श्रीमद्भागवत महापुराण पंचम स्कन्ध भाग 6 — अध्याय 24–26, पाताल लोक, अनन्त भगवान और कर्मफल
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
श्रीमद्भागवत महापुराण
पंचम स्कन्ध • भाग 6
अध्याय 24–26 • पाताल लोक, अनन्त भगवान और कर्मफल
86 क्रमांकित मूल पाठ • प्रत्येक का अलग सरल हिंदी भावार्थ
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पिछले भाग में द्वीपों, सूर्यरथ और भगवान के शिशुमार रूप का वर्णन पढ़ा। अब पंचम स्कन्ध की अंतिम तीन अध्याय-कड़ियों में राहु की स्थिति, सात भूविवर, राजा बलि की निष्काम भक्ति, अनन्त शेष की महिमा और कर्म के अनुसार मिलने वाली गतियों का विवेचन आता है। इस भाग के अंत में पंचम स्कन्ध पूर्ण होता है।
यह पाठ केवल लोकों का विवरण नहीं देता। बलि और प्रह्लाद का प्रसंग बताता है कि भगवान की सेवा भोग-ऐश्वर्य से श्रेष्ठ है। अनन्त भगवान के ध्यान और नाम की महिमा के बाद कर्मफल का वर्णन मनुष्य को अपने आचरण, दया, सत्य और उत्तरदायित्व पर विचार करने की प्रेरणा देता है।
पंचम स्कन्ध • अध्याय 24
राहु, सात भूविवर और राजा बलि की भक्ति
मूल पाठ 24.1
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी कहते हैं—कुछ आचार्यों के अनुसार सूर्य से दस हजार योजन नीचे राहु नक्षत्र के समान विचरता है। सिंहिका का यह असुर-पुत्र भगवान की कृपा से अमरता और ग्रह का पद प्राप्त कर सका। उसके जन्म और कर्म का विस्तार आगे कहा जाएगा।
मूल पाठ 24.2
सरल हिंदी भावार्थ: पुराण के इस वर्णन में सूर्य-मण्डल का विस्तार दस हजार, चन्द्रमा का बारह हजार और राहु का तेरह हजार योजन कहा गया है। पुराने वैर के कारण राहु पर्वकाल में सूर्य और चन्द्रमा को ढकने के लिए उनकी ओर दौड़ता है।
मूल पाठ 24.3
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी रक्षा के लिए भगवान का प्रिय सुदर्शन चक्र उपस्थित होता है। उसका असह्य तेज देखकर राहु भयभीत होकर थोड़ी देर बाद दूर लौट जाता है। लोक में इस आच्छादन को ग्रहण कहा जाता है। यह कथन पुराण की देवकथा के संदर्भ में है।
मूल पाठ 24.4
सरल हिंदी भावार्थ: उससे उतनी ही दूरी नीचे सिद्धों, चारणों और विद्याधरों के निवास बताए गए हैं। इस क्रम में शुकदेवजी ऊपर से नीचे की लोकव्यवस्था समझा रहे हैं।
मूल पाठ 24.5
सरल हिंदी भावार्थ: उसके नीचे यक्ष, राक्षस, पिशाच, प्रेत और भूतगणों के विचरण का अन्तरिक्ष है। जहाँ वायु चलती और बादल दिखाई देते हैं, वह क्षेत्र इस वर्णन में अन्तरिक्ष के रूप में आता है।
मूल पाठ 24.6
सरल हिंदी भावार्थ: उससे सौ योजन नीचे पृथ्वी बताई गई है। उसके ऊपर हंस, भास, बाज और गरुड़ आदि बड़े पक्षियों के उड़ने का क्षेत्र है। ये दूरियाँ ग्रंथ की पारम्परिक लोककल्पना का हिस्सा हैं।
मूल पाठ 24.7
सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी की स्थिति पहले कही जा चुकी है। उसके नीचे दस-दस हजार योजन के अन्तर और विस्तार वाले सात भूविवर बताए गए हैं—अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल।
मूल पाठ 24.8
सरल हिंदी भावार्थ: इन बिलस्वर्गों में दैत्य, दानव और नाग अपने परिवार, मित्र तथा सेवकों के साथ रहते हैं। उनके भवन, उपवन, क्रीड़ास्थल और भोग-संपदा का वैभव स्वर्ग से भी बढ़कर वर्णित है। वे माया और इच्छित सुखों में प्रसन्न रहते हैं।
मूल पाठ 24.9
सरल हिंदी भावार्थ: मय दानव ने वहाँ अद्भुत नगर बनाए हैं। रत्नों से सजे भवन, प्राकार, द्वार, सभाएँ, चौराहे और श्रेष्ठ निवास उनमें शोभा पाते हैं। नागों और असुरों के परिवारों तथा कबूतर, तोते और सारिका जैसे पक्षियों से वे स्थान सुशोभित हैं।
