ऐतरेयोपनिषद् सम्पूर्ण — तीनों अध्याय, सभी 33 मंत्र और सरल हिंदी अर्थ
ऐतरेयोपनिषद् सम्पूर्ण
मूल पाठ और प्रत्येक मंत्र का सरल हिंदी अर्थ
ऐतरेयोपनिषद् ऋग्वेद से सम्बद्ध प्रमुख उपनिषद् है। यह ऐतरेय आरण्यक के दूसरे आरण्यक के चौथे, पाँचवें और छठे अध्याय में आता है। इसमें आत्मा से सृष्टि, इन्द्रियों और देवशक्तियों का सम्बन्ध, अन्न का महत्त्व, जीव के तीन जन्म और प्रज्ञानस्वरूप ब्रह्म का विवेचन है। इसका प्रसिद्ध महावाक्य है—प्रज्ञानं ब्रह्म।
वाणी और मन की एकता का शांतिपाठ
अध्याय 1
खण्ड 1 · आत्मा, लोक और देवशक्तियों का प्राकट्य
4 मंत्र
मंत्र 1.1.1 · एक आत्मा और सृष्टि का संकल्प
आरम्भ में यह सब केवल एक आत्मा ही था। उससे अलग कुछ भी सक्रिय नहीं था। उस आत्मा ने विचार किया—मैं लोकों की सृष्टि करूँ। सृष्टि का यह विवेचन आत्मा को समस्त जगत का मूल आधार बताकर आरम्भ होता है।
मंत्र 1.1.2 · चार लोकों का निरूपण
उसने अम्भस्, मरीचि, मर और आप नामक लोकों को रचा। द्युलोक से ऊपर अम्भस् है, जिसका आधार द्युलोक है। अन्तरिक्ष को मरीचियाँ कहा गया है। पृथ्वी मर है और उसके नीचे के क्षेत्र आप हैं। ये इस उपनिषद् में प्रयुक्त सृष्टि-विवेचन के लोकनाम हैं।
मंत्र 1.1.3 · पुरुष का निर्माण
उसने विचार किया—ये लोक बन गए; अब इनके लोकपालों को रचूँ। तब जल से ही पुरुष को उठाकर उसका आकार बनाया। यहाँ पुरुष का निरूपण आगे इन्द्रियों और उनसे सम्बद्ध देवशक्तियों के प्रकट होने का आधार बनता है।
मंत्र 1.1.4 · इन्द्रियों और देवशक्तियों का प्राकट्य
उस पुरुष पर तप का संकल्प हुआ। उसके मुख का द्वार अण्डे की तरह खुला; मुख से वाणी और वाणी से अग्नि प्रकट हुई। नासिकाओं से प्राण और प्राण से वायु; नेत्रों से दृष्टि और दृष्टि से सूर्य; कानों से श्रवण और श्रवण से दिशाएँ प्रकट हुईं।
त्वचा से रोम और रोमों से औषधि-वनस्पतियाँ; हृदय से मन और मन से चन्द्रमा; नाभि से अपान और अपान से मृत्यु; जननेन्द्रिय से रेतस् तथा रेतस् से जल प्रकट हुआ। शरीर की शक्तियों और जगत की देवशक्तियों का परस्पर सम्बन्ध इस प्रकार बताया गया है।
खण्ड 2 · देवशक्तियों का देह में प्रवेश
5 मंत्र
मंत्र 1.2.1 · शक्तियों के लिए आश्रय की माँग
इस प्रकार रची गई देवशक्तियाँ विशाल समुद्र में आ पड़ीं और भूख-प्यास से घिर गईं। उन्होंने आत्मा से कहा—हमारे लिए ऐसा निवास निश्चित कीजिए जिसमें प्रतिष्ठित होकर हम अन्न ग्रहण कर सकें। यह देह में शक्तियों के लिए उपयुक्त आश्रय की खोज का प्रसंग है।
मंत्र 1.2.2 · गाय और घोड़े का शरीर
