अष्टावक्र गीता अध्याय 20: अद्वैत की पूर्णता — 14 श्लोक हिंदी अर्थ सहित
भक्ति भावना • अष्टावक्र गीता अष्टावक्र गीता अध्याय २० • अद्वैत की पूर्णता सम्पूर्ण १४ श्लोक • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ ☰ ग्रंथालय में अष्टावक्र गीता अष्टावक्र गीता के इस अध्याय का मुख्य विषय है—अद्वैत की पूर्णता। यहाँ जनक अपने आत्मानुभव का वर्णन करते हैं। नीचे सभी १४ मूल श्लोक क्रम से सरल हिंदी भावार्थ के साथ दिए गए हैं। पाठ का संदर्भ: यह अद्वैत दर्शन का आत्मस्वरूप संबंधी संवाद है। अकर्तापन और बंधन से परे होने के कथन शुद्ध आत्मा की दृष्टि से हैं; व्यवहार में कर्तव्य, सदाचार और करुणा का महत्त्व बना रहता है। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना द्वारा सरल भाषा में प्रस्तुत है। अध्याय का विषय-शीर्षक पाठ की सुविधा के लिए दिया गया है। अध्याय २० • श्लोक १ जनक उवाच ॥ क्व भूतानि क्व देहो वा क्वेन्द्रियाणि क्व वा मनः । क्व शून्यं क्व च नैराश्यं मत्स्वरूपे निरञ्जने ॥ २०-१॥ सरल हिंदी भावार्थ: जनक कहते हैं—मेरे निर्मल आत्मस्वरूप में पंचभूत, देह, इंद्रियाँ, मन, शून्यता और आकांक्षारहित होने के भेद कहाँ हैं? अध्याय २० • श्लोक २ क्व शास्त्रं क्वात्मविज्ञानं क्व वा निर्विषयं मनः । क्व तृप्तिः क्व...