वाक्यवृत्ति सम्पूर्ण — सभी 53 श्लोक मूल संस्कृत पाठ और सरल हिंदी भावार्थ सहित

भक्ति भावना • गीता एवं दर्शन

वाक्यवृत्ति

सम्पूर्ण ५३ श्लोक

मूल संस्कृत पाठ एवं सरल हिंदी भावार्थ

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वाक्यवृत्ति परंपरा में आदि शंकराचार्य से संबद्ध अद्वैत वेदान्त का संक्षिप्त प्रकरण ग्रंथ है। गुरु–शिष्य संवाद के द्वारा इसमें “तत्त्वमसि” महावाक्य, “तत्” और “त्वम्” के अर्थ तथा जीव और ब्रह्म के स्वरूपगत अभेद का विवेचन है।

यहाँ मंगलाचरण से उपसंहार तक सभी 53 मूल संस्कृत श्लोक और भक्ति भावना के लिए लिखा गया सरल हिंदी भावार्थ एक साथ दिया गया है। “वाच्यार्थ” का अर्थ शब्द का सीधा अर्थ और “लक्ष्यार्थ” का अर्थ प्रसंग से लक्षित अभिप्रेत अर्थ है।

पाठ-सूचना: श्लोक-संख्या अपनाए गए 53-श्लोक पाठ के अनुसार है। विषय-शीर्षक पढ़ने की सुविधा के लिए हैं, मूल अध्याय नहीं। श्लोक 10 का पाठान्तर अलग टिप्पणी में है। भावार्थ इस ग्रंथ के अद्वैत दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है।

मंगलाचरण और शिष्य की जिज्ञासा

श्लोक 1

सर्गस्थितिप्रलयहेतुमचिन्त्यशक्तिं विश्वेश्वरं विदितविश्वमनन्तमूर्तिम् ।
निर्मुक्तबन्धनमपारसुखाम्बुराशिं श्रीवल्लभं विमलबोधघनं नमामि॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं लक्ष्मीपति भगवान को प्रणाम करता हूँ, जो सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के कारण हैं; जिनकी शक्ति अचिन्त्य है; जो विश्व के ईश्वर, सबको जानने वाले और अनन्त रूपों वाले हैं। वे बन्धनरहित, अपार आनन्द के समुद्र और निर्मल ज्ञानस्वरूप हैं।

श्लोक 2

यस्य प्रसादादहमेव विष्णुर्मय्येव सर्वं परिकल्पितं च ।
इत्थं विजानामि सदात्मरूपं तस्यांघ्रिपद्मं प्रणतोऽस्मि नित्यम्॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिन गुरु की कृपा से मैं अपने नित्य आत्मस्वरूप को जानता हूँ कि “मैं ही सर्वव्यापी विष्णुस्वरूप हूँ और मुझमें ही सब कल्पित है”, उनके चरणकमलों को मैं नित्य प्रणाम करता हूँ। यहाँ “मैं” का अर्थ सीमित अहंकार नहीं, सर्वव्यापी आत्मा है।

श्लोक 3

तापत्रयार्कसंतप्तः कश्चिदुद्विग्नमानसः ।
शमादिसाधनैर्युक्तः सद्गुरुं परिपृच्छति॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: तीन प्रकार के तापों से संतप्त और उद्विग्न मन वाला, किन्तु शम आदि साधनों से सम्पन्न एक जिज्ञासु सद्गुरु से प्रश्न करता है। तीन ताप हैं—अपने शरीर–मन से, दूसरे प्राणियों से और दैविक या प्राकृतिक कारणों से होने वाले दुःख।

श्लोक 4

अनायासेन येनास्मान्मुच्च्येयं भवबन्धनात् ।
तन्मे संक्षिप्य भगवन्केवलं कृपया वद॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: शिष्य कहता है—हे भगवन्! कृपा करके मुझे संक्षेप में वह उपाय बताइए जिससे मैं संसार के बन्धन से सहज मुक्ति पा सकूँ।

