श्रीमद्भागवत महापुराण पंचम स्कन्ध भाग 2 — अध्याय 7–15, जड़भरत रहूगण संवाद और संसारवन रूपक
श्रीमद्भागवत महापुराण
पंचम स्कन्ध • भाग २ • अध्याय ७–१५
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आसक्ति से आत्मस्मृति तक भरत की यात्रा
भरत का राज्यत्याग और भजन, हरिणशावक की आसक्ति से मृगजन्म तथा जड़भरत की छिपी आत्मनिष्ठा—यह कथा साधक को सावधानी सिखाती है। रहूगण से संवाद में देह और आत्मा का भेद, मन का संयम, सत्सङ्ग तथा हरिसेवा का महत्व स्पष्ट होता है। संसारवन का रूपक जीवन की उलझनों का अर्थ खोलता है।
इस भाग में अध्याय 7–15 के सभी 211 क्रमाङ्कित गद्य-पद्य पाठ और प्रत्येक का स्वतंत्र हिंदी भावार्थ है।
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पंचम स्कन्ध • अध्याय 7
भरत का राजधर्म और भगवदाराधना
मूल पाठ 7.1
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेव बोले—भगवान ऋषभदेव ने महाभागवत भरत को पृथ्वी की रक्षा का दायित्व दिया। पिता की आज्ञा मानते हुए उन्होंने विश्वरूप की पुत्री पञ्चजनी से विवाह किया।
मूल पाठ 7.2
सरल हिंदी भावार्थ: उनसे अपने समान गुणवान पाँच पुत्र उत्पन्न हुए—सुमति, राष्ट्रभृत्, सुदर्शन, आवरण और धूम्रकेतु; जैसे अहंकारतत्त्व से पाँच सूक्ष्म तन्मात्राएँ प्रकट होती हैं।
मूल पाठ 7.3
सरल हिंदी भावार्थ: इन्हीं भरत के समय से अजनाभ नाम का यह भूखण्ड भारत कहलाने लगा।
मूल पाठ 7.4
सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानी राजा भरत अपने पिता और पितामह की भाँति प्रजा से अत्यन्त स्नेह रखते थे। स्वयं धर्मपालन करते हुए वे अपने-अपने कर्तव्य में लगे लोगों की रक्षा करते थे।
मूल पाठ 7.5
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने श्रद्धापूर्वक अग्निहोत्र, दर्श, पूर्णमास, चातुर्मास्य और अन्य वैदिक यज्ञों के मूल तथा परिवर्तित विधानों से यज्ञस्वरूप भगवान की उपासना की।
मूल पाठ 7.6
सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञों के प्रत्येक कर्म और फल को वे परमब्रह्म वासुदेव को अर्पित समझते थे। मन्त्रों और देवताओं का अन्तिम आश्रय उन्हीं को जानते हुए आहुति पाने वाले देवताओं का ध्यान विराट पुरुष के अङ्गों के रूप में करते थे। इससे उनका अन्तःकरण निर्मल होता गया।
मूल पाठ 7.7
सरल हिंदी भावार्थ: विशुद्ध कर्म से उनका सत्त्व शुद्ध हुआ और हृदय में श्रीवत्स, कौस्तुभ, वनमाला, शंख तथा गदा से सुशोभित महापुरुष वासुदेव के प्रति प्रतिदिन बढ़ती हुई प्रगाढ़ भक्ति उत्पन्न हुई।
मूल पाठ 7.8
सरल हिंदी भावार्थ: कथा में अत्यन्त दीर्घ राजकाल के बाद निवृत्ति का समय आने पर भरत ने पैतृक राज्य और सम्पत्ति पुत्रों में बाँटी। समृद्ध राजगृह छोड़कर स्वयं पुलह आश्रम चले गए।
मूल पाठ 7.9
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ भगवान हरि अपने भक्तों के वात्सल्यवश आज भी उनकी भावना के अनुकूल रूप में सान्निध्य देते हैं—ऐसी उस क्षेत्र की महिमा कही गई है।
मूल पाठ 7.10
सरल हिंदी भावार्थ: उस आश्रमभूमि को चक्रनदी अर्थात् गण्डकी पवित्र करती है। उसके जल में दोनों ओर चक्रचिह्नों से युक्त शालग्राम शिलाएँ मिलती हैं।
मूल पाठ 7.11
सरल हिंदी भावार्थ: पुलह आश्रम के उपवन में अकेले रहकर भरत फूल, पत्ते, तुलसी, जल, कन्द, मूल और फल से भगवान की पूजा करते थे। विषयों की चाह छोड़कर शान्त हुए और परम तृप्ति प्राप्त की।
मूल पाठ 7.12
सरल हिंदी भावार्थ: निरन्तर सेवा से उनका हृदय प्रेम में पिघलता, रोमाञ्च होता और प्रेमाश्रुओं से आँखें भर जातीं। भगवान के अरुण चरणों के ध्यान में वे इतने गहरे आनन्द में डूब जाते कि सामने चल रही पूजा की क्रिया का भी ध्यान नहीं रहता।
मूल पाठ 7.13
सरल हिंदी भावार्थ: भगवद्व्रती भरत मृगचर्म धारण करते थे। बार-बार स्नान से भीगी कपिश जटाओं सहित वे उगते सूर्य के मण्डल में हिरण्मय पुरुष की उपासना करते हुए यह प्रार्थना कहते थे।
मूल पाठ 7.14
सरल हिंदी भावार्थ: हम उस परम प्रकाश का आश्रय लेते हैं जो रजोगुण से परे है। उसने संकल्प से जगत की रचना की, अपने दिव्य सामर्थ्य से उसमें प्रवेश किया और जीवों में स्थित होकर उन्हें प्रकाशित तथा प्रेरित करता है।
॥ पंचम स्कन्ध • अध्याय 7 समाप्त ॥
पंचम स्कन्ध • अध्याय 8
हरिणशावक की आसक्ति और मृगजन्म
मूल पाठ 8.1
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेव बोले—एक दिन भरत महानदी में स्नान और आवश्यक नित्यकर्म करके किनारे बैठे तथा प्रणव का जप करने लगे।
मूल पाठ 8.2
सरल हिंदी भावार्थ: उसी समय एक प्यासी हरिणी अकेली नदी के पास जल पीने आई।
मूल पाठ 8.3
सरल हिंदी भावार्थ: वह जल पी ही रही थी कि पास में सिंह की अत्यन्त भयङ्कर गर्जना सुनाई दी।
मूल पाठ 8.4
सरल हिंदी भावार्थ: स्वभाव से भीरु हरिणी चारों ओर घबराकर देखने लगी। प्यास पूरी न होने पर भी सिंह के भय से उसका मन व्याकुल हुआ और वह अचानक छलाँग लगा बैठी।
मूल पाठ 8.5
सरल हिंदी भावार्थ: वह गर्भवती थी। छलाँग और तीव्र भय के कारण उसका गर्भ छूटकर नदी के प्रवाह में गिर गया।
मूल पाठ 8.6
सरल हिंदी भावार्थ: प्रसव, उछलने के श्रम और भय से पीड़ित हरिणी अपने झुण्ड से बिछुड़कर एक गुफा में गिरी और मर गई।
मूल पाठ 8.7
सरल हिंदी भावार्थ: राजर्षि भरत ने प्रवाह में बहते असहाय शावक को देखा। उसकी माँ मर चुकी थी; इसलिए अपने सम्बन्धी की तरह दया करके उसे बचाया और आश्रम ले आए।
मूल पाठ 8.8
सरल हिंदी भावार्थ: दिन-प्रतिदिन शावक के पालन, रक्षा, दुलार और चिन्ता में भरत का ममत्व बढ़ने लगा। धीरे-धीरे उनके संयम, नियम और भगवान की सेवा के अभ्यास छूटते गए।
मूल पाठ 8.9
सरल हिंदी भावार्थ: वे सोचते—काल ने इस अनाथ शावक को माँ, झुण्ड और स्वजनों से बिछुड़ा दिया है। यह मुझे ही माता-पिता और सब कुछ मानता है। शरणागत की उपेक्षा दोष है, इसलिए मुझे बिना खिन्न हुए इसका पालन और स्नेह करना चाहिए।
मूल पाठ 8.10
सरल हिंदी भावार्थ: वे विचार करते—शान्त और दयालु सज्जन असहाय प्राणी की रक्षा के लिए अपने बड़े हितों की भी उपेक्षा कर देते हैं।
मूल पाठ 8.11
सरल हिंदी भावार्थ: इस सोच से उनका हृदय शावक के स्नेह में बँध गया। बैठना, सोना, घूमना, स्नान और भोजन—सब उसके साथ करने लगे।
मूल पाठ 8.12
सरल हिंदी भावार्थ: कुश, फूल, समिधा, पत्ते, फल, मूल और जल लेने वन जाते समय वे भेड़िए आदि का भय मानकर शावक को भी साथ ले जाते थे।
मूल पाठ 8.13
सरल हिंदी भावार्थ: रास्ते में उसे कहीं उलझा या भोला-भाला विचरता देखकर करुणा और अत्यधिक स्नेह से कन्धे पर उठा लेते। गोद और छाती से लगाकर दुलारने में उन्हें बड़ा सुख मिलता था।
मूल पाठ 8.14
सरल हिंदी भावार्थ: पूजा करते समय भी वे बार-बार उठकर शावक को देखने लगते। उसके दिख जाने पर मन स्थिर होता और वे कहते—बेटा! तुम्हारा सब ओर कल्याण हो।
मूल पाठ 8.15
सरल हिंदी भावार्थ: कभी शावक न दिखता तो भरत धन खोए दीन मनुष्य की तरह व्याकुल हो उठते। विरह और चिन्ता में डूबे वे विलाप करते थे।
मूल पाठ 8.16
सरल हिंदी भावार्थ: क्या वह अनाथ शावक मुझ जैसे असावधान और कठोर हृदय वाले के दोषों को न मानकर लौट आएगा? उसने तो सज्जन की तरह मुझ पर पूरा विश्वास किया था।
मूल पाठ 8.17
सरल हिंदी भावार्थ: क्या मैं फिर उसे भगवान की रक्षा में सुरक्षित, इसी आश्रम के उपवन में हरी घास चरते देख सकूँगा?
