श्रीमद्भागवत महापुराण प्रथम स्कन्ध भाग 5 — अध्याय 13–15, विदुर उपदेश और पाण्डव प्रस्थान

भक्ति भावना • पुराण साहित्य

श्रीमद्भागवत महापुराण

प्रथम स्कन्ध • भाग ५ • अध्याय १३–१५

१५४ मूल श्लोक • प्रत्येक श्लोक का सरल हिंदी भावार्थ

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विदुर उपदेश और पाण्डव प्रस्थान

विदुर का वैराग्य-उपदेश, धृतराष्ट्र का वनगमन, श्रीकृष्ण के वियोग में अर्जुन और पाण्डवों के महाप्रस्थान की कथा।

यहाँ अध्याय 13–15 के सभी 154 श्लोक मूल क्रम में हैं। प्रत्येक के साथ स्वतंत्र रूप से लिखा सरल हिंदी भावार्थ है।

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प्रथम स्कन्ध • अध्याय 13

विदुर का उपदेश, धृतराष्ट्र का वनगमन और नारद का आश्वासन

श्लोक 13.1

सूत उवाच । विदुरस्तीर्थयात्रायां मैत्रेयादात्मनो गतिम् । ज्ञात्वागाद्धास्तिनपुरं तयावाप्तविवित्सितः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—तीर्थयात्रा में मैत्रेयजी से आत्मकल्याण का मार्ग जानकर और अपनी जिज्ञासा का समाधान पाकर विदुर हस्तिनापुर लौट आए।

श्लोक 13.2

यावतः कृतवान् प्रश्नान् क्षत्ता कौषारवाग्रतः । जातैकभक्तिर्गोविन्दे तेभ्यश्चोपरराम ह ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेयजी से अनेक प्रश्न पूछने के बाद विदुर के हृदय में गोविन्द की अनन्य भक्ति जाग गई; तब आगे पूछने की आवश्यकता नहीं रही।

श्लोक 13.3

तं बन्धुमागतं दृष्ट्वा धर्मपुत्रः सहानुजः । धृतराष्ट्रो युयुत्सुश्च सूतः शारद्वतः पृथा ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्हें लौटा देखकर युधिष्ठिर, उनके भाई, धृतराष्ट्र, युयुत्सु, संजय, कृपाचार्य और कुन्ती प्रसन्न हुए।

श्लोक 13.4

गान्धारी द्रौपदी ब्रह्मन् सुभद्रा चोत्तरा कृपी । अन्याश्च जामयः पाण्डोर्ज्ञातयः ससुताः स्त्रियः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: गान्धारी, द्रौपदी, सुभद्रा, उत्तरा, कृपी तथा पाण्डुवंश के अन्य संबंधी और स्त्रियाँ अपने बालकों सहित स्वागत करने आईं।

श्लोक 13.5

प्रत्युज्जग्मुः प्रहर्षेण प्राणं तन्व इवागतम् । अभिसङ्गम्य विधिवत्परिष्वङ्गाभिवादनैः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे शरीर में प्राण लौट आए हों, वैसे सब हर्षित होकर आगे बढ़े और यथायोग्य आलिंगन तथा प्रणाम से विदुर का स्वागत किया।

श्लोक 13.6

मुमुचुः प्रेमबाष्पौघं विरहौत्कण्ठ्यकातराः । राजा तमर्हयाञ्चक्रे कृतासनपरिग्रहम् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: लम्बे वियोग की व्याकुलता प्रेम के आँसुओं में बह निकली। विदुर के आसन ग्रहण करने पर राजा ने उनका आदर-सत्कार किया।

श्लोक 13.7

तं भुक्तवन्तं विश्रान्तमासीनं सुखमासने । प्रश्रयावनतो राजा प्राह तेषां च श‍ृण्वताम् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: भोजन और विश्राम के बाद वे सुखपूर्वक बैठे तो युधिष्ठिर ने विनय से झुककर सबके सामने उनसे निवेदन किया।

श्लोक 13.8

युधिष्ठिर उवाच । अपि स्मरथ नो युष्मत्पक्षच्छायासमेधितान् । विपद्गणाद्विषाग्न्यादेर्मोचिता यत्समातृकाः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: युधिष्ठिर बोले—क्या आपको हमारी याद आती थी? हम आपकी छत्रछाया में पले हैं; आपने माता सहित हमें विष, अग्नि और अनेक विपत्तियों से बचाया था।

श्लोक 13.9

कया वृत्त्या वर्तितं वश्चरद्भिः क्षितिमण्डलम् । तीर्थानि क्षेत्रमुख्यानि सेवितानीह भूतले ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी पर विचरते हुए आपने किस प्रकार निर्वाह किया और किन प्रमुख तीर्थों तथा पवित्र क्षेत्रों की सेवा की?

श्लोक 13.10

भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूताः स्वयं विभो । तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तःस्थेन गदाभृता ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप जैसे भगवद्भक्त स्वयं तीर्थस्वरूप हैं। हृदय में विराजमान भगवान के प्रभाव से आप तीर्थों को भी पवित्र करते हैं।

श्लोक 13.11

अपि नः सुहृदस्तात बान्धवाः कृष्णदेवताः । दृष्टाः श्रुता वा यदवः स्वपुर्यां सुखमासते ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: तात, क्या आपने श्रीकृष्ण को आराध्य मानने वाले हमारे यदुवंशी स्वजनों को देखा या उनका समाचार सुना? क्या वे अपनी नगरी में सुखी हैं?

श्लोक 13.12

इत्युक्तो धर्मराजेन सर्वं तत्समवर्णयत् । यथानुभूतं क्रमशो विना यदुकुलक्षयम् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: धर्मराज के पूछने पर विदुर ने अपने अनुभव क्रम से बताए, किन्तु यदुवंश के विनाश का समाचार नहीं कहा।

श्लोक 13.13

नन्वप्रियं दुर्विषहं नृणां स्वयमुपस्थितम् । नावेदयत्सकरुणो दुःखितान् द्रष्टुमक्षमः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: करुणामय विदुर अपने स्वजनों को दुःखी नहीं देख सकते थे; इसलिए उन्होंने उस असह्य और अपने-आप आ पहुँची अप्रिय घटना को नहीं बताया।

श्लोक 13.14

कञ्चित्कालमथावात्सीत्सत्कृतो देववत्सुखम् । भ्रातुर्ज्येष्ठस्य श्रेयस्कृत्सर्वेषां प्रीतिमावहन् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे कुछ समय देवता के समान सम्मान पाकर वहाँ रहे। सबको प्रसन्न करते हुए उन्होंने बड़े भाई धृतराष्ट्र के परम कल्याण का उपाय किया।

श्लोक 13.15

अबिभ्रदर्यमा दण्डं यथावदघकारिषु । यावद्दधार शूद्रत्वं शापाद्वर्षशतं यमः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिस समय शाप के कारण यमराज सौ वर्षों तक विदुर के रूप में जन्मे थे, उस अवधि में अर्यमा अपराधियों को उचित दण्ड देने का कार्य करते थे।

श्लोक 13.16

युधिष्ठिरो लब्धराज्यो दृष्ट्वा पौत्रं कुलन्धरम् । भ्रातृभिर्लोकपालाभैर्मुमुदे परया श्रिया ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: राज्य प्राप्त करके और वंश को आगे बढ़ाने वाला पौत्र देखकर युधिष्ठिर लोकपालों जैसे अपने भाइयों सहित समृद्धि का आनन्द ले रहे थे।

श्लोक 13.17

एवं गृहेषु सक्तानां प्रमत्तानां तदीहया । अत्यक्रामदविज्ञातः कालः परमदुस्तरः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: घर-परिवार के कामों और आसक्ति में लगे लोगों को पता भी न चला और दुस्तर काल निरन्तर आगे बढ़ता गया।

श्लोक 13.18

विदुरस्तदभिप्रेत्य धृतराष्ट्रमभाषत । राजन् निर्गम्यतां शीघ्रं पश्येदं भयमागतम् ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह देखकर विदुर ने धृतराष्ट्र से कहा—राजन्, अब शीघ्र यहाँ से निकल चलिए; देखिए, जीवन के अन्त का भय निकट आ गया है।

श्लोक 13.19

प्रतिक्रिया न यस्येह कुतश्चित्कर्हिचित्प्रभो । स एव भगवान् कालः सर्वेषां नः समागतः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिसका कोई किसी भी उपाय से प्रतिकार नहीं कर सकता, वही सामर्थ्यवान काल हम सबके निकट आ पहुँचा है।

श्लोक 13.20

येन चैवाभिपन्नोऽयं प्राणैः प्रियतमैरपि । जनः सद्यो वियुज्येत किमुतान्यैर्धनादिभिः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसकी पकड़ में आया मनुष्य अपने सबसे प्यारे प्राणों से भी बिछुड़ जाता है; फिर धन और अन्य वस्तुओं की क्या बात है?