उनके लिए गाय का शरीर लाया गया; उन्होंने कहा—यह हमारे लिए पर्याप्त नहीं है। फिर घोड़े का शरीर लाया गया; उसके बारे में भी उन्होंने यही कहा। आगे मनुष्य-शरीर के विशेष अवसर को समझाने के लिए यह क्रम रखा गया है।
मंत्र 1.2.3 · मनुष्य-शरीर की प्रशंसा
उनके लिए पुरुष का शरीर लाया गया। उन्होंने प्रसन्न होकर कहा—यह बहुत सुन्दर और अच्छी तरह बनाया गया है। पुरुष को सुकृत कहा गया। तब आत्मा ने उन शक्तियों से अपने-अपने उचित स्थानों में प्रवेश करने को कहा।
मंत्र 1.2.4 · देवताओं का इन्द्रिय-रूप प्रवेश
अग्नि वाणी होकर मुख में, वायु प्राण होकर नासिकाओं में और सूर्य दृष्टि होकर नेत्रों में प्रविष्ट हुआ। दिशाएँ श्रवण होकर कानों में; औषधि-वनस्पतियाँ रोम होकर त्वचा में; चन्द्रमा मन होकर हृदय में प्रविष्ट हुए। मृत्यु अपान होकर नाभि में और जल रेतस् होकर जननेन्द्रिय में प्रविष्ट हुए। पहले प्रकट देवशक्तियाँ अब देह में अपने-अपने कार्यों के रूप में प्रतिष्ठित होती हैं।
मंत्र 1.2.5 · भूख-प्यास का भाग
भूख और प्यास ने भी अपने लिए स्थान माँगा। उनसे कहा गया—मैं तुम्हें इन्हीं देवशक्तियों में भाग देता हूँ; तुम इनके साथ सहभागी रहोगी। इसलिए जिस भी देवता के लिए अर्पण ग्रहण किया जाता है, उसमें भूख-प्यास भी भागी होती हैं। देह और उसकी शक्तियों की पोषण पर निर्भरता इस कथन से व्यक्त होती है।
खण्ड 3 · अन्न, इन्द्रियाँ और आत्मा का प्रवेश
14 मंत्र
मंत्र 1.3.1 · अन्न की सृष्टि का संकल्प
आत्मा ने विचार किया—लोक और लोकपाल बन गए; अब इनके लिए अन्न की सृष्टि करूँ। जीवन और इन्द्रिय-व्यवस्था के बाद पोषण का विषय आता है।
मंत्र 1.3.2 · अन्न का प्राकट्य
उसने जल पर तप किया। तप्त जल से एक मूर्ति, अर्थात् ग्रहण करने योग्य पदार्थ, उत्पन्न हुआ। वही अन्न था। यह सृष्टि-विवेचन में अन्न के प्रकट होने का वर्णन है।
मंत्र 1.3.3 · केवल बोलने से तृप्ति नहीं
बना हुआ अन्न दूर हटना चाहता था। पुरुष ने उसे वाणी से पकड़ना चाहा, लेकिन वाणी से ग्रहण नहीं कर सका। यदि केवल वाणी से अन्न पकड़ा जा सकता, तो उसका नाम बोल देने से ही तृप्ति हो जाती।
मंत्र 1.3.4 · केवल सूँघने से तृप्ति नहीं
उसने प्राण, अर्थात् यहाँ नासिका की घ्राण-क्रिया, से अन्न ग्रहण करना चाहा, पर ऐसा नहीं कर सका। यदि यह सम्भव होता, तो अन्न को सूँघ लेने से ही तृप्ति हो जाती।
मंत्र 1.3.5 · केवल देखने से तृप्ति नहीं
उसने आँखों से अन्न पकड़ना चाहा, पर आँखें उसे ग्रहण नहीं कर सकीं। यदि आँखें अन्न ग्रहण कर सकतीं, तो उसे देख लेने से ही भूख मिट जाती।
