तैत्तिरीयोपनिषद् सम्पूर्ण — तीनों वल्लियाँ, सभी 31 अनुवाक और सरल हिंदी अर्थ

भक्ति भावना प्रस्तुत · कृष्णयजुर्वेदीय ब्रह्मविद्या

तैत्तिरीयोपनिषद् सम्पूर्ण

तीनों वल्लियों का मूल पाठ और सरल हिंदी अर्थ

एक ही लेख में3 वल्लियाँ31 अनुवाक

तैत्तिरीयोपनिषद् कृष्णयजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा से सम्बद्ध प्रमुख उपनिषद् है। यह तैत्तिरीय आरण्यक के सातवें, आठवें और नवें प्रपाठक में आता है। इसकी तीन वल्लियाँ हैं—शिक्षावल्ली, ब्रह्मानन्दवल्ली और भृगुवल्ली। शुद्ध उच्चारण और सदाचार से आरम्भ होकर इसका विवेचन अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द के द्वारा ब्रह्मज्ञान की ओर बढ़ता है।

पढ़ने की व्यवस्था: शिक्षावल्ली के 12, ब्रह्मानन्दवल्ली के 9 और भृगुवल्ली के 10—कुल 31 अनुवाक इसी लेख में पूरे हैं। हर अनुवाक के नीचे सरल हिंदी अर्थ है। भीतर दिए मूल पाठ के छोटे क्रमांक अनुवाक के अन्दर के पाठ-खण्ड हैं; उन्हें कुल अनुवाकों की संख्या न समझें। 2.8 का अर्थ दूसरी वल्ली का आठवाँ अनुवाक है।
ॐ श्री गुरुभ्यो नमः । हरिः ॐ ।

वल्ली 1 · शिक्षावल्ली

12 अनुवाक

अनुवाक 1.1 · शांति की प्रार्थना

ॐ शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि । ऋतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु माम् । अवतु वक्तारम् । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थ

मित्र, वरुण, अर्यमा, इन्द्र, बृहस्पति और व्यापक गति वाले विष्णु हमारे लिए कल्याणकारी हों। ब्रह्म को नमस्कार है। हे वायु! आपको नमस्कार है; आप प्रत्यक्ष ब्रह्म के प्रतीक हैं। मैं आपको ही प्रत्यक्ष ब्रह्म कहूँगा, ऋत और सत्य बोलूँगा। वह ब्रह्म मेरी और वक्ता की रक्षा करे। तीन बार शांति की प्रार्थना है।

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अनुवाक 1.2 · उच्चारण के छह अंग

ॐ शीक्षां व्याख्यास्यामः । वर्णः स्वरः । मात्रा बलम् । साम सन्तानः । इत्युक्तः शीक्षाध्यायः ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थ

अब शिक्षा, अर्थात् शुद्ध उच्चारण का विषय बताया जाता है। इसमें वर्ण, स्वर, मात्रा, बल, साम और सन्तान का विचार है—कौन-सी ध्वनि है, उसका स्वर कैसा है, कितनी देर बोली जाए, कितना प्रयत्न हो, उसमें समता कैसी हो और ध्वनियों का परस्पर सम्बन्ध कैसे बना रहे। इन विषयों में शिक्षा का संक्षिप्त निरूपण हुआ।

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अनुवाक 1.3 · महासंहिता · सम्बन्धों की उपासना

सह नौ यशः । सह नौ ब्रह्मवर्चसम् । अथातः सꣳहिताया उपनिषदम् व्याख्यास्यामः । पञ्चस्वधिकरणेषु । अधिलोकमधिज्यौतिषमधिविद्यमधिप्रजमध्यात्मम् । ता महासꣳहिता इत्याचक्षते । अथाधिलोकम् । पृथिवी पूर्वरूपम् । द्यौरुत्तररूपम् । आकाशः सन्धिः ॥ १॥ वायुः सन्धानम् । इत्यधिलोकम् । अथाधिज्यौतिषम् । अग्निः पूर्वरूपम् । आदित्य उत्तररूपम् । आपः सन्धिः । वैद्युतः सन्धानम् । इत्यधिज्यौतिषम् । अथाधिविद्यम् । आचार्यः पूर्वरूपम् ॥ २॥ अन्तेवास्युत्तररूपम् । विद्या सन्धिः । प्रवचनꣳसन्धानम् । इत्यधिविद्यम् । अथाधिप्रजम् । माता पूर्वरूपम् । पितोत्तररूपम् । प्रजा सन्धिः । प्रजननꣳसन्धानम् । इत्यधिप्रजम् ॥ ३॥ अथाध्यात्मम् । अधराहनुः पूर्वरूपम् । उत्तराहनूत्तररूपम् । वाक्सन्धिः । जिह्वासन्धानम् । इत्यध्यात्मम् । इतीमामहासꣳहिताः । य एवमेता महासꣳहिता व्याख्याता वेद । सन्धीयते प्रजया पशुभिः । ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन सुवर्ग्येण लोकेन ॥ ४॥
सरल हिंदी अर्थ

गुरु और शिष्य दोनों को यश और ब्रह्मविद्या का तेज मिले। अब संहिता, अर्थात् मिलन और जोड़ का रहस्य, पाँच क्षेत्रों में समझाया जाता है—लोक, प्रकाश, विद्या, सन्तान और अपना शरीर। इन्हें महासंहिताएँ कहा गया है।

लोक के विचार में पृथ्वी पूर्वरूप, द्युलोक उत्तररूप, आकाश उनका सन्धिस्थल और वायु उन्हें जोड़ने वाला है। प्रकाश के विचार में अग्नि पूर्वरूप, सूर्य उत्तररूप, जल सन्धि और विद्युत् संयोजक है। विद्या में आचार्य पूर्वरूप, शिष्य उत्तररूप, ज्ञान सन्धि और उपदेश उन्हें जोड़ने वाला है।

प्रजा के विचार में माता पूर्वरूप, पिता उत्तररूप, सन्तान सन्धि और प्रजनन संयोजन है। शरीर में नीचे का जबड़ा पूर्वरूप, ऊपर का जबड़ा उत्तररूप, वाणी सन्धि और जीभ जोड़ने वाला साधन है। इस प्रकार इन सम्बन्धों का ज्ञान रखने वाले के लिए सन्तान, पशुसम्पदा, ब्रह्मतेज, अन्न और उच्च लोक से जुड़ने का फल बताया गया है।

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अनुवाक 1.4 · मेधा, समृद्धि और विद्यार्थियों की प्रार्थना

यश्छन्दसामृषभो विश्वरूपः । छन्दोभ्योऽध्यमृतात्सम्बभूव । स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु । अमृतस्य देव धारणो भूयासम् । शरीरं मे विचर्षणम् । जिह्वा मे मधुमत्तमा । कर्णाभ्यां भूरिविश्रुवम् । ब्रह्मणः कोशोऽसि मेधया पिहितः । श्रुतं मे गोपाय । आवहन्ती वितन्वाना ॥ १॥ कुर्वाणाऽचीरमात्मनः । वासाꣳसि मम गावश्च । अन्नपाने च सर्वदा । ततो मे श्रियमावह । लोमशां पशुभिः सह स्वाहा । आमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । विमाऽऽयन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । प्रमाऽऽयन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । दमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा । शमायन्तु ब्रह्मचारिणः स्वाहा ॥ २॥ यशो जनेऽसानि स्वाहा । श्रेयान् वस्यसोऽसानि स्वाहा । तं त्वा भग प्रविशानि स्वाहा । स मा भग प्रविश स्वाहा । तस्मिन् सहस्रशाखे । निभगाऽहं त्वयि मृजे स्वाहा । यथाऽऽपः प्रवताऽऽयन्ति । यथा मासा अहर्जरम् । एवं मां ब्रह्मचारिणः । धातरायन्तु सर्वतः स्वाहा । प्रतिवेशोऽसि प्रमाभाहि प्रमापद्यस्व ॥ ३॥
सरल हिंदी अर्थ