श्लोक 13.21

पितृभ्रातृसुहृत्पुत्रा हतास्ते विगतं वयः । आत्मा च जरया ग्रस्तः परगेहमुपाससे ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपके पिता, भाई, मित्र और पुत्र चले गए; आयु ढल गई, शरीर वृद्ध हो गया, फिर भी आप दूसरों के घर पर आश्रित हैं।

श्लोक 13.22

अहो महीयसी जन्तोर्जीविताशा यथा भवान् । भीमापवर्जितं पिण्डमादत्ते गृहपालवत् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जीव की जीने की इच्छा कितनी प्रबल है! आप भीम द्वारा दिया हुआ अन्न लेकर घर की रखवाली करने वाले आश्रित की तरह जीवन बिताते हैं।

श्लोक 13.23

अग्निर्निसृष्टो दत्तश्च गरो दाराश्च दूषिताः । हृतं क्षेत्रं धनं येषां तद्दत्तैरसुभिः कियत् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिन्हें आपने आग, विष, अपमान और राज्य तथा धन के हरण से कष्ट पहुँचाया, उन्हीं के अन्न से टिके जीवन को अब और कितना खींचेंगे?

श्लोक 13.24

तस्यापि तव देहोऽयं कृपणस्य जिजीविषोः । परैत्यनिच्छतो जीर्णो जरया वाससी इव ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जीने की इच्छा और अनिच्छा के बावजूद यह वृद्ध शरीर पुराने वस्त्र की तरह क्षीण होकर नष्ट होगा।

श्लोक 13.25

गतस्वार्थमिमं देहं विरक्तो मुक्तबन्धनः । अविज्ञातगतिर्जह्यात्स वै धीर उदाहृतः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो शरीर की उपयोगिता समाप्त होती देखकर उससे विरक्त हो, संबंधों का बन्धन छोड़े और एकान्त में देहाभिमान त्याग दे, वही धीर कहा जाता है।

श्लोक 13.26

यः स्वकात्परतो वेह जातनिर्वेद आत्मवान् । हृदि कृत्वा हरिं गेहात्प्रव्रजेत्स नरोत्तमः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने विवेक से अथवा दूसरे के उपदेश से वैराग्य पाकर जो मनुष्य हृदय में हरि को धारण कर घर से निकलता है, वह श्रेष्ठ पुरुष है।

श्लोक 13.27

अथोदीचीं दिशं यातु स्वैरज्ञातगतिर्भवान् । इतोऽर्वाक् प्रायशः कालः पुंसां गुणविकर्षणः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अब आप गुप्त रूप से उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान करें; आगे आने वाला समय प्रायः मनुष्यों के सद्गुणों को क्षीण करने वाला है।

श्लोक 13.28

एवं राजा विदुरेणानुजेन प्रज्ञाचक्षुर्बोधित आजमीढः । छित्त्वा स्वेषु स्नेहपाशान् द्रढिम्नो निश्चक्राम भ्रातृसन्दर्शिताध्वा ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: छोटे भाई विदुर के उपदेश से धृतराष्ट्र का विवेक जागा। उन्होंने स्वजनों के स्नेह का दृढ़ बन्धन काटकर भाई के बताए मार्ग से प्रस्थान किया।

श्लोक 13.29

पतिं प्रयान्तं सुबलस्य पुत्री पतिव्रता चानुजगाम साध्वी । हिमालयं न्यस्तदण्डप्रहर्षं मनस्विनामिव सत्सम्प्रहारः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: पतिव्रता गान्धारी भी पति के पीछे हिमालय की ओर चलीं। संयमी साधकों को वहाँ ऐसा उत्साह मिलता है, जैसे वीरों को धर्मयुद्ध में।

श्लोक 13.30

अजातशत्रुः कृतमैत्रो हुताग्नि- र्विप्रान्नत्वा तिलगोभूमिरुक्मैः । गृहं प्रविष्टो गुरुवन्दनाय न चापश्यत्पितरौ सौबलीं च ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रातः संध्या और अग्निहोत्र करके तथा तिल, गाय, भूमि और स्वर्ण से ब्राह्मणों का सम्मान करके युधिष्ठिर गुरुजनों को प्रणाम करने आए, पर धृतराष्ट्र, विदुर और गान्धारी नहीं मिले।

श्लोक 13.31

तत्र सञ्जयमासीनं पप्रच्छोद्विग्नमानसः । गावल्गणे क्व नस्तातो वृद्धो हीनश्च नेत्रयोः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: चिन्तित राजा ने वहाँ बैठे संजय से पूछा—हे गावल्गणि, हमारे वृद्ध और नेत्रहीन ताऊजी कहाँ हैं?

श्लोक 13.32

अम्बा च हतपुत्राऽऽर्ता पितृव्यः क्व गतः सुहृत् । अपि मय्यकृतप्रज्ञे हतबन्धुः स भार्यया । आशंसमानः शमलं गङ्गायां दुःखितोऽपतत् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुत्रशोक से दुःखी गान्धारी माता और हितैषी विदुर कहाँ गए? कहीं मेरे व्यवहार में दोष समझकर दुःखी धृतराष्ट्र ने पत्नी सहित गङ्गा में प्रवेश तो नहीं कर लिया?

श्लोक 13.33

पितर्युपरते पाण्डौ सर्वान् नः सुहृदः शिशून् । अरक्षतां व्यसनतः पितृव्यौ क्व गतावितः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: पिता पाण्डु के निधन के बाद इन दोनों पितृव्यों ने हम अनाथ बालकों को विपत्तियों से बचाया था; अब वे कहाँ चले गए?

श्लोक 13.34

सूत उवाच । कृपया स्नेहवैक्लव्यात्सूतो विरहकर्शितः । आत्मेश्वरमचक्षाणो न प्रत्याहातिपीडितः ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—स्वामी के वियोग से पीड़ित संजय स्नेह और करुणा के कारण इतने व्याकुल थे कि तत्काल उत्तर नहीं दे सके।

श्लोक 13.35

विमृज्याश्रूणि पाणिभ्यां विष्टभ्यात्मानमात्मना । अजातशत्रुं प्रत्यूचे प्रभोः पादावनुस्मरन् ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर हाथों से आँसू पोंछकर और मन को सँभालकर उन्होंने अपने स्वामी के चरणों का स्मरण करते हुए युधिष्ठिर को उत्तर दिया।

श्लोक 13.36

सञ्जय उवाच । नाहं वेद व्यवसितं पित्रोर्वः कुलनन्दन । गान्धार्या वा महाबाहो मुषितोऽस्मि महात्मभिः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: संजय बोले—हे कुलनन्दन, आपके दोनों पितृव्य और गान्धारी क्या निश्चय करके गए, यह मैं नहीं जानता। उन महात्माओं ने मुझे भी इसकी सूचना नहीं दी।

श्लोक 13.37

अथाजगाम भगवान् नारदः सह तुम्बुरुः । प्रत्युत्थायाभिवाद्याह सानुजोऽभ्यर्चयन्निव ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसी समय तुम्बुरु के साथ देवर्षि नारद आए। युधिष्ठिर भाइयों सहित उठकर, प्रणाम और सत्कार करके उनसे बोले।

श्लोक 13.38

युधिष्ठिर उवाच । नाहं वेद गतिं पित्रोर्भगवन् क्व गतावितः । अम्बा वा हतपुत्राऽऽर्ता क्व गता च तपस्विनी ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवन्, मुझे ज्ञात नहीं कि मेरे दोनों पितृव्य कहाँ चले गए और पुत्रशोक से दुःखी तपस्विनी गान्धारी माता कहाँ हैं।

श्लोक 13.39

कर्णधार इवापारे भगवान् पारदर्शकः । अथाबभाषे भगवान्नारदो मुनिसत्तमः ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप अपार समुद्र के नाविक के समान हमें इस चिन्ता से पार लगाने वाले हैं। तब मुनिश्रेष्ठ नारद ने कहना आरम्भ किया।