मंत्र 1.3.6 · केवल सुनने से तृप्ति नहीं
उसने कानों से अन्न ग्रहण करना चाहा, पर सफल नहीं हुआ। यदि ऐसा होता, तो अन्न के विषय में सुन लेने से ही तृप्ति मिल जाती।
मंत्र 1.3.7 · केवल छूने से तृप्ति नहीं
उसने त्वचा से अन्न ग्रहण करना चाहा, पर त्वचा से ऐसा नहीं हो सका। यदि त्वचा से अन्न ग्रहण हो जाता, तो उसे छू लेने मात्र से तृप्ति हो जाती।
मंत्र 1.3.8 · केवल सोचने से तृप्ति नहीं
उसने मन से अन्न ग्रहण करना चाहा, लेकिन मन का चिन्तन उसे खा नहीं सका। यदि ऐसा हो सकता, तो अन्न का ध्यान कर लेने से ही तृप्ति मिल जाती।
मंत्र 1.3.9 · जननेन्द्रिय की सीमा
उसने जननेन्द्रिय से अन्न ग्रहण करना चाहा, पर उससे भी ऐसा नहीं हुआ। यदि यह सम्भव होता, तो केवल विसर्जन की उस क्रिया से ही तृप्ति हो जाती। यह भी इन्द्रियों की सीमाएँ बताने वाले उसी क्रम का भाग है।
मंत्र 1.3.10 · अपान और अन्नग्रहण
अन्त में उसने अपान-वायु से अन्न ग्रहण करना चाहा और उसे ग्रहण कर लिया। अपान को अन्न ग्रहण करने वाला कहा गया है। अन्न ही इस वायु के जीवन का आधार है। यहाँ अन्न को भीतर ले जाने वाली जीवनक्रिया और उसके पोषण की महत्ता बताई गई है।
मंत्र 1.3.11 · मैं कौन हूँ?
आत्मा ने विचार किया—यह शरीर और इसकी क्रियाएँ मेरे बिना कैसे रह सकती हैं? मैं किस द्वार से प्रवेश करूँ? यदि वाणी बोलती है, प्राण सूँघता है, आँख देखती है, कान सुनते हैं, त्वचा छूती है, मन सोचता है, अपान अन्न ग्रहण करता है और जननेन्द्रिय विसर्जन करती है, तो मैं कौन हूँ? यह प्रश्न उपकरणों और उनके चेतन आधार का विवेक कराता है।
मंत्र 1.3.12 · विदृति और तीन निवास
उसने सिर की सीमा को विदीर्ण करके उसी द्वार से प्रवेश किया। इस द्वार का नाम विदृति है; इसे आनन्द का द्वार कहा गया है। उसके तीन निवास और तीन स्वप्न बताए गए हैं—यह निवास, यह निवास और यह निवास। यह आत्मा के देह में प्रकट अनुभव का सांकेतिक निरूपण है; ‘तीन’ का विस्तृत विवेचन परम्परागत भाष्यों में मिलता है।
मंत्र 1.3.13 · ब्रह्म का दर्शन
जन्म लेकर उसने प्राणियों को देखा और विचार किया—यहाँ अपने से अलग किस अन्य का वर्णन करूँ? उसने इसी पुरुष को सर्वत्र विस्तृत ब्रह्म के रूप में देखा और कहा—मैंने इसे देख लिया। यह इन्द्रियों की अलग-अलग क्रियाओं के पीछे एक ब्रह्म के दर्शन का प्रसंग है। मंत्र में दिया ‘३’ प्लुत, अर्थात् दीर्घ उच्चारण, का संकेत है।
मंत्र 1.3.14 · इदन्द्र और इन्द्र
