अष्टावक्र गीता अध्याय 2: जनक का आत्मानुभव — 25 श्लोक हिंदी अर्थ सहित
अष्टावक्र गीता
अध्याय २ • जनक का आत्मानुभव
अष्टावक्र गीता के इस अध्याय का मुख्य विषय है—जनक का आत्मानुभव। यहाँ जनक अपने आत्मानुभव का वर्णन करते हैं। नीचे सभी २५ मूल श्लोक क्रम से सरल हिंदी भावार्थ के साथ दिए गए हैं।
अध्याय २ • श्लोक १
जनक उवाच ॥
एतावन्तमहं कालं मोहेनैव विडम्बितः ॥ २-१॥
सरल हिंदी भावार्थ: जनक कहते हैं—आश्चर्य! मैं निर्मल, शांत, बोधस्वरूप और प्रकृति से परे हूँ। इतने समय तक मोह ने ही मुझे भ्रमित रखा।
अध्याय २ • श्लोक २
अतो मम जगत्सर्वमथवा न च किञ्चन ॥ २-२॥
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे मैं इस शरीर को प्रकाशित करता हूँ, वैसे ही जगत को भी। इसलिए सब जगत मेरा आत्मस्वरूप है; अथवा आत्मा से अलग मेरा कुछ भी नहीं।
अध्याय २ • श्लोक ३
कुतश्चित् कौशलाद् एव परमात्मा विलोक्यते ॥ २-३॥
सरल हिंदी भावार्थ: अब शरीर सहित विश्व की अलग सत्ता का आग्रह छोड़कर, गुरु के उपदेश से प्राप्त विवेक के कारण मैं परमात्मा का अनुभव करता हूँ।
अध्याय २ • श्लोक ४
आत्मनो न तथा भिन्नं विश्वमात्मविनिर्गतम् ॥ २-४॥
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे तरंग, झाग और बुलबुले जल से अलग नहीं हैं, वैसे ही आत्मा से प्रकट विश्व आत्मा से भिन्न नहीं है।
अध्याय २ • श्लोक ५
आत्मतन्मात्रमेवेदं तद्वद् विश्वं विचारितम् ॥ २-५॥
सरल हिंदी भावार्थ: विचार करने पर कपड़ा धागों का ही रूप निकलता है। वैसे ही तत्त्वविचार से यह विश्व केवल आत्मस्वरूप जान पड़ता है।
अध्याय २ • श्लोक ६
तथा विश्वं मयि क्लृप्तं मया व्याप्तं निरन्तरम् ॥ २-६॥
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे गन्ने के रस से बनी शक्कर उसी रस से व्याप्त है, वैसे ही मुझमें प्रकट विश्व निरंतर मेरे चेतन स्वरूप से व्याप्त है।
अध्याय २ • श्लोक ७
रज्ज्वज्ञानादहिर्भाति तज्ज्ञानाद् भासते न हि ॥ २-७॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा के अज्ञान से जगत अलग सत्य की तरह दिखता है; आत्मज्ञान से वह भ्रम मिटता है। जैसे रस्सी न जानने से साँप दिखता है और रस्सी जानने पर नहीं दिखता।
अध्याय २ • श्लोक ८
यदा प्रकाशते विश्वं तदाहं भास एव हि ॥ २-८॥
सरल हिंदी भावार्थ: प्रकाश अर्थात चेतना मेरा अपना स्वरूप है; मैं उससे अलग नहीं हूँ। जब विश्व प्रकाशित होता है, तब मेरा ही चेतन प्रकाश उसमें प्रकट होता है।
अध्याय २ • श्लोक ९
रूप्यं शुक्तौ फणी रज्जौ वारि सूर्यकरे यथा ॥ २-९॥
सरल हिंदी भावार्थ: आश्चर्य! अज्ञान से कल्पित विश्व मुझमें ऐसा दिखता है, जैसे सीप में चाँदी, रस्सी में साँप और सूर्य की किरणों में मृगतृष्णा का जल।
अध्याय २ • श्लोक १०
मृदि कुम्भो जले वीचिः कनके कटकं यथा ॥ २-१०॥
सरल हिंदी भावार्थ: यह विश्व मुझसे प्रकट होकर मुझमें ही लीन होगा; जैसे घड़ा मिट्टी में, लहर जल में और कंगन सोने में अपने मूल स्वरूप को प्राप्त होते हैं।
अध्याय २ • श्लोक ११
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं जगन्नाशोऽपि तिष्ठतः ॥ २-११॥
सरल हिंदी भावार्थ: आश्चर्य! अपने अविनाशी आत्मस्वरूप को नमस्कार है। ब्रह्मा से लेकर तिनके तक का जगत नष्ट हो जाए, तब भी मैं आत्मरूप में बना रहता हूँ।
अध्याय २ • श्लोक १२
क्वचिन्न गन्ता नागन्ता व्याप्य विश्वमवस्थितः ॥ २-१२॥
सरल हिंदी भावार्थ: अपने आत्मस्वरूप को नमस्कार है। शरीर होते हुए भी मैं एक हूँ; न कहीं जाता हूँ, न आता हूँ; पूरे विश्व में व्याप्त हूँ।
