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मुण्डकोपनिषद् सम्पूर्ण — तीनों मुण्डक, सभी 64 मंत्र और सरल हिंदी अर्थ
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भक्ति भावना प्रस्तुत · अथर्ववेद की ब्रह्मविद्या
मुण्डकोपनिषद् सम्पूर्ण
मूल पाठ और प्रत्येक मंत्र का सरल हिंदी अर्थ
एक ही लेख में3 मुण्डक · 6 खण्ड64 मूल मंत्र
मुण्डकोपनिषद् अथर्ववेद से सम्बद्ध प्रमुख उपनिषद् है। इसे मुण्डक उपनिषद् भी कहते हैं। शौनक ऋषि अंगिरस से पूछते हैं—किस एक तत्त्व को जान लेने से सब जाना हुआ हो जाता है? इस प्रश्न से परा और अपरा विद्या, कर्मफल की सीमा, योग्य गुरु, अक्षर ब्रह्म और आत्मज्ञान की यात्रा खुलती है। इसी ग्रंथ में ‘सत्यमेव जयते’, दो मित्र पक्षियों और ॐ को धनुष बताने वाले प्रसिद्ध मंत्र हैं।
पढ़ने की व्यवस्था: तीनों मुण्डक, छहों खण्ड और सभी 64 मंत्र इसी लेख में हैं। प्रत्येक मंत्र के नीचे उसका स्वतंत्र सरल हिंदी अर्थ है। 2.2.4 का संकेत दूसरा मुण्डक, दूसरा खण्ड, चौथा मंत्र है। शांतिपाठ और आरम्भिक वन्दना मुख्य 64 मंत्रों से अलग रखे गए हैं।
सरल हिंदी अर्थहे देवगण! हम कानों से कल्याणकारी सुनें और आँखों से शुभ देखें। स्थिर अंगों और स्वस्थ शरीर से स्तुति करते हुए नियत आयु को देवहित में बिताएँ। यशस्वी इन्द्र, पूषा, अरिष्टनेमि तार्क्ष्य और बृहस्पति हमारा कल्याण करें। तीन बार शांति की प्रार्थना है।
सरल हिंदी अर्थदेवताओं में पहले प्रकट हुए ब्रह्मा विश्व के कर्ता और रक्षक कहे गए हैं। उन्होंने सभी विद्याओं के आधार ब्रह्मविद्या का उपदेश अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को दिया। ग्रंथ ज्ञान की गुरु-शिष्य परम्परा से आरम्भ होता है।
सरल हिंदी अर्थब्रह्मा से प्राप्त ब्रह्मविद्या अथर्वा ने अंगिर को बताई। अंगिर ने सत्यवाह भारद्वाज को और भारद्वाज ने अंगिरस को परा तथा अपरा से सम्बद्ध यह विद्या दी।
सरल हिंदी अर्थमहाशाल गृहस्थ शौनक विधिपूर्वक अंगिरस के पास गए और पूछा—भगवन्! किस एक तत्त्व को जान लेने से यह सब जाना हुआ हो जाता है? यह समस्त ज्ञान के मूल आधार की जिज्ञासा है।
सरल हिंदी अर्थऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद तथा शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष अपरा विद्या हैं। परा वह है जिससे अविनाशी अक्षर का बोध होता है। भेद शास्त्रज्ञान और उसके परम प्रत्यक्ष लक्ष्य का है।
सरल हिंदी अर्थवह अक्षर इन्द्रियों से देखा या पकड़ा नहीं जाता; उसका गोत्र या वर्ण नहीं, न आँख-कान या हाथ-पैर हैं। वह नित्य, सर्वव्यापक, अतिसूक्ष्म और अविनाशी है। विवेकी उसे सभी प्राणियों का मूल कारण जानते हैं।
सरल हिंदी अर्थजैसे मकड़ी जाला निकालती और समेटती है, पृथ्वी से वनस्पतियाँ उगती हैं और जीवित व्यक्ति से केश-रोम उत्पन्न होते हैं, वैसे ही अक्षर ब्रह्म से यह विश्व प्रकट होता है। उपमाएँ कारण से कार्य के सम्बन्ध को समझाती हैं।