‘मैंने इसे देखा’ इस भाव के कारण उसका नाम इदन्द्र कहा गया। वही वास्तव में इदन्द्र है; उसे परोक्ष रीति से इन्द्र कहते हैं। देवता मानो परोक्ष नामों को प्रिय मानते हैं—यह बात दोहराकर कही गई है। यह नाम की उपनिषद् में दी गई व्याख्या है।
अध्याय 2
जीव के तीन जन्म और वामदेव की अनुभूति
6 मंत्र
मंत्र 2.1.1 · प्रथम जन्म
इस अध्याय में जीव के जन्म की निरन्तरता का विवेचन है। पुरुष में आरम्भिक गर्भरूप रेतस् होता है, जिसे शरीर के अंगों से प्राप्त तेज या सार कहा गया है। वह अपने भीतर अपने ही आत्मरूप को धारण करता है। जब वह स्त्री में स्थापित होता है, तब उस जीव का प्रथम जन्म कहा जाता है। यह ग्रंथ की जन्म-विषयक आध्यात्मिक व्याख्या है।
मंत्र 2.1.2 · गर्भ का पोषण
वह स्त्री के शरीर में अपने अंग के समान एकात्म हो जाता है, इसलिए उसे हानि नहीं पहुँचाता—ऐसा मंत्र कहता है। स्त्री अपने भीतर आए इस आत्मरूप गर्भ का पोषण करती है। गर्भधारण को पोषण और अपनेपन के सम्बन्ध में देखा गया है।
मंत्र 2.1.3 · माता की देखभाल और दूसरा जन्म
जो स्त्री गर्भ का पोषण करती है, उसका भी पोषण और संरक्षण होना चाहिए। वह गर्भ को धारण करती है। पिता जन्म से पहले और जन्म के बाद बालक की अभिवृद्धि करता है; बालक का पालन करके वह मानो अपने ही आत्मरूप का पोषण करता है। इस सन्तति से लोकों की परम्परा बनी रहती है। इसे दूसरा जन्म कहा गया है।
मंत्र 2.1.4 · कर्तव्य की निरन्तरता और तीसरा जन्म
पुत्ररूप आत्मा को पुण्यकर्मों और कर्तव्यों की निरन्तरता के लिए प्रतिनिधि बनाया जाता है। फिर दूसरा, अर्थात् पिता का वृद्ध शरीर, अपना कार्य पूरा करके प्रयाण करता है। यहाँ से प्रयाण करने वाला पुनः जन्म लेता है; यह उसका तीसरा जन्म बताया गया है। पिता-पुत्र की निरन्तरता और पुनर्जन्म को एक क्रम में रखकर समझाया गया है।
मंत्र 2.1.5 · वामदेव का मंत्र
ऋषि वामदेव ने कहा—गर्भ में रहते हुए ही मैंने देवताओं के सभी जन्मों को जाना। लोहे के समान सुदृढ़ अनेक पुरियाँ मुझे रोके हुए थीं, पर मैं बाज की तरह वेग से निकल आया। मंत्र कहता है कि वामदेव ने गर्भ में शयन करते हुए यह कहा। परम्परागत अर्थ में वे पुरियाँ बन्धनकारी देहों का बिंब हैं और उनसे निकलना आत्मज्ञान की मुक्ति का संकेत है।
मंत्र 2.1.6 · ज्ञान और अमृतत्व
इस प्रकार आत्मा को जानने वाले वामदेव शरीर का बन्धन टूटने पर ऊपर उठे। उस स्वर्गलोक में सभी कामनाओं की पूर्णता पाकर वे अमृत हुए—मंत्र इस बात को दोहराता है। यहाँ ज्ञान के फलस्वरूप बन्धन से परे होने और अमृतत्व की महिमा बताई गई है।
अध्याय 3
प्रज्ञानस्वरूप आत्मा और ब्रह्म
4 मंत्र
मंत्र 3.1.1 · कौन-सा आत्मा?