श्लोक 13.40

मा कञ्चन शुचो राजन् यदीश्वरवशं जगत् । लोकाः सपाला यस्येमे वहन्ति बलिमीशितुः । स संयुनक्ति भूतानि स एव वियुनक्ति च ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारदजी बोले—राजन्, किसी के लिए शोक न करें। जगत ईश्वर के अधीन है; लोक और लोकपाल उनकी आज्ञा मानते हैं। वे ही प्राणियों का मिलन और वियोग कराते हैं।

श्लोक 13.41

यथा गावो नसि प्रोतास्तन्त्यां बद्धाश्च दामभिः । वाक्तन्त्यां नामभिर्बद्धा वहन्ति बलिमीशितुः ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे नाक में डोरी डालकर पशु बाँधे जाते हैं, वैसे जीव नाम और शास्त्रीय व्यवस्थाओं के बन्धन में रहकर ईश्वर की व्यवस्था का पालन करते हैं।

श्लोक 13.42

यथा क्रीडोपस्कराणां संयोगविगमाविह । इच्छया क्रीडितुः स्यातां तथैवेशेच्छया नृणाम् ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: खेल की वस्तुओं का मिलना-बिछुड़ना खिलाड़ी की इच्छा से होता है; वैसे ही मनुष्यों का संयोग-वियोग ईश्वर की इच्छा के अधीन है।

श्लोक 13.43

यन्मन्यसे ध्रुवं लोकमध्रुवं वा न चोभयम् । सर्वथा न हि शोच्यास्ते स्नेहादन्यत्र मोहजात् ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जीव को नित्य मानें, शरीर को अनित्य मानें अथवा दोनों के अन्य प्रकार का विचार करें—मोह से उत्पन्न आसक्ति के अतिरिक्त शोक का स्थायी आधार नहीं रहता।

श्लोक 13.44

तस्माज्जह्यङ्ग वैक्लव्यमज्ञानकृतमात्मनः । कथं त्वनाथाः कृपणा वर्तेरंस्ते च मां विना ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए अज्ञान से उठी यह व्याकुलता छोड़ दें कि मेरे बिना ये असहाय लोग कैसे रहेंगे।

श्लोक 13.45

कालकर्मगुणाधीनो देहोऽयं पाञ्चभौतिकः । कथमन्यांस्तु गोपायेत्सर्पग्रस्तो यथा परम् ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह पाँच तत्त्वों का शरीर स्वयं काल, कर्म और गुणों के अधीन है। साँप की पकड़ में आया व्यक्ति दूसरे की रक्षा कैसे करे—वैसी ही इसकी सीमा है।

श्लोक 13.46

अहस्तानि सहस्तानामपदानि चतुष्पदाम् । फल्गूनि तत्र महतां जीवो जीवस्य जीवनम् ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: हाथरहित जीव हाथवालों के, पैररहित जीव चौपायों के और छोटे जीव बड़े जीवों के आहार बनते हैं; संसार में एक जीव दूसरे का जीवनाधार बनता है।

श्लोक 13.47

तदिदं भगवान् राजन्नेक आत्माऽऽत्मनां स्वदृक् । अन्तरोऽनन्तरो भाति पश्य तं माययोरुधा ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, सब जीवों के भीतर और बाहर एक ही स्वयंप्रकाश परमात्मा अपनी माया से अनेक रूपों में प्रकट हैं; उन्हीं को सबमें देखिए।

श्लोक 13.48

सोऽयमद्य महाराज भगवान् भूतभावनः । कालरूपोऽवतीर्णोऽस्यामभावाय सुरद्विषाम् ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वही प्राणियों के पालक भगवान दैत्यस्वभाव वाले पृथ्वी के भार को हटाने के लिए कालरूप से अवतरित हुए हैं।

श्लोक 13.49

निष्पादितं देवकृत्यमवशेषं प्रतीक्षते । तावद्यूयमवेक्षध्वं भवेद्यावदिहेश्वरः ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवताओं के लिए उनका मुख्य कार्य पूर्ण हो चुका है और शेष लीला की प्रतीक्षा है। जब तक भगवान यहाँ हैं, तब तक आप भी उनकी इच्छा की प्रतीक्षा करें।

श्लोक 13.50

धृतराष्ट्रः सह भ्रात्रा गान्धार्या च स्वभार्यया । दक्षिणेन हिमवत ऋषीणामाश्रमं गतः ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: धृतराष्ट्र अपने भाई विदुर और पत्नी गान्धारी के साथ हिमालय के दक्षिण में ऋषियों के आश्रम में गए हैं।

श्लोक 13.51

स्रोतोभिः सप्तभिर्या वै स्वर्धुनी सप्तधा व्यधात् । सप्तानां प्रीतये नाना सप्तस्रोतः प्रचक्षते ॥ ५१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ गङ्गा ने सात ऋषियों की प्रसन्नता के लिए सात धाराएँ धारण कीं, उस स्थान को सप्तस्रोत कहते हैं।

श्लोक 13.52

स्नात्वानुसवनं तस्मिन् हुत्वा चाग्नीन् यथाविधि । अब्भक्ष उपशान्तात्मा स आस्ते विगतैषणः ॥ ५२॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ धृतराष्ट्र तीनों संध्याओं में स्नान और विधिपूर्वक अग्निहोत्र करते हैं। केवल जल पर निर्वाह करके इच्छारहित और शान्त चित्त से रहते हैं।

श्लोक 13.53

जितासनो जितश्वासः प्रत्याहृतषडिन्द्रियः । हरिभावनया ध्वस्तरजःसत्त्वतमोमलः ॥ ५३॥

सरल हिंदी भावार्थ: आसन, श्वास और मन सहित छह इन्द्रियों को वश में करके वे हरि के ध्यान से सत्त्व, रज और तम के मल को दूर कर रहे हैं।

श्लोक 13.54

विज्ञानात्मनि संयोज्य क्षेत्रज्ञे प्रविलाप्य तम् । ब्रह्मण्यात्मानमाधारे घटाम्बरमिवाम्बरे ॥ ५४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे मन को शुद्ध बुद्धि में, बुद्धि को जीवचैतन्य में और जीवचैतन्य को उसके आधार ब्रह्म में एकाग्र कर रहे हैं, जैसे घटाकाश महाकाश में अभिन्न है।

श्लोक 13.55

ध्वस्तमायागुणोदर्को निरुद्धकरणाशयः । निवर्तिताखिलाहार आस्ते स्थाणुरिवाचलः । तस्यान्तरायो मैवाभूः संन्यस्ताखिलकर्मणः ॥ ५५॥

सरल हिंदी भावार्थ: माया के गुणों का प्रभाव मिटाकर, इन्द्रियों और चित्त को स्थिर करके तथा आहार छोड़कर वे अचल बैठे हैं। सब कर्म त्याग चुके उनकी साधना में आप बाधा न बनें।

श्लोक 13.56

स वा अद्यतनाद्राजन् परतः पञ्चमेऽहनि । कलेवरं हास्यति स्वं तच्च भस्मीभविष्यति ॥ ५६॥

सरल हिंदी भावार्थ: आज से पाँचवें दिन वे अपना शरीर त्याग देंगे और वह शरीर अग्नि में भस्म हो जाएगा।

श्लोक 13.57

दह्यमानेऽग्निभिर्देहे पत्युः पत्नी सहोटजे । बहिः स्थिता पतिं साध्वी तमग्निमनुवेक्ष्यति ॥ ५७॥

सरल हिंदी भावार्थ: कथा के अनुसार पति की देह और कुटिया अग्नि में जलते देखकर बाहर खड़ी गान्धारी भी उसी अग्नि में प्रवेश करेंगी। यह ग्रंथ में वर्णित घटना का भावार्थ है।

श्लोक 13.58

विदुरस्तु तदाश्चर्यं निशाम्य कुरुनन्दन । हर्षशोकयुतस्तस्माद्गन्ता तीर्थनिषेवकः ॥ ५८॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर इस अद्भुत घटना को देखकर हर्ष और शोक दोनों अनुभव करेंगे और फिर तीर्थसेवा के लिए वहाँ से चले जाएँगे।

श्लोक 13.59

इत्युक्त्वाथारुहत्स्वर्गं नारदः सहतुम्बुरुः । युधिष्ठिरो वचस्तस्य हृदि कृत्वाजहाच्छुचः ॥ ५९॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह कहकर नारद तुम्बुरु सहित देवलोक चले गए। उनके वचनों को हृदय में धारण करके युधिष्ठिर का शोक दूर हो गया।

