अष्टावक्र गीता अध्याय 18: परम शांति का विस्तार — 100 श्लोक हिंदी अर्थ सहित

भक्ति भावना • अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

अध्याय १८ • परम शांति का विस्तार

सम्पूर्ण १०० श्लोक • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

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अष्टावक्र गीता के इस अध्याय का मुख्य विषय है—परम शांति का विस्तार। यहाँ अष्टावक्र और जनक के संवाद में आत्मतत्त्व का विवेचन मिलता है। नीचे सभी १०० मूल श्लोक क्रम से सरल हिंदी भावार्थ के साथ दिए गए हैं।

पाठ का संदर्भ: यह अद्वैत दर्शन का आत्मस्वरूप संबंधी संवाद है। अकर्तापन और बंधन से परे होने के कथन शुद्ध आत्मा की दृष्टि से हैं; व्यवहार में कर्तव्य, सदाचार और करुणा का महत्त्व बना रहता है। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना द्वारा सरल भाषा में प्रस्तुत है। अध्याय का विषय-शीर्षक पाठ की सुविधा के लिए दिया गया है।

अध्याय १८ • श्लोक १

अष्टावक्र उवाच ॥

यस्य बोधोदये तावत्स्वप्नवद् भवति भ्रमः ।
तस्मै सुखैकरूपाय नमः शान्ताय तेजसे ॥ १८-१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिसके बोध के उदय से भ्रम स्वप्न की तरह मिट जाता है, उस एक सुखस्वरूप, शांत चेतन प्रकाश को नमस्कार है।

अध्याय १८ • श्लोक २

अर्जयित्वाखिलान् अर्थान् भोगानाप्नोति पुष्कलान् ।
न हि सर्वपरित्यागमन्तरेण सुखी भवेत् ॥ १८-२॥

सरल हिंदी भावार्थ: सभी प्रकार का धन जुटाकर प्रचुर भोग मिल सकते हैं, लेकिन उन सबके प्रति आंतरिक आसक्ति छोड़े बिना स्थायी सुख नहीं मिलता।

अध्याय १८ • श्लोक ३

कर्तव्यदुःखमार्तण्डज्वालादग्धान्तरात्मनः ।
कुतः प्रशमपीयूषधारासारमृते सुखम् ॥ १८-३॥

सरल हिंदी भावार्थ: “मुझे यह करना ही है”—इस अहंकारपूर्ण बोझ की दाह से जले अंतःकरण को शांति की अमृतधारा के बिना सुख कहाँ मिल सकता है?

अध्याय १८ • श्लोक ४

भवोऽयं भावनामात्रो न किञ्चित् परमार्थतः ।
नास्त्यभावः स्वभावानां भावाभावविभाविनाम् ॥ १८-४॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह संसारबंध मन की धारणाओं से बना है; परम सत्य में उसकी अलग सत्ता नहीं। उत्पत्ति और अभाव को जानने वाला आत्मस्वभाव उन दोनों से नहीं मिटता।

अध्याय १८ • श्लोक ५

न दूरं न च सङ्कोचाल्लब्धमेवात्मनः पदम् ।
निर्विकल्पं निरायासं निर्विकारं निरञ्जनम् ॥ १८-५॥

सरल हिंदी भावार्थ: आत्मपद न दूर है, न मानसिक संकुचन से मिलता है; वह पहले से प्राप्त है। वह विकल्प, प्रयास, विकार और मलिनता से रहित है।

अध्याय १८ • श्लोक ६

व्यामोहमात्रविरतौ स्वरूपादानमात्रतः ।
वीतशोका विराजन्ते निरावरणदृष्टयः ॥ १८-६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मोह के रुकने और अपने स्वरूप की पहचान होने पर जिनकी दृष्टि का आवरण हट गया है, वे शोक से रहित होकर शोभते हैं।

अध्याय १८ • श्लोक ७

समस्तं कल्पनामात्रमात्मा मुक्तः सनातनः ।
इति विज्ञाय धीरो हि किमभ्यस्यति बालवत् ॥ १८-७॥

सरल हिंदी भावार्थ: सब भेद कल्पनामात्र हैं और आत्मा सनातन मुक्त है—यह जानने वाला धीर पुरुष अज्ञानवश बालक जैसी प्राप्ति की चेष्टा क्यों करेगा?

अध्याय १८ • श्लोक ८

आत्मा ब्रह्मेति निश्चित्य भावाभावौ च कल्पितौ ।
निष्कामः किं विजानाति किं ब्रूते च करोति किम् ॥ १८-८॥

सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा ही ब्रह्म है और होने-न होने के भेद कल्पित हैं—यह निश्चित जानकर निष्काम पुरुष अपने लिए क्या अलग जाने, कहे या करे?

अध्याय १८ • श्लोक ९

अयं सोऽहमयं नाहमिति क्षीणा विकल्पना ।
सर्वमात्मेति निश्चित्य तूष्णीम्भूतस्य योगिनः ॥ १८-९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सब आत्मस्वरूप है—यह जानकर शांत हुए योगी की “यह मैं हूँ, यह मैं नहीं हूँ”—ऐसी विभाजनकारी कल्पना मिट जाती है।

अध्याय १८ • श्लोक १०

न विक्षेपो न चैकाग्र्यं नातिबोधो न मूढता ।
न सुखं न च वा दुःखमुपशान्तस्य योगिनः ॥ १८-१०॥

सरल हिंदी भावार्थ: पूर्ण शांत योगी के आत्मबोध में विक्षेप-एकाग्रता, अधिक ज्ञान-मूढ़ता और सुख-दुःख के द्वंद्व टिकते नहीं हैं।

अध्याय १८ • श्लोक ११

स्वाराज्ये भैक्षवृत्तौ च लाभालाभे जने वने ।
निर्विकल्पस्वभावस्य न विशेषोऽस्ति योगिनः ॥ १८-११॥

सरल हिंदी भावार्थ: विकल्परहित योगी के लिए राज्य या भिक्षा, लाभ या हानि और जनसमूह या वन—इनसे आत्मस्थिति में अंतर नहीं पड़ता।

अध्याय १८ • श्लोक १२

क्व धर्मः क्व च वा कामः क्व चार्थः क्व विवेकिता ।
इदं कृतमिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तस्य योगिनः ॥ १८-१२॥

सरल हिंदी भावार्थ: “यह किया, यह नहीं किया”—इन द्वंद्वों से मुक्त योगी के लिए धर्म, काम, अर्थ और विवेक का प्राप्ति-संबंधी आग्रह कहाँ रहता है?