श्लोक 5

गुरुरुवाच ।
साध्वीते वचनव्यक्तिः प्रतिभाति वदामि ते ।
इदं तदिति विस्पष्टं सावधानमनाः श‍ृणु॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुरु कहते हैं—तुम्हारी बात उत्तम और उचित है। मैं तुम्हें इसका स्पष्ट उत्तर देता हूँ; सावधान और एकाग्र मन से सुनो।

श्लोक 6

तत्त्वमस्यादिवाक्योत्थं यज्जीवपरमात्मनोः ।
तादात्म्यविषयं ज्ञानं तदिदं मुक्तिसाधनम्॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: “तत्त्वमसि” आदि महावाक्यों से उत्पन्न जीव और परमात्मा के तादात्म्य का ज्ञान ही मुक्ति का साधन है। तादात्म्य का अर्थ है दोनों के वास्तविक आत्मस्वरूप का अभेद।

श्लोक 7

शिष्य उवाच ।
को जीवः कः परश्चात्मा तादात्म्यं वा कथं तयोः ।
तत्त्वमस्यादिवाक्यं वा कथं तत्प्रतिपादयेत्॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: शिष्य पूछता है—जीव कौन है? परमात्मा कौन है? दोनों का अभेद कैसे है? और “तत्त्वमसि” जैसा वाक्य उस अभेद को किस प्रकार बताता है?

श्लोक 8

गुरुरुवाच ।
अत्र ब्रूमः समाधानं कोऽन्यो जीवस्त्वमेव हि ।
यस्त्वं पृच्छसि मां कोऽहं ब्रह्मैवासि न संशयः॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुरु कहते हैं—इसका समाधान सुनो। जीव कोई दूसरा नहीं, तुम ही हो। जो तुम “मैं कौन हूँ?” पूछ रहे हो, तुम अपने वास्तविक आत्मस्वरूप में ब्रह्म ही हो; इसमें संशय नहीं है।

श्लोक 9

शिष्य उवाच ।
पदार्थमेव जानामि नाद्यापि भगवन्स्फुटम् ।
अहं ब्रह्मेति वाक्यार्थं प्रतिपद्ये कथं वद॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: शिष्य कहता है—भगवन्! अभी मुझे वाक्य के पदों का अर्थ ही स्पष्ट नहीं है। फिर “मैं ब्रह्म हूँ” इस पूरे वाक्य का अर्थ कैसे समझूँ? कृपया बताइए।

श्लोक 10

गुरुरुवाच ।
सत्यमाह भवानत्र विगानं नैव विद्यते ।
हेतुः पदार्थबोधो हि वाक्यार्थावगतेरिह॥ १०॥

पाठान्तर: विगानं के स्थान पर विज्ञानं भी मिलता है। ऊपर मुख्य पाठ रखा गया है।

सरल हिंदी भावार्थ: गुरु कहते हैं—तुम्हारा कहना ठीक है; इसमें कोई विवाद नहीं। वाक्यार्थ समझने का कारण पहले उसके पदों का अर्थ समझना ही है। इसलिए अब “तत्” और “त्वम्” का विवेक किया जाएगा।

“त्वम्” पद—अन्तरात्मा का विवेक

श्लोक 11

अन्तःकरणतद्वृत्तिसाक्षिचैतन्यविग्रहः ।
आनन्दरूपः सत्यः सन्किं नात्मानं प्रपद्यसे॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम अन्तःकरण और उसकी वृत्तियों के साक्षी, चैतन्यस्वरूप, आनन्दस्वरूप और सत्य आत्मा हो। अपने को इस रूप में क्यों नहीं पहचानते?

