हनुमान बाहुक गोस्वामी तुलसीदास जी की हनुमान-स्तुति है। आरंभ में हनुमान जी के तेज, पराक्रम, सेवा और करुणा का वर्णन है। आगे कवि बाहु-पीड़ा और शारीरिक कष्ट के बीच अपने आराध्य को पुकारते हैं। इस रचना में स्तुति के साथ आत्मीय उलाहना, अपने आचरण का विचार, रामनाम का भरोसा और अंततः शरणागति का गहरा स्वर मिलता है।
1. स्वरूप, पराक्रम और हनुमान-महिमा
छंद 1 · छप्पय
सिंधु-तरन, सिय-सोच-हरन, रबि-बाल-बरन तनु ।
भुज बिसाल, मूरति कराल कालहुको काल जनु ।।
गहन-दहन-निरदहन लंक निःसंक, बंक-भुव ।
जातुधान-बलवान-मान-मद-दवन पवनसुव ।।
कह तुलसिदास सेवत सुलभ सेवक हित सन्तत निकट ।
गुन-गनत, नमत, सुमिरत, जपत समन सकल-संकट-विकट ।।१।।
सरल हिंदी अर्थकवि समुद्र पार करने वाले, सीता का शोक हरने वाले और प्रातःकालीन सूर्य जैसे तेजस्वी हनुमान का स्मरण करते हैं। विशाल भुजाओं तथा प्रचंड रूप वाले पवनपुत्र ने लंका में राक्षसों का अभिमान तोड़ा। तुलसी उन्हें सेवक के लिए सुलभ, निकट रहने वाला और कठिन संकटों का शमन करने वाला आराध्य बताते हैं।
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छंद 2 · छप्पय
स्वर्न-सैल-संकास कोटि-रबि-तरुन-तेज-घन ।
उर बिसाल भुज-दंड चंड नख-बज्र बज्र-तन ।।
पिंग नयन, भृकुटी कराल रसना दसनानन ।
कपिस केस, करकस लँगूर, खल-दल बल भानन ।।
कह तुलसिदास बस जासु उर मारुतसुत मूरति बिकट ।
संताप पाप तेहि पुरुष पहिं सपनेहुँ नहिं आवत निकट ।।२।।
सरल हिंदी अर्थहनुमान का रूप स्वर्ण-पर्वत जैसा, तेज असंख्य तरुण सूर्यों जैसा और शरीर वज्र के समान दृढ़ है। विशाल वक्ष, प्रबल भुजाएँ, कठोर नख तथा उग्र मुख दुष्टों के बल को तोड़ते हैं। कवि कहते हैं कि जिसके हृदय में यह रक्षक रूप बसा हो, वह उनके आश्रय में संताप और पाप से निर्भयता पाता है।
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छंद 3 · झूलना
पंचमुख-छमुख-भृगु मुख्य भट असुर सुर, सर्व-सरि-समर समरत्थ सूरो ।
बाँकुरो बीर बिरुदैत बिरुदावली, बेद बंदी बदत पैजपूरो ।।
जासु गुनगाथ रघुनाथ कह, जासुबल, बिपुल-जल-भरित जग-जलधि झूरो ।
दुवन-दल-दमनको कौन तुलसीस है, पवन को पूत रजपूत रुरो ।।३।।
सरल हिंदी अर्थहनुमान श्रेष्ठ योद्धाओं के समान रणकुशल, साहसी और प्रतिज्ञा निभाने वाले वीर हैं। वेद उनकी कीर्ति गाते हैं और स्वयं राम उनके गुण तथा बल का बखान करते हैं। विशाल समुद्र को भी लाँघने वाले इस पवनपुत्र को तुलसी पीड़ादायक शक्तियों का दमन करने में अपना समर्थ स्वामी मानते हैं।
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छंद 4 · घनाक्षरी
भानुसों पढ़न हनुमान गये भानु मन-अनुमानि सिसु-केलि कियो फेरफार सो ।
पाछिले पगनि गम गगन मगन-मन, क्रम को न भ्रम, कपि बालक बिहार सो ।।
कौतुक बिलोकि लोकपाल हरि हर बिधि, लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खभार सो।
बल कैंधौं बीर-रस धीरज कै, साहस कै, तुलसी सरीर धरे सबनि को सार सो ।।४।।
सरल हिंदी अर्थसूर्य से शिक्षा लेने जाते समय हनुमान चलते सूर्य के साथ सहज गति से बढ़ते हैं। उनका यह अद्भुत कार्य भी बालक के खेल जैसा लगता है। देवता विस्मित हैं। तुलसी पूछते हैं कि यह बल, वीरता, धैर्य और साहस का कैसा मूर्त सार है, जो हनुमान के शरीर में एक साथ प्रकट हुआ है!
