श्रीमद्भागवत महापुराण पंचम स्कन्ध भाग 2 — अध्याय 7–15, जड़भरत रहूगण संवाद और संसारवन रूपक

भक्ति भावना • पुराण साहित्य

श्रीमद्भागवत महापुराण

पंचम स्कन्ध • भाग २ • अध्याय ७–१५

२११ क्रमाङ्कित मूल पाठ • प्रत्येक का सरल हिंदी भावार्थ

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आसक्ति से आत्मस्मृति तक भरत की यात्रा

भरत का राज्यत्याग और भजन, हरिणशावक की आसक्ति से मृगजन्म तथा जड़भरत की छिपी आत्मनिष्ठा—यह कथा साधक को सावधानी सिखाती है। रहूगण से संवाद में देह और आत्मा का भेद, मन का संयम, सत्सङ्ग तथा हरिसेवा का महत्व स्पष्ट होता है। संसारवन का रूपक जीवन की उलझनों का अर्थ खोलता है।

इस भाग में अध्याय 7–15 के सभी 211 क्रमाङ्कित गद्य-पद्य पाठ और प्रत्येक का स्वतंत्र हिंदी भावार्थ है।

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पंचम स्कन्ध • अध्याय 7

भरत का राजधर्म और भगवदाराधना

मूल पाठ 7.1

श्रीशुक उवाच । भरतस्तु महाभागवतो यदा भगवतावनितल- परिपालनाय सञ्चिन्तितस्तदनुशासनपरः पञ्चजनीं विश्वरूपदुहितरमुपयेमे ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेव बोले—भगवान ऋषभदेव ने महाभागवत भरत को पृथ्वी की रक्षा का दायित्व दिया। पिता की आज्ञा मानते हुए उन्होंने विश्वरूप की पुत्री पञ्चजनी से विवाह किया।

मूल पाठ 7.2

तस्यामु ह वा आत्मजान् कार्त्स्न्येनानुरूपा- नात्मनः पञ्च जनयामास भूतादिरिव भूतसूक्ष्माणि सुमतिं राष्ट्रभृतं सुदर्शनमावरणं धूम्रकेतुमिति ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनसे अपने समान गुणवान पाँच पुत्र उत्पन्न हुए—सुमति, राष्ट्रभृत्, सुदर्शन, आवरण और धूम्रकेतु; जैसे अहंकारतत्त्व से पाँच सूक्ष्म तन्मात्राएँ प्रकट होती हैं।

मूल पाठ 7.3

अजनाभं नामैतद्वर्षं भारतमिति यत आरभ्य व्यपदिशन्ति ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन्हीं भरत के समय से अजनाभ नाम का यह भूखण्ड भारत कहलाने लगा।

मूल पाठ 7.4

स बहुविन्महीपतिः पितृपितामहवदुरुवत्सलतया स्वे स्वे कर्मणि वर्तमानाः प्रजाः स्वधर्ममनुवर्तमानः पर्यपालयत् ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानी राजा भरत अपने पिता और पितामह की भाँति प्रजा से अत्यन्त स्नेह रखते थे। स्वयं धर्मपालन करते हुए वे अपने-अपने कर्तव्य में लगे लोगों की रक्षा करते थे।

मूल पाठ 7.5

ईजे च भगवन्तं यज्ञक्रतुरूपं क्रतुभिरुच्चावचैः श्रद्धयाऽऽहृताग्निहोत्रदर्शपूर्णमासचातुर्मास्य- पशुसोमानां प्रकृतिविकृतिभिरनुसवनं चातुर्होत्रविधिना ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने श्रद्धापूर्वक अग्निहोत्र, दर्श, पूर्णमास, चातुर्मास्य और अन्य वैदिक यज्ञों के मूल तथा परिवर्तित विधानों से यज्ञस्वरूप भगवान की उपासना की।

मूल पाठ 7.6

सम्प्रचरत्सु नानायागेषु विरचिताङ्गक्रियेष्वपूर्वं यत्तत्क्रियाफलं धर्माख्यं परे ब्रह्मणि यज्ञपुरुषे सर्वदेवतालिङ्गानां मन्त्राणामर्थनियामकतया साक्षात्कर्तरि परदेवतायां भगवति वासुदेव एव भावयमान आत्मनैपुण्यमृदितकषायो हविःष्वध्वर्युभिर्गृह्यमाणेषु स यजमानो यज्ञभाजो देवांस्तान् पुरुषावयवेष्वभ्यध्यायत् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञों के प्रत्येक कर्म और फल को वे परमब्रह्म वासुदेव को अर्पित समझते थे। मन्त्रों और देवताओं का अन्तिम आश्रय उन्हीं को जानते हुए आहुति पाने वाले देवताओं का ध्यान विराट पुरुष के अङ्गों के रूप में करते थे। इससे उनका अन्तःकरण निर्मल होता गया।

मूल पाठ 7.7

एवं कर्मविशुद्ध्या विशुद्धसत्त्वस्यान्तर्हृदयाकाश- शरीरे ब्रह्मणि भगवति वासुदेवे महापुरुषरूपो- पलक्षणे श्रीवत्सकौस्तुभवनमालादरगदादिभि- रुपलक्षिते निजपुरुषहृल्लिखितेनात्मनि पुरुषरूपेण विरोचमान उच्चैस्तरां भक्तिमनुदिनमेधमान- रजयाजायत ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: विशुद्ध कर्म से उनका सत्त्व शुद्ध हुआ और हृदय में श्रीवत्स, कौस्तुभ, वनमाला, शंख तथा गदा से सुशोभित महापुरुष वासुदेव के प्रति प्रतिदिन बढ़ती हुई प्रगाढ़ भक्ति उत्पन्न हुई।

मूल पाठ 7.8

एवं वर्षायुतसहस्रपर्यन्तावसितकर्मनिर्वाणावसरो- ऽधिभुज्यमानं स्वतनयेभ्यो रिक्थं पितृपैतामहं यथादायं विभज्य स्वयं सकलसम्पन्निकेतात्पुलहाश्रमं प्रवव्राज ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: कथा में अत्यन्त दीर्घ राजकाल के बाद निवृत्ति का समय आने पर भरत ने पैतृक राज्य और सम्पत्ति पुत्रों में बाँटी। समृद्ध राजगृह छोड़कर स्वयं पुलह आश्रम चले गए।

मूल पाठ 7.9

यत्र ह वाव भगवान् हरिरद्यापि तत्रत्यानां निजजनानां वात्सल्येन सन्निधाप्यत इच्छारूपेण ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ भगवान हरि अपने भक्तों के वात्सल्यवश आज भी उनकी भावना के अनुकूल रूप में सान्निध्य देते हैं—ऐसी उस क्षेत्र की महिमा कही गई है।

मूल पाठ 7.10

यत्राश्रमपदान्युभयतो नाभिभिर्दृषच्चक्रैश्चक्रनदी नाम सरित्प्रवरा सर्वतः पवित्रीकरोति ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस आश्रमभूमि को चक्रनदी अर्थात् गण्डकी पवित्र करती है। उसके जल में दोनों ओर चक्रचिह्नों से युक्त शालग्राम शिलाएँ मिलती हैं।

मूल पाठ 7.11

तस्मिन् वाव किल स एकलः पुलहाश्रमोपवने विविधकुसुमकिसलयतुलसिकाम्बुभिः कन्दमूल- फलोपहारैश्च समीहमानो भगवत आराधनं विविक्त उपरतविषयाभिलाष उपभृतोपशमः परां निर्वृतिमवाप ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुलह आश्रम के उपवन में अकेले रहकर भरत फूल, पत्ते, तुलसी, जल, कन्द, मूल और फल से भगवान की पूजा करते थे। विषयों की चाह छोड़कर शान्त हुए और परम तृप्ति प्राप्त की।

मूल पाठ 7.12

तयेत्थमविरतपुरुषपरिचर्यया भगवति प्रवर्धमाना- नुरागभरद्रुतहृदयशैथिल्यः प्रहर्षवेगेनात्मन्युद्भिद्य- मानरोमपुलककुलकौत्कण्ठ्यप्रवृत्तप्रणयबाष्पनिरुद्धा- वलोकनयन एवं निजरमणारुणचरणारविन्दानुध्यान- परिचितभक्तियोगेन परिप्लुतपरमाह्लादगम्भीरहृदय- ह्रदावगाढधिषणस्तामपि क्रियमाणां भगवत्सपर्यां न सस्मार ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: निरन्तर सेवा से उनका हृदय प्रेम में पिघलता, रोमाञ्च होता और प्रेमाश्रुओं से आँखें भर जातीं। भगवान के अरुण चरणों के ध्यान में वे इतने गहरे आनन्द में डूब जाते कि सामने चल रही पूजा की क्रिया का भी ध्यान नहीं रहता।

मूल पाठ 7.13

इत्थं धृतभगवद्व्रत ऐणेयाजिनवाससानुसवनाभिषेकार्द्र- कपिशकुटिलजटाकलापेन च विरोचमानः सूर्यर्चा भगवन्तं हिरण्मयं पुरुषमुज्जिहाने सूर्यमण्डलेऽभ्युपतिष्ठ- न्नेतदु होवाच ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवद्व्रती भरत मृगचर्म धारण करते थे। बार-बार स्नान से भीगी कपिश जटाओं सहित वे उगते सूर्य के मण्डल में हिरण्मय पुरुष की उपासना करते हुए यह प्रार्थना कहते थे।

मूल पाठ 7.14

परो रजः सवितुर्जातवेदो देवस्य भर्गो मनसेदं जजान । सुरेतसादः पुनराविश्य चष्टे हंसं गृध्राणं नृषद्रिङ्गिरामिमः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: हम उस परम प्रकाश का आश्रय लेते हैं जो रजोगुण से परे है। उसने संकल्प से जगत की रचना की, अपने दिव्य सामर्थ्य से उसमें प्रवेश किया और जीवों में स्थित होकर उन्हें प्रकाशित तथा प्रेरित करता है।

॥ पंचम स्कन्ध • अध्याय 7 समाप्त ॥

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पंचम स्कन्ध • अध्याय 8

हरिणशावक की आसक्ति और मृगजन्म

मूल पाठ 8.1

श्रीशुक उवाच । एकदा तु महानद्यां कृताभिषेकनैयमिकावश्यको ब्रह्माक्षरमभिगृणानो मुहूर्तत्रयमुदकान्त उपविवेश ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेव बोले—एक दिन भरत महानदी में स्नान और आवश्यक नित्यकर्म करके किनारे बैठे तथा प्रणव का जप करने लगे।

मूल पाठ 8.2

तत्र तदा राजन् हरिणी पिपासया जलाशयाभ्याशमेकैवोपजगाम ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसी समय एक प्यासी हरिणी अकेली नदी के पास जल पीने आई।

मूल पाठ 8.3

तया पेपीयमान उदके तावदेवाविदूरेण नदतो मृगपतेरुन्नादो लोकभयङ्कर उदपतत् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह जल पी ही रही थी कि पास में सिंह की अत्यन्त भयङ्कर गर्जना सुनाई दी।

मूल पाठ 8.4

तमुपश्रुत्य सा मृगवधूः प्रकृतिविक्लवा चकित- निरीक्षणा सुतरामपि हरिभयाभिनिवेशव्यग्रहृदया पारिप्लवदृष्टिरगततृषा भयात्सहसैवोच्चक्राम ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वभाव से भीरु हरिणी चारों ओर घबराकर देखने लगी। प्यास पूरी न होने पर भी सिंह के भय से उसका मन व्याकुल हुआ और वह अचानक छलाँग लगा बैठी।

मूल पाठ 8.5

तस्या उत्पतन्त्या अन्तर्वत्न्या उरुभयावगलितो योनिनिर्गतो गर्भः स्रोतसि निपपात ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह गर्भवती थी। छलाँग और तीव्र भय के कारण उसका गर्भ छूटकर नदी के प्रवाह में गिर गया।

मूल पाठ 8.6

तत्प्रसवोत्सर्पणभयखेदातुरा स्वगणेन वियुज्यमाना कस्याञ्चिद्दर्यां कृष्णसारसती निपपाताथ च ममार ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रसव, उछलने के श्रम और भय से पीड़ित हरिणी अपने झुण्ड से बिछुड़कर एक गुफा में गिरी और मर गई।

मूल पाठ 8.7

तं त्वेणकुणकं कृपणं स्रोतसानूह्यमानमभि- वीक्ष्यापविद्धं बन्धुरिवानुकम्पया राजर्षि- र्भरत आदाय मृतमातरमित्याश्रमपदमनयत् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजर्षि भरत ने प्रवाह में बहते असहाय शावक को देखा। उसकी माँ मर चुकी थी; इसलिए अपने सम्बन्धी की तरह दया करके उसे बचाया और आश्रम ले आए।

मूल पाठ 8.8

तस्य ह वा एणकुणक उच्चैरेतस्मिन् कृतनिजाभि- मानस्याहरहस्तत्पोषणपालनलालनप्रीणना- नुध्यानेनात्मनियमाः सह यमाः पुरुषपरिचर्यादय एकैकशः कतिपयेनाहर्गणेन वियुज्यमानाः किल सर्व एवोदवसन् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: दिन-प्रतिदिन शावक के पालन, रक्षा, दुलार और चिन्ता में भरत का ममत्व बढ़ने लगा। धीरे-धीरे उनके संयम, नियम और भगवान की सेवा के अभ्यास छूटते गए।

मूल पाठ 8.9

अहो बतायं हरिणकुणकः कृपण ईश्वररथचरण- परिभ्रमणरयेण स्वगणसुहृद्बन्धुभ्यः परिवर्जितः शरणं च मोपसादितो मामेव मातापितरौ भ्रातृज्ञातीन् यौथिकांश्चैवोपेयाय नान्यं कञ्चन वेद मय्यतिविस्रब्धश्चात एव मया मत्परायणस्य पोषणपालनप्रीणनलालनमनसूयुनानुष्ठेयं शरण्योपेक्षा दोषविदुषा ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे सोचते—काल ने इस अनाथ शावक को माँ, झुण्ड और स्वजनों से बिछुड़ा दिया है। यह मुझे ही माता-पिता और सब कुछ मानता है। शरणागत की उपेक्षा दोष है, इसलिए मुझे बिना खिन्न हुए इसका पालन और स्नेह करना चाहिए।

मूल पाठ 8.10

नूनं ह्यार्याः साधव उपशमशीलाः कृपणसुहृद एवंविधार्थे स्वार्थानपि गुरुतरानुपेक्षन्ते ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे विचार करते—शान्त और दयालु सज्जन असहाय प्राणी की रक्षा के लिए अपने बड़े हितों की भी उपेक्षा कर देते हैं।

मूल पाठ 8.11

इति कृतानुषङ्ग आसनशयनाटनस्नानाशनादिषु सह मृगजहुना स्नेहानुबद्धहृदय आसीत् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस सोच से उनका हृदय शावक के स्नेह में बँध गया। बैठना, सोना, घूमना, स्नान और भोजन—सब उसके साथ करने लगे।

मूल पाठ 8.12

कुशकुसुमसमित्पलाशफलमूलोदकान्याहरिष्यमाणो वृकसालावृकादिभ्यो भयमाशंसमानो यदा सह हरिणकुणकेन वनं समाविशति ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: कुश, फूल, समिधा, पत्ते, फल, मूल और जल लेने वन जाते समय वे भेड़िए आदि का भय मानकर शावक को भी साथ ले जाते थे।

मूल पाठ 8.13

पथिषु च मुग्धभावेन तत्र तत्र विषक्तमतिप्रणयभर- हृदयः कार्पण्यात्स्कन्धेनोद्वहति एवमुत्सङ्ग उरसि चाधायोपलालयन् मुदं परमामवाप ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: रास्ते में उसे कहीं उलझा या भोला-भाला विचरता देखकर करुणा और अत्यधिक स्नेह से कन्धे पर उठा लेते। गोद और छाती से लगाकर दुलारने में उन्हें बड़ा सुख मिलता था।

मूल पाठ 8.14

क्रियायां निर्वर्त्यमानायामन्तरालेऽप्युत्थायोत्थाय यदैनमभिचक्षीत तर्हि वाव स वर्षपतिः प्रकृतिस्थेन मनसा तस्मा आशिष आशास्ते स्वस्ति स्ताद्वत्स ते सर्वत इति ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: पूजा करते समय भी वे बार-बार उठकर शावक को देखने लगते। उसके दिख जाने पर मन स्थिर होता और वे कहते—बेटा! तुम्हारा सब ओर कल्याण हो।

मूल पाठ 8.15

अन्यदा भृशमुद्विग्नमना नष्टद्रविण इव कृपणः सकरुणमतितर्षेण हरिणकुणकविरहविह्वलहृदय- सन्तापस्तमेवानुशोचन् किल कश्मलं महदभि- रम्भित इति होवाच ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: कभी शावक न दिखता तो भरत धन खोए दीन मनुष्य की तरह व्याकुल हो उठते। विरह और चिन्ता में डूबे वे विलाप करते थे।

मूल पाठ 8.16

अपि बत स वै कृपण एणबालको मृतहरिणीसुतो- ऽहो ममानार्यस्य शठकिरातमतेरकृतसुकृतस्य कृतविस्रम्भ आत्मप्रत्ययेन तदविगणयन् सुजन इवागमिष्यति ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्या वह अनाथ शावक मुझ जैसे असावधान और कठोर हृदय वाले के दोषों को न मानकर लौट आएगा? उसने तो सज्जन की तरह मुझ पर पूरा विश्वास किया था।

मूल पाठ 8.17

अपि क्षेमेणास्मिन्नाश्रमोपवने शष्पाणि चरन्तं देवगुप्तं द्रक्ष्यामि ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्या मैं फिर उसे भगवान की रक्षा में सुरक्षित, इसी आश्रम के उपवन में हरी घास चरते देख सकूँगा?

