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श्रीरामचरितमानस उत्तरकाण्ड भाग 1 | दोहा 1–65 | मूल पाठ और सरल हिंदी अर्थ
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भक्ति भावना · गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस
उत्तरकाण्ड · भाग 1
दोहा 1–65 · मूल पाठ और सरल हिंदी अर्थ सम्पूर्ण काण्ड का प्रथम भाग · कुल दो भाग
उत्तरकाण्ड · दोनों प्रकाशित भाग खोलें
इस भाग को कैसे पढ़ें?
मूल चौपाइयाँ, छंद, दोहे और सोरठे उनके क्रम में हैं। प्रत्येक क्रमांक के बाद स्वतंत्र रूप से लिखा समेकित सरल हिंदी अर्थ दिया है; यह शब्द-शब्द अनुवाद नहीं है। संवाद को उसके प्रसंग सहित पढ़ें। काण्ड का समापन दूसरे भाग में है।
कोसलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ।
जानकीकरसरोजलालितौ चिन्तकस्य मनभृङ्गसङ्गिनौ ॥ २ ॥
कुन्दइन्दुदरगौरसुन्दरं अम्बिकापतिमभीष्टसिद्धिदम्।
कारुणीककलकञ्जलोचनं नौमि शंकरमनंगमोचनम् ॥ ३ ॥
दो. रहा एक दिन अवधि कर अति आरत पुर लोग।
जहँ तहँ सोचहिं नारि नर कृस तन राम बियोग ॥
सगुन होहिं सुंदर सकल मन प्रसन्न सब केर।
प्रभु आगवन जनाव जनु नगर रम्य चहुँ फेर ॥
कौसल्यादि मातु सब मन अनंद अस होइ।
आयउ प्रभु श्री अनुज जुत कहन चहत अब कोइ ॥
भरत नयन भुज दच्छिन फरकत बारहिं बार।
जानि सगुन मन हरष अति लागे करन बिचार ॥
मंगलाचरण का समेकित सरल अर्थ
पुष्पक विमान पर विराजमान, सीताजी के स्वामी, लक्ष्मण द्वारा सेवित और वानर-समूह से घिरे राम का वंदन है। अगले श्लोक में ब्रह्मा-शिव से वंदित तथा सीता द्वारा सेवित उनके कोमल चरणों का स्मरण है। तीसरा श्लोक करुणामय शिव को प्रणाम करता है। आरंभिक दोहों में वनवास की अवधि पूरी होने में एक दिन शेष है। अयोध्या-वासी विरह में हैं, पर शुभ संकेत राम के आगमन की आशा जगाते हैं। माताएँ और भरत भी हर्ष अनुभव करते हैं।
उत्तरकाण्ड · क्रमांक 1
भरत की प्रतीक्षा और हनुमान का आगमन
चौपाइयाँ — मूल पाठ
रहेउ एक दिन अवधि अधारा। समुझत मन दुख भयउ अपारा ॥
कारन कवन नाथ नहिं आयउ। जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ ॥
अहह धन्य लछिमन बड़भागी। राम पदारबिंदु अनुरागी ॥
कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा। ताते नाथ संग नहिं लीन्हा ॥
जौं करनी समुझै प्रभु मोरी। नहिं निस्तार कलप सत कोरी ॥
जन अवगुन प्रभु मान न काऊ। दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ ॥
मोरि जियँ भरोस दृढ़ सोई। मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई ॥
बीतें अवधि रहहि जौं प्राना। अधम कवन जग मोहि समाना ॥
दोहा — मूल पाठ
राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत।
बिप्र रूप धरि पवन सुत आइ गयउ जनु पोत ॥ १(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
बैठि देखि कुसासन जटा मुकुट कृस गात।
राम राम रघुपति जपत स्त्रवत नयन जलजात ॥ १(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
अवधि पूरी होने पर भी राम न लौटे तो भरत दुःखी होकर स्वयं को दोष देते हैं। फिर प्रभु के दयालु स्वभाव से मिलने का भरोसा पाते हैं। विरह-सागर में डूबते भरत के पास ब्राह्मणरूप हनुमान नाव जैसे पहुँचते हैं।
हनुमान राम की विजय और सीता-लक्ष्मण सहित आगमन का समाचार देते हैं। भरत प्रेम से गले लगाकर उनका ऋण मानते हैं। हनुमान बताते हैं कि भरत राम के प्राणप्रिय हैं। कुशल समाचार लेकर वे फिर राम के पास लौटते हैं।
हरषि भरत कोसलपुर आए। समाचार सब गुरहि सुनाए ॥
पुनि मंदिर महँ बात जनाई। आवत नगर कुसल रघुराई ॥
सुनत सकल जननीं उठि धाईं। कहि प्रभु कुसल भरत समुझाई ॥
समाचार पुरबासिंह पाए। नर अरु नारि हरषि सब धाए ॥
दधि दुर्बा रोचन फल फूला। नव तुलसी दल मंगल मूला ॥
भरि भरि हेम थार भामिनी। गावत चलिं सिंधु सिंधुरगामिनी ॥
जे जैसेहिं तैसेहिं उठि धावहिं। बाल बृद्ध कहँ संग न लावहिं ॥
एक एकन्ह कहँ बूझहिं भाई। तुम्ह देखे दयाल रघुराई ॥
अवधपुरी प्रभु आवत जानी। भई सकल सोभा कै खानी ॥
बहइ सुहावन त्रिबिध समीरा। भइ सरजू अति निर्मल नीरा ॥
दोहा — मूल पाठ
हरषित गुर परिजन अनुज भूसुर बृंद समेत।
चले भरत मन प्रेम अति सन्मुख कृपानिकेत ॥ ३(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
बहुतक चढ़ी अटारिन्ह निरखहिं गगन बिमान।
देखि मधुर सुर हरषित करहिं सुमंगल गान ॥ ३(ख) ॥
दोहा — मूल पाठ
राका ससि रघुपति पुर सिंधु देखि हरषान।
बढ़यो कोलाहल करत जनु नारि तरंग समान ॥ ३(ग) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
भरत गुरु और माताओं को समाचार देते हैं। सारे नगर में प्रसन्नता फैलती है। लोग मंगल सामग्री लेकर स्वागत को दौड़ते हैं। भरत गुरु, परिवार और ब्राह्मणों सहित राम के सामने जाने निकलते हैं; अटारियों से विमान देखकर मंगलगान होता है।
इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर। कपिन्ह देखावत नगर मनोहर ॥
सुनु कपीस अंगद लंकेसा। पावन पुरी रुचिर यह देसा ॥
जद्यपि सब बैकुंठ बखाना। बेद पुरान बिदित जगु जाना ॥
अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ। यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ ॥
जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि। उत्तर दिसि बह सरजू पावनि ॥
जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा। मम समीप नर पावहिं बासा ॥
अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी। मम धामदा पुरी सुख रासी ॥
हरषे सब कपि सुनि प्रभु बानी। धन्य अवध जो राम बखानी ॥
दोहा — मूल पाठ
आवत देखि लोग सब कृपासिंधु भगवान।
नगर निकट प्रभु प्रेरेउ उतरेउ भूमि बिमान ॥ ४(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
उतरि कहेउ प्रभु पुष्पकहि तुम्ह कुबेर पहिं जाहु।
प्रेरित राम चलेउ सो हरषु बिरहु अति ताहु ॥ ४(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम अपने साथियों को अयोध्या और सरयू का महत्व बताते हैं। जन्मभूमि और वहाँ के निवासी उन्हें अत्यंत प्रिय हैं। नगर के पास विमान उतरता है। राम पुष्पक को कुबेर के पास लौटने की आज्ञा देते हैं।
आए भरत संग सब लोगा। कृस तन श्रीरघुबीर बियोगा ॥
बामदेव बसिष्ठ मुनिनायक। देखे प्रभु महि धरि धनु सायक ॥
धाइ धरे गुर चरन सरोरुह। अनुज सहित अति पुलक तनोरुह ॥
भेंटि कुसल बूझी मुनिराया। हमरें कुसल तुम्हारिहिं दाया ॥
सकल द्विजन्ह मिलि नायउ माथा। धर्म धुरंधर रघुकुलनाथा ॥
गहे भरत पुनि प्रभु पद पंकज। नमत जिन्हहि सुर मुनि संकर अज ॥
परे भूमि नहिं उठत उठाए। बर करि कृपासिंधु उर लाए ॥
स्यामल गात रोम भए ठाढ़े। नव राजीव नयन जल बाढ़े ॥
छंद — मूल पाठ
राजीव लोचन स्त्रवत जल तन ललित पुलकावलि बनी।
अति प्रेम हृदयँ लगाइ अनुजहि मिले प्रभु त्रिभुअन धनी ॥
प्रभु मिलत अनुजहि सोह मो पहिं जाति नहिं उपमा कही।
जनु प्रेम अरु सिंगार तनु धरि मिले बर सुषमा लही ॥ १ ॥
बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि न आवई।
सुनु सिवा सो सुख बचन मन ते भिन्न जान जो पावई ॥
अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो।
बूड़त बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो ॥ २ ॥
दोहा — मूल पाठ
पुनि प्रभु हरषि सत्रुहन भेंटे हृदयँ लगाइ।
लछिमन भरत मिले तब परम प्रेम दोउ भाइ ॥ ५ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम गुरु और ब्राह्मणों को प्रणाम करते हैं। भरत चरणों में गिर पड़ते हैं; प्रभु उठाकर हृदय से लगाते हैं। दोनों के नेत्र प्रेम से भर जाते हैं। फिर शत्रुघ्न और लक्ष्मण सहित सभी भाई परस्पर मिलते हैं।
जनु धेनु बालक बच्छ तजि गृहँ चरन बन परबस गईं।
दिन अंत पुर रुख स्त्रवत थन हुंकार करि धावत भई ॥
अति प्रेम सब मातु भेटीं बचन मृदु बहुबिधि कहे।
गइ बिषम बियोग भव तिन्ह हरष सुख अगनित लहे ॥
दोहा — मूल पाठ
भेटेउ तनय सुमित्राँ राम चरन रति जानि।
रामहि मिलत कैकेई हृदयँ बहुत सकुचानि ॥ ६(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
लछिमन सब मातन्ह मिलि हरषे आसिष पाइ।
कैकेइ कहँ पुनि पुनि मिले मन कर छोभु न जाइ ॥ ६(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम अनेक रूपों में प्रकट होकर क्षणभर में सभी नगरवासियों से मिलते हैं। माताएँ बछड़े से मिलने आती गायों की तरह दौड़ती हैं। सुमित्रा पुत्र की रामनिष्ठा से प्रसन्न हैं; कैकेयी संकोच करती हैं। लक्ष्मण सभी माताओं का आशीर्वाद लेते हैं।
लछिमन अरु सीता सहित प्रभुहि बिलोकति मातु।
परमानंद मगन मन पुनि पुनि पुलकित गातु ॥ ७ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
सीताजी सासों के चरण छूकर आशीर्वाद लेती हैं। माताएँ आरती और निछावर करती हैं। कौसल्या अपने सुकुमार पुत्रों को देखकर सोचती हैं कि इन्होंने इतने बलवान राक्षसों को कैसे जीता होगा। राम, सीता और लक्ष्मण के दर्शन से उनका मन आनंदमग्न है।