अध्याय १८ • श्लोक १३

कृत्यं किमपि नैवास्ति न कापि हृदि रञ्जना ।
यथा जीवनमेवेह जीवन्मुक्तस्य योगिनः ॥ १८-१३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जीवनमुक्त योगी के हृदय में निजी आसक्ति नहीं और आत्मपूर्णता के लिए कोई काम शेष नहीं। वह प्राप्त जीवन को सहज जीता है।

अध्याय १८ • श्लोक १४

क्व मोहः क्व च वा विश्वं क्व तद् ध्यानं क्व मुक्तता ।
सर्वसङ्कल्पसीमायां विश्रान्तस्य महात्मनः ॥ १८-१४॥

सरल हिंदी भावार्थ: सभी संकल्पों की सीमा से परे विश्राम पाए महात्मा के लिए मोह, अलग विश्व, ध्यान और मुक्ति की धारणाएँ कहाँ रहती हैं?

अध्याय १८ • श्लोक १५

येन विश्वमिदं दृष्टं स नास्तीति करोतु वै ।
निर्वासनः किं कुरुते पश्यन्नपि न पश्यति ॥ १८-१५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो विश्व को आत्मा से अलग देखता है, वही उसके न होने की धारणा बनाए। वासनारहित ज्ञानी देखते हुए भी उसे अलग स्वतंत्र सत्य नहीं मानता।

अध्याय १८ • श्लोक १६

येन दृष्टं परं ब्रह्म सोऽहं ब्रह्मेति चिन्तयेत् ।
किं चिन्तयति निश्चिन्तो द्वितीयं यो न पश्यति ॥ १८-१६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो ब्रह्म को अपने से अलग कोई वस्तु समझकर देखता है, वह “मैं ब्रह्म हूँ”—ऐसा चिंतन करे। जो दूसरा कुछ देखता ही नहीं, वह निश्चिंत होकर क्या चिंतन करे?

अध्याय १८ • श्लोक १७

दृष्टो येनात्मविक्षेपो निरोधं कुरुते त्वसौ ।
उदारस्तु न विक्षिप्तः साध्याभावात्करोति किम् ॥ १८-१७॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो अपने मन को विक्षिप्त मानता है, वह उसका निरोध करता है। उदार ज्ञानी अपने स्वरूप को अविक्षिप्त जानता है; उसके लिए कौन-सा साध्य शेष है?

अध्याय १८ • श्लोक १८

धीरो लोकविपर्यस्तो वर्तमानोऽपि लोकवत् ।
न समाधिं न विक्षेपं न लोपं स्वस्य पश्यति ॥ १८-१८॥

सरल हिंदी भावार्थ: धीर पुरुष बाहर से लोगों की तरह व्यवहार करता है, पर भीतर उसकी दृष्टि अलग होती है। वह आत्मा में न समाधि, न विक्षेप और न स्वरूप की हानि देखता है।

अध्याय १८ • श्लोक १९

भावाभावविहीनो यस्तृप्तो निर्वासनो बुधः ।
नैव किञ्चित्कृतं तेन लोकदृष्ट्या विकुर्वता ॥ १८-१९॥

सरल हिंदी भावार्थ: होने-न होने के आग्रह से मुक्त, तृप्त और वासनारहित ज्ञानी लोकदृष्टि से कर्म करता है, फिर भी आत्मा को कर्ता नहीं मानता।

अध्याय १८ • श्लोक २०

प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा नैव धीरस्य दुर्ग्रहः ।
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वा तिष्ठतः सुखम् ॥ १८-२०॥

सरल हिंदी भावार्थ: धीर व्यक्ति को न कर्म करने का हठ है, न छोड़ने का। जो कार्य सामने आता है उसे करके सुख से रहता है।

अध्याय १८ • श्लोक २१

निर्वासनो निरालम्बः स्वच्छन्दो मुक्तबन्धनः ।
क्षिप्तः संस्कारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत् ॥ १८-२१॥

सरल हिंदी भावार्थ: वासनारहित, निरालंब, सहज और बंधनमुक्त ज्ञानी के शरीर की चेष्टाएँ पुराने संस्कारों की हवा से सूखे पत्ते की तरह चलती हैं।

अध्याय १८ • श्लोक २२

असंसारस्य तु क्वापि न हर्षो न विषादता ।
स शीतलमना नित्यं विदेह इव राजये ॥ १८-२२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिसका संसारबंध समाप्त हो गया, उसे किसी परिस्थिति में हर्ष या विषाद नहीं बाँधता। वह सदा शीतल मन से देहभाव से परे शोभता है।

अध्याय १८ • श्लोक २३

कुत्रापि न जिहासास्ति नाशो वापि न कुत्रचित् ।
आत्मारामस्य धीरस्य शीतलाच्छतरात्मनः ॥ १८-२३॥

सरल हिंदी भावार्थ: आत्मानंद में रमने वाले, शांत और अत्यंत निर्मल धीर व्यक्ति में कहीं कुछ त्यागने का आग्रह नहीं और न आत्मस्वरूप के नाश का प्रश्न।

अध्याय १८ • श्लोक २४

प्रकृत्या शून्यचित्तस्य कुर्वतोऽस्य यदृच्छया ।
प्राकृतस्येव धीरस्य न मानो नावमानता ॥ १८-२४॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वभाव से संकल्पशून्य धीर पुरुष सामान्य व्यक्ति की तरह प्राप्त कर्म करता है, लेकिन भीतर मान या अपमान की गाँठ नहीं बनती।