मूल पाठ 8.18

अपि च न वृकः सालावृकोऽन्यतमो वा नैकचर एकचरो वा भक्षयति ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: कहीं किसी भेड़िए, कुत्ते, झुण्ड में घूमने वाले अथवा अकेले हिंसक पशु ने उसे खा तो नहीं लिया?

मूल पाठ 8.19

निम्लोचति ह भगवान् सकलजगत्क्षेमोदयस्त्रय्या- त्माद्यापि मम न मृगवधून्यास आगच्छति ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: संसार का कल्याण करने वाला, वेदस्वरूप सूर्य अस्त होने जा रहा है; फिर भी हरिणी की मेरे पास छोड़ी धरोहर अब तक नहीं लौटी।

मूल पाठ 8.20

अपि स्विदकृतसुकृतमागत्य मां सुखयिष्यति हरिणराजकुमारो विविधरुचिरदर्शनीयनिजमृग- दारकविनोदैरसन्तोषं स्वानामपनुदन् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्या वह हरिणशावक लौटकर अपनी सुन्दर बालक्रीड़ाओं से मेरे जैसे अभागे को सुख देगा और अपने स्वजनों की उदासी दूर करेगा?

मूल पाठ 8.21

क्ष्वेलिकायां मां मृषा समाधिनाऽऽमीलितदृशं प्रेमसंरम्भेण चकित चकित आगत्य पृषदपरुष- विषाणाग्रेण लुठति ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: खेल में जब मैं आँख बन्द करके समाधि का बहाना करता, तब वह स्नेह से पास आता और अपने कोमल सींग के सिरे से मुझे टटोलता था।

मूल पाठ 8.22

आसादितहविषि बर्हिषि दूषिते मयोपालब्धो भीतभीतः सपद्युपरतरास ऋषिकुमारवदवहित- करणकलाप आस्ते ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञ-सामग्री पर मुँह लगाने और कुश दूषित करने पर मैं डाँटता तो वह डरकर खेल छोड़ देता और ऋषिकुमार की तरह चुपचाप संयत होकर बैठ जाता था।

मूल पाठ 8.23

किं वा अरे आचरितं तपस्तपस्विन्यानया यदियमवनिः सविनयकृष्णसारतनयतनुतर- सुभगशिवतमाखरखुरपदपङ्क्तिभिर्द्रविण- विधुरातुरस्य कृपणस्य मम द्रविणपदवीं सूचयन्त्यात्मानं च सर्वतः कृतकौतुकं द्विजानां स्वर्गापवर्गकामानां देवयजनं करोति ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह पृथ्वी कितनी तपस्विनी है, जिस पर उस सुन्दर शावक के खुरों की पङ्क्तियाँ हैं! ये निशान खोए धन का मार्ग बताने की तरह मुझे उसका पता देते हैं और इस भूमि को देवयजन के योग्य पवित्र बना रहे हैं।

मूल पाठ 8.24

अपि स्विदसौ भगवानुडुपतिरेनं मृगपतिभया- न्मृतमातरं मृगबालकं स्वाश्रमपरिभ्रष्टमनुकम्पया कृपणजनवत्सलः परिपाति ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्या दीनों पर दया करने वाले चन्द्रमा ने सिंह के भय से माँ खो बैठे और आश्रम से बिछुड़े इस शावक को करुणावश अपने पास रख लिया है?

मूल पाठ 8.25

किं वाऽऽत्मजविश्लेषज्वरदवदहनशिखाभि- रुपतप्यमानहृदयस्थलनलिनीकं मामुपसृत- मृगीतनयं शिशिरशान्तानुरागगुणितनिज- वदनसलिलामृतमयगभस्तिभिः स्वधयतीति च ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: या चन्द्रमा मुझे ही उस शावक का विरह सहते देखकर अपनी शीतल अमृतमयी किरणों से मेरे हृदय की दाह शान्त कर रहा है?

मूल पाठ 8.26

एवमघटमानमनोरथाकुलहृदयो मृगदारकाभासेन स्वारब्धकर्मणा योगारम्भणतो विभ्रंशितः स योगतापसो भगवदाराधनलक्षणाच्च कथमितरथा जात्यन्तर एणकुणक आसङ्गः साक्षान्निःश्रेयस- प्रतिपक्षतया प्राक्परित्यक्तदुस्त्यजहृदयाभिजातस्य तस्यैवमन्तरायविहतयोगारम्भणस्य राजर्षेर्भरतस्य तावन्मृगार्भकपोषणपालनप्रीणनलालनानुषङ्गेणा- विगणयत आत्मानमहिरिवाखुबिलं दुरतिक्रमः कालः करालरभस आपद्यत ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार असंगत कल्पनाओं और शावक की आसक्ति ने भरत को योग तथा भगवदाराधना से विचलित कर दिया। जिन्होंने कठिन राजबन्धन त्यागे थे, वे अब इस ममत्व में अपना कल्याण भूल गए। तभी अटल काल उनके सामने आ पहुँचा, जैसे सर्प चूहे के बिल में प्रवेश कर जाता है।

मूल पाठ 8.27

तदानीमपि पार्श्ववर्तिनमात्मजमिवानुशोचन्त- मभिवीक्षमाणो मृग एवाभिनिवेशितमना विसृज्य लोकमिमं सह मृगेण कलेवरं मृतमनु न मृतजन्मा- नुस्मृतिरितरवन्मृगशरीरमवाप ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मृत्यु के समय भी वे पास खड़े शोकमग्न शावक को देखते और उसी में मन लगाए रहे। देह छोड़ने पर उन्हें मृगशरीर मिला; किन्तु पिछले भगवदभजन के प्रभाव से पूर्वजन्म की स्मृति नहीं मिटी।

मूल पाठ 8.28

तत्रापि ह वा आत्मनो मृगत्वकारणं भगव- दाराधनसमीहानुभावेनानुस्मृत्य भृशमनु- तप्यमान आह ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मृगयोनि में भी भगवान की पूर्व आराधना के प्रभाव से उन्हें अपने इस जन्म का कारण स्मरण रहा। वे बहुत पश्चात्ताप करके सोचने लगे।

मूल पाठ 8.29

अहो कष्टं भ्रष्टोऽहमात्मवतामनुपथाद्यद्विमुक्त- समस्तसङ्गस्य विविक्तपुण्यारण्यशरणस्यात्मवत आत्मनि सर्वेषामात्मनां भगवति वासुदेवे तदनुश्रवणमननसङ्कीर्तनाराधनानुस्मरणा- भियोगेनाशून्यसकलयामेन कालेन समावेशितं समाहितं कार्त्स्न्येन मनस्तत्तु पुनर्ममाबुधस्या- रान्मृगसुतमनु परिसुस्राव ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: हाय! मैं आत्मज्ञानियों के मार्ग से च्युत हो गया। सब आसक्ति छोड़कर पवित्र वन में आया था और दिन-रात वासुदेव का श्रवण, मनन, कीर्तन, पूजा तथा स्मरण करता था। फिर भी मेरी असावधानी से भगवान में स्थित मन शावक की ओर बह गया।

मूल पाठ 8.30

इत्येवं निगूढनिर्वेदो विसृज्य मृगीं मातरं पुनर्भगवत्क्षेत्रमुपशमशीलमुनिगणदयितं शालग्रामं पुलस्त्यपुलहाश्रमं कालञ्जरा- त्प्रत्याजगाम ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस गहरे वैराग्य से उन्होंने मृगी माता को छोड़ा और कालञ्जर से पुनः शालग्राम क्षेत्र में पुलस्त्य-पुलह के पवित्र आश्रम पहुँचे, जो शान्त मुनियों को प्रिय था।

मूल पाठ 8.31

तस्मिन्नपि कालं प्रतीक्षमाणः सङ्गाच्च भृशमुद्विग्न आत्मसहचरः शुष्कपर्णतृणवीरुधा वर्तमानो मृगत्वनिमित्तावसानमेव गणयन् मृगशरीरं तीर्थोदकक्लिन्नमुत्ससर्ज ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ वे सङ्ग से बहुत सावधान होकर अकेले रहते, सूखे पत्ते और घास खाते तथा मृगजन्म के समाप्त होने की प्रतीक्षा करते रहे। अन्ततः तीर्थजल से भीगा वह मृगशरीर छोड़ दिया।

॥ पंचम स्कन्ध • अध्याय 8 समाप्त ॥

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पंचम स्कन्ध • अध्याय 9

जड़भरत का जन्म और देवी की रक्षा

मूल पाठ 9.1

श्रीशुक उवाच । अथ कस्यचिद्द्विजवरस्याङ्गिरःप्रवरस्य शमदमतपः- स्वाध्यायाध्ययनत्यागसन्तोषतितिक्षाप्रश्रयविद्या- नसूयात्मज्ञानानन्दयुक्तस्यात्मसदृशश्रुतशीलाचार- रूपौदार्यगुणा नवसोदर्या अङ्गजा बभूवुर्मिथुनं च यवीयस्यां भार्यायाम् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेव बोले—अङ्गिरा गोत्र के एक श्रेष्ठ ब्राह्मण शान्ति, संयम, तप, वेदाध्ययन, त्याग, सन्तोष, सहनशीलता, विनम्रता, विद्या और आत्मानन्द से सम्पन्न थे। पहली पत्नी से उनके समान गुणवान नौ पुत्र थे और छोटी पत्नी से एक पुत्र तथा एक पुत्री हुए।

मूल पाठ 9.2

यस्तु तत्र पुमांस्तं परमभागवतं राजर्षिप्रवरं भरत- मुत्सृष्टमृगशरीरं चरमशरीरेण विप्रत्वं गतमाहुः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: छोटी पत्नी का वही पुत्र मृगदेह छोड़ चुके महाभागवत राजर्षि भरत थे, जिन्होंने अपने अंतिम जन्म के लिए ब्राह्मण शरीर पाया था।

मूल पाठ 9.3

तत्रापि स्वजनसङ्गाच्च भृशमुद्विजमानो भगवतः कर्मबन्धविध्वंसनश्रवणस्मरणगुणविवरण- चरणारविन्दयुगलं मनसा विदधदात्मनः प्रतिघातमाशङ्कमानो भगवदनुग्रहेणानुस्मृत- स्वपूर्वजन्मावलिरात्मानमुन्मत्तजडान्धबधिर- स्वरूपेण दर्शयामास लोकस्य ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की कृपा से उन्हें पूर्वजन्मों की स्मृति थी। फिर सम्बन्धों की आसक्ति से बाधा न हो, इसलिए वे भीतर भगवान के चरणों का चिन्तन करते हुए बाहर से उन्मत्त, जड़, अन्धे या बहरे जैसे व्यवहार करते थे।

मूल पाठ 9.4

तस्यापि ह वा आत्मजस्य विप्रः पुत्रस्नेहानुबद्धमना आ समावर्तनात्संस्कारान् यथोपदेशं विदधान उपनीतस्य च पुनः शौचाचमनादीन् कर्मनियमा- ननभिप्रेतानपि समशिक्षयदनुशिष्टेन हि भाव्यं पितुः पुत्रेणेति ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: पिता पुत्रस्नेह से उनके सभी संस्कार विधिपूर्वक करते रहे। उपनयन के बाद शौच, आचमन और नित्यकर्म भी सिखाए, यद्यपि भरत में इन बाहरी शिक्षाओं के प्रति रुचि नहीं दिखती थी; पिता समझते थे कि पुत्र को शिक्षित करना उनका कर्तव्य है।

मूल पाठ 9.5

स चापि तदु ह पितृसन्निधावेवासध्रीचीनमिव स्म करोति छन्दांस्यध्यापयिष्यन् सह व्याहृतिभिः सप्रणवशिरस्त्रिपदीं सावित्रीं ग्रैष्मवासन्तिकान् मासानधीयानमप्यसमवेतरूपं ग्राहयामास ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: भरत पिता के सामने भी जानबूझकर असंगत व्यवहार करते थे। पिता ने वसन्त और ग्रीष्म के महीनों तक प्रणव और व्याहृतियों सहित त्रिपदा गायत्री सिखाई, फिर भी वे उसका ठीक पाठ करते दिखाई नहीं दिए।

मूल पाठ 9.6

एवं स्वतनुज आत्मन्यनुरागावेशितचित्तः शौचाध्ययनव्रतनियमगुर्वनलशुश्रूषणाद्यौप- कुर्वाणककर्माण्यनभियुक्तान्यपि समनुशिष्टेन भाव्यमित्यसदाग्रहः पुत्रमनुशास्य स्वयं तावदनधिगतमनोरथः कालेनाप्रमत्तेन स्वयं गृह एव प्रमत्त उपसंहृतः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुत्र के प्रति गहरे अनुराग से पिता शौच, अध्ययन, व्रत, नियम, गुरुसेवा और अग्निसेवा सिखाते रहे। अपनी इच्छा पूरी होने से पहले ही घर में रहते उनका देहान्त हो गया; सजग काल ने उन्हें उठा लिया।

मूल पाठ 9.7

अथ यवीयसी द्विजसती स्वगर्भजातं मिथुनं सपत्न्या उपन्यस्य स्वयमनुसंस्थयापतिलोकमगात् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: छोटी पत्नी ने अपने जुड़वाँ बच्चों को बड़ी पत्नी के संरक्षण में सौंपा और कथानुसार पति के पीछे देहत्याग करके पतिलोक गई। यह प्राचीन आख्यान का प्रसंग है।