सुमन बृष्टि नभ संकुल भवन चले सुखकंद।
चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नगर नारि नर बृंद ॥ ८(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम साथी वीरों को गुरु का सम्मान करना सिखाते और विजय में गुरु की कृपा बताते हैं। फिर अपने मित्रों की सेवा का यश कहते हैं। कौसल्या उन्हें राम के समान प्रिय कहकर आशीर्वाद देती हैं।
नारि कुमुदिनीं अवध सर रघुपति बिरह दिनेस।
अस्त भएँ बिगसत भईं निरखि राम राकेस ॥ ९(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
होहिं सगुन सुभ बिबिध बिधि बाजहिं गगन निसान।
पुर नर नारि सनाथ करि भवन चले भगवान ॥ ९(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
नगर में कलश, बंदनवार, ध्वज और सुगंधित जल से सजावट है। स्त्रियाँ मंगलगान और आरती करती हैं। राम के लौटने से विरह समाप्त होकर समूची अयोध्या फिर प्रफुल्लित हो जाती है।
प्रभु जानी कैकेई लजानी। प्रथम तासु गृह गए भवानी ॥
ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा। पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा ॥
कृपासिंधु जब मंदिर गए। पुर नर नारि सुखी सब भए ॥
गुर बसिष्ट द्विज लिए बुलाई। आजु सुघरी सुदिन समुदाई ॥
सब द्विज देहु हरषि अनुसासन। रामचंद्र बैठहिं सिंघासन ॥
मुनि बसिष्ट के बचन सुहाए। सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए ॥
कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका। जग अभिराम राम अभिषेका ॥
अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजे। महाराज कहँ तिलक करीजै ॥
दोहा — मूल पाठ
तब मुनि कहेउ सुमंत्र सन सुनत चलेउ हरषाइ।
रथ अनेक बहु बाजि गज तुरत सँवारे जाइ ॥ १०(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
जहँ तहँ धावन पठइ पुनि मंगल द्रब्य मगाइ।
हरष समेत बसिष्ट पद पुनि सिरु नायउ आइ ॥ १०(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
कैकेयी का संकोच जानकर राम पहले उनके घर जाते और उन्हें सुख देते हैं। गुरु वसिष्ठ ब्राह्मणों से राज्याभिषेक की सम्मति लेते हैं। सब प्रसन्न हैं; सुमंत्र शीघ्र रथ, वाहन और मंगल सामग्री जुटाते हैं।
राम बाम दिसि सोभति रमा रूप गुन खानि।
देखि मातु सब हरषीं जन्म सुफल निज जानि ॥ ११(ख) ॥
दोहा — मूल पाठ
सुनु खगेस तेहि अवसर ब्रह्मा सिव मुनि बृंद।
चढ़ि बिमान आए सब सुर देखन सुखकंद ॥ ११(ग) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम पहले मित्रों के स्नान की व्यवस्था करते हैं। अपने हाथ से भरत की जटाएँ सुलझाकर भाइयों को स्नान कराते हैं। फिर स्वयं स्नान और अलंकरण करते हैं। माताएँ सीता को सजाती हैं; राज्याभिषेक देखने देवता आते हैं।
प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा। तुरत दिब्य सिंघासन मागा ॥
रबि सम तेज सो बरनि न जाई। बैठे राम द्विजन्ह सिरु नाई ॥
जनकसुता समेत रघुराई। पेखि प्रहरषे मुनि समुदाई ॥
बेद मंत्र तब द्विजन्ह उचारे। नभ सुर मुनि जय जयति पुकारे ॥
प्रथम तिलक बसिष्ट मुनि कीन्हा। पुनि सब बिप्रन्ह आयसु दीन्हा ॥
सुत बिलोकि हरषीं महतारी। बार बार आरती उतारी ॥
बिप्रन्ह दान बिबिध बिधि दीन्हे। जाचक सकल अजाचक कीन्हे ॥
सिंघासन पर त्रिभुअन साई। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं ॥
छंद — मूल पाठ
नभ दुंदुभीं बाजहिं बिपुल गंधर्ब किंनर गावहीं।
नाचहिं अपछरा बृंद परमानंद सुर मुनि पावहीं ॥
भरतादि अनुज बिभीषनांगद हनुमदादि समेत ते।
गहें छत्र चामर ब्यजन धनु असि चर्म सक्ति बिराजते ॥ १ ॥
श्री सहित दिनकर बंस बूषन काम बहु छबि सोहई।
नव अंबुधर बर गात अंबर पीत सुर मन मोहई ॥
मुकुटांगदादि बिचित्र भूषन अंग अंगन्हि प्रति सजे।
अंभोज नयन बिसाल उर भुज धन्य नर निरखंति जे ॥ २ ॥
दोहा — मूल पाठ
वह सोभा समाज सुख कहत न बनइ खगेस।
बरनहिं सारद सेष श्रुति सो रस जान महेस ॥ १२(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
भिन्न भिन्न अस्तुति करि गए सुर निज निज धाम।
बंदी बेष बेद तब आए जहँ श्रीराम ॥ १२(ख) ॥
दोहा — मूल पाठ
प्रभु सर्बग्य कीन्ह अति आदर कृपानिधान।
लखेउ न काहूँ मरम कछु लगे करन गुन गान ॥ १२(ग) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
सीता सहित राम दिव्य सिंहासन पर बैठते हैं। वेदमंत्रों के बीच वसिष्ठ प्रथम तिलक करते हैं। माताएँ आरती, देवता पुष्पवर्षा और गंधर्व मंगलगान करते हैं। सबको दान दिया जाता है। फिर वेद बंदीजन का रूप धरकर स्तुति करने आते हैं।
जय सगुन निर्गुन रूप अनूप भूप सिरोमने।
दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुज बल हने ॥
अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दुख दहे।
जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे ॥ १ ॥
तव बिषम माया बस सुरासुर नाग नर अग जग हरे।
भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निसि काल कर्म गुननि भरे ॥
जे नाथ करि करुना बिलोके त्रिबिधि दुख ते निर्बहे।
भव खेद छेदन दच्छ हम कहुँ रच्छ राम नमामहे ॥ २ ॥
जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी।
ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी ॥
बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे।
जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे ॥ ३ ॥
जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी।
नख निर्गता मुनि बंदिता त्रेलोक पावनि सुरसरी ॥
ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे।
पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे ॥ ४ ॥
अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने।
षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने ॥
फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे।
पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे ॥ ५ ॥
जे ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मनपर ध्यावहीं।
ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं ॥
करुनायतन प्रभु सदगुनाकर देव यह बर मागहीं।
मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं ॥ ६ ॥
दोहा — मूल पाठ
सब के देखत बेदन्ह बिनती कीन्हि उदार।
अंतर्धान भए पुनि गए ब्रह्म आगार ॥ १३(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
बैनतेय सुनु संभु तब आए जहँ रघुबीर।
बिनय करत गदगद गिरा पूरित पुलक सरीर ॥ १३(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
वेद राम को सगुण-निर्गुण परमात्मा और शरणागत-पालक कहते हैं। वे माया से मुक्ति में कृपा, विश्वास और भक्ति का महत्व बताते हैं। अंत में मन-वचन-कर्म के विकार छोड़कर चरणों में प्रेम माँगते हैं। फिर शिव स्तुति करने आते हैं।
जय राम रमारमनं समनं। भव ताप भयाकुल पाहि जनं ॥
अवधेस सुरेस रमेस बिभो। सरनागत मागत पाहि प्रभो ॥ १ ॥
दससीस बिनासन बीस भुजा। कृत दूरि महा महि भूरि रुजा ॥
रजनीचर बृंद पतंग रहे। सर पावक तेज प्रचंड दहे ॥ २ ॥
महि मंडल मंडन चारुतरं। धृत सायक चाप निषंग बरं ॥
मद मोह महा ममता रजनी। तम पुंज दिवाकर तेज अनी ॥ ३ ॥
मनजात किरात निपात किए। मृग लोग कुभोग सरेन हिए ॥
हति नाथ अनाथनि पाहि हरे। बिषया बन पावँर भूलि परे ॥ ४ ॥
बहु रोग बियोगन्हि लोग हए। भवदंघ्रि निरादर के फल ए ॥
भव सिंधु अगाध परे नर ते। पद पंकज प्रेम न जे करते ॥ ५ ॥
अति दीन मलीन दुखी नितहीं। जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं ॥
अवलंब भवंत कथा जिन्ह के ॥ प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें ॥ ६ ॥
नहिं राग न लोभ न मान मदा ॥ तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा ॥
एहि ते तव सेवक होत मुदा। मुनि त्यागत जोग भरोस सदा ॥ ७ ॥
करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ। पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ ॥
सम मानि निरादर आदरही। सब संत सुखी बिचरंति मही ॥ ८ ॥
मुनि मानस पंकज भृंग भजे। रघुबीर महा रनधीर अजे ॥
तव नाम जपामि नमामि हरी। भव रोग महागद मान अरी ॥ ९ ॥
गुन सील कृपा परमायतनं। प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं ॥
रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं। महिपाल बिलोकय दीन जनं ॥ १० ॥
दोहा — मूल पाठ
बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग।
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग ॥ १४(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
बरनि उमापति राम गुन हरषि गए कैलास।
तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुखप्रद बास ॥ १४(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
