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जानकीमंगल सम्पूर्ण — 192 सोहर, 24 छंद और सरल हिंदी भावार्थ | तुलसीदास
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गोस्वामी तुलसीदास · सीता-राम विवाह का मंगलकाव्य
जानकीमंगल सम्पूर्ण
संपूर्ण मूल पाठ और प्रसंगवार सरल हिंदी भावार्थ
एक ही लेख में192 सोहर24 हरिगीतिका छंद
जानकीमंगल में गोस्वामी तुलसीदास जी ने जनकपुर के स्वयंवर से लेकर सीता-राम के विवाह, विदाई और अयोध्या के स्वागत तक की कथा गाई है। इसकी अवधी भाषा में भक्ति की कोमलता, परिवार का स्नेह, विवाह के मंगलगीत और लोकजीवन का उत्साह साथ मिलते हैं। यह रामचरितमानस से अलग स्वतंत्र रचना है।
पाठ की व्यवस्था: सभी 192 सोहर और 24 हरिगीतिका छंद एक ही लेख में हैं। हर आठ सोहर के बाद आने वाला हरिगीतिका छंद उसी क्रम में रखा गया है। नीचे 24 अध्ययन-प्रसंगों की विषय-सूची है। प्रत्येक समूह के बाद स्वतंत्र सरल भावार्थ दिया है; वह समूह का समेकित अर्थ है, पंक्ति-पंक्ति का शब्दानुवाद नहीं।
1. मंगलाचरण और जनकपुर में स्वयंवर की तैयारी
सोहर 1–8 · हरिगीतिका छंद 1
सोहर 1
गुरु गनपति गिरिजापति गौरि गिरापति।
सारद सेष सुकबि श्रुति संत सरल मति॥१॥
पनु धरेउ सिव धनु रचि स्वयंबर अति रुचिर रचना बनी।
जनु प्रगटि चतुरानन देखाई चतुरता सब आपनी॥
पुनि देस देस सँदेस पठयउ भूप सुनि सुख पावहीं।
सब साजि साजि समाज राजा जनक नगरहिं आवहीं॥१॥
सरल समेकित भावार्थतुलसीदास पहले गुरु, गणेश, शिव-पार्वती, वाणी के अधिष्ठाता, सरस्वती, शेष, कवियों, वेद और सरल हृदय संतों को प्रणाम करते हैं। अपनी बुद्धि की सीमा स्वीकार करके वे सीता-राम के विवाह का गान आरंभ करते हैं। तिरहुत की प्रसिद्ध नगरी जनकपुर में जानकी प्रकट हुई हैं। राजा जनक उनके योग्य विवाह के लिए गुरु और परिवार से सलाह लेते हैं। शिवधनुष की प्रतिज्ञा के साथ स्वयंवर की सुंदर तैयारी होती है और अनेक देशों के राजाओं को संदेश भेजा जाता है।
काहूँ न कीन्हेउ सुकृत सुनि मुनि मुदित नृपहि बखानहीं।
महिपाल मुनि को मिलन सुख महिपाल मुनि मन जानहीं॥
अनुराग भाग सोहाग सील सरूप बहु भूषन भरी।
हिय हरषि सुतन्ह समेत रानी आइ रिषि पायन्ह परी॥२॥
सरल समेकित भावार्थअनेक राजा अपनी सेनाओं और राजसी साज के साथ जनकपुर पहुँचते हैं। नगर और रंगभूमि का सौंदर्य उन्हें आकर्षित करता है; कोई धनुष को प्रणाम करता है, कोई उत्सव देखता है। सीता के विवाह की उमंग हर ओर है। इसी समय विश्वामित्र अयोध्या पहुँचते हैं। दशरथ आदर से उनका स्वागत करके अपने को धन्य मानते हैं। मुनि और राजा का मिलन औपचारिक स्वागत से आगे, परस्पर प्रेम और सम्मान का प्रसंग बन जाता है।