सर्वरूप, वेदों में श्रेष्ठ और अमृतस्वरूप छन्दों से प्रकट देवतत्त्व मेरी मेधा को पुष्ट करे। मैं अमृत ज्ञान को धारण करने योग्य बनूँ। शरीर समर्थ हो, वाणी मधुर हो और कानों से अधिक ज्ञान सुन सकूँ। हे ब्रह्म के कोशस्वरूप! मेधा के आवरण में स्थित सुने हुए ज्ञान की रक्षा करें।

फिर आवहन्ती प्रार्थना में वस्त्र, पशुधन, अन्न-पान और जीवन के आवश्यक साधनों की अभिवृद्धि माँगी गई है। ब्रह्मचारी विद्यार्थी मेरे पास आएँ, विविध दिशाओं से आएँ, ज्ञान के लिए आगे आएँ, इन्द्रियसंयम और मन की शांति अपनाएँ—ऐसी आहुतिपरक प्रार्थनाएँ हैं।

समाज में यश और श्रेष्ठता मिले। हे भग, मैं आपमें प्रवेश करूँ और आप मुझमें प्रवेश करें। आपके अनेक शाखाओं वाले स्वरूप में मैं निर्मल बनूँ। जैसे जल नीचे की ओर और महीने वर्ष की ओर जाते हैं, वैसे विद्यार्थी सभी दिशाओं से मेरे पास आएँ। आप आश्रय हैं; मुझे प्रकाशित करें और मुझमें उपस्थित हों। यह अध्यापक के ज्ञान, साधन और सदाचारी शिष्यों की कामना का प्रसंग है।

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अनुवाक 1.5 · चार व्याहृतियों की उपासना

भूर्भुवः सुवरिति वा एतास्तिस्रो व्याहृतयः । तासामुहस्मै तां चतुर्थीम् । माहाचमस्यः प्रवेदयते । मह इति । तद्ब्रह्म । स आत्मा । अङ्गान्यन्या देवताः । भूरिति वा अयं लोकः । भुव इत्यन्तरिक्षम् । सुवरित्यसौ लोकः ॥ १॥ मह इत्यादित्यः । आदित्येन वाव सर्वे लोका महीयन्ते । भूरिति वा अग्निः । भुव इति वायुः । सुवरित्यादित्यः । मह इति चन्द्रमाः । चन्द्रमसा वाव सर्वाणि ज्योतीꣳषि महीयन्ते । भूरिति वा ऋचः । भुव इति सामानि । सुवरिति यजूꣳषि ॥ २॥ मह इति ब्रह्म । ब्रह्मणा वाव सर्वेवेदा महीयन्ते । भूरिति वै प्राणः । भुव इत्यपानः । सुवरिति व्यानः । मह इत्यन्नम् । अन्नेन वाव सर्वे प्राणा महीयन्ते । ता वा एताश्चतस्रश्चतुर्धा । चतस्रश्चतस्रो व्याहृतयः । ता यो वेद । स वेद ब्रह्म । सर्वेऽस्मैदेवा बलिमावहन्ति ॥ ३॥
सरल हिंदी अर्थ

भूः, भुवः और सुवः तीन व्याहृतियाँ हैं। माहाचमस्य ऋषि ने चौथी ‘महः’ बताई। महः को ब्रह्म और आत्मा कहा गया है; अन्य देवताओं को उसके अंगों की तरह समझाया गया है।

लोकों की उपासना में भूः पृथ्वी, भुवः अन्तरिक्ष, सुवः द्युलोक और महः सूर्य है; सूर्य से लोकों की महिमा प्रकट होती है। देवताविचार में भूः अग्नि, भुवः वायु, सुवः सूर्य और महः चन्द्रमा है; चन्द्रमा से ज्योतियों की महिमा कही गई है। वेदविचार में भूः ऋक्, भुवः साम, सुवः यजुः और महः ब्रह्म है; ब्रह्म से वेदों का महत्त्व है।

प्राणविचार में भूः प्राण, भुवः अपान, सुवः व्यान और महः अन्न है; अन्न से प्राण पुष्ट होते हैं। चार व्याहृतियों के ये चार-चार सम्बन्ध मिलकर सोलह प्रकार का निरूपण बनाते हैं। इन्हें जानने वाले को ब्रह्म का ज्ञान होता है और उसके लिए देवताओं के अर्पण लाने का उपासना-फल कहा गया है।

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अनुवाक 1.6 · हृदयस्थ ब्रह्म और स्वाराज्य

स य एषोऽन्तहृदय आकाशः । तस्मिन्नयं पुरुषो मनोमयः । अमृतो हिरण्मयः । अन्तरेण तालुके । य एषस्तन इवावलम्बते । सेन्द्रयोनिः । यत्रासौ केशान्तो विवर्तते । व्यपोह्य शीर्षकपाले । भूरित्यग्नौ प्रतितिष्ठति । भुव इति वायौ ॥ १॥ सुवरित्यादित्ये । मह इति ब्रह्मणि । आप्नोति स्वाराज्यम् । आप्नोति मनसस्पतिम् । वाक्पतिश्चक्षुष्पतिः । श्रोत्रपतिर्विज्ञानपतिः । एतत्ततो भवति । आकाशशरीरं ब्रह्म । सत्यात्म प्राणारामं मन आनन्दम् । शान्तिसमृद्धममृतम् । इति प्राचीन योग्योपास्व ॥ २॥
सरल हिंदी अर्थ

हृदय के अन्तराकाश में मनोमय, अमृत और हिरण्मय पुरुष का ध्यान बताया गया है। तालु के बीच लटकते स्तन-जैसे अंश, इन्द्र की योनि अथवा मार्ग, और सिर के ऊपरी भाग से जुड़ा वर्णन इस ध्यानमार्ग के प्रसंग में आता है। भूः के द्वारा अग्नि में और भुवः के द्वारा वायु में प्रतिष्ठा कही गई है।

सुवः के द्वारा सूर्य में और महः के द्वारा ब्रह्म में प्रतिष्ठित होकर उपासक स्वाराज्य प्राप्त करता है। मन, वाणी, दृष्टि, श्रवण और विज्ञान पर आधिपत्य का फल बताया गया है। आकाश जिसका शरीर है, सत्य जिसका स्वरूप है, प्राण जिसका रमणस्थान है, मन में आनन्दस्वरूप, शांति से परिपूर्ण और अमृत—ऐसे ब्रह्म का ध्यान करने का उपदेश प्राचीनयोग्य को दिया जाता है। शरीर सम्बन्धी वर्णन यहाँ उपासना का भाग है।

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अनुवाक 1.7 · बाहरी और भीतरी पाँच-पाँच समूह

पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौर्दिशोऽवान्तरदिशाः । अग्निर्वायुरादित्यश्चन्द्रमा नक्षत्राणि । आप ओषधयो वनस्पतय आकाश आत्मा । इत्यधिभूतम् । अथाध्यात्मम् । प्राणो व्यानोऽपान उदानः समानः । चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक् त्वक् । चर्ममाꣳस स्नावास्थि मज्जा । एतदधिविधाय ऋषिरवोचत् । पाङ्क्तं वा इदꣳसर्वम् । पाङ्क्तेनैव पाङ्क्तग् स्पृणोतीति ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थ

बाहरी जगत को पाँच-पाँच के समूहों में देखा गया है। पृथ्वी, अन्तरिक्ष, द्युलोक, मुख्य दिशाएँ और उपदिशाएँ एक समूह हैं; अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र दूसरा; जल, औषधियाँ, वनस्पतियाँ, आकाश और आत्मा तीसरा है।