मूल पाठ 9.8

पितर्युपरते भ्रातर एनमतत्प्रभावविदस्त्रय्यां विद्यायामेव पर्यवसितमतयो न परविद्यायां जडमतिरिति भ्रातु- रनुशासननिर्बन्धान्न्यवृत्सन्त ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: पिता के बाद भाइयों ने भरत की वास्तविक आध्यात्मिक स्थिति नहीं समझी। उनकी समझ कर्मकाण्ड तक सीमित थी; उन्हें जड़बुद्धि मानकर शिक्षा देने का आग्रह छोड़ दिया।

मूल पाठ 9.9

स च प्राकृतैर्द्विपदपशुभिरुन्मत्तजडबधिरमूके- त्यभिभाष्यमाणो यदा तदनुरूपाणि प्रभाषते कर्माणि च स कार्यमाणः परेच्छया करोति विष्टितो वेतनतो वा याच्ञया यदृच्छया वोपसादितमल्पं बहु मृष्टं कदन्नं वाभ्यवहरति परं नेन्द्रियप्रीतिनिमित्तम् । नित्यनिवृत्तनिमित्तस्वसिद्धविशुद्धानुभवानन्द- स्वात्मलाभाधिगमः सुखदुःखयोर्द्वन्द्वनिमित्तयो- रसम्भावितदेहाभिमानः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: अज्ञानी लोग उन्हें पागल, जड़, बहरे और गूँगे कहते। वे उसी के अनुरूप बोलते या दूसरों की इच्छा से काम कर देते। मजदूरी, माँगने या अपने-आप जो थोड़ा-बहुत अच्छा-बुरा भोजन मिलता, उसे केवल शरीरनिर्वाह के लिए खाते। आत्मानन्द में स्थित होने से उन्हें सुख-दुःख और देह का अभिमान नहीं था।

मूल पाठ 9.10

शीतोष्णवातवर्षेषु वृष इवानावृताङ्गः पीनः संहननाङ्गः स्थण्डिलसंवेशनानुन्मर्दनामज्जन- रजसा महामणिरिवानभिव्यक्तब्रह्मवर्चसः कुपटावृतकटिरुपवीतेनोरुमषिणा द्विजातिरिति ब्रह्मबन्धुरिति संज्ञयातज्ज्ञजनावमतो विचचार ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे बलवान और सुगठित थे, फिर भी शीत, गर्मी, हवा और वर्षा में बैल की तरह खुले रहते थे। भूमि पर सोने और स्नान-सज्जा न करने से देह धूल से ढकी थी। मैला वस्त्र और जनेऊ देखकर अज्ञानी उनकी अवमानना करते थे; उनका ब्रह्मतेज धूल से ढके रत्न की तरह छिपा था।

मूल पाठ 9.11

यदा तु परत आहारं कर्मवेतनत ईहमानः स्वभ्रातृभिरपि केदारकर्मणि निरूपितस्तदपि करोति किन्तु न समं विषमं न्यूनमधिकमिति वेद कणपिण्याकफलीकरणकुल्माषस्थाली- पुरीषादीन्यप्यमृतवदभ्यवहरति ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: भाइयों ने उन्हें खेत का काम दिया। वे ऊँचा-नीचा और कम-अधिक समतल करने का विशेष ध्यान नहीं रखते थे। मजदूरी में मिले चावल के टुकड़े, खली, भूसी, अधपके दाने या जले-चिपके अन्न को भी अमृत जैसा स्वीकार कर लेते थे।

मूल पाठ 9.12

अथ कदाचित्कश्चिद्वृषलपतिर्भद्रकाल्यै पुरुषपशु- मालभतापत्यकामः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक समय डाकुओं के एक सरदार ने सन्तान पाने की इच्छा से भद्रकाली के नाम पर मनुष्य की बलि देने का अधार्मिक आयोजन किया।

मूल पाठ 9.13

तस्य ह दैवमुक्तस्य पशोः पदवीं तदनुचराः परिधावन्तो निशि निशीथसमये तमसा- वृतायामनधिगतपशव आकस्मिकेन विधिना केदारान् वीरासनेन मृगवराहादिभ्यः संरक्षमाणमङ्गिरःप्रवरसुतमपश्यन् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिस मनुष्य को उन्होंने पकड़ रखा था वह भाग निकला। सेवक आधी रात अन्धकार में उसे खोजते हुए खेतों की रक्षा में बैठे उस ब्राह्मणपुत्र भरत तक आ पहुँचे।

मूल पाठ 9.14

अथ त एनमनवद्यलक्षणमवमृश्य भर्तृकर्म- निष्पत्तिं मन्यमाना बद्ध्वा रशनया चण्डिका- गृहमुपनिन्युर्मुदा विकसितवदनाः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनका सुगठित शरीर देखकर वे अपने दुष्कर्म की पूर्ति का साधन मिल गया समझे। प्रसन्न होकर उन्हें रस्सी से बाँधा और चण्डिका के मन्दिर ले गए।

मूल पाठ 9.15

अथ पणयस्तं स्वविधिनाभिषिच्याहतेन वाससाऽऽच्छाद्य भूषणालेपस्रक्तिलकादिभि- रुपस्कृतं भुक्तवन्तं धूपदीपमाल्यलाज- किसलयाङ्कुरफलोपहारोपेतया वैशस- संस्थया महता गीतस्तुतिमृदङ्गपणवघोषेण च पुरुषपशुं भद्रकाल्याः पुरत उपवेशयामासुः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: डाकुओं ने उन्हें अपनी विधि से नहलाया, नए वस्त्र, आभूषण, लेप, माला और तिलक लगाए तथा भोजन कराया। फिर गीत, स्तुति और वाद्यों के शोर में धूप-दीप, फूल, फल आदि सजाकर उन्हें देवी के सामने बैठा दिया।

मूल पाठ 9.16

अथ वृषलराजपणिः पुरुषपशोरसृगासवेन देवीं भद्रकालीं यक्ष्यमाणस्तदभिमन्त्रितमसि- मतिकरालनिशितमुपाददे ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: तब सरदार का पुरोहित रक्त से देवी की पूजा करने की दुष्ट इच्छा से अभिमन्त्रित और अत्यन्त तीखी तलवार उठाने लगा।

मूल पाठ 9.17

इति तेषां वृषलानां रजस्तमःप्रकृतीनां धनमदरज उत्सिक्तमनसां भगवत्कला- वीरकुलं कदर्थीकृत्योत्पथेन स्वैरं विहरतां हिंसाविहाराणां कर्मातिदारुणं यद्ब्रह्मभूतस्य साक्षाद्ब्रह्मर्षिसुतस्य निर्वैरस्य सर्वभूतसुहृदः सूनायामप्यननुमतमालम्भनं तदुपलभ्य ब्रह्मतेजसातिदुर्विषहेण दन्दह्यमानेन वपुषा सहसोच्चचाट सैव देवी भद्रकाली ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे रज-तम और धनमद से अन्धे हिंसक लोग सर्वभूतहितैषी, निर्वैर ब्रह्मज्ञानी ऋषिपुत्र को मारने जा रहे थे। ऐसा क्रूर दुष्कर्म देखकर भद्रकाली की मूर्ति में ब्रह्मतेज प्रज्वलित हुआ और देवी उसमें से प्रकट हो गईं।

मूल पाठ 9.18

भृशममर्षरोषावेशरभसविलसितभ्रुकुटि- विटपकुटिलदंष्ट्रारुणेक्षणाटोपातिभयानक- वदना हन्तुकामेवेदं महाट्टहासमतिसंरम्भेण विमुञ्चन्ती तत उत्पत्य पापीयसां दुष्टानां तेनैवासिना विवृक्णशीर्ष्णां गलात्स्रवन्तमसृगासव- मत्युष्णं सह गणेन निपीयातिपानमदविह्वलोच्चैस्तरां स्वपार्षदैः सह जगौ ननर्त च विजहार च शिरः कन्दुकलीलया ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: कथा में देवी का प्रचण्ड रूप वर्णित है। क्रोधपूर्ण नेत्र, भयानक दाँत और अट्टहास के साथ उन्होंने उसी तलवार से हिंसक डाकुओं का संहार किया। अपने गणों सहित उनका रक्तपान और कटे सिरों से क्रीड़ा करना इस उग्र पौराणिक दृश्य का अङ्ग है।

मूल पाठ 9.19

एवमेव खलु महदभिचारातिक्रमः कार्त्स्न्येनात्मने फलति ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: महात्मा के विरुद्ध किया गया घोर अपराध इसी प्रकार पूरा का पूरा अपराधी पर ही लौट पड़ता है।

मूल पाठ 9.20

न वा एतद्विष्णुदत्त महदद्भुतं यदसम्भ्रमः स्वशिरश्च्छेदन आपतितेऽपि विमुक्तदेहाद्यात्मभाव- सुदृढहृदयग्रन्थीनां सर्वसत्त्वसुहृदात्मनां निर्वैराणां साक्षाद्भगवतानिमिषारिवरायुधेनाप्रमत्तेन तैस्तैर्भावैः परिरक्ष्यमाणानां तत्पादमूलमकुतश्चिद्भयमुपसृतानां भागवतपरमहंसानाम् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेव बोले—परीक्षित! देहाभिमान की गाँठ खोल चुके, निर्वैर और सबके हितैषी परमहंस भक्त के लिए वध का संकट आने पर भी न घबराना आश्चर्य नहीं। वे भगवान के निर्भय चरणों में आश्रित हैं और उनकी सजग रक्षा पर विश्वास रखते हैं।

॥ पंचम स्कन्ध • अध्याय 9 समाप्त ॥

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पंचम स्कन्ध • अध्याय 10

जड़भरत और राजा रहूगण का मिलन

मूल पाठ 10.1

श्रीशुक उवाच । अथ सिन्धुसौवीरपते रहूगणस्य व्रजत इक्षुमत्यास्तटे तत्कुलपतिना शिबिकावाहपुरुषा- न्वेषणसमये दैवेनोपसादितः स द्विजवर उपलब्ध एष पीवा युवा संहननाङ्गो गोखरवद्धुरं वोढुमलमिति पूर्वविष्टिगृहीतैः सह गृहीतः प्रसभमतदर्ह उवाह शिबिकां स महानुभावः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेव बोले—सिन्धु-सौवीर के राजा रहूगण यात्रा कर रहे थे। इक्षुमती के किनारे पालकी के लिए कहार खोजते सेवकों ने बलवान युवा भरत को देखा और योग्य-अयोग्य का विचार किए बिना उन्हें बलपूर्वक पालकी ढोने में लगा दिया।

मूल पाठ 10.2

यदा हि द्विजवरस्येषुमात्रावलोकानुगतेर्न समाहिता पुरुषगतिस्तदा विषमगतां स्वशिबिकां रहूगण उपधार्य पुरुषानधिवहत आह हे वोढारः साध्वतिक्रमत किमिति विषममुह्यते यानमिति ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: भरत आगे की भूमि देखते हुए सावधानी से पैर रखते थे, इसलिए दूसरे कहारों के साथ उनकी चाल नहीं मिली। पालकी डगमगाने पर रहूगण ने कहा—ठीक चलो! मेरी सवारी असमान क्यों चल रही है?

मूल पाठ 10.3

अथ त ईश्वरवचः सोपालम्भमुपाकर्ण्योपायतुरीया- च्छङ्कितमनसस्तं विज्ञापयां बभूवुः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा की डाँट सुनकर कहार दण्ड की आशंका से घबरा गए और अपना पक्ष बताने लगे।

मूल पाठ 10.4

न वयं नरदेव प्रमत्ता भवन्नियमानुपथाः साध्वेव वहामः अयमधुनैव नियुक्तोऽपि न द्रुतं व्रजति नानेन सह वोढुमु ह वयं पारयाम इति ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—महाराज! हम असावधान नहीं हैं और आपकी आज्ञा से ठीक चल रहे हैं। यह नया लगाया गया व्यक्ति तेज नहीं चलता; इसके साथ हम चाल नहीं मिला पा रहे।

मूल पाठ 10.5

सांसर्गिको दोष एव नूनमेकस्यापि सर्वेषां सांसर्गिकाणां भवितुमर्हतीति निश्चित्य निशम्य कृपणवचो राजा रहूगण उपासित- वृद्धोऽपि निसर्गेण बलात्कृत ईषदुत्थित- मन्युरविस्पष्टब्रह्मतेजसं जातवेदसमिव रजसाऽऽवृतमतिराह ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: रहूगण ने माना कि एक व्यक्ति का दोष सब साथियों पर पड़ सकता है। विद्वानों की सेवा कर चुके होने पर भी स्वभाव और रजोगुण से क्रुद्ध राजा उस भस्म से ढकी अग्नि जैसे छिपे ब्रह्मतेज वाले भरत से बोल उठे।

मूल पाठ 10.6

अहो कष्टं भ्रातर्व्यक्तमुरुपरिश्रान्तो दीर्घमध्वानमेक एव ऊहिवान् सुचिरं नातिपीवा न संहननाङ्गो जरसा चोपद्रुतो भवान् सखे नो एवापर एते सङ्घट्टिन इति बहु विप्रलब्धोऽप्यविद्यया रचितद्रव्यगुणकर्माशयस्व- चरमकलेवरेऽवस्तुनि संस्थानविशेषेऽहम्ममेत्य- नध्यारोपितमिथ्याप्रत्ययो ब्रह्मभूतस्तूष्णीं शिबिकां पूर्ववदुवाह ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने व्यंग्य किया—भाई! तुम तो बहुत थक गए होगे; इतनी दूर अकेले ढोया है! तुम्हारा शरीर भी दुबला-कमजोर है और बुढ़ापा आ गया है; बाकी लोग तो तुम्हारे साथी ही नहीं! देह को मैं-मेरा न मानने वाले ब्रह्मज्ञानी भरत यह कटाक्ष सुनकर भी चुपचाप पालकी ढोते रहे।

मूल पाठ 10.7

अथ पुनः स्वशिबिकायां विषमगतायां प्रकुपित उवाच । रहूगणः किमिदमरे त्वं जीवन्मृतो मां कदर्थीकृत्य भर्तृशासनमतिचरसि प्रमत्तस्य च ते करोमि चिकित्सां दण्डपाणिरिव जनताया यथा प्रकृतिं स्वां भजिष्यस इति ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: पालकी फिर डगमगाई तो राजा क्रुद्ध हुए—अरे! क्या जीवित ही मर गए हो? मेरी आज्ञा का उल्लङ्घन करते हो! जैसे यम दण्ड देता है, वैसे ही मैं तुम्हारी असावधानी का उपचार करूँगा, तब तुम ठीक हो जाओगे।

मूल पाठ 10.8

एवं बह्वबद्धमपि भाषमाणं नरदेवाभिमानं रजसा तमसानुविद्धेन मदेन तिरस्कृताशेषभगवत्प्रियनिकेतं पण्डितमानिनं स भगवान् ब्राह्मणो ब्रह्मभूतः सर्वभूत- सुहृदात्मा योगेश्वरचर्यायां नातिव्युत्पन्नमतिं स्मयमान इव विगतस्मय इदमाह ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजस-तामस मद से भरे राजा स्वयं को ज्ञानी मानते हुए अनुचित बातें कह रहे थे। उनका योगियों की स्थिति का ज्ञान अधूरा था। सबके हितैषी, अहंकाररहित भरत ने मानो मुस्कराते हुए उन्हें उत्तर दिया।

मूल पाठ 10.9

ब्राह्मण उवाच । त्वयोदितं व्यक्तमविप्रलब्धं भर्तुः स मे स्याद्यदि वीर भारः । गन्तुर्यदि स्यादधिगम्यमध्वा पीवेति राशौ न विदां प्रवादः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: भरत बोले—वीर! यदि भार मेरा होता और मैं चलने वाला शरीर ही होता, तो तुम्हारी बात सही होती। किन्तु देह के समूह को मोटा कहना और आत्मा को मोटा समझना एक बात नहीं; ज्ञानी ऐसा नहीं कहते।

मूल पाठ 10.10

स्थौल्यं कार्श्यं व्याधय आधयश्च क्षुत्तृड्भयं कलिरिच्छा जरा च । निद्रा रतिर्मन्युरहं मदः शुचो देहेन जातस्य हि मे न सन्ति ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: मोटापन, दुबलापन, रोग, मानसिक व्यथा, भूख, प्यास, भय, कलह, इच्छा, बुढ़ापा, नींद, रति, क्रोध, अहंकार, मद और शोक शरीराभिमानी की अवस्थाएँ हैं। शुद्ध आत्मस्वरूप में ये मेरे धर्म नहीं हैं।

मूल पाठ 10.11

जीवन्मृतत्वं नियमेन राजन् आद्यन्तवद्यद्विकृतस्य दृष्टम् । स्वस्वाम्यभावो ध्रुव ईड्य यत्र तर्ह्युच्यतेऽसौ विधिकृत्ययोगः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजन्! जिन विकारी पदार्थों का आरम्भ और अन्त है, उनके लिए जीवित और मृत होने की बात कही जाती है। स्वामी और सेवक का सम्बन्ध भी स्थायी होता, तभी तुम्हारी आज्ञा का निरपेक्ष अधिकार माना जा सकता था।

मूल पाठ 10.12

विशेषबुद्धेर्विवरं मनाक्च पश्याम यन्न व्यवहारतोऽन्यत् । क ईश्वरस्तत्र किमीशितव्यं तथापि राजन् करवाम किं ते ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं स्वामी और तुम सेवक—इस भेद का आधार सांसारिक व्यवहार के अतिरिक्त क्या है? परम तत्त्व में कौन शासक और कौन शासित है? फिर भी व्यवहार में बताओ, मैं तुम्हारा क्या काम करूँ?