सरल समेकित भावार्थरानियाँ और राजकुमार मुनि का आशीर्वाद लेते हैं। राम को देखकर विश्वामित्र के नेत्र भर आते हैं और शरीर पुलकित हो जाता है। दशरथ विनयपूर्वक उनके आने का प्रयोजन पूछते हैं। मुनि यज्ञ की रक्षा के लिए राम-लक्ष्मण को साथ ले जाने की बात रखते हैं। पुत्र-स्नेह और दिए हुए वचन के बीच राजा निरुत्तर हो जाते हैं। वसिष्ठ उन्हें विश्वामित्र के तप और राम के प्रभाव का स्मरण कराकर धैर्य देते हैं।
बिरचे बिरंचि बनाइ बाँची रुचिरता रंचौ नहीं।
दस चारि भुवन निहारि देखि बिचारि नहिं उपमा कहीं॥
रिषि संग सोहत जात मग छबि बसत सो तुलसी हिएँ।
कियो गवन जनु दिननाथ उत्तर संग मधु माधव लिएँ॥४॥
सरल समेकित भावार्थदशरथ अपनी और परिवार की रक्षा का आधार मुनि की कृपा को मानते हुए दोनों पुत्र उन्हें सौंपते हैं। राम-लक्ष्मण माता-पिता की अनुमति लेकर गुरु के चरण छूते हैं और धनुष-बाण धारण करते हैं। नगरवासियों के मन उनके साथ चले जाते हैं; वे कुशल वापसी की प्रार्थना करते हैं। भरत और शत्रुघ्न प्रेम से विदा देते हैं। कवि दोनों भाइयों की मनोहर छवि को अपनी स्मृति का स्थायी धन मानता है।
गौतम नारि उधारि पठै पति धामहि।
जनक नगर लै गयउ महामुनि रामहि॥४०॥
हरिगीतिका 5
लै गयउ रामहि गाधि सुवन बिलोकि पुर हरषे हिएँ।
सुनि राउ आगे लेन आयउ सचिव गुर भूसुर लिएँ॥
नृप गहे पाय असीस पाई मान आदर अति किएँ।
अवलोकि रामहि अनुभवत मनु ब्रह्मसुख सौगुन किएँ॥५॥
सरल समेकित भावार्थरास्ते में दोनों भाई बाल-सुलभ उत्साह से पहाड़, पेड़, बेल, नदी, पक्षी और मृग देखते हैं; साथ ही गुरु की मर्यादा का ध्यान रखते हैं। राम ताड़का का वध करते हैं और मुनि से विद्या प्राप्त करते हैं। यज्ञ में बाधा डालने वाले राक्षसों का निवारण कर ऋषियों को निर्भय करते हैं। विश्वामित्र उन्हें धनुषयज्ञ के अवसर पर जनकपुर ले चलते हैं। मार्ग में गौतम-पत्नी का उद्धार होता है। जनक राम-दर्शन में अत्यंत आनंद अनुभव करते हैं।
पूषन बंस बिभूषन दसरथ नंदन।
नाम राम अरु लखन सुरारि निकंदन॥४७॥
सोहर 48
रूप सील बय बंस राम परिपूरन।
समुझि कठिन पन आपन लाग बिसूरन॥४८॥
हरिगीतिका 6
लागे बिसूरन समुझि पन मन बहुरि धीरज आनि कै।
लै चले देखावन रंगभूमि अनेक बिधि सनमानि कै॥
कौसिक सराही रुचिर रचना जनक सुनि हरषित भए।
तब राम लखन समेत मुनि कहँ सुभग सिंहासन दए॥६॥
सरल समेकित भावार्थविरक्त जनक भी राम के रूप और शील से स्नेह में बँध जाते हैं। वे विश्वामित्र से दोनों राजकुमारों का परिचय पूछते हैं। मुनि बताते हैं कि ये दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण हैं, जिनका स्वरूप परमार्थमय है। राम के गुणों को देखकर राजा को अपनी कठोर धनुष-प्रतिज्ञा का ध्यान आता है और चिंता होती है। फिर धैर्य रखकर वे मुनि और दोनों भाइयों को रंगभूमि में उचित सम्मान से बैठाते हैं।
कटि निषंग कर कमलन्हि धरें धनु-सायक।
सकल अंग मन मोहन जोहन लायक॥५४॥
सोहर 55
