श्री सूर्य देव चालीसा हिंदी अर्थ सहित | Surya Chalisa

☀️ श्री सूर्य देव चालीसा

श्री सूर्य देव चालीसा भगवान सूर्य की दिव्य महिमा, उनके विभिन्न नाम, सप्ताश्व रथ और प्रकाशमय स्वरूप का भक्तिपूर्ण वर्णन करती है। नीचे श्री सूर्य चालीसा का प्रचलित पाठ सरल हिंदी भावार्थ सहित प्रस्तुत है।

॥ दोहा ॥
कनक बदन कुण्डल मकर, मुक्ता माला अंग।
पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के संग॥

अर्थ: स्वर्ण समान तेजस्वी शरीर, मकराकार कुण्डल और मोतियों की माला से सुशोभित पद्मासन पर विराजमान भगवान सूर्य का ध्यान किया गया है।

जय सविता जय जयति दिवाकर।
सहस्रांशु! सप्ताश्व तिमिरहर॥

अर्थ: सविता और दिवाकर सूर्यदेव की जय हो। हजारों किरणों वाले, सात अश्वों के रथ पर विराजमान प्रभु अंधकार को दूर करते हैं।

भानु! पतंग! मरीची! भास्कर!।
सविता हंस! सुनूर विभाकर॥

अर्थ: भानु, मरीची, भास्कर और सविता आदि सूर्यदेव के विभिन्न दिव्य नामों का स्मरण किया गया है।

विवस्वान! आदित्य! विकर्तन।
मार्तण्ड हरिरूप विरोचन॥

अर्थ: विवस्वान, आदित्य, विकर्तन और मार्तण्ड आदि नाम सूर्यदेव के तेजस्वी स्वरूपों का वर्णन करते हैं।

अम्बरमणि! खग! रवि कहलाते।
वेद हिरण्यगर्भ कह गाते॥

अर्थ: सूर्य को आकाश का रत्न, रवि और हिरण्यगर्भ जैसे पवित्र नामों से भी स्तुति की जाती है।

सहस्रांशु प्रद्योतन, कहिकहि।
मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि॥

अर्थ: ऋषि-मुनि हजारों किरणों से प्रकाश देने वाले सूर्यदेव का स्मरण कर आनंद अनुभव करते हैं।

अरुण सदृश सारथी मनोहर।
हांकत हय साता चढ़ि रथ पर॥

अर्थ: सूर्यदेव के सारथी अरुण हैं और उनका दिव्य रथ सात अश्वों द्वारा खींचा जाता है।

मंडल की महिमा अति न्यारी।
तेज रूप केरी बलिहारी॥

अर्थ: सूर्य मंडल का तेज और प्रकाश अद्भुत है। भक्त उस दिव्य तेज को प्रणाम करता है।

उच्चैःश्रवा सदृश हय जोते।
देखि पुरन्दर लज्जित होते॥

अर्थ: सूर्यदेव के रथ के अश्व अत्यंत तेजस्वी बताए गए हैं, जिनकी भव्यता अद्भुत है।

मित्र मरीचि भानु अरुण भास्कर।
सविता सूर्य अर्क खग कलिकर॥

अर्थ: मित्र, मरीचि, भानु, भास्कर, सविता और अर्क जैसे सूर्यदेव के अनेक पवित्र नामों का स्मरण किया गया है।

पूषा रवि आदित्य नाम लै।
हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै॥

अर्थ: पूषा, रवि, आदित्य और हिरण्यगर्भ नाम लेकर सूर्यदेव को श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया जाता है।

द्वादस नाम प्रेम सों गावैं।
मस्तक बारह बार नवावैं॥

अर्थ: सूर्यदेव के बारह नामों का प्रेमपूर्वक स्मरण करते हुए भक्त उन्हें बार-बार प्रणाम करता है।

चार पदारथ जन सो पावै।
दुःख दारिद्र अघ पुंज नसावै॥

अर्थ: फलश्रुति में श्रद्धालु के लिए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष तथा जीवन के कल्याण की कामना की गई है।