अध्याय १८ • श्लोक २५

कृतं देहेन कर्मेदं न मया शुद्धरूपिणा ।
इति चिन्तानुरोधी यः कुर्वन्नपि करोति न ॥ १८-२५॥

सरल हिंदी भावार्थ: “यह कर्म देह से हुआ है, मेरे शुद्ध आत्मस्वरूप से नहीं”—इस विवेक में स्थित व्यक्ति कर्म करते हुए भी कर्ताभाव से रहित रहता है।

अध्याय १८ • श्लोक २६

अतद्वादीव कुरुते न भवेदपि बालिशः ।
जीवन्मुक्तः सुखी श्रीमान् संसरन्नपि शोभते ॥ १८-२६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जीवनमुक्त की चेष्टाएँ कभी उपदेश की सामान्य भाषा से भिन्न दिख सकती हैं, फिर भी वह अज्ञानी नहीं होता। सुखी और आत्मसमृद्ध होकर संसार में भी शोभता है।

अध्याय १८ • श्लोक २७

नानाविचारसुश्रान्तो धीरो विश्रान्तिमागतः ।
न कल्पते न जानाति न श‍ृणोति न पश्यति ॥ १८-२७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अनेक विचारों से थककर आत्मविश्राम पाए धीर पुरुष में अब कल्पना का आग्रह नहीं। जानना, सुनना और देखना भी उसे अलग विषयसत्ता में नहीं बाँधते।

अध्याय १८ • श्लोक २८

असमाधेरविक्षेपान् न मुमुक्षुर्न चेतरः ।
निश्चित्य कल्पितं पश्यन् ब्रह्मैवास्ते महाशयः ॥ १८-२८॥

सरल हिंदी भावार्थ: विक्षेप और समाधि की सीमाओं से परे वह न मुक्ति की लालसा में बँधा है, न उसका विरोधी है। जगत को कल्पित जानकर वह ब्रह्मस्वरूप में स्थित रहता है।

अध्याय १८ • श्लोक २९

यस्यान्तः स्यादहङ्कारो न करोति करोति सः ।
निरहङ्कारधीरेण न किञ्चिदकृतं कृतम् ॥ १८-२९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिसके भीतर अहंकार है, वह बाहर निष्क्रिय होकर भी मानसिक कर्ता बना रहता है। निरहंकारी धीर पुरुष को किए और न किए कर्मों का बंधन नहीं होता।

अध्याय १८ • श्लोक ३०

नोद्विग्नं न च सन्तुष्टमकर्तृ स्पन्दवर्जितम् ।
निराशं गतसन्देहं चित्तं मुक्तस्य राजते ॥ १८-३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुक्त पुरुष का चित्त न उद्विग्न होता है, न प्राप्ति के उत्साह में बँधता है। कर्ताभाव, मानसिक कंपन, आशा और संदेह से रहित होकर शोभता है।

अध्याय १८ • श्लोक ३१

निर्ध्यातुं चेष्टितुं वापि यच्चित्तं न प्रवर्तते ।
निर्निमित्तमिदं किन्तु निर्ध्यायेति विचेष्टते ॥ १८-३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिसका चित्त आग्रहपूर्वक ध्यान या कर्म में नहीं दौड़ता, उसका ध्यान और व्यवहार भी बिना निजी स्वार्थ के सहज घटित होता है।

अध्याय १८ • श्लोक ३२

तत्त्वं यथार्थमाकर्ण्य मन्दः प्राप्नोति मूढताम् ।
अथवा याति सङ्कोचममूढः कोऽपि मूढवत् ॥ १८-३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: तत्त्व का यथार्थ उपदेश सुनकर मंदबुद्धि व्यक्ति उलझ सकता है। स्पष्ट बोध वाला कभी बाहर से संकुचित या मूढ़ जैसा लगे, फिर भी वह भ्रमित नहीं होता।

अध्याय १८ • श्लोक ३३

एकाग्रता निरोधो वा मूढैरभ्यस्यते भृशम् ।
धीराः कृत्यं न पश्यन्ति सुप्तवत्स्वपदे स्थिताः ॥ १८-३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अज्ञानी लोग एकाग्रता और निरोध का बहुत आग्रह से अभ्यास करते हैं। धीर पुरुष आत्मपद में विश्राम पाकर अपने लिए कोई अपूर्णता दूर करने का काम नहीं देखता।

अध्याय १८ • श्लोक ३४

अप्रयत्नात् प्रयत्नाद् वा मूढो नाप्नोति निर्वृतिम् ।
तत्त्वनिश्चयमात्रेण प्राज्ञो भवति निर्वृतः ॥ १८-३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: केवल प्रयास करने या प्रयास छोड़ने से अविवेकी को शांति नहीं मिलती। प्रज्ञावान तत्त्व का निश्चय करके ही विश्राम पाता है।

अध्याय १८ • श्लोक ३५

शुद्धं बुद्धं प्रियं पूर्णं निष्प्रपञ्चं निरामयम् ।
आत्मानं तं न जानन्ति तत्राभ्यासपरा जनाः ॥ १८-३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो आत्मा को केवल अभ्यास से भविष्य में मिलने वाली वस्तु मानते हैं, वे उसके शुद्ध, बोधमय, प्रिय, पूर्ण, प्रपंचरहित और दोषरहित स्वरूप को नहीं पहचानते।

अध्याय १८ • श्लोक ३६

नाप्नोति कर्मणा मोक्षं विमूढोऽभ्यासरूपिणा ।
धन्यो विज्ञानमात्रेण मुक्तस्तिष्ठत्यविक्रियः ॥ १८-३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: अविवेकी केवल अभ्यासरूपी कर्म से मोक्ष नहीं पा सकता। धन्य व्यक्ति तत्त्वज्ञान से मुक्त होकर निर्विकार स्वरूप में स्थित रहता है।

अध्याय १८ • श्लोक ३७

मूढो नाप्नोति तद् ब्रह्म यतो भवितुमिच्छति ।
अनिच्छन्नपि धीरो हि परब्रह्मस्वरूपभाक् ॥ १८-३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अज्ञानी ब्रह्म “बनना” चाहता है, इसलिए अपने नित्य स्वरूप को नहीं पहचानता। धीर पुरुष ऐसी इच्छा किए बिना ही परब्रह्मस्वरूप का बोध रखता है।

