आदित्यहृदय स्तोत्र सम्पूर्ण — सभी 31 श्लोक और सरल हिन्दी अर्थ

भक्ति भावना • सूर्य उपासना

श्रीआदित्यहृदय स्तोत्र

सम्पूर्ण ३१ श्लोक

मूल संस्कृत पाठ • प्रत्येक श्लोक का सरल हिन्दी अर्थ

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अगस्त्य ऋषि का श्रीराम को उपदेश

आदित्यहृदय स्तोत्र वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड का सूर्यदेव की महिमा से युक्त पावन प्रसंग है। रावण से युद्ध करते हुए श्रीराम थके और चिन्तामग्न खड़े थे। तब अगस्त्य ऋषि ने उन्हें सूर्यदेव की सर्वव्यापक शक्ति का स्मरण कराया और आदित्यहृदय का उपदेश दिया।

इस स्तोत्र में सूर्य को जगत के पोषण, प्रकाश, ऋतुचक्र, चेतना और समस्त देवशक्तियों के व्यापक आधार के रूप में वन्दन किया गया है। उपदेश सुनकर श्रीराम का शोक दूर हुआ और वे धैर्य तथा उत्साह के साथ अपने कर्तव्य के लिए आगे बढ़े।

यहाँ आरम्भिक प्रसंग और समापन सहित सभी 31 श्लोक, प्रत्येक के सरल हिन्दी अर्थ के साथ दिए गए हैं।

रणभूमि का प्रसंग और अगस्त्य का आगमन

श्लोक 1

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् । रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम् ॥ १॥

सरल हिन्दी अर्थ: युद्ध से थके हुए श्रीराम रणभूमि में चिन्तामग्न खड़े थे। उन्होंने देखा कि रावण फिर युद्ध के लिए उनके सामने उपस्थित है।

श्लोक 2

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् । उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवानृषिः ॥ २॥

सरल हिन्दी अर्थ: देवताओं के साथ युद्ध देखने आए भगवान अगस्त्य ऋषि श्रीराम के पास पहुँचे और उनसे इस प्रकार बोले।

अगस्त्य ऋषि का उपदेश और स्तोत्र की महिमा

श्लोक 3

राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम् । येन सर्वानरीन्वत्स समरे विजयिष्यसि ॥ ३॥

सरल हिन्दी अर्थ: हे राम! हे महाबाहु राम! हे वत्स! इस सनातन और गूढ़ उपदेश को सुनो, जिसके द्वारा तुम युद्ध में सभी शत्रुओं पर विजय प्राप्त करोगे।

श्लोक 4

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् । जयावहं जपेन्नित्यमक्षयं परमं शिवम् ॥ ४॥

सरल हिन्दी अर्थ: आदित्यहृदय पुण्यदायक, शत्रुओं का नाश करने वाला और विजय प्रदान करने वाला स्तोत्र है। इसका नित्य जप करना चाहिए; यह अक्षय और परम कल्याणकारी कहा गया है।

श्लोक 5

सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम् । चिन्ताशोकप्रशमनं आयुर्वर्धनमुत्तमम् ॥ ५॥

सरल हिन्दी अर्थ: यह सभी मंगलों में श्रेष्ठ मंगलकारी, पापों का नाश करने वाला तथा चिन्ता और शोक को शान्त करने वाला है। स्तोत्र की महिमा में इसे उत्तम और आयु बढ़ाने वाला कहा गया है।

सूर्यदेव के विश्वव्यापक स्वरूप का वर्णन

श्लोक 6

रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् । पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ॥ ६॥

सरल हिन्दी अर्थ: किरणों से सुशोभित, उदित होते हुए, देवताओं और असुरों द्वारा नमस्कृत विवस्वान सूर्यदेव की पूजा करो। वे प्रकाश देने वाले भास्कर और समस्त लोकों के स्वामी हैं।

श्लोक 7

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः । एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः ॥ ७॥

सरल हिन्दी अर्थ: ये सूर्यदेव सभी देवताओं के स्वरूप को धारण करने वाले, तेजस्वी और अपनी किरणों से जगत का पोषण करने वाले हैं। ये किरणों के द्वारा देवताओं, असुरों और सभी लोकों की रक्षा करते हैं।