राम-लखन-छबि देखि मगन भए पुरजन।
उर अनंद जल लोचन प्रेम पूलक तन॥५५॥
सोहर 56
नारि परस्पर कहहिं देखि दोउ भाइन्ह।
लहेउ जनम फल आजु जनमि जग आइन्ह॥५६॥
हरिगीतिका 7
जग जनमि लोयन लाहु पाए सकल सिवहि मनावहीं।
बरु मिलौ सीतहि साँवरो हम हरषि मंगल गावहीं॥
एक कहहिं कुँवरु किसोर कुलिस कठोर सिव धनु है महा।
किमि लेहिं बाल मराल मंदर नृपहि अस काहुँ न कहा॥७॥
सरल समेकित भावार्थराजाओं के बीच राम और लक्ष्मण की श्याम-गौर जोड़ी सबको मोह लेती है। उनके नेत्र, मुख, तिलक, वेश, आभूषण और धनुष-बाण का सौंदर्य कवि अनेक उपमाओं से व्यक्त करता है। नगरवासी उनके दर्शन में जन्म सफल मानते हैं। स्त्रियाँ चाहती हैं कि सीता को यही साँवले वर मिलें। फिर कठोर शिवधनुष और कोमल राजकुमार को देखकर उनके मन में संशय भी उठता है। प्रेम के साथ चिंता का यह स्वाभाविक भाव चलता है।
मनसिज मनोहर मधुर मूरति कस न सादर जोवहू।
बिनु काज राज समाज महुँ तजि लाज आपु बिगोवहू॥
सिष देइ भूपति साधु भूप अनूप छबि देखन लगे।
रघुबंस कैरव चंद चितइ चकोर जिमि लोचन लगे॥८॥
सरल समेकित भावार्थराम को देखकर कुछ राजा निराश होते हैं और जनक की प्रतिज्ञा पर अलग-अलग बातें कहते हैं। समझदार राजा उन्हें व्यर्थ अभिमान छोड़ने को कहते हैं: राम के तेज और प्रभाव को केवल कोमल रूप से नहीं आँकना चाहिए। जो सामने देखकर भी सौंदर्य और गुण का आदर नहीं करता, वह अपने ही अवसर को खोता है। मुनि के बीच बैठे दोनों भाई कमलों के बीच सूर्य की तरह सुशोभित हैं। अंततः विवेकी लोग विवाद छोड़कर दर्शन में मन लगाते हैं।
जनु दमक दामिनि रूप रति मद निदरि सुंदरि सोहहीं।
मुनि ढिग देखाए सखिन्ह कुँवर बिलोकि छबि मन मोहहीं॥
सिय मातु हरषी निरखि सुषमा अति अलौकिक रामकी।
हिय कहति कहँ धनु कुँअर कहँ बिपरीत गति बिधि बाम की॥९॥
सरल समेकित भावार्थनगरवासियों में जनक के निर्णय पर चर्चा होती है। कोई प्रेमवश उन्हें दोष देता है, कोई समझाता है कि घोषित वचन छोड़ना राजा की प्रतिष्ठा और सत्यनिष्ठा के अनुकूल नहीं है। लोग आशा रखते हैं कि राम धनुष चढ़ाकर प्रतिज्ञा भी पूरी करेंगे और विवाह भी होगा। महल के झरोखों से रानियाँ राजकुमारों को देखती हैं। सुनयना राम के अलौकिक सौंदर्य से प्रसन्न हैं, लेकिन धनुष की कठोरता और उनकी किशोर देह का विचार उन्हें चिंतित करता है।
सुनि जिय भयउ भरोस रानि हिय हरषइ।
बहुरि निरखि रघुबरहि प्रेम मन करषद॥७९॥
सोहर 80
नृप रानी पुर लोग राम तन चितवहिं।
मंजु मनोरथ कलस भरहिं अरु रितवहिं॥८०॥
हरिगीतिका 10
रितवहिं भरहिं धनु निरखि छिनु-छिनु निरखि रामहि सोचहीं।
नर नारि हरष बिषाद बस हिय सकल सिवहिं सकोचहीं॥
तब जनक आयसु पाइ कुलगुर जानकिहि लै आयऊ।
सिय रूप रासि निहारि लोचन लाहु लोगन्हि पायऊ॥१०॥
