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सुंदरकांड भाग 2: हनुमान जी का लंका प्रस्थान और मैनाक पर्वत | दोहा 1 अर्थ सहित
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॥ ✦ श्रीराम ✦ ॥
श्रीगोस्वामी तुलसीदास कृत
श्रीरामचरितमानस — सुन्दरकाण्ड
भाग 2 • हनुमान जी का लंका प्रस्थान और मैनाक पर्वत
मंगलाचरण के पश्चात सुन्दरकाण्ड की कथा आरंभ होती है।
जामवंत जी द्वारा अपनी शक्ति का स्मरण कराए जाने पर
श्रीहनुमान जी के हृदय में श्रीराम-काज पूर्ण करने का उत्साह जागृत होता है।
वे सभी वानरों को प्रणाम करके माता सीता की खोज के लिए समुद्र पार लंका की ओर प्रस्थान करते हैं।
॥ श्रीहनुमान जी का प्रस्थान ॥
सुन्दरकाण्ड • प्रथम दोहा तक का सम्पूर्ण मूल पाठ
चौपाई
जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।।
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई।।
सरल भावार्थ
जामवंत जी के सुंदर और प्रेरणादायक वचन सुनकर हनुमान जी के हृदय को बहुत आनंद हुआ।
उन्होंने अपने साथियों से कहा—हे भाइयो! मेरे लौटने तक तुम यहीं मेरी राह देखना
और कंद-मूल-फल खाकर इस कठिन समय को सहन करना।
हनुमान जी ने कहा—जब तक मैं माता सीता को देखकर वापस न आऊँ,
तब तक मेरी प्रतीक्षा करना। मेरे हृदय में विशेष आनंद हो रहा है,
इसलिए मुझे विश्वास है कि श्रीराम का कार्य अवश्य सफल होगा।
ऐसा कहकर उन्होंने सबको मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और हृदय में
श्रीरघुनाथ जी को धारण करके हर्षपूर्वक चल पड़े।
चौपाई
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर।।
बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी।।
सरल भावार्थ
समुद्र के किनारे एक सुंदर पर्वत था। हनुमान जी सहज भाव से छलाँग लगाकर
उस पर्वत के ऊपर चढ़ गए। उन्होंने बार-बार श्रीरघुवीर का स्मरण किया
और फिर पवनपुत्र ने अपने महान बल से समुद्र पार करने के लिए प्रचंड छलाँग लगाई।
चौपाई
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता।।
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना।।
सरल भावार्थ
जिस पर्वत पर पैर रखकर हनुमान जी ने छलाँग लगाई,
उनके वेग से वह पर्वत तुरंत नीचे पाताल की ओर धँस गया।
जिस प्रकार श्रीरघुनाथ जी का छोड़ा हुआ बाण लक्ष्य से कभी नहीं चूकता,
उसी प्रकार हनुमान जी भी अपने लक्ष्य की ओर तीव्र गति से बढ़ चले।
समुद्र ने जब हनुमान जी को श्रीरघुनाथ जी का दूत समझा,
तब उसने मैनाक पर्वत से कहा कि तुम ऊपर उठो और
श्रीरामदूत हनुमान जी की यात्रा की थकान दूर करने के लिए उन्हें विश्राम दो।
॥ दोहा 1 ॥
हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।।1।।
दोहा का सरल भावार्थ
हनुमान जी ने मैनाक पर्वत को स्पर्श किया और आदरपूर्वक प्रणाम करके आगे बढ़ गए।
उनका भाव था—श्रीराम का कार्य पूरा किए बिना मेरे लिए विश्राम कहाँ है?
🌺 इस प्रसंग का भाव
इस प्रसंग में हनुमान जी की सबसे बड़ी विशेषता केवल उनका असाधारण बल नहीं,
बल्कि लक्ष्य के प्रति उनका पूर्ण समर्पण है।
वे यात्रा आरंभ करने से पहले श्रीराम का स्मरण करते हैं,
साथियों का सम्मान करते हैं और मार्ग में सम्मानपूर्वक मिले विश्राम के अवसर को भी
अस्वीकार नहीं करते, बल्कि मैनाक को प्रणाम करके आगे बढ़ते हैं।
उनका संकल्प स्पष्ट है—
प्रभु का कार्य पूरा होने से पहले विश्राम नहीं।
मूल पाठ:
श्रीरामचरितमानस — पञ्चम सोपान, सुन्दरकाण्ड, दोहा 1 तक।
मूल चौपाइयों एवं दोहे का प्रमाणिक डिजिटल पाठ से मिलान किया गया है।
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