श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18: मोक्षसंन्यासयोग — सम्पूर्ण 78 श्लोक हिंदी अर्थ सहित
श्रीमद्भगवद्गीता
अध्याय १८ • मोक्षसंन्यासयोग
अन्तिम अध्याय में संन्यास, त्याग, कर्म, ज्ञान, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख का समग्र विवेचन होता है। स्वधर्म, भक्ति, ईश्वराश्रय और पूर्ण समर्पण के उपदेश के साथ अर्जुन का मोह दूर होता है और संवाद पूर्णता पाता है।
श्लोक १–१०
अध्याय १८ • श्लोक १
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥१८.१॥
सरल हिंदी अर्थ: अर्जुन ने पूछा—हे महाबाहु, हृषीकेश, केशिनिषूदन! मैं संन्यास और त्याग का तत्त्व अलग-अलग जानना चाहता हूँ।
अध्याय १८ • श्लोक २
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः ।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥१८.२॥
सरल हिंदी अर्थ: श्रीभगवान ने कहा—ज्ञानी कामनापूर्ण कर्मों को छोड़ना संन्यास कहते हैं और विवेकी सभी कर्मों के फल का मोह छोड़ना त्याग कहते हैं।
अध्याय १८ • श्लोक ३
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥१८.३॥
सरल हिंदी अर्थ: कुछ मनीषी कर्म को दोषयुक्त मानकर छोड़ने को कहते हैं; अन्य कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप के कर्म नहीं छोड़ने चाहिए।
अध्याय १८ • श्लोक ४
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ॥१८.४॥
सरल हिंदी अर्थ: हे भरतश्रेष्ठ! त्याग के विषय में मेरा निश्चय सुनो। हे पुरुषश्रेष्ठ! त्याग तीन प्रकार का बताया गया है।
अध्याय १८ • श्लोक ५
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥१८.५॥
सरल हिंदी अर्थ: यज्ञ, दान और तप के कर्म नहीं छोड़ने चाहिए; उन्हें करना ही चाहिए। वे बुद्धिमान साधकों को पवित्र करने वाले हैं।
अध्याय १८ • श्लोक ६
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥१८.६॥
सरल हिंदी अर्थ: हे पार्थ! इन कर्मों को भी आसक्ति और फलों की इच्छा छोड़कर करना चाहिए—यह मेरा निश्चित और उत्तम मत है।
अध्याय १८ • श्लोक ७
मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः ॥१८.७॥
सरल हिंदी अर्थ: नियत कर्तव्यकर्म का त्याग उचित नहीं है। मोह के कारण उसे छोड़ना तामस त्याग कहा गया है।
अध्याय १८ • श्लोक ८
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥१८.८॥
सरल हिंदी अर्थ: जो कर्म को केवल दुःखद मानकर शारीरिक कष्ट के भय से छोड़ता है, वह राजस त्याग करता है और वास्तविक त्याग का फल नहीं पाता।
अध्याय १८ • श्लोक ९
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥१८.९॥
सरल हिंदी अर्थ: हे अर्जुन! नियत कर्म को “यह मेरा कर्तव्य है” समझकर, आसक्ति और फल की इच्छा छोड़कर करना सात्त्विक त्याग माना गया है।
अध्याय १८ • श्लोक १०
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥१८.१०॥
सरल हिंदी अर्थ: सत्त्व से युक्त, बुद्धिमान और संशयरहित त्यागी अप्रिय कर्म से द्वेष नहीं करता और प्रिय कर्म में आसक्त नहीं होता।
श्लोक ११–२०
अध्याय १८ • श्लोक ११
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥१८.११॥
सरल हिंदी अर्थ: शरीरधारी के लिए सभी कर्मों को पूरी तरह छोड़ना सम्भव नहीं है। जो कर्मफल की आसक्ति छोड़ता है, वही त्यागी कहलाता है।
अध्याय १८ • श्लोक १२
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥१८.१२॥
सरल हिंदी अर्थ: त्याग न करने वालों को मृत्यु के बाद कर्म का तीन प्रकार का फल मिलता है—अनिष्ट, इष्ट और मिला-जुला। वास्तविक संन्यासियों को ऐसा फल नहीं बाँधता।
