श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र अर्थ सहित – भाग 2 | श्लोक 55–107 व फलश्रुति

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र

भाग 2 • श्लोक 55 से 107 • समापन एवं फलश्रुति
भाग 1 — श्लोक 1–54
भाग 2 — श्लोक 55–107 • समापन • फलश्रुति
यह श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र का दूसरा और अंतिम भाग है।

पहले भाग में मुख्य सहस्रनाम के श्लोक 1 से 54 तक दिए गए थे।

इस भाग में श्लोक 55 से 107, उसके बाद प्रचलित समापन श्लोक और फिर फलश्रुति प्रस्तुत की जा रही है।

फलश्रुति में भगवान वासुदेव की भक्ति, सदाचार, मन की शुद्धि, धैर्य और परमात्मा के आश्रय की महिमा कही गई है।
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॥ श्री विष्णु सहस्रनाम — श्लोक 55 से आगे ॥

॥ श्लोक 55 ॥

जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः ।
अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः ॥55॥

॥ श्लोक 56 ॥

अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।
आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ॥56॥

॥ श्लोक 57 ॥

महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत् ॥57॥

श्लोक 55–57 का सरल भावार्थ
भगवान को समस्त जीवों के अंतर्यामी, साक्षी, मुक्ति प्रदान करने वाले मुकुन्द, अनन्त आत्मा, आनंदस्वरूप, सत्यधर्म के आधार और त्रिविक्रम के रूप में स्मरण किया गया है।
॥ श्लोक 58 ॥

महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी ।
गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः ॥58॥

॥ श्लोक 59 ॥

वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणोऽच्युतः ।
वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ॥59॥

॥ श्लोक 60 ॥

भगवान् भगहाऽऽनन्दी वनमाली हलायुधः ।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः ॥60॥

श्लोक 58–60 का सरल भावार्थ
यहाँ भगवान के महावराह, गोविन्द, चक्र-गदाधारी, कृष्ण, अच्युत, कमलनयन, वनमाली और परम गति जैसे दिव्य स्वरूपों का स्मरण है।
॥ श्लोक 61 ॥

सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः ।
दिवस्पृक् सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः ॥61॥

॥ श्लोक 62 ॥

त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक् ।
संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम् ॥62॥

॥ श्लोक 63 ॥

शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः ।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ॥63॥

श्लोक 61–63 का सरल भावार्थ
प्रभु को सर्वदर्शी, वाणी और ज्ञान के स्वामी, शांति और परम आश्रय, शुभ स्वरूप तथा जीवों के रक्षक के रूप में वंदन किया गया है।
॥ श्लोक 64 ॥

अनिवर्ती निवृत्तात्मा सङ्क्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः ।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतांवरः ॥64॥

॥ श्लोक 65 ॥

श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः ।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः ॥65॥

॥ श्लोक 66 ॥

स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः ।
विजितात्माऽविधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः ॥66॥

श्लोक 64–66 का सरल भावार्थ
इन श्लोकों में श्रीपति, श्रीनिवास, श्रीधर और तीनों लोकों के आश्रय भगवान की महिमा है। वे कल्याण, आनंद और संशय से मुक्ति देने वाले परमात्मा हैं।
॥ श्लोक 67 ॥

उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः ।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ॥67॥

॥ श्लोक 68 ॥

अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः ।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ॥68॥

॥ श्लोक 69 ॥

कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः ।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ॥69॥

श्लोक 67–69 का सरल भावार्थ
भगवान शाश्वत, सर्वदर्शी, दुःख से ऊपर उठाने वाले, विशुद्ध आत्मा, पराक्रमी, त्रिलोकेश, केशव और हरि हैं।
॥ श्लोक 70 ॥

कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः ।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जयः ॥70॥

॥ श्लोक 71 ॥

ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ।
ब्रह्मविद् ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥71॥

॥ श्लोक 72 ॥

महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ॥72॥

श्लोक 70–72 का सरल भावार्थ
यहाँ भगवान को अनन्त, वीर, ब्रह्मस्वरूप, ब्रह्मज्ञान के आधार, महान कर्म और महान तेज वाले तथा यज्ञस्वरूप परमेश्वर कहा गया है।
॥ श्लोक 73 ॥

स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः ।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ॥73॥

॥ श्लोक 74 ॥

मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ॥74॥

॥ श्लोक 75 ॥

सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः ।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ॥75॥

