संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा एवं गणेश पूजा विधि | Sankashti Chaturthi Vrat
संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा
हिन्दू चन्द्र पंचांग में प्रत्येक मास की पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है।
भगवान गणेश को विघ्नहर्ता, बुद्धि और विवेक के अधिष्ठाता तथा मंगलकर्ता के रूप में स्मरण किया जाता है।
संकष्टी के दिन गणेश पूजन, मंत्रजप, व्रत कथा, चन्द्र दर्शन और अपनी परंपरा के अनुसार अर्घ्य देने की प्रथा प्रचलित है।
पूर्णिमा के बाद कृष्ण पक्ष की चतुर्थी संकष्टी चतुर्थी कहलाती है।
अमावस्या के बाद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहा जाता है।
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी पर प्रसिद्ध गणेश चतुर्थी महोत्सव मनाया जाता है।
॥ अंगारकी चतुर्थी क्या है? ॥
महाराष्ट्र सहित भारत के कई क्षेत्रों में अंगारकी संकष्टी का विशेष महत्व माना जाता है।
मूल पूजा फिर भी भगवान गणेश की ही होती है।
॥ संकष्टी चतुर्थी का आध्यात्मिक भाव ॥
लेकिन व्रत का अर्थ केवल किसी समस्या के तुरंत समाप्त हो जाने की अपेक्षा नहीं है।
भगवान गणेश की उपासना मनुष्य को विवेक, धैर्य, एकाग्रता, सही निर्णय और बाधाओं का सामना करने का साहस विकसित करने की प्रेरणा देती है।
॥ गणेश पूजा सामग्री ॥
- भगवान गणेश का चित्र या मूर्ति
- स्वच्छ चौकी एवं वस्त्र
- स्वच्छ जल
- चन्दन या रोली
- अक्षत
- दूर्वा उपलब्ध हो तो
- लाल, पीले या अन्य सात्त्विक पुष्प
- धूप
- दीपक
- फल
- मोदक या लड्डू उपलब्ध हों तो
- अन्य सात्त्विक नैवेद्य
- चन्द्र अर्घ्य के लिए स्वच्छ जल का पात्र, अपनी परंपरा के अनुसार
लेकिन इनके उपलब्ध न होने पर पूजा अधूरी नहीं मानी जानी चाहिए। श्रद्धा से पुष्प, जल, दीप और गणेश नाम-स्मरण किया जा सकता है।
॥ सरल संकष्टी गणेश पूजा विधि ॥
ॐ गं गणपतये नमः ॥
॥ चन्द्र दर्शन और अर्घ्य ॥
चन्द्रमा देखने के बाद व्रत पूर्ण करने की परंपरा
संकष्टी चतुर्थी की प्रचलित व्रत-पद्धति में चन्द्रमा के उदय के बाद चन्द्र दर्शन का विशेष स्थान है।अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार चन्द्रमा को स्वच्छ जल से अर्घ्य दिया जा सकता है।
इसके बाद भगवान गणेश को प्रणाम करके व्रत पूर्ण किया जाता है।
चन्द्र उदय का समय हर शहर में अलग होता है। इसलिए किसी एक स्थायी समय को पूरे भारत के लिए सही नहीं माना जा सकता।
इसलिए किसी विशेष संकष्टी पर अपने शहर के अनुसार विश्वसनीय स्थानीय पंचांग देखना उचित है।
॥ 12 मासों की संकष्टी चतुर्थी ॥
पूर्णिमान्त मास-पद्धति के अनुसार प्रचलित नाम इस प्रकार हैं:
भालचन्द्र संकष्टी
विकट संकष्टी
एकदन्त संकष्टी
कृष्णपिङ्गल संकष्टी
गजानन संकष्टी
हेरम्ब संकष्टी
विघ्नराज संकष्टी
वक्रतुण्ड संकष्टी
गणाधिप संकष्टी
अखुरथ संकष्टी
लम्बोदर संकष्टी
द्विजप्रिय संकष्टी
पूर्णिमान्त और अमान्त हिन्दू मास-पद्धति में मास का नाम एक महीने के अंतर से दिखाई दे सकता है।
इसीलिए महाराष्ट्र की अमान्त परंपरा और उत्तर भारत की पूर्णिमान्त परंपरा में एक ही संकष्टी का मास-नाम अलग दिख सकता है।
व्रत की वास्तविक तिथि चन्द्र तिथि और स्थानीय पंचांग से निर्धारित की जानी चाहिए।
॥ भालचन्द्र संकष्टी व्रत कथा ॥
राजा मयूरध्वज और धर्मपाल के परिवार की कथा
प्रचलित कथा के अनुसार प्राचीन समय में मयूरध्वज नामक एक धर्मनिष्ठ राजा था।
उसके राज्य में धर्मपाल नामक एक मंत्री था। मंत्री के परिवार में अनेक पुत्र थे और समय आने पर उनके विवाह हुए।
परिवार की सबसे छोटी बहू भगवान गणेश की बहुत श्रद्धालु भक्त थी। वह नियमित रूप से गणेश जी का पूजन करती थी।
जब भालचन्द्र संकष्टी आई, तो उसने श्रद्धा के साथ संकष्टी का पूजन आरम्भ किया।
परिवार के कुछ लोगों को उसकी पूजा का महत्व समझ में नहीं आया और उन्होंने उसे पूजा रोकने के लिए कहा।
