सुंदरकांड भाग 3: सुरसा ने ली हनुमान जी की परीक्षा | दोहा 2 अर्थ सहित

॥ ✦ श्रीराम ✦ ॥
श्रीगोस्वामी तुलसीदास कृत
श्रीरामचरितमानस — सुन्दरकाण्ड
भाग 3 • सुरसा द्वारा हनुमान जी की परीक्षा
मैनाक पर्वत को प्रणाम करके श्रीहनुमान जी अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ते हैं। देवता उनके असाधारण बल और बुद्धि की परीक्षा लेना चाहते हैं। इसलिए वे नागमाता सुरसा को हनुमान जी के पास भेजते हैं।

इस प्रसंग में हनुमान जी यह दिखाते हैं कि केवल बल ही पर्याप्त नहीं होता— उचित समय पर बुद्धि, विनम्रता और युक्ति का प्रयोग भी उतना ही आवश्यक है।

॥ सुरसा प्रसंग ॥

सुन्दरकाण्ड • दोहा 2 तक सम्पूर्ण मूल पाठ
चौपाई

जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।।
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता।।

सरल भावार्थ
पवनपुत्र हनुमान जी को जाते हुए देवताओं ने देखा। वे उनके विशेष बल और बुद्धि की परीक्षा करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने सर्पों की माता सुरसा को भेजा। सुरसा हनुमान जी के सामने आकर मार्ग में खड़ी हो गई।
चौपाई

आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा।।
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं।।

सरल भावार्थ
सुरसा ने कहा—आज देवताओं ने तुम्हें मेरे भोजन के रूप में दिया है। उसकी बात सुनकर हनुमान जी ने विनम्रतापूर्वक कहा— मैं पहले श्रीराम का कार्य पूर्ण कर लूँ और माता सीता का समाचार प्रभु श्रीराम को सुना दूँ, फिर लौटकर तुम्हारे पास आ जाऊँगा।
चौपाई

तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई।।
कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी बोले—हे माता! तब मैं स्वयं आकर तुम्हारे मुख में प्रवेश करूँगा। मैं सत्य कहता हूँ, अभी मुझे श्रीराम का कार्य करने के लिए जाने दीजिए।

परंतु जब सुरसा किसी भी प्रकार उन्हें जाने देने को तैयार नहीं हुई, तब हनुमान जी ने कहा—अच्छा, तो तुम मुझे खा ही लो।
चौपाई

जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा।।
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ।।

सरल भावार्थ
सुरसा ने अपना मुख एक योजन तक फैला दिया। हनुमान जी ने अपना शरीर उससे दुगुना बड़ा कर लिया।

तब सुरसा ने अपना मुख सोलह योजन तक विशाल कर लिया, तो पवनपुत्र हनुमान जी तुरंत बत्तीस योजन के विशाल रूप में हो गए।
चौपाई

जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा।।
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।।

सरल भावार्थ
जैसे-जैसे सुरसा अपने मुख को बड़ा करती गई, हनुमान जी उससे दुगुना विशाल रूप धारण करते गए।

अंत में जब सुरसा ने अपना मुख सौ योजन का कर लिया, तब हनुमान जी ने तत्काल अपनी युक्ति बदली और अत्यंत छोटा रूप धारण कर लिया।
चौपाई

बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा।।
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा।।

सरल भावार्थ
हनुमान जी अपने लघु रूप से सुरसा के मुख में प्रवेश करके तुरंत बाहर निकल आए। फिर उन्होंने सिर झुकाकर सुरसा को प्रणाम किया और जाने की अनुमति माँगी।

तब सुरसा ने कहा—जिस उद्देश्य से देवताओं ने मुझे तुम्हारे पास भेजा था, वह पूरा हो गया। मैंने तुम्हारे बल और बुद्धि का रहस्य जान लिया है।
॥ दोहा 2 ॥

राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान।।2।।

दोहा का सरल भावार्थ
सुरसा ने हनुमान जी को आशीर्वाद देते हुए कहा— तुम श्रीराम का समस्त कार्य अवश्य पूरा करोगे, क्योंकि तुम बल और बुद्धि के भंडार हो।

ऐसा आशीर्वाद देकर सुरसा चली गई और हनुमान जी प्रसन्न होकर अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ गए।

🌺 इस प्रसंग का जीवन-संदेश

सुरसा प्रसंग हमें बताता है कि हर कठिनाई को केवल शक्ति से जीतना आवश्यक नहीं है। हनुमान जी पहले विनम्रता से मार्ग माँगते हैं, फिर आवश्यकता पड़ने पर अपना विराट सामर्थ्य दिखाते हैं और अंत में बुद्धि का प्रयोग करके बहुत छोटा रूप धारण कर लेते हैं।

इसलिए हनुमान जी केवल बल के प्रतीक नहीं हैं—वे विवेक, समयानुकूल निर्णय और विनम्रता के भी अद्भुत आदर्श हैं।

सच्ची सामर्थ्य वही है जिसमें यह समझ हो कि कहाँ बल लगाना है और कहाँ बुद्धि।

मूल पाठ: श्रीरामचरितमानस — पञ्चम सोपान, सुन्दरकाण्ड, दोहा 2 तक। मूल चौपाइयों का प्रमाणिक पाठ से मिलान करके प्रस्तुत किया गया है।
अगला प्रसंग — सिंहिका वध और स्वर्णमयी लंका का दर्शन
॥ जय श्रीराम • जय हनुमान ॥

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