पार्वतीमंगल सम्पूर्ण — 148 सोहर, 16 छंद और सरल हिंदी भावार्थ | तुलसीदास

गोस्वामी तुलसीदास · शिव-पार्वती विवाह का मंगलकाव्य

पार्वतीमंगल सम्पूर्ण

संपूर्ण मूल पाठ और प्रसंगवार सरल हिंदी भावार्थ

एक ही लेख में148 सोहर16 हरिगीतिका छंद

पार्वतीमंगल में गोस्वामी तुलसीदास जी ने माता पार्वती के जन्म, शिव के प्रति उनकी निष्ठा, तपस्या, प्रेम की परीक्षा और शिव-पार्वती के मंगलमय विवाह की कथा कही है। अवधी के इस स्वतंत्र काव्य में भक्ति के साथ वात्सल्य, विनोद और विदाई की करुणा भी है।

पाठ की व्यवस्था: सभी 148 सोहर और 16 हरिगीतिका छंद अपने क्रम में इसी लेख में हैं। विषय-सूची से 16 अध्ययन-प्रसंगों तक सीधे पहुँच सकते हैं। हर समूह के बाद स्वतंत्र सरल भावार्थ है; यह समेकित व्याख्या है, पंक्ति-पंक्ति का अलग शब्दानुवाद नहीं। सोहर और हरिगीतिका की मूल क्रम-संख्याएँ अलग-अलग चलती हैं।

1. मंगलाचरण और पार्वती का जन्म

सोहर 1–8 · हरिगीतिका छंद 1

सोहर 1
बिनइ गुरहि गुनिगनहि गिरिहि गननाथहि। ह्रदयँ आनि सिय राम धरे धनु भाथहि॥१॥
सोहर 2
गावउँ गौरि गिरीस बिबाह सुहावन। पाप नसावन पावन मुनि मन भावन॥२॥
सोहर 3
कबित रीति नहिं जानउँ कबि न कहावउँ। संकर चरित सुसरित मनहि अन्हवावउँ॥३॥
सोहर 4
पर अपबाद-बिबाद-बिदूषित बानिहि। पावन करौं सो गाइ भवेस भवानिहि॥४॥
सोहर 5
जय संबत फागुन सुदि पाँचै गुरु छिनु। अस्विनि बिरचेउँ मंगल सुनि सुख छिनु छिनु॥५॥
सोहर 6
गुन निधानु हिमवानु धरनिधर धुर धनि। मैना तासु घरनि घर त्रिभुवन तियमनि॥६॥
सोहर 7
कहहु सुकृत केहि भाँति सराहिय तिन्ह कर। लीन्ह जाइ जग जननि जनमु जिन्ह के घर॥७॥
सोहर 8
मंगल खानि भवानि प्रगट जब ते भइ। तब ते रिधि-सिधि संपति गिरि गृह नित नइ॥८॥
हरिगीतिका 1
नित नव सकल कल्यान मंगल मोदमय मुनि मानहिं। ब्रह्मादि सुर नर नाग अति अनुराग भाग बखानहीं॥ पितु मातु प्रिय परिवारु हरषहिं निरखि पालहिं लालहिं। सित पाख बाढ़ति चंद्रिका जनु चंदभूषन भालहिं॥१॥
सरल समेकित भावार्थतुलसीदास गुरु, गुणीजनों, हिमालय और गणेश को प्रणाम करके सीता-राम का स्मरण करते हैं। वे गौरी-शंकर के विवाह को अंतःकरण पवित्र करने वाला मंगलगान बताते हैं। कवि अपनी काव्य-सामर्थ्य का अभिमान नहीं करता; वह शिवचरित की पावन धारा में मन और वाणी को निर्मल करना चाहता है। हिमवान और मैना के घर जगज्जननी पार्वती का जन्म होता है। परिवार में प्रतिदिन नया आनंद और शुभता बढ़ती है। बालिका का विकास शिव के मस्तक की चंद्रकला के बढ़ने जैसी सुंदर उपमा से व्यक्त है।
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2. नारद का आगमन और योग्य वर की चर्चा

सोहर 9–16 · हरिगीतिका छंद 2

सोहर 9
कुँअरि सयानि बिलोकि मातु-पितु सोचहिं। गिरिजा जोगु जुरिहि बरु अनुदिन लोचहिं॥९॥
सोहर 10
एक समय हिमवान भवन नारद गए। गिरिबरु मैना मुदित मुनिहि पूजत भए॥१०॥
सोहर 11
उमहि बोलि रिषि पगन मातु मेलत भई। मुनि मन कीन्ह प्रणाम बचन आसिष दई॥११॥
सोहर 12
कुँअरि लागि पितु काँध ठाढ़ि भइ सोहई। रूप न जाइ बखानि जानु जोइ जोहई॥१२॥
सोहर 13
अति सनेहँ सतिभायँ पाय परि पुनि पुनि। कह मैना मृदु बचन सुनिअ बिनती मुनि॥१३॥
सोहर 14
तुम त्रिभुवन तिहुँ काल बिचार बिसारद। पारबती अनुरूप कहिय बरु नारद॥१४॥
सोहर 15
मुनि कह चौदह भुवन फिरउँ जग जहँ जहँ। गिरिबर सुनिय सरहना राउरि तहँ तहँ॥१५॥
सोहर 16
भूरि भाग तुम सरिस कतहुँ कोउ नाहिन। कछु न अगम सब सुगम भयो बिधि दाहिन॥१६॥
हरिगीतिका 2
दाहिन भए बिधि सुगम सब सुनि तजहु चित चिंता नई। बरु प्रथम बिरवा बिरचि बिरच्यो मंगला मंगलमई॥ बिधिलोक चरचा चलति राउरि चतुर चतुरानन कही। हिमवानु कन्या जोगु बरु बाउर बिबुध बंदित सही॥२॥
सरल समेकित भावार्थपार्वती के बड़ी होने पर माता-पिता उनके योग्य वर का विचार करते हैं। नारद के आने पर हिमवान और मैना आदरपूर्वक उनका स्वागत करते हैं। पार्वती मुनि को प्रणाम करती हैं और माता उनके लिए सुयोग्य वर बताने की विनती करती हैं। नारद परिवार के सौभाग्य की प्रशंसा करके संकेत में उस वर का वर्णन करते हैं जिसे सामान्य लोकदृष्टि विचित्र समझ सकती है, लेकिन देवता वंदन करते हैं। बाहर से उलटी प्रतीत होने वाली बात में भीतर शुभ अर्थ छिपा है।
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3. शिव-आराधना का उपदेश और पार्वती की सेवा

