श्रीमद्भागवत महापुराण पंचम स्कन्ध भाग 6 — अध्याय 24–26, पाताल लोक, अनन्त भगवान और कर्मफल

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

श्रीमद्भागवत महापुराण
पंचम स्कन्ध • भाग 6

अध्याय 24–26 • पाताल लोक, अनन्त भगवान और कर्मफल

86 क्रमांकित मूल पाठ • प्रत्येक का अलग सरल हिंदी भावार्थ

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पिछले भाग में द्वीपों, सूर्यरथ और भगवान के शिशुमार रूप का वर्णन पढ़ा। अब पंचम स्कन्ध की अंतिम तीन अध्याय-कड़ियों में राहु की स्थिति, सात भूविवर, राजा बलि की निष्काम भक्ति, अनन्त शेष की महिमा और कर्म के अनुसार मिलने वाली गतियों का विवेचन आता है। इस भाग के अंत में पंचम स्कन्ध पूर्ण होता है।

यह पाठ केवल लोकों का विवरण नहीं देता। बलि और प्रह्लाद का प्रसंग बताता है कि भगवान की सेवा भोग-ऐश्वर्य से श्रेष्ठ है। अनन्त भगवान के ध्यान और नाम की महिमा के बाद कर्मफल का वर्णन मनुष्य को अपने आचरण, दया, सत्य और उत्तरदायित्व पर विचार करने की प्रेरणा देता है।

पंचम स्कन्ध • अध्याय 24

राहु, सात भूविवर और राजा बलि की भक्ति

मूल पाठ 24.1

श्रीशुक उवाच । अधस्तात्सवितुर्योजनायुते स्वर्भानुर्नक्षत्रव- च्चरतीत्येके योऽसावमरत्वं ग्रहत्वं चालभत । भगवदनुकम्पया स्वयमसुरापसदः सैंहिकेयो ह्यतदर्हस्तस्य तात जन्मकर्माणि चोपरिष्टा- द्वक्ष्यामः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी कहते हैं—कुछ आचार्यों के अनुसार सूर्य से दस हजार योजन नीचे राहु नक्षत्र के समान विचरता है। सिंहिका का यह असुर-पुत्र भगवान की कृपा से अमरता और ग्रह का पद प्राप्त कर सका। उसके जन्म और कर्म का विस्तार आगे कहा जाएगा।

मूल पाठ 24.2

यददस्तरणेर्मण्डलं प्रतपतस्तद्विस्तरतो योजना- युतमाचक्षते द्वादशसहस्रं सोमस्य त्रयोदशसहस्रं राहोर्यः पर्वणि तद्व्यवधानकृद्वैरानुबन्धः सूर्याचन्द्रमसावभिधावति ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुराण के इस वर्णन में सूर्य-मण्डल का विस्तार दस हजार, चन्द्रमा का बारह हजार और राहु का तेरह हजार योजन कहा गया है। पुराने वैर के कारण राहु पर्वकाल में सूर्य और चन्द्रमा को ढकने के लिए उनकी ओर दौड़ता है।

मूल पाठ 24.3

तन्निशम्योभयत्रापि भगवता रक्षणाय प्रयुक्तं सुदर्शनं नाम भागवतं दयितमस्त्रं तत्तेजसा दुर्विषहं मुहुः परिवर्तमानमभ्यवस्थितो मुहूर्त- मुद्विजमानश्चकितहृदय आरादेव निवर्तते तदुपरागमिति वदन्ति लोकाः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी रक्षा के लिए भगवान का प्रिय सुदर्शन चक्र उपस्थित होता है। उसका असह्य तेज देखकर राहु भयभीत होकर थोड़ी देर बाद दूर लौट जाता है। लोक में इस आच्छादन को ग्रहण कहा जाता है। यह कथन पुराण की देवकथा के संदर्भ में है।

मूल पाठ 24.4

ततोऽधस्तात्सिद्धचारणविद्याधराणां सदनानि तावन्मात्र एव ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उससे उतनी ही दूरी नीचे सिद्धों, चारणों और विद्याधरों के निवास बताए गए हैं। इस क्रम में शुकदेवजी ऊपर से नीचे की लोकव्यवस्था समझा रहे हैं।

मूल पाठ 24.5

ततोऽधस्ताद्यक्षरक्षःपिशाचप्रेतभूतगणानां विहाराजिरमन्तरिक्षं यावद्वायुः प्रवाति यावन्मेघा उपलभ्यन्ते ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसके नीचे यक्ष, राक्षस, पिशाच, प्रेत और भूतगणों के विचरण का अन्तरिक्ष है। जहाँ वायु चलती और बादल दिखाई देते हैं, वह क्षेत्र इस वर्णन में अन्तरिक्ष के रूप में आता है।

मूल पाठ 24.6

ततोऽधस्ताच्छतयोजनान्तर इयं पृथिवी याव- द्धंसभासश्येनसुपर्णादयः पतत्त्रिप्रवरा उत्पतन्तीति ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उससे सौ योजन नीचे पृथ्वी बताई गई है। उसके ऊपर हंस, भास, बाज और गरुड़ आदि बड़े पक्षियों के उड़ने का क्षेत्र है। ये दूरियाँ ग्रंथ की पारम्परिक लोककल्पना का हिस्सा हैं।

मूल पाठ 24.7

उपवर्णितं भूमेर्यथा सन्निवेशावस्थानमवनेर- प्यधस्तात्सप्तभूविवरा एकैकशो योजनायुतान्तरेणा- यामविस्तारेणोपकॢप्ता अतलं वितलं सुतलं तलातलं महातलं रसातलं पातालमिति ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी की स्थिति पहले कही जा चुकी है। उसके नीचे दस-दस हजार योजन के अन्तर और विस्तार वाले सात भूविवर बताए गए हैं—अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल।

मूल पाठ 24.8

एतेषु हि बिलस्वर्गेषु स्वर्गादप्यधिककामभोगै- श्वर्यानन्दभूतिविभूतिभिः सुसमृद्धभवनोद्याना- क्रीडाविहारेषु दैत्यदानवकाद्रवेया नित्यप्रमुदिता- नुरक्तकलत्रापत्यबन्धुसुहृदनुचरा गृहपतय ईश्वरादप्यप्रतिहतकामा मायाविनोदा निवसन्ति ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन बिलस्वर्गों में दैत्य, दानव और नाग अपने परिवार, मित्र तथा सेवकों के साथ रहते हैं। उनके भवन, उपवन, क्रीड़ास्थल और भोग-संपदा का वैभव स्वर्ग से भी बढ़कर वर्णित है। वे माया और इच्छित सुखों में प्रसन्न रहते हैं।

मूल पाठ 24.9

येषु महाराज मयेन मायाविना विनिर्मिताः पुरो नानामणिप्रवरप्रवेकविरचितविचित्रभवन- प्राकारगोपुरसभाचैत्यचत्वरायतनादिभि- र्नागासुरमिथुनपारावतशुकसारिकाऽऽकीर्णकृत्रिम- भूमिभिर्विवरेश्वरगृहोत्तमैः समलङ्कृताश्चकासति ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मय दानव ने वहाँ अद्भुत नगर बनाए हैं। रत्नों से सजे भवन, प्राकार, द्वार, सभाएँ, चौराहे और श्रेष्ठ निवास उनमें शोभा पाते हैं। नागों और असुरों के परिवारों तथा कबूतर, तोते और सारिका जैसे पक्षियों से वे स्थान सुशोभित हैं।

मूल पाठ 24.10

उद्यानानि चातितरां मन इन्द्रियानन्दिभिः कुसुमफलस्तबकसुभगकिसलयावनतरुचिर- विटपविटपिनां लताङ्गालिङ्गितानां श्रीभिः समिथुनविविधविहङ्गमजलाशयानाममल- जलपूर्णानां झषकुलोल्लङ्घनक्षुभितनीरनीरज- कुमुदकुवलयकह्लारनीलोत्पललोहितशतपत्रादि वनेषु कृतनिकेतनानामेकविहाराकुलमधुर- विविधस्वनादिभिरिन्द्रियोत्सवैरमरलोकश्रिय- मतिशयितानि ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ के उद्यान फूलों, फलों, कोमल पत्तों और लताओं से लिपटे वृक्षों से भरे हैं। निर्मल सरोवरों में मछलियाँ और अनेक प्रकार के कमल हैं। जोड़ों में विचरते पक्षियों के मधुर स्वर और प्रकृति की शोभा इन्द्रियों को आनन्द देती है; यह वैभव देवलोक से भी बढ़ा हुआ कहा गया है।