मूल पाठ 10.13

उन्मत्तमत्तजडवत्स्वसंस्थां गतस्य मे वीर चिकित्सितेन । अर्थः कियान् भवता शिक्षितेन स्तब्धप्रमत्तस्य च पिष्टपेषः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: यदि मैं अपने स्वरूप में स्थित हूँ और बाहर से पागल या जड़ दिखता हूँ, तो दण्ड से मेरा क्या उपचार होगा? और यदि सचमुच जड़ होता, तब भी शिक्षा देना पिसे को फिर पीसने जैसा व्यर्थ होता।

मूल पाठ 10.14

श्रीशुक उवाच । एतावदनुवादपरिभाषया प्रत्युदीर्य मुनिवर उपशमशील उपरतानात्म्यनिमित्त उपभोगेन कर्मारब्धं व्यपनयन् राजयानमपि तथोवाह ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेव बोले—शान्त मुनि ने राजा की बातों का इस प्रकार तत्त्वपूर्ण उत्तर दिया। देहाभिमान से रहित होकर प्रारब्ध का फल समाप्त करने के लिए वे फिर राजपालकी ढोने लगे।

मूल पाठ 10.15

स चापि पाण्डवेय सिन्धुसौवीरपतिस्तत्त्व- जिज्ञासायां सम्यक् श्रद्धयाधिकृताधिकार- स्तद्धृदयग्रन्थिमोचनं द्विजवच आश्रुत्य बहु योगग्रन्थसम्मतं त्वरयावरुह्य शिरसा पादमूलमुपसृतः क्षमापयन् विगत- नृपदेवस्मय उवाच ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: रहूगण में तत्त्वजिज्ञासा और श्रद्धा थी। हृदय की गाँठ खोलने वाले और योगशास्त्र से सम्मत वचन सुनकर वे शीघ्र पालकी से उतरे। राजमद छोड़कर भरत के चरणों में सिर रखा और क्षमा माँगते हुए बोले।

मूल पाठ 10.16

कस्त्वं निगूढश्चरसि द्विजानां बिभर्षि सूत्रं कतमोऽवधूतः । कस्यासि कुत्रत्य इहापि कस्मात् क्षेमाय नश्चेदसि नोत शुक्लः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप कौन हैं, जो अपनी वास्तविक महिमा छिपाकर विचरते हैं? जनेऊ धारण किए किस अवधूत परम्परा के हैं? किसके पुत्र और कहाँ के निवासी हैं? कहीं हमारे कल्याण के लिए आए महान आत्मज्ञानी ही तो नहीं?

मूल पाठ 10.17

नाहं विशङ्के सुरराजवज्रा- न्न त्र्यक्षशूलान्न यमस्य दण्डात् । नाग्न्यर्कसोमानिलवित्तपास्त्रा- च्छङ्के भृशं ब्रह्मकुलावमानात् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुझे इन्द्र के वज्र, शिव के त्रिशूल, यमदण्ड अथवा अग्नि, सूर्य, चन्द्र, वायु और कुबेर के अस्त्रों से उतना भय नहीं जितना ब्रह्मज्ञानी का अपमान करने से है।

मूल पाठ 10.18

तद्ब्रूह्यसङ्गो जडवन्निगूढ- विज्ञानवीर्यो विचरस्यपारः । वचांसि योगग्रथितानि साधो न नः क्षमन्ते मनसापि भेत्तुम् ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: साधो! आप आसक्तिरहित होकर जड़ जैसे दिखाई देते हैं, पर आपका ज्ञान और सामर्थ्य अगाध है। आपके योगयुक्त वचनों का आशय हमारा मन भी पूरी तरह नहीं समझ पा रहा; कृपया स्पष्ट कीजिए।

मूल पाठ 10.19

अहं च योगेश्वरमात्मतत्त्व- विदां मुनीनां परमं गुरुं वै । प्रष्टुं प्रवृत्तः किमिहारणं तत् साक्षाद्धरिं ज्ञानकलावतीर्णम् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं आत्मतत्त्व के ज्ञाता मुनियों के परम गुरु योगेश्वर के पास यह पूछने जा रहा हूँ कि संसार में सुरक्षित आश्रय क्या है। वे ज्ञानरूप में अवतीर्ण साक्षात् हरि हैं।

मूल पाठ 10.20

स वै भवाँल्लोकनिरीक्षणार्थ- मव्यक्तलिङ्गो विचरत्यपि स्वित् । योगेश्वराणां गतिमन्धबुद्धिः कथं विचक्षीत गृहानुबन्धः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्या आप वही हैं, जो लोक का निरीक्षण करने के लिए अपने लक्षण छिपाकर घूमते हैं? गृहासक्ति से अन्धी बुद्धि वाला व्यक्ति योगेश्वरों की वास्तविक गति कैसे पहचान सकता है?

मूल पाठ 10.21

दृष्टः श्रमः कर्मत आत्मनो वै भर्तुर्गन्तुर्भवतश्चानुमन्ये । यथासतोदानयनाद्यभावात् समूल इष्टो व्यवहारमार्गः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपने देह और आत्मा का भेद बताया, फिर भी काम करने, भार उठाने और चलने पर थकान प्रत्यक्ष दिखती है। केवल व्यवहार के परिणामों को सर्वथा असत्य कहने से पानी लाने जैसे उपयोग भी नहीं समझाए जा सकते; इसलिए मेरा संशय बना है।

मूल पाठ 10.22

स्थाल्यग्नितापात्पयसोऽभिताप- स्तत्तापतस्तण्डुलगर्भरन्धिः । देहेन्द्रियास्वाशयसन्निकर्षा- त्तत्संसृतिः पुरुषस्यानुरोधात् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे अग्नि से पात्र, पात्र से जल और जल से चावल गर्म होकर पकते हैं, वैसे देह, इन्द्रिय, प्राण और मन के सम्बन्ध से पुरुष को भी संसार के अनुभव होते होंगे—राजा ने अपनी शङ्का इस उपमा से रखी।

मूल पाठ 10.23

शास्ताभिगोप्ता नृपतिः प्रजानां यः किङ्करो वै न पिनष्टि पिष्टम् । स्वधर्ममाराधनमच्युतस्य यदीहमानो विजहात्यघौघम् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा प्रजा का शिक्षक और रक्षक है। उचित कर्तव्य निभाते सेवक को सुधारना सर्वथा व्यर्थ नहीं। अपने धर्म को अच्युत की आराधना मानकर कर्म करने वाला पापसमूह छोड़ सकता है।

मूल पाठ 10.24

तन्मे भवान् नरदेवाभिमान- मदेन तुच्छीकृतसत्तमस्य । कृषीष्ट मैत्री दृशमार्तबन्धो यथा तरे सदवध्यानमंहः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: किन्तु मैंने राजाभिमान के मद में आप जैसे श्रेष्ठ साधु को तुच्छ समझा। हे दुःखियों के बन्धु! मुझ पर मैत्रीपूर्ण दृष्टि कीजिए, जिससे इस अपराध के पाप से उबर सकूँ।

मूल पाठ 10.25

न विक्रिया विश्वसुहृत्सखस्य साम्येन वीताभिमतेस्तवापि । महद्विमानात्स्वकृताद्धि मादृ- ङ्नङ्क्ष्यत्यदूरादपि शूलपाणिः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप विश्वहितैषी भगवान के सखा, समदर्शी और अभिमानरहित हैं; इसलिए आपमें विकार नहीं होता। फिर भी मेरे जैसे का अपने किए महात्मा-अपमान से नाश हो सकता है; ऐसा अपराध शक्तिशाली से शक्तिशाली को भी नहीं छोड़ता।

॥ पंचम स्कन्ध • अध्याय 10 समाप्त ॥

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पंचम स्कन्ध • अध्याय 11

मन का बन्धन और अन्तर्यामी का बोध

मूल पाठ 11.1

ब्राह्मण उवाच । अकोविदः कोविदवादवादान् वदस्यथो नातिविदां वरिष्ठः । न सूरयो हि व्यवहारमेनं तत्त्वावमर्शेन सहामनन्ति ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: भरत बोले—तुम तत्त्व में निपुण हुए बिना विद्वानों जैसी बातें कहते हो और श्रेष्ठ ज्ञानी भी नहीं हो। ज्ञानी लोग व्यवहार की बात को परम तत्त्व के विवेचन के समान नहीं मानते।

मूल पाठ 11.2

तथैव राजन्नुरुगार्हमेध- वितानविद्योरुविजृम्भितेषु । न वेदवादेषु हि तत्त्ववादः प्रायेण शुद्धो नु चकास्ति साधुः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजन्! विशाल गृहस्थ-कर्मकाण्ड और वैदिक फलवचनों के विस्तार में सामान्यतः शुद्ध तत्त्वज्ञान स्पष्ट नहीं दिखाई देता, क्योंकि उनकी प्रवृत्ति कामनापूर्ति की ओर हो सकती है।

मूल पाठ 11.3

न तस्य तत्त्वग्रहणाय साक्षा- द्वरीयसीरपि वाचः समासन् । स्वप्ने निरुक्त्या गृहमेधिसौख्यं न यस्य हेयानुमितं स्वयं स्यात् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब तक व्यक्ति स्वयं गृहासक्ति के सुख को स्वप्नवत् त्याज्य नहीं समझता, तब तक बड़े-बड़े उपदेश भी उसे सीधे आत्मतत्त्व ग्रहण नहीं करा सकते।

मूल पाठ 11.4

यावन्मनो रजसा पूरुषस्य सत्त्वेन वा तमसा वानुरुद्धम् । चेतोभिराकूतिभिरातनोति निरङ्कुशं कुशलं चेतरं वा ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब तक मन सत्त्व, रज या तम के वश में है, तब तक विविध इच्छाओं और वृत्तियों से वह मनुष्य को शुभ अथवा अशुभ कर्मों में अनियन्त्रित रूप से लगाता रहता है।

मूल पाठ 11.5

स वासनात्मा विषयोपरक्तो गुणप्रवाहो विकृतः षोडशात्मा । बिभ्रत्पृथङ्नामभि रूपभेद- मन्तर्बहिष्ट्वं च पुरैस्तनोति ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वासना और विषयों से रँगा हुआ मन गुणों के प्रवाह में बदलता है। विविध नाम-रूप और सूक्ष्म-स्थूल उपाधियाँ धारण कर वह जीव के भीतरी-बाहरी अनुभवों का विस्तार करता है।

मूल पाठ 11.6

दुःखं सुखं व्यतिरिक्तं च तीव्रं कालोपपन्नं फलमाव्यनक्ति । आलिङ्ग्य मायारचितान्तरात्मा स्वदेहिनं संसृतिचक्रकूटः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: माया से बने अन्तःकरण को अपनाकर जीव कालानुसार तीव्र सुख, दुःख और अन्य फल अनुभव करता है। यही मन संसारचक्र में उसे बाँधे रखने का प्रमुख साधन बनता है।

मूल पाठ 11.7

तावानयं व्यवहारः सदाविः क्षेत्रज्ञसाक्ष्यो भवति स्थूलसूक्ष्मः । तस्मान्मनो लिङ्गमदो वदन्ति गुणागुणत्वस्य परावरस्य ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्थूल और सूक्ष्म व्यवहार का यह विस्तार क्षेत्रज्ञ आत्मा की साक्षी में प्रकट होता है। इसलिए मन जीव की गुणबद्ध या गुणातीत तथा ऊँची या नीची अवस्था का सूचक कहा जाता है।

मूल पाठ 11.8

गुणानुरक्तं व्यसनाय जन्तोः क्षेमाय नैर्गुण्यमथो मनः स्यात् । यथा प्रदीपो घृतवर्तिमश्नन् शिखाः सधूमा भजति ह्यन्यदा स्वम् । पदं तथा गुणकर्मानुबद्धं वृत्तीर्मनः श्रयतेऽन्यत्र तत्त्वम् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: विषयगुणों में आसक्त मन दुःख का कारण है और उनसे मुक्त मन कल्याण का। जैसे तेल-बत्ती के आश्रय से दीपक धुएँ वाली लौ देता है और उनके समाप्त होने पर शान्त हो जाता है, वैसे मन गुण-कर्म के आश्रय से वृत्तियाँ बनाता है और उनसे उपरत होकर तत्त्व में शान्त होता है।

मूल पाठ 11.9

एकादशासन्मनसो हि वृत्तय आकूतयः पञ्च धियोऽभिमानः । मात्राणि कर्माणि पुरं च तासां वदन्ति हैकादश वीर भूमीः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मन के ग्यारह कार्यक्षेत्र बताए गए हैं—पाँच कर्मेन्द्रियों की प्रवृत्तियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियों के बोध और अहंकार। इनके आधार विषय, कर्म और शरीर हैं।

मूल पाठ 11.10

गन्धाकृतिस्पर्शरसश्रवांसि विसर्गरत्यर्त्यभिजल्पशिल्पाः । एकादशं स्वीकरणं ममेति शय्यामहं द्वादशमेक आहुः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: गन्ध, रूप, स्पर्श, रस और शब्द पाँच ज्ञानविषय हैं; त्याग, सम्भोग, गमन, बोलना और हाथों की क्रिया पाँच कर्मविषय। शरीरादि को मेरा मानना ग्यारहवीं वृत्ति है; कुछ मतों में देह को मैं मानने का आधार अलग गिनकर बारहवाँ कहा गया है।

मूल पाठ 11.11

द्रव्यस्वभावाशयकर्मकालै- रेकादशामी मनसो विकाराः । सहस्रशः शतशः कोटिशश्च क्षेत्रज्ञतो न मिथो न स्वतः स्युः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: पदार्थ, स्वभाव, संस्कार, कर्म और काल के कारण मन के ये विकार सैकड़ों, हजारों और करोड़ों रूप लेते हैं। वे अपने-आप या एक-दूसरे मात्र से स्वतन्त्र नहीं होते; क्षेत्रज्ञ की साक्षी और चेतना के आश्रय में ही उनका अनुभव होता है।

