गजेन्द्रमोक्ष सम्पूर्ण — 92 श्लोक, कथा और स्तुति हिन्दी अर्थ सहित

भक्ति भावना • श्रीहरि की शरणागति

श्रीगजेन्द्रमोक्ष

सम्पूर्ण कथा और स्तुति

श्रीमद्भागवत • अष्टम स्कन्ध • अध्याय २–४ • सभी ९२ श्लोक

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जब गजराज ने परम आश्रय को पुकारा

श्रीमद्भागवत में गजेन्द्रमोक्ष शरणागति और भगवान की करुणा का पावन प्रसंग है। अपने बल और परिवार की सहायता से भी ग्राह की पकड़ से न छूट पाने पर गजराज ने परमेश्वर का स्मरण किया। पूर्वजन्म की भक्ति जागी और उसने हृदय से प्रभु की स्तुति की। श्रीहरि गरुड़ पर आए और अपने भक्त का उद्धार किया।

इस प्रकाशन में अष्टम स्कन्ध के दूसरे, तीसरे और चौथे अध्यायों का पूरा मूल पाठ दिया गया है। त्रिकूट पर्वत और सरोवर का वर्णन, गज-ग्राह संघर्ष, गजेन्द्र की स्तुति, भगवान का आगमन, पूर्वजन्म का प्रसंग और फलश्रुति—सभी 92 श्लोक प्रत्येक के सरल हिन्दी अर्थ सहित साथ हैं।

अध्याय 2 में 33, अध्याय 3 में 33 और अध्याय 4 में 26 श्लोक हैं। मुख्य गजेन्द्र-स्तुति अध्याय 3 में आती है। श्लोक-संख्या अपने मूल अध्याय के अनुसार रखी गई है।

अध्याय 2 • त्रिकूट पर्वत, सरोवर और गज-ग्राह संघर्ष

श्रीमद्भागवत • अष्टम स्कन्ध • 33 श्लोक

श्लोक 8.2.1

श्रीशुक उवाच । आसीद्गिरिवरो राजंस्त्रिकूट इति विश्रुतः । क्षीरोदेनावृतः श्रीमान् योजनायुतमुच्छ्रितः ॥ १॥

सरल हिन्दी अर्थ: श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! क्षीरसागर से घिरा हुआ त्रिकूट नाम का एक अत्यन्त सुन्दर और विशाल पर्वत था। उसकी ऊँचाई दस हजार योजन कही गई है।

श्लोक 8.2.2

तावता विस्तृतः पर्यक् त्रिभिः श‍ृङ्गैः पयोनिधिम् । दिशः खं रोचयन्नास्ते रौप्यायसहिरण्मयैः ॥ २॥

सरल हिन्दी अर्थ: वह पर्वत उतने ही विस्तार वाला था। चाँदी, लोहे और सोने के तीन शिखरों से वह समुद्र, दिशाओं और आकाश को प्रकाशित करता था।

श्लोक 8.2.3

अन्यैश्च ककुभः सर्वा रत्नधातुविचित्रितैः । नानाद्रुमलतागुल्मैर्निर्घोषैर्निर्झराम्भसाम् ॥ ३॥

सरल हिन्दी अर्थ: उसके दूसरे शिखर भी अनेक रत्नों और धातुओं से विचित्र शोभा पाते थे। विविध वृक्ष, लताएँ, झाड़ियाँ और झरनों की ध्वनि सभी दिशाओं को सुशोभित करती थीं।

श्लोक 8.2.4

स चावनिज्यमानाङ्घ्रिः समन्तात्पयऊर्मिभिः । करोति श्यामलां भूमिं हरिण्मरकताश्मभिः ॥ ४॥

सरल हिन्दी अर्थ: समुद्र की लहरें चारों ओर से उसके चरणों को धोती थीं। हरी मणियों और मरकत पत्थरों की कान्ति से आसपास की भूमि हरी-श्याम दिखाई देती थी।

श्लोक 8.2.5

सिद्धचारणगन्धर्वविद्याधरमहोरगैः । किन्नरैरप्सरोभिश्च क्रीडद्भिर्जुष्टकन्दरः ॥ ५॥

सरल हिन्दी अर्थ: उसकी गुफाओं में सिद्ध, चारण, गन्धर्व, विद्याधर, महानाग, किन्नर और अप्सराएँ विहार करती थीं। उनकी उपस्थिति से वे कन्दराएँ रमणीय थीं।

श्लोक 8.2.6

यत्र सङ्गीतसन्नादैर्नदद्गुहममर्षया । अभिगर्जन्ति हरयः श्लाघिनः परशङ्कया ॥ ६॥

सरल हिन्दी अर्थ: उनके संगीत की ध्वनि से गुफाएँ गूँज उठती थीं। अपने बल पर गर्व करने वाले सिंह उसे दूसरे सिंहों की गर्जना समझकर ईर्ष्या से प्रत्युत्तर में गरजते थे।

श्लोक 8.2.7

नानारण्यपशुव्रातसङ्कुलद्रोण्यलङ्कृतः । चित्रद्रुमसुरोद्यानकलकण्ठविहङ्गमः ॥ ७॥

सरल हिन्दी अर्थ: पर्वत की घाटियाँ अनेक वन्य पशुओं के समूहों से भरी थीं। विचित्र वृक्षों वाले दिव्य उद्यानों में मधुर स्वर वाले पक्षी रहते थे।

श्लोक 8.2.8

सरित्सरोभिरच्छोदैः पुलिनैर्मणिवालुकैः । देवस्त्रीमज्जनामोदसौरभाम्ब्वनिलैर्युतः ॥ ८॥

सरल हिन्दी अर्थ: वहाँ निर्मल जल की नदियाँ और सरोवर, मणियों की रेत वाले तट तथा देवांगनाओं के स्नान से सुगन्धित जल और वायु थे।

श्लोक 8.2.9

तस्य द्रोण्यां भगवतो वरुणस्य महात्मनः । उद्यानमृतुमन्नाम आक्रीडं सुरयोषिताम् ॥ ९॥

सरल हिन्दी अर्थ: उस पर्वत की घाटी में महात्मा वरुणदेव का ऋतुमान नाम का उद्यान था। वह देवांगनाओं के विहार का स्थान था।

श्लोक 8.2.10

सर्वतोऽलङ्कृतं दिव्यैर्नित्यं पुष्पफलद्रुमैः । मन्दारैः पारिजातैश्च पाटलाशोकचम्पकैः ॥ १०॥

सरल हिन्दी अर्थ: उद्यान चारों ओर से सदा फूल और फल देने वाले दिव्य वृक्षों से सुशोभित था। वहाँ मन्दार, पारिजात, पाटल, अशोक और चम्पा आदि वृक्ष थे।

