जानकीमंगल सम्पूर्ण — 192 सोहर, 24 छंद और सरल हिंदी भावार्थ | तुलसीदास

गोस्वामी तुलसीदास · सीता-राम विवाह का मंगलकाव्य

जानकीमंगल सम्पूर्ण

संपूर्ण मूल पाठ और प्रसंगवार सरल हिंदी भावार्थ

एक ही लेख में192 सोहर24 हरिगीतिका छंद

जानकीमंगल में गोस्वामी तुलसीदास जी ने जनकपुर के स्वयंवर से लेकर सीता-राम के विवाह, विदाई और अयोध्या के स्वागत तक की कथा गाई है। इसकी अवधी भाषा में भक्ति की कोमलता, परिवार का स्नेह, विवाह के मंगलगीत और लोकजीवन का उत्साह साथ मिलते हैं। यह रामचरितमानस से अलग स्वतंत्र रचना है।

पाठ की व्यवस्था: सभी 192 सोहर और 24 हरिगीतिका छंद एक ही लेख में हैं। हर आठ सोहर के बाद आने वाला हरिगीतिका छंद उसी क्रम में रखा गया है। नीचे 24 अध्ययन-प्रसंगों की विषय-सूची है। प्रत्येक समूह के बाद स्वतंत्र सरल भावार्थ दिया है; वह समूह का समेकित अर्थ है, पंक्ति-पंक्ति का शब्दानुवाद नहीं।

1. मंगलाचरण और जनकपुर में स्वयंवर की तैयारी

सोहर 1–8 · हरिगीतिका छंद 1

सोहर 1
गुरु गनपति गिरिजापति गौरि गिरापति। सारद सेष सुकबि श्रुति संत सरल मति॥१॥
सोहर 2
हाथ जोरि करि बिनय सबहि सिर नावौं। सिय रघुबीर बिबाहु जथामति गावौं ॥२॥
सोहर 3
सुभ दिन रच्यौ स्वयंबर मंगलदायक। सुनत श्रवन हिय बसहिं सीय रघुनायक॥ ३॥
सोहर 4
देस सुहावन पावन बेद बखानिय। भूमि तिलक सम तिरहुति त्रिभुवन जानिय॥४॥
सोहर 5
तहँ बस नगर जनकपुर परम उजागर। सीय लच्छि जहँ प्रगटी सब सुख सागर॥५॥
सोहर 6
जनक नाम तेहिं नगर बसै नरनायक। सब गुन अवधि न दूसर पटतर लायक॥६॥
सोहर 7
भयउ न होइहि है न जनक सम नरवइ। सीय सुता भइ जासु सकल मंगलमइ॥७॥
सोहर 8
नृप लखि कुँअरि सयानि बोलि गुर परिजन। करि मत रच्यौ स्वयंबर सिव धनु धरि पन॥८॥
हरिगीतिका 1
पनु धरेउ सिव धनु रचि स्वयंबर अति रुचिर रचना बनी। जनु प्रगटि चतुरानन देखाई चतुरता सब आपनी॥ पुनि देस देस सँदेस पठयउ भूप सुनि सुख पावहीं। सब साजि साजि समाज राजा जनक नगरहिं आवहीं॥१॥
सरल समेकित भावार्थतुलसीदास पहले गुरु, गणेश, शिव-पार्वती, वाणी के अधिष्ठाता, सरस्वती, शेष, कवियों, वेद और सरल हृदय संतों को प्रणाम करते हैं। अपनी बुद्धि की सीमा स्वीकार करके वे सीता-राम के विवाह का गान आरंभ करते हैं। तिरहुत की प्रसिद्ध नगरी जनकपुर में जानकी प्रकट हुई हैं। राजा जनक उनके योग्य विवाह के लिए गुरु और परिवार से सलाह लेते हैं। शिवधनुष की प्रतिज्ञा के साथ स्वयंवर की सुंदर तैयारी होती है और अनेक देशों के राजाओं को संदेश भेजा जाता है।
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2. राजाओं का आगमन और विश्वामित्र का आतिथ्य

सोहर 9–16 · हरिगीतिका छंद 2

सोहर 9
रूप सील बय बंस बिरुद बल दल भले। मनहुँ पुरंदर निकर उतरि अवनिहिं चले॥९॥
सोहर 10
दानव देव निसाचर किंनर अहिगन। सुनि धरि-धरि नृप बेष चले प्रमुदित मन॥१०॥
सोहर 11
एक चलहिं एक बीच एक पुर पैठहिं। एक धरहिं धनु धाय नाइ सिरु बैठहिं॥११॥
सोहर 12
रंग भूमि पुर कौतुक एक निहारहि। ललकि सुभाहिं नयन मन फेरि न पावहिं॥१२॥
सोहर 13
जनकहि एक सिहाहिं देखि सनमानत। बाहर भीतर भीर न बनै बखानत ॥१३॥
सोहर 14
गान निसान कोलाहल कौतुक जहँ तहँ। सीय-बिबाह उछाह जाइ कहि का पहँ॥१४॥
सोहर 15
गाधि सुवन तेहि अवसर अवध सिधायउ। नृपति कीन्ह सनमान भवन लै आयउ॥१५॥
सोहर 16
पूजि पहुनई कीन्ह पाइ प्रिय पाहुन। कहेउ भूप मोहि सरिस सुकृत किए काहु न॥१६॥
हरिगीतिका 2
काहूँ न कीन्हेउ सुकृत सुनि मुनि मुदित नृपहि बखानहीं। महिपाल मुनि को मिलन सुख महिपाल मुनि मन जानहीं॥ अनुराग भाग सोहाग सील सरूप बहु भूषन भरी। हिय हरषि सुतन्ह समेत रानी आइ रिषि पायन्ह परी॥२॥
सरल समेकित भावार्थअनेक राजा अपनी सेनाओं और राजसी साज के साथ जनकपुर पहुँचते हैं। नगर और रंगभूमि का सौंदर्य उन्हें आकर्षित करता है; कोई धनुष को प्रणाम करता है, कोई उत्सव देखता है। सीता के विवाह की उमंग हर ओर है। इसी समय विश्वामित्र अयोध्या पहुँचते हैं। दशरथ आदर से उनका स्वागत करके अपने को धन्य मानते हैं। मुनि और राजा का मिलन औपचारिक स्वागत से आगे, परस्पर प्रेम और सम्मान का प्रसंग बन जाता है।
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3. मुनि की याचना और दशरथ का संकोच

सोहर 17–24 · हरिगीतिका छंद 3

सोहर 17
कौसिक दीन्हि असीस सकल प्रमुदित भईं। सींची मनहुँ सुधा रस कलप लता नईं॥१७॥
सोहर 18
रामहि भाइन्ह सहित जबहिं मुनि जोहेउ। नैन नीर तन पुलक रूप मन मोहेउ॥१८॥
सोहर 19
परसि कमल कर सीस हरषि हियँ लावहिं। प्रेम पयोधि मगन मुनि पार न पावहिं॥१९॥
सोहर 20
मधुर मनोहर मूरति सादर चाहहिं। बार बार दसरथके सुकृत सराहहिं॥ २०॥
सोहर 21
राउ कहेउ कर जोर सुबचन सुहावन। भयउ कृतारथ आजु देखि पद पावन॥२१॥
सोहर 22
तुम्ह प्रभु पूरन काम चारि फलदायक। तेहिं तें बूझत काजु डरौं मुनिनायक॥२२॥
सोहर 23
कौसिक सुनि नृप बचन सराहेउ राजहि। धर्म कथा कहि कहेउ गयउ जेहि काजहि॥२३॥
सोहर 24
जबहिं मुनीस महीसहि काजु सुनायउ। भयउ सनेह सत्य बस उतरु न आयउ॥२४॥
हरिगीतिका 3
आयउ न उतरु बसिष्ठ लखि बहु भाँति नृप समझायऊ। कहि गाधिसुत तप तेज कछु रघुपति प्रभाउ जनायऊ॥ धीरज धरेउ सुर बचन सुनि कर जोरि कह कोसल धनी। करुना निधान सुजान प्रभु सो उचित नहिं बिनती घनी॥३॥
सरल समेकित भावार्थरानियाँ और राजकुमार मुनि का आशीर्वाद लेते हैं। राम को देखकर विश्वामित्र के नेत्र भर आते हैं और शरीर पुलकित हो जाता है। दशरथ विनयपूर्वक उनके आने का प्रयोजन पूछते हैं। मुनि यज्ञ की रक्षा के लिए राम-लक्ष्मण को साथ ले जाने की बात रखते हैं। पुत्र-स्नेह और दिए हुए वचन के बीच राजा निरुत्तर हो जाते हैं। वसिष्ठ उन्हें विश्वामित्र के तप और राम के प्रभाव का स्मरण कराकर धैर्य देते हैं।
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4. राम-लक्ष्मण का मुनि के साथ प्रस्थान