मूल पाठ 11.12

क्षेत्रज्ञ एता मनसो विभूती- र्जीवस्य मायारचितस्य नित्याः । आविर्हिताः क्वापि तिरोहिताश्च शुद्धो विचष्टे ह्यविशुद्धकर्तुः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुद्ध क्षेत्रज्ञ इन मनोवृत्तियों को देखता है। माया से निर्मित जीवव्यवहार में ये कभी प्रकट और कभी अप्रकट होती हैं, किन्तु साक्षी स्वयं अशुद्ध कर्तृत्व से अलग है।

मूल पाठ 11.13

क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः पुराणः साक्षात्स्वयञ्ज्योतिरजः परेशः । नारायणो भगवान्वासुदेवः स्वमाययाऽऽत्मन्यवधीयमानः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: परम क्षेत्रज्ञ सनातन, अजन्मा, स्वयम्प्रकाश आत्मा हैं। वे ही परमेश्वर नारायण, भगवान वासुदेव हैं, जो अपनी माया से जीवों में स्थित प्रतीत होते हैं।

मूल पाठ 11.14

यथानिलः स्थावरजङ्गमाना- मात्मस्वरूपेण निविष्ट ईशेत् । एवं परो भगवान् वासुदेवः क्षेत्रज्ञ आत्मेदमनुप्रविष्टः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे वायु चर-अचर प्राणियों में प्राणरूप होकर प्रवेश करती और उन्हें चलाती है, वैसे परम भगवान वासुदेव समस्त जगत में अन्तर्यामी आत्मा के रूप में उपस्थित हैं।

मूल पाठ 11.15

न यावदेतां तनुभृन्नरेन्द्र विधूय मायां वयुनोदयेन । विमुक्तसङ्गो जितषट्सपत्नो वेदात्मतत्त्वं भ्रमतीह तावत् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजन्! जब तक देहधारी ज्ञान के प्रकाश से माया दूर करके आसक्ति और मन-पाँच इन्द्रियों के छह शत्रुओं को नहीं जीतता तथा आत्मतत्त्व नहीं जानता, तब तक संसार में भटकता रहता है।

मूल पाठ 11.16

न यावदेतन्मन आत्मलिङ्गं संसारतापावपनं जनस्य । यच्छोकमोहामयरागलोभ- वैरानुबन्धं ममतां विधत्ते ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मन जीव की उपाधि बनकर संसारताप बोता है। वही शोक, मोह, रोग, राग, लोभ, वैर और ममता पैदा करता है; उसकी यह स्थिति पहचानना आवश्यक है।

मूल पाठ 11.17

भ्रातृव्यमेनं तददभ्रवीर्य- मुपेक्षयाध्येधितमप्रमत्तः । गुरोर्हरेश्चरणोपासनास्त्रो जहि व्यलीकं स्वयमात्ममोषम् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उपेक्षा से प्रबल हुए इस आत्महित चुराने वाले शत्रु मन को सावधानी से जीतो। गुरु और हरि के चरणों की उपासना को अस्त्र बनाकर इसके मिथ्या प्रपञ्च को दूर करो।

॥ पंचम स्कन्ध • अध्याय 11 समाप्त ॥

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पंचम स्कन्ध • अध्याय 12

सत्सङ्ग, आत्मज्ञान और भरत का पूर्वजन्म

मूल पाठ 12.1

रहूगण उवाच । नमो नमः कारणविग्रहाय स्वरूपतुच्छीकृतविग्रहाय । नमोऽवधूतद्विजबन्धुलिङ्ग- निगूढनित्यानुभवाय तुभ्यम् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: रहूगण बोले—आपको बार-बार नमस्कार! आपने लोकहित के लिए देह धारण की है, पर आत्मस्वरूप से देहाभिमान तुच्छ कर दिया है। सामान्य ब्राह्मण और अवधूत के चिह्नों में अपना नित्य आत्मानुभव छिपाने वाले आपको प्रणाम है।

मूल पाठ 12.2

ज्वरामयार्तस्य यथागदं स- न्निदाघदग्धस्य यथा हिमाम्भः । कुदेहमानाहिविदष्टदृष्टे- र्ब्रह्मन्वचस्तेऽमृतमौषधं मे ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: ज्वरपीड़ित को औषधि और गर्मी से तपे को शीतल जल जैसा सुख देता है, वैसे आपके अमृतमय वचन मुझे देहाभिमान के सर्पविष से मुक्त करने वाली औषधि हैं।

मूल पाठ 12.3

तस्माद्भवन्तं मम संशयार्थं प्रक्ष्यामि पश्चादधुना सुबोधम् । अध्यात्मयोगग्रथितं तवोक्त- माख्याहि कौतूहलचेतसो मे ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने अन्य संशय बाद में पूछूँगा। अभी आपकी अध्यात्मयोग से भरी बात को सरल रूप में समझा दीजिए; मेरा मन उसे जानने को उत्सुक है।

मूल पाठ 12.4

यदाह योगेश्वर दृश्यमानं क्रियाफलं सद्व्यवहारमूलम् । न ह्यञ्जसा तत्त्वविमर्शनाय भवानमुष्मिन् भ्रमते मनो मे ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: योगेश्वर! आपने कहा कि प्रत्यक्ष दिखने वाला क्रियाफल और व्यवहार परम तत्त्व के निर्णय का सीधा प्रमाण नहीं है। इसी बात में मेरा मन उलझ रहा है।

मूल पाठ 12.5

ब्राह्मण उवाच । अयं जनो नाम चलन् पृथिव्यां यः पार्थिवः पार्थिव कस्य हेतोः । तस्यापि चाङ्घ्र्योरधिगुल्फजङ्घा- जानूरुमध्योरशिरोधरांसाः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: भरत बोले—पृथ्वी पर चलता यह शरीर पृथ्वी के ही तत्त्वों से बना है। उसके ऊपर पाँव, टखने, पिण्डलियाँ, घुटने, जाँघें, कमर, वक्ष, गर्दन और कन्धे हैं—यह सब भौतिक संरचना है।

मूल पाठ 12.6

अंसेऽधि दार्वी शिबिका च यस्यां सौवीरराजेत्यपदेश आस्ते । यस्मिन् भवान् रूढनिजाभिमानो राजास्मि सिन्धुष्विति दुर्मदान्धः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कन्धों पर लकड़ी की पालकी है और उसमें बैठा शरीर सौवीरराज कहलाता है। उसी में तुम यह दृढ़ अहंकार धारण किए हो कि मैं सिन्धुदेश का राजा हूँ।

मूल पाठ 12.7

शोच्यानिमांस्त्वमधिकष्टदीनान् विष्ट्या निगृह्णन् निरनुग्रहोऽसि । जनस्य गोप्तास्मि विकत्थमानो न शोभसे वृद्धसभासु धृष्टः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: बेगार से इन पहले ही कष्ट पाए दीन लोगों को दबाकर तुम करुणा नहीं कर रहे। फिर प्रजा का रक्षक होने का घमण्ड करना ज्ञानी जनों की सभा में शोभा नहीं देता।

मूल पाठ 12.8

यदा क्षितावेव चराचरस्य विदाम निष्ठां प्रभवं च नित्यम् । तन्नामतोऽन्यद्व्यवहारमूलं निरूप्यतां सत्क्रिययानुमेयम् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: चर-अचर के शरीरों की उत्पत्ति और स्थिति पृथ्वी आदि तत्त्वों में ही देखी जाती है। इन नामों के अतिरिक्त किसी अलग व्यवहारिक सत्ता का दावा हो तो उसका वास्तविक स्वरूप स्पष्ट करो।

मूल पाठ 12.9

एवं निरुक्तं क्षितिशब्दवृत्त- मसन्निधानात्परमाणवो ये । अविद्यया मनसा कल्पितास्ते येषां समूहेन कृतो विशेषः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी शब्द से जिस समूह का बोध होता है, उसे परमाणुओं में बाँटा जाता है। फिर भी उन सूक्ष्म भेदों और उनके समूहों की कल्पना मन के द्वारा होती है; आत्मा उनसे परे है।

मूल पाठ 12.10

एवं कृशं स्थूलमणुर्बृहद्य- दसच्च सज्जीवमजीवमन्यत् । द्रव्यस्वभावाशयकालकर्म- नाम्नाजयावेहि कृतं द्वितीयम् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: दुबला-मोटा, छोटा-बड़ा, कार्य-कारण, जीव-जड़ तथा पदार्थ, स्वभाव, संस्कार, काल और कर्म के नाम से दिखने वाला समस्त भेद माया द्वारा रचित व्यवहारिक द्वैत समझो।

मूल पाठ 12.11

ज्ञानं विशुद्धं परमार्थमेक- मनन्तरं त्वबहिर्ब्रह्म सत्यम् । प्रत्यक्प्रशान्तं भगवच्छब्दसंज्ञं यद्वासुदेवं कवयो वदन्ति ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: परम सत्य विशुद्ध, एक, अभेद और भीतर-बाहर के भेद से रहित ज्ञानस्वरूप ब्रह्म है। वह अन्तरात्मा, परम शान्त और भगवान नाम से प्रसिद्ध है; ज्ञानी उसी को वासुदेव कहते हैं।

मूल पाठ 12.12

रहूगणैतत्तपसा न याति न चेज्यया निर्वपणाद्गृहाद्वा । न छन्दसा नैव जलाग्निसूर्यै- र्विना महत्पादरजोऽभिषेकम् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: रहूगण! महात्माओं के चरणों की कृपा और सेवा के बिना यह बोध केवल तप, यज्ञ, दान, गृहत्याग, वेदाध्ययन अथवा जल, अग्नि और सूर्य की उपासना से प्राप्त नहीं होता।

मूल पाठ 12.13

यत्रोत्तमश्लोकगुणानुवादः प्रस्तूयते ग्राम्यकथाविघातः । निषेव्यमाणोऽनुदिनं मुमुक्षो- र्मतिं सतीं यच्छति वासुदेवे ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ भगवान के गुणों की कथा होती है, वहाँ विषयभरी बातें छूटती हैं। ऐसे सत्सङ्ग का प्रतिदिन सेवन करने से मुक्तिकामी की बुद्धि वासुदेव में दृढ़ और निर्मल हो जाती है।

मूल पाठ 12.14

अहं पुरा भरतो नाम राजा विमुक्तदृष्टश्रुतसङ्गबन्धः । आराधनं भगवत ईहमानो मृगोऽभवं मृगसङ्गाद्धतार्थः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं पहले भरत नाम का राजा था। दृश्य और शास्त्रश्रुत भोगों की आसक्ति छोड़कर भगवान की पूजा में लगा था, पर मृग की आसक्ति से साधना बाधित हुई और मृगजन्म मिला।

मूल पाठ 12.15

सा मां स्मृतिर्मृगदेहेऽपि वीर कृष्णार्चनप्रभवा नो जहाति । अथो अहं जनसङ्गादसङ्गो विशङ्कमानोऽविवृतश्चरामि ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे वीर! कृष्ण की आराधना से मिली पूर्वस्मृति मृगदेह में भी नहीं गई। इसलिए अब मैं आसक्ति से सावधान होकर लोगों की सङ्गति से अलग और अपनी वास्तविक स्थिति छिपाए विचरता हूँ।

मूल पाठ 12.16

तस्मान्नरोऽसङ्गसुसङ्गजात- ज्ञानासिनेहैव विवृक्णमोहः । हरिं तदीहाकथनश्रुताभ्यां लब्धस्मृतिर्यात्यतिपारमध्वनः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए अनासक्ति और सत्सङ्ग से मिले ज्ञानरूपी खड्ग से मोह काटो। हरि की लीला कहना-सुनना आत्मस्मृति जगाता है; इसी से मनुष्य संसारपथ के उस पार पहुँचता है।

॥ पंचम स्कन्ध • अध्याय 12 समाप्त ॥

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पंचम स्कन्ध • अध्याय 13

भवाटवी का रूपक और रहूगण का बोध

मूल पाठ 13.1

ब्राह्मण उवाच । दुरत्ययेऽध्वन्यजया निवेशितो रजस्तमःसत्त्वविभक्तकर्मदृक् । स एष सार्थोऽर्थपरः परिभ्रमन् भवाटवीं याति न शर्म विन्दति ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: भरत बोले—माया से कठिन संसारपथ पर पड़ा जीव शुभ-अशुभ गुणजन्य कर्म करता है। धन और विषयों के लिए भटकता व्यापारीदल जैसा वह भववन में चलता है, किन्तु स्थायी शान्ति नहीं पाता।

मूल पाठ 13.2

यस्यामिमे षण्नरदेव दस्यवः सार्थं विलुम्पन्ति कुनायकं बलात् । गोमायवो यत्र हरन्ति सार्थिकं प्रमत्तमाविश्य यथोरणं वृकाः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस वन में छह लुटेरे दुर्बुद्धि नायक वाले व्यापारीदल को लूटते हैं। सियार और भेड़िए भी असावधान व्यापारी का धन ऐसे ले जाते हैं जैसे भेड़ को खींच ले जाएँ।

मूल पाठ 13.3

प्रभूतवीरुत्तृणगुल्मगह्वरे कठोरदंशैर्मशकैरुपद्रुतः । क्वचित्तु गन्धर्वपुरं प्रपश्यति क्वचित्क्वचिच्चाशु रयोल्मुकग्रहम् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: घनी लताओं, घास और झाड़ियों में उसे डाँस-मच्छर सताते हैं। कहीं वह आकाश में कल्पित नगर देखता है और कहीं चमकती आग जैसी भ्रामक वस्तु की ओर खिंचता है।

मूल पाठ 13.4

निवासतोयद्रविणात्मबुद्धि- स्ततस्ततो धावति भो अटव्याम् । क्वचिच्च वात्योत्थितपांसुधूम्रा दिशो न जानाति रजस्वलाक्षः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: घर, जल, धन और अपने अस्तित्व का सुख खोजते वह वन में इधर-उधर दौड़ता है। कभी आँधी की धूल से उसकी आँखें ढक जाती हैं और दिशा भूल जाता है।

मूल पाठ 13.5

अदृश्यझिल्लीस्वनकर्णशूल उलूकवाग्भिर्व्यथितान्तरात्मा । अपुण्यवृक्षान् श्रयते क्षुधार्दितो मरीचितोयान्यभिधावति क्वचित् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अदृश्य झींगुरों की तीखी ध्वनि और उल्लुओं के शब्द उसे व्यथित करते हैं। भूखा होकर निष्फल वृक्षों का आश्रय लेता और कभी मृगतृष्णा के जल की ओर भागता है।

मूल पाठ 13.6

क्वचिद्वितोयाः सरितोऽभियाति परस्परं चालषते निरन्धः । आसाद्य दावं क्वचिदग्नितप्तो निर्विद्यते क्व च यक्षैर्हृतासुः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कभी सूखी नदियों तक पहुँचता, कुछ न पाकर आपस में झगड़ता है। कभी दावानल से तपता और कभी प्राणतुल्य धन हर लेने वालों से पीड़ित होकर निराश होता है।

मूल पाठ 13.7

शूरैर्हृतस्वः क्व च निर्विण्णचेताः शोचन्विमुह्यन्नुपयाति कश्मलम् । क्वचिच्च गन्धर्वपुरं प्रविष्टः प्रमोदते निर्वृतवन्मुहूर्तम् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: बलवानों से धन छिनने पर वह शोक और मोह में डूब जाता है। कभी कल्पित गन्धर्वनगर में पहुँचकर थोड़ी देर के लिए सुखी होने का अनुभव करता है।