श्लोक 8

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः । महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः ॥ ८॥

सरल हिन्दी अर्थ: इन्हीं में ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द और प्रजापति का स्वरूप देखा गया है। इन्द्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा और जल के स्वामी वरुण की शक्तियाँ भी इन्हीं में समाहित मानी गई हैं।

श्लोक 9

पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः । वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः ॥ ९॥

सरल हिन्दी अर्थ: पितर, वसु, साध्यगण, अश्विनीकुमार, मरुद्गण और मनु के रूप में भी इन्हीं का वन्दन है। ये वायु, अग्नि, प्रजाओं के प्राण, ऋतुओं की व्यवस्था करने वाले और प्रकाश देने वाले प्रभाकर हैं।

श्लोक 10

आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान् । सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः ॥ १०॥

सरल हिन्दी अर्थ: ये अदिति के पुत्र आदित्य, जगत को प्रेरित करने वाले सविता, सूर्य, आकाश में विचरने वाले खग, पोषण करने वाले पूषा और किरणों से सम्पन्न गभस्तिमान हैं। स्वर्ण जैसी कान्ति वाले भानु, तेजोमय सृष्टिबीज वाले हिरण्यरेता और दिन बनाने वाले दिवाकर भी यही हैं।

श्लोक 11

हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान् । तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्ताण्ड अंशुमान् ॥ ११॥

सरल हिन्दी अर्थ: ये हरितवर्ण अश्वों वाले हरिदश्व, सहस्र किरणों वाले सहस्रार्चि, सात घोड़ों वाले सप्तसप्ति और किरणमय मरीचिमान हैं। अन्धकार का नाश करने वाले, कल्याण के स्रोत, रूपों की रचना करने वाले त्वष्टा, मार्ताण्ड और अंशुमान भी यही हैं।

श्लोक 12

हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः । अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः ॥ १२॥

सरल हिन्दी अर्थ: ये हिरण्यगर्भ, शीतलता के आधार, ताप और प्रकाश देने वाले भास्कर तथा रवि हैं। अग्नितेज को धारण करने वाले, अदिति के पुत्र और शीत का नाश करने वाले देवता हैं। यहाँ सूर्य के विविध नामों से उनके पोषक और तापकारी रूपों का स्मरण किया गया है।

श्लोक 13

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः । घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथी प्लवङ्गमः ॥ १३॥

सरल हिन्दी अर्थ: ये आकाश के स्वामी, अन्धकार को भेदने वाले और ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद के तत्त्व को जानने वाले हैं। वर्षा के कारण, जल के मित्र और विन्ध्य के मार्ग को पार करते हुए आकाश में विचरने वाले हैं।

श्लोक 14

आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः । कविर्विश्वो महातेजाः रक्तः सर्वभवोद्भवः ॥ १४॥

सरल हिन्दी अर्थ: ये ताप देने वाले, मण्डलरूप, काल के रूप में संहार करने वाले, पिंगलवर्ण और सबको उष्णता देने वाले हैं। ये सर्वज्ञ, विश्वरूप, महान तेज वाले, रक्तवर्ण और समस्त उत्पत्ति के आधार हैं।

श्लोक 15

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः । तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्नमोऽस्तु ते ॥ १५॥

सरल हिन्दी अर्थ: नक्षत्रों, ग्रहों और तारों के अधिपति तथा विश्व का पोषण करने वाले सूर्यदेव को नमस्कार है। हे तेजस्वियों में भी परम तेजस्वी और बारह आदित्यरूपों में प्रकट होने वाले देव! आपको प्रणाम है।

आदित्यदेव को नमस्कार

श्लोक 16

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः । ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः ॥ १६॥

सरल हिन्दी अर्थ: पूर्व और पश्चिम के पर्वतों के रूप में प्रतिष्ठित आपको नमस्कार है। समस्त ज्योतियों के स्वामी और दिन के अधिपति को प्रणाम है। यहाँ उदय और अस्त की दिशाओं सहित सूर्य की व्यापक महिमा का वन्दन है।