अध्याय १८ • श्लोक १३
साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥१८.१३॥
सरल हिंदी अर्थ: हे महाबाहु! सभी कर्मों की सिद्धि के लिए तत्त्वविवेचन में बताए गए पाँच कारण मुझसे जानो।
अध्याय १८ • श्लोक १४
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥१८.१४॥
सरल हिंदी अर्थ: अधिष्ठान अर्थात् कर्म का आधार, कर्ता, अलग-अलग करण, विभिन्न चेष्टाएँ और पाँचवाँ दैव—ये कर्म के कारण हैं।
अध्याय १८ • श्लोक १५
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥१८.१५॥
सरल हिंदी अर्थ: मनुष्य शरीर, वाणी और मन से जो भी कर्म आरम्भ करता है, वह उचित हो या विपरीत, उसके ये पाँच कारण होते हैं।
अध्याय १८ • श्लोक १६
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥१८.१६॥
सरल हिंदी अर्थ: ऐसा होने पर जो अपरिपक्व बुद्धि से केवल आत्मा को ही कर्ता मानता है, वह अविवेकी यथार्थ नहीं देखता।
अध्याय १८ • श्लोक १७
हत्वाऽपि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥१८.१७॥
सरल हिंदी अर्थ: जिसमें अहंकारपूर्ण कर्तापन नहीं और जिसकी बुद्धि कर्म में लिप्त नहीं होती, वह इन लोगों को युद्ध में मारकर भी आत्मदृष्टि से न मारता है, न कर्मबन्धन में पड़ता है।
अध्याय १८ • श्लोक १८
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः ॥१८.१८॥
सरल हिंदी अर्थ: ज्ञान, जानने योग्य वस्तु और जानने वाला—ये कर्म की तीन प्रेरणाएँ हैं। करण, कर्म और कर्ता—ये कर्म के तीन आधार हैं।
अध्याय १८ • श्लोक १९
प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥१८.१९॥
सरल हिंदी अर्थ: गुणों के विवेचन में ज्ञान, कर्म और कर्ता के भी तीन-तीन भेद बताए गए हैं। उन्हें भी यथार्थ सुनो।
अध्याय १८ • श्लोक २०
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥१८.२०॥
सरल हिंदी अर्थ: जिस ज्ञान से सभी प्राणियों में एक अविनाशी भाव को, अनेक रूपों में अविभाजित स्थित देखा जाता है, उसे सात्त्विक जानो।
श्लोक २१–३०
अध्याय १८ • श्लोक २१
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥१८.२१॥
सरल हिंदी अर्थ: जो ज्ञान सभी प्राणियों में अलग-अलग अनेक भावों को ही पृथक्-पृथक् देखता है, उसे राजस जानो।
अध्याय १८ • श्लोक २२
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥१८.२२॥
सरल हिंदी अर्थ: जो बिना युक्ति के किसी एक सीमित कार्य में ही सम्पूर्ण सत्य मानकर आसक्त है, वास्तविक तत्त्व से रहित और संकीर्ण है, वह ज्ञान तामस है।
अध्याय १८ • श्लोक २३
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥१८.२३॥
सरल हिंदी अर्थ: जो नियत कर्म आसक्ति के बिना, राग-द्वेष छोड़कर और फल की इच्छा के बिना किया जाता है, वह सात्त्विक कहलाता है।
अध्याय १८ • श्लोक २४
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥१८.२४॥
सरल हिंदी अर्थ: जो कर्म कामना की पूर्ति या अहंकार से प्रेरित होकर बहुत परिश्रम के साथ किया जाता है, वह राजस कहलाता है।
अध्याय १८ • श्लोक २५
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥१८.२५॥
सरल हिंदी अर्थ: परिणाम, हानि, हिंसा और अपनी सामर्थ्य का विचार किए बिना मोह से जो कर्म आरम्भ किया जाता है, वह तामस है।
अध्याय १८ • श्लोक २६
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥१८.२६॥
