सुंदरकांड भाग 6: अशोक वाटिका में माता सीता दर्शन और रावण संवाद | दोहा 8–10 अर्थ सहित

॥ ✦ श्रीराम ✦ ॥
श्रीगोस्वामी तुलसीदास कृत
श्रीरामचरितमानस — सुन्दरकाण्ड
भाग 6 • अशोक वाटिका में माता सीता दर्शन एवं रावण संवाद
विभीषण जी से माता सीता के निवास का पता जानकर श्रीहनुमान जी पुनः अपना अत्यंत छोटा रूप धारण करते हैं और अशोक वाटिका की ओर बढ़ते हैं।

यहीं पहली बार वे विरह से अत्यंत दुर्बल माता जानकी का दर्शन करते हैं। हनुमान जी वृक्ष के पत्तों में छिपकर उचित अवसर की प्रतीक्षा करते हैं। इसी बीच रावण माता सीता के पास आता है और उन्हें अपने पक्ष में करने का प्रयास करता है।

॥ अशोक वाटिका में माता सीता दर्शन ॥

सुन्दरकाण्ड • दोहा 8 से दोहा 10 तक
चौपाई

जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी कहते हैं कि ऐसे कृपालु स्वामी श्रीराम को जानते हुए भी जो उन्हें भूलकर संसार में भटकते हैं, वे दुःखी क्यों न हों?

इस प्रकार श्रीराम के गुणों का वर्णन करते हुए हनुमान जी को ऐसी शांति प्राप्त हुई जिसका वर्णन करना कठिन है।
चौपाई

पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही।।
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता।।

सरल भावार्थ
इसके बाद विभीषण जी ने हनुमान जी को बताया कि माता जानकी लंका में कहाँ और किस प्रकार रह रही हैं।

हनुमान जी ने कहा— हे भाई! अब मैं माता जानकी का दर्शन करना चाहता हूँ।
चौपाई

जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई।।
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ।।

सरल भावार्थ
विभीषण जी ने माता सीता तक पहुँचने की पूरी युक्ति समझा दी। उनसे विदा लेकर पवनपुत्र हनुमान जी चल पड़े।

उन्होंने फिर वही अत्यंत छोटा रूप धारण किया और अशोक वन में उस स्थान पर पहुँचे जहाँ माता सीता रहती थीं।
चौपाई

देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा।।
कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी।।

सरल भावार्थ
माता सीता को देखकर हनुमान जी ने मन ही मन उन्हें प्रणाम किया।

माता का शरीर विरह के कारण अत्यंत दुर्बल हो गया था। सिर पर जटाओं की एक वेणी थी और वे अपने हृदय में निरंतर श्रीरघुनाथ जी के गुणों का स्मरण कर रही थीं।
॥ दोहा 8 ॥

निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।।8।।

दोहा का सरल भावार्थ
माता सीता की दृष्टि अपने चरणों की ओर थी, किंतु उनका मन श्रीराम के चरण-कमलों में लीन था।

माता जानकी की ऐसी विरह और दुःख से भरी अवस्था देखकर पवनपुत्र हनुमान जी स्वयं अत्यंत दुःखी हो गए।

॥ रावण का अशोक वाटिका में आगमन ॥

चौपाई

तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई।।
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी वृक्ष के पत्तों में छिपे रहे और विचार करने लगे कि अब किस प्रकार आगे बढ़ना उचित होगा।

उसी समय रावण बहुत-सी स्त्रियों को साथ लेकर अशोक वाटिका में माता सीता के पास आया।
चौपाई

बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा।।
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी।।

सरल भावार्थ
रावण ने अनेक प्रकार से माता सीता को समझाने का प्रयास किया। उसने साम, दान, भय और भेद—सभी उपाय अपनाए।

वह कहने लगा— हे सुंदरी! मेरी बात मान लो। मंदोदरी सहित मेरी सभी रानियाँ तुम्हारी अधीन होंगी।
चौपाई

तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा।।
तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही।।

सरल भावार्थ
रावण ने कहा— मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि सभी रानियों को तुम्हारी सेविका बना दूँगा; तुम केवल एक बार मेरी ओर देख लो।

माता सीता ने बीच में तिनके की ओट कर ली और अपने परम प्रिय अयोध्यापति श्रीराम का स्मरण करते हुए उत्तर दिया।
चौपाई

सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा।।
अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की।।

