सुंदरकांड भाग 3: सुरसा ने ली हनुमान जी की परीक्षा | दोहा 2 अर्थ सहित
इस प्रसंग में हनुमान जी यह दिखाते हैं कि केवल बल ही पर्याप्त नहीं होता— उचित समय पर बुद्धि, विनम्रता और युक्ति का प्रयोग भी उतना ही आवश्यक है।
॥ सुरसा प्रसंग ॥
जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।।
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता।।
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा।।
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं।।
तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई।।
कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना।।
परंतु जब सुरसा किसी भी प्रकार उन्हें जाने देने को तैयार नहीं हुई, तब हनुमान जी ने कहा—अच्छा, तो तुम मुझे खा ही लो।
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा।।
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ।।
तब सुरसा ने अपना मुख सोलह योजन तक विशाल कर लिया, तो पवनपुत्र हनुमान जी तुरंत बत्तीस योजन के विशाल रूप में हो गए।
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा।।
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।।
अंत में जब सुरसा ने अपना मुख सौ योजन का कर लिया, तब हनुमान जी ने तत्काल अपनी युक्ति बदली और अत्यंत छोटा रूप धारण कर लिया।
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा।।
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा।।
तब सुरसा ने कहा—जिस उद्देश्य से देवताओं ने मुझे तुम्हारे पास भेजा था, वह पूरा हो गया। मैंने तुम्हारे बल और बुद्धि का रहस्य जान लिया है।
राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान।।2।।
ऐसा आशीर्वाद देकर सुरसा चली गई और हनुमान जी प्रसन्न होकर अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ गए।
🌺 इस प्रसंग का जीवन-संदेश
सुरसा प्रसंग हमें बताता है कि हर कठिनाई को केवल शक्ति से जीतना आवश्यक नहीं है।
हनुमान जी पहले विनम्रता से मार्ग माँगते हैं, फिर आवश्यकता पड़ने पर अपना
विराट सामर्थ्य दिखाते हैं और अंत में बुद्धि का प्रयोग करके बहुत छोटा रूप धारण कर लेते हैं।
इसलिए हनुमान जी केवल बल के प्रतीक
नहीं हैं—वे विवेक, समयानुकूल निर्णय और विनम्रता के भी अद्भुत आदर्श हैं।
सच्ची सामर्थ्य वही है जिसमें यह समझ हो कि
कहाँ बल लगाना है और कहाँ बुद्धि।
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