मुण्डकोपनिषद् सम्पूर्ण — तीनों मुण्डक, सभी 64 मंत्र और सरल हिंदी अर्थ

भक्ति भावना प्रस्तुत · अथर्ववेद की ब्रह्मविद्या

मुण्डकोपनिषद् सम्पूर्ण

मूल पाठ और प्रत्येक मंत्र का सरल हिंदी अर्थ

एक ही लेख में3 मुण्डक · 6 खण्ड64 मूल मंत्र

मुण्डकोपनिषद् अथर्ववेद से सम्बद्ध प्रमुख उपनिषद् है। इसे मुण्डक उपनिषद् भी कहते हैं। शौनक ऋषि अंगिरस से पूछते हैं—किस एक तत्त्व को जान लेने से सब जाना हुआ हो जाता है? इस प्रश्न से परा और अपरा विद्या, कर्मफल की सीमा, योग्य गुरु, अक्षर ब्रह्म और आत्मज्ञान की यात्रा खुलती है। इसी ग्रंथ में ‘सत्यमेव जयते’, दो मित्र पक्षियों और ॐ को धनुष बताने वाले प्रसिद्ध मंत्र हैं।

पढ़ने की व्यवस्था: तीनों मुण्डक, छहों खण्ड और सभी 64 मंत्र इसी लेख में हैं। प्रत्येक मंत्र के नीचे उसका स्वतंत्र सरल हिंदी अर्थ है। 2.2.4 का संकेत दूसरा मुण्डक, दूसरा खण्ड, चौथा मंत्र है। शांतिपाठ और आरम्भिक वन्दना मुख्य 64 मंत्रों से अलग रखे गए हैं।

भद्रं कर्णेभिः · शांतिपाठ

ॐ भद्रं कर्णेभिः श‍ृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
सरल हिंदी अर्थहे देवगण! हम कानों से कल्याणकारी सुनें और आँखों से शुभ देखें। स्थिर अंगों और स्वस्थ शरीर से स्तुति करते हुए नियत आयु को देवहित में बिताएँ। यशस्वी इन्द्र, पूषा, अरिष्टनेमि तार्क्ष्य और बृहस्पति हमारा कल्याण करें। तीन बार शांति की प्रार्थना है।
॥ ॐ ब्रह्मणे नमः ॥

परम ब्रह्म को नमस्कार।

मुण्डक 1

खण्ड 1 · शौनक का प्रश्न और परा–अपरा विद्या

मुण्डक 1 · 9 मंत्र

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मंत्र 1.1.1

ॐ ब्रह्मा देवानां प्रथमः संबभूव विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता । स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थदेवताओं में पहले प्रकट हुए ब्रह्मा विश्व के कर्ता और रक्षक कहे गए हैं। उन्होंने सभी विद्याओं के आधार ब्रह्मविद्या का उपदेश अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को दिया। ग्रंथ ज्ञान की गुरु-शिष्य परम्परा से आरम्भ होता है।
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मंत्र 1.1.2

अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्माऽथर्वा तं पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम् । स भारद्वाजाय सत्यवाहाय प्राह भारद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम् ॥ २॥
सरल हिंदी अर्थब्रह्मा से प्राप्त ब्रह्मविद्या अथर्वा ने अंगिर को बताई। अंगिर ने सत्यवाह भारद्वाज को और भारद्वाज ने अंगिरस को परा तथा अपरा से सम्बद्ध यह विद्या दी।
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मंत्र 1.1.3

शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ । कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति ॥ ३॥
सरल हिंदी अर्थमहाशाल गृहस्थ शौनक विधिपूर्वक अंगिरस के पास गए और पूछा—भगवन्! किस एक तत्त्व को जान लेने से यह सब जाना हुआ हो जाता है? यह समस्त ज्ञान के मूल आधार की जिज्ञासा है।
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मंत्र 1.1.4

तस्मै स होवाच । द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो वदन्ति परा चैवापरा च ॥ ४॥
सरल हिंदी अर्थअंगिरस ने कहा—ब्रह्मज्ञानी दो विद्याओं को जानने योग्य बताते हैं: परा और अपरा। आगे इनके विषय और प्रयोजन का भेद स्पष्ट किया जाता है।
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मंत्र 1.1.5

तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति । अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ ५॥
सरल हिंदी अर्थऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद तथा शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष अपरा विद्या हैं। परा वह है जिससे अविनाशी अक्षर का बोध होता है। भेद शास्त्रज्ञान और उसके परम प्रत्यक्ष लक्ष्य का है।
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मंत्र 1.1.6

यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम् । नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः ॥ ६॥
सरल हिंदी अर्थवह अक्षर इन्द्रियों से देखा या पकड़ा नहीं जाता; उसका गोत्र या वर्ण नहीं, न आँख-कान या हाथ-पैर हैं। वह नित्य, सर्वव्यापक, अतिसूक्ष्म और अविनाशी है। विवेकी उसे सभी प्राणियों का मूल कारण जानते हैं।
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मंत्र 1.1.7

यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः संभवन्ति । यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि तथाऽक्षरात्संभवतीह विश्वम् ॥ ७॥
सरल हिंदी अर्थजैसे मकड़ी जाला निकालती और समेटती है, पृथ्वी से वनस्पतियाँ उगती हैं और जीवित व्यक्ति से केश-रोम उत्पन्न होते हैं, वैसे ही अक्षर ब्रह्म से यह विश्व प्रकट होता है। उपमाएँ कारण से कार्य के सम्बन्ध को समझाती हैं।
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मंत्र 1.1.8

तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽन्नमभिजायते । अन्नात्प्राणो मनः सत्यं लोकाः कर्मसु चामृतम् ॥ ८॥
सरल हिंदी अर्थज्ञानमय तप से सृष्टि का विस्तार होता है। पहले अन्नरूप उपादान, फिर प्राण, मन, भूततत्त्व, लोक और कर्मों के फल का क्रम प्रकट होता है। यहाँ कर्मफल का अमृतत्व परम ब्रह्म की निरपेक्ष नित्यता के समान नहीं है।
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मंत्र 1.1.9

यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः । तस्मादेतद्ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते ॥ ९॥
सरल हिंदी अर्थजिसका तप ज्ञानमय है और जो सामान्य तथा विशेष, दोनों रूपों से सब जानता है, उसी से समष्टि ब्रह्मा, नाम, रूप और अन्न प्रकट होते हैं। सृष्टि के विविध पक्षों का आधार एक सर्वज्ञ सत्य बताया गया है।
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खण्ड 2 · कर्मफल की सीमा और गुरु की शरण

मुण्डक 1 · 13 मंत्र

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मंत्र 1.2.1

तदेतत्सत्यं मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यंस्तानि त्रेतायां बहुधा संततानि । तान्याचरथ नियतं सत्यकामा एष वः पन्थाः सुकृतस्य लोके ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थमंत्रों में ऋषियों ने जिन कर्मों का दर्शन किया, वे तीन वेदों के क्षेत्र में अनेक रूपों में विस्तृत हुए। पुण्यफल चाहने वालों को उन्हें विधिपूर्वक करना चाहिए; वे सुकृत से मिलने वाले लोक का मार्ग हैं।
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मंत्र 1.2.2

यदा लेलायते ह्यर्चिः समिद्धे हव्यवाहने । तदाऽऽज्यभागावन्तरेणाऽऽहुतीः प्रतिपादयेत् ॥ २॥
सरल हिंदी अर्थजब प्रज्वलित अग्नि की ज्वाला लहराने लगे, तब आज्यभागों के बीच आहुतियाँ देनी चाहिए। यह अग्निहोत्र की विधि का पाठ है; आगे ग्रंथ ऐसे कर्मों के फल और उनकी सीमा पर विचार करता है।
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मंत्र 1.2.3

यस्याग्निहोत्रमदर्शमपौर्णमासमचातुर्मास्यमनाग्रयणमतिथिवर्जितं च । अहुतमवैश्वदेवमविधिना हुतमासप्तमांस्तस्य लोकान् हिनस्ति ॥ ३॥
सरल हिंदी अर्थदर्श, पूर्णमास, चातुर्मास्य, आग्रयण, अतिथि-सत्कार और वैश्वदेव से रहित अथवा विधिविरुद्ध अग्निहोत्र को अधूरा बताया गया है। कर्मकाण्ड के इस प्रसंग में कहा है कि वह यजमान के सातवें तक के लोकों को हानि पहुँचाता है।
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मंत्र 1.2.4

काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा । स्फुलिङ्गिनी विश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्त जिह्वाः ॥ ४॥
सरल हिंदी अर्थकाली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुलिङ्गिनी और विश्वरुची—लहराती अग्नि की ये सात जिह्वाएँ कही गई हैं। ये ज्वाला के अलग-अलग रूप और गुण सूचित करती हैं।
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मंत्र 1.2.5

एतेषु यश्चरते भ्राजमानेषु यथाकालं चाहुतयो ह्याददायन् । तं नयन्त्येताः सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां पतिरेकोऽधिवासः ॥ ५॥
सरल हिंदी अर्थजो इन प्रकाशमान ज्वालाओं में उचित समय पर आहुतियाँ देता है, उसकी आहुतियाँ सूर्य-किरणों के रूपक से उसे उस लोक तक ले जाती हैं जहाँ देवताओं का अधिपति निवास करता है। यह यज्ञ के फल का वर्णन है।
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मंत्र 1.2.6