श्लोक 73–75 का सरल भावार्थ
भगवान स्वयं स्तुति के योग्य, पूर्ण, पुण्यस्वरूप, वासुदेव और सत्पुरुषों की परम गति हैं। यहाँ उनके यदुवंश से जुड़े दिव्य स्वरूप का भी स्मरण होता है।
॥ श्लोक 76 ॥

भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः ।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः ॥76॥

॥ श्लोक 77 ॥

विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान् ।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ॥77॥

॥ श्लोक 78 ॥

एको नैकः सवः कः किं यत् तत्पदमनुत्तमम् ।
लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ॥78॥

श्लोक 76–78 का सरल भावार्थ
भगवान सभी प्राणियों के निवास, अपराजित, विश्वरूप, अनेक रूपों में प्रकट होने वाले और फिर भी एक परम सत्य हैं। वे लोकनाथ, माधव और भक्तवत्सल हैं।
॥ श्लोक 79 ॥

सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी ।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः ॥79॥

॥ श्लोक 80 ॥

अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक् ।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ॥80॥

॥ श्लोक 81 ॥

तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः ॥81॥

श्लोक 79–81 का सरल भावार्थ
यहाँ प्रभु की दिव्य कांति, विनम्रता, बुद्धि, सत्य, संसार को धारण करने की शक्ति और अधर्म को नियंत्रित करने वाले तेजस्वी स्वरूप की स्तुति है।
॥ श्लोक 82 ॥

चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः ।
चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात् ॥82॥

॥ श्लोक 83 ॥

समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ॥83॥

॥ श्लोक 84 ॥

शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः ।
इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ॥84॥

श्लोक 82–84 का सरल भावार्थ
भगवान चतुर्भुज, चारों वेदों के ज्ञाता, अजेय और अगम्य परम सत्य हैं। वे संसार की व्यवस्था और धर्म के ताने-बाने को बनाए रखने वाले हैं।
॥ श्लोक 85 ॥

उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः ।
अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी ॥85॥

॥ श्लोक 86 ॥

सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः ।
महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः ॥86॥

॥ श्लोक 87 ॥

कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः ।
अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ॥87॥

श्लोक 85–87 का सरल भावार्थ
प्रभु सुंदर, सर्वज्ञ, अचल, महान निधि, पवित्र करने वाले और सभी दिशाओं में विद्यमान परमात्मा हैं।
॥ श्लोक 88 ॥

सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः ।
न्यग्रोधोऽदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः ॥88॥

॥ श्लोक 89 ॥

सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः ।
अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः ॥89॥

॥ श्लोक 90 ॥

अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् ।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ॥90॥

श्लोक 88–90 का सरल भावार्थ
भगवान भक्त के लिए सहज उपलब्ध, सिद्ध, भय को दूर करने वाले, अचिन्त्य और निर्गुण होते हुए भी समस्त गुणों को धारण करने वाले परम सत्य हैं।
॥ श्लोक 91 ॥

भारभृत् कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ।
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ॥91॥

॥ श्लोक 92 ॥

धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः ।
अपराजितः सर्वसहो नियन्ताऽनियमोऽयमः ॥92॥

॥ श्लोक 93 ॥

सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः ।
अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत् प्रीतिवर्धनः ॥93॥

श्लोक 91–93 का सरल भावार्थ
भगवान योगियों के स्वामी, संसार के नियन्ता, सत्य और सात्त्विक धर्म के आधार हैं। वे भक्त के हृदय में प्रेम और भक्ति को बढ़ाने वाले हैं।
॥ श्लोक 94 ॥

विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः ।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ॥94॥

॥ श्लोक 95 ॥

अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः ।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः ॥95॥

॥ श्लोक 96 ॥

सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः ।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः ॥96॥

श्लोक 94–96 का सरल भावार्थ
भगवान प्रकाशस्वरूप, सूर्य के समान तेजस्वी, अनन्त, सुख प्रदान करने वाले, लोकों के आधार और सनातन मंगल के स्रोत हैं।
॥ श्लोक 97 ॥

अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः ।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ॥97॥

॥ श्लोक 98 ॥

अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणांवरः ।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥98॥

॥ श्लोक 99 ॥

उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः ।
वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः ॥99॥

श्लोक 97–99 का सरल भावार्थ
प्रभु चक्रधारी, क्षमाशील, भय से ऊपर उठाने वाले, पुण्यस्वरूप और भक्तों के रक्षक हैं। उनका स्मरण मन में आशा और साहस जगाता है।
॥ श्लोक 100 ॥

अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः ।
चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ॥100॥

॥ श्लोक 101 ॥

अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः ।
जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः ॥101॥

॥ श्लोक 102 ॥

आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः ।
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ॥102॥

श्लोक 100–102 का सरल भावार्थ
भगवान अनन्त रूपों और अनन्त ऐश्वर्य वाले, भय दूर करने वाले, सृष्टि के आदि कारण, समस्त जगत के आधार और प्राण तथा प्रणव के स्वरूप हैं।
॥ श्लोक 103 ॥

प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः ।
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः ॥103॥

॥ श्लोक 104 ॥

भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः ।
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः ॥104॥

॥ श्लोक 105 ॥

यज्ञभृद् यज्ञकृद् यज्ञी यज्ञभुग् यज्ञसाधनः ।
यज्ञान्तकृद् यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ॥105॥

श्लोक 103–105 का सरल भावार्थ
प्रभु जीवन के आधार, परम तत्त्व, जन्म-मृत्यु से परे और यज्ञ के कर्ता, भोक्ता तथा आधार हैं। अन्न और उसे ग्रहण करने वाली जीवनशक्ति भी उन्हीं में स्थित मानी गई है।
॥ श्लोक 106 ॥

आत्मयोनिः स्वयञ्जातो वैखानः सामगायनः ।
देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ॥106॥

॥ श्लोक 107 ॥

शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ।
रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ॥107॥

श्लोक 106–107 का सरल भावार्थ
अंतिम नामों में भगवान को स्वयं प्रकट, सृष्टिकर्ता, देवकीनन्दन, शंख, नन्दक तलवार, चक्र, शार्ङ्ग धनुष और गदा धारण करने वाले अक्षोभ्य परमात्मा के रूप में प्रणाम किया गया है।

॥ सहस्रनाम का समापन ॥

सर्वप्रहरणायुध ॐ नम इति ।

वनमाली गदी शार्ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी ।
श्रीमान् नारायणो विष्णुर्वासुदेवोऽभिरक्षतु ॥108॥

सरल भावार्थ
वनमाला, गदा, शार्ङ्ग धनुष, शंख, चक्र और नन्दक धारण करने वाले श्रीमान नारायण, विष्णु और वासुदेव हमारे जीवन को धर्म, विवेक और भक्ति के मार्ग पर बनाए रखें।

॥ फलश्रुति ॥

॥ फलश्रुति 1–2 ॥

इतीदं कीर्तनीयस्य केशवस्य महात्मनः ।
नाम्नां सहस्रं दिव्यानामशेषेण प्रकीर्तितम् ॥1॥

य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् ।
नाशुभं प्राप्नुयात्किञ्चित्सोऽमुत्रेह च मानवः ॥2॥

॥ फलश्रुति 3–5 ॥

वेदान्तगो ब्राह्मणः स्यात्क्षत्रियो विजयी भवेत् ।
वैश्यो धनसमृद्धः स्याच्छूद्रः सुखमवाप्नुयात् ॥3॥

धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी चार्थमाप्नुयात् ।
कामानवाप्नुयात्कामी प्रजार्थी प्राप्नुयात्प्रजाम् ॥4॥

भक्तिमान् यः सदोत्थाय शुचिस्तद्गतमानसः ।
सहस्रं वासुदेवस्य नाम्नामेतत्प्रकीर्तयेत् ॥5॥

फलश्रुति 1–5 का सरल भावार्थ
भीष्म पितामह बताते हैं कि भगवान के इन दिव्य नामों का श्रद्धा और भक्ति से स्मरण कल्याणकारी माना गया है। फलश्रुति में उस समय की सामाजिक भाषा के अनुसार विभिन्न जीवन-लक्ष्यों और वर्गों का उल्लेख मिलता है। व्यापक आध्यात्मिक भाव यह है कि मनुष्य धर्म, भक्ति और अपने उचित कर्तव्य की ओर बढ़े।
॥ फलश्रुति 6–8 ॥

यशः प्राप्नोति विपुलं ज्ञातिप्राधान्यमेव च ।
अचलां श्रियमाप्नोति श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥6॥

न भयं क्वचिदाप्नोति वीर्यं तेजश्च विन्दति ।
भवत्यरोगो द्युतिमान्बलरूपगुणान्वितः ॥7॥

