माँ चंद्रघंटा की पूजा विधि, मंत्र, दिव्य स्वरूप, प्रिय भोग और महत्व | नवरात्रि तीसरा दिन 2026
माँ चंद्रघंटा: दिव्य स्वरूप, पूजा विधि, मंत्र, प्रिय भोग एवं आध्यात्मिक महत्व
नवरात्रि के तीसरे दिन सिंहवाहिनी माँ चंद्रघंटा की आराधना की जाती है। उनके अर्धचंद्र, दशभुजा स्वरूप, पूजा विधि, मंत्र और दूध-खीर के भोग के बारे में जानें। इसी लेख में आठों मूल कैरोसेल चित्र क्रमवार प्रस्तुत हैं।
माँ चंद्रघंटा — नवदुर्गा का तृतीय स्वरूप

शारदीय नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की उपासना की जाती है। नवदुर्गा का यह स्वरूप शौर्य, शांति और करुणा का अनूठा संगम माना जाता है। सिंह वाहन, मस्तक पर घंटी के आकार जैसा अर्धचंद्र और दस भुजाओं वाला उनका तेजस्वी स्वरूप भक्तों को साहस तथा आत्मविश्वास की प्रेरणा देता है।
इस चित्रमय लेख में आठ अलग-अलग कैरोसेल चित्र उसी क्रम में प्रस्तुत हैं—माँ का परिचय, नाम का अर्थ, दिव्य स्वरूप, आध्यात्मिक संदेश, पूजा की विधि, मंत्र एवं प्रिय भोग और आशीर्वाद। प्रत्येक चित्र के नीचे विषय की विस्तृत व्याख्या भी पढ़ें।
↑ ऊपर जाएँकौन हैं माँ चंद्रघंटा?

नवदुर्गा का तीसरा स्वरूप
माँ चंद्रघंटा को नवदुर्गा की तृतीय देवी के रूप में पूजा जाता है। दुर्गा उपासना की प्रचलित परंपराओं में उनका स्वरूप निर्भयता, रक्षा और सकारात्मक शक्ति से जोड़ा जाता है। लाल अथवा सुनहरे वस्त्रों में सिंह पर आरूढ़ उनका चित्रण बहुत प्रसिद्ध है।
उपासना से मिलने वाली प्रेरणा
भक्ति की दृष्टि से माता के एक ओर दिव्य अस्त्र-शस्त्र साहस एवं सतर्कता का संकेत हैं, तो दूसरी ओर आशीर्वाद की मुद्रा करुणा और आश्वासन का भाव प्रकट करती है। भक्त इस स्वरूप से सीख सकते हैं कि दृढ़ता के साथ सौम्यता भी आवश्यक है।
उनकी पूजा का उद्देश्य केवल बाहरी अनुष्ठान करना नहीं, बल्कि मन में सच्चाई, संयम, सेवा और दूसरों के प्रति सद्भाव को बढ़ाना भी है।
↑ ऊपर जाएँचंद्रघंटा नाम का अर्थ

“चंद्रघंटा” नाम को पारंपरिक रूप से दो शब्दों — चंद्र और घंटा — से समझाया जाता है। देवी के मस्तक पर स्थित घंटी के आकार से मिलता-जुलता अर्धचंद्र इस नाम की विशेष पहचान माना जाता है।
शीतलता, सौम्यता और शांत चित्त का प्रतीक।
ध्वनि, सतर्कता और जागरण का सांकेतिक भाव।
नाम का सार यह है कि माँ के स्वरूप में शांत मन और जाग्रत साहस दोनों साथ दिखाई देते हैं। इसी कारण उनकी भक्ति से जुड़े संदेशों में निर्भयता और अंतर्मन की शांति का उल्लेख होता है।
माँ चंद्रघंटा का दिव्य स्वरूप

माँ चंद्रघंटा का लोकप्रिय धार्मिक चित्रण दस भुजाओं, दिव्य आयुधों, सिंह वाहन और मस्तक पर अर्धचंद्र के साथ मिलता है। अनेक चित्रों में उनका मुख तेजस्वी और शांत दोनों दिखाई देता है।
दिव्य सामर्थ्य तथा विविध प्रकार से रक्षा करने की शक्ति का प्रतीक।
साहस, दृढ़ता और निर्भयता का भाव।
उनके चंद्रघंटा नाम की प्रसिद्ध पहचान।
करुणा, आश्वासन और कल्याण की भावना।
चित्र परंपराओं में अलग-अलग अस्त्रों की स्थिति बदल सकती है। मुख्य पहचान देवी का तेजस्वी स्वरूप, सिंह, अर्धचंद्र और भक्ति के साथ जुड़ी साहस एवं शांति की भावना है।
↑ ऊपर जाएँमाँ चंद्रघंटा का आध्यात्मिक महत्व