मूल पाठ 8.18
सरल हिंदी भावार्थ: कहीं किसी भेड़िए, कुत्ते, झुण्ड में घूमने वाले अथवा अकेले हिंसक पशु ने उसे खा तो नहीं लिया?
मूल पाठ 8.19
सरल हिंदी भावार्थ: संसार का कल्याण करने वाला, वेदस्वरूप सूर्य अस्त होने जा रहा है; फिर भी हरिणी की मेरे पास छोड़ी धरोहर अब तक नहीं लौटी।
मूल पाठ 8.20
सरल हिंदी भावार्थ: क्या वह हरिणशावक लौटकर अपनी सुन्दर बालक्रीड़ाओं से मेरे जैसे अभागे को सुख देगा और अपने स्वजनों की उदासी दूर करेगा?
मूल पाठ 8.21
सरल हिंदी भावार्थ: खेल में जब मैं आँख बन्द करके समाधि का बहाना करता, तब वह स्नेह से पास आता और अपने कोमल सींग के सिरे से मुझे टटोलता था।
मूल पाठ 8.22
सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञ-सामग्री पर मुँह लगाने और कुश दूषित करने पर मैं डाँटता तो वह डरकर खेल छोड़ देता और ऋषिकुमार की तरह चुपचाप संयत होकर बैठ जाता था।
मूल पाठ 8.23
सरल हिंदी भावार्थ: यह पृथ्वी कितनी तपस्विनी है, जिस पर उस सुन्दर शावक के खुरों की पङ्क्तियाँ हैं! ये निशान खोए धन का मार्ग बताने की तरह मुझे उसका पता देते हैं और इस भूमि को देवयजन के योग्य पवित्र बना रहे हैं।
मूल पाठ 8.24
सरल हिंदी भावार्थ: क्या दीनों पर दया करने वाले चन्द्रमा ने सिंह के भय से माँ खो बैठे और आश्रम से बिछुड़े इस शावक को करुणावश अपने पास रख लिया है?
मूल पाठ 8.25
सरल हिंदी भावार्थ: या चन्द्रमा मुझे ही उस शावक का विरह सहते देखकर अपनी शीतल अमृतमयी किरणों से मेरे हृदय की दाह शान्त कर रहा है?
मूल पाठ 8.26
सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार असंगत कल्पनाओं और शावक की आसक्ति ने भरत को योग तथा भगवदाराधना से विचलित कर दिया। जिन्होंने कठिन राजबन्धन त्यागे थे, वे अब इस ममत्व में अपना कल्याण भूल गए। तभी अटल काल उनके सामने आ पहुँचा, जैसे सर्प चूहे के बिल में प्रवेश कर जाता है।
मूल पाठ 8.27
सरल हिंदी भावार्थ: मृत्यु के समय भी वे पास खड़े शोकमग्न शावक को देखते और उसी में मन लगाए रहे। देह छोड़ने पर उन्हें मृगशरीर मिला; किन्तु पिछले भगवदभजन के प्रभाव से पूर्वजन्म की स्मृति नहीं मिटी।
मूल पाठ 8.28
सरल हिंदी भावार्थ: मृगयोनि में भी भगवान की पूर्व आराधना के प्रभाव से उन्हें अपने इस जन्म का कारण स्मरण रहा। वे बहुत पश्चात्ताप करके सोचने लगे।
मूल पाठ 8.29
सरल हिंदी भावार्थ: हाय! मैं आत्मज्ञानियों के मार्ग से च्युत हो गया। सब आसक्ति छोड़कर पवित्र वन में आया था और दिन-रात वासुदेव का श्रवण, मनन, कीर्तन, पूजा तथा स्मरण करता था। फिर भी मेरी असावधानी से भगवान में स्थित मन शावक की ओर बह गया।
मूल पाठ 8.30
सरल हिंदी भावार्थ: इस गहरे वैराग्य से उन्होंने मृगी माता को छोड़ा और कालञ्जर से पुनः शालग्राम क्षेत्र में पुलस्त्य-पुलह के पवित्र आश्रम पहुँचे, जो शान्त मुनियों को प्रिय था।
मूल पाठ 8.31
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ वे सङ्ग से बहुत सावधान होकर अकेले रहते, सूखे पत्ते और घास खाते तथा मृगजन्म के समाप्त होने की प्रतीक्षा करते रहे। अन्ततः तीर्थजल से भीगा वह मृगशरीर छोड़ दिया।
॥ पंचम स्कन्ध • अध्याय 8 समाप्त ॥
पंचम स्कन्ध • अध्याय 9
जड़भरत का जन्म और देवी की रक्षा
मूल पाठ 9.1
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेव बोले—अङ्गिरा गोत्र के एक श्रेष्ठ ब्राह्मण शान्ति, संयम, तप, वेदाध्ययन, त्याग, सन्तोष, सहनशीलता, विनम्रता, विद्या और आत्मानन्द से सम्पन्न थे। पहली पत्नी से उनके समान गुणवान नौ पुत्र थे और छोटी पत्नी से एक पुत्र तथा एक पुत्री हुए।
मूल पाठ 9.2
सरल हिंदी भावार्थ: छोटी पत्नी का वही पुत्र मृगदेह छोड़ चुके महाभागवत राजर्षि भरत थे, जिन्होंने अपने अंतिम जन्म के लिए ब्राह्मण शरीर पाया था।
मूल पाठ 9.3
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की कृपा से उन्हें पूर्वजन्मों की स्मृति थी। फिर सम्बन्धों की आसक्ति से बाधा न हो, इसलिए वे भीतर भगवान के चरणों का चिन्तन करते हुए बाहर से उन्मत्त, जड़, अन्धे या बहरे जैसे व्यवहार करते थे।
मूल पाठ 9.4
सरल हिंदी भावार्थ: पिता पुत्रस्नेह से उनके सभी संस्कार विधिपूर्वक करते रहे। उपनयन के बाद शौच, आचमन और नित्यकर्म भी सिखाए, यद्यपि भरत में इन बाहरी शिक्षाओं के प्रति रुचि नहीं दिखती थी; पिता समझते थे कि पुत्र को शिक्षित करना उनका कर्तव्य है।
मूल पाठ 9.5
सरल हिंदी भावार्थ: भरत पिता के सामने भी जानबूझकर असंगत व्यवहार करते थे। पिता ने वसन्त और ग्रीष्म के महीनों तक प्रणव और व्याहृतियों सहित त्रिपदा गायत्री सिखाई, फिर भी वे उसका ठीक पाठ करते दिखाई नहीं दिए।
मूल पाठ 9.6
सरल हिंदी भावार्थ: पुत्र के प्रति गहरे अनुराग से पिता शौच, अध्ययन, व्रत, नियम, गुरुसेवा और अग्निसेवा सिखाते रहे। अपनी इच्छा पूरी होने से पहले ही घर में रहते उनका देहान्त हो गया; सजग काल ने उन्हें उठा लिया।
मूल पाठ 9.7
सरल हिंदी भावार्थ: छोटी पत्नी ने अपने जुड़वाँ बच्चों को बड़ी पत्नी के संरक्षण में सौंपा और कथानुसार पति के पीछे देहत्याग करके पतिलोक गई। यह प्राचीन आख्यान का प्रसंग है।
मूल पाठ 9.8
सरल हिंदी भावार्थ: पिता के बाद भाइयों ने भरत की वास्तविक आध्यात्मिक स्थिति नहीं समझी। उनकी समझ कर्मकाण्ड तक सीमित थी; उन्हें जड़बुद्धि मानकर शिक्षा देने का आग्रह छोड़ दिया।
मूल पाठ 9.9
सरल हिंदी भावार्थ: अज्ञानी लोग उन्हें पागल, जड़, बहरे और गूँगे कहते। वे उसी के अनुरूप बोलते या दूसरों की इच्छा से काम कर देते। मजदूरी, माँगने या अपने-आप जो थोड़ा-बहुत अच्छा-बुरा भोजन मिलता, उसे केवल शरीरनिर्वाह के लिए खाते। आत्मानन्द में स्थित होने से उन्हें सुख-दुःख और देह का अभिमान नहीं था।
मूल पाठ 9.10
सरल हिंदी भावार्थ: वे बलवान और सुगठित थे, फिर भी शीत, गर्मी, हवा और वर्षा में बैल की तरह खुले रहते थे। भूमि पर सोने और स्नान-सज्जा न करने से देह धूल से ढकी थी। मैला वस्त्र और जनेऊ देखकर अज्ञानी उनकी अवमानना करते थे; उनका ब्रह्मतेज धूल से ढके रत्न की तरह छिपा था।
मूल पाठ 9.11
सरल हिंदी भावार्थ: भाइयों ने उन्हें खेत का काम दिया। वे ऊँचा-नीचा और कम-अधिक समतल करने का विशेष ध्यान नहीं रखते थे। मजदूरी में मिले चावल के टुकड़े, खली, भूसी, अधपके दाने या जले-चिपके अन्न को भी अमृत जैसा स्वीकार कर लेते थे।
मूल पाठ 9.12
