श्री कनकधारा स्तोत्र अर्थ सहित | सम्पूर्ण Kanakadhara Stotram in Hindi
श्री कनकधारा स्तोत्र
इस स्तोत्र में माता लक्ष्मी की करुणामयी दृष्टि, भगवान विष्णु के प्रति उनके प्रेम, कमलमय दिव्य स्वरूप और जगत-जननी रूप की अत्यंत सुंदर स्तुति की गई है।
नीचे व्यापक रूप से प्रचलित 21 श्लोकों वाला कनकधारा स्तोत्र सरल हिंदी भावार्थ सहित दिया गया है।
परंपरागत रचनाकार — आदि शंकराचार्य
॥ श्री कनकधारा स्तोत्रम् ॥
वन्दे वन्दारुमन्दारमिन्दिरानन्दकन्दलम् ।
अमन्दानन्दसन्दोहबन्धुरं सिन्धुराननम् ॥
अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्ती
भृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम् ।
अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीला
माङ्गल्यदाऽस्तु मम मङ्गलदेवतायाः ॥1॥
समस्त ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री मंगलमयी माता की वह कृपादृष्टि मेरे जीवन में भी शुभता उत्पन्न करे।
मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेः
प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि ।
माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले या
सा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः ॥2॥
कमल पर घूमती मधुमक्खी के समान उनकी वह सुंदर दृष्टि हमारे जीवन में कल्याण और सद्बुद्धि प्रदान करे।
विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षं
आनन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि ।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धम्
इन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः ॥3॥
नीलकमल के समान सुंदर उनकी वह कृपामयी दृष्टि क्षणभर के लिए मुझ पर भी पड़े।
आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दं
आनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम् ।
आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं
भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः ॥4॥
उनके नेत्रों की वह शांत और प्रेममयी दृष्टि मेरे जीवन में कल्याणकारी बने।
बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे या
हारावलीव हरिनीलमयी विभाति ।
कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला
कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः ॥5॥
कमल में निवास करने वाली माता की वह कृपामयी दृष्टि मेरे लिए मंगलकारी हो।
कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेः
धाराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव ।
मातुः समस्तजगतां महनीयमूर्तिः
भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः ॥6॥
समस्त संसार की माता, महनीय स्वरूप वाली देवी मेरे जीवन में शुभता प्रदान करें।
प्राप्तं पदं प्रथमतः खलु यत्प्रभावात्
माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन ।
मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धं
मन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः ॥7॥
समुद्र से प्रकट हुई माता की वह कोमल कृपादृष्टि मेरी ओर भी आए।
दद्याद्दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारां
अस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ विषण्णे ।
दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरं
नारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः ॥8॥
हे नारायणप्रिया माता! अपनी दयामयी दृष्टि से मेरे दुःख, अभाव और कर्मजनित कठिनाइयों को शांत करके जीवन में कल्याण का मार्ग प्रशस्त कीजिए।
इष्टाविशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र-
दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते ।
दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टां
पुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः ॥9॥
कमल के समान उज्ज्वल उनकी दृष्टि मेरे जीवन में भी उचित पोषण, संतोष और कल्याण प्रदान करे।
गीर्देवतेति गरुडध्वजभामिनीति
शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति ।
सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायै
तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै ॥10॥
सृष्टि, पालन और परिवर्तन की समस्त दिव्य शक्तियों में विद्यमान जगत्-जननी को मेरा नमस्कार है।