श्लोक 8.2.11

चूतैः प्रियालैः पनसैराम्रैराम्रातकैरपि । क्रमुकैर्नालिकेरैश्च खर्जूरैर्बीजपूरकैः ॥ ११॥

सरल हिन्दी अर्थ: वहाँ आम, प्रियाल, कटहल, आम्रातक, सुपारी, नारियल, खजूर और बिजौरा नींबू आदि के वृक्ष भी थे। श्लोक में उस उद्यान की फल-समृद्धि का वर्णन है।

श्लोक 8.2.12

मधूकैः शालतालैश्च तमालैरसनार्जुनैः । अरिष्टोदुम्बरप्लक्षैर्वटैः किंशुकचन्दनैः ॥ १२॥

सरल हिन्दी अर्थ: महुआ, शाल, ताड़, तमाल, असन, अर्जुन, नीम, गूलर, पाकड़, बरगद, पलाश और चन्दन के वृक्ष भी उद्यान को सुशोभित करते थे।

श्लोक 8.2.13

पिचुमन्दैः कोविदारैः सरलैः सुरदारुभिः । द्राक्षेक्षुरम्भाजम्बूभिर्बदर्यक्षाभयामलैः ॥ १३॥

सरल हिन्दी अर्थ: वहाँ पिचुमन्द, कोविदार, सरल और देवदारु के साथ अंगूर, ईख, केले, जामुन, बेर, बहेड़ा, हरड़ और आँवले आदि भी थे।

श्लोक 8.2.14

बिल्वैः कपित्थैर्जम्बीरैर्वृतो भल्लातकादिभिः । तस्मिन् सरः सुविपुलं लसत्काञ्चनपङ्कजम् ॥ १४॥

सरल हिन्दी अर्थ: बेल, कैथ, जम्बीर और भिलावा आदि वृक्षों से घिरे उस उद्यान में एक बहुत विशाल सरोवर था। उसमें स्वर्ण के समान चमकते कमल खिले थे।

श्लोक 8.2.15

कुमुदोत्पलकह्लारशतपत्रश्रियोर्जितम् । मत्तषट्पदनिर्घुष्टं शकुन्तैश्च कलस्वनैः ॥ १५॥

सरल हिन्दी अर्थ: कुमुद, उत्पल, कह्लार और शतपत्र कमलों की शोभा से वह सरोवर सम्पन्न था। मतवाले भौंरों की गुनगुनाहट और पक्षियों के मधुर स्वर वहाँ सुनाई देते थे।

श्लोक 8.2.16

हंसकारण्डवाकीर्णं चक्राह्वैः सारसैरपि । जलकुक्कुटकोयष्टिदात्यूहकुलकूजितम् ॥ १६॥

सरल हिन्दी अर्थ: हंस, कारण्डव, चक्रवाक, सारस, जलकुक्कुट, कोयष्टि और दात्यूह आदि जलपक्षियों के समूह सरोवर में रहते और कलरव करते थे।

श्लोक 8.2.17

मत्स्यकच्छपसञ्चारचलत्पद्मरजःपयः । कदम्बवेतसनलनीपवञ्जुलकैर्वृतम् ॥ १७॥

सरल हिन्दी अर्थ: मछलियों और कछुओं के विचरण से कमलों की परागयुक्त जलराशि हिलती रहती थी। उसके चारों ओर कदम्ब, बेंत, नरकट, नीप और वञ्जुल आदि थे।

श्लोक 8.2.18

कुन्दैः कुरबकाशोकैः शिरीषैः कुटजेङ्गुदैः । कुब्जकैः स्वर्णयूथीभिर्नागपुन्नागजातिभिः ॥ १८॥

सरल हिन्दी अर्थ: तट पर कुन्द, कुरबक, अशोक, शिरीष, कुटज, इंगुद, कुब्जक, स्वर्णयूथी, नाग, पुन्नाग और जाति आदि पुष्पवृक्ष और लताएँ थीं।

श्लोक 8.2.19

मल्लिकाशतपत्रैश्च माधवीजालकादिभिः । शोभितं तीरजैश्चान्यैर्नित्यर्तुभिरलं द्रुमैः ॥ १९॥

सरल हिन्दी अर्थ: चमेली, शतपत्र, माधवी लताओं और किनारे पर उगे दूसरे वृक्षों से सरोवर सुशोभित था। वहाँ सभी ऋतुओं की रमणीयता मानो एक साथ बनी रहती थी।

श्लोक 8.2.20

तत्रैकदा तद्गिरिकाननाश्रयः करेणुभिर्वारणयूथपश्चरन् । सकण्टकान् कीचकवेणुवेत्रव- द्विशालगुल्मं प्ररुजन् वनस्पतीन् ॥ २०॥

सरल हिन्दी अर्थ: एक दिन उस पर्वतीय वन में रहने वाला हाथियों का सरदार अपनी हथिनियों के साथ विचरता हुआ आया। वह काँटेदार बाँस, बेंत और बड़े-बड़े झुरमुटों तथा वृक्षों को तोड़ता चलता था।

श्लोक 8.2.21

यद्गन्धमात्राद्धरयो गजेन्द्रा व्याघ्रादयो व्यालमृगाः सखड्गाः । महोरगाश्चापि भयाद्द्रवन्ति सगौरकृष्णाः शरभाश्चमर्यः ॥ २१॥

सरल हिन्दी अर्थ: उसकी गन्ध मात्र से सिंह, दूसरे बड़े हाथी, बाघ, गैंडे, बड़े सर्प, गौर, कृष्णमृग, शरभ और चँवरी गाय आदि भय से भाग जाते थे।

श्लोक 8.2.22

वृका वराहा महिषर्क्षशल्या गोपुच्छसालावृकमर्कटाश्च । अन्यत्र क्षुद्रा हरिणाः शशादय- श्चरन्त्यभीता यदनुग्रहेण ॥ २२॥

सरल हिन्दी अर्थ: भेड़िए, सूअर, भैंसे, भालू, साही और वानर आदि भी उससे डरते थे। दूसरी ओर छोटे हिरन और खरगोश जैसे दुर्बल जीव उसके संरक्षण में निर्भय होकर विचरते थे।

श्लोक 8.2.23

स घर्मतप्तः करिभिः करेणुभि- र्वृतो मदच्युत्करभैरनुद्रुतः । गिरिं गरिम्णा परितः प्रकम्पयन् निषेव्यमाणोऽलिकुलैर्मदाशनैः ॥ २३॥

सरल हिन्दी अर्थ: गर्मी से तपता हुआ वह गजराज हाथियों, हथिनियों और बच्चों से घिरा चलता था। उसके मदजल का रस लेने वाले भौंरे उसके चारों ओर मँडराते थे; उसकी भारी चाल से पर्वतभूमि काँपती थी।