मूल पाठ 24.10
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ के उद्यान फूलों, फलों, कोमल पत्तों और लताओं से लिपटे वृक्षों से भरे हैं। निर्मल सरोवरों में मछलियाँ और अनेक प्रकार के कमल हैं। जोड़ों में विचरते पक्षियों के मधुर स्वर और प्रकृति की शोभा इन्द्रियों को आनन्द देती है; यह वैभव देवलोक से भी बढ़ा हुआ कहा गया है।
मूल पाठ 24.11
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ दिन और रात आदि काल-विभागों से उत्पन्न भय का अनुभव नहीं होता। ऊपर की भाँति सूर्य के प्रकाश से दिन-रात का क्रम स्पष्ट न होने का संदर्भ यहाँ है।
मूल पाठ 24.12
सरल हिंदी भावार्थ: श्रेष्ठ विशाल नागों के मस्तक की मणियाँ वहाँ का अन्धकार दूर करती हैं। पुराण पाताल के प्रकाश का वर्णन इन दिव्य मणियों के रूप में करता है।
मूल पाठ 24.13
सरल हिंदी भावार्थ: दिव्य औषधियों, रसों, रसायनों, भोजन, पेय और स्नानादि के कारण वहाँ रहने वालों में मानसिक कष्ट, रोग, झुर्रियाँ, सफेद बाल, बुढ़ापा, दुर्गन्ध, पसीना और थकान जैसी सामान्य शारीरिक अवस्थाएँ नहीं आतीं—ऐसा उन लोकों का वर्णन है।
मूल पाठ 24.14
सरल हिंदी भावार्थ: उन सुखसम्पन्न निवासियों पर सामान्य कारणों से मृत्यु प्रभाव नहीं डालती; भगवान के सुदर्शन रूप तेज से ही उनका विनाश हो सकता है। यह विशेषता उनकी परम स्वतंत्रता नहीं, भगवान के अधीनता को दिखाती है।
मूल पाठ 24.15
सरल हिंदी भावार्थ: जब वह सुदर्शन चक्र वहाँ प्रवेश करता है, तो असुर स्त्रियों के गर्भ भी उसके भय से गिर जाते हैं। इस कथन में भगवान के तेज के सामने असुरों की असहायता प्रकट होती है।
मूल पाठ 24.16
सरल हिंदी भावार्थ: अतल में मय का पुत्र बल रहता है, जिसने छियानबे मायाएँ रचीं। उसकी जँभाई से स्वैरिणी, कामिनी और पुंश्चली नाम की तीन स्त्री-श्रेणियाँ उत्पन्न कही गई हैं। वे वहाँ आने वाले पुरुष को हाटक नामक रस पिलाकर अपने हावभाव और संग से मोहित करती हैं। उसके प्रभाव में पुरुष स्वयं को सिद्ध, ईश्वर और दस हजार हाथियों के बल वाला मानकर मदान्ध की तरह डींगें मारता है।
मूल पाठ 24.17
सरल हिंदी भावार्थ: उसके नीचे वितल में भगवान हाटकेश्वर शिव, भवानी और अपने भूतगणों के साथ स्थित हैं। सृष्टि-वृद्धि की उनकी शक्ति से हाटकी नदी का उद्गम कहा गया है। वायु से प्रज्वलित अग्नि उसके रस को ग्रहण करके हाटक नामक सुवर्ण उत्पन्न करती है; असुरलोक के स्त्री-पुरुष उसे आभूषणों में धारण करते हैं।
मूल पाठ 24.18
सरल हिंदी भावार्थ: उसके नीचे सुतल में विरोचन के पुत्र, दानशील और पुण्यकीर्ति राजा बलि रहते हैं। भगवान ने अदिति से वामन रूप में जन्म लेकर इन्द्र का हित किया और बलि का त्रैलोक्य राज्य ले लिया। फिर अपनी कृपा से उन्हें सुतल में ऐसी समृद्धि दी जो इन्द्र को भी नहीं मिली। बलि निर्भय होकर अपने धर्म द्वारा उन्हीं भगवान की आराधना करते हैं।
मूल पाठ 24.19
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान वासुदेव समस्त प्राणियों के आत्मा और सर्वश्रेष्ठ दान-पात्र हैं। उन्हें अत्यन्त श्रद्धा और एकाग्र आदर से भूमि देना मुक्ति का द्वार है। इसलिए बलि का सुतल का ऐश्वर्य ही उस समर्पण का पूरा या वास्तविक फल नहीं माना जा सकता।
मूल पाठ 24.20
सरल हिंदी भावार्थ: छींकने, गिरने या पैर फिसलने जैसी विवश अवस्था में भी जिसका नाम एक बार मुख से निकल जाए, वह भगवान कर्मबन्धन नष्ट करने में समर्थ हैं। मुक्ति चाहने वाले साधक उसी बन्धन को दूसरे उपायों से दूर करने का प्रयत्न करते हैं। यहाँ भगवान के नाम की महिमा कही गई है।
मूल पाठ 24.21