मूल पाठ 24.11

यत्र ह वाव न भयमहोरात्रादिभिः कालविभागैरुपलक्ष्यते ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ दिन और रात आदि काल-विभागों से उत्पन्न भय का अनुभव नहीं होता। ऊपर की भाँति सूर्य के प्रकाश से दिन-रात का क्रम स्पष्ट न होने का संदर्भ यहाँ है।

मूल पाठ 24.12

यत्र हि महाहिप्रवरशिरोमणयः सर्वं तमः प्रबाधन्ते ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रेष्ठ विशाल नागों के मस्तक की मणियाँ वहाँ का अन्धकार दूर करती हैं। पुराण पाताल के प्रकाश का वर्णन इन दिव्य मणियों के रूप में करता है।

मूल पाठ 24.13

न वा एतेषु वसतां दिव्यौषधिरसरसायनान्नपान- स्नानादिभिराधयो व्याधयो वलीपलितजरादयश्च देहवैवर्ण्यदौर्गन्ध्यस्वेदक्लमग्लानिरिति वयोऽवस्थाश्च भवन्ति ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: दिव्य औषधियों, रसों, रसायनों, भोजन, पेय और स्नानादि के कारण वहाँ रहने वालों में मानसिक कष्ट, रोग, झुर्रियाँ, सफेद बाल, बुढ़ापा, दुर्गन्ध, पसीना और थकान जैसी सामान्य शारीरिक अवस्थाएँ नहीं आतीं—ऐसा उन लोकों का वर्णन है।

मूल पाठ 24.14

न हि तेषां कल्याणानां प्रभवति कुतश्चन मृत्युर्विना भगवत्तेजसश्चक्रापदेशात् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन सुखसम्पन्न निवासियों पर सामान्य कारणों से मृत्यु प्रभाव नहीं डालती; भगवान के सुदर्शन रूप तेज से ही उनका विनाश हो सकता है। यह विशेषता उनकी परम स्वतंत्रता नहीं, भगवान के अधीनता को दिखाती है।

मूल पाठ 24.15

यस्मिन् प्रविष्टेऽसुरवधूनां प्रायः पुंसवनानि भयादेव स्रवन्ति पतन्ति च ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब वह सुदर्शन चक्र वहाँ प्रवेश करता है, तो असुर स्त्रियों के गर्भ भी उसके भय से गिर जाते हैं। इस कथन में भगवान के तेज के सामने असुरों की असहायता प्रकट होती है।

मूल पाठ 24.16

अथातले मयपुत्रोऽसुरो बलो निवसति येन ह वा इह सृष्टाः षण्णवतिर्मायाः काश्चनाद्यापि मायाविनो धारयन्ति यस्य च जृम्भमाणस्य मुखतस्त्रयः स्त्रीगणा उदपद्यन्त स्वैरिण्यः कामिन्यः पुंश्चल्य इति या वै बिलायनं प्रविष्टं पुरुषं रसेन हाटकाख्येन साधयित्वा स्वविलासावलोकनानुरागस्मितसंलापोपगूहनादिभिः स्वैरं किल रमयन्ति यस्मिन्नुपयुक्ते पुरुष ईश्वरोऽहं सिद्धोऽहमित्ययुतमहागजबलमात्मानमभिमन्यमानः कत्थते मदान्ध इव ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: अतल में मय का पुत्र बल रहता है, जिसने छियानबे मायाएँ रचीं। उसकी जँभाई से स्वैरिणी, कामिनी और पुंश्चली नाम की तीन स्त्री-श्रेणियाँ उत्पन्न कही गई हैं। वे वहाँ आने वाले पुरुष को हाटक नामक रस पिलाकर अपने हावभाव और संग से मोहित करती हैं। उसके प्रभाव में पुरुष स्वयं को सिद्ध, ईश्वर और दस हजार हाथियों के बल वाला मानकर मदान्ध की तरह डींगें मारता है।

मूल पाठ 24.17

ततोऽधस्ताद्वितले हरो भगवान् हाटकेश्वरः स्वपार्षद- भूतगणावृतः प्रजापतिसर्गोपबृंहणाय भवो भवान्या सह मिथुनीभूत आस्ते यतः प्रवृत्ता सरित्प्रवरा हाटकी नाम भवयोर्वीर्येण यत्र चित्रभानुर्मातरिश्वना समिध्यमान ओजसा पिबति तन्निष्ठ्यूतं हाटकाख्यं सुवर्णं भूषणेना- सुरेन्द्रावरोधेषु पुरुषाः सह पुरुषीभिर्धारयन्ति ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसके नीचे वितल में भगवान हाटकेश्वर शिव, भवानी और अपने भूतगणों के साथ स्थित हैं। सृष्टि-वृद्धि की उनकी शक्ति से हाटकी नदी का उद्गम कहा गया है। वायु से प्रज्वलित अग्नि उसके रस को ग्रहण करके हाटक नामक सुवर्ण उत्पन्न करती है; असुरलोक के स्त्री-पुरुष उसे आभूषणों में धारण करते हैं।

मूल पाठ 24.18

ततोऽधस्तात्सुतले उदारश्रवाः पुण्यश्लोको विरोचनात्मजो बलिर्भगवता महेन्द्रस्य प्रियं चिकीर्षमाणेनादितेर्लब्धकायो भूत्वा वटुवामनरूपेण पराक्षिप्तलोकत्रयो भगवदनुकम्पयैव पुनः प्रवेशित इन्द्रादिष्वविद्यमानया सुसमृद्धया श्रियाभिजुष्टः स्वधर्मेणाराधयंस्तमेव भगवन्तमाराधनीयमपगत- साध्वस आस्तेऽधुनापि ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसके नीचे सुतल में विरोचन के पुत्र, दानशील और पुण्यकीर्ति राजा बलि रहते हैं। भगवान ने अदिति से वामन रूप में जन्म लेकर इन्द्र का हित किया और बलि का त्रैलोक्य राज्य ले लिया। फिर अपनी कृपा से उन्हें सुतल में ऐसी समृद्धि दी जो इन्द्र को भी नहीं मिली। बलि निर्भय होकर अपने धर्म द्वारा उन्हीं भगवान की आराधना करते हैं।

मूल पाठ 24.19

नो एवैतत्साक्षात्कारो भूमिदानस्य यत्तद्भगवत्यशेष- जीवनिकायानां जीवभूतात्मभूते परमात्मनि वासुदेवे तीर्थतमे पात्र उपपन्ने परया श्रद्धया परमादरसमाहित- मनसा सम्प्रतिपादितस्य साक्षादपवर्गद्वारस्य यद्बिलनिलयैश्वर्यम् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान वासुदेव समस्त प्राणियों के आत्मा और सर्वश्रेष्ठ दान-पात्र हैं। उन्हें अत्यन्त श्रद्धा और एकाग्र आदर से भूमि देना मुक्ति का द्वार है। इसलिए बलि का सुतल का ऐश्वर्य ही उस समर्पण का पूरा या वास्तविक फल नहीं माना जा सकता।

मूल पाठ 24.20

यस्य ह वाव क्षुतपतनप्रस्खलनादिषु विवशः सकृन्नामाभिगृणन् पुरुषः कर्मबन्धनमञ्जसा विधुनोति यस्य हैव प्रतिबाधनं मुमुक्षवो- ऽन्यथैवोपलभन्ते ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: छींकने, गिरने या पैर फिसलने जैसी विवश अवस्था में भी जिसका नाम एक बार मुख से निकल जाए, वह भगवान कर्मबन्धन नष्ट करने में समर्थ हैं। मुक्ति चाहने वाले साधक उसी बन्धन को दूसरे उपायों से दूर करने का प्रयत्न करते हैं। यहाँ भगवान के नाम की महिमा कही गई है।

मूल पाठ 24.21

तद्भक्तानामात्मवतां सर्वेषामात्मन्यात्मद आत्मतयैव ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान संयमी भक्तों को केवल बाहरी वस्तुएँ नहीं देते; सबके आत्मा होकर वे उन्हें अपना स्वरूप और अपना सान्निध्य प्रदान करते हैं। भक्त के लिए परम प्राप्ति स्वयं भगवान हैं।