एह्येहीति तमाहुतयः सुवर्चसः सूर्यस्य रश्मिभिर्यजमानं वहन्ति । प्रियां वाचमभिवदन्त्योऽर्चयन्त्य एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः ॥ ६॥
सरल हिंदी अर्थतेजस्वी आहुतियाँ मानो ‘आओ, आओ’ कहती हुई सूर्य-किरणों के साथ यजमान को ले जाती और मधुर वचन से उसका स्वागत करती हैं—यह तुम्हारे पुण्यकर्म का उच्च लोक है। आगे इसी प्राप्ति की अनित्यता समझाई जाती है।
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मंत्र 1.2.7

प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म । एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापि यन्ति ॥ ७॥
सरल हिंदी अर्थअठारह अंगों से सम्बद्ध यज्ञरूप कर्मों को अदृढ़ नौकाएँ कहा गया है। जो इन्हें ही सर्वोच्च कल्याण मान लेते हैं, वे बुढ़ापे और मृत्यु में फिर लौटते हैं। कर्मफल सीमित है; वह अपने-आप परम आत्मज्ञान नहीं है।
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मंत्र 1.2.8

अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः । जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ८॥
सरल हिंदी अर्थअज्ञान के भीतर रहकर स्वयं को बुद्धिमान और पण्डित मानने वाले लोग भटकते रहते हैं। उनकी दशा अन्धे का अनुसरण करते अन्धों जैसी है। विद्वत्ता का अभिमान सत्य का बोध नहीं बन जाता।
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मंत्र 1.2.9

अविद्यायां बहुधा वर्तमाना वयं कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति बालाः । यत्कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागात्तेनातुराः क्षीणलोकाश्च्यवन्ते ॥ ९॥
सरल हिंदी अर्थअज्ञान की अनेक स्थितियों में रहते हुए भी अपरिपक्व लोग अपने को कृतार्थ मानते हैं। आसक्ति के कारण कर्मनिष्ठ लोग परम सत्य नहीं जान पाते; पुण्यलोक का फल क्षीण होने पर वे वहाँ से नीचे आते हैं।
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मंत्र 1.2.10

इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः । नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥ १०॥
सरल हिंदी अर्थयज्ञ और लोकहित के कर्मों को ही सर्वोच्च मानने वाले उनसे आगे का कल्याण नहीं जानते। स्वर्ग में पुण्यफल भोगकर वे इस लोक या उससे नीचे की गति में लौटते हैं। कर्म की उपयोगिता और उसकी अंतिम सीमा अलग रखी गई है।
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मंत्र 1.2.11

तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वांसो भैक्ष्यचर्यां चरन्तः । सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥ ११॥
सरल हिंदी अर्थजो शान्त, विद्वान और श्रद्धावान साधक वन में तप करते तथा भिक्षाचर्या से जीवन चलाते हैं, वे मलरहित होकर सूर्यद्वार से उस अविनाशी पुरुष की प्राप्ति की ओर जाते हैं। यह अनुशासित उपासना की उच्च गति का वर्णन है।
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मंत्र 1.2.12

परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन । तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥ १२॥
सरल हिंदी अर्थकर्मों से प्राप्त लोकों की परीक्षा करके विवेकी ब्राह्मण वैराग्य पाए, क्योंकि अकृत नित्य सत्य कर्म से बनाया नहीं जा सकता। उसे जानने के लिए समिधा लेकर शास्त्रज्ञ और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाना चाहिए।
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मंत्र 1.2.13

तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय । येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम् ॥ १३॥
सरल हिंदी अर्थऐसे विधिपूर्वक आए, शान्त चित्त और संयम वाले शिष्य को ज्ञानी गुरु वह ब्रह्मविद्या यथार्थ रूप से बताता है जिससे सत्यस्वरूप अक्षर पुरुष का बोध होता है।
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मुण्डक 2

खण्ड 1 · अक्षर पुरुष से जगत का प्राकट्य

मुण्डक 2 · 10 मंत्र

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मंत्र 2.1.1

तदेतत्सत्यं यथा सुदीप्तात्पावकाद्विस्फुलिङ्गाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः । तथाऽक्षराद्विविधाः सोम्य भावाः प्रजायन्ते तत्र चैवापियन्ति ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थहे सौम्य! जैसे प्रज्वलित अग्नि से उसी के स्वरूप वाली हजारों चिनगारियाँ निकलती हैं, वैसे अक्षर से विविध प्राणी और पदार्थ प्रकट होते हैं तथा उसी में लौट जाते हैं। यह जगत के एक मूल आधार का दृष्टान्त है।
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मंत्र 2.1.2

दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः । अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्षरात्परतः परः ॥ २॥
सरल हिंदी अर्थवह पुरुष दिव्य, निराकार और अजन्मा है; बाहर और भीतर सर्वत्र है। अपने स्वरूप में वह प्राण और मन के अधीन नहीं, निर्मल तथा अव्यक्त कारण से भी परे है।
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मंत्र 2.1.3

एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥ ३॥
सरल हिंदी अर्थउसी से प्राण, मन, सभी इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, ज्योति, जल और विश्व को धारण करने वाली पृथ्वी प्रकट होते हैं। बाहरी जगत और अनुभव के साधन, दोनों एक ही आधार पर निर्भर हैं।
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मंत्र 2.1.4

अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदाः । वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा ॥ ४॥
सरल हिंदी अर्थअग्निरूप द्युलोक उसका मस्तक, चन्द्र-सूर्य नेत्र, दिशाएँ कान, प्रकट वेद वाणी, वायु प्राण और विश्व हृदय है; उसके चरणों से पृथ्वी है। यह सबके अन्तरात्मा का विराट् रूपक है।
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मंत्र 2.1.5

तस्मादग्निः समिधो यस्य सूर्यः सोमात्पर्जन्य ओषधयः पृथिव्याम् । पुमान् रेतः सिञ्चति योषितायां बह्वीः प्रजाः पुरुषात्संप्रसूताः ॥ ५॥
सरल हिंदी अर्थउसी से वह अग्नि है जिसकी समिधा सूर्य है; चन्द्र से वर्षा, पृथ्वी पर वनस्पतियाँ और फिर प्रजनन का क्रम चलता है। स्त्री-पुरुष के द्वारा उत्पन्न अनेक प्रजाएँ भी उसी पुरुष पर आश्रित हैं।
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मंत्र 2.1.6

तस्मादृचः साम यजूꣳषि दीक्षा यज्ञाश्च सर्वे क्रतवो दक्षिणाश्च । संवत्सरश्च यजमानश्च लोकाः सोमो यत्र पवते यत्र सूर्यः ॥ ६॥
सरल हिंदी अर्थऋचाएँ, साम, यजुर्मंत्र, दीक्षा, यज्ञ, क्रतु, दक्षिणा, वर्ष, यजमान और चन्द्र-सूर्य से सम्बद्ध लोक—ये सब उसी से प्रकट होते हैं। धार्मिक कर्म और उनके क्षेत्र का आधार भी वही है।
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मंत्र 2.1.7

तस्माच्च देवा बहुधा संप्रसूताः साध्या मनुष्याः पशवो वयाꣳसि । प्राणापानौ व्रीहियवौ तपश्च श्रद्धा सत्यं ब्रह्मचर्यं विधिश्च ॥ ७॥
सरल हिंदी अर्थदेवता, साध्य, मनुष्य, पशु, पक्षी, प्राण-अपान, धान-जौ, तप, श्रद्धा, सत्य, ब्रह्मचर्य और विधि—सभी उसी पुरुष से प्रकट बताए गए हैं।
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मंत्र 2.1.8

सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात्सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः । सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त ॥ ८॥
सरल हिंदी अर्थउसी से सात प्राणद्वार, उनकी सात ज्योतियाँ, विषय-समिधाएँ और ज्ञानरूप आहुतियाँ हैं। हृदय-गुहा से सम्बद्ध ये इन्द्रिय-शक्तियाँ अपने-अपने क्षेत्रों में कार्य करती हैं। यहाँ अनुभव को यज्ञ के रूपक से समझाया गया है।
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मंत्र 2.1.9

अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वेऽस्मात्स्यन्दन्ते सिन्धवः सर्वरूपाः । अतश्च सर्वा ओषधयो रसश्च येनैष भूतैस्तिष्ठते ह्यन्तरात्मा ॥ ९॥
सरल हिंदी अर्थसभी समुद्र, पर्वत और विविध नदियाँ उसी से हैं। वनस्पतियाँ तथा उनका रस भी उसी पर निर्भर है; उसी पोषण से देह में स्थित जीव भौतिक तत्त्वों के साथ बना रहता है।
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मंत्र 2.1.10

पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम् । एतद्यो वेद निहितं गुहायां सोऽविद्याग्रन्थिं विकिरतीह सोम्य ॥ १०॥
सरल हिंदी अर्थयह विश्व, कर्म, तप और परम अमृत ब्रह्म—सबका आधार पुरुष ही है। उसे हृदय-गुहा में स्थित जानने वाला इसी जीवन में अविद्या की गाँठ खोल देता है।
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खण्ड 2 · ॐ का धनुष और आत्मज्ञान का लक्ष्य

मुण्डक 2 · 11 मंत्र

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मंत्र 2.2.1

आविः संनिहितं गुहाचरं नाम महत्पदमत्रैतत्समर्पितम् । एजत्प्राणन्निमिषच्च यदेतज्जानथ सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाद्यद्वरिष्ठं प्रजानाम् ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थवह प्रकाशमान, अत्यन्त निकट और हृदय-गुहा में स्थित महान पद है। चलने, श्वास लेने और पलक झपकाने वाला सब उसी में आश्रित है। उसे स्थूल-सूक्ष्म का आधार और सामान्य विषयज्ञान से परे श्रेष्ठ सत्य जानो।
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मंत्र 2.2.2