सरल भावार्थ
माता जानकी ने कहा— हे दशमुख! जुगनू के प्रकाश से कभी कमल नहीं खिलता।

उसी प्रकार तुम अपने मन में यह भ्रम मत रखो। तुम्हें अभी श्रीरघुवीर के बाणों की शक्ति का ज्ञान नहीं है।
चौपाई

सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही।।

सरल भावार्थ
माता सीता ने रावण को धिक्कारते हुए कहा— तुमने छलपूर्वक मुझे उस समय हर लिया जब प्रभु वहाँ उपस्थित नहीं थे। ऐसा अधर्म करते हुए भी तुम्हें लज्जा नहीं आई।
॥ दोहा 9 ॥

आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन।।9।।

दोहा का सरल भावार्थ
स्वयं को जुगनू और श्रीराम को सूर्य के समान बताया जाना तथा माता सीता के कठोर सत्य-वचनों को सुनकर रावण अत्यंत क्रोधित हो गया।

उसने तलवार निकाल ली और क्रोध में बोलने लगा।

॥ माता सीता की अटल प्रतिज्ञा ॥

चौपाई

सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना।।
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी।।

सरल भावार्थ
रावण ने क्रोध में कहा— सीता! तुमने मेरा अपमान किया है। यदि तुम शीघ्र मेरी बात नहीं मानोगी तो मैं इस तलवार से तुम्हारा अंत कर दूँगा।
चौपाई

स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर।।
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा।।

सरल भावार्थ
माता सीता ने निर्भय होकर कहा— मेरे गले में या तो नीलकमल की माला के समान सुंदर प्रभु श्रीराम की भुजाएँ होंगी,

अथवा तुम्हारी यह भयानक तलवार। इसके अतिरिक्त कोई तीसरा विकल्प मुझे स्वीकार नहीं है।
चौपाई

चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं।।
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा।।

सरल भावार्थ
माता सीता रावण की चंद्रहास तलवार को संबोधित करके कहती हैं— श्रीरघुनाथ के वियोग से उत्पन्न मेरे इस महान दुःख को यदि समाप्त करना है, तो अपनी शीतल और तीक्ष्ण धार से इस विरह का अंत कर दो।

माता की वाणी में भय नहीं, बल्कि श्रीराम के प्रति पूर्ण निष्ठा और अटल समर्पण दिखाई देता है।
चौपाई

सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा।।
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई।।

सरल भावार्थ
माता सीता के वचन सुनकर रावण उन्हें मारने के लिए आगे बढ़ा, परंतु मय दानव की पुत्री मंदोदरी ने नीति की बात कहकर उसे रोका।

इसके बाद रावण ने वहाँ उपस्थित राक्षसियों को बुलाकर आदेश दिया कि वे माता सीता को अनेक प्रकार से भय दिखाएँ।
चौपाई

मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना।।

सरल भावार्थ
रावण ने कहा— यदि एक महीने के भीतर सीता मेरी बात नहीं मानेंगी, तो मैं तलवार निकालकर उनका वध कर दूँगा।
॥ दोहा 10 ॥

भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहिं धरहिं रूप बहु मंद।।10।।

दोहा का सरल भावार्थ
इसके बाद दशमुख रावण अपने भवन को चला गया।

इधर राक्षसियों का समूह भयानक रूप धारण करके माता सीता को डराने और कष्ट देने लगा।

🌺 इस प्रसंग का भाव

इस प्रसंग में एक ओर श्रीहनुमान जी का करुणामय भक्त-हृदय दिखाई देता है, जो माता सीता की दशा देखकर स्वयं दुःखी हो जाता है।

दूसरी ओर माता जानकी की श्रीराम के प्रति अटल निष्ठा दिखाई देती है। रावण का वैभव, प्रलोभन, भय और तलवार— कोई भी उनके संकल्प को डिगा नहीं पाता।

इस प्रसंग का गहरा संदेश है कि सच्ची भक्ति केवल सुख के समय का विश्वास नहीं, बल्कि कठिनतम परिस्थिति में भी प्रभु के प्रति अडिग रहने का नाम है।

मूल पाठ: श्रीरामचरितमानस — पञ्चम सोपान, सुन्दरकाण्ड। इस भाग में दोहा 8 से दोहा 10 तक का मूल पाठ प्रमाणिक डिजिटल पाठ से मिलान करके प्रस्तुत किया गया है।
अगला प्रसंग — त्रिजटा का स्वप्न, माता सीता की विरह-व्यथा और श्रीराम की मुद्रिका
॥ जय श्रीराम • जय हनुमान ॥

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