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान संयमी भक्तों को केवल बाहरी वस्तुएँ नहीं देते; सबके आत्मा होकर वे उन्हें अपना स्वरूप और अपना सान्निध्य प्रदान करते हैं। भक्त के लिए परम प्राप्ति स्वयं भगवान हैं।
मूल पाठ 24.22
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसा नहीं समझना चाहिए कि आत्मस्मृति छीन लेने वाला मायामय भोग और ऐश्वर्य बढ़ा देना ही बलि पर भगवान की मुख्य कृपा है। भोग-संपदा से बढ़कर भगवान का स्मरण और उनकी प्राप्ति है।
मूल पाठ 24.23
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने याचना की लीला से बलि का तीनों लोकों का अधिकार ले लिया; उनके पास अपना शरीर ही शेष रहा। वे वरुणपाश से बाँधे गए और फिर मुक्त होकर नीचे के लोक में पहुँचे। इस स्थिति में बलि ने आगे कही गई बात कही।
मूल पाठ 24.24
सरल हिंदी भावार्थ: बलि कहते हैं—इन्द्र ने बृहस्पति जैसे एकनिष्ठ सलाहकार के रहते भी भगवान उपेन्द्र से उनकी सेवा के बजाय अपना राज्य और सुख माँगा। अनन्त काल की तुलना में एक मन्वन्तर तक मिलने वाला त्रैलोक्य राज्य कितना छोटा है! वास्तविक हित भगवान की दासता प्राप्त करने में है।
मूल पाठ 24.25
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे पितामह प्रह्लाद ने अपने पिता के मारे जाने पर भगवान द्वारा दिया जा रहा राज्य स्वीकारने की अपेक्षा उनकी सेवा ही माँगी थी। उन्होंने अपने पिता की संपत्ति को भगवान की निष्काम दासता से श्रेष्ठ नहीं माना।
मूल पाठ 24.26
सरल हिंदी भावार्थ: बलि विनय करते हैं—प्रह्लाद जैसे महानुभाव के मार्ग पर हम जैसे लोग कैसे पहुँच सकते हैं? हमारे भीतर की अशुद्ध वासनाएँ अभी दूर नहीं हुईं और उनके जैसी भगवान की अनुकम्पा भी हमें कहाँ मिली है! यहाँ भक्त की आत्मनम्रता व्यक्त है।
मूल पाठ 24.27
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी कहते हैं—बलि का विस्तृत चरित्र आगे कहा जाएगा। अपने भक्त पर करुणा से भगवान नारायण स्वयं गदा लेकर उनके द्वार पर खड़े रहते हैं। दिग्विजय करते आए रावण को उन्हीं भगवान ने पैर के अँगूठे से बहुत दूर फेंक दिया था।
मूल पाठ 24.28
सरल हिंदी भावार्थ: उससे नीचे तलातल में त्रिपुर का अधिपति मय दानव रहता है। तीनों लोकों का कल्याण करने के लिए शिव ने उसके तीन पुर जलाए, फिर अपनी कृपा से उसे स्थान दिया। मायावियों का यह आचार्य महादेव की रक्षा में सुदर्शन के भय से मुक्त होकर रहता है।
मूल पाठ 24.29
सरल हिंदी भावार्थ: महातल में कद्रू की सन्तान अनेक फणों वाले नागों का क्रोधवश नामक समुदाय रहता है। कुहक, तक्षक, कालिय और सुषेण उसके प्रमुख हैं। वे भगवान के वाहन गरुड़ से भयभीत रहते हैं, फिर भी कभी अपने परिवार और मित्रों के संग में उस भय को भूलकर विहार करते हैं।
मूल पाठ 24.30
सरल हिंदी भावार्थ: रसातल में पणि, निवातकवच, कालेय और हिरण्यपुरवासी दैत्य-दानव रहते हैं। वे जन्म से पराक्रमी और देवताओं के विरोधी हैं, पर भगवान हरि का तेज उनका बल-अभिमान दबा देता है। इन्द्र की दूती सरमा के मन्त्रयुक्त वचनों से भी वे भय मानते हैं।
मूल पाठ 24.31
सरल हिंदी भावार्थ: सबसे नीचे पाताल में वासुकि आदि नागराज रहते हैं—शंख, कुलिक, महाशंख, श्वेत, धनंजय, धृतराष्ट्र, शंखचूड़, कम्बल, अश्वतर और देवदत्त आदि। उनके पाँच, सात, दस, सौ या हजार फणों पर चमकती मणियाँ हैं। उन मणियों की आभा पाताल का घना अन्धकार दूर करती है।
पंचम स्कन्ध • अध्याय 25
अनन्त शेष की महिमा और भगवान के नाम का आश्रय
मूल पाठ 25.1