सरल हिंदी अर्थज्ञानमय तप से सृष्टि का विस्तार होता है। पहले अन्नरूप उपादान, फिर प्राण, मन, भूततत्त्व, लोक और कर्मों के फल का क्रम प्रकट होता है। यहाँ कर्मफल का अमृतत्व परम ब्रह्म की निरपेक्ष नित्यता के समान नहीं है।
यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः ।
तस्मादेतद्ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ॥ ९॥
सरल हिंदी अर्थजिसका तप ज्ञानमय है और जो सामान्य तथा विशेष, दोनों रूपों से सब जानता है, उसी से समष्टि ब्रह्मा, नाम, रूप और अन्न प्रकट होते हैं। सृष्टि के विविध पक्षों का आधार एक सर्वज्ञ सत्य बताया गया है।
सरल हिंदी अर्थमंत्रों में ऋषियों ने जिन कर्मों का दर्शन किया, वे तीन वेदों के क्षेत्र में अनेक रूपों में विस्तृत हुए। पुण्यफल चाहने वालों को उन्हें विधिपूर्वक करना चाहिए; वे सुकृत से मिलने वाले लोक का मार्ग हैं।
सरल हिंदी अर्थजब प्रज्वलित अग्नि की ज्वाला लहराने लगे, तब आज्यभागों के बीच आहुतियाँ देनी चाहिए। यह अग्निहोत्र की विधि का पाठ है; आगे ग्रंथ ऐसे कर्मों के फल और उनकी सीमा पर विचार करता है।
यस्याग्निहोत्रमदर्शमपौर्णमासमचातुर्मास्यमनाग्रयणमतिथिवर्जितं च ।
अहुतमवैश्वदेवमविधिना हुतमासप्तमांस्तस्य लोकान् हिनस्ति ॥ ३॥
सरल हिंदी अर्थदर्श, पूर्णमास, चातुर्मास्य, आग्रयण, अतिथि-सत्कार और वैश्वदेव से रहित अथवा विधिविरुद्ध अग्निहोत्र को अधूरा बताया गया है। कर्मकाण्ड के इस प्रसंग में कहा है कि वह यजमान के सातवें तक के लोकों को हानि पहुँचाता है।
काली कराली च मनोजवा च
सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा ।
स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी
लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः ॥ ४॥
सरल हिंदी अर्थकाली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुलिङ्गिनी और विश्वरुची—लहराती अग्नि की ये सात जिह्वाएँ कही गई हैं। ये ज्वाला के अलग-अलग रूप और गुण सूचित करती हैं।
सरल हिंदी अर्थजो इन प्रकाशमान ज्वालाओं में उचित समय पर आहुतियाँ देता है, उसकी आहुतियाँ सूर्य-किरणों के रूपक से उसे उस लोक तक ले जाती हैं जहाँ देवताओं का अधिपति निवास करता है। यह यज्ञ के फल का वर्णन है।
सरल हिंदी अर्थतेजस्वी आहुतियाँ मानो ‘आओ, आओ’ कहती हुई सूर्य-किरणों के साथ यजमान को ले जाती और मधुर वचन से उसका स्वागत करती हैं—यह तुम्हारे पुण्यकर्म का उच्च लोक है। आगे इसी प्राप्ति की अनित्यता समझाई जाती है।
सरल हिंदी अर्थअठारह अंगों से सम्बद्ध यज्ञरूप कर्मों को अदृढ़ नौकाएँ कहा गया है। जो इन्हें ही सर्वोच्च कल्याण मान लेते हैं, वे बुढ़ापे और मृत्यु में फिर लौटते हैं। कर्मफल सीमित है; वह अपने-आप परम आत्मज्ञान नहीं है।
सरल हिंदी अर्थअज्ञान के भीतर रहकर स्वयं को बुद्धिमान और पण्डित मानने वाले लोग भटकते रहते हैं। उनकी दशा अन्धे का अनुसरण करते अन्धों जैसी है। विद्वत्ता का अभिमान सत्य का बोध नहीं बन जाता।