अपने भीतर प्राण, व्यान, अपान, उदान और समान एक समूह हैं; आँख, कान, मन, वाणी और त्वचा दूसरा; चर्म, मांस, स्नायु, अस्थि और मज्जा तीसरा है। ऋषि कहते हैं कि यह सब पाङ्क्त, अर्थात् पाँच के क्रम में व्यवस्थित है। बाहरी और भीतरी पाँच-पाँच समूहों के साम्य से पूर्णता का ध्यान कराया जाता है।

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अनुवाक 1.8 · ॐ की महिमा

ओमिति ब्रह्म । ओमितीदꣳसर्वम् । ओमित्येतदनुकृतिर्हस्म वा अप्योश्रावयेत्याश्रावयन्ति । ओमिति सामानि गायन्ति । ॐꣳशोमिति शस्त्राणि शꣳसन्ति । ओमित्यध्वर्युः प्रतिगरं प्रतिगृणाति । ओमिति ब्रह्मा प्रसौति । ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति । ओमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाप्नवानीति । ब्रह्मैवोपाप्नोति ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थ

ॐ ब्रह्म का सूचक है; ॐ इस समस्त अस्तित्व का संकेत है। वैदिक कर्म और अध्ययन में ॐ स्वीकृति तथा आरम्भ की ध्वनि है। आश्रावण, सामगान, शस्त्रपाठ, अध्वर्यु के प्रत्युत्तर, ब्रह्मा ऋत्विज् की अनुमति और अग्निहोत्र की आज्ञा में इसका प्रयोग बताया गया है। ब्रह्म का अध्ययन आरम्भ करने वाला भी ‘मैं ब्रह्म को प्राप्त करूँ’ इस भाव से ॐ कहता है; उसके लिए ब्रह्मप्राप्ति का फल कहा गया है।

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अनुवाक 1.9 · स्वाध्याय और प्रवचन

ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च । तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च । दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च । शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च । अग्नयश्च स्वाध्यायप्रवचने च । अग्निहोत्रं च स्वाध्यायप्रवचने च । अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च । मानुषं च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च । प्रजातिश्च स्वाध्यायप्रवचने च । सत्यमिति सत्यवचा राथी तरः । तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः । स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्गल्यः । तद्धि तपस्तद्धि तपः ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थ

ऋत, सत्य, तप, इन्द्रियसंयम और मन की शांति के साथ स्वाध्याय और प्रवचन भी आवश्यक हैं। अग्नियों का पालन, अग्निहोत्र, अतिथि-सत्कार, मानवीय व्यवहार, सन्तान और परिवार की परम्परा—इन सभी कर्तव्यों के साथ अध्ययन और ज्ञान-वितरण जोड़कर कहा गया है। किसी एक जिम्मेदारी के कारण सीखना-सिखाना छूटना नहीं चाहिए।

सत्यवचा राथीतर सत्य को विशेष महत्त्व देते हैं; तपोनित्य पौरुशिष्टि तप को; नाक मौद्गल्य स्वाध्याय और प्रवचन को ही प्रमुख बताते हैं। अन्त में इन्हीं को तप कहा गया है और इसी बात को दोहराकर बल दिया गया है।

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अनुवाक 1.10 · त्रिशंकु का वेदानुवचन

अहं वृक्षस्य रेरिवा । कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव । ऊर्ध्वपवित्रो वाजिनीव स्वमृतमस्मि । द्रविणꣳसवर्चसम् । सुमेध अमृतोक्षितः । इति त्रिशङ्कोर्वेदानुवचनम् ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थ

यह त्रिशंकु की वेदानुभूति का कथन है। ‘मैं संसार-वृक्ष को प्रेरित करने वाला हूँ। मेरी कीर्ति पर्वत के शिखर जैसी ऊँची है। मैं ऊर्ध्व पवित्र करने वाला, सूर्य में स्थित अमृत की तरह अमृतस्वरूप हूँ। मैं प्रकाशमान सम्पदा हूँ, उत्तम बुद्धि से युक्त और अमृत से अभिषिक्त हूँ।’ यह आत्मबोध की महिमा व्यक्त करने वाला मंत्र है।

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अनुवाक 1.11 · सत्य, धर्म और शिष्य का अनुशासन

वेदमनूच्याचार्योन्तेवासिनमनुशास्ति । सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः । आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः । सत्यान्न प्रमदितव्यम् । धर्मान्न प्रमदितव्यम् । कुशलान्न प्रमदितव्यम् । भूत्यै न प्रमदितव्यम् । स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम् ॥ १॥ देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम् । मातृदेवो भव । पितृदेवो भव । आचार्यदेवो भव । अतिथिदेवो भव । यान्यनवद्यानि कर्माणि । तानि सेवितव्यानि । नो इतराणि । यान्यस्माकꣳसुचरितानि । तानि त्वयोपास्यानि ॥ २॥ नो इतराणि । ये के चास्मच्छ्रेयाꣳसो ब्राह्मणाः । तेषां त्वयाऽऽसनेन प्रश्वसितव्यम् । श्रद्धया देयम् । अश्रद्धयाऽदेयम् । श्रिया देयम् । ह्रिया देयम् । भिया देयम् । संविदा देयम् । अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात् ॥ ३॥ ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तत्र वर्तेरन् । तथा तत्र वर्तेथाः । अथाभ्याख्यातेषु । ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः । युक्ता आयुक्ताः । अलूक्षा धर्मकामाः स्युः । यथा ते तेषु वर्तेरन् । तथा तेषु वर्तेथाः । एष आदेशः । एष उपदेशः । एषा वेदोपनिषत् । एतदनुशासनम् । एवमुपासितव्यम् । एवमु चैतदुपास्यम् ॥ ४॥
सरल हिंदी अर्थ

वेद पढ़ाने के बाद आचार्य शिष्य को जीवन का अनुशासन देते हैं—सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो और स्वाध्याय में प्रमाद मत करो। आचार्य को प्रिय दक्षिणा देकर प्रजा की परम्परा का विच्छेद मत करो। सत्य, धर्म, कल्याण, समृद्धि, अध्ययन और अध्यापन के प्रति असावधान न बनो। देवों और पितरों के कर्तव्यों की उपेक्षा न करो।

माता, पिता, आचार्य और अतिथि को देवतुल्य सम्मान दो। जो कर्म निर्दोष हैं, केवल उनका अनुसरण करो। गुरु के भी जो आचरण अच्छे हैं, उन्हीं को अपनाओ; अन्य आचरण नहीं। अपने से श्रेष्ठ विद्वानों को आसन और सम्मान देकर उनकी थकान दूर करो।

श्रद्धा से दान दो, अश्रद्धा से नहीं; अपनी समृद्धि के अनुरूप उदारता से, विनय से, कर्तव्य की गंभीरता समझकर और विवेक तथा सहभाव से दो। यदि कर्म या व्यवहार के विषय में संदेह हो, तो वहाँ के विचारशील, योग्य, स्वतंत्र निर्णय रखने वाले, कठोरतारहित और धर्माभिलाषी विद्वानों के आचरण को मार्गदर्शक बनाओ।

जिन लोगों पर कोई आरोप लगा हो, उनके प्रति व्यवहार में भी ऐसे ही विवेकी और धर्मप्रिय जनों की रीति का अनुसरण करो। यही आदेश, यही उपदेश, यही वेद का रहस्य और यही अनुशासन है। इसी भाव से उपासना और आचरण करना चाहिए।

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अनुवाक 1.12 · अध्ययन के समापन का शांतिपाठ

शं नो मित्रः शं वरुणः । शं नो भवत्वर्यमा । शं न इन्द्रो बृहस्पतिः । शं नो विष्णुरुरुक्रमः । नमो ब्रह्मणे । नमस्ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्मावादिषम् । ऋतमवादिषम् । सत्यमवादिषम् । तन्मामावीत् । तद्वक्तारमावीत् । आवीन्माम् । आवीद्वक्तारम् । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थ