सोहर 17–24 · हरिगीतिका छंद 3

सोहर 17
मोरेहुँ मन अस आव मिलिहि बरु बाउर। लखि नारद नारदी उमहि सुख भा उर॥१७॥
सोहर 18
सुनि सहमे परि पाइ कहत भए दंपति। गिरिजहि लगे हमार जिवनु सुख संपति॥१८॥
सोहर 19
नाथ कहिय सोइ जतन मिटइ जेहिं दूषनु। दोष दलन मुनि कहेउ बाल बिधु भूषनु॥१९॥
सोहर 20
अवसि होइ सिधि साहस फलै सुसाधन। कोटि कलप तरु सरिस संभु अवराधन॥२०॥
सोहर 21
तुम्हरें आश्रम अबहिं ईसु तप साधहिं। कहिअ उमहि मनु लाइ जाइ अवराधहिं॥२१॥
सोहर 22
कहि उपाय दंपतिहि मुदित मुनिबर गए। अति सनेहँ पितु मातु उमहि सिखवत भए॥२२॥
सोहर 23
सजि समाज गिरिराज दीन्ह सबु गिरिजहि। बदति जननि जगदीस जुबति जनि सिरजहि॥२३॥
सोहर 24
जननि जनक उपदेस महेसहि सेवहि। अति आदर अनुराग भगति मनु भेवहि॥२४॥
हरिगीतिका 3
भेवहि भगति मन बचन करम अनन्य गति हर चरन की। गौरव सनेह सकोच सेवा जाइ केहि बिधि बरन की॥ गुन रूप जोबन सींव सुंदरि निरखि छोभ न हर हिएँ। ते धीर अछत बिकार हेतु जे रहत मनसिज बस किएँ॥३॥
सरल समेकित भावार्थनारद के संकेत से पार्वती आनंदित होती हैं, पर माता-पिता चिंता में पड़ जाते हैं। वे पुत्री को अपने जीवन और सुख का आधार बताते हुए उपाय पूछते हैं। मुनि चंद्रभूषण शिव की आराधना का मार्ग बताते हैं और साधना की सफलता के लिए साहस तथा एकाग्रता का आश्वासन देते हैं। माता-पिता की सीख से पार्वती शिव की प्रेमपूर्वक सेवा करती हैं। उनका मन, वचन और कर्म एक ही लक्ष्य में लग जाते हैं। शिव की समाधि और धीरता बाहरी आकर्षण से विचलित नहीं होती।
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4. कामदेव का दहन और पार्वती का दृढ़ संकल्प

सोहर 25–32 · हरिगीतिका छंद 4

सोहर 25
देव देखि भल समय मनोज बुलायउ। कहेउ करिअ सुर काजु साजु सजि आयउ॥२५॥
सोहर 26
बामदेउ सन कामु बाम होइ बरतेउ। जग जय मद निदरेसि फरु पायसि फर तेउ॥२६॥
सोहर 27
रति पति हीन मलीन बिलोकि बिसूरति। नीलकंठ मृदु सील कृपामय मूरति॥२७॥
सोहर 28
आसुतोष परितोष कीन्ह बर दीन्हेउ। सिव उदास तजि बास अनत गम कीन्हेउ॥२८॥
सोहर 29
उमा नेह बस बिकल देह सुधि बुधि गई। कलप बेलि बन बढ़त बिषम हिम जनु दई॥२९॥
सोहर 30
समाचार सब सखिन्ह जाइ घर घर कहे। सुनत मातु पितु परिजन दारुन दुख दहे॥३०॥
सोहर 31
जाइ देखि अति प्रेम उमहि उर लावहिं। बिलपहिं बाम बिधातहि दोष लगावहिं॥३१॥
सोहर 32
जौ न होहिं मंगल मग सुर बिधि बाधक। तौ अभिमत फल पावहिं करि श्रमु साधक॥३२॥
हरिगीतिका 4
साधक कलेस सुनाइ सब गौरिहि निहोरत धाम को। को सुनइ काहि सोहाय घर चित चहत चंद्र ललामको॥ समुझाइ सबहि दृढ़ाइ मनु पितु मातु, आयसु पाइ कै। लागी करन पुनि अगमु तपु तुलसी कहै किमि गाइकै॥४॥
सरल समेकित भावार्थदेवता अपने कार्य के लिए कामदेव को भेजते हैं। कामदेव शिव के सामने अपने प्रभाव का अभिमान करते हैं और दग्ध होते हैं। रति का दुःख देखकर करुणामय शिव उसे आश्वासन देते हैं, फिर वहाँ से दूसरे स्थान को चले जाते हैं। पार्वती विरह से अत्यंत व्याकुल होती हैं। माता-पिता और परिजन उन्हें घर लौटने के लिए समझाते हैं। वे सबको सांत्वना देकर, माता-पिता की अनुमति पाकर, अपना संकल्प और दृढ़ करती हैं तथा पुनः तप में लग जाती हैं।
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5. कठोर तप और अपर्णा नाम

