श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 13: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग — सम्पूर्ण 34 श्लोक हिंदी अर्थ सहित

भक्ति भावना • श्रीमद्भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता

अध्याय १३ • क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

सम्पूर्ण ३४ श्लोक • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी अर्थ

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इस अध्याय में शरीर को क्षेत्र और उसके ज्ञाता को क्षेत्रज्ञ कहकर विवेचन किया गया है। ज्ञान के गुण, जानने योग्य परम तत्त्व तथा प्रकृति और पुरुष का सम्बन्ध समझाया गया है।

श्लोक १–१०

अध्याय १३ • श्लोक १

श्रीभगवानुवाच ।
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥१३.१॥

सरल हिंदी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—हे कुन्तीपुत्र! यह शरीर क्षेत्र कहलाता है। जो इसे जानता है, उसे तत्त्व के ज्ञाता क्षेत्रज्ञ कहते हैं।

अध्याय १३ • श्लोक २

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ॥१३.२॥

सरल हिंदी अर्थ: हे भारत! सभी क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ मुझे भी जानो। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का ज्ञान ही मेरे मत में वास्तविक ज्ञान है।

अध्याय १३ • श्लोक ३

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् ।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥१३.३॥

सरल हिंदी अर्थ: वह क्षेत्र क्या है, कैसा है, उसके विकार और कारण क्या हैं तथा क्षेत्रज्ञ कौन है और उसका प्रभाव क्या है—यह संक्षेप में सुनो।

अध्याय १३ • श्लोक ४

ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ॥१३.४॥

सरल हिंदी अर्थ: ऋषियों ने इसे अनेक प्रकार से गाया है; विभिन्न वैदिक छन्दों और तर्कयुक्त, निश्चित अर्थ वाले ब्रह्मसूत्र के पदों में भी इसका विवेचन हुआ है।

अध्याय १३ • श्लोक ५

महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥१३.५॥

सरल हिंदी अर्थ: पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त प्रकृति, दस इन्द्रियाँ, एक मन और इन्द्रियों के पाँच विषय—

अध्याय १३ • श्लोक ६

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥१३.६॥

सरल हिंदी अर्थ: इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, शरीरसमूह, चेतना और धृति—इस प्रकार विकारों सहित क्षेत्र का संक्षिप्त वर्णन किया गया है।

अध्याय १३ • श्लोक ७

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥१३.७॥

सरल हिंदी अर्थ: मान की इच्छा का अभाव, दम्भरहित होना, अहिंसा, क्षमा, सरलता, आचार्य की सेवा, शुद्धता, स्थिरता और आत्मसंयम—

अध्याय १३ • श्लोक ८

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥१३.८॥

सरल हिंदी अर्थ: इन्द्रिय-विषयों में वैराग्य, अहंकार का अभाव तथा जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोग में दुःख तथा दोष को बार-बार देखना—

अध्याय १३ • श्लोक ९

असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥१३.९॥

सरल हिंदी अर्थ: आसक्ति का अभाव, पुत्र-परिवार और घर आदि में अत्यधिक मोह न होना तथा प्रिय-अप्रिय मिलने पर सदा समचित्त रहना—

अध्याय १३ • श्लोक १०

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥१३.१०॥

सरल हिंदी अर्थ: मुझमें अनन्य और अडिग भक्ति, एकान्त स्थान में रहना और निरर्थक जनसमूह में रमण न करना—

श्लोक ११–२०

अध्याय १३ • श्लोक ११

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥१३.११॥

सरल हिंदी अर्थ: अध्यात्मज्ञान में निरन्तर निष्ठा और तत्त्वज्ञान के प्रयोजन का विचार—इसे ज्ञान कहा गया है। इससे विपरीत जो है, वह अज्ञान है।

अध्याय १३ • श्लोक १२

ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥१३.१२॥

सरल हिंदी अर्थ: अब उस जानने योग्य तत्त्व को बताऊँगा, जिसे जानकर अमृतत्व प्राप्त होता है। वह अनादि परम ब्रह्म है; उसे न केवल सत् कहा जाता है, न असत्।

अध्याय १३ • श्लोक १३

सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥१३.१३॥

सरल हिंदी अर्थ: उसके हाथ-पैर सब ओर, नेत्र-सिर-मुख सब ओर और कान सब ओर हैं। वह जगत में सबको व्याप्त करके स्थित है।

अध्याय १३ • श्लोक १४

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥१३.१४॥

सरल हिंदी अर्थ: वह सभी इन्द्रियों के कार्यों को प्रकाशित करता है, पर स्वयं सामान्य इन्द्रियों से रहित है; आसक्तिरहित होकर सबको धारण करता है और निर्गुण होकर गुणों का ज्ञाता है।

अध्याय १३ • श्लोक १५

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥१३.१५॥

सरल हिंदी अर्थ: वह प्राणियों के बाहर और भीतर है, चर और अचर रूपों का आधार है। सूक्ष्म होने से सामान्य दृष्टि से जाना नहीं जाता; दूर भी है और निकट भी।

अध्याय १३ • श्लोक १६

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥१३.१६॥

सरल हिंदी अर्थ: अविभाजित होकर भी वह प्राणियों में विभाजित-सा स्थित है। उसे प्राणियों का पोषक, संहारकर्ता और उत्पत्तिकर्ता जानना चाहिए।

अध्याय १३ • श्लोक १७

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥१३.१७॥

सरल हिंदी अर्थ: वह प्रकाशों का भी प्रकाश और अज्ञानरूपी अन्धकार से परे कहा गया है। वह ज्ञान, जानने योग्य और ज्ञान से प्राप्त होने वाला है; सबके हृदय में स्थित है।

