श्री सरस्वती स्तोत्र अर्थ सहित | अगस्त्य मुनि प्रोक्त सम्पूर्ण Saraswati Stotram
श्री सरस्वती स्तोत्र
इस स्तोत्र में माँ सरस्वती के श्वेत स्वरूप, वीणा, पुस्तक, ज्ञान, वाणी, वेद, शास्त्र, शुद्ध बुद्धि और दिव्य शक्ति का स्मरण किया गया है।
नीचे स्तोत्र के सभी 21 श्लोक सरल हिंदी भावार्थ सहित दिए गए हैं।
कुल श्लोक — 21
॥ श्री सरस्वती स्तोत्रम् ॥
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना ।
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा पूजिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥1॥
जिनकी ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवता भी पूजा करते हैं, वे जड़ता और अज्ञान को दूर करने वाली भगवती सरस्वती मेरी रक्षा करें।
दोर्भिर्युक्ता चतुर्भिः स्फटिकमणिनिभैरक्षमालान्दधाना
हस्तेनैकेन पद्मं सितमपि च शुकं पुस्तकं चापरेण ।
भासा कुन्देन्दुशङ्खस्फटिकमणिनिभा भासमानाऽसमाना
सा मे वाग्देवतेयं निवसतु वदने सर्वदा सुप्रसन्ना ॥2॥
कुन्द पुष्प, चंद्रमा, शंख और स्फटिक के समान उज्ज्वल वाग्देवी मेरी वाणी में सदैव प्रसन्न होकर निवास करें।
सुरासुरसेवितपादपङ्कजा
करे विराजत्कमनीयपुस्तका ।
विरिञ्चिपत्नी कमलासनस्थिता
सरस्वती नृत्यतु वाचि मे सदा ॥3॥
वे माँ सरस्वती मेरी वाणी में सदैव विद्यमान रहें और उसे ज्ञानपूर्ण तथा मधुर बनाएँ।
सरस्वती सरसिजकेसरप्रभा
तपस्विनी सितकमलासनप्रिया ।
घनस्तनी कमलविलोललोचना
मनस्विनी भवतु वरप्रसादिनी ॥4॥
कमल के समान चंचल और सुंदर नेत्रों वाली माँ हमें शुभ बुद्धि और कृपा प्रदान करें।
सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि ।
विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा ॥5॥
मैं विद्या का आरंभ कर रहा हूँ। मेरे अध्ययन में एकाग्रता, सद्बुद्धि और सफलता बनी रहे— यही प्रार्थना है।
सरस्वति नमस्तुभ्यं सर्वदेवि नमो नमः ।
शान्तरूपे शशिधरे सर्वयोगे नमो नमः ॥6॥
शांत स्वरूप वाली, दिव्य ज्योति से सुशोभित और योगमयी देवी को नमस्कार है।
नित्यानन्दे निराधारे निष्कलायै नमो नमः ।
विद्याधरे विशालाक्षि शुद्धज्ञाने नमो नमः ॥7॥
शुद्धस्फटिकरूपायै सूक्ष्मरूपे नमो नमः ।
शब्दब्रह्मि चतुर्हस्ते सर्वसिद्ध्यै नमो नमः ॥8॥
वे हमारे भीतर ज्ञान, विवेक और योग्य कर्म की क्षमता बढ़ाएँ।
मुक्तालङ्कृतसर्वाङ्ग्यै मूलाधारे नमो नमः ।
मूलमन्त्रस्वरूपायै मूलशक्त्यै नमो नमः ॥9॥
वे ज्ञान और पवित्र वाणी की मूल प्रेरणा हैं।
मनोमयि महायोगे वागीश्वरि नमो नमः ।
वाण्यै वरदहस्तायै वरदायै नमो नमः ॥10॥
वरद मुद्रा धारण करने वाली माँ सरस्वती हमें सद्बुद्धि और उत्तम वाणी प्रदान करें।
वेद्यायै वेदरूपायै वेदान्तायै नमो नमः ।
गुणदोषविवर्जिन्यै गुणदीप्त्यै नमो नमः ॥11॥
सर्वज्ञाने सदानन्दे सर्वरूपे नमो नमः ।
