अष्टावक्र गीता अध्याय 15: शुद्ध चेतना का बोध — 20 श्लोक हिंदी अर्थ सहित

भक्ति भावना • अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

अध्याय १५ • शुद्ध चेतना का बोध

सम्पूर्ण २० श्लोक • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

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अष्टावक्र गीता के इस अध्याय का मुख्य विषय है—शुद्ध चेतना का बोध। यहाँ अष्टावक्र और जनक के संवाद में आत्मतत्त्व का विवेचन मिलता है। नीचे सभी २० मूल श्लोक क्रम से सरल हिंदी भावार्थ के साथ दिए गए हैं।

पाठ का संदर्भ: यह अद्वैत दर्शन का आत्मस्वरूप संबंधी संवाद है। अकर्तापन और बंधन से परे होने के कथन शुद्ध आत्मा की दृष्टि से हैं; व्यवहार में कर्तव्य, सदाचार और करुणा का महत्त्व बना रहता है। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना द्वारा सरल भाषा में प्रस्तुत है। अध्याय का विषय-शीर्षक पाठ की सुविधा के लिए दिया गया है।

अध्याय १५ • श्लोक १

अष्टावक्र उवाच ॥

यथातथोपदेशेन कृतार्थः सत्त्वबुद्धिमान् ।
आजीवमपि जिज्ञासुः परस्तत्र विमुह्यति ॥ १५-१॥

सरल हिंदी भावार्थ: अष्टावक्र कहते हैं—निर्मल बुद्धि वाला थोड़े-से उपदेश से भी कृतार्थ हो जाता है; अशुद्ध बुद्धि वाला जीवन भर पूछते हुए भी भ्रम में रह सकता है।

अध्याय १५ • श्लोक २

मोक्षो विषयवैरस्यं बन्धो वैषयिको रसः ।
एतावदेव विज्ञानं यथेच्छसि तथा कुरु ॥ १५-२॥

सरल हिंदी भावार्थ: विषयों की आसक्ति से मुक्त होना मोक्ष है और उनमें रस के कारण बँधना बंधन है। बोध का सार इतना ही है; इसे समझकर विवेक से चलो।

अध्याय १५ • श्लोक ३

वाग्मिप्राज्ञामहोद्योगं जनं मूकजडालसम् ।
करोति तत्त्वबोधोऽयमतस्त्यक्तो बुभुक्षभिः ॥ १५-३॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह तत्त्वबोध बहुत बोलने वाले, बुद्धि का प्रदर्शन करने वाले और अत्यधिक उद्यमशील व्यक्ति को भी बाहर से मौन, सरल और निष्प्रयोजन चेष्टाओं से रहित बना देता है; इसलिए भोग चाहने वाले इसे छोड़ देते हैं।

अध्याय १५ • श्लोक ४

न त्वं देहो न ते देहो भोक्ता कर्ता न वा भवान् ।
चिद्रूपोऽसि सदा साक्षी निरपेक्षः सुखं चर ॥ १५-४॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम देह नहीं हो, देह तुम्हारा स्वरूप नहीं है। तुम कर्ता या भोक्ता नहीं, सदा साक्षी चेतना हो। अपेक्षारहित होकर सुख से रहो।

अध्याय १५ • श्लोक ५

रागद्वेषौ मनोधर्मौ न मनस्ते कदाचन ।
निर्विकल्पोऽसि बोधात्मा निर्विकारः सुखं चर ॥ १५-५॥

सरल हिंदी भावार्थ: राग और द्वेष मन के धर्म हैं; मन तुम्हारा शुद्ध स्वरूप नहीं है। तुम निर्विकल्प, बोधस्वरूप और निर्विकार हो; सुख से रहो।

अध्याय १५ • श्लोक ६

सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।
विज्ञाय निरहङ्कारो निर्ममस्त्वं सुखी भव ॥ १५-६॥

सरल हिंदी भावार्थ: सभी प्राणियों में आत्मा और आत्मा में सभी प्राणियों को जानकर अहंकार तथा ममत्व से मुक्त और सुखी हो जाओ।

अध्याय १५ • श्लोक ७

विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरङ्गा इव सागरे ।
तत्त्वमेव न सन्देहश्चिन्मूर्ते विज्वरो भव ॥ १५-७॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे चेतनस्वरूप! जिसमें यह विश्व समुद्र में तरंगों की तरह प्रकट होता है, वही तुम हो—इसमें संदेह नहीं। मानसिक ताप छोड़ो।

अध्याय १५ • श्लोक ८

श्रद्धस्व तात श्रद्धस्व नात्र मोहं कुरुष्व भोः ।
ज्ञानस्वरूपो भगवानात्मा त्वं प्रकृतेः परः ॥ १५-८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वत्स! विश्वास रखो, विश्वास रखो; इसमें भ्रम मत करो। तुम ज्ञानस्वरूप, दिव्य आत्मा और प्रकृति से परे हो।

अध्याय १५ • श्लोक ९

गुणैः संवेष्टितो देहस्तिष्ठत्यायाति याति च ।
आत्मा न गन्ता नागन्ता किमेनमनुशोचसि ॥ १५-९॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रकृति के गुणों से घिरा शरीर रहता है, आता है और चला जाता है। आत्मा न आती है, न जाती है; फिर इसके लिए शोक क्यों करते हो?