सरल हिंदी भावार्थ: एक समय डाकुओं के एक सरदार ने सन्तान पाने की इच्छा से भद्रकाली के नाम पर मनुष्य की बलि देने का अधार्मिक आयोजन किया।
मूल पाठ 9.13
सरल हिंदी भावार्थ: जिस मनुष्य को उन्होंने पकड़ रखा था वह भाग निकला। सेवक आधी रात अन्धकार में उसे खोजते हुए खेतों की रक्षा में बैठे उस ब्राह्मणपुत्र भरत तक आ पहुँचे।
मूल पाठ 9.14
सरल हिंदी भावार्थ: उनका सुगठित शरीर देखकर वे अपने दुष्कर्म की पूर्ति का साधन मिल गया समझे। प्रसन्न होकर उन्हें रस्सी से बाँधा और चण्डिका के मन्दिर ले गए।
मूल पाठ 9.15
सरल हिंदी भावार्थ: डाकुओं ने उन्हें अपनी विधि से नहलाया, नए वस्त्र, आभूषण, लेप, माला और तिलक लगाए तथा भोजन कराया। फिर गीत, स्तुति और वाद्यों के शोर में धूप-दीप, फूल, फल आदि सजाकर उन्हें देवी के सामने बैठा दिया।
मूल पाठ 9.16
सरल हिंदी भावार्थ: तब सरदार का पुरोहित रक्त से देवी की पूजा करने की दुष्ट इच्छा से अभिमन्त्रित और अत्यन्त तीखी तलवार उठाने लगा।
मूल पाठ 9.17
सरल हिंदी भावार्थ: वे रज-तम और धनमद से अन्धे हिंसक लोग सर्वभूतहितैषी, निर्वैर ब्रह्मज्ञानी ऋषिपुत्र को मारने जा रहे थे। ऐसा क्रूर दुष्कर्म देखकर भद्रकाली की मूर्ति में ब्रह्मतेज प्रज्वलित हुआ और देवी उसमें से प्रकट हो गईं।
मूल पाठ 9.18
सरल हिंदी भावार्थ: कथा में देवी का प्रचण्ड रूप वर्णित है। क्रोधपूर्ण नेत्र, भयानक दाँत और अट्टहास के साथ उन्होंने उसी तलवार से हिंसक डाकुओं का संहार किया। अपने गणों सहित उनका रक्तपान और कटे सिरों से क्रीड़ा करना इस उग्र पौराणिक दृश्य का अङ्ग है।
मूल पाठ 9.19
सरल हिंदी भावार्थ: महात्मा के विरुद्ध किया गया घोर अपराध इसी प्रकार पूरा का पूरा अपराधी पर ही लौट पड़ता है।
मूल पाठ 9.20
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेव बोले—परीक्षित! देहाभिमान की गाँठ खोल चुके, निर्वैर और सबके हितैषी परमहंस भक्त के लिए वध का संकट आने पर भी न घबराना आश्चर्य नहीं। वे भगवान के निर्भय चरणों में आश्रित हैं और उनकी सजग रक्षा पर विश्वास रखते हैं।
॥ पंचम स्कन्ध • अध्याय 9 समाप्त ॥
पंचम स्कन्ध • अध्याय 10
जड़भरत और राजा रहूगण का मिलन
मूल पाठ 10.1
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेव बोले—सिन्धु-सौवीर के राजा रहूगण यात्रा कर रहे थे। इक्षुमती के किनारे पालकी के लिए कहार खोजते सेवकों ने बलवान युवा भरत को देखा और योग्य-अयोग्य का विचार किए बिना उन्हें बलपूर्वक पालकी ढोने में लगा दिया।
मूल पाठ 10.2
सरल हिंदी भावार्थ: भरत आगे की भूमि देखते हुए सावधानी से पैर रखते थे, इसलिए दूसरे कहारों के साथ उनकी चाल नहीं मिली। पालकी डगमगाने पर रहूगण ने कहा—ठीक चलो! मेरी सवारी असमान क्यों चल रही है?
मूल पाठ 10.3
सरल हिंदी भावार्थ: राजा की डाँट सुनकर कहार दण्ड की आशंका से घबरा गए और अपना पक्ष बताने लगे।
मूल पाठ 10.4
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—महाराज! हम असावधान नहीं हैं और आपकी आज्ञा से ठीक चल रहे हैं। यह नया लगाया गया व्यक्ति तेज नहीं चलता; इसके साथ हम चाल नहीं मिला पा रहे।
मूल पाठ 10.5
सरल हिंदी भावार्थ: रहूगण ने माना कि एक व्यक्ति का दोष सब साथियों पर पड़ सकता है। विद्वानों की सेवा कर चुके होने पर भी स्वभाव और रजोगुण से क्रुद्ध राजा उस भस्म से ढकी अग्नि जैसे छिपे ब्रह्मतेज वाले भरत से बोल उठे।
मूल पाठ 10.6
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने व्यंग्य किया—भाई! तुम तो बहुत थक गए होगे; इतनी दूर अकेले ढोया है! तुम्हारा शरीर भी दुबला-कमजोर है और बुढ़ापा आ गया है; बाकी लोग तो तुम्हारे साथी ही नहीं! देह को मैं-मेरा न मानने वाले ब्रह्मज्ञानी भरत यह कटाक्ष सुनकर भी चुपचाप पालकी ढोते रहे।
मूल पाठ 10.7
सरल हिंदी भावार्थ: पालकी फिर डगमगाई तो राजा क्रुद्ध हुए—अरे! क्या जीवित ही मर गए हो? मेरी आज्ञा का उल्लङ्घन करते हो! जैसे यम दण्ड देता है, वैसे ही मैं तुम्हारी असावधानी का उपचार करूँगा, तब तुम ठीक हो जाओगे।
मूल पाठ 10.8
सरल हिंदी भावार्थ: राजस-तामस मद से भरे राजा स्वयं को ज्ञानी मानते हुए अनुचित बातें कह रहे थे। उनका योगियों की स्थिति का ज्ञान अधूरा था। सबके हितैषी, अहंकाररहित भरत ने मानो मुस्कराते हुए उन्हें उत्तर दिया।
मूल पाठ 10.9
सरल हिंदी भावार्थ: भरत बोले—वीर! यदि भार मेरा होता और मैं चलने वाला शरीर ही होता, तो तुम्हारी बात सही होती। किन्तु देह के समूह को मोटा कहना और आत्मा को मोटा समझना एक बात नहीं; ज्ञानी ऐसा नहीं कहते।
मूल पाठ 10.10
सरल हिंदी भावार्थ: मोटापन, दुबलापन, रोग, मानसिक व्यथा, भूख, प्यास, भय, कलह, इच्छा, बुढ़ापा, नींद, रति, क्रोध, अहंकार, मद और शोक शरीराभिमानी की अवस्थाएँ हैं। शुद्ध आत्मस्वरूप में ये मेरे धर्म नहीं हैं।
मूल पाठ 10.11
सरल हिंदी भावार्थ: राजन्! जिन विकारी पदार्थों का आरम्भ और अन्त है, उनके लिए जीवित और मृत होने की बात कही जाती है। स्वामी और सेवक का सम्बन्ध भी स्थायी होता, तभी तुम्हारी आज्ञा का निरपेक्ष अधिकार माना जा सकता था।
मूल पाठ 10.12
सरल हिंदी भावार्थ: मैं स्वामी और तुम सेवक—इस भेद का आधार सांसारिक व्यवहार के अतिरिक्त क्या है? परम तत्त्व में कौन शासक और कौन शासित है? फिर भी व्यवहार में बताओ, मैं तुम्हारा क्या काम करूँ?
मूल पाठ 10.13
सरल हिंदी भावार्थ: यदि मैं अपने स्वरूप में स्थित हूँ और बाहर से पागल या जड़ दिखता हूँ, तो दण्ड से मेरा क्या उपचार होगा? और यदि सचमुच जड़ होता, तब भी शिक्षा देना पिसे को फिर पीसने जैसा व्यर्थ होता।
मूल पाठ 10.14
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेव बोले—शान्त मुनि ने राजा की बातों का इस प्रकार तत्त्वपूर्ण उत्तर दिया। देहाभिमान से रहित होकर प्रारब्ध का फल समाप्त करने के लिए वे फिर राजपालकी ढोने लगे।
मूल पाठ 10.15
सरल हिंदी भावार्थ: रहूगण में तत्त्वजिज्ञासा और श्रद्धा थी। हृदय की गाँठ खोलने वाले और योगशास्त्र से सम्मत वचन सुनकर वे शीघ्र पालकी से उतरे। राजमद छोड़कर भरत के चरणों में सिर रखा और क्षमा माँगते हुए बोले।
मूल पाठ 10.16
सरल हिंदी भावार्थ: आप कौन हैं, जो अपनी वास्तविक महिमा छिपाकर विचरते हैं? जनेऊ धारण किए किस अवधूत परम्परा के हैं? किसके पुत्र और कहाँ के निवासी हैं? कहीं हमारे कल्याण के लिए आए महान आत्मज्ञानी ही तो नहीं?