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी कहते हैं—उसके मूल में तीस हजार योजन के अन्तर पर भगवान की वह कला स्थित है जिसे भक्त अनन्त कहते हैं। द्रष्टा और दृश्य को अहंभाव के आधार पर संकर्षित करने वाले होने से उनका नाम संकर्षण भी है। यहाँ भगवान की संहार से सम्बन्धित शक्ति का वर्णन है।
मूल पाठ 25.2
सरल हिंदी भावार्थ: सहस्र मस्तकों वाले भगवान अनन्त के एक ही मस्तक पर यह समस्त पृथ्वी-मण्डल सरसों के दाने जैसा दिखाई देता है। इससे उनके असीम सामर्थ्य का बोध कराया गया है।
मूल पाठ 25.3
सरल हिंदी भावार्थ: जब समय आने पर भगवान इस जगत का संहार करना चाहते हैं, तब उनकी क्रोध से चंचल भौंहों के बीच से सांकरषण रुद्र प्रकट होते हैं। वे त्रिनेत्र और त्रिशूलधारी हैं तथा उनके ग्यारह रूप बताए गए हैं।
मूल पाठ 25.4
सरल हिंदी भावार्थ: नागराज और श्रेष्ठ भक्त एकनिष्ठ भक्ति से उनके चरणों में प्रणाम करते हैं। चरणों के लाल और निर्मल नखमणियों में वे अपने कुण्डलों से प्रकाशित गण्डस्थलों वाले सुन्दर मुखों का प्रतिबिम्ब देखकर आनन्दित होते हैं।
मूल पाठ 25.5
सरल हिंदी भावार्थ: नागराजों की कुमारियाँ आशीर्वाद की कामना से भगवान की चाँदी के स्तम्भों जैसी उज्ज्वल भुजाओं पर अगुरु, चन्दन और कुमकुम का लेप करती हैं। सेवा और स्पर्श से उनके हृदय में प्रेम जागता है। वे लज्जा और अनुराग सहित भगवान का मुस्कान तथा करुणामय दृष्टि से सुशोभित मुख देखती हैं।
मूल पाठ 25.6
सरल हिंदी भावार्थ: अनन्त गुणों के समुद्र, आदिदेव भगवान अनन्त अपने रोष और संहार-वेग को रोककर समस्त लोकों के कल्याण के लिए स्थित रहते हैं। उनका सामर्थ्य प्राणियों की रक्षा में भी प्रकट होता है।
मूल पाठ 25.7
सरल हिंदी भावार्थ: देवता, असुर, नाग, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर और मुनि उनका ध्यान करते हैं। वे मधुर अमृतमय वाणी से अपने पार्षदों को प्रसन्न करते हैं। नीले वस्त्र, एक कुण्डल, तुलसी की सुगन्ध और भ्रमरों के गुंजार से सुशोभित वैजयन्ती वनमाला धारण कर, हल पर सुन्दर भुजा टिकाए भगवान अनन्त उदार लीला से विराजते हैं।
मूल पाठ 25.8
सरल हिंदी भावार्थ: उनका श्रवण और ध्यान मुक्ति चाहने वालों के हृदय में अनादि कर्मवासनाओं और अविद्या से बँधी तीन गुणों की गाँठ खोल देता है। ब्रह्माजी के पुत्र नारद ने तुम्बुरु के साथ ब्रह्मसभा में उनकी इस महिमा का गान किया।
मूल पाठ 25.9
सरल हिंदी भावार्थ: नारदजी स्तुति करते हैं—जिनकी दृष्टि से सत्त्व, रज और तम जैसे प्रकृति के गुण सृष्टि, स्थिति और लय के कारण बनते हैं, वे स्वयं नित्य, अजन्मा और अद्वितीय हैं। भिन्न-भिन्न रूपों में बँटा हुआ जीव उनके सम्पूर्ण स्वरूप और मार्ग को कैसे जान सकता है?
मूल पाठ 25.10
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने हमारे प्रति बड़ी कृपा से विशुद्ध सत्त्वमय मूर्ति धारण की है, जिसमें कारण और कार्यरूप जगत का प्रकाश होता है। भक्तों के मन को आकर्षित करने वाली उनकी उदार और निष्कलंक वीरलीला का अनुकरण सिंह जैसे पराक्रमी जीव भी करते हैं।
मूल पाठ 25.11
सरल हिंदी भावार्थ: जिस भगवान का सुना हुआ नाम अचानक, कष्ट में, गिरते समय अथवा हँसी-परिहास में भी दोहराने से पाप नष्ट करने की महिमा कही गई है, मुक्ति चाहने वाला उनके अतिरिक्त और किसका आश्रय ले? यहाँ अनन्त शेष के नाम और आश्रय की महत्ता है।
मूल पाठ 25.12
सरल हिंदी भावार्थ: पर्वत, नदियाँ, समुद्र और जीवों सहित समस्त पृथ्वी उनके सहस्र मस्तकों में से एक पर अणु के समान रखी है। अनन्त और अपरिमित पराक्रम वाले भगवान की शक्तियों की गिनती हजार जिह्वाओं वाला भी कैसे कर सकता है?