मूल पाठ 13.8

चलन् क्वचित्कण्टकशर्कराङ्घ्रि- र्नगारुरुक्षुर्विमना इवास्ते । पदे पदेऽभ्यन्तरवह्निनार्दितः कौटुम्बिकः क्रुध्यति वै जनाय ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: काँटों और कंकड़ों से पैर घायल होते हैं; पहाड़ चढ़ने की इच्छा में हताश बैठ जाता है। भीतर की अग्नि से तपता गृहस्थ अपने ही परिवार पर क्रोध करता है।

मूल पाठ 13.9

क्वचिन्निगीर्णोऽजगराहिना जनो नावैति किञ्चिद्विपिनेऽपविद्धः । दष्टः स्म शेते क्व च दन्दशूकै- रन्धोऽन्धकूपे पतितस्तमिस्रे ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: कभी अजगर उसे निगल लेता है और वह कुछ नहीं जानता। कभी विषैले सर्पों से पीड़ित होकर अन्धेरे कुएँ में पड़े अन्धे की तरह निस्सहाय हो जाता है।

मूल पाठ 13.10

कर्हि स्म चित्क्षुद्ररसान् विचिन्वं- स्तन्मक्षिकाभिर्व्यथितो विमानः । तत्रातिकृच्छ्रात्प्रतिलब्धमानो बलाद्विलुम्पन्त्यथ तं ततोऽन्ये ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: थोड़ा मधुर रस पाने जाता है तो मधुमक्खियाँ सताती और अपमानित करती हैं। बड़ी कठिनाई से कुछ मिलता भी है तो दूसरे बलपूर्वक छीन लेते हैं।

मूल पाठ 13.11

क्वचिच्च शीतातपवातवर्ष- प्रतिक्रियां कर्तुमनीश आस्ते । क्वचिन्मिथो विपणन् यच्च किञ्चि- द्विद्वेषमृच्छत्युत वित्तशाठ्यात् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: कभी शीत, धूप, हवा और वर्षा से बचाव नहीं कर पाता। लेन-देन में थोड़े धन के लिए भी छल करता और दूसरों का वैर कमाता है।

मूल पाठ 13.12

क्वचित्क्वचित्क्षीणधनस्तु तस्मिन् शय्यासनस्थानविहारहीनः । याचन् परादप्रतिलब्धकामः पारक्यदृष्टिर्लभतेऽवमानम् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: धन घट जाने पर बिस्तर, बैठने का स्थान, आश्रय और मनोरंजन छूट जाते हैं। दूसरों से माँगने पर इच्छा पूरी नहीं होती; पराई वस्तु पर दृष्टि रखने से अपमान मिलता है।

मूल पाठ 13.13

अन्योन्यवित्तव्यतिषङ्गवृद्ध- वैरानुबन्धो विवहन् मिथश्च । अध्वन्यमुष्मिन्नुरुकृच्छ्रवित्त- बाधोपसर्गैर्विहरन् विपन्नः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: धनसम्बन्धी उलझनों से वैर बढ़ता है, फिर भी लोग परस्पर विवाहसम्बन्ध बनाते हैं। इस पथ में धन की कठिनाई और अनेक संकटों के बीच जीव कभी सम्पन्न, कभी विपन्न होता रहता है।

मूल पाठ 13.14

तांस्तान् विपन्नान् स हि तत्र तत्र विहाय जातं परिगृह्य सार्थः । आवर्ततेऽद्यापि न कश्चिदत्र वीराध्वनः पारमुपैति योगम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: दल मृत साथियों को पीछे छोड़कर नए जन्म लेने वालों को साथ लेता और चलता रहता है। संसारपथ का पार कराने वाले योग को साधारण भटकाव से कोई नहीं पाता।

मूल पाठ 13.15

मनस्विनो निर्जितदिग्गजेन्द्रा ममेति सर्वे भुवि बद्धवैराः । मृधे शयीरन् न तु तद्व्रजन्ति यन्न्यस्तदण्डो गतवैरोऽभियाति ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: दिग्विजयी राजा भी यह पृथ्वी मेरी है कहकर वैर बाँधते और रणभूमि में मर जाते हैं। वे उस पद तक नहीं पहुँचते, जहाँ दण्ड और वैर छोड़ने वाला पहुँचता है।

मूल पाठ 13.16

प्रसज्जति क्वापि लता भुजाश्रय- स्तदाश्रयाव्यक्तपदद्विजस्पृहः । क्वचित्कदाचिद्धरिचक्रतस्त्रसन् सख्यं विधत्ते बककङ्कगृध्रैः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कभी वह लता की भुजाओं का सहारा लेकर उससे जुड़े पक्षियों के अस्पष्ट बोल सुनने की इच्छा करता है। मृत्यु के चक्र से डरकर कभी बगुले, कङ्क और गिद्ध जैसे छली सहायकों से मित्रता करता है।

मूल पाठ 13.17

तैर्वञ्चितो हंसकुलं समाविश- न्नरोचयन् शीलमुपैति वानरान् । तज्जातिरासेन सुनिर्वृतेन्द्रियः परस्परोद्वीक्षणविस्मृतावधिः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनसे ठगा जाकर हंसों के समुदाय में आता है, किन्तु उनका शील नहीं रुचता तो बन्दरों में मिल जाता है। वहाँ इन्द्रियभोग और परस्पर आकर्षण में जीवन की सीमा भूल जाता है।

मूल पाठ 13.18

द्रुमेषु रंस्यन् सुतदारवत्सलो व्यवायदीनो विवशः स्वबन्धने । क्वचित्प्रमादाद्गिरिकन्दरे पतन् वल्लीं गृहीत्वा गजभीत आस्थितः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वृक्षों पर रमते बन्दर की तरह पत्नी-पुत्र की ममता और कामासक्ति में बँधता है। कभी असावधानी से पर्वत की खाई में गिरकर हाथी के भय से लता पकड़कर लटक जाता है।

मूल पाठ 13.19

अतः कथञ्चित्स विमुक्त आपदः पुनश्च सार्थं प्रविशत्यरिन्दम । अध्वन्यमुष्मिन्नजया निवेशितो भ्रमञ्जनोऽद्यापि न वेद कश्चन ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: किसी तरह संकट से छूटकर वह फिर उसी व्यापारीदल में मिल जाता है। माया के इस पथ में लगा जीव अब भी भटकता और अपने वास्तविक हित को नहीं समझता।

मूल पाठ 13.20

रहूगण त्वमपि ह्यध्वनोऽस्य सन्न्यस्तदण्डः कृतभूतमैत्रः । असज्जितात्मा हरिसेवया शितं ज्ञानासिमादाय तरातिपारम् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: रहूगण! तुम दण्ड और हिंसा छोड़ो, सभी प्राणियों से मैत्री करो और मन को आसक्ति से बचाओ। हरिसेवा से तीखे किए ज्ञानखड्ग को लेकर इस संसारपथ के पार पहुँचो।

मूल पाठ 13.21

राजोवाच । अहो नृजन्माखिलजन्मशोभनं किं जन्मभिस्त्वपरैरप्यमुष्मिन् । न यद्धृषीकेशयशःकृतात्मनां महात्मनां वः प्रचुरः समागमः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: रहूगण बोले—मनुष्यजन्म सभी जन्मों में श्रेष्ठ है, क्योंकि इसमें भगवान के यश में मन लगाए आप जैसे महात्माओं का सङ्ग मिलता है। जहाँ ऐसा सङ्ग नहीं, उन ऊँचे जन्मों से भी क्या लाभ?

मूल पाठ 13.22

न ह्यद्भुतं त्वच्चरणाब्जरेणुभि- र्हतांहसो भक्तिरधोक्षजेऽमला । मौहूर्तिकाद्यस्य समागमाच्च मे दुस्तर्कमूलोऽपहतोऽविवेकः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपके चरणों की कृपा से पाप मिटने और निर्मल भक्ति मिलने में आश्चर्य नहीं। आपके क्षणभर के सङ्ग से ही मेरा कुतर्कजन्य अविवेक दूर हो गया।

मूल पाठ 13.23

नमो महद्भ्योऽस्तु नमः शिशुभ्यो नमो युवभ्यो नम आवटुभ्यः । ये ब्राह्मणा गामवधूतलिङ्गा- श्चरन्ति तेभ्यः शिवमस्तु राज्ञाम् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: बड़े, बालक, युवा और बाहरी चिह्न छिपाए विचरने वाले सभी ब्रह्मज्ञानी अवधूतों को नमस्कार! वे राजाओं के लिए भी कल्याण का कारण हों।

मूल पाठ 13.24

श्रीशुक उवाच । इत्येवमुत्तरामातः स वै ब्रह्मर्षिसुतः सिन्धुपतय आत्मसतत्त्वं विगणयतः परानुभावः परमकारुणिकतयोपदिश्य रहूगणेन सकरुणमभिवन्दितचरण आपूर्णार्णव इव निभृतकरणोर्म्याशयो धरणिमिमां विचचार ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेव बोले—ब्रह्मर्षिपुत्र भरत ने करुणापूर्वक रहूगण को आत्मतत्त्व समझाया। राजा ने उनके चरणों में प्रणाम किया। पूर्ण समुद्र की तरह शान्त इन्द्रियों और मन वाले भरत फिर पृथ्वी पर विचरने लगे।

मूल पाठ 13.25

सौवीरपतिरपि सुजनसमवगतपरमात्मसतत्त्व आत्मन्यविद्याध्यारोपितां च देहात्ममतिं विससर्ज एवं हि नृप भगवदाश्रिताश्रितानुभावः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: सज्जन के उपदेश से परमात्मतत्त्व जानकर रहूगण ने अज्ञान से आरोपित देह को आत्मा मानने की बुद्धि त्याग दी। भगवान के आश्रित के आश्रय का भी ऐसा महान प्रभाव है।

मूल पाठ 13.26

राजोवाच । यो ह वा इह बहुविदा महाभागवत त्वयाभिहितः परोक्षेण वचसा जीवलोकभवाध्वा स ह्यार्य मनीषया कल्पितविषयो नाञ्जसाव्युत्पन्नलोक- समधिगमः अथ तदेवैतद्दुरवगमं समवेता- नुकल्पेन निर्दिश्यतामिति ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: परीक्षित ने पूछा—आपने जीव के संसारपथ को रूपक में बताया है। बुद्धिमान इसका आशय समझ सकते हैं, पर सामान्य व्यक्ति के लिए कठिन है। कृपया उपमा और उसके अर्थ को मिलाकर स्पष्ट समझाइए।

॥ पंचम स्कन्ध • अध्याय 13 समाप्त ॥

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पंचम स्कन्ध • अध्याय 14

संसारवन के रूपक का विस्तार

मूल पाठ 14.1

स होवाच । य एष देहात्ममानिनां सत्त्वादिगुणविशेषविकल्पित- कुशलाकुशलसमवहारविनिर्मितविविधदेहावलिभि- र्वियोगसंयोगादि अनादिसंसारानुभवस्य द्वारभूतेन षडिन्द्रियवर्गेण तस्मिन् दुर्गाध्ववदसुगमेऽध्व- न्यापतित ईश्वरस्य भगवतो विष्णोर्वशवर्तिन्या मायया जीवलोकोऽयं यथा वणिक्सार्थोऽर्थपरः स्वदेहनिष्पादितकर्मानुभवः श्मशानवदशिवतमायां संसाराटव्यां गतो नाद्यापि विफलबहुप्रतियोगेहस्त- त्तापोपशमनीं हरिगुरुचरणारविन्दमधुकरानुपदवी- मवरुन्धे ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेव बोले—शरीर को आत्मा मानने वाला जीव गुणजन्य शुभ-अशुभ कर्मों से अनेक देह पाता और सम्बन्धों में जुड़ता-बिछुड़ता है। मन सहित छह इन्द्रियाँ उसके अनुभव का द्वार हैं। धन के पीछे लगे व्यापारी की तरह वह विष्णु की माया के कठिन संसारवन में भटकता है। अनेक निष्फल प्रयत्नों के बाद भी वह हरि और गुरु के चरणों का अनुसरण नहीं करता, जो उसके ताप शान्त कर सकता है।

मूल पाठ 14.2

यस्यामु ह वा एते षडिन्द्रियनामानः कर्मणा दस्यव एव ते तद्यथा पुरुषस्य धनं यत्किञ्चिद्धर्मौपयिकं बहु कृच्छ्राधिगतं साक्षात्परमपुरुषाराधनलक्षणो योऽसौ धर्मस्तं तु साम्पराय उदाहरन्ति । तद्धर्म्यं धनं दर्शन- स्पर्शनश्रवणास्वादनावघ्राणसङ्कल्पव्यवसायगृह- ग्राम्योपभोगेन कुनाथस्याजितात्मनो यथा सार्थस्य विलुम्पन्ति ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: छह लुटेरे मन और पाँच इन्द्रियाँ हैं। कठिन श्रम से पाया धन भगवान की आराधनारूपी धर्म में लग सकता था, पर असंयमी जीव उसे देखने, छूने, सुनने, चखने, सूँघने और विषयसंकल्पों में गँवा देता है, जैसे अयोग्य नायक का व्यापारीदल लुट जाता है।

मूल पाठ 14.3

अथ च यत्र कौटुम्बिका दारापत्यादयो नाम्ना कर्मणा वृकसृगाला एवानिच्छतोऽपि कदर्यस्य कुटुम्बिन उरणकवत्संरक्ष्यमाणं मिषतोऽपि हरन्ति ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: परिवार के प्रति अन्धी आसक्ति में पत्नी-पुत्र आदि के लिए निरन्तर होता व्यय रूपक में भेड़िए और सियारों द्वारा धनहरण कहा गया है। आशय ममता के बन्धन का है, वास्तविक सम्बन्धियों को पशु मानना नहीं।

मूल पाठ 14.4

यथा ह्यनुवत्सरं कृष्यमाणमप्यदग्धबीजं क्षेत्रं पुनरेवावपनकाले गुल्मतृणवीरुद्भिर्गह्वरमिव भवत्येवमेव गृहाश्रमः कर्मक्षेत्रं यस्मिन् न हि कर्माण्युत्सीदन्ति यदयं कामकरण्ड एष आवसथः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिस खेत के बीज जले नहीं, उसमें बार-बार खेती करने पर भी घास-झाड़ियाँ उगती हैं। वैसे ही भीतर की कामनाएँ बनी रहें तो गृहासक्ति के कर्मक्षेत्र में नए कर्मों के बीज निरन्तर पैदा होते हैं।

मूल पाठ 14.5

तत्र गतो दंशमशकसमापसदैर्मनुजैः शलभ- शकुन्ततस्करमूषकादिभिरुपरुध्यमानबहिःप्राणः क्वचित्परिवर्तमानोऽस्मिन्नध्वन्यविद्याकामकर्मभि- रुपरक्तमनसानुपपन्नार्थं नरलोकं गन्धर्वनगर- मुपपन्नमिति मिथ्यादृष्टिरनुपश्यति ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: हानि पहुँचाने वाले लोग और अन्य विघ्न डाँस-मच्छर, पक्षी, चोर और चूहों जैसे धन को घटाते हैं। अज्ञान, कामना और कर्म से रँगा मन इस अस्थिर मनुष्यलोक को गन्धर्वनगर की तरह स्थायी मान लेता है।

मूल पाठ 14.6

तत्र च क्वचिदातपोदकनिभान् विषयानुपधावति पानभोजनव्यवायादि व्यसनलोलुपः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: भोजन, पेय और कामभोग का लोभी कभी मृगतृष्णा के जल जैसे क्षणिक विषयों के पीछे दौड़ता है।