सोहर 33–40 · हरिगीतिका छंद 5

सोहर 33
फिरेउ मातु पितु परिजन लखि गिरिजा पन। जेहिं अनुरागु लागु चितु सोइ हितु आपन॥३३॥
सोहर 34
तजेउ भोग जिमि रोग लोग अहि गन जनु। मुनि मनसहु ते अगम तपहिं लायो मनु॥३४॥
सोहर 35
सकुचहिं बसन बिभूषन परसत जो बपु। तेहिं सरीर हर हेतु अरंभेउ बड़ तपु॥३५॥
सोहर 36
पूजइ सिवहि समय तिहुँ करइ निमज्जन। देखि प्रेमु ब्रतु नेमु सराहहिं सज्जन॥३६॥
सोहर 37
नीद न भूख पियास सरिस निसि बासरु। नयन नीरु मुख नाम पुलक तनु हियँ हरु॥३७॥
सोहर 38
कंद मूल फल असन, कबहुँ जल पवनहि। सूखे बेल के पात खात दिन गवनहि॥३८॥
सोहर 39
नाम अपरना भयउ परन जब परिहरे। नवल धवल कल कीरति सकल भुवन भरे॥३९॥
सोहर 40
देखि सराहहिं गिरिजहि मुनिबरु मुनि बहु। अस तप सुना न दीख कबहुँ काहुँ कहु॥४०॥
हरिगीतिका 5
काहूँ न देख्यौ कहहिं यह तपु जोग फल फल चारि का। नहिं जानि जाइ न कहति चाहति काहि कुधर-कुमारिका॥ बटु बेष पेखन पेम पनु ब्रत नेम ससि सेखर गए। मनसहिं समरपेउ आपु गिरिजहि बचन मृ्दु बोलत भए॥५॥
सरल समेकित भावार्थपार्वती का मन अपने आराध्य में स्थिर है। वे सुख-सुविधा का मोह छोड़कर नियमपूर्वक शिव-पूजन करती हैं। कवि उनकी एकाग्रता को ऐसी तन्मयता के रूप में चित्रित करता है जिसमें दिन-रात, भूख-प्यास और शरीर के सुख गौण हो जाते हैं। तप की तीव्रता बढ़ते-बढ़ते वे पत्तों का आहार भी छोड़ देती हैं, जिससे अपर्णा नाम प्रसिद्ध होता है। ऋषि उनके संकल्प पर विस्मित होते हैं। शिव उनका प्रेम और निष्ठा परखने के लिए ब्रह्मचारी का वेश धारण करके आते हैं। यह तप का काव्यात्मक वर्णन है, आहार-त्याग की सामान्य विधि नहीं।
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6. ब्रह्मचारी-वेश में शिव का आगमन

सोहर 41–48 · हरिगीतिका छंद 6

सोहर 41
देखि दसा करुनाकर हर दुख पायउ। मोर कठोर सुभाय ह्रदयँ अस आयउ॥४१॥
सोहर 42
बंस प्रसंसि मातु पितु कहि सब लायक। अमिय बचनु बटु बोलेउ अति सुख दायक॥४२॥
सोहर 43
देबि करौं कछु बिनती बिलगु न मानब। कहउँ सनेहँ सुभाय साँच जियँ जानब॥४३॥
सोहर 44
जननि जगत जस प्रगटेहु मातु पिता कर। तीय रतन तुम उपजिहु भव रतनाकर॥४४॥
सोहर 45
अगम न कछु जग तुम कहँ मोहि अस सूझइ। बिनु कामना कलेस कलेस न बूझइ॥४५॥
सोहर 46
जौ बर लागि करहु तप तौ लरिकाइअ। पारस जौ घर मिलै तौ मेरु कि जाइअ॥४६॥
सोहर 47
मोरें जान कलेस करिअ बिनु काजहि। सुधा कि रोगिहि चाहइ रतन की राजहि॥४७॥
सोहर 48
लखि न परेउ तप कारन बटु हियँ हारेउ। सुनि प्रिय बचन सखी मुख गौरि निहारेउ॥४८॥
हरिगीतिका 6
गौरीं निहारेउ सखी मुख रुख पाइ तेहिं कारन कहा। तपु करहिं हर हितु सुनि बिहँसि बटु कहत मुरुखाई महा॥ जेहिं दीन्ह अस उपदेस बरेदु कलेस करि बरु बावरो। हित लागि कहौं सुभायँ सो बड़ बिषम बैरी रावरो॥६॥
सरल समेकित भावार्थब्रह्मचारी-वेश में आए शिव पार्वती की दशा देखकर भीतर से करुणा अनुभव करते हैं। बाहर वे मधुर वचन कहकर कुल, माता-पिता और उनके गुणों की प्रशंसा करते हैं। वे पूछते हैं कि इतनी कठोर तपस्या का प्रयोजन क्या है; जिन्हें संसार की संपन्नता सहज उपलब्ध है, वे यह कष्ट क्यों उठा रही हैं? पार्वती सखी की ओर देखती हैं और सखी उनका शिव-प्राप्ति का संकल्प बताती है। अब ब्रह्मचारी उलटा तर्क करके उस संकल्प की परीक्षा लेने लगते हैं।
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7. शिव-वेश पर प्रश्न: प्रेम की परीक्षा