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छंद 5 · घनाक्षरी
भारत में पारथ के रथ केथू कपिराज, गाज्यो सुनि कुरुराज दल हल बल भो ।
कह्यो द्रोन भीषम समीर सुत महाबीर, बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो ।।
बानर सुभाय बाल केलि भूमि भानु लागि, फलँग फलाँग हूँतें घाटि नभतल भो ।
नाई-नाई माथ जोरि-जोरि हाथ जोधा जोहैं, हनुमान देखे जगजीवन को फल भो ।।५
सरल हिंदी अर्थमहाभारत के प्रसंग में अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजमान हनुमान की गर्जना से कौरव-दल विचलित होता है। द्रोण और भीष्म उनके अतुल बल को पहचानते हैं। सूर्य तक पहुँचने की बाललीला याद करके योद्धा उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम करते हैं। कवि उनके दर्शन को जीवन का सौभाग्य बताते हैं।
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छंद 6 · घनाक्षरी
गो-पद पयोधि करि होलिका ज्यों लाई लंक, निपट निसंक परपुर गलबल भो ।
द्रोन-सो पहार लियो ख्याल ही उखारि कर, कंदुक-ज्यों कपि खेल बेल कैसो फल भो ।।
संकट समाज असमंजस भो रामराज, काज जुग पूगनि को करतल पल भो ।
साहसी समत्थ तुलसी को नाह जाकी बाँह, लोकपाल पालन को फिर थिर थल भो ।।६
सरल हिंदी अर्थहनुमान ने समुद्र को गाय के खुर के छोटे गड्ढे जैसा सहज पार किया और लंका जला दी। पर्वत उठाना उनके लिए गेंद के खेल जैसा था। राम के कठिन संकट में उन्होंने बहुत बड़े काम शीघ्र पूरे किए। तुलसी ऐसे समर्थ और साहसी स्वामी की भुजाओं में सबकी रक्षा का स्थिर आश्रय देखते हैं।
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छंद 7 · घनाक्षरी
कमठ की पीठि जाके गोडनि की गाड़ैं मानो, नाप के भाजन भरि जल निधि जल भो ।
जातुधान-दावन परावन को दुर्ग भयो, महामीन बास तिमि तोमनि को थल भो ।।
कुम्भकरन-रावन पयोद-नाद-ईंधन को, तुलसी प्रताप जाको प्रबल अनल भो ।
भीषम कहत मेरे अनुमान हनुमान, सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो ।।७
सरल हिंदी अर्थसमुद्र-लाँघने के समय हनुमान के पाँवों के दबाव की अतिशय शक्ति का वर्णन है। समुद्र और उसमें रहने वाले प्राणियों की उपमाएँ उनके वेग की विराटता दिखाती हैं। रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद जैसे शत्रुओं के लिए उनका प्रताप प्रबल अग्नि है। भीष्म उन्हें तीनों लोक और तीनों काल में अद्वितीय महाबली कहते हैं।
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छंद 8 · घनाक्षरी
दूत रामराय को, सपूत पूत पौनको, तू अंजनी को नन्दन प्रताप भूरि भानु सो ।
सीय-सोच-समन, दुरित दोष दमन, सरन आये अवन, लखन प्रिय प्रान सो ।।
दसमुख दुसह दरिद्र दरिबे को भयो, प्रकट तिलोक ओक तुलसी निधान सो ।
ज्ञान गुनवान बलवान सेवा सावधान, साहेब सुजान उर आनु हनुमान सो ।।८
सरल हिंदी अर्थतुलसी अपने मन को राम के दूत, पवन के सपूत और अंजनीनंदन हनुमान का ध्यान करने को कहते हैं। वे सीता का शोक मिटाने वाले, शरणागत की रक्षा करने वाले और लक्ष्मण को प्राणों जैसे प्रिय हैं। ज्ञान, गुण, बल और सावधान सेवा से युक्त इस सुजान स्वामी को हृदय में बसाना ही कवि का आग्रह है।
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छंद 9 · घनाक्षरी
दवन-दुवन-दल भुवन-बिदित बल, बेद जस गावत बिबुध बंदीछोर को ।
पाप-ताप-तिमिर तुहिन-विघटन-पटु, सेवक-सरोरुह सुखद भानु भोर को ।।
लोक-परलोक तें बिसोक सपने न सोक, तुलसी के हिये है भरोसो एक ओर को ।
राम को दुलारो दास बामदेव को निवास, नाम कलि-कामतरु केसरी-किसोर को ।।९।।
सरल हिंदी अर्थहनुमान का बल लोकप्रसिद्ध है; वे बंधनों से छुड़ाने वाले और भक्तों के लिए प्रातःसूर्य जैसे सुखद हैं। पाप और संताप को अंधकार तथा पाले की उपमा दी गई है। तुलसी को उनके ही आश्रय का भरोसा है। राम के प्रिय दास का नाम कवि के लिए कलियुग का कामनापूरक वृक्ष है।
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छंद 10 · घनाक्षरी
महाबल-सीम महाभीम महाबान इत, महाबीर बिदित बरायो रघुबीर को ।
कुलिस-कठोर तनु जोरपरै रोर रन, करुना-कलित मन धारमिक धीर को ।।
दुर्जन को कालसो कराल पाल सज्जन को, सुमिरे हरनहार तुलसी की पीर को ।
सीय-सुख-दायक दुलारो रघुनायक को, सेवक सहायक है साहसी समीर को ।।१०।।
सरल हिंदी अर्थहनुमान महाबलवान, धीर और धर्मपरायण हैं। कठोर शरीर के भीतर उनका मन करुणा से भरा है। दुष्टों के लिए काल-जैसे और सज्जनों के पालनकर्ता हैं। तुलसी उन्हें सीता को सुख देने वाला, राम का दुलारा और सेवक की सहायता करने वाला कहकर अपनी पीड़ा हरने की प्रार्थना करते हैं।
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छंद 11 · घनाक्षरी
रचिबे को बिधि जैसे, पालिबे को हरि, हर मीच मारिबे को, ज्याईबे को सुधापान भो ।
धरिबे को धरनि, तरनि तम दलिबे को, सोखिबे कृसानु, पोषिबे को हिम-भानु भो ।।