शिव राम का वंदन करके मोह, अभिमान और विषयासक्ति से रक्षा चाहते हैं। वे संतों की समता और चरणसेवा का महत्व कहते हैं। उनका वरदान है कि राम के चरणों में अटूट भक्ति तथा सदा सत्संग मिले।
सुनु खगपति यह कथा पावनी। त्रिबिध ताप भव भय दावनी ॥
महाराज कर सुभ अभिषेका। सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका ॥
जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं। सुख संपति नाना बिधि पावहिं ॥
सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं। अंतकाल रघुपति पुर जाहीं ॥
सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई। लहहिं भगति गति संपति नई ॥
खगपति राम कथा मैं बरनी। स्वमति बिलास त्रास दुख हरनी ॥
बिरति बिबेक भगति दृढ़ करनी। मोह नदी कहँ सुंदर तरनी ॥
नित नव मंगल कौसलपुरी। हरषित रहहिं लोग सब कुरी ॥
नित नइ प्रीति राम पद पंकज। सबकें जिन्हहि नमत सिव मुनि अज ॥
मंगन बहु प्रकार पहिराए। द्विजन्ह दान नाना बिधि पाए ॥
दोहा — मूल पाठ
ब्रह्मानंद मगन कपि सब कें प्रभु पद प्रीति।
जात न जाने दिवस तिन्ह गए मास षट बीति ॥ १५ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
काकभुशुण्डि रामकथा को विवेक, वैराग्य और भक्ति बढ़ाने वाली नाव बताते हैं। अयोध्या में नित्य उत्सव है। वानर प्रभु-प्रेम और आनंद में ऐसे मग्न हैं कि छह महीने बीतने का पता भी नहीं चलता।
बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं। जिमि परद्रोह संत मन माही ॥
तब रघुपति सब सखा बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिरु नाए ॥
परम प्रीति समीप बैठारे। भगत सुखद मृदु बचन उचारे ॥
तुम्ह अति कीन्ह मोरि सेवकाई। मुख पर केहि बिधि करौं बड़ाई ॥
ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे। मम हित लागि भवन सुख त्यागे ॥
अनुज राज संपति बैदेही। देह गेह परिवार सनेही ॥
सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना। मृषा न कहउँ मोर यह बाना ॥
सब के प्रिय सेवक यह नीती। मोरें अधिक दास पर प्रीती ॥
दोहा — मूल पाठ
अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दृढ़ नेम।
सदा सर्बगत सर्बहित जानि करेहु अति प्रेम ॥ १६ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम साथियों की सेवा और त्याग की प्रशंसा करते हैं। वे उन्हें अपना अत्यंत प्रिय बताते और सर्वव्यापी, सबके हितैषी प्रभु को जानकर प्रेम तथा नियमपूर्वक भजन करते हुए घर लौटने को कहते हैं।
सुनि प्रभु बचन मगन सब भए। को हम कहाँ बिसरि तन गए ॥
एकटक रहे जोरि कर आगे। सकहिं न कछु कहि अति अनुरागे ॥
परम प्रेम तिन्ह कर प्रभु देखा। कहा बिबिध बिधि ग्यान बिसेषा ॥
प्रभु सन्मुख कछु कहन न पारहिं। पुनि पुनि चरन सरोज निहारहिं ॥
तब प्रभु भूषन बसन मगाए। नाना रंग अनूप सुहाए ॥
सुग्रीवहि प्रथमहिं पहिराए। बसन भरत निज हाथ बनाए ॥
प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराए। लंकापति रघुपति मन भाए ॥
अंगद बैठ रहा नहिं डोला। प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला ॥
दोहा — मूल पाठ
जामवंत नीलादि सब पहिराए रघुनाथ।
हियँ धरि राम रूप सब चले नाइ पद माथ ॥ १७(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
तब अंगद उठि नाइ सिरु सजल नयन कर जोरि।
अति बिनीत बोलेउ बचन मनहुँ प्रेम रस बोरि ॥ १७(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
प्रेम से निरुत्तर साथियों को राम समझाते और वस्त्र-आभूषण देते हैं। सुग्रीव, विभीषण, जाम्बवान आदि विदा होते हैं। अंगद अलग बैठे रहते हैं, फिर अश्रुपूर्ण नेत्रों से विनय करने उठते हैं।
निज उर माल बसन मनि बालितनय पहिराइ।
बिदा कीन्हि भगवान तब बहु प्रकार समुझाइ ॥ १८(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
अंगद कहते हैं कि बालि ने उन्हें राम की गोद में सौंपा था। राम ही उनके माता-पिता, गुरु और स्वामी हैं; वे छोटी सेवा करके भी पास रहना चाहते हैं। राम उन्हें गले लगाकर अपने वस्त्र-माला देते और प्रेम से विदा करते हैं।
भरत अनुज सौमित्र समेता। पठवन चले भगत कृत चेता ॥
अंगद हृदयँ प्रेम नहिं थोरा। फिरि फिरि चितव राम कीं ओरा ॥
बार बार कर दंड प्रनामा। मन अस रहन कहहिं मोहि रामा ॥
राम बिलोकनि बोलनि चलनी। सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी ॥
प्रभु रुख देखि बिनय बहु भाषी। चलेउ हृदयँ पद पंकज राखी ॥
अति आदर सब कपि पहुँचाए। भाइन्ह सहित भरत पुनि आए ॥
तब सुग्रीव चरन गहि नाना। भाँति बिनय कीन्हे हनुमाना ॥
दिन दस करि रघुपति पद सेवा। पुनि तव चरन देखिहउँ देवा ॥
पुन्य पुंज तुम्ह पवनकुमारा। सेवहु जाइ कृपा आगारा ॥
अस कहि कपि सब चले तुरंता। अंगद कहइ सुनहु हनुमंता ॥
दोहा — मूल पाठ
कहेहु दंडवत प्रभु सैं तुम्हहि कहउँ कर जोरि।
बार बार रघुनायकहि सुरति कराएहु मोरि ॥ १९(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
अस कहि चलेउ बालिसुत फिरि आयउ हनुमंत।
तासु प्रीति प्रभु सन कही मगन भए भगवंत ॥ १९(ख) ॥
दोहा — मूल पाठ
कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु चाहि।
चित्त खगेस राम कर समुझि परइ कहु काहि ॥ १९(ग) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
भाई वानरों को पहुँचाने जाते हैं। हनुमान सुग्रीव से कुछ दिन और राम की सेवा की अनुमति लेते हैं। अंगद उनसे बार-बार अपना स्मरण दिलाने को कहते हैं। उनका संदेश सुनकर राम भावमग्न होते हैं; प्रभु के हृदय की कठोरता और कोमलता का अद्भुत मेल बताया गया है।
पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा। दीन्हे भूषन बसन प्रसादा ॥
जाहु भवन मम सुमिरन करेहू। मन क्रम बचन धर्म अनुसरेहू ॥
तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता। सदा रहेहु पुर आवत जाता ॥
बचन सुनत उपजा सुख भारी। परेउ चरन भरि लोचन बारी ॥
चरन नलिन उर धरि गृह आवा। प्रभु सुभाउ परिजनन्हि सुनावा ॥
रघुपति चरित देखि पुरबासी। पुनि पुनि कहहिं धन्य सुखरासी ॥
राम राज बैंठें त्रेलोका। हरषित भए गए सब सोका ॥
बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप बिषमता खोई ॥
दोहा — मूल पाठ
बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग।
चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग ॥ २० ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम निषादराज को भरत समान भाई और मित्र कहकर धर्मपालन तथा आते-जाते रहने को कहते हैं। वे प्रेम से लौटते हैं। रामराज्य में शोक और परस्पर बैर दूर होते हैं; लोग धर्ममार्ग पर चलकर निर्भय सुख पाते हैं।
दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा ॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती ॥
चारिउ चरन धर्म जग माहीं। पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं ॥
राम भगति रत नर अरु नारी। सकल परम गति के अधिकारी ॥
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। सब सुंदर सब बिरुज सरीरा ॥
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना ॥
सब निर्दंभ धर्मरत पुनी। नर अरु नारि चतुर सब गुनी ॥
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। सब कृतग्य नहिं कपट सयानी ॥
दोहा — मूल पाठ
राम राज खगेस सुनु सचराचर जग माहिं ॥
काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं ॥ २१ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
रामराज्य का आदर्श वर्णन है: दैहिक, दैविक और भौतिक ताप नहीं हैं। लोग प्रेम, धर्म, भक्ति और कृतज्ञता से रहते हैं। गरीबी, बीमारी, कपट और अज्ञान का अभाव है; सबके जीवन में कल्याण है।
भूमि सप्त सागर मेखला। एक भूप रघुपति कोसला ॥
भुअन अनेक रोम प्रति जासू। यह प्रभुता कछु बहुत न तासू ॥
सो महिमा समुझत प्रभु केरी। यह बरनत हीनता घनेरी ॥
सोउ महिमा खगेस जिन्ह जानी। फिरी एहिं चरित तिन्हहुँ रति मानी ॥
सोउ जाने कर फल यह लीला। कहहिं महा मुनिबर दमसीला ॥
राम राज कर सुख संपदा। बरनि न सकइ फनीस सारदा ॥
सब उदार सब पर उपकारी। बिप्र चरन सेवक नर नारी ॥
एकनारि ब्रत रत सब झारी। ते मन बच क्रम पति हितकारी ॥
दोहा — मूल पाठ
दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज।
जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र कें राज ॥ २२ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
असंख्य ब्रह्मांडों के स्वामी राम की राजमहिमा भी उनकी असीमता का छोटा अंश है। लोग उदार, परोपकारी और दांपत्य में निष्ठावान हैं। दंड केवल संन्यासियों का दंड और भेद नृत्य की कला में है; विजय का विषय अपना मन है।
बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज।
मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र के राज ॥ २३ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