सरल हिंदी अर्थअज्ञान की अनेक स्थितियों में रहते हुए भी अपरिपक्व लोग अपने को कृतार्थ मानते हैं। आसक्ति के कारण कर्मनिष्ठ लोग परम सत्य नहीं जान पाते; पुण्यलोक का फल क्षीण होने पर वे वहाँ से नीचे आते हैं।
इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं
नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः ।
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं
लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥ १०॥
सरल हिंदी अर्थयज्ञ और लोकहित के कर्मों को ही सर्वोच्च मानने वाले उनसे आगे का कल्याण नहीं जानते। स्वर्ग में पुण्यफल भोगकर वे इस लोक या उससे नीचे की गति में लौटते हैं। कर्म की उपयोगिता और उसकी अंतिम सीमा अलग रखी गई है।
तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये
शान्ता विद्वांसो भैक्ष्यचर्यां चरन्तः ।
सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति
यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥ ११॥
सरल हिंदी अर्थजो शान्त, विद्वान और श्रद्धावान साधक वन में तप करते तथा भिक्षाचर्या से जीवन चलाते हैं, वे मलरहित होकर सूर्यद्वार से उस अविनाशी पुरुष की प्राप्ति की ओर जाते हैं। यह अनुशासित उपासना की उच्च गति का वर्णन है।
सरल हिंदी अर्थकर्मों से प्राप्त लोकों की परीक्षा करके विवेकी ब्राह्मण वैराग्य पाए, क्योंकि अकृत नित्य सत्य कर्म से बनाया नहीं जा सकता। उसे जानने के लिए समिधा लेकर शास्त्रज्ञ और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाना चाहिए।
सरल हिंदी अर्थऐसे विधिपूर्वक आए, शान्त चित्त और संयम वाले शिष्य को ज्ञानी गुरु वह ब्रह्मविद्या यथार्थ रूप से बताता है जिससे सत्यस्वरूप अक्षर पुरुष का बोध होता है।
सरल हिंदी अर्थहे सौम्य! जैसे प्रज्वलित अग्नि से उसी के स्वरूप वाली हजारों चिनगारियाँ निकलती हैं, वैसे अक्षर से विविध प्राणी और पदार्थ प्रकट होते हैं तथा उसी में लौट जाते हैं। यह जगत के एक मूल आधार का दृष्टान्त है।
सरल हिंदी अर्थवह पुरुष दिव्य, निराकार और अजन्मा है; बाहर और भीतर सर्वत्र है। अपने स्वरूप में वह प्राण और मन के अधीन नहीं, निर्मल तथा अव्यक्त कारण से भी परे है।
सरल हिंदी अर्थउसी से प्राण, मन, सभी इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, ज्योति, जल और विश्व को धारण करने वाली पृथ्वी प्रकट होते हैं। बाहरी जगत और अनुभव के साधन, दोनों एक ही आधार पर निर्भर हैं।
सरल हिंदी अर्थअग्निरूप द्युलोक उसका मस्तक, चन्द्र-सूर्य नेत्र, दिशाएँ कान, प्रकट वेद वाणी, वायु प्राण और विश्व हृदय है; उसके चरणों से पृथ्वी है। यह सबके अन्तरात्मा का विराट् रूपक है।
सरल हिंदी अर्थउसी से वह अग्नि है जिसकी समिधा सूर्य है; चन्द्र से वर्षा, पृथ्वी पर वनस्पतियाँ और फिर प्रजनन का क्रम चलता है। स्त्री-पुरुष के द्वारा उत्पन्न अनेक प्रजाएँ भी उसी पुरुष पर आश्रित हैं।