नमस्कार को चमत्कार यह।
विधि हरिहर को कृपासार यह॥

अर्थ: सूर्य को प्रणाम करना ब्रह्मा, विष्णु और शिव की दिव्य कृपा से जुड़े भाव के रूप में वर्णित है।

सेवै भानु तुमहिं मन लाई।
अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई॥

अर्थ: भक्त एकाग्र मन से सूर्यदेव की उपासना करके आध्यात्मिक और सांसारिक कल्याण की प्रार्थना करता है।

बारह नाम उच्चारन करते।
सहस जनम के पातक टरते॥

अर्थ: बारह पवित्र नामों के स्मरण को आत्मशुद्धि और भगवान के प्रति समर्पण का साधन माना गया है।

उपाख्यान जो करते तवजन।
रिपु सों जमलहते सोतेहि छन॥

अर्थ: सूर्यदेव की महिमा और कथाओं का स्मरण करने वाला भक्त जीवन की विरोधी परिस्थितियों पर विजय की प्रार्थना करता है।

धन सुत जुत परिवार बढ़तु है।
प्रबल मोह को फंद कटतु है॥

अर्थ: फलश्रुति में परिवार के कल्याण और संसार के मोह से ऊपर उठने की आध्यात्मिक कामना की गई है।

अर्क शीश को रक्षा करते।
रवि ललाट पर नित्य बिहरते॥

अर्थ: इस भाग में सूर्य के विभिन्न नामों का स्मरण शरीर की रक्षा करने वाले आध्यात्मिक कवच के रूप में किया गया है।

सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत।
कर्ण देस पर दिनकर छाजत॥

अर्थ: सूर्य और दिनकर नामों का स्मरण नेत्र और कानों की प्रतीकात्मक रक्षा के भाव से किया गया है।

भानु नासिका वास करहु नित।
भास्कर करत सदा मुखको हित॥

अर्थ: भानु और भास्कर नामों का स्मरण भक्त अपने शरीर और जीवन के कल्याण की प्रार्थना के साथ करता है।

ओंठ रहैं पर्जन्य हमारे।
रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे॥

अर्थ: यह सूर्य कवच के भाव को आगे बढ़ाते हुए वाणी और इंद्रियों की रक्षा की प्रार्थना करता है।

कंठ सुवर्ण रेत की शोभा।
तिग्म तेजसः कांधे लोभा॥

अर्थ: सूर्य के तेजस्वी नामों का स्मरण कंठ और कंधों की प्रतीकात्मक रक्षा के लिए किया गया है।

पूषां बाहू मित्र पीठहिं पर।
त्वष्टा वरुण रहत सुउष्णकर॥

अर्थ: पूषा, मित्र, त्वष्टा और वरुण नामों के माध्यम से शरीर के विभिन्न अंगों के संरक्षण की प्रार्थना की गई है।

युगल हाथ पर रक्षा कारन।
भानुमान उरसर्म सुउदरचन॥

अर्थ: भक्त सूर्यदेव से अपने हाथों, वक्ष और शरीर की प्रतीकात्मक रक्षा की प्रार्थना करता है।

बसत नाभि आदित्य मनोहर।
कटिमंह रहत मन मुदभर॥

अर्थ: आदित्य का स्मरण नाभि और कटि क्षेत्र की रक्षा के भाव से किया गया है।

जंघा गोपति सविता बासा।
गुप्त दिवाकर करत हुलासा॥

अर्थ: सविता और दिवाकर नामों के माध्यम से भक्त संपूर्ण शरीर की रक्षा और कल्याण की प्रार्थना करता है।

विवस्वान पद की रखवारी।
बाहर बसते नित तम हारी॥

अर्थ: विवस्वान और तमहारी सूर्यदेव से भक्त अपने चरणों और चारों ओर संरक्षण की प्रार्थना करता है।