यदर्चिमद्यदणुभ्योऽणु च यस्मिँल्लोका निहिता लोकिनश्च । तदेतदक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वाङ्मनः तदेतत्सत्यं तदमृतं तद्वेद्धव्यं सोम्य विद्धि ॥ २॥
सरल हिंदी अर्थजो तेजस्वी और सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है, जिसमें सभी लोक तथा उनके निवासी स्थित हैं, वही अक्षर ब्रह्म, प्राण, वाणी और मन का आधार है। वही सत्य और अमृत है; हे सौम्य! उसी को जानने का लक्ष्य बनाओ।
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मंत्र 2.2.3

धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शरं ह्युपासानिशितं संदधीत । आयम्य तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्य विद्धि ॥ ३॥
सरल हिंदी अर्थउपनिषद् के उपदेशरूप महान धनुष को लेकर उपासना से तीखा किया हुआ आत्मरूप बाण उस पर चढ़ाओ। ब्रह्मभाव में लगे चित्त से उसे खींचकर उसी अक्षर लक्ष्य को भेदो। यह एकाग्र आत्मसाधना का रूपक है।
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मंत्र 2.2.4

प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥ ४॥
सरल हिंदी अर्थॐ धनुष है, आत्मा बाण और ब्रह्म लक्ष्य है। सावधानी से उस लक्ष्य का वेध करना चाहिए और बाण के लक्ष्य में मिल जाने की तरह ब्रह्म में तन्मय होना चाहिए।
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मंत्र 2.2.5

यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः । तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः ॥ ५॥
सरल हिंदी अर्थजिसमें आकाश, पृथ्वी, अन्तरिक्ष, मन और सभी प्राण ओत-प्रोत हैं, उसी एक आत्मा को जानो। अन्य अनावश्यक चर्चाएँ छोड़ो; यही अमृत की प्राप्ति का सेतु है।
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मंत्र 2.2.6

अरा इव रथनाभौ संहता यत्र नाड्यः । स एषोऽन्तश्चरते बहुधा जायमानः । ओमित्येवं ध्यायथ आत्मानं स्वस्ति वः पाराय तमसः परस्तात् ॥ ६॥
सरल हिंदी अर्थजिसमें नाड़ियाँ पहिए की नाभि में अरों की तरह एकत्र हैं, वही अन्तर्यामी अनेक रूपों में प्रकट होता है। ॐ के आलम्बन से उसका ध्यान करो। अज्ञान के अँधेरे से पार जाने में तुम्हारा कल्याण हो।
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मंत्र 2.2.7

यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्यैष महिमा भुवि । दिव्ये ब्रह्मपुरे ह्येष व्योम्न्यात्मा प्रतिष्ठितः ॥ मनोमयः प्राणशरीरनेता प्रतिष्ठितोऽन्ने हृदयं संनिधाय । तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरूपममृतं यद्विभाति ॥ ७॥
सरल हिंदी अर्थसर्वज्ञ और सबका ज्ञाता आत्मा की महिमा जगत में प्रकट है। वह शरीररूपी ब्रह्मपुरी के हृदयाकाश में स्थित, मन से उपलब्ध और प्राण-शरीर का संचालक है। विवेकी उसे ज्ञान से आनन्दस्वरूप अमृत के रूप में देखते हैं।
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मंत्र 2.2.8

भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे ॥ ८॥
सरल हिंदी अर्थकारण और कार्य के आधार परम सत्य का दर्शन होने पर हृदय की अज्ञानग्रन्थि टूटती, सभी संशय मिटते और कर्मों का बन्धन क्षीण होता है। आत्मज्ञान का परिवर्तनकारी फल बताया गया है।
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मंत्र 2.2.9

हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम् । तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ॥ ९॥
सरल हिंदी अर्थप्रकाशमय उच्च कोश में निर्मल, अखण्ड ब्रह्म है। वह शुद्ध और सभी ज्योतियों की ज्योति है; आत्मज्ञानी उसी को जानते हैं। बाहरी प्रकाश से आगे चैतन्य के मूल प्रकाश की बात है।
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मंत्र 2.2.10

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥ १०॥
सरल हिंदी अर्थवहाँ सूर्य, चन्द्रमा, तारे, बिजली और अग्नि उसे प्रकाशित नहीं करते। उसी के प्रकाश से सब प्रकाशित होते हैं; उसी की भासा में यह पूरा जगत जाना जाता है।
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मंत्र 2.2.11

ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद्ब्रह्म पश्चाद्ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण । अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् ॥ ११॥
सरल हिंदी अर्थआगे, पीछे, दक्षिण, उत्तर, नीचे और ऊपर—हर ओर वही अमृत ब्रह्म व्याप्त है। यह समस्त विश्व उसी ब्रह्म पर आश्रित है; उसके अतिरिक्त कोई स्वतंत्र परम आधार नहीं है।
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मुण्डक 3