श्लोक 17

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः । नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः ॥ १७॥

सरल हिन्दी अर्थ: विजय और विजय से उत्पन्न कल्याण देने वाले, हरितवर्ण अश्वों से युक्त देवता को बारम्बार नमस्कार है। हे सहस्र किरणों वाले आदित्य! आपको बार-बार प्रणाम है।

श्लोक 18

नम उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः । नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः ॥ १८॥

सरल हिन्दी अर्थ: उग्र, पराक्रमी और विविध कान्तियों से सम्पन्न सूर्यदेव को नमस्कार है। कमलों को खिलाने वाले और मार्ताण्ड नाम से प्रसिद्ध देवता को बारम्बार प्रणाम है।

श्लोक 19

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे । भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः ॥ १९॥

सरल हिन्दी अर्थ: ब्रह्मा, ईशान अर्थात् शिव और अच्युत अर्थात् विष्णु के भी अधिष्ठाता रूप में वन्दित सूर्यदेव को प्रणाम है। प्रकाशमान, आदित्यतेज से सम्पन्न, सबको अपने में समेट लेने वाले और रौद्र स्वरूप वाले देव को नमस्कार है।

श्लोक 20

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने । कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः ॥ २०॥

सरल हिन्दी अर्थ: अन्धकार, शीत और शत्रुओं का नाश करने वाले, अपरिमित स्वरूप वाले देव को नमस्कार है। कृतघ्नों का दमन करने वाले तथा सभी ज्योतियों के स्वामी को प्रणाम है।

श्लोक 21

तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे । नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥ २१॥

सरल हिन्दी अर्थ: तपे हुए सोने जैसी कान्ति वाले, अग्निस्वरूप और विश्व की रचना करने वाले को नमस्कार है। अन्धकार का विनाश करने वाले प्रकाशस्वरूप तथा समस्त लोकों के साक्षी को प्रणाम है।

जगत का आधार और कर्मों का साक्षी

श्लोक 22

नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः । पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ॥ २२॥

सरल हिन्दी अर्थ: ये प्रभु ही प्राणियों का संहार करते और फिर उनकी सृष्टि करते हैं। अपनी किरणों से जल ग्रहण करते, ताप देते और वर्षा कराते हैं। स्तोत्र में प्रकृति के सृजन, पोषण और परिवर्तन का आधार सूर्यशक्ति को कहा गया है।

श्लोक 23

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः । एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ॥ २३॥

सरल हिन्दी अर्थ: सभी प्राणियों में स्थित यह शक्ति उनके सो जाने पर भी जागती रहती है। यही अग्निहोत्र का स्वरूप और अग्निहोत्र करने वालों को मिलने वाला फल भी है।

श्लोक 24

वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च । यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः ॥ २४॥

सरल हिन्दी अर्थ: वेद, यज्ञ और यज्ञों के फल—सभी में इन्हीं प्रभु रवि का स्वरूप माना गया है। लोक में जितने कर्तव्य और कर्म हैं, उनका आधार भी यही व्यापक शक्ति है।

फलश्रुति, उपदेश और श्रीराम का उत्साह

श्लोक 25

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च । कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ॥ २५॥

सरल हिन्दी अर्थ: हे राघव! विपत्ति, कठिनाई, निर्जन वन और भय के अवसर पर इनका कीर्तन करने वाला मनुष्य मन से टूटता नहीं है। यह श्लोक संकट में स्मरण, धैर्य और श्रद्धा बनाए रखने का सन्देश देता है।

श्लोक 26

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम् । एतत् त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥ २६॥

सरल हिन्दी अर्थ: एकाग्र होकर इन देवाधिदेव, जगत के स्वामी की पूजा करो। अगस्त्य ऋषि श्रीराम से कहते हैं कि इस स्तोत्र का तीन बार जप करके तुम युद्ध में विजय प्राप्त करोगे।

श्लोक 27

अस्मिन्क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि । एवमुक्त्वा तदाऽगस्त्यो जगाम च यथागतम् ॥ २७॥