सरल हिंदी अर्थ: जो कर्ता आसक्तिरहित, अहंकार से मुक्त, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा सफलता-असफलता में निर्विकार रहता है, वह सात्त्विक है।
अध्याय १८ • श्लोक २७
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥१८.२७॥
सरल हिंदी अर्थ: आसक्त, कर्मफल का इच्छुक, लोभी, हिंसक, अशुद्ध और हर्ष-शोक से प्रभावित कर्ता राजस कहा गया है।
अध्याय १८ • श्लोक २८
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥१८.२८॥
सरल हिंदी अर्थ: असंयमित, असंस्कृत, हठी, छलपूर्ण, दूसरों का अहित करने वाला, आलसी, विषादी और टालमटोल करने वाला कर्ता तामस है।
अध्याय १८ • श्लोक २९
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय ॥१८.२९॥
सरल हिंदी अर्थ: हे धनञ्जय! अब बुद्धि और धृति के गुणानुसार तीन प्रकार के भेद अलग-अलग और पूर्ण रूप से सुनो।
अध्याय १८ • श्लोक ३०
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥१८.३०॥
सरल हिंदी अर्थ: हे पार्थ! जो बुद्धि करने और छोड़ने योग्य प्रवृत्ति, कर्तव्य-अकर्तव्य, भय-अभय तथा बन्धन-मोक्ष को सही जानती है, वह सात्त्विक है।
श्लोक ३१–४०
अध्याय १८ • श्लोक ३१
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥१८.३१॥
सरल हिंदी अर्थ: हे पार्थ! जिस बुद्धि से धर्म-अधर्म तथा करने और न करने योग्य कर्म का सही निर्णय नहीं होता, वह राजस है।
अध्याय १८ • श्लोक ३२
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥१८.३२॥
सरल हिंदी अर्थ: हे पार्थ! तम से ढकी जो बुद्धि अधर्म को धर्म मानती है और सभी विषयों का उलटा अर्थ लेती है, वह तामस है।
अध्याय १८ • श्लोक ३३
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥१८.३३॥
सरल हिंदी अर्थ: हे पार्थ! अडिग योग द्वारा जिस धृति से मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को स्थिर रखा जाता है, वह सात्त्विक है।
अध्याय १८ • श्लोक ३४
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥१८.३४॥
सरल हिंदी अर्थ: हे अर्जुन! फल की आकांक्षा और आसक्ति से जिस धृति द्वारा धर्म, अर्थ और काम को पकड़े रखा जाता है, वह राजस है।
अध्याय १८ • श्लोक ३५
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥१८.३५॥
सरल हिंदी अर्थ: हे पार्थ! जिस धृति से दुर्मति व्यक्ति निद्रा, भय, शोक, विषाद और मद को नहीं छोड़ता, वह तामस है।
अध्याय १८ • श्लोक ३६
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥१८.३६॥
सरल हिंदी अर्थ: हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकार का सुख सुनो। जिसके अभ्यास से मनुष्य उसमें रमण करता है और दुःखों का अन्त पाता है—
अध्याय १८ • श्लोक ३७
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥१८.३७॥
सरल हिंदी अर्थ: जो आरम्भ में विष जैसा कठिन लगता है, पर परिणाम में अमृत जैसा है और आत्मबुद्धि की निर्मलता से उत्पन्न होता है, वह सात्त्विक सुख है।
अध्याय १८ • श्लोक ३८
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥१८.३८॥
सरल हिंदी अर्थ: इन्द्रियों और विषयों के संयोग से मिलने वाला जो सुख आरम्भ में अमृत जैसा और परिणाम में विष जैसा है, वह राजस है।
अध्याय १८ • श्लोक ३९
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥१८.३९॥
सरल हिंदी अर्थ: जो आरम्भ और परिणाम दोनों में आत्मा को मोहित करता है तथा निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न है, वह सुख तामस कहा गया है।
अध्याय १८ • श्लोक ४०
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥१८.४०॥