मूल पाठ 25.13
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसी अनन्त महिमा, असीम शक्ति और महान गुणों वाले भगवान अनन्त पृथ्वी के नीचे स्थित हैं। वे स्वतंत्र हैं और जगत की स्थिरता के लिए लीला से पृथ्वी को धारण करते हैं।
मूल पाठ 25.14
सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्य अपनी कामनाओं और कर्मों के अनुसार जिन लोकों और गतियों को प्राप्त करते हैं, उनका शास्त्रोपदेश के अनुसार वर्णन किया गया। इच्छाओं के अनुसार किए गए कर्म ही अलग-अलग फल देने वाले हैं।
मूल पाठ 25.15
सरल हिंदी भावार्थ: हे राजन्! तुम्हारे प्रश्न के अनुसार प्रवृत्ति-प्रधान धर्म के कर्मफलस्वरूप ऊँची-नीची और भिन्न-भिन्न गतियाँ कह दीं। अब और क्या सुनना चाहते हो? इस प्रश्न से अगला कर्मफल-विवेचन आरम्भ होता है।
पंचम स्कन्ध • अध्याय 26
कर्मफल, नरक-वर्णन और विराट रूप का उपसंहार
मूल पाठ 26.1
सरल हिंदी भावार्थ: राजा परीक्षित पूछते हैं—महर्षे! संसार के प्राणियों और उनकी प्राप्त होने वाली गतियों में यह इतनी विविधता कैसे आती है?
मूल पाठ 26.2
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी उत्तर देते हैं—कर्ता सत्त्व, रज और तम, इन तीन गुणों से प्रभावित होता है। उसकी श्रद्धा और कर्मों में भी भिन्नता तथा न्यूनाधिकता होती है। इसी से सबकी कर्मगतियाँ एक जैसी नहीं होतीं।
मूल पाठ 26.3
सरल हिंदी भावार्थ: निषिद्ध आचरणरूप अधर्म में भी कर्ता की प्रवृत्ति और श्रद्धा के भेद से फल भिन्न होता है। अनादि अविद्या से उत्पन्न इच्छाओं और कर्मों के परिणामस्वरूप हजारों गतियाँ बनती हैं। अब उनमें प्रमुख अधर्मफल का वर्णन किया जाएगा।
मूल पाठ 26.4
सरल हिंदी भावार्थ: परीक्षित पूछते हैं—भगवन्! जिन्हें नरक कहा जाता है, क्या वे कोई विशेष देश हैं? क्या वे तीनों लोकों के बाहर हैं या उनके बीच किसी स्थान में हैं?
मूल पाठ 26.5
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी कहते हैं—वे त्रिलोक के अन्तराल में, दक्षिण दिशा में, पृथ्वी के नीचे और जल के ऊपर बताए गए हैं। उसी दिशा में अग्निष्वात्त आदि पितृगण निवास करते हैं और एकाग्र भाव से अपने वंशजों के सच्चे कल्याण की कामना करते हैं।
मूल पाठ 26.6
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ सूर्यपुत्र पितृराज यम अपने अनुचरों द्वारा लाए गए मृत जीवों के कर्मदोषों के अनुसार दण्ड का विधान करते हैं। वे भगवान के शासन का उल्लंघन नहीं करते; न्याय उनके कार्य का आधार है।
मूल पाठ 26.7
सरल हिंदी भावार्थ: कुछ आचार्य इक्कीस नरक गिनते हैं। यहाँ तामिस्र, अन्धतामिस्र, रौरव, महारौरव, कुम्भीपाक, कालसूत्र, असिपत्रवन, सूकरमुख, अन्धकूप, कृमिभोजन, सन्दंश, तप्तसूर्मि, वज्रकण्टकशाल्मली, वैतरणी, पूयोद, प्राणरोध, विशसन, लालाभक्ष, सारमेयादन, अवीचि और अयःपान के साथ क्षारकर्दम, रक्षोगणभोजन, शूलप्रोत, दन्दशूक, अवटनिरोधन, पर्यावर्तन और सूचीमुख—कुल अट्ठाईस यातनाभूमियों का नामक्रम कहा गया है।
मूल पाठ 26.8
सरल हिंदी भावार्थ: जो दूसरों का धन, सन्तान या जीवनसाथी छीनता है, उसे तामिस्र की यातना का अधिकारी बताया गया है। भूख-प्यास, मार और भय से मूर्च्छित होने का वर्णन इस बात को कठोर रूप में सामने रखता है कि दूसरे का जीवन और अधिकार छीनना गंभीर अधर्म है।