खल-दुःख दोषिबे को, जन-परितोषिबे को, माँगिबो मलीनता को मोदक सुदान भो ।
आरत की आरति निवारिबे को तिहुँ पुर, तुलसी को साहेब हठीलो हनुमान भो ।।११।।
सरल हिंदी अर्थरचना, पालन, संकट-नाश, आधार, प्रकाश और पोषण जैसे अनेक कार्यों के लिए कवि अलग-अलग दिव्य उपमाएँ देते हैं। भक्त के लिए हनुमान आवश्यकता के अनुरूप सहायक बनते हैं। तुलसी उन्हें तीनों लोकों में आर्त जन की व्यथा दूर करने का दृढ़ संकल्प रखने वाला स्वामी बताते हैं।
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छंद 12 · घनाक्षरी
सेवक स्योकाई जानि जानकीस मानै कानि, सानुकूल सूलपानि नवै नाथ नाँक को ।
देवी देव दानव दयावने ह्वै जोरैं हाथ, बापुरे बराक कहा और राजा राँक को ।।
जागत सोवत बैठे बागत बिनोद मोद, ताके जो अनर्थ सो समर्थ एक आँक को ।
सब दिन रुरो परै पूरो जहाँ-तहाँ ताहि, जाके है भरोसो हिये हनुमान हाँक को ।।१२।।
सरल हिंदी अर्थजिस भक्त को हनुमान की पुकार पर भरोसा है, उसे कवि राम, शिव और देवताओं के अनुग्रह का पात्र मानते हैं। जागते-सोते और जीवन के विविध कार्यों में वह इस आश्रय से बल पाता है। पद का केंद्र बाहरी पद या धन से अधिक समर्थ रक्षक पर अटूट विश्वास है।
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छंद 13 · घनाक्षरी
सानुग सगौरि सानुकूल सूलपानि ताहि, लोकपाल सकल लखन राम जानकी ।
लोक परलोक को बिसोक सो तिलोक ताहि, तुलसी तमाइ कहा काहू बीर आनकी ।।
केसरी किसोर बन्दीछोर के नेवाजे सब, कीरति बिमल कपि करुनानिधान की ।
बालक-ज्यों पालिहैं कृपालु मुनि सिद्ध ताको, जाके हिये हुलसति हाँक हनुमान की ।।१३।।
सरल हिंदी अर्थहनुमान का आश्रित भक्त राम, लक्ष्मण, सीता और गौरी-शंकर की कृपा में सुरक्षित माना गया है। तुलसी पूछते हैं कि फिर किसी दूसरे बलवान से आशा क्यों रखी जाए। करुणामय हनुमान की कीर्ति निर्मल है; उनके नाम की पुकार हृदय में हो तो कवि उसे बालक जैसे स्नेहपूर्ण संरक्षण का अधिकारी मानते हैं।
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छंद 14 · घनाक्षरी
करुनानिधान, बलबुद्धि के निधान मोद-महिमा निधान, गुन-ज्ञान के निधान हौ ।
बामदेव-रुप भूप राम के सनेही, नाम लेत-देत अर्थ धर्म काम निरबान हौ ।।
आपने प्रभाव सीताराम के सुभाव सील, लोक-बेद-बिधि के बिदूष हनुमान हौ ।
मन की बचन की करम की तिहूँ प्रकार, तुलसी तिहारो तुम साहेब सुजान हौ ।।१४।।
सरल हिंदी अर्थहनुमान करुणा, बल, बुद्धि, आनंद, ज्ञान और गुणों के भंडार हैं। वे राम के प्रिय और शिव-स्वरूप हैं; भक्त उनके नाम में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की अभिलाषा रखते हैं। तुलसी मन, वचन और कर्म से स्वयं को उनका सेवक कहते हैं और उन्हें अपना सुजान स्वामी मानते हैं।
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2. आश्रय, आत्मीय उलाहना और विनय
छंद 15 · घनाक्षरी
मन को अगम, तन सुगम किये कपीस, काज महाराज के समाज साज साजे हैं ।
देव-बंदी छोर रनरोर केसरी किसोर, जुग जुग जग तेरे बिरद बिराजे हैं ।
बीर बरजोर, घटि जोर तुलसी की ओर, सुनि सकुचाने साधु खल गन गाजे हैं ।
बिगरी सँवार अंजनी कुमार कीजे मोहिं, जैसे होत आये हनुमान के निवाजे हैं ।।१५।।
सरल हिंदी अर्थहनुमान ने ऐसे काम कर दिखाए जो मन की पहुँच से भी परे लगते हैं। उनकी वीरता और बंधन छुड़ाने की कीर्ति युगों से जग में है। कवि दुख से पूछते हैं कि क्या उनका बल अब तुलसी की ओर घट गया है? वे बिगड़ी दशा सँवारकर पुराने आश्रितों जैसी कृपा पाने की याचना करते हैं।
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छंद 16 · सवैया
जान सिरोमनि हौ हनुमान सदा जन के मन बास तिहारो ।
ढ़ारो बिगारो मैं काको कहा केहि कारन खीझत हौं तो तिहारो ।।
साहेब सेवक नाते तो हातो कियो सो तहाँ तुलसी को न चारो ।
दोष सुनाये तें आगेहुँ को होशियार ह्वैं हों मन तौ हिय हारो ।।१६।।
सरल हिंदी अर्थतुलसी हनुमान से अपने अपराध का कारण जानना चाहते हैं। वे कहते हैं कि सेवक होकर भी ऐसी पीड़ा क्यों मिली, यह समझ नहीं पा रहे। यदि भूल हुई हो तो बता दें, आगे सावधान रहेंगे। स्वामी-सेवक के आत्मीय संबंध में यह दुखी भक्त की विनम्र, सीधी शिकायत है।
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छंद 17 · सवैया
तेरे थपे उथपै न महेस, थपै थिरको कपि जे घर घाले ।
तेरे निवाजे गरीब निवाज बिराजत बैरिन के उर साले ।।
संकट सोच सबै तुलसी लिये नाम फटै मकरी के से जाले ।
बूढ़ भये, बलि, मेरिहि बार, कि हारि परे बहुतै नत पाले ।।१७।।
सरल हिंदी अर्थहनुमान की स्थापित की हुई स्थिति को कोई डिगा नहीं सकता; उनके आश्रित संकटों से उबरते हैं। तुलसी कहते हैं कि नाम लेने पर चिंताएँ मकड़ी के जाले जैसी टूटती हैं। फिर प्रेमभरा उलाहना देते हैं—क्या मेरी बारी में वृद्ध हो गए या अनेक शरणागतों को सँभालते-सँभालते थक गए?