अध्याय १८ • श्लोक ३८

निराधारा ग्रहव्यग्रा मूढाः संसारपोषकाः ।
एतस्यानर्थमूलस्य मूलच्छेदः कृतो बुधैः ॥ १८-३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: आधारहीन धारणाएँ पकड़कर व्यग्र रहने वाले अपना संसारबंध बढ़ाते हैं। ज्ञानी इस अनर्थ के मूल अज्ञान और आग्रह को काट देते हैं।

अध्याय १८ • श्लोक ३९

न शान्तिं लभते मूढो यतः शमितुमिच्छति ।
धीरस्तत्त्वं विनिश्चित्य सर्वदा शान्तमानसः ॥ १८-३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: शांति पाने की तीव्र चाह भी जिसके भीतर अशांति बन गई है, वह शांत नहीं होता। धीर पुरुष तत्त्व का निश्चय करके सदा शांत रहता है।

अध्याय १८ • श्लोक ४०

क्वात्मनो दर्शनं तस्य यद् दृष्टमवलम्बते ।
धीरास्तं तं न पश्यन्ति पश्यन्त्यात्मानमव्ययम् ॥ १८-४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो दृश्य वस्तु का ही सहारा पकड़े है, उसे आत्मदर्शन कैसे हो? धीर व्यक्ति बदलती वस्तुओं में न अटककर अविनाशी आत्मा को पहचानता है।

अध्याय १८ • श्लोक ४१

क्व निरोधो विमूढस्य यो निर्बन्धं करोति वै ।
स्वारामस्यैव धीरस्य सर्वदासावकृत्रिमः ॥ १८-४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: हठ करने वाले अज्ञानी को सहज चित्तनिरोध कहाँ मिलता है? आत्मानंद में रमने वाले धीर पुरुष में शांति सदा अकृत्रिम रहती है।

अध्याय १८ • श्लोक ४२

भावस्य भावकः कश्चिन् न किञ्चिद् भावकोपरः ।
उभयाभावकः कश्चिद् एवमेव निराकुलः ॥ १८-४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: कोई जगत के होने की भावना करता है, कोई कुछ भी न होने की। विरला व्यक्ति दोनों धारणाओं का आग्रह छोड़कर सहज निराकुल रहता है।

अध्याय १८ • श्लोक ४३

शुद्धमद्वयमात्मानं भावयन्ति कुबुद्धयः ।
न तु जानन्ति संमोहाद्यावज्जीवमनिर्वृताः ॥ १८-४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अविवेकी शुद्ध अद्वैत आत्मा की केवल कल्पना करते हैं, पर मोह से उसे यथार्थ नहीं पहचानते; इसलिए जीवन भर विश्राम नहीं पाते।

अध्याय १८ • श्लोक ४४

मुमुक्षोर्बुद्धिरालम्बमन्तरेण न विद्यते ।
निरालम्बैव निष्कामा बुद्धिर्मुक्तस्य सर्वदा ॥ १८-४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुक्ति चाहने वाले की बुद्धि किसी न किसी आधार को पकड़ती है। मुक्त पुरुष की बुद्धि सदा निष्काम और किसी बाहरी सहारे पर निर्भर नहीं होती।

अध्याय १८ • श्लोक ४५

विषयद्वीपिनो वीक्ष्य चकिताः शरणार्थिनः ।
विशन्ति झटिति क्रोडं निरोधैकाग्रसिद्धये ॥ १८-४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: विषयरूपी बाघों से भयभीत साधक मन के निरोध और एकाग्रता के लिए तुरंत एकांत गुफा की शरण लेते हैं।

अध्याय १८ • श्लोक ४६

निर्वासनं हरिं दृष्ट्वा तूष्णीं विषयदन्तिनः ।
पलायन्ते न शक्तास्ते सेवन्ते कृतचाटवः ॥ १८-४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वासनारहित ज्ञानीरूपी सिंह को देखकर विषयरूपी हाथी या तो शांत होकर दूर हो जाते हैं, या प्रभावहीन होकर उसके अधीन रहते हैं।

अध्याय १८ • श्लोक ४७

न मुक्तिकारिकां धत्ते निःशङ्को युक्तमानसः ।
पश्यन् श‍ृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्नश्नन्नास्ते यथासुखम् ॥ १८-४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: निःशंक और समाहित मन वाला मुक्त पुरुष मुक्ति के लिए आग्रहपूर्ण क्रियाएँ नहीं पकड़ता; देखते, सुनते, छूते, सूँघते और खाते हुए सुख से रहता है।

अध्याय १८ • श्लोक ४८

वस्तुश्रवणमात्रेण शुद्धबुद्धिर्निराकुलः ।
नैवाचारमनाचारमौदास्यं वा प्रपश्यति ॥ १८-४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: निर्मल बुद्धि वाला तत्त्व का उपदेश सुनते ही निराकुल हो जाता है। वह अपने आत्मस्वरूप को आचार, अनाचार या उदासीनता की सीमित पहचान में नहीं बाँधता।

अध्याय १८ • श्लोक ४९

यदा यत्कर्तुमायाति तदा तत्कुरुते ऋजुः ।
शुभं वाप्यशुभं वापि तस्य चेष्टा हि बालवत् ॥ १८-४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सरल ज्ञानी के सामने जब जो कार्य आता है, वह उसे करता है। फल अनुकूल हो या प्रतिकूल, उसकी चेष्टा बालक जैसी निष्कपट होती है।

अध्याय १८ • श्लोक ५०

स्वातन्त्र्यात्सुखमाप्नोति स्वातन्त्र्याल्लभते परम् ।
स्वातन्त्र्यान्निर्वृतिं गच्छेत्स्वातन्त्र्यात् परमं पदम् ॥ १८-५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: आंतरिक स्वतंत्रता से सुख, परम तत्त्व की प्राप्ति, गहरी शांति और परम पद का बोध होता है।