सरल हिंदी अर्थऋचाएँ, साम, यजुर्मंत्र, दीक्षा, यज्ञ, क्रतु, दक्षिणा, वर्ष, यजमान और चन्द्र-सूर्य से सम्बद्ध लोक—ये सब उसी से प्रकट होते हैं। धार्मिक कर्म और उनके क्षेत्र का आधार भी वही है।
सरल हिंदी अर्थउसी से सात प्राणद्वार, उनकी सात ज्योतियाँ, विषय-समिधाएँ और ज्ञानरूप आहुतियाँ हैं। हृदय-गुहा से सम्बद्ध ये इन्द्रिय-शक्तियाँ अपने-अपने क्षेत्रों में कार्य करती हैं। यहाँ अनुभव को यज्ञ के रूपक से समझाया गया है।
सरल हिंदी अर्थसभी समुद्र, पर्वत और विविध नदियाँ उसी से हैं। वनस्पतियाँ तथा उनका रस भी उसी पर निर्भर है; उसी पोषण से देह में स्थित जीव भौतिक तत्त्वों के साथ बना रहता है।
सरल हिंदी अर्थयह विश्व, कर्म, तप और परम अमृत ब्रह्म—सबका आधार पुरुष ही है। उसे हृदय-गुहा में स्थित जानने वाला इसी जीवन में अविद्या की गाँठ खोल देता है।
सरल हिंदी अर्थवह प्रकाशमान, अत्यन्त निकट और हृदय-गुहा में स्थित महान पद है। चलने, श्वास लेने और पलक झपकाने वाला सब उसी में आश्रित है। उसे स्थूल-सूक्ष्म का आधार और सामान्य विषयज्ञान से परे श्रेष्ठ सत्य जानो।
यदर्चिमद्यदणुभ्योऽणु च
यस्मिँल्लोका निहिता लोकिनश्च ।
तदेतदक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वाङ्मनः
तदेतत्सत्यं तदमृतं तद्वेद्धव्यं सोम्य विद्धि ॥ २॥
सरल हिंदी अर्थजो तेजस्वी और सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है, जिसमें सभी लोक तथा उनके निवासी स्थित हैं, वही अक्षर ब्रह्म, प्राण, वाणी और मन का आधार है। वही सत्य और अमृत है; हे सौम्य! उसी को जानने का लक्ष्य बनाओ।
सरल हिंदी अर्थउपनिषद् के उपदेशरूप महान धनुष को लेकर उपासना से तीखा किया हुआ आत्मरूप बाण उस पर चढ़ाओ। ब्रह्मभाव में लगे चित्त से उसे खींचकर उसी अक्षर लक्ष्य को भेदो। यह एकाग्र आत्मसाधना का रूपक है।
सरल हिंदी अर्थॐ धनुष है, आत्मा बाण और ब्रह्म लक्ष्य है। सावधानी से उस लक्ष्य का वेध करना चाहिए और बाण के लक्ष्य में मिल जाने की तरह ब्रह्म में तन्मय होना चाहिए।
सरल हिंदी अर्थजिसमें आकाश, पृथ्वी, अन्तरिक्ष, मन और सभी प्राण ओत-प्रोत हैं, उसी एक आत्मा को जानो। अन्य अनावश्यक चर्चाएँ छोड़ो; यही अमृत की प्राप्ति का सेतु है।
सरल हिंदी अर्थजिसमें नाड़ियाँ पहिए की नाभि में अरों की तरह एकत्र हैं, वही अन्तर्यामी अनेक रूपों में प्रकट होता है। ॐ के आलम्बन से उसका ध्यान करो। अज्ञान के अँधेरे से पार जाने में तुम्हारा कल्याण हो।
सरल हिंदी अर्थसर्वज्ञ और सबका ज्ञाता आत्मा की महिमा जगत में प्रकट है। वह शरीररूपी ब्रह्मपुरी के हृदयाकाश में स्थित, मन से उपलब्ध और प्राण-शरीर का संचालक है। विवेकी उसे ज्ञान से आनन्दस्वरूप अमृत के रूप में देखते हैं।
सरल हिंदी अर्थकारण और कार्य के आधार परम सत्य का दर्शन होने पर हृदय की अज्ञानग्रन्थि टूटती, सभी संशय मिटते और कर्मों का बन्धन क्षीण होता है। आत्मज्ञान का परिवर्तनकारी फल बताया गया है।