पशु-पक्षी सहज बैर भूलकर साथ रहते हैं। वन फूलते-फलते, नदियाँ निर्मल बहतीं और समुद्र मर्यादा में रहते हैं। वर्षा, धूप और चाँदनी आवश्यकता के अनुसार हैं। प्रकृति का यह सुखद रूप रामराज्य की समरसता दिखाता है।
कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे। दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे ॥
श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर। गुनातीत अरु भोग पुरंदर ॥
पति अनुकूल सदा रह सीता। सोभा खानि सुसील बिनीता ॥
जानति कृपासिंधु प्रभुताई। सेवति चरन कमल मन लाई ॥
जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी। बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी ॥
निज कर गृह परिचरजा करई। रामचंद्र आयसु अनुसरई ॥
जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ। सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ ॥
कौसल्यादि सासु गृह माहीं। सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं ॥
उमा रमा ब्रह्मादि बंदिता। जगदंबा संततमनिंदिता ॥
दोहा — मूल पाठ
जासु कृपा कटाच्छु सुर चाहत चितव न सोइ।
राम पदारबिंद रति करति सुभावहि खोइ ॥ २४ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम धर्मपालन, यज्ञ और दान करते हैं। जगदंबा सीता अपनी महिमा का अभिमान छोड़कर राम और माताओं की सेवा करती हैं। अनेक सेवकों के रहते हुए भी उनका प्रेम और विनय स्वयं कार्य करने में प्रकट होता है।
सेवहिं सानकूल सब भाई। राम चरन रति अति अधिकाई ॥
प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं। कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं ॥
राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती। नाना भाँति सिखावहिं नीती ॥
हरषित रहहिं नगर के लोगा। करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा ॥
अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं। श्रीरघुबीर चरन रति चहहीं ॥
दुइ सुत सुन्दर सीताँ जाए। लव कुस बेद पुरानन्ह गाए ॥
दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर। हरि प्रतिबिंब मनहुँ अति सुंदर ॥
दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे। भए रूप गुन सील घनेरे ॥
दोहा — मूल पाठ
ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार।
सोइ सच्चिदानंद घन कर नर चरित उदार ॥ २५ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
भाई राम के प्रति प्रेम और सेवा में रहते हैं; राम उन्हें नीति सिखाते हैं। नगरवासी चरणप्रेम चाहते हैं। सीता से सुंदर, विनयी लव-कुश जन्मते हैं और भाइयों के भी गुणवान पुत्र होते हैं। निर्गुण सच्चिदानंद की उदार मानवीय लीला दिखाई गई है।
प्रातकाल सरऊ करि मज्जन। बैठहिं सभाँ संग द्विज सज्जन ॥
बेद पुरान बसिष्ट बखानहिं। सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं ॥
अनुजन्ह संजुत भोजन करहीं। देखि सकल जननीं सुख भरहीं ॥
भरत सत्रुहन दोनउ भाई। सहित पवनसुत उपबन जाई ॥
बूझहिं बैठि राम गुन गाहा। कह हनुमान सुमति अवगाहा ॥
सुनत बिमल गुन अति सुख पावहिं। बहुरि बहुरि करि बिनय कहावहिं ॥
सब कें गृह गृह होहिं पुराना। रामचरित पावन बिधि नाना ॥
नर अरु नारि राम गुन गानहिं। करहिं दिवस निसि जात न जानहिं ॥
दोहा — मूल पाठ
अवधपुरी बासिंह कर सुख संपदा समाज।
सहस सेष नहिं कहि सकहिं जहँ नृप राम बिराज ॥ २६ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम सरयू-स्नान के बाद सभा में वसिष्ठ से वेद-पुराण सुनते हैं। भरत और शत्रुघ्न हनुमान से रामगुण सुनते हैं। घर-घर कथा और गुणगान है; अयोध्या के सुख का पूरा वर्णन भी संभव नहीं कहा गया है।
नारदादि सनकादि मुनीसा। दरसन लागि कोसलाधीसा ॥
दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिं। देखि नगरु बिरागु बिसरावहिं ॥
जातरूप मनि रचित अटारीं। नाना रंग रुचिर गच ढारीं ॥
पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर। रचे कँगूरा रंग रंग बर ॥
नव ग्रह निकर अनीक बनाई। जनु घेरी अमरावति आई ॥
महि बहु रंग रचित गच काँचा। जो बिलोकि मुनिबर मन नाचा ॥
धवल धाम ऊपर नभ चुंबत। कलस मनहुँ रबि ससि दुति निंदत ॥
बहु मनि रचित झरोखा भ्राजहिं। गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं ॥
चारु चित्रसाला गृह गृह प्रति लिखे बनाइ।
राम चरित जे निरख मुनि ते मन लेहिं चोराइ ॥ २७ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
नारद और सनकादि प्रतिदिन दर्शन को आते हैं। नगर के रत्नमय भवन, ऊँची अटारियाँ, दीप, द्वार और चित्रशालाएँ शोभित हैं। घरों में रामकथा के चित्र मुनियों का मन भी आकर्षित करते हैं।
सुमन बाटिका सबहिं लगाई। बिबिध भाँति करि जतन बनाई ॥
लता ललित बहु जाति सुहाई। फूलहिं सदा बंसत कि नाई ॥
गुंजत मधुकर मुखर मनोहर। मारुत त्रिबिध सदा बह सुंदर ॥
नाना खग बालकन्हि जिआए। बोलत मधुर उड़ात सुहाए ॥
मोर हंस सारस पारावत। भवननि पर सोभा अति पावत ॥
जहँ तहँ देखहिं निज परिछाहीं। बहु बिधि कूजहिं नृत्य कराहीं ॥
सुक सारिका पढ़ावहिं बालक। कहहु राम रघुपति जनपालक ॥
राज दुआर सकल बिधि चारू। बीथीं चौहट रूचिर बजारू ॥
छंद — मूल पाठ
बाजार रुचिर न बनइ बरनत बस्तु बिनु गथ पाइए।
जहँ भूप रमानिवास तहँ की संपदा किमि गाइए ॥
बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहुँ कुबेर ते।
सब सुखी सब सच्चरित सुंदर नारि नर सिसु जरठ जे ॥
दोहा — मूल पाठ
उत्तर दिसि सरजू बह निर्मल जल गंभीर।
बाँधे घाट मनोहर स्वल्प पंक नहिं तीर ॥ २८ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
नगरवासी सुंदर वाटिकाएँ लगाते हैं। पक्षियों का मधुर कलरव और बच्चों का रामनाम सिखाना वातावरण को सुखद बनाता है। बाजार समृद्ध हैं और सभी आयु के लोग सच्चरित्र हैं। उत्तर दिशा में निर्मल सरयू और सुंदर घाट हैं।
दूरि फराक रुचिर सो घाटा। जहँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा ॥
पनिघट परम मनोहर नाना। तहाँ न पुरुष करहिं अस्नाना ॥
राजघाट सब बिधि सुंदर बर। मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर ॥
तीर तीर देवन्ह के मंदिर। चहुँ दिसि तिन्ह के उपबन सुंदर ॥
कहुँ कहुँ सरिता तीर उदासी। बसहिं ग्यान रत मुनि संन्यासी ॥
तीर तीर तुलसिका सुहाई। बृंद बृंद बहु मुनिन्ह लगाई ॥
पुर सोभा कछु बरनि न जाई। बाहेर नगर परम रुचिराई ॥
देखत पुरी अखिल अघ भागा। बन उपबन बापिका तड़ागा ॥
छंद — मूल पाठ
बापीं तड़ाग अनूप कूप मनोहरायत सोहहीं।
सोपान सुंदर नीर निर्मल देखि सुर मुनि मोहहीं ॥
बहु रंग कंज अनेक खग कूजहिं मधुप गुंजारहीं।
आराम रम्य पिकादि खग रव जनु पथिक हंकारहीं ॥
दोहा — मूल पाठ
रमानाथ जहँ राजा सो पुर बरनि कि जाइ।
अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ ॥ २९ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
अयोध्या में विविध उपयोगों के सुव्यवस्थित घाट, मंदिर, उपवन और ज्ञाननिष्ठ मुनियों के आश्रम हैं। तुलसी के वृंद, बावलियाँ, कुएँ और कमलयुक्त सरोवर शोभा देते हैं। राम के राज्य की सुख-संपदा अपरंपार कही गई है।
जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं। बैठि परसपर इहइ सिखावहिं ॥
भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि। सोभा सील रूप गुन धामहि ॥
जलज बिलोचन स्यामल गातहि। पलक नयन इव सेवक त्रातहि ॥
धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि। संत कंज बन रबि रनधीरहि ॥
काल कराल ब्याल खगराजहि। नमत राम अकाम ममता जहि ॥
लोभ मोह मृगजूथ किरातहि। मनसिज करि हरि जन सुखदातहि ॥
संसय सोक निबिड़ तम भानुहि। दनुज गहन घन दहन कृसानुहि ॥
जनकसुता समेत रघुबीरहि। कस न भजहु भंजन भव भीरहि ॥
बहु बासना मसक हिम रासिहि। सदा एकरस अज अबिनासिहि ॥
मुनि रंजन भंजन महि भारहि। तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि ॥
दोहा — मूल पाठ
एहि बिधि नगर नारि नर करहिं राम गुन गान।
सानुकूल सब पर रहहिं संतत कृपानिधान ॥ ३० ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
लोग एक-दूसरे को राम के भजन की प्रेरणा देते हैं। वे प्रभु को सेवक-रक्षक, संतों के सुखदाता तथा लोभ, मोह, संशय और शोक हरने वाला कहते हैं। सीता सहित राम का गुणगान करते सभी पर उनकी कृपा बनी रहती है।
जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा ॥
पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका ॥
जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी। प्रथम अबिद्या निसा नसानी ॥
अघ उलूक जहँ तहाँ लुकाने। काम क्रोध कैरव सकुचाने ॥
बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ। ए चकोर सुख लहहिं न काऊ ॥
मत्सर मान मोह मद चोरा। इन्ह कर हुनर न कवनिहुँ ओरा ॥