सहस्रांशु सर्वांग सम्हारै।
रक्षा कवच विचित्र विचारे॥

अर्थ: हजारों किरणों वाले सूर्यदेव से संपूर्ण शरीर और जीवन की रक्षा की प्रार्थना की गई है।

अस जोजन अपने मन माहीं।
भय जगबीच करहुं तेहि नाहीं॥

अर्थ: जो भक्त इस दिव्य संरक्षण के भाव को मन में धारण करता है, वह निर्भयता और विश्वास की प्रार्थना करता है।

दद्रु कुष्ठ तेहिं कबहु न व्यापै।
जोजन याको मन मंह जापै॥

अर्थ: यह फलश्रुति स्वास्थ्य और आरोग्य के लिए की गई पारंपरिक धार्मिक प्रार्थना है; इसे चिकित्सकीय उपचार का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

अंधकार जग का जो हरता।
नव प्रकाश से आनन्द भरता॥

अर्थ: सूर्य संसार का अंधकार दूर करके प्रकाश और ऊर्जा प्रदान करते हैं।

ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही।
कोटि बार मैं प्रनवौं ताही॥

अर्थ: सूर्यदेव के महान और स्थिर प्रकाशमय स्वरूप को भक्त बारंबार प्रणाम करता है।

मंद सदृश सुत जग में जाके।
धर्मराज सम अद्भुत बांके॥

अर्थ: इस पद में सूर्यदेव से जुड़े शनिदेव और धर्मराज जैसे पौराणिक संबंधों का स्मरण है।

धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा।
किया करत सुरमुनि नर सेवा॥

अर्थ: दिन के प्रकाशदाता सूर्यदेव धन्य हैं; देवता, ऋषि और मनुष्य उनकी महिमा का स्मरण करते हैं।

भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों।
दूर हटतसो भवके भ्रम सों॥

अर्थ: नियमित और श्रद्धापूर्ण उपासना मनुष्य को भ्रम से दूर होकर अनुशासित और आध्यात्मिक जीवन की ओर बढ़ने की प्रेरणा देती है।

परम धन्य सों नर तनधारी।
हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी॥

अर्थ: जिस व्यक्ति पर प्रकाशस्वरूप सूर्यदेव की कृपा मानी जाती है, उसके जीवन को धन्य बताया गया है।

अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन।
मधु वेदांग नाम रवि उदयन॥

अर्थ: यहाँ वर्ष के विभिन्न महीनों में सूर्यदेव के अलग-अलग पारंपरिक नामों का वर्णन शुरू होता है।

भानु उदय बैसाख गिनावै।
ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै॥

अर्थ: वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ के साथ सूर्य के विभिन्न पवित्र नाम जोड़े गए हैं।

यम भादों आश्विन हिमरेता।
कातिक होत दिवाकर नेता॥

अर्थ: भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक महीनों में सूर्यदेव के अलग नामों का पारंपरिक स्मरण किया गया है।

अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं।
पुरुष नाम रवि हैं मलमासहिं॥

अर्थ: अगहन, पौष और अधिक मास में भी सूर्यदेव के विभिन्न पारंपरिक नामों का स्मरण किया गया है।

॥ समापन दोहा ॥
भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य।
सुख सम्पत्ति लहि विविध, होंहिं सदा कृतकृत्य॥

अर्थ: फलश्रुति में कहा गया है कि जो भक्त प्रेम और श्रद्धा से सूर्य चालीसा का पाठ करता है, वह जीवन के मंगल और कल्याण की प्रार्थना करता है।

🌼 भक्ति भावना

श्री सूर्य चालीसा का पाठ श्रद्धा, अनुशासन और सकारात्मक भाव से करें। सूर्यदेव का प्रकाश जीवन में ऊर्जा, नियमितता, कर्म और आशा की प्रेरणा देता है।

जय सूर्य नारायण ☀️
ॐ सूर्याय नमः 🙏
भक्ति भावना • भक्ति • धर्म • भारतीय संस्कृति

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