श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र अर्थ सहित – भाग 1 | Vishnu Sahasranamam

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र

भाग 1 • श्लोक 1 से 54 • सरल हिंदी भावार्थ सहित
इस भाग में — युधिष्ठिर-भीष्म संवाद • ध्यान • मुख्य सहस्रनाम श्लोक 1–54
भाग 2 में — श्लोक 55–107 • समापन • फलश्रुति
श्री विष्णु सहस्रनाम भगवान विष्णु के सहस्र दिव्य नामों की प्रसिद्ध स्तुति है।

यह पाठ महाभारत की परंपरा में भीष्म पितामह और धर्मराज युधिष्ठिर के संवाद से जुड़ा है।

युधिष्ठिर ने भीष्म पितामह से पूछा कि संसार में सर्वोच्च आराध्य कौन हैं, मनुष्य किसका स्मरण और स्तवन करे और कौन-सा धर्म श्रेष्ठ माना जाए।

भीष्म पितामह भगवान विष्णु के सहस्र नामों के स्मरण और स्तवन का उपदेश देते हैं।

पाठ बहुत विस्तृत होने के कारण इसे भक्ति भावना पर दो भागों में प्रस्तुत किया जा रहा है। इस पहले भाग में मुख्य सहस्रनाम के श्लोक 1 से 54 दिए गए हैं।

॥ युधिष्ठिर उवाच ॥

किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् ।
स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ॥

को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः ।
किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥

सरल भावार्थ
युधिष्ठिर पूछते हैं— इस संसार में एक परम आराध्य कौन है? मनुष्य किसका स्तवन और पूजन करके कल्याण प्राप्त कर सकता है?

सभी धर्मों में श्रेष्ठ धर्म क्या है और किस नाम का स्मरण मनुष्य को संसार के बंधनों से ऊपर उठने की प्रेरणा देता है?

॥ भीष्म उवाच ॥

जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम् ।
स्तुवन् नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः ॥

तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् ।
ध्यायन् स्तुवन् नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ॥

अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् ।
लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत् ॥

ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम् ।
लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम् ॥

एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः ।
यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥

परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः ।
परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥

पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् ।
दैवतं दैवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥

यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे ।
यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥

तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते ।
विष्णोर्नामसहस्रं मे शृणु पापभयापहम् ॥

यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः ।
ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ॥

सरल भावार्थ
भीष्म पितामह कहते हैं— अनन्त, पुरुषोत्तम और जगत के प्रभु भगवान विष्णु का भक्ति से सहस्र नामों द्वारा स्तवन करना श्रेष्ठ आध्यात्मिक साधना है।

वे अनादि, अनन्त, सभी प्राणियों के आधार और समस्त जगत के स्वामी हैं। ऋषियों द्वारा गाए गए उनके दिव्य नाम अब मैं तुम्हारे कल्याण के लिए कहता हूँ।

॥ संक्षिप्त विनियोग ॥

ऋषिर्नाम्नां सहस्रस्य वेदव्यासो महामुनिः ।
छन्दोऽनुष्टुप् तथा देवो भगवान् देवकीसुतः ॥

अमृतांशूद्भवो बीजं शक्तिर्देवकीनन्दनः ।
त्रिसामा हृदयं तस्य शान्त्यर्थे विनियोज्यते ॥

सरल भावार्थ
परंपरागत विनियोग में महर्षि वेदव्यास को ऋषि, अनुष्टुप् को छन्द और भगवान विष्णु को आराध्य देवता माना गया है।

॥ ध्यानम् ॥

ॐ शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥

सरल भावार्थ
शांत स्वरूप, शेषनाग पर शयन करने वाले, नाभि से कमल प्रकट करने वाले, देवताओं के स्वामी, जगत के आधार और मेघ के समान श्यामवर्ण भगवान विष्णु को प्रणाम है।

