श्री नवग्रह चालीसा हिंदी अर्थ सहित | Navgraha Chalisa

🪐 श्री नवग्रह चालीसा

श्री नवग्रह चालीसा में सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु—इन नौ ग्रह देवताओं की स्तुति की गई है। इस पाठ में प्रत्येक ग्रह के दिव्य नाम, स्वरूप और उनसे की गई भक्तिपूर्ण प्रार्थना का वर्णन मिलता है। नीचे संपूर्ण प्रचलित पाठ सरल हिंदी भावार्थ सहित प्रस्तुत है।

॥ दोहा ॥
श्री गणपति गुरुपद कमल, प्रेम सहित सिरनाय।
नवग्रह चालीसा कहत, शारद होत सहाय॥

जय जय रवि शशि सोम बुध, जय गुरु भृगु शनि राज।
जयति राहु अरु केतु ग्रह, करहु अनुग्रह आज॥

अर्थ: श्रीगणेश, गुरु और माता सरस्वती को प्रणाम करके नौ ग्रह देवताओं की स्तुति आरंभ की जाती है। भक्त सूर्य से लेकर केतु तक सभी ग्रहों से कृपा की प्रार्थना करता है।

☀️ श्री सूर्य स्तुति
प्रथमहि रवि कहँ नावौं माथा।
करहुं कृपा जनि जानि अनाथा॥

अर्थ: सबसे पहले सूर्यदेव को प्रणाम करके भक्त उनसे कृपा की प्रार्थना करता है।


हे आदित्य दिवाकर भानू।
मैं मति मन्द महा अज्ञानू॥

अर्थ: हे आदित्य, दिवाकर और भानु! भक्त विनम्रता से अपनी सीमित बुद्धि स्वीकार करता है।


अब निज जन कहँ हरहु कलेषा।
दिनकर द्वादश रूप दिनेशा॥

अर्थ: बारह स्वरूपों वाले दिनकर से भक्त अपने कष्ट दूर करने की प्रार्थना करता है।


नमो भास्कर सूर्य प्रभाकर।
अर्क मित्र अघ मोघ क्षमाकर॥

अर्थ: भास्कर, प्रभाकर, अर्क और मित्र आदि नामों से सूर्यदेव को प्रणाम किया गया है।

🌙 श्री चन्द्र स्तुति
शशि मयंक रजनीपति स्वामी।
चन्द्र कलानिधि नमो नमामि॥

अर्थ: शशि, मयंक और कलानिधि चंद्रदेव को बारंबार प्रणाम है।


राकापति हिमांशु राकेशा।
प्रणवत जन तन हरहुं कलेशा॥

अर्थ: शीतल प्रकाश देने वाले चंद्रदेव से भक्त शांति और कल्याण की प्रार्थना करता है।


सोम इन्दु विधु शान्ति सुधाकर।
शीत रश्मि औषधि निशाकर॥

अर्थ: सोम, इन्दु और सुधाकर नाम चंद्रमा के शीतल तथा शांत स्वरूप का वर्णन करते हैं।


तुम्हीं शोभित सुन्दर भाल महेशा।
शरण शरण जन हरहुं कलेशा॥

अर्थ: भगवान शिव के मस्तक पर विराजमान चंद्रदेव की शरण लेकर भक्त शांति की प्रार्थना करता है।

🔴 श्री मंगल स्तुति
जय जय जय मंगल सुखदाता।
लोहित भौमादिक विख्याता॥

अर्थ: मंगल, लोहित और भौम नामों से प्रसिद्ध मंगलदेव की जय हो।


अंगारक कुज रुज ऋणहारी।
करहु दया यही विनय हमारी॥

अर्थ: अंगारक और कुज नाम से पूजित मंगलदेव से भक्त दया की प्रार्थना करता है।


हे महिसुत छितिसुत सुखराशी।
लोहितांग जय जन अघनाशी॥

अर्थ: पृथ्वीपुत्र और लोहितांग मंगलदेव का गुणगान किया गया है।


अगम अमंगल अब हर लीजै।
सकल मनोरथ पूरण कीजै॥

अर्थ: भक्त जीवन के अमंगल और कठिनाइयों को दूर करने तथा शुभ कार्यों की सिद्धि की प्रार्थना करता है।