धरम तड़ाग ग्यान बिग्याना। ए पंकज बिकसे बिधि नाना ॥
सुख संतोष बिराग बिबेका। बिगत सोक ए कोक अनेका ॥
दोहा — मूल पाठ
यह प्रताप रबि जाकें उर जब करइ प्रकास।
पछिले बाढ़हिं प्रथम जे कहे ते पावहिं नास ॥ ३१ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम का प्रताप सूर्य की तरह अज्ञान, पाप, काम, क्रोध और अहंकार का अंधकार मिटाता है। उसके प्रकाश में धर्म, ज्ञान, संतोष, वैराग्य और विवेक बढ़ते हैं। हृदय में यह प्रकाश होने का फल भीतर के सद्गुणों की वृद्धि है।
भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा। संग परम प्रिय पवनकुमारा ॥
सुंदर उपबन देखन गए। सब तरु कुसुमित पल्लव नए ॥
जानि समय सनकादिक आए। तेज पुंज गुन सील सुहाए ॥
ब्रह्मानंद सदा लयलीना। देखत बालक बहुकालीना ॥
रूप धरें जनु चारिउ बेदा। समदरसी मुनि बिगत बिभेदा ॥
आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं। रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं ॥
तहाँ रहे सनकादि भवानी। जहँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी ॥
राम कथा मुनिबर बहु बरनी। ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी ॥
दोहा — मूल पाठ
देखि राम मुनि आवत हरषि दंडवत कीन्ह।
स्वागत पूँछि पीत पट प्रभु बैठन कहँ दीन्ह ॥ ३२ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम भाइयों और हनुमान के साथ उपवन जाते हैं। वहाँ बालक रूप में दिखते, पर अत्यंत प्राचीन और ब्रह्मानंद में स्थित सनकादि आते हैं। राम दंडवत करके स्वागत करते और बैठने को अपना पीत वस्त्र देते हैं।
कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई। सहित पवनसुत सुख अधिकाई ॥
मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी। भए मगन मन सके न रोकी ॥
स्यामल गात सरोरुह लोचन। सुंदरता मंदिर भव मोचन ॥
एकटक रहे निमेष न लावहिं। प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं ॥
तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा। स्त्रवत नयन जल पुलक सरीरा ॥
कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे। परम मनोहर बचन उचारे ॥
आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा। तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा ॥
बड़े भाग पाइब सतसंगा। बिनहिं प्रयास होहिं भव भंगा ॥
दोहा — मूल पाठ
संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ।
कहहि संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ ॥ ३३ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
मुनि राम के दर्शन में मग्न होते हैं। प्रभु उन्हें आदरपूर्वक बैठाकर संत-दर्शन से पाप मिटने का महत्व बताते हैं। संतों का संग मुक्ति का मार्ग और विषयासक्त संग संसार-बंधन का मार्ग कहा गया है।
सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी। पुलकित तन अस्तुति अनुसारी ॥
जय भगवंत अनंत अनामय। अनघ अनेक एक करुनामय ॥
जय निर्गुन जय जय गुन सागर। सुख मंदिर सुंदर अति नागर ॥
जय इंदिरा रमन जय भूधर। अनुपम अज अनादि सोभाकर ॥
ग्यान निधान अमान मानप्रद। पावन सुजस पुरान बेद बद ॥
तग्य कृतग्य अग्यता भंजन। नाम अनेक अनाम निरंजन ॥
सर्ब सर्बगत सर्ब उरालय। बससि सदा हम कहुँ परिपालय ॥
द्वंद बिपति भव फंद बिभंजय। ह्रदि बसि राम काम मद गंजय ॥
दोहा — मूल पाठ
परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम।
प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम ॥ ३४ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
मुनि राम को अनंत, निर्गुण और गुणों के सागर, सर्वव्यापी तथा करुणामय कहते हैं। वे हृदय में रहकर काम-अभिमान और संसार-बंधन दूर करने तथा अटूट प्रेमभक्ति देने की प्रार्थना करते हैं।
बार बार अस्तुति करि प्रेम सहित सिरु नाइ।
ब्रह्म भवन सनकादि गे अति अभीष्ट बर पाइ ॥ ३५ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
मुनि राम से ताप, भय, ईर्ष्या और दुख मिटाने वाली भक्ति माँगते हैं। यह भक्ति संसार-नदी पार कराने वाली नाव और विनय-विवेक बढ़ाने वाली है। अभीष्ट वर पाकर वे प्रेमपूर्वक प्रणाम करके ब्रह्मलोक लौटते हैं।
नाथ न मोहि संदेह कछु सपनेहुँ सोक न मोह।
केवल कृपा तुम्हारिहि कृपानंद संदोह ॥ ३६ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
भाई राम के मुख से उपदेश सुनना चाहते हैं, पर संकोच करते हैं। हनुमान भरत की इच्छा बताते हैं। राम अपना और भरत का भेद न मानने की बात कहते हैं। भरत चरण पकड़कर प्रभु की कृपा के लिए कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
भरत संतों के लक्षण पूछते हैं। राम कहते हैं कि संत का आचरण चंदन जैसा है: काटने वाली कुल्हाड़ी को भी वह सुगंध देता है। चंदन आदर पाता है और कुल्हाड़ी आग तथा चोट का दंड पाती है।
बिषय अलंपट सील गुनाकर। पर दुख दुख सुख सुख देखे पर ॥
सम अभूतरिपु बिमद बिरागी। लोभामरष हरष भय त्यागी ॥
कोमलचित दीनन्ह पर दाया। मन बच क्रम मम भगति अमाया ॥
सबहि मानप्रद आपु अमानी। भरत प्रान सम मम ते प्रानी ॥
बिगत काम मम नाम परायन। सांति बिरति बिनती मुदितायन ॥
सीतलता सरलता मयत्री। द्विज पद प्रीति धर्म जनयत्री ॥
ए सब लच्छन बसहिं जासु उर। जानेहु तात संत संतत फुर ॥
सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं। परुष बचन कबहूँ नहिं बोलहिं ॥
दोहा — मूल पाठ
निंदा अस्तुति उभय सम ममता मम पद कंज।
ते सज्जन मम प्रानप्रिय गुन मंदिर सुख पुंज ॥ ३८ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
संत दूसरों के सुख-दुख में सहभागी, समदर्शी, निष्कपट भक्त और दीनों पर दयालु होते हैं। वे सबको सम्मान देते, स्वयं अभिमान नहीं करते और कठोर वचन नहीं बोलते। निंदा-स्तुति में समान रहकर रामचरणों में प्रेम रखते हैं।
सुनहु असंतन्ह केर सुभाऊ। भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ ॥
तिन्ह कर संग सदा दुखदाई। जिमि कलपहि घालइ हरहाई ॥
खलन्ह हृदयँ अति ताप बिसेषी। जरहिं सदा पर संपति देखी ॥
जहँ कहुँ निंदा सुनहिं पराई। हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई ॥
काम क्रोध मद लोभ परायन। निर्दय कपटी कुटिल मलायन ॥
बयरु अकारन सब काहू सों। जो कर हित अनहित ताहू सों ॥
झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना ॥
बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा। खाइ महा अति हृदय कठोरा ॥
दोहा — मूल पाठ
पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद।
ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद ॥ ३९ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम कुसंग से बचने को कहते हैं। असंत पराई संपत्ति से जलता, निंदा से प्रसन्न होता और हित करने वाले से भी बैर रखता है। मधुर वाणी के भीतर कठोरता, झूठ, लोभ और परद्रोह छिपे रहते हैं।
लोभइ ओढ़न लोभइ डासन। सिस्त्रोदर पर जमपुर त्रास न ॥
काहू की जौं सुनहिं बड़ाई। स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई ॥
जब काहू कै देखहिं बिपती। सुखी भए मानहुँ जग नृपती ॥
स्वारथ रत परिवार बिरोधी। लंपट काम लोभ अति क्रोधी ॥
मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं। आपु गए अरु घालहिं आनहिं ॥
करहिं मोह बस द्रोह परावा। संत संग हरि कथा न भावा ॥
अवगुन सिंधु मंदमति कामी। बेद बिदूषक परधन स्वामी ॥
बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा। दंभ कपट जियँ धरें सुबेषा ॥
दोहा — मूल पाठ
ऐसे अधम मनुज खल कृतजुग त्रेता नाहिं।
द्वापर कछुक बृंद बहु होइहहिं कलिजुग माहिं ॥ ४० ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
दुष्ट दूसरों की प्रशंसा से दुखी और विपत्ति से प्रसन्न होता है। वह माता-पिता, गुरु और धर्म का सम्मान नहीं करता; संतों और हरिकथा से विमुख रहता है। यह वर्णन ऐसे अवगुणों को पहचानकर उनसे बचने की प्रेरणा देता है।
पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ॥
निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर ॥
नर सरीर धरि जे पर पीरा। करहिं ते सहहिं महा भव भीरा ॥
करहिं मोह बस नर अघ नाना। स्वारथ रत परलोक नसाना ॥
कालरूप तिन्ह कहँ मैं भ्राता। सुभ अरु असुभ कर्म फल दाता ॥
अस बिचारि जे परम सयाने। भजहिं मोहि संसृत दुख जाने ॥
त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक। भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक ॥
संत असंतन्ह के गुन भाषे। ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे ॥
दोहा — मूल पाठ
सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक।
गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक ॥ ४१ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम कहते हैं कि परहित के समान धर्म और परपीड़ा जैसी अधमता नहीं है। कर्मों का फल मिलता है। विवेकी संसार के दुख को समझकर भजन करते हैं। गुण-दोष के अहंकारी निर्णय से ऊपर उठकर समदृष्टि रखने का भी उपदेश है।
श्रीमुख बचन सुनत सब भाई। हरषे प्रेम न हृदयँ समाई ॥
करहिं बिनय अति बारहिं बारा। हनूमान हियँ हरष अपारा ॥
पुनि रघुपति निज मंदिर गए। एहि बिधि चरित करत नित नए ॥
बार बार नारद मुनि आवहिं। चरित पुनीत राम के गावहिं ॥
नित नव चरन देखि मुनि जाहीं। ब्रह्मलोक सब कथा कहाहीं ॥
सुनि बिरंचि अतिसय सुख मानहिं। पुनि पुनि तात करहु गुन गानहिं ॥
सनकादिक नारदहि सराहहिं। जद्यपि ब्रह्म निरत मुनि आहहिं ॥
सुनि गुन गान समाधि बिसारी ॥ सादर सुनहिं परम अधिकारी ॥
दोहा — मूल पाठ
जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान।
जे हरि कथाँ न करहिं रति तिन्ह के हिय पाषान ॥ ४२ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
उपदेश सुनकर भाई और हनुमान हर्षित होते हैं। नारद बार-बार राम के चरित्र सुनाते हैं। ब्रह्मनिष्ठ सनकादि भी गुणगान सुनने को ध्यान छोड़ देते हैं; कथा में प्रेम का महत्व बताया गया है।
राम गुरु और नगरवासियों की सभा में कहते हैं कि उनकी अनुचित बात को भी निर्भय रोकें। वे दुर्लभ मनुष्यजन्म को साधना और मुक्ति का द्वार बताते हैं। इसका उपयोग न करके बाद में काल, कर्म या ईश्वर को दोष देना व्यर्थ है।
एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई ॥
नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं ॥
ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई। गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई ॥
आकर चारि लच्छ चौरासी। जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी ॥
फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा ॥
कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही ॥
नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो ॥
करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा ॥
दोहा — मूल पाठ
जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ।
सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ ॥ ४४ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
मनुष्यजीवन केवल विषयभोग के लिए नहीं है। प्रभु-कृपा अनुकूल हवा, सद्गुरु कर्णधार और शरीर दृढ़ नाव है। इतने दुर्लभ साधन मिलने पर भी संसार-सागर न पार करने को अपनी ही बड़ी हानि कहा गया है।
जौं परलोक इहाँ सुख चहहू। सुनि मम बचन हृदयँ दृढ़ गहहू ॥
सुलभ सुखद मारग यह भाई। भगति मोरि पुरान श्रुति गाई ॥
ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका। साधन कठिन न मन कहुँ टेका ॥
करत कष्ट बहु पावइ कोऊ। भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ ॥
भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी ॥
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता ॥
पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा। मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा ॥
सानुकूल तेहि पर मुनि देवा। जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा ॥
दोहा — मूल पाठ
औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि।
संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि ॥ ४५ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम भक्ति को सहज, सुखद और स्वतंत्र मार्ग बताते हैं। ज्ञानमार्ग कठिन है; भक्ति के लिए सत्संग आवश्यक है। निष्कपट सेवा और संत-संग का महत्व कहकर वे शिवभजन को अपनी भक्ति से जोड़ते हैं।
कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा ॥
सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई ॥
मोर दास कहाइ नर आसा। करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा ॥
बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई। एहि आचरन बस्य मैं भाई ॥
बैर न बिग्रह आस न त्रासा। सुखमय ताहि सदा सब आसा ॥
अनारंभ अनिकेत अमानी। अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी ॥
प्रीति सदा सज्जन संसर्गा। तृन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा ॥
भगति पच्छ हठ नहिं सठताई। दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई ॥
दोहा — मूल पाठ
मम गुन ग्राम नाम रत गत ममता मद मोह।
ता कर सुख सोइ जानइ परानंद संदोह ॥ ४६ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम भक्ति में जटिल बाहरी प्रयास से अधिक सरल स्वभाव, निष्कपट मन और संतोष बताते हैं। बैर, भय, अभिमान और ममता छोड़कर संतों से प्रेम तथा रामनाम-गुणों में रुचि रखने वाला सच्चा सुख पाता है।
प्रजा राम के अमृत समान उपदेश से भावविह्वल होती है। लोग उन्हें माता-पिता, गुरु और प्राणप्रिय रक्षक कहते हैं। राम तथा उनके सेवक निष्कारण हित करते हैं। प्रभु की आज्ञा पाकर सभी प्रसन्नतापूर्वक घर लौटते हैं।
एक बार बसिष्ट मुनि आए। जहाँ राम सुखधाम सुहाए ॥
अति आदर रघुनायक कीन्हा। पद पखारि पादोदक लीन्हा ॥
राम सुनहु मुनि कह कर जोरी। कृपासिंधु बिनती कछु मोरी ॥
देखि देखि आचरन तुम्हारा। होत मोह मम हृदयँ अपारा ॥
महिमा अमित बेद नहिं जाना। मैं केहि भाँति कहउँ भगवाना ॥
उपरोहित्य कर्म अति मंदा। बेद पुरान सुमृति कर निंदा ॥
जब न लेउँ मैं तब बिधि मोही। कहा लाभ आगें सुत तोही ॥
परमातमा ब्रह्म नर रूपा। होइहि रघुकुल भूषन भूपा ॥
दोहा — मूल पाठ
-तब मैं हृदयँ बिचारा जोग जग्य ब्रत दान।
जा कहुँ करिअ सो पैहउँ धर्म न एहि सम आन ॥ ४८ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम गुरु वसिष्ठ का अत्यंत आदर करते हैं। मुनि कहते हैं कि ब्रह्माजी से रघुकुल में परमात्मा के अवतार का समाचार मिलने पर उन्होंने कुलपुरोहित का कार्य स्वीकारा था। राम की प्राप्ति को वे सभी साधनों का श्रेष्ठ लाभ मानते हैं।
जप तप नियम जोग निज धर्मा। श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा ॥
ग्यान दया दम तीरथ मज्जन। जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन ॥
आगम निगम पुरान अनेका। पढ़े सुने कर फल प्रभु एका ॥
तब पद पंकज प्रीति निरंतर। सब साधन कर यह फल सुंदर ॥
छूटइ मल कि मलहि के धोएँ। घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएँ ॥
प्रेम भगति जल बिनु रघुराई। अभिअंतर मल कबहुँ न जाई ॥
सोइ सर्बग्य तग्य सोइ पंडित। सोइ गुन गृह बिग्यान अखंडित ॥
दच्छ सकल लच्छन जुत सोई। जाकें पद सरोज रति होई ॥
दोहा — मूल पाठ
नाथ एक बर मागउँ राम कृपा करि देहु।
जन्म जन्म प्रभु पद कमल कबहुँ घटै जनि नेहु ॥ ४९ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
वसिष्ठ कहते हैं कि जप, तप, ज्ञान, तीर्थ और शास्त्रों का सुंदर फल रामचरणों में निरंतर प्रेम है। प्रेमभक्ति के बिना अंतःकरण का मल नहीं मिटता। वे जन्म-जन्म में यह प्रेम कभी न घटने का वर माँगते हैं।
अस कहि मुनि बसिष्ट गृह आए। कृपासिंधु के मन अति भाए ॥
हनूमान भरतादिक भ्राता। संग लिए सेवक सुखदाता ॥
पुनि कृपाल पुर बाहेर गए। गज रथ तुरग मगावत भए ॥
देखि कृपा करि सकल सराहे। दिए उचित जिन्ह जिन्ह तेइ चाहे ॥
हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई। गए जहाँ सीतल अवँराई ॥
भरत दीन्ह निज बसन डसाई। बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई ॥
मारुतसुत तब मारूत करई। पुलक बपुष लोचन जल भरई ॥
हनूमान सम नहिं बड़भागी। नहिं कोउ राम चरन अनुरागी ॥
गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई। बार बार प्रभु निज मुख गाई ॥
दोहा — मूल पाठ
तेहिं अवसर मुनि नारद आए करतल बीन।
गावन लगे राम कल कीरति सदा नबीन ॥ ५० ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
गुरु के लौटने पर राम भाई और हनुमान सहित बाहर जाते हैं। उपवन में भरत आसन बिछाते और हनुमान पंखा करते हैं। शिव उनके भाग्य और रामप्रेम की प्रशंसा करते हैं। तभी नारद वीणा लेकर गुणगान करने आते हैं।
मामवलोकय पंकज लोचन। कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन ॥
नील तामरस स्याम काम अरि। हृदय कंज मकरंद मधुप हरि ॥
जातुधान बरूथ बल भंजन। मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन ॥
भूसुर ससि नव बृंद बलाहक। असरन सरन दीन जन गाहक ॥
भुज बल बिपुल भार महि खंडित। खर दूषन बिराध बध पंडित ॥
रावनारि सुखरूप भूपबर। जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर ॥
सुजस पुरान बिदित निगमागम। गावत सुर मुनि संत समागम ॥
कारुनीक ब्यलीक मद खंडन। सब बिधि कुसल कोसला मंडन ॥
कलि मल मथन नाम ममताहन। तुलसीदास प्रभु पाहि प्रनत जन ॥
दोहा — मूल पाठ
प्रेम सहित मुनि नारद बरनि राम गुन ग्राम।