श्लोक 8.2.24

सरोऽनिलं पङ्कजरेणुरूषितं जिघ्रन् विदूरान्मदविह्वलेक्षणः । वृतः स्वयूथेन तृषार्दितेन तत् सरोवराभ्याशमथागमद्द्रुतम् ॥ २४॥

सरल हिन्दी अर्थ: दूर से ही उसने कमलों के पराग से सुगन्धित सरोवर की हवा सूँघी। प्यास से पीड़ित अपने समूह को साथ लेकर वह शीघ्र सरोवर के पास पहुँचा।

श्लोक 8.2.25

विगाह्य तस्मिन्नमृताम्बु निर्मलं हेमारविन्दोत्पलरेणुवासितम् । पपौ निकामं निजपुष्करोद्धृत- मात्मानमद्भिः स्नपयन् गतक्लमः ॥ २५॥

सरल हिन्दी अर्थ: सरोवर में उतरकर उसने कमलों की सुगन्ध से युक्त अमृत के समान निर्मल जल पिया। सूँड़ से जल उठाकर अपने शरीर पर डाला और थकान दूर की।

श्लोक 8.2.26

स्वपुष्करेणोद्धृतशीकराम्बुभि- र्निपाययन् संस्नपयन् यथा गृही । घृणी करेणुः कलभांश्च दुर्मदो नाचष्ट कृच्छ्रं कृपणोऽजमायया ॥ २६॥

सरल हिन्दी अर्थ: जैसे गृहस्थ स्नेह से अपने परिवार की सेवा करता है, वैसे ही वह अपनी सूँड़ से हथिनियों और बच्चों को जल पिलाने तथा नहलाने लगा। आनन्द और मद में डूबा होने से वह आने वाले संकट को नहीं देख पाया।

श्लोक 8.2.27

तं तत्र कश्चिन्नृप दैवचोदितो ग्राहो बलीयांश्चरणे रुषाग्रहीत् । यदृच्छयैवं व्यसनं गतो गजो यथाबलं सोऽतिबलो विचक्रमे ॥ २७॥

सरल हिन्दी अर्थ: राजन्! तभी प्रारब्ध की प्रेरणा से एक बलवान ग्राह ने क्रोधपूर्वक उसका पैर पकड़ लिया। अचानक संकट में पड़ा अत्यन्त बलशाली गजराज अपनी पूरी शक्ति से छूटने का प्रयत्न करने लगा।

श्लोक 8.2.28

तथाऽऽतुरं यूथपतिं करेणवो विकृष्यमाणं तरसा बलीयसा । विचुक्रुशुर्दीनधियोऽपरे गजाः पार्ष्णिग्रहास्तारयितुं न चाशकन् ॥ २८॥

सरल हिन्दी अर्थ: बलवान ग्राह द्वारा खींचे जाते अपने सरदार को देखकर हथिनियाँ व्याकुल होकर चीत्कार करने लगीं। दूसरे हाथियों ने पीछे से पकड़कर उसे खींचा, पर वे उसे छुड़ा नहीं सके।

श्लोक 8.2.29

नियुध्यतोरेवमिभेन्द्रनक्रयो- र्विकर्षतोरन्तरतो बहिर्मिथः । समाः सहस्रं व्यगमन् महीपते सप्राणयोश्चित्रममंसतामराः ॥ २९॥

सरल हिन्दी अर्थ: हाथी बाहर की ओर और ग्राह जल के भीतर की ओर एक-दूसरे को खींचते हुए लड़ते रहे। कथा में उनका यह संघर्ष एक हजार वर्षों तक चलना कहा गया है; देवता भी इसे देखकर आश्चर्य करते थे।

श्लोक 8.2.30

ततो गजेन्द्रस्य मनोबलौजसां कालेन दीर्घेण महानभूद्व्ययः । विकृष्यमाणस्य जलेऽवसीदतो विपर्ययोऽभूत्सकलं जलौकसः ॥ ३०॥

सरल हिन्दी अर्थ: दीर्घकाल तक जल में खिंचते और डूबते रहने से गजेन्द्र का मनोबल, शारीरिक बल और तेज घटने लगा। जल में रहने वाला ग्राह अपनी अनुकूल स्थिति के कारण और बलवान होता गया।

श्लोक 8.2.31

इत्थं गजेन्द्रः स यदाऽऽप सङ्कटं प्राणस्य देही विवशो यदृच्छया । अपारयन्नात्मविमोक्षणे चिरं दध्याविमां बुद्धिमथाभ्यपद्यत ॥ ३१॥

सरल हिन्दी अर्थ: इस प्रकार विवश होकर प्राणसंकट में पड़े गजेन्द्र ने देखा कि बहुत प्रयत्न करने पर भी वह स्वयं को छुड़ा नहीं पा रहा है। तब उसने भीतर विचार किया और एक नए निश्चय पर पहुँचा।

श्लोक 8.2.32

न मामिमे ज्ञातय आतुरं गजाः कुतः करिण्यः प्रभवन्ति मोचितुम् । ग्राहेण पाशेन विधातुरावृतो- ऽप्यहं च तं यामि परं परायणम् ॥ ३२॥

सरल हिन्दी अर्थ: उसने सोचा—मेरे ये हाथी-बन्धु मुझे संकट से नहीं छुड़ा सके, तो हथिनियाँ कैसे छुड़ा पाएँगी? मैं ग्राहरूपी दैव-पाश में बँधा हूँ। अब मैं उस परम आश्रय की शरण लेता हूँ, जो सबका अन्तिम सहारा है।

श्लोक 8.2.33

यः कश्चनेशो बलिनोऽन्तकोरगा- त्प्रचण्डवेगादभिधावतो भृशम् । भीतं प्रपन्नं परिपाति यद्भया- न्मृत्युः प्रधावत्यरणं तमीमहि ॥ ३३॥

सरल हिन्दी अर्थ: जो परमेश्वर प्रचण्ड वेग से आती मृत्यु से डरे हुए शरणागत की रक्षा करते हैं और जिनके भय से मृत्यु भी दूर भागती है, मैं उन्हीं सर्वशरणदाता प्रभु का आश्रय ग्रहण करता हूँ।

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां अष्टमस्कन्धे मन्वन्तरानुवर्णने गजेन्द्रोपाख्याने द्वितीयोऽध्यायः ॥ २॥

अध्याय 3 • गजेन्द्र की स्तुति और भगवान का आगमन

श्रीमद्भागवत • अष्टम स्कन्ध • 33 श्लोक

श्लोक 8.3.1

श्रीशुक उवाच । एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि । जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम् ॥ १॥

सरल हिन्दी अर्थ: श्रीशुकदेवजी कहते हैं—ऐसा निश्चय करके गजेन्द्र ने मन को हृदय में एकाग्र किया। उसने वह परम पवित्र स्तोत्र जपा, जिसे उसने पूर्वजन्म में सीखा था।