🌿 श्री बुध स्तुति
जय शशि नन्दन बुध महाराजा।
करहु सकल जन कहँ शुभ काजा॥

अर्थ: चंद्रपुत्र बुधदेव की जय हो। भक्त उनसे शुभ बुद्धि और मंगल की प्रार्थना करता है।


दीजै बुद्धि बल सुमति सुजाना।
कठिन कष्ट हरि करि कल्याणा॥

अर्थ: बुधदेव से बुद्धि, विवेक और कठिन परिस्थितियों में सही निर्णय की प्रार्थना की गई है।


हे तारासुत रोहिणी नन्दन।
चन्द्रसुवन दुख द्वन्द्व निकन्दन॥

अर्थ: बुधदेव के पारंपरिक नामों का स्मरण करते हुए दुख और मानसिक द्वंद्व दूर करने की प्रार्थना है।


पूजहु आस दास कहु स्वामी।
प्रणत पाल प्रभु नमो नमामी॥

अर्थ: भक्त स्वयं को सेवक मानकर बुधदेव को प्रणाम और शरणागति अर्पित करता है।

🟡 श्री बृहस्पति स्तुति
जयति जयति जय श्री गुरुदेवा।
करों सदा तुम्हरी प्रभु सेवा॥

अर्थ: देवगुरु बृहस्पति की जय हो। भक्त सदैव उनकी कृपा और मार्गदर्शन चाहता है।


देवाचार्य तुम देव गुरु ज्ञानी।
इन्द्र पुरोहित विद्यादानी॥

अर्थ: बृहस्पति को देवताओं के गुरु, ज्ञानदाता और इन्द्र के पुरोहित के रूप में स्मरण किया गया है।


वाचस्पति बागीश उदारा।
जीव बृहस्पति नाम तुम्हारा॥

अर्थ: वाचस्पति, बागीश और बृहस्पति उनके ज्ञानमय स्वरूप के नाम हैं।


विद्या सिन्धु अंगिरा नामा।
करहु सकल विधि पूरण कामा॥

अर्थ: ज्ञान के सागर अंगिरा-बृहस्पति से भक्त सद्बुद्धि और शुभ कार्यों की पूर्ति की प्रार्थना करता है।

⚪ श्री शुक्र स्तुति
शुक्र देव पद तल जल जाता।
दास निरन्तन ध्यान लगाता॥

अर्थ: भक्त शुक्रदेव के चरणों में स्वयं को समर्पित कर निरंतर उनका ध्यान करता है।


हे उशना भार्गव भृगु नन्दन।
दैत्य पुरोहित दुष्ट निकन्दन॥

अर्थ: उशना, भार्गव और भृगुनंदन नामों से शुक्राचार्य की स्तुति की गई है।


भृगुकुल भूषण दूषण हारी।
हरहु नेष्ट ग्रह करहु सुखारी॥

अर्थ: भृगुकुल के भूषण शुक्रदेव से भक्त अपने जीवन की बाधाओं को दूर करने की प्रार्थना करता है।


तुहि द्विजबर जोशी सिरताजा।
नर शरीर के तुमहीं राजा॥

अर्थ: शुक्रदेव को विद्या, ज्योतिष और सांसारिक जीवन से जुड़े गुणों का अधिष्ठाता मानकर प्रणाम किया गया है।

🪔 श्री शनि स्तुति
जय श्री शनिदेव रवि नन्दन।
जय कृष्णो सौरी जगवन्दन॥

अर्थ: सूर्यपुत्र शनिदेव की जय हो। उनके श्यामवर्ण सौरी स्वरूप को प्रणाम है।


पिंगल मन्द रौद्र यम नामा।
वप्र आदि कोणस्थ ललामा॥

अर्थ: पिंगल, मन्द, रौद्र और कोणस्थ आदि शनिदेव के पारंपरिक नामों का स्मरण किया गया है।


वक्र दृष्टि पिप्पल तन साजा।
क्षण महँ करत रंक क्षण राजा॥

अर्थ: इस पद में शनिदेव के प्रभाव को जीवन में परिवर्तन और कर्मफल से जुड़े धार्मिक भाव के रूप में बताया गया है।


ललत स्वर्ण पद करत निहाला।
हरहु विपत्ति छाया के लाला॥

अर्थ: छाया के पुत्र शनिदेव से भक्त अपनी विपत्तियों को दूर करने और कल्याण की प्रार्थना करता है।

