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पार्वतीमंगल सम्पूर्ण — 148 सोहर, 16 छंद और सरल हिंदी भावार्थ | तुलसीदास
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गोस्वामी तुलसीदास · शिव-पार्वती विवाह का मंगलकाव्य
पार्वतीमंगल सम्पूर्ण
संपूर्ण मूल पाठ और प्रसंगवार सरल हिंदी भावार्थ
एक ही लेख में148 सोहर16 हरिगीतिका छंद
पार्वतीमंगल में गोस्वामी तुलसीदास जी ने माता पार्वती के जन्म, शिव के प्रति उनकी निष्ठा, तपस्या, प्रेम की परीक्षा और शिव-पार्वती के मंगलमय विवाह की कथा कही है। अवधी के इस स्वतंत्र काव्य में भक्ति के साथ वात्सल्य, विनोद और विदाई की करुणा भी है।
पाठ की व्यवस्था: सभी 148 सोहर और 16 हरिगीतिका छंद अपने क्रम में इसी लेख में हैं। विषय-सूची से 16 अध्ययन-प्रसंगों तक सीधे पहुँच सकते हैं। हर समूह के बाद स्वतंत्र सरल भावार्थ है; यह समेकित व्याख्या है, पंक्ति-पंक्ति का अलग शब्दानुवाद नहीं। सोहर और हरिगीतिका की मूल क्रम-संख्याएँ अलग-अलग चलती हैं।
सरल समेकित भावार्थतुलसीदास गुरु, गुणीजनों, हिमालय और गणेश को प्रणाम करके सीता-राम का स्मरण करते हैं। वे गौरी-शंकर के विवाह को अंतःकरण पवित्र करने वाला मंगलगान बताते हैं। कवि अपनी काव्य-सामर्थ्य का अभिमान नहीं करता; वह शिवचरित की पावन धारा में मन और वाणी को निर्मल करना चाहता है। हिमवान और मैना के घर जगज्जननी पार्वती का जन्म होता है। परिवार में प्रतिदिन नया आनंद और शुभता बढ़ती है। बालिका का विकास शिव के मस्तक की चंद्रकला के बढ़ने जैसी सुंदर उपमा से व्यक्त है।
सरल समेकित भावार्थपार्वती के बड़ी होने पर माता-पिता उनके योग्य वर का विचार करते हैं। नारद के आने पर हिमवान और मैना आदरपूर्वक उनका स्वागत करते हैं। पार्वती मुनि को प्रणाम करती हैं और माता उनके लिए सुयोग्य वर बताने की विनती करती हैं। नारद परिवार के सौभाग्य की प्रशंसा करके संकेत में उस वर का वर्णन करते हैं जिसे सामान्य लोकदृष्टि विचित्र समझ सकती है, लेकिन देवता वंदन करते हैं। बाहर से उलटी प्रतीत होने वाली बात में भीतर शुभ अर्थ छिपा है।
जननि जनक उपदेस महेसहि सेवहि।
अति आदर अनुराग भगति मनु भेवहि॥२४॥
हरिगीतिका 3
भेवहि भगति मन बचन करम अनन्य गति हर चरन की।
गौरव सनेह सकोच सेवा जाइ केहि बिधि बरन की॥
गुन रूप जोबन सींव सुंदरि निरखि छोभ न हर हिएँ।
ते धीर अछत बिकार हेतु जे रहत मनसिज बस किएँ॥३॥
सरल समेकित भावार्थनारद के संकेत से पार्वती आनंदित होती हैं, पर माता-पिता चिंता में पड़ जाते हैं। वे पुत्री को अपने जीवन और सुख का आधार बताते हुए उपाय पूछते हैं। मुनि चंद्रभूषण शिव की आराधना का मार्ग बताते हैं और साधना की सफलता के लिए साहस तथा एकाग्रता का आश्वासन देते हैं। माता-पिता की सीख से पार्वती शिव की प्रेमपूर्वक सेवा करती हैं। उनका मन, वचन और कर्म एक ही लक्ष्य में लग जाते हैं। शिव की समाधि और धीरता बाहरी आकर्षण से विचलित नहीं होती।
उमा नेह बस बिकल देह सुधि बुधि गई।
कलप बेलि बन बढ़त बिषम हिम जनु दई॥२९॥
सोहर 30
समाचार सब सखिन्ह जाइ घर घर कहे।