अध्याय १८ • श्लोक ५१

अकर्तृत्वमभोक्तृत्वं स्वात्मनो मन्यते यदा ।
तदा क्षीणा भवन्त्येव समस्ताश्चित्तवृत्तयः ॥ १८-५१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब व्यक्ति अपने आत्मस्वरूप को अकर्ता और अभोक्ता जानता है, तब चित्त की बंधनकारी वृत्तियाँ क्षीण हो जाती हैं।

अध्याय १८ • श्लोक ५२

उच्छृङ्खलाप्यकृतिका स्थितिर्धीरस्य राजते ।
न तु सस्पृहचित्तस्य शान्तिर्मूढस्य कृत्रिमा ॥ १८-५२॥

सरल हिंदी भावार्थ: धीर पुरुष की सहज, अकृत्रिम स्थिति बाहर से अनियमित लगे तब भी शोभती है; इच्छाओं से भरे अज्ञानी की बनावटी शांति वैसी नहीं होती।

अध्याय १८ • श्लोक ५३

विलसन्ति महाभोगैर्विशन्ति गिरिगह्वरान् ।
निरस्तकल्पना धीरा अबद्धा मुक्तबुद्धयः ॥ १८-५३॥

सरल हिंदी भावार्थ: कल्पनाओं से मुक्त धीर पुरुष बड़े भोगों के बीच रहें या पर्वत की गुफाओं में, उनकी बुद्धि मुक्त और बंधनरहित रहती है।

अध्याय १८ • श्लोक ५४

श्रोत्रियं देवतां तीर्थमङ्गनां भूपतिं प्रियम् ।
दृष्ट्वा सम्पूज्य धीरस्य न कापि हृदि वासना ॥ १८-५४॥

सरल हिंदी भावार्थ: शास्त्रज्ञ, देवता, तीर्थ, स्त्री, राजा या प्रियजन को देखकर और सम्मान देकर भी धीर पुरुष के हृदय में निजी वासना नहीं उठती।

अध्याय १८ • श्लोक ५५

भृत्यैः पुत्रैः कलत्रैश्च दौहित्रैश्चापि गोत्रजैः ।
विहस्य धिक्कृतो योगी न याति विकृतिं मनाक् ॥ १८-५५॥

सरल हिंदी भावार्थ: सेवक, पुत्र, पत्नी, नाती या परिवारजन हँसी उड़ाएँ अथवा अपमान करें, तब भी आत्मस्थित योगी भीतर तनिक विकृत नहीं होता।

अध्याय १८ • श्लोक ५६

सन्तुष्टोऽपि न सन्तुष्टः खिन्नोऽपि न च खिद्यते ।
तस्याश्चर्यदशां तां तां तादृशा एव जानते ॥ १८-५६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह बाहर प्रसन्न या खिन्न दिख सकता है, लेकिन भीतर न प्रसन्नता में बँधता है, न दुःख में। उसकी अद्भुत अवस्था उसी प्रकार के अनुभवी जानते हैं।

अध्याय १८ • श्लोक ५७

कर्तव्यतैव संसारो न तां पश्यन्ति सूरयः ।
शून्याकारा निराकारा निर्विकारा निरामयाः ॥ १८-५७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अहंकार से लदी “मुझे करना ही है”—यह भावना संसारबंध है। शून्य आग्रह, निराकार बोध, निर्विकारता और निरामयता वाले ज्ञानी उसमें नहीं बँधते।

अध्याय १८ • श्लोक ५८

अकुर्वन्नपि सङ्क्षोभाद् व्यग्रः सर्वत्र मूढधीः ।
कुर्वन्नपि तु कृत्यानि कुशलो हि निराकुलः ॥ १८-५८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मंदबुद्धि बाहर कर्म न करके भी मानसिक खलबली से व्यग्र रहता है। कुशल ज्ञानी आवश्यक कार्य करते हुए भी भीतर निराकुल रहता है।

अध्याय १८ • श्लोक ५९

सुखमास्ते सुखं शेते सुखमायाति याति च ।
सुखं वक्ति सुखं भुङ्क्ते व्यवहारेऽपि शान्तधीः ॥ १८-५९॥

सरल हिंदी भावार्थ: शांत बुद्धि वाला बैठता, सोता, आता-जाता, बोलता और भोजन करता है—इन सभी व्यवहारों में सहज सुखी रहता है।

अध्याय १८ • श्लोक ६०

स्वभावाद्यस्य नैवार्तिर्लोकवद् व्यवहारिणः ।
महाह्रद इवाक्षोभ्यो गतक्लेशः सुशोभते ॥ १८-६०॥

सरल हिंदी भावार्थ: लोगों की तरह व्यवहार करते हुए भी जिसके स्वभाव में आंतरिक पीड़ा नहीं, वह क्लेशरहित होकर विशाल शांत सरोवर की तरह शोभता है।

अध्याय १८ • श्लोक ६१

निवृत्तिरपि मूढस्य प्रवृत्ति रुपजायते ।
प्रवृत्तिरपि धीरस्य निवृत्तिफलभागिनी ॥ १८-६१॥

सरल हिंदी भावार्थ: अज्ञानी की बाहरी निवृत्ति भी मानसिक प्रवृत्ति बन सकती है। धीर व्यक्ति की प्रवृत्ति भी अनासक्ति के कारण निवृत्ति का फल देती है।

अध्याय १८ • श्लोक ६२

परिग्रहेषु वैराग्यं प्रायो मूढस्य दृश्यते ।
देहे विगलिताशस्य क्व रागः क्व विरागता ॥ १८-६२॥

सरल हिंदी भावार्थ: अविवेकी में वस्तुओं के प्रति बाहरी विरक्ति दिख सकती है। जिसकी देह में भी आशा-आसक्ति गल गई, उसके लिए राग और विराग का द्वंद्व कहाँ है?