खण्ड 1 · दो पक्षियों का रूपक और सत्य का मार्ग

मुण्डक 3 · 10 मंत्र

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मंत्र 3.1.1

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते । तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थएक ही वृक्ष पर साथ रहने वाले दो मित्र पक्षी बैठे हैं। एक मीठा फल खाता है, दूसरा बिना खाए केवल देखता है। यह भोग करने वाले जीव और साक्षी ईश्वर का प्रसिद्ध रूपक है।
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मंत्र 3.1.2

समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः । जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥ २॥
सरल हिंदी अर्थउसी शरीर-वृक्ष में जीव असहायता और मोह के कारण शोक करता है। जब वह दूसरे, पूजनीय ईश्वर और उसकी महिमा को देखता है, तब शोक से मुक्त होता है।
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मंत्र 3.1.3

यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् । तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति ॥ ३॥
सरल हिंदी अर्थजब साधक स्वर्णिम प्रकाशस्वरूप कर्ता, नियन्ता और समस्त सृष्टि के मूल पुरुष को देखता है, तब पुण्य-पाप के बन्धन से परे निर्मल होकर परम साम्य पाता है।
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मंत्र 3.1.4

प्राणो ह्येष यः सर्वभूतैर्विभाति विजानन् विद्वान् भवते नातिवादी । आत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥ ४॥
सरल हिंदी अर्थसभी प्राणियों में प्रकाशित उस जीवनाधार को जानकर विद्वान व्यर्थ वाद का अभिमानी नहीं बनता। आत्मा में क्रीड़ा और आनन्द रखने वाला तथा साधनानिष्ठ व्यक्ति ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ कहा गया है।
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मंत्र 3.1.5

सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् । अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः ॥ ५॥
सरल हिंदी अर्थयह आत्मा सत्य, तप, सम्यक् ज्ञान और निरन्तर ब्रह्मचर्य से उपलब्ध होती है। शरीर के भीतर स्थित शुद्ध प्रकाशस्वरूप आत्मा का दर्शन दोषों से मुक्त यति करते हैं।
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मंत्र 3.1.6

सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः । येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम् ॥ ६॥
सरल हिंदी अर्थसत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं। सत्य से देवयान का मार्ग खुलता है, जिस पर इच्छाओं से तृप्त ऋषि उस परम स्थान तक जाते हैं जहाँ सत्य का सर्वोच्च आश्रय है।
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मंत्र 3.1.7

बृहच्च तद्दिव्यमचिन्त्यरूपं सूक्ष्माच्च तत्सूक्ष्मतरं विभाति । दूरात्सुदूरे तदिहान्तिके च पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम् ॥ ७॥
सरल हिंदी अर्थवह महान, दिव्य और विचार की सीमाओं से परे है; सूक्ष्म से भी सूक्ष्म होकर प्रकाशित होता है। अज्ञान में दूर से भी दूर और जानने वालों के लिए अत्यन्त निकट, हृदय-गुहा में ही स्थित है।
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मंत्र 3.1.8

न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा । ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥ ८॥
सरल हिंदी अर्थआत्मा आँख, वाणी, अन्य इन्द्रियों, केवल तप या कर्म से नहीं पकड़ी जाती। ज्ञान की निर्मलता से शुद्ध अन्तःकरण वाला साधक ध्यान में उस अखण्ड सत्य को देखता है।
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मंत्र 3.1.9

एषोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन्प्राणः पञ्चधा संविवेश । प्राणैश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन्विशुद्धे विभवत्येष आत्मा ॥ ९॥
सरल हिंदी अर्थयह सूक्ष्म आत्मा चित्त द्वारा जानी जाती है; उसी के आश्रय पर प्राण पाँच विभागों में कार्य करता है। प्राणों से सम्बद्ध चित्त शुद्ध होने पर आत्मस्वरूप स्पष्ट होता है।
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मंत्र 3.1.10

यं यं लोकं मनसा संविभाति विशुद्धसत्त्वः कामयते यांश्च कामान् । तं तं लोकं जयते तांश्च कामांस्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेद्भूतिकामः ॥ १०॥
सरल हिंदी अर्थशुद्ध अन्तःकरण वाला आत्मज्ञानी जिस लोक और जिन अभीष्टों का संकल्प करता है, उनकी प्राप्ति का सामर्थ्य रखता है—ऐसी उसकी महिमा बताई गई है। इसी कारण कल्याण चाहने वाले को आत्मज्ञानी का आदर करना चाहिए।
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खण्ड 2 · निष्कामता, ब्रह्मप्राप्ति और विद्या का समापन

मुण्डक 3 · 11 मंत्र

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मंत्र 3.2.1

स वेदैतत्परमं ब्रह्म धाम यत्र विश्वं निहितं भाति शुभ्रम् । उपासते पुरुषं ये ह्यकामास्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीराः ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थज्ञानी उस परम ब्रह्मधाम को जानता है जहाँ पूरा विश्व स्थित और प्रकाशित है। निष्काम होकर उस पुरुष की उपासना करने वाले धीर साधक जन्म के बीजरूप बन्धन को पार करते हैं।
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मंत्र 3.2.2