रोगार्तो मुच्यते रोगाद्बद्धो मुच्येत बन्धनात् ।
भयान्मुच्येत भीतस्तु मुच्येतापन्न आपदः ॥8॥

॥ फलश्रुति 9–12 ॥

दुर्गाण्यतितरत्याशु पुरुषः पुरुषोत्तमम् ।
स्तुवन्नामसहस्रेण नित्यं भक्तिसमन्वितः ॥9॥

वासुदेवाश्रयो मर्त्यो वासुदेवपरायणः ।
सर्वपापविशुद्धात्मा याति ब्रह्म सनातनम् ॥10॥

न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित् ।
जन्ममृत्युजराव्याधिभयं नैवोपजायते ॥11॥

इमं स्तवमधीयानः श्रद्धाभक्तिसमन्वितः ।
युज्येतात्मसुखक्षान्तिश्रीधृतिस्मृतिकीर्तिभिः ॥12॥

फलश्रुति 6–12 का सरल भावार्थ
परंपरागत फलश्रुति में यश, साहस, कल्याण और रोग आदि से मुक्ति जैसे फल बताए गए हैं। इनका आध्यात्मिक भाव यह है कि भक्ति मनुष्य के भीतर धैर्य, आत्मबल, क्षमा, संतोष और संकटों का सामना करने की शक्ति बढ़ाए। स्वास्थ्य से जुड़े श्लोक श्रद्धा-परंपरा के कथन हैं; किसी बीमारी में चिकित्सा का स्थान नहीं लेते।
॥ फलश्रुति 13–16 ॥

न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः ।
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां पुरुषोत्तमे ॥13॥

द्यौः सचन्द्रार्कनक्षत्रा खं दिशो भूर्महोदधिः ।
वासुदेवस्य वीर्येण विधृतानि महात्मनः ॥14॥

ससुरासुरगन्धर्वं सयक्षोरगराक्षसम् ।
जगद्वशे वर्ततेदं कृष्णस्य सचराचरम् ॥15॥

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः सत्त्वं तेजो बलं धृतिः ।
वासुदेवात्मकान्याहुः क्षेत्रं क्षेत्रज्ञ एव च ॥16॥

फलश्रुति 13–16 का सरल भावार्थ
भगवान की सच्ची भक्ति का प्रभाव क्रोध, ईर्ष्या, लोभ और अशुभ विचारों को कम करने में दिखाई देना चाहिए। सृष्टि, मन, बुद्धि, शक्ति और चेतना को वासुदेव की व्यापक सत्ता से जुड़ा हुआ बताया गया है।
॥ फलश्रुति 17–20 ॥

सर्वागमानामाचारः प्रथमं परिकल्प्यते ।
आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः ॥17॥

ऋषयः पितरो देवा महाभूतानि धातवः ।
जङ्गमाजङ्गमं चेदं जगन्नारायणोद्भवम् ॥18॥

योगो ज्ञानं तथा साङ्ख्यं विद्याः शिल्पादिकर्म च ।
वेदाः शास्त्राणि विज्ञानमेतत्सर्वं जनार्दनात् ॥19॥

एको विष्णुर्महद्भूतं पृथग्भूतान्यनेकशः ।
त्रींल्लोकान्व्याप्य भूतात्मा भुङ्क्ते विश्वभुगव्ययः ॥20॥

॥ फलश्रुति 21–22 ॥

इमं स्तवं भगवतो विष्णोर्व्यासेन कीर्तितम् ।
पठेद्य इच्छेत्पुरुषः श्रेयः प्राप्तुं सुखानि च ॥21॥

विश्वेश्वरमजं देवं जगतः प्रभुमव्ययम् ।
भजन्ति ये पुष्कराक्षं न ते यान्ति पराभवम् ॥22॥

फलश्रुति 17–22 का सरल भावार्थ
सदाचार को धर्म की नींव बताया गया है। ऋषि, देवता, प्रकृति, ज्ञान, योग, वेद, शास्त्र और समस्त सृष्टि को नारायण से उत्पन्न और उन्हीं में स्थित माना गया है। अंत में भगवान विष्णु के इस स्तोत्र को श्रद्धा से पढ़ने और उनके चरणों में भक्ति रखने की महिमा कही गई है।