सोहर 25–32 · हरिगीतिका छंद 4

सोहर 25
नाथ मोहि बालकन्ह सहित पुर परिजन। राखनिहार तुम्हार अनुग्रह घर बन॥२५॥
सोहर 26
दीन बचन बहु भाँति भूप मुनि सन कहे। सौंपि राम अरु लखन पाय पंकज गहे॥२६॥
सोहर 27
पाइ मातु पितु आयसु गुरु पायन्ह परे। कटि निषंग पट पीत करनि सर धनु धरे॥२७॥
सोहर 28
पुरबासी नृप रानिन्ह संग दिये मन। बेगि फिरेउ करि काजु कुसल रघुनंदन॥२८॥
सोहर 29
ईस मनाइ असीसहिं जय जसु पावहु। न्हात खसै जनि बार गहरु जनि लावहु॥२९॥
सोहर 30
चलत सकल पुर लोग बियोग बिकल भए। सानुज भरत सप्रेम राम पायन्ह नए॥३०॥
सोहर 31
होहिं सगुन सुभ मंगल जनु कहि दीन्हेउ। राम लखन मुनि साथ गवन तब कीन्हेउ॥३१॥
सोहर 32
स्यामल गौर किसोर मनोहरता निधि। सुषमा सकल सकेलि मनहुँ बिरचे बिधि॥३२॥
हरिगीतिका 4
बिरचे बिरंचि बनाइ बाँची रुचिरता रंचौ नहीं। दस चारि भुवन निहारि देखि बिचारि नहिं उपमा कहीं॥ रिषि संग सोहत जात मग छबि बसत सो तुलसी हिएँ। कियो गवन जनु दिननाथ उत्तर संग मधु माधव लिएँ॥४॥
सरल समेकित भावार्थदशरथ अपनी और परिवार की रक्षा का आधार मुनि की कृपा को मानते हुए दोनों पुत्र उन्हें सौंपते हैं। राम-लक्ष्मण माता-पिता की अनुमति लेकर गुरु के चरण छूते हैं और धनुष-बाण धारण करते हैं। नगरवासियों के मन उनके साथ चले जाते हैं; वे कुशल वापसी की प्रार्थना करते हैं। भरत और शत्रुघ्न प्रेम से विदा देते हैं। कवि दोनों भाइयों की मनोहर छवि को अपनी स्मृति का स्थायी धन मानता है।
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5. यज्ञ-रक्षा, अहल्या-उद्धार और जनकपुर-आगमन

सोहर 33–40 · हरिगीतिका छंद 5

सोहर 33
गिर तरु बेलि सरित सर बिपुल बिलोकहिं। धावहिं बाल सुभाय बिहग मृग रोकहिं॥३३॥
सोहर 34
सकुचहिं मुनिहि सभीत बहुरि फिरि आवहिं। तोरि फूल फल किसलय माल बनावहिं॥३४॥
सोहर 35
देखि बिनोद प्रमोद प्रेम कौसिक उर। करत जाहिँ घन छाह सुमन बरषहि सुर॥३५॥
सोहर 36
बधी ताड़का राम जानि सब लायक। बिद्या मंत्र रहस्य दिए मुनिनायक॥३६॥
सोहर 37
मन लोगन्हके करत सुफल मन लोचन। गए कौसिक आश्रमहिं बिप्र भय मोचन॥३७॥
सोहर 38
मारि निसाचर निकर जग्य करवायउ। अभय किए मुनिबंद जगत जसु गायउ॥३८॥
सोहर 39
बिप्र साधु सुर काजु महामुनि मन धरि। रामहि चले लिवाइ धनुष मख मिसु करि॥३९॥
सोहर 40
गौतम नारि उधारि पठै पति धामहि। जनक नगर लै गयउ महामुनि रामहि॥४०॥
हरिगीतिका 5
लै गयउ रामहि गाधि सुवन बिलोकि पुर हरषे हिएँ। सुनि राउ आगे लेन आयउ सचिव गुर भूसुर लिएँ॥ नृप गहे पाय असीस पाई मान आदर अति किएँ। अवलोकि रामहि अनुभवत मनु ब्रह्मसुख सौगुन किएँ॥५॥
सरल समेकित भावार्थरास्ते में दोनों भाई बाल-सुलभ उत्साह से पहाड़, पेड़, बेल, नदी, पक्षी और मृग देखते हैं; साथ ही गुरु की मर्यादा का ध्यान रखते हैं। राम ताड़का का वध करते हैं और मुनि से विद्या प्राप्त करते हैं। यज्ञ में बाधा डालने वाले राक्षसों का निवारण कर ऋषियों को निर्भय करते हैं। विश्वामित्र उन्हें धनुषयज्ञ के अवसर पर जनकपुर ले चलते हैं। मार्ग में गौतम-पत्नी का उद्धार होता है। जनक राम-दर्शन में अत्यंत आनंद अनुभव करते हैं।
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6. जनक का अनुराग और धनुष-प्रतिज्ञा की चिंता

सोहर 41–48 · हरिगीतिका छंद 6

सोहर 41
देखि मनोहर मूरति मन अनुरागेउ। बँधेउ सनेह बिदेह बिराग बिरागेउ॥४१॥
सोहर 42
प्रमुदित हृदयँ सराहत भल भवसागर। जहँ उपजहिं अस मानिक बिधि बड़ नागर॥४२॥
सोहर 43
पुन्य पयोधि मातु पितु ए सिसु सुरतरु। रूप सुधा सुख देत नयन अमरनि बरु॥४३॥
सोहर 44
केहि सुकृती के कुँअर कहिय मुनिनायक। गौर स्याम छबि धाम धरें धनु सायक॥४४॥
सोहर 45
बिषय बिमुख मन मोर सेइ परमारथ। इन्हहिं देखि भयो मगन जानि बड़ स्वारथ॥४५॥
सोहर 46
कहेउ सप्रेम पुलकि मुनि सुनि महिपालक। ए परमारथ रूप ब्रह्ममय बालक॥४६॥
सोहर 47
पूषन बंस बिभूषन दसरथ नंदन। नाम राम अरु लखन सुरारि निकंदन॥४७॥
सोहर 48
रूप सील बय बंस राम परिपूरन। समुझि कठिन पन आपन लाग बिसूरन॥४८॥
हरिगीतिका 6
लागे बिसूरन समुझि पन मन बहुरि धीरज आनि कै। लै चले देखावन रंगभूमि अनेक बिधि सनमानि कै॥ कौसिक सराही रुचिर रचना जनक सुनि हरषित भए। तब राम लखन समेत मुनि कहँ सुभग सिंहासन दए॥६॥
सरल समेकित भावार्थविरक्त जनक भी राम के रूप और शील से स्नेह में बँध जाते हैं। वे विश्वामित्र से दोनों राजकुमारों का परिचय पूछते हैं। मुनि बताते हैं कि ये दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण हैं, जिनका स्वरूप परमार्थमय है। राम के गुणों को देखकर राजा को अपनी कठोर धनुष-प्रतिज्ञा का ध्यान आता है और चिंता होती है। फिर धैर्य रखकर वे मुनि और दोनों भाइयों को रंगभूमि में उचित सम्मान से बैठाते हैं।
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7. रंगभूमि में राम-लक्ष्मण के दर्शन