कामान् यः कामयते मन्यमानः स कामभिर्जायते तत्र तत्र । पर्याप्तकामस्य कृतात्मनस्तु इहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः ॥ २॥
सरल हिंदी अर्थजो विषयों का चिन्तन करके कामनाएँ करता है, वह उन्हीं कामनाओं के अनुसार अलग-अलग जन्म लेता है। जिसका आत्मस्वरूप सिद्ध और जिसकी कामनाएँ पूर्णतः शान्त हैं, उसकी बन्धनकारी इच्छाएँ यहीं लीन हो जाती हैं।
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मंत्र 3.2.3

नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ ३॥
सरल हिंदी अर्थआत्मा केवल प्रवचन, बुद्धि की तीक्ष्णता या बहुत शास्त्र सुन लेने से नहीं मिलती। जिसे वह अपनाती है, उसी के सामने अपना स्वरूप खोलती है। सच्ची आत्मनिष्ठा और अनुग्रह का महत्व बताया गया है।
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मंत्र 3.2.4

नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिङ्गात् । एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वांस्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम ॥ ४॥
सरल हिंदी अर्थआत्मिक बल से रहित, असावधान या उचित त्यागभाव से रहित तप करने वाला आत्मा को नहीं पाता। जो विद्वान दृढ़ता, सावधानी और समुचित साधना से प्रयत्न करता है, वह आत्मस्वरूप से ब्रह्मधाम में प्रवेश करता है।
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मंत्र 3.2.5

संप्राप्यैनमृषयो ज्ञानतृप्ताः कृतात्मानो वीतरागाः प्रशान्ताः । ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीरा युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति ॥ ५॥
सरल हिंदी अर्थइस आत्मा को पाकर ऋषि ज्ञान से तृप्त, सिद्ध अन्तःकरण वाले, रागमुक्त और शान्त हो जाते हैं। सर्वव्यापक सत्य को सब ओर जानकर वे सीमित अहंभाव से मुक्त होकर सर्वात्मभाव पाते हैं।
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मंत्र 3.2.6

वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः । ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥ ६॥
सरल हिंदी अर्थवेदान्त के ज्ञान का अर्थ निश्चित रूप से समझने वाले, संन्यासयोग से शुद्ध अन्तःकरण वाले यति अंतिम अवस्था में परम अमृत होकर पूर्ण मुक्त होते हैं। ज्ञान, त्याग और अन्तःशुद्धि की एकता बताई गई है।
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मंत्र 3.2.7

गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्वे प्रतिदेवतासु । कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्वे एकीभवन्ति ॥ ७॥
सरल हिंदी अर्थदेह की पन्द्रह कलाएँ अपने-अपने आधार में, इन्द्रिय-देवता अपनी समष्टि शक्तियों में लौट जाते हैं। कर्म और विज्ञानमय जीवभाव भी परम अविनाशी में एक हो जाते हैं। यह मुक्त ज्ञानी की उपाधियों के लय का वर्णन है।
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मंत्र 3.2.8

यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय । तथा विद्वान् नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥ ८॥
सरल हिंदी अर्थजैसे बहती नदियाँ अपने अलग नाम और रूप छोड़कर समुद्र में मिलती हैं, वैसे ज्ञानी नाम-रूप की सीमा से मुक्त होकर परम दिव्य पुरुष को प्राप्त होता है।
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मंत्र 3.2.9

स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति । तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥ ९॥
सरल हिंदी अर्थजो परम ब्रह्म को जानता है, वह ब्रह्मस्वरूप ही हो जाता है। उसके कुल में ब्रह्म को न जानने वाला नहीं होता—ऐसी विद्या की महिमा कही गई है। वह शोक-पाप से पार और हृदयग्रन्थियों से मुक्त होकर अमृत होता है।
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मंत्र 3.2.10

तदेतदृचाऽभ्युक्तम् । क्रियावन्तः श्रोत्रिया ब्रह्मनिष्ठाः स्वयं जुह्वत एकर्षिं श्रद्धयन्तः । तेषामेवैतां ब्रह्मविद्यां वदेत शिरोव्रतं विधिवद्यैस्तु चीर्णम् ॥ १०॥
सरल हिंदी अर्थयह विद्या श्रद्धावान, कर्मनिष्ठ, वेदाध्ययन करने वाले और ब्रह्मनिष्ठ साधकों को बताने का विधान है, जिन्होंने एकर्षि-अग्नि तथा शिरोव्रत का विधिपूर्वक पालन किया हो। यह अथर्ववेदीय अध्ययन-दीक्षा की परम्परा का प्रसंग है।
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मंत्र 3.2.11