सोहर 49–56 · हरिगीतिका छंद 7

सोहर 49
कहहु काह सुनि रीझिहु बर अकुलीनहिं। अगुन अमान अजाति मातु पितु हीनहिं॥४९॥
सोहर 50
भीख मागि भव खाहिं चिता नित सोवहिं। नाचहिं नगन पिसाच पिसाचिनि जोवहिं॥५०॥
सोहर 51
भाँग धतूर अहार छार लपटावहिं। जोगी जटिल सरोष भोग नहिं भावहिं॥५१॥
सोहर 52
सुमुखि सुलोचनि हर मुख पंच तिलोचन। बामदेव फुर नाम काम मद मोचन॥५२॥
सोहर 53
एकउ हरहिं न बर गुन कोटिक दूषन। नर कपाल गज खाल ब्याल बिष भूषन॥५३॥
सोहर 54
कहँ राउर गुन सील सरूप सुहावन। कहाँ अमंगल बेषु बिसेषु भयावन॥५४॥
सोहर 55
जो सोचइ ससि कलहि सो सोचइ रौरेहि। कहा मोर मन धरि न बिरय बर बौरेहि॥५५॥
सोहर 56
हिए हेरि हठ तजहु हठै दुख पैहहु। ब्याह समय सिख मोरि समुझि पछितैहहु॥५६॥
हरिगीतिका 7
पछिताब भूत पिसाच प्रेत जनेत ऎहैं साजि कै। जम धार सरिस निहारि सब नर्-नारि चलिहहिं भाजि कै॥ गज अजिन दिब्य दुकूल जोरत सखी हँसि मुख मोरि कै। कोउ प्रगट कोउ हियँ कहिहि मिलवत अमिय माहुर घोरि कै॥७॥
सरल समेकित भावार्थपरीक्षा के लिए ब्रह्मचारी शिव के वैरागी वेश, भस्म, जटा, श्मशान-निवास, सर्प और असामान्य बरात का उल्लेख करके उन्हें सांसारिक विवाह की कसौटी पर अनुपयुक्त बताते हैं। वे पार्वती की कोमलता और राजसी पालन-पोषण से इसकी तुलना करते हैं। ये परीक्षा लेने वाले वेश के कथन हैं; इन्हें शिव की वास्तविक निंदा या कवि का अंतिम मत न समझें। प्रसंग का केंद्र यह है कि पार्वती का प्रेम बाहरी सजावट, प्रतिष्ठा और लोक-मान्यता पर कितना निर्भर है।
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8. पार्वती की अटल निष्ठा और शिव का प्रकट होना

सोहर 57–66 · हरिगीतिका छंद 8

सोहर 57
तुमहि सहित असवार बसहँ जब होइहहिं। निरखि नगर नर नारि बिहँसि मुख गोइहहिं॥५७॥
सोहर 58
बटु करि कोटि कुतरक जथा रुचि बोलइ॥ अचल सुता मनु अचल बयारि कि डोलइ॥५८॥
सोहर 59
साँच सनेह साँच रुचि जो हठि फेरइ। सावन सरिस सिंधु रुख सूप सो घेरइ॥५९॥
सोहर 60
मनि बिनु फनि जल हीन मीन तनु त्यागइ। सो कि दोष गुन गनइ जो जेहि अनुरागइ॥६०॥
सोहर 61
करन कटुक चटु बचन बिसिष सम हिय हए। अरुन नयन चढ़ि भृकुटि अधर फरकत भए॥६१॥
सोहर 62
बोली फिर लखि सखिहि काँपु तन थर थर। आलि बिदा करु बटुहि बेगि बड़ बरबर॥६२॥
सोहर 63
कहुँ तिय होहिं सयानि सुनहिं सिख राउरि। बौरेहि कैं अनुराग भइउँ बड़ि बाउरि॥६३॥
सोहर 64
दोष निधान इसानु सत्य सबु भाषेउ। मेटि को सकइ सो आँकु जो बिधि लिखि राखेउ॥६४॥
सोहर 65
को करि बादु बिबादु बिषादु बढ़ावइ। मीठ काहि कबि कहहिं जाहि जोइ भावइ॥६५॥
सोहर 66
भइ बड़ि बार आलि कहुँ काज सिधारहिं। बकि जनि उठहिं बहोरि कुजुगति सवाँरहिं॥६६॥
हरिगीतिका 8
जनि कहहिं कछु बिपरीत जानत प्रीति रीति न बात की। सिव साधु निंदकु मंद अति जोउ सुनै सोउ बड़ पातकी॥ सुनि बचन सोधि सनेहु तुलसी साँच अबिचल पावनो। भए प्रगट करुनासिंधु संकरु भाल चंद सुहावनो॥८॥
सरल समेकित भावार्थअनेक कुतर्क सुनकर भी पर्वत-पुत्री का मन पर्वत की तरह स्थिर रहता है। कवि कहता है कि सच्चा प्रेम जिद करके मोड़ा नहीं जा सकता। शिव की निंदा पार्वती को असह्य होती है; वे सखी से ब्रह्मचारी को विदा करने को कहती हैं। उनकी वाणी में अपने आराध्य के प्रति स्पष्ट निष्ठा और अपमान के सामने दृढ़ता है। परीक्षा में प्रेम की सच्चाई प्रकट होने पर ब्रह्मचारी-वेश समाप्त होता है और चंद्रशेखर शिव अपने करुणामय स्वरूप में सामने आ जाते हैं।
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9. तप-प्रेम की स्वीकृति और विवाह का संकल्प

सोहर 67–74 · हरिगीतिका छंद 9

सोहर 67
सुंदर गौर सरीर भूति भलि सोहइ। लोचन भाल बिसाल बदनु मन मोहइ॥६७॥
सोहर 68
सैल कुमारि निहारि मनोहर मूरति। सजल नयन हियँ हरषु पुलक तन पूरति॥६८॥
सोहर 69
पुनि पुनि करै प्रनामु न आवत कछु कहि। देखौं सपन कि सौतुख ससि सेखर सहि॥६९॥
सोहर 70
जैसें जनम दरिद्र महामनि पावइ। पेखत प्रगट प्रभाउ प्रतीति न आवइ॥७०॥
सोहर 71
सुफल मनोरथ भयउ गौरि सोहइ सुठि। घर ते खेलन मनहुँ अबहिं आई उठि॥७१॥
सोहर 72
देखि रूप अनुराग महेस भए बस। कहत बचन जनु सानि सनेह सुधा रस॥७२॥
सोहर 73
हमहि आजु लगि कनउड़ काहुँ न कीन्हेउँ। पारबती तप प्रेम मोल मोहि लीन्हेउँ॥७३॥
सोहर 74
अब जो कहहु सो करउँ बिलंबु न एहिं घरी। सुनि महेस मृदु बचन पुलकि पायन्ह परी॥७४॥
हरिगीतिका 9
परि पायँ सखि मुख कहि जनायो आपु बाप अधीनता। परितोषि गरिजहि चले बरनत प्रीति नीति प्रबीनता॥ हर हृदयँ धरि घर गौरि गवनी कीन्ह बिधि मन भावनो। आनंदु प्रेम समाजु मंगल गान बाजु बधावनो॥९॥
सरल समेकित भावार्थअपने सामने शिव की मनोहर मूर्ति देखकर पार्वती की आँखों में आनंद के आँसू और शरीर में पुलक भर जाता है। उन्हें अपने सौभाग्य पर सहसा विश्वास नहीं होता, जैसे जन्म से निर्धन व्यक्ति अप्रत्याशित अनमोल रत्न पाकर विस्मित हो जाए। शिव उनके तप और प्रेम को स्वीकार करके कहते हैं कि उन्होंने उन्हें अपने प्रेम का ऋणी बना लिया है। पार्वती विवाह की बात माता-पिता के माध्यम से संपन्न करने की मर्यादा सखी द्वारा कहती हैं। शिव उनकी भावना का सम्मान करते हैं और पार्वती आनंदपूर्वक घर लौटती हैं।
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10. सप्तर्षियों का प्रस्ताव और लग्न-निर्धारण