॥ प्रचलित उत्तर संवाद ॥

॥ अर्जुन उवाच • 23 ॥

पद्मपत्रविशालाक्ष पद्मनाभ सुरोत्तम ।
भक्तानामनुरक्तानां त्राता भव जनार्दन ॥23॥

सरल अर्थ
अर्जुन भगवान से प्रार्थना करते हैं— हे कमलनयन, पद्मनाभ और देवों में श्रेष्ठ जनार्दन! अपने प्रेममय भक्तों के रक्षक बनिए।
॥ श्रीभगवानुवाच • 24 ॥

यो मां नामसहस्रेण स्तोतुमिच्छति पाण्डव ।
सोहऽमेकेन श्लोकेन स्तुत एव न संशयः ॥24॥

सरल अर्थ
भगवान कहते हैं कि भक्ति का मूल बाहरी संख्या से अधिक हृदय की श्रद्धा में है। एकाग्र और सच्चे भाव से की गई स्तुति भी उन्हें प्रिय है।
॥ व्यास उवाच • 25 ॥

वासनाद्वासुदेवस्य वासितं भुवनत्रयम् ।
सर्वभूतनिवासोऽसि वासुदेव नमोऽस्तु ते ॥25॥

सरल अर्थ
तीनों लोक वासुदेव की सत्ता से व्याप्त हैं। वे सभी प्राणियों के भीतर निवास करने वाले परमात्मा हैं। उन वासुदेव को नमस्कार है।
॥ पार्वत्युवाच • 26 ॥

केनोपायेन लघुना विष्णोर्नामसहस्रकम् ।
पठ्यते पण्डितैर्नित्यं श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो ॥26॥

॥ ईश्वर उवाच • 27 ॥

श्रीरामरामरामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनामतत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥27॥

सरल अर्थ
माता पार्वती पूछती हैं कि विष्णु सहस्रनाम के समान स्मरण का कोई संक्षिप्त उपाय क्या है। भगवान शिव उत्तर में रामनाम की महान महिमा बताते हुए “राम” नाम के प्रेमपूर्वक स्मरण का उपदेश देते हैं।
॥ ब्रह्मोवाच • 28 ॥

नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये
सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे ।
सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते
सहस्रकोटियुगधारिणे नमः ॥28॥

सरल अर्थ
अनन्त, असंख्य रूपों में प्रकट होने वाले, सहस्र नामों से स्तुत और अनादि-अनन्त काल के आधार उस शाश्वत पुरुष को नमस्कार है।

॥ इति श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

॥ ॐ नमो नारायणाय ॥

विष्णु सहस्रनाम का मूल भाव

विष्णु सहस्रनाम के सहस्र नाम भगवान को केवल एक रूप में सीमित नहीं करते।

वे कहीं विश्व, कहीं परमात्मा, कहीं गोविन्द, कहीं केशव, कहीं नारायण और कहीं भक्तवत्सल के रूप में स्मरण किए जाते हैं।

इस स्तोत्र का मुख्य आध्यात्मिक संदेश है— भगवान को स्मरण करते हुए सदाचार, सत्य, आत्मसंयम, करुणा, धर्म और भक्ति को जीवन में उतारना।

फलश्रुति भी अंततः यही संकेत देती है कि सच्ची भक्ति मनुष्य के भीतर क्रोध, लोभ और ईर्ष्या को कम करके धैर्य, स्मृति, शांति और सद्बुद्धि को बढ़ाए।

पाठ संबंधी जानकारी:

इस भाग में मुख्य विष्णु सहस्रनाम के श्लोक 55 से 107 दिए गए हैं। इसके बाद प्रचलित समापन “वनमाली गदी शार्ङ्गी…” और फलश्रुति प्रस्तुत की गई है।

कुछ संस्करणों में फलश्रुति के बाद श्रीमद्भगवद्गीता तथा अन्य ग्रंथों से प्रचलित कुछ अतिरिक्त समापन श्लोक भी जोड़े जाते हैं। वे मुख्य सहस्रनाम-फलश्रुति का अनिवार्य हिस्सा नहीं माने जाते, इसलिए यहाँ मानक महाभारत-आधारित समापन तक पाठ रखा गया है।

फलश्रुति में स्वास्थ्य, समृद्धि और अन्य लाभों के जो वर्णन हैं, वे धार्मिक परंपरा के श्रद्धा-वचन हैं। उन्हें चिकित्सा, आर्थिक या अन्य व्यावहारिक परिणाम की निश्चित गारंटी न समझें।
← भाग 1 पढ़ें ✓ विष्णु सहस्रनाम सम्पूर्ण
भक्ति भावना
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॥ ॐ नमो नारायणाय • ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

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