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 13 समाप्त ॥

प्रथम स्कन्ध • अध्याय 14

अशुभ संकेत, अर्जुन का आगमन और युधिष्ठिर की जिज्ञासा

श्लोक 14.1

सूत उवाच । सम्प्रस्थिते द्वारकायां जिष्णौ बन्धुदिदृक्षया । ज्ञातुं च पुण्यश्लोकस्य कृष्णस्य च विचेष्टितम् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—अर्जुन स्वजनों से मिलने और श्रीकृष्ण की पुण्यमयी लीलाओं का समाचार जानने द्वारका गए थे।

श्लोक 14.2

व्यतीताः कतिचिन्मासास्तदा नायात्ततोऽर्जुनः । ददर्श घोररूपाणि निमित्तानि कुरूद्वहः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: कई महीने बीतने पर भी वे नहीं लौटे। इसी बीच युधिष्ठिर को अनेक भयानक अनिष्टसूचक घटनाएँ दिखाई दीं।

श्लोक 14.3

कालस्य च गतिं रौद्रां विपर्यस्तर्तुधर्मिणः । पापीयसीं नृणां वार्तां क्रोधलोभानृतात्मनाम् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऋतुओं का स्वाभाविक क्रम बिगड़ने लगा और क्रोध, लोभ तथा असत्य में लगे लोगों का जीवन अधर्म की ओर बढ़ता दिखाई दिया।

श्लोक 14.4

जिह्मप्रायं व्यवहृतं शाठ्यमिश्रं च सौहृदम् । पितृमातृसुहृद्भ्रातृदम्पतीनां च कल्कनम् ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: व्यवहार में कुटिलता, मित्रता में छल और माता-पिता, स्वजनों, भाइयों तथा पति-पत्नी के बीच कलह बढ़ रही थी।

श्लोक 14.5

निमित्तान्यत्यरिष्टानि काले त्वनुगते नृणाम् । लोभाद्यधर्मप्रकृतिं दृष्ट्वोवाचानुजं नृपः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसे अशुभ संकेत और लोगों में लोभ आदि अधार्मिक प्रवृत्तियाँ देखकर राजा ने छोटे भाई भीम से कहा।

श्लोक 14.6

युधिष्ठिर उवाच । सम्प्रेषितो द्वारकायां जिष्णुर्बन्धुदिदृक्षया । ज्ञातुं च पुण्यश्लोकस्य कृष्णस्य च विचेष्टितम् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: युधिष्ठिर बोले—अर्जुन को हमने द्वारका में स्वजनों से मिलने और श्रीकृष्ण की लीलाओं का समाचार जानने भेजा था।

श्लोक 14.7

गताः सप्ताधुना मासा भीमसेन तवानुजः । नायाति कस्य वा हेतोर्नाहं वेदेदमञ्जसा ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे भीमसेन, सात महीने बीत गए, पर तुम्हारा भाई नहीं लौटा। उसके विलम्ब का कारण मैं ठीक-ठीक नहीं जानता।

श्लोक 14.8

अपि देवर्षिणाऽऽदिष्टः स कालोऽयमुपस्थितः । यदाऽऽत्मनोऽङ्गमाक्रीडं भगवानुत्सिसृक्षति ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्या देवर्षि नारद द्वारा संकेत किया गया वह समय आ गया, जब भगवान अपनी प्रकट लीला समेटना चाहते हैं?

श्लोक 14.9

यस्मान्नः सम्पदो राज्यं दाराः प्राणाः कुलं प्रजाः । आसन् सपत्नविजयो लोकाश्च यदनुग्रहात् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिनकी कृपा से हमें धन, राज्य, परिवार, जीवन, वंश, प्रजा, शत्रुविजय और श्रेष्ठ लोकों का सौभाग्य मिला, क्या उन्हीं की लीला का अन्त समीप है?

श्लोक 14.10

पश्योत्पातान् नरव्याघ्र दिव्यान् भौमान् सदैहिकान् । दारुणान् शंसतोऽदूराद्भयं नो बुद्धिमोहनम् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे नरश्रेष्ठ, आकाश, पृथ्वी और शरीर में ये भयानक उत्पात देखो; ये किसी निकट आती और बुद्धि को व्याकुल करने वाली विपत्ति का संकेत देते हैं।

श्लोक 14.11

ऊर्वक्षिबाहवो मह्यं स्फुरन्त्यङ्ग पुनः पुनः । वेपथुश्चापि हृदये आराद्दास्यन्ति विप्रियम् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरी जाँघ, आँख और भुजा बार-बार फड़कती हैं, हृदय काँप रहा है; मन को लगता है कि कोई अप्रिय समाचार निकट है।

श्लोक 14.12

शिवैषोद्यन्तमादित्यमभिरौत्यनलानना । मामङ्ग सारमेयोऽयमभिरेभत्यभीरुवत् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह सियारिन उगते सूर्य की ओर मुख करके चिल्ला रही है और यह कुत्ता बिना भय मेरे सामने भौंक रहा है।

श्लोक 14.13

शस्ताः कुर्वन्ति मां सव्यं दक्षिणं पशवोऽपरे । वाहांश्च पुरुषव्याघ्र लक्षये रुदतो मम ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मंगलसूचक पशु बाईं ओर और अन्य पशु दाईं ओर जा रहे हैं; मेरे वाहन के पशु भी मानो रो रहे हों।

श्लोक 14.14

मृत्युदूतः कपोतोऽयमुलूकः कम्पयन् मनः । प्रत्युलूकश्च कुह्वानैरनिद्रौ शून्यमिच्छतः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: कबूतर, उल्लू और उसके प्रतिद्वन्द्वी पक्षी की निरन्तर बोली मन को विचलित कर रही है; वे मानो उजाड़ का संकेत देते हों।

श्लोक 14.15

धूम्रा दिशः परिधयः कम्पते भूः सहाद्रिभिः । निर्घातश्च महांस्तात साकं च स्तनयित्नुभिः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: दिशाएँ धुँधली हैं, सूर्य-चन्द्र के चारों ओर घेरे हैं, पर्वतों सहित पृथ्वी काँप रही है और बिजली की गड़गड़ाहट के साथ बड़े आघात सुनाई देते हैं।

श्लोक 14.16

वायुर्वाति खरस्पर्शो रजसा विसृजंस्तमः । असृग्वर्षन्ति जलदा बीभत्समिव सर्वतः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कठोर स्पर्श वाली हवा धूल से अन्धकार फैला रही है और बादल मानो रक्तवर्ण वर्षा करके चारों ओर भयावह दृश्य बना रहे हैं।

श्लोक 14.17

सूर्यं हतप्रभं पश्य ग्रहमर्दं मिथो दिवि । ससङ्कुलैर्भूतगणैर्ज्वलिते इव रोदसी ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूर्य की प्रभा मन्द है, आकाश में ग्रह परस्पर टकराते जैसे दिखते हैं और व्याकुल प्राणियों सहित आकाश-पृथ्वी मानो जल रहे हों।

श्लोक 14.18

नद्यो नदाश्च क्षुभिताः सरांसि च मनांसि च । न ज्वलत्यग्निराज्येन कालोऽयं किं विधास्यति ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: नदियाँ, जलाशय और मन सब अशान्त हैं। घी डालने पर भी अग्नि ठीक से नहीं जलती; यह समय कौन-सी घटना लाने वाला है?

श्लोक 14.19

न पिबन्ति स्तनं वत्सा न दुह्यन्ति च मातरः । रुदन्त्यश्रुमुखा गावो न हृष्यन्त्यृषभा व्रजे ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: बछड़े दूध नहीं पीते, गायें दूध नहीं देतीं और आँसू बहाती हैं; गोशाला के बैल भी प्रसन्न नहीं हैं।

श्लोक 14.20

दैवतानि रुदन्तीव स्विद्यन्ति ह्युच्चलन्ति च । इमे जनपदा ग्रामाः पुरोद्यानाकराश्रमाः । भ्रष्टश्रियो निरानन्दाः किमघं दर्शयन्ति नः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवप्रतिमाएँ मानो रोती, पसीना बहाती और हिलती लगती हैं। देश, गाँव, नगर, उद्यान, खदानें और आश्रम शोभारहित तथा उदास हैं; ये क्या अनिष्ट सूचित करते हैं?