सुनत मातु पितु परिजन दारुन दुख दहे॥३०॥
सोहर 31
जाइ देखि अति प्रेम उमहि उर लावहिं।
बिलपहिं बाम बिधातहि दोष लगावहिं॥३१॥
सोहर 32
जौ न होहिं मंगल मग सुर बिधि बाधक।
तौ अभिमत फल पावहिं करि श्रमु साधक॥३२॥
हरिगीतिका 4
साधक कलेस सुनाइ सब गौरिहि निहोरत धाम को।
को सुनइ काहि सोहाय घर चित चहत चंद्र ललामको॥
समुझाइ सबहि दृढ़ाइ मनु पितु मातु, आयसु पाइ कै।
लागी करन पुनि अगमु तपु तुलसी कहै किमि गाइकै॥४॥
सरल समेकित भावार्थदेवता अपने कार्य के लिए कामदेव को भेजते हैं। कामदेव शिव के सामने अपने प्रभाव का अभिमान करते हैं और दग्ध होते हैं। रति का दुःख देखकर करुणामय शिव उसे आश्वासन देते हैं, फिर वहाँ से दूसरे स्थान को चले जाते हैं। पार्वती विरह से अत्यंत व्याकुल होती हैं। माता-पिता और परिजन उन्हें घर लौटने के लिए समझाते हैं। वे सबको सांत्वना देकर, माता-पिता की अनुमति पाकर, अपना संकल्प और दृढ़ करती हैं तथा पुनः तप में लग जाती हैं।
तजेउ भोग जिमि रोग लोग अहि गन जनु।
मुनि मनसहु ते अगम तपहिं लायो मनु॥३४॥
सोहर 35
सकुचहिं बसन बिभूषन परसत जो बपु।
तेहिं सरीर हर हेतु अरंभेउ बड़ तपु॥३५॥
सोहर 36
पूजइ सिवहि समय तिहुँ करइ निमज्जन।
देखि प्रेमु ब्रतु नेमु सराहहिं सज्जन॥३६॥
सोहर 37
नीद न भूख पियास सरिस निसि बासरु।
नयन नीरु मुख नाम पुलक तनु हियँ हरु॥३७॥
सोहर 38
कंद मूल फल असन, कबहुँ जल पवनहि।
सूखे बेल के पात खात दिन गवनहि॥३८॥
सोहर 39
नाम अपरना भयउ परन जब परिहरे।
नवल धवल कल कीरति सकल भुवन भरे॥३९॥
सोहर 40
देखि सराहहिं गिरिजहि मुनिबरु मुनि बहु।
अस तप सुना न दीख कबहुँ काहुँ कहु॥४०॥
हरिगीतिका 5
काहूँ न देख्यौ कहहिं यह तपु जोग फल फल चारि का।
नहिं जानि जाइ न कहति चाहति काहि कुधर-कुमारिका॥
बटु बेष पेखन पेम पनु ब्रत नेम ससि सेखर गए।
मनसहिं समरपेउ आपु गिरिजहि बचन मृ्दु बोलत भए॥५॥
सरल समेकित भावार्थपार्वती का मन अपने आराध्य में स्थिर है। वे सुख-सुविधा का मोह छोड़कर नियमपूर्वक शिव-पूजन करती हैं। कवि उनकी एकाग्रता को ऐसी तन्मयता के रूप में चित्रित करता है जिसमें दिन-रात, भूख-प्यास और शरीर के सुख गौण हो जाते हैं। तप की तीव्रता बढ़ते-बढ़ते वे पत्तों का आहार भी छोड़ देती हैं, जिससे अपर्णा नाम प्रसिद्ध होता है। ऋषि उनके संकल्प पर विस्मित होते हैं। शिव उनका प्रेम और निष्ठा परखने के लिए ब्रह्मचारी का वेश धारण करके आते हैं। यह तप का काव्यात्मक वर्णन है, आहार-त्याग की सामान्य विधि नहीं।
सरल समेकित भावार्थब्रह्मचारी-वेश में आए शिव पार्वती की दशा देखकर भीतर से करुणा अनुभव करते हैं। बाहर वे मधुर वचन कहकर कुल, माता-पिता और उनके गुणों की प्रशंसा करते हैं। वे पूछते हैं कि इतनी कठोर तपस्या का प्रयोजन क्या है; जिन्हें संसार की संपन्नता सहज उपलब्ध है, वे यह कष्ट क्यों उठा रही हैं? पार्वती सखी की ओर देखती हैं और सखी उनका शिव-प्राप्ति का संकल्प बताती है। अब ब्रह्मचारी उलटा तर्क करके उस संकल्प की परीक्षा लेने लगते हैं।