श्लोक 8.3.2

गजेन्द्र उवाच । ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम् । पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि ॥ २॥

सरल हिन्दी अर्थ: गजेन्द्र ने कहा—जिनसे यह शरीर और जगत चेतना पाते हैं, उन परम भगवान को नमस्कार है। मैं आदिकारण, परम पुरुष और सबके स्वामी का ध्यान करता हूँ।

श्लोक 8.3.3

यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयम् । योऽस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम् ॥ ३॥

सरल हिन्दी अर्थ: जिनमें यह जगत स्थित है, जिनसे उत्पन्न हुआ है, जिनके द्वारा प्रकाशित है और जो स्वयं इसके व्यापक आधार हैं—प्रकट तथा अप्रकट प्रकृति से भी परे उन स्वयम्भू प्रभु की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 8.3.4

यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितं क्वचिद्विभातं क्व च तत्तिरोहितम् । अविद्धदृक्साक्ष्युभयं तदीक्षते स आत्ममूलोऽवतु मां परात्परः ॥ ४॥

सरल हिन्दी अर्थ: अपनी माया से अपने ही भीतर कभी प्रकट और कभी लीन होते इस जगत को जो अविचल ज्ञान से साक्षी होकर देखते हैं, वे स्वयं अपने आधार और परम से भी परम प्रभु मेरी रक्षा करें।

श्लोक 8.3.5

कालेन पञ्चत्वमितेषु कृत्स्नशो लोकेषु पालेषु च सर्वहेतुषु । तमस्तदासीद्गहनं गभीरं यस्तस्य पारेऽभिविराजते विभुः ॥ ५॥

सरल हिन्दी अर्थ: जब काल के प्रभाव से सभी लोक, उनके पालक और उनके कारण लीन हो जाते हैं, तब गहन अन्धकार रह जाता है। उस अन्धकार से भी परे जो सर्वव्यापक प्रभु प्रकाशित रहते हैं, उन्हीं का मैं आश्रय लेता हूँ।

श्लोक 8.3.6

न यस्य देवा ऋषयः पदं विदु- र्जन्तुः पुनः कोऽर्हति गन्तुमीरितुम् । यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतो दुरत्ययानुक्रमणः स मावतु ॥ ६॥

सरल हिन्दी अर्थ: जिनके वास्तविक स्वरूप को देवता और ऋषि भी पूरी तरह नहीं जानते, उनके विषय में साधारण प्राणी कैसे जान या वर्णन कर सकता है? अनेक वेशों में अभिनय करने वाले नट के समान जिनकी लीला को समझना कठिन है, वे मेरी रक्षा करें।

श्लोक 8.3.7

दिदृक्षवो यस्य पदं सुमङ्गलं विमुक्तसङ्गा मुनयः सुसाधवः । चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वने भूतात्मभूताः सुहृदः स मे गतिः ॥ ७॥

सरल हिन्दी अर्थ: जिनके परम मंगलमय पद के दर्शन के लिए आसक्तिरहित, शुद्ध आचरण वाले मुनि वन में रहकर असाधारण व्रत और साधना करते हैं तथा सभी जीवों के आत्मीय और सुहृद बनते हैं, वही प्रभु मेरी गति हों।

श्लोक 8.3.8

न विद्यते यस्य च जन्म कर्म वा न नामरूपे गुणदोष एव वा । तथापि लोकाप्ययसम्भवाय यः स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति ॥ ८॥

सरल हिन्दी अर्थ: उनका वास्तव में सांसारिक जन्म और बन्धनकारी कर्म नहीं है। वे नाम, रूप, गुण और दोष की सीमाओं में बँधे नहीं हैं। फिर भी लोकों की उत्पत्ति और संहार के लिए अपनी माया से समय-समय पर विविध रूप धारण करते हैं।

श्लोक 8.3.9

तस्मै नमः परेशाय ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये । अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्यकर्मणे ॥ ९॥

सरल हिन्दी अर्थ: उन परमेश्वर, अनन्त शक्तिमान ब्रह्म को नमस्कार है। वे किसी सीमित रूप में बँधे नहीं हैं, फिर भी अनेक महान रूपों में प्रकट होते हैं और आश्चर्यपूर्ण कार्य करते हैं।

श्लोक 8.3.10

नम आत्मप्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने । नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि ॥ १०॥

सरल हिन्दी अर्थ: स्वयं प्रकाशस्वरूप, सबके साक्षी और परमात्मा को नमस्कार है। वे वाणी, मन और चित्त की पहुँच से भी परे हैं।

श्लोक 8.3.11

सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता । नमः कैवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे ॥ ११॥

सरल हिन्दी अर्थ: विवेकी साधक शुद्ध अन्तःकरण और निष्काम साधना से जिन्हें प्राप्त करते हैं, उन कैवल्य के स्वामी को प्रणाम है। मोक्ष के आनन्द का वास्तविक बोध उन्हीं से होता है।

श्लोक 8.3.12

नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे । निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च ॥ १२॥

सरल हिन्दी अर्थ: सत्त्व, रज और तम के सम्बन्ध से शान्त, उग्र और अज्ञानाच्छादित रूपों में प्रकट होने वाले प्रभु को नमस्कार है। इन गुणभेदों से परे समभाव और अखण्ड ज्ञानस्वरूप परमात्मा को भी प्रणाम है।

श्लोक 8.3.13

क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे । पुरुषायात्ममूलाय मूलप्रकृतये नमः ॥ १३॥

सरल हिन्दी अर्थ: शरीररूपी क्षेत्र के ज्ञाता, सबके अधीक्षक और साक्षी आपको नमस्कार है। आप परम पुरुष, अपने ही आधार और मूल प्रकृति के भी कारण हैं।

श्लोक 8.3.14

सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे । असताच्छाययोक्ताय सदाभासाय ते नमः ॥ १४॥

सरल हिन्दी अर्थ: आप सभी इन्द्रियों और उनके विषयों के द्रष्टा तथा सभी अनुभवों के मूल कारण हैं। अस्थायी जगत की छाया से जिनकी सत्ता का संकेत मिलता है और जो सभी प्रतीतियों को प्रकाशित करते हैं, उन सत्यस्वरूप आपको नमस्कार है।

श्लोक 8.3.15

नमो नमस्तेऽखिलकारणाय निष्कारणायाद्भुतकारणाय । सर्वागमाम्नायमहार्णवाय नमोऽपवर्गाय परायणाय ॥ १५॥

सरल हिन्दी अर्थ: सभी कारणों के कारण, स्वयं किसी दूसरे कारण पर आश्रित न रहने वाले और अद्भुत जगत के कारण आपको बारम्बार प्रणाम है। आप सभी वेद-शास्त्रों के महासागर, मोक्षस्वरूप और परम आश्रय हैं।

