ईशावास्य उपनिषद् सम्पूर्ण — सभी 18 मंत्र, शांतिपाठ और सरल हिंदी अर्थ

भक्ति भावना प्रस्तुत · शुक्ल यजुर्वेद की उपनिषद्

ईशावास्य उपनिषद् सम्पूर्ण

सभी 18 मंत्र · शांतिपाठ · प्रत्येक मंत्र का सरल हिंदी अर्थ

एक ही लेख में18 मूल मंत्र18 सरल अर्थ

ईशावास्य उपनिषद् को ईशोपनिषद् या ईश उपनिषद् भी कहते हैं। यह शुक्ल यजुर्वेद से सम्बद्ध प्रमुख उपनिषदों में है। इसकी छोटी-सी रचना में ईश्वर की व्यापकता, त्याग, कर्तव्य, आत्मदर्शन, समदृष्टि और सत्य की प्रार्थना का गहरा विचार मिलता है। यहाँ काण्व परम्परा का प्रचलित 18-मंत्र क्रम प्रस्तुत है।

अर्थ पढ़ने से पहले: नीचे दिया हिंदी अर्थ भक्ति भावना की स्वतंत्र सरल व्याख्या है, मूल मंत्र का भाग नहीं। विशेषतः मंत्र 9–14 के तकनीकी शब्दों का आशय शांकरभाष्य के प्रसंग से समझाया गया है। अन्य भाष्य-परम्पराओं में इनके अर्थ भिन्न हो सकते हैं। वैदिक स्वरचिह्नों के बिना यह अध्ययन-पाठ है।

पूर्णमदः शांतिपाठ

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
सरल हिंदी अर्थवह पूर्ण है, यह भी पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण प्रकट होता है; पूर्ण से पूर्ण ले लेने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है। परम सत्य की पूर्णता किसी वस्तु की तरह घटती-बढ़ती नहीं। अंत में तीन बार शांति की प्रार्थना है।

यह प्रचलित शांतिपाठ मुख्य 18 मंत्रों से अलग रखा गया है।

मंत्र 1 · ईश्वर की व्यापकता और त्याग

ॐ ईशा वास्यमिदꣳ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थइस गतिशील जगत में जो कुछ भी है, सबको ईश्वर से व्याप्त समझो। त्याग और अनासक्ति के सहारे अपना जीवन सँभालो; किसी के धन के लिए लालच मत करो। ‘भुञ्जीथा’ की व्याख्या आत्मरक्षा तथा त्यागपूर्वक भोग—दोनों रूपों में की जाती है। यहाँ मुख्य संकेत स्वामित्व के अभिमान और लोभ से मुक्त होने का है।
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मंत्र 2 · कर्तव्य करते हुए जीवन

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतꣳ समाः । एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ॥ २॥
सरल हिंदी अर्थयहाँ अपने विहित कर्म करते हुए मनुष्य सौ वर्ष जीने की इच्छा करे। जीवन की इच्छा रखने वाले के लिए कर्म से बचना उपाय नहीं है; उचित रीति से कर्तव्य निभाने पर कर्म उसे बाँधता नहीं। सौ वर्ष की बात दीर्घ जीवन की कामना है, किसी व्यक्ति की निश्चित आयु का वचन नहीं।
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मंत्र 3 · आत्मस्वरूप की उपेक्षा

असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽऽवृताः । ताꣳस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ॥ ३॥
सरल हिंदी अर्थघोर अज्ञान के अँधेरे से ढके हुए लोकों को यहाँ असुर्य लोक कहा गया है। आत्मा के सत्य को उपेक्षित रखने वाले लोग मृत्यु के बाद उन्हीं की ओर जाते हैं। ‘आत्महन’ का आध्यात्मिक आशय अपने वास्तविक स्वरूप को अज्ञान से ढक देना है; अविनाशी आत्मा का सचमुच नाश होना अभिप्रेत नहीं है।
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मंत्र 4 · मन से भी परे आत्मतत्त्व

अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्षत् । तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥ ४॥
सरल हिंदी अर्थवह एक आत्मतत्त्व अचल होकर भी मन से अधिक वेगवान कहा गया है। इन्द्रियाँ उसे पकड़ नहीं पातीं; मन जहाँ पहुँचे, वह वहाँ पहले से उपस्थित है। स्वयं स्थिर रहते हुए भी वह दौड़ने वालों से आगे है। उसी के आधार पर मातरिश्वा अर्थात् वायु जगत के कार्यों को धारण करता है। यह वर्णन सर्वव्यापक चैतन्य का है, किसी भौतिक गति की माप का नहीं।
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मंत्र 5 · दूर भी, निकट भी

तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके । तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः ॥ ५॥
सरल हिंदी अर्थवह चलता हुआ भी है और अपने स्वरूप में अचल भी; दूर भी है और अत्यन्त समीप भी। वह समस्त जगत के भीतर भी है और उसके बाहर भी। इन विपरीत से लगने वाले कथनों से समझाया गया है कि आत्मतत्त्व किसी एक स्थान, गति या सीमा में बँधा नहीं है।
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मंत्र 6 · सबमें आत्मा का दर्शन

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते ॥ ६॥
सरल हिंदी अर्थजो सभी प्राणियों को अपने आत्मस्वरूप में और अपने आत्मस्वरूप को सभी प्राणियों में देखता है, वह किसी से घृणा नहीं करता। इस दृष्टि में दूसरे को अपने से सर्वथा अलग मानकर तिरस्कार करने का आधार मिट जाता है। समदृष्टि का व्यावहारिक फल करुणा और द्वेष का क्षय है।
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मंत्र 7 · एकत्व से शोक-मोह का क्षय

यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः । तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ॥ ७॥
सरल हिंदी अर्थजिस ज्ञानी के लिए सभी प्राणी आत्मस्वरूप ही हो गए हों और जो एकत्व का प्रत्यक्ष बोध रखता हो, उसके लिए मोह और शोक का आधार कहाँ रह जाता है? यहाँ केवल एक विचार मान लेने की नहीं, आत्मस्वरूप को जानने से होने वाले भीतरी परिवर्तन की बात है।
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मंत्र 8 · शुद्ध, अशरीरी और सर्वज्ञ

स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरꣳ शुद्धमपापविद्धम् । कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ ८॥
सरल हिंदी अर्थवह आत्मतत्त्व सर्वत्र व्याप्त, प्रकाशस्वरूप, शरीर से रहित, घाव और स्नायु से परे, निर्मल तथा पाप से अछूता है। वह सबको देखने वाला, मन का नियन्ता, सबसे परे और स्वयं स्थित है। उसी ने अनादि व्यवस्था में वस्तुओं और उनके कार्यों को यथार्थ रूप से नियत किया है।
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मंत्र 9 · विद्या-अविद्या का प्रसंग

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाꣳ रताः ॥ ९॥
सरल हिंदी अर्थकेवल अविद्या की उपासना करने वाले अँधेरे में जाते हैं; केवल विद्या में लगे रहने वालों के लिए भी उससे बड़ा अँधेरा कहा गया है। इस मंत्र-समूह के शांकरभाष्य में ‘अविद्या’ का आशय विहित कर्म और ‘विद्या’ का आशय देवता-विषयक उपासना है। एक को छोड़कर दूसरे में ही सीमित हो जाने की आलोचना है; आत्मज्ञान या पढ़ाई-लिखाई की निन्दा नहीं।
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मंत्र 10 · साधनों के फल में भेद

अन्यदेवाहुर्विद्ययाऽन्यदाहुरविद्यया । इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥ १०॥
सरल हिंदी अर्थविद्या से एक प्रकार का फल मिलता है और अविद्या से दूसरा—ऐसा उन धीर आचार्यों से सुना गया है जिन्होंने यह विषय समझाया। पिछले मंत्र के प्रसंग में उपासना और कर्म को एक ही परिणाम देने वाला मान लेना उचित नहीं है। साधना के साधन, उद्देश्य और फल को समझना आवश्यक है।
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मंत्र 11 · कर्म और उपासना का संयुक्त अभ्यास

विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयꣳ सह । अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥ ११॥
सरल हिंदी अर्थजो विद्या और अविद्या, दोनों को साथ समझता है, वह अविद्या से मृत्यु को पार करता और विद्या से अमृत को प्राप्त करता है। शांकरभाष्य के अनुसार यहाँ विहित कर्म तथा देवता-उपासना का समुचित अभ्यास अभिप्रेत है। इस प्रसंग का ‘अमृत’ देवताभाव की सापेक्ष उपलब्धि है; इसे पहले के मंत्रों में वर्णित परम आत्मज्ञान के समान नहीं मानना चाहिए।
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मंत्र 12 · सम्भूति और असम्भूति