अध्याय १३ • श्लोक १८

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥१३.१८॥

सरल हिंदी अर्थ: इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय का संक्षिप्त वर्णन किया। मेरा भक्त इसे समझकर मेरे भाव की प्राप्ति के योग्य होता है।

अध्याय १३ • श्लोक १९

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ॥१३.१९॥

सरल हिंदी अर्थ: प्रकृति और पुरुष, दोनों को अनादि जानो। सभी विकार और गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं।

अध्याय १३ • श्लोक २०

कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥१३.२०॥

सरल हिंदी अर्थ: शरीर और इन्द्रियों के कार्य-कारण तथा कर्तृत्व में प्रकृति हेतु कही जाती है; सुख-दुःख का अनुभव करने में पुरुष हेतु कहा जाता है।

श्लोक २१–३०

अध्याय १३ • श्लोक २१

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् ।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥१३.२१॥

सरल हिंदी अर्थ: प्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृतिजनित गुणों का अनुभव करता है। गुणों से उसका सम्बन्ध ही अच्छी-बुरी योनियों में जन्म का कारण बनता है।

अध्याय १३ • श्लोक २२

उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥१३.२२॥

सरल हिंदी अर्थ: इस शरीर में परम पुरुष साक्षी, अनुमति देने वाला, धारणकर्ता, भोक्ता और महेश्वर है; उसे परमात्मा भी कहते हैं।

अध्याय १३ • श्लोक २३

य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥१३.२३॥

सरल हिंदी अर्थ: जो पुरुष और गुणों सहित प्रकृति को इस प्रकार जानता है, वह किसी भी अवस्था में रहते हुए फिर जन्म नहीं लेता।

अध्याय १३ • श्लोक २४

ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।
अन्ये साङ्ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥१३.२४॥

सरल हिंदी अर्थ: कुछ साधक ध्यान द्वारा अपने भीतर आत्मा का दर्शन करते हैं, अन्य ज्ञानयोग से और दूसरे कर्मयोग से।

अध्याय १३ • श्लोक २५

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥१३.२५॥

सरल हिंदी अर्थ: अन्य लोग स्वयं इस प्रकार न जानकर दूसरों से सुनकर उपासना करते हैं। श्रद्धापूर्वक सुने हुए उपदेश पर चलने वाले वे भी मृत्यु को पार कर जाते हैं।

अध्याय १३ • श्लोक २६

यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥१३.२६॥

सरल हिंदी अर्थ: हे भरतश्रेष्ठ! जितने भी स्थावर और जंगम प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन्हें क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से उत्पन्न जानो।

अध्याय १३ • श्लोक २७

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥१३.२७॥

सरल हिंदी अर्थ: जो सभी प्राणियों में समान रूप से स्थित और शरीरों के नष्ट होने पर भी अविनाशी परमेश्वर को देखता है, वही ठीक देखता है।

अध्याय १३ • श्लोक २८

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥१३.२८॥

सरल हिंदी अर्थ: सबमें समान रूप से स्थित ईश्वर को समान देखकर वह अपने द्वारा अपना अहित नहीं करता और परम गति प्राप्त करता है।

अध्याय १३ • श्लोक २९

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥१३.२९॥

सरल हिंदी अर्थ: जो सभी कर्मों को प्रकृति से ही होते देखता है और आत्मा को अकर्ता जानता है, वही यथार्थ देखता है।

अध्याय १३ • श्लोक ३०

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥१३.३०॥

सरल हिंदी अर्थ: जब वह विभिन्न प्राणियों के अलग-अलग रूपों को एक ही आधार में स्थित और उसी से विस्तृत देखता है, तब ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है।

श्लोक ३१–३४

अध्याय १३ • श्लोक ३१

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥१३.३१॥

सरल हिंदी अर्थ: हे कुन्तीपुत्र! अनादि और निर्गुण होने से यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित होकर भी न कर्म करता है, न लिप्त होता है।

अध्याय १३ • श्लोक ३२

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥१३.३२॥

सरल हिंदी अर्थ: जैसे सर्वव्यापी आकाश सूक्ष्मता के कारण लिप्त नहीं होता, वैसे ही शरीर में सर्वत्र स्थित आत्मा लिप्त नहीं होती।

अध्याय १३ • श्लोक ३३

यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥१३.३३॥

सरल हिंदी अर्थ: हे भारत! जैसे एक सूर्य सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है, वैसे ही क्षेत्रज्ञ पूरे क्षेत्र को प्रकाशित करता है।

अध्याय १३ • श्लोक ३४

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥१३.३४॥

सरल हिंदी अर्थ: जो ज्ञानदृष्टि से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का अंतर तथा प्राणियों को प्रकृति के बन्धन से मुक्ति का तत्त्व जानते हैं, वे परम पद पाते हैं।

अध्याय का सार

  1. शरीर और उसके ज्ञाता का विवेक आवश्यक है।
  2. विनम्रता, अहिंसा और आत्मसंयम ज्ञान के अंग हैं।
  3. सब प्राणियों में एक परम तत्त्व का दर्शन मुक्ति की दिशा देता है।
पाठ-संदर्भ: श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १३, श्लोक १–३४। संस्कृत मूल पाठ के साथ हिंदी अर्थ स्वतंत्र सरल शब्दों में प्रस्तुत हैं।
भक्ति भावना • संस्थापक: बबलू प्रसाद द्विवेदी
श्रीकृष्णार्पणमस्तु

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