मूल पाठ 14.7

क्वचिच्चाशेषदोषनिषदनं पुरीषविशेषं तद्वर्णगुण- निर्मितमतिः सुवर्णमुपादित्सत्यग्निकामकातर इवोल्मुकपिशाचम् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: कभी सोने के रंग और गुण से मोहित होकर उसे पाने दौड़ता है। वह दोषों का आश्रय बन सकता है; उसकी भ्रामक चमक के पीछे दौड़ना आग चाहकर जलती उल्का को उपयोगी आश्रय समझने जैसा है।

मूल पाठ 14.8

अथ कदाचिन्निवासपानीयद्रविणाद्यनेकात्मो- पजीवनाभिनिवेश एतस्यां संसाराटव्यामितस्ततः परिधावति ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: कभी घर, पानी, धन और जीवननिर्वाह की अनेक वस्तुओं के प्रति तीव्र लगाव उसे संसारवन में इधर-उधर दौड़ाता है।

मूल पाठ 14.9

क्वचिच्च वात्यौपम्यया प्रमदयाऽऽरोहमारोपित- स्तत्कालरजसा रजनीभूत इवासाधुमर्यादो रजस्वलाक्षोऽपि दिग्देवता अतिरजस्वलमतिर्न विजानाति ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: कामासक्ति आँधी की तरह विवेक को ढक देती है। रजोगुण के धूलभरे अन्धकार में पड़ा व्यक्ति मर्यादा और सब ओर उपस्थित साक्षी देवताओं का भी ध्यान नहीं रखता।

मूल पाठ 14.10

क्वचित्सकृदवगतविषयवैतथ्यः स्वयं पराभिध्यानेन विभ्रंशितस्मृतिस्तयैव मरीचितोयप्रायांस्तानेवाभिधावति ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: विषयों की असारता एक बार जान लेने पर भी उन्हीं का चिन्तन उसकी स्मृति हर लेता है। फिर वही व्यक्ति मृगतृष्णा जैसे भोगों की ओर दौड़ने लगता है।

मूल पाठ 14.11

क्वचिदुलूकझिल्लीस्वनवदतिपरुषरभसाटोपं प्रत्यक्षं परोक्षं वा रिपुराजकुलनिर्भर्त्सितेना- तिव्यथितकर्णमूलहृदयः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: शत्रु या राजकर्मचारियों के सामने अथवा पीछे से कहे कठोर अपमानजनक वचन उल्लू और झींगुर की ध्वनि जैसे उसके कान और हृदय को दुखाते हैं।

मूल पाठ 14.12

स यदा दुग्धपूर्वसुकृतस्तदा कारस्करकाकतुण्डा- द्यपुण्यद्रुमलताविषोदपानवदुभयार्थशून्यद्रविणान् जीवन्मृतान् स्वयं जीवन् म्रियमाण उपधावति ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुण्य का सहारा चुकने पर वह ऐसे निष्फल धनिकों का आश्रय लेता है जो न अपना आध्यात्मिक हित करते हैं, न दूसरों का। यह विषैले वृक्ष, लता या दूषित कुएँ से राहत चाहने जैसा है।

मूल पाठ 14.13

एकदासत्प्रसङ्गान्निकृतमतिर्व्युदकस्रोतः स्खलनव- दुभयतोऽपि दुःखदं पाखण्डमभियाति ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: बुरी सङ्गति से बुद्धि ठगी जाती है और वह लोक-परलोक दोनों में दुःख देने वाले असत्य मार्ग पर जाता है, जैसे पानी की आशा में सूखे प्रवाह में उतर पड़े।

मूल पाठ 14.14

यदा तु परबाधयान्ध आत्मने नोपनमति तदा हि पितृपुत्रबर्हिष्मतः पितृपुत्रान् वा स खलु भक्षयति ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब दूसरों से हड़पकर अपना निर्वाह नहीं चला पाता, तब वह पिता-पुत्र अथवा निकट सम्बन्धियों के हिस्से तक खा जाता है; रूपक में यही स्वजनों को भक्षण करना है।

मूल पाठ 14.15

क्वचिदासाद्य गृहं दाववत्प्रियार्थविधुरमसुखोदर्कं शोकाग्निना दह्यमानो भृशं निर्वेदमुपगच्छति ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: घर कभी वनाग्नि जैसा लगता है—प्रियजनों का वियोग और अपेक्षित सुख का अभाव शोक की आग बनते हैं। उसमें तपकर जीव गहरी निराशा पाता है।

मूल पाठ 14.16

क्वचित्कालविषमितराजकुलरक्षसापहृतप्रियतम- धनासुः प्रमृतक इव विगतजीवलक्षण आस्ते ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रतिकूल समय में अत्याचारी राजसत्ता जब प्रिय धन छीन लेती है, तब मनुष्य प्राण छिन जाने जैसा अनुभव करता और मृतवत् निश्चेष्ट हो जाता है।

मूल पाठ 14.17

कदाचिन्मनोरथोपगतपितृपितामहाद्यसत्सदिति स्वप्ननिर्वृतिलक्षणमनुभवति ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: कभी कल्पना या स्वप्न में पिता-पितामह आदि से मिलकर अस्थिर दृश्य को सच मानता और थोड़ी देर तृप्त होता है।

मूल पाठ 14.18

क्वचिद्गृहाश्रमकर्मचोदनातिभरगिरि- मारुरुक्षमाणो लोकव्यसनकर्षितमनाः कण्टकशर्कराक्षेत्रं प्रविशन्निव सीदति ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: गृहस्थ के भारी कर्तव्यों के पहाड़ पर चढ़ने की चेष्टा में, लोकव्यवहार के कष्टों से मन खिंचता है। उसे काँटों और कंकड़ों वाले क्षेत्र में जाने जैसी पीड़ा होती है।

मूल पाठ 14.19

क्वचिच्च दुःसहेन कायाभ्यन्तरवह्निना गृहीतसारः स्वकुटुम्बाय क्रुध्यति ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: कभी शरीर की असह्य भूखरूपी अग्नि उसकी शक्ति सोख लेती है और वह अपने ही परिवार पर क्रोध करता है।

मूल पाठ 14.20

स एव पुनर्निद्राजगरगृहीतोऽन्धे तमसि मग्नः शून्यारण्य इव शेते नान्यत्किञ्चन वेद शव इवापविद्धः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर नीन्दरूपी अजगर उसे पकड़ लेता है। गहरे अन्धकार में पड़ा वह निर्जन वन में फेंके शव जैसा रहता और कुछ नहीं जानता।

मूल पाठ 14.21

कदाचिद्भग्नमानदंष्ट्रो दुर्जनदन्दशूकैरलब्ध- निद्राक्षणो व्यथितहृदयेनानुक्षीयमाणविज्ञानो- ऽन्धकूपेऽन्धवत्पतति ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: दुष्टजन रूपी सर्प उसका मान तोड़ते और नींद हर लेते हैं। व्यथित हृदय तथा घटते विवेक से वह अन्धे की तरह अज्ञान के कुएँ में गिरता है।

मूल पाठ 14.22

कर्हि स्म चित्काममधुलवान् विचिन्वन् यदा परदारपरद्रव्याण्यवरुन्धानो राज्ञा स्वामिभिर्वा निहतः पतत्यपारे निरये ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: थोड़े विषयसुखरूपी मधु की चाह में परस्त्री या परधन पर अधिकार करता है। तब राजा या उसके स्वामी से दण्डित होकर घोर दुःख और पतन पाता है।

मूल पाठ 14.23

अथ च तस्मादुभयथापि हि कर्मास्मिन्नात्मनः संसारावपनमुदाहरन्ति ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसे कर्मों में अपने या दूसरे के लिए किया गया आसक्तिपूर्ण आचरण दोनों ही प्रकार से संसारबन्धन का बीज बन सकता है।

मूल पाठ 14.24

मुक्तस्ततो यदि बन्धाद्देवदत्त उपाच्छिनत्ति तस्मादपि विष्णुमित्र इत्यनवस्थितिः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक बन्धन से छूटा तो देवदत्त नाम का कोई व्यक्ति उसका धन ले जाता है; उससे बचा तो विष्णुमित्र छीन लेता है। इस तरह उसकी स्थिति अस्थिर बनी रहती है।

मूल पाठ 14.25

क्वचिच्च शीतवाताद्यनेकाधिदैविकभौतिका- त्मीयानां दशानां प्रतिनिवारणेऽकल्पो दुरन्तचिन्तया विषण्ण आस्ते ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: शीत, हवा तथा देविक, भौतिक और अपने शरीर-मन के अनेक कष्टों का निवारण न कर पाने पर वह अन्तहीन चिन्ता में उदास बैठा रहता है।

मूल पाठ 14.26

क्वचिन्मिथो व्यवहरन् यत्किञ्चिद्धनमन्येभ्यो वा काकिणिकामात्रमप्यपहरन् यत्किञ्चिद्वा विद्वेषमेति वित्तशाठ्यात् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: लेन-देन में छल करके किसी का थोड़ा-सा धन भी हड़पता है तो उसी से वैर उत्पन्न हो जाता है।

मूल पाठ 14.27

अध्वन्यमुष्मिन्निम उपसर्गास्तथा सुखदुःख- रागद्वेषभयाभिमानप्रमादोन्मादशोकमोहलोभ- मात्सर्येर्ष्यावमानक्षुत्पिपासाऽऽधिव्याधिजन्म- जरामरणादयः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस संसारपथ में सुख-दुःख, राग-द्वेष, भय, अभिमान, प्रमाद, उन्माद, शोक, मोह, लोभ, ईर्ष्या, अपमान, भूख-प्यास, मानसिक-शारीरिक रोग, जन्म, बुढ़ापा और मृत्यु जैसे अनेक उपद्रव हैं।

मूल पाठ 14.28

क्वापि देवमायया स्त्रिया भुजलतोपगूढः प्रस्कन्न- विवेकविज्ञानो यद्विहारगृहारम्भाकुलहृदय- स्तदाश्रयावसक्तसुतदुहितृकलत्रभाषितावलोक- विचेष्टितापहृतहृदय आत्मानमजितात्मापारेऽन्धे तमसि प्रहिणोति ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: कभी दाम्पत्य और परिवार की ममता में विवेक छूट जाता है। घर बसाने की चिन्ता, बच्चों और जीवनसाथी के बोल, दृष्टि तथा व्यवहार में मन बँधकर असंयमी जीव आत्महित भूलता और अज्ञान में डूब जाता है।

मूल पाठ 14.29

कदाचिदीश्वरस्य भगवतो विष्णोश्चक्रात्परमाण्वादि द्विपरार्धापवर्गकालोपलक्षणात्परिवर्तितेन वयसा रंहसा हरत आब्रह्मतृणस्तम्बादीनां भूतानामनिमिषतो मिषतां वित्रस्तहृदयस्तमेवेश्वरं कालचक्रनिजायुधं साक्षाद्भगवन्तं यज्ञपुरुषमनादृत्य पाखण्डदेवताः कङ्कगृध्रबकवटप्राया आर्यसमयपरिहृताः साङ्केत्येनाभिधत्ते ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूक्ष्मतम क्षण से ब्रह्मा की आयु तक फैला कालचक्र सभी की आयु हरता है। उससे भयभीत व्यक्ति कभी काल के स्वामी विष्णु की शरण लेने के बजाय छली आश्रयों और मनगढ़न्त रक्षकों पर भरोसा करता है; रूपक में वे कङ्क, गिद्ध और बगुले हैं।

मूल पाठ 14.30

यदा पाखण्डिभिरात्मवञ्चितैस्तैरुरुवञ्चितो ब्रह्मकुलं समावसंस्तेषां शीलमुपनयनादि श्रौतस्मार्तकर्मा- नुष्ठानेन भगवतो यज्ञपुरुषस्याराधनमेव तदरोचयन् शूद्रकुलं भजते निगमाचारेऽशुद्धितो यस्य मिथुनीभावः कुटुम्बभरणं यथा वानरजातेः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: छली उपदेशकों से ठगकर वह वेदज्ञों के पास आता है, पर संयम, संस्कार और भगवदाराधना का आचरण रुचता नहीं। फिर केवल भोग और परिवारपालन तक सीमित जीवन में लौट जाता है, जिसे रूपक में वानरचर्या कहा गया है।

मूल पाठ 14.31

तत्रापि निरवरोधः स्वैरेण विहरन्नतिकृपणबुद्धि- रन्योन्यमुखनिरीक्षणादिना ग्राम्यकर्मणैव विस्मृतकालावधिः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ भी स्वच्छन्द भोग और परस्पर आकर्षण में पड़ा संकीर्णबुद्धि व्यक्ति जीवन का सीमित समय भूल जाता है।

मूल पाठ 14.32

क्वचिद्द्रुमवदैहिकार्थेषु गृहेषु रंस्यन् यथा वानरः सुतदारवत्सलो व्यवायक्षणः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे बन्दर वृक्षों में रमते हैं, वैसे वह ऐहिक सुखों वाले घरों में रमना चाहता है। पत्नी-पुत्र की ममता और कामभोग की चाह उसका समय ले लेती है।

मूल पाठ 14.33

एवमध्वन्यवरुन्धानो मृत्युगजभयात्तमसि गिरिकन्दरप्राये ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसे पथ पर चलते हुए वह मृत्यु के हाथीरूपी भय से घिरता है, मानो अन्धेरी पर्वतगुफा के संकट में आ पड़ा हो।

मूल पाठ 14.34

क्वचिच्छीतवाताद्यनेकदैविकभौतिकात्मीयानां दुःखानां प्रतिनिवारणेऽकल्पो दुरन्तविषयविषण्ण आस्ते ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर कभी शीत, वायु और अन्य देविक, भौतिक तथा शारीरिक-मानसिक दुःखों का उपाय नहीं कर पाता और कठिन विषयचिन्ता से उदास रहता है।

मूल पाठ 14.35

क्वचिन्मिथो व्यवहरन् यत्किञ्चिद्धनमुपयाति वित्तशाठ्येन ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: कभी दूसरों के साथ व्यवहार करते हुए छल से कुछ धन पा लेता है, किन्तु इससे नई उलझनें बनती हैं।

मूल पाठ 14.36

क्वचित्क्षीणधनः शय्यासनाशनाद्युपभोगविहीनो यावदप्रतिलब्धमनोरथोपगतादानेऽवसितमति- स्ततस्ततोऽवमानादीनि जनादभिलभते ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: धन समाप्त होने पर सोने, बैठने और भोजन की सुविधाएँ छूटती हैं। अपनी इच्छा पूरी करने के लिए दूसरों से लेने का विचार करता है और जगह-जगह अपमान पाता है।

मूल पाठ 14.37

एवं वित्तव्यतिषङ्गविवृद्धवैरानुबन्धोऽपि पूर्ववासनया मिथ उद्वहत्यथापवहति ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: धनसम्बन्धों से वैर बढ़ने पर भी पुरानी वासना के कारण लोग आपस में विवाह करते और फिर सम्बन्ध तोड़ते रहते हैं।

मूल पाठ 14.38

एतस्मिन् संसाराध्वनि नानाक्लेशोपसर्गबाधित आपन्नविपन्नो यत्र यस्तमु ह वावेतरस्तत्र विसृज्य जातं जातमुपादाय शोचन्मुह्यन्बिभ्य- द्विवदन् क्रन्दन्संहृष्यन् गायन्नह्यमानः साधुवर्जितो नैवावर्ततेऽद्यापि यत आरब्ध एष नरलोकसार्थो यमध्वनः पारमुपदिशन्ति ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: संसार के व्यापारीदल में कोई संकटग्रस्त साथी मरता है तो दूसरे उसे छोड़कर नए आने वालों को अपना लेते हैं। शोक, मोह, भय, झगड़े, रोने, हर्ष और उत्सव में उलझा तथा सत्सङ्ग से रहित यह दल अपने आरम्भ से अब तक उस पार नहीं पहुँचा, जिसे ज्ञानी मुक्ति का मार्ग बताते हैं।