सोहर 49–56 · हरिगीतिका छंद 7

सोहर 49
राजत राज समाज जुगल रघुकुल मनि। मनहुँ सरद बिधु उभय नखत धरनी धनि॥४९॥
सोहर 50
काकपच्छ सिर सुभग सरोरुह लोचन। गौर स्याम सत कोटि काम मद मोचन॥५०॥
सोहर 51
तिलकु ललित सर भ्रकुटी काम कमानै। श्रवन बिभूषन रुचिर देखि मन मानै॥५१॥
सोहर 52
नासा चिबुक कपोल अधर रद सुंदर। बदन सरद बिधु निंदक सहज मनोहर॥५२॥
सोहर 53
उर बिसाल बृष कंध सुभग भुज अतिबल। पीत बसन उपबीत कंठ मुकुता फल॥५३॥
सोहर 54
कटि निषंग कर कमलन्हि धरें धनु-सायक। सकल अंग मन मोहन जोहन लायक॥५४॥
सोहर 55
राम-लखन-छबि देखि मगन भए पुरजन। उर अनंद जल लोचन प्रेम पूलक तन॥५५॥
सोहर 56
नारि परस्पर कहहिं देखि दोउ भाइन्ह। लहेउ जनम फल आजु जनमि जग आइन्ह॥५६॥
हरिगीतिका 7
जग जनमि लोयन लाहु पाए सकल सिवहि मनावहीं। बरु मिलौ सीतहि साँवरो हम हरषि मंगल गावहीं॥ एक कहहिं कुँवरु किसोर कुलिस कठोर सिव धनु है महा। किमि लेहिं बाल मराल मंदर नृपहि अस काहुँ न कहा॥७॥
सरल समेकित भावार्थराजाओं के बीच राम और लक्ष्मण की श्याम-गौर जोड़ी सबको मोह लेती है। उनके नेत्र, मुख, तिलक, वेश, आभूषण और धनुष-बाण का सौंदर्य कवि अनेक उपमाओं से व्यक्त करता है। नगरवासी उनके दर्शन में जन्म सफल मानते हैं। स्त्रियाँ चाहती हैं कि सीता को यही साँवले वर मिलें। फिर कठोर शिवधनुष और कोमल राजकुमार को देखकर उनके मन में संशय भी उठता है। प्रेम के साथ चिंता का यह स्वाभाविक भाव चलता है।
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8. राजसमाज में विवेक और अभिमान

सोहर 57–64 · हरिगीतिका छंद 8

सोहर 57
भे निरास सब भूप बिलोकत रामहि।। पन परिहरि सिय देब जनक बरु स्यामहि॥५७॥
सोहर 58
कहहिं एक भलि बात ब्याहु भल होइहि। बर दुलहिनि लगि जनक अपनपन खोइहि॥५८॥
सोहर 59
सुचि सुजान नृप कहहिं हमहि अस सूझई। तेज प्रताप रूप जहँ तहँ बल बूझई॥५९॥
सोहर 60
चितइ न सकहु राम तन गाल बजावहु। बिधि बस बलउ लजान सुमति न लजावहु॥६०॥
सोहर 61
अवसि राम के उठत सरासन टूटिहि। गवनहिं राजसमाज नाक अस फूटिहि॥६१॥
सोहर 62
कस न पिअहु भरि लोचन रूप सुधा रसु। करह कृतारथ जन्म होहु कत नर पसु॥६२॥
सोहर 63
दुहु दिसि राजकुमार बिराजत मुनिबर। नील पीत पाथोज बीच जनु दिनकर॥६३॥
सोहर 64
काकपच्छ रिषि परसत पानि सरोजनि। लाल कमल जनु लालत बाल मनोजनि॥६४॥
हरिगीतिका 8
मनसिज मनोहर मधुर मूरति कस न सादर जोवहू। बिनु काज राज समाज महुँ तजि लाज आपु बिगोवहू॥ सिष देइ भूपति साधु भूप अनूप छबि देखन लगे। रघुबंस कैरव चंद चितइ चकोर जिमि लोचन लगे॥८॥
सरल समेकित भावार्थराम को देखकर कुछ राजा निराश होते हैं और जनक की प्रतिज्ञा पर अलग-अलग बातें कहते हैं। समझदार राजा उन्हें व्यर्थ अभिमान छोड़ने को कहते हैं: राम के तेज और प्रभाव को केवल कोमल रूप से नहीं आँकना चाहिए। जो सामने देखकर भी सौंदर्य और गुण का आदर नहीं करता, वह अपने ही अवसर को खोता है। मुनि के बीच बैठे दोनों भाई कमलों के बीच सूर्य की तरह सुशोभित हैं। अंततः विवेकी लोग विवाद छोड़कर दर्शन में मन लगाते हैं।
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9. जनक की मर्यादा और सुनयना की चिंता

सोहर 65–72 · हरिगीतिका छंद 9

सोहर 65
पुर नर नारि निहारहिं रघुकुल दीपहि। दोषु नेहबस देहिं बिदेह महीपहि॥६५॥
सोहर 66
एक कहहिं भल भूप देहु जनि दूषन। नृप न सोह बिनु बचन नाक बिनु भूषन॥६६॥
सोहर 67
हमरें जान जनेस बहुत भल कीन्हेउ। पन मिस लोचन लाह सबन्हि कहँ दीन्हेउ॥ ६७॥
सोहर 68
अस सुकृती नरनाहु जो मन अभिलाषिहि। सो पुरइहिं जगदीस परज पन राखिहि॥६८॥
सोहर 69
प्रथम सुनत जो राउ राम गुन-रूपहि। बोलि ब्याहि सिय देत दोष नहिं भूपहि॥ ६९॥
सोहर 70
अब करि पइज पंच महँ जो पन त्यागे। बिधि गति जानि न जाइ अजसु जग जागै॥७०॥
सोहर 71
अजहुँ अवसि रघुनंदन चाप चढ़ाउब। ब्याह उछाह सुमंगल त्रिभुवन गाउब॥७१॥
सोहर 72
लागि झरोखन्ह झाँकहिं भूपति भामिनि। कहत बचन रद लसहिं दमक जनु दामिनि॥७२॥
हरिगीतिका 9
जनु दमक दामिनि रूप रति मद निदरि सुंदरि सोहहीं। मुनि ढिग देखाए सखिन्ह कुँवर बिलोकि छबि मन मोहहीं॥ सिय मातु हरषी निरखि सुषमा अति अलौकिक रामकी। हिय कहति कहँ धनु कुँअर कहँ बिपरीत गति बिधि बाम की॥९॥
सरल समेकित भावार्थनगरवासियों में जनक के निर्णय पर चर्चा होती है। कोई प्रेमवश उन्हें दोष देता है, कोई समझाता है कि घोषित वचन छोड़ना राजा की प्रतिष्ठा और सत्यनिष्ठा के अनुकूल नहीं है। लोग आशा रखते हैं कि राम धनुष चढ़ाकर प्रतिज्ञा भी पूरी करेंगे और विवाह भी होगा। महल के झरोखों से रानियाँ राजकुमारों को देखती हैं। सुनयना राम के अलौकिक सौंदर्य से प्रसन्न हैं, लेकिन धनुष की कठोरता और उनकी किशोर देह का विचार उन्हें चिंतित करता है।
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10. सखियों का आश्वासन और सीता का आगमन

