हनुमान जी अपनी शक्ति क्यों भूल गए? ऋषियों के शाप से जाम्बवान के स्मरण तक पूरी कथा

भक्ति भावना • श्री हनुमान भक्ति

॥ जय श्री सीताराम ॥

हनुमान जी अपनी शक्ति क्यों भूल गए?

बाल्यकाल के शाप से जाम्बवान के स्मरण और समुद्र लाँघने तक पूरी कथा

जिन हनुमान जी का नाम साहस, बुद्धि और अतुलित बल का स्मरण कराता है, उन्हें अपने सामर्थ्य का स्मरण क्यों कराना पड़ा? क्या उनका बल समाप्त हो गया था? किसने शाप दिया और जाम्बवान के वचन सुनकर क्या हुआ?

इस कथा को समझने के लिए पहले बाल हनुमान के प्रसंग में चलना होगा, फिर उस समुद्रतट पर जहाँ माता सीता की खोज में पहुँची वानर-सेना के सामने विशाल समुद्र की चुनौती खड़ी थी।

कथा का आधार: बाल्यकाल के शाप का वृत्तांत वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में मिलता है। आगे का जाम्बवान–हनुमान संवाद यहाँ श्रीरामचरितमानस की चौपाइयों और उनके सरल भावार्थ के साथ समझाया गया है।

1. बाल हनुमान का सामर्थ्य और चंचलता

उत्तरकाण्ड के वृत्तांत में देवताओं के वरदानों से संपन्न बाल हनुमान अत्यंत सामर्थ्यवान थे। बालसुलभ चंचलता में वे मुनियों के आश्रमों में पात्र, यज्ञ-सामग्री और वल्कल आदि बिखेर देते थे। इससे ऋषियों की व्यवस्था और साधना में बाधा पड़ती थी।

ऋषियों ने पहले सहन किया। पिता केसरी के समझाने पर भी उपद्रव नहीं थमा। तब भृगु और अंगिरा की परंपरा के मुनियों ने संयमित क्रोध से शाप दिया। यहाँ किसी एक मुनि का मनगढ़ंत नाम जोड़ना उचित नहीं।

2. शाप क्यों मिला और उसका अर्थ क्या था?

शाप का भाव था कि जिस बल के बोध से वे मुनियों को परेशान करते हैं, उसी बल का ज्ञान उन्हें लंबे समय तक नहीं रहेगा; स्मरण होने पर वह सामर्थ्य फिर प्रभावी होगा। यह उसका सरल आशय है, मूल श्लोक का शब्दशः उद्धरण नहीं।

इसके बाद वे शांत होकर विचरण करने लगे। घटना बाल्यावस्था की है; कोई निश्चित उम्र या तारीख यहाँ नहीं बताई गई है।

इस वृत्तांत में बल-स्मृति के अभाव को आगे बालि–सुग्रीव संघर्ष के समय भी बताया गया है। हनुमान जी सुग्रीव के सहायक बने रहे।

समझने योग्य अंतर: शक्ति नष्ट होना और अपनी शक्ति का बोध न रहना अलग बातें हैं। इस कथा में बल के स्मरण का अभाव है, समस्त ज्ञान या स्मृति खो जाने की बात नहीं।

3. माता सीता की खोज और समुद्र की चुनौती

आगे रामकथा में माता सीता की खोज के लिए वानर-दल दक्षिण दिशा में बढ़ता है। संपाती से लंका में सीता जी के होने की सूचना मिलने पर समुद्र पार जाने का प्रश्न सामने आता है। सूचना मिल चुकी थी, पर वहाँ पहुँचकर सीता जी की सुधि कौन लाए?

अंगद जाने का सामर्थ्य बताते हैं, लेकिन लौटने को लेकर संशय प्रकट करते हैं।

अंगद कहइ जाउँ मैं पारा।
जियँ संसय कछु फिरती बारा॥

सरल अर्थ: अंगद कहते हैं कि मैं समुद्र के उस पार जा सकता हूँ, किंतु वापस लौटने के विषय में मन में कुछ संशय है।

यह कार्य केवल उस पार पहुँचने का नहीं था। माता सीता को ढूँढ़कर उनकी सूचना सुरक्षित लौटाना भी आवश्यक था। इसी परिस्थिति में जाम्बवान का ध्यान हनुमान जी की ओर जाता है।

