सुंदरकांड भाग 4: सिंहिका वध, लंका दर्शन और लंकिनी प्रसंग | अर्थ सहित
अब उनके मार्ग में एक ऐसी राक्षसी आती है जो आकाश में उड़ने वाले जीवों की छाया पकड़कर उन्हें नीचे खींच लेती थी। इस बाधा को पार करने के बाद हनुमान जी पहली बार स्वर्णमयी लंका को देखते हैं और रात्रि में नगर में प्रवेश करने का विचार करते हैं।
॥ सिंहिका वध ॥
निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई।।
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं।।
जो जीव आकाश में उड़ते थे, उनकी परछाईं जब समुद्र के जल में दिखाई देती, तब वह उसी छाया को पकड़ लेती थी।
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई।।
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा।।
उसने हनुमान जी के साथ भी वही छल किया, परंतु बुद्धिमान हनुमान जी तुरंत उसकी चाल समझ गए।
ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा।।
तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा।।
दूसरी ओर पहुँचकर उन्होंने सुंदर वन की शोभा देखी। मधु के लोभ में भौंरे मधुर गुंजार कर रहे थे।
नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए।।
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें।।
आगे उन्हें एक विशाल पर्वत दिखाई दिया। वे निर्भय होकर तेजी से उस पर्वत के ऊपर चढ़ गए।
उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई।।
गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी।।
पर्वत पर चढ़कर हनुमान जी ने लंका को देखा। वह इतनी विशाल और दुर्गम थी कि उसके विशेष वैभव का वर्णन करना कठिन था।
अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा।।
॥ स्वर्णमयी लंका का वर्णन ॥
कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना।।
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै।।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै।।
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं।।
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं।।
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं।।
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही।।
हाथी, घोड़े, खच्चर, पैदल सैनिक और रथों की संख्या बहुत अधिक थी। अनेक रूपों वाले अत्यंत बलवान राक्षसों की विशाल सेना थी।
वन, बाग, उपवन, वाटिकाएँ, सरोवर, कुएँ और बावड़ियाँ नगर की शोभा बढ़ा रहे थे। लंका के वैभव का वर्णन अत्यंत विलक्षण था।
विशाल शरीर वाले बलवान राक्षस गर्जना करते थे और विभिन्न अखाड़ों में युद्धाभ्यास तथा शक्ति प्रदर्शन करते थे। असंख्य विकराल योद्धा चारों दिशाओं से नगर की रक्षा कर रहे थे।
पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार।।3।।
॥ लंकिनी प्रसंग ॥
मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।
वहाँ लंकिनी नाम की एक राक्षसी लंका की रक्षा कर रही थी। उसने हनुमान जी को रोककर कठोर वचन कहे।
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।।
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।।
तब महाबली हनुमान जी ने उसे एक घूँसा मारा। वह रक्त उगलती हुई भूमि पर गिर पड़ी।
पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।।
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।
उसने बताया कि जब ब्रह्माजी ने रावण को वरदान दिया था, तब जाते समय उन्होंने उसके लिए एक संकेत भी बताया था।
बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे।।
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता।।
लंकिनी ने हनुमान जी से कहा— हे तात! आज मेरे महान पुण्य का उदय हुआ है, क्योंकि मैंने अपनी आँखों से भगवान श्रीराम के दूत का दर्शन किया है।
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।4।।
🌺 इस प्रसंग का भाव
इस पूरे प्रसंग में श्रीहनुमान जी की शक्ति के साथ-साथ
उनकी बुद्धि और लक्ष्य के प्रति जागरूकता दिखाई देती है।
सिंहिका उनकी गति रोकती है तो वे बाधा को पहचानकर आगे बढ़ते हैं।
विशाल एवं सुरक्षित लंका देखकर वे बिना सोचे सीधे प्रवेश नहीं करते,
बल्कि परिस्थितियों को समझकर छोटा रूप धारण करने का निर्णय लेते हैं।
और लंकिनी के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास जी हमें
सत्संग की महानता का सुंदर संदेश देते हैं—
प्रभु के भक्त का संग जीवन की दिशा बदल सकता है।
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