सुंदरकांड भाग 6: अशोक वाटिका में माता सीता दर्शन और रावण संवाद | दोहा 8–10 अर्थ सहित
यहीं पहली बार वे विरह से अत्यंत दुर्बल माता जानकी का दर्शन करते हैं। हनुमान जी वृक्ष के पत्तों में छिपकर उचित अवसर की प्रतीक्षा करते हैं। इसी बीच रावण माता सीता के पास आता है और उन्हें अपने पक्ष में करने का प्रयास करता है।
॥ अशोक वाटिका में माता सीता दर्शन ॥
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा।।
इस प्रकार श्रीराम के गुणों का वर्णन करते हुए हनुमान जी को ऐसी शांति प्राप्त हुई जिसका वर्णन करना कठिन है।
पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही।।
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता।।
हनुमान जी ने कहा— हे भाई! अब मैं माता जानकी का दर्शन करना चाहता हूँ।
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई।।
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ।।
उन्होंने फिर वही अत्यंत छोटा रूप धारण किया और अशोक वन में उस स्थान पर पहुँचे जहाँ माता सीता रहती थीं।
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा।।
कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी।।
माता का शरीर विरह के कारण अत्यंत दुर्बल हो गया था। सिर पर जटाओं की एक वेणी थी और वे अपने हृदय में निरंतर श्रीरघुनाथ जी के गुणों का स्मरण कर रही थीं।
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।।8।।
माता जानकी की ऐसी विरह और दुःख से भरी अवस्था देखकर पवनपुत्र हनुमान जी स्वयं अत्यंत दुःखी हो गए।
॥ रावण का अशोक वाटिका में आगमन ॥
तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई।।
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा।।
उसी समय रावण बहुत-सी स्त्रियों को साथ लेकर अशोक वाटिका में माता सीता के पास आया।
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा।।
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी।।
वह कहने लगा— हे सुंदरी! मेरी बात मान लो। मंदोदरी सहित मेरी सभी रानियाँ तुम्हारी अधीन होंगी।
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा।।
तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही।।
माता सीता ने बीच में तिनके की ओट कर ली और अपने परम प्रिय अयोध्यापति श्रीराम का स्मरण करते हुए उत्तर दिया।
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा।।
अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की।।
उसी प्रकार तुम अपने मन में यह भ्रम मत रखो। तुम्हें अभी श्रीरघुवीर के बाणों की शक्ति का ज्ञान नहीं है।
सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही।।
आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन।।9।।
उसने तलवार निकाल ली और क्रोध में बोलने लगा।
॥ माता सीता की अटल प्रतिज्ञा ॥
सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना।।
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी।।
स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर।।
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा।।
अथवा तुम्हारी यह भयानक तलवार। इसके अतिरिक्त कोई तीसरा विकल्प मुझे स्वीकार नहीं है।
चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं।।
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा।।
माता की वाणी में भय नहीं, बल्कि श्रीराम के प्रति पूर्ण निष्ठा और अटल समर्पण दिखाई देता है।
सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा।।
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई।।
इसके बाद रावण ने वहाँ उपस्थित राक्षसियों को बुलाकर आदेश दिया कि वे माता सीता को अनेक प्रकार से भय दिखाएँ।
मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना।।
भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद।।10।।
इधर राक्षसियों का समूह भयानक रूप धारण करके माता सीता को डराने और कष्ट देने लगा।
🌺 इस प्रसंग का भाव
इस प्रसंग में एक ओर श्रीहनुमान जी का करुणामय भक्त-हृदय दिखाई देता है,
जो माता सीता की दशा देखकर स्वयं दुःखी हो जाता है।
दूसरी ओर माता जानकी की श्रीराम के प्रति अटल निष्ठा दिखाई देती है।
रावण का वैभव, प्रलोभन, भय और तलवार—
कोई भी उनके संकल्प को डिगा नहीं पाता।
इस प्रसंग का गहरा संदेश है कि
सच्ची भक्ति केवल सुख के समय का विश्वास नहीं,
बल्कि कठिनतम परिस्थिति में भी प्रभु के प्रति अडिग रहने का नाम है।
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