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छंद 18 · सवैया
सिंधु तरे, बड़े बीर दले खल, जारे हैं लंक से बंक मवा से ।
तैं रनि-केहरि केहरि के बिदले अरि-कुंजर छैल छवा से ।।
तोसों समत्थ सुसाहेब सेई सहै तुलसी दुख दोष दवा से ।
बानर बाज ! बढ़े खल-खेचर, लीजत क्यों न लपेटि लवा-से ।।१८।।
सरल हिंदी अर्थसमुद्र पार करने, बड़े वीरों को परास्त करने और लंका जलाने वाले हनुमान रण के सिंह हैं। तुलसी कहते हैं कि ऐसे समर्थ स्वामी का सेवक होकर भी दुख की अग्नि सहना कठिन है। बाज और छोटे पक्षियों की उपमा देकर वे आग्रह करते हैं कि बढ़ती हुई विपत्तियों को अपनी शक्ति से समेट लें।
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छंद 19 · सवैया
अच्छ-विमर्दन कानन-भानि दसानन आनन भा न निहारो ।
बारिदनाद अकंपन कुंभकरन्न-से कुंजर केहरि-बारो ।।
राम-प्रताप-हुतासन, कच्छ, बिपच्छ, समीर समीर-दुलारो ।
पाप-तें साप-तें ताप तिहूँ-तें सदा तुलसी कहँ सो रखवारो ।।१९।।
सरल हिंदी अर्थअक्षयकुमार-वध, अशोक-वाटिका और लंका के युद्ध-प्रसंगों से हनुमान का पराक्रम स्मरण किया गया है। राम के प्रताप की अग्नि में वे प्रबल पवन जैसे हैं। शत्रु, पाप, शाप और ताप से रक्षा की आशा व्यक्त करते हुए तुलसी उन्हें अपना सदा का रखवाला कहते हैं।
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3. बाहु-पीड़ा में आर्त प्रार्थना
छंद 20 · घनाक्षरी
जानत जहान हनुमान को निवाज्यौ जन, मन अनुमानि बलि, बोल न बिसारिये ।
सेवा-जोग तुलसी कबहुँ कहा चूक परी, साहेब सुभाव कपि साहिबी सँभारिये ।।
अपराधी जानि कीजै सासति सहस भाँति, मोदक मरै जो ताहि माहुर न मारिये ।
साहसी समीर के दुलारे रघुबीर जू के, बाँह पीर महाबीर बेगि ही निवारिये ।।२०।।
सरल हिंदी अर्थसंसार जानता है कि तुलसी हनुमान के कृपापात्र हैं; कवि प्रार्थना करते हैं कि उन्हें भुलाया न जाए। भूल हुई हो तो अनेक तरह से समझाएँ-दंड दें, लेकिन अपने दीन सेवक के लिए इतनी कठोरता क्यों! मिठाई से ही वश होने वाले को विष न देने की लोकोक्ति से वे शीघ्र बाहु-पीड़ा दूर करने की याचना करते हैं।
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छंद 21 · घनाक्षरी
बालक बिलोकि, बलि बारेतें आपनो कियो, दीनबन्धु दया कीन्हीं निरुपाधि न्यारिये ।
रावरो भरोसो तुलसी के, रावरोई बल, आस रावरीयै दास रावरो बिचारिये ।।
बड़ो बिकराल कलि, काको न बिहाल कियो, माथे पगु बलि को, निहारि सो निवारिये ।
केसरी किसोर, रनरोर, बरजोर बीर, बाँहुपीर राहुमातु ज्यौं पछारि मारिये ।।२१।।
सरल हिंदी अर्थतुलसी स्मरण करते हैं कि हनुमान ने उन्हें बाल्यावस्था से बिना शर्त अपनाया। उनका भरोसा, बल और आशा सब उन्हीं पर टिकी है। कठिन समय में घिरी दशा देखकर वे सहायता माँगते हैं। राहु की माता सिंहिका को परास्त करने की उपमा के साथ बाहु-पीड़ा का भी वैसा ही निवारण चाहते हैं।
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छंद 22 · घनाक्षरी
उथपे थपनथिर थपे उथपनहार, केसरी कुमार बल आपनो सँभारिये ।
राम के गुलामनि को कामतरु रामदूत, मोसे दीन दूबरे को तकिया तिहारिये ।।
साहेब समर्थ तोसों तुलसी के माथे पर, सोऊ अपराध बिनु बीर, बाँधि मारिये ।
पोखरी बिसाल बाँहु, बलि, बारिचर पीर, मकरी ज्यौं पकरि कै बदन बिदारिये ।।२२।।
सरल हिंदी अर्थजो गिरा हुआ सँभाल सकें और स्थिर बाधा को हटा सकें, वे हनुमान रामभक्तों के लिए कल्पवृक्ष हैं। तुलसी अपने को दुर्बल सेवक मानकर उनके सहारे की प्रार्थना करते हैं। बाहु को सरोवर और पीड़ा को उसमें बैठे घातक जीव की उपमा देकर मकरी-वध जैसी रक्षा चाहते हैं।
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छंद 23 · घनाक्षरी
राम को सनेह, राम साहस लखन सिय, राम की भगति, सोच संकट निवारिये ।
मुद-मरकट रोग-बारिनिधि हेरि हारे, जीव-जामवंत को भरोसो तेरो भारिये ।।
कूदिये कृपाल तुलसी सुप्रेम-पब्बयतें, सुथल सुबेल भालू बैठि कै बिचारिये ।
