सुंदरकांड भाग 14: सीता माता का संदेश, श्रीराम की भावुकता और हनुमान प्रेम | दोहा 30–33 अर्थ सहित

॥ ✦ श्रीराम ✦ ॥
श्रीगोस्वामी तुलसीदास कृत
श्रीरामचरितमानस — सुन्दरकाण्ड
भाग 14 • माता सीता का संदेश एवं श्रीराम-हनुमान प्रेम
माता सीता की चूड़ामणि लेकर श्रीहनुमान जी वानर-सेना सहित श्रीराम के पास लौट चुके हैं।

अब जामवंत जी श्रीराम के सामने हनुमान जी के अद्भुत कार्य का वर्णन करते हैं। श्रीराम माता सीता की दशा जानना चाहते हैं और हनुमान जी माता का संदेश प्रभु तक पहुँचाते हैं।

यह सुन्दरकाण्ड के सबसे भावपूर्ण प्रसंगों में से एक है, जहाँ सेवक के प्रति भगवान का प्रेम और भगवान के प्रति सेवक की पूर्ण विनम्रता प्रकट होती है।

॥ जामवंत जी द्वारा हनुमान जी के कार्य का वर्णन ॥

सुन्दरकाण्ड • दोहा 30 से दोहा 33 तक
चौपाई

जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया।।
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर।।

सरल भावार्थ
जामवंत जी बोले— हे श्रीरघुनाथ! जिस पर आपकी कृपा होती है, उसका सदा कल्याण होता है और देवता, मनुष्य तथा मुनि भी उस पर प्रसन्न रहते हैं।
चौपाई

सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर।।
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू।।

सरल भावार्थ
जिस पर प्रभु की कृपा होती है वही सच्चा विजयी, विनम्र और गुणों का सागर होता है।

जामवंत जी कहते हैं कि आपकी कृपा से हमारा कार्य सफल हुआ और आज हमारा जन्म भी सफल हो गया।
चौपाई

नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी।।
पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए।।

सरल भावार्थ
जामवंत जी कहते हैं— हे प्रभु! पवनपुत्र हनुमान ने जो कार्य किया है, उसका वर्णन हजारों मुखों से भी पूरा नहीं किया जा सकता।

इसके बाद उन्होंने हनुमान जी के सभी सुंदर कार्य श्रीराम को सुनाए।
चौपाई

सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए।।
कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी के कार्य सुनकर करुणामय श्रीराम अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने प्रेम से हनुमान जी को हृदय से लगा लिया।

प्रभु ने पूछा— हे तात! जानकी किस प्रकार वहाँ रहती हैं और अपने प्राणों की रक्षा किस प्रकार कर रही हैं?
॥ दोहा 30 ॥

नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट।।30।।

दोहा का सरल भावार्थ
हनुमान जी बताते हैं— माता सीता के लिए दिन-रात आपका नाम पहरेदार है और आपका ध्यान मानो द्वार है।

उनकी दृष्टि अपने चरणों पर लगी रहती है; ऐसे में उनके प्राण बाहर जाने का मार्ग ही नहीं पाते।

॥ माता सीता की चूड़ामणि और संदेश ॥

चौपाई

चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही।।
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी ने कहा— प्रस्थान करते समय माता सीता ने मुझे चूड़ामणि दी थी।

श्रीराम ने उस चूड़ामणि को अपने हृदय से लगा लिया। हनुमान जी ने आगे कहा कि माता जानकी ने आँसुओं से भरे नेत्रों से आपके लिए कुछ वचन कहे हैं।
चौपाई

अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना।।
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी।।

सरल भावार्थ
माता सीता का संदेश है— हे प्रभु! लक्ष्मण सहित आपके चरणों को मेरा प्रणाम।