सरल समेकित भावार्थसुनयना अपना संशय सखियों से कहती हैं। सखी उन्हें विश्वामित्र के ज्ञान और विवेक पर भरोसा रखने को कहती है; इतने समर्थ मुनि बिना सामर्थ्य जाने बालकों को यहाँ क्यों लाते? राम के पराक्रम का समाचार सुनकर रानी को विश्वास मिलता है। फिर भी धनुष देखकर चिंता और राम को देखकर आशा बार-बार लौटती है। इसी बीच जनक की आज्ञा से कुलगुरु सीता को रंगभूमि में लाते हैं। उनके रूप-दर्शन से उपस्थित लोगों को नया आनंद मिलता है।
नहि सगुन पायउ रहे मिसु करि एक धनु देखन गए।
टकटोरि कपि ज्यों नारियरु, सिरु नाइ सब बैठत भए॥
एक करहिं दाप, न चाप सज्जन बचन जिमि टारें टरै।
नृप नहुष ज्यों सब के बिलोकत बुद्धि बल बरबस हरै॥११॥
सरल समेकित भावार्थसीता मंगलमय वस्त्र और आभूषणों में सुशोभित हैं। नगरवासी कभी सीता और कभी राम को देखकर उनके रूप, गुण, अवस्था और कुल की अनुकूलता पर मुग्ध होते हैं। दोनों एक-दूसरे को देखते हैं और प्रेम को संकोच में सँभालते हैं। जनक की प्रतिज्ञा सुनकर राजा उत्साह से उठते हैं, पर धनुष के सामने उनकी सामर्थ्य चुक जाती है। किसी का दिखावा काम नहीं आता; बल का अभिमान वास्तविक परीक्षा में टिक नहीं पाता।
मुनि हँसि कहेउ जनक यह मूरति सोहइ।
सुमिरत सकृत मोह मल सकल बिछोहइ॥९६॥
हरिगीतिका 12
सब मल बिछोहनि जानि मूरति जनक कौतुक देखहू।
धनु सिंधु नृप बल जल बढ्यो रघुबरहि कुंभज लेखह॥
सुनि सकुचि सोचहिं जनक गुर पद बंदि रघुनंदन चले।
नहिं हरष हृदय बिषाद कछु भए सगुन सुभ मंगल भले॥१२॥
सरल समेकित भावार्थराजाओं की असफलता से जनक और परिवार निराश होते हैं। विश्वामित्र राम को धनुष दिखाने की अनुमति माँगते हैं। जनक मुनि के वचन की शक्ति मानते हैं, किंतु राजकुमार की कोमलता के कारण अपना संकोच बताते हैं। मुनि उन्हें राम के स्वरूप का स्मरण कराते हैं और कौतुक देखने को कहते हैं। राम गुरु को प्रणाम कर सहज भाव से उठते हैं। उनके मन में न विजय का उन्माद है और न कठिनाई का भय।
सरल समेकित भावार्थराम के उठते ही देवताओं में आनंद होता है। लक्ष्मण पृथ्वी और पर्वतों को स्थिर रहने का संकेत देते हैं। सीता का मन संकोच और आशंका से व्याकुल है; वे गौरी, गणेश और शिव का स्मरण करती हैं। अंतर्यामी राम सबके हृदय का भाव जानते हैं। वे सहजता से धनुष चढ़ाकर खींचते हैं और उसे तोड़ देते हैं। उसके प्रचंड नाद से जगत चकित होता है। प्रेम करने वालों की आशा पूरी होती है और विरोधियों का अभिमान टूट जाता है।
बरषहिं बिबुध प्रसून हरषि कहि जय जए।
सुख सनेह भरे भुवन राम गुर पहँ गए॥११२॥
हरिगीतिका 14
गए राम गुरु पहिं राउ रानी नारि-नर आनंद भरे।
जनु तृषित करि करिनी निकर सीतल सुधासागर परे॥
कौसिकहि पूजि प्रसंसि आयसु पाइ नृप सुख पायऊ।
लिखि लगन तिलक समाज सजि कुल गुरहि अवध पठायऊ॥१४॥