श्लोक 14.21

मन्य एतैर्महोत्पातैर्नूनं भगवतः पदैः । अनन्यपुरुषश्रीभिर्हीना भूर्हतसौभगा ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन महा उत्पातों से मुझे लगता है कि पृथ्वी अद्वितीय शोभा वाले भगवान के चरणचिह्नों से वंचित होकर अपना सौभाग्य खोने वाली है।

श्लोक 14.22

इति चिन्तयतस्तस्य दृष्टारिष्टेन चेतसा । राज्ञः प्रत्यागमद्ब्रह्मन् यदुपुर्याः कपिध्वजः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा इन अशुभ संकेतों के कारण चिन्तित थे कि उसी समय कपिध्वज अर्जुन द्वारका से लौट आए।

श्लोक 14.23

तं पादयोर्निपतितमयथापूर्वमातुरम् । अधोवदनमब्बिन्दून् सृजन्तं नयनाब्जयोः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अर्जुन ने उनके चरणों में प्रणाम किया। पहले से भिन्न वे अत्यन्त व्याकुल, मुख झुकाए और आँखों से आँसू बहाते दिखाई दिए।

श्लोक 14.24

विलोक्योद्विग्नहृदयो विच्छायमनुजं नृपः । पृच्छति स्म सुहृन्मध्ये संस्मरन् नारदेरितम् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने छोटे भाई को निस्तेज और दुःखी देखकर युधिष्ठिर का हृदय घबरा उठा। नारदजी के वचन याद करके उन्होंने स्वजनों के बीच प्रश्न किए।

श्लोक 14.25

युधिष्ठिर उवाच । कच्चिदानर्तपुर्यां नः स्वजनाः सुखमासते । मधुभोजदशार्हार्हसात्वतान्धकवृष्णयः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: युधिष्ठिर बोले—क्या द्वारका में हमारे मधु, भोज, दशार्ह, अर्ह, सात्वत, अन्धक और वृष्णिवंशी स्वजन कुशल से हैं?

श्लोक 14.26

शूरो मातामहः कच्चित्स्वस्त्यास्ते वाथ मारिषः । मातुलः सानुजः कच्चित्कुशल्यानकदुन्दुभिः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्या हमारे नाना शूर और मामा वसुदेव अपने छोटे भाइयों सहित सुखी हैं?

श्लोक 14.27

सप्त स्वसारस्तत्पत्न्यो मातुलान्यः सहात्मजाः । आसते सस्नुषाः क्षेमं देवकीप्रमुखाः स्वयम् ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्या देवकी आदि सातों मौसियाँ, जो वसुदेवजी की पत्नियाँ हैं, अपने पुत्रों और पुत्रवधुओं सहित कुशल से हैं?

श्लोक 14.28

कच्चिद्राजाऽऽहुको जीवत्यसत्पुत्रोऽस्य चानुजः । हृदीकः ससुतोऽक्रूरो जयन्तगदसारणाः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्या उग्रसेन जीवित और कुशल हैं, जिनका पुत्र कंस दुष्ट था? उनके भाई, हृदीक तथा उनके पुत्र, अक्रूर, जयन्त, गद और सारण कैसे हैं?

श्लोक 14.29

आसते कुशलं कच्चिद्ये च शत्रुजिदादयः । कच्चिदास्ते सुखं रामो भगवान् सात्वतां प्रभुः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: शत्रुजित् आदि स्वजन कुशल से हैं? सात्वतों के स्वामी भगवान बलराम सुखी हैं?

श्लोक 14.30

प्रद्युम्नः सर्ववृष्णीनां सुखमास्ते महारथः । गम्भीररयोऽनिरुद्धो वर्धते भगवानुत ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्या महारथी प्रद्युम्न और गम्भीर पराक्रम वाले अनिरुद्ध कुशलपूर्वक हैं?

श्लोक 14.31

सुषेणश्चारुदेष्णश्च साम्बो जाम्बवतीसुतः । अन्ये च कार्ष्णिप्रवराः सपुत्रा ऋषभादयः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: सुषेण, चारुदेष्ण, जाम्बवतीपुत्र साम्ब तथा ऋषभ आदि श्रीकृष्ण के अन्य श्रेष्ठ पुत्र अपने पुत्रों सहित कुशल हैं?

श्लोक 14.32

तथैवानुचराः शौरेः श्रुतदेवोद्धवादयः । सुनन्दनन्दशीर्षण्या ये चान्ये सात्वतर्षभाः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रुतदेव, उद्धव, सुनन्द, नन्द और अन्य श्रेष्ठ सात्वत सेवक कैसे हैं?

श्लोक 14.33

अपि स्वस्त्यासते सर्वे रामकृष्णभुजाश्रयाः । अपि स्मरन्ति कुशलमस्माकं बद्धसौहृदाः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: बलराम और श्रीकृष्ण की भुजाओं के आश्रय में रहने वाले सब लोग सुखी हैं? क्या वे प्रेमपूर्वक हमारा स्मरण और कुशल-चिन्तन करते हैं?

श्लोक 14.34

भगवानपि गोविन्दो ब्रह्मण्यो भक्तवत्सलः । कच्चित्पुरे सुधर्मायां सुखमास्ते सुहृद्वृतः ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्राह्मणहितैषी और भक्तवत्सल भगवान गोविन्द क्या सुधर्मा सभा में स्वजनों से घिरे सुखपूर्वक विराजते हैं?

श्लोक 14.35

मङ्गलाय च लोकानां क्षेमाय च भवाय च । आस्ते यदुकुलाम्भोधावाद्योऽनन्तसखः पुमान् ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: आदि पुरुष श्रीकृष्ण अनन्त बलराम के साथ यदुवंशरूपी समुद्र में लोकों के मंगल, सुरक्षा और कल्याण के लिए रहते हैं।

श्लोक 14.36

यद्बाहुदण्डगुप्तायां स्वपुर्यां यदवोऽर्चिताः । क्रीडन्ति परमानन्दं महापौरुषिका इव ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी भुजाओं से सुरक्षित द्वारका में यदुवंशी सम्मान और परम आनन्द के साथ ऐसे रहते हैं, जैसे दिव्य लोक के निवासी।

श्लोक 14.37

यत्पादशुश्रूषणमुख्यकर्मणा सत्यादयो द्व्यष्टसहस्रयोषितः । निर्जित्य सङ्ख्ये त्रिदशांस्तदाशिषो हरन्ति वज्रायुधवल्लभोचिताः ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके चरणों की सेवा को प्रधान मानने वाली सत्यभामा आदि रानियों को देवताओं पर विजय के बाद देवपत्नी के योग्य पारिजात आदि सौभाग्य प्राप्त हुए।

श्लोक 14.38

यद्बाहुदण्डाभ्युदयानुजीविनो यदुप्रवीरा ह्यकुतोभया मुहुः । अधिक्रमन्त्यङ्घ्रिभिराहृतां बला- त्सभां सुधर्मां सुरसत्तमोचिताम् ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रीकृष्ण के बाहुबल पर निर्भर निर्भय यदुवीर देवताओं के योग्य सुधर्मा सभा में प्रवेश करते और उसका उपयोग करते हैं।

श्लोक 14.39

कच्चित्तेऽनामयं तात भ्रष्टतेजा विभासि मे । अलब्धमानोऽवज्ञातः किं वा तात चिरोषितः ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रिय अर्जुन, तुम स्वयं कुशल तो हो? तुम्हारा तेज मन्द लगता है। क्या तुम्हारा आदर नहीं हुआ, अपमान हुआ, अथवा अधिक समय बाहर रहने से दुःखी हो?

श्लोक 14.40

कच्चिन्नाभिहतोऽभावैः शब्दादिभिरमङ्गलैः । न दत्तमुक्तमर्थिभ्य आशया यत्प्रतिश्रुतम् ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्या किसी ने कठोर और अमंगल वचनों से तुम्हें चोट पहुँचाई? कहीं आशा लेकर आए याचक को वचन देने पर भी तुम कुछ दे नहीं सके?

श्लोक 14.41

कच्चित्त्वं ब्राह्मणं बालं गां वृद्धं रोगिणं स्त्रियम् । शरणोपसृतं सत्त्वं नात्याक्षीः शरणप्रदः ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: शरण देने वाले अर्जुन, कहीं तुमने आश्रय माँगने वाले ब्राह्मण, बालक, गाय, वृद्ध, रोगी, स्त्री या किसी जीव को असहाय तो नहीं छोड़ दिया?

श्लोक 14.42

कच्चित्त्वं नागमोऽगम्यां गम्यां वाऽसत्कृतां स्त्रियम् । पराजितो वाथ भवान् नोत्तमैर्नासमैः पथि ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: कहीं तुमने अनुचित संबंध तो नहीं बनाया, या सम्मान योग्य स्त्री का अनादर तो नहीं किया? क्या मार्ग में अपने से हीन अथवा समान शत्रु से पराजय हुई?

