श्रीमद्भागवत महापुराण प्रथम स्कन्ध भाग 5 — अध्याय 13–15, विदुर उपदेश और पाण्डव प्रस्थान
श्रीमद्भागवत महापुराण
प्रथम स्कन्ध • भाग ५ • अध्याय १३–१५
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विदुर उपदेश और पाण्डव प्रस्थान
विदुर का वैराग्य-उपदेश, धृतराष्ट्र का वनगमन, श्रीकृष्ण के वियोग में अर्जुन और पाण्डवों के महाप्रस्थान की कथा।
यहाँ अध्याय 13–15 के सभी 154 श्लोक मूल क्रम में हैं। प्रत्येक के साथ स्वतंत्र रूप से लिखा सरल हिंदी भावार्थ है।
प्रथम स्कन्ध • अध्याय 13
विदुर का उपदेश, धृतराष्ट्र का वनगमन और नारद का आश्वासन
श्लोक 13.1
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—तीर्थयात्रा में मैत्रेयजी से आत्मकल्याण का मार्ग जानकर और अपनी जिज्ञासा का समाधान पाकर विदुर हस्तिनापुर लौट आए।
श्लोक 13.2
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेयजी से अनेक प्रश्न पूछने के बाद विदुर के हृदय में गोविन्द की अनन्य भक्ति जाग गई; तब आगे पूछने की आवश्यकता नहीं रही।
श्लोक 13.3
सरल हिंदी भावार्थ: उन्हें लौटा देखकर युधिष्ठिर, उनके भाई, धृतराष्ट्र, युयुत्सु, संजय, कृपाचार्य और कुन्ती प्रसन्न हुए।
श्लोक 13.4
सरल हिंदी भावार्थ: गान्धारी, द्रौपदी, सुभद्रा, उत्तरा, कृपी तथा पाण्डुवंश के अन्य संबंधी और स्त्रियाँ अपने बालकों सहित स्वागत करने आईं।
श्लोक 13.5
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे शरीर में प्राण लौट आए हों, वैसे सब हर्षित होकर आगे बढ़े और यथायोग्य आलिंगन तथा प्रणाम से विदुर का स्वागत किया।
श्लोक 13.6
सरल हिंदी भावार्थ: लम्बे वियोग की व्याकुलता प्रेम के आँसुओं में बह निकली। विदुर के आसन ग्रहण करने पर राजा ने उनका आदर-सत्कार किया।
श्लोक 13.7
सरल हिंदी भावार्थ: भोजन और विश्राम के बाद वे सुखपूर्वक बैठे तो युधिष्ठिर ने विनय से झुककर सबके सामने उनसे निवेदन किया।
श्लोक 13.8
सरल हिंदी भावार्थ: युधिष्ठिर बोले—क्या आपको हमारी याद आती थी? हम आपकी छत्रछाया में पले हैं; आपने माता सहित हमें विष, अग्नि और अनेक विपत्तियों से बचाया था।
श्लोक 13.9
सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी पर विचरते हुए आपने किस प्रकार निर्वाह किया और किन प्रमुख तीर्थों तथा पवित्र क्षेत्रों की सेवा की?
श्लोक 13.10
सरल हिंदी भावार्थ: आप जैसे भगवद्भक्त स्वयं तीर्थस्वरूप हैं। हृदय में विराजमान भगवान के प्रभाव से आप तीर्थों को भी पवित्र करते हैं।
श्लोक 13.11
सरल हिंदी भावार्थ: तात, क्या आपने श्रीकृष्ण को आराध्य मानने वाले हमारे यदुवंशी स्वजनों को देखा या उनका समाचार सुना? क्या वे अपनी नगरी में सुखी हैं?