मूल पाठ 24.22

न वै भगवान् नूनममुष्यानुजग्राह यदुत पुनरात्मा- नुस्मृतिमोषणं मायामयभोगैश्वर्यमेवातनुतेति ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसा नहीं समझना चाहिए कि आत्मस्मृति छीन लेने वाला मायामय भोग और ऐश्वर्य बढ़ा देना ही बलि पर भगवान की मुख्य कृपा है। भोग-संपदा से बढ़कर भगवान का स्मरण और उनकी प्राप्ति है।

मूल पाठ 24.23

यत्तद्भगवतानधिगतान्योपायेन याच्ञाच्छलेनापहृत स्वशरीरावशेषितलोकत्रयो वरुणपाशैश्च सम्प्रतिमुक्तो गिरिदर्यां चापविद्ध इति होवाच ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने याचना की लीला से बलि का तीनों लोकों का अधिकार ले लिया; उनके पास अपना शरीर ही शेष रहा। वे वरुणपाश से बाँधे गए और फिर मुक्त होकर नीचे के लोक में पहुँचे। इस स्थिति में बलि ने आगे कही गई बात कही।

मूल पाठ 24.24

नूनं बतायं भगवानर्थेषु न निष्णातो योऽसाविन्द्रो यस्य सचिवो मन्त्राय वृत एकान्ततो बृहस्पतिस्त- मतिहाय यमुपेन्द्रेणात्मानमयाचतात्मनश्चाशिषो नो एव तद्दास्यमतिगम्भीरवयसः कालस्य मन्वन्तरपरिवृत्तं कियल्लोकत्रयमिदम् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: बलि कहते हैं—इन्द्र ने बृहस्पति जैसे एकनिष्ठ सलाहकार के रहते भी भगवान उपेन्द्र से उनकी सेवा के बजाय अपना राज्य और सुख माँगा। अनन्त काल की तुलना में एक मन्वन्तर तक मिलने वाला त्रैलोक्य राज्य कितना छोटा है! वास्तविक हित भगवान की दासता प्राप्त करने में है।

मूल पाठ 24.25

यस्यानुदास्यमेवास्मत्पितामहः किल वव्रे न तु स्वपित्र्यं यदुताकुतोभयं पदं दीयमानं भगवतः परमिति भगवतोपरते खलु स्वपितरि ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरे पितामह प्रह्लाद ने अपने पिता के मारे जाने पर भगवान द्वारा दिया जा रहा राज्य स्वीकारने की अपेक्षा उनकी सेवा ही माँगी थी। उन्होंने अपने पिता की संपत्ति को भगवान की निष्काम दासता से श्रेष्ठ नहीं माना।

मूल पाठ 24.26

तस्य महानुभावस्यानुपथममृजितकषायः को वास्मद्विधः परिहीणभगवदनुग्रह उपजिगमिषतीति ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: बलि विनय करते हैं—प्रह्लाद जैसे महानुभाव के मार्ग पर हम जैसे लोग कैसे पहुँच सकते हैं? हमारे भीतर की अशुद्ध वासनाएँ अभी दूर नहीं हुईं और उनके जैसी भगवान की अनुकम्पा भी हमें कहाँ मिली है! यहाँ भक्त की आत्मनम्रता व्यक्त है।

मूल पाठ 24.27

तस्यानुचरितमुपरिष्टाद्विस्तरिष्यते यस्य भगवान् स्वय- मखिलजगद्गुरुर्नारायणो द्वारि गदापाणिरवतिष्ठते निज- जनानुकम्पितहृदयो येनाङ्गुष्ठेन पदा दशकन्धरो योजना- युतायुतं दिग्विजय उच्चाटितः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी कहते हैं—बलि का विस्तृत चरित्र आगे कहा जाएगा। अपने भक्त पर करुणा से भगवान नारायण स्वयं गदा लेकर उनके द्वार पर खड़े रहते हैं। दिग्विजय करते आए रावण को उन्हीं भगवान ने पैर के अँगूठे से बहुत दूर फेंक दिया था।

मूल पाठ 24.28

ततोऽधस्तात्तलातले मयो नाम दानवेन्द्रस्त्रिपुराधिपति- र्भगवता पुरारिणा त्रिलोकीशं चिकीर्षुणा निर्दग्धस्व- पुरत्रयः तत्प्रसादाल्लब्धपदो मायाविनामाचार्यो महादेवेन परिरक्षितो विगतसुदर्शनभयो महीयते ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उससे नीचे तलातल में त्रिपुर का अधिपति मय दानव रहता है। तीनों लोकों का कल्याण करने के लिए शिव ने उसके तीन पुर जलाए, फिर अपनी कृपा से उसे स्थान दिया। मायावियों का यह आचार्य महादेव की रक्षा में सुदर्शन के भय से मुक्त होकर रहता है।

मूल पाठ 24.29

ततोऽधस्तान्महातले काद्रवेयाणां सर्पाणां नैकशिरसां क्रोधवशो नाम गणः कुहकतक्षककालिय- सुषेणादिप्रधाना महाभोगवन्तः पतत्त्रिराजाधिपतेः पुरुषवाहादनवरतमुद्विजमानाः स्वकलत्रापत्यसुहृ- त्कुटुम्बसङ्गेन क्वचित्प्रमत्ता विहरन्ति ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: महातल में कद्रू की सन्तान अनेक फणों वाले नागों का क्रोधवश नामक समुदाय रहता है। कुहक, तक्षक, कालिय और सुषेण उसके प्रमुख हैं। वे भगवान के वाहन गरुड़ से भयभीत रहते हैं, फिर भी कभी अपने परिवार और मित्रों के संग में उस भय को भूलकर विहार करते हैं।

मूल पाठ 24.30

ततोऽधस्ताद्रसातले दैतेया दानवाः पणयो नाम निवातकवचाः कालेया हिरण्यपुरवासिन इति विबुधप्रत्यनीका उत्पत्त्या महौजसो महासाहसिनो भगवतः सकललोकानुभावस्य हरेरेव तेजसा प्रतिहतबलावलेपा बिलेशया इव वसन्ति ये वै सरमयेन्द्रदूत्या वाग्भिर्मन्त्रवर्णाभिरिन्द्राद्बिभ्यति ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: रसातल में पणि, निवातकवच, कालेय और हिरण्यपुरवासी दैत्य-दानव रहते हैं। वे जन्म से पराक्रमी और देवताओं के विरोधी हैं, पर भगवान हरि का तेज उनका बल-अभिमान दबा देता है। इन्द्र की दूती सरमा के मन्त्रयुक्त वचनों से भी वे भय मानते हैं।

मूल पाठ 24.31

ततोऽधस्तात्पाताले नागलोकपतयो वासुकिप्रमुखाः शङ्खकुलिकमहाशङ्खश्वेतधनञ्जयधृतराष्ट्रशङ्खचूड- कम्बलाश्वतरदेवदत्तादयो महाभोगिनो महामर्षा निवसन्ति येषामु ह वै पञ्चसप्तदशशतसहस्रशीर्षाणां फणासु विरचिता महामणयो रोचिष्णवः पातालविवर- तिमिरनिकरं स्वरोचिषा विधमन्ति ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: सबसे नीचे पाताल में वासुकि आदि नागराज रहते हैं—शंख, कुलिक, महाशंख, श्वेत, धनंजय, धृतराष्ट्र, शंखचूड़, कम्बल, अश्वतर और देवदत्त आदि। उनके पाँच, सात, दस, सौ या हजार फणों पर चमकती मणियाँ हैं। उन मणियों की आभा पाताल का घना अन्धकार दूर करती है।

पंचम स्कन्ध • अध्याय 25

अनन्त शेष की महिमा और भगवान के नाम का आश्रय

मूल पाठ 25.1

श्रीशुक उवाच । तस्य मूलदेशे त्रिंशद्योजनसहस्रान्तर आस्ते या वै कला भगवतस्तामसी समाख्यातानन्त इति सात्वतीया द्रष्टृदृश्ययोः सङ्कर्षणमहमित्यभिमान-लक्षणं यं सङ्कर्षणमित्याचक्षते ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी कहते हैं—उसके मूल में तीस हजार योजन के अन्तर पर भगवान की वह कला स्थित है जिसे भक्त अनन्त कहते हैं। द्रष्टा और दृश्य को अहंभाव के आधार पर संकर्षित करने वाले होने से उनका नाम संकर्षण भी है। यहाँ भगवान की संहार से सम्बन्धित शक्ति का वर्णन है।