सरल हिंदी अर्थ: पृथ्वी पर या स्वर्ग के देवताओं में भी ऐसा कोई प्राणी नहीं जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीन गुणों से सर्वथा मुक्त हो।
श्लोक ४१–५०
अध्याय १८ • श्लोक ४१
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥१८.४१॥
सरल हिंदी अर्थ: हे परन्तप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार विभाजित किए गए हैं।
अध्याय १८ • श्लोक ४२
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥१८.४२॥
सरल हिंदी अर्थ: मन की शान्ति, इन्द्रिय-संयम, तप, शुद्धता, क्षमा, सरलता, ज्ञान, अनुभूत ज्ञान और आस्तिक भाव ब्राह्मण के स्वभावजनित कर्म हैं।
अध्याय १८ • श्लोक ४३
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥१८.४३॥
सरल हिंदी अर्थ: शौर्य, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्ध से न भागना, दान और नेतृत्वभाव क्षत्रिय के स्वभावजनित कर्म हैं।
अध्याय १८ • श्लोक ४४
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥१८.४४॥
सरल हिंदी अर्थ: कृषि, गोपालन और व्यापार वैश्य के स्वभावजनित कर्म हैं। सेवा-परिचर्या रूप कर्म शूद्र का स्वभावजनित कर्म है।
अध्याय १८ • श्लोक ४५
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥१८.४५॥
सरल हिंदी अर्थ: अपने-अपने कर्तव्य में तत्पर मनुष्य पूर्णता प्राप्त करता है। अपने कर्म में लगा हुआ वह सिद्धि कैसे पाता है, यह सुनो।
अध्याय १८ • श्लोक ४६
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥१८.४६॥
सरल हिंदी अर्थ: जिससे प्राणियों की प्रवृत्ति होती है और जिससे यह समस्त जगत व्याप्त है, अपने कर्म द्वारा उसकी आराधना करके मनुष्य सिद्धि पाता है।
अध्याय १८ • श्लोक ४७
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥१८.४७॥
सरल हिंदी अर्थ: अपने धर्म का कमी के साथ पालन भी दूसरे के धर्म के उत्तम पालन से श्रेष्ठ है। अपने स्वभाव के अनुरूप नियत कर्म करने से मनुष्य पाप का भागी नहीं बनता।
अध्याय १८ • श्लोक ४८
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥१८.४८॥
सरल हिंदी अर्थ: हे कुन्तीपुत्र! स्वभाव से प्राप्त कर्म में कुछ दोष हों, तब भी उसे नहीं छोड़ना चाहिए। सभी आरम्भ किसी-न-किसी दोष से वैसे ही ढके हैं जैसे अग्नि धुएँ से।
अध्याय १८ • श्लोक ४९
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥१८.४९॥
सरल हिंदी अर्थ: जिसकी बुद्धि कहीं आसक्त नहीं, जिसने मन को जीत लिया और जिसकी लालसा मिट गई, वह संन्यास द्वारा परम निष्कर्मता की सिद्धि पाता है।
अध्याय १८ • श्लोक ५०
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥१८.५०॥
सरल हिंदी अर्थ: हे कुन्तीपुत्र! सिद्धि प्राप्त व्यक्ति ज्ञान की परम निष्ठा द्वारा ब्रह्म को कैसे पाता है, यह मुझसे संक्षेप में जानो।
श्लोक ५१–६०
अध्याय १८ • श्लोक ५१
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥१८.५१॥
सरल हिंदी अर्थ: शुद्ध बुद्धि से युक्त होकर, धैर्य से मन को संयमित करके, शब्द आदि विषयों को त्यागकर और राग-द्वेष हटाकर—
अध्याय १८ • श्लोक ५२
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥१८.५२॥
सरल हिंदी अर्थ: एकान्त का सेवन करने वाला, संयमित आहार वाला, वाणी-शरीर-मन को वश में रखने वाला और वैराग्य का आश्रय लेकर सदा ध्यानयोग में लगा साधक—
अध्याय १८ • श्लोक ५३
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥१८.५३॥