तदेतत्सत्यमृषिरङ्गिराः पुरोवाच नैतदचीर्णव्रतोऽधीते । नमः परमऋषिभ्यो नमः परमऋषिभ्यः ॥ ११॥
सरल हिंदी अर्थऋषि अंगिरस ने पहले यही सत्य कहा था। अनुशासन और व्रत से रहित व्यक्ति इस विद्या के अध्ययन का अधिकारी नहीं बताया गया है। परम ऋषियों को बार-बार नमस्कार करके ग्रंथ समाप्त होता है।
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मुण्डकोपनिषद् का मुख्य संदेश

शास्त्र और कर्म मनुष्य को तैयार करते हैं, पर आत्मसत्य उनके किसी सीमित फल तक समाप्त नहीं होता। परा विद्या का लक्ष्य उस अक्षर को जानना है जो सबका आधार है। गुरु का उपदेश, सत्य, संयम, निर्मल चित्त और निष्काम साधना से साधक अपने साक्षी स्वरूप की ओर बढ़ता है। दो पक्षियों, धनुष-बाण और समुद्र में मिलती नदियों के बिंब इसी ज्ञान को स्पष्ट करते हैं।

कठिन शब्दों के सरल अर्थ

  • मुण्डक: ग्रंथ का मुख्य प्रकरण
  • महाशाल: समृद्ध, यज्ञादि करने वाला गृहस्थ
  • परा विद्या: अक्षर ब्रह्म का बोध कराने वाला ज्ञान
  • अपरा विद्या: वेद-वेदाङ्ग आदि का शास्त्रीय अध्ययन
  • अक्षर: अविनाशी परम तत्त्व
  • श्रोत्रिय: शास्त्र और उसकी शिक्षापद्धति का ज्ञाता
  • ब्रह्मनिष्ठ: ब्रह्मज्ञान में स्थित गुरु
  • समित्पाणि: हाथ में समिधा लेकर गुरु के पास आने वाला
  • इष्टापूर्त: यज्ञादि और लोकहित के पुण्यकर्म
  • प्लव: नाव / पार जाने का साधन
  • गुहा: हृदय / अन्तःकरण की गहराई
  • प्रणव: ॐ
  • सुपर्ण: सुन्दर पंखों वाला पक्षी
  • पिप्पल: रूपक में वृक्ष का फल
  • निरञ्जन: मल और बन्धन से रहित
  • देवयान: उच्च आध्यात्मिक गति का मार्ग
  • हृदयग्रन्थि: अज्ञान और आसक्ति की गाँठ
  • शिरोव्रत: अथर्ववेदीय अध्ययन-दीक्षा से जुड़ा विशेष व्रत

मूल पाठ, पाठांतर और संपादकीय टिप्पणी

प्राचीन मूल वैदिक मंत्र सार्वजनिक सम्पदा की रचना हैं। छह खण्डों के क्रमशः 9, 13, 10, 11, 10 और 11 मंत्र—कुल 64—पूरे रखे गए हैं। आरम्भिक शांतिपाठ और ‘ॐ ब्रह्मणे नमः’ मुख्य मंत्रों से अलग हैं। स्रोत के अंत में आए समान शांतिपाठ को फिर नहीं दोहराया गया है।

मुद्रित पंक्तियों के अंत में टूटे शब्द 12 स्थानों पर हाइफ़न हटाकर जोड़े गए हैं। रिक्त स्थान और पंक्ति-विन्यास पढ़ने की सुविधा से व्यवस्थित हैं; अन्य मूल शब्द, क्रम और अनुनासिक चिह्न सुरक्षित हैं। स्रोत की कोष्ठक वाली टिप्पणियों को मूल मंत्र से अलग किया गया है। मंत्र 2.2.3 में आधार-पाठ के ‘संधयीत’ के स्थान पर उसी स्रोत का दिया पाठांतर ‘संदधीत’ लिया गया है; वैदिक हेरिटेज में भी इसका ‘सन्दधीत’ रूप है।

आधार-पाठ में दिए अन्य पाठांतर: 1.2.2—‘प्रतिपादयेच्छ्रद्धया हुतम्’; 1.2.5—‘तन्नयन्त्येताः’; 2.2.6—‘पराय’; 2.2.7—‘संप्रतिष्ठितः’; 3.1.6—‘जयति’; 3.2.3—‘आत्मा वृणुते’। यहाँ उन स्थानों पर मुख्य आधार-पाठ रखा गया है। अलग संस्करणों में छोटे पाठांतर मिलते हैं; यह किसी आलोचनात्मक संस्करण का दावा नहीं है।

यह वैदिक उदात्त-अनुदात्त स्वरचिह्नों के बिना अध्ययन-पाठ है। हिंदी अर्थ, विषय-शीर्षक और सार भक्ति भावना की स्वतंत्र सरल व्याख्या हैं; किसी आधुनिक हिंदी अनुवाद की प्रतिलिपि नहीं। यज्ञ और लोकप्राप्ति के फल को परम आत्मज्ञान से अलग समझाया गया है। धनुष-बाण और दो पक्षियों के वर्णन ध्यान तथा आत्मविवेक के रूपक हैं।

॥ नमः परमऋषिभ्यः ॥
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