मूल पाठ 25.2

यस्येदं क्षितिमण्डलं भगवतोऽनन्तमूर्तेः सहस्रशिरस एकस्मिन्नेव शीर्षणि ध्रियमाणं सिद्धार्थ इव लक्ष्यते ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: सहस्र मस्तकों वाले भगवान अनन्त के एक ही मस्तक पर यह समस्त पृथ्वी-मण्डल सरसों के दाने जैसा दिखाई देता है। इससे उनके असीम सामर्थ्य का बोध कराया गया है।

मूल पाठ 25.3

यस्य ह वा इदं कालेनोपसञ्जिहीर्षतोऽमर्षविरचित- रुचिरभ्रमद्भ्रुवोरन्तरेण साङ्कर्षणो नाम रुद्र एकादश- व्यूहस्त्र्यक्षस्त्रिशिखं शूलमुत्तम्भयन्नुदतिष्ठत् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब समय आने पर भगवान इस जगत का संहार करना चाहते हैं, तब उनकी क्रोध से चंचल भौंहों के बीच से सांकरषण रुद्र प्रकट होते हैं। वे त्रिनेत्र और त्रिशूलधारी हैं तथा उनके ग्यारह रूप बताए गए हैं।

मूल पाठ 25.4

यस्याङ्घ्रिकमलयुगलारुणविशदनखमणिषण्ड- मण्डलेषु अहिपतयः सह सात्वतर्षभैरेकान्तभक्ति- योगेनावनमन्तः स्ववदनानि परिस्फुरत्कुण्डलप्रभा- मण्डितगण्डस्थलान्यतिमनोहराणि प्रमुदितमनसः खलु विलोकयन्ति ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: नागराज और श्रेष्ठ भक्त एकनिष्ठ भक्ति से उनके चरणों में प्रणाम करते हैं। चरणों के लाल और निर्मल नखमणियों में वे अपने कुण्डलों से प्रकाशित गण्डस्थलों वाले सुन्दर मुखों का प्रतिबिम्ब देखकर आनन्दित होते हैं।

मूल पाठ 25.5

यस्यैव हि नागराजकुमार्य आशिष आशासाना- श्चार्वङ्गवलयविलसितविशदविपुलधवलसुभग- रुचिरभुजरजतस्तम्भेष्वगुरुचन्दनकुङ्कुमपङ्कानु- लेपेनावलिम्पमानास्तदभिमर्शनोन्मथितहृदय- मकरध्वजावेशरुचिरललितस्मितास्तदनुराग- मदमुदितमदविघूर्णितारुणकरुणावलोकनयन- वदनारविन्दं सव्रीडं किल विलोकयन्ति ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: नागराजों की कुमारियाँ आशीर्वाद की कामना से भगवान की चाँदी के स्तम्भों जैसी उज्ज्वल भुजाओं पर अगुरु, चन्दन और कुमकुम का लेप करती हैं। सेवा और स्पर्श से उनके हृदय में प्रेम जागता है। वे लज्जा और अनुराग सहित भगवान का मुस्कान तथा करुणामय दृष्टि से सुशोभित मुख देखती हैं।

मूल पाठ 25.6

स एव भगवाननन्तोऽनन्तगुणार्णव आदिदेव उपसंहृतामर्षरोषवेगो लोकानां स्वस्तय आस्ते ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: अनन्त गुणों के समुद्र, आदिदेव भगवान अनन्त अपने रोष और संहार-वेग को रोककर समस्त लोकों के कल्याण के लिए स्थित रहते हैं। उनका सामर्थ्य प्राणियों की रक्षा में भी प्रकट होता है।

मूल पाठ 25.7

ध्यायमानः सुरासुरोरगसिद्धगन्धर्वविद्याधर- मुनिगणैरनवरतमदमुदितविकृतविह्वललोचनः सुललितमुखरिकामृतेनाप्यायमानः स्वपार्षद- विबुधयूथपतीनपरिम्लानरागनवतुलसिकामोद- मध्वासवेन माद्यन् मधुकरव्रातमधुरगीतश्रियं वैजयन्तीं स्वां वनमालां नीलवासा एककुण्डलो हलककुदि कृतसुभगसुन्दरभुजो भगवान् माहेन्द्रो वारणेन्द्र इव काञ्चनीं कक्षामुदारलीलो बिभर्ति ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवता, असुर, नाग, सिद्ध, गन्धर्व, विद्याधर और मुनि उनका ध्यान करते हैं। वे मधुर अमृतमय वाणी से अपने पार्षदों को प्रसन्न करते हैं। नीले वस्त्र, एक कुण्डल, तुलसी की सुगन्ध और भ्रमरों के गुंजार से सुशोभित वैजयन्ती वनमाला धारण कर, हल पर सुन्दर भुजा टिकाए भगवान अनन्त उदार लीला से विराजते हैं।

मूल पाठ 25.8

य एष एवमनुश्रुतो ध्यायमानो मुमुक्षूणामनादि- कालकर्मवासनाग्रथितमविद्यामयं हृदयग्रन्थिं सत्त्वरजस्तमोमयमन्तर्हृदयं गत आशु निर्भिनत्ति तस्यानुभावान् भगवान् स्वायम्भुवो नारदः सह तुम्बुरुणा सभायां ब्रह्मणः संश्लोकयामास ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनका श्रवण और ध्यान मुक्ति चाहने वालों के हृदय में अनादि कर्मवासनाओं और अविद्या से बँधी तीन गुणों की गाँठ खोल देता है। ब्रह्माजी के पुत्र नारद ने तुम्बुरु के साथ ब्रह्मसभा में उनकी इस महिमा का गान किया।

मूल पाठ 25.9

उत्पत्तिस्थितिलयहेतवोऽस्य कल्पाः सत्त्वाद्याः प्रकृतिगुणा यदीक्षयाऽऽसन् । यद्रूपं ध्रुवमकृतं यदेकमात्मन् नानाधात्कथमु ह वेद तस्य वर्त्म ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारदजी स्तुति करते हैं—जिनकी दृष्टि से सत्त्व, रज और तम जैसे प्रकृति के गुण सृष्टि, स्थिति और लय के कारण बनते हैं, वे स्वयं नित्य, अजन्मा और अद्वितीय हैं। भिन्न-भिन्न रूपों में बँटा हुआ जीव उनके सम्पूर्ण स्वरूप और मार्ग को कैसे जान सकता है?

मूल पाठ 25.10

मूर्तिं नः पुरुकृपया बभार सत्त्वं संशुद्धं सदसदिदं विभाति तत्र । यल्लीलां मृगपतिराददेऽनवद्या- मादातुं स्वजनमनांस्युदारवीर्यः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने हमारे प्रति बड़ी कृपा से विशुद्ध सत्त्वमय मूर्ति धारण की है, जिसमें कारण और कार्यरूप जगत का प्रकाश होता है। भक्तों के मन को आकर्षित करने वाली उनकी उदार और निष्कलंक वीरलीला का अनुकरण सिंह जैसे पराक्रमी जीव भी करते हैं।

मूल पाठ 25.11

यन्नामश्रुतमनुकीर्तयेदकस्मा- दार्तो वा यदि पतितः प्रलम्भनाद्वा । हन्त्यंहः सपदि नृणामशेषमन्यं कं शेषाद्भगवत आश्रयेन्मुमुक्षुः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिस भगवान का सुना हुआ नाम अचानक, कष्ट में, गिरते समय अथवा हँसी-परिहास में भी दोहराने से पाप नष्ट करने की महिमा कही गई है, मुक्ति चाहने वाला उनके अतिरिक्त और किसका आश्रय ले? यहाँ अनन्त शेष के नाम और आश्रय की महत्ता है।

मूल पाठ 25.12

मूर्धन्यर्पितमणुवत्सहस्रमूर्ध्नो भूगोलं सगिरिसरित्समुद्रसत्त्वम् । आनन्त्यादनिमितविक्रमस्य भूम्नः को वीर्याण्यधिगणयेत्सहस्रजिह्वः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: पर्वत, नदियाँ, समुद्र और जीवों सहित समस्त पृथ्वी उनके सहस्र मस्तकों में से एक पर अणु के समान रखी है। अनन्त और अपरिमित पराक्रम वाले भगवान की शक्तियों की गिनती हजार जिह्वाओं वाला भी कैसे कर सकता है?