सरल समेकित भावार्थधनुषभंग के बाद आकाश और नगर मंगलध्वनि से भर जाते हैं। सखियाँ सीता को जयमाला लेकर आती हैं। वे संकोच और प्रेम से राम को देखती हुई उनके गले में माला डालती हैं। इस अनुपम मिलन पर परिवार, नगर और देवता आनंदित होते हैं। राम फिर गुरु के पास जाते हैं। जनक विश्वामित्र का आदर करके विवाह की आगे की तैयारी करते हैं और लग्नपत्र तथा तिलक की सामग्री के साथ कुलगुरु को अयोध्या भेजते हैं।
नियरानि नगर बरात हरषी लेन अगवानी गए।
देखत परस्पर मिलत मानत प्रेम परिपूरन भए॥
आनंदपुर कौतुक कोलाहल बनत सो बरनत कहाँ।
लै दियो तहँ जनवास सकल सुपास नित नूतन जहाँ॥१५॥
सरल समेकित भावार्थजनक मंडप बनवाते हैं; घर में मंगलगीत, हल्दी और कुलपरंपरा के संस्कार होते हैं। सीता-राम के कल्याण के लिए गौरी-गणेश का पूजन किया जाता है। शतानंद अयोध्या जाकर दशरथ को लग्नपत्र और कुशल समाचार देते हैं। अयोध्या में बधाइयाँ बजती हैं और बरात सजती है। गणेश का स्मरण करके दशरथ जनकपुर की ओर चलते हैं। दोनों पक्ष प्रेमपूर्वक अगवानी और आदर करते हैं; बरात को सुविधापूर्ण जनवास दिया जाता है।
चले सुमिरि गुर सुर सुमन बरषहिं परे बहुबिधि पावड़े।
सनमानि सब बिधि जनक दसरथ किये प्रेम कनावड़े॥
गुन सकल सम समधी परस्पर मिलन अति आनंद लहे।
जय धन्य जय जय धन्य धन्य बिलोकि सुर नर मुनि कहे ॥१६॥
सरल समेकित भावार्थविश्वामित्र राम-लक्ष्मण को लेकर जनवास जाते हैं। पुत्रों को देखकर दशरथ अत्यंत आनंदित होते हैं और उन्हें हृदय से लगाते हैं। राजा मुनि का पूजन और दान करते हैं। विवाह के वेश में राम सबके नेत्रों को आनंद देते हैं। जनक बरात के लिए अनेक भेंटें भेजते हैं और विधिपूर्वक मंडप में आमंत्रित करते हैं। दोनों समधी एक-दूसरे का सम्मान करते हैं; उनके गुण, विनय और आत्मीयता इस मिलन को और सुंदर बनाते हैं।
करि आरती निछावरि बरहि निहारहिं।
प्रेम मगन प्रमदागन तन न सँभारहिं॥१३६॥
हरिगीतिका 17
नहिं तन सम्हारहिं छबि निहारहिं निमिष रिपु जनु रनु जए।
चक्रवै लोचन राम रूप सुराज सुख भोगी भए॥
तब जनक सहित समाज राजहि उचित रुचिरासन दए।
कौसिक बसिष्ठहि पूजि पूजे राउ दै अंबर नए॥१७॥
सरल समेकित भावार्थजनक और दशरथ की जोड़ी की उपमा कवि उन्हीं दोनों से देता है। रनिवास में आनंद, गीत और परिहास है। उमा और लक्ष्मी जैसी देवियाँ भी स्त्री-वेश में उत्सव में सम्मिलित होती हैं। आरती और परिछन के समय राम को देखकर स्त्रियाँ भावविभोर हैं। वे अपने नेत्रों को धन्य मानती हैं और कुलरीति निभाते हुए बार-बार दूल्हे को निहारती हैं। फिर जनक सहित सबको उचित आसन और आदर दिया जाता है।
सरल समेकित भावार्थराम को अर्घ्य देकर विवाह-मंडप में लाया जाता है। दोनों पुरोहित समयानुकूल वैदिक विधि और कुलपरंपरा के संस्कार कराते हैं। सखियाँ सीता को लाती हैं और दूल्हा-दुल्हन के दर्शन से सब आनंदित होते हैं। मंगलगीत तथा गौरी-गणेश पूजन के बीच जनक अग्नि स्थापित करके कन्यादान का संकल्प लेते हैं। आगे सिंदूर, होम, लावा, भाँवर और शिलारोहण जैसे विवाह-संस्कारों का वर्णन आता है। यह विवाह-प्रसंग राम और सीता के मंगलमय मिलन का उत्सव है।