मूल पाठ 10.17
सरल हिंदी भावार्थ: मुझे इन्द्र के वज्र, शिव के त्रिशूल, यमदण्ड अथवा अग्नि, सूर्य, चन्द्र, वायु और कुबेर के अस्त्रों से उतना भय नहीं जितना ब्रह्मज्ञानी का अपमान करने से है।
मूल पाठ 10.18
सरल हिंदी भावार्थ: साधो! आप आसक्तिरहित होकर जड़ जैसे दिखाई देते हैं, पर आपका ज्ञान और सामर्थ्य अगाध है। आपके योगयुक्त वचनों का आशय हमारा मन भी पूरी तरह नहीं समझ पा रहा; कृपया स्पष्ट कीजिए।
मूल पाठ 10.19
सरल हिंदी भावार्थ: मैं आत्मतत्त्व के ज्ञाता मुनियों के परम गुरु योगेश्वर के पास यह पूछने जा रहा हूँ कि संसार में सुरक्षित आश्रय क्या है। वे ज्ञानरूप में अवतीर्ण साक्षात् हरि हैं।
मूल पाठ 10.20
सरल हिंदी भावार्थ: क्या आप वही हैं, जो लोक का निरीक्षण करने के लिए अपने लक्षण छिपाकर घूमते हैं? गृहासक्ति से अन्धी बुद्धि वाला व्यक्ति योगेश्वरों की वास्तविक गति कैसे पहचान सकता है?
मूल पाठ 10.21
सरल हिंदी भावार्थ: आपने देह और आत्मा का भेद बताया, फिर भी काम करने, भार उठाने और चलने पर थकान प्रत्यक्ष दिखती है। केवल व्यवहार के परिणामों को सर्वथा असत्य कहने से पानी लाने जैसे उपयोग भी नहीं समझाए जा सकते; इसलिए मेरा संशय बना है।
मूल पाठ 10.22
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे अग्नि से पात्र, पात्र से जल और जल से चावल गर्म होकर पकते हैं, वैसे देह, इन्द्रिय, प्राण और मन के सम्बन्ध से पुरुष को भी संसार के अनुभव होते होंगे—राजा ने अपनी शङ्का इस उपमा से रखी।
मूल पाठ 10.23
सरल हिंदी भावार्थ: राजा प्रजा का शिक्षक और रक्षक है। उचित कर्तव्य निभाते सेवक को सुधारना सर्वथा व्यर्थ नहीं। अपने धर्म को अच्युत की आराधना मानकर कर्म करने वाला पापसमूह छोड़ सकता है।
मूल पाठ 10.24
सरल हिंदी भावार्थ: किन्तु मैंने राजाभिमान के मद में आप जैसे श्रेष्ठ साधु को तुच्छ समझा। हे दुःखियों के बन्धु! मुझ पर मैत्रीपूर्ण दृष्टि कीजिए, जिससे इस अपराध के पाप से उबर सकूँ।
मूल पाठ 10.25
सरल हिंदी भावार्थ: आप विश्वहितैषी भगवान के सखा, समदर्शी और अभिमानरहित हैं; इसलिए आपमें विकार नहीं होता। फिर भी मेरे जैसे का अपने किए महात्मा-अपमान से नाश हो सकता है; ऐसा अपराध शक्तिशाली से शक्तिशाली को भी नहीं छोड़ता।
॥ पंचम स्कन्ध • अध्याय 10 समाप्त ॥
पंचम स्कन्ध • अध्याय 11
मन का बन्धन और अन्तर्यामी का बोध
मूल पाठ 11.1
सरल हिंदी भावार्थ: भरत बोले—तुम तत्त्व में निपुण हुए बिना विद्वानों जैसी बातें कहते हो और श्रेष्ठ ज्ञानी भी नहीं हो। ज्ञानी लोग व्यवहार की बात को परम तत्त्व के विवेचन के समान नहीं मानते।
मूल पाठ 11.2
सरल हिंदी भावार्थ: राजन्! विशाल गृहस्थ-कर्मकाण्ड और वैदिक फलवचनों के विस्तार में सामान्यतः शुद्ध तत्त्वज्ञान स्पष्ट नहीं दिखाई देता, क्योंकि उनकी प्रवृत्ति कामनापूर्ति की ओर हो सकती है।
मूल पाठ 11.3
सरल हिंदी भावार्थ: जब तक व्यक्ति स्वयं गृहासक्ति के सुख को स्वप्नवत् त्याज्य नहीं समझता, तब तक बड़े-बड़े उपदेश भी उसे सीधे आत्मतत्त्व ग्रहण नहीं करा सकते।
मूल पाठ 11.4
सरल हिंदी भावार्थ: जब तक मन सत्त्व, रज या तम के वश में है, तब तक विविध इच्छाओं और वृत्तियों से वह मनुष्य को शुभ अथवा अशुभ कर्मों में अनियन्त्रित रूप से लगाता रहता है।
मूल पाठ 11.5
सरल हिंदी भावार्थ: वासना और विषयों से रँगा हुआ मन गुणों के प्रवाह में बदलता है। विविध नाम-रूप और सूक्ष्म-स्थूल उपाधियाँ धारण कर वह जीव के भीतरी-बाहरी अनुभवों का विस्तार करता है।
मूल पाठ 11.6
सरल हिंदी भावार्थ: माया से बने अन्तःकरण को अपनाकर जीव कालानुसार तीव्र सुख, दुःख और अन्य फल अनुभव करता है। यही मन संसारचक्र में उसे बाँधे रखने का प्रमुख साधन बनता है।
मूल पाठ 11.7
सरल हिंदी भावार्थ: स्थूल और सूक्ष्म व्यवहार का यह विस्तार क्षेत्रज्ञ आत्मा की साक्षी में प्रकट होता है। इसलिए मन जीव की गुणबद्ध या गुणातीत तथा ऊँची या नीची अवस्था का सूचक कहा जाता है।
मूल पाठ 11.8
सरल हिंदी भावार्थ: विषयगुणों में आसक्त मन दुःख का कारण है और उनसे मुक्त मन कल्याण का। जैसे तेल-बत्ती के आश्रय से दीपक धुएँ वाली लौ देता है और उनके समाप्त होने पर शान्त हो जाता है, वैसे मन गुण-कर्म के आश्रय से वृत्तियाँ बनाता है और उनसे उपरत होकर तत्त्व में शान्त होता है।
मूल पाठ 11.9
सरल हिंदी भावार्थ: मन के ग्यारह कार्यक्षेत्र बताए गए हैं—पाँच कर्मेन्द्रियों की प्रवृत्तियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियों के बोध और अहंकार। इनके आधार विषय, कर्म और शरीर हैं।
मूल पाठ 11.10
सरल हिंदी भावार्थ: गन्ध, रूप, स्पर्श, रस और शब्द पाँच ज्ञानविषय हैं; त्याग, सम्भोग, गमन, बोलना और हाथों की क्रिया पाँच कर्मविषय। शरीरादि को मेरा मानना ग्यारहवीं वृत्ति है; कुछ मतों में देह को मैं मानने का आधार अलग गिनकर बारहवाँ कहा गया है।
मूल पाठ 11.11
सरल हिंदी भावार्थ: पदार्थ, स्वभाव, संस्कार, कर्म और काल के कारण मन के ये विकार सैकड़ों, हजारों और करोड़ों रूप लेते हैं। वे अपने-आप या एक-दूसरे मात्र से स्वतन्त्र नहीं होते; क्षेत्रज्ञ की साक्षी और चेतना के आश्रय में ही उनका अनुभव होता है।
मूल पाठ 11.12
सरल हिंदी भावार्थ: शुद्ध क्षेत्रज्ञ इन मनोवृत्तियों को देखता है। माया से निर्मित जीवव्यवहार में ये कभी प्रकट और कभी अप्रकट होती हैं, किन्तु साक्षी स्वयं अशुद्ध कर्तृत्व से अलग है।
मूल पाठ 11.13
सरल हिंदी भावार्थ: परम क्षेत्रज्ञ सनातन, अजन्मा, स्वयम्प्रकाश आत्मा हैं। वे ही परमेश्वर नारायण, भगवान वासुदेव हैं, जो अपनी माया से जीवों में स्थित प्रतीत होते हैं।
मूल पाठ 11.14
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे वायु चर-अचर प्राणियों में प्राणरूप होकर प्रवेश करती और उन्हें चलाती है, वैसे परम भगवान वासुदेव समस्त जगत में अन्तर्यामी आत्मा के रूप में उपस्थित हैं।
मूल पाठ 11.15
सरल हिंदी भावार्थ: राजन्! जब तक देहधारी ज्ञान के प्रकाश से माया दूर करके आसक्ति और मन-पाँच इन्द्रियों के छह शत्रुओं को नहीं जीतता तथा आत्मतत्त्व नहीं जानता, तब तक संसार में भटकता रहता है।
मूल पाठ 11.16
सरल हिंदी भावार्थ: मन जीव की उपाधि बनकर संसारताप बोता है। वही शोक, मोह, रोग, राग, लोभ, वैर और ममता पैदा करता है; उसकी यह स्थिति पहचानना आवश्यक है।
मूल पाठ 11.17