मूल पाठ 25.13

एवम्प्रभावो भगवाननन्तो दुरन्तवीर्योरुगुणानुभावः । मूले रसायाः स्थित आत्मतन्त्रो यो लीलया क्ष्मां स्थितये बिभर्ति ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसी अनन्त महिमा, असीम शक्ति और महान गुणों वाले भगवान अनन्त पृथ्वी के नीचे स्थित हैं। वे स्वतंत्र हैं और जगत की स्थिरता के लिए लीला से पृथ्वी को धारण करते हैं।

मूल पाठ 25.14

एता ह्येवेह नृभिरुपगन्तव्या गतयो यथा कर्मविनिर्मिता यथोपदेशमनुवर्णिताः कामान् कामयमानैः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्य अपनी कामनाओं और कर्मों के अनुसार जिन लोकों और गतियों को प्राप्त करते हैं, उनका शास्त्रोपदेश के अनुसार वर्णन किया गया। इच्छाओं के अनुसार किए गए कर्म ही अलग-अलग फल देने वाले हैं।

मूल पाठ 25.15

एतावतीर्हि राजन् पुंसः प्रवृत्तिलक्षणस्य धर्मस्य विपाकगतय उच्चावचा विसदृशा यथाप्रश्नं व्याचख्ये किमन्यत्कथयाम इति ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे राजन्! तुम्हारे प्रश्न के अनुसार प्रवृत्ति-प्रधान धर्म के कर्मफलस्वरूप ऊँची-नीची और भिन्न-भिन्न गतियाँ कह दीं। अब और क्या सुनना चाहते हो? इस प्रश्न से अगला कर्मफल-विवेचन आरम्भ होता है।

पंचम स्कन्ध • अध्याय 26

कर्मफल, नरक-वर्णन और विराट रूप का उपसंहार

मूल पाठ 26.1

राजोवाच । महर्ष एतद्वैचित्र्यं लोकस्य कथमिति ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा परीक्षित पूछते हैं—महर्षे! संसार के प्राणियों और उनकी प्राप्त होने वाली गतियों में यह इतनी विविधता कैसे आती है?

मूल पाठ 26.2

ऋषिरुवाच । त्रिगुणत्वात्कर्तुः श्रद्धया कर्मगतयः पृथग्विधाः सर्वा एव सर्वस्य तारतम्येन भवन्ति ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी उत्तर देते हैं—कर्ता सत्त्व, रज और तम, इन तीन गुणों से प्रभावित होता है। उसकी श्रद्धा और कर्मों में भी भिन्नता तथा न्यूनाधिकता होती है। इसी से सबकी कर्मगतियाँ एक जैसी नहीं होतीं।

मूल पाठ 26.3

अथेदानीं प्रतिषिद्धलक्षणस्याधर्मस्य तथैव कर्तुः श्रद्धाया वैसादृश्यात्कर्मफलं विसदृशं भवति या ह्यनाद्यविद्यया कृतकामानां तत्परिणामलक्षणाः सृतयः सहस्रशः प्रवृत्तास्तासां प्राचुर्येणा- नुवर्णयिष्यामः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: निषिद्ध आचरणरूप अधर्म में भी कर्ता की प्रवृत्ति और श्रद्धा के भेद से फल भिन्न होता है। अनादि अविद्या से उत्पन्न इच्छाओं और कर्मों के परिणामस्वरूप हजारों गतियाँ बनती हैं। अब उनमें प्रमुख अधर्मफल का वर्णन किया जाएगा।

मूल पाठ 26.4

राजोवाच । नरका नाम भगवन् किं देशविशेषा अथवा बहिस्त्रिलोक्या आहोस्विदन्तराल इति ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: परीक्षित पूछते हैं—भगवन्! जिन्हें नरक कहा जाता है, क्या वे कोई विशेष देश हैं? क्या वे तीनों लोकों के बाहर हैं या उनके बीच किसी स्थान में हैं?

मूल पाठ 26.5

ऋषिरुवाच । अन्तराल एव त्रिजगत्यास्तु दिशि दक्षिणस्या- मधस्ताद्भूमेरुपरिष्टाच्च जलाद्यस्यामग्निष्वात्तादयः पितृगणा दिशि स्वानां गोत्राणां परमेण समाधिना सत्या एवाशिष आशासाना निवसन्ति ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी कहते हैं—वे त्रिलोक के अन्तराल में, दक्षिण दिशा में, पृथ्वी के नीचे और जल के ऊपर बताए गए हैं। उसी दिशा में अग्निष्वात्त आदि पितृगण निवास करते हैं और एकाग्र भाव से अपने वंशजों के सच्चे कल्याण की कामना करते हैं।

मूल पाठ 26.6

यत्र ह वाव भगवान् पितृराजो वैवस्वतः स्वविषयं प्रापितेषु स्वपुरुषैर्जन्तुषु सम्परेतेषु यथा कर्मावद्यं दोषमेवानुल्लङ्घितभगवच्छासनः सगणो दमं धारयति ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ सूर्यपुत्र पितृराज यम अपने अनुचरों द्वारा लाए गए मृत जीवों के कर्मदोषों के अनुसार दण्ड का विधान करते हैं। वे भगवान के शासन का उल्लंघन नहीं करते; न्याय उनके कार्य का आधार है।

मूल पाठ 26.7

तत्र हैके नरकानेकविंशतिं गणयन्ति अथ तांस्ते राजन् नामरूपलक्षणतोऽनुक्रमिष्यामस्तामिस्रो- ऽन्धतामिस्रो रौरवो महारौरवः कुम्भीपाकः कालसूत्रमसिपत्रवनं सूकरमुखमन्धकूपः कृमिभोजनः सन्दंशस्तप्तसूर्मिर्वज्रकण्टक- शाल्मली वैतरणी पूयोदः प्राणरोधो विशसनं लालाभक्षः सारमेयादनमवीचिरयःपानमिति किञ्च क्षारकर्दमो रक्षोगणभोजनः शूलप्रोतो दन्दशूकोऽवटनिरोधनः पर्यावर्तनः सूचीमुखमि- त्यष्टाविंशतिर्नरका विविधयातनाभूमयः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: कुछ आचार्य इक्कीस नरक गिनते हैं। यहाँ तामिस्र, अन्धतामिस्र, रौरव, महारौरव, कुम्भीपाक, कालसूत्र, असिपत्रवन, सूकरमुख, अन्धकूप, कृमिभोजन, सन्दंश, तप्तसूर्मि, वज्रकण्टकशाल्मली, वैतरणी, पूयोद, प्राणरोध, विशसन, लालाभक्ष, सारमेयादन, अवीचि और अयःपान के साथ क्षारकर्दम, रक्षोगणभोजन, शूलप्रोत, दन्दशूक, अवटनिरोधन, पर्यावर्तन और सूचीमुख—कुल अट्ठाईस यातनाभूमियों का नामक्रम कहा गया है।

मूल पाठ 26.8

तत्र यस्तु परवित्तापत्यकलत्राण्यपहरति स हि कालपाशबद्धो यमपुरुषैरतिभयानकैस्तामिस्रे नरके बलान्निपात्यते अनशनानुदपानदण्ड- ताडनसन्तर्जनादिभिर्यातनाभिर्यात्यमानो जन्तुर्यत्र कश्मलमासादित एकदैव मूर्च्छामुपयाति तामिस्रप्राये ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो दूसरों का धन, सन्तान या जीवनसाथी छीनता है, उसे तामिस्र की यातना का अधिकारी बताया गया है। भूख-प्यास, मार और भय से मूर्च्छित होने का वर्णन इस बात को कठोर रूप में सामने रखता है कि दूसरे का जीवन और अधिकार छीनना गंभीर अधर्म है।