सोहर 73–80 · हरिगीतिका छंद 10

सोहर 73
कहि प्रिय बचन सखिन्ह सन रानि बिसूरति। कहाँ कठिन सिव धनुष कहाँ मृदु मूरति॥७३॥
सोहर 74
जौं बिधि लोचन अतिथि करत नहिं रामहि। तौ कोउ नृपहि न देत दोषु परिनामहि॥७४॥
सोहर 75
अब असमंजस भयउ न कछु कहि आवै। रानिहि जानि ससोच सखी समझावै॥७५॥
सोहर 76
देबि सोच परिहरिय हरष हियँ आनिय। चाप चढ़ाउब राम बचन फुर मानिय॥७६॥
सोहर 77
तीनि काल को ग्यान कौसिकहि करतल। सो कि स्वयंबर आनिहिं बालक बिनु बल॥७७॥
सोहर 78
मुनि महिमा सुनि रानिहि धीरजु आयउ। तब सुबाहु सूदन जसु सखिन्ह सुनायउ॥७८॥
सोहर 79
सुनि जिय भयउ भरोस रानि हिय हरषइ। बहुरि निरखि रघुबरहि प्रेम मन करषद॥७९॥
सोहर 80
नृप रानी पुर लोग राम तन चितवहिं। मंजु मनोरथ कलस भरहिं अरु रितवहिं॥८०॥
हरिगीतिका 10
रितवहिं भरहिं धनु निरखि छिनु-छिनु निरखि रामहि सोचहीं। नर नारि हरष बिषाद बस हिय सकल सिवहिं सकोचहीं॥ तब जनक आयसु पाइ कुलगुर जानकिहि लै आयऊ। सिय रूप रासि निहारि लोचन लाहु लोगन्हि पायऊ॥१०॥
सरल समेकित भावार्थसुनयना अपना संशय सखियों से कहती हैं। सखी उन्हें विश्वामित्र के ज्ञान और विवेक पर भरोसा रखने को कहती है; इतने समर्थ मुनि बिना सामर्थ्य जाने बालकों को यहाँ क्यों लाते? राम के पराक्रम का समाचार सुनकर रानी को विश्वास मिलता है। फिर भी धनुष देखकर चिंता और राम को देखकर आशा बार-बार लौटती है। इसी बीच जनक की आज्ञा से कुलगुरु सीता को रंगभूमि में लाते हैं। उनके रूप-दर्शन से उपस्थित लोगों को नया आनंद मिलता है।
↑ विषय-सूची

11. सीता-राम का दर्शन और राजाओं की असफलता

सोहर 81–88 · हरिगीतिका छंद 11

सोहर 81
मंगल भूषन बसन मंजु तन सोहहिं। देखि मूढ महिपाल मोह बस मोहहिं॥८१॥
सोहर 82
रूप रासि जेहि ओर सुभायँ निहारइ। नील कमल सर श्रेनि मयन जनु डारइ॥८२॥
सोहर 83
छिनु सीतहि छिनु रामहि पुरजन देखहिं। रूप सील बय बंस बिसेष बिसेषहिं॥८३॥
सोहर 84
राम दीख जब सीय सीय रघुनायक। दोउ तन तकि तकि मयन सुधारत सायक॥८४॥
सोहर 85
प्रेम प्रमोद परस्पर प्रगटत गोपहिं। जनु हिरदय गुन ग्राम थूनि थिर रोपहिं॥८५॥
सोहर 86
राम सीय बय समौ सुभाय सुहावन। नृप जोबन छबि पुरइ चहत जनु आवन॥८६॥
सोहर 87
सो छबि जाइ न बरनि देखि मनु मान। सुधा पान करि मूक कि स्वाद बखानै॥८७॥
सोहर 88
तब बिदेह पन बंदिन्ह प्रगट सुनायउ। उठे भूप आमरषि सगुन नहिं पायउ॥८८॥
हरिगीतिका 11
नहि सगुन पायउ रहे मिसु करि एक धनु देखन गए। टकटोरि कपि ज्यों नारियरु, सिरु नाइ सब बैठत भए॥ एक करहिं दाप, न चाप सज्जन बचन जिमि टारें टरै। नृप नहुष ज्यों सब के बिलोकत बुद्धि बल बरबस हरै॥११॥
सरल समेकित भावार्थसीता मंगलमय वस्त्र और आभूषणों में सुशोभित हैं। नगरवासी कभी सीता और कभी राम को देखकर उनके रूप, गुण, अवस्था और कुल की अनुकूलता पर मुग्ध होते हैं। दोनों एक-दूसरे को देखते हैं और प्रेम को संकोच में सँभालते हैं। जनक की प्रतिज्ञा सुनकर राजा उत्साह से उठते हैं, पर धनुष के सामने उनकी सामर्थ्य चुक जाती है। किसी का दिखावा काम नहीं आता; बल का अभिमान वास्तविक परीक्षा में टिक नहीं पाता।
↑ विषय-सूची

12. विश्वामित्र की आज्ञा और राम का प्रस्थान

सोहर 89–96 · हरिगीतिका छंद 12

सोहर 89
देखि सपुर परिवार जनक हिय हारेउ। नृप समाज जन तुहिन बनज बन मारेउ॥८९॥
सोहर 90
कौसिक जनकहि कहेउ देहु अनुसासन। देखि भानु कुल भानु इसानु सरासन॥९०॥
सोहर 91
मुनिबर तुम्हरें बचन मेरु महि डोलहिं। तदपि उचित आचरत पाँच भल बोलहिं॥९१॥
सोहर 92
बानु बानु जिमि गयउ गवहिं दसकंधरु। को अवनी तल इन सम बीर धुरंधरु॥९२॥
सोहर 93
पारबती मन सरिस अचल धनु चालक। हहिं पुरारि तेउ एक नारि ब्रत पालक॥९३॥
सोहर 94
सो धनु कहिय बिलोकन भूप किसोरहि। भेद कि सिरिस सुमन कन कुलिस कठोरहि॥९४॥
सोहर 95
रोम रोम छबि निंदति सोभ मनोजनि। देखिय मूरति मलिन करिय मुनि सो जनि॥९५॥
सोहर 96
मुनि हँसि कहेउ जनक यह मूरति सोहइ। सुमिरत सकृत मोह मल सकल बिछोहइ॥९६॥
हरिगीतिका 12
सब मल बिछोहनि जानि मूरति जनक कौतुक देखहू। धनु सिंधु नृप बल जल बढ्यो रघुबरहि कुंभज लेखह॥ सुनि सकुचि सोचहिं जनक गुर पद बंदि रघुनंदन चले। नहिं हरष हृदय बिषाद कछु भए सगुन सुभ मंगल भले॥१२॥
सरल समेकित भावार्थराजाओं की असफलता से जनक और परिवार निराश होते हैं। विश्वामित्र राम को धनुष दिखाने की अनुमति माँगते हैं। जनक मुनि के वचन की शक्ति मानते हैं, किंतु राजकुमार की कोमलता के कारण अपना संकोच बताते हैं। मुनि उन्हें राम के स्वरूप का स्मरण कराते हैं और कौतुक देखने को कहते हैं। राम गुरु को प्रणाम कर सहज भाव से उठते हैं। उनके मन में न विजय का उन्माद है और न कठिनाई का भय।
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13. धनुषभंग और जनकपुर का उल्लास