श्लोक 12

सत्यानन्दस्वरूपं धीसाक्षिणं बोधविग्रहम् ।
चिन्तयात्मतया नित्यं त्यक्त्वा देहादिगां धियम्॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: देह आदि में “मैं” की बुद्धि छोड़कर नित्य ऐसा चिन्तन करो कि मैं सत्य, आनन्द और बोधस्वरूप आत्मा हूँ, जो बुद्धि तथा उसके परिवर्तनों का साक्षी है।

श्लोक 13

रूपादिमान्यतः पिण्डस्ततो नात्मा घटादिवत् ।
वियदादिमहाभूतविकारत्वाच्च कुम्भवत्॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: शरीर रूप आदि गुणों वाला है, इसलिए घड़े की तरह वह जानने वाला आत्मा नहीं है। वह आकाश आदि महाभूतों का विकार भी है, जैसे घड़ा मिट्टी का विकार है।

श्लोक 14

अनात्मा यदि पिण्डोऽयमुक्तहेतुबलान्मतः ।
करामलकवत्साक्षादात्मानं प्रतिपादय॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: शिष्य कहता है—इन कारणों से यदि यह शरीर अनात्मा सिद्ध हो गया, तो अब आत्मा को हथेली पर रखे आँवले की तरह स्पष्ट रूप से समझाइए।

श्लोक 15

घटद्रष्टा घटाद्भिन्नः सर्वथा न घटो यथा ।
देहद्रष्टा तथा देहो नाहमित्यवधारय॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे घड़े को देखने वाला घड़े से अलग है और स्वयं घड़ा नहीं है, वैसे ही शरीर को जानने वाला मैं शरीर नहीं हूँ—यह निश्चय करो।

श्लोक 16

एवमिन्द्रियदृङ्नाहमिन्द्रियाणीति निश्चिनु ।
मनोबुद्धिस्तथा प्राणो नाहमित्यवधारय॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसी प्रकार इन्द्रियों को जानने वाला मैं इन्द्रियाँ नहीं हूँ। मन, बुद्धि और प्राण भी ज्ञात होते हैं; इसलिए वे मेरा जानने वाला आत्मस्वरूप नहीं हैं।

श्लोक 17

संघातोऽपि तथा नाहमिति दृश्यविलक्षणम् ।
द्रष्टारमनुमानेन निपुणं सम्प्रधारय॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं इन सबका संयुक्त समूह भी नहीं हूँ। देखे जाने वाली वस्तुओं से भिन्न द्रष्टा को तर्क और सूक्ष्म विवेक के द्वारा भली प्रकार समझो।

श्लोक 18

देहेन्द्रियादयो भावा हानादिव्यापृतिक्षमाः ।
यस्य सन्निधिमात्रेण सोऽहमित्यवधारय॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिस चेतना की उपस्थिति मात्र से शरीर और इन्द्रियाँ ग्रहण, त्याग आदि कार्य कर पाते हैं, वही मैं हूँ—यह निश्चय करो।

श्लोक 19

अनापन्नविकारः सन्नयस्कान्तवदेव यः ।
बुद्ध्यादींश्चालयेत्प्रत्यक् सोऽहमित्यवधारय॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो भीतर का आत्मा स्वयं विकार को प्राप्त हुए बिना बुद्धि आदि को सक्रिय करता है, जैसे चुम्बक स्वयं स्थिर रहकर लोहे को चलाता है, वही मैं हूँ—यह पहचानो।

श्लोक 20

अजडात्मवदाभान्ति यत्सान्निध्याज्जडा अपि ।
देहेन्द्रियमनःप्राणाः सोऽहमित्यवधारय॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: शरीर, इन्द्रियाँ, मन और प्राण जड़ होने पर भी जिसकी निकटता से चेतन जैसे दिखाई देते हैं, वही प्रकाशक आत्मा मैं हूँ।

श्लोक 21

अगमन्मे मनोऽन्यत्र साम्प्रतं च स्थिरीकृतम् ।
एवं यो वेत्ति धीवृत्तिं सोऽहमित्यवधारय॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: “मेरा मन दूसरी ओर चला गया था, अब स्थिर हो गया”—इस प्रकार मन और बुद्धि की वृत्ति को जो जानता है, वही साक्षी मैं हूँ।