श्लोक 8.3.16

गुणारणिच्छन्नचिदूष्मपाय तत्क्षोभविस्फूर्जितमानसाय । नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम- स्वयम्प्रकाशाय नमस्करोमि ॥ १६॥

सरल हिन्दी अर्थ: जैसे काष्ठ में अग्नि छिपी रहती है, वैसे ही प्रकृति के गुणों से आपकी चैतन्यशक्ति ढकी-सी प्रतीत होती है। गुणों की हलचल से मन का व्यापार प्रकट होता है। निष्काम साधना से इन आवरणों के शान्त होने पर अनुभव में आने वाले स्वयंप्रकाश प्रभु को मैं प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 8.3.17

मादृक् प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणाय मुक्ताय भूरिकरुणाय नमोऽलयाय । स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत- प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते ॥ १७॥

सरल हिन्दी अर्थ: मेरे जैसे शरणागत और बन्धन में पड़े जीवों के पाश काटने वाले, स्वयं मुक्त, असीम करुणामय और अविनाशी प्रभु को नमस्कार है। अपने अंश से सभी जीवों के भीतर अन्तर्यामी रूप में प्रकाशित महान भगवान को प्रणाम है।

श्लोक 8.3.18

आत्माऽऽत्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तै- र्दुष्प्रापणाय गुणसङ्गविवर्जिताय । मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभाविताय ज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय ॥ १८॥

सरल हिन्दी अर्थ: शरीर, सन्तान, सम्बन्धी, घर, धन और परिवार में आसक्ति रखने वालों के लिए आप दुर्लभ हैं। आप गुणों की आसक्ति से रहित हैं; मुक्तचित्त साधक अपने हृदय में आपका ध्यान करते हैं। ज्ञानस्वरूप ईश्वर को मेरा नमस्कार है।

श्लोक 8.3.19

यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामा भजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति । किं त्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययं करोतु मेऽदभ्रदयो विमोक्षणम् ॥ १९॥

सरल हिन्दी अर्थ: धर्म, अर्थ, काम या मुक्ति चाहने वाले आपका भजन करके अपनी अभिलषित गति पाते हैं। आप इच्छित वर और अविनाशी दिव्य स्वरूप तक प्रदान करते हैं। वे अत्यन्त दयालु प्रभु मेरे बन्धन का भी निवारण करें।

श्लोक 8.3.20

एकान्तिनो यस्य न कञ्चनार्थं वाञ्छन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः । अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमङ्गलं गायन्त आनन्दसमुद्रमग्नाः ॥ २०॥

सरल हिन्दी अर्थ: आपकी अनन्य शरण में रहने वाले भक्त किसी लौकिक लाभ की इच्छा नहीं करते। वे आपके अत्यन्त अद्भुत और मंगलमय चरित्रों का गान करते हुए आनन्द के समुद्र में मग्न रहते हैं।

श्लोक 8.3.21

तमक्षरं ब्रह्म परं परेश- मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम् । अतीन्द्रियं सूक्ष्ममिवातिदूर- मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे ॥ २१॥

सरल हिन्दी अर्थ: मैं उन अविनाशी, परम ब्रह्म, सभी ईश्वरों के भी स्वामी की स्तुति करता हूँ, जो अव्यक्त हैं और आत्मयोग से अनुभव में आते हैं। वे इन्द्रियों से परे, अत्यन्त सूक्ष्म, अनन्त, आदिकारण और पूर्ण हैं।

श्लोक 8.3.22

यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः । नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः ॥ २२॥

सरल हिन्दी अर्थ: ब्रह्मा आदि देवता, वेद, लोक और समस्त चराचर जगत नाम-रूप के भेद से आपकी शक्ति के एक छोटे-से अंश द्वारा प्रकट हुए हैं।

श्लोक 8.3.23

यथार्चिषोऽग्नेः सवितुर्गभस्तयो निर्यान्ति संयान्त्यसकृत्स्वरोचिषः । तथा यतोऽयं गुणसम्प्रवाहो बुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः ॥ २३॥

सरल हिन्दी अर्थ: जैसे अग्नि से ज्वालाएँ और सूर्य से किरणें निकलती तथा फिर अपने स्रोत में समा जाती हैं, वैसे ही गुणों का प्रवाह, बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ और शरीरों की सृष्टि आपसे प्रकट होकर आपमें ही लीन होती है।

श्लोक 8.3.24

स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यङ्- न स्त्री न षण्ढो न पुमान्न जन्तुः । नायं गुणः कर्म न सन्न चास- न्निषेधशेषो जयतादशेषः ॥ २४॥

सरल हिन्दी अर्थ: वे परम सत्य देवता, असुर, मनुष्य या पशु जैसी किसी एक योनि तक सीमित नहीं हैं। वे स्त्री, पुरुष या किसी अन्य देहभेद में बँधे नहीं हैं; गुण, कर्म और स्थूल-सूक्ष्म कार्यकारण की सीमाओं से भी परे हैं। सभी सीमित धारणाओं के निषेध के बाद जो अखण्ड सत्य शेष रहता है, उसी की जय हो।

श्लोक 8.3.25

जिजीविषे नाहमिहामुया कि- मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या । इच्छामि कालेन न यस्य विप्लव- स्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम् ॥ २५॥

सरल हिन्दी अर्थ: मैं केवल इस हाथी-शरीर का जीवन बढ़ाना नहीं चाहता, क्योंकि यह भीतर और बाहर अज्ञान से आवृत है। मैं उस आवरण से मुक्ति चाहता हूँ, जिसके हटने पर आत्मा का वह प्रकाश प्रकट होता है जिसे काल नष्ट नहीं कर सकता।

श्लोक 8.3.26

सोऽहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम् । विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोऽस्मि परं पदम् ॥ २६॥

सरल हिन्दी अर्थ: जो जगत के सृष्टा, विश्वरूप होते हुए भी विश्व की सीमाओं से परे और उसके पूर्ण ज्ञाता हैं, उन अजन्मा, विश्वात्मा, परम ब्रह्म तथा परम पद को मैं प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 8.3.27

योगरन्धितकर्माणो हृदि योगविभाविते । योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोऽस्म्यहम् ॥ २७॥

सरल हिन्दी अर्थ: योगसाधना से कर्मबन्धन शिथिल कर चुके योगी अपने योगशुद्ध हृदय में जिनका दर्शन करते हैं, उन योगेश्वर को मैं प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 8.3.28

नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग- शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय । प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तये कदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने ॥ २८॥