महाबीर बाँकुरे बराकी बाँह-पीर क्यों न, लंकिनी ज्यों लात-घात ही मरोरि मारिये ।।२३।।
सरल हिंदी अर्थकवि अपनी स्थिति को रामकथा की उपमाओं में रखते हैं। रोग समुद्र है, निराश मन वानरों जैसा और जीव जामवंत की तरह हनुमान पर भरोसा करता है। प्रेमरूपी पर्वत से कूदकर इस संकट को पार कराने की पुकार है। वे बाहु-पीड़ा को लंकिनी की तरह एक प्रहार से दूर करने की प्रार्थना करते हैं।
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छंद 24 · घनाक्षरी
लोक-परलोकहुँ तिलोक न बिलोकियत, तोसे समरथ चष चारिहूँ निहारिये ।
कर्म, काल, लोकपाल, अग-जग जीवजाल, नाथ हाथ सब निज महिमा बिचारिये ।।
खास दास रावरो, निवास तेरो तासु उर, तुलसी सो देव दुखी देखियत भारिये ।
बात तरुमूल बाँहुसूल कपिकच्छु-बेलि, उपजी सकेलि कपिकेलि ही उखारिये ।।२४।।
सरल हिंदी अर्थतुलसी चारों ओर देखते हैं, पर हनुमान जैसा समर्थ सहायक नहीं पाते। कर्म, काल और संसार की स्थितियाँ भी उनके आराध्य की महिमा के अधीन मानी गई हैं। अपने हृदय में उनका निवास बताते हुए कवि दुख की बेल उखाड़ने को कहते हैं। बाहु-शूल को पेड़ पर चढ़ती खुजलीकारी लता की उपमा दी गई है।
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छंद 25 · घनाक्षरी
करम-कराल-कंस भूमिपाल के भरोसे, बकी बकभगिनी काहू तें कहा डरैगी ।
बड़ी बिकराल बाल घातिनी न जात कहि, बाँहूबल बालक छबीले छोटे छरैगी ।।
आई है बनाइ बेष आप ही बिचारि देख, पाप जाय सबको गुनी के पाले परैगी ।
पूतना पिसाचिनी ज्यौं कपिकान्ह तुलसी की, बाँहपीर महाबीर तेरे मारे मरैगी ।।२५।।
सरल हिंदी अर्थकवि बाहु-पीड़ा को पूतना और कठिन कर्म को कंस के रूपक में देखते हैं। बालक कृष्ण जैसे सहज दिखते हुए भी पूतना का अंत कर देते हैं, वैसे ही हनुमान इस प्रबल बाधा को हटा सकते हैं। यह पीड़ा और रक्षा की शक्ति समझाने वाला पौराणिक काव्य-रूपक है।
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छंद 26 · घनाक्षरी
भालकी कि कालकी कि रोष की त्रिदोष की है, बेदन बिषम पाप ताप छल छाँह की ।
करमन कूट की कि जन्त्र मन्त्र बूट की, पराहि जाहि पापिनी मलीन मन माँह की ।।
पैहहि सजाय, नत कहत बजाय तोहि, बाबरी न होहि बानि जानि कपि नाँह की ।
आन हनुमान की दुहाई बलवान की, सपथ महाबीर की जो रहै पीर बाँह की ।।२६।।
सरल हिंदी अर्थकवि दुख के संभावित कारणों के रूप में भाग्य, काल, रोष, त्रिदोष, कर्म और लोकप्रचलित बाधाओं की धारणाएँ गिनाते हैं। वे किसी एक कारण का निश्चित निर्णय नहीं करते। हनुमान की दुहाई देकर पीड़ा से हटने की पुकार है। यह आस्था की भाषा में दुख से मुक्ति की याचना है।
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छंद 27 · घनाक्षरी
सिंहिका सँहारि बल, सुरसा सुधारि छल, लंकिनी पछारि मारि बाटिका उजारी है ।
लंक परजारि मकरी बिदारि बारबार, जातुधान धारि धूरिधानी करि डारी है ।।
तोरि जमकातरि मंदोदरी कढ़ोरि आनी, रावन की रानी मेघनाद महँतारी है ।
भीर बाँह पीर की निपट राखी महाबीर, कौन के सकोच तुलसी के सोच भारी है ।।२७।।
सरल हिंदी अर्थसिंहिका, सुरसा, लंकिनी, अशोक-वाटिका, लंका-दहन और मकरी-वध जैसे पराक्रमों का स्मरण है। रावण के परिवार पर पड़े संकट भी कवि याद करते हैं। इतने कठिन कार्य करने वाले महाबीर के सामने अपनी बाहु-पीड़ा बड़ी क्यों बनी हुई है—तुलसी इसी व्यथा के साथ सहायता माँगते हैं।
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छंद 28 · घनाक्षरी
तेरो बालि केलि बीर सुनि सहमत धीर, भूलत सरीर सुधि सक्र-रबि-राहु की ।
तेरी बाँह बसत बिसोक लोकपाल सब, तेरो नाम लेत रहै आरति न काहु की ।।
साम दान भेद बिधि बेदहू लबेद सिधि, हाथ कपिनाथ ही के चोटी चोर साहु की ।
आलस अनख परिहास कै सिखावन है, एते दिन रही पीर तुलसी के बाहु की ।।२८।।
सरल हिंदी अर्थहनुमान की बाललीला सुनकर इंद्र, सूर्य और राहु जैसे समर्थ भी विस्मित होते हैं। कवि कहते हैं कि सबकी रक्षा का बल उनके हाथ में है। फिर पूछते हैं कि मेरी पीड़ा इतने दिन क्यों रही—क्या यह कोई शिक्षा है, उपेक्षा है या आत्मीय विनोद? प्रश्न में शिकायत के साथ विश्वास भी अडिग है।