सरल हिंदी अर्थ: अहंकार, बल का अभिमान, दर्प, काम, क्रोध और संग्रह का मोह छोड़कर, ममतारहित तथा शान्त होकर ब्रह्मभाव के योग्य होता है।
अध्याय १८ • श्लोक ५४
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥१८.५४॥
सरल हिंदी अर्थ: ब्रह्मभाव को प्राप्त प्रसन्न साधक न शोक करता है न आकांक्षा; सब प्राणियों में सम होकर वह मेरी परम भक्ति पाता है।
अध्याय १८ • श्लोक ५५
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥१८.५५॥
सरल हिंदी अर्थ: भक्ति से वह मुझे तत्त्वतः जानता है कि मैं कौन हूँ और मेरा स्वरूप क्या है। मुझे तत्त्व से जानकर वह मेरे स्वरूप में प्रवेश करता है।
अध्याय १८ • श्लोक ५६
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥१८.५६॥
सरल हिंदी अर्थ: मेरा आश्रय लेने वाला सदा सभी कर्तव्य करते हुए भी मेरी कृपा से शाश्वत अविनाशी पद प्राप्त करता है।
अध्याय १८ • श्लोक ५७
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥१८.५७॥
सरल हिंदी अर्थ: मन से सभी कर्म मुझे अर्पित करके, मुझे परम लक्ष्य मानकर और समबुद्धि का आश्रय लेकर सदा मुझमें चित्त रखो।
अध्याय १८ • श्लोक ५८
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥१८.५८॥
सरल हिंदी अर्थ: मुझमें चित्त रखने से मेरी कृपा द्वारा सभी कठिनाइयाँ पार करोगे। पर यदि अहंकार से मेरी बात नहीं सुनोगे, तो पतन को प्राप्त होगे।
अध्याय १८ • श्लोक ५९
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥१८.५९॥
सरल हिंदी अर्थ: यदि अहंकार का आश्रय लेकर सोचते हो कि “मैं युद्ध नहीं करूँगा”, तो तुम्हारा यह निश्चय व्यर्थ है; तुम्हारी प्रकृति तुम्हें कर्म में लगाएगी।
अध्याय १८ • श्लोक ६०
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥१८.६०॥
सरल हिंदी अर्थ: हे कुन्तीपुत्र! अपने स्वभावजनित कर्म से बँधे हुए तुम मोह के कारण जो नहीं करना चाहते, उसे भी विवश होकर करोगे।
श्लोक ६१–७०
अध्याय १८ • श्लोक ६१
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥१८.६१॥
सरल हिंदी अर्थ: हे अर्जुन! ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित है और अपनी माया से शरीररूपी यन्त्र पर आरूढ़ प्राणियों को उनके स्वभावानुसार घुमा रहा है।
अध्याय १८ • श्लोक ६२
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥१८.६२॥
सरल हिंदी अर्थ: हे भारत! उसी ईश्वर की सम्पूर्ण भाव से शरण लो। उसकी कृपा से परम शान्ति और शाश्वत स्थान प्राप्त करोगे।
अध्याय १८ • श्लोक ६३
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥१८.६३॥
सरल हिंदी अर्थ: इस प्रकार मैंने तुम्हें गुप्त से भी गुप्त ज्ञान बताया है। इस पर पूरी तरह विचार करो, फिर जैसा उचित चाहो वैसा करो।
अध्याय १८ • श्लोक ६४
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥१८.६४॥
सरल हिंदी अर्थ: अब फिर सबसे गुप्त मेरा परम वचन सुनो। तुम मुझे अत्यन्त प्रिय हो, इसलिए तुम्हारे हित की बात कहूँगा।
अध्याय १८ • श्लोक ६५
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥१८.६५॥
सरल हिंदी अर्थ: मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो और मुझे नमस्कार करो। तुम मुझे ही पाओगे; मैं सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तुम मुझे प्रिय हो।
अध्याय १८ • श्लोक ६६
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥१८.६६॥
सरल हिंदी अर्थ: सभी धर्मों का आश्रय छोड़कर केवल मेरी शरण आओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा; शोक मत करो।