सोहर 75–82 · हरिगीतिका छंद 10

सोहर 75
सिव सुमिरे मुनि सात आइ सिर नाइन्हि। कीन्ह संभु सनमानु जन्म फल पाइन्हि॥७५॥
सोहर 76
सुमिरहिं सकृत तुम्हहि जन तेइ सुकृति बर। नाथ जिन्हहि सुधि करिअ तिनहिं सम तेइ हर॥७६॥
सोहर 77
सुनि मुनि बिनय महेस परम सुख पायउ। कथा प्रसंग मुनीसन्ह सकल सुनायउ॥७७॥
सोहर 78
जाहु हिमाचल गेह प्रसंग चलायहु। जौं मन मान तुम्हार तौ लगन धरायहु॥७८॥
सोहर 79
अरुंधती मिलि मनहिं बात चलाइहि। नारि कुसल इहिं काजु बनि आइहि॥७९॥
सोहर 80
दुलहिनि उमा ईसु बरु साधक ए मुनि। बनिहि अवसि यहु काजु गगन भइ अस धुनि॥८०॥
सोहर 81
भयउ अकनि आनंद महेस मुनीसन्ह। देहिं सुलोचनि सगुन कलस लिएँ सीसन्ह॥८१॥
सोहर 82
सिव सो कहेउ दिन ठाउँ बहोरि मिलनु जहँ। चले मुदित मुनिराज गए गिरिबर पहँ॥८२॥
हरिगीतिका 10
गिरि गेह गे अति नेहँ आदर पूजि पहुँनाई करी। घरवात घरनि समेत कन्या आनि सब आगें धरी॥ सुखु पाइ बात चलाइ सुदिन सोधाइ गिरिहि सिखाइ कै। रिषि सात प्रातहिं चले प्रमुदित ललित लगन लिखाइ कै॥१०॥
सरल समेकित भावार्थशिव सप्तर्षियों का स्मरण करते हैं। मुनि उपस्थित होकर प्रणाम करते हैं और शिव उनका आदर करते हैं। शिव सारा प्रसंग बताकर हिमवान के घर विवाह का प्रस्ताव ले जाने को कहते हैं। अरुंधती को भी परिवार से आत्मीय बातचीत करने की भूमिका दी जाती है। हिमवान और मैना मुनियों की पहुनाई करते हैं तथा पार्वती को उनके सामने लाते हैं। सबकी प्रसन्न सहमति से शुभ समय देखा जाता है और लग्नपत्र तैयार होता है। इस प्रसंग में इच्छा, संवाद, सम्मान और पारिवारिक सम्मति साथ हैं।
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11. हिमवान के घर विवाह की सजावट

सोहर 83–88 · हरिगीतिका छंद 11

सोहर 83
बिप्र बृंद सनमानि पूजि कुल गुर सुर। परेउ निसानहिं घाउ चाउ चहुँ दिसि पुर॥८३॥
सोहर 84
गिरि बन सरित सिंधु सर सुनइ जो पायउ। सब कहँ गिरिबर नायक नेवत पठायउ॥८४॥
सोहर 85
धरि धरि सुंदर बेष चले हरषित हिएँ। चवँर चीर उपहार हार मनि गन लिएँ॥८५॥
सोहर 86
कहेउ हरषि हिमवान बितान बनावन। हरषित लगीं सुआसिनि मंगल गावन॥८६॥
सोहर 87
तोरन कलस चँवर धुज बिबिध बनाइन्हि। हाट पटोरन्हि छाय सफल तरु लाइन्हि॥८७॥
सोहर 88
गौरी नैहर केहि बिधि कहहु बखानिय। जनु रितुराज मनोज राज रजधानिय॥८८॥
हरिगीतिका 11
जनु राजधानी मदन की बिरची चतुर बिधि और हीं। रचना बिचित्र बिलोकि लोचन बिथकि ठौरहिं ठौर हीं॥ एहि भाँति ब्याह समाज सजि गिरिराजु मगु जोवन लगे। तुलसी लगन लै दीन्ह मुनिन्ह महेस आनँद रँग मगे॥११॥
सरल समेकित भावार्थहिमवान गुरु, देवताओं और विद्वानों का सम्मान करके विवाह की तैयारी आरंभ करते हैं। पर्वत, वन, नदियाँ और समुद्र तक मानवीकृत होकर निमंत्रण और उत्सव में सम्मिलित हैं। अतिथि सुंदर वेश और भेंट लेकर आते हैं। मंडप, तोरण, कलश, पताका और सजाए हुए बाजारों से पार्वती का मायका अत्यंत सुंदर दिखाई देता है। कवि इसे वसंत और सौंदर्य की राजधानी जैसी छवि देता है। उधर मुनि शिव को लग्नपत्र देते हैं और वे विवाह की तैयारी से आनंदित होते हैं।
↑ विषय-सूची

