श्री विष्णु चालीसा हिंदी अर्थ सहित | Vishnu Chalisa
श्री विष्णु चालीसा जगत के पालनकर्ता भगवान श्रीहरि विष्णु की महिमा, दिव्य स्वरूप, अवतारों और भक्तों पर उनकी कृपा का गुणगान करती है। नीचे श्री विष्णु चालीसा का प्रचलित पाठ सरल हिंदी भावार्थ सहित प्रस्तुत है।
कीरत कुछ वर्णन करूँ, दीजै ज्ञान बताय॥
अर्थ: हे भगवान विष्णु! अपने सेवक की विनती सुनिए। आपकी महिमा का वर्णन करने के लिए मुझे ज्ञान और सद्बुद्धि प्रदान कीजिए।
कष्ट नशावन अखिल बिहारी॥
अर्थ: हे भगवान विष्णु! आपको प्रणाम है। आप भक्तों के संकटों को दूर करने और संसार का पालन करने वाले हैं।
त्रिभुवन फैल रही उजियारी॥
अर्थ: आपकी दिव्य शक्ति पूरे संसार और तीनों लोकों में प्रकाशमान है।
सरल स्वभाव मोहनी मूरत॥
अर्थ: आपका दिव्य रूप अत्यंत सुंदर, मनोहर और भक्तों को आकर्षित करने वाला है।
बैजन्ती माला मन मोहत॥
अर्थ: आपके शरीर पर पीताम्बर और गले में वैजयंती माला अत्यंत शोभायमान है।
देखत दैत्य असुर दल भाजे॥
अर्थ: आपके हाथों में शंख, चक्र और गदा सुशोभित हैं, जो धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के प्रतीक हैं।
काम क्रोध मद लोभ न छाजे॥
अर्थ: जहाँ सत्य और धर्म का पालन होता है, वहाँ काम, क्रोध, अहंकार और लोभ जैसे विकारों पर नियंत्रण की प्रेरणा मिलती है।
दनुज असुर दुष्टन दल गंजन॥
अर्थ: भगवान अपने संतों और भक्तों को आनंद देने तथा दुष्ट प्रवृत्तियों का नाश करने वाले हैं।
दोष मिटाय करत जन सज्जन॥
अर्थ: भगवान की भक्ति मनुष्य को सद्गुणों की ओर प्रेरित करती है और मन के दोष दूर करने का मार्ग दिखाती है।
कष्ट नाशकर भक्त उबारण॥
अर्थ: भक्त भगवान से अपने दोषों से मुक्ति और संसाररूपी सागर से पार लगाने की प्रार्थना करता है।
केवल आप भक्ति के कारण॥
अर्थ: भगवान विष्णु धर्म की रक्षा और भक्तों के कल्याण के लिए अनेक अवतार धारण करते हैं।
तब तुम रूप राम का धारा॥
अर्थ: पृथ्वी पर अधर्म बढ़ने पर भगवान ने श्रीराम के रूप में अवतार लेकर धर्म की स्थापना की।
रावण आदिक को संहारा॥
अर्थ: श्रीराम रूप में भगवान ने रावण सहित अधर्मी शक्तियों का नाश कर पृथ्वी का भार कम किया।
हिरण्याक्ष को मार गिराया॥
अर्थ: वराह अवतार में भगवान विष्णु ने हिरण्याक्ष का संहार कर पृथ्वी की रक्षा की।
चौदह रतनन को निकलाया॥
अर्थ: इस पद में भगवान के मत्स्य स्वरूप और समुद्र से जुड़े पौराणिक प्रसंगों का स्मरण किया गया है।
रूप मोहनी आप दिखाया॥
अर्थ: समुद्र मंथन के समय देव-असुर संघर्ष में भगवान ने मोहिनी रूप धारण किया।
असुरन को छबि से बहलाया॥
अर्थ: मोहिनी रूप में भगवान ने देवताओं को अमृत प्रदान करने की व्यवस्था की।
मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया॥
अर्थ: कूर्म अवतार में भगवान ने समुद्र मंथन के समय मन्दराचल पर्वत को आधार दिया।
भस्मासुर को रूप दिखाया॥
अर्थ: भस्मासुर के प्रसंग में भगवान ने अपनी लीला से भगवान शिव को संकट से मुक्त किया।
कर प्रबन्ध उन्हें ढुँढवाया॥
अर्थ: पौराणिक कथा में भगवान ने वेदों और दिव्य ज्ञान की रक्षा की।
उसही कर से भस्म कराया॥