सम्पन्नायै कुमार्यै च सर्वज्ञायै नमो नमः ॥12॥
योगरूपे रमादेव्यै योगानन्दे नमो नमः ।
दिव्यज्ञायै त्रिनेत्रायै दिव्यमूर्त्यै नमो नमः ॥13॥
यह श्लोक देवी की व्यापक ज्ञानशक्ति का स्मरण कराता है।
अर्धचन्द्रजटाधारि चन्द्रबिम्बे नमो नमः ।
चन्द्रादित्यजटाधारि चन्द्रबिम्बे नमो नमः ॥14॥
अणुरूपे महारूपे विश्वरूपे नमो नमः ।
अणिमाद्यष्टसिद्धायै आनन्दायै नमो नमः ॥15॥
अणिमा आदि सिद्धियों की अधिष्ठात्री और आनंदस्वरूपा माँ को नमस्कार है।
ज्ञानविज्ञानरूपायै ज्ञानमूर्ते नमो नमः ।
नानाशास्त्रस्वरूपायै नानारूपे नमो नमः ॥16॥
पद्मदे पद्मवंशे च पद्मरूपे नमो नमः ।
परमेष्ठ्यै परामूर्त्यै नमस्ते पापनाशिनी ॥17॥
महादेव्यै महाकाल्यै महालक्ष्म्यै नमो नमः ।
ब्रह्मविष्णुशिवाख्यायै ब्रह्मनार्यै नमो नमः ॥18॥
यहाँ देवी को सृष्टि की व्यापक दिव्य शक्ति के रूप में वंदन किया गया है।
कमलाकरपुष्पा च कामरूपे नमो नमः ।
कपालि कर्मदीप्तायै कर्मदायै नमो नमः ॥19॥
कर्म को प्रकाश देने वाली और उचित कर्म के फल की प्रेरणा देने वाली देवी को बार-बार नमस्कार है।
॥ फलश्रुति ॥
सायं प्रातः पठेन्नित्यं षण्मासात्सिद्धिरुच्यते ।
चोरव्याघ्रभयं नास्ति पठतां शृण्वतामपि ॥20॥
इसका आध्यात्मिक संदेश है कि नियमित साधना, एकाग्रता और श्रद्धा मन में साहस और स्थिरता विकसित करती है।
इत्थं सरस्वतीस्तोत्रमगस्त्यमुनिवाचकम् ।
सर्वसिद्धिकरं नॄणां सर्वपापप्रणाशनम् ॥21॥
फलश्रुति में इसे मनुष्य के कल्याणकारी कार्यों में सहायक और पाप अर्थात अधर्म तथा अज्ञान से दूर करने वाला बताया गया है।
॥ इत्यगस्त्यमुनिप्रोक्तं सरस्वतीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
॥ श्री सरस्वत्यै नमः ॥
श्री सरस्वती स्तोत्र का मूल भाव
इस स्तोत्र में माँ सरस्वती को
ज्ञान, वाणी, वेद, शास्त्र,
सद्बुद्धि और विवेक की अधिष्ठात्री
के रूप में स्मरण किया गया है।
उनका श्वेत स्वरूप
मन और विचार की पवित्रता का प्रतीक है,
वीणा कला और सामंजस्य का,
पुस्तक ज्ञान का
और अक्षमाला साधना तथा एकाग्रता का प्रतीक मानी जाती है।
इस स्तोत्र का सुंदर संदेश है कि
विद्या केवल जानकारी प्राप्त करना नहीं,
बल्कि
विनम्रता, विवेक, सत्य वाणी और अच्छे कर्म
का विकास करना भी है।
यहाँ अगस्त्य मुनि-प्रोक्त श्री सरस्वती स्तोत्र का 21-श्लोक वाला प्रचलित पाठ प्रस्तुत किया गया है।
अलग-अलग प्रकाशित संस्करणों में कुछ शब्दों में छोटे पाठभेद मिलते हैं, विशेषकर श्लोक 10, 13, 14 और 19 में। इसलिए किसी अन्य पुस्तक में कुछ शब्द थोड़ा अलग मिलना संभव है।
श्लोक 20–21 में वर्णित फल परंपरागत धार्मिक फलश्रुति हैं। इनका मुख्य आध्यात्मिक भाव नियमित भक्ति, अध्ययन, एकाग्रता और सदाचार से जुड़ा है।
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