सरल हिंदी भावार्थ: उपेक्षा से प्रबल हुए इस आत्महित चुराने वाले शत्रु मन को सावधानी से जीतो। गुरु और हरि के चरणों की उपासना को अस्त्र बनाकर इसके मिथ्या प्रपञ्च को दूर करो।
॥ पंचम स्कन्ध • अध्याय 11 समाप्त ॥
पंचम स्कन्ध • अध्याय 12
सत्सङ्ग, आत्मज्ञान और भरत का पूर्वजन्म
मूल पाठ 12.1
सरल हिंदी भावार्थ: रहूगण बोले—आपको बार-बार नमस्कार! आपने लोकहित के लिए देह धारण की है, पर आत्मस्वरूप से देहाभिमान तुच्छ कर दिया है। सामान्य ब्राह्मण और अवधूत के चिह्नों में अपना नित्य आत्मानुभव छिपाने वाले आपको प्रणाम है।
मूल पाठ 12.2
सरल हिंदी भावार्थ: ज्वरपीड़ित को औषधि और गर्मी से तपे को शीतल जल जैसा सुख देता है, वैसे आपके अमृतमय वचन मुझे देहाभिमान के सर्पविष से मुक्त करने वाली औषधि हैं।
मूल पाठ 12.3
सरल हिंदी भावार्थ: अपने अन्य संशय बाद में पूछूँगा। अभी आपकी अध्यात्मयोग से भरी बात को सरल रूप में समझा दीजिए; मेरा मन उसे जानने को उत्सुक है।
मूल पाठ 12.4
सरल हिंदी भावार्थ: योगेश्वर! आपने कहा कि प्रत्यक्ष दिखने वाला क्रियाफल और व्यवहार परम तत्त्व के निर्णय का सीधा प्रमाण नहीं है। इसी बात में मेरा मन उलझ रहा है।
मूल पाठ 12.5
सरल हिंदी भावार्थ: भरत बोले—पृथ्वी पर चलता यह शरीर पृथ्वी के ही तत्त्वों से बना है। उसके ऊपर पाँव, टखने, पिण्डलियाँ, घुटने, जाँघें, कमर, वक्ष, गर्दन और कन्धे हैं—यह सब भौतिक संरचना है।
मूल पाठ 12.6
सरल हिंदी भावार्थ: कन्धों पर लकड़ी की पालकी है और उसमें बैठा शरीर सौवीरराज कहलाता है। उसी में तुम यह दृढ़ अहंकार धारण किए हो कि मैं सिन्धुदेश का राजा हूँ।
मूल पाठ 12.7
सरल हिंदी भावार्थ: बेगार से इन पहले ही कष्ट पाए दीन लोगों को दबाकर तुम करुणा नहीं कर रहे। फिर प्रजा का रक्षक होने का घमण्ड करना ज्ञानी जनों की सभा में शोभा नहीं देता।
मूल पाठ 12.8
सरल हिंदी भावार्थ: चर-अचर के शरीरों की उत्पत्ति और स्थिति पृथ्वी आदि तत्त्वों में ही देखी जाती है। इन नामों के अतिरिक्त किसी अलग व्यवहारिक सत्ता का दावा हो तो उसका वास्तविक स्वरूप स्पष्ट करो।
मूल पाठ 12.9
सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी शब्द से जिस समूह का बोध होता है, उसे परमाणुओं में बाँटा जाता है। फिर भी उन सूक्ष्म भेदों और उनके समूहों की कल्पना मन के द्वारा होती है; आत्मा उनसे परे है।
मूल पाठ 12.10
सरल हिंदी भावार्थ: दुबला-मोटा, छोटा-बड़ा, कार्य-कारण, जीव-जड़ तथा पदार्थ, स्वभाव, संस्कार, काल और कर्म के नाम से दिखने वाला समस्त भेद माया द्वारा रचित व्यवहारिक द्वैत समझो।
मूल पाठ 12.11
सरल हिंदी भावार्थ: परम सत्य विशुद्ध, एक, अभेद और भीतर-बाहर के भेद से रहित ज्ञानस्वरूप ब्रह्म है। वह अन्तरात्मा, परम शान्त और भगवान नाम से प्रसिद्ध है; ज्ञानी उसी को वासुदेव कहते हैं।
मूल पाठ 12.12
सरल हिंदी भावार्थ: रहूगण! महात्माओं के चरणों की कृपा और सेवा के बिना यह बोध केवल तप, यज्ञ, दान, गृहत्याग, वेदाध्ययन अथवा जल, अग्नि और सूर्य की उपासना से प्राप्त नहीं होता।
मूल पाठ 12.13
सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ भगवान के गुणों की कथा होती है, वहाँ विषयभरी बातें छूटती हैं। ऐसे सत्सङ्ग का प्रतिदिन सेवन करने से मुक्तिकामी की बुद्धि वासुदेव में दृढ़ और निर्मल हो जाती है।
मूल पाठ 12.14
सरल हिंदी भावार्थ: मैं पहले भरत नाम का राजा था। दृश्य और शास्त्रश्रुत भोगों की आसक्ति छोड़कर भगवान की पूजा में लगा था, पर मृग की आसक्ति से साधना बाधित हुई और मृगजन्म मिला।
मूल पाठ 12.15
सरल हिंदी भावार्थ: हे वीर! कृष्ण की आराधना से मिली पूर्वस्मृति मृगदेह में भी नहीं गई। इसलिए अब मैं आसक्ति से सावधान होकर लोगों की सङ्गति से अलग और अपनी वास्तविक स्थिति छिपाए विचरता हूँ।
मूल पाठ 12.16
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए अनासक्ति और सत्सङ्ग से मिले ज्ञानरूपी खड्ग से मोह काटो। हरि की लीला कहना-सुनना आत्मस्मृति जगाता है; इसी से मनुष्य संसारपथ के उस पार पहुँचता है।
॥ पंचम स्कन्ध • अध्याय 12 समाप्त ॥
पंचम स्कन्ध • अध्याय 13
भवाटवी का रूपक और रहूगण का बोध
मूल पाठ 13.1
सरल हिंदी भावार्थ: भरत बोले—माया से कठिन संसारपथ पर पड़ा जीव शुभ-अशुभ गुणजन्य कर्म करता है। धन और विषयों के लिए भटकता व्यापारीदल जैसा वह भववन में चलता है, किन्तु स्थायी शान्ति नहीं पाता।
मूल पाठ 13.2
सरल हिंदी भावार्थ: इस वन में छह लुटेरे दुर्बुद्धि नायक वाले व्यापारीदल को लूटते हैं। सियार और भेड़िए भी असावधान व्यापारी का धन ऐसे ले जाते हैं जैसे भेड़ को खींच ले जाएँ।
मूल पाठ 13.3
सरल हिंदी भावार्थ: घनी लताओं, घास और झाड़ियों में उसे डाँस-मच्छर सताते हैं। कहीं वह आकाश में कल्पित नगर देखता है और कहीं चमकती आग जैसी भ्रामक वस्तु की ओर खिंचता है।
मूल पाठ 13.4
सरल हिंदी भावार्थ: घर, जल, धन और अपने अस्तित्व का सुख खोजते वह वन में इधर-उधर दौड़ता है। कभी आँधी की धूल से उसकी आँखें ढक जाती हैं और दिशा भूल जाता है।
मूल पाठ 13.5
सरल हिंदी भावार्थ: अदृश्य झींगुरों की तीखी ध्वनि और उल्लुओं के शब्द उसे व्यथित करते हैं। भूखा होकर निष्फल वृक्षों का आश्रय लेता और कभी मृगतृष्णा के जल की ओर भागता है।
मूल पाठ 13.6
सरल हिंदी भावार्थ: कभी सूखी नदियों तक पहुँचता, कुछ न पाकर आपस में झगड़ता है। कभी दावानल से तपता और कभी प्राणतुल्य धन हर लेने वालों से पीड़ित होकर निराश होता है।
मूल पाठ 13.7
सरल हिंदी भावार्थ: बलवानों से धन छिनने पर वह शोक और मोह में डूब जाता है। कभी कल्पित गन्धर्वनगर में पहुँचकर थोड़ी देर के लिए सुखी होने का अनुभव करता है।
मूल पाठ 13.8
सरल हिंदी भावार्थ: काँटों और कंकड़ों से पैर घायल होते हैं; पहाड़ चढ़ने की इच्छा में हताश बैठ जाता है। भीतर की अग्नि से तपता गृहस्थ अपने ही परिवार पर क्रोध करता है।
मूल पाठ 13.9
सरल हिंदी भावार्थ: कभी अजगर उसे निगल लेता है और वह कुछ नहीं जानता। कभी विषैले सर्पों से पीड़ित होकर अन्धेरे कुएँ में पड़े अन्धे की तरह निस्सहाय हो जाता है।
मूल पाठ 13.10
सरल हिंदी भावार्थ: थोड़ा मधुर रस पाने जाता है तो मधुमक्खियाँ सताती और अपमानित करती हैं। बड़ी कठिनाई से कुछ मिलता भी है तो दूसरे बलपूर्वक छीन लेते हैं।
मूल पाठ 13.11
सरल हिंदी भावार्थ: कभी शीत, धूप, हवा और वर्षा से बचाव नहीं कर पाता। लेन-देन में थोड़े धन के लिए भी छल करता और दूसरों का वैर कमाता है।