सरल समेकित भावार्थपरीक्षा के लिए ब्रह्मचारी शिव के वैरागी वेश, भस्म, जटा, श्मशान-निवास, सर्प और असामान्य बरात का उल्लेख करके उन्हें सांसारिक विवाह की कसौटी पर अनुपयुक्त बताते हैं। वे पार्वती की कोमलता और राजसी पालन-पोषण से इसकी तुलना करते हैं। ये परीक्षा लेने वाले वेश के कथन हैं; इन्हें शिव की वास्तविक निंदा या कवि का अंतिम मत न समझें। प्रसंग का केंद्र यह है कि पार्वती का प्रेम बाहरी सजावट, प्रतिष्ठा और लोक-मान्यता पर कितना निर्भर है।
जनि कहहिं कछु बिपरीत जानत प्रीति रीति न बात की।
सिव साधु निंदकु मंद अति जोउ सुनै सोउ बड़ पातकी॥
सुनि बचन सोधि सनेहु तुलसी साँच अबिचल पावनो।
भए प्रगट करुनासिंधु संकरु भाल चंद सुहावनो॥८॥
सरल समेकित भावार्थअनेक कुतर्क सुनकर भी पर्वत-पुत्री का मन पर्वत की तरह स्थिर रहता है। कवि कहता है कि सच्चा प्रेम जिद करके मोड़ा नहीं जा सकता। शिव की निंदा पार्वती को असह्य होती है; वे सखी से ब्रह्मचारी को विदा करने को कहती हैं। उनकी वाणी में अपने आराध्य के प्रति स्पष्ट निष्ठा और अपमान के सामने दृढ़ता है। परीक्षा में प्रेम की सच्चाई प्रकट होने पर ब्रह्मचारी-वेश समाप्त होता है और चंद्रशेखर शिव अपने करुणामय स्वरूप में सामने आ जाते हैं।
सुफल मनोरथ भयउ गौरि सोहइ सुठि।
घर ते खेलन मनहुँ अबहिं आई उठि॥७१॥
सोहर 72
देखि रूप अनुराग महेस भए बस।
कहत बचन जनु सानि सनेह सुधा रस॥७२॥
सोहर 73
हमहि आजु लगि कनउड़ काहुँ न कीन्हेउँ।
पारबती तप प्रेम मोल मोहि लीन्हेउँ॥७३॥
सोहर 74
अब जो कहहु सो करउँ बिलंबु न एहिं घरी।
सुनि महेस मृदु बचन पुलकि पायन्ह परी॥७४॥
हरिगीतिका 9
परि पायँ सखि मुख कहि जनायो आपु बाप अधीनता।
परितोषि गरिजहि चले बरनत प्रीति नीति प्रबीनता॥
हर हृदयँ धरि घर गौरि गवनी कीन्ह बिधि मन भावनो।
आनंदु प्रेम समाजु मंगल गान बाजु बधावनो॥९॥
सरल समेकित भावार्थअपने सामने शिव की मनोहर मूर्ति देखकर पार्वती की आँखों में आनंद के आँसू और शरीर में पुलक भर जाता है। उन्हें अपने सौभाग्य पर सहसा विश्वास नहीं होता, जैसे जन्म से निर्धन व्यक्ति अप्रत्याशित अनमोल रत्न पाकर विस्मित हो जाए। शिव उनके तप और प्रेम को स्वीकार करके कहते हैं कि उन्होंने उन्हें अपने प्रेम का ऋणी बना लिया है। पार्वती विवाह की बात माता-पिता के माध्यम से संपन्न करने की मर्यादा सखी द्वारा कहती हैं। शिव उनकी भावना का सम्मान करते हैं और पार्वती आनंदपूर्वक घर लौटती हैं।
सिव सो कहेउ दिन ठाउँ बहोरि मिलनु जहँ।
चले मुदित मुनिराज गए गिरिबर पहँ॥८२॥
हरिगीतिका 10
गिरि गेह गे अति नेहँ आदर पूजि पहुँनाई करी।
घरवात घरनि समेत कन्या आनि सब आगें धरी॥
सुखु पाइ बात चलाइ सुदिन सोधाइ गिरिहि सिखाइ कै।
रिषि सात प्रातहिं चले प्रमुदित ललित लगन लिखाइ कै॥१०॥
सरल समेकित भावार्थशिव सप्तर्षियों का स्मरण करते हैं। मुनि उपस्थित होकर प्रणाम करते हैं और शिव उनका आदर करते हैं। शिव सारा प्रसंग बताकर हिमवान के घर विवाह का प्रस्ताव ले जाने को कहते हैं। अरुंधती को भी परिवार से आत्मीय बातचीत करने की भूमिका दी जाती है। हिमवान और मैना मुनियों की पहुनाई करते हैं तथा पार्वती को उनके सामने लाते हैं। सबकी प्रसन्न सहमति से शुभ समय देखा जाता है और लग्नपत्र तैयार होता है। इस प्रसंग में इच्छा, संवाद, सम्मान और पारिवारिक सम्मति साथ हैं।