श्रुत्यै नमोऽस्तु त्रिभुवनैकफलप्रसूत्यै
रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणाश्रयायै ।
शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायै
पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै ॥11॥
यहाँ देवी को ज्ञान, प्रेम, शक्ति और पोषण सभी के मूल स्वरूप के रूप में स्मरण किया गया है।
नमोऽस्तु नालीकनिभाननायै
नमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूम्यै ।
नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायै
नमोऽस्तु नारायणवल्लभायै ॥12॥
नमोऽस्तु हेमाम्बुजपीठिकायै
नमोऽस्तु भूमण्डलनायिकायै ।
नमोऽस्तु देवादिदयापरायै
नमोऽस्तु शार्ङ्गायुधवल्लभायै ॥13॥
नमोऽस्तु देव्यै भृगुनन्दनायै
नमोऽस्तु विष्णोरुरसि स्थितायै ।
नमोऽस्तु लक्ष्म्यै कमलालयायै
नमोऽस्तु दामोदरवल्लभायै ॥14॥
नमोऽस्तु कान्त्यै कमलेक्षणायै
नमोऽस्तु भूत्यै भुवनप्रसूत्यै ।
नमोऽस्तु देवादिभिरर्चितायै
नमोऽस्तु नन्दात्मजवल्लभायै ॥15॥
भगवान के प्रिय स्वरूप में विराजमान महालक्ष्मी को बार-बार नमस्कार है।
सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानि
साम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि ।
त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि
मामेव मातरनिशं कलयन्तु नान्यत् ॥16॥
मेरा मन सदा आपकी भक्ति में लगा रहे।
यत्कटाक्षसमुपासनाविधिः
सेवकस्य सकलार्थसम्पदः ।
सन्तनोति वचनाङ्गमानसैः
त्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ॥17॥
मैं वाणी, शरीर और मन से भगवान विष्णु के हृदय में विराजमान महालक्ष्मी का भजन करता हूँ।
सरसिजनिलये सरोजहस्ते
धवलतरांशुकगन्धमाल्यशोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे
त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥18॥
तीनों लोकों का कल्याण करने वाली माता, मुझ पर प्रसन्न हों।
दिग्घस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्ट-
स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुताङ्गीम् ।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष-
लोकाधिराजगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम् ॥19॥
कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं
करुणापूरतरङ्गितैरपाङ्गैः ।
अवलोकय मामकिञ्चनानां
प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः ॥20॥
अपनी करुणा से भरी दृष्टि से मेरी ओर देखिए। मैं स्वयं को आपकी निष्कपट दया का आश्रित मानकर आपकी शरण में आया हूँ।
स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमीभिरन्वहं
त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम् ।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो
भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः ॥21॥
उनके भीतर श्रेष्ठ गुण, शुभ विचार और सद्भाव बढ़ें— यह इस समापन श्लोक का भाव है।
॥ इति श्रीमदाद्यशङ्कराचार्यविरचितं
श्री कनकधारा स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥
॥ श्री महालक्ष्म्यै नमः ॥
कनकधारा स्तोत्र का मूल भाव
कनकधारा स्तोत्र में
माँ महालक्ष्मी की
करुणा, कृपादृष्टि, शुभता,
सद्गुण और भगवान विष्णु के प्रति प्रेम
का अत्यंत सुंदर वर्णन है।
इस स्तोत्र में बार-बार
माता की “कटाक्ष-दृष्टि” का स्मरण आता है।
इसका आध्यात्मिक भाव केवल धन प्राप्त करना नहीं,
बल्कि जीवन में
करुणा, संतोष, सद्बुद्धि,
उचित समृद्धि और दूसरों के प्रति उदारता
का विकास भी है।
माता लक्ष्मी की उपासना का सुंदर संदेश है कि
समृद्धि के साथ विनम्रता,
धर्म और करुणा भी बनी रहे।
कनकधारा स्तोत्र के अलग-अलग प्रकाशित संस्करणों में श्लोकों की संख्या और क्रम में अंतर मिलता है।
कुछ पाठ-संपादनों में 18 श्लोक मुख्य क्रम में दिए गए हैं, जबकि व्यापक रूप से प्रचलित पूजा-पाठ संस्करणों में 21 श्लोक पढ़े जाते हैं।
इस पोस्ट में पाठकों की सुविधा के लिए प्रचलित 21-श्लोक वाला पाठ प्रस्तुत किया गया है।
कनकधारा स्तोत्र को परंपरा में आदि शंकराचार्य से संबद्ध माना जाता है। स्तोत्र में वर्णित समृद्धि संबंधी फल धार्मिक श्रद्धा और परंपरा के कथन हैं; इन्हें निश्चित आर्थिक परिणाम की गारंटी न समझें।
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