सुंदरकांड भाग 14: सीता माता का संदेश, श्रीराम की भावुकता और हनुमान प्रेम | दोहा 30–33 अर्थ सहित
अब जामवंत जी श्रीराम के सामने हनुमान जी के अद्भुत कार्य का वर्णन करते हैं। श्रीराम माता सीता की दशा जानना चाहते हैं और हनुमान जी माता का संदेश प्रभु तक पहुँचाते हैं।
यह सुन्दरकाण्ड के सबसे भावपूर्ण प्रसंगों में से एक है, जहाँ सेवक के प्रति भगवान का प्रेम और भगवान के प्रति सेवक की पूर्ण विनम्रता प्रकट होती है।
॥ जामवंत जी द्वारा हनुमान जी के कार्य का वर्णन ॥
जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया।।
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर।।
सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर।।
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू।।
जामवंत जी कहते हैं कि आपकी कृपा से हमारा कार्य सफल हुआ और आज हमारा जन्म भी सफल हो गया।
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी।।
पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए।।
इसके बाद उन्होंने हनुमान जी के सभी सुंदर कार्य श्रीराम को सुनाए।
सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए।।
कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की।।
प्रभु ने पूछा— हे तात! जानकी किस प्रकार वहाँ रहती हैं और अपने प्राणों की रक्षा किस प्रकार कर रही हैं?
नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट।।30।।
उनकी दृष्टि अपने चरणों पर लगी रहती है; ऐसे में उनके प्राण बाहर जाने का मार्ग ही नहीं पाते।
॥ माता सीता की चूड़ामणि और संदेश ॥
चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही।।
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी।।
श्रीराम ने उस चूड़ामणि को अपने हृदय से लगा लिया। हनुमान जी ने आगे कहा कि माता जानकी ने आँसुओं से भरे नेत्रों से आपके लिए कुछ वचन कहे हैं।
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना।।
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी।।
आप दीनों के बंधु और शरणागतों का दुःख हरने वाले हैं। मैं मन, कर्म और वचन से आपके चरणों में अनुरक्त हूँ; फिर हे नाथ, मुझसे ऐसा कौन-सा अपराध हुआ?
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।।
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा।।
वे इसे अपने नेत्रों का अनुराग बताती हैं, जो श्रीराम के पुनः दर्शन की आशा में उन्हें निरंतर संभाले हुए हैं।
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा।।
नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी।
उनकी आँखों से निरंतर बहने वाले आँसू उस विरह की तपन के बीच मानो उन्हें सांत्वना देते रहते हैं।
सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला।।
निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति।।31।।
अतः शीघ्र चलकर अपने पराक्रम से शत्रुओं को जीतिए और माता जानकी को वापस ले आइए।
॥ श्रीराम की आँखों में आँसू ॥
सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना।।
बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही।।
प्रभु कहते हैं— जो मन, वचन और शरीर से मेरा आश्रित है, उस पर विपत्ति कैसे आ सकती है?
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई।।
केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी।।
इन राक्षसों की शक्ति कितनी ही क्यों न हो, आप शत्रुओं पर विजय पाकर माता जानकी को अवश्य वापस लाएँगे।
सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।।
प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा।।
तुम्हारे इस उपकार के बदले मैं क्या करूँ, यह सोचकर भी मेरा मन तुम्हारे सामने स्वयं को समर्थ नहीं पाता।
सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं।।
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता।।
प्रभु बार-बार हनुमान जी की ओर देखते हैं। उनके नेत्र प्रेम से भरे हैं और शरीर रोमांचित हो रहा है।
सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत।।32।।
वे प्रेम से श्रीराम के चरणों में गिर पड़े और प्रभु की शरण में स्वयं को पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया।
॥ हनुमान जी की अद्भुत विनम्रता ॥
बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा।।
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।।
प्रभु का कमल समान हाथ हनुमान जी के सिर पर है। भगवान शिव इस प्रेममय दृश्य का स्मरण करके स्वयं भाव-विभोर हो जाते हैं।
सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर।।
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा।।
श्रीराम ने हनुमान जी को उठाकर अपने हृदय से लगा लिया और उनका हाथ पकड़कर अपने अत्यंत निकट बैठाया।
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।।
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना।।
हनुमान जी समझ गए कि प्रभु प्रसन्न हैं, फिर भी उनके भीतर तनिक भी अभिमान नहीं आया।
साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।।
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।
समुद्र पार करना, स्वर्णमयी लंका को जलाना, राक्षसों को परास्त करना और अशोक वाटिका उजाड़ना— यह सब मेरी अपनी शक्ति से नहीं हुआ।
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।
हे प्रभु! इसमें मेरी अपनी कोई प्रभुता या सामर्थ्य नहीं है।
ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।
तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल।।33।।
आपके प्रभाव से अत्यंत छोटी और निर्बल वस्तु भी असंभव प्रतीत होने वाले बड़े कार्य को करने में समर्थ हो सकती है।
🌺 इस प्रसंग का भाव
यह प्रसंग श्रीराम और हनुमान जी के प्रेम का अत्यंत सुंदर स्वरूप प्रस्तुत करता है।
हनुमान जी इतना महान कार्य करके लौटे,
फिर भी अपने लिए कोई श्रेय नहीं लेते।
वे स्पष्ट कहते हैं—
“सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।”
दूसरी ओर श्रीराम अपने सेवक के प्रेम और सेवा को इतना ऊँचा स्थान देते हैं
कि स्वयं कहते हैं कि वे हनुमान जी के उपकार से उऋण नहीं हो सकते।
यही भक्त और भगवान के संबंध की सुंदरता है—
भक्त सफलता का श्रेय प्रभु को देता है और प्रभु अपने भक्त की सेवा को हृदय से स्वीकार करते हैं।
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