गौरी नैहर केहि बिधि कहहु बखानिय।
जनु रितुराज मनोज राज रजधानिय॥८८॥
हरिगीतिका 11
जनु राजधानी मदन की बिरची चतुर बिधि और हीं।
रचना बिचित्र बिलोकि लोचन बिथकि ठौरहिं ठौर हीं॥
एहि भाँति ब्याह समाज सजि गिरिराजु मगु जोवन लगे।
तुलसी लगन लै दीन्ह मुनिन्ह महेस आनँद रँग मगे॥११॥
सरल समेकित भावार्थहिमवान गुरु, देवताओं और विद्वानों का सम्मान करके विवाह की तैयारी आरंभ करते हैं। पर्वत, वन, नदियाँ और समुद्र तक मानवीकृत होकर निमंत्रण और उत्सव में सम्मिलित हैं। अतिथि सुंदर वेश और भेंट लेकर आते हैं। मंडप, तोरण, कलश, पताका और सजाए हुए बाजारों से पार्वती का मायका अत्यंत सुंदर दिखाई देता है। कवि इसे वसंत और सौंदर्य की राजधानी जैसी छवि देता है। उधर मुनि शिव को लग्नपत्र देते हैं और वे विवाह की तैयारी से आनंदित होते हैं।
सरल समेकित भावार्थविवाह का समय जानकर शिव देवताओं को बुलवाते हैं। देवता अपने-अपने विमान, वाहन और साज के साथ आते हैं। शिवगणों की तैयारी अलग और निराली है: उनके रूप, वाहन और ध्वनियाँ लोक की सामान्य बरात से भिन्न हैं। विष्णु, इंद्र और अन्य देवता शिव से मिलते हैं। मंगलध्वनि, पुष्पवर्षा और जय-जयकार के बीच शिव नंदी पर सवार होकर चलते हैं। भस्म, सर्प और कपाल से सजे दूल्हे को देखकर विष्णु का परिहास प्रसंग में सहज हास्य जोड़ता है।
समाचार सुनि सोचु भयउ मन मयनहिं।
नारद के उपदेस कवन घर गे नहिं॥१०८॥
हरिगीतिका 13
घर घाल चालक कलह प्रिय कहियत परम परमारथी।
तैसी बरेखी कीन्हि पुनि मुनि सात स्वारथ सारथी॥
उर लाइ उमहि अनेक बिधि जलपति जननि दुख मानई।
हिमवान कहेउ इसान महिमा अगम निगम न जानई॥१३॥
सरल समेकित भावार्थनगर के निकट विष्णु देवताओं को अपने-अपने समूह अलग रखने को कहते हैं। शिव के साथ उनके विचित्र गण दिखाई देते हैं। विष्णु हँसकर कहते हैं कि दूल्हे के अनुरूप ही बरात बनी है; शिव भी इस विनोद का आनंद लेते हैं। बरात देखकर अगवानी करने वाले और बालक घबरा जाते हैं। घरों में इसकी चर्चा फैलती है। मैना सुनकर पुत्री के लिए चिंतित होती हैं और प्रस्ताव लाने वालों से शिकायत करती हैं। हिमवान उन्हें शिव की अगाध महिमा का स्मरण कराते हैं।
सरल समेकित भावार्थमैना की चिंता और नगर की चर्चा सुनकर देवता मुसकराते हैं। लोक की परिस्थिति समझकर शिव ऐसा सुंदर मंगल-वेश धारण करते हैं जिससे सबका भय दूर हो जाता है। उनके गण भी सुशोभित दिखाई देते हैं। अब नगर की स्त्रियाँ और पुरुष आनंदपूर्वक दर्शन को आते हैं। हिमवान विवाह का समय होने पर शिव को मंडप में बुलवाते हैं। आरती, अर्घ्य और परिछन के साथ स्वागत होता है। मैना दूल्हे को देखकर आनंद में डूब जाती हैं और देवताओं को उचित आसन दिया जाता है।