↑ विषय-सूची
छंद 29 · घनाक्षरी
टूकनि को घर-घर डोलत कँगाल बोलि, बाल ज्यों कृपाल नतपाल पालि पोसो है ।
कीन्ही है सँभार सार अँजनी कुमार बीर, आपनो बिसारि हैं न मेरेहू भरोसो है ।।
इतनो परेखो सब भाँति समरथ आजु, कपिराज साँची कहौं को तिलोक तोसो है ।
सासति सहत दास कीजे पेखि परिहास, चीरी को मरन खेल बालकनि को सो है ।।२९।।
सरल हिंदी अर्थतुलसी अपने अभावपूर्ण बचपन और हनुमान से मिले पालन का स्मरण करते हैं। उन्हें विश्वास है कि अंजनीकुमार अपने सेवक को भुलाएँगे नहीं। पर वे आग्रह करते हैं कि दास की पीड़ा को खेल न समझें। पक्षी के कष्ट और बालकों के खेल की उपमा से वे दुख की गंभीरता व्यक्त करते हैं।
↑ विषय-सूची
छंद 30 · घनाक्षरी
आपने ही पाप तें त्रिपात तें कि साप तें, बढ़ी है बाँह बेदन कही न सहि जाति है ।
औषध अनेक जन्त्र मन्त्र टोटकादि किये, बादि भये देवता मनाये अधिकाति है ।।
करतार, भरतार, हरतार, कर्म काल, को है जगजाल जो न मानत इताति है ।
चेरो तेरो तुलसी तू मेरो कह्यो राम दूत, ढील तेरी बीर मोहि पीर तें पिराति है ।।३०।।
सरल हिंदी अर्थकवि कहते हैं कि बाहु की वेदना बढ़ गई है और कही-सही नहीं जाती। उन्होंने अनेक औषध तथा तत्कालीन लोकप्रचलित उपाय किए, पर संतोष नहीं मिला। अब वे रामदूत के साथ अपने सेवक-संबंध का स्मरण करके पुकारते हैं। सहायता में विलंब भी दुख से अधिक पीड़ादायक लग रहा है।
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छंद 31 · घनाक्षरी
दूत राम राय को, सपूत पूत बाय को, समत्व हाथ पाय को सहाय असहाय को ।
बाँकी बिरदावली बिदित बेद गाइयत, रावन सो भट भयो मुठिका के घाय को ।।
एते बड़े साहेब समर्थ को निवाजो आज, सीदत सुसेवक बचन मन काय को ।
थोरी बाँह पीर की बड़ी गलानि तुलसी को, कौन पाप कोप, लोप प्रकट प्रभाय को ।।३१।।
सरल हिंदी अर्थहनुमान राम के दूत, पवनपुत्र और असहायों के सहायक हैं। रावण जैसा योद्धा भी उनकी मुष्टि का प्रभाव जानता था। कवि को दुख है कि ऐसे स्वामी का सेवक आज मन, वचन और शरीर से क्षीण हो रहा है। वे पूछते हैं कि किस बाधा से कृपा का प्रत्यक्ष अनुभव रुक गया है।
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छंद 32 · घनाक्षरी
देवी देव दनुज मनुज मुनि सिद्ध नाग, छोटे बड़े जीव जेते चेतन अचेत हैं ।
पूतना पिसाची जातुधानी जातुधान बाम, राम दूत की रजाइ माथे मानि लेत हैं ।।
घोर जन्त्र मन्त्र कूट कपट कुरोग जोग, हनुमान आन सुनि छाड़त निकेत हैं ।
क्रोध कीजे कर्म को प्रबोध कीजे तुलसी को, सोध कीजे तिनको जो दोष दुख देत हैं ।।३२।।
सरल हिंदी अर्थकवि के विश्वास में देवता, मनुष्य और समस्त शक्तियाँ रामदूत की मर्यादा मानती हैं। लोकविश्वासों में कही जाने वाली भीषण बाधाओं का उल्लेख भी इसी आश्रय-भाव से है। तुलसी अपने कर्म की प्रतिकूलता दूर करने, स्वयं को समझ देने और दुख के कारणों का समाधान करने की प्रार्थना करते हैं।
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छंद 33 · घनाक्षरी
तेरे बल बानर जिताये रन रावन सों, तेरे घाले जातुधान भये घर-घर के ।
तेरे बल रामराज किये सब सुरकाज, सकल समाज साज साजे रघुबर के ।।
तेरो गुनगान सुनि गीरबान पुलकत, सजल बिलोचन बिरंचि हरि हर के ।
तुलसी के माथे पर हाथ फेरो कीसनाथ, देखिये न दास दुखी तोसो कनिगर के ।।३३।।
सरल हिंदी अर्थराम-रावण युद्ध में हनुमान की सहायता, रामकाज की सफलता और देवताओं के आनंद का स्मरण किया गया है। उनका गुणगान सुनकर दिव्य समाज भी पुलकित होता है। तुलसी प्रार्थना करते हैं कि वानरनाथ उनके सिर पर स्नेह से हाथ फेरें; इतने दयालु स्वामी अपने दास को दुखी न देखें।
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छंद 34 · घनाक्षरी
पालो तेरे टूक को परेहू चूक मूकिये न, कूर कौड़ी दूको हौं आपनी ओर हेरिये ।
भोरानाथ भोरे ही सरोष होत थोरे दोष, पोषि तोषि थापि आपनी न अवडेरिये ।।