सोभासिंधु हृदयँ धरि गए जहाँ बिधि धाम ॥ ५१ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
नारद राम से कृपादृष्टि माँगते हैं। वे प्रभु को दीनों का आश्रय, सज्जनों के आनंददाता और पाप-अभिमान का नाश करने वाला कहते हैं। गुणगान करके राम का रूप हृदय में धर वे ब्रह्मलोक जाते हैं।
गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा। मैं सब कही मोरि मति जथा ॥
राम चरित सत कोटि अपारा। श्रुति सारदा न बरनै पारा ॥
राम अनंत अनंत गुनानी। जन्म कर्म अनंत नामानी ॥
जल सीकर महि रज गनि जाहीं। रघुपति चरित न बरनि सिराहीं ॥
बिमल कथा हरि पद दायनी। भगति होइ सुनि अनपायनी ॥
उमा कहिउँ सब कथा सुहाई। जो भुसुंडि खगपतिहि सुनाई ॥
कछुक राम गुन कहेउँ बखानी। अब का कहौं सो कहहु भवानी ॥
सुनि सुभ कथा उमा हरषानी। बोली अति बिनीत मृदु बानी ॥
धन्य धन्य मैं धन्य पुरारी। सुनेउँ राम गुन भव भय हारी ॥
दोहा — मूल पाठ
तुम्हरी कृपाँ कृपायतन अब कृतकृत्य न मोह।
जानेउँ राम प्रताप प्रभु चिदानंद संदोह ॥ ५२(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
नाथ तवानन ससि स्रवत कथा सुधा रघुबीर।
श्रवन पुटन्हि मन पान करि नहिं अघात मतिधीर ॥ ५२(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
शिव कहते हैं कि राम के अनंत चरित्र पूरे कहे नहीं जा सकते; कथा अटूट भक्ति देती है। पार्वती सुनकर कृतार्थ होती हैं और कहती हैं कि कृपा से उनका मोह मिटा। फिर भी कथा के अमृत से उनका मन तृप्त नहीं होता।
राम चरित जे सुनत अघाहीं। रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं ॥
जीवनमुक्त महामुनि जेऊ। हरि गुन सुनहीं निरंतर तेऊ ॥
भव सागर चह पार जो पावा। राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा ॥
बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा। श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा ॥
श्रवनवंत अस को जग माहीं। जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं ॥
ते जड़ जीव निजात्मक घाती। जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती ॥
हरिचरित्र मानस तुम्ह गावा। सुनि मैं नाथ अमिति सुख पावा ॥
तुम्ह जो कही यह कथा सुहाई। कागभसुंडि गरुड़ प्रति गाई ॥
दोहा — मूल पाठ
बिरति ग्यान बिग्यान दृढ़ राम चरन अति नेह।
बायस तन रघुपति भगति मोहि परम संदेह ॥ ५३ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
पार्वती रामकथा को संसार-सागर पार कराने की नाव कहती हैं। फिर पूछती हैं कि काकभुशुण्डि को कौए के शरीर में इतना ज्ञान, वैराग्य और दृढ़ रामप्रेम कैसे मिला। यह उनके हृदय की जिज्ञासा है।
नर सहस्र महँ सुनहु पुरारी। कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी ॥
धर्मसील कोटिक महँ कोई। बिषय बिमुख बिराग रत होई ॥
कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई। सम्यक ग्यान सकृत कोउ लहई ॥
ग्यानवंत कोटिक महँ कोऊ। जीवनमुक्त सकृत जग सोऊ ॥
तिन्ह सहस्र महुँ सब सुख खानी। दुर्लभ ब्रह्मलीन बिग्यानी ॥
धर्मसील बिरक्त अरु ग्यानी। जीवनमुक्त ब्रह्मपर प्रानी ॥
सब ते सो दुर्लभ सुरराया। राम भगति रत गत मद माया ॥
सो हरिभगति काग किमि पाई। बिस्वनाथ मोहि कहहु बुझाई ॥
दोहा — मूल पाठ
राम परायन ग्यान रत गुनागार मति धीर।
नाथ कहहु केहि कारन पायउ काक सरीर ॥ ५४ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
पार्वती धर्म, वैराग्य, ज्ञान और मुक्ति की क्रमशः दुर्लभता बताती हैं। इनसे भी दुर्लभ अभिमान-माया रहित रामभक्ति है। वे पूछती हैं कि ऐसे ज्ञानवान भक्त को कौए का शरीर किस कारण मिला।
यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा। कहहु कृपाल काग कहँ पावा ॥
तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी। कहहु मोहि अति कौतुक भारी ॥
गरुड़ महाग्यानी गुन रासी। हरि सेवक अति निकट निवासी ॥
तेहिं केहि हेतु काग सन जाई। सुनी कथा मुनि निकर बिहाई ॥
कहहु कवन बिधि भा संबादा। दोउ हरिभगत काग उरगादा ॥
गौरि गिरा सुनि सरल सुहाई। बोले सिव सादर सुख पाई ॥
धन्य सती पावन मति तोरी। रघुपति चरन प्रीति नहिं थोरी ॥
सुनहु परम पुनीत इतिहासा। जो सुनि सकल लोक भ्रम नासा ॥
उपजइ राम चरन बिस्वासा। भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा ॥
दोहा — मूल पाठ
ऐसिअ प्रस्न बिहंगपति कीन्ह काग सन जाइ।
सो सब सादर कहिहउँ सुनहु उमा मन लाइ ॥ ५५ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
पार्वती पूछती हैं कि शिव ने कथा कैसे सुनी और महान ज्ञानी गरुड़ ने काकभुशुण्डि से क्यों सुनी। शिव उनकी निर्मल जिज्ञासा की प्रशंसा करते और भ्रम हरने वाला इतिहास सुनाने का आश्वासन देते हैं।
मैं जिमि कथा सुनी भव मोचनि। सो प्रसंग सुनु सुमुखि सुलोचनि ॥
प्रथम दच्छ गृह तव अवतारा। सती नाम तब रहा तुम्हारा ॥
दच्छ जग्य तब भा अपमाना। तुम्ह अति क्रोध तजे तब प्राना ॥
मम अनुचरन्ह कीन्ह मख भंगा। जानहु तुम्ह सो सकल प्रसंगा ॥
तब अति सोच भयउ मन मोरें। दुखी भयउँ बियोग प्रिय तोरें ॥
सुंदर बन गिरि सरित तड़ागा। कौतुक देखत फिरउँ बेरागा ॥
गिरि सुमेर उत्तर दिसि दूरी। नील सैल एक सुन्दर भूरी ॥
तासु कनकमय सिखर सुहाए। चारि चारु मोरे मन भाए ॥
तिन्ह पर एक एक बिटप बिसाला। बट पीपर पाकरी रसाला ॥
सैलोपरि सर सुंदर सोहा। मनि सोपान देखि मन मोहा ॥
दोहा — मूल पाठ
-सीतल अमल मधुर जल जलज बिपुल बहुरंग।
कूजत कल रव हंस गन गुंजत मंजुल भृंग ॥ ५६ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
शिव सती-वियोग के बाद अपने भ्रमण का प्रसंग बताते हैं। सुमेरु के उत्तर में चार स्वर्णमय शिखरों वाला नील पर्वत है। वट, पीपल, पाकर और आम के वृक्ष तथा निर्मल सरोवर का मनोहारी वर्णन है।
तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई। तासु नास कल्पांत न होई ॥
माया कृत गुन दोष अनेका। मोह मनोज आदि अबिबेका ॥
रहे ब्यापि समस्त जग माहीं। तेहि गिरि निकट कबहुँ नहिं जाहीं ॥
तहँ बसि हरिहि भजइ जिमि कागा। सो सुनु उमा सहित अनुरागा ॥
पीपर तरु तर ध्यान सो धरई। जाप जग्य पाकरि तर करई ॥
आँब छाहँ कर मानस पूजा। तजि हरि भजनु काजु नहिं दूजा ॥
बर तर कह हरि कथा प्रसंगा। आवहिं सुनहिं अनेक बिहंगा ॥
राम चरित बिचीत्र बिधि नाना। प्रेम सहित कर सादर गाना ॥
सुनहिं सकल मति बिमल मराला। बसहिं निरंतर जे तेहिं ताला ॥
जब मैं जाइ सो कौतुक देखा। उर उपजा आनंद बिसेषा ॥
दोहा — मूल पाठ
तब कछु काल मराल तनु धरि तहँ कीन्ह निवास।
सादर सुनि रघुपति गुन पुनि आयउँ कैलास ॥ ५७ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
उस पर्वत पर काकभुशुण्डि ध्यान, जप, मानसपूजा और रामकथा करते हैं। अनेक पक्षी प्रेम से सुनते हैं। शिव भी हंस का रूप लेकर कुछ समय वहाँ रहते और आदरपूर्वक कथा सुनकर कैलास लौटते हैं।
गिरिजा कहेउँ सो सब इतिहासा। मैं जेहि समय गयउँ खग पासा ॥
अब सो कथा सुनहु जेही हेतू। गयउ काग पहिं खग कुल केतू ॥
जब रघुनाथ कीन्हि रन क्रीड़ा। समुझत चरित होति मोहि ब्रीड़ा ॥
इंद्रजीत कर आपु बँधायो। तब नारद मुनि गरुड़ पठायो ॥
बंधन काटि गयो उरगादा। उपजा हृदयँ प्रचंड बिषादा ॥
प्रभु बंधन समुझत बहु भाँती। करत बिचार उरग आराती ॥
ब्यापक ब्रह्म बिरज बागीसा। माया मोह पार परमीसा ॥
सो अवतार सुनेउँ जग माहीं। देखेउँ सो प्रभाव कछु नाहीं ॥
दोहा — मूल पाठ
-भव बंधन ते छूटहिं नर जपि जा कर नाम।
खर्ब निसाचर बाँधेउ नागपास सोइ राम ॥ ५८ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
राम के नागपाश की लीला के समय नारद गरुड़ को भेजते हैं। बंधन काटकर लौटते हुए उन्हें संदेह होता है: जिनके नाम से संसार का बंधन छूटता है, वे एक राक्षस के पाश में कैसे बँध सकते हैं?
नाना भाँति मनहि समुझावा। प्रगट न ग्यान हृदयँ भ्रम छावा ॥
खेद खिन्न मन तर्क बढ़ाई। भयउ मोहबस तुम्हरिहिं नाई ॥
ब्याकुल गयउ देवरिषि पाहीं। कहेसि जो संसय निज मन माहीं ॥
सुनि नारदहि लागि अति दाया। सुनु खग प्रबल राम कै माया ॥
जो ग्यानिन्ह कर चित अपहरई। बरिआई बिमोह मन करई ॥
जेहिं बहु बार नचावा मोही। सोइ ब्यापी बिहंगपति तोही ॥
महामोह उपजा उर तोरें। मिटिहि न बेगि कहें खग मोरें ॥
चतुरानन पहिं जाहु खगेसा। सोइ करेहु जेहि होइ निदेसा ॥
दोहा — मूल पाठ
अस कहि चले देवरिषि करत राम गुन गान।
हरि माया बल बरनत पुनि पुनि परम सुजान ॥ ५९ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
अपना संदेह न मिटने पर गरुड़ नारद के पास जाते हैं। नारद प्रभु की प्रबल माया बताते हैं, जो ज्ञानियों को भी मोहित करती है। वे गरुड़ को आगे का निर्देश लेने ब्रह्माजी के पास भेजते हैं।
तब खगपति बिरंचि पहिं गयऊ। निज संदेह सुनावत भयऊ ॥
सुनि बिरंचि रामहि सिरु नावा। समुझि प्रताप प्रेम अति छावा ॥