श्लोक 13.12
सरल हिंदी भावार्थ: धर्मराज के पूछने पर विदुर ने अपने अनुभव क्रम से बताए, किन्तु यदुवंश के विनाश का समाचार नहीं कहा।
श्लोक 13.13
सरल हिंदी भावार्थ: करुणामय विदुर अपने स्वजनों को दुःखी नहीं देख सकते थे; इसलिए उन्होंने उस असह्य और अपने-आप आ पहुँची अप्रिय घटना को नहीं बताया।
श्लोक 13.14
सरल हिंदी भावार्थ: वे कुछ समय देवता के समान सम्मान पाकर वहाँ रहे। सबको प्रसन्न करते हुए उन्होंने बड़े भाई धृतराष्ट्र के परम कल्याण का उपाय किया।
श्लोक 13.15
सरल हिंदी भावार्थ: जिस समय शाप के कारण यमराज सौ वर्षों तक विदुर के रूप में जन्मे थे, उस अवधि में अर्यमा अपराधियों को उचित दण्ड देने का कार्य करते थे।
श्लोक 13.16
सरल हिंदी भावार्थ: राज्य प्राप्त करके और वंश को आगे बढ़ाने वाला पौत्र देखकर युधिष्ठिर लोकपालों जैसे अपने भाइयों सहित समृद्धि का आनन्द ले रहे थे।
श्लोक 13.17
सरल हिंदी भावार्थ: घर-परिवार के कामों और आसक्ति में लगे लोगों को पता भी न चला और दुस्तर काल निरन्तर आगे बढ़ता गया।
श्लोक 13.18
सरल हिंदी भावार्थ: यह देखकर विदुर ने धृतराष्ट्र से कहा—राजन्, अब शीघ्र यहाँ से निकल चलिए; देखिए, जीवन के अन्त का भय निकट आ गया है।
श्लोक 13.19
सरल हिंदी भावार्थ: जिसका कोई किसी भी उपाय से प्रतिकार नहीं कर सकता, वही सामर्थ्यवान काल हम सबके निकट आ पहुँचा है।
श्लोक 13.20
सरल हिंदी भावार्थ: उसकी पकड़ में आया मनुष्य अपने सबसे प्यारे प्राणों से भी बिछुड़ जाता है; फिर धन और अन्य वस्तुओं की क्या बात है?
श्लोक 13.21
सरल हिंदी भावार्थ: आपके पिता, भाई, मित्र और पुत्र चले गए; आयु ढल गई, शरीर वृद्ध हो गया, फिर भी आप दूसरों के घर पर आश्रित हैं।
श्लोक 13.22
सरल हिंदी भावार्थ: जीव की जीने की इच्छा कितनी प्रबल है! आप भीम द्वारा दिया हुआ अन्न लेकर घर की रखवाली करने वाले आश्रित की तरह जीवन बिताते हैं।
श्लोक 13.23
सरल हिंदी भावार्थ: जिन्हें आपने आग, विष, अपमान और राज्य तथा धन के हरण से कष्ट पहुँचाया, उन्हीं के अन्न से टिके जीवन को अब और कितना खींचेंगे?
श्लोक 13.24
सरल हिंदी भावार्थ: जीने की इच्छा और अनिच्छा के बावजूद यह वृद्ध शरीर पुराने वस्त्र की तरह क्षीण होकर नष्ट होगा।
श्लोक 13.25
सरल हिंदी भावार्थ: जो शरीर की उपयोगिता समाप्त होती देखकर उससे विरक्त हो, संबंधों का बन्धन छोड़े और एकान्त में देहाभिमान त्याग दे, वही धीर कहा जाता है।
श्लोक 13.26
सरल हिंदी भावार्थ: अपने विवेक से अथवा दूसरे के उपदेश से वैराग्य पाकर जो मनुष्य हृदय में हरि को धारण कर घर से निकलता है, वह श्रेष्ठ पुरुष है।
श्लोक 13.27
सरल हिंदी भावार्थ: अब आप गुप्त रूप से उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान करें; आगे आने वाला समय प्रायः मनुष्यों के सद्गुणों को क्षीण करने वाला है।
श्लोक 13.28
सरल हिंदी भावार्थ: छोटे भाई विदुर के उपदेश से धृतराष्ट्र का विवेक जागा। उन्होंने स्वजनों के स्नेह का दृढ़ बन्धन काटकर भाई के बताए मार्ग से प्रस्थान किया।
श्लोक 13.29
सरल हिंदी भावार्थ: पतिव्रता गान्धारी भी पति के पीछे हिमालय की ओर चलीं। संयमी साधकों को वहाँ ऐसा उत्साह मिलता है, जैसे वीरों को धर्मयुद्ध में।
श्लोक 13.30
सरल हिंदी भावार्थ: प्रातः संध्या और अग्निहोत्र करके तथा तिल, गाय, भूमि और स्वर्ण से ब्राह्मणों का सम्मान करके युधिष्ठिर गुरुजनों को प्रणाम करने आए, पर धृतराष्ट्र, विदुर और गान्धारी नहीं मिले।
श्लोक 13.31
सरल हिंदी भावार्थ: चिन्तित राजा ने वहाँ बैठे संजय से पूछा—हे गावल्गणि, हमारे वृद्ध और नेत्रहीन ताऊजी कहाँ हैं?