सरल हिन्दी अर्थ: जिनकी तीनों शक्तियों का वेग अप्रतिहत है, जो सभी बुद्धियों और गुणों के आधार हैं, शरणागतों की रक्षा करते हैं और जिनकी शक्ति का पार नहीं है—उन्हें बारम्बार नमस्कार है। विषयों में उलझी इन्द्रियों से उनका मार्ग नहीं जाना जा सकता।

श्लोक 8.3.29

नायं वेद स्वमात्मानं यच्छक्त्याहन्धिया हतम् । तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोऽस्म्यहम् ॥ २९॥

सरल हिन्दी अर्थ: जिनकी शक्ति से उत्पन्न अहंकार में दबकर यह जीव अपने वास्तविक आत्मस्वरूप को नहीं जान पाता, उन अपार महिमावाले भगवान की मैं शरण आया हूँ।

श्लोक 8.3.30

श्रीशुक उवाच । एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषं ब्रह्मादयो विविधलिङ्गभिदाभिमानाः । नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वा- त्तत्राखिलामरमयो हरिराविरासीत् ॥ ३०॥

सरल हिन्दी अर्थ: श्रीशुकदेवजी कहते हैं—गजेन्द्र ने किसी सीमित देव-विशेष का नाम लेकर नहीं, सर्वव्यापक परमात्मा को पुकारा था। इसलिए अलग-अलग देवस्वरूपों के अधिष्ठाता ब्रह्मा आदि आगे नहीं आए; सबके आत्मा और समस्त देवशक्तियों के आधार श्रीहरि वहाँ प्रकट हुए।

श्लोक 8.3.31

तं तद्वदार्तमुपलभ्य जगन्निवासः स्तोत्रं निशम्य दिविजैः सह संस्तुवद्भिः । छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमान- श्चक्रायुधोऽभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः ॥ ३१॥

सरल हिन्दी अर्थ: गजेन्द्र की व्यथा और स्तुति सुनकर जगत के निवास भगवान शीघ्र गरुड़ पर आरूढ़ होकर पहुँचे। उनके हाथ में चक्र था और देवता साथ-साथ उनका स्तवन कर रहे थे।

श्लोक 8.3.32

सोऽन्तःसरस्युरुबलेन गृहीत आर्तो दृष्ट्वा गरुत्मति हरिं ख उपात्तचक्रम् । उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छ्रा- न्नारायणाखिलगुरो भगवन्नमस्ते ॥ ३२॥

सरल हिन्दी अर्थ: सरोवर में ग्राह की पकड़ से पीड़ित गजेन्द्र ने गरुड़ पर चक्रधारी श्रीहरि को देखा। उसने सूँड़ में कमल उठाकर बड़ी कठिनाई से कहा—हे नारायण! हे समस्त जगत के गुरु! हे भगवान! आपको नमस्कार है।

श्लोक 8.3.33

तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्य सग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार । ग्राहाद्विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रं सम्पश्यतां हरिरमूमुचदुच्छ्रियाणाम् ॥ ३३॥

सरल हिन्दी अर्थ: उस पीड़ित भक्त को देखकर भगवान शीघ्र नीचे उतरे। कृपा करके उसे ग्राह सहित सरोवर से बाहर निकाला और सबके देखते-देखते चक्र से ग्राह का मुख चीरकर गजेन्द्र को उसकी पकड़ से मुक्त कर दिया।

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां अष्टमस्कन्धे मन्वन्तरानुवर्णने गजेन्द्रोपाख्याने तृतीयोऽध्यायः ॥ ३॥

अध्याय 4 • पूर्वजन्म, मुक्ति और फलश्रुति

श्रीमद्भागवत • अष्टम स्कन्ध • 26 श्लोक

श्लोक 8.4.1

श्रीशुक उवाच । तदा देवर्षिगन्धर्वा ब्रह्मेशानपुरोगमाः । मुमुचुः कुसुमासारं शंसन्तः कर्म तद्धरेः ॥ १॥

सरल हिन्दी अर्थ: श्रीशुकदेवजी कहते हैं—भगवान के इस कार्य की प्रशंसा करते हुए ब्रह्मा और शिव के साथ देवता, ऋषि तथा गन्धर्व पुष्पवर्षा करने लगे।

श्लोक 8.4.2

नेदुर्दुन्दुभयो दिव्या गन्धर्वा ननृतुर्जगुः । ऋषयश्चारणाः सिद्धास्तुष्टुवुः पुरुषोत्तमम् ॥ २॥

सरल हिन्दी अर्थ: दिव्य दुन्दुभियाँ बजने लगीं। गन्धर्वों ने नृत्य और गान किया तथा ऋषि, चारण और सिद्ध पुरुषोत्तम भगवान की स्तुति करने लगे।

श्लोक 8.4.3

योऽसौ ग्राहः स वै सद्यः परमाश्चर्यरूपधृक् । मुक्तो देवलशापेन हूहूर्गन्धर्वसत्तमः ॥ ३॥

सरल हिन्दी अर्थ: जो ग्राह था, वह उसी क्षण अद्भुत सुन्दर रूप वाला श्रेष्ठ गन्धर्व हूहू बन गया। वह देवल ऋषि के शाप से मुक्त हुआ था।

श्लोक 8.4.4

प्रणम्य शिरसाधीशमुत्तमश्लोकमव्ययम् । अगायत यशोधाम कीर्तन्यगुणसत्कथम् ॥ ४॥

सरल हिन्दी अर्थ: उसने सिर झुकाकर अविनाशी भगवान को प्रणाम किया और उनके पवित्र यश, गुण तथा मंगलमयी कथाओं का गान किया।

श्लोक 8.4.5

सोऽनुकम्पित ईशेन परिक्रम्य प्रणम्य तम् । लोकस्य पश्यतो लोकं स्वमगान्मुक्तकिल्बिषः ॥ ५॥

सरल हिन्दी अर्थ: भगवान की कृपा पाकर, पाप और शाप से मुक्त वह गन्धर्व उनकी परिक्रमा और प्रणाम करके सबके देखते-देखते अपने लोक को चला गया।

श्लोक 8.4.6

गजेन्द्रो भगवत्स्पर्शाद्विमुक्तोऽज्ञानबन्धनात् । प्राप्तो भगवतो रूपं पीतवासाश्चतुर्भुजः ॥ ६॥

सरल हिन्दी अर्थ: भगवान के स्पर्श से गजेन्द्र अज्ञान के बन्धन से मुक्त हो गया। उसने भगवान के समान पीताम्बरधारी, चार भुजाओं वाला दिव्य स्वरूप प्राप्त किया।

श्लोक 8.4.7

स वै पूर्वमभूद्राजा पाण्ड्यो द्रविडसत्तमः । इन्द्रद्युम्न इति ख्यातो विष्णुव्रतपरायणः ॥ ७॥

