सुंदरकांड भाग 4: सिंहिका वध, लंका दर्शन और लंकिनी प्रसंग | अर्थ सहित

॥ ✦ श्रीराम ✦ ॥
श्रीगोस्वामी तुलसीदास कृत
श्रीरामचरितमानस — सुन्दरकाण्ड
भाग 4 • सिंहिका वध, लंका दर्शन एवं लंकिनी प्रसंग
सुरसा की परीक्षा में अपनी बुद्धि और विनम्रता का परिचय देकर श्रीहनुमान जी समुद्र के ऊपर तीव्र गति से आगे बढ़ते हैं।

अब उनके मार्ग में एक ऐसी राक्षसी आती है जो आकाश में उड़ने वाले जीवों की छाया पकड़कर उन्हें नीचे खींच लेती थी। इस बाधा को पार करने के बाद हनुमान जी पहली बार स्वर्णमयी लंका को देखते हैं और रात्रि में नगर में प्रवेश करने का विचार करते हैं।

॥ सिंहिका वध ॥

सुन्दरकाण्ड • दोहा 3 एवं दोहा 4 तक
चौपाई

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई।।
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं।।

सरल भावार्थ
समुद्र में एक राक्षसी रहती थी। वह अपनी मायाशक्ति से आकाश में उड़ने वाले जीवों को पकड़ लिया करती थी।

जो जीव आकाश में उड़ते थे, उनकी परछाईं जब समुद्र के जल में दिखाई देती, तब वह उसी छाया को पकड़ लेती थी।
चौपाई

गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई।।
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा।।

सरल भावार्थ
वह जिस जीव की छाया पकड़ लेती, वह फिर उड़ नहीं पाता। इसी प्रकार वह आकाश में उड़ने वाले जीवों को अपना आहार बनाती थी।

उसने हनुमान जी के साथ भी वही छल किया, परंतु बुद्धिमान हनुमान जी तुरंत उसकी चाल समझ गए।
चौपाई

ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा।।
तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा।।

सरल भावार्थ
वीर पवनपुत्र हनुमान जी ने उस राक्षसी का अंत किया और धैर्य एवं बुद्धि के साथ समुद्र पार कर गए।

दूसरी ओर पहुँचकर उन्होंने सुंदर वन की शोभा देखी। मधु के लोभ में भौंरे मधुर गुंजार कर रहे थे।
चौपाई

नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए।।
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें।।

सरल भावार्थ
वहाँ अनेक प्रकार के सुंदर वृक्ष, फल और फूल थे। पक्षियों और पशुओं के समूहों को देखकर हनुमान जी का मन प्रसन्न हुआ।

आगे उन्हें एक विशाल पर्वत दिखाई दिया। वे निर्भय होकर तेजी से उस पर्वत के ऊपर चढ़ गए।
चौपाई

उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई।।
गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी।।

सरल भावार्थ
भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं— इसमें हनुमान जी की अपनी कोई बड़ाई नहीं है; यह सब उस प्रभु श्रीराम के प्रताप का फल है, जिनकी शक्ति काल को भी जीत सकती है।

पर्वत पर चढ़कर हनुमान जी ने लंका को देखा। वह इतनी विशाल और दुर्गम थी कि उसके विशेष वैभव का वर्णन करना कठिन था।
चौपाई

अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा।।

सरल भावार्थ
लंका अत्यंत ऊँचे स्थान पर बसी हुई थी और चारों ओर समुद्र से घिरी थी। उसके स्वर्ण से बने विशाल परकोटे अत्यंत तेजस्वी दिखाई दे रहे थे।

॥ स्वर्णमयी लंका का वर्णन ॥

छंद

कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना।।

गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै।।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै।।

बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं।।

कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं।।

करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं।।

एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही।।

छंद का सरल भावार्थ
लंका का स्वर्णमय दुर्ग अनेक प्रकार की विचित्र मणियों से सजा हुआ था। उसके भीतर सुंदर भवन, चौक, बाजार और आकर्षक गलियाँ थीं।

हाथी, घोड़े, खच्चर, पैदल सैनिक और रथों की संख्या बहुत अधिक थी। अनेक रूपों वाले अत्यंत बलवान राक्षसों की विशाल सेना थी।