मूल पाठ 26.9
सरल हिंदी भावार्थ: जो किसी को छलकर उसकी पत्नी आदि का उपभोग करता है, उसके लिए अन्धतामिस्र कहा गया है। वहाँ की वेदना बुद्धि और दृष्टि हर लेने वाली बताई गई है, जैसे जड़ कट जाने पर वृक्ष नष्ट होता है। प्रसंग विश्वासघात और छल की निन्दा करता है।
मूल पाठ 26.10
सरल हिंदी भावार्थ: जो ‘मैं’ और ‘मेरा’ मानकर दूसरे जीवों से द्रोह करता है और केवल अपने परिवार का पोषण ही अपना लक्ष्य बनाता है, वह सब यहीं छोड़कर अपने उस अशुभ कर्म के कारण रौरव में पड़ता है। परिवार-पालन नहीं, उसके लिए किया गया निर्दयी अन्याय यहाँ दोष है।
मूल पाठ 26.11
सरल हिंदी भावार्थ: जिन जीवों को उसने पीड़ा दी थी, वे परलोक में रुरु नाम के अत्यन्त क्रूर प्राणी बनकर उसे पीड़ा देते हैं—ऐसा वर्णन है। इसी से इस गति का नाम रौरव कहा गया है। अपने द्वारा पहुँचाई गई पीड़ा के प्रत्यावर्तन की बात यहाँ आती है।
मूल पाठ 26.12
सरल हिंदी भावार्थ: जो केवल अपने शरीर के भरण-पोषण के लिए दूसरों को नष्ट करता है, उसके लिए महारौरव कहा गया है। वहाँ क्रव्याद नाम के रुरुओं से पीड़ित होने का वर्णन है। स्वार्थ के लिए क्रूरता को गंभीर पाप बताया गया है।
मूल पाठ 26.13
सरल हिंदी भावार्थ: जो दयारहित होकर जीवित पशु-पक्षियों को पकाता है, उसके लिए कुम्भीपाक में तप्त तेल की यातना कही गई है। ऐसी क्रूरता की निन्दा अत्यन्त हिंसक स्वभाव वालों द्वारा भी की जाती है।
मूल पाठ 26.14
सरल हिंदी भावार्थ: पितरों, ब्राह्मणों और ब्रह्म अथवा वैदिक ज्ञान के प्रति द्रोह करने वाले के लिए कालसूत्र का वर्णन है। विशाल तप्त ताम्रभूमि, ऊपर सूर्य और नीचे अग्नि, भूख-प्यास तथा दीर्घ यातना का चित्रण किया गया है। ग्रंथ सम्मान और धर्म के प्रति द्रोह की कठोर निन्दा करता है।
मूल पाठ 26.15
सरल हिंदी भावार्थ: जो आपत्ति न होने पर भी अपना वैदिक धर्ममार्ग छोड़कर पाखण्ड का आश्रय लेता है, उसे असिपत्रवन की गति कही गई है। तलवार-जैसे पत्तों से कटने और पीड़ा से बार-बार गिरने का वर्णन है। अपने कर्तव्य को छोड़कर छलपूर्ण धर्माचरण अपनाना इसका प्रसंग है।
मूल पाठ 26.16
सरल हिंदी भावार्थ: जो राजा या राजकर्मी निर्दोष को दण्ड देता है अथवा ब्राह्मण को शारीरिक दण्ड देता है, उसके लिए सूकरमुख नरक कहा गया है। वहाँ गन्ने की तरह दबाए जाने की यातना का वर्णन है। जिस पीड़ा में निर्दोष को डाला, उसी अन्याय का फल शासक को भी भोगना पड़ता है।
मूल पाठ 26.17
सरल हिंदी भावार्थ: पशु-पक्षी और कीट आदि अपनी स्वाभाविक जीविका में दूसरे की पीड़ा का विवेक नहीं रखते। पर मनुष्य विवेक और अपनी आजीविका की क्षमता रखते हुए भी उन्हें व्यर्थ कष्ट दे, तो अन्धकूप की गति कही गई है। वहीं वे जीव उसे घेरकर पीड़ा देते हैं और उसे विश्राम नहीं मिलता।
मूल पाठ 26.18
सरल हिंदी भावार्थ: जो प्राप्त भोजन में दूसरों का भाग न बाँटे और पंचमहायज्ञ जैसे अपने दायित्व पूरे किए बिना ही सब स्वयं खा ले, उसके लिए कृमिभोजन कहा गया है। वहाँ कृमि होकर कृमियों से पीड़ित होने का वर्णन है। भोजन और संसाधन में साझा दायित्व की उपेक्षा यहाँ दोष है।
मूल पाठ 26.19
सरल हिंदी भावार्थ: जो बिना आपत्ति के चोरी या बल से किसी ब्राह्मण अथवा किसी दूसरे का सोना, रत्न आदि छीनता है, उसे सन्दंश की यातना कही गई है। तप्त लोहे के उपकरणों से पीड़ा का वर्णन परधन-हरण की गंभीर निन्दा के लिए है।