अध्याय १८ • श्लोक ६७
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥१८.६७॥
सरल हिंदी अर्थ: यह उपदेश कभी ऐसे व्यक्ति से न कहना जिसमें तप या भक्ति नहीं, जो सुनना नहीं चाहता अथवा मुझमें दोष देखता है।
अध्याय १८ • श्लोक ६८
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥१८.६८॥
सरल हिंदी अर्थ: जो मुझमें परम भक्ति रखकर मेरे भक्तों को यह परम रहस्य बताएगा, वह निःसंदेह मुझे ही प्राप्त होगा।
अध्याय १८ • श्लोक ६९
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥१८.६९॥
सरल हिंदी अर्थ: मनुष्यों में उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला कोई नहीं है और पृथ्वी पर उससे अधिक प्रिय दूसरा कोई नहीं होगा।
अध्याय १८ • श्लोक ७०
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥१८.७०॥
सरल हिंदी अर्थ: जो हमारे इस धर्ममय संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा ज्ञानयज्ञ से मेरी उपासना होगी—यह मेरा मत है।
श्लोक ७१–७८
अध्याय १८ • श्लोक ७१
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥१८.७१॥
सरल हिंदी अर्थ: जो मनुष्य श्रद्धा और दोषदृष्टि के अभाव से इसे केवल सुनेगा भी, वह भी मुक्त होकर पुण्यकर्मियों के शुभ लोक प्राप्त करेगा।
अध्याय १८ • श्लोक ७२
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ॥१८.७२॥
सरल हिंदी अर्थ: हे पार्थ! क्या तुमने इसे एकाग्र चित्त से सुना? हे धनञ्जय! क्या तुम्हारा अज्ञान से उत्पन्न मोह नष्ट हुआ?
अध्याय १८ • श्लोक ७३
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥१८.७३॥
सरल हिंदी अर्थ: अर्जुन ने कहा—हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हुआ और मुझे अपने कर्तव्य का स्मरण मिल गया है। मेरा संशय दूर है; मैं स्थिर हूँ और आपकी बात का पालन करूँगा।
अध्याय १८ • श्लोक ७४
संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥१८.७४॥
सरल हिंदी अर्थ: संजय ने कहा—इस प्रकार मैंने वासुदेव और महात्मा अर्जुन का यह अद्भुत, रोमांचकारी संवाद सुना।
अध्याय १८ • श्लोक ७५
योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥१८.७५॥
सरल हिंदी अर्थ: व्यासजी की कृपा से मैंने योगेश्वर श्रीकृष्ण से, जो स्वयं उपदेश दे रहे थे, यह परम गुप्त योग प्रत्यक्ष सुना।
अध्याय १८ • श्लोक ७६
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥१८.७६॥
सरल हिंदी अर्थ: हे राजन्! श्रीकृष्ण और अर्जुन के इस अद्भुत तथा पवित्र संवाद को बार-बार स्मरण करके मैं बार-बार आनन्दित होता हूँ।
अध्याय १८ • श्लोक ७७
विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ॥१८.७७॥
सरल हिंदी अर्थ: हे राजन्! भगवान हरि के उस अत्यन्त अद्भुत रूप का बार-बार स्मरण करके मुझे महान विस्मय होता है और मैं पुनः-पुनः हर्षित होता हूँ।
अध्याय १८ • श्लोक ७८
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥१८.७८॥
सरल हिंदी अर्थ: जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन हैं, वहाँ श्री, विजय, समृद्धि और अडिग नीति है—यह मेरा मत है।
अध्याय का सार
- कर्म का विवेकपूर्वक पालन और फलासक्ति का त्याग करें।
- अपने स्वभावानुकूल धर्म में स्थिर रहकर साधना करें।
- अनन्य ईश्वराश्रय, भक्ति और समर्पण संवाद की पूर्णता हैं।
॥ मोक्षसंन्यासयोग — अध्याय १८ सम्पूर्ण ॥
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