सुंदरकांड भाग 19: समुद्र से मार्ग की विनती, रावण के गुप्तचर और लक्ष्मण का संदेश | दोहा 50–53

॥ ✦ श्रीराम ✦ ॥
श्रीगोस्वामी तुलसीदास कृत
श्रीरामचरितमानस — सुन्दरकाण्ड
भाग 19 • समुद्र से मार्ग की विनती एवं रावण के गुप्तचर
विभीषण को अपनी शरण में लेकर और लंका का भावी राजा घोषित करने के बाद श्रीराम अब विशाल समुद्र को पार करने के उपाय पर विचार करते हैं।

विभीषण नीति के अनुसार समुद्र से मार्ग माँगने की सलाह देते हैं। लक्ष्मण जी को यह उपाय पसंद नहीं आता, पर श्रीराम उन्हें समझाकर समुद्र तट पर विनयपूर्वक बैठते हैं।

इसी बीच रावण द्वारा भेजे गए गुप्तचर वानर रूप धारण करके श्रीराम की सेना में पहुँचते हैं। प्रभु का शरणागतों के प्रति प्रेम देखकर वे भी भाव-विभोर हो जाते हैं।

॥ समुद्र पार करने का उपाय ॥

सुन्दरकाण्ड • दोहा 50 से दोहा 53 तक
चौपाई

अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना।।
निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा।।

सरल भावार्थ
गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि ऐसे कृपालु श्रीराम को छोड़कर जो अन्य आश्रय खोजता है, वह अपने वास्तविक कल्याण को नहीं पहचानता।

श्रीराम ने विभीषण को अपना भक्त जानकर स्वीकार कर लिया। प्रभु का यह दयालु स्वभाव समस्त वानर-सेना को बहुत प्रिय लगा।
चौपाई

पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी।।
बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक।।

सरल भावार्थ
सब कुछ जानने वाले और सबके हृदय में निवास करने वाले श्रीराम, जो सभी रूपों में व्याप्त होते हुए भी उनसे निर्लिप्त हैं, अब नीति के अनुसार विचार करने लगे।

मानव रूप में प्रकट हुए प्रभु ने वानरराज सुग्रीव और विभीषण से आगे का उपाय पूछा।
चौपाई

सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा।।
संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती।।

सरल भावार्थ
श्रीराम बोले— हे वानरराज सुग्रीव और वीर लंकापति विभीषण! बताइए इस गहरे समुद्र को किस प्रकार पार किया जाए?

यह समुद्र मगरों, सर्पों और अनेक जलचर जीवों से भरा है और अत्यंत गहरा तथा कठिन है।
चौपाई

कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक।।
जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई।।

सरल भावार्थ
विभीषण बोले— हे श्रीरघुनाथ! आपके बाण तो करोड़ों समुद्रों को सुखाने में समर्थ हैं।

फिर भी नीति यही कहती है कि पहले विनम्रतापूर्वक समुद्र से मार्ग देने की प्रार्थना करनी चाहिए।
॥ दोहा 50 ॥

प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि।।50।।

दोहा का सरल भावार्थ
विभीषण ने कहा— हे प्रभु! समुद्र आपके कुल का गुरु माना गया है। उससे विनय करने पर वह स्वयं उचित उपाय बताएगा,

जिससे पूरी वानर और भालू सेना बिना अनावश्यक कठिनाई के समुद्र पार कर सकेगी।

॥ लक्ष्मण जी का मत और श्रीराम की विनय ॥

चौपाई

सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई।।
मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा।।

सरल भावार्थ
श्रीराम ने कहा— हे सखा! तुमने अच्छा उपाय बताया है। यदि दैव की सहायता हुई तो ऐसा ही किया जाए।

लेकिन यह बात लक्ष्मण जी को पसंद नहीं आई। प्रभु की वाणी सुनकर उनके मन में असंतोष हुआ।
चौपाई

नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा।।
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।।

सरल भावार्थ
लक्ष्मण जी बोले— हे नाथ! केवल भाग्य पर भरोसा क्यों किया जाए? आप क्रोध करके समुद्र को सुखा सकते हैं।

उनका भाव था कि समर्थ व्यक्ति को उचित पुरुषार्थ भी करना चाहिए और केवल दैव के भरोसे निष्क्रिय नहीं बैठना चाहिए।
चौपाई

सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा।।
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई।।

सरल भावार्थ
लक्ष्मण जी की बात सुनकर श्रीराम मुस्कराए और बोले— धैर्य रखो, आवश्यकता पड़ने पर वैसा भी किया जाएगा।

इस प्रकार लक्ष्मण जी को समझाकर श्रीराम समुद्र के समीप गए।
चौपाई

प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई।।
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए।।

सरल भावार्थ
श्रीराम ने पहले समुद्र को प्रणाम किया और फिर समुद्र तट पर कुश बिछाकर बैठ गए।

उधर जब विभीषण श्रीराम की शरण में आए थे, तभी रावण ने उनके पीछे अपने गुप्तचर भेज दिए थे।
॥ दोहा 51 ॥

सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह।।51।।

दोहा का सरल भावार्थ
रावण के गुप्तचर कपट से वानर रूप धारण करके श्रीराम की सेना में होने वाली सभी घटनाएँ देखते रहे।

लेकिन शरणागत विभीषण के प्रति श्रीराम का प्रेम देखकर वे मन ही मन प्रभु के गुणों की प्रशंसा करने लगे।

॥ रावण के गुप्तचर पकड़े गए ॥

चौपाई

प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ।।
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने।।

