अष्टावक्र गीता अध्याय 17: जीवनमुक्त का स्वरूप — 20 श्लोक हिंदी अर्थ सहित
अष्टावक्र गीता
अध्याय १७ • जीवनमुक्त का स्वरूप
अष्टावक्र गीता के इस अध्याय का मुख्य विषय है—जीवनमुक्त का स्वरूप। यहाँ अष्टावक्र और जनक के संवाद में आत्मतत्त्व का विवेचन मिलता है। नीचे सभी २० मूल श्लोक क्रम से सरल हिंदी भावार्थ के साथ दिए गए हैं।
अध्याय १७ • श्लोक १
अष्टावक्र उवाच ॥
तृप्तः स्वच्छेन्द्रियो नित्यमेकाकी रमते तु यः ॥ १७-१॥
सरल हिंदी भावार्थ: अष्टावक्र कहते हैं—ज्ञान और योगाभ्यास का फल उसी ने पाया है जो सदा तृप्त, निर्मल इंद्रियों वाला और अपने आत्मस्वरूप में अकेला रमण करता है।
अध्याय १७ • श्लोक २
यत एकेन तेनेदं पूर्णं ब्रह्माण्डमण्डलम् ॥ १७-२॥
सरल हिंदी भावार्थ: तत्त्वज्ञानी इस जगत में भीतर से खिन्न नहीं होता, क्योंकि वह इस पूरे ब्रह्मांड को एक आत्मतत्त्व से पूर्ण जानता है।
अध्याय १७ • श्लोक ३
सल्लकीपल्लवप्रीतमिवेभं निम्बपल्लवाः ॥ १७-३॥
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे सल्लकी के कोमल पत्तों से तृप्त हाथी को नीम के पत्ते नहीं लुभाते, वैसे ही आत्मानंद में रमने वाले को विषय विशेष हर्ष नहीं देते।
अध्याय १७ • श्लोक ४
अभुक्तेषु निराकाङ्क्षी तादृशो भवदुर्लभः ॥ १७-४॥
सरल हिंदी भावार्थ: जो भोगे हुए विषयों का संस्कार पकड़कर नहीं बैठता और न भोगे विषयों की इच्छा नहीं करता, ऐसा व्यक्ति संसार में दुर्लभ है।
अध्याय १७ • श्लोक ५
भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी विरलो हि महाशयः ॥ १७-५॥
सरल हिंदी भावार्थ: संसार में भोग चाहने वाले और मुक्ति चाहने वाले मिलते हैं; भोग और मोक्ष दोनों की आकांक्षा से परे महात्मा विरला है।
अध्याय १७ • श्लोक ६
कस्याप्युदारचित्तस्य हेयोपादेयता न हि ॥ १७-६॥
सरल हिंदी भावार्थ: किसी उदारचित्त ज्ञानी के लिए धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, जीवन और मृत्यु को निजी आग्रह से ग्रहण या त्याग करने का प्रश्न नहीं रहता।
अध्याय १७ • श्लोक ७
यथा जीविकया तस्माद् धन्य आस्ते यथा सुखम् ॥ १७-७॥
सरल हिंदी भावार्थ: उसे न विश्व के नाश की इच्छा होती है, न उसके बने रहने से द्वेष। इसलिए जो जीवनयापन प्राप्त होता है उसमें वह धन्य होकर सुख से रहता है।
अध्याय १७ • श्लोक ८
पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्न्
अश्नन्नास्ते यथा सुखम् ॥ १७-८॥
सरल हिंदी भावार्थ: “इस ज्ञान से मैं कृतार्थ हूँ”—ऐसा अभिमान भी जिसका गल गया है, वह देखते, सुनते, छूते, सूँघते और खाते हुए सहज सुख में रहता है।
अध्याय १७ • श्लोक ९
न स्पृहा न विरक्तिर्वा क्षीणसंसारसागरे ॥ १७-९॥
सरल हिंदी भावार्थ: जिसके लिए संसारबंध का सागर शांत हो गया, उसकी दृष्टि आग्रहशून्य, चेष्टा प्रयोजनरहित और इंद्रियाँ विषयलोभ से मुक्त हैं। उसमें न लालसा है, न द्वेषपूर्ण विरक्ति।
अध्याय १७ • श्लोक १०
अहो परदशा क्वापि वर्तते मुक्तचेतसः ॥ १७-१०॥