श्लोक 14.43

अपि स्वित्पर्यभुङ्क्थास्त्वं सम्भोज्यान् वृद्धबालकान् । जुगुप्सितं कर्म किञ्चित्कृतवान् न यदक्षमम् ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: कहीं वृद्धों और बच्चों को भोजन कराए बिना स्वयं तो नहीं खा लिया? क्या कोई ऐसा निन्दनीय काम हुआ जिसे नहीं करना चाहिए था?

श्लोक 14.44

कच्चित्प्रेष्ठतमेनाथ हृदयेनात्मबन्धुना । शून्योऽस्मि रहितो नित्यं मन्यसे तेऽन्यथा न रुक् ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: या फिर अपने परम प्रिय, हृदयस्वरूप सखा श्रीकृष्ण से बिछुड़कर तुम स्वयं को शून्य अनुभव कर रहे हो? मुझे तुम्हारी ऐसी पीड़ा का दूसरा कारण नहीं लगता।

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 14 समाप्त ॥

प्रथम स्कन्ध • अध्याय 15

अर्जुन का विरह, गीता-स्मरण और पाण्डवों का प्रस्थान

श्लोक 15.1

सूत उवाच । एवं कृष्णसखः कृष्णो भ्रात्रा राज्ञा विकल्पितः । नानाशङ्कास्पदं रूपं कृष्णविश्लेषकर्शितः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—राजा के अनेक आशंकाभरे प्रश्न सुनकर श्रीकृष्ण के सखा अर्जुन और अधिक दुःखी हुए; उनका यह रूप भगवान के वियोग से हुआ था।

श्लोक 15.2

शोकेन शुष्यद्वदनहृत्सरोजो हतप्रभः । विभुं तमेवानुध्यायन्नाशक्नोत्प्रतिभाषितुम् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: शोक से उनका मुख और हृदय मुरझा गए थे, तेज मन्द था। वे भगवान का ही ध्यान करते हुए उत्तर नहीं दे पा रहे थे।

श्लोक 15.3

कृच्छ्रेण संस्तभ्य शुचः पाणिनाऽऽमृज्य नेत्रयोः । परोक्षेण समुन्नद्धप्रणयौत्कण्ठ्यकातरः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: कठिनाई से शोक सँभालकर और हाथ से आँसू पोंछकर उन्होंने अपने अदृश्य हुए सखा के लिए उमड़ती प्रेम-वेदना को रोका।

श्लोक 15.4

सख्यं मैत्रीं सौहृदं च सारथ्यादिषु संस्मरन् । नृपमग्रजमित्याह बाष्पगद्गदया गिरा ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: सारथि रूप और अन्य अवसरों की मित्रता, आत्मीयता तथा प्रेम याद करके वे बड़े भाई से आँसुओं से रुंधे स्वर में बोले।

श्लोक 15.5

अर्जुन उवाच । वञ्चितोऽहं महाराज हरिणा बन्धुरूपिणा । येन मेऽपहृतं तेजो देवविस्मापनं महत् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अर्जुन बोले—महाराज, बन्धुरूप श्रीहरि ने मुझे अपने प्रत्यक्ष साथ से वंचित कर दिया है। उनके जाने से देवताओं को चकित करने वाला मेरा सामर्थ्य भी चला गया।

श्लोक 15.6

यस्य क्षणवियोगेन लोको ह्यप्रियदर्शनः । उक्थेन रहितो ह्येष मृतकः प्रोच्यते यथा ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिनके क्षणभर के वियोग से संसार अप्रिय लगता है, वे ही हमारे जीवन थे; जैसे प्राण के बिना शरीर मृत कहलाता है।

श्लोक 15.7

यत्संश्रयाद्द्रुपदगेहमुपागतानां राज्ञां स्वयंवरमुखे स्मरदुर्मदानाम् । तेजो हृतं खलु मयाभिहतश्च मत्स्यः सज्जीकृतेन धनुषाधिगता च कृष्णा ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्हीं के आश्रय से मैंने द्रौपदी के स्वयंवर में गर्वित राजाओं का तेज दबाया, धनुष चढ़ाकर मत्स्यलक्ष्य भेदा और द्रौपदी को प्राप्त किया।

श्लोक 15.8

यत्सन्निधावहमु खाण्डवमग्नयेऽदा- मिन्द्रं च सामरगणं तरसा विजित्य । लब्धा सभा मयकृताद्भुतशिल्पमाया दिग्भ्योऽहरन् नृपतयो बलिमध्वरे ते ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्हीं के साथ मैंने देवताओं सहित इन्द्र का सामना करके खाण्डव वन अग्नि को दिया। मय की बनाई अद्भुत सभा मिली और आपके यज्ञ में दिशाओं के राजा भेंट लाए।

श्लोक 15.9

यत्तेजसा नृपशिरोऽङ्घ्रिमहन् मखार्थे आर्योऽनुजस्तव गजायुतसत्त्ववीर्यः । तेनाहृताः प्रमथनाथमखाय भूपा यन्मोचितास्तदनयन् बलिमध्वरे ते ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्हीं के प्रभाव से भीम ने दस हजार हाथियों के बल वाले जरासन्ध को मार गिराया। उसके द्वारा बन्दी बनाए गए राजा मुक्त होकर आपके यज्ञ में उपहार लाए।

श्लोक 15.10

पत्न्यास्तवाधिमखकॢप्तमहाभिषेक- श्लाघिष्ठचारुकबरं कितवैः सभायाम् । स्पृष्टं विकीर्य पदयोः पतिताश्रुमुख्या यस्तत्स्त्रियोऽकृतहतेशविमुक्तकेशाः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजसूय में अभिषिक्त द्रौपदी के सुन्दर केश सभा में दुष्टों ने पकड़कर बिखेरे थे। उनके आँसुओं भरे समर्पण का प्रतिकार भगवान ने उन अपराधियों की पत्नियों को विधवा करके किया।

श्लोक 15.11

यो नो जुगोप वनमेत्य दुरन्तकृच्छ्रा- द्दुर्वाससोऽरिरचितादयुताग्रभुग् यः । शाकान्नशिष्टमुपयुज्य यतस्त्रिलोकीं तृप्ताममंस्त सलिले विनिमग्नसङ्घः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: वनवास में शत्रुओं की योजना से आए दुर्वासा और उनके हजारों शिष्यों के प्रसंग में भगवान ने बचे हुए अन्न का अंश खाकर हमारी रक्षा की; स्नान कर रहे सबने स्वयं को पूर्ण तृप्त पाया।

श्लोक 15.12

यत्तेजसाथ भगवान् युधि शूलपाणि- र्विस्मापितः सगिरिजोऽस्त्रमदान्निजं मे । अन्येऽपि चाहममुनैव कलेवरेण प्राप्तो महेन्द्रभवने महदासनार्धम् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्हीं के प्रभाव से युद्ध में शिवजी और पार्वती प्रसन्न हुए तथा मुझे दिव्य अस्त्र मिला। इसी शरीर से मुझे इन्द्रलोक में इन्द्र के साथ आसन का भाग भी प्राप्त हुआ।

श्लोक 15.13

तत्रैव मे विहरतो भुजदण्डयुग्मं गाण्डीवलक्षणमरातिवधाय देवाः । सेन्द्राः श्रिता यदनुभावितमाजमीढ तेनाहमद्य मुषितः पुरुषेण भूम्ना ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्रलोक में देवताओं ने दैत्यों के वध के लिए मेरी उन्हीं गाण्डीवधारी भुजाओं का आश्रय लिया, जिन्हें श्रीकृष्ण ने सामर्थ्य दिया था। आज उसी परम पुरुष के बिना मैं निर्बल हूँ।

श्लोक 15.14

यद्बान्धवः कुरुबलाब्धिमनन्तपार- मेको रथेन ततरेऽहमतार्यसत्त्वम् । प्रत्याहृतं बहुधनं च मया परेषां तेजास्पदं मणिमयं च हृतं शिरोभ्यः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी सहायता से मैंने अकेले रथ पर बैठकर कौरवसेनारूपी दुस्तर समुद्र पार किया, विरोधियों से गोधन और सम्पत्ति लौटाई तथा उनके मस्तकों के रत्नमय मुकुट छीन लिए।