सरल समेकित भावार्थशिव को आदर से आसन और मधुपर्क दिया जाता है। सप्तर्षियों के कहने पर समयानुसार अग्नि स्थापित होती है और पार्वती को सखियों के साथ लाया जाता है। उनके सौंदर्य और गुणों का वर्णन सुनते हुए देवता प्रणाम करते हैं। वेदध्वनि, आशीर्वाद और मंगलगीतों के बीच हिमवान कन्यादान का संकल्प करते हैं। होम, लावा, भाँवर, ग्रंथि-बंधन और ध्रुव-दर्शन जैसे संस्कारों से विवाह संपन्न होता है। सभी आनंदित हैं। भेंटों का वर्णन काव्य के तत्कालीन राजपरिवार की रीति है, आधुनिक विवाह में माँग का निर्देश नहीं।
प्रेम पाट पटडोरि गौरि हर गुन मनि।
मंगल हार रचेउ कबि मति मृगलोचनि॥१४८॥
हरिगीतिका 16
मृगनयनि बिधुबदनी रचेउ मनि मंजु मंगलहार सो।
उर धरहुँ जुबती जन बिलोकि तिलोक सोभा सार सो॥
कल्यान काज उछाह ब्याह सनेह सहित जो गाइहै।
तुलसी उमा संकर प्रसाद प्रमोद मन प्रिय पाइहै॥१६॥
सरल समेकित भावार्थविवाह के बाद कोहबर के विनोद, द्वार रोकने, लहकौरि और खेलों में परिवार का उल्लास व्यक्त होता है। देवताओं को प्रेम से भोजन कराया जाता है। प्रातः विदाई के समय मैना शिव से कहती हैं कि गौरी को उनके जीवन के अनमोल आधार की तरह समझें। माँ-बेटी और पिता-परिवार का बिछोह करुण है; पार्वती कैलास जाती हैं और देवता अपने धाम लौटते हैं। अंत में तुलसीदास इस काव्य को प्रेम के धागे में पिरोया गौरी-शंकर के गुणों का मंगलहार बताते हैं और प्रेमपूर्वक गाने वालों के लिए कल्याण की कामना करते हैं।
आधार-पाठ में सोहर 19 पर 12 और सोहर 75 पर 76 छपा था; क्रम तथा तुलनात्मक पाठ से मिलाकर ये दो अंक सुधारे गए हैं। बीच में सम्मिलित रामचरितमानस की अलग पंक्तियों को पार्वतीमंगल का मूल अंश नहीं माना गया है। वेब-पृष्ठ की अतिरिक्त खाली जगह और पंक्ति-लपेट हटाकर छंदों की पंक्तियाँ व्यवस्थित की गई हैं। अवधी की आधार-पाठ वाली वर्तनी रखी गई है; विभिन्न संस्करणों में छोटे वर्तनी-पाठांतर मिल सकते हैं।
भावार्थ: भक्ति भावना की स्वतंत्र सरल व्याख्या। अध्ययन-शीर्षक और शब्दार्थ पढ़ने की सुविधा के लिए हैं। परीक्षा के समय ब्रह्मचारी-वेश में कहे गए कथनों और कवि के अंतिम भाव में अंतर प्रसंगानुसार समझें।
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🌺 श्रीरामचरितमानस • बालकाण्ड जय जय गिरिवरराज किशोरी — सीता जी की गौरी स्तुति पुष्पवाटिका में प्रभु श्रीराम के दर्शन के बाद माता सीता द्वारा माता गौरी से की गई पावन प्रार्थना, संपूर्ण प्रसंग और सरल हिंदी अर्थ सहित। माता सीता ने गौरी स्तुति कब की? श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में जनकपुर की पुष्पवाटिका का अत्यंत सुंदर प्रसंग आता है। माता सीता अपनी सखियों के साथ गौरी पूजन के लिए आई थीं। इसी वाटिका में उन्होंने पहली बार प्रभु श्रीराम को देखा। श्रीराम के दिव्य स्वरूप को देखकर उनका मन प्रेम से भर गया। उसी समय उन्हें अपने पिता महाराज जनक का वह प्रण भी स्मरण हुआ कि जो शिवजी के महान धनुष को उठाकर तोड़ेगा, उसी से सीता का विवाह होगा। माता सीता श्रीराम की छवि को हृदय में धारण करके पुनः माता भवानी के मंदिर में गईं और हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगीं। 🌸 पुष्पवाटिका में श्रीराम के दर्शन 🏹 पिता जनक के प्रण का स्मरण 🙏 गौरी माता से प्रार्थना ...
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