श्लोक 13.32
सरल हिंदी भावार्थ: पुत्रशोक से दुःखी गान्धारी माता और हितैषी विदुर कहाँ गए? कहीं मेरे व्यवहार में दोष समझकर दुःखी धृतराष्ट्र ने पत्नी सहित गङ्गा में प्रवेश तो नहीं कर लिया?
श्लोक 13.33
सरल हिंदी भावार्थ: पिता पाण्डु के निधन के बाद इन दोनों पितृव्यों ने हम अनाथ बालकों को विपत्तियों से बचाया था; अब वे कहाँ चले गए?
श्लोक 13.34
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—स्वामी के वियोग से पीड़ित संजय स्नेह और करुणा के कारण इतने व्याकुल थे कि तत्काल उत्तर नहीं दे सके।
श्लोक 13.35
सरल हिंदी भावार्थ: फिर हाथों से आँसू पोंछकर और मन को सँभालकर उन्होंने अपने स्वामी के चरणों का स्मरण करते हुए युधिष्ठिर को उत्तर दिया।
श्लोक 13.36
सरल हिंदी भावार्थ: संजय बोले—हे कुलनन्दन, आपके दोनों पितृव्य और गान्धारी क्या निश्चय करके गए, यह मैं नहीं जानता। उन महात्माओं ने मुझे भी इसकी सूचना नहीं दी।
श्लोक 13.37
सरल हिंदी भावार्थ: उसी समय तुम्बुरु के साथ देवर्षि नारद आए। युधिष्ठिर भाइयों सहित उठकर, प्रणाम और सत्कार करके उनसे बोले।
श्लोक 13.38
सरल हिंदी भावार्थ: भगवन्, मुझे ज्ञात नहीं कि मेरे दोनों पितृव्य कहाँ चले गए और पुत्रशोक से दुःखी तपस्विनी गान्धारी माता कहाँ हैं।
श्लोक 13.39
सरल हिंदी भावार्थ: आप अपार समुद्र के नाविक के समान हमें इस चिन्ता से पार लगाने वाले हैं। तब मुनिश्रेष्ठ नारद ने कहना आरम्भ किया।
श्लोक 13.40
सरल हिंदी भावार्थ: नारदजी बोले—राजन्, किसी के लिए शोक न करें। जगत ईश्वर के अधीन है; लोक और लोकपाल उनकी आज्ञा मानते हैं। वे ही प्राणियों का मिलन और वियोग कराते हैं।
श्लोक 13.41
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे नाक में डोरी डालकर पशु बाँधे जाते हैं, वैसे जीव नाम और शास्त्रीय व्यवस्थाओं के बन्धन में रहकर ईश्वर की व्यवस्था का पालन करते हैं।
श्लोक 13.42
सरल हिंदी भावार्थ: खेल की वस्तुओं का मिलना-बिछुड़ना खिलाड़ी की इच्छा से होता है; वैसे ही मनुष्यों का संयोग-वियोग ईश्वर की इच्छा के अधीन है।
श्लोक 13.43
सरल हिंदी भावार्थ: जीव को नित्य मानें, शरीर को अनित्य मानें अथवा दोनों के अन्य प्रकार का विचार करें—मोह से उत्पन्न आसक्ति के अतिरिक्त शोक का स्थायी आधार नहीं रहता।
श्लोक 13.44
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए अज्ञान से उठी यह व्याकुलता छोड़ दें कि मेरे बिना ये असहाय लोग कैसे रहेंगे।
श्लोक 13.45
सरल हिंदी भावार्थ: यह पाँच तत्त्वों का शरीर स्वयं काल, कर्म और गुणों के अधीन है। साँप की पकड़ में आया व्यक्ति दूसरे की रक्षा कैसे करे—वैसी ही इसकी सीमा है।
श्लोक 13.46
सरल हिंदी भावार्थ: हाथरहित जीव हाथवालों के, पैररहित जीव चौपायों के और छोटे जीव बड़े जीवों के आहार बनते हैं; संसार में एक जीव दूसरे का जीवनाधार बनता है।