मूल पाठ 26.9

एवमेवान्धतामिस्रे यस्तु वञ्चयित्वा पुरुषं दारादी- नुपयुङ्क्ते यत्र शरीरी निपात्यमानो यातनास्थो वेदनया नष्टमतिर्नष्टदृष्टिश्च भवति यथा वनस्पति- र्वृश्च्यमानमूलस्तस्मादन्धतामिस्रं तमुपदिशन्ति ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो किसी को छलकर उसकी पत्नी आदि का उपभोग करता है, उसके लिए अन्धतामिस्र कहा गया है। वहाँ की वेदना बुद्धि और दृष्टि हर लेने वाली बताई गई है, जैसे जड़ कट जाने पर वृक्ष नष्ट होता है। प्रसंग विश्वासघात और छल की निन्दा करता है।

मूल पाठ 26.10

यस्त्विह वा एतदहमिति ममेदमिति भूतद्रोहेण केवलं स्वकुटुम्बमेवानुदिनं प्रपुष्णाति स तदिह विहाय स्वयमेव तदशुभेन रौरवे निपतति ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो ‘मैं’ और ‘मेरा’ मानकर दूसरे जीवों से द्रोह करता है और केवल अपने परिवार का पोषण ही अपना लक्ष्य बनाता है, वह सब यहीं छोड़कर अपने उस अशुभ कर्म के कारण रौरव में पड़ता है। परिवार-पालन नहीं, उसके लिए किया गया निर्दयी अन्याय यहाँ दोष है।

मूल पाठ 26.11

ये त्विह यथैवामुना विहिंसिता जन्तवः परत्र यमयातनामुपगतं त एव रुरवो भूत्वा तथा तमेव विहिंसन्ति तस्माद्रौरवमित्याहू रुरुरिति सर्पादतिक्रूरसत्त्वस्यापदेशः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिन जीवों को उसने पीड़ा दी थी, वे परलोक में रुरु नाम के अत्यन्त क्रूर प्राणी बनकर उसे पीड़ा देते हैं—ऐसा वर्णन है। इसी से इस गति का नाम रौरव कहा गया है। अपने द्वारा पहुँचाई गई पीड़ा के प्रत्यावर्तन की बात यहाँ आती है।

मूल पाठ 26.12

एवमेव महारौरवो यत्र निपतितं पुरुषं क्रव्यादा नाम रुरवस्तं क्रव्येण घातयन्ति यः केवलं देहम्भरः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो केवल अपने शरीर के भरण-पोषण के लिए दूसरों को नष्ट करता है, उसके लिए महारौरव कहा गया है। वहाँ क्रव्याद नाम के रुरुओं से पीड़ित होने का वर्णन है। स्वार्थ के लिए क्रूरता को गंभीर पाप बताया गया है।

मूल पाठ 26.13

यस्त्विह वा उग्रः पशून् पक्षिणो वा प्राणत उपरन्धयति तमपकरुणं पुरुषादैरपि विगर्हितममुत्र यमानुचराः कुम्भीपाके तप्ततैले उपरन्धयन्ति ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो दयारहित होकर जीवित पशु-पक्षियों को पकाता है, उसके लिए कुम्भीपाक में तप्त तेल की यातना कही गई है। ऐसी क्रूरता की निन्दा अत्यन्त हिंसक स्वभाव वालों द्वारा भी की जाती है।

मूल पाठ 26.14

यस्त्विह पितृविप्रब्रह्मध्रुक् स कालसूत्रसंज्ञके नरके अयुतयोजनपरिमण्डले ताम्रमये तप्तखले उपर्यधस्तादग्न्यर्काभ्यामतितप्यमानेऽभिनिवेशितः क्षुत्पिपासाभ्यां च दह्यमानान्तर्बहिःशरीर आस्ते शेते चेष्टतेऽवतिष्ठति परिधावति च यावन्ति पशुरोमाणि तावद्वर्षसहस्राणि ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: पितरों, ब्राह्मणों और ब्रह्म अथवा वैदिक ज्ञान के प्रति द्रोह करने वाले के लिए कालसूत्र का वर्णन है। विशाल तप्त ताम्रभूमि, ऊपर सूर्य और नीचे अग्नि, भूख-प्यास तथा दीर्घ यातना का चित्रण किया गया है। ग्रंथ सम्मान और धर्म के प्रति द्रोह की कठोर निन्दा करता है।

मूल पाठ 26.15

यस्त्विह वै निजवेदपथादनापद्यपगतः पाखण्डं चोपगतस्तमसिपत्रवनं प्रवेश्य कशया प्रहरन्ति तत्र हासावितस्ततो धावमान उभयतो धारै- स्तालवनासिपत्रैश्छिद्यमानसर्वाङ्गो हा हतो- ऽस्मीति परमया वेदनया मूर्च्छितः पदे पदे निपतति स्वधर्महा पाखण्डानुगतं फलं भुङ्क्ते ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो आपत्ति न होने पर भी अपना वैदिक धर्ममार्ग छोड़कर पाखण्ड का आश्रय लेता है, उसे असिपत्रवन की गति कही गई है। तलवार-जैसे पत्तों से कटने और पीड़ा से बार-बार गिरने का वर्णन है। अपने कर्तव्य को छोड़कर छलपूर्ण धर्माचरण अपनाना इसका प्रसंग है।

मूल पाठ 26.16

यस्त्विह वै राजा राजपुरुषो वा अदण्ड्ये दण्डं प्रणयति ब्राह्मणे वा शरीरदण्डं स पापीयान् नरकेऽमुत्र सूकरमुखे निपतति तत्रातिबलै- र्विनिष्पिष्यमाणावयवो यथैवेहेक्षुखण्ड आर्तस्वरेण स्वनयन् क्वचिन्मूर्च्छितः कश्मलमुपगतो यथैवेहादृष्टदोषा उपरुद्धाः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो राजा या राजकर्मी निर्दोष को दण्ड देता है अथवा ब्राह्मण को शारीरिक दण्ड देता है, उसके लिए सूकरमुख नरक कहा गया है। वहाँ गन्ने की तरह दबाए जाने की यातना का वर्णन है। जिस पीड़ा में निर्दोष को डाला, उसी अन्याय का फल शासक को भी भोगना पड़ता है।

मूल पाठ 26.17

यस्त्विह वै भूतानामीश्वरोपकल्पितवृत्तीना- मविविक्तपरव्यथानां स्वयं पुरुषोपकल्पित- वृत्तिर्विविक्तपरव्यथो व्यथामाचरति स परत्रान्धकूपे तदभिद्रोहेण निपतति तत्र हासौ तैर्जन्तुभिः पशुमृगपक्षिसरीसृपैर्मशकयूका- मत्कुणमक्षिकादिभिर्ये के चाभिद्रुग्धास्तैः सर्वतोऽभिद्रुह्यमाणस्तमसि विहतनिद्रानिर्वृति- रलब्धावस्थानः परिक्रामति यथा कुशरीरे जीवः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: पशु-पक्षी और कीट आदि अपनी स्वाभाविक जीविका में दूसरे की पीड़ा का विवेक नहीं रखते। पर मनुष्य विवेक और अपनी आजीविका की क्षमता रखते हुए भी उन्हें व्यर्थ कष्ट दे, तो अन्धकूप की गति कही गई है। वहीं वे जीव उसे घेरकर पीड़ा देते हैं और उसे विश्राम नहीं मिलता।

मूल पाठ 26.18

यस्त्विह वा असंविभज्याश्नाति यत्किञ्चनो- पनतमनिर्मितपञ्चयज्ञो वायससंस्तुतः स परत्र कृमिभोजने नरकाधमे निपतति तत्र शतसहस्रयोजने कृमिकुण्डे कृमिभूतः स्वयं कृमिभिरेव भक्ष्यमाणः कृमिभोजनो यावत्त- दप्रत्ताप्रहूतादोऽनिर्वेशमात्मानं यातयते ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो प्राप्त भोजन में दूसरों का भाग न बाँटे और पंचमहायज्ञ जैसे अपने दायित्व पूरे किए बिना ही सब स्वयं खा ले, उसके लिए कृमिभोजन कहा गया है। वहाँ कृमि होकर कृमियों से पीड़ित होने का वर्णन है। भोजन और संसाधन में साझा दायित्व की उपेक्षा यहाँ दोष है।