श्लोक 22

स्वप्नजागरिते सुप्तिं भावाभावौ धियां तथा ।
यो वेत्त्यविक्रियः साक्षात्सोऽहमित्यवधारय॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो जाग्रत्, स्वप्न और गहरी नींद तथा बुद्धि की वृत्तियों के होने और न होने को जानता है, वह स्वयं अविकारी साक्षी मैं हूँ।

श्लोक 23

घटावभासको दीपो घटादन्यो यथेष्यते ।
देहावभासको देही तथाहं बोधविग्रहः॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे घड़े को प्रकाशित करने वाला दीपक घड़े से अलग है, वैसे ही देह को ज्ञात करने वाला देही मैं बोधस्वरूप हूँ। यहाँ “प्रकाश” का भाव जानने वाली चेतना है।

श्लोक 24

पुत्रवित्तादयो भावा यस्य शेषतया प्रियाः ।
द्रष्टा सर्वप्रियतमः सोऽहमित्यवधारय॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुत्र, धन आदि वस्तुएँ आत्मा के प्रयोजन से प्रिय होती हैं। जो सब प्रिय वस्तुओं के पीछे स्वयं परम प्रिय द्रष्टा है, वही मैं हूँ—यह निश्चय करो।

श्लोक 25

परप्रेमास्पदतया मा न भूवमहं सदा ।
भूयासमिति यो द्रष्टा सोऽहमित्यवधारय॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा परम प्रेम का आधार है; इसीलिए मनुष्य चाहता है, “मेरा अस्तित्व कभी न मिटे, मैं सदा रहूँ।” इस अस्तित्व का साक्षी जो आत्मा है, वही मैं हूँ।

श्लोक 26

यः साक्षिलक्षणो बोधस्त्वंपदार्थः स उच्यते ।
साक्षित्वमपि बोद्धृत्वमविकारितयात्मनः॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: साक्षीस्वरूप यह बोध ही “त्वम्”—अर्थात् “तुम”—पद का वास्तविक आत्मार्थ है। आत्मा अविकारी है; उसका जानना और साक्षी होना किसी परिवर्तनशील क्रिया की तरह नहीं है।

श्लोक 27

देहेन्द्रियमनःप्राणाहङ्कृतिभ्यो विलक्षणः ।
प्रोज्झिताशेशषड्भावविकारस्त्वंपदाभिधः॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: “त्वम्” पद से लक्षित आत्मा शरीर, इन्द्रिय, मन, प्राण और अहंकार से भिन्न है। अस्तित्व में आना, जन्म, वृद्धि, परिवर्तन, क्षय और नाश—ये छह देहगत विकार उसमें नहीं हैं।

“तत्” पद—ब्रह्म का स्वरूप

श्लोक 28

त्वमर्थमेवं निश्चित्य तदर्थं चिन्तयेत्पुनः ।
अतद्व्यावृत्तिरूपेण साक्षाद्विधिमुखेन च॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: “त्वम्” का अर्थ इस प्रकार निश्चित करने के बाद “तत्”—अर्थात् “वह”—के अर्थ का विचार करो। उसे अनात्म विशेषताओं का निषेध करके और सत्य–ज्ञान आदि स्वरूप का प्रत्यक्ष विधान करके समझाया जाता है।

श्लोक 29

निरस्ताशेषसंसारदोषोऽस्थुलादिलक्षणः ।
अदृश्यत्वादिगुणकः पराकृततमोमलः॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह ब्रह्म संसार के सभी दोषों से रहित है। वह स्थूल आदि सीमाओं से परे, इन्द्रियों का दृश्य विषय नहीं और अज्ञानरूप मल से सर्वथा मुक्त है।

श्लोक 30

निरस्तातिशयानन्दः सत्यप्रज्ञानविग्रहः ।
सत्तास्वलक्षणः पूर्ण परमात्मेति गीयते॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस आनन्द से बढ़कर कोई आनन्द नहीं। वह सत्य और शुद्ध ज्ञानस्वरूप, अपनी सत्ता से सिद्ध तथा पूर्ण है; उसी को परमात्मा कहा गया है।