सरल समेकित भावार्थविवाह संपन्न होने पर देवता पुष्प बरसाते हैं और मुनि आशीर्वाद देते हैं। सखियाँ दूल्हा-दुल्हन को कोहबर ले जाती हैं। निछावर, लहकौरि, हँसी-परिहास और खेलों में घर का आनंद प्रकट होता है। सीता के भाई की भूमिका में भौम के आने का काव्य-प्रसंग भी है। सुनयना आरती उतारती हैं और पूरा रनिवास सीता-राम को देखकर पुलकित है। चारों विवाहों के समाचार से उत्सव का आनंद और बढ़ जाता है।
राम बिबाह समान बिबाह तीनिउ भए।
जीवन फल लोचन फल बिधि सब कहँदए॥१५५॥
सोहर 156
दाइज भयउ बिबिध बिधि जाइ न सो गनि।
दासी दास बाजि गज हेम बसन मनि॥१५६॥
सोहर 157
दान मान परमान प्रेम पूरन किए।
समधी सहित बरात बिनय बस करि लिए॥१५७॥
सोहर 158
गे जनवासे राउ संगु सुत सुतबहु।
जनु पाए फल चारि सहित साधन चहु॥१५८॥
सोहर 159
चहु प्रकार जेवनार भई बहु भाँतिन्ह।
भोजन करत अवधपति सहित बरातिन्ह॥१५९॥
सोहर 160
देहि गारि बर नारि नाम लै दुहु दिसि।
जेंवत बढ्यो अनंद सुहावनि सो निसि॥१६०॥
हरिगीतिका 20
सो निसि सोहावनि मधुर गावति बाजने बाजहिं भले।
नृप कियो भोजन पान पाइ प्रमोद जनवासेहि चले॥
नट भाट मागध सूत जाचक जस प्रतापहि बरनहीं।
सानंद भूसुर बृंद मनि गज देत मन करषै नहीं॥२०॥
सरल समेकित भावार्थजनक के भाई की पुत्रियों में बड़ी का विवाह भरत से और श्रुतकीर्ति का विवाह शत्रुघ्न से होता है; सीता की छोटी बहन लक्ष्मण को ब्याही जाती हैं। तीनों विवाह भी राम के विवाह जैसी रीति और आनंद से संपन्न होते हैं। अतिथियों का सम्मान, भेंट और जेवनार होती है। स्त्रियों के विवाहगीतों और परिहास से रात सुहावनी बनती है। कवि अपने समय के राजपरिवार की रीति का वर्णन कर रहा है; भेंट की सूची को आज के विवाह में अपेक्षा या अनिवार्य माँग न समझें।
जन जानि करब सनेह बलि, कहि दीन बचन सुनावहीं।
अति प्रेम बारहिं बार रानी बालिकन्हि उरलावहीं॥
सिय चलत पुरजन नारि हय गय बिहँग मृगब्याकुल भए।
सुनि बिनय सासु प्रबोधि तब रघुबंस मनिपितु पहिं गए॥२१॥
सरल समेकित भावार्थजनक बरात को कई दिन आत्मीयता से रोककर सेवा करते हैं। प्रातः विदाई का समाचार सुनकर माताएँ बिछोह में रात भर सो नहीं पातीं। राम भाइयों सहित महल में आकर विदा माँगते हैं। सुनयना आरती उतारते हुए प्रेम से व्याकुल होती हैं। वे बेटियों को सौंपकर राम से स्नेह और कृपा बनाए रखने की विनती करती हैं। सीता की विदाई से नगर के लोग ही नहीं, पशु-पक्षी तक करुण भाव में चित्रित हैं। राम सबको सांत्वना देकर पिता के पास जाते हैं।
जनि छोह छाड़ब बिनय सुनि रघुबीर बहुबिनती करी।
मिलि भेटि सहित सनेह फिरेउ बिदेह मनधीरज धरी॥