12. देवताओं और शिवगणों की अनोखी बरात

सोहर 89–96 · हरिगीतिका छंद 12

सोहर 89
बेगि बोलाइ बिरंचि बचाइ लगन जब। कहेन्हि बिआहन चलहु बुलाइ अमर सब॥८९॥
सोहर 90
बिधि पठए जहँ तहँ सब सिव गन धावन। सुनि हरषहिं सुर कहहिं निसान बजावन॥९०॥
सोहर 91
रचहिं बिमान बनाइ सगुन पावहिं भले। निज निज साजु समाजु साजि सुरगन चले॥९१॥
सोहर 92
मुदित सकल सिव दूत भूत गन गाजहिं। सूकर महिष स्वान खर बाहन साजहिं॥९२॥
सोहर 93
नाचहिं नाना रंग तरंग बढ़ावहिं। अज उलूक बृक नाद गीत गन गावहिं॥९३॥
सोहर 94
रमानाथ सुरनाथ साथ सब सुर गन। आए जहँ बिधि संभु देखि हरषे मन॥९४॥
सोहर 95
मिले हरिहिं हरु हरषि सुभाषि सुरेसहि। सुर निहारि सनमानेउ मोद महेसहि॥९५॥
सोहर 96
बहु बिधि बाहन जान बिमान बिराजहिं। चली बरात निसान गहागह बाजहिं॥९६॥
हरिगीतिका 12
बाजहिं निसान सुगान नभ चढ़ि बसह बिधुभूषन चले। बरषहिं सुमन जय जय करहिं सुर सगुन सुभ मंगल भले॥ तुलसी बराती भूत प्रेत पिसाच पसुपति सँग लसे। गज छाल ब्याल कपाल माल बिलोकि बर सुर हरि हँसे॥१२॥
सरल समेकित भावार्थविवाह का समय जानकर शिव देवताओं को बुलवाते हैं। देवता अपने-अपने विमान, वाहन और साज के साथ आते हैं। शिवगणों की तैयारी अलग और निराली है: उनके रूप, वाहन और ध्वनियाँ लोक की सामान्य बरात से भिन्न हैं। विष्णु, इंद्र और अन्य देवता शिव से मिलते हैं। मंगलध्वनि, पुष्पवर्षा और जय-जयकार के बीच शिव नंदी पर सवार होकर चलते हैं। भस्म, सर्प और कपाल से सजे दूल्हे को देखकर विष्णु का परिहास प्रसंग में सहज हास्य जोड़ता है।
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13. बरात का आगमन और मैना की चिंता

सोहर 97–108 · हरिगीतिका छंद 13

सोहर 97
बिबुध बोलि हरि कहेउ निकट पुर आयउ। आपन आपन साज सबहिं बिलगायउ॥९७॥
सोहर 98
प्रमथनाथ के साथ प्रमथ गन राजहिं। बिबिध भाँति मुख बाहन बेष बिराजहिं॥९८॥
सोहर 99
कमठ खपर मढि खाल निसान बजावहिं। नर कपाल जल भरि-भरि पिअहिं पिआवहिं॥९९॥
सोहर 100
बर अनुहरत बरात बनी हरि हँसि कहा। सुनि हियँ हँसत महेस केलि कौतुक महा॥१००॥
सोहर 101
बड़ बिनोद मग मोद न कछु कहि आवत। जाइ नगर नियरानि बरात बजावत॥१०१॥
सोहर 102
पुर खरभर उर हरषेउ अचल अखंडलु। परब उदधि उमगेउ जनु लखि बिधु मंडलु॥१०२॥
सोहर 103
प्रमुदित गे अगवान बिलोकि बरातहि। भभरे बनइ न रहत न बनइ परातहि॥१०३॥
सोहर 104
चले भाजि गज बाजि फिरहिं नहिं फेरत। बालक भभरि भुलान फिरहिं घर हेरत॥१०४॥
सोहर 105
दीन्ह जाइ जनवास सुपास किए सब। घर घर बालक बात कहन लागे तब॥१०५॥
सोहर 106
प्रेत बेताल बराती भूत भयानक। बरद चढ़ा बर बाउर सबइ सुबानक॥१०६॥
सोहर 107
कुसल करइ करतार कहहिं हम साँचिअ। देखब कोटि बिआह जिअत जौं बाँचिअ॥१०७॥
सोहर 108
समाचार सुनि सोचु भयउ मन मयनहिं। नारद के उपदेस कवन घर गे नहिं॥१०८॥
हरिगीतिका 13
घर घाल चालक कलह प्रिय कहियत परम परमारथी। तैसी बरेखी कीन्हि पुनि मुनि सात स्वारथ सारथी॥ उर लाइ उमहि अनेक बिधि जलपति जननि दुख मानई। हिमवान कहेउ इसान महिमा अगम निगम न जानई॥१३॥
सरल समेकित भावार्थनगर के निकट विष्णु देवताओं को अपने-अपने समूह अलग रखने को कहते हैं। शिव के साथ उनके विचित्र गण दिखाई देते हैं। विष्णु हँसकर कहते हैं कि दूल्हे के अनुरूप ही बरात बनी है; शिव भी इस विनोद का आनंद लेते हैं। बरात देखकर अगवानी करने वाले और बालक घबरा जाते हैं। घरों में इसकी चर्चा फैलती है। मैना सुनकर पुत्री के लिए चिंतित होती हैं और प्रस्ताव लाने वालों से शिकायत करती हैं। हिमवान उन्हें शिव की अगाध महिमा का स्मरण कराते हैं।
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14. शिव का मंगलमय रूप और परिछन