हम जिसे आत्मा मानकर उपासते हैं, वह कौन है? वह आत्मा कौन-सा है जिसके द्वारा मनुष्य देखता है, सुनता है, गन्ध सूँघता है, वाणी व्यक्त करता है और स्वादिष्ट-अस्वादिष्ट का ज्ञान करता है? अब चर्चा बाहरी उपकरणों से उस जानने वाले आधार की ओर मुड़ती है।
मंत्र 3.1.2 · प्रज्ञान के विविध नाम
हृदय और मन की पहचान, शासन-शक्ति, विशेष ज्ञान, चेतन बोध, मेधा, दृष्टि, धैर्य, मनन, विवेक, मन के आवेग, स्मृति, संकल्प, दृढ़ निश्चय, जीवनशक्ति, कामना और इच्छा के विविध रूप—ये सब प्रज्ञान के ही नाम हैं। जानने की मूल चेतना विभिन्न मानसिक और जीवनगत कार्यों के रूप में अलग-अलग नाम पाती है।
मंत्र 3.1.3 · प्रज्ञानं ब्रह्म
यही ब्रह्मा, इन्द्र, प्रजापति और समस्त देवताओं का आधार है। पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और ज्योति—पाँच महाभूत; छोटे-बड़े बीजों से उत्पन्न जीव; अण्डज, जरायुज, स्वेदज और उद्भिज्ज; घोड़े, गायें, मनुष्य, हाथी; चलने वाले, उड़ने वाले और स्थिर रहने वाले—जो कुछ है, सब प्रज्ञान के द्वारा संचालित और प्रज्ञान में प्रतिष्ठित है।
प्रज्ञान ही लोक का मार्गदर्शक है, प्रज्ञा ही उसका आधार है। इसलिए महावाक्य कहा गया—‘प्रज्ञानं ब्रह्म’: जानने की मूल चेतना ही ब्रह्म है। यहाँ प्रज्ञान का आशय केवल सूचनाओं का संग्रह या व्यक्ति की बौद्धिक चतुराई नहीं है। जीवों का वर्गीकरण इस प्राचीन ग्रंथ में प्रयुक्त वर्गीकरण है।
मंत्र 3.1.4 · आत्मबोध का फल
इस प्रज्ञानस्वरूप आत्मा के द्वारा ज्ञानी इस लोक से ऊपर उठकर उस स्वर्गलोक में सभी कामनाओं की पूर्णता पाता है और अमृत होता है—मंत्र इसे दोहराकर समाप्त होता है। प्रज्ञान को आत्मा और ब्रह्म का आधार जानना इस उपनिषद् का निष्कर्ष है।
मुख्य संदेश और अध्ययन-संकेत
देखना, सुनना, सूँघना, सोचना और अन्न ग्रहण करना अलग-अलग क्रियाएँ हैं। उपनिषद् इनके पीछे स्थित जानने वाले आधार की खोज कराता है। अन्त में प्रज्ञान को सभी अनुभवों और समस्त जगत का आधार कहता है। ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ का आशय मूल चेतन तत्त्व से है, केवल अधिक जानकारी रखने से नहीं।
पहले अध्याय का सृष्टि और देह-प्रवेश वर्णन आध्यात्मिक निरूपण है। दूसरे अध्याय में प्रथम जन्म गर्भ की स्थापना, दूसरा जन्म शिशु के प्रकट होने और सन्तति, तथा तीसरा जन्म देह के प्रयाण के बाद पुनर्जन्म से जुड़ा है। ग्रंथ इन बातों को पिता-पुत्र की निरन्तरता के दृष्टिकोण से रखता है। माता का पोषण और संरक्षण भी स्पष्ट कर्तव्य कहा गया है।
तीसरे अध्याय में अण्डज, जरायुज, स्वेदज और उद्भिज्ज जैसे प्राचीन वर्गनाम आते हैं। उन्हें उसी पाठ-प्रसंग में रखा गया है। मूल पाठ का ‘३’ प्लुत उच्चारण का संकेत है; यह कोई अतिरिक्त मंत्र नहीं है।