मूल पाठ 26.19

यस्त्विह वै स्तेयेन बलाद्वा हिरण्यरत्नादीनि ब्राह्मणस्य वापहरत्यन्यस्य वानापदि पुरुष- स्तममुत्र राजन् यमपुरुषा अयस्मयैरग्निपिण्डैः सन्दंशैस्त्वचि निष्कुषन्ति ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो बिना आपत्ति के चोरी या बल से किसी ब्राह्मण अथवा किसी दूसरे का सोना, रत्न आदि छीनता है, उसे सन्दंश की यातना कही गई है। तप्त लोहे के उपकरणों से पीड़ा का वर्णन परधन-हरण की गंभीर निन्दा के लिए है।

मूल पाठ 26.20

यस्त्विह वा अगम्यां स्त्रियमगम्यं वा पुरुषं योषिदभिगच्छति तावमुत्र कशया ताडयन्त- स्तिग्मया सूर्म्या लोहमय्या पुरुषमालिङ्गयन्ति स्त्रियं च पुरुषरूपया सूर्म्या ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो स्त्री या पुरुष निषिद्ध यौन सम्बन्ध में प्रवृत्त होते हैं, उनके लिए तप्तसूर्मि की यातना कही गई है। दण्ड और तपे लोहे की स्त्री-पुरुष आकृतियों के आलिंगन का वर्णन आता है। प्रसंग सम्बन्धों में संयम और मर्यादा के उल्लंघन का है।

मूल पाठ 26.21

यस्त्विह वै सर्वाभिगमस्तममुत्र निरये वर्तमानं वज्रकण्टकशाल्मलीमारोप्य निष्कर्षन्ति ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो बिना किसी मर्यादा के सब प्रकार के निषिद्ध यौन आचरण में प्रवृत्त होता है, उसके लिए वज्रकण्टकशाल्मली कही गई है। कठोर काँटों वाले वृक्ष पर चढ़ाकर नीचे खींचने का दण्ड वर्णित है।

मूल पाठ 26.22

ये त्विह वै राजन्या राजपुरुषा वा अपाखण्डा धर्मसेतून् भिन्दन्ति ते सम्परेत्य वैतरण्यां निपतन्ति भिन्नमर्यादास्तस्यां निरयपरिखा- भूतायां नद्यां यादोगणैरितस्ततो भक्ष्यमाणा आत्मना न वियुज्यमानाश्चासुभिरुह्यमानाः स्वाघेन कर्मपाकमनुस्मरन्तो विण्मूत्रपूयशोणित- केशनखास्थिमेदोमांसवसावाहिन्यामुपतप्यन्ते ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो राजा और राजकर्मी धर्म की मर्यादाएँ तोड़ते हैं, वे वैतरणी में पड़ते हैं—ऐसा कहा गया है। मल, रक्त और अन्य अपवित्र पदार्थों से भरी नदी में पीड़ा का चित्रण है। सत्ता का उपयोग मर्यादा तोड़ने के लिए करना उन्हें उसके फल से मुक्त नहीं करता।

मूल पाठ 26.23

ये त्विह वै वृषलीपतयो नष्टशौचाचारनियमा- स्त्यक्तलज्जाः पशुचर्यां चरन्ति ते चापि प्रेत्य पूयविण्मूत्रश्लेष्ममलापूर्णार्णवे निपतन्ति तदेवातिबीभत्सितमश्नन्ति ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मूल पाठ में ‘वृषलीपति’ आदि तत्कालीन सामाजिक पदों के साथ शौच, सदाचार, नियम और लज्जा छोड़कर पशुवत जीवन जीने वालों का उल्लेख है। उनके लिए पूयोद की अपवित्रता भरी गति कही गई है। यह पुराण के ऐतिहासिक सामाजिक विधान का प्रसंग है; इससे आज किसी समुदाय के अपमान या उत्पीड़न का समर्थन नहीं किया जा रहा।

मूल पाठ 26.24

ये त्विह वै श्वगर्दभपतयो ब्राह्मणादयो मृगया- विहारा अतीर्थे च मृगान् निघ्नन्ति तानपि सम्परेतान् लक्ष्यभूतान् यमपुरुषा इषुभिर्विध्यन्ति ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो ब्राह्मणादि कुत्ते और गधे पालकर शिकार का मनोरंजन करते और अनुचित समय या अवसर में मृगों को मारते हैं, उन्हें परलोक में स्वयं बाणों का निशाना बनने का फल बताया गया है। यहाँ मनोरंजन के लिए प्राणियों की हत्या की निन्दा है।

मूल पाठ 26.25

ये त्विह वै दाम्भिका दम्भयज्ञेषु पशून् विशसन्ति तानमुष्मिन् लोके वैशसे नरके पतितान् निरयपतयो यातयित्वा विशसन्ति ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो लोग धार्मिक दिखावे के लिए यज्ञ का ढोंग करके पशुओं को मारते हैं, उनके लिए विशसन की यातना कही गई है। धर्म के नाम पर दम्भ और हिंसा को इस प्रसंग में दोष माना गया है।

मूल पाठ 26.26

यस्त्विह वै सवर्णां भार्यां द्विजो रेतः पाययति काममोहितस्तं पापकृतममुत्र रेतःकुल्यायां पातयित्वा रेतः सम्पाययन्ति ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो द्विज काममोह से अपनी पत्नी को वीर्य पिलाता है, उसके लिए लालाभक्ष अथवा रेतःकुल्या की यातना कही गई है। यह दाम्पत्य में भी काममोह से उत्पन्न अपवित्र और अपमानजनक आचरण की निन्दा का प्रसंग है।

मूल पाठ 26.27

ये त्विह वै दस्यवोऽग्निदा गरदा ग्रामान् सार्थान् वा विलुम्पन्ति राजानो राजभटा वा तांश्चापि हि परेत्य यमदूता वज्रदंष्ट्राः श्वानः सप्तशतानि विंशतिश्च सरभसं खादन्ति ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो डाकू, आग लगाने वाले, विष देने वाले अथवा गाँवों और व्यापारी दलों को लूटने वाले राजा तथा सैनिक होते हैं, उनके लिए सारमेयादन कहा गया है। वहाँ सात सौ बीस भयानक दाँतों वाले कुत्तों द्वारा पीड़ित किए जाने का वर्णन है।

मूल पाठ 26.28

यस्त्विह वा अनृतं वदति साक्ष्ये द्रव्यविनिमये दाने वा कथञ्चित्स वै प्रेत्य नरकेऽवीचिमत्यधःशिरा निरवकाशे योजनशतोच्छ्रायाद्गिरिमूर्ध्नः सम्पात्यते यत्र जलमिव स्थलमश्मपृष्ठमवभासते तदवीचिम- त्तिलशो विशीर्यमाणशरीरो न म्रियमाणः पुनरारोपितो निपतति ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो गवाही, व्यापार अथवा दान में जानबूझकर झूठ बोलता है, उसे अवीचि की गति कही गई है। ऊँचे पर्वत से कठोर भूमि पर बार-बार गिराए जाने का वर्णन है। सत्य को तोड़कर लाभ लेने के परिणाम की कठोरता यहाँ प्रकट की गई है।

मूल पाठ 26.29

यस्त्विह वै विप्रो राजन्यो वैश्यो वा सोमपीथस्तत्कलत्रं वा सुरां व्रतस्थोऽपि वा पिबति प्रमादतस्तेषां निरयं नीतानामुरसि पदाऽऽक्रम्यास्ये वह्निना द्रवमाणं कार्ष्णायसं निषिञ्चन्ति ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मूल पाठ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, सोमपान के अधिकारी तथा उनकी पत्नी और व्रतधारी द्वारा निषिद्ध सुरापान का उल्लेख करता है। ऐसे नियमभंग के लिए अयःपान में तप्त लोहे का दण्ड वर्णित है। यह उस समय के वर्णाश्रम और व्रत-विधान के संदर्भ का कथन है।

मूल पाठ 26.30

अथ च यस्त्विह वा आत्मसम्भावनेन स्वयमधमो जन्मतपोविद्याचारवर्णाश्रमवतो वरीयसो न बहुमन्येत स मृतक एव मृत्वा क्षारकर्दमे निरये- ऽवाक्शिरा निपातितो दुरन्ता यातना ह्यश्नुते ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो अपने अभिमान से तप, विद्या और सदाचार में श्रेष्ठ लोगों का उचित सम्मान नहीं करता, उसके लिए क्षारकर्दम की गति कही गई है। उलटे गिराए जाने की यातना अहंकार और गुणों के अनादर की निन्दा करती है।