अध्याय १८ • श्लोक ६३

भावनाभावनासक्ता दृष्टिर्मूढस्य सर्वदा ।
भाव्यभावनया सा तु स्वस्थस्यादृष्टिरूपिणी ॥ १८-६३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अविवेकी की दृष्टि सदा कुछ मानने या न मानने में लगी रहती है। आत्मस्थित व्यक्ति किसी कल्पित विषय को आत्मसत्य मानकर नहीं पकड़ता।

अध्याय १८ • श्लोक ६४

सर्वारम्भेषु निष्कामो यश्चरेद् बालवन् मुनिः ।
न लेपस्तस्य शुद्धस्य क्रियमाणेऽपि कर्मणि ॥ १८-६४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो मुनि सभी कार्यों में निष्काम होकर बालक की तरह निष्कपट चलता है, उस निर्मल पुरुष को कर्म करते हुए भी बंधन नहीं लगता।

अध्याय १८ • श्लोक ६५

स एव धन्य आत्मज्ञः सर्वभावेषु यः समः ।
पश्यन् श‍ृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्न् अश्नन्निस्तर्षमानसः ॥ १८-६५॥

सरल हिंदी भावार्थ: धन्य आत्मज्ञानी वही है जो सब परिस्थितियों में समान रहता है और देखते, सुनते, छूते, सूँघते तथा खाते हुए तृष्णारहित है।

अध्याय १८ • श्लोक ६६

क्व संसारः क्व चाभासः क्व साध्यं क्व च साधनम् ।
आकाशस्येव धीरस्य निर्विकल्पस्य सर्वदा ॥ १८-६६॥

सरल हिंदी भावार्थ: आकाश के समान निर्विकल्प धीर पुरुष के लिए संसार, उसका आभास, कोई साध्य और कोई साधन—इनका अलग बंधन कहाँ है?

अध्याय १८ • श्लोक ६७

स जयत्यर्थसंन्यासी पूर्णस्वरसविग्रहः ।
अकृत्रिमोऽनवच्छिन्ने समाधिर्यस्य वर्तते ॥ १८-६७॥

सरल हिंदी भावार्थ: विषयासक्ति छोड़कर अपने पूर्ण आत्मरस में स्थित वही धन्य है जिसकी अखंड आत्मस्थिति बनावटी नहीं है।

अध्याय १८ • श्लोक ६८

बहुनात्र किमुक्तेन ज्ञाततत्त्वो महाशयः ।
भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी सदा सर्वत्र नीरसः ॥ १८-६८॥

सरल हिंदी भावार्थ: अधिक क्या कहा जाए! तत्त्वज्ञानी महात्मा भोग और मोक्ष दोनों की लालसा से रहित होकर सदा सबमें अनासक्त रहता है।

अध्याय १८ • श्लोक ६९

महदादि जगद्द्वैतं नाममात्रविजृम्भितम् ।
विहाय शुद्धबोधस्य किं कृत्यमवशिष्यते ॥ १८-६९॥

सरल हिंदी भावार्थ: महत् आदि तत्त्वों से बने जगत के द्वैत को नामों का विस्तार जानकर छोड़ देने पर शुद्ध बोधस्वरूप के लिए क्या अपूर्ण कार्य शेष है?

अध्याय १८ • श्लोक ७०

भ्रमभूतमिदं सर्वं किञ्चिन्नास्तीति निश्चयी ।
अलक्ष्यस्फुरणः शुद्धः स्वभावेनैव शाम्यति ॥ १८-७०॥

सरल हिंदी भावार्थ: सब भेद भ्रममात्र हैं, उनकी अलग स्वतंत्र सत्ता नहीं—यह निश्चित जानकर निर्मल चेतनस्वरूप व्यक्ति सहज शांत हो जाता है।

अध्याय १८ • श्लोक ७१

शुद्धस्फुरणरूपस्य दृश्यभावमपश्यतः ।
क्व विधिः क्व च वैराग्यं क्व त्यागः क्व शमोऽपि वा ॥ १८-७१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिसका स्वरूप शुद्ध चेतन प्रकाश है और जो दृश्य जगत को अलग आत्मसत्ता नहीं देता, उसके लिए विधि, वैराग्य, त्याग और शांति की साध्यरूप धारणाएँ कहाँ हैं?

अध्याय १८ • श्लोक ७२

स्फुरतोऽनन्तरूपेण प्रकृतिं च न पश्यतः ।
क्व बन्धः क्व च वा मोक्षः क्व हर्षः क्व विषादिता ॥ १८-७२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो अनंत चेतनस्वरूप में प्रकाशित है और प्रकृति को अपने से अलग स्वतंत्र सत्य नहीं देखता, उसके लिए बंधन-मोक्ष और हर्ष-विषाद कहाँ हैं?

अध्याय १८ • श्लोक ७३

बुद्धिपर्यन्तसंसारे मायामात्रं विवर्तते ।
निर्ममो निरहङ्कारो निष्कामः शोभते बुधः ॥ १८-७३॥

सरल हिंदी भावार्थ: बुद्धि तक फैला संसार माया का परिवर्तनशील आभास है। इसे जानकर ज्ञानी ममता, अहंकार और कामना से मुक्त होकर शोभता है।

अध्याय १८ • श्लोक ७४

अक्षयं गतसन्तापमात्मानं पश्यतो मुनेः ।
क्व विद्या च क्व वा विश्वं क्व देहोऽहं ममेति वा ॥ १८-७४॥

सरल हिंदी भावार्थ: अविनाशी और संपूर्ण संताप से परे आत्मा को जानने वाले मुनि के लिए विद्या, विश्व, देह, “मैं” और “मेरा”—इनका अलग आग्रह कहाँ है?