सरल हिन्दी अर्थ: गजेन्द्र पूर्वजन्म में द्रविड़ प्रदेश का श्रेष्ठ पाण्ड्यवंशी राजा था। उसका नाम इन्द्रद्युम्न था और वह भगवान विष्णु की उपासना में निष्ठावान था।

श्लोक 8.4.8

स एकदाऽऽराधनकाल आत्मवान् गृहीतमौनव्रत ईश्वरं हरिम् । जटाधरस्तापस आप्लुतोऽच्युतं समर्चयामास कुलाचलाश्रमः ॥ ८॥

सरल हिन्दी अर्थ: एक समय वह पर्वत पर स्थित आश्रम में मौनव्रत लेकर भगवान हरि की आराधना कर रहा था। जटाधारी तपस्वी के रूप में, स्नान करके और मन संयत रखकर उसने अच्युत का पूजन किया।

श्लोक 8.4.9

यदृच्छया तत्र महायशा मुनिः समागमच्छिष्यगणैः परिश्रितः । तं वीक्ष्य तूष्णीमकृतार्हणादिकं रहस्युपासीनमृषिश्चुकोप ह ॥ ९॥

सरल हिन्दी अर्थ: उसी समय शिष्यों से घिरे महायशस्वी ऋषि वहाँ आ पहुँचे। राजा को एकान्त में मौन बैठे और अपना स्वागत-सत्कार न करते देखकर ऋषि क्रोधित हुए।

श्लोक 8.4.10

तस्मा इमं शापमदादसाधु- रयं दुरात्माकृतबुद्धिरद्य । विप्रावमन्ता विशतां तमोऽन्धं यथा गजः स्तब्धमतिः स एव ॥ १०॥

सरल हिन्दी अर्थ: ऋषि ने उसे शाप दिया—इसकी बुद्धि शिक्षित और विनीत नहीं हुई; यह ऋषि का अनादर करता और हाथी की भाँति जड़वत् बैठा है। अतः यह अज्ञानयुक्त हाथी की योनि में जाए। यह कथा में ऋषि के शाप का वर्णन है।

श्लोक 8.4.11

श्रीशुक उवाच । एवं शप्त्वा गतोऽगस्त्यो भगवान् नृप सानुगः । इन्द्रद्युम्नोऽपि राजर्षिर्दिष्टं तदुपधारयन् ॥ ११॥

सरल हिन्दी अर्थ: श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार शाप देकर अगस्त्य ऋषि अपने शिष्यों सहित चले गए। राजर्षि इन्द्रद्युम्न ने इस घटना को दैव का विधान मानकर स्वीकार किया।

श्लोक 8.4.12

आपन्नः कौञ्जरीं योनिमात्मस्मृतिविनाशिनीम् । हर्यर्चनानुभावेन यद्गजत्वेऽप्यनुस्मृतिः ॥ १२॥

सरल हिन्दी अर्थ: वह आत्मस्मृति को ढक देने वाली हाथी की योनि में जन्मा। फिर भी पूर्व में किए भगवान के पूजन का ऐसा प्रभाव था कि हाथी होने पर भी संकट में उसे प्रभु और पूर्वजन्म की स्तुति याद आ गई।

श्लोक 8.4.13

एवं विमोक्ष्य गजयूथपमब्जनाभ- स्तेनापिपार्षदगतिं गमितेन युक्तः । गन्धर्वसिद्धविबुधैरुपगीयमान- कर्माद्भुतं स्वभवनं गरुडासनोऽगात् ॥ १३॥

सरल हिन्दी अर्थ: कमलनाभ भगवान ने गजेन्द्र को मुक्त करके उसे अपने पार्षद की गति दी। उसे साथ लेकर गरुड़ पर बैठे प्रभु अपने धाम गए। गन्धर्व, सिद्ध और देवता उनके अद्भुत कार्य का गान कर रहे थे।

श्लोक 8.4.14

एतन्महाराज तवेरितो मया कृष्णानुभावो गजराजमोक्षणम् । स्वर्ग्यं यशस्यं कलिकल्मषापहं दुःस्वप्ननाशं कुरुवर्य श‍ृण्वताम् ॥ १४॥

सरल हिन्दी अर्थ: श्रीशुकदेवजी कहते हैं—महाराज! मैंने आपको भगवान की महिमा से युक्त गजराज के मोक्ष का यह प्रसंग सुनाया। इसके श्रवण की महिमा में शुभ गति, यश, कलियुग के पापों का निवारण और दुःस्वप्नों की शान्ति कही गई है।

श्लोक 8.4.15

यथानुकीर्तयन्त्येतच्छ्रेयस्कामा द्विजातयः । शुचयः प्रातरुत्थाय दुःस्वप्नाद्युपशान्तये ॥ १५॥

सरल हिन्दी अर्थ: कल्याण चाहने वाले साधक प्रातः उठकर शुद्ध भाव से इस प्रसंग का कीर्तन करते हैं। कथा में इसे दुःस्वप्न आदि की शान्ति और मंगल के लिए स्मरणीय बताया गया है।

श्लोक 8.4.16

इदमाह हरिः प्रीतो गजेन्द्रं कुरुसत्तम । श‍ृण्वतां सर्वभूतानां सर्वभूतमयो विभुः ॥ १६॥

सरल हिन्दी अर्थ: हे कुरुश्रेष्ठ! सर्वजीवमय, सर्वव्यापक भगवान प्रसन्न होकर गजेन्द्र से यह भी बोले। उस समय सभी प्राणी उनके वचन सुन रहे थे।

श्लोक 8.4.17

श्रीभगवानुवाच । ये मां त्वां च सरश्चेदं गिरिकन्दरकाननम् । वेत्रकीचकवेणूनां गुल्मानि सुरपादपान् ॥ १७॥

सरल हिन्दी अर्थ: भगवान ने कहा—जो मेरा, तुम्हारा, इस सरोवर का, पर्वत की गुफाओं और वनों का, बेंत तथा बाँस के झुरमुटों और दिव्य वृक्षों का स्मरण करते हैं—

श्लोक 8.4.18

श‍ृङ्गाणीमानि धिष्ण्यानि ब्रह्मणो मे शिवस्य च । क्षीरोदं मे प्रियं धाम श्वेतद्वीपं च भास्वरम् ॥ १८॥

सरल हिन्दी अर्थ: इन पर्वतशिखरों, ब्रह्मा, मेरे और शिव के निवासों का तथा मेरे प्रिय धाम क्षीरसागर और प्रकाशमान श्वेतद्वीप का स्मरण करते हैं—

श्लोक 8.4.19

श्रीवत्सं कौस्तुभं मालां गदां कौमोदकीं मम । सुदर्शनं पाञ्चजन्यं सुपर्णं पतगेश्वरम् ॥ १९॥