वे माता लक्ष्मी के प्रिय, कमलनयन और योगियों द्वारा ध्यान में अनुभव किए जाने वाले समस्त लोकों के परम आश्रय हैं।

॥ श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्रम् — भाग 1 ॥

॥ श्लोक 1 ॥

विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥1॥

॥ श्लोक 2 ॥

पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः ।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥2॥

॥ श्लोक 3 ॥

योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः ।
नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥3॥

श्लोक 1–3 का सरल भावार्थ
इन आरंभिक नामों में भगवान विष्णु को सम्पूर्ण विश्व, सर्वव्यापक परमात्मा, भूत-वर्तमान-भविष्य के स्वामी, समस्त जीवों के रचयिता और पालनकर्ता, साक्षी, अक्षर, योग के आधार और पुरुषोत्तम के रूप में स्मरण किया गया है।
॥ श्लोक 4 ॥

सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः ।
सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥4॥

॥ श्लोक 5 ॥

स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥5॥

॥ श्लोक 6 ॥

अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः ।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥6॥

श्लोक 4–6 का सरल भावार्थ
यहाँ प्रभु को कल्याणस्वरूप, अचल, जगत के आधार, स्वयंभू, कमलनयन, अनादि-अनन्त, इन्द्रियों के स्वामी हृषीकेश, पद्मनाभ और सम्पूर्ण सृष्टि के विधानकर्ता के रूप में वंदन किया गया है।
॥ श्लोक 7 ॥

अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।
प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम् ॥7॥

॥ श्लोक 8 ॥

ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः ।
हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः ॥8॥

॥ श्लोक 9 ॥

ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान् ॥9॥

श्लोक 7–9 का सरल भावार्थ
भगवान को शाश्वत, परम मंगल, प्राण देने वाले, श्रेष्ठ, सृष्टि के स्वामी, माधव, मधुसूदन, पराक्रमी, बुद्धिमान और अतुलनीय स्वरूप में याद किया गया है।
॥ श्लोक 10 ॥

सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः ।
अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ॥10॥

॥ श्लोक 11 ॥

अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः ।
वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः ॥11॥

॥ श्लोक 12 ॥

वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्माऽसम्मितः समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ॥12॥

श्लोक 10–12 का सरल भावार्थ
इन नामों में भगवान विष्णु को देवों के स्वामी, शरण और शांति देने वाले, सर्वदर्शी, अजन्मा, अच्युत, सत्यस्वरूप, समभाव वाले और कमलनयन कहा गया है।
॥ श्लोक 13 ॥

रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः ।
अमृतः शाश्वतस्थाणुर्वरारोहो महातपाः ॥13॥

॥ श्लोक 14 ॥

सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः ।
वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित् कविः ॥14॥

॥ श्लोक 15 ॥

लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः ।
चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः ॥15॥

श्लोक 13–15 का सरल भावार्थ
भगवान को विश्व का मूल, अमृतस्वरूप, सर्वज्ञ, जनार्दन, वेद और वेदों के ज्ञाता, लोकों तथा धर्म के अधिष्ठाता और चतुर्भुज दिव्य स्वरूप वाला कहा गया है।
॥ श्लोक 16 ॥

भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः ।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ॥16॥

॥ श्लोक 17 ॥

उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः ।
अतीन्द्रः सङ्ग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ॥17॥

॥ श्लोक 18 ॥

वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः ।
अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ॥18॥

श्लोक 16–18 का सरल भावार्थ
प्रभु को तेजस्वी, संसार के आदि कारण, विजयस्वरूप, वामन, शुद्ध, नियम के आधार, सदैव योगयुक्त, माधव, महामाया और महान शक्ति वाले परमेश्वर के रूप में स्मरण किया गया है।
॥ श्लोक 19 ॥

महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः ।
अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक् ॥19॥

॥ श्लोक 20 ॥

महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः ।
अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः ॥20॥

॥ श्लोक 21 ॥

मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः ।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ॥21॥

