अष्टावक्र गीता अध्याय 19: आत्ममहिमा में स्थिति — 8 श्लोक हिंदी अर्थ सहित
अष्टावक्र गीता
अध्याय १९ • आत्ममहिमा में स्थिति
अष्टावक्र गीता के इस अध्याय का मुख्य विषय है—आत्ममहिमा में स्थिति। यहाँ जनक अपने आत्मानुभव का वर्णन करते हैं। नीचे सभी ८ मूल श्लोक क्रम से सरल हिंदी भावार्थ के साथ दिए गए हैं।
अध्याय १९ • श्लोक १
जनक उवाच ॥
नानाविधपरामर्शशल्योद्धारः कृतो मया ॥ १९-१॥
सरल हिंदी भावार्थ: जनक कहते हैं—तत्त्वज्ञानरूपी चिमटी से मैंने हृदय के भीतर चुभे अनेक प्रकार के विचारों और मतों के काँटे निकाल दिए हैं।
अध्याय १९ • श्लोक २
क्व द्वैतं क्व च वाऽद्वैतं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ १९-२॥
सरल हिंदी भावार्थ: अपनी आत्ममहिमा में स्थित मेरे लिए धर्म, काम, अर्थ, विवेक तथा द्वैत-अद्वैत के वैचारिक विभाजन कहाँ रह गए हैं?
अध्याय १९ • श्लोक ३
क्व देशः क्व च वा नित्यं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ १९-३॥
सरल हिंदी भावार्थ: अपने स्वरूप में स्थित मेरे लिए भूत, भविष्य, वर्तमान, स्थान और काल के विभाजन कहाँ हैं?
अध्याय १९ • श्लोक ४
क्व चिन्ता क्व च वाचिन्ता स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ १९-४॥
सरल हिंदी भावार्थ: अपनी महिमा में स्थित मेरे लिए आत्म-अनात्म, शुभ-अशुभ तथा चिंता और चिंतारहित होने की धारणाएँ कहाँ हैं?
अध्याय १९ • श्लोक ५
क्व तुरीयं भयं वापि स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ १९-५॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्ममहिमा में स्थित मेरे लिए स्वप्न, गहरी नींद, जागरण, तुरीय अवस्था अथवा भय की सीमाएँ कहाँ हैं?
अध्याय १९ • श्लोक ६
क्व स्थूलं क्व च वा सूक्ष्मं स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ १९-६॥
सरल हिंदी भावार्थ: अपने स्वरूप में स्थित मेरे लिए दूर-पास, बाहर-भीतर और स्थूल-सूक्ष्म का भेद कहाँ है?
अध्याय १९ • श्लोक ७
क्व लयः क्व समाधिर्वा स्वमहिम्नि स्थितस्य मे ॥ १९-७॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्ममहिमा में स्थित मेरे लिए मृत्यु-जीवन, लोक और लौकिक व्यवहार, लय तथा समाधि के अलग-अलग बंधन कहाँ हैं?
अध्याय १९ • श्लोक ८
अलं विज्ञानकथया विश्रान्तस्य ममात्मनि ॥ १९-८॥
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा में विश्राम पा चुका हूँ। अब धर्म-अर्थ-काम की चर्चा, योग की चर्चा और ज्ञान की चर्चा से कुछ प्राप्त करने का प्रयोजन पूरा हो चुका है।
॥ अष्टावक्र गीता — अध्याय १९ सम्पूर्ण ॥
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