सरल हिंदी भावार्थ: मुक्तचित्त व्यक्ति की अद्भुत परम अवस्था जागने, सोने और आँखें खोलने-बंद करने जैसी शारीरिक अवस्थाओं में सीमित नहीं होती।
अध्याय १७ • श्लोक ११
समस्तवासना मुक्तो मुक्तः सर्वत्र राजते ॥ १७-११॥
सरल हिंदी भावार्थ: वह हर स्थिति में आत्मस्थित और निर्मल अंतःकरण वाला दिखाई देता है। समस्त वासनाओं से मुक्त पुरुष सर्वत्र शोभा पाता है।
अध्याय १७ • श्लोक १२
गृह्णन् वदन् व्रजन् ।
ईहितानीहितैर्मुक्तो मुक्त एव महाशयः ॥ १७-१२॥
सरल हिंदी भावार्थ: देखते, सुनते, छूते, सूँघते, खाते, लेते, बोलते और चलते हुए भी इच्छा-अनिच्छा के आग्रह से रहित महात्मा मुक्त ही है।
अध्याय १७ • श्लोक १३
न ददाति न गृह्णाति मुक्तः सर्वत्र नीरसः ॥ १७-१३॥
सरल हिंदी भावार्थ: मुक्त पुरुष न आग्रह से निंदा करता है, न स्तुति; न हर्ष में बहता है, न क्रोध में। देने और लेने में भी निजी आसक्ति नहीं रखता।
अध्याय १७ • श्लोक १४
अविह्वलमनाः स्वस्थो मुक्त एव महाशयः ॥ १७-१४॥
सरल हिंदी भावार्थ: प्रेम से आकर्षित करने वाली स्त्री सामने हो या मृत्यु आ पहुँचे, जिसका मन व्याकुल न हो और जो आत्मस्थित रहे, वही मुक्त महात्मा है।
अध्याय १७ • श्लोक १५
विशेषो नैव धीरस्य सर्वत्र समदर्शिनः ॥ १७-१५॥
सरल हिंदी भावार्थ: सर्वत्र समदर्शी धीर व्यक्ति के आंतरिक बोध में सुख-दुःख, स्त्री-पुरुष और संपत्ति-विपत्ति के कारण भेदभाव नहीं होता।
अध्याय १७ • श्लोक १६
नाश्चर्यं नैव च क्षोभः क्षीणसंसरणे नरे ॥ १७-१६॥
सरल हिंदी भावार्थ: जिसका संसारबंध क्षीण हो गया, उसमें हिंसा, करुणा का अहंकार, उद्दंडता, हीनता, विस्मय या क्षोभ के मानसिक आवेग नहीं रहते। यहाँ आत्मस्थिति का वर्णन है, करुणापूर्ण व्यवहार का निषेध नहीं।
अध्याय १७ • श्लोक १७
असंसक्तमना नित्यं प्राप्ताप्राप्तमुपाश्नुते ॥ १७-१७॥
सरल हिंदी भावार्थ: मुक्त व्यक्ति न विषयों से द्वेष करता है, न उन्हें पाने को ललचाता है। आसक्तिरहित मन से प्राप्ति और अप्राप्ति दोनों को स्वीकार करता है।
अध्याय १७ • श्लोक १८
शून्यचित्तो न जानाति कैवल्यमिव संस्थितः ॥ १७-१८॥
सरल हिंदी भावार्थ: विकल्परहित चित्त वाला आत्मस्थिति में ऐसा रहता है कि समाधान-असमाधान और हित-अहित की कल्पनाएँ उसे बाँधती नहीं हैं।
अध्याय १७ • श्लोक १९
अन्तर्गलितसर्वाशः कुर्वन्नपि करोति न ॥ १७-१९॥
सरल हिंदी भावार्थ: जो ममत्व और अहंकार से मुक्त है, जगत की स्वतंत्र सत्ता का आग्रह छोड़ चुका है और जिसकी अपेक्षाएँ गल गई हैं, वह कर्म करते हुए भी कर्ताभाव से कर्म नहीं करता।
अध्याय १७ • श्लोक २०
दशां कामपि सम्प्राप्तो भवेद् गलितमानसः ॥ १७-२०॥
सरल हिंदी भावार्थ: जिसके मन का आग्रह गल गया है, वह मानसिक उत्तेजना, मोह, स्वप्न और जड़ता से परे ऐसी आत्मस्थिति पाता है जिसे साधारण मनोवृत्तियों से नहीं मापा जा सकता।
॥ अष्टावक्र गीता — अध्याय १७ सम्पूर्ण ॥
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