श्लोक 19–21 का सरल भावार्थ
इन नामों में भगवान की महान बुद्धि, शक्ति और दिव्य तेज का वर्णन है। वे श्रीनिवास, सत्पुरुषों की परम गति, गोविन्द, पद्मनाभ और समस्त प्रजा के स्वामी हैं।
॥ श्लोक 22 ॥

अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः ।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ॥22॥

॥ श्लोक 23 ॥

गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः ।
निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः ॥23॥

॥ श्लोक 24 ॥

अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः ।
सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥24॥

श्लोक 22–24 का सरल भावार्थ
यहाँ विष्णु को सब कुछ देखने वाले, स्थिर, अजन्मा, गुरु, सत्य और सत्यपराक्रमी, न्याय के मार्गदर्शक तथा सहस्र सिर, नेत्र और चरणों वाले विश्वात्मा रूप में वर्णित किया गया है।
॥ श्लोक 25 ॥

आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः ।
अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः ॥25॥

॥ श्लोक 26 ॥

सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः ।
सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः ॥26॥

॥ श्लोक 27 ॥

असङ्ख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः ।
सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ॥27॥

श्लोक 25–27 का सरल भावार्थ
भगवान को पृथ्वी का आधार, प्रसन्नचित्त, विश्व को धारण करने वाले, नारायण, पवित्र, अपरिमेय और शुभ संकल्पों को पूर्ण करने की प्रेरणा देने वाला कहा गया है।
॥ श्लोक 28 ॥

वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः ।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः ॥28॥

॥ श्लोक 29 ॥

सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः ।
नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ॥29॥

॥ श्लोक 30 ॥

ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः ।
ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः ॥30॥

श्लोक 28–30 का सरल भावार्थ
इन श्लोकों में प्रभु को धर्मस्वरूप, वृद्धि देने वाला, श्रुतियों का सागर, अनेक रूपों वाला, प्रकाशस्वरूप और सूर्य-चंद्र के समान दिव्य तेज वाले परमात्मा के रूप में प्रणाम किया गया है।
॥ श्लोक 31 ॥

अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः ।
औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः ॥31॥

॥ श्लोक 32 ॥

भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः ।
कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः ॥32॥

॥ श्लोक 33 ॥

युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः ।
अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित् ॥33॥

श्लोक 31–33 का सरल भावार्थ
भगवान को जगत का सेतु, सत्यधर्म के पराक्रमी, तीनों कालों के स्वामी, पवित्र करने वाले, युगों के नियन्ता और अनन्त विजय वाले परम प्रभु कहा गया है।
॥ श्लोक 34 ॥

इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः ।
क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः ॥34॥

॥ श्लोक 35 ॥

अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः ।
अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ॥35॥

॥ श्लोक 36 ॥

स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः ।
वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्दरः ॥36॥

श्लोक 34–36 का सरल भावार्थ
यहाँ भगवान को क्रोध से ऊपर उठाने वाले, विश्व को धारण करने वाले, अच्युत, जीवनदाता, समस्त जल और सृष्टि के आधार, वासुदेव और आदिदेव कहा गया है।
॥ श्लोक 37 ॥

अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः ।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ॥37॥

॥ श्लोक 38 ॥

पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत् ।
महर्द्धिरृद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः ॥38॥

॥ श्लोक 39 ॥

अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः ।
सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जयः ॥39॥

श्लोक 37–39 का सरल भावार्थ
भगवान विष्णु को दुःख से पार लगाने वाला, वीर, कमलनयन, पद्मनाभ, गरुड़ध्वज, अतुलनीय, लक्ष्मीवान और धर्मयुद्ध में विजय प्रदान करने वाला कहा गया है।
॥ श्लोक 40 ॥

विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः ।
महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः ॥40॥

॥ श्लोक 41 ॥

उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः ।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ॥41॥