मूल पाठ 26.20
सरल हिंदी भावार्थ: जो स्त्री या पुरुष निषिद्ध यौन सम्बन्ध में प्रवृत्त होते हैं, उनके लिए तप्तसूर्मि की यातना कही गई है। दण्ड और तपे लोहे की स्त्री-पुरुष आकृतियों के आलिंगन का वर्णन आता है। प्रसंग सम्बन्धों में संयम और मर्यादा के उल्लंघन का है।
मूल पाठ 26.21
सरल हिंदी भावार्थ: जो बिना किसी मर्यादा के सब प्रकार के निषिद्ध यौन आचरण में प्रवृत्त होता है, उसके लिए वज्रकण्टकशाल्मली कही गई है। कठोर काँटों वाले वृक्ष पर चढ़ाकर नीचे खींचने का दण्ड वर्णित है।
मूल पाठ 26.22
सरल हिंदी भावार्थ: जो राजा और राजकर्मी धर्म की मर्यादाएँ तोड़ते हैं, वे वैतरणी में पड़ते हैं—ऐसा कहा गया है। मल, रक्त और अन्य अपवित्र पदार्थों से भरी नदी में पीड़ा का चित्रण है। सत्ता का उपयोग मर्यादा तोड़ने के लिए करना उन्हें उसके फल से मुक्त नहीं करता।
मूल पाठ 26.23
सरल हिंदी भावार्थ: मूल पाठ में ‘वृषलीपति’ आदि तत्कालीन सामाजिक पदों के साथ शौच, सदाचार, नियम और लज्जा छोड़कर पशुवत जीवन जीने वालों का उल्लेख है। उनके लिए पूयोद की अपवित्रता भरी गति कही गई है। यह पुराण के ऐतिहासिक सामाजिक विधान का प्रसंग है; इससे आज किसी समुदाय के अपमान या उत्पीड़न का समर्थन नहीं किया जा रहा।
मूल पाठ 26.24
सरल हिंदी भावार्थ: जो ब्राह्मणादि कुत्ते और गधे पालकर शिकार का मनोरंजन करते और अनुचित समय या अवसर में मृगों को मारते हैं, उन्हें परलोक में स्वयं बाणों का निशाना बनने का फल बताया गया है। यहाँ मनोरंजन के लिए प्राणियों की हत्या की निन्दा है।
मूल पाठ 26.25
सरल हिंदी भावार्थ: जो लोग धार्मिक दिखावे के लिए यज्ञ का ढोंग करके पशुओं को मारते हैं, उनके लिए विशसन की यातना कही गई है। धर्म के नाम पर दम्भ और हिंसा को इस प्रसंग में दोष माना गया है।
मूल पाठ 26.26
सरल हिंदी भावार्थ: जो द्विज काममोह से अपनी पत्नी को वीर्य पिलाता है, उसके लिए लालाभक्ष अथवा रेतःकुल्या की यातना कही गई है। यह दाम्पत्य में भी काममोह से उत्पन्न अपवित्र और अपमानजनक आचरण की निन्दा का प्रसंग है।
मूल पाठ 26.27
सरल हिंदी भावार्थ: जो डाकू, आग लगाने वाले, विष देने वाले अथवा गाँवों और व्यापारी दलों को लूटने वाले राजा तथा सैनिक होते हैं, उनके लिए सारमेयादन कहा गया है। वहाँ सात सौ बीस भयानक दाँतों वाले कुत्तों द्वारा पीड़ित किए जाने का वर्णन है।
मूल पाठ 26.28
सरल हिंदी भावार्थ: जो गवाही, व्यापार अथवा दान में जानबूझकर झूठ बोलता है, उसे अवीचि की गति कही गई है। ऊँचे पर्वत से कठोर भूमि पर बार-बार गिराए जाने का वर्णन है। सत्य को तोड़कर लाभ लेने के परिणाम की कठोरता यहाँ प्रकट की गई है।
मूल पाठ 26.29
सरल हिंदी भावार्थ: मूल पाठ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, सोमपान के अधिकारी तथा उनकी पत्नी और व्रतधारी द्वारा निषिद्ध सुरापान का उल्लेख करता है। ऐसे नियमभंग के लिए अयःपान में तप्त लोहे का दण्ड वर्णित है। यह उस समय के वर्णाश्रम और व्रत-विधान के संदर्भ का कथन है।
मूल पाठ 26.30
सरल हिंदी भावार्थ: जो अपने अभिमान से तप, विद्या और सदाचार में श्रेष्ठ लोगों का उचित सम्मान नहीं करता, उसके लिए क्षारकर्दम की गति कही गई है। उलटे गिराए जाने की यातना अहंकार और गुणों के अनादर की निन्दा करती है।