मित्र, वरुण, अर्यमा, इन्द्र, बृहस्पति और विष्णु हमारा कल्याण करें। ब्रह्म और प्रत्यक्ष ब्रह्मस्वरूप वायु को नमस्कार है। मैंने आपको प्रत्यक्ष ब्रह्म कहा, ऋत कहा और सत्य कहा। उस ब्रह्म ने मेरी और वक्ता की रक्षा की—इस कृतज्ञ भाव के साथ अध्ययन पूरा होता है। तीन बार शांति की प्रार्थना है।

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वल्ली 2 · ब्रह्मानन्दवल्ली

9 अनुवाक

वल्ली का आरम्भिक शांतिपाठ

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
सरल हिंदी अर्थहम गुरु और शिष्य दोनों की रक्षा हो, दोनों का पोषण हो और दोनों मिलकर सामर्थ्य से कार्य करें। हमारा अध्ययन तेजस्वी हो। हम परस्पर द्वेष न करें। तीन बार शांति की प्रार्थना है।

अनुवाक 2.1 · सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म

ॐ ब्रह्मविदाप्नोति परम् । तदेषाऽभ्युक्ता । सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म । यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन् । सोऽश्नुते सर्वान् कामान्सह । ब्रह्मणा विपश्चितेति ॥ तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः । आकाशाद्वायुः । वायोरग्निः । अग्नेरापः । अद्भ्यः पृथिवी । पृथिव्या ओषधयः । ओषधीभ्योन्नम् । अन्नात्पुरुषः । स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः । तस्येदमेव शिरः । अयं दक्षिणः पक्षः । अयमुत्तरः पक्षः । अयमात्मा । इदं पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थ

ब्रह्म को जानने वाला परम को प्राप्त करता है। उस ब्रह्म को सत्य, ज्ञान और अनन्त कहा गया है। जो उसे हृदय-गुहा के परम आकाश में स्थित जानता है, वह सर्वज्ञ ब्रह्म के साथ सभी कामनाओं की पूर्णता प्राप्त करता है।

आत्मा से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी, पृथ्वी से औषधियाँ, औषधियों से अन्न और अन्न से मनुष्य का उत्पन्न होना बताया गया है। यह पुरुष अन्नरस से बना है। उसके सिर, दोनों पक्षों, मध्य और आधार के रूप में आगे के विवेचन का ढाँचा रखा जाता है। यह जगत और शरीर के ब्रह्माधारित होने का शास्त्रीय निरूपण है।

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अनुवाक 2.2 · अन्नमय से प्राणमय

अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते । याः काश्च पृथिवीꣳश्रिताः । अथो अन्नेनैव जीवन्ति । अथैनदपि यन्त्यन्ततः । अन्नꣳहि भूतानां ज्येष्ठम् । तस्मात् सर्वौषधमुच्यते । सर्वं वै तेऽन्नमाप्नुवन्ति । येऽन्नं ब्रह्मोपासते । अन्नꣳहि भूतानां ज्येष्ठम् । तस्मात् सर्वौषधमुच्यते । अन्नाद् भूतानि जायन्ते । जातान्यन्नेन वर्धन्ते । अद्यतेऽत्ति च भूतानि । तस्मादन्नं तदुच्यत इति । तस्माद्वा एतस्मादन्नरसमयात् । अन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधताम् । अन्वयं पुरुषविधः । तस्य प्राण एव शिरः । व्यानो दक्षिणः पक्षः । अपान उत्तरः पक्षः । आकाश आत्मा । पृथिवी पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थ

पृथ्वी पर रहने वाले प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न से जीते हैं और अन्त में अन्न में लौटते हैं। अन्न प्राणियों का अग्रज और सबको पोषण देने वाला है। जो अन्न को ब्रह्म के रूप में उपासते हैं, उनके लिए अन्न की प्राप्ति का फल कहा गया है। अन्न खाया भी जाता है और प्राणियों को अपने में समेटता भी है—इससे अन्न नाम की व्याख्या की गई है।

अन्नरस से बने इस शरीर के भीतर प्राणमय आत्मा है, जिससे यह शरीर भरा हुआ है। उसका रूप भी पुरुष के अनुरूप समझाया जाता है। उसमें प्राण सिर, व्यान दायाँ पक्ष, अपान बायाँ पक्ष, आकाश मध्य और पृथ्वी आधार है। बाहरी अन्नमय से भीतर के प्राणमय की ओर ध्यान बढ़ता है।

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अनुवाक 2.3 · प्राणमय से मनोमय

प्राणं देवा अनु प्राणन्ति । मनुष्याः पशवश्च ये । प्राणो हि भूतानामायुः । तस्मात् सर्वायुषमुच्यते । सर्वमेव त आयुर्यन्ति । ये प्राणं ब्रह्मोपासते । प्राणो हि भूतानामायुः । तस्मात् सर्वायुषमुच्यत इति । तस्यैष एव शारीर आत्मा । यः पूर्वस्य । तस्माद्वा एतस्मात् प्राणमयात् । अन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधताम् । अन्वयं पुरुषविधः । तस्य यजुरेव शिरः । ऋग्दक्षिणः पक्षः । सामोत्तरः पक्षः । आदेश आत्मा । अथर्वाङ्गिरसः पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थ

देवता, मनुष्य और पशु प्राण के सहारे प्राणन करते हैं। प्राण ही प्राणियों की आयु है, इसलिए उसे सबकी आयु कहा गया है। जो प्राण को ब्रह्मरूप उपासते हैं, उनके लिए पूर्ण आयु का उपासना-फल कहा गया है।

प्राणमय के भीतर मनोमय आत्मा है, जिससे प्राणमय भरा हुआ है। उसके पुरुषरूप निरूपण में यजुः सिर, ऋक् दायाँ पक्ष, साम बायाँ पक्ष, आदेश मध्य और अथर्वाङ्गिरस आधार है। यह मन और वैदिक ज्ञान के सम्बन्ध से अन्तर्मुखी विवेचन है।

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अनुवाक 2.4 · मनोमय से विज्ञानमय

यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न बिभेति कदाचनेति । तस्यैष एव शारीर आत्मा । यः पूर्वस्य । तस्माद्वा एतस्मान्मनोमयात् । अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधताम् । अन्वयं पुरुषविधः । तस्य श्रद्धैव शिरः । ऋतं दक्षिणः पक्षः । सत्यमुत्तरः पक्षः । योग आत्मा । महः पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थ

ब्रह्म को पूरी तरह प्राप्त किए बिना वाणी मन के साथ लौट आती है। उसके आनन्द को जानने वाला कभी भय नहीं करता—ऐसी ब्रह्मज्ञान की महिमा कही गई है।

मनोमय के भीतर विज्ञानमय आत्मा है, जिससे मनोमय भरा हुआ है। विज्ञानमय के पुरुषरूप में श्रद्धा सिर, ऋत दायाँ पक्ष, सत्य बायाँ पक्ष, योग मध्य और महः आधार है। यहाँ विज्ञान का आशय विवेक और निश्चय करने वाली बुद्धि से है।

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अनुवाक 2.5 · विज्ञानमय से आनन्दमय

विज्ञानं यज्ञं तनुते । कर्माणि तनुतेऽपि च । विज्ञानं देवाः सर्वे । ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते । विज्ञानं ब्रह्म चेद्वेद । तस्माच्चेन्न प्रमाद्यति । शरीरे पाप्मनो हित्वा । सर्वान्कामान् समश्नुत इति । तस्यैष एव शारीर आत्मा । यः पूर्वस्य । तस्माद्वा एतस्माद्विज्ञानमयात् । अन्योऽन्तर आत्माऽऽनन्दमयः । तेनैष पूर्णः । स वा एष पुरुषविध एव । तस्य पुरुषविधताम् । अन्वयं पुरुषविधः । तस्य प्रियमेव शिरः । मोदो दक्षिणः पक्षः । प्रमोद उत्तरः पक्षः । आनन्द आत्मा । ब्रह्म पुच्छं प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थ