॥ श्लोक 42 ॥

व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः ।
परर्द्धिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ॥42॥

श्लोक 40–42 का सरल भावार्थ
इन नामों में प्रभु को मार्ग, जगत के कारण और कर्ता, दामोदर, परमेश्वर, स्थिर आधार, संतुष्ट, पोषण देने वाला और शुभ दृष्टि वाला कहा गया है।
॥ श्लोक 43 ॥

रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयोऽनयः ।
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः ॥43॥

॥ श्लोक 44 ॥

वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः ।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ॥44॥

॥ श्लोक 45 ॥

ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः ।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः ॥45॥

श्लोक 43–45 का सरल भावार्थ
भगवान को आनंदस्वरूप राम, धर्म और धर्म के श्रेष्ठ ज्ञाता, वैकुण्ठ, प्राणदाता, प्रणव अर्थात ॐ के स्वरूप, सुदर्शन और समय के अधिपति के रूप में स्मरण किया गया है।
॥ श्लोक 46 ॥

विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम् ।
अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ॥46॥

॥ श्लोक 47 ॥

अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः ।
नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ॥47॥

॥ श्लोक 48 ॥

यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः ।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम् ॥48॥

श्लोक 46–48 का सरल भावार्थ
भगवान समस्त जगत में विस्तृत, सृष्टि के अविनाशी बीज, धर्म और यज्ञ के आधार, सत्पुरुषों की परम गति, सर्वदर्शी, मुक्तस्वरूप और सर्वोच्च ज्ञान के स्रोत हैं।
॥ श्लोक 49 ॥

सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत् ।
मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ॥49॥

॥ श्लोक 50 ॥

स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत् ।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ॥50॥

॥ श्लोक 51 ॥

धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम् ।
अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः ॥51॥

श्लोक 49–51 का सरल भावार्थ
इन नामों में भगवान को शुभ व्रत वाले, सुख देने वाले मित्र, क्रोध को जीतने वाले, सर्वव्यापक, भक्तवत्सल, धर्म की रक्षा और स्थापना करने वाले, अक्षर तथा सहस्र किरणों वाले परम प्रभु के रूप में वंदन किया गया है।
॥ श्लोक 52 ॥

गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः ।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः ॥52॥

॥ श्लोक 53 ॥

उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ।
शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः ॥53॥

॥ श्लोक 54 ॥

सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः ।
विनयो जयः सत्यसन्धो दाशार्हः सात्वताम्पतिः ॥54॥

श्लोक 52–54 का सरल भावार्थ
भाग 1 के अंतिम नामों में भगवान को सत्त्व में स्थित, सिंह के समान शक्तिशाली, समस्त प्राणियों के महेश्वर, आदिदेव, देवों के स्वामी, गोपालक और रक्षक, ज्ञान से प्राप्त होने वाले, सत्यप्रतिज्ञ और सात्वतों के स्वामी के रूप में स्मरण किया गया है।
पाठ संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी:

विष्णु सहस्रनाम का मुख्य नाम-स्तोत्र 107 श्लोकों में प्रचलित है। इस पोस्ट में श्लोक 1 से 54 तक दिए गए हैं।

अगले भाग में श्लोक 55 से 107, मुख्य स्तोत्र का समापन और परंपरागत फलश्रुति दी जाएगी।

विभिन्न संस्कृत संस्करणों में कुछ संधि, वर्तनी और पूर्वन्यास/ध्यान-पद्धति में छोटे पाठभेद मिलते हैं। मुख्य सहस्रनाम पाठ को प्रचलित महाभारत-आधारित क्रम से रखा गया है।

यहाँ अर्थ को सरल और पठनीय रखने के लिए हर तीन श्लोकों के समूह का भावार्थ दिया गया है। प्रत्येक नाम की विस्तृत दार्शनिक व्याख्या अलग-अलग भाष्यों में काफी विस्तृत होती है।
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॥ ॐ नमो नारायणाय • ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

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