मूल पाठ 13.12
सरल हिंदी भावार्थ: धन घट जाने पर बिस्तर, बैठने का स्थान, आश्रय और मनोरंजन छूट जाते हैं। दूसरों से माँगने पर इच्छा पूरी नहीं होती; पराई वस्तु पर दृष्टि रखने से अपमान मिलता है।
मूल पाठ 13.13
सरल हिंदी भावार्थ: धनसम्बन्धी उलझनों से वैर बढ़ता है, फिर भी लोग परस्पर विवाहसम्बन्ध बनाते हैं। इस पथ में धन की कठिनाई और अनेक संकटों के बीच जीव कभी सम्पन्न, कभी विपन्न होता रहता है।
मूल पाठ 13.14
सरल हिंदी भावार्थ: दल मृत साथियों को पीछे छोड़कर नए जन्म लेने वालों को साथ लेता और चलता रहता है। संसारपथ का पार कराने वाले योग को साधारण भटकाव से कोई नहीं पाता।
मूल पाठ 13.15
सरल हिंदी भावार्थ: दिग्विजयी राजा भी यह पृथ्वी मेरी है कहकर वैर बाँधते और रणभूमि में मर जाते हैं। वे उस पद तक नहीं पहुँचते, जहाँ दण्ड और वैर छोड़ने वाला पहुँचता है।
मूल पाठ 13.16
सरल हिंदी भावार्थ: कभी वह लता की भुजाओं का सहारा लेकर उससे जुड़े पक्षियों के अस्पष्ट बोल सुनने की इच्छा करता है। मृत्यु के चक्र से डरकर कभी बगुले, कङ्क और गिद्ध जैसे छली सहायकों से मित्रता करता है।
मूल पाठ 13.17
सरल हिंदी भावार्थ: उनसे ठगा जाकर हंसों के समुदाय में आता है, किन्तु उनका शील नहीं रुचता तो बन्दरों में मिल जाता है। वहाँ इन्द्रियभोग और परस्पर आकर्षण में जीवन की सीमा भूल जाता है।
मूल पाठ 13.18
सरल हिंदी भावार्थ: वृक्षों पर रमते बन्दर की तरह पत्नी-पुत्र की ममता और कामासक्ति में बँधता है। कभी असावधानी से पर्वत की खाई में गिरकर हाथी के भय से लता पकड़कर लटक जाता है।
मूल पाठ 13.19
सरल हिंदी भावार्थ: किसी तरह संकट से छूटकर वह फिर उसी व्यापारीदल में मिल जाता है। माया के इस पथ में लगा जीव अब भी भटकता और अपने वास्तविक हित को नहीं समझता।
मूल पाठ 13.20
सरल हिंदी भावार्थ: रहूगण! तुम दण्ड और हिंसा छोड़ो, सभी प्राणियों से मैत्री करो और मन को आसक्ति से बचाओ। हरिसेवा से तीखे किए ज्ञानखड्ग को लेकर इस संसारपथ के पार पहुँचो।
मूल पाठ 13.21
सरल हिंदी भावार्थ: रहूगण बोले—मनुष्यजन्म सभी जन्मों में श्रेष्ठ है, क्योंकि इसमें भगवान के यश में मन लगाए आप जैसे महात्माओं का सङ्ग मिलता है। जहाँ ऐसा सङ्ग नहीं, उन ऊँचे जन्मों से भी क्या लाभ?
मूल पाठ 13.22
सरल हिंदी भावार्थ: आपके चरणों की कृपा से पाप मिटने और निर्मल भक्ति मिलने में आश्चर्य नहीं। आपके क्षणभर के सङ्ग से ही मेरा कुतर्कजन्य अविवेक दूर हो गया।
मूल पाठ 13.23
सरल हिंदी भावार्थ: बड़े, बालक, युवा और बाहरी चिह्न छिपाए विचरने वाले सभी ब्रह्मज्ञानी अवधूतों को नमस्कार! वे राजाओं के लिए भी कल्याण का कारण हों।
मूल पाठ 13.24
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेव बोले—ब्रह्मर्षिपुत्र भरत ने करुणापूर्वक रहूगण को आत्मतत्त्व समझाया। राजा ने उनके चरणों में प्रणाम किया। पूर्ण समुद्र की तरह शान्त इन्द्रियों और मन वाले भरत फिर पृथ्वी पर विचरने लगे।
मूल पाठ 13.25
सरल हिंदी भावार्थ: सज्जन के उपदेश से परमात्मतत्त्व जानकर रहूगण ने अज्ञान से आरोपित देह को आत्मा मानने की बुद्धि त्याग दी। भगवान के आश्रित के आश्रय का भी ऐसा महान प्रभाव है।
मूल पाठ 13.26
सरल हिंदी भावार्थ: परीक्षित ने पूछा—आपने जीव के संसारपथ को रूपक में बताया है। बुद्धिमान इसका आशय समझ सकते हैं, पर सामान्य व्यक्ति के लिए कठिन है। कृपया उपमा और उसके अर्थ को मिलाकर स्पष्ट समझाइए।
॥ पंचम स्कन्ध • अध्याय 13 समाप्त ॥
पंचम स्कन्ध • अध्याय 14
संसारवन के रूपक का विस्तार
मूल पाठ 14.1
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेव बोले—शरीर को आत्मा मानने वाला जीव गुणजन्य शुभ-अशुभ कर्मों से अनेक देह पाता और सम्बन्धों में जुड़ता-बिछुड़ता है। मन सहित छह इन्द्रियाँ उसके अनुभव का द्वार हैं। धन के पीछे लगे व्यापारी की तरह वह विष्णु की माया के कठिन संसारवन में भटकता है। अनेक निष्फल प्रयत्नों के बाद भी वह हरि और गुरु के चरणों का अनुसरण नहीं करता, जो उसके ताप शान्त कर सकता है।
मूल पाठ 14.2
सरल हिंदी भावार्थ: छह लुटेरे मन और पाँच इन्द्रियाँ हैं। कठिन श्रम से पाया धन भगवान की आराधनारूपी धर्म में लग सकता था, पर असंयमी जीव उसे देखने, छूने, सुनने, चखने, सूँघने और विषयसंकल्पों में गँवा देता है, जैसे अयोग्य नायक का व्यापारीदल लुट जाता है।
मूल पाठ 14.3
सरल हिंदी भावार्थ: परिवार के प्रति अन्धी आसक्ति में पत्नी-पुत्र आदि के लिए निरन्तर होता व्यय रूपक में भेड़िए और सियारों द्वारा धनहरण कहा गया है। आशय ममता के बन्धन का है, वास्तविक सम्बन्धियों को पशु मानना नहीं।
मूल पाठ 14.4
सरल हिंदी भावार्थ: जिस खेत के बीज जले नहीं, उसमें बार-बार खेती करने पर भी घास-झाड़ियाँ उगती हैं। वैसे ही भीतर की कामनाएँ बनी रहें तो गृहासक्ति के कर्मक्षेत्र में नए कर्मों के बीज निरन्तर पैदा होते हैं।
मूल पाठ 14.5
सरल हिंदी भावार्थ: हानि पहुँचाने वाले लोग और अन्य विघ्न डाँस-मच्छर, पक्षी, चोर और चूहों जैसे धन को घटाते हैं। अज्ञान, कामना और कर्म से रँगा मन इस अस्थिर मनुष्यलोक को गन्धर्वनगर की तरह स्थायी मान लेता है।
मूल पाठ 14.6
सरल हिंदी भावार्थ: भोजन, पेय और कामभोग का लोभी कभी मृगतृष्णा के जल जैसे क्षणिक विषयों के पीछे दौड़ता है।
मूल पाठ 14.7
सरल हिंदी भावार्थ: कभी सोने के रंग और गुण से मोहित होकर उसे पाने दौड़ता है। वह दोषों का आश्रय बन सकता है; उसकी भ्रामक चमक के पीछे दौड़ना आग चाहकर जलती उल्का को उपयोगी आश्रय समझने जैसा है।
मूल पाठ 14.8
सरल हिंदी भावार्थ: कभी घर, पानी, धन और जीवननिर्वाह की अनेक वस्तुओं के प्रति तीव्र लगाव उसे संसारवन में इधर-उधर दौड़ाता है।
मूल पाठ 14.9
सरल हिंदी भावार्थ: कामासक्ति आँधी की तरह विवेक को ढक देती है। रजोगुण के धूलभरे अन्धकार में पड़ा व्यक्ति मर्यादा और सब ओर उपस्थित साक्षी देवताओं का भी ध्यान नहीं रखता।
मूल पाठ 14.10
सरल हिंदी भावार्थ: विषयों की असारता एक बार जान लेने पर भी उन्हीं का चिन्तन उसकी स्मृति हर लेता है। फिर वही व्यक्ति मृगतृष्णा जैसे भोगों की ओर दौड़ने लगता है।
मूल पाठ 14.11
सरल हिंदी भावार्थ: शत्रु या राजकर्मचारियों के सामने अथवा पीछे से कहे कठोर अपमानजनक वचन उल्लू और झींगुर की ध्वनि जैसे उसके कान और हृदय को दुखाते हैं।
मूल पाठ 14.12