सरल हिन्दी अर्थ: मेरे श्रीवत्सचिह्न, कौस्तुभमणि, वनमाला, कौमोदकी गदा, सुदर्शन चक्र, पाञ्चजन्य शंख और पक्षिराज गरुड़ का स्मरण करते हैं—

श्लोक 8.4.20

शेषं च मत्कलां सूक्ष्मां श्रियं देवीं मदाश्रयाम् । ब्रह्माणं नारदमृषिं भवं प्रह्लादमेव च ॥ २०॥

सरल हिन्दी अर्थ: शेषनाग, मेरी सूक्ष्म कला, मेरे आश्रय में स्थित देवी लक्ष्मी तथा ब्रह्मा, नारद ऋषि, शिव और प्रह्लाद का स्मरण करते हैं—

श्लोक 8.4.21

मत्स्यकूर्मवराहाद्यैरवतारैः कृतानि मे । कर्माण्यनन्तपुण्यानि सूर्यं सोमं हुताशनम् ॥ २१॥

सरल हिन्दी अर्थ: मत्स्य, कूर्म और वराह आदि अवतारों में किए मेरे अनन्त पुण्यमय कार्यों तथा सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि का स्मरण करते हैं—

श्लोक 8.4.22

प्रणवं सत्यमव्यक्तं गोविप्रान् धर्ममव्ययम् । दाक्षायणीर्धर्मपत्नीः सोमकश्यपयोरपि ॥ २२॥

सरल हिन्दी अर्थ: प्रणव अर्थात् ॐ, सत्य, अव्यक्त तत्त्व, गौ, वेदज्ञ ब्राह्मण, सनातन धर्म तथा दक्ष की उन कन्याओं का स्मरण करते हैं जो धर्म, चन्द्रमा और कश्यप की पत्नियाँ हैं—

श्लोक 8.4.23

गङ्गां सरस्वतीं नन्दां कालिन्दीं सितवारणम् । ध्रुवं ब्रह्मऋषीन् सप्त पुण्यश्लोकांश्च मानवान् ॥ २३॥

सरल हिन्दी अर्थ: गंगा, सरस्वती, नन्दा और यमुना, श्वेत ऐरावत हाथी, ध्रुव, सप्तर्षि तथा पुण्यकीर्ति वाले मनुष्यों का स्मरण करते हैं—

श्लोक 8.4.24

उत्थायापररात्रान्ते प्रयताः सुसमाहिताः । स्मरन्ति मम रूपाणि मुच्यन्ते ह्येनसोऽखिलात् ॥ २४॥

सरल हिन्दी अर्थ: जो रात्रि के अन्त में उठकर शुद्ध और एकाग्र मन से मेरे इन स्वरूपों का स्मरण करते हैं, वे समस्त पापों से मुक्त होते हैं। पिछले श्लोकों में बताए स्मरणीय रूपों की फलश्रुति यहाँ पूर्ण होती है।

श्लोक 8.4.25

ये मां स्तुवन्त्यनेनाङ्ग प्रतिबुध्य निशात्यये । तेषां प्राणात्यये चाहं ददामि विमलां मतिम् ॥ २५॥

सरल हिन्दी अर्थ: हे गजेन्द्र! जो लोग रात्रि बीतने पर जागकर इस स्तोत्र से मेरी स्तुति करते हैं, उन्हें अन्तसमय में भी मैं निर्मल बुद्धि प्रदान करता हूँ।

श्लोक 8.4.26

श्रीशुक उवाच । इत्यादिश्य हृषीकेशः प्रध्माय जलजोत्तमम् । हर्षयन् विबुधानीकमारुरोह खगाधिपम् ॥ २६॥

सरल हिन्दी अर्थ: श्रीशुकदेवजी कहते हैं—ऐसा उपदेश देकर हृषीकेश भगवान ने अपना श्रेष्ठ शंख बजाया। देवसमूह को आनन्दित करते हुए वे पक्षिराज गरुड़ पर आरूढ़ हो गए।

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां अष्टमस्कन्धे गजेन्द्रमोक्षणं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४॥

॥ श्रीगजेन्द्रमोक्षप्रसंगः सम्पूर्णः ॥

॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥

गजेन्द्रमोक्ष का भक्ति-सन्देश

गजेन्द्र पहले अपने बल पर छूटने का पूरा प्रयत्न करता है। जब सभी सीमित सहारे असमर्थ हो जाते हैं, तब वह परम आश्रय को पहचानता है। उसकी स्तुति देह की रक्षा से आगे अज्ञान और अहंकार के बन्धन से मुक्ति की प्रार्थना बनती है।

कथा में पूर्व साधना का प्रभाव भी स्पष्ट है। राजा इन्द्रद्युम्न की भक्ति के संस्कार हाथी-योनि में भी नष्ट नहीं हुए; संकट में वही स्मरण जाग उठा। भगवान की कृपा से ग्राह अपने शाप से छूटा और गजेन्द्र को दिव्य पार्षदगति मिली।

पाठ करते समय मूल श्लोक के साथ अर्थ पर भी मनन करें। शरणागति, करुणा, निर्मल बुद्धि और भगवान के स्मरण की यह भावना ही इस प्रसंग का हृदय है।

यहाँ सम्पूर्ण प्रसंग में क्या सम्मिलित है?

श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कन्ध में 8.2.1 से 8.4.26 तक के तीनों अध्याय—कुल 92 श्लोक। इसमें केवल स्तुति का चयन नहीं, कथा की भूमिका, ग्राह से संघर्ष, गजेन्द्र की प्रार्थना, श्रीहरि का आगमन और उद्धार, गन्धर्व हूहू तथा राजा इन्द्रद्युम्न के पूर्वजन्म और समापन की फलश्रुति भी सम्मिलित हैं। यह सम्पूर्ण गजेन्द्रमोक्ष प्रसंग है; सम्पूर्ण भागवत महापुराण इससे कहीं बड़ा ग्रंथ है।

पाठाधार और हिन्दी अर्थ

संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents का “श्रीमद्भागवते गजेन्द्रमोक्षणः” है। अध्यायों का प्रसंग और स्तुति का पाठ संस्कृत विकिस्रोत पर उपलब्ध श्रीमद्भागवत-पाठ से भी देखा गया है। संधि, वर्तनी और शब्द-विभाजन के संस्करणगत अन्तर मिलते हैं। मूल अध्याय और श्लोक-क्रम बनाए रखे गए हैं। हिन्दी अर्थ भक्ति भावना की स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है। कथा की दीर्घकाल-गणना और फलश्रुति को ग्रंथ के कथन के रूप में समझें।

सम्पूर्ण आदित्यहृदय स्तोत्र पढ़ें →

भक्ति भावना • मूल पाठ और सरल हिन्दी अर्थ

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