सो समौ कहत न बनत कछु सब भुवन भरिकरुना रहे।
तब कीन्ह कोसलपति पयान निसान बाजेगहगहे॥२२॥
सरल समेकित भावार्थबरात अयोध्या के लिए चलती है। जनक सीता को गले लगाकर सीख देते हैं और गुरु, मंत्री तथा बंधुओं के साथ पहुँचाने आते हैं। दशरथ उन्हें लौटने के लिए कहते हैं; दोनों समधियों की विनय में गहरा सम्मान है। जनक मुनियों के चरण पकड़ते हैं और राम से अपने को स्मरण रखने की प्रार्थना करते हैं। राम भी प्रेमपूर्वक उत्तर देते हैं। अंततः जनक धैर्य धारण करके लौटते हैं; विदाई का करुण वातावरण कवि के लिए शब्दों से परे है।
सरल समेकित भावार्थवापसी के मार्ग में क्रोधित परशुराम मिलते हैं। राम उन्हें संतुष्ट करते हैं; वे क्रोध छोड़कर अपना धनुष सौंपते और दर्शन का लाभ लेकर चले जाते हैं। राम के प्रभाव से बराती प्रसन्न होते हैं। दशरथ चारों पुत्रों का विवाह करके अयोध्या लौटते हैं। वहाँ नगरवासी मार्ग, द्वार, बाजार और घर सजाते हैं। कलश, ध्वज, बंदनवार और आरती की तैयारी होती है। माताएँ बहुओं सहित पुत्रों की अगवानी के लिए हर्ष से निकलती हैं।
बिकसहिं कुमुद जिमि देखि बिधु भइ अवधसुख सोभामई।
एहि जुगुति राम बिबाह गावहिं सकल कबि कीरति नई॥
उपबीत ब्याह उछाह जे सिय राम मंगल गावहीं।
तुलसी सकल कल्यान ते नर नारि अनुदिन पावहीं॥२४॥
सरल समेकित भावार्थमाताएँ चारों पुत्रों और बहुओं को देखकर बार-बार आरती उतारती हैं। नगर की स्त्रियाँ दुल्हनों के दर्शन करके अपने नेत्र और जीवन को सफल मानती हैं। घर में स्वागत, मंगलकार्य, दान और परिजनों का सम्मान होता है। चारों जोड़ों को आशीर्वाद देकर सब प्रसन्न हैं, जैसे चंद्रमा के उदय से कुमुद खिल उठते हैं। तुलसीदास समापन में सीता-राम के मंगलगान को कल्याणकारी बताते हैं। यह भक्ति और मंगलकामना की फलश्रुति है।
आधार के वेब-पाठ में हरिगीतिका 19 का अधिकांश अंश तथा सोहर 153 की पहली पंक्ति छूटी हुई थी; इन्हें अनुभूति और कविता कोश के उपलब्ध पाठ से मिलाकर रखा गया है। सोहर 148 का मूल अंश गद्य से अलग किया गया है। पाठ में घुले दो संपादकीय शीर्षक और स्पष्ट दुहराव हटाए गए हैं; कुछ स्पष्ट टंकण-दोष तुलनात्मक पाठ के आधार पर सुधारे गए हैं। अवधी की मूल वर्तनी और अलग-अलग छंदों का क्रम रखा गया है। संस्करणों में छोटे वर्तनी-पाठांतर मिल सकते हैं।
भावार्थ: भक्ति भावना की स्वतंत्र सरल व्याख्या। अध्ययन-प्रसंगों के शीर्षक सुविधा के लिए हैं। राजपरिवार की ऐतिहासिक विवाह-रीतियों का वर्णन आधुनिक पाठक के लिए सभी प्रथाओं का अनिवार्य निर्देश नहीं है।