सरल हिंदी अर्थप्रकाशमय उच्च कोश में निर्मल, अखण्ड ब्रह्म है। वह शुद्ध और सभी ज्योतियों की ज्योति है; आत्मज्ञानी उसी को जानते हैं। बाहरी प्रकाश से आगे चैतन्य के मूल प्रकाश की बात है।
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १०॥
सरल हिंदी अर्थवहाँ सूर्य, चन्द्रमा, तारे, बिजली और अग्नि उसे प्रकाशित नहीं करते। उसी के प्रकाश से सब प्रकाशित होते हैं; उसी की भासा में यह पूरा जगत जाना जाता है।
सरल हिंदी अर्थआगे, पीछे, दक्षिण, उत्तर, नीचे और ऊपर—हर ओर वही अमृत ब्रह्म व्याप्त है। यह समस्त विश्व उसी ब्रह्म पर आश्रित है; उसके अतिरिक्त कोई स्वतंत्र परम आधार नहीं है।
सरल हिंदी अर्थएक ही वृक्ष पर साथ रहने वाले दो मित्र पक्षी बैठे हैं। एक मीठा फल खाता है, दूसरा बिना खाए केवल देखता है। यह भोग करने वाले जीव और साक्षी ईश्वर का प्रसिद्ध रूपक है।
सरल हिंदी अर्थजब साधक स्वर्णिम प्रकाशस्वरूप कर्ता, नियन्ता और समस्त सृष्टि के मूल पुरुष को देखता है, तब पुण्य-पाप के बन्धन से परे निर्मल होकर परम साम्य पाता है।
सरल हिंदी अर्थसभी प्राणियों में प्रकाशित उस जीवनाधार को जानकर विद्वान व्यर्थ वाद का अभिमानी नहीं बनता। आत्मा में क्रीड़ा और आनन्द रखने वाला तथा साधनानिष्ठ व्यक्ति ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ कहा गया है।
सरल हिंदी अर्थयह आत्मा सत्य, तप, सम्यक् ज्ञान और निरन्तर ब्रह्मचर्य से उपलब्ध होती है। शरीर के भीतर स्थित शुद्ध प्रकाशस्वरूप आत्मा का दर्शन दोषों से मुक्त यति करते हैं।
सरल हिंदी अर्थसत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं। सत्य से देवयान का मार्ग खुलता है, जिस पर इच्छाओं से तृप्त ऋषि उस परम स्थान तक जाते हैं जहाँ सत्य का सर्वोच्च आश्रय है।
सरल हिंदी अर्थवह महान, दिव्य और विचार की सीमाओं से परे है; सूक्ष्म से भी सूक्ष्म होकर प्रकाशित होता है। अज्ञान में दूर से भी दूर और जानने वालों के लिए अत्यन्त निकट, हृदय-गुहा में ही स्थित है।
न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा
नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा ।
ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥ ८॥
सरल हिंदी अर्थआत्मा आँख, वाणी, अन्य इन्द्रियों, केवल तप या कर्म से नहीं पकड़ी जाती। ज्ञान की निर्मलता से शुद्ध अन्तःकरण वाला साधक ध्यान में उस अखण्ड सत्य को देखता है।
सरल हिंदी अर्थयह सूक्ष्म आत्मा चित्त द्वारा जानी जाती है; उसी के आश्रय पर प्राण पाँच विभागों में कार्य करता है। प्राणों से सम्बद्ध चित्त शुद्ध होने पर आत्मस्वरूप स्पष्ट होता है।
सरल हिंदी अर्थशुद्ध अन्तःकरण वाला आत्मज्ञानी जिस लोक और जिन अभीष्टों का संकल्प करता है, उनकी प्राप्ति का सामर्थ्य रखता है—ऐसी उसकी महिमा बताई गई है। इसी कारण कल्याण चाहने वाले को आत्मज्ञानी का आदर करना चाहिए।
स वेदैतत्परमं ब्रह्म धाम
यत्र विश्वं निहितं भाति शुभ्रम् ।
उपासते पुरुषं ये ह्यकामास्ते
शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीराः ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थज्ञानी उस परम ब्रह्मधाम को जानता है जहाँ पूरा विश्व स्थित और प्रकाशित है। निष्काम होकर उस पुरुष की उपासना करने वाले धीर साधक जन्म के बीजरूप बन्धन को पार करते हैं।
सरल हिंदी अर्थजो विषयों का चिन्तन करके कामनाएँ करता है, वह उन्हीं कामनाओं के अनुसार अलग-अलग जन्म लेता है। जिसका आत्मस्वरूप सिद्ध और जिसकी कामनाएँ पूर्णतः शान्त हैं, उसकी बन्धनकारी इच्छाएँ यहीं लीन हो जाती हैं।
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन ।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ ३॥
सरल हिंदी अर्थआत्मा केवल प्रवचन, बुद्धि की तीक्ष्णता या बहुत शास्त्र सुन लेने से नहीं मिलती। जिसे वह अपनाती है, उसी के सामने अपना स्वरूप खोलती है। सच्ची आत्मनिष्ठा और अनुग्रह का महत्व बताया गया है।
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो
न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिङ्गात् ।
एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वांस्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम ॥ ४॥
सरल हिंदी अर्थआत्मिक बल से रहित, असावधान या उचित त्यागभाव से रहित तप करने वाला आत्मा को नहीं पाता। जो विद्वान दृढ़ता, सावधानी और समुचित साधना से प्रयत्न करता है, वह आत्मस्वरूप से ब्रह्मधाम में प्रवेश करता है।
सरल हिंदी अर्थइस आत्मा को पाकर ऋषि ज्ञान से तृप्त, सिद्ध अन्तःकरण वाले, रागमुक्त और शान्त हो जाते हैं। सर्वव्यापक सत्य को सब ओर जानकर वे सीमित अहंभाव से मुक्त होकर सर्वात्मभाव पाते हैं।
सरल हिंदी अर्थवेदान्त के ज्ञान का अर्थ निश्चित रूप से समझने वाले, संन्यासयोग से शुद्ध अन्तःकरण वाले यति अंतिम अवस्था में परम अमृत होकर पूर्ण मुक्त होते हैं। ज्ञान, त्याग और अन्तःशुद्धि की एकता बताई गई है।
सरल हिंदी अर्थदेह की पन्द्रह कलाएँ अपने-अपने आधार में, इन्द्रिय-देवता अपनी समष्टि शक्तियों में लौट जाते हैं। कर्म और विज्ञानमय जीवभाव भी परम अविनाशी में एक हो जाते हैं। यह मुक्त ज्ञानी की उपाधियों के लय का वर्णन है।
सरल हिंदी अर्थजैसे बहती नदियाँ अपने अलग नाम और रूप छोड़कर समुद्र में मिलती हैं, वैसे ज्ञानी नाम-रूप की सीमा से मुक्त होकर परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।
सरल हिंदी अर्थजो परम ब्रह्म को जानता है, वह ब्रह्मस्वरूप ही हो जाता है। उसके कुल में ब्रह्म को न जानने वाला नहीं होता—ऐसी विद्या की महिमा कही गई है। वह शोक-पाप से पार और हृदयग्रन्थियों से मुक्त होकर अमृत होता है।
सरल हिंदी अर्थयह विद्या श्रद्धावान, कर्मनिष्ठ, वेदाध्ययन करने वाले और ब्रह्मनिष्ठ साधकों को बताने का विधान है, जिन्होंने एकर्षि-अग्नि तथा शिरोव्रत का विधिपूर्वक पालन किया हो। यह अथर्ववेदीय अध्ययन-दीक्षा की परम्परा का प्रसंग है।