श्लोक 13.47
सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, सब जीवों के भीतर और बाहर एक ही स्वयंप्रकाश परमात्मा अपनी माया से अनेक रूपों में प्रकट हैं; उन्हीं को सबमें देखिए।
श्लोक 13.48
सरल हिंदी भावार्थ: वही प्राणियों के पालक भगवान दैत्यस्वभाव वाले पृथ्वी के भार को हटाने के लिए कालरूप से अवतरित हुए हैं।
श्लोक 13.49
सरल हिंदी भावार्थ: देवताओं के लिए उनका मुख्य कार्य पूर्ण हो चुका है और शेष लीला की प्रतीक्षा है। जब तक भगवान यहाँ हैं, तब तक आप भी उनकी इच्छा की प्रतीक्षा करें।
श्लोक 13.50
सरल हिंदी भावार्थ: धृतराष्ट्र अपने भाई विदुर और पत्नी गान्धारी के साथ हिमालय के दक्षिण में ऋषियों के आश्रम में गए हैं।
श्लोक 13.51
सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ गङ्गा ने सात ऋषियों की प्रसन्नता के लिए सात धाराएँ धारण कीं, उस स्थान को सप्तस्रोत कहते हैं।
श्लोक 13.52
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ धृतराष्ट्र तीनों संध्याओं में स्नान और विधिपूर्वक अग्निहोत्र करते हैं। केवल जल पर निर्वाह करके इच्छारहित और शान्त चित्त से रहते हैं।
श्लोक 13.53
सरल हिंदी भावार्थ: आसन, श्वास और मन सहित छह इन्द्रियों को वश में करके वे हरि के ध्यान से सत्त्व, रज और तम के मल को दूर कर रहे हैं।
श्लोक 13.54
सरल हिंदी भावार्थ: वे मन को शुद्ध बुद्धि में, बुद्धि को जीवचैतन्य में और जीवचैतन्य को उसके आधार ब्रह्म में एकाग्र कर रहे हैं, जैसे घटाकाश महाकाश में अभिन्न है।
श्लोक 13.55
सरल हिंदी भावार्थ: माया के गुणों का प्रभाव मिटाकर, इन्द्रियों और चित्त को स्थिर करके तथा आहार छोड़कर वे अचल बैठे हैं। सब कर्म त्याग चुके उनकी साधना में आप बाधा न बनें।
श्लोक 13.56
सरल हिंदी भावार्थ: आज से पाँचवें दिन वे अपना शरीर त्याग देंगे और वह शरीर अग्नि में भस्म हो जाएगा।
श्लोक 13.57
सरल हिंदी भावार्थ: कथा के अनुसार पति की देह और कुटिया अग्नि में जलते देखकर बाहर खड़ी गान्धारी भी उसी अग्नि में प्रवेश करेंगी। यह ग्रंथ में वर्णित घटना का भावार्थ है।
श्लोक 13.58
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर इस अद्भुत घटना को देखकर हर्ष और शोक दोनों अनुभव करेंगे और फिर तीर्थसेवा के लिए वहाँ से चले जाएँगे।
श्लोक 13.59
सरल हिंदी भावार्थ: यह कहकर नारद तुम्बुरु सहित देवलोक चले गए। उनके वचनों को हृदय में धारण करके युधिष्ठिर का शोक दूर हो गया।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 13 समाप्त ॥
प्रथम स्कन्ध • अध्याय 14
अशुभ संकेत, अर्जुन का आगमन और युधिष्ठिर की जिज्ञासा
श्लोक 14.1
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—अर्जुन स्वजनों से मिलने और श्रीकृष्ण की पुण्यमयी लीलाओं का समाचार जानने द्वारका गए थे।
