माण्डूक्योपनिषद् सम्पूर्ण — सभी 12 मंत्र, ॐ और आत्मा के चार पाद का सरल हिंदी अर्थ

भक्ति भावना प्रस्तुत · अथर्ववेदीय उपनिषद्

माण्डूक्योपनिषद् सम्पूर्ण

मूल पाठ और प्रत्येक मंत्र का सरल हिंदी अर्थ

एक ही लेख में12 मूल मंत्रॐ · आत्मा · तुरीय

माण्डूक्योपनिषद् अथर्ववेद से सम्बद्ध संक्षिप्त और गहन उपनिषद् है। केवल 12 मंत्रों में यह ओंकार, आत्मा और अनुभव की अवस्थाओं का विवेचन करता है। इसका प्रसिद्ध वाक्य है—अयमात्मा ब्रह्म। जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति को समझाते हुए यह उस अद्वैत आत्मसत्य की ओर संकेत करता है जिसे चतुर्थ या तुरीय कहा जाता है। इसे मांडूक्य उपनिषद् भी लिखा जाता है।

पढ़ने की व्यवस्था: सभी 12 मूल मंत्र और उनके अर्थ इसी पोस्ट में हैं। गौड़पादाचार्य की माण्डूक्यकारिका एक अलग व्याख्यात्मक रचना है; उसे इन 12 मूल मंत्रों की गिनती में सम्मिलित नहीं किया गया है।

आरम्भिक शांतिपाठ

ॐ भद्रं कर्णेभिः श‍ृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ भद्रं नो अपि वातय मनः ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।
सरल हिंदी अर्थहे देवगण! हम कानों से शुभ सुनें और आँखों से शुभ देखें। स्थिर अंगों से स्तुति करते हुए देवहित में अपना जीवन बिताएँ। हमारा मन भी कल्याण की ओर प्रेरित हो। तीन बार शांति की प्रार्थना है।
हरिः ॐ ।

मंत्र 1 · ॐ और समस्त अस्तित्व

ॐ इत्येतदक्षरमिदꣳ सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद् भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थॐ यह अक्षर सम्पूर्ण जगत का सूचक है। जो भूतकाल में था, वर्तमान में है और भविष्य में होगा—सबका निरूपण ओंकार से किया जाता है। जो तीनों कालों से परे है, वह भी ओंकार द्वारा ही इंगित है।
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मंत्र 2 · अयमात्मा ब्रह्म

सर्वं ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात् ॥ २॥
सरल हिंदी अर्थयह सब ब्रह्म है और यह आत्मा भी ब्रह्म है। उसी आत्मा के चार पाद, अर्थात् समझाने के चार पक्ष बताए जाते हैं। यहाँ ‘पाद’ शरीर का अंग नहीं, आत्मविवेचन का विभाग है।
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मंत्र 3 · जाग्रत · वैश्वानर

जागरितस्थानो बहिष्प्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः ॥ ३॥
सरल हिंदी अर्थपहला पाद वैश्वानर है—जाग्रत अवस्था में बाहर के विषयों को जानने वाला और स्थूल वस्तुओं का अनुभव करने वाला। उसके सात अंग और उन्नीस मुख बताए गए हैं। ‘मुख’ अनुभव के साधन हैं; सात अंग उसके समष्टि स्वरूप का संकेत हैं।
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मंत्र 4 · स्वप्न · तैजस

स्वप्नस्थानोऽन्तःप्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक्तैजसो द्वितीयः पादः ॥ ४॥
सरल हिंदी अर्थदूसरा पाद तैजस है—स्वप्न में भीतर के विषयों को जानने वाला। इसके भी सात अंग और उन्नीस मुख कहे गए हैं। यह बाहरी स्थूल वस्तुओं के स्थान पर मन में प्रकट सूक्ष्म अनुभवों का भोक्ता है।
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मंत्र 5 · सुषुप्ति · प्राज्ञ

यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत् सुषुप्तम् । सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥ ५॥
सरल हिंदी अर्थजिस अवस्था में सोया हुआ व्यक्ति किसी कामना का अनुभव नहीं करता और कोई स्वप्न नहीं देखता, वह सुषुप्ति है। उसमें अनुभवों के भेद एकरूप होकर अव्यक्त रहते हैं। उस अवस्था का प्राज्ञ तीसरा पाद है; उसे प्रज्ञानघन, आनन्दमय, आनन्द का भोक्ता और चेतना की अन्य अवस्थाओं का द्वार कहा गया है।
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मंत्र 6 · कारण स्वरूप और अन्तर्यामी