अँबु तू हौं अँबुचर, अँबु तू हौं डिंभ सो न, बूझिये बिलंब अवलंब मेरे तेरिये ।
बालक बिकल जानि पाहि प्रेम पहिचानि, तुलसी की बाँह पर लामी लूम फेरिये ।।३४।।
सरल हिंदी अर्थतुलसी स्वयं को हनुमान के अन्न और कृपा से पला हुआ मानते हैं। भूल हुई हो तो भी अपनी ओर का स्नेह देखकर उन्हें सँभालें। जल-जलचर और माता-बालक की उपमाओं से अपनी पूर्ण निर्भरता बताते हैं। वे प्रेम पहचानकर रक्षा करने और बाहु पर स्नेहपूर्ण स्पर्श की याचना करते हैं।
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छंद 35 · घनाक्षरी
घेरि लियो रोगनि, कुजोगनि, कुलोगनि ज्यौं, बासर जलद घन घटा धुकि धाई है ।
बरसत बारि पीर जारिये जवासे जस, रोष बिनु दोष धूम-मूल मलिनाई है ।।
करुनानिधान हनुमान महा बलवान, हेरि हँसि हाँकि फूँकि फौजैं ते उड़ाई है ।
खाये हुतो तुलसी कुरोग राढ़ राकसनि, केसरी किसोर राखे बीर बरिआई है ।।३५।।
सरल हिंदी अर्थरोग, प्रतिकूल परिस्थितियाँ और कठोर लोग कवि को घने बादलों की तरह घेरे हुए लगते हैं। पीड़ा उन्हें भीतर से जला रही है। ऐसे में करुणामय हनुमान की ओर देखकर वे रक्षा का अनुभव व्यक्त करते हैं—मानो एक हाँक से विपत्तियों की सेना छँट गई हो। यह आश्वस्त शरणागत की काव्यात्मक वाणी है।
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4. रामनाम, आत्मपरीक्षण और शरणागति
छंद 36 · सवैया
राम गुलाम तु ही हनुमान गोसाँई सुसाँई सदा अनुकूलो ।
पाल्यो हौं बाल ज्यों आखर दू पितु मातु सों मंगल मोद समूलो ।।
बाँह की बेदन बाँह पगार पुकारत आरत आनँद भूलो ।
श्री रघुबीर निवारिये पीर रहौं दरबार परो लटि लूलो ।।३६।।
सरल हिंदी अर्थकवि कहते हैं कि राम और हनुमान सदा अनुकूल स्वामी हैं; रामनाम के दो अक्षरों ने माता-पिता की तरह उनका पालन किया। बाहु की वेदना में आनंद भूलकर वे आर्त पुकार करते हैं। राम के दरबार में असमर्थ होकर भी पड़े रहने और वहीं से पीड़ा-निवारण की आशा रखने का भाव है।
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छंद 37 · घनाक्षरी
काल की करालता करम कठिनाई कीधौं, पाप के प्रभाव की सुभाय बाय बावरे ।
बेदन कुभाँति सो सही न जाति राति दिन, सोई बाँह गही जो गही समीर डाबरे ।।
लायो तरु तुलसी तिहारो सो निहारि बारि, सींचिये मलीन भो तयो है तिहुँ तावरे ।
भूतनि की आपनी पराये की कृपा निधान, जानियत सबही की रीति राम रावरे ।।३७।।
सरल हिंदी अर्थकाल, कर्म, पाप या वात जैसे संभावित कारणों का उल्लेख करके कवि कहते हैं कि दिन-रात का दुख सहा नहीं जाता। जिस हाथ को हनुमान ने कभी थामा था, उसी में अब पीड़ा है। स्वयं को उनके लगाए पौधे की तरह मानकर कृपा का जल माँगते हैं; राम सबकी स्थिति जानते हैं।
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छंद 38 · घनाक्षरी
पाँय पीर पेट पीर बाँह पीर मुँह पीर, जरजर सकल पीर मई है ।
देव भूत पितर करम खल काल ग्रह, मोहि पर दवरि दमानक सी दई है ।।
हौं तो बिनु मोल के बिकानो बलि बारेही तें, ओट राम नाम की ललाट लिखि लई है ।
कुँभज के किंकर बिकल बूढ़े गोखुरनि, हाय राम राय ऐसी हाल कहूँ भई है ।।३८।।
सरल हिंदी अर्थपाँव, पेट, बाँह और मुख की पीड़ा से शरीर जर्जर होने की अनुभूति व्यक्त की गई है। कवि को लगता है कि अनेक विपत्तियाँ एक साथ घेर रही हैं। वे बचपन से राम के दास और रामनाम के आश्रित हैं। इतने समर्थ स्वामी का सेवक छोटी बाधा में भी विवश हो—इस विडंबना से उनकी पुकार तीव्र होती है।
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छंद 39 · घनाक्षरी
बाहुक-सुबाहु नीच लीचर-मरीच मिलि, मुँहपीर केतुजा कुरोग जातुधान हैं ।
राम नाम जगजाप कियो चहों सानुराग, काल कैसे दूत भूत कहा मेरे मान हैं ।।
सुमिरे सहाय राम लखन आखर दोऊ, जिनके समूह साके जागत जहान हैं ।
तुलसी सँभारि ताड़का सँहारि भारि भट, बेधे बरगद से बनाइ बानवान हैं ।।३९।।
सरल हिंदी अर्थकवि पीड़ा और रोग को सुबाहु, मारीच तथा ताड़का जैसे रामकथा के विरोधियों की उपमा देते हैं। वे स्नेहपूर्वक रामनाम का जप करना चाहते हैं, पर कष्ट बाधा बन रहा है। राम और लक्ष्मण के स्मरण से बल लेकर वे इन्हीं दुखों को हटाने की प्रार्थना करते हैं।