श्लोक 15.15

यो भीष्मकर्णगुरुशल्यचमूष्वदभ्र- राजन्यवर्यरथमण्डलमण्डितासु । अग्रेचरो मम विभो रथयूथपाना- मायुर्मनांसि च दृशा सह ओज आर्च्छत् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: भीष्म, कर्ण, द्रोण और शल्य आदि की विशाल सेनाओं के सामने मेरे आगे रहते हुए भगवान अपनी दृष्टि से शत्रु रथियों की आयु, उत्साह और शक्ति क्षीण कर देते थे।

श्लोक 15.16

यद्दोष्षु मा प्रणिहितं गुरुभीष्मकर्ण- नप्तृत्रिगर्तशलसैन्धवबाह्लिकाद्यैः । अस्त्राण्यमोघमहिमानि निरूपितानि नोपस्पृशुर्नृहरिदासमिवासुराणि ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: द्रोण, भीष्म, कर्ण, अश्वत्थामा, त्रिगर्त, शल्य, जयद्रथ और बाह्लीक आदि के अमोघ अस्त्र उनके आश्रय से मुझे नहीं छू सके, जैसे असुरों के अस्त्र प्रह्लाद को हानि न पहुँचा सके।

श्लोक 15.17

सौत्ये वृतः कुमतिनाऽऽत्मद ईश्वरो मे यत्पादपद्ममभवाय भजन्ति भव्याः । मां श्रान्तवाहमरयो रथिनो भुविष्ठं न प्राहरन् यदनुभावनिरस्तचित्ताः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिन भगवान के चरणों का साधु मुक्ति के लिए भजन करते हैं, उन्हें मैंने सारथि बनाया। उनके प्रभाव से घोड़ों को जल पिलाते समय रथ से उतरे मुझ पर शत्रु प्रहार नहीं कर सके।

श्लोक 15.18

नर्माण्युदाररुचिरस्मितशोभितानि हे पार्थ हेऽर्जुन सखे कुरुनन्दनेति । सञ्जल्पितानि नरदेव हृदिस्पृशानि स्मर्तुर्लुठन्ति हृदयं मम माधवस्य ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी मधुर मुस्कान, हँसी-ठिठोली और “हे पार्थ, हे अर्जुन, हे सखा, हे कुरुनन्दन” जैसे आत्मीय सम्बोधन याद करके मेरा हृदय व्याकुल हो उठता है।

श्लोक 15.19

शय्यासनाटनविकत्थनभोजनादि- ष्वैक्याद्वयस्य ऋतवानिति विप्रलब्धः । सख्युः सखेव पितृवत्तनयस्य सर्वं सेहे महान् महितया कुमतेरघं मे ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: साथ सोते, बैठते, घूमते और खाते समय निकटता में मैंने कभी उन्हें उलाहना भी दिया। वे मेरी सभी भूलें मित्र की तरह, और पिता जैसे पुत्र की, सहते रहे।

श्लोक 15.20

सोऽहं नृपेन्द्र रहितः पुरुषोत्तमेन सख्या प्रियेण सुहृदा हृदयेन शून्यः । अध्वन्युरुक्रमपरिग्रहमङ्ग रक्षन् गोपैरसद्भिरबलेव विनिर्जितोऽस्मि ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: आज अपने प्रिय सखा और हितैषी पुरुषोत्तम के बिना मेरा हृदय सूना है। मार्ग में उनकी रानियों की रक्षा करते हुए साधारण लुटेरों से मैं असहाय की तरह हार गया।

श्लोक 15.21

तद्वै धनुस्त इषवः स रथो हयास्ते सोऽहं रथी नृपतयो यत आनमन्ति । सर्वं क्षणेन तदभूदसदीशरिक्तं भस्मन् हुतं कुहकराद्धमिवोप्तमूष्याम् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: वही धनुष, बाण, रथ, घोड़े और मैं धनुर्धर था, जिसके सामने राजा झुकते थे; पर भगवान के बिना सब क्षणभर में निष्फल हो गया, जैसे राख में आहुति या ऊसर में बीज।

श्लोक 15.22

राजंस्त्वयानुपृष्टानां सुहृदां नः सुहृत्पुरे । विप्रशापविमूढानां निघ्नतां मुष्टिभिर्मिथः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिन द्वारकावासी स्वजनों की कुशल आपने पूछी, वे ब्राह्मणों के शाप से विवेक खोकर परस्पर लड़ पड़े।

श्लोक 15.23

वारुणीं मदिरां पीत्वा मदोन्मथितचेतसाम् । अजानतामिवान्योन्यं चतुःपञ्चावशेषिताः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मदिरा के नशे से उन्मत्त होकर वे एक-दूसरे को मानो पहचान न सके और आपसी प्रहार में केवल चार-पाँच ही बचे।

श्लोक 15.24

प्रायेणैतद्भगवत ईश्वरस्य विचेष्टितम् । मिथो निघ्नन्ति भूतानि भावयन्ति च यन्मिथः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुझे लगता है कि यह ईश्वर की ही लीला है, जिनकी व्यवस्था में जीव एक-दूसरे के जीवन और विनाश का कारण बनते हैं।

श्लोक 15.25

जलौकसां जले यद्वन्महान्तोऽदन्त्यणीयसः । दुर्बलान् बलिनो राजन् महान्तो बलिनो मिथः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे जल में बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियों को खाती हैं और बड़े बलवान आपस में भी लड़ते हैं, वैसे ही यह घटना हुई।

श्लोक 15.26

एवं बलिष्ठैर्यदुभिर्महद्भिरितरान् विभुः । यदून् यदुभिरन्योन्यं भूभारान् सञ्जहार ह ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने शक्तिशाली यदुवंशियों से अन्य भारस्वरूप यदुओं को और फिर परस्पर संघर्ष से शेष यदुओं को पृथ्वी से हटा दिया।

श्लोक 15.27

देशकालार्थयुक्तानि हृत्तापोपशमानि च । हरन्ति स्मरतश्चित्तं गोविन्दाभिहितानि मे ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: समय, परिस्थिति और प्रयोजन के अनुसार कहे गोविन्द के वे वचन, जो हृदय का ताप मिटाते थे, स्मरण करने पर आज भी मेरा चित्त हर लेते हैं।

श्लोक 15.28

सूत उवाच । एवं चिन्तयतो जिष्णोः कृष्णपादसरोरुहम् । सौहार्देनातिगाढेन शान्ताऽऽसीद्विमला मतिः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—इस प्रकार गहरे प्रेम से श्रीकृष्ण के चरणकमलों का चिन्तन करते-करते अर्जुन की बुद्धि निर्मल और शान्त हो गई।

श्लोक 15.29

वासुदेवाङ्घ्र्यनुध्यानपरिबृंहितरंहसा । भक्त्या निर्मथिताशेषकषायधिषणोऽर्जुनः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: वासुदेव के चरणों के ध्यान से बढ़ी भक्ति ने अर्जुन की बुद्धि के समस्त आन्तरिक मल और विकारों को दूर कर दिया।

श्लोक 15.30

गीतं भगवता ज्ञानं यत्तत्सङ्ग्राममूर्धनि । कालकर्मतमोरुद्धं पुनरध्यगमत्प्रभुः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: रणभूमि में भगवान ने जो गीता का ज्ञान दिया था और जो काल, कर्म तथा अज्ञान से ढक गया था, वह उन्हें फिर स्पष्ट हो गया।

श्लोक 15.31

विशोको ब्रह्मसम्पत्त्या सञ्च्छिन्नद्वैतसंशयः । लीनप्रकृतिनैर्गुण्यादलिङ्गत्वादसम्भवः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मस्वरूप की अनुभूति से उनका शोक और द्वैत के संशय मिट गए। प्रकृति के गुणों का बन्धन छूटने से पुनर्जन्म का कारण भी समाप्त हो गया।

श्लोक 15.32

निशम्य भगवन्मार्गं संस्थां यदुकुलस्य च । स्वःपथाय मतिं चक्रे निभृतात्मा युधिष्ठिरः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की लीला-समाप्ति और यदुवंश के विनाश का समाचार सुनकर युधिष्ठिर ने मन स्थिर किया और संसार से प्रस्थान का निश्चय किया।

श्लोक 15.33

पृथाप्यनुश्रुत्य धनञ्जयोदितं नाशं यदूनां भगवद्गतिं च ताम् । एकान्तभक्त्या भगवत्यधोक्षजे निवेशितात्मोपरराम संसृतेः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अर्जुन से यदुवंश के विनाश और भगवान के अन्तर्धान का समाचार सुनकर कुन्ती ने अनन्य भक्ति से अपना चित्त भगवान में लगाया और संसारबन्धन से मुक्त हुईं।