माँ चंद्रघंटा के स्वरूप से जुड़ा आध्यात्मिक संदेश है—साहस, सुरक्षा और शांति। यह हमें सिखाता है कि जीवन की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में विवेक के साथ कदम बढ़ाना चाहिए और असुरक्षा या भय के बीच भी अच्छे कर्मों का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए।
साहस: सही बात पर दृढ़ रहना। सुरक्षा: अपने तथा दूसरों की भलाई का ध्यान रखना। शांति: क्रोध और चिंता में भी संतुलन बनाए रखना। करुणा: दूसरों के दुख को समझते हुए उचित सहायता करना।
माँ चंद्रघंटा की सरल पूजा विधि

घर पर माँ चंद्रघंटा का पूजन श्रद्धा एवं स्वच्छता के साथ सरल रूप में किया जा सकता है। क्षेत्र, परिवार और संप्रदाय के अनुसार विधि में अंतर होना सामान्य है।
- स्वच्छ पूजा स्थान तैयार करें: पूजा चौकी पर साफ वस्त्र बिछाकर माता का चित्र अथवा प्रतिमा स्थापित करें।
- पुष्प एवं सामग्री अर्पित करें: उपलब्धता के अनुसार जल, पुष्प, अक्षत, दीप, धूप और नैवेद्य अर्पित करें।
- मंत्र और ध्यान: शांत मन से माँ चंद्रघंटा का नाम-स्मरण करें और सरल मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप करें।
- आरती एवं प्रार्थना: परिवार के मंगल, साहस, सद्बुद्धि तथा शांति के लिए प्रार्थना करें।
जलते दीपक या धूप का उपयोग करते समय सावधानी रखें। उपवास तथा विशेष नियम अपनी स्वास्थ्य-स्थिति, पारिवारिक परंपरा और आवश्यक मार्गदर्शन के अनुसार ही अपनाएँ।
↑ ऊपर जाएँमाँ चंद्रघंटा का मंत्र और प्रिय भोग

माँ चंद्रघंटा की आराधना में प्रचलित सरल नाममंत्र को शांत मन से श्रद्धापूर्वक दोहराया जाता है। मंत्र को ध्यान एवं भक्ति से जोड़कर समझना अधिक महत्वपूर्ण है।
सरल अर्थ: मैं नवदुर्गा के तृतीय स्वरूप माँ चंद्रघंटा को श्रद्धापूर्वक प्रणाम करता/करती हूँ।
प्रिय भोग — दूध और खीर
कई प्रचलित नवरात्रि परंपराओं में तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा को दूध अथवा दूध से बनी खीर अर्पित की जाती है। पूजा में फल या अन्य सात्त्विक प्रसाद भी परिवार की रीति के अनुसार चढ़ाया जा सकता है।
दूध और खीर के भोग को भक्तिपरक भाव से पवित्रता, सौम्यता तथा मधुरता से जोड़ा जाता है। प्रसाद स्वच्छता से तैयार करें और पूजा के बाद सम्मानपूर्वक बाँटें।
↑ ऊपर जाएँमाँ चंद्रघंटा का दिव्य आशीर्वाद

माँ चंद्रघंटा की कृपा का स्मरण भक्तों को धैर्य, साहस और मन की शांति के साथ जीवन जीने की प्रेरणा देता है। माता का आशीर्वाद हमें केवल अपने लिए नहीं, बल्कि परिवार, समाज और सभी जीवों के कल्याण के लिए शुभ भावना रखने की सीख भी देता है।
जय माता दी! आठ चित्रों की इस संपूर्ण शृंखला को परिवार और मित्रों के साथ साझा कीजिए और नवरात्रि के तीसरे दिन का भक्तिमय संदेश पहुँचाइए।
↑ ऊपर जाएँमाँ चंद्रघंटा — सामान्य प्रश्न और उत्तर
माँ चंद्रघंटा की पूजा नवरात्रि के किस दिन की जाती है?
नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा की जाती है।
माँ चंद्रघंटा किसका स्वरूप हैं?
माँ चंद्रघंटा नवदुर्गा का तृतीय स्वरूप हैं और देवी दुर्गा की उपासना से संबंधित हैं।
माँ चंद्रघंटा का वाहन क्या है?
उनका पारंपरिक वाहन सिंह माना जाता है।
माँ चंद्रघंटा के मस्तक पर क्या होता है?
उनके मस्तक पर घंटी के आकार जैसा अर्धचंद्र सुशोभित रहता है।
माँ चंद्रघंटा का मंत्र क्या है?
प्रचलित सरल नाममंत्र है — ॐ देवी चंद्रघंटायै नमः॥
माँ चंद्रघंटा को क्या भोग चढ़ाया जाता है?
प्रचलित परंपराओं में दूध या खीर अर्पित की जाती है; पारिवारिक परंपरा के अनुसार प्रसाद में भिन्नता हो सकती है।
माँ चंद्रघंटा के स्वरूप का आध्यात्मिक संदेश क्या है?
साहस, आत्मविश्वास, सतर्कता, करुणा और मन की शांति के बीच संतुलन बनाए रखना।
इस आठ-चित्र वाली भक्तिमय शृंखला को अपने प्रियजनों के साथ साझा करें। माता रानी सभी के जीवन में साहस, शांति और सद्बुद्धि की प्रेरणा दें।
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