सरल भावार्थ
श्रीराम का स्वभाव देखकर वे गुप्तचर इतने प्रभावित हुए कि अपना छिपाव भूलकर प्रेम से प्रभु की प्रशंसा करने लगे।

तब वानरों ने पहचान लिया कि ये शत्रु के दूत हैं और उन्हें बाँधकर सुग्रीव के सामने ले आए।
चौपाई

कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर।।
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए।।

सरल भावार्थ
सुग्रीव ने वानरों को दूतों को दंड देकर वापस भेजने का आदेश दिया।

वानरों ने उन्हें बाँधकर सेना के बीच घुमाया और दंड देने के लिए आगे बढ़े।
चौपाई

बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे।।
जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना।।

सरल भावार्थ
भयभीत दूतों ने अंततः श्रीराम की शरण और मर्यादा का स्मरण कराया।

उन्होंने कहा कि यदि उनके साथ अत्यधिक कठोर व्यवहार किया जाए, तो ऐसा करने वाले को कोसलपति श्रीराम की शपथ है।
चौपाई

सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोडाए।।
रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती।।

सरल भावार्थ
यह सुनकर लक्ष्मण जी ने उन सभी दूतों को अपने पास बुलाया और दया करके तुरंत छुड़वा दिया।

फिर उन्होंने रावण के लिए एक पत्र दिया और कहा— इसे रावण को देना तथा मेरा संदेश उसे स्पष्ट रूप से सुनाना।
॥ दोहा 52 ॥

कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार।।52।।

दोहा का सरल भावार्थ
लक्ष्मण जी ने कहा— रावण से स्पष्ट रूप से मेरा संदेश कहना—

माता सीता को सम्मानपूर्वक लौटाकर श्रीराम से मिलो; अन्यथा तुम्हारे विनाश का समय निकट है।

॥ दूतों का लंका लौटना ॥

चौपाई

तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा।।
कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए।।

सरल भावार्थ
दूतों ने लक्ष्मण जी के चरणों में सिर झुकाया और श्रीराम के गुणों की चर्चा करते हुए लंका के लिए चल पड़े।

रास्ते भर श्रीराम का यश कहते हुए वे लंका पहुँचे और राजसभा की मर्यादा के अनुसार रावण के सामने उपस्थित हुए।
चौपाई

बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता।।
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी।।

सरल भावार्थ
रावण हँसकर अपने दूत शुक से समाचार पूछता है— तुम अपनी कुशल क्यों नहीं बता रहे?

फिर वह विभीषण के विषय में पूछता है, जिसे वह अपने अहंकार के कारण विनाश के निकट समझ रहा था।
चौपाई

करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी।।
पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई।।

सरल भावार्थ
रावण विभीषण का उपहास करते हुए कहता है कि उसने लंका का राज्य छोड़ दिया और अब वह श्रीराम के पास जा मिला है।

इसके बाद वह वानर और भालुओं की सेना का समाचार पूछता है, जो समुद्र के उस पार आ पहुँची थी।
चौपाई

जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा।।
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी।।

सरल भावार्थ
रावण अहंकारपूर्वक श्रीराम और उनकी सेना को कम आँकता है और समुद्र के सामने प्रभु की विनय का भी उपहास करता है।

वह दूत से कहता है कि अब श्रीराम और उनकी सेना का वास्तविक बल और स्थिति विस्तार से बताओ।
॥ दोहा 53 ॥

की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर।।53।।

दोहा का सरल भावार्थ
रावण पूछता है— क्या तुम उनसे मिले या केवल मेरा यश सुनकर ही लौट आए?

शत्रु की सेना का तेज और बल क्यों नहीं बताते? तुम इतने आश्चर्यचकित और गंभीर क्यों दिखाई दे रहे हो?

🌺 इस प्रसंग का भाव

इस भाग में श्रीराम की नीति, विनय और करुणा तीनों दिखाई देती हैं।

असीम सामर्थ्य होते हुए भी प्रभु पहले समुद्र से विनय का मार्ग अपनाते हैं। दूसरी ओर उनके शरणागत-प्रेम का प्रभाव इतना गहरा है कि रावण के गुप्तचर भी उसे देखकर श्रीराम के गुणों की प्रशंसा करने लगते हैं।

लक्ष्मण जी दूतों को दया से मुक्त करते हैं, लेकिन रावण को सत्य और स्पष्ट चेतावनी भी भेजते हैं।

धर्म में विनम्रता और करुणा होती है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर सत्य को स्पष्ट रूप से कहने का साहस भी होता है।

मूल पाठ: श्रीरामचरितमानस — पञ्चम सोपान, सुन्दरकाण्ड। इस भाग में दोहा 50, 51, 52 और 53 तथा इनके अंतर्गत आने वाली सभी चौपाइयाँ क्रमवार मिलान करके प्रस्तुत की गई हैं।
अगला प्रसंग — शुक द्वारा श्रीराम की विशाल सेना का वर्णन, लक्ष्मण का पत्र और रावण को अंतिम चेतावनी
॥ जय श्रीराम • जय हनुमान ॥

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय भक्ति सामग्री

सुंदरकांड भाग 20: श्रीराम की सेना का वर्णन, लक्ष्मण का पत्र और रावण को अंतिम चेतावनी | दोहा 54–57

श्री हनुमान आरती: आरती कीजै हनुमान लला की, अर्थ सहित | Hanuman Aarti

सुंदरकांड भाग 21: श्रीराम का समुद्र पर क्रोध, नल-नील का उपाय और सुंदरकांड समापन | दोहा 58–60