विज्ञान, अर्थात् विवेकपूर्ण बोध, यज्ञ और कर्मों को विस्तार देता है। देवता विज्ञान को श्रेष्ठ ब्रह्मरूप में उपासते हैं। जो विज्ञान को ब्रह्मरूप जानता है और उस ज्ञान में प्रमाद नहीं करता, उसके लिए शरीरगत पाप्मा को छोड़कर कामनाओं की पूर्णता का फल कहा गया है।

विज्ञानमय के भीतर आनन्दमय आत्मा है, जिससे विज्ञानमय भरा हुआ है। उसके पुरुषरूप में प्रिय सिर, मोद दायाँ पक्ष, प्रमोद बायाँ पक्ष, आनन्द मध्य और ब्रह्म आधार है। प्रिय वस्तु का भाव, उसकी प्राप्ति की प्रसन्नता और उसके अनुभव का हर्ष—इनसे भीतर के आनन्द की ओर संकेत किया जाता है।

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अनुवाक 2.6 · सृष्टि और ब्रह्म का प्रवेश

असन्नेव स भवति । असद्ब्रह्मेति वेद चेत् । अस्ति ब्रह्मेति चेद्वेद । सन्तमेनं ततो विदुरिति । तस्यैष एव शारीर आत्मा । यः पूर्वस्य । अथातोऽनुप्रश्नाः । उताविद्वानमुं लोकं प्रेत्य । कश्चन गच्छती३ । आहो विद्वानमुं लोकं प्रेत्य । कश्चित्समश्नुता३ उ । सोऽकामयत । बहुस्यां प्रजायेयेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा । इदꣳसर्वमसृजत । यदिदं किञ्च । तत्सृष्ट्वा । तदेवानुप्राविशत् । तदनु प्रविश्य । सच्च त्यच्चाभवत् । निरुक्तं चानिरुक्तं च । निलयनं चानिलयनं च । विज्ञानं चाविज्ञानं च । सत्यं चानृतं च सत्यमभवत् । यदिदं किञ्च । तत्सत्यमित्याचक्षते । तदप्येष श्लोको भवति ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थ

जो ब्रह्म को असत् मानता है, वह मानो अपने सत्य आधार को ही नकारता है। जो ब्रह्म का अस्तित्व जानता है, उसे सत् में स्थित माना जाता है। फिर प्रश्न उठते हैं—क्या अज्ञानी शरीर छोड़कर उस लोक को प्राप्त करता है? क्या ज्ञानी उसे प्राप्त करता है?

ब्रह्म ने ‘मैं अनेक होऊँ, प्रकट होऊँ’ ऐसा संकल्प किया। तप करके उसने यह सब रचा और रचकर उसी में प्रवेश किया। प्रवेश करके वह व्यक्त और अव्यक्त, कहे जा सकने वाले और अनिर्वचनीय, आश्रययुक्त और आश्रयरहित, चेतन और अचेतन तथा व्यवहार में सत्य और असत्य कहे जाने वाले रूपों में प्रकट हुआ। जो कुछ है, उसका आधार वही सत्य है। यह अनेकता में एक ब्रह्म की उपस्थिति का विवेचन है।

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अनुवाक 2.7 · रसस्वरूप ब्रह्म और अभय

असद्वा इदमग्र आसीत् । ततो वै सदजायत । तदात्मानं स्वयमकुरुत । तस्मात्तत्सुकृतमुच्यत इति । यद्वै तत् सुकृतम् । रसो वै सः । रसꣳह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति । को ह्येवान्यात्कः प्राण्यात् । यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् । एष ह्येवाऽऽनन्दयाति । यदा ह्येवैष एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते । अथ सोऽभयं गतो भवति । यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते । अथ तस्य भयं भवति । तत्त्वेव भयं विदुषोऽमन्वानस्य । तदप्येष श्लोको भवति ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थ

आरम्भ में यह जगत अप्रकट था; उससे प्रकट जगत हुआ। ब्रह्म ने स्वयं अपने को इस रूप में प्रकट किया, इसलिए उसे सुकृत कहा गया। वह रसस्वरूप है। उसी रस को पाकर जीव आनन्दित होता है। यदि यह अन्तराकाशस्थ आनन्द न होता, तो कौन जीता और कौन श्वास लेता? वही आनन्द देने वाला है।

जब साधक अदृश्य, देहातीत, अनिर्वचनीय और किसी दूसरे आश्रय पर निर्भर न रहने वाले उस तत्त्व में निर्भय प्रतिष्ठा पाता है, तब अभय होता है। पर उसी में थोड़ा-सा भी पृथक् भेद मानता है तो भय होता है। केवल शास्त्र जानकर भी उसके सत्य पर मनन न करने वाले के लिए भेद भय का कारण बनता है।

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अनुवाक 2.8 · आनन्द की मीमांसा

भीषाऽस्माद्वातः पवते । भीषोदेति सूर्यः । भीषाऽस्मादग्निश्चेन्द्रश्च । मृत्युर्धावति पञ्चम इति । सैषाऽऽनन्दस्य मीमाꣳसा भवति । युवा स्यात्साधुयुवाऽध्यायकः । आशिष्ठो दृढिष्ठो बलिष्ठः । तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात् । स एको मानुष आनन्दः । ते ये शतं मानुषा आनन्दाः ॥ १॥ स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दाः । स एको देवगन्धर्वाणामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं देवगन्धर्वाणामानन्दाः । स एकः पितृणां चिरलोकलोकानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं पितृणां चिरलोकलोकानामानन्दाः । स एक आजानजानां देवानामानन्दः ॥ २॥ श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं आजानजानां देवानामानन्दाः । स एकः कर्मदेवानां देवानामानन्दः । ये कर्मणा देवानपियन्ति । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं कर्मदेवानां देवानामानन्दाः । स एको देवानामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं देवानामानन्दाः । स एक इन्द्रस्याऽऽनन्दः ॥ ३॥ श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतमिन्द्रस्याऽऽनन्दाः । स एको बृहस्पतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं बृहस्पतेरानन्दाः । स एकः प्रजापतेरानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं प्रजापतेरानन्दाः । स एको ब्रह्मण आनन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य ॥ ४॥ स यश्चायं पुरुषे । यश्चासावादित्ये । स एकः । स य एवंवित् । अस्माल्लोकात्प्रेत्य । एतमन्नमयमात्मानमुपसङ्क्रामति । एतं प्राणमयमात्मानमुपसङ्क्रामति । एतं मनोमयमात्मानमुपसङ्क्रामति । एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसङ्क्रामति । एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रामति । तदप्येष श्लोको भवति ॥ ५॥
सरल हिंदी अर्थ

उस परम के अनुशासन से वायु बहती है, सूर्य उदित होता है, अग्नि और इन्द्र अपना कार्य करते हैं तथा मृत्यु भी अपनी गति से चलती है। अब आनन्द की मीमांसा की जाती है। एक सदाचारी, अध्ययनशील, आशावान, दृढ़ और बलवान युवक को सम्पत्ति से पूर्ण पृथ्वी उपलब्ध हो—उसके सुख को एक मानुष आनन्द का मान रखा गया है।

