प्रतिकूलता में अनुकूलता–299: “सुनु लंकेस सकल गुन तोरें” — विभीषण श्रीराम को इतने प्रिय क्यों हुए?
“सुनु लंकेस सकल गुन तोरें” — विभीषण श्रीराम को इतने प्रिय क्यों हुए?
सुन्दरकाण्ड का यह छोटा-सा पद शरणागति, संत-लक्षण, प्रभु की करुणा और भक्त की विनय का विशाल संदेश समेटे है। लंका छोड़कर शरण में आए विभीषण को श्रीराम केवल स्वीकार ही नहीं करते, बल्कि उनके गुणों की प्रशंसा कर उन्हें अत्यंत प्रिय बताते हैं।
🚩 मूल मानस-पद
तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें॥
राम बचन सुनि बानर जूथा।
सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥
यह पद सुन्दरकाण्ड के उस प्रसंग का हिस्सा है जिसमें विभीषण रावण और लंका का आश्रय छोड़कर श्रीराम की शरण ग्रहण करते हैं। इससे ठीक पहले श्रीराम ऐसे भक्तों के गुण बताते हैं जो सगुण उपासक, परहित में लगे हुए, नीति और नियम में दृढ़ तथा श्रद्धाशील हैं। फिर वे विभीषण की ओर देखकर कहते हैं कि ये गुण उनमें विद्यमान हैं।
🌺 “सुनु लंकेस” — शरणागत को सम्मान देने की पराकाष्ठा
विभीषण उस समय श्रीराम के सामने राज्य-सिंहासन पर बैठे राजा के रूप में नहीं आए थे। वे अपने ही भाई द्वारा अपमानित और त्यागे जाने के बाद शरणागत होकर आए थे। फिर भी श्रीराम उन्हें “लंकेस”—लंका का स्वामी—कहकर संबोधित करते हैं। यही संबोधन इस प्रसंग को अत्यंत भावपूर्ण बनाता है।
भक्ति-व्याख्या में इसे प्रभु की उस दृष्टि के रूप में देखा जाता है जो शरणागत को उसकी वर्तमान विपत्ति से नहीं, उसके धर्म और भाव से पहचानती है। संसार जिसे निर्वासित या असहाय देख सकता है, श्रीराम उसी में भावी लंकेश को देखते हैं। आगे कथा में विभीषण का राज्याभिषेक इसी कृपा का प्रत्यक्ष रूप बनता है।
📿 “सकल गुन तोरें” — कौन-से गुण?
इस पद को ठीक से समझने के लिए इसके पहले आए भक्त-लक्षणों को याद करना आवश्यक है। श्रीराम कहते हैं कि सगुण भगवान की उपासना करने वाले, दूसरों के हित में लगे रहने वाले, नीति और नियम में दृढ़ रहने वाले तथा श्रद्धा रखने वाले भक्त उन्हें प्राणों के समान प्रिय हैं। “सकल गुन तोरें” इसी क्रम से जुड़ा हुआ है।
विभीषण के चरित्र में परहित की भावना स्पष्ट दिखाई देती है। वे रावण के सामने भी केवल अपना हित नहीं देखते; उसे सीताजी को लौटाकर श्रीराम से वैर छोड़ने की नीति बताते हैं। रावण इसे स्वीकार नहीं करता, फिर भी विभीषण धर्मसम्मत सलाह देने का प्रयास छोड़ते नहीं।
उनका दूसरा बड़ा गुण है—सत्य और धर्म के लिए मोह छोड़ने की तैयारी। लंका उनका घर है, रावण उनका भाई है और वहाँ उनका पद तथा संबंध हैं; फिर भी जब अधर्म के साथ खड़े रहने और धर्म की शरण लेने में चुनाव आता है, वे श्रीराम की शरण चुनते हैं।
🪔 भक्त भगवान को “अतिशय प्रिय” कैसे होता है?
इस प्रसंग की तुलना भक्तियोग के संदेश से करने पर एक सुंदर समानता दिखाई देती है। श्रीमद्भगवद्गीता के बारहवें अध्याय में भगवान भक्त के अनेक गुण बताते हैं और अध्याय के अंत में श्रद्धापूर्वक उस धर्ममय अमृत का पालन करने वाले भक्तों को अत्यंत प्रिय कहते हैं।
अर्थात जो श्रद्धावान होकर भगवान को परम लक्ष्य मानते हुए बताए गए धर्ममय मार्ग का आचरण करते हैं, वे भगवान को अत्यंत प्रिय हैं। यहाँ समान भाव यह है कि प्रियता केवल बाहरी पहचान से नहीं, भक्त के आचरण और अंतःकरण के गुणों से जुड़ती है।
विभीषण का जन्म राक्षस-कुल में होना उनके लिए बाधा नहीं बनता। रामकथा का संदेश है कि शरणागति, धर्मनिष्ठा और भक्ति जन्म अथवा कुल की सीमाओं से बड़ी हैं।
🙏 शबरी से विभीषण तक — भक्ति में भेद कहाँ?