मूल पाठ 26.31

ये त्विह वै पुरुषाः पुरुषमेधेन यजन्ते याश्च स्त्रियो नृपशून् खादन्ति तांश्च ते पशव इव निहता यमसदने यातयन्तो रक्षोगणाः सौनिका इव स्वधितिनावदाया- सृक् पिबन्ति नृत्यन्ति च गायन्ति च हृष्यमाणा यथेह पुरुषादाः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो मनुष्यबलि देते या मनुष्य का मांस खाते हैं, उनके लिए रक्षोगणभोजन का वर्णन है। मारे गए प्राणियों की ओर से प्रतिकार जैसी यातना कही गई है। प्रसंग मानव-हत्या और अत्यन्त क्रूर हिंसा का निषेध करता है।

मूल पाठ 26.32

ये त्विह वा अनागसोऽरण्ये ग्रामे वा वैश्रम्भकैरुपसृता- नुपविश्रम्भय्य जिजीविषून् शूलसूत्रादिषूपप्रोतान् क्रीडनकतया यातयन्ति तेऽपि च प्रेत्य यमयातनासु शूलादिषु प्रोतात्मानः क्षुत्तृड्भ्यां चाभिहताः कङ्कवटादिभि- श्चेतस्ततस्तिग्मतुण्डैराहन्यमाना आत्मशमलं स्मरन्ति ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो निर्दोष प्राणियों का विश्वास जीतकर उन्हें पकड़ते और खेल की तरह शूल या सूत्र से बाँधकर यातना देते हैं, उनके लिए शूलप्रोत कहा गया है। भूख-प्यास तथा तीक्ष्ण चोंच वाले पक्षियों से पीड़ा में वे अपने दुष्कर्म को स्मरण करते हैं।

मूल पाठ 26.33

ये त्विह वै भूतान्युद्वेजयन्ति नरा उल्बणस्वभावा यथा दन्दशूकास्तेऽपि प्रेत्य नरके दन्दशूकाख्ये निपतन्ति यत्र नृप दन्दशूकाः पञ्चमुखाः सप्तमुखा उपसृत्य ग्रसन्ति यथा बिलेशयान् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो साँप-जैसे उग्र और क्रूर स्वभाव से दूसरे जीवों को भयभीत करते हैं, उनके लिए दन्दशूक नरक कहा गया है। वहाँ पाँच और सात मुख वाले सर्पों से ग्रस्त होने का वर्णन है। भय फैलाकर जीवन जीने की प्रवृत्ति इसकी विषयवस्तु है।

मूल पाठ 26.34

ये त्विह वा अन्धावटकुसूलगुहादिषु भूतानि निरुन्धन्ति तथामुत्र तेष्वेवोपवेश्य सगरेण वह्निना धूमेन निरुन्धन्ति ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो जीवों को अँधे गड्ढों, भण्डारों या गुफाओं में बन्द करके कष्ट देते हैं, उनके लिए अवटनिरोधन में वैसे ही बंद स्थान, विषैली अग्नि और धुएँ की यातना कही गई है। दूसरों की स्वतंत्रता और प्राणों से क्रूर खेल यहाँ निन्दित है।

मूल पाठ 26.35

यस्त्विह वा अतिथीनभ्यागतान् वा गृहपतिरसकृ- दुपगतमन्युर्दिधक्षुरिव पापेन चक्षुषा निरीक्षते तस्य चापि निरये पापदृष्टेरक्षिणी वज्रतुण्डा गृध्राः कङ्ककाकवटादयः प्रसह्योरुबलादुत्पाटयन्ति ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो गृहस्थ आए हुए अतिथि को बार-बार क्रोध और जलाने जैसी दुर्भावना भरी दृष्टि से देखता है, उसके लिए पर्यावर्तन की यातना कही गई है। कठोर चोंच वाले पक्षियों से आँखों को पीड़ा का वर्णन अतिथि के प्रति निर्दय व्यवहार की निन्दा में है।

मूल पाठ 26.36

यस्त्विह वा आढ्याभिमतिरहङ्कृतिस्तिर्यक्प्रेक्षणः सर्वतोऽभिविशङ्की अर्थव्ययनाशचिन्तया परिशुष्यमाणहृदयवदनो निर्वृतिमनवगतो ग्रह इवार्थमभिरक्षति स चापि प्रेत्य तदुत्पादनोत्कर्षण संरक्षणशमलग्रहः सूचीमुखे नरके निपतति यत्र ह वित्तग्रहं पापपुरुषं धर्मराजपुरुषा वायका इव सर्वतोऽङ्गेषु सूत्रैः परिवयन्ति ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो धन के अभिमान में दूसरों को तिरस्कार से देखता, सब पर संदेह करता और धन खर्च या नष्ट होने की चिन्ता में सूखता रहता है, उसे सूचीमुख की गति कही गई है। वहाँ शरीर को सूत से सीने जैसी यातना का वर्णन है। अन्यायपूर्ण धन-संग्रह और उसकी आसक्ति उसे शान्ति नहीं देते।

मूल पाठ 26.37

एवंविधा नरका यमालये सन्ति शतशः सहस्रशस्तेषु सर्वेषु च सर्व एवाधर्मवर्तिनो ये केचिदिहोदिता अनुदिताश्चावनिपते पर्यायेण विशन्ति तथैव धर्मानुवर्तिन इतरत्र इह तु पुनर्भवे त उभयशेषाभ्यां निविशन्ति ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: यमलोक में ऐसी सैकड़ों-हजारों गतियाँ कही गई हैं। बताए हुए और न बताए हुए अधर्मी कर्मों का फल वहाँ भोगते हैं, और धर्मानुसार कर्म करने वाले दूसरी पुण्यगतियाँ पाते हैं। शेष बचे शुभ-अशुभ कर्मों के अनुसार वे फिर इस संसार में जन्म लेते हैं।

मूल पाठ 26.38

निवृत्तिलक्षणमार्ग आदावेव व्याख्यातः एतावानेवा- ण्डकोशो यश्चतुर्दशधा पुराणेषु विकल्पित उपगीयते यत्तद्भगवतो नारायणस्य साक्षान्महापुरुषस्य स्थविष्ठं रूपमात्ममायागुणमयमनुवर्णितमादृतः पठति श‍ृणोति श्रावयति स उपगेयं भगवतः परमात्मनोऽग्राह्यमपि श्रद्धाभक्तिविशुद्धबुद्धिर्वेद ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: निवृत्ति अर्थात बन्धन से मुक्त होने का मार्ग पहले बताया गया है। चौदह लोकों वाला यह ब्रह्माण्ड भगवान नारायण के विराट स्थूल स्वरूप के रूप में वर्णित है। जो श्रद्धा से इसका पाठ, श्रवण और कथन करता है, उसकी बुद्धि भक्ति से शुद्ध होकर इन्द्रियातीत परमात्मा के तत्त्व को समझने योग्य होती है।

मूल पाठ 26.39

श्रुत्वा स्थूलं तथा सूक्ष्मं रूपं भगवतो यतिः । स्थूले निर्जितमात्मानं शनैः सूक्ष्मं धिया नयेदिति ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: साधक भगवान के स्थूल और सूक्ष्म स्वरूप का श्रवण करे। पहले विराट रूप के ध्यान से मन को स्थिर करके फिर धीरे-धीरे अपनी बुद्धि को सूक्ष्म परमात्मतत्त्व की ओर ले जाए।

मूल पाठ 26.40

भूद्वीपवर्षसरिदद्रिनभःसमुद्र- पातालदिङ्नरकभागणलोकसंस्था । गीता मया तव नृपाद्भुतमीश्वरस्य स्थूलं वपुः सकलजीवनिकायधाम ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी कहते हैं—हे राजन्! पृथ्वी, द्वीप, वर्ष, नदियाँ, पर्वत, आकाश, समुद्र, पाताल, दिशाएँ, नरक, ग्रहगण और लोकों की व्यवस्था का वर्णन मैंने किया। यह सब समस्त प्राणियों के आश्रय भगवान के अद्भुत स्थूल स्वरूप की प्रस्तुति है। इसी के साथ पंचम स्कन्ध का वर्णन पूर्ण होता है।

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पाठ-संदर्भ: श्रीमद्भागवत महापुराण • पंचम स्कन्ध • अध्याय 24–26।

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