सोहर 109–120 · हरिगीतिका छंद 14

सोहर 109
सुनि मैना भइ सुमन सखी देखन चली। जहँ तहँ चरचा चलइ हाट चौहट गली॥१०९॥
सोहर 110
श्रीपति सुरपति बिबुध बात सब सुनि सुनि। हँसहि कमल कर जोरि मोरि मुख पुनि पुनि॥११०॥
सोहर 111
लखि लौकिक गति संभु जानि बड़ सोहर। भए सुंदर सत कोटि मनोज मनोहर॥१११॥
सोहर 112
नील निचोल छाल भइ फनि मनि भूषन। रोम रोम पर उदित रूपमय पूषन॥११२॥
सोहर 113
गन भए मंगल बेष मदन मन मोहन। सुनत चले हियँ हरषि नारि नर जोहन॥११३॥
सोहर 114
संभु सरद राकेस नखत गन सुर गन। जनु चकोर चहुँ ओर बिराजहिं पुर जन॥११४॥
सोहर 115
गिरबर पठए बोलि लगन बेरा भई। मंगल अरघ पाँवड़े देत चले लई॥११५॥
सोहर 116
होहिं सुमंगल सगुन सुमन बरषहिं सुर। गहगहे गान निसान मोद मंगल पुर॥११६॥
सोहर 117
पहिलिहिं पवरि सुसामध भा सुख दायक। इति बिधि उत हिमवान सरिस सब लायक॥११७॥
सोहर 118
मनि चामीकर चारु थार सजि आरति। रति सिहाहिं लखि रूप गान सुनि भारति॥११८॥
सोहर 119
भरी भाग अनुराग पुलकि तन मुद मन। मदन मत्त गजगवनि चलीं बर परिछन॥११९॥
सोहर 120
बर बिलोकि बिधु गौर सुअंग उजागर। करति आरती सासु मगन सुख सागर॥१२०॥
हरिगीतिका 14
सुख सिंधु मगन उतारि आरति करि निछावर निरखि कै। मगु अरघ बसन प्रसून भरि लेइ चलीं मंडप हरषि कै॥ हिमवान दीन्हें उचित आसन सकल सुर सनमानि कै॥ तेहि समय साज समाज सब राखे सुमंडप आनि कै॥१४॥
सरल समेकित भावार्थमैना की चिंता और नगर की चर्चा सुनकर देवता मुसकराते हैं। लोक की परिस्थिति समझकर शिव ऐसा सुंदर मंगल-वेश धारण करते हैं जिससे सबका भय दूर हो जाता है। उनके गण भी सुशोभित दिखाई देते हैं। अब नगर की स्त्रियाँ और पुरुष आनंदपूर्वक दर्शन को आते हैं। हिमवान विवाह का समय होने पर शिव को मंडप में बुलवाते हैं। आरती, अर्घ्य और परिछन के साथ स्वागत होता है। मैना दूल्हे को देखकर आनंद में डूब जाती हैं और देवताओं को उचित आसन दिया जाता है।
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15. विवाह-मंडप और शिव-पार्वती का पाणिग्रहण

सोहर 121–132 · हरिगीतिका छंद 15

सोहर 121
अरघ देइ मनि आसन बर बैठायउ। पूजि कीन्ह मधुपर्क अमी अचवायउ॥१२१॥
सोहर 122
सप्त रिषिन्ह बिधि कहेउ बिलंब न लाइअ। लगन बेर भइ बेगि बिधान बनाइअ॥१२२॥
सोहर 123
थापि अनल हर बरहि बसन पहिरायउ। आनहु दुलहिनि बेगि समय अब आयउ॥१२३॥
सोहर 124
सखी सुआसिनि संग गौरि सुठि सोहति। प्रगट रूपमय मूरति जनु जग मोहति॥१२४॥
सोहर 125
भूषन बसन समय सम सोभा सो भली। सुषमा बेलि नवल जनु रूप फलनि फली॥१२५॥
सोहर 126
कहहु काहि पटतरिय गौरि गुन रूपहि। सिंधु कहिय केहि भाँति सरिस सर कूपहि॥१२६॥
सोहर 127
आवत उमहि बिलोकि सीस सुर नावहिं। भव कृतारथ जनम जानि सुख पावहिं॥१२७॥
सोहर 128
बिप्र बेद धुनि करहिं सुभासिष कहि कहि। गान निसान सुमन झरि अवसर लहि लहि॥१२८॥
सोहर 129
बर दुलहिनिहि बिलोकि सकल मन हरसहिं। साखोच्चार समय सब सुर मुनि बिहसहिं॥१२९॥
सोहर 130
लोक बेद बिधि कीन्ह लीन्ह जल कुस कर। कन्या दान सँकलप कीन्ह धरनीधर॥१३०॥
सोहर 131
पूजे कुल गुर देव कलसु सिल सुभ घरी। लावा होम बिधान बहुरि भाँवरि परी॥१३१॥
सोहर 132
बंदन बंदि ग्रंथि बिधि करि धुव देखेउ। भा बिबाह सब कहहिं जनम फल पेखेउ॥१३२॥
हरिगीतिका 15
पेखेउ जनम फलु भा बिबाह उछाह उमगहि दस दिसा। नीसान गान प्रसूत झरि तुलसी सुहावनि सो निसा॥ दाइज बसन मनि धेनु धन हय गय सुसेवक सेवकी। दीन्हीं मुदित गिरिराज जे गिरिजहि पिआरि पेव की॥१५॥
सरल समेकित भावार्थशिव को आदर से आसन और मधुपर्क दिया जाता है। सप्तर्षियों के कहने पर समयानुसार अग्नि स्थापित होती है और पार्वती को सखियों के साथ लाया जाता है। उनके सौंदर्य और गुणों का वर्णन सुनते हुए देवता प्रणाम करते हैं। वेदध्वनि, आशीर्वाद और मंगलगीतों के बीच हिमवान कन्यादान का संकल्प करते हैं। होम, लावा, भाँवर, ग्रंथि-बंधन और ध्रुव-दर्शन जैसे संस्कारों से विवाह संपन्न होता है। सभी आनंदित हैं। भेंटों का वर्णन काव्य के तत्कालीन राजपरिवार की रीति है, आधुनिक विवाह में माँग का निर्देश नहीं।
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16. विवाह-विनोद, विदाई और मंगलहार का समापन