🌑 श्री राहु स्तुति
जय जय राहु गगन प्रविसइया।
तुमही चन्द्र आदित्य ग्रसइया॥

अर्थ: राहुदेव की जय हो। पौराणिक वर्णन में राहु का संबंध सूर्य और चंद्र ग्रहण से जोड़ा गया है।


रवि शशि अरि स्वर्भानु धारा।
शिखी आदि बहु नाम तुम्हारा॥

अर्थ: स्वर्भानु सहित राहु के विभिन्न पारंपरिक नामों का स्मरण है।


सैहिंकेय तुम निशाचर राजा।
अर्धकाय जग राखहु लाजा॥

अर्थ: राहु के अर्धकाय पौराणिक स्वरूप का उल्लेख करते हुए भक्त उनसे कृपा की प्रार्थना करता है।


यदि ग्रह समय पाय कहिं आवहु।
सदा शान्ति और सुख उपजावहु॥

अर्थ: भक्त राहुदेव से जीवन में शांति, संतुलन और शुभता की प्रार्थना करता है।

🚩 श्री केतु स्तुति
जय श्री केतु कठिन दुखहारी।
करहु सुजन हित मंगलकारी॥

अर्थ: केतुदेव की जय हो। भक्त उनसे कठिनाइयों को दूर करके कल्याण करने की प्रार्थना करता है।


ध्वजयुत रुण्ड रूप विकराला।
घोर रौद्रतन अघमन काला॥

अर्थ: केतु के ध्वजायुक्त और तेजस्वी पौराणिक स्वरूप का वर्णन किया गया है।


शिखी तारिका ग्रह बलवान।
महा प्रताप न तेज ठिकाना॥

अर्थ: केतु को शक्तिशाली और तेजस्वी ग्रह के रूप में स्तुति की गई है।


वाहन मीन महा शुभकारी।
दीजै शान्ति दया उर धारी॥

अर्थ: भक्त केतुदेव से दया, शांति और शुभता प्रदान करने की प्रार्थना करता है।

🙏 नवग्रह शान्ति फल
तीरथराज प्रयाग सुपासा।
बसै राम के सुन्दर दासा॥

अर्थ: यहाँ रचनाकार से संबंधित प्रयाग क्षेत्र का उल्लेख मिलता है।


ककरा ग्रामहिं पुरे-तिवारी।
दुर्वासाश्रम जन दुख हारी॥

अर्थ: इस पद में रचनाकार के स्थान और दुर्वासा आश्रम से जुड़े पारंपरिक उल्लेख हैं।


नव-ग्रह शान्ति लिख्यो सुख हेतु।
जन तन कष्ट उतारण सेतू॥

अर्थ: रचनाकार इस स्तुति को नवग्रह शांति और भक्तों के कल्याण की प्रार्थना के रूप में प्रस्तुत करते हैं।


जो नित पाठ करै चित लावै।
सब सुख भोगि परम पद पावै॥

अर्थ: फलश्रुति में एकाग्रता और श्रद्धा से पाठ करने वाले भक्त के सांसारिक तथा आध्यात्मिक कल्याण की कामना की गई है।

॥ समापन दोहा ॥
धन्य नवग्रह देव प्रभु, महिमा अगम अपार।
चित नव मंगल मोद गृह, जगत जनन सुखद्वार॥

यह चालीसा नवोग्रह, विरचित सुन्दरदास।
पढ़त प्रेम सुत बढ़त सुख, सर्वानन्द हुलास॥

अर्थ: नवग्रह देवताओं की महिमा को अनंत बताते हुए भक्त उनके मंगलकारी आशीर्वाद की प्रार्थना करता है। अंतिम दोहे में सुंदरदास का नाम रचनाकार के रूप में आता है।

🌼 भक्ति भावना

नवग्रह चालीसा का पाठ श्रद्धा और शांत मन से करें। नवग्रह से जुड़ी फलश्रुति और ज्योतिषीय प्रभाव धार्मिक एवं पारंपरिक मान्यताओं का हिस्सा हैं। इसका मुख्य भक्तिपूर्ण भाव जीवन में आत्मचिंतन, अनुशासन, सद्कर्म और ईश्वर के प्रति समर्पण बढ़ाना है।

जय नवग्रह देव 🪐
सूर्य से केतु तक सभी ग्रह देवताओं को प्रणाम 🙏
भक्ति भावना • भक्ति • धर्म • भारतीय संस्कृति

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