सौ मानुष आनन्द एक मनुष्यगन्धर्व का आनन्द हैं। उसके सौ गुने को देवगन्धर्व का आनन्द, फिर सौ गुने को दीर्घलोक वाले पितरों का आनन्द और उसके सौ गुने को आजानज देवताओं का आनन्द कहा गया है। प्रत्येक स्तर पर वेदज्ञ और कामना से आहत न हुए श्रोत्रिय का आनन्द भी साथ रखा गया है।

आगे क्रमशः कर्म से देवत्व पाने वाले कर्मदेव, देवता, इन्द्र, बृहस्पति, प्रजापति और ब्रह्मा के आनन्द तक सौ-सौ गुने का क्रम चलता है। प्रत्येक सीढ़ी पर ‘श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य’ कहकर ज्ञान और निष्कामता का महत्त्व दोहराया जाता है। यह उपासना और आनन्द का आध्यात्मिक मान-विवेचन है।

मनुष्य में और सूर्य में स्थित वह तत्त्व एक है। इस एकत्व को जानने वाला इस लोक से प्रयाण करके अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय आत्मा को क्रम से प्राप्त करता है। इस प्रकार बाहरी अनुभव से अन्तरतम आधार की ओर ज्ञान की गति बताई गई है।

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अनुवाक 2.9 · ब्रह्मानन्द और निर्भयता

यतो वाचो निवर्तन्ते । अप्राप्य मनसा सह । आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् । न बिभेति कुतश्चनेति । एतꣳह वाव न तपति । किमहꣳसाधु नाकरवम् । किमहं पापमकरवमिति । स य एवं विद्वानेते आत्मानं स्पृणुते । उभे ह्येवैष एते आत्मानं स्पृणुते । य एवं वेद । इत्युपनिषत् ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थ

जिस ब्रह्म तक वाणी और मन नहीं पहुँचते, उसके आनन्द को जानने वाला किसी से भय नहीं करता। ‘मैंने शुभ कर्म क्यों नहीं किया, मैंने पाप क्यों किया’—ऐसी संतप्त करने वाली ग्लानि उसे नहीं जलाती। वह शुभ और अशुभ दोनों से जुड़े अनुभवों को आत्मा के प्रकाश में देखता है; दोनों के पार आत्मबोध में स्थित होता है। यह ज्ञानजनित अभय का वर्णन है, आचरण की उपेक्षा का निर्देश नहीं। इसी के साथ यह उपनिषद्-शिक्षा पूरी होती है।

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वल्ली का समापन शांतिपाठ

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

हम गुरु और शिष्य दोनों की रक्षा हो, दोनों का पोषण हो और दोनों मिलकर सामर्थ्य से कार्य करें। हमारा अध्ययन तेजस्वी हो। हम परस्पर द्वेष न करें। तीन बार शांति की प्रार्थना है।

वल्ली 3 · भृगुवल्ली

10 अनुवाक

वल्ली का आरम्भिक शांतिपाठ

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
सरल हिंदी अर्थहम गुरु और शिष्य दोनों की रक्षा हो, दोनों का पोषण हो और दोनों मिलकर सामर्थ्य से कार्य करें। हमारा अध्ययन तेजस्वी हो। हम परस्पर द्वेष न करें। तीन बार शांति की प्रार्थना है।

अनुवाक 3.1 · भृगु की जिज्ञासा और वरुण का उपदेश

भृगुर्वै वारुणिः । वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तस्मा एतत्प्रोवाच । अन्नं प्राणं चक्षुः श्रोत्रं मनो वाचमिति । तꣳहोवाच । यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते । येन जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति । तद्विजिज्ञासस्व । तद्ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थ

वरुण के पुत्र भृगु अपने पिता के पास आए और बोले—भगवन्, मुझे ब्रह्म का उपदेश दीजिए। पिता ने अन्न, प्राण, आँख, कान, मन और वाणी को जानने के द्वार बताए। फिर कहा—जिससे ये प्राणी उत्पन्न होते हैं, जिससे उत्पन्न होकर जीते हैं और जिसमें अन्त में प्रवेश करते हैं, उसे विशेष रूप से जानने की इच्छा करो; वही ब्रह्म है। भृगु ने तप किया और उसके द्वारा विचार आरम्भ किया।

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अनुवाक 3.2 · अन्न का विवेचन

अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात् । अन्नाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । अन्नेन जातानि जीवन्ति । अन्नं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय । पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तꣳहोवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थ

भृगु ने पहले अन्न को ब्रह्म समझा, क्योंकि अन्न से प्राणी उत्पन्न होते हैं, अन्न से जीते हैं और अन्न में लौटते हैं। यह जानकर वे फिर पिता वरुण के पास गए और ब्रह्म का आगे उपदेश माँगा। पिता ने कहा—तप के द्वारा ब्रह्म को जानने का प्रयत्न करो; तप ही ब्रह्मज्ञान का साधन है। भृगु ने फिर तप किया।

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अनुवाक 3.3 · प्राण का विवेचन

प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात् । प्राणाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । प्राणेन जातानि जीवन्ति । प्राणं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय । पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तꣳहोवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थ

अगले चरण में भृगु ने प्राण को ब्रह्म समझा। प्राण से प्राणियों का जीवन प्रकट होता है, प्राण के सहारे वे जीते हैं और प्राण में उनका लय होता है। वे फिर पिता के पास गए। वरुण ने पुनः तप से ब्रह्म की जिज्ञासा करने को कहा। भृगु ने फिर तप और मनन किया।

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अनुवाक 3.4 · मन का विवेचन

मनो ब्रह्मेति व्यजानात् । मनसो ह्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । मनसा जातानि जीवन्ति । मनः प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय । पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तꣳहोवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थ

भृगु ने अब मन को ब्रह्म समझा—मन के द्वारा प्राणियों के अनुभव और जीवन का क्रम सम्भव है; मन से सम्बन्धित होकर उनका प्रकट होना, जीना और लौटना समझा गया। पर खोज यहीं नहीं रुकी। वे फिर वरुण के पास गए और पिता ने फिर तप द्वारा ब्रह्म को जानने का उपदेश दिया। भृगु ने साधना जारी रखी।

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अनुवाक 3.5 · विज्ञान का विवेचन

विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात् । विज्ञानाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । विज्ञानेन जातानि जीवन्ति । विज्ञानं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । तद्विज्ञाय । पुनरेव वरुणं पितरमुपससार । अधीहि भगवो ब्रह्मेति । तꣳहोवाच । तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व । तपो ब्रह्मेति । स तपोऽतप्यत । स तपस्तप्त्वा ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थ

इसके बाद भृगु ने विज्ञान, अर्थात् विवेकपूर्ण बोध, को ब्रह्म समझा। विज्ञान से प्राणियों का जीवन व्यवस्थित होता है; उसी से वे जीते और उसी में लौटते हैं। वे पुनः पिता के पास गए। वरुण ने वही मार्ग बताया—तप के द्वारा ब्रह्म को जानो। भृगु ने फिर तप किया और अधिक भीतर की खोज की।

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अनुवाक 3.6 · आनन्दो ब्रह्म

आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् । आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । आनन्देन जातानि जीवन्ति । आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति । सैषा भार्गवी वारुणी विद्या । परमे व्योमन्प्रतिष्ठिता । स य एवं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थ

अन्ततः भृगु ने आनन्द को ब्रह्म जाना। आनन्द से ही सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं, आनन्द के सहारे जीते हैं और आनन्द में प्रवेश करते हैं। यही भृगु द्वारा जानी गई और वरुण द्वारा उपदिष्ट भार्गवी वारुणी विद्या है, जो परम आकाश में प्रतिष्ठित कही गई है। इसे जानने वाला प्रतिष्ठा पाता है। उसके लिए अन्न, अन्न का उपभोग, सन्तान, पशुसम्पदा, ब्रह्मतेज और कीर्ति की महिमा कही गई है।

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अनुवाक 3.7 · अन्न की निन्दा न करो