4. जाम्बवान ने मौन बैठे हनुमान जी को संबोधित किया

कहइ रीछपति सुनु हनुमाना।
का चुप साधि रहेहु बलवाना॥

पवन तनय बल पवन समाना।
बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥

सरल अर्थ: रीछराज जाम्बवान कहते हैं—हे बलवान हनुमान! सुनो, तुम चुप क्यों बैठे हो? तुम पवनपुत्र हो, तुम्हारा बल पवन के समान है। तुम बुद्धि, विवेक और विज्ञान के भंडार हो।

जाम्बवान केवल शारीरिक शक्ति का उल्लेख नहीं करते। इस अभियान में उचित निर्णय, परिस्थिति की पहचान और कार्य की समझ भी चाहिए थी। इसीलिए बल के साथ बुद्धि और विवेक का भी स्मरण कराया गया।

5. “कवन सो काज…”—सामर्थ्य और उद्देश्य का स्मरण

कवन सो काज कठिन जग माहीं।
जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥

राम काज लगि तव अवतारा।
सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥

सरल अर्थ: हे तात! संसार में ऐसा कौन-सा कठिन कार्य है जो तुमसे न हो सके? तुम्हारा अवतार श्रीराम के कार्य के लिए हुआ है। यह सुनते ही हनुमान जी पर्वत के समान विशाल रूप वाले हो गए।

पहले जाम्बवान ने सामर्थ्य का स्मरण कराया, फिर उसके उद्देश्य का—रामकाज। इस प्रसंग में भक्ति और पराक्रम एक साथ दिखाई देते हैं। बल का उपयोग अपने प्रदर्शन के लिए नहीं, प्रभु की सेवा के लिए होना है।

कांड की पहचान: यह संवाद श्रीरामचरितमानस के किष्किन्धाकाण्ड के अंतिम हिस्से में है। इसके बाद सुंदरकांड में समुद्र-पार यात्रा और लंका के प्रसंग आगे बढ़ते हैं।

6. स्मरण होते ही हनुमान जी का उत्साह

कनक बरन तन तेज बिराजा।
मानहुँ अपर गिरिन्ह कर राजा॥

सिंहनाद करि बारहिं बारा।
लीलहीं नाघउँ जलनिधि खारा॥

सरल अर्थ: हनुमान जी का स्वर्णवर्ण शरीर तेज से चमकने लगा, मानो पर्वतों का कोई दूसरा राजा सामने खड़ा हो। वे बार-बार सिंहनाद करके कहते हैं कि इस खारे समुद्र को सहज ही लाँघ सकता हूँ।

जिस समुद्र के सामने सब चिंतित थे, उसी को पार करने का विश्वास अब स्पष्ट हो गया। फिर भी उत्साह के साथ उनकी विनम्रता बनी रहती है।

सहित सहाय रावनहि मारी।
आनउँ इहाँ त्रिकूट उपारी॥

जामवंत मैं पूछउँ तोही।
उचित सिखावनु दीजहु मोही॥

सरल अर्थ: हनुमान जी कहते हैं कि मैं सहायकों सहित रावण को मारकर त्रिकूट पर्वत उखाड़ यहाँ ला सकता हूँ। फिर जाम्बवान से पूछते हैं—आप मुझे उचित सलाह दें, मुझे क्या करना चाहिए?

सामर्थ्य का स्मरण होने के बाद भी वे मनमाना अभियान शुरू नहीं करते। वे वरिष्ठ से कार्य की मर्यादा और उद्देश्य पूछते हैं। यही बल के साथ विवेक और अनुशासन का सुंदर उदाहरण है।

7. जाम्बवान ने कार्य स्पष्ट किया

एतना करहु तात तुम्ह जाई।
सीतहि देखि कहहु सुधि आई॥

सरल अर्थ: हे तात! तुम जाकर इतना काम करो कि सीता जी को देखो और लौटकर उनकी सूचना दो।

जाम्बवान का निर्देश स्पष्ट था—पहले सीता जी का पता लगाना और उनकी सुधि लाना। हनुमान जी का पराक्रम अब निश्चित कार्य की ओर लगाया गया। उत्साह को उचित दिशा मिली।