श्लोक 15.34

ययाहरद्भुवो भारं तां तनुं विजहावजः । कण्टकं कण्टकेनेव द्वयं चापीशितुः समम् ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: अजन्मा भगवान ने पृथ्वी का भार दूर करने वाली अपनी प्रकट लीला समेट ली। उनके लिए भारहरण और लीला-समापन दोनों समान रूप से स्वाधीन हैं, जैसे काँटे से काँटा निकालकर दोनों छोड़ दिए जाएँ।

श्लोक 15.35

यथा मत्स्यादिरूपाणि धत्ते जह्याद्यथा नटः । भूभारः क्षपितो येन जहौ तच्च कलेवरम् ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे नट अनेक वेश धारण करके उन्हें छोड़ता है, वैसे भगवान मत्स्य आदि रूपों की लीला करते हैं; पृथ्वी का भार मिटने पर उन्होंने यह प्रकट लीला भी समेट ली।

श्लोक 15.36

यदा मुकुन्दो भगवानिमां महीं जहौ स्वतन्वा श्रवणीयसत्कथः । तदा हरेवाप्रतिबुद्धचेतसा- मधर्महेतुः कलिरन्ववर्तत ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिस दिन श्रवणयोग्य पवित्र कथाओं वाले मुकुन्द ने अपनी प्रकट उपस्थिति पृथ्वी से समेटी, उसी दिन असावधान लोगों में अधर्म का कारण कलि प्रभावी होने लगा।

श्लोक 15.37

युधिष्ठिरस्तत्परिसर्पणं बुधः पुरे च राष्ट्रे च गृहे तथाऽऽत्मनि । विभाव्य लोभानृतजिह्महिंसना- द्यधर्मचक्रं गमनाय पर्यधात् ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: नगर, राज्य, घर और मन में लोभ, असत्य, कुटिलता तथा हिंसा बढ़ते देखकर विवेकी युधिष्ठिर ने प्रस्थान की तैयारी की।

श्लोक 15.38

स्वराट् पौत्रं विनयिनमात्मनः सुसमं गुणैः । तोयनीव्याः पतिं भूमेरभ्यषिञ्चद्गजाह्वये ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने अपने समान सद्गुणों वाले विनयी पौत्र परीक्षित का हस्तिनापुर में समुद्रपर्यन्त पृथ्वी के राजा के रूप में अभिषेक किया।

श्लोक 15.39

मथुरायां तथा वज्रं शूरसेनपतिं ततः । प्राजापत्यां निरूप्येष्टिमग्नीनपिबदीश्वरः ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मथुरा में वज्र को शूरसेन का राजा बनाया और प्राजापत्य अनुष्ठान करके अग्नियों को अपने भीतर समाहित किया।

श्लोक 15.40

विसृज्य तत्र तत्सर्वं दुकूलवलयादिकम् । निर्ममो निरहङ्कारः सञ्च्छिन्नाशेषबन्धनः ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: रेशमी वस्त्र और आभूषण आदि छोड़कर वे ममता, अहंकार और शेष बन्धनों से मुक्त हो गए।

श्लोक 15.41

वाचं जुहाव मनसि तत्प्राण इतरे च तम् । मृत्यावपानं सोत्सर्गं तं पञ्चत्वे ह्यजोहवीत् ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने वाणी को मन में, मन को प्राण में और प्राण को अपान में लीन किया; फिर अपान और देहत्याग के भाव को पंचतत्त्वों में समर्पित किया।

श्लोक 15.42

त्रित्वे हुत्वाथ पञ्चत्वं तच्चैकत्वेऽजुहोन्मुनिः । सर्वमात्मन्यजुहवीद्ब्रह्मण्यात्मानमव्यये ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: पाँच तत्त्वों को उनके कारण गुणों में, गुणों को उनके मूल कारण में और समस्त कारणों को आत्मा में लीन करके आत्मा को अविनाशी ब्रह्म में स्थित किया।

श्लोक 15.43

चीरवासा निराहारो बद्धवाङ्मुक्तमूर्धजः । दर्शयन्नात्मनो रूपं जडोन्मत्तपिशाचवत् ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: चीरवस्त्र धारण करके, भोजन और वाणी का संयम करके तथा केश खुले रखकर वे लोकव्यवहार से विरक्त, साधारण दृष्टि में जड़ अथवा उन्मत्त जैसे दिखाई देते थे।

श्लोक 15.44

अनवेक्षमाणो निरगादश‍ृण्वन् बधिरो यथा । उदीचीं प्रविवेशाशां गतपूर्वां महात्मभिः । हृदि ब्रह्म परं ध्यायन् नावर्तेत यतो गतः ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: किसी की ओर अपेक्षा से न देखते और किसी पुकार पर न रुकते हुए वे महात्माओं के मार्ग से उत्तर दिशा को चले। हृदय में उस परब्रह्म का ध्यान था, जहाँ से लौटना नहीं पड़ता।

श्लोक 15.45

सर्वे तमनुनिर्जग्मुर्भ्रातरः कृतनिश्चयाः । कलिनाधर्ममित्रेण दृष्ट्वा स्पृष्टाः प्रजा भुवि ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अधर्म के मित्र कलि का प्रजा पर प्रभाव देखकर उनके सभी भाइयों ने भी दृढ़ निश्चय से उन्हीं का अनुसरण किया।

श्लोक 15.46

ते साधुकृतसर्वार्था ज्ञात्वाऽऽत्यन्तिकमात्मनः । मनसा धारयामासुर्वैकुण्ठचरणाम्बुजम् ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जीवन के आवश्यक कर्तव्य पूर्ण करके और परम कल्याण का निश्चय जानकर उन्होंने मन में भगवान के चरणकमलों को धारण किया।

श्लोक 15.47

तद्ध्यानोद्रिक्तया भक्त्या विशुद्धधिषणाः परे । तस्मिन् नारायणपदे एकान्तमतयो गतिम् ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस ध्यान से प्रबल हुई भक्ति ने उनकी बुद्धि शुद्ध कर दी। वे एकनिष्ठ होकर नारायण के परम पद की ओर अग्रसर हुए।

श्लोक 15.48

अवापुर्दुरवापां ते असद्भिर्विषयात्मभिः । विधूतकल्मषा स्थानं विरजेनात्मनैव हि ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: पापमल से मुक्त होकर उन्होंने निर्मल आत्मभाव से वह दुर्लभ परम स्थिति प्राप्त की, जो विषयासक्त और असत्प्रवृत्ति वाले लोगों के लिए दुर्गम है।

श्लोक 15.49

विदुरोऽपि परित्यज्य प्रभासे देहमात्मवान् । कृष्णावेशेन तच्चित्तः पितृभिः स्वक्षयं ययौ ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर ने भी प्रभास में शरीर त्यागकर श्रीकृष्ण में चित्त लगाया और अपने मूल यमस्वरूप के धाम को प्राप्त हुए।

श्लोक 15.50

द्रौपदी च तदाऽऽज्ञाय पतीनामनपेक्षताम् । वासुदेवे भगवति ह्येकान्तमतिराप तम् ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: द्रौपदी ने पतियों की संसार से पूर्ण विरक्ति जानकर भगवान वासुदेव में एकनिष्ठ मन लगाया और उन्हीं को प्राप्त हुईं।

श्लोक 15.51

यः श्रद्धयैतद्भगवत्प्रियाणां पाण्डोः सुतानामिति सम्प्रयाणम् । श‍ृणोत्यलं स्वस्त्ययनं पवित्रं लब्ध्वा हरौ भक्तिमुपैति सिद्धिम् ॥ ५१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो श्रद्धा से भगवान के प्रिय पाण्डवों के इस पवित्र और कल्याणकारी प्रस्थान की कथा सुनता है, वह श्रीहरि की भक्ति पाकर जीवन की सिद्धि की ओर बढ़ता है।

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 15 समाप्त ॥

पाठाधार और संपादकीय जानकारी

मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents का “श्रीमद्भागवतं—प्रथमस्कन्धः” है। कोष्ठकों में दिए अतिरिक्त पाठ और वैकल्पिक पाठान्तर मुख्य श्लोकों में नहीं जोड़े गए हैं। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना की स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है; किसी आधुनिक टीका की प्रतिलिपि नहीं है। यह प्रथम स्कन्ध का क्रमिक भाग 5 है।

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भक्ति भावना • मूल पाठ और सरल हिंदी भावार्थ

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