🚩 श्री राम भजन ओ मेरे रघुवर तू ही सहारा है प्रभु श्रीराम के प्रति प्रेम, विश्वास और पूर्ण समर्पण से भरा सुंदर भक्तिमय भजन। ▶ Instagram पर भजन देखें भजन लिरिक्स ॥ श्री राम ॥ ओ मेरे रघुवर तू ही सहारा है, मेरी नैय्यां का तू ही किनारा है।। ओ मेरे रघुवर तू ही सहारा है, मेरे रघुवर तू ही सहारा है।। मेरे ख्वाबों में तू, मेरी स्वासों में तू, मेरे दिल की धड़कन में, बस तू ही तू। मेरे ख्वाबों में तू, मेरी स्वासों में तू, मेरे दिल की धड़कन में, बस तू ही तू।। दीवाने तेरे प्यार में, बड़ा ही बुरा हाल, है पड़ा हूँ तेरे दर पे, ना होश ना ख्याल। मेरी नैय्यां का तू ही किनारा है, ओ मेरे रघुवर तू ही सहारा है, मेरे रघुवर तू ही सहारा है।। मेरी नैय्यां का तू ही किनारा है।। अंधेरों में जैसे उजाले हो तुम उजाले ही तुम, गिरतों को कितने सम्हाले हो तुम, सम्हाले ही तुम। तेरे बिना रघुवर मेरी, दुनियाँ वीरान है, तेरी किरपा से मेरी दुनियाँ में पहिचान है। मेरी नैय्यां का तू ही किनारा है, ओ मेरे रघुवर तू ही...
🚩 श्रीरामचरितमानस श्रीरामचरितमानस की 24 प्रसिद्ध चौपाइयाँ प्रेम, भक्ति, सत्संग, कर्म, सद्बुद्धि, परोपकार और प्रभु श्रीराम की कृपा का मार्ग दिखाने वाली श्रीरामचरितमानस की प्रसिद्ध चौपाइयाँ सरल हिंदी अर्थ सहित। श्रीरामचरितमानस गोस्वामी तुलसीदासजी की अमर रचना है। इसमें प्रभु श्रीराम की कथा के साथ जीवन, भक्ति, धर्म, प्रेम, कर्म, सदाचार, सत्संग और लोककल्याण की अनेक शिक्षाएँ मिलती हैं। यहाँ 24 प्रसिद्ध चौपाइयों को सरल भावार्थ के साथ प्रस्तुत किया गया है, ताकि उनके संदेश को सहज रूप से समझा और जीवन में अपनाया जा सके। 📜 इस संग्रह में ❤️ प्रेम और भक्ति 🌿 जीवन और नीति 🙏 संकट और विश्वास 🚩 रामराज्य और आदर्श जीवन ❤️ प्रेम और भक्ति प्रभु-प्रेम, समर्पण और निर्मल हृदय का संदेश 01 प्रभु को केवल प्रेम प्रिय है रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा॥ ...
🌺 श्रीरामचरितमानस • बालकाण्ड जय जय गिरिवरराज किशोरी — सीता जी की गौरी स्तुति पुष्पवाटिका में प्रभु श्रीराम के दर्शन के बाद माता सीता द्वारा माता गौरी से की गई पावन प्रार्थना, संपूर्ण प्रसंग और सरल हिंदी अर्थ सहित। माता सीता ने गौरी स्तुति कब की? श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में जनकपुर की पुष्पवाटिका का अत्यंत सुंदर प्रसंग आता है। माता सीता अपनी सखियों के साथ गौरी पूजन के लिए आई थीं। इसी वाटिका में उन्होंने पहली बार प्रभु श्रीराम को देखा। श्रीराम के दिव्य स्वरूप को देखकर उनका मन प्रेम से भर गया। उसी समय उन्हें अपने पिता महाराज जनक का वह प्रण भी स्मरण हुआ कि जो शिवजी के महान धनुष को उठाकर तोड़ेगा, उसी से सीता का विवाह होगा। माता सीता श्रीराम की छवि को हृदय में धारण करके पुनः माता भवानी के मंदिर में गईं और हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगीं। 🌸 पुष्पवाटिका में श्रीराम के दर्शन 🏹 पिता जनक के प्रण का स्मरण 🙏 गौरी माता से प्रार्थना ...
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