अध्याय १८ • श्लोक ७५

निरोधादीनि कर्माणि जहाति जडधीर्यदि ।
मनोरथान् प्रलापांश्च कर्तुमाप्नोत्यतत्क्षणात् ॥ १८-७५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अविवेकी केवल निरोध आदि क्रियाएँ छोड़ दे, तो तुरंत कल्पनाएँ और व्यर्थ बातें करने लग सकता है। बाहरी त्याग मात्र आत्मबोध नहीं है।

अध्याय १८ • श्लोक ७६

मन्दः श्रुत्वापि तद्वस्तु न जहाति विमूढताम् ।
निर्विकल्पो बहिर्यत्नादन्तर्विषयलालसः ॥ १८-७६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मंदबुद्धि तत्त्व सुनकर भी मोह नहीं छोड़ता; प्रयास से बाहर शांत दिखाई देता है, पर भीतर विषयों की लालसा रहती है।

अध्याय १८ • श्लोक ७७

ज्ञानाद् गलितकर्मा यो लोकदृष्ट्यापि कर्मकृत् ।
नाप्नोत्यवसरं कर्तुं वक्तुमेव न किञ्चन ॥ १८-७७॥

सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञान से जिसका कर्माभिमान गल गया है, वह लोकदृष्टि में कर्म करता दिखे भी, तो अपने लिए कुछ करने या कहने का अहंकारी दावा नहीं करता।

अध्याय १८ • श्लोक ७८

क्व तमः क्व प्रकाशो वा हानं क्व च न किञ्चन ।
निर्विकारस्य धीरस्य निरातङ्कस्य सर्वदा ॥ १८-७८॥

सरल हिंदी भावार्थ: सदा निर्विकार और निर्भय धीर पुरुष के लिए अंधकार-प्रकाश तथा ग्रहण-त्याग के बंधनकारी भेद कहाँ हैं?

अध्याय १८ • श्लोक ७९

क्व धैर्यं क्व विवेकित्वं क्व निरातङ्कतापि वा ।
अनिर्वाच्यस्वभावस्य निःस्वभावस्य योगिनः ॥ १८-७९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिस योगी का स्वरूप कथन से परे और सीमित गुणों से रहित है, उसे धैर्य, विवेक या निर्भयता के किसी दावे में कैसे सीमित किया जाए?

अध्याय १८ • श्लोक ८०

न स्वर्गो नैव नरको जीवन्मुक्तिर्न चैव हि ।
बहुनात्र किमुक्तेन योगदृष्ट्या न किञ्चन ॥ १८-८०॥

सरल हिंदी भावार्थ: परम योगदृष्टि में स्वर्ग, नरक और जीवनमुक्ति के भी अलग विभाजन नहीं हैं। अधिक क्या कहा जाए—आत्मा से अलग कुछ नहीं।

अध्याय १८ • श्लोक ८१

नैव प्रार्थयते लाभं नालाभेनानुशोचति ।
धीरस्य शीतलं चित्तममृतेनैव पूरितम् ॥ १८-८१॥

सरल हिंदी भावार्थ: धीर पुरुष न लाभ की याचना में बँधता है, न अलाभ पर शोक करता है। उसका शीतल चित्त मानो अमृत से भरा रहता है।

अध्याय १८ • श्लोक ८२

न शान्तं स्तौति निष्कामो न दुष्टमपि निन्दति ।
समदुःखसुखस्तृप्तः किञ्चित् कृत्यं न पश्यति ॥ १८-८२॥

सरल हिंदी भावार्थ: निष्काम व्यक्ति न शांत व्यक्ति की चापलूसी में बँधता है, न दुष्ट की निंदा में। सुख-दुःख में समान और तृप्त होकर अपने लिए कुछ पाना शेष नहीं देखता।

अध्याय १८ • श्लोक ८३

धीरो न द्वेष्टि संसारमात्मानं न दिदृक्षति ।
हर्षामर्षविनिर्मुक्तो न मृतो न च जीवति ॥ १८-८३॥

सरल हिंदी भावार्थ: धीर व्यक्ति न संसार से द्वेष करता है, न आत्मा को किसी अलग वस्तु की तरह देखना चाहता है। हर्ष-रोष से मुक्त होकर जीवन-मृत्यु की सीमित पहचान से परे रहता है।

अध्याय १८ • श्लोक ८४

निःस्नेहः पुत्रदारादौ निष्कामो विषयेषु च ।
निश्चिन्तः स्वशरीरेऽपि निराशः शोभते बुधः ॥ १८-८४॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुत्र और जीवनसाथी में स्वामित्व की आसक्ति, विषयों में कामना और अपने शरीर की अहंकारपूर्ण चिंता से रहित ज्ञानी अपेक्षामुक्त होकर शोभता है।

अध्याय १८ • श्लोक ८५

तुष्टिः सर्वत्र धीरस्य यथापतितवर्तिनः ।
स्वच्छन्दं चरतो देशान् यत्रस्तमितशायिनः ॥ १८-८५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो प्राप्त परिस्थिति में सहज रहता है, स्वतंत्र भाव से स्थानों में विचरता है और जहाँ संध्या हो वहीं विश्राम करता है, वह धीर सर्वत्र संतुष्ट रहता है।

अध्याय १८ • श्लोक ८६

पततूदेतु वा देहो नास्य चिन्ता महात्मनः ।
स्वभावभूमिविश्रान्तिविस्मृताशेषसंसृतेः ॥ १८-८६॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने सहज स्वरूप में विश्राम पाकर जिसने संसार की पकड़ भुला दी है, उस महात्मा को शरीर के उठने या गिरने की आसक्तिपूर्ण चिंता नहीं होती।

अध्याय १८ • श्लोक ८७

अकिञ्चनः कामचारो निर्द्वन्द्वश्छिन्नसंशयः ।
असक्तः सर्वभावेषु केवलो रमते बुधः ॥ १८-८७॥

सरल हिंदी भावार्थ: कुछ अपना न मानने वाला, द्वंद्व और संशय से मुक्त, सभी अवस्थाओं में अनासक्त ज्ञानी अपने एक आत्मस्वरूप में आनंदित रहता है।

अध्याय १८ • श्लोक ८८

निर्ममः शोभते धीरः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
सुभिन्नहृदयग्रन्थिर्विनिर्धूतरजस्तमः ॥ १८-८८॥

सरल हिंदी भावार्थ: ममत्वरहित धीर पुरुष मिट्टी, पत्थर और सोने को समदृष्टि से देखता है। उसकी हृदयग्रंथि टूट गई है और रजस-तमस का प्रभाव मिट गया है।

अध्याय १८ • श्लोक ८९

सर्वत्रानवधानस्य न किञ्चिद् वासना हृदि ।
मुक्तात्मनो वितृप्तस्य तुलना केन जायते ॥ १८-८९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिसका मन विषयों में अटका नहीं, हृदय में कोई वासना नहीं और जो मुक्त तथा पूर्णतृप्त है, उसकी तुलना किससे की जाए?