सोहर 97–104 · हरिगीतिका छंद 13

सोहर 97
बरिसन लगे सुमन सुर दुंदुभि बाजहिं। मुदित जनक, पुर परिजन नृपगन लाजहिं॥९७॥
सोहर 98
महि महिधरनि लखन कह बलहि बढ़ावनु। राम चहत सिव चापहि चपरि चढ़ावनु॥९८॥
सोहर 99
गए सुभायँ राम जब चाप समीपहि। सोच सहित परिवार बिदेह महीपहि॥९९॥
सोहर 100
कहि न सकति कछु सकुचति सिय हियँ सोचइ। गौरि गनेस गिरीसहि सुमिरि सकोचइ॥१००॥
सोहर 101
होत बिरह सर मगन देखि रघुनाथहि। फरकि बाम भुज नयन देत जनु हाथहि॥१०१॥
सोहर 102
धीरज धरति सगुन बल रहति सो नाहिन। बरु किसोर धनु घोर दइउ नहिं दाहिन॥१०२॥
सोहर 103
अंतरजामी राम मरम सब जानेउ। धनु चढाइ कौतुकहिं कान लगि तानेउ॥१०३॥
सोहर 104
प्रेम परखि रघुबीर सरासन भंजेउ। जनु मृगराज किसोर महागज भंजेउ॥१०४॥
हरिगीतिका 13
गंजेउ सो गर्जेउ घोर धुनि सुनि भूमि भूधर लरखरे। रघुबीर जस मुकता बिपुल सब भुवन पटु पेटक भरे॥ हित मुदित अनहित रुदित मुख छबि कहत कबि धनु जाग की। जनु भोर चक्क चकोर कैरव सघन कमल तड़ाग की॥१३॥
सरल समेकित भावार्थराम के उठते ही देवताओं में आनंद होता है। लक्ष्मण पृथ्वी और पर्वतों को स्थिर रहने का संकेत देते हैं। सीता का मन संकोच और आशंका से व्याकुल है; वे गौरी, गणेश और शिव का स्मरण करती हैं। अंतर्यामी राम सबके हृदय का भाव जानते हैं। वे सहजता से धनुष चढ़ाकर खींचते हैं और उसे तोड़ देते हैं। उसके प्रचंड नाद से जगत चकित होता है। प्रेम करने वालों की आशा पूरी होती है और विरोधियों का अभिमान टूट जाता है।
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14. जयमाला और अयोध्या को निमंत्रण

सोहर 105–112 · हरिगीतिका छंद 14

सोहर 105
नभ पुर मंगल गान निसान गहागहे। देखि मनोरथ सुरतरु ललित लहालहे॥१०५॥
सोहर 106
तब उपरोहित कहेउ सखीं सब गावन। चलीं लेवाइ जानकिहि भा मन भावन॥१०६॥
सोहर 107
कर कमलनि जयमाल जानकी सोहइ। बरनि सकै छबि अतुलित अस कबि को हइ॥१०७॥
सोहर 108
सीय सनेह सकुच बस पिय तन हेरइ। सुरतरु रुख सुरबेलि पवन जनु फेरइ॥१०८॥
सोहर 109
लसत ललित कर कमल माल पहिरावत। काम फंद जन चंदहि बनज फँसावत॥१०९॥
सोहर 110
राम सीय छबि निरुपम निरुपम सो दिनु। सुख समाज लखि रानिन्ह आनंद छिनु छिनु॥११०॥
सोहर 111
प्रभुहि माल पहिराइ जानकिहि लै चलीं। सखीं मनहुँ बिधु उदय मुदित कैरव कलीं॥१११॥
सोहर 112
बरषहिं बिबुध प्रसून हरषि कहि जय जए। सुख सनेह भरे भुवन राम गुर पहँ गए॥११२॥
हरिगीतिका 14
गए राम गुरु पहिं राउ रानी नारि-नर आनंद भरे। जनु तृषित करि करिनी निकर सीतल सुधासागर परे॥ कौसिकहि पूजि प्रसंसि आयसु पाइ नृप सुख पायऊ। लिखि लगन तिलक समाज सजि कुल गुरहि अवध पठायऊ॥१४॥
सरल समेकित भावार्थधनुषभंग के बाद आकाश और नगर मंगलध्वनि से भर जाते हैं। सखियाँ सीता को जयमाला लेकर आती हैं। वे संकोच और प्रेम से राम को देखती हुई उनके गले में माला डालती हैं। इस अनुपम मिलन पर परिवार, नगर और देवता आनंदित होते हैं। राम फिर गुरु के पास जाते हैं। जनक विश्वामित्र का आदर करके विवाह की आगे की तैयारी करते हैं और लग्नपत्र तथा तिलक की सामग्री के साथ कुलगुरु को अयोध्या भेजते हैं।
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15. विवाह की तैयारी और बरात का स्वागत

सोहर 113–120 · हरिगीतिका छंद 15

सोहर 113
गनि गन बोलि कहेउ नृप माँडव छावन। गावहिं गीत सुआसिनि बाज बधावन॥११३॥
सोहर 114
सीय राम हित पूजहिं गौरि गनेसहि। परिजन पुरजन सहित प्रमोद नरेसहि॥११४॥
सोहर 115
प्रथम हरदि बंदन करि मंगल गावहिं। करि कुल रीति कलस थपि तेलु चढ़ावहिं॥११५॥
सोहर 116
गे मुनि अवध बिलोकि सुसरित नहायउ। सतानंद सत कोटि नाम फल पायउ॥११६॥
सोहर 117
नृप सुनि आगे आइ पूजि सनमानेउ। दीन्हि लगन कहि कुसल राउ हरषानेउ॥११७॥
सोहर 118
सुनि पुर भयउ अनंद बधाव बजावहिं। सजहिं सुमंगल कलस बितान बनावहिं॥११८॥
सोहर 119
राउ छाँड़ि सब काज साज सब साजहिं। चलेउ बरात बनाइ पूजि गनराजहिं॥११९॥
सोहर 120
बाजहिं ढोल निसान सगुन सुभ पाइन्हि। सिय नैहर जनकौर नगर नियराइन्हि॥१२०॥
हरिगीतिका 15
नियरानि नगर बरात हरषी लेन अगवानी गए। देखत परस्पर मिलत मानत प्रेम परिपूरन भए॥ आनंदपुर कौतुक कोलाहल बनत सो बरनत कहाँ। लै दियो तहँ जनवास सकल सुपास नित नूतन जहाँ॥१५॥
सरल समेकित भावार्थजनक मंडप बनवाते हैं; घर में मंगलगीत, हल्दी और कुलपरंपरा के संस्कार होते हैं। सीता-राम के कल्याण के लिए गौरी-गणेश का पूजन किया जाता है। शतानंद अयोध्या जाकर दशरथ को लग्नपत्र और कुशल समाचार देते हैं। अयोध्या में बधाइयाँ बजती हैं और बरात सजती है। गणेश का स्मरण करके दशरथ जनकपुर की ओर चलते हैं। दोनों पक्ष प्रेमपूर्वक अगवानी और आदर करते हैं; बरात को सुविधापूर्ण जनवास दिया जाता है।
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16. पिता-पुत्र मिलन और दोनों समधियों का सम्मान

