सुंदरकांड भाग 19: समुद्र से मार्ग की विनती, रावण के गुप्तचर और लक्ष्मण का संदेश | दोहा 50–53
विभीषण नीति के अनुसार समुद्र से मार्ग माँगने की सलाह देते हैं। लक्ष्मण जी को यह उपाय पसंद नहीं आता, पर श्रीराम उन्हें समझाकर समुद्र तट पर विनयपूर्वक बैठते हैं।
इसी बीच रावण द्वारा भेजे गए गुप्तचर वानर रूप धारण करके श्रीराम की सेना में पहुँचते हैं। प्रभु का शरणागतों के प्रति प्रेम देखकर वे भी भाव-विभोर हो जाते हैं।
॥ समुद्र पार करने का उपाय ॥
अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना।।
निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा।।
श्रीराम ने विभीषण को अपना भक्त जानकर स्वीकार कर लिया। प्रभु का यह दयालु स्वभाव समस्त वानर-सेना को बहुत प्रिय लगा।
पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी।।
बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक।।
मानव रूप में प्रकट हुए प्रभु ने वानरराज सुग्रीव और विभीषण से आगे का उपाय पूछा।
सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा।।
संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती।।
यह समुद्र मगरों, सर्पों और अनेक जलचर जीवों से भरा है और अत्यंत गहरा तथा कठिन है।
कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक।।
जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई।।
फिर भी नीति यही कहती है कि पहले विनम्रतापूर्वक समुद्र से मार्ग देने की प्रार्थना करनी चाहिए।
प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि।।50।।
जिससे पूरी वानर और भालू सेना बिना अनावश्यक कठिनाई के समुद्र पार कर सकेगी।
॥ लक्ष्मण जी का मत और श्रीराम की विनय ॥
सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई।।
मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा।।
लेकिन यह बात लक्ष्मण जी को पसंद नहीं आई। प्रभु की वाणी सुनकर उनके मन में असंतोष हुआ।
नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा।।
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।।
उनका भाव था कि समर्थ व्यक्ति को उचित पुरुषार्थ भी करना चाहिए और केवल दैव के भरोसे निष्क्रिय नहीं बैठना चाहिए।
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा।।
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई।।
इस प्रकार लक्ष्मण जी को समझाकर श्रीराम समुद्र के समीप गए।
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई।।
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए।।
उधर जब विभीषण श्रीराम की शरण में आए थे, तभी रावण ने उनके पीछे अपने गुप्तचर भेज दिए थे।
सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह।।51।।
लेकिन शरणागत विभीषण के प्रति श्रीराम का प्रेम देखकर वे मन ही मन प्रभु के गुणों की प्रशंसा करने लगे।
॥ रावण के गुप्तचर पकड़े गए ॥
प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ।।
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने।।
तब वानरों ने पहचान लिया कि ये शत्रु के दूत हैं और उन्हें बाँधकर सुग्रीव के सामने ले आए।
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर।।
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए।।
वानरों ने उन्हें बाँधकर सेना के बीच घुमाया और दंड देने के लिए आगे बढ़े।
बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे।।
जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना।।
उन्होंने कहा कि यदि उनके साथ अत्यधिक कठोर व्यवहार किया जाए, तो ऐसा करने वाले को कोसलपति श्रीराम की शपथ है।
सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोडाए।।
रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती।।
फिर उन्होंने रावण के लिए एक पत्र दिया और कहा— इसे रावण को देना तथा मेरा संदेश उसे स्पष्ट रूप से सुनाना।
कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार।।52।।
माता सीता को सम्मानपूर्वक लौटाकर श्रीराम से मिलो; अन्यथा तुम्हारे विनाश का समय निकट है।
॥ दूतों का लंका लौटना ॥
तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा।।
कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए।।
रास्ते भर श्रीराम का यश कहते हुए वे लंका पहुँचे और राजसभा की मर्यादा के अनुसार रावण के सामने उपस्थित हुए।
बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता।।
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी।।
फिर वह विभीषण के विषय में पूछता है, जिसे वह अपने अहंकार के कारण विनाश के निकट समझ रहा था।
करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी।।
पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई।।
इसके बाद वह वानर और भालुओं की सेना का समाचार पूछता है, जो समुद्र के उस पार आ पहुँची थी।
जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा।।
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी।।
वह दूत से कहता है कि अब श्रीराम और उनकी सेना का वास्तविक बल और स्थिति विस्तार से बताओ।
की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर।।53।।
शत्रु की सेना का तेज और बल क्यों नहीं बताते? तुम इतने आश्चर्यचकित और गंभीर क्यों दिखाई दे रहे हो?
🌺 इस प्रसंग का भाव
इस भाग में श्रीराम की नीति, विनय और करुणा तीनों दिखाई देती हैं।
असीम सामर्थ्य होते हुए भी प्रभु पहले समुद्र से विनय का मार्ग अपनाते हैं।
दूसरी ओर उनके शरणागत-प्रेम का प्रभाव इतना गहरा है
कि रावण के गुप्तचर भी उसे देखकर श्रीराम के गुणों की प्रशंसा करने लगते हैं।
लक्ष्मण जी दूतों को दया से मुक्त करते हैं,
लेकिन रावण को सत्य और स्पष्ट चेतावनी भी भेजते हैं।
धर्म में विनम्रता और करुणा होती है,
लेकिन आवश्यकता पड़ने पर सत्य को स्पष्ट रूप से कहने का साहस भी होता है।
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