श्लोक 31

सर्वज्ञत्वं परेशत्वं तथा सम्पूर्णशक्तिता ।
वेदैः समर्थ्यते यस्य तद्ब्रह्मेत्यवधारय॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिसकी सर्वज्ञता, परमेश्वरता और सम्पूर्ण शक्ति का वेद प्रतिपादन करते हैं, उसे ब्रह्म जानो।

श्लोक 32

यज्ज्ञानात्सर्वविज्ञानं श्रुतिषु प्रतिपादितम् ।
मृदाद्यनेकदृष्टान्तैस्तद्ब्रह्मेत्यवधारय॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रुतियाँ मिट्टी आदि अनेक दृष्टान्तों से बताती हैं कि जिसे जानने पर सबका मूल स्वरूप ज्ञात हो जाता है, वही ब्रह्म है। जैसे मिट्टी का स्वरूप जानने पर मिट्टी के बने पात्रों का आधार समझ में आ जाता है।

श्लोक 33

यदानन्त्यं प्रतिज्ञाय श्रुतिस्तत्सिद्धये जगौ ।
तत्कार्यत्वं प्रपञ्चस्य तद्ब्रह्मेत्यवधारय॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रुति पहले उसकी अनन्तता बताती है और उसे स्पष्ट करने के लिए प्रपञ्च को उसका कार्य कहती है। जगत् जिसके आधार से स्वतंत्र नहीं है, वही ब्रह्म है।

श्लोक 34

विजिज्ञास्यतया यच्च वेदान्तेषु मुमुक्षुभिः ।
समर्थ्यतेऽतियत्नेन तद्ब्रह्मेत्यवधारय॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वेदान्तों में मुक्ति चाहने वाले साधकों के लिए जिसे जानने की जिज्ञासा करना अत्यन्त आवश्यक बताया गया है, वही ब्रह्म है।

श्लोक 35

जीवात्मना प्रवेशश्च नियन्तृत्वं च तान् प्रति ।
श्रूयते यस्य वेदेषु तद्ब्रह्मेत्यवधारय॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वेदों में जिसके जीवात्मरूप से प्राणियों में प्रवेश और उनके अन्तर्यामी नियामक होने का वर्णन है, वही ब्रह्म है। यहाँ प्रवेश का आशय स्थान बदलकर आना नहीं, सभी में आत्मस्वरूप से उपस्थित होना है।

श्लोक 36

कर्मणां फलदातृत्वं यस्यैव श्रूयते श्रुतौ ।
जीवानां हेतुकर्तृत्वं तद्ब्रह्मेत्यवधारय॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रुति जिसे कर्मों का फल देने वाला और जीवों की प्रवृत्ति का मूल प्रेरक बताती है, वही ब्रह्म है। यह परमेश्वर के रूप में उसका निरूपण है।

महावाक्य का अर्थ और अभेद

श्लोक 37

तत्त्वंपदार्थौ निर्णीतौ वाक्यार्थश्चिन्त्यतेऽधुना ।
तादात्म्यमत्र वाक्यार्थस्तयोरेव पदार्थयोः॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: “तत्” और “त्वम्” दोनों पदों के अर्थ का निर्णय हो गया। अब वाक्यार्थ का विचार करते हैं। यहाँ वाक्य का अभिप्राय इन दोनों के वास्तविक स्वरूप का तादात्म्य है।

श्लोक 38

संसर्गो वा विशिष्टो वा वाक्यार्थो नात्र सम्मतः ।
अखण्डैकरसत्वेन वाक्यार्थो विदुषां मतः॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस वाक्य का अर्थ दो स्वतंत्र वस्तुओं का सम्बन्ध जोड़ना या एक को दूसरे का विशेषण बनाना नहीं है। ज्ञानी इसका अर्थ अखण्ड, एकरस चैतन्यस्वरूप मानते हैं।