अन्नं न निन्द्यात् । तद्व्रतम् । प्राणो वा अन्नम् । शरीरमन्नादम् । प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम् । शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थ

अन्न की निन्दा न करना व्रत है। उपासना में प्राण को अन्न और शरीर को अन्नाद, अर्थात् उसका ग्रहणकर्ता, कहा गया है। शरीर प्राण पर और प्राण शरीर पर आश्रित है। इस प्रकार अन्न अन्न में प्रतिष्ठित है। इस परस्पर आश्रय को जानने वाले के लिए प्रतिष्ठा, अन्नसम्पन्नता, अन्न का उपभोग तथा सन्तान, पशुसम्पदा, ब्रह्मतेज और कीर्ति का फल कहा गया है।

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अनुवाक 3.8 · अन्न का तिरस्कार न करो

अन्नं न परिचक्षीत । तद्व्रतम् । आपो वा अन्नम् । ज्योतिरन्नादम् । अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठितम् । ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिताः । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थ

अन्न को तिरस्कृत या व्यर्थ न करना व्रत है। इस उपासना में जल अन्न और ज्योति अन्नाद है। ज्योति जल में तथा जल ज्योति में प्रतिष्ठित कहा गया है। दोनों के परस्पर सम्बन्ध को अन्न का अन्न में स्थित होना समझाकर उसी प्रतिष्ठा, अन्नसम्पन्नता और अन्य उपासना-फलों का वर्णन दोहराया गया है।

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अनुवाक 3.9 · अन्न की प्रचुरता का व्रत

अन्नं बहु कुर्वीत । तद्व्रतम् । पृथिवी वा अन्नम् । आकाशोऽन्नादः । पृथिव्यामाकाशः प्रतिष्ठितः । आकाशे पृथिवी प्रतिष्ठिता । तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं वेद प्रतितिष्ठति । अन्नवानन्नादो भवति । महान्भवति प्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन । महान् कीर्त्या ॥ १॥
सरल हिंदी अर्थ

अन्न की प्रचुरता के लिए प्रयत्न करना व्रत है। उपासना में पृथ्वी अन्न और आकाश अन्नाद है। पृथ्वी में आकाश और आकाश में पृथ्वी प्रतिष्ठित है। इस परस्पर आश्रय को जानने वाले के लिए फिर प्रतिष्ठा, अन्न, उसके उपभोग, सन्तान, पशुसम्पदा, ब्रह्मतेज और कीर्ति का फल कहा गया है। अन्न का सम्मान ज्ञान से अलग नहीं रखा गया है।

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अनुवाक 3.10 · अतिथि-सत्कार, उपासना और आनन्दगान

न कञ्चन वसतौ प्रत्याचक्षीत । तद्व्रतम् । तस्माद्यया कया च विधया बह्वन्नं प्राप्नुयात् । अराध्यस्मा अन्नमित्याचक्षते । एतद्वै मुखतोऽन्नꣳराद्धम् । मुखतोऽस्मा अन्नꣳराध्यते । एतद्वै मध्यतोऽन्नꣳराद्धम् । मध्यतोऽस्मा अन्नꣳराध्यते । एतद्वा अन्ततोऽन्नꣳराद्धम् । अन्ततोऽस्मा अन्नꣳराध्यते ॥ १॥ य एवं वेद । क्षेम इति वाचि । योगक्षेम इति प्राणापानयोः । कर्मेति हस्तयोः । गतिरिति पादयोः । विमुक्तिरिति पायौ । इति मानुषीः समाज्ञाः । अथ दैवीः । तृप्तिरिति वृष्टौ । बलमिति विद्युति ॥ २॥ यश इति पशुषु । ज्योतिरिति नक्षत्रेषु । प्रजातिरमृतमानन्द इत्युपस्थे । सर्वमित्याकाशे । तत्प्रतिष्ठेत्युपासीत । प्रतिष्ठावान् भवति । तन्मह इत्युपासीत । महान्भवति । तन्मन इत्युपासीत । मानवान्भवति ॥ ३॥ तन्नम इत्युपासीत । नम्यन्तेऽस्मै कामाः । तद्ब्रह्मेत्युपासीत । ब्रह्मवान्भवति । तद्ब्रह्मणः परिमर इत्युपासीत । पर्येणं म्रियन्ते द्विषन्तः सपत्नाः । परि येऽप्रिया भ्रातृव्याः । स यश्चायं पुरुषे । यश्चासावादित्ये । स एकः ॥ ४॥ स य एवंवित् । अस्माल्लोकात्प्रेत्य । एतमन्नमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य । एतं प्राणमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य । एतं मनोमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य । एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य । एतमानन्दमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य । इमाँल्लोकन्कामान्नी कामरूप्यनुसञ्चरन् । एतत् साम गायन्नास्ते । हा ३ वु हा ३ वु हा ३ वु ॥ ५॥ अहमन्नमहमन्नमहमन्नम् । अहमन्नादोऽ३हमन्नादोऽ३अहमन्नादः । अहꣳश्लोककृदहꣳश्लोककृदहꣳश्लोककृत् । अहमस्मि प्रथमजा ऋता३स्य । पूर्वं देवेभ्योऽमृतस्य ना३भाइ । यो मा ददाति स इदेव मा३अऽवाः । अहमन्नमन्नमदन्तमा३द्मि । अहं विश्वं भुवनमभ्यभवा३म् । सुवर्न ज्योतीः । य एवं वेद । इत्युपनिषत् ॥ ६॥
सरल हिंदी अर्थ

आश्रय माँगने वाले को निवास से लौटा न देना व्रत बताया गया है। इसलिए यथाशक्ति पर्याप्त अन्न जुटाकर अतिथि के लिए अन्न तैयार होने की बात कहनी चाहिए। जिस प्रकार उत्तम, मध्यम या अन्तिम ढंग से अन्न अर्पित किया जाता है, उसी के अनुरूप अन्न की प्राप्ति का फल बताया गया है। अतिथि-सत्कार और अन्नदान का भाव इस आरम्भिक खण्ड का केन्द्र है।

मानव शरीर में ब्रह्म की उपासना वाणी में क्षेम, प्राण-अपान में योगक्षेम, हाथों में कर्म, पैरों में गति और मलत्याग में विमुक्ति के रूप में कही गई है। दैवी क्षेत्र में वर्षा में तृप्ति, विद्युत् में बल, पशुओं में यश, नक्षत्रों में ज्योति और प्रजननशक्ति में सन्तान, अमर परम्परा तथा आनन्द का ध्यान बताया गया है। आकाश में सबके समावेश का भाव लिया गया है।

उसे प्रतिष्ठा मानकर उपासने वाला प्रतिष्ठावान होता है; महत्त्व मानकर उपासने वाला महान होता है; मनरूप उपासने वाला मानसम्मानवान होता है। नमनीय मानकर उपासना करने पर कामनाओं के अनुकूल होने और ब्रह्मरूप उपासना पर ब्रह्मसम्पन्न होने का फल कहा गया है। ब्रह्म को सबका लयस्थान मानने की उपासना में विरोधियों के नष्ट होने का प्राचीन फलवाक्य भी है। इसे यहाँ मूल प्रसंग के रूप में पढ़ा गया है।

मनुष्य में स्थित और सूर्य में स्थित तत्त्व एक है। इसे जानने वाला इस लोक से प्रयाण करके अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय को क्रम से प्राप्त करता हुआ इच्छानुसार रूप और लोकों में विचरण करने की महिमा से वर्णित है। वह हर्षपूर्वक साम गाता है; ‘हा वु’ उसी सामगान का स्तोभ है।