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छंद 40 · घनाक्षरी
बालपने सूधे मन राम सनमुख भयो, राम नाम लेत माँगि खात टूकटाक हौं ।
परयो लोक-रीति में पुनीत प्रीति राम राय, मोह बस बैठो तोरि तरकि तराक हौं ।।
खोटे-खोटे आचरन आचरत अपनायो, अंजनी कुमार सोध्यो रामपानि पाक हौं ।
तुलसी गुसाँई भयो भोंडे दिन भूल गयो, ताको फल पावत निदान परिपाक हौं ।।४०।।
सरल हिंदी अर्थतुलसी अपने भीतर की कमियों का स्मरण करते हैं। बचपन की सरल राममुखी वृत्ति से हटकर लोकव्यवहार और मोह में उलझने का दुख है। हनुमान ने उन्हें अपनाकर सँवारा, फिर भी प्रतिष्ठा मिलने पर वे कठिन दिन भूल गए—ऐसी आत्मग्लानि व्यक्त है। इसे कवि का आत्मालोचन समझें, सभी पीड़ितों पर कर्म-दोष का निर्णय नहीं।
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छंद 41 · घनाक्षरी
असन-बसन-हीन बिषम-बिषाद-लीन, देखि दीन दूबरो करै न हाय हाय को ।
तुलसी अनाथ सो सनाथ रघुनाथ कियो, दियो फल सील सिंधु आपने सुभाय को ।।
नीच यहि बीच पति पाइ भरु हाईगो, बिहाइ प्रभु भजन बचन मन काय को ।
ता तें तनु पेषियत घोर बरतोर मिस, फूटि फूटि निकसत लोन राम राय को ।।४१।।
सरल हिंदी अर्थकवि भोजन-वस्त्र के अभाव और गहरे विषाद की पुरानी दशा याद करते हैं। राम ने अनाथ को सनाथ करके सम्मान दिया। फिर अभिमान में भजन भूलने पर वे स्वयं को धिक्कारते हैं। शरीर के कष्ट को प्रभु का ऋण याद दिलाने वाली उपमा में रखते हैं; यह व्यक्तिगत विनय और आत्मपरीक्षण का भाव है।
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छंद 42 · घनाक्षरी
जीओं जग जानकी जीवन को कहाइ जन, मरिबे को बारानसी बारि सुरसरि को ।
तुलसी के दुहूँ हाथ मोदक हैं ऐसे ठाँउ, जाके जिये मुये सोच करिहैं न लरि को ।।
मोको झूटो साँचो लोग राम को कहत सब, मेरे मन मान है न हर को न हरि को ।
भारी पीर दुसह सरीर तें बिहाल होत, सोऊ रघुबीर बिनु सकै दूर करि को ।।४२।।
सरल हिंदी अर्थतुलसी जीवन में जानकीजी के स्वामी के सेवक कहलाने और मृत्यु के लिए काशी तथा गंगा का आश्रय मिलने को सौभाग्य मानते हैं। लोग उन्हें राम का कहते हैं; वे भी उसी नाम पर भरोसा रखते हैं। फिर असह्य शारीरिक पीड़ा में पूछते हैं कि रघुवीर के अतिरिक्त इसे दूर करने वाला उनका अपना कौन है!
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छंद 43 · घनाक्षरी
सीतापति साहेब सहाय हनुमान नित, हित उपदेश को महेस मानो गुरु कै ।
मानस बचन काय सरन तिहारे पाँय, तुम्हरे भरोसे सुर मैं न जाने सुर कै ।।
ब्याधि भूत जनित उपाधि काहु खल की, समाधि कीजे तुलसी को जानि जन फुर कै ।
कपिनाथ रघुनाथ भोलानाथ भूतनाथ, रोग सिंधु क्यों न डारियत गाय खुर कै ।।४३।।
सरल हिंदी अर्थकवि सीतापति को स्वामी, हनुमान को नित्य सहायक और शिव को हितकारी गुरु मानते हैं। मन, वचन और शरीर से उनके चरणों की शरण लेते हैं। बीमारी और अन्य उपद्रवों से घिरी दशा का समाधान माँगते हैं। रोगरूपी समुद्र को गाय के खुर के गड्ढे जितना सुगम बनाने की प्रार्थना है।
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छंद 44 · घनाक्षरी
कहों हनुमान सों सुजान राम राय सों, कृपानिधान संकर सों सावधान सुनिये ।
हरष विषाद राग रोष गुन दोष मई, बिरची बिरञ्ची सब देखियत दुनिये ।।
माया जीव काल के करम के सुभाय के, करैया राम बेद कहैं साँची मन गुनिये ।
तुम्ह तें कहा न होय हा हा सो बुझैये मोहि, हौं हूँ रहों मौनही बयो सो जानि लुनिये ।।४४।।
सरल हिंदी अर्थअंत में तुलसी हनुमान, राम और शंकर से अपनी बात सुनने का निवेदन करते हैं। संसार हर्ष-विषाद, राग-रोष और गुण-दोष से भरा है; माया, जीव, काल, कर्म और स्वभाव के परम नियंता राम माने गए हैं। कवि समझ और धैर्य माँगते हैं—जो भोगना है, उसका बोध मिले तो मौन रहकर स्वीकार कर सकें।
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