श्लोक 39

प्रत्यग्बोधो य आभाति सोऽद्वयानन्दलक्षणः ।
अद्वयानन्दरूपश्च प्रत्यग्बोधैकलक्षणः॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो भीतर स्वयं प्रकाशित बोध है, वही अद्वितीय आनन्दस्वरूप है। और जो अद्वितीय आनन्दस्वरूप ब्रह्म है, वही अन्तरात्मा का स्वयंप्रकाश बोध है।

श्लोक 40

इत्थमन्योन्यतादात्म्यप्रतिपत्तिर्यदा भवेत् ।
अब्रह्मत्वं त्वमर्थस्य व्यावर्तेत तदैव हि॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार दोनों के स्वरूप की एकता समझ में आने पर “त्वम्” के अर्थ में यह भ्रम मिट जाता है कि मैं ब्रह्म से भिन्न या अब्रह्म हूँ।

श्लोक 41

तदर्थस्य पारोक्ष्यं यद्येवं किं ततः श्रुणु ।
पूर्णानन्दैकरूपेण प्रत्यग्बोधोवतिष्ठते॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: साथ ही “तत्” के अर्थ का परोक्षपन मिटता है—ब्रह्म कोई केवल दूर की, सुनकर जानी गई वस्तु नहीं रह जाता। फलतः अन्तरात्मा का बोध ही पूर्ण आनन्दस्वरूप में स्थित होता है। यह पिछले श्लोक की बात को पूरा करता है।

श्लोक 42

तत्त्वमस्यादिवाक्यं च तादात्म्यप्रतिपादने ।
लक्ष्यौ तत्त्वंपदार्थौ द्वावुपादाय प्रवर्तते॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: “तत्त्वमसि” आदि वाक्य तादात्म्य बताने के लिए “तत्” और “त्वम्” के लक्ष्यार्थ लेते हैं। लक्ष्यार्थ वह अभिप्रेत अर्थ है जो उपाधियों से जुड़े विरोधी लक्षणों को हटाकर समझा जाता है।

श्लोक 43

हित्वा द्वौ शबलौ वाच्यौ वाक्यं वाक्यार्थबोधने ।
यथा प्रवर्ततेऽस्माभिस्तथा व्याख्यातमादरात्॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: दोनों पदों के उपाधियों से मिश्रित सीधे अर्थ छोड़कर वाक्य अखण्ड आत्मार्थ समझाता है। गुरु कहते हैं—महावाक्य किस प्रकार यह बोध देता है, इसका हमने आदरपूर्वक विवेचन किया है।

वाच्यार्थ, लक्ष्यार्थ और भागलक्षणा

श्लोक 44

आलम्बनतयाभाति योऽस्मत्प्रत्ययशब्दयोः ।
अन्तःकरणसंभिन्नबोधः स त्वंपदाभिधः॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: “मैं” की अनुभूति और “मैं” शब्द का सामान्य आधार अन्तःकरण से जुड़ा चैतन्य है। यही सीमित जीव के रूप में “त्वम्” पद का वाच्यार्थ, अर्थात् सीधे कहा गया अर्थ है।

श्लोक 45

मायोपाधिर्जगद्योनिः सर्वज्ञत्वादिलक्षणः ।
परोक्ष्यशबलः सत्याद्यात्मकस्तत्पदाभिधः॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: माया की उपाधि वाला, जगत् का कारण, सर्वज्ञ आदि लक्षणों से युक्त और परोक्ष रूप में समझा जाने वाला सत्यस्वरूप ईश्वर “तत्” पद का वाच्यार्थ है।

श्लोक 46

प्रत्यक्परोक्षतैकस्य सद्वितीयत्वपूर्णता ।
विरुध्यते यतस्तस्माल्लक्षणा सम्प्रवर्तते॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक को सीमित और भीतर प्रत्यक्ष जीव तथा दूसरे को परोक्ष और पूर्ण ईश्वर मानने पर दोनों के उपाधिगत लक्षण परस्पर विरोधी दिखाई देते हैं। इसी विरोध के कारण यहाँ लक्ष्यार्थ ग्रहण करने की आवश्यकता होती है।

