अष्टावक्र गीता अध्याय 14: तृष्णारहित अवस्था — 4 श्लोक हिंदी अर्थ सहित

भक्ति भावना • अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

अध्याय १४ • तृष्णारहित अवस्था

सम्पूर्ण ४ श्लोक • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

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अष्टावक्र गीता के इस अध्याय का मुख्य विषय है—तृष्णारहित अवस्था। यहाँ जनक अपने आत्मानुभव का वर्णन करते हैं। नीचे सभी ४ मूल श्लोक क्रम से सरल हिंदी भावार्थ के साथ दिए गए हैं।

पाठ का संदर्भ: यह अद्वैत दर्शन का आत्मस्वरूप संबंधी संवाद है। अकर्तापन और बंधन से परे होने के कथन शुद्ध आत्मा की दृष्टि से हैं; व्यवहार में कर्तव्य, सदाचार और करुणा का महत्त्व बना रहता है। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना द्वारा सरल भाषा में प्रस्तुत है। अध्याय का विषय-शीर्षक पाठ की सुविधा के लिए दिया गया है।

अध्याय १४ • श्लोक १

जनक उवाच ॥

प्रकृत्या शून्यचित्तो यः प्रमादाद् भावभावनः ।
निद्रितो बोधित इव क्षीणसंस्मरणो हि सः ॥ १४-१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जनक कहते हैं—जिसका चित्त स्वभाव से संकल्परहित हो गया है, उसमें असावधानी से कोई विचार उठ भी जाए तो उसका संस्कार ऐसे मिट जाता है जैसे जागने पर स्वप्न का।

अध्याय १४ • श्लोक २

क्व धनानि क्व मित्राणि क्व मे विषयदस्यवः ।
क्व शास्त्रं क्व च विज्ञानं यदा मे गलिता स्पृहा ॥ १४-२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब मेरी तृष्णा गल गई, तब धन, मित्र, विषयों के आकर्षण, शास्त्र और विद्या—इनमें किसी को पकड़कर अपनी पूर्णता खोजने की आवश्यकता कहाँ रही?

अध्याय १४ • श्लोक ३

विज्ञाते साक्षिपुरुषे परमात्मनि चेश्वरे ।
नैराश्ये बन्धमोक्षे च न चिन्ता मुक्तये मम ॥ १४-३॥

सरल हिंदी भावार्थ: साक्षी पुरुष, परमात्मा और ईश्वर का बोध हो जाने पर, आकांक्षारहित स्थिति में मुझे बंधन-मोक्ष या मुक्ति पाने की चिंता नहीं रहती।

अध्याय १४ • श्लोक ४

अन्तर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः ।
भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्तादृशा एव जानते ॥ १४-४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिसके भीतर विकल्प नहीं और जो बाहर सहज व्यवहार करता है, उसकी लोकदृष्टि में विचित्र लगने वाली अवस्था को उसी प्रकार के अनुभवी जानते हैं।

भक्ति भावना • मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

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