सरल हिंदी भावार्थ: पुण्य का सहारा चुकने पर वह ऐसे निष्फल धनिकों का आश्रय लेता है जो न अपना आध्यात्मिक हित करते हैं, न दूसरों का। यह विषैले वृक्ष, लता या दूषित कुएँ से राहत चाहने जैसा है।
मूल पाठ 14.13
सरल हिंदी भावार्थ: बुरी सङ्गति से बुद्धि ठगी जाती है और वह लोक-परलोक दोनों में दुःख देने वाले असत्य मार्ग पर जाता है, जैसे पानी की आशा में सूखे प्रवाह में उतर पड़े।
मूल पाठ 14.14
सरल हिंदी भावार्थ: जब दूसरों से हड़पकर अपना निर्वाह नहीं चला पाता, तब वह पिता-पुत्र अथवा निकट सम्बन्धियों के हिस्से तक खा जाता है; रूपक में यही स्वजनों को भक्षण करना है।
मूल पाठ 14.15
सरल हिंदी भावार्थ: घर कभी वनाग्नि जैसा लगता है—प्रियजनों का वियोग और अपेक्षित सुख का अभाव शोक की आग बनते हैं। उसमें तपकर जीव गहरी निराशा पाता है।
मूल पाठ 14.16
सरल हिंदी भावार्थ: प्रतिकूल समय में अत्याचारी राजसत्ता जब प्रिय धन छीन लेती है, तब मनुष्य प्राण छिन जाने जैसा अनुभव करता और मृतवत् निश्चेष्ट हो जाता है।
मूल पाठ 14.17
सरल हिंदी भावार्थ: कभी कल्पना या स्वप्न में पिता-पितामह आदि से मिलकर अस्थिर दृश्य को सच मानता और थोड़ी देर तृप्त होता है।
मूल पाठ 14.18
सरल हिंदी भावार्थ: गृहस्थ के भारी कर्तव्यों के पहाड़ पर चढ़ने की चेष्टा में, लोकव्यवहार के कष्टों से मन खिंचता है। उसे काँटों और कंकड़ों वाले क्षेत्र में जाने जैसी पीड़ा होती है।
मूल पाठ 14.19
सरल हिंदी भावार्थ: कभी शरीर की असह्य भूखरूपी अग्नि उसकी शक्ति सोख लेती है और वह अपने ही परिवार पर क्रोध करता है।
मूल पाठ 14.20
सरल हिंदी भावार्थ: फिर नीन्दरूपी अजगर उसे पकड़ लेता है। गहरे अन्धकार में पड़ा वह निर्जन वन में फेंके शव जैसा रहता और कुछ नहीं जानता।
मूल पाठ 14.21
सरल हिंदी भावार्थ: दुष्टजन रूपी सर्प उसका मान तोड़ते और नींद हर लेते हैं। व्यथित हृदय तथा घटते विवेक से वह अन्धे की तरह अज्ञान के कुएँ में गिरता है।
मूल पाठ 14.22
सरल हिंदी भावार्थ: थोड़े विषयसुखरूपी मधु की चाह में परस्त्री या परधन पर अधिकार करता है। तब राजा या उसके स्वामी से दण्डित होकर घोर दुःख और पतन पाता है।
मूल पाठ 14.23
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसे कर्मों में अपने या दूसरे के लिए किया गया आसक्तिपूर्ण आचरण दोनों ही प्रकार से संसारबन्धन का बीज बन सकता है।
मूल पाठ 14.24
सरल हिंदी भावार्थ: एक बन्धन से छूटा तो देवदत्त नाम का कोई व्यक्ति उसका धन ले जाता है; उससे बचा तो विष्णुमित्र छीन लेता है। इस तरह उसकी स्थिति अस्थिर बनी रहती है।
मूल पाठ 14.25
सरल हिंदी भावार्थ: शीत, हवा तथा देविक, भौतिक और अपने शरीर-मन के अनेक कष्टों का निवारण न कर पाने पर वह अन्तहीन चिन्ता में उदास बैठा रहता है।
मूल पाठ 14.26
सरल हिंदी भावार्थ: लेन-देन में छल करके किसी का थोड़ा-सा धन भी हड़पता है तो उसी से वैर उत्पन्न हो जाता है।
मूल पाठ 14.27
सरल हिंदी भावार्थ: इस संसारपथ में सुख-दुःख, राग-द्वेष, भय, अभिमान, प्रमाद, उन्माद, शोक, मोह, लोभ, ईर्ष्या, अपमान, भूख-प्यास, मानसिक-शारीरिक रोग, जन्म, बुढ़ापा और मृत्यु जैसे अनेक उपद्रव हैं।
मूल पाठ 14.28
सरल हिंदी भावार्थ: कभी दाम्पत्य और परिवार की ममता में विवेक छूट जाता है। घर बसाने की चिन्ता, बच्चों और जीवनसाथी के बोल, दृष्टि तथा व्यवहार में मन बँधकर असंयमी जीव आत्महित भूलता और अज्ञान में डूब जाता है।
मूल पाठ 14.29
सरल हिंदी भावार्थ: सूक्ष्मतम क्षण से ब्रह्मा की आयु तक फैला कालचक्र सभी की आयु हरता है। उससे भयभीत व्यक्ति कभी काल के स्वामी विष्णु की शरण लेने के बजाय छली आश्रयों और मनगढ़न्त रक्षकों पर भरोसा करता है; रूपक में वे कङ्क, गिद्ध और बगुले हैं।
मूल पाठ 14.30
सरल हिंदी भावार्थ: छली उपदेशकों से ठगकर वह वेदज्ञों के पास आता है, पर संयम, संस्कार और भगवदाराधना का आचरण रुचता नहीं। फिर केवल भोग और परिवारपालन तक सीमित जीवन में लौट जाता है, जिसे रूपक में वानरचर्या कहा गया है।
मूल पाठ 14.31
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ भी स्वच्छन्द भोग और परस्पर आकर्षण में पड़ा संकीर्णबुद्धि व्यक्ति जीवन का सीमित समय भूल जाता है।
मूल पाठ 14.32
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे बन्दर वृक्षों में रमते हैं, वैसे वह ऐहिक सुखों वाले घरों में रमना चाहता है। पत्नी-पुत्र की ममता और कामभोग की चाह उसका समय ले लेती है।
मूल पाठ 14.33
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसे पथ पर चलते हुए वह मृत्यु के हाथीरूपी भय से घिरता है, मानो अन्धेरी पर्वतगुफा के संकट में आ पड़ा हो।
मूल पाठ 14.34
सरल हिंदी भावार्थ: फिर कभी शीत, वायु और अन्य देविक, भौतिक तथा शारीरिक-मानसिक दुःखों का उपाय नहीं कर पाता और कठिन विषयचिन्ता से उदास रहता है।
मूल पाठ 14.35
सरल हिंदी भावार्थ: कभी दूसरों के साथ व्यवहार करते हुए छल से कुछ धन पा लेता है, किन्तु इससे नई उलझनें बनती हैं।
मूल पाठ 14.36
सरल हिंदी भावार्थ: धन समाप्त होने पर सोने, बैठने और भोजन की सुविधाएँ छूटती हैं। अपनी इच्छा पूरी करने के लिए दूसरों से लेने का विचार करता है और जगह-जगह अपमान पाता है।
मूल पाठ 14.37
सरल हिंदी भावार्थ: धनसम्बन्धों से वैर बढ़ने पर भी पुरानी वासना के कारण लोग आपस में विवाह करते और फिर सम्बन्ध तोड़ते रहते हैं।
मूल पाठ 14.38
सरल हिंदी भावार्थ: संसार के व्यापारीदल में कोई संकटग्रस्त साथी मरता है तो दूसरे उसे छोड़कर नए आने वालों को अपना लेते हैं। शोक, मोह, भय, झगड़े, रोने, हर्ष और उत्सव में उलझा तथा सत्सङ्ग से रहित यह दल अपने आरम्भ से अब तक उस पार नहीं पहुँचा, जिसे ज्ञानी मुक्ति का मार्ग बताते हैं।
मूल पाठ 14.39
सरल हिंदी भावार्थ: हिंसा और दण्ड छोड़ चुके शान्त, संयत मुनि जिस योगानुशासन का अनुभव करते हैं, उसे यह विषयासक्त समूह नहीं पा पाता।
मूल पाठ 14.40
सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञ करने वाले दिग्विजयी राजर्षि भी पृथ्वी मेरी है मानकर वैर करते और युद्ध में प्राण खो देते हैं। जिस भूमि के लिए लड़ते हैं, उसे यहीं छोड़कर चले जाते हैं।
मूल पाठ 14.41
सरल हिंदी भावार्थ: कर्मरूपी लता पकड़कर किसी तरह विपत्ति या नीच अवस्था से निकलता जीव फिर मनुष्यदल में आ मिलता है। ऊपर उठने पर भी आसक्ति रहने से उसका संसारपथ फिर शुरू हो जाता है।
मूल पाठ 14.42