उसका आनन्दोद्गार है—मैं अन्न हूँ, मैं अन्न का भोक्ता हूँ, मैं श्लोक का रचयिता हूँ। मैं ऋत का प्रथमज और देवों से पूर्व अमृत की नाभि हूँ। जो मुझे अर्पित करता है, वह मेरी रक्षा करता है। मैं अन्न हूँ और अन्न खाने वाले को भी अपने में समेटता हूँ। मैं समस्त विश्व में व्याप्त हूँ; मेरा प्रकाश सूर्य के समान है। यह संकीर्ण अहंकार का दावा नहीं, अन्न, भोक्ता और समस्त जगत के एक आधार की अनुभूति का स्तुतिगान है। इसी के साथ भृगुवल्ली पूरी होती है।

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वल्ली का समापन शांतिपाठ

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥

हम गुरु और शिष्य दोनों की रक्षा हो, दोनों का पोषण हो और दोनों मिलकर सामर्थ्य से कार्य करें। हमारा अध्ययन तेजस्वी हो। हम परस्पर द्वेष न करें। तीन बार शांति की प्रार्थना है।

पंचकोश का सरल परिचय

नामसमझने का संकेत
अन्नमयअन्न से बना और अन्न से पोषित शरीर
प्राणमयजीवन की प्राणशक्ति और उसकी क्रियाएँ
मनोमयमन, विचार और संकल्प-विकल्प
विज्ञानमयविवेक और निश्चय करने वाला बोध
आनन्दमयप्रिय, मोद, प्रमोद और आनन्द का अन्तरंग पक्ष

उपनिषद् में ‘अन्योऽन्तर आत्मा’ कहकर एक से अधिक भीतर के आधार की ओर बढ़ाया गया है। इन पाँचों को समझाने के लिए परम्परा में ‘पंचकोश’ शब्द प्रचलित है। इनका निरूपण जैविक अंगों की सूची नहीं, आत्मविचार का क्रम है। ब्रह्म को आनन्दमय का भी आधार बताया गया है। विभिन्न वेदान्त परम्पराएँ इसकी सूक्ष्म व्याख्या अपने-अपने ढंग से करती हैं।

इस ग्रंथ की जीवन-शिक्षा

सत्य बोलना, धर्म का आचरण, अध्ययन जारी रखना, माता-पिता और गुरु का सम्मान, अतिथि-सत्कार और अन्न का आदर—ये ब्रह्मविद्या के साथ रखे गए हैं। भृगु को उत्तर केवल याद करने के लिए नहीं दिया गया; उन्हें बार-बार तप और विवेचन से स्वयं जानने को कहा गया। यहाँ तप का अर्थ साधना, एकाग्र विचार और आत्मअनुशासन के प्रसंग में समझें।

मूल में बताए सन्तान, पशुधन, आयु, प्रतिष्ठा और लोकप्राप्ति के फल उपासना के शास्त्रीय प्रसंग हैं। आनन्द की सौ-सौ गुनी सीढ़ियाँ ज्ञान और निष्कामता का महत्त्व समझाती हैं। अन्तिम सामगान के ‘३’ जैसे प्लुत-चिह्न दीर्घ उच्चारण के संकेत हैं; वे अतिरिक्त अनुवाक-क्रमांक नहीं हैं।

कठिन शब्दों के सरल अर्थ

  • वल्ली: ग्रंथ का प्रमुख अध्याय
  • अनुवाक: पाठ का उपविभाग
  • शिक्षा / शीक्षा: वर्ण और उच्चारण का वैदिक शास्त्र
  • ऋत: सत्य और व्यवस्था का धर्मसम्मत क्रम
  • स्वाध्याय: अपने शास्त्र का नियमित अध्ययन
  • प्रवचन: ज्ञान का अध्यापन और विवेचन
  • ब्रह्मवर्चस: ब्रह्मविद्या का तेज
  • व्याहृति: भूः, भुवः, सुवः आदि पवित्र उच्चारण
  • दम: इन्द्रियों का संयम
  • शम: मन की शांति
  • गुहा: हृदय की अन्तरंग गहराई
  • विज्ञान: प्रसंगानुसार विवेकपूर्ण बोध
  • अकामहत: कामना से आहत न हुआ
  • अन्नाद: अन्न का ग्रहणकर्ता / भोक्ता
  • भार्गवी वारुणी विद्या: वरुण से उपदिष्ट और भृगु द्वारा अनुभूत ब्रह्मविद्या
  • स्तोभ: सामगान में प्रयुक्त विशेष ध्वनि

मूल स्रोत और संपादकीय टिप्पणी

प्राचीन उपनिषद् का मूल सार्वजनिक सम्पदा है। शिक्षावल्ली 12, ब्रह्मानन्दवल्ली 9 और भृगुवल्ली 10—सभी 31 अनुवाक पूरे रखे गए हैं। मूल स्रोत के अनुवाक-समापन वाक्यों के स्थान पर स्पष्ट हिंदी शीर्षक दिए हैं। स्रोत के बीच के संपादकीय विषय-शीर्षक मूल मंत्रों में नहीं मिलाए गए हैं। स्रोत की मूल पंक्तियों और पाठ-खण्डों का क्रम सुरक्षित है। शांतिपाठ आरम्भ और समापन के अपने प्रसंग में रखे हैं। यह स्वरचिह्नों के बिना अध्ययन-पाठ है।

आधार स्रोत में मिले टंकण-दोषों के निम्न सीमित संशोधन अलग दर्ज हैं। अन्य पाठ-रूप और अंतिम सामगान के प्लुत-चिह्न यथावत हैं। यह आलोचनात्मक संस्करण होने का दावा नहीं है।

  • ‘वे`द’ → ‘वेद’ · गैर-संस्कृत बैकटिक हटाया
  • ‘ 3 for prolonging the vowel in the form । अऽऽ ।’ → ‘ ।’ · प्लुत स्वर की अंग्रेजी संपादकीय टिप्पणी अलग की
  • ‘सर्वेलोक महीयन्ते’ → ‘सर्वे लोका महीयन्ते’ · तुलनात्मक पाठ के अनुसार छूटा आकार
  • ‘सर्वे प्राण महीयन्ते’ → ‘सर्वे प्राणा महीयन्ते’ · तुलनात्मक पाठ के अनुसार छूटा आकार
  • ‘तदात्मान स्वयमकुरुत’ → ‘तदात्मानं स्वयमकुरुत’ · तुलनात्मक पाठ के अनुसार अनुस्वार
  • ‘आत्मान स्पृणुते’ → ‘आत्मानं स्पृणुते’ · तुलनात्मक पाठ के अनुसार अनुस्वार · 2 स्थान
  • ‘भुतानि’ → ‘भूतानि’ · स्पष्ट ह्रस्व-दीर्घ टंकण-संशोधन
  • ‘आनन्दाध्येव’ → ‘आनन्दाद्ध्येव’ · तुलनात्मक पाठ के अनुसार संयुक्ताक्षर
  • ‘एदद्वा अन्ततो’ → ‘एतद्वा अन्ततो’ · स्पष्ट द/त टंकण-संशोधन
  • ‘अन्ततोऽस्मा अन्न राध्यते’ → ‘अन्ततोऽस्मा अन्नꣳराध्यते’ · तुलनात्मक पाठ के अनुसार अनुनासिक
  • मुख्य अनुवाकों से बाहर के समान शांतिपाठ में केवल शब्दों के बीच की रिक्तता और अन्तिम दण्ड का विन्यास एकरूप किया गया है।

हिंदी अर्थ, विषय-शीर्षक, सारणी और अध्ययन-संकेत भक्ति भावना की स्वतंत्र सरल व्याख्या हैं; किसी आधुनिक हिंदी अनुवाद की प्रतिलिपि नहीं। अनुवाक का मूल पाठ पूरा है; उसके नीचे अर्थ पढ़ने की सुविधा से अनुच्छेदों में बाँटा गया है।

॥ हरिः ॐ ॥
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