अध्याय २ • श्लोक १३
असंस्पृश्य शरीरेण येन विश्वं चिरं धृतम् ॥ २-१३॥
सरल हिंदी भावार्थ: अपने आत्मस्वरूप को नमस्कार है। मेरे समान समर्थ कौन है, जिसने शरीर से स्पर्श किए बिना ही इस विश्व को आधार दे रखा है।
अध्याय २ • श्लोक १४
अथवा यस्य मे सर्वं यद् वाङ्मनसगोचरम् ॥ २-१४॥
सरल हिंदी भावार्थ: अपने आत्मस्वरूप को नमस्कार है। मेरा कुछ भी नहीं; अथवा वाणी और मन के विषय में आने वाला सब कुछ मेरा ही स्वरूप है।
अध्याय २ • श्लोक १५
अज्ञानाद् भाति यत्रेदं सोऽहमस्मि निरञ्जनः ॥ २-१५॥
सरल हिंदी भावार्थ: जानने का ज्ञान, जानने योग्य विषय और जानने वाला—इन तीनों की भिन्नता परम सत्य नहीं है। जिस निर्मल चेतना में अज्ञान से यह भेद दिखता है, वही मैं हूँ।
अध्याय २ • श्लोक १६
दृश्यमेतन् मृषा सर्वमेकोऽहं चिद्रसोमलः ॥ २-१६॥
सरल हिंदी भावार्थ: दुःख का मूल द्वैतभाव है। उसका उपाय यही बोध है कि दृश्य जगत की अलग स्वतंत्र सत्ता वास्तविक नहीं; मैं एक निर्मल चेतन सार हूँ।
अध्याय २ • श्लोक १७
एवं विमृशतो नित्यं निर्विकल्पे स्थितिर्मम ॥ २-१७॥
सरल हिंदी भावार्थ: मैं केवल बोधस्वरूप हूँ; अज्ञान से ही मैंने अपने ऊपर सीमित पहचानें आरोपित की थीं। निरंतर इस विवेक से मैं भेदरहित स्वरूप में स्थित हूँ।
अध्याय २ • श्लोक १८
अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम् ॥ २-१८॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मस्वरूप में न मेरा बंधन है, न मोक्ष। आधारहीन भ्रांति शांत हो गई है। आश्चर्य! जगत मुझमें दिखाई देता है, फिर भी वास्तव में वह मुझे बाँध नहीं सकता।
अध्याय २ • श्लोक १९
शुद्धचिन्मात्र आत्मा च तत्कस्मिन् कल्पनाधुना ॥ २-१९॥
सरल हिंदी भावार्थ: निश्चित हो गया है कि शरीर सहित इस विश्व की आत्मा से अलग स्वतंत्र सत्ता नहीं है। आत्मा शुद्ध चेतना है; अब किसमें और कैसी कल्पना की जाए?
अध्याय २ • श्लोक २०
कल्पनामात्रमेवैतत् किं मे कार्यं चिदात्मनः ॥ २-२०॥
सरल हिंदी भावार्थ: शरीर, स्वर्ग-नरक, बंधन-मोक्ष और भय—ये सब आत्मा पर की गई कल्पनाएँ हैं। शुद्ध चेतन स्वरूप में मेरा इनसे क्या संबंध है?
अध्याय २ • श्लोक २१
अरण्यमिव संवृत्तं क्व रतिं करवाण्यहम् ॥ २-२१॥
सरल हिंदी भावार्थ: आश्चर्य! जनसमूह में भी मुझे आत्मा से अलग दूसरा नहीं दिखता। सब एकांत वन जैसा शांत हो गया है; अब किस अलग वस्तु में आसक्ति करूँ?
अध्याय २ • श्लोक २२
अयमेव हि मे बन्ध आसीद्या जीविते स्पृहा ॥ २-२२॥
सरल हिंदी भावार्थ: मैं शरीर नहीं हूँ, शरीर मेरा स्वरूप नहीं है और मैं सीमित जीवभाव भी नहीं हूँ; मैं चेतना हूँ। केवल जीवन को पकड़े रहने की इच्छा ही मेरा बंधन थी।
अध्याय २ • श्लोक २३
मय्यनन्तमहाम्भोधौ चित्तवाते समुद्यते ॥ २-२३॥
सरल हिंदी भावार्थ: मुझ अनंत महासागर में चित्तरूपी हवा चलती है, तो अनेक प्रकार की विश्वरूपी लहरें तुरंत उठने लगती हैं।
अध्याय २ • श्लोक २४
अभाग्याज्जीववणिजो जगत्पोतो विनश्वरः ॥ २-२४॥
सरल हिंदी भावार्थ: मुझ अनंत महासागर में चित्त की हवा शांत होने पर, सीमित जीवभावरूपी व्यापारी की नश्वर जगतरूपी नाव का आधार मिट जाता है।
अध्याय २ • श्लोक २५
उद्यन्ति घ्नन्ति खेलन्ति प्रविशन्ति स्वभावतः ॥ २-२५॥
सरल हिंदी भावार्थ: आश्चर्य! मुझ अनंत महासागर में जीवरूपी तरंगें स्वभाव से उठती हैं, टकराती हैं, खेलती हैं और फिर मुझमें ही समा जाती हैं।
॥ अष्टावक्र गीता — अध्याय २ सम्पूर्ण ॥
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