मन महुँ करइ बिचार बिधाता। माया बस कबि कोबिद ग्याता ॥
हरि माया कर अमिति प्रभावा। बिपुल बार जेहिं मोहि नचावा ॥
अग जगमय जग मम उपराजा। नहिं आचरज मोह खगराजा ॥
तब बोले बिधि गिरा सुहाई। जान महेस राम प्रभुताई ॥
बैनतेय संकर पहिं जाहू। तात अनत पूछहु जनि काहू ॥
तहँ होइहि तव संसय हानी। चलेउ बिहंग सुनत बिधि बानी ॥
दोहा — मूल पाठ
परमातुर बिहंगपति आयउ तब मो पास।
जात रहेउँ कुबेर गृह रहिहु उमा कैलास ॥ ६० ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
ब्रह्माजी गरुड़ की बात सुनकर राम को प्रणाम करते हैं। वे स्वयं पर भी माया का प्रभाव स्मरण करते हैं। राम की प्रभुता के ज्ञाता शिव से संदेह दूर करने को कहते हैं। गरुड़ तब शिव के पास पहुँचते हैं।
तेहिं मम पद सादर सिरु नावा। पुनि आपन संदेह सुनावा ॥
सुनि ता करि बिनती मृदु बानी। परेम सहित मैं कहेउँ भवानी ॥
मिलेहु गरुड़ मारग महँ मोही। कवन भाँति समुझावौं तोही ॥
तबहि होइ सब संसय भंगा। जब बहु काल करिअ सतसंगा ॥
सुनिअ तहाँ हरि कथा सुहाई। नाना भाँति मुनिन्ह जो गाई ॥
जेहि महुँ आदि मध्य अवसाना। प्रभु प्रतिपाद्य राम भगवाना ॥
नित हरि कथा होत जहँ भाई। पठवउँ तहाँ सुनहि तुम्ह जाई ॥
जाइहि सुनत सकल संदेहा। राम चरन होइहि अति नेहा ॥
दोहा — मूल पाठ
बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग।
मोह गएँ बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग ॥ ६१ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
शिव गरुड़ से कहते हैं कि लंबे सत्संग और हरिकथा से संदेह दूर होगा। कथा के आदि, मध्य और अंत में राम ही प्रतिपाद्य हैं। मोह मिटे बिना रामचरणों में दृढ़ प्रेम नहीं होता; कथा उसके लिए आवश्यक आधार है।
मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। किएँ जोग तप ग्यान बिरागा ॥
उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला। तहँ रह काकभुसुंडि सुसीला ॥
राम भगति पथ परम प्रबीना। ग्यानी गुन गृह बहु कालीना ॥
राम कथा सो कहइ निरंतर। सादर सुनहिं बिबिध बिहंगबर ॥
जाइ सुनहु तहँ हरि गुन भूरी। होइहि मोह जनित दुख दूरी ॥
मैं जब तेहि सब कहा बुझाई। चलेउ हरषि मम पद सिरु नाई ॥
ताते उमा न मैं समुझावा। रघुपति कृपाँ मरमु मैं पावा ॥
होइहि कीन्ह कबहुँ अभिमाना। सो खौवै चह कृपानिधाना ॥
कछु तेहि ते पुनि मैं नहिं राखा। समुझइ खग खगही कै भाषा ॥
प्रभु माया बलवंत भवानी। जाहि न मोह कवन अस ग्यानी ॥
दोहा — मूल पाठ
ग्यानि भगत सिरोमनि त्रिभुवनपति कर जान।
ताहि मोह माया नर पावँर करहिं गुमान ॥ ६२(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
सिव बिरंचि कहुँ मोहइ को है बपुरा आन।
अस जियँ जानि भजहिं मुनि माया पति भगवान ॥ ६२(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
शिव गरुड़ को नील पर्वत पर रहने वाले ज्ञानी भक्त काकभुशुण्डि के पास भेजते हैं। वे प्रभु की कृपा में छिपे अभिमानहरण का संकेत देते हैं। माया से बड़े ज्ञानी भी मोहित होते हैं, इसलिए माया के स्वामी का भजन करना चाहिए।
गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुंडा। मति अकुंठ हरि भगति अखंडा ॥
देखि सैल प्रसन्न मन भयऊ। माया मोह सोच सब गयऊ ॥
करि तड़ाग मज्जन जलपाना। बट तर गयउ हृदयँ हरषाना ॥
बृद्ध बृद्ध बिहंग तहँ आए। सुनै राम के चरित सुहाए ॥
कथा अरंभ करै सोइ चाहा। तेही समय गयउ खगनाहा ॥
आवत देखि सकल खगराजा। हरषेउ बायस सहित समाजा ॥
अति आदर खगपति कर कीन्हा। स्वागत पूछि सुआसन दीन्हा ॥
करि पूजा समेत अनुरागा। मधुर बचन तब बोलेउ कागा ॥
दोहा — मूल पाठ
नाथ कृतारथ भयउँ मैं तव दरसन खगराज।
आयसु देहु सो करौं अब प्रभु आयहु केहि काज ॥ ६३(क) ॥
दोहा — मूल पाठ
सदा कृतारथ रूप तुम्ह कह मृदु बचन खगेस।
जेहि कै अस्तुति सादर निज मुख कीन्हि महेस ॥ ६३(ख) ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
गरुड़ आश्रम पहुँचते ही प्रसन्न और संशयरहित होते हैं। सरोवर में स्नान करके कथा-सभा में आते हैं। काकभुशुण्डि उनका आदरपूर्वक स्वागत करते हैं। दोनों एक-दूसरे के भक्तिसौभाग्य का सम्मान करते हैं।
सुनहु तात जेहि कारन आयउँ। सो सब भयउ दरस तव पायउँ ॥
देखि परम पावन तव आश्रम। गयउ मोह संसय नाना भ्रम ॥
अब श्रीराम कथा अति पावनि। सदा सुखद दुख पुंज नसावनि ॥
सादर तात सुनावहु मोही। बार बार बिनवउँ प्रभु तोही ॥
सुनत गरुड़ कै गिरा बिनीता। सरल सुप्रेम सुखद सुपुनीता ॥
भयउ तासु मन परम उछाहा। लाग कहै रघुपति गुन गाहा ॥
प्रथमहिं अति अनुराग भवानी। रामचरित सर कहेसि बखानी ॥
पुनि नारद कर मोह अपारा। कहेसि बहुरि रावन अवतारा ॥
प्रभु अवतार कथा पुनि गाई। तब सिसु चरित कहेसि मन लाई ॥
दोहा — मूल पाठ
बालचरित कहिं बिबिध बिधि मन महँ परम उछाह।
रिषि आगवन कहेसि पुनि श्री रघुबीर बिबाह ॥ ६४ ॥
इस पूरे प्रसंग का समेकित सरल हिंदी अर्थ
गरुड़ कहते हैं कि दर्शन से उनका भ्रम मिट गया है, अब वे पावन रामकथा सुनना चाहते हैं। काकभुशुण्डि प्रेमपूर्वक मानस की भूमिका, नारद-मोह, रावण का जन्म, रामावतार, बाललीला और विवाह की कथा सुनाते हैं।
काकभुशुण्डि अभिषेक की तैयारी से वनगमन, केवट, प्रयाग, वाल्मीकि और चित्रकूट तक कथा कहते हैं। दशरथ-वियोग, भरत का मिलन और पादुका-प्राप्ति के बाद विराध, शरभंग, सुतीक्ष्ण तथा अगस्त्य के प्रसंगों का स्मरण करते हैं।
मूल रचना गोस्वामी तुलसीदास की है। मूल पाठ के लिए देवनागरी डिजिटल संस्करण और संदिग्ध स्थानों के मिलान के लिए मुद्रित संस्करण का संदर्भ लिया गया है। संस्करणों में वर्तनी और पाठांतर मिल सकते हैं। हिंदी अर्थ भक्ति भावना के लिए स्वतंत्र रूप से लिखे गए हैं।
🚩 श्री राम भजन ओ मेरे रघुवर तू ही सहारा है प्रभु श्रीराम के प्रति प्रेम, विश्वास और पूर्ण समर्पण से भरा सुंदर भक्तिमय भजन। ▶ Instagram पर भजन देखें भजन लिरिक्स ॥ श्री राम ॥ ओ मेरे रघुवर तू ही सहारा है, मेरी नैय्यां का तू ही किनारा है।। ओ मेरे रघुवर तू ही सहारा है, मेरे रघुवर तू ही सहारा है।। मेरे ख्वाबों में तू, मेरी स्वासों में तू, मेरे दिल की धड़कन में, बस तू ही तू। मेरे ख्वाबों में तू, मेरी स्वासों में तू, मेरे दिल की धड़कन में, बस तू ही तू।। दीवाने तेरे प्यार में, बड़ा ही बुरा हाल, है पड़ा हूँ तेरे दर पे, ना होश ना ख्याल। मेरी नैय्यां का तू ही किनारा है, ओ मेरे रघुवर तू ही सहारा है, मेरे रघुवर तू ही सहारा है।। मेरी नैय्यां का तू ही किनारा है।। अंधेरों में जैसे उजाले हो तुम उजाले ही तुम, गिरतों को कितने सम्हाले हो तुम, सम्हाले ही तुम। तेरे बिना रघुवर मेरी, दुनियाँ वीरान है, तेरी किरपा से मेरी दुनियाँ में पहिचान है। मेरी नैय्यां का तू ही किनारा है, ओ मेरे रघुवर तू ही...
🚩 श्रीरामचरितमानस श्रीरामचरितमानस की 24 प्रसिद्ध चौपाइयाँ प्रेम, भक्ति, सत्संग, कर्म, सद्बुद्धि, परोपकार और प्रभु श्रीराम की कृपा का मार्ग दिखाने वाली श्रीरामचरितमानस की प्रसिद्ध चौपाइयाँ सरल हिंदी अर्थ सहित। श्रीरामचरितमानस गोस्वामी तुलसीदासजी की अमर रचना है। इसमें प्रभु श्रीराम की कथा के साथ जीवन, भक्ति, धर्म, प्रेम, कर्म, सदाचार, सत्संग और लोककल्याण की अनेक शिक्षाएँ मिलती हैं। यहाँ 24 प्रसिद्ध चौपाइयों को सरल भावार्थ के साथ प्रस्तुत किया गया है, ताकि उनके संदेश को सहज रूप से समझा और जीवन में अपनाया जा सके। 📜 इस संग्रह में ❤️ प्रेम और भक्ति 🌿 जीवन और नीति 🙏 संकट और विश्वास 🚩 रामराज्य और आदर्श जीवन ❤️ प्रेम और भक्ति प्रभु-प्रेम, समर्पण और निर्मल हृदय का संदेश 01 प्रभु को केवल प्रेम प्रिय है रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा॥ ...
🌺 श्रीरामचरितमानस • बालकाण्ड जय जय गिरिवरराज किशोरी — सीता जी की गौरी स्तुति पुष्पवाटिका में प्रभु श्रीराम के दर्शन के बाद माता सीता द्वारा माता गौरी से की गई पावन प्रार्थना, संपूर्ण प्रसंग और सरल हिंदी अर्थ सहित। माता सीता ने गौरी स्तुति कब की? श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में जनकपुर की पुष्पवाटिका का अत्यंत सुंदर प्रसंग आता है। माता सीता अपनी सखियों के साथ गौरी पूजन के लिए आई थीं। इसी वाटिका में उन्होंने पहली बार प्रभु श्रीराम को देखा। श्रीराम के दिव्य स्वरूप को देखकर उनका मन प्रेम से भर गया। उसी समय उन्हें अपने पिता महाराज जनक का वह प्रण भी स्मरण हुआ कि जो शिवजी के महान धनुष को उठाकर तोड़ेगा, उसी से सीता का विवाह होगा। माता सीता श्रीराम की छवि को हृदय में धारण करके पुनः माता भवानी के मंदिर में गईं और हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगीं। 🌸 पुष्पवाटिका में श्रीराम के दर्शन 🏹 पिता जनक के प्रण का स्मरण 🙏 गौरी माता से प्रार्थना ...
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