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसम्भूतिमुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ सम्भूत्याꣳ रताः ॥ १२॥
सरल हिंदी अर्थकेवल असम्भूति की उपासना करने वाले अँधेरे में जाते हैं; केवल सम्भूति में लगे रहने वालों के लिए भी अधिक अँधेरा कहा गया है। शांकर व्याख्या में असम्भूति अव्यक्त कारण-प्रकृति और सम्भूति व्यक्त कार्य-ब्रह्म, अर्थात् हिरण्यगर्भ है। इन सीमित उपासनाओं में से किसी एक को ही परम पूर्णता मान लेने के स्थान पर उनके स्वरूप और फल समझने का आग्रह है।
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मंत्र 13 · व्यक्त और अव्यक्त उपासना के फल

अन्यदेवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात् । इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥ १३॥
सरल हिंदी अर्थसम्भूति की उपासना का फल अलग बताया गया है और असम्भूति की उपासना का फल अलग। ऐसा उन धीर आचार्यों से सुना गया है जिन्होंने इस भेद को स्पष्ट किया। यहाँ व्यक्त कार्य और अव्यक्त कारण की उपासना के परिणाम अलग हैं; केवल उनके नाम बदल देने से उनका प्रयोजन एक नहीं हो जाता।
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मंत्र 14 · विनाशशील और कारण का विवेक

सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयꣳ सह । विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्याऽमृतमश्नुते ॥ १४॥
सरल हिंदी अर्थमंत्र दोनों पक्षों को साथ जानने, विनाश के द्वारा मृत्यु को पार करने और सम्भूति के द्वारा अमृत पाने की बात कहता है। शांकरभाष्य यहाँ ‘सम्भूति’ में आरम्भिक ‘अ’ का लोप मानकर असम्भूति का अर्थ लेता है। उसके अनुसार विनाशशील कार्य-ब्रह्म की उपासना से सीमित दुर्बलताओं का अतिक्रमण और अव्यक्त कारण की उपासना से प्रकृति-लय मिलता है। यह सापेक्ष फल है; आत्मज्ञान से मिलने वाली परम मुक्ति से इसका भेद रखा गया है।
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मंत्र 15 · सत्य का आवरण हटे

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् । तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥ १५॥
सरल हिंदी अर्थसत्य का मुख एक स्वर्णमय पात्र से ढका हुआ है। हे पूषन्, जगत का पोषण करने वाले! सत्यधर्म में स्थित साधक को दर्शन देने के लिए उस आवरण को हटा दीजिए। सूर्य की चमक के बिंब के माध्यम से बाहरी प्रकाश से आगे सत्य के स्वरूप को देखने की प्रार्थना है।
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मंत्र 16 · कल्याणमय पुरुष का दर्शन

पूषन्नेकर्षे यम सूर्य प्राजापत्य व्यूह रश्मीन् समूह तेजः । यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥ १६॥
सरल हिंदी अर्थहे पूषन्, एकर्षि, यम, सूर्य और प्रजापति के पुत्र! अपनी किरणों को समेटिए और अपना तेज संकुचित कीजिए, ताकि मैं आपके सबसे कल्याणमय स्वरूप का दर्शन कर सकूँ। उस सूर्य में जो पुरुष है, वही मैं हूँ—ऐसा आत्मएकत्व का बोध व्यक्त किया गया है। यह देह या व्यक्तिगत अहंकार को सूर्य के बराबर बताने का कथन नहीं है।
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मंत्र 17 · अन्तिम स्मरण

वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तꣳ शरीरम् । ॐ क्रतो स्मर कृतꣳ स्मर क्रतो स्मर कृतꣳ स्मर ॥ १७॥
सरल हिंदी अर्थमेरा प्राण व्यापक अमृत वायु में मिल जाए और यह शरीर भस्म हो जाए। हे संकल्पमय मन! स्मरण कर, किए हुए कर्मों का स्मरण कर—यह बात दो बार कही गई है। देह की अनित्यता के बीच साधक अपने संकल्प, साधना और कर्म के स्मरण की ओर लौटता है।
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मंत्र 18 · सुपथ की प्रार्थना

अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नमौक्तिं विधेम ॥ १८॥
सरल हिंदी अर्थहे अग्निदेव! आप हमारे सभी कर्मों और मार्गों को जानते हैं। हमें श्रेष्ठ प्राप्ति की ओर ले जाने वाले शुभ मार्ग से चलाइए; हमसे टेढ़े पाप को दूर कीजिए। हम बार-बार आपको नमस्कार के वचन अर्पित करते हैं। ग्रंथ का समापन अपने पुरुषार्थ के साथ दिव्य मार्गदर्शन माँगने की विनम्र प्रार्थना में होता है।
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पूरे ग्रंथ का मुख्य भाव

सबमें परमात्मा की व्यापकता को पहचानना, लोभ छोड़ना, अपने कर्तव्य को समझना और आत्मदर्शन की ओर बढ़ना—ये इस उपनिषद् के प्रमुख सूत्र हैं। सब प्राणियों में एक आत्मतत्त्व का दर्शन घृणा से दूर ले जाता है। अंतिम मंत्र सत्य के आवरण हटाने और शुभ मार्ग पर चलने की प्रार्थना सिखाते हैं।

कठिन शब्दों के सरल अर्थ

  • ईशा वास्यम्: ईश्वर से व्याप्त / ईश्वरभाव से आच्छादित
  • त्यक्तेन: त्याग या अनासक्ति के द्वारा
  • मा गृधः: लालच मत करो
  • जिजीविषेत्: जीने की इच्छा करे
  • आत्महनः: यहाँ आत्मस्वरूप को अज्ञान से उपेक्षित रखने वाले
  • मातरिश्वा: वायु; जगत की प्राण-क्रियाओं का धारक
  • विजुगुप्सते: घृणा करता है / तिरस्कार करता है
  • स्वयम्भूः: स्वयं स्थित, किसी दूसरे पर निर्भर नहीं
  • विद्या–अविद्या: मंत्र 9–11 की शांकर व्याख्या में देवता-उपासना और विहित कर्म
  • सम्भूति: उत्पन्न / व्यक्त कार्य; यहाँ भाष्य के अनुसार कार्य-ब्रह्म
  • असम्भूति: अव्यक्त कारण-प्रकृति
  • पूषन्: पोषण करने वाले; सूर्य का सम्बोधन
  • हिरण्मय: स्वर्णमय / तेजोमय
  • क्रतो: हे संकल्पमय मन!
  • वयुनानि: कर्म, ज्ञान या उनके मार्ग
  • जुहुराणम् एनः: टेढ़ा ले जाने वाला पाप

पाठ-स्रोत और संपादकीय टिप्पणी

प्राचीन वैदिक मूल मंत्र सार्वजनिक सम्पदा की रचना हैं। यहाँ 18 मंत्रों के मूल शब्द और क्रम आधार-पाठ के अनुसार हैं। मंत्र 8 में केवल पंक्ति के अंत के मुद्रण-हाइफ़न हटाकर जुड़े शब्द निरन्तर किए गए हैं; अन्यत्र पंक्ति-विन्यास और रिक्त स्थान पढ़ने की सुविधा से रखे गए हैं। वैदिक अनुनासिक चिह्न ‘ꣳ’ मूल के अनुसार सुरक्षित है। प्रारम्भ का शांतिपाठ मुख्य मंत्रों से अलग है; अंत में उसी पाठ की पुनरावृत्ति नहीं की गई है।

शाखा और संस्करण के अनुसार क्रम एवं छोटे पाठांतर मिलते हैं। मंत्र 14 में आधार मूल का ‘सम्भूतिं’ पाठ सुरक्षित है, जबकि शांकरभाष्य उसका ‘असम्भूतिं’ आशय आरम्भिक अकार के लोप से स्पष्ट करता है। अर्थ में यह अंतर खुलकर बताया गया है। मंत्र 9–14 के अमृत-फल को इसी भाष्य के अनुसार सापेक्ष उपलब्धि कहा गया है; उसे परम आत्मज्ञान का पर्याय नहीं बनाया गया है।

हिंदी व्याख्या और अध्ययन-शीर्षक भक्ति भावना की स्वतंत्र प्रस्तुति हैं। किसी आधुनिक हिंदी अनुवाद का पाठ यहाँ प्रतिलिपित नहीं है।

॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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