सरल हिंदी अर्थऋषि अंगिरस ने पहले यही सत्य कहा था। अनुशासन और व्रत से रहित व्यक्ति इस विद्या के अध्ययन का अधिकारी नहीं बताया गया है। परम ऋषियों को बार-बार नमस्कार करके ग्रंथ समाप्त होता है।
शास्त्र और कर्म मनुष्य को तैयार करते हैं, पर आत्मसत्य उनके किसी सीमित फल तक समाप्त नहीं होता। परा विद्या का लक्ष्य उस अक्षर को जानना है जो सबका आधार है। गुरु का उपदेश, सत्य, संयम, निर्मल चित्त और निष्काम साधना से साधक अपने साक्षी स्वरूप की ओर बढ़ता है। दो पक्षियों, धनुष-बाण और समुद्र में मिलती नदियों के बिंब इसी ज्ञान को स्पष्ट करते हैं।
कठिन शब्दों के सरल अर्थ
मुण्डक: ग्रंथ का मुख्य प्रकरण
महाशाल: समृद्ध, यज्ञादि करने वाला गृहस्थ
परा विद्या: अक्षर ब्रह्म का बोध कराने वाला ज्ञान
अपरा विद्या: वेद-वेदाङ्ग आदि का शास्त्रीय अध्ययन
अक्षर: अविनाशी परम तत्त्व
श्रोत्रिय: शास्त्र और उसकी शिक्षापद्धति का ज्ञाता
ब्रह्मनिष्ठ: ब्रह्मज्ञान में स्थित गुरु
समित्पाणि: हाथ में समिधा लेकर गुरु के पास आने वाला
इष्टापूर्त: यज्ञादि और लोकहित के पुण्यकर्म
प्लव: नाव / पार जाने का साधन
गुहा: हृदय / अन्तःकरण की गहराई
प्रणव: ॐ
सुपर्ण: सुन्दर पंखों वाला पक्षी
पिप्पल: रूपक में वृक्ष का फल
निरञ्जन: मल और बन्धन से रहित
देवयान: उच्च आध्यात्मिक गति का मार्ग
हृदयग्रन्थि: अज्ञान और आसक्ति की गाँठ
शिरोव्रत: अथर्ववेदीय अध्ययन-दीक्षा से जुड़ा विशेष व्रत
प्राचीन मूल वैदिक मंत्र सार्वजनिक सम्पदा की रचना हैं। छह खण्डों के क्रमशः 9, 13, 10, 11, 10 और 11 मंत्र—कुल 64—पूरे रखे गए हैं। आरम्भिक शांतिपाठ और ‘ॐ ब्रह्मणे नमः’ मुख्य मंत्रों से अलग हैं। स्रोत के अंत में आए समान शांतिपाठ को फिर नहीं दोहराया गया है।
मुद्रित पंक्तियों के अंत में टूटे शब्द 12 स्थानों पर हाइफ़न हटाकर जोड़े गए हैं। रिक्त स्थान और पंक्ति-विन्यास पढ़ने की सुविधा से व्यवस्थित हैं; अन्य मूल शब्द, क्रम और अनुनासिक चिह्न सुरक्षित हैं। स्रोत की कोष्ठक वाली टिप्पणियों को मूल मंत्र से अलग किया गया है। मंत्र 2.2.3 में आधार-पाठ के ‘संधयीत’ के स्थान पर उसी स्रोत का दिया पाठांतर ‘संदधीत’ लिया गया है; वैदिक हेरिटेज में भी इसका ‘सन्दधीत’ रूप है।
आधार-पाठ में दिए अन्य पाठांतर: 1.2.2—‘प्रतिपादयेच्छ्रद्धया हुतम्’; 1.2.5—‘तन्नयन्त्येताः’; 2.2.6—‘पराय’; 2.2.7—‘संप्रतिष्ठितः’; 3.1.6—‘जयति’; 3.2.3—‘आत्मा वृणुते’। यहाँ उन स्थानों पर मुख्य आधार-पाठ रखा गया है। अलग संस्करणों में छोटे पाठांतर मिलते हैं; यह किसी आलोचनात्मक संस्करण का दावा नहीं है।
यह वैदिक उदात्त-अनुदात्त स्वरचिह्नों के बिना अध्ययन-पाठ है। हिंदी अर्थ, विषय-शीर्षक और सार भक्ति भावना की स्वतंत्र सरल व्याख्या हैं; किसी आधुनिक हिंदी अनुवाद की प्रतिलिपि नहीं। यज्ञ और लोकप्राप्ति के फल को परम आत्मज्ञान से अलग समझाया गया है। धनुष-बाण और दो पक्षियों के वर्णन ध्यान तथा आत्मविवेक के रूपक हैं।