एष सर्वेश्वरः एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ॥ ६॥
सरल हिंदी अर्थयह प्राज्ञ, अपने समष्टि कारण स्वरूप में, सर्वेश्वर, सर्वज्ञ और अन्तर्यामी कहा गया है। यह समस्त प्राणियों का कारण है; उन्हीं का प्रकट होना और लय इसी में बताया गया है। यह कथन सोए हुए व्यक्ति के मन को सर्वज्ञ घोषित करना नहीं है।
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मंत्र 7 · तुरीय · शान्त, शिव और अद्वैत

नान्तःप्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतःप्रज्ञं न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणं अचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ ७॥
सरल हिंदी अर्थचतुर्थ को न स्वप्न जैसा भीतर का ज्ञान, न जाग्रत जैसा बाहर का ज्ञान, न दोनों का मिश्रण और न सुषुप्ति जैसी एकरूपता कहा जा सकता है। वह किसी सीमित ज्ञान-अवस्था में नहीं आता, पर अचेतन भी नहीं है। इन्द्रियों से अदृश्य, व्यवहार से परे, पकड़ और लक्षण से रहित, विचार तथा शब्दों की सीमा के पार उसका सार एक आत्मा का बोध है। उसमें भेदपूर्ण जगत का उपशम है; वह शान्त, कल्याणस्वरूप और अद्वैत है। वही आत्मा है, उसी को जानना चाहिए।
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मंत्र 8 · आत्मा और ओंकार की मात्राएँ

सोऽयमात्माध्यक्षरमोङ्कारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति ॥ ८॥
सरल हिंदी अर्थवही आत्मा अक्षर के दृष्टिकोण से ओंकार है। ओंकार की मात्राओं और आत्मा के पादों का परस्पर सम्बन्ध समझाया जाता है। उसकी तीन उच्चरित मात्राएँ अकार, उकार और मकार हैं। आगे इन्हें तीन अनुभव-अवस्थाओं से जोड़ा गया है।
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मंत्र 9 · अकार और जाग्रत

जागरितस्थानो वैश्वानरोऽकारः प्रथमा मात्राऽऽप्तेरादिमत्त्वाद् वाऽऽप्नोति ह वै सर्वान् कामानादिश्च भवति य एवं वेद ॥ ९॥
सरल हिंदी अर्थजाग्रत अवस्था का वैश्वानर ओंकार की पहली मात्रा ‘अ’ से सम्बद्ध है, क्योंकि ‘अ’ में व्याप्ति और प्रथम होने का संकेत लिया गया है। इस सम्बन्ध को जानने वाले के लिए मंत्र सभी कामनाओं की प्राप्ति और अग्रणी होने का फल कहता है। यह यहाँ वर्णित उपासना-फल है।
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मंत्र 10 · उकार और स्वप्न

स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्षात् उभयत्वाद्वोत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्ततिं समानश्च भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति य एवं वेद ॥ १०॥
सरल हिंदी अर्थस्वप्न अवस्था का तैजस दूसरी मात्रा ‘उ’ से सम्बद्ध है—उत्कर्ष के कारण और दोनों के बीच स्थित होने के कारण। इस प्रकार जानने वाले की ज्ञान-परम्परा की उन्नति तथा समता का फल कहा गया है। मंत्र आगे कहता है कि उसके कुल में ब्रह्मज्ञान से रहित व्यक्ति नहीं होता। यह उपासना की महिमा और उससे जुड़े फल का शास्त्रीय कथन है।
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मंत्र 11 · मकार और सुषुप्ति

सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा मितेरपीतेर्वा मिनोति ह वा इदं सर्वमपीतिश्च भवति य एवं वेद ॥ ११॥
सरल हिंदी अर्थसुषुप्ति का प्राज्ञ तीसरी मात्रा ‘म्’ से सम्बद्ध है। इसमें मापने और लय होने का साम्य लिया गया है। जो इसे जानता है, वह इस सबका परिमाण समझता है और सबके लय का आश्रय होता है—इस प्रकार मंत्र उपासना का फल बताता है।
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मंत्र 12 · अमात्र और आत्मबोध

अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोङ्कार आत्मैव संविशत्यात्मनाऽऽत्मानं य एवं वेद ॥ १२॥
सरल हिंदी अर्थचतुर्थ अमात्र है—तीन उच्चरित मात्राओं से परे। वह व्यवहार की सीमा में नहीं आता; उसमें प्रपंच का उपशम है, वह कल्याणस्वरूप और अद्वैत है। इस प्रकार ओंकार आत्मा ही है। जो ऐसा जानता है, वह आत्मा के द्वारा आत्मा में प्रवेश करता है, अर्थात् अपने वास्तविक आत्मस्वरूप का बोध पाता है।
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चार पाद और ओंकार · सरल सारणी