मूल पाठ 14.39

यदिदं योगानुशासनं न वा एतदवरुन्धते यन्न्यस्तदण्डा मुनय उपशमशीला उपरतात्मानः समवगच्छन्ति ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: हिंसा और दण्ड छोड़ चुके शान्त, संयत मुनि जिस योगानुशासन का अनुभव करते हैं, उसे यह विषयासक्त समूह नहीं पा पाता।

मूल पाठ 14.40

यदपि दिगिभजयिनो यज्विनो ये वै राजर्षयः किं तु परं मृधे शयीरन्नस्यामेव ममेयमिति कृतवैरानुबन्धायां विसृज्य स्वयमुपसंहृताः ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञ करने वाले दिग्विजयी राजर्षि भी पृथ्वी मेरी है मानकर वैर करते और युद्ध में प्राण खो देते हैं। जिस भूमि के लिए लड़ते हैं, उसे यहीं छोड़कर चले जाते हैं।

मूल पाठ 14.41

कर्मवल्लीमवलम्ब्य तत आपदः कथञ्चिन्नरकाद्विमुक्तः पुनरप्येवं संसाराध्वनि वर्तमानो नरलोकसार्थमुपयाति एवमुपरिगतोऽपि ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: कर्मरूपी लता पकड़कर किसी तरह विपत्ति या नीच अवस्था से निकलता जीव फिर मनुष्यदल में आ मिलता है। ऊपर उठने पर भी आसक्ति रहने से उसका संसारपथ फिर शुरू हो जाता है।

मूल पाठ 14.42

तस्येदमुपगायन्ति - आर्षभस्येह राजर्षेर्मनसापि महात्मनः । नानुवर्त्मार्हति नृपो मक्षिकेव गरुत्मतः ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: भरत की महिमा में कहा जाता है—ऋषभपुत्र महात्मा राजर्षि के मार्ग का सामान्य राजा मन से भी अनुसरण नहीं कर सकता, जैसे मक्खी गरुड़ की गति नहीं पा सकती।

मूल पाठ 14.43

यो दुस्त्यजान् दारसुतान् सुहृद्राज्यं हृदिस्पृशः । जहौ युवैव मलवदुत्तमश्लोकलालसः ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की लालसा से उन्होंने युवावस्था में ही पत्नी, पुत्र, मित्र और राज्य जैसे हृदय को बाँधने वाले, कठिनाई से छूटने वाले विषयों की ममता तुच्छ समझकर छोड़ दी।

मूल पाठ 14.44

यो दुस्त्यजान् क्षितिसुतस्वजनार्थदारान् प्रार्थ्यां श्रियं सुरवरैः सदयावलोकाम् । नैच्छन्नृपस्तदुचितं महतां मधुद्विट् सेवानुरक्तमनसामभवोऽपि फल्गुः ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी, सन्तान, स्वजन, धन, दाम्पत्य और देवताओं द्वारा चाही लक्ष्मी भी उन्होंने नहीं चाही। मधुसूदन की सेवा में रत महात्माओं के लिए यह उचित है; उनके सामने मोक्ष भी भक्ति से अलग आकर्षण नहीं रखता।

मूल पाठ 14.45

यज्ञाय धर्मपतये विधिनैपुणाय योगाय साङ्ख्यशिरसे प्रकृतीश्वराय । नारायणाय हरये नम इत्युदारं हास्यन् मृगत्वमपि यः समुदाजहार ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मृगदेह छोड़ते समय भी भरत ने उच्च स्वर से कहा—यज्ञस्वरूप, धर्म के स्वामी, विधिकर्म के प्रेरक, योगस्वरूप, सांख्य के परम आश्रय, प्रकृति के ईश्वर नारायण हरि को नमस्कार है।

मूल पाठ 14.46

य इदं भागवतसभाजितावदातगुणकर्मणो राजर्षेर्भरतस्यानुचरितं स्वस्त्ययनमायुष्यं धन्यं यशस्यं स्वर्ग्यापवर्ग्यं वानुश‍ृणो- त्याख्यास्यत्यभिनन्दति च सर्वा एवाशिष आत्मन आशास्ते न काञ्चन परत इति ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो भक्तों द्वारा सम्मानित भरत के पवित्र चरित्र को श्रद्धा से सुनता, सुनाता और सराहता है, वह अपने कल्याण का मार्ग पाता है। ग्रन्थ इसे मंगल, आयु, समृद्धि, यश, स्वर्ग और मुक्ति का साधक बताता है; ऐसा भक्त अन्य आश्रयों पर निर्भर कामना नहीं रखता।

॥ पंचम स्कन्ध • अध्याय 14 समाप्त ॥

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पंचम स्कन्ध • अध्याय 15

भरतवंश और राजर्षि गय का चरित्र

मूल पाठ 15.1

श्रीशुक उवाच । भरतस्यात्मजः सुमतिर्नामाभिहितो यमु ह वाव केचित्पाखण्डिन ऋषभपदवीमनुवर्तमानं चानार्या अवेदसमाम्नातां देवतां स्वमनीषया पापीयस्या कलौ कल्पयिष्यन्ति ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेव बोले—भरत के पुत्र का नाम सुमति था। ग्रन्थ भविष्यवर्णन में कहता है कि कलियुग में कुछ लोग ऋषभदेव के मार्ग के अनुयायी सुमति के सम्बन्ध में अपनी कल्पना से वेद में न कही देवता की धारणा बनाएँगे; यह ग्रन्थ का आन्तरिक धार्मिक मत है।

मूल पाठ 15.2

तस्माद्वृद्धसेनायां देवताजिन्नाम पुत्रोऽभवत् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: सुमति की पत्नी वृद्धसेना से देवताजित् नाम का पुत्र हुआ।

मूल पाठ 15.3

अथासुर्यां तत्तनयो देवद्युम्नस्ततो धेनुमत्यां सुतः परमेष्ठी तस्य सुवर्चलायां प्रतीह उपजातः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवताजित् की आसुरी से देवद्युम्न, देवद्युम्न की धेनुमती से परमेष्ठी और परमेष्ठी की सुवर्चला से प्रतीह उत्पन्न हुए।

मूल पाठ 15.4

य आत्मविद्यामाख्याय स्वयं संशुद्धो महापुरुषमनुसस्मार ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रतीह ने आत्मविद्या का उपदेश दिया और स्वयं शुद्ध होकर महापुरुष भगवान का निरन्तर स्मरण किया।

मूल पाठ 15.5

प्रतीहात्सुवर्चलायां प्रतिहर्त्रादयस्त्रय आसन्निज्या- कोविदाः सूनवः प्रतिहर्तुः स्तुत्यामजभूमाना- वजनिषाताम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रतीह की सुवर्चला से प्रतिहर्ता आदि यज्ञविद्या में निपुण तीन पुत्र हुए। प्रतिहर्ता की स्तुति से अज और भूमा उत्पन्न हुए।

मूल पाठ 15.6

भूम्न ऋषिकुल्यायामुद्गीथस्ततः प्रस्तावो देवकुल्यायां प्रस्तावान्नियुत्सायां हृदयज आसीद्विभुर्विभो रत्यां च पृथुषेणस्तस्मान्नक्त आकूत्यां जज्ञे नक्ताद्द्रुतिपुत्रो गयो राजर्षिप्रवर उदारश्रवा अजायत । साक्षाद्भगवतो विष्णोर्जगद्रिरक्षिषया गृहीतसत्त्वस्य कलात्मवत्त्वादि लक्षणेन महापुरुषतां प्राप्तः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: भूमा की ऋषिकुल्या से उद्गीथ, उद्गीथ की देवकुल्या से प्रस्ताव, प्रस्ताव की नियुत्सा से विभु, विभु की रति से पृथुषेण, पृथुषेण की आकूति से नक्त और नक्त की द्रुति से यशस्वी राजर्षि गय हुए। जगत की रक्षा के लिए सत्त्व धारण करने वाले विष्णु की कला से युक्त होकर वे महान पुरुष माने गए।

मूल पाठ 15.7

स वै स्वधर्मेण प्रजापालनपोषणप्रीणनोपलालना- नुशासनलक्षणेनेज्यादिना च भगवति महापुरुषे परावरे ब्रह्मणि सर्वात्मनार्पितपरमार्थलक्षणेन ब्रह्मविच्चरणानुसेवयाऽऽपादितभगवद्भक्तियोगेन चाभीक्ष्णशः परिभावितातिशुद्धमतिरुपरतानात्म्य आत्मनि स्वयमुपलभ्यमानब्रह्मात्मानुभवोऽपि निरभिमान एवावनिमजूगुपत् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: गय रक्षा, पोषण, स्नेह, शिक्षा और उचित शासन द्वारा प्रजा का पालन करते थे। यज्ञादि के फल भगवान को अर्पित और ब्रह्मज्ञों की सेवा करते हुए भक्ति से उनकी बुद्धि अत्यन्त शुद्ध हुई। ब्रह्मानुभव प्राप्त होने पर भी वे अभिमानरहित रहकर पृथ्वी की रक्षा करते रहे।

मूल पाठ 15.8

तस्येमां गाथां पाण्डवेय पुराविद उपगायन्ति ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे पाण्डुवंशज! प्राचीन इतिहास के ज्ञाता गय की प्रशंसा में यह गाथा गाते हैं।

मूल पाठ 15.9

गयं नृपः कः प्रतियाति कर्मभि- र्यज्वाभिमानी बहुविद्धर्मगोप्ता । समागतश्रीः सदसस्पतिः सतां सत्सेवकोऽन्यो भगवत्कलामृते ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की कला के अतिरिक्त कौन राजा यज्ञशील, निरभिमानी, ज्ञानी, धर्मरक्षक, समृद्ध, सज्जनों के सभापति और साधुसेवक गय के कार्यों की बराबरी कर सकता है?

मूल पाठ 15.10

यमभ्यषिञ्चन् परया मुदा सतीः सत्याशिषो दक्षकन्याः सरिद्भिः । यस्य प्रजानां दुदुहे धराशिषो निराशिषो गुणवत्सस्नुतोधाः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: कथा में श्रद्धा आदि दक्षकन्याओं द्वारा पवित्र नदीजल से उनके आनन्दपूर्ण अभिषेक का वर्णन है। वे निष्काम थे, फिर भी उनके गुणों से प्रसन्न पृथ्वी ने प्रजा की इच्छानुसार उपज और समृद्धि दी।

मूल पाठ 15.11

छन्दांस्यकामस्य च यस्य कामान् दुदूहुराजह्रुरथो बलिं नृपाः । प्रत्यञ्चिता युधि धर्मेण विप्रा यदाशिषां षष्ठमंशं परेत्य ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: निष्काम होने पर भी वैदिक अनुष्ठानों ने उन्हें फल दिए और दूसरे राजाओं ने कर अर्पित किया। यज्ञदक्षिणा आदि से सम्मानित वेदज्ञों के पुण्य का धर्मानुसार अंश भी प्रजापालक गय को मिला।

मूल पाठ 15.12

यस्याध्वरे भगवानध्वरात्मा मघोनि माद्यत्युरुसोमपीथे । श्रद्धा विशुद्धाचलभक्तियोग- समर्पितेज्याफलमाजहार ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके यज्ञ में इन्द्र सोमपान से प्रसन्न हुए और स्वयं यज्ञस्वरूप भगवान ने शुद्ध श्रद्धा तथा अचल भक्ति से अर्पित यज्ञफल स्वीकार किया।

मूल पाठ 15.13

यत्प्रीणनाद्बर्हिषि देवतिर्यङ्- मनुष्यवीरुत्तृणमाविरिञ्चात् । प्रीयेत सद्यः स ह विश्वजीवः प्रीतः स्वयं प्रीतिमगाद्गयस्य ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिनकी प्रसन्नता से ब्रह्मा से लेकर देव, मनुष्य, पशु, वनस्पति और घास तक सभी तृप्त होते हैं, वे विश्वात्मा भगवान गय के यज्ञ से स्वयं प्रसन्न हुए।

मूल पाठ 15.14

गयाद्गयन्त्यां चित्ररथः सुगतिरवरोधन इति त्रयः पुत्रा बभूवुश्चित्ररथादूर्णायां सम्राडजनिष्ट ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: गय की गयन्ती से चित्ररथ, सुगति और अवरोधन नाम के तीन पुत्र हुए। चित्ररथ की ऊर्णा से सम्राट् उत्पन्न हुए।

मूल पाठ 15.15

तत उत्कलायां मरीचिर्मरीचेर्बिन्दुमत्यां बिन्दुमा- नुदपद्यत तस्मात्सरघायां मधुर्नामाभवन्मधोः सुमनसि वीरव्रतस्ततो भोजायां मन्थुप्रमन्थू जज्ञाते मन्थोः सत्यायां भौवनस्ततो दूषणायां त्वष्टाजनिष्ट त्वष्टुर्विरोचनायां विरजो विरजस्य शतजित्प्रवरं पुत्रशतं कन्या च विषूच्यां किल जातम् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: सम्राट् की उत्कला से मरीचि, मरीचि की बिन्दुमती से बिन्दुमान्, बिन्दुमान् की सरघा से मधु, मधु की सुमना से वीरव्रत और वीरव्रत की भोजा से मन्थु तथा प्रमन्थु हुए। मन्थु की सत्या से भौवन, भौवन की दूषणा से त्वष्टा और त्वष्टा की विरोचना से विरज हुए। विरज की विषूची से शतजित् आदि सौ पुत्र और एक कन्या उत्पन्न हुई।

मूल पाठ 15.16

तत्रायं श्लोकः प्रैयव्रतं वंशमिमं विरजश्चरमोद्भवः । अकरोदत्यलं कीर्त्या विष्णुः सुरगणं यथा ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस विषय में कहा गया है—इस वंश के अन्त में उत्पन्न विरज ने अपनी कीर्ति से प्रियव्रत के वंश को विशेष शोभा दी, जैसे विष्णु देवसमुदाय को सुशोभित करते हैं।

॥ पंचम स्कन्ध • अध्याय 15 समाप्त ॥

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इस भाग का भक्ति-सन्देश

करुणा के साथ विवेक और साधना की सावधानी भी जरूरी है। देह, पद और धन का अभिमान आत्मस्वरूप को ढकता है। सत्सङ्ग, हरिकथा और सर्वभूतमैत्री से मन का बन्धन खुलता है और जीवन की कठिन राह पार होती है।

पाठाधार और संपादकीय जानकारी

मूल संस्कृत का आधार Sanskrit Documents का प्राचीन “श्रीमद्भागवतं—पञ्चमस्कन्धः” पाठ है। अध्याय 7–15 में क्रमशः 14, 31, 20, 25, 17, 16, 26, 46 और 16 क्रमाङ्कित गद्य-पद्य पाठ हैं; कुल 211। हिंदी भावार्थ स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है। अध्याय 13 का वनरूपक अध्याय 14 में स्वयं ग्रन्थ द्वारा समझाया गया है। मनुष्यबलि की घटना को क्रूर अधर्म बताया गया है और देवी निर्दोष की रक्षा करती हैं। अध्याय 9 का पति के पीछे देहत्याग का प्रसंग प्राचीन आख्यान है, अनुकरण का निर्देश नहीं। धार्मिक मतों की आलोचना ग्रन्थ के आन्तरिक दृष्टिकोण की है।

॥ पंचम स्कन्ध • भाग २ समाप्त ॥

॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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