सोहर 121–128 · हरिगीतिका छंद 16

सोहर 121
गे जनवासहिं कौसिक राम लखन लिए। हरषे निरखि बरात प्रेम प्रमुदित हिए॥१२१॥
सोहर 122
हृदयँ लाइ लिए गोद मोद अति भूपहि। कहि न सकहिं सत सेष अनंद अनूपहि॥१२२॥
सोहर 123
रायँ कौसिकहि पूजि दान बिप्रन्ह दिए। राम सुमंगल हेतु सकल मंगल किए॥१२३॥
सोहर 124
ब्याह बिभूषन भूषित भूषन भूषन। बिस्व बिलोचन बनज बिकासक पूषन॥१२४॥
सोहर 125
मध्य बरात बिराजत अति अनुकूलेउ। मनहुँ काम आराम कलपतरु फूलेउ॥१२५॥
सोहर 126
पठई भेंट बिदेह बहुत बहु भाँतिन्ह। देखत देव सिहाहिं अनंद बरातिन्ह॥१२६॥
सोहर 127
बेद बिहित कुलरीति कीन्हि दुहुँ कुलगुर। पठई बोलि बरात जनक प्रमुदित मन॥१२७॥
सोहर 128
जाइ कहेउ पगु धारिअ मुनि अवधेसहि। चले सुमिरि गुरु गौरि गिरीस गनेसहि॥१२८॥
हरिगीतिका 16
चले सुमिरि गुर सुर सुमन बरषहिं परे बहुबिधि पावड़े। सनमानि सब बिधि जनक दसरथ किये प्रेम कनावड़े॥ गुन सकल सम समधी परस्पर मिलन अति आनंद लहे। जय धन्य जय जय धन्य धन्य बिलोकि सुर नर मुनि कहे ॥१६॥
सरल समेकित भावार्थविश्वामित्र राम-लक्ष्मण को लेकर जनवास जाते हैं। पुत्रों को देखकर दशरथ अत्यंत आनंदित होते हैं और उन्हें हृदय से लगाते हैं। राजा मुनि का पूजन और दान करते हैं। विवाह के वेश में राम सबके नेत्रों को आनंद देते हैं। जनक बरात के लिए अनेक भेंटें भेजते हैं और विधिपूर्वक मंडप में आमंत्रित करते हैं। दोनों समधी एक-दूसरे का सम्मान करते हैं; उनके गुण, विनय और आत्मीयता इस मिलन को और सुंदर बनाते हैं।
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17. मंगलगीत, आरती और दूल्हे का परिछन

सोहर 129–136 · हरिगीतिका छंद 17

सोहर 129
तीनि लोक अवलोकहिं नहिं उपमा कोउ। दसरथ जनक समान जनक दसरथ दोउ॥१२९॥
सोहर 130
सजहिं सुमंगल साज रहस रनिवासहि। गान करहिं पिकबैनि सहित परिहासहि॥१३०॥
सोहर 131
उमा रमादिक सुरतिय सुनि प्रमुदित भईं। कपट नारि बर बेष बिरचि मंडप गईं। १३१॥
सोहर 132
मंगल आरति साज बरहि परिछन चलीं। जनु बिगसीं रबि उदय कनक पंकज कलीं॥१३२॥
सोहर 133
नख सिख सुंदर राम रूप जब देखहिं। सब इंद्रिन्ह महँ इंद्र बिलोचन लेखहिं॥१३३॥
सोहर 134
परम प्रीति कुलरीति करहिं गज गामिनि। नहिं अघाहिं अनुराग भाग भरि भामिनि॥१३४॥
सोहर 135
नेगचारु कहँ नागरि गहरु न लावहिं। निरखि निरखि आनंदु सुलोचनि पावहिं॥१३५॥
सोहर 136
करि आरती निछावरि बरहि निहारहिं। प्रेम मगन प्रमदागन तन न सँभारहिं॥१३६॥
हरिगीतिका 17
नहिं तन सम्हारहिं छबि निहारहिं निमिष रिपु जनु रनु जए। चक्रवै लोचन राम रूप सुराज सुख भोगी भए॥ तब जनक सहित समाज राजहि उचित रुचिरासन दए। कौसिक बसिष्ठहि पूजि पूजे राउ दै अंबर नए॥१७॥
सरल समेकित भावार्थजनक और दशरथ की जोड़ी की उपमा कवि उन्हीं दोनों से देता है। रनिवास में आनंद, गीत और परिहास है। उमा और लक्ष्मी जैसी देवियाँ भी स्त्री-वेश में उत्सव में सम्मिलित होती हैं। आरती और परिछन के समय राम को देखकर स्त्रियाँ भावविभोर हैं। वे अपने नेत्रों को धन्य मानती हैं और कुलरीति निभाते हुए बार-बार दूल्हे को निहारती हैं। फिर जनक सहित सबको उचित आसन और आदर दिया जाता है।
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18. विवाह-मंडप और सीता-राम का पाणिग्रहण

सोहर 137–144 · हरिगीतिका छंद 18

सोहर 137
देत अरघ रघुबीरहि मंडप लै चलीं। करहिं सुमंगल गान उमगि आनँद अलीं॥१३७॥
सोहर 138
बर बिराज मंडप महँ बिस्व बिमोहइ। ऋतु बसंत बन मध्य मदनु जनु सोहइ॥१३८॥
सोहर 139
कुल बिबहार बेद बिधि चाहिय जहँ जस। उपरोहित दोउ करहिं मुदित मन तहँ तस॥१३९॥
सोहर 140
बरहि पूजि नृप दीन्ह सुभग सिंहासन। चली दुलहिनिहि ल्याइ पाइ अनुसासन॥१४०॥
सोहर 141
जुबति जुत्थ महँ सीय सुभाइ बिराजइ। उपमा कहत लजाइ भारती भाजइ॥१४१॥
सोहर 142
दुलह दुलहिनिन्ह देखि नारि नर हरषहिं। छिनु छिनु गान निसान सुमन सुर बरषहिं॥१४२॥
सोहर 143
लै लै नाउँ सुआसिनि मंगल गावहिं। कुँवर कुँवरि हित गनपति गौरि पुजावहिं॥१४३॥
सोहर 144
अगिनि थापि मिथिलेस कुसोदक लीन्हेउ। कन्या दान बिधान संकलप कीन्हेउ॥१४४॥
हरिगीतिका 18
संकल्पि सिय रामहि समरपी सील सुख सोभामई। जिमि संकरहि गिरिराज गिरिजा हरिहि श्री सागर दई॥ सिंदूर बंदन होम लावा होन लागी भाँवरी। सिल पोहनी करि मोहनी मनहरयो मूरति साँवरी॥१८॥
सरल समेकित भावार्थराम को अर्घ्य देकर विवाह-मंडप में लाया जाता है। दोनों पुरोहित समयानुकूल वैदिक विधि और कुलपरंपरा के संस्कार कराते हैं। सखियाँ सीता को लाती हैं और दूल्हा-दुल्हन के दर्शन से सब आनंदित होते हैं। मंगलगीत तथा गौरी-गणेश पूजन के बीच जनक अग्नि स्थापित करके कन्यादान का संकल्प लेते हैं। आगे सिंदूर, होम, लावा, भाँवर और शिलारोहण जैसे विवाह-संस्कारों का वर्णन आता है। यह विवाह-प्रसंग राम और सीता के मंगलमय मिलन का उत्सव है।
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19. कोहबर के विनोद और परिवार का आनंद

