अष्टावक्र गीता अध्याय 16: आसक्ति से परे विश्राम — 11 श्लोक हिंदी अर्थ सहित
अष्टावक्र गीता
अध्याय १६ • आसक्ति से परे विश्राम
अष्टावक्र गीता के इस अध्याय का मुख्य विषय है—आसक्ति से परे विश्राम। यहाँ अष्टावक्र और जनक के संवाद में आत्मतत्त्व का विवेचन मिलता है। नीचे सभी ११ मूल श्लोक क्रम से सरल हिंदी भावार्थ के साथ दिए गए हैं।
अध्याय १६ • श्लोक १
अष्टावक्र उवाच ॥
तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणाद् ऋते ॥ १६-१॥
सरल हिंदी भावार्थ: अष्टावक्र कहते हैं—वत्स! अनेक शास्त्र बार-बार कहो या सुनो, फिर भी संचित धारणाओं का आग्रह छूटे बिना आत्मविश्राम नहीं मिलता।
अध्याय १६ • श्लोक २
चित्तं निरस्तसर्वाशमत्यर्थं रोचयिष्यति ॥ १६-२॥
सरल हिंदी भावार्थ: हे विवेकी! भोग, कर्म या समाधि कुछ भी करो; अंततः सभी अपेक्षाओं से मुक्त चित्त ही तुम्हें सच्चा संतोष देगा।
अध्याय १६ • श्लोक ३
अनेनैवोपदेशेन धन्यः प्राप्नोति निर्वृतिम् ॥ १६-३॥
सरल हिंदी भावार्थ: सब लोग आंतरिक खींचतान से दुःखी हैं, पर इसे बहुत कम जानते हैं। इस उपदेश को समझकर कोई धन्य व्यक्ति शांति पाता है।
अध्याय १६ • श्लोक ४
तस्यालस्य धुरीणस्य सुखं नान्यस्य कस्यचित् ॥ १६-४॥
सरल हिंदी भावार्थ: जिसे पलक खोलने-बंद करने जितनी चेष्टा का आग्रह भी अनावश्यक लगता है, उस परम विश्रांत व्यक्ति का सुख अन्यत्र दुर्लभ है। यहाँ सहज विश्राम की चरम स्थिति कही गई है।
अध्याय १६ • श्लोक ५
धर्मार्थकाममोक्षेषु निरपेक्षं तदा भवेत् ॥ १६-५॥
सरल हिंदी भावार्थ: जब मन “यह किया, यह नहीं किया”—इन द्वंद्वों से मुक्त होता है, तब धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में भी निजी प्राप्ति की अपेक्षा नहीं रहती।
अध्याय १६ • श्लोक ६
ग्रहमोक्षविहीनस्तु न विरक्तो न रागवान् ॥ १६-६॥
सरल हिंदी भावार्थ: विषयों से द्वेष करने वाला विरक्त कहलाता है और उन्हें पाने को ललचाने वाला रागी। ग्रहण-त्याग के आग्रह से रहित व्यक्ति इन दोनों से परे है।
अध्याय १६ • श्लोक ७
स्पृहा जीवति यावद् वै निर्विचारदशास्पदम् ॥ १६-७॥
सरल हिंदी भावार्थ: जब तक तृष्णा जीवित है, तब तक “यह छोड़ना है, यह लेना है”—यह भाव संसाररूपी वृक्ष का अंकुर बना रहता है और अविवेक को टिकाता है।
अध्याय १६ • श्लोक ८
निर्द्वन्द्वो बालवद् धीमान् एवमेव व्यवस्थितः ॥ १६-८॥
सरल हिंदी भावार्थ: प्रवृत्ति में आसक्ति और निवृत्ति में विषयों से द्वेष पैदा हो सकता है। धीर विवेकी दोनों द्वंद्वों से मुक्त होकर बालक जैसा सहज रहता है।
अध्याय १६ • श्लोक ९
वीतरागो हि निर्दुःखस्तस्मिन्नपि न खिद्यति ॥ १६-९॥
सरल हिंदी भावार्थ: आसक्त व्यक्ति दुःख से बचने के लिए संसार छोड़ना चाहता है। वीतराग व्यक्ति आंतरिक दुःख से मुक्त है, इसलिए संसार में रहते हुए भी खिन्न नहीं होता।
अध्याय १६ • श्लोक १०
न च ज्ञानी न वा योगी केवलं दुःखभागसौ ॥ १६-१०॥
सरल हिंदी भावार्थ: जिसे अपनी मुक्ति का भी अहंकार है और शरीर में ममता बनी है, वह न आत्मज्ञानी है, न सिद्ध योगी; वह अभी दुःख का भागी है।
अध्याय १६ • श्लोक ११
तथापि न तव स्वाथ्यं सर्वविस्मरणादृते ॥ १६-११॥
सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारे उपदेशक शिव, विष्णु या ब्रह्मा स्वयं हों, फिर भी अपने मन की संचित पकड़ छोड़े बिना आत्मविश्राम नहीं मिलेगा।
॥ अष्टावक्र गीता — अध्याय १६ सम्पूर्ण ॥
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
🙏 जय श्री राम 🙏
अपनी श्रद्धा, सुझाव या प्रतिक्रिया कमेंट में अवश्य लिखें।
कृपया भाषा शालीन और सम्मानजनक रखें।
🚩 भक्ति भावना परिवार से जुड़े रहने के लिए धन्यवाद।