मूल पाठ 26.31
सरल हिंदी भावार्थ: जो मनुष्यबलि देते या मनुष्य का मांस खाते हैं, उनके लिए रक्षोगणभोजन का वर्णन है। मारे गए प्राणियों की ओर से प्रतिकार जैसी यातना कही गई है। प्रसंग मानव-हत्या और अत्यन्त क्रूर हिंसा का निषेध करता है।
मूल पाठ 26.32
सरल हिंदी भावार्थ: जो निर्दोष प्राणियों का विश्वास जीतकर उन्हें पकड़ते और खेल की तरह शूल या सूत्र से बाँधकर यातना देते हैं, उनके लिए शूलप्रोत कहा गया है। भूख-प्यास तथा तीक्ष्ण चोंच वाले पक्षियों से पीड़ा में वे अपने दुष्कर्म को स्मरण करते हैं।
मूल पाठ 26.33
सरल हिंदी भावार्थ: जो साँप-जैसे उग्र और क्रूर स्वभाव से दूसरे जीवों को भयभीत करते हैं, उनके लिए दन्दशूक नरक कहा गया है। वहाँ पाँच और सात मुख वाले सर्पों से ग्रस्त होने का वर्णन है। भय फैलाकर जीवन जीने की प्रवृत्ति इसकी विषयवस्तु है।
मूल पाठ 26.34
सरल हिंदी भावार्थ: जो जीवों को अँधे गड्ढों, भण्डारों या गुफाओं में बन्द करके कष्ट देते हैं, उनके लिए अवटनिरोधन में वैसे ही बंद स्थान, विषैली अग्नि और धुएँ की यातना कही गई है। दूसरों की स्वतंत्रता और प्राणों से क्रूर खेल यहाँ निन्दित है।
मूल पाठ 26.35
सरल हिंदी भावार्थ: जो गृहस्थ आए हुए अतिथि को बार-बार क्रोध और जलाने जैसी दुर्भावना भरी दृष्टि से देखता है, उसके लिए पर्यावर्तन की यातना कही गई है। कठोर चोंच वाले पक्षियों से आँखों को पीड़ा का वर्णन अतिथि के प्रति निर्दय व्यवहार की निन्दा में है।
मूल पाठ 26.36
सरल हिंदी भावार्थ: जो धन के अभिमान में दूसरों को तिरस्कार से देखता, सब पर संदेह करता और धन खर्च या नष्ट होने की चिन्ता में सूखता रहता है, उसे सूचीमुख की गति कही गई है। वहाँ शरीर को सूत से सीने जैसी यातना का वर्णन है। अन्यायपूर्ण धन-संग्रह और उसकी आसक्ति उसे शान्ति नहीं देते।
मूल पाठ 26.37
सरल हिंदी भावार्थ: यमलोक में ऐसी सैकड़ों-हजारों गतियाँ कही गई हैं। बताए हुए और न बताए हुए अधर्मी कर्मों का फल वहाँ भोगते हैं, और धर्मानुसार कर्म करने वाले दूसरी पुण्यगतियाँ पाते हैं। शेष बचे शुभ-अशुभ कर्मों के अनुसार वे फिर इस संसार में जन्म लेते हैं।
मूल पाठ 26.38
सरल हिंदी भावार्थ: निवृत्ति अर्थात बन्धन से मुक्त होने का मार्ग पहले बताया गया है। चौदह लोकों वाला यह ब्रह्माण्ड भगवान नारायण के विराट स्थूल स्वरूप के रूप में वर्णित है। जो श्रद्धा से इसका पाठ, श्रवण और कथन करता है, उसकी बुद्धि भक्ति से शुद्ध होकर इन्द्रियातीत परमात्मा के तत्त्व को समझने योग्य होती है।
मूल पाठ 26.39
सरल हिंदी भावार्थ: साधक भगवान के स्थूल और सूक्ष्म स्वरूप का श्रवण करे। पहले विराट रूप के ध्यान से मन को स्थिर करके फिर धीरे-धीरे अपनी बुद्धि को सूक्ष्म परमात्मतत्त्व की ओर ले जाए।
मूल पाठ 26.40
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी कहते हैं—हे राजन्! पृथ्वी, द्वीप, वर्ष, नदियाँ, पर्वत, आकाश, समुद्र, पाताल, दिशाएँ, नरक, ग्रहगण और लोकों की व्यवस्था का वर्णन मैंने किया। यह सब समस्त प्राणियों के आश्रय भगवान के अद्भुत स्थूल स्वरूप की प्रस्तुति है। इसी के साथ पंचम स्कन्ध का वर्णन पूर्ण होता है।
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