सरल हिन्दी अर्थ: हे महाबाहु! अब तुम रावण का वध करोगे। इस प्रकार श्रीराम को उपदेश देकर अगस्त्य ऋषि जैसे आए थे, वैसे ही वापस चले गए।

श्लोक 28

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्तदा । धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान् ॥ २८॥

सरल हिन्दी अर्थ: यह उपदेश सुनकर महातेजस्वी श्रीराम का शोक दूर हो गया। वे अत्यन्त प्रसन्न हुए और मन को संयत करके इस उपदेश को हृदय में धारण किया।

श्लोक 29

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान् । त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥ २९॥

सरल हिन्दी अर्थ: श्रीराम ने आदित्यदेव का ध्यान करके स्तोत्र का जप किया और परम हर्ष प्राप्त किया। तीन बार आचमन करके शुद्ध हुए वीर श्रीराम ने अपना धनुष उठाया।

श्लोक 30

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत् । सर्व यत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत् ॥ ३०॥

सरल हिन्दी अर्थ: रावण को देखकर प्रसन्नचित्त श्रीराम युद्ध के लिए आगे बढ़े। वे उसके संहार के लिए अपनी सम्पूर्ण शक्ति और प्रयत्न लगाने के दृढ़ निश्चय से खड़े हुए।

श्लोक 31

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः । निशिचरपतिसङ्क्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥ ३१॥

सरल हिन्दी अर्थ: देवताओं के बीच स्थित सूर्यदेव ने प्रसन्न होकर श्रीराम को देखा। राक्षसराज का विनाश निकट जानकर वे अत्यन्त हर्षित हुए और श्रीराम से कहा—अब शीघ्रता करो।

॥ इति आदित्यहृदयं सम्पूर्णम् ॥

सूर्यनारायण भगवान और रघुनाथजी के चरणों में प्रणाम।

स्तोत्र का भाव जीवन में कैसे अपनाएँ?

आदित्यहृदय का प्रसंग कठिन परिस्थिति में स्मरण, एकाग्रता और कर्तव्यनिष्ठा का सन्देश देता है। श्रीराम को मिला उपदेश केवल स्तुति पर समाप्त नहीं होता; वे शोक से उबरकर धनुष उठाते हैं और पूरे प्रयत्न से अपने कर्तव्य में लगते हैं। भक्त भी पाठ का अर्थ समझते हुए श्रद्धा, धैर्य और पुरुषार्थ को अपने जीवन में स्थान दे सकता है।

श्रद्धापूर्वक स्वच्छ और शान्त स्थान पर बैठकर सूर्यनारायण का स्मरण करें। मूल श्लोक स्पष्ट उच्चारण से पढ़ें और साथ दिए अर्थ पर मनन करें। इस प्रसंग में तीन बार जप का निर्देश अगस्त्य ऋषि द्वारा श्रीराम को दिया गया है।

यह पाठ किस ग्रंथ से है?

यह वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड में अगस्त्य–श्रीराम संवाद का आदित्यहृदय पाठ है। सर्ग-संख्या संस्करणों के अनुसार अलग मिलती है; उपलब्ध पाठों में 105 और 107 दोनों क्रम प्रचलित हैं। यहाँ 31 श्लोकों वाला प्रचलित स्तोत्र-पाठ रखा गया है।

पाठाधार और पाठान्तर

मूल पाठ का आधार Sanskrit Documents का “आदित्यहृदयम्” है; रामायण प्रसंग और श्लोकों का मिलान वाल्मीकि रामायण के उपलब्ध संस्कृत पाठ से भी किया गया है। पाठों में “अक्षयं/अक्षय्यं”, “भास्करो/अहस्करो”, “मार्ताण्डाय/प्रचण्डाय” जैसे भेद मिलते हैं। यहाँ मुख्य संस्कृत पाठ में चुने हुए आधार का क्रम बनाए रखा गया है; इसे किसी एक मुद्रित संस्करण की अक्षरशः प्रतिकृति न समझें। हिन्दी अर्थ स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है।

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भक्ति भावना • मूल पाठ और सरल हिन्दी अर्थ

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