सरल हिंदी भावार्थ: भरत की महिमा में कहा जाता है—ऋषभपुत्र महात्मा राजर्षि के मार्ग का सामान्य राजा मन से भी अनुसरण नहीं कर सकता, जैसे मक्खी गरुड़ की गति नहीं पा सकती।
मूल पाठ 14.43
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की लालसा से उन्होंने युवावस्था में ही पत्नी, पुत्र, मित्र और राज्य जैसे हृदय को बाँधने वाले, कठिनाई से छूटने वाले विषयों की ममता तुच्छ समझकर छोड़ दी।
मूल पाठ 14.44
सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी, सन्तान, स्वजन, धन, दाम्पत्य और देवताओं द्वारा चाही लक्ष्मी भी उन्होंने नहीं चाही। मधुसूदन की सेवा में रत महात्माओं के लिए यह उचित है; उनके सामने मोक्ष भी भक्ति से अलग आकर्षण नहीं रखता।
मूल पाठ 14.45
सरल हिंदी भावार्थ: मृगदेह छोड़ते समय भी भरत ने उच्च स्वर से कहा—यज्ञस्वरूप, धर्म के स्वामी, विधिकर्म के प्रेरक, योगस्वरूप, सांख्य के परम आश्रय, प्रकृति के ईश्वर नारायण हरि को नमस्कार है।
मूल पाठ 14.46
सरल हिंदी भावार्थ: जो भक्तों द्वारा सम्मानित भरत के पवित्र चरित्र को श्रद्धा से सुनता, सुनाता और सराहता है, वह अपने कल्याण का मार्ग पाता है। ग्रन्थ इसे मंगल, आयु, समृद्धि, यश, स्वर्ग और मुक्ति का साधक बताता है; ऐसा भक्त अन्य आश्रयों पर निर्भर कामना नहीं रखता।
॥ पंचम स्कन्ध • अध्याय 14 समाप्त ॥
पंचम स्कन्ध • अध्याय 15
भरतवंश और राजर्षि गय का चरित्र
मूल पाठ 15.1
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेव बोले—भरत के पुत्र का नाम सुमति था। ग्रन्थ भविष्यवर्णन में कहता है कि कलियुग में कुछ लोग ऋषभदेव के मार्ग के अनुयायी सुमति के सम्बन्ध में अपनी कल्पना से वेद में न कही देवता की धारणा बनाएँगे; यह ग्रन्थ का आन्तरिक धार्मिक मत है।
मूल पाठ 15.2
सरल हिंदी भावार्थ: सुमति की पत्नी वृद्धसेना से देवताजित् नाम का पुत्र हुआ।
मूल पाठ 15.3
सरल हिंदी भावार्थ: देवताजित् की आसुरी से देवद्युम्न, देवद्युम्न की धेनुमती से परमेष्ठी और परमेष्ठी की सुवर्चला से प्रतीह उत्पन्न हुए।
मूल पाठ 15.4
सरल हिंदी भावार्थ: प्रतीह ने आत्मविद्या का उपदेश दिया और स्वयं शुद्ध होकर महापुरुष भगवान का निरन्तर स्मरण किया।
मूल पाठ 15.5
सरल हिंदी भावार्थ: प्रतीह की सुवर्चला से प्रतिहर्ता आदि यज्ञविद्या में निपुण तीन पुत्र हुए। प्रतिहर्ता की स्तुति से अज और भूमा उत्पन्न हुए।
मूल पाठ 15.6
सरल हिंदी भावार्थ: भूमा की ऋषिकुल्या से उद्गीथ, उद्गीथ की देवकुल्या से प्रस्ताव, प्रस्ताव की नियुत्सा से विभु, विभु की रति से पृथुषेण, पृथुषेण की आकूति से नक्त और नक्त की द्रुति से यशस्वी राजर्षि गय हुए। जगत की रक्षा के लिए सत्त्व धारण करने वाले विष्णु की कला से युक्त होकर वे महान पुरुष माने गए।
मूल पाठ 15.7
सरल हिंदी भावार्थ: गय रक्षा, पोषण, स्नेह, शिक्षा और उचित शासन द्वारा प्रजा का पालन करते थे। यज्ञादि के फल भगवान को अर्पित और ब्रह्मज्ञों की सेवा करते हुए भक्ति से उनकी बुद्धि अत्यन्त शुद्ध हुई। ब्रह्मानुभव प्राप्त होने पर भी वे अभिमानरहित रहकर पृथ्वी की रक्षा करते रहे।
मूल पाठ 15.8
सरल हिंदी भावार्थ: हे पाण्डुवंशज! प्राचीन इतिहास के ज्ञाता गय की प्रशंसा में यह गाथा गाते हैं।
मूल पाठ 15.9
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की कला के अतिरिक्त कौन राजा यज्ञशील, निरभिमानी, ज्ञानी, धर्मरक्षक, समृद्ध, सज्जनों के सभापति और साधुसेवक गय के कार्यों की बराबरी कर सकता है?
मूल पाठ 15.10
सरल हिंदी भावार्थ: कथा में श्रद्धा आदि दक्षकन्याओं द्वारा पवित्र नदीजल से उनके आनन्दपूर्ण अभिषेक का वर्णन है। वे निष्काम थे, फिर भी उनके गुणों से प्रसन्न पृथ्वी ने प्रजा की इच्छानुसार उपज और समृद्धि दी।
मूल पाठ 15.11
सरल हिंदी भावार्थ: निष्काम होने पर भी वैदिक अनुष्ठानों ने उन्हें फल दिए और दूसरे राजाओं ने कर अर्पित किया। यज्ञदक्षिणा आदि से सम्मानित वेदज्ञों के पुण्य का धर्मानुसार अंश भी प्रजापालक गय को मिला।
मूल पाठ 15.12
सरल हिंदी भावार्थ: उनके यज्ञ में इन्द्र सोमपान से प्रसन्न हुए और स्वयं यज्ञस्वरूप भगवान ने शुद्ध श्रद्धा तथा अचल भक्ति से अर्पित यज्ञफल स्वीकार किया।
मूल पाठ 15.13
सरल हिंदी भावार्थ: जिनकी प्रसन्नता से ब्रह्मा से लेकर देव, मनुष्य, पशु, वनस्पति और घास तक सभी तृप्त होते हैं, वे विश्वात्मा भगवान गय के यज्ञ से स्वयं प्रसन्न हुए।
मूल पाठ 15.14
सरल हिंदी भावार्थ: गय की गयन्ती से चित्ररथ, सुगति और अवरोधन नाम के तीन पुत्र हुए। चित्ररथ की ऊर्णा से सम्राट् उत्पन्न हुए।
मूल पाठ 15.15
सरल हिंदी भावार्थ: सम्राट् की उत्कला से मरीचि, मरीचि की बिन्दुमती से बिन्दुमान्, बिन्दुमान् की सरघा से मधु, मधु की सुमना से वीरव्रत और वीरव्रत की भोजा से मन्थु तथा प्रमन्थु हुए। मन्थु की सत्या से भौवन, भौवन की दूषणा से त्वष्टा और त्वष्टा की विरोचना से विरज हुए। विरज की विषूची से शतजित् आदि सौ पुत्र और एक कन्या उत्पन्न हुई।
मूल पाठ 15.16
सरल हिंदी भावार्थ: इस विषय में कहा गया है—इस वंश के अन्त में उत्पन्न विरज ने अपनी कीर्ति से प्रियव्रत के वंश को विशेष शोभा दी, जैसे विष्णु देवसमुदाय को सुशोभित करते हैं।
॥ पंचम स्कन्ध • अध्याय 15 समाप्त ॥
इस भाग का भक्ति-सन्देश
करुणा के साथ विवेक और साधना की सावधानी भी जरूरी है। देह, पद और धन का अभिमान आत्मस्वरूप को ढकता है। सत्सङ्ग, हरिकथा और सर्वभूतमैत्री से मन का बन्धन खुलता है और जीवन की कठिन राह पार होती है।
पाठाधार और संपादकीय जानकारी
मूल संस्कृत का आधार Sanskrit Documents का प्राचीन “श्रीमद्भागवतं—पञ्चमस्कन्धः” पाठ है। अध्याय 7–15 में क्रमशः 14, 31, 20, 25, 17, 16, 26, 46 और 16 क्रमाङ्कित गद्य-पद्य पाठ हैं; कुल 211। हिंदी भावार्थ स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है। अध्याय 13 का वनरूपक अध्याय 14 में स्वयं ग्रन्थ द्वारा समझाया गया है। मनुष्यबलि की घटना को क्रूर अधर्म बताया गया है और देवी निर्दोष की रक्षा करती हैं। अध्याय 9 का पति के पीछे देहत्याग का प्रसंग प्राचीन आख्यान है, अनुकरण का निर्देश नहीं। धार्मिक मतों की आलोचना ग्रन्थ के आन्तरिक दृष्टिकोण की है।
॥ पंचम स्कन्ध • भाग २ समाप्त ॥
॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
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