वन, बाग, उपवन, वाटिकाएँ, सरोवर, कुएँ और बावड़ियाँ नगर की शोभा बढ़ा रहे थे। लंका के वैभव का वर्णन अत्यंत विलक्षण था।

विशाल शरीर वाले बलवान राक्षस गर्जना करते थे और विभिन्न अखाड़ों में युद्धाभ्यास तथा शक्ति प्रदर्शन करते थे। असंख्य विकराल योद्धा चारों दिशाओं से नगर की रक्षा कर रहे थे।
॥ दोहा 3 ॥

पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार।।3।।

दोहा का सरल भावार्थ
नगर के चारों ओर अनेक रक्षकों को देखकर हनुमान जी ने विचार किया कि रात के समय अत्यंत छोटा रूप धारण करके ही लंका में प्रवेश करना उचित होगा।

॥ लंकिनी प्रसंग ॥

चौपाई

मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी ने मच्छर के समान अत्यंत छोटा रूप धारण किया और भगवान श्रीराम का स्मरण करते हुए लंका की ओर बढ़े।

वहाँ लंकिनी नाम की एक राक्षसी लंका की रक्षा कर रही थी। उसने हनुमान जी को रोककर कठोर वचन कहे।
चौपाई

जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।।
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।।

सरल भावार्थ
लंकिनी ने कहा—तुम मेरे रहस्य को नहीं जानते। यहाँ आने वाले चोर ही मेरे भोजन हैं।

तब महाबली हनुमान जी ने उसे एक घूँसा मारा। वह रक्त उगलती हुई भूमि पर गिर पड़ी।
चौपाई

पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।।
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।

सरल भावार्थ
कुछ समय बाद लंकिनी स्वयं को सँभालकर उठी। उसने हाथ जोड़कर विनम्रता से हनुमान जी से बात की।

उसने बताया कि जब ब्रह्माजी ने रावण को वरदान दिया था, तब जाते समय उन्होंने उसके लिए एक संकेत भी बताया था।
चौपाई

बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे।।
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता।।

सरल भावार्थ
ब्रह्माजी ने कहा था कि जब किसी वानर के प्रहार से तुम व्याकुल हो जाओ, तब समझ लेना कि राक्षसों के विनाश का समय निकट आ गया है।

लंकिनी ने हनुमान जी से कहा— हे तात! आज मेरे महान पुण्य का उदय हुआ है, क्योंकि मैंने अपनी आँखों से भगवान श्रीराम के दूत का दर्शन किया है।
॥ दोहा 4 ॥

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।4।।

दोहा का सरल भावार्थ
लंकिनी कहती है— हे तात! एक ओर स्वर्ग और मोक्ष के सभी सुखों को रख दिया जाए, और दूसरी ओर केवल एक क्षण के सत्संग का आनंद रखा जाए, तो भी वे सभी सुख उस थोड़े-से सत्संग के समान नहीं हो सकते।

🌺 इस प्रसंग का भाव

इस पूरे प्रसंग में श्रीहनुमान जी की शक्ति के साथ-साथ उनकी बुद्धि और लक्ष्य के प्रति जागरूकता दिखाई देती है।

सिंहिका उनकी गति रोकती है तो वे बाधा को पहचानकर आगे बढ़ते हैं। विशाल एवं सुरक्षित लंका देखकर वे बिना सोचे सीधे प्रवेश नहीं करते, बल्कि परिस्थितियों को समझकर छोटा रूप धारण करने का निर्णय लेते हैं।

और लंकिनी के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास जी हमें सत्संग की महानता का सुंदर संदेश देते हैं— प्रभु के भक्त का संग जीवन की दिशा बदल सकता है।

मूल पाठ: श्रीरामचरितमानस — पञ्चम सोपान, सुन्दरकाण्ड। इस भाग में सिंहिका प्रसंग से दोहा 4 तक का मूल पाठ प्रमाणिक पाठ से मिलान करके प्रस्तुत किया गया है।
अगला प्रसंग — लंका में प्रवेश, रावण के भवन की खोज और विभीषण के घर का दर्शन
॥ जय श्रीराम • जय हनुमान ॥

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