श्लोक 47

मानान्तरविरोधे तु मुख्यार्थस्य परिग्रहे ।
मुख्यार्थेनाविनाभूते प्रतीतिर्लक्षणोच्यते॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब शब्द का केवल मुख्य अर्थ ग्रहण करने से अन्य प्रमाणों के साथ विरोध होता है, तब मुख्य अर्थ से जुड़े हुए अभिप्रेत अर्थ का बोध “लक्षणा” कहलाता है। इसका अर्थ मनमाना अर्थ निकालना नहीं है।

श्लोक 48

तत्त्वमस्यादिवाक्येषु लक्षणा भागलक्षणा ।
सोऽयमित्यादिवाक्यस्थपदयोरिव नापरा॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: “तत्त्वमसि” आदि वाक्यों में भागलक्षणा अपनाई जाती है। जैसे “यह वही व्यक्ति है” कहने में पुराने और वर्तमान समय-स्थान का भेद छोड़कर उसी व्यक्ति की पहचान होती है, वैसे ही यहाँ विरोधी उपाधियाँ छोड़कर समान चैतन्यस्वरूप ग्रहण किया जाता है।

अभ्यास, जीवन्मुक्ति और उपसंहार

श्लोक 49

अहं ब्रह्मेतिवाक्यार्थबोधो यावद्दृढीभवेत् ।
शमादिसहितस्तावदभ्यसेच्छ्रवणादिकम्॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब तक “मैं ब्रह्म हूँ” इस वाक्यार्थ का बोध दृढ़ न हो जाए, तब तक शम आदि साधनों के साथ श्रवण, मनन और निदिध्यासन का अभ्यास करना चाहिए।

श्लोक 50

श्रुत्याचार्यप्रसादेन दृढो बोधो यदा भवेत् ।
निरस्ताशेषसंसारनिदानः पुरुषस्तदा॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रुति और आचार्य की कृपा से जब बोध दृढ़ हो जाता है, तब साधक में संसारबन्धन के मूल कारण का निरसन होता है। आगे का श्लोक इस मुक्ति का स्वरूप स्पष्ट करता है।

श्लोक 51

विशीर्णकार्यकरणो भूतसूक्ष्मैरनावृतः ।
विमुक्तकर्मनिगडः सद्य एव विमुच्यते॥ ५१॥

सरल हिंदी भावार्थ: कर्म की बेड़ियों से छूटा और स्थूल–सूक्ष्म उपाधियों के आवरण से मुक्त आत्मस्वरूप को जानने वाला साधक तत्क्षण मुक्त होता है। यह ज्ञान से बन्धन मिटने का कथन है; इसे ज्ञान मिलते ही शरीर का तत्काल नाश होना न समझें।

श्लोक 52

प्रारब्धकर्मवेगेन जीवन्मुक्तो यदा भवेत् ।
किञ्चित्कालमनारब्धकर्मबन्धस्य संक्षये॥ ५२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिस ज्ञानी का प्रारब्ध कर्म अभी चल रहा है, वह कुछ समय शरीर रहते हुए जीवन्मुक्त के रूप में स्थित रहता है। उसके अनारब्ध कर्मों का बन्धन ज्ञान से क्षीण हो चुका है; आगे का श्लोक इस स्थिति के अंतिम फल को बताता है।

श्लोक 53

निरस्तातिशयानन्दं वैष्णवं परमं पदम् ।
पुनरावृत्तिरहितं कैवल्यं प्रतिपद्यते॥ ५३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अन्ततः वह अतुलनीय आनन्दस्वरूप, विष्णु के परम पद कहे गए कैवल्य को प्राप्त होता है, जहाँ पुनरावृत्ति नहीं है। ग्रंथ का उपसंहार आत्मज्ञान, जीवन्मुक्ति और परम अभेद की सिद्धि में होता है।

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भक्ति भावना • मूल पाठ, सरल अर्थ और आत्मविचार

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