अध्याय १८ • श्लोक ९०

जानन्नपि न जानाति पश्यन्नपि न पश्यति ।
ब्रुवन्न् अपि न च ब्रूते कोऽन्यो निर्वासनादृते ॥ १८-९०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वासनारहित व्यक्ति ही जानता, देखता और बोलता हुआ भी इन क्रियाओं का अहंकारी कर्ता नहीं बनता।

अध्याय १८ • श्लोक ९१

भिक्षुर्वा भूपतिर्वापि यो निष्कामः स शोभते ।
भावेषु गलिता यस्य शोभनाशोभना मतिः ॥ १८-९१॥

सरल हिंदी भावार्थ: भिक्षुक हो या राजा, निष्काम व्यक्ति ही शोभता है; क्योंकि वस्तुओं को सुंदर या असुंदर मानकर चिपकने वाली उसकी बुद्धि शांत हो गई है।

अध्याय १८ • श्लोक ९२

क्व स्वाच्छन्द्यं क्व सङ्कोचः क्व वा तत्त्वविनिश्चयः ।
निर्व्याजार्जवभूतस्य चरितार्थस्य योगिनः ॥ १८-९२॥

सरल हिंदी भावार्थ: निष्कपट सरलता में स्थित और कृतार्थ योगी के लिए स्वतंत्रता का प्रदर्शन, संकोच और तत्त्वज्ञान का दावा—इनका प्रश्न कहाँ रहता है?

अध्याय १८ • श्लोक ९३

आत्मविश्रान्तितृप्तेन निराशेन गतार्तिना ।
अन्तर्यदनुभूयेत तत् कथं कस्य कथ्यते ॥ १८-९३॥

सरल हिंदी भावार्थ: आत्मविश्राम से तृप्त, अपेक्षारहित और पीड़ारहित पुरुष के भीतर जो अनुभव होता है, उसे किससे और कैसे शब्दों में कहा जाए?

अध्याय १८ • श्लोक ९४

सुप्तोऽपि न सुषुप्तौ च स्वप्नेऽपि शयितो न च ।
जागरेऽपि न जागर्ति धीरस्तृप्तः पदे पदे ॥ १८-९४॥

सरल हिंदी भावार्थ: धीर पुरुष सोते, स्वप्न देखते या जागते हुए भी आत्मा को इन अवस्थाओं में सीमित नहीं मानता; हर स्थिति में तृप्त रहता है।

अध्याय १८ • श्लोक ९५

ज्ञः सचिन्तोऽपि निश्चिन्तः सेन्द्रियोऽपि निरिन्द्रियः ।
सुबुद्धिरपि निर्बुद्धिः साहङ्कारोऽनहङ्कृतिः ॥ १८-९५॥

सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानी चिंतन के बीच भी निश्चिंत, इंद्रियों के बीच भी अनासक्त और बुद्धि के व्यवहार में भी उसके अभिमान से रहित होता है। “मैं” का व्यवहार करता है, पर अहंकार नहीं पकड़ता।

अध्याय १८ • श्लोक ९६

न सुखी न च वा दुःखी न विरक्तो न सङ्गवान् ।
न मुमुक्षुर्न वा मुक्ता न किञ्चिन्न च किञ्चन ॥ १८-९६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसकी आत्मस्थिति सुख-दुःख, राग-विराग और मुक्ति चाहने या मुक्त होने की सीमित पहचानों से परे है; उसे किसी एक धारणा में बाँधा नहीं जा सकता।

अध्याय १८ • श्लोक ९७

विक्षेपेऽपि न विक्षिप्तः समाधौ न समाधिमान् ।
जाड्येऽपि न जडो धन्यः पाण्डित्येऽपि न पण्डितः ॥ १८-९७॥

सरल हिंदी भावार्थ: धन्य पुरुष विक्षेप के बीच भी आत्मतः अविक्षिप्त है, समाधि में उसका अहंकार नहीं, जड़ता में आत्मा जड़ नहीं और पांडित्य में उसे विद्वत्ता का गर्व नहीं।

अध्याय १८ • श्लोक ९८

मुक्तो यथास्थितिस्वस्थः कृतकर्तव्यनिर्वृतः ।
समः सर्वत्र वैतृष्ण्यान्न स्मरत्यकृतं कृतम् ॥ १८-९८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुक्त पुरुष प्राप्त स्थिति में स्वस्थ, अपने कर्तव्य का अहंकारी बोझ छोड़कर तृप्त और तृष्णारहित होने से सर्वत्र सम रहता है; किए-अनकिए काम उसे नहीं सताते।

अध्याय १८ • श्लोक ९९

न प्रीयते वन्द्यमानो निन्द्यमानो न कुप्यति ।
नैवोद्विजति मरणे जीवने नाभिनन्दति ॥ १८-९९॥

सरल हिंदी भावार्थ: वंदना से वह अहंकार में प्रसन्न नहीं होता, निंदा से क्रुद्ध नहीं होता। मृत्यु से व्याकुल नहीं और जीवन को पकड़कर विशेष उल्लास भी नहीं करता।

अध्याय १८ • श्लोक १००

न धावति जनाकीर्णं नारण्यमुपशान्तधीः ।
यथातथा यत्रतत्र सम एवावतिष्ठते ॥ १८-१००॥

सरल हिंदी भावार्थ: शांत बुद्धि वाला न जनसमूह के पीछे दौड़ता है, न वन की अनिवार्यता पकड़ता है। जैसी परिस्थिति और जैसा स्थान हो, वह समान आत्मस्थिति में रहता है।

भक्ति भावना • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

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