सोहर 133–148 · हरिगीतिका छंद 16

सोहर 133
बहुरि बराती मुदित चले जनवासहि। दूलह दुलहिन गे तब हास-अवासहि॥१३३॥
सोहर 134
रोकि द्वार मैना तब कौतुक कीन्हेउ। करि लहकौरि गौरि हर बड़ सुख दीन्हेउ॥१३४॥
सोहर 135
जुआ खेलावत गारि देहिं गिरि नारिहि। आपनि ओर निहारि प्रमोद पुरारिहि॥१३५॥
सोहर 136
सखी सुआसिनि सासु पाउ सुख सब बिधि। जनवासेहि बर चलेउ सकल मंगल निधि॥१३६॥
सोहर 137
भइ जेवनार बहोरि बुलाइ सकल सुर। बैठाए गिरिराज धरम धरनि धुर॥१३७॥
सोहर 138
परुसन लगे सुआर बिबुध जन जेवहिं। देहिं गारि बर नारि मोद मन भेवहिं॥१३८॥
सोहर 139
करहिं सुमंगल गान सुघर सहनाइन्ह। जेइँ चले हरि दुहिन सहित सुर भाइन्ह॥१३९॥
सोहर 140
भूधर भोरु बिदा कर साज सजायउ। चले देव सजि जान निसान बजायउ॥१४०॥
सोहर 141
सनमाने सुर सकल दीन्ह पहिरावनि। कीन्ह बड़ाई बिनय सनेह सुहावनि॥१४१॥
सोहर 142
गहि सिव पद कह सासु बिनय मृदु मानबि। गौरि सजीवन मूरि मोरि जियँ जानबि॥१४२॥
सोहर 143
भेंटि बिदा करि बहुरि भेंटि पहुँचावहि। हुँकरि हुँकरि सु लवाइ धेनु जनु धावहिं॥१४३॥
सोहर 144
उमा मातु मुख निरखि नैन जल मोचहिं। नारि जनमु जग जाय सखी कहि सोचहिं॥१४४॥
सोहर 145
भेंटहि उमहि गिरिराज सहित सुत परिजन। बहुत भाँति समुझाइ फिरे बिलखित मन॥१४५॥
सोहर 146
संकर गौरि समेत गए कैलासहि। नाइ नाइ सिर देव चले निज बासहि॥१४६॥
सोहर 147
उमा महेस बिआह उछाह भुवन भरे। सब के सकल मनोरथ बिधि पूरन करे॥१४७॥
सोहर 148
प्रेम पाट पटडोरि गौरि हर गुन मनि। मंगल हार रचेउ कबि मति मृगलोचनि॥१४८॥
हरिगीतिका 16
मृगनयनि बिधुबदनी रचेउ मनि मंजु मंगलहार सो। उर धरहुँ जुबती जन बिलोकि तिलोक सोभा सार सो॥ कल्यान काज उछाह ब्याह सनेह सहित जो गाइहै। तुलसी उमा संकर प्रसाद प्रमोद मन प्रिय पाइहै॥१६॥
सरल समेकित भावार्थविवाह के बाद कोहबर के विनोद, द्वार रोकने, लहकौरि और खेलों में परिवार का उल्लास व्यक्त होता है। देवताओं को प्रेम से भोजन कराया जाता है। प्रातः विदाई के समय मैना शिव से कहती हैं कि गौरी को उनके जीवन के अनमोल आधार की तरह समझें। माँ-बेटी और पिता-परिवार का बिछोह करुण है; पार्वती कैलास जाती हैं और देवता अपने धाम लौटते हैं। अंत में तुलसीदास इस काव्य को प्रेम के धागे में पिरोया गौरी-शंकर के गुणों का मंगलहार बताते हैं और प्रेमपूर्वक गाने वालों के लिए कल्याण की कामना करते हैं।
↑ विषय-सूची

कुछ कठिन शब्द

  • गिरिजा / अचलसुता: पर्वत-पुत्री पार्वती
  • गिरीस / महेस: भगवान शिव
  • बटु: ब्रह्मचारी बालक
  • अपर्णा: पत्तों का आहार भी छोड़ने वाली
  • बसह / बरद: बैल, यहाँ नंदी
  • प्रमथ: शिव के गण
  • परिछन: विवाह में दूल्हे का आरती सहित स्वागत
  • जेवनार: विवाह का सामूहिक भोजन
  • पहुनाई: अतिथि-सत्कार
  • मंगलहार: मंगलमय गुणों से गुँथा काव्य-हार

पाठ-स्रोत और संपादकीय जानकारी

मूल-पाठ का आधार: भक्तितक — पार्वतीमंगल का मूल-पाठ खंड। क्रम और पाठ का तुलनात्मक संदर्भ: हिंदी समय — तुलसीदास कृत पार्वती मंगल तथा पूजा आरती — पार्वती मंगल मूल पाठ। मूल काव्य तुलसीदास जी की सार्वजनिक-सम्पदा रचना है। आधुनिक वेबसाइटों के हिंदी अनुवाद इस प्रस्तुति में नहीं लिए गए हैं।

आधार-पाठ में सोहर 19 पर 12 और सोहर 75 पर 76 छपा था; क्रम तथा तुलनात्मक पाठ से मिलाकर ये दो अंक सुधारे गए हैं। बीच में सम्मिलित रामचरितमानस की अलग पंक्तियों को पार्वतीमंगल का मूल अंश नहीं माना गया है। वेब-पृष्ठ की अतिरिक्त खाली जगह और पंक्ति-लपेट हटाकर छंदों की पंक्तियाँ व्यवस्थित की गई हैं। अवधी की आधार-पाठ वाली वर्तनी रखी गई है; विभिन्न संस्करणों में छोटे वर्तनी-पाठांतर मिल सकते हैं।

भावार्थ: भक्ति भावना की स्वतंत्र सरल व्याख्या। अध्ययन-शीर्षक और शब्दार्थ पढ़ने की सुविधा के लिए हैं। परीक्षा के समय ब्रह्मचारी-वेश में कहे गए कथनों और कवि के अंतिम भाव में अंतर प्रसंगानुसार समझें।

॥ हर हर महादेव · जय माँ गौरी ॥
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