आप दीनों के बंधु और शरणागतों का दुःख हरने वाले हैं। मैं मन, कर्म और वचन से आपके चरणों में अनुरक्त हूँ; फिर हे नाथ, मुझसे ऐसा कौन-सा अपराध हुआ?
चौपाई

अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।।
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा।।

सरल भावार्थ
माता अपनी विरह-व्यथा व्यक्त करते हुए कहती हैं कि प्रभु से बिछुड़कर भी उनका जीवन बना हुआ है।

वे इसे अपने नेत्रों का अनुराग बताती हैं, जो श्रीराम के पुनः दर्शन की आशा में उन्हें निरंतर संभाले हुए हैं।
चौपाई

बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा।।
नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी।

सरल भावार्थ
माता सीता श्रीराम के वियोग की अत्यंत गहरी पीड़ा का वर्णन करती हैं।

उनकी आँखों से निरंतर बहने वाले आँसू उस विरह की तपन के बीच मानो उन्हें सांत्वना देते रहते हैं।
चौपाई

सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी कहते हैं— हे दीनदयाल प्रभु! माता सीता की विपत्ति इतनी बड़ी है कि उसे शब्दों में विस्तार से कहना भी कठिन है।
॥ दोहा 31 ॥

निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति।।31।।

दोहा का सरल भावार्थ
हे करुणानिधान! माता सीता के लिए एक-एक क्षण कल्प के समान लंबा बीत रहा है।

अतः शीघ्र चलकर अपने पराक्रम से शत्रुओं को जीतिए और माता जानकी को वापस ले आइए।

॥ श्रीराम की आँखों में आँसू ॥

चौपाई

सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना।।
बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही।।

सरल भावार्थ
माता सीता का दुःख सुनकर सुख के धाम श्रीराम के कमल समान नेत्र आँसुओं से भर आए।

प्रभु कहते हैं— जो मन, वचन और शरीर से मेरा आश्रित है, उस पर विपत्ति कैसे आ सकती है?
चौपाई

कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई।।
केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी कहते हैं— हे प्रभु! वास्तविक विपत्ति तो वही है जब आपका स्मरण और भजन न हो।

इन राक्षसों की शक्ति कितनी ही क्यों न हो, आप शत्रुओं पर विजय पाकर माता जानकी को अवश्य वापस लाएँगे।
चौपाई

सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।।
प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा।।

सरल भावार्थ
श्रीराम हनुमान जी से कहते हैं— हे हनुमान! तुम्हारे समान मेरा उपकार करने वाला देवता, मनुष्य या मुनि कोई नहीं है।

तुम्हारे इस उपकार के बदले मैं क्या करूँ, यह सोचकर भी मेरा मन तुम्हारे सामने स्वयं को समर्थ नहीं पाता।
चौपाई

सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं।।
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता।।

सरल भावार्थ
श्रीराम कहते हैं— हे पुत्र! मैंने मन में बहुत विचार किया, फिर भी मैं तुम्हारे उपकार से उऋण नहीं हो सकता।

प्रभु बार-बार हनुमान जी की ओर देखते हैं। उनके नेत्र प्रेम से भरे हैं और शरीर रोमांचित हो रहा है।
॥ दोहा 32 ॥

सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत।।32।।

दोहा का सरल भावार्थ
प्रभु के ऐसे प्रेमपूर्ण वचन सुनकर हनुमान जी अत्यंत भाव-विह्वल हो गए।

वे प्रेम से श्रीराम के चरणों में गिर पड़े और प्रभु की शरण में स्वयं को पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया।

॥ हनुमान जी की अद्भुत विनम्रता ॥

चौपाई

बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा।।
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।।

सरल भावार्थ
श्रीराम बार-बार हनुमान जी को उठाना चाहते हैं, पर हनुमान जी प्रेम में इतने मग्न हैं कि चरणों से उठना नहीं चाहते।

प्रभु का कमल समान हाथ हनुमान जी के सिर पर है। भगवान शिव इस प्रेममय दृश्य का स्मरण करके स्वयं भाव-विभोर हो जाते हैं।
चौपाई

सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर।।
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा।।

सरल भावार्थ
भगवान शिव पुनः मन को स्थिर करके सुंदर कथा आगे कहते हैं।

श्रीराम ने हनुमान जी को उठाकर अपने हृदय से लगा लिया और उनका हाथ पकड़कर अपने अत्यंत निकट बैठाया।
चौपाई

कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।।
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना।।

सरल भावार्थ
श्रीराम ने पूछा— हे हनुमान! रावण द्वारा सुरक्षित उस कठिन लंका को तुमने किस प्रकार जला दिया?

हनुमान जी समझ गए कि प्रभु प्रसन्न हैं, फिर भी उनके भीतर तनिक भी अभिमान नहीं आया।
चौपाई

साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।।
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।

सरल भावार्थ
हनुमान जी विनम्रता से कहते हैं— वानर की बड़ी सामर्थ्य ही क्या है? वह तो केवल एक शाखा से दूसरी शाखा पर जाता है।

समुद्र पार करना, स्वर्णमयी लंका को जलाना, राक्षसों को परास्त करना और अशोक वाटिका उजाड़ना— यह सब मेरी अपनी शक्ति से नहीं हुआ।
चौपाई

सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी कहते हैं— हे श्रीरघुनाथ! यह सब केवल आपके प्रताप से हुआ है।

हे प्रभु! इसमें मेरी अपनी कोई प्रभुता या सामर्थ्य नहीं है।
॥ दोहा 33 ॥

ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।
तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल।।33।।

दोहा का सरल भावार्थ
हनुमान जी कहते हैं— हे प्रभु! जिस पर आप अनुकूल हो जाएँ, उसके लिए कोई भी कार्य असंभव नहीं रहता।

आपके प्रभाव से अत्यंत छोटी और निर्बल वस्तु भी असंभव प्रतीत होने वाले बड़े कार्य को करने में समर्थ हो सकती है।

🌺 इस प्रसंग का भाव

यह प्रसंग श्रीराम और हनुमान जी के प्रेम का अत्यंत सुंदर स्वरूप प्रस्तुत करता है।

हनुमान जी इतना महान कार्य करके लौटे, फिर भी अपने लिए कोई श्रेय नहीं लेते। वे स्पष्ट कहते हैं— “सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।”

दूसरी ओर श्रीराम अपने सेवक के प्रेम और सेवा को इतना ऊँचा स्थान देते हैं कि स्वयं कहते हैं कि वे हनुमान जी के उपकार से उऋण नहीं हो सकते।

यही भक्त और भगवान के संबंध की सुंदरता है— भक्त सफलता का श्रेय प्रभु को देता है और प्रभु अपने भक्त की सेवा को हृदय से स्वीकार करते हैं।

मूल पाठ: श्रीरामचरितमानस — पञ्चम सोपान, सुन्दरकाण्ड। इस भाग में दोहा 30 से दोहा 33 तक की सभी चौपाइयाँ और दोहे क्रमवार प्रमाणिक डिजिटल पाठ से मिलान करके प्रस्तुत किए गए हैं।
अगला प्रसंग — हनुमान जी द्वारा अखंड भक्ति का वर माँगना और श्रीराम का वानर-सेना सहित लंका की ओर प्रस्थान
॥ जय श्रीराम • जय हनुमान ॥

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय भक्ति सामग्री

सुंदरकांड भाग 20: श्रीराम की सेना का वर्णन, लक्ष्मण का पत्र और रावण को अंतिम चेतावनी | दोहा 54–57

श्री हनुमान आरती: आरती कीजै हनुमान लला की, अर्थ सहित | Hanuman Aarti

सुंदरकांड भाग 21: श्रीराम का समुद्र पर क्रोध, नल-नील का उपाय और सुंदरकांड समापन | दोहा 58–60