सोहर 145–152 · हरिगीतिका छंद 19

सोहर 145
एहि बिधि भयो बिबाह उछाह तिहूँ पुर। देहिं असीस मुनीस सुमन बरषहिं सुर॥१४५॥
सोहर 146
मन भावत बिधि कीन्ह मुदित भामिनि भईं। बर दुलहिनिहि लवाइ सखीं कोहबर गईं॥ १४६॥
सोहर 147
निरखि निछावर करहि बसन मनि छिनु छिन्। जाइ न बरनि बिनोद मोदमय सो दिनु॥१४७॥
सोहर 148
सिय भ्राताके समय भोम तहँ आयउ। दुरीदुरा करि नेगु सुनात जनायउ॥१४८॥
सोहर 149
चतुर नारि बर कुँवरिहि रीति सिखावहिं। देहिं गारि लहकौरि समौ सुख पावहिं॥१४९॥
सोहर 150
जुआ खेलावन कौतुक कीन्ह सयानिन्ह। जीति हारि मिस देहिं गारि दुहु रानिन्ह॥१५०॥
सोहर 151
सीय मातु मन मुदित उतारति आरति। को कहि सकइ अनंद मगन भइ भारति॥१५१॥
सोहर 152
जुबति जूथ रनिवास रहस बस एहि बिधि। देखि देखि सिय राम सकल मंगल निधि॥१५२॥
हरिगीतिका 19
मंगल निधान बिलोकि लोयन लाह लूटति नागरीं। दइ जनक तीनिहुँ कुँवर बिबाहि सुनि आनँद भरीं।। कल्यान मो कल्यान पाइ बितान छबि मन मोहई। सुरधेनु ससि सुरमनि सहित मानहुँ कलप तरू सोहई।१९।
सरल समेकित भावार्थविवाह संपन्न होने पर देवता पुष्प बरसाते हैं और मुनि आशीर्वाद देते हैं। सखियाँ दूल्हा-दुल्हन को कोहबर ले जाती हैं। निछावर, लहकौरि, हँसी-परिहास और खेलों में घर का आनंद प्रकट होता है। सीता के भाई की भूमिका में भौम के आने का काव्य-प्रसंग भी है। सुनयना आरती उतारती हैं और पूरा रनिवास सीता-राम को देखकर पुलकित है। चारों विवाहों के समाचार से उत्सव का आनंद और बढ़ जाता है।
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20. चारों भाइयों का विवाह और जेवनार

सोहर 153–160 · हरिगीतिका छंद 20

सोहर 153
जनक अनुज तनया दोउ परम मनोरम। जेठि भरत कहँ ब्याहि रूप रति सय सम॥१५३॥
सोहर 154
सिय लघु भगिनि लखन कहुँ रूप उजागरि। लखन अनुज श्रुतकीरति सब गुन आगरि॥१५४॥
सोहर 155
राम बिबाह समान बिबाह तीनिउ भए। जीवन फल लोचन फल बिधि सब कहँदए॥१५५॥
सोहर 156
दाइज भयउ बिबिध बिधि जाइ न सो गनि। दासी दास बाजि गज हेम बसन मनि॥१५६॥
सोहर 157
दान मान परमान प्रेम पूरन किए। समधी सहित बरात बिनय बस करि लिए॥१५७॥
सोहर 158
गे जनवासे राउ संगु सुत सुतबहु। जनु पाए फल चारि सहित साधन चहु॥१५८॥
सोहर 159
चहु प्रकार जेवनार भई बहु भाँतिन्ह। भोजन करत अवधपति सहित बरातिन्ह॥१५९॥
सोहर 160
देहि गारि बर नारि नाम लै दुहु दिसि। जेंवत बढ्यो अनंद सुहावनि सो निसि॥१६०॥
हरिगीतिका 20
सो निसि सोहावनि मधुर गावति बाजने बाजहिं भले। नृप कियो भोजन पान पाइ प्रमोद जनवासेहि चले॥ नट भाट मागध सूत जाचक जस प्रतापहि बरनहीं। सानंद भूसुर बृंद मनि गज देत मन करषै नहीं॥२०॥
सरल समेकित भावार्थजनक के भाई की पुत्रियों में बड़ी का विवाह भरत से और श्रुतकीर्ति का विवाह शत्रुघ्न से होता है; सीता की छोटी बहन लक्ष्मण को ब्याही जाती हैं। तीनों विवाह भी राम के विवाह जैसी रीति और आनंद से संपन्न होते हैं। अतिथियों का सम्मान, भेंट और जेवनार होती है। स्त्रियों के विवाहगीतों और परिहास से रात सुहावनी बनती है। कवि अपने समय के राजपरिवार की रीति का वर्णन कर रहा है; भेंट की सूची को आज के विवाह में अपेक्षा या अनिवार्य माँग न समझें।
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21. विदाई की तैयारी और माता की विनती

सोहर 161–168 · हरिगीतिका छंद 21

सोहर 161
करि करि बिनय कछुक दिन राखि बरातिन्ह। जनक कीन्ह पहुनाई अगनित भाँतिन्ह॥१६१॥
सोहर 162
प्रात बरात चलिहि सुनि भूपति भामिनि। परि न बिरह बस नींद बीति गइ जामिनि॥१६२॥
सोहर 163
खरभर नगर नारि नर बिधिहि मनावहिं। बार बार ससुरारि राम जेहि आवहिं॥१६३॥
सोहर 164
सकल चलन के साज जनक साजत भए। भाइन्ह सहित राम तब भूप-भवन गए॥१६४॥
सोहर 165
सासु उतारि आरती करहिं निछावरि। निरखि निरखि हियँ हरषहिं सूरति साँवरि॥१६५॥
सोहर 166
मागेउ बिदा राम तब सुनि करुना भरीं। परिहरि सकुच सप्रेम पुलकि पायन्ह परी॥१६६॥
सोहर 167
सीय सहित सब सुता सौंपि कर जोरहिं। बार बार रघुनाथहि निरखि निहोरहिं॥१६७॥
सोहर 168
तात तजिय जनि छोह मया राखबि मन। अनुचर जानब राउ सहित पुर परिजन॥१६८॥
हरिगीतिका 21
जन जानि करब सनेह बलि, कहि दीन बचन सुनावहीं। अति प्रेम बारहिं बार रानी बालिकन्हि उरलावहीं॥ सिय चलत पुरजन नारि हय गय बिहँग मृगब्याकुल भए। सुनि बिनय सासु प्रबोधि तब रघुबंस मनिपितु पहिं गए॥२१॥
सरल समेकित भावार्थजनक बरात को कई दिन आत्मीयता से रोककर सेवा करते हैं। प्रातः विदाई का समाचार सुनकर माताएँ बिछोह में रात भर सो नहीं पातीं। राम भाइयों सहित महल में आकर विदा माँगते हैं। सुनयना आरती उतारते हुए प्रेम से व्याकुल होती हैं। वे बेटियों को सौंपकर राम से स्नेह और कृपा बनाए रखने की विनती करती हैं। सीता की विदाई से नगर के लोग ही नहीं, पशु-पक्षी तक करुण भाव में चित्रित हैं। राम सबको सांत्वना देकर पिता के पास जाते हैं।
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22. जनक का बिछोह और बरात का प्रस्थान

सोहर 169–176 · हरिगीतिका छंद 22

सोहर 169
परे निसानहि घाउ राउ अवधहिं चले। सुर गन बरषहिं सुमन सगुन पावहिं भले॥१६९॥
सोहर 170
जनक जानकिहि भेटि सिखाइ सिखावन। सहित सचिव गुर बंधु चले पहुँचावन॥१७०॥
सोहर 171
प्रेम पुलकि कहि राय फिरिय अब राजन। करत परस्पर बिनय सकल गुन भाजन॥१७१॥
सोहर 172
कहेउ जनक कर जोरि कीन्ह मोहि आपन। रघुकुल तिलक सदा तुम उथपन थापन॥१७२॥
सोहर 173
बिलग न मानब मोर जो बोलि पठायउँ। प्रभु प्रसाद जसु जानि सकल सुख पायउँ॥१७३॥
सोहर 174
पुनि बसिष्ठ आदिक मुनि बंदि महीपति। गहि कौसिक के पाइ कीन्ह बिनती अति॥१७४॥
सोहर 175
भाइन्ह सहित बहोरि बिनय रघुबीरहि। गदगद कंठ नयन जल उर धरि धीरहि॥१७५॥
सोहर 176
कृपा सिंधु सुख सिंधु सुजान सिरोमनि। तात समय सुधि करबि छोह छाड़ब जनि॥१७६॥
हरिगीतिका 22
जनि छोह छाड़ब बिनय सुनि रघुबीर बहुबिनती करी। मिलि भेटि सहित सनेह फिरेउ बिदेह मनधीरज धरी॥ सो समौ कहत न बनत कछु सब भुवन भरिकरुना रहे। तब कीन्ह कोसलपति पयान निसान बाजेगहगहे॥२२॥
सरल समेकित भावार्थबरात अयोध्या के लिए चलती है। जनक सीता को गले लगाकर सीख देते हैं और गुरु, मंत्री तथा बंधुओं के साथ पहुँचाने आते हैं। दशरथ उन्हें लौटने के लिए कहते हैं; दोनों समधियों की विनय में गहरा सम्मान है। जनक मुनियों के चरण पकड़ते हैं और राम से अपने को स्मरण रखने की प्रार्थना करते हैं। राम भी प्रेमपूर्वक उत्तर देते हैं। अंततः जनक धैर्य धारण करके लौटते हैं; विदाई का करुण वातावरण कवि के लिए शब्दों से परे है।
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23. परशुराम-मिलन और अयोध्या में स्वागत की तैयारी