कठिन शब्दों के सरल अर्थ
- आत्मा: यहाँ सृष्टि और अनुभव का चेतन आधार
- लोक: अस्तित्व का क्षेत्र
- लोकपाल: लोकों से सम्बद्ध नियामक देवशक्तियाँ
- अम्भस्: पाठ में द्युलोक से ऊपर का लोक
- मरीचि: किरणें; यहाँ अन्तरिक्ष का नाम
- मर: यहाँ पृथ्वीलोक का नाम
- आयतन: निवास / आधार
- अशनाया-पिपासा: भूख और प्यास
- रेतस्: प्रसंगानुसार प्रजनन का बीजरूप सार
- अपान: प्रसंगानुसार अन्नग्रहण से जुड़ी प्राणक्रिया
- विदृति: प्रवेश के लिए खुला बताया गया द्वार
- आवसथ: निवास
- प्रज्ञान: जानने की मूल चेतना
- मेधा: ज्ञान धारण करने की शक्ति
- क्रतु: दृढ़ निश्चय / संकल्प
- अमृतत्व: मृत्यु-बन्धन से परे होने का आध्यात्मिक संकेत
मूल स्रोत और संपादकीय टिप्पणी
- Sanskrit Documents — ऐतरेयोपनिषद् का आधार मूल पाठ
- वैदिक हेरिटेज पोर्टल — ग्रंथ का परिचय और 33 मंत्रों की संरचना
- शंकरभाष्य में उद्धृत प्राचीन मूल पाठ — तुलनात्मक स्रोत
प्राचीन उपनिषद् और प्राचीन भाष्य सार्वजनिक सम्पदा की रचनाएँ हैं। पाँच पाठ-समूहों में 4, 5, 14, 6 और 4—सभी 33 मंत्र पूरे रखे गए हैं। मूल पाठ के अध्याय और खण्डों के आरम्भ-समापन वाक्यों को स्पष्ट शीर्षकों में व्यक्त किया गया है। स्रोत में अन्त में दोहराया समान शांतिपाठ यहाँ आरम्भ में अर्थ सहित दिया गया है। यह वैदिक स्वरचिह्नों के बिना अध्ययन-पाठ है।
आधार स्रोत के निम्न टंकण-दोषों को प्राचीन भाष्य में उद्धृत मूल पाठ से मिलाकर सुधारा गया है। रिक्त स्थान और पंक्तियों का विन्यास पढ़ने की सुविधा से रखा गया है; अन्य मूल शब्द और क्रम सुरक्षित हैं।
- ‘श्रोत्रद्दिशस्त्वङ्’ → ‘श्रोत्राद्दिशस्त्वङ्’
- ‘प्राविशाद्दिशः’ → ‘प्राविशद्दिशः’
- ‘भागिन्न्यौ’ → ‘भागिन्यौ’
- ‘पराङ्त्यजिघांसत्’ → ‘पराङत्यजिघांसत्’
- ‘ग्रहीतु/न्’ → ‘ग्रहीतुं’
- ‘हैवानमत्रप्स्यत्’ → ‘हैवान्नमत्रप्स्यत्’ · 2 स्थान
- ‘च्छ्रोतेणाग्रहैष्य’ → ‘च्छ्रोत्रेणाग्रहैष्य’
- ‘द्वित्सृज्य’ → ‘द्विसृज्य’
- ‘यद्वायुरनायुर्वा’ → ‘यद्वायुरन्नायुर्वा’
- ‘द्वास्तदेतन्नाऽन्दनम्’ → ‘द्वास्तदेतन्नान्दनम्’
- ‘इदमदर्शनमिती’ → ‘इदमदर्शमिती’
- ‘मात्मन्येवऽऽत्मानं’ → ‘मात्मन्येवात्मानं’
- ‘गर्भ बिभर्ति’ → ‘गर्भं बिभर्ति’
- ‘तद्भावयत्येषं’ → ‘तद्भावयत्येषां’
- ‘अथास्यायामितर’ → ‘अथास्यायमितर’
- ‘धृतिमतिर्मनीषा’ → ‘धृतिर्मतिर्मनीषा’
हिंदी अर्थ, शीर्षक और अध्ययन-संकेत भक्ति भावना की स्वतंत्र सरल व्याख्या हैं; किसी आधुनिक हिंदी अनुवाद की प्रतिलिपि नहीं। पाठांतर वाले अन्य संस्करणों में वर्तनी अथवा सन्धि का छोटा अंतर मिल सकता है; यह किसी आलोचनात्मक संस्करण का दावा नहीं है।
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