छोटी बहू ने विनम्रता से समझाया कि वह किसी के विरुद्ध कोई कर्म नहीं कर रही, बल्कि परिवार के कल्याण की भावना से भगवान गणेश की आराधना कर रही है।
कठिन परिस्थिति के बावजूद उसने अपनी पूजा श्रद्धा से पूर्ण की और भगवान गणेश से प्रार्थना की कि परिवार के लोगों को सद्बुद्धि और भक्ति का महत्व समझ आए।
कथा में आगे राजा मयूरध्वज के पुत्र के अचानक दिखाई न देने का प्रसंग आता है।
कुछ संकेत मंत्री धर्मपाल के घर से जुड़े मिले, जिससे राजा और मंत्री दोनों बहुत चिंतित हो गए।
धर्मपाल के परिवार ने हर ओर राजकुमार को खोजा, लेकिन उसका पता नहीं चला।
तब छोटी बहू ने कहा कि भगवान गणेश का अनादर करना उचित नहीं था और सबको श्रद्धा से संकष्टी पूजा करनी चाहिए।
परिवार और राजा ने अहंकार छोड़कर भगवान गणेश की पूजा की और अपनी भूल के लिए क्षमा माँगी।
प्रचलित कथा में भगवान गणेश की कृपा से राजकुमार पुनः सुरक्षित मिल गया।
इस घटना के बाद राजा, मंत्री और परिवार के लोगों में भगवान गणेश के प्रति श्रद्धा बढ़ गई।
उन्होंने संकष्टी के अवसर पर गणेश पूजा करने और दूसरों की भक्ति का सम्मान करने का निश्चय किया।
दूसरे व्यक्ति की सच्ची भक्ति का उपहास या अपमान नहीं करना चाहिए।
कथा हमें श्रद्धा, सद्बुद्धि, विनम्रता, परिवार के कल्याण की भावना और अपनी भूल स्वीकार करने की प्रेरणा देती है।
इसे सभी 12 संकष्टी चतुर्थियों की एक ही कथा नहीं समझना चाहिए। अन्य मासों की विकट, एकदन्त, कृष्णपिङ्गल, गजानन, हेरम्ब, विघ्नराज, वक्रतुण्ड, गणाधिप, अखुरथ, लम्बोदर और द्विजप्रिय संकष्टी की अपनी अलग-अलग कथाएँ मिलती हैं।
॥ वक्रतुण्ड महाकाय ॥
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ संकष्टी में भोजन और उपवास ॥
परंपरा और स्वास्थ्य दोनों महत्वपूर्ण
परंपरागत संकष्टी व्रत में सूर्योदय से चन्द्र उदय तक उपवास की प्रथा बहुत प्रसिद्ध है।कुछ लोग फलाहार या अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार सरल व्रत-भोजन करते हैं।
लेकिन यह सभी लोगों के लिए अनिवार्य स्वास्थ्य-नियम नहीं है।
व्रत का प्रमुख धार्मिक भाव गणेश भक्ति, संयम, सद्बुद्धि और प्रार्थना है।
सूर्योदय से चन्द्र उदय तक भूखे या प्यासे रहना आवश्यक नहीं है।
बढ़ती उम्र में नियमित, संतुलित और पर्याप्त भोजन महत्वपूर्ण है।
संकष्टी के दिन सामान्य भोजन लेते हुए भी भगवान गणेश की पूजा, “ॐ गं गणपतये नमः” जप, गणेश कथा, आरती और अच्छे व्यवहार का संकल्प किया जा सकता है।
॥ संकष्टी के दिन क्या कर सकते हैं? ॥
- भगवान गणेश का स्मरण
- ॐ गं गणपतये नमः का जप
- गणेश जी को पुष्प एवं दूर्वा अर्पित करना
- मोदक या अन्य सात्त्विक प्रसाद अर्पित करना
- मास के अनुसार संकष्टी कथा पढ़ना
- गणेश आरती करना
- बड़ों और गुरुजनों का सम्मान
- क्रोध और जल्दबाजी से बचने का प्रयास
- महत्वपूर्ण निर्णय सोच-विचार से लेना
- अपनी सामर्थ्य के अनुसार सेवा करना
॥ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न ॥
संकष्टी चतुर्थी प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष चतुर्थी से जुड़ी है और 12 मासों की अलग-अलग संकष्टी कथाएँ उपलब्ध हैं।
इस लेख में राजा मयूरध्वज, मंत्री धर्मपाल और उसकी छोटी बहू वाली भालचन्द्र संकष्टी कथा सरल हिंदी में प्रस्तुत की गई है।
पूर्णिमान्त और अमान्त मास-पद्धति के कारण एक ही संकष्टी का मास-नाम अलग क्षेत्रों में अलग दिखाई दे सकता है।
चन्द्र उदय और चतुर्थी तिथि के कारण व्रत का दिन भी स्थान के अनुसार बदल सकता है। इसलिए किसी विशेष संकष्टी के लिए स्थानीय पंचांग देखना उचित है।
व्रत कथा में वर्णित संकट-निवारण और अन्य फल धार्मिक श्रद्धा और परंपरा के कथन हैं; इन्हें निश्चित सांसारिक परिणाम की गारंटी न समझें।
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