नारि पुरुष सचराचर कोई॥
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें।
सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥
शबरी के प्रसंग में नवधा भक्ति बताते समय भी श्रीराम का संदेश व्यापक है। भक्ति किसी एक सामाजिक पहचान तक सीमित नहीं है। स्त्री हो या पुरुष, किसी भी पृष्ठभूमि का जीव हो—भक्ति का मूल्य उसके हृदय और साधना से है।
मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी॥
इस भाव को विभीषण की कथा और भी स्पष्ट करती है। जिस कुल को युद्ध में श्रीराम का विरोधी पक्ष माना जा रहा है, उसी कुल से आया एक भक्त प्रभु को अत्यंत प्रिय हो जाता है। यहाँ रामकथा व्यक्ति को कुल के आधार पर स्थायी रूप से बाँधने के बजाय उसके धर्म और भक्ति को महत्व देती दिखाई देती है।
🌿 विभीषण की विनय — प्रशंसा सुनकर भी अहंकार नहीं
भक्ति-परंपरा की व्याख्याओं में इस प्रसंग का एक अत्यंत सुंदर भाव लिया जाता है—श्रीराम विभीषण के गुणों की प्रशंसा कर रहे हैं, लेकिन विभीषण उस प्रशंसा को अपने गौरव का कारण नहीं बनाते। शरणागत के लिए अपनी उपलब्धियों से अधिक प्रभु की कृपा महत्वपूर्ण होती है।
“लंकेस” संबोधन भी भावकों को विशेष रूप से आकर्षित करता है। श्रीराम पहले ही उस व्यक्ति को लंका का स्वामी कह रहे हैं जो अभी लंका के सिंहासन पर बैठा भी नहीं है। इसे भक्त प्रभु के आश्वासन और कृपा-दृष्टि के रूप में अनुभव करते हैं।
यहाँ सावधानी से समझने योग्य बात यह है कि विभीषण की भीतरी मनोदशा के कुछ सूक्ष्म वर्णन—जैसे ठीक किस शब्द पर वे कितने संकुचित हुए—भिन्न टीकाकारों की भावपूर्ण व्याख्या हो सकते हैं। मूल मानस-पद और टीका की भाव-व्याख्या को अलग पहचानना अध्ययन को अधिक स्पष्ट बनाता है।
🐒 “राम बचन सुनि बानर जूथा” — वानरों ने जयकार क्यों किया?
सकल कहहिं जय कृपा बरूथा॥
श्रीराम की कृपा केवल विभीषण को आनंदित नहीं करती; उसे देखकर पूरी वानर-सेना आनंदित होती है। वे प्रभु की कृपालुता का जयघोष करते हैं। इसका कारण भी गहरा है—कुछ समय पहले तक विभीषण शत्रु-पक्ष से आया व्यक्ति था और उसके प्रवेश पर शंका स्वाभाविक थी। श्रीराम ने उसे केवल सुरक्षा नहीं दी, बल्कि अपनापन और सम्मान दिया।
भक्त की दृष्टि में प्रभु की कृपा स्वयं उत्सव है। कृपा किसी दूसरे पर हुई हो, फिर भी सच्चा भक्त उससे ईर्ष्या नहीं करता; वह आनंदित होता है। वानरों का सामूहिक जयघोष इसी भाव का सुंदर चित्र बन जाता है।
🌊 आगे विभीषण के हृदय में क्या होता है?
इस पद के बाद मानस में विभीषण श्रीराम की वाणी को मानो श्रवण-अमृत की तरह सुनते हैं। उनका प्रेम इतना बढ़ता है कि वे बार-बार प्रभु के चरण पकड़ते हैं। आगे वे स्वीकार करते हैं कि उनके हृदय में जो कोई पूर्व वासना थी, वह प्रभु के चरणों की प्रेम-सरिता में बह गई और वे पवित्र भक्ति माँगते हैं।
यही शरणागति की यात्रा है—मनुष्य संकट से बचने के लिए प्रभु के पास आता है, पर प्रभु के प्रेम का अनुभव होते-होते उसकी मांग भी बदल सकती है। बाहरी लाभ से बड़ी वस्तु भक्ति स्वयं बन जाती है।
✨ आज के जीवन के लिए इस प्रसंग के पाँच बड़े संदेश
पहला— प्रतिकूल घटना हमेशा अंतिम हानि नहीं होती। विभीषण का लंका से निकलना आगे उनके जीवन का निर्णायक मोड़ बनता है।
दूसरा— सही सलाह देना हमारा धर्म हो सकता है, भले सामने वाला उसे स्वीकार न करे। विभीषण ने रावण के हित की बात कही, पर निर्णय रावण का था।
तीसरा— जन्म, कुल और पुरानी पहचान से अधिक वर्तमान आचरण और भाव महत्वपूर्ण हैं।
चौथा— सच्ची भक्ति का एक चिन्ह परहित है। केवल व्यक्तिगत साधना नहीं, दूसरों के कल्याण की भावना भी भक्त-चरित्र का हिस्सा है।
पाँचवाँ— दूसरे भक्त पर हुई कृपा देखकर आनंदित होना भी सुंदर साधना है। वानर-समूह विभीषण को मिली कृपा देखकर प्रभु का जयघोष करता है।
🌺 “प्रतिकूलता में अनुकूलता” का सार
विभीषण के सामने परिस्थिति अत्यंत कठिन थी—एक ओर अपना भाई, अपना नगर और अपना परिचित संसार; दूसरी ओर धर्म की पुकार। उन्होंने अधर्म के साथ सुविधा चुनने के बजाय श्रीराम की शरण चुनी। बाहर से देखा जाए तो उन्होंने सब खो दिया; रामकथा के भीतर वही क्षण उन्हें प्रभु की निकटता तक ले गया।
और प्रभु का उत्तर क्या था? संदेह नहीं, तिरस्कार नहीं—“लंकेस” का सम्मान और “अतिसय प्रिय” का प्रेम। यही इस प्रसंग की आत्मा है।
📖 क्रमशः — आगे भी ऐसे प्रसंग
“प्रतिकूलता में अनुकूलता” श्रृंखला में श्रीरामचरितमानस के ऐसे प्रसंग आगे भी विस्तार से समझे जाएँगे जहाँ कठिन परिस्थिति के भीतर भक्ति, नीति, करुणा और प्रभु-कृपा का नया द्वार खुलता दिखाई देता है।
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🚩 जय श्री सीताराम 🚩

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