अध्याय १५ • श्लोक १०

देहस्तिष्ठतु कल्पान्तं गच्छत्वद्यैव वा पुनः ।
क्व वृद्धिः क्व च वा हानिस्तव चिन्मात्ररूपिणः ॥ १५-१०॥

सरल हिंदी भावार्थ: शरीर कल्प के अंत तक रहे या आज ही चला जाए, केवल चेतन आत्मस्वरूप में न कोई वृद्धि है, न हानि।

अध्याय १५ • श्लोक ११

त्वय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्ववीचिः स्वभावतः ।
उदेतु वास्तमायातु न ते वृद्धिर्न वा क्षतिः ॥ १५-११॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम अनंत महासागर हो। तुममें विश्वरूपी लहर स्वभाव से उठे या मिटे, उससे न तुम्हारी वृद्धि होती है, न हानि।

अध्याय १५ • श्लोक १२

तात चिन्मात्ररूपोऽसि न ते भिन्नमिदं जगत् ।
अतः कस्य कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना ॥ १५-१२॥

सरल हिंदी भावार्थ: वत्स! तुम केवल चेतनस्वरूप हो और यह जगत तुमसे भिन्न नहीं है। तब कौन, कैसे और कहाँ किसी वस्तु को पकड़ने या छोड़ने की कल्पना करेगा?

अध्याय १५ • श्लोक १३

एकस्मिन्नव्यये शान्ते चिदाकाशेऽमले त्वयि ।
कुतो जन्म कुतो कर्म कुतोऽहङ्कार एव च ॥ १५-१३॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक, अविनाशी, शांत और निर्मल चिदाकाशस्वरूप तुममें जन्म, कर्म और अहंकार कहाँ हैं?

अध्याय १५ • श्लोक १४

यत्त्वं पश्यसि तत्रैकस्त्वमेव प्रतिभाससे ।
किं पृथक् भासते स्वर्णात् कटकाङ्गदनूपुरम् ॥ १५-१४॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम जो भी देखते हो, उसमें एक तुम्हारा आत्मस्वरूप ही प्रकट होता है। कंगन, बाजूबंद और पायल क्या सोने से अलग चमकते हैं?

अध्याय १५ • श्लोक १५

अयं सोऽहमयं नाहं विभागमिति सन्त्यज ।
सर्वमात्मेति निश्चित्य निःसङ्कल्पः सुखी भव ॥ १५-१५॥

सरल हिंदी भावार्थ: “यह मैं हूँ, यह मैं नहीं हूँ”—ऐसा विभाजन छोड़ो। सब आत्मस्वरूप है—यह निश्चित जानकर संकल्पों से रहित और सुखी रहो।

अध्याय १५ • श्लोक १६

तवैवाज्ञानतो विश्वं त्वमेकः परमार्थतः ।
त्वत्तोऽन्यो नास्ति संसारी नासंसारी च कश्चन ॥ १५-१६॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारे अज्ञान से ही जगत अलग दिखता है; परम सत्य में तुम एक हो। तुमसे अलग न कोई बँधा हुआ है और न कोई मुक्त।

अध्याय १५ • श्लोक १७

भ्रान्तिमात्रमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चयी ।
निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किञ्चिदिव शाम्यति ॥ १५-१७॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस विश्व की अलग सत्ता को भ्रममात्र जानने वाला वासनारहित और केवल चेतना के प्रकाश में स्थित होकर शांत हो जाता है।

अध्याय १५ • श्लोक १८

एक एव भवाम्भोधावासीदस्ति भविष्यति ।
न ते बन्धोऽस्ति मोक्षो वा कृतकृत्यः सुखं चर ॥ १५-१८॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस संसारसागर में एक आत्मतत्त्व ही था, है और रहेगा। आत्मस्वरूप में तुम्हारा न बंधन है, न मोक्ष; कृतार्थ होकर सुख से रहो।

अध्याय १५ • श्लोक १९

मा सङ्कल्पविकल्पाभ्यां चित्तं क्षोभय चिन्मय ।
उपशाम्य सुखं तिष्ठ स्वात्मन्यानन्दविग्रहे ॥ १५-१९॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे चेतनस्वरूप! संकल्प-विकल्प से चित्त को व्याकुल मत करो। शांत होकर अपने आनंदमय आत्मस्वरूप में सुख से स्थित रहो।

अध्याय १५ • श्लोक २०

त्यजैव ध्यानं सर्वत्र मा किञ्चिद् हृदि धारय ।
आत्मा त्वं मुक्त एवासि किं विमृश्य करिष्यसि ॥ १५-२०॥

सरल हिंदी भावार्थ: हर वस्तु को मन से पकड़कर ध्यान की विषयवस्तु बनाने का आग्रह भी छोड़ो। तुम मुक्त आत्मा ही हो; अपने स्वरूप को कल्पनाओं से क्या बनाओगे?

भक्ति भावना • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

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