अर्थ: भगवान ने मोहिनी रूप द्वारा भस्मासुर को उसकी ही शक्ति से पराजित किया।
शंकर से उन कीन्ह लड़ाई॥
अर्थ: इस पद में शक्तिशाली असुर जलंधर और भगवान शिव के युद्ध का पौराणिक प्रसंग है।
कीन सती से छल खल जाई॥
अर्थ: जलंधर की शक्ति और उससे जुड़े पौराणिक घटनाक्रम का वर्णन इस पद में किया गया है।
बतलाई सब विपत कहानी॥
अर्थ: संकट के समय भगवान विष्णु का स्मरण करके सहायता की प्रार्थना करने का भाव व्यक्त किया गया है।
वृन्दा की सब सुरति भुलानी॥
अर्थ: वृंदा और जलंधर की पौराणिक कथा में भगवान के एक विशेष रूप का वर्णन है।
वृन्दा आय तुम्हें लपटानी॥
अर्थ: यह वृंदा-जालंधर प्रसंग की आगे की कथा का भाग है।
हना असुर उर शिव शैतानी॥
अर्थ: इस प्रसंग का अंत जलंधर के वध और धर्म की पुनर्स्थापना से जोड़ा गया है।
हिरण्यकशिपु आदिक खल मारे॥
अर्थ: भगवान ने ध्रुव और प्रह्लाद जैसे भक्तों पर कृपा की तथा हिरण्यकशिपु जैसे अधर्मी का अंत किया।
बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे॥
अर्थ: भक्तिपरंपरा में भगवान की करुणा से अनेक लोगों के उद्धार की कथाएँ कही गई हैं।
कृपा करहु हरि सिरजन हारे॥
अर्थ: हे श्रीहरि! हमारे दुख और मानसिक संताप दूर कर हम पर कृपा कीजिए।
दीन बन्धु भक्तन हितकारे॥
अर्थ: भक्त दीनबंधु भगवान विष्णु के दर्शन और कृपा की कामना करता है।
करहु दया अपनी मधुसूदन॥
अर्थ: हे मधुसूदन! आपका सेवक आपके दर्शन और करुणा की प्रार्थना करता है।
होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन॥
अर्थ: भक्त विनम्रता से स्वीकार करता है कि उसे पूजा और साधना की पूर्ण विधि ज्ञात नहीं है।
विदित नहीं व्रत बोध विलक्षण॥
अर्थ: भक्त भगवान से शील, दया, संतोष और अच्छे गुणों की प्राप्ति की प्रार्थना करता है।
कुमति विलोक होत दुख भीषण॥
अर्थ: भक्त अपनी सीमित बुद्धि को स्वीकार कर प्रभु से सही भक्ति का मार्ग दिखाने की विनती करता है।
कौन भाँति मैं करहुँ समर्पण॥
अर्थ: भक्त भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण और स्मरण का सही भाव पाने की प्रार्थना करता है।
हर्षित रहत परम गति पाई॥
अर्थ: देवता और मुनि भी भगवान की सेवा और स्मरण करके परम आनंद का अनुभव करते हैं।
निज जन जान लेव अपनाई॥
अर्थ: भगवान को दीन और दुखी भक्तों का सहारा माना गया है। भक्त उनसे स्वयं को अपनाने की प्रार्थना करता है।
भव बन्धन से मुक्त कराओ॥
अर्थ: भक्त भगवान से अपने दोष, दुख और सांसारिक बंधनों से मुक्ति की प्रार्थना करता है।
निज चरणन का दास बनाओ॥
अर्थ: भक्त परिवार के कल्याण और सुख की कामना करते हुए सबसे बढ़कर भगवान के चरणों में भक्ति माँगता है।
पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै॥
अर्थ: समापन में श्रद्धा से विष्णु चालीसा पढ़ने और सुनने वाले भक्त के कल्याण और आध्यात्मिक सुख की कामना की गई है।
श्री विष्णु चालीसा का पाठ श्रद्धा, सदाचार और भगवान श्रीहरि के प्रति समर्पण भाव से करें। भगवान विष्णु की उपासना का भाव धर्म, करुणा, संतुलन और संसार के कल्याण से जुड़ा हुआ है।
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