🚩 श्री राम भजन ओ मेरे रघुवर तू ही सहारा है प्रभु श्रीराम के प्रति प्रेम, विश्वास और पूर्ण समर्पण से भरा सुंदर भक्तिमय भजन। ▶ Instagram पर भजन देखें भजन लिरिक्स ॥ श्री राम ॥ ओ मेरे रघुवर तू ही सहारा है, मेरी नैय्यां का तू ही किनारा है।। ओ मेरे रघुवर तू ही सहारा है, मेरे रघुवर तू ही सहारा है।। मेरे ख्वाबों में तू, मेरी स्वासों में तू, मेरे दिल की धड़कन में, बस तू ही तू। मेरे ख्वाबों में तू, मेरी स्वासों में तू, मेरे दिल की धड़कन में, बस तू ही तू।। दीवाने तेरे प्यार में, बड़ा ही बुरा हाल, है पड़ा हूँ तेरे दर पे, ना होश ना ख्याल। मेरी नैय्यां का तू ही किनारा है, ओ मेरे रघुवर तू ही सहारा है, मेरे रघुवर तू ही सहारा है।। मेरी नैय्यां का तू ही किनारा है।। अंधेरों में जैसे उजाले हो तुम उजाले ही तुम, गिरतों को कितने सम्हाले हो तुम, सम्हाले ही तुम। तेरे बिना रघुवर मेरी, दुनियाँ वीरान है, तेरी किरपा से मेरी दुनियाँ में पहिचान है। मेरी नैय्यां का तू ही किनारा है, ओ मेरे रघुवर तू ही...
🚩 श्रीरामचरितमानस श्रीरामचरितमानस की 24 प्रसिद्ध चौपाइयाँ प्रेम, भक्ति, सत्संग, कर्म, सद्बुद्धि, परोपकार और प्रभु श्रीराम की कृपा का मार्ग दिखाने वाली श्रीरामचरितमानस की प्रसिद्ध चौपाइयाँ सरल हिंदी अर्थ सहित। श्रीरामचरितमानस गोस्वामी तुलसीदासजी की अमर रचना है। इसमें प्रभु श्रीराम की कथा के साथ जीवन, भक्ति, धर्म, प्रेम, कर्म, सदाचार, सत्संग और लोककल्याण की अनेक शिक्षाएँ मिलती हैं। यहाँ 24 प्रसिद्ध चौपाइयों को सरल भावार्थ के साथ प्रस्तुत किया गया है, ताकि उनके संदेश को सहज रूप से समझा और जीवन में अपनाया जा सके। 📜 इस संग्रह में ❤️ प्रेम और भक्ति 🌿 जीवन और नीति 🙏 संकट और विश्वास 🚩 रामराज्य और आदर्श जीवन ❤️ प्रेम और भक्ति प्रभु-प्रेम, समर्पण और निर्मल हृदय का संदेश 01 प्रभु को केवल प्रेम प्रिय है रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा॥ ...
🌺 श्रीरामचरितमानस • बालकाण्ड जय जय गिरिवरराज किशोरी — सीता जी की गौरी स्तुति पुष्पवाटिका में प्रभु श्रीराम के दर्शन के बाद माता सीता द्वारा माता गौरी से की गई पावन प्रार्थना, संपूर्ण प्रसंग और सरल हिंदी अर्थ सहित। माता सीता ने गौरी स्तुति कब की? श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में जनकपुर की पुष्पवाटिका का अत्यंत सुंदर प्रसंग आता है। माता सीता अपनी सखियों के साथ गौरी पूजन के लिए आई थीं। इसी वाटिका में उन्होंने पहली बार प्रभु श्रीराम को देखा। श्रीराम के दिव्य स्वरूप को देखकर उनका मन प्रेम से भर गया। उसी समय उन्हें अपने पिता महाराज जनक का वह प्रण भी स्मरण हुआ कि जो शिवजी के महान धनुष को उठाकर तोड़ेगा, उसी से सीता का विवाह होगा। माता सीता श्रीराम की छवि को हृदय में धारण करके पुनः माता भवानी के मंदिर में गईं और हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगीं। 🌸 पुष्पवाटिका में श्रीराम के दर्शन 🏹 पिता जनक के प्रण का स्मरण 🙏 गौरी माता से प्रार्थना ...
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