सोहर 177–184 · हरिगीतिका छंद 23

सोहर 177
पंथ मिले भृगुनाथ हाथ फरसा लिए। डाटहिं आँखि देखाइ कोप दारुन किए॥१७७॥
सोहर 178
राम कीन्ह परितोष रोष रिस परिहरि। चले सौंप सारंग सुफल लोचन करि॥१७८॥
सोहर 179
रघुबर भुज बल देखि उछाह बरातिन्ह। मुदित राउ लखि सनमुख बिधि सबभाँतिन्ह॥१७९॥
सोहर 180
एहि बिधि ब्याहि सकल सुत जग जसुछायउ। मग लोगन्हि सुख देत अवधपति आयउ॥१८०॥
सोहर 181
होहिं सुमंगल सगुन सुमन सुर बरषहिं। नगर कोलाहल भयउ नारि नर हरषहिं॥१८१॥
सोहर 182
घाट बाट पुर द्वार बजार बनावहिं। बीथीं सींचि सुगंध सुमंगल गावहिं॥१८२॥
सोहर 183
चौकैं पूरै चारु कलस ध्वज साजहिं। बिबिध प्रकार गहागह बाजन बाजहिं॥१८३॥
सोहर 184
बंदनवार बितान पताका घर घर। रोपे सफल सपल्लव मंगल तरुबर॥१८४॥
हरिगीतिका 23
मंगल बिटप मंजुल बिपुल दधि दूब अच्छत रोचना। भरि थार आरति सजहिं सब सारंग सावक लोचना॥ मन मुदित कौसल्या सुमित्रा सकल भूपति भामिनी। सजि साजु परिछन चलीं रामहि मत्त कुंजर गामिनी॥२३॥
सरल समेकित भावार्थवापसी के मार्ग में क्रोधित परशुराम मिलते हैं। राम उन्हें संतुष्ट करते हैं; वे क्रोध छोड़कर अपना धनुष सौंपते और दर्शन का लाभ लेकर चले जाते हैं। राम के प्रभाव से बराती प्रसन्न होते हैं। दशरथ चारों पुत्रों का विवाह करके अयोध्या लौटते हैं। वहाँ नगरवासी मार्ग, द्वार, बाजार और घर सजाते हैं। कलश, ध्वज, बंदनवार और आरती की तैयारी होती है। माताएँ बहुओं सहित पुत्रों की अगवानी के लिए हर्ष से निकलती हैं।
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24. चारों जोड़ों का स्वागत और मंगलमय समापन

सोहर 185–192 · हरिगीतिका छंद 24

सोहर 185
बधुन सहित सुत चारिउ मातु निहारहिं। बारहिं बार आरती मुदित उतारहिं॥१८५॥
सोहर 186
करहिं निछावरि छिनु छिनु मंगल मुद भरीं। दूलह दुलहिनिन्ह देखि प्रेम पयनिधि परी॥१८६॥
सोहर 187
देत पावड़े अरघ चलीं लै सादर। उमगि चलेउ आनंद भुवन भुइँ बादर॥१८७॥
सोहर 188
नारि उहारु उघारि दुलहिनिन्ह देखहिं। नैन लाहु लहि जनम सफल करि लेखहिं॥१८८॥
सोहर 189
भवन आनि सनमानि सकल मंगल किए। बसन कनक मनि धेनु दान बिप्रन्ह दिए॥१८९॥
सोहर 190
जाचक कीन्ह निहाल असीसहिं जहँ तहँ। पूजे देव पितर सब राम उदय कहँ॥१९०॥
सोहर 191
नेगचार करि दीन्ह सबहि पहिरावनि। समधी सकल सुआसिनि गुरतिय पावनि॥१९१॥
सोहर 192
जोरीं चारि निहारि असीसत निकसहिं। मनहुँ कुमुद बिधु-उदय मुदित मन बिकसहिं॥१९२॥
हरिगीतिका 24
बिकसहिं कुमुद जिमि देखि बिधु भइ अवधसुख सोभामई। एहि जुगुति राम बिबाह गावहिं सकल कबि कीरति नई॥ उपबीत ब्याह उछाह जे सिय राम मंगल गावहीं। तुलसी सकल कल्यान ते नर नारि अनुदिन पावहीं॥२४॥
सरल समेकित भावार्थमाताएँ चारों पुत्रों और बहुओं को देखकर बार-बार आरती उतारती हैं। नगर की स्त्रियाँ दुल्हनों के दर्शन करके अपने नेत्र और जीवन को सफल मानती हैं। घर में स्वागत, मंगलकार्य, दान और परिजनों का सम्मान होता है। चारों जोड़ों को आशीर्वाद देकर सब प्रसन्न हैं, जैसे चंद्रमा के उदय से कुमुद खिल उठते हैं। तुलसीदास समापन में सीता-राम के मंगलगान को कल्याणकारी बताते हैं। यह भक्ति और मंगलकामना की फलश्रुति है।
↑ विषय-सूची

पाठ-स्रोत और संपादकीय जानकारी

आधार-पाठ: रामचरित — जानकीमंगल मूल पाठ। तुलनात्मक संदर्भ: अनुभूति — तुलसीदास कृत जानकी मंगल तथा कविता कोश — विवाह-प्रसंग का पाठ। तुलसीदास जी की मूल रचना सार्वजनिक सम्पदा में है; इन स्रोतों के आधुनिक अनुवाद यहाँ नहीं लिए गए हैं।

आधार के वेब-पाठ में हरिगीतिका 19 का अधिकांश अंश तथा सोहर 153 की पहली पंक्ति छूटी हुई थी; इन्हें अनुभूति और कविता कोश के उपलब्ध पाठ से मिलाकर रखा गया है। सोहर 148 का मूल अंश गद्य से अलग किया गया है। पाठ में घुले दो संपादकीय शीर्षक और स्पष्ट दुहराव हटाए गए हैं; कुछ स्पष्ट टंकण-दोष तुलनात्मक पाठ के आधार पर सुधारे गए हैं। अवधी की मूल वर्तनी और अलग-अलग छंदों का क्रम रखा गया है। संस्करणों में छोटे वर्तनी-पाठांतर मिल सकते हैं।

भावार्थ: भक्ति भावना की स्वतंत्र सरल व्याख्या। अध्ययन-प्रसंगों के शीर्षक सुविधा के लिए हैं। राजपरिवार की ऐतिहासिक विवाह-रीतियों का वर्णन आधुनिक पाठक के लिए सभी प्रथाओं का अनिवार्य निर्देश नहीं है।

॥ जय श्री सीताराम ॥
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