8. स्मरण से संकल्प और फिर समुद्र लाँघना

सुंदरकांड के आरंभ में हनुमान जी जाम्बवान के वचनों को हृदय से स्वीकार करते हैं।

जामवंत के बचन सुहाए।
सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥

तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई।
सहि दुख कंद मूल फल खाई॥

सरल अर्थ: जाम्बवान के सुंदर वचन सुनकर हनुमान जी को बहुत अच्छे लगे। वे साथियों से कहते हैं कि तब तक कष्ट सहकर कंद-मूल और फल खाते हुए मेरी प्रतीक्षा करना।

जब लगि आवौं सीतहि देखी।
होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥

यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा।
चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा॥

सरल अर्थ: जब तक मैं सीता जी को देखकर लौटूँ, तब तक प्रतीक्षा करना। मेरे मन में विशेष हर्ष है, कार्य अवश्य होगा। ऐसा कहकर सबको प्रणाम किया और हृदय में श्रीरघुनाथ जी को धारण करके चले।

वे समुद्रतट के पर्वत पर चढ़ते हैं। प्रभु का स्मरण करके समुद्र की ओर छलाँग लगाते हैं। तुलसीदास जी उनकी गति का वर्णन श्रीराम के अमोघ बाण की उपमा से करते हैं।

जिमि अमोघ रघुपति कर बाना।
एही भाँति चलेउ हनुमाना॥

सरल अर्थ: जैसे श्रीरघुनाथ जी का बाण अपने लक्ष्य से नहीं चूकता, उसी प्रकार हनुमान जी आगे बढ़े। अब उनकी यात्रा सीता जी की खोज और रामकाज की सिद्धि की ओर चल पड़ी।

9. क्या उन्हें हर बार शक्ति याद दिलानी पड़ती थी?

इस कथा से यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं कि हनुमान जी हर कार्य के बाद फिर अपना बल भूल जाते थे और किसी को हर बार वही शाप हटाना पड़ता था। समुद्रतट पर जाम्बवान द्वारा सामर्थ्य का स्मरण कराना एक स्पष्ट और प्रमुख प्रसंग है।

सुंदरकांड में आगे हनुमान जी परिस्थितियों के अनुसार स्वयं निर्णय लेते हैं, अपना आकार बदलते हैं और साहस तथा बुद्धि से कार्य करते हैं। प्रत्येक कार्य से पहले किसी नए बल-स्मरण का वर्णन नहीं आता।

किसी वरिष्ठ का आगे फिर कार्य बताना या उत्साह बढ़ाना अलग बात है। उसे बिना स्पष्ट आधार दोबारा शक्ति भूलना नहीं कहना चाहिए।

सीधा उत्तर: कथा में मुनियों का शाप बाल्यकाल में मिलता है। जाम्बवान समुद्र-पार अभियान से पहले बल और रामकाज का स्मरण कराते हैं। बार-बार स्मरण खोने की कोई निश्चित समय-सारणी इस प्रसंग में नहीं बताई गई है।

10. कथा का भाव

हनुमान जी के प्रसंग में सामर्थ्य, सेवा और विनम्रता साथ-साथ दिखाई देते हैं। जाम्बवान बताते हैं कि उचित मार्गदर्शन कितनी बड़ी भूमिका निभा सकता है। हनुमान जी दिखाते हैं कि जाग्रत उत्साह को कर्तव्य और मर्यादा के साथ कैसे जोड़ा जाए।

अपने जीवन के लिए इससे यह प्रेरणा ली जा सकती है— योग्यता पहचानें, विवेकपूर्ण सलाह स्वीकार करें और अच्छे कार्य में लगें। दूसरों के जीवन में भी निराशा बढ़ाने के बजाय सच्चे प्रोत्साहन का कारण बनें।

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शक्ति-स्मरण, जाम्बवान का संदेश और अंगद का प्रसंग।

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कथा और पाठ के संदर्भ

  • वाल्मीकि रामायण, उत्तरकाण्ड— अगस्त्य जी द्वारा सुनाया गया बाल हनुमान, देवताओं के वरदान और मुनियों के शाप का वृत्तांत। हरि प्रसाद शास्त्री अनुवाद, अध्याय 36 ।
  • वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 66 — जाम्बवान द्वारा हनुमान जी को प्रेरित करना।
  • गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस— किष्किन्धाकाण्ड का अंतिम जाम्बवान–हनुमान संवाद और सुंदरकांड का आरंभिक समुद्र-प्रस्थान प्रसंग। ऊपर दिए भावार्थ सरल हिंदी में प्रस्तुत किए गए हैं।

॥ श्री सीताराम हनुमान ॥

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