पाद / स्वरूपअनुभवओंकार
वैश्वानरजाग्रत · बाहरी स्थूल विषयअ
तैजसस्वप्न · आन्तरिक सूक्ष्म विषयउ
प्राज्ञसुषुप्ति · विषयभेद अव्यक्तम्
तुरीय / चतुर्थअद्वैत आत्मस्वरूपअमात्र

यह सारणी समझने की सुविधा है। तुरीय को पहले तीन अनुभवों के बाद आने वाली एक और साधारण मानसिक अवस्था न मानें; मंत्र 7 उसे उन सीमाओं से परे बताता है। अमात्र केवल ध्वनि बन्द हो जाने का नाम नहीं, अद्वैत आत्मतत्त्व का संकेत है।

कुछ जरूरी संकेत

सात अंग: वैश्वानर के समष्टि स्वरूप का परम्परागत निरूपण है; यह व्यक्ति के शरीर के सात अंग गिनने की बात नहीं है। उन्नीस मुख: पारम्परिक व्याख्या में पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण तथा मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त—अनुभव के उन्नीस साधन। मंत्र स्वयं इनके नाम अलग-अलग नहीं गिनाता।

सुषुप्ति और आत्मज्ञान: गहरी नींद में विषयों का भेद प्रकट नहीं होता; इसलिए केवल सो जाना ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना नहीं है। शिवम्: मंत्र 7 और 12 में यहाँ अर्थ ‘कल्याणस्वरूप’ है। मंत्र 9–11 के फल: इन्हें ग्रंथ में वर्णित उपासना-फल के रूप में पढ़ें; अर्थ में इन्हें व्यक्तिगत जीवन की निश्चित भविष्यवाणी नहीं बनाया गया है।

कठिन शब्दों के सरल अर्थ

  • अक्षर: प्रसंगानुसार ॐ का वर्ण-रूप; अविनाशी तत्त्व का भी संकेत
  • पाद: विवेचन का पक्ष / विभाग
  • बहिष्प्रज्ञ: बाहर के विषयों का ज्ञाता
  • अन्तःप्रज्ञ: भीतर के विषयों का ज्ञाता
  • प्रविविक्तभुक्: सूक्ष्म अनुभवों का भोक्ता
  • प्रज्ञानघन: अनुभवभेदों की अव्यक्त एकरूपता
  • अन्तर्यामी: भीतर स्थित नियामक
  • प्रपञ्चोपशम: भेदपूर्ण प्रपंच का उपशम
  • अद्वैत: द्वैत से रहित
  • तुरीय: चतुर्थ; अद्वैत आत्मस्वरूप
  • मात्रा: यहाँ ओंकार का उच्चरित भाग
  • अमात्र: उच्चरित मात्राओं से परे

मूल स्रोत और पाठ संबंधी टिप्पणी

यह प्राचीन सार्वजनिक-सम्पदा उपनिषद् का पूरा 12-मंत्र अध्ययन-पाठ है। आधार पाठ के मूल शब्द और क्रम सुरक्षित हैं। केवल रिक्त स्थान और पंक्तियों का विन्यास पढ़ने की सुविधा से रखा गया है। आधार स्रोत में दिया आरम्भिक शांतिपाठ मुख्य 12 मंत्रों से अलग रखा गया है। वैदिक स्वरचिह्नों वाला सस्वर पाठ यहाँ प्रस्तुत नहीं है।

तुलनात्मक पोर्टल में मंत्र 4 के ‘अन्तः प्रज्ञाः’ और मंत्र 8 के ‘ओङ्करो’ जैसे टंकण-भेद मिलते हैं; यहाँ आधार-पाठ के ‘अन्तःप्रज्ञः’ तथा ‘ओङ्कारो’ रूप रखे गए हैं। मंत्र 10 में आधार स्रोत की पंक्ति ‘उभयत्वाद्वोत्कर्षति’ यथावत है; शब्द-संधि से इसे ‘उभयत्वाद्वा उत्कर्षति’ समझा जाता है। हिंदी अर्थ, शीर्षक, सारणी और अध्ययन-संकेत भक्ति भावना की स्वतंत्र सरल व्याख्या हैं। गौड़पादकारिका और शंकरभाष्य का पाठ इस मूल उपनिषद् से अलग है।

॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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