श्लोक 14.2
सरल हिंदी भावार्थ: कई महीने बीतने पर भी वे नहीं लौटे। इसी बीच युधिष्ठिर को अनेक भयानक अनिष्टसूचक घटनाएँ दिखाई दीं।
श्लोक 14.3
सरल हिंदी भावार्थ: ऋतुओं का स्वाभाविक क्रम बिगड़ने लगा और क्रोध, लोभ तथा असत्य में लगे लोगों का जीवन अधर्म की ओर बढ़ता दिखाई दिया।
श्लोक 14.4
सरल हिंदी भावार्थ: व्यवहार में कुटिलता, मित्रता में छल और माता-पिता, स्वजनों, भाइयों तथा पति-पत्नी के बीच कलह बढ़ रही थी।
श्लोक 14.5
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसे अशुभ संकेत और लोगों में लोभ आदि अधार्मिक प्रवृत्तियाँ देखकर राजा ने छोटे भाई भीम से कहा।
श्लोक 14.6
सरल हिंदी भावार्थ: युधिष्ठिर बोले—अर्जुन को हमने द्वारका में स्वजनों से मिलने और श्रीकृष्ण की लीलाओं का समाचार जानने भेजा था।
श्लोक 14.7
सरल हिंदी भावार्थ: हे भीमसेन, सात महीने बीत गए, पर तुम्हारा भाई नहीं लौटा। उसके विलम्ब का कारण मैं ठीक-ठीक नहीं जानता।
श्लोक 14.8
सरल हिंदी भावार्थ: क्या देवर्षि नारद द्वारा संकेत किया गया वह समय आ गया, जब भगवान अपनी प्रकट लीला समेटना चाहते हैं?
श्लोक 14.9
सरल हिंदी भावार्थ: जिनकी कृपा से हमें धन, राज्य, परिवार, जीवन, वंश, प्रजा, शत्रुविजय और श्रेष्ठ लोकों का सौभाग्य मिला, क्या उन्हीं की लीला का अन्त समीप है?
श्लोक 14.10
सरल हिंदी भावार्थ: हे नरश्रेष्ठ, आकाश, पृथ्वी और शरीर में ये भयानक उत्पात देखो; ये किसी निकट आती और बुद्धि को व्याकुल करने वाली विपत्ति का संकेत देते हैं।
श्लोक 14.11
सरल हिंदी भावार्थ: मेरी जाँघ, आँख और भुजा बार-बार फड़कती हैं, हृदय काँप रहा है; मन को लगता है कि कोई अप्रिय समाचार निकट है।
श्लोक 14.12
सरल हिंदी भावार्थ: यह सियारिन उगते सूर्य की ओर मुख करके चिल्ला रही है और यह कुत्ता बिना भय मेरे सामने भौंक रहा है।
श्लोक 14.13
सरल हिंदी भावार्थ: मंगलसूचक पशु बाईं ओर और अन्य पशु दाईं ओर जा रहे हैं; मेरे वाहन के पशु भी मानो रो रहे हों।
श्लोक 14.14
सरल हिंदी भावार्थ: कबूतर, उल्लू और उसके प्रतिद्वन्द्वी पक्षी की निरन्तर बोली मन को विचलित कर रही है; वे मानो उजाड़ का संकेत देते हों।
श्लोक 14.15
सरल हिंदी भावार्थ: दिशाएँ धुँधली हैं, सूर्य-चन्द्र के चारों ओर घेरे हैं, पर्वतों सहित पृथ्वी काँप रही है और बिजली की गड़गड़ाहट के साथ बड़े आघात सुनाई देते हैं।
श्लोक 14.16
सरल हिंदी भावार्थ: कठोर स्पर्श वाली हवा धूल से अन्धकार फैला रही है और बादल मानो रक्तवर्ण वर्षा करके चारों ओर भयावह दृश्य बना रहे हैं।
श्लोक 14.17
सरल हिंदी भावार्थ: सूर्य की प्रभा मन्द है, आकाश में ग्रह परस्पर टकराते जैसे दिखते हैं और व्याकुल प्राणियों सहित आकाश-पृथ्वी मानो जल रहे हों।
श्लोक 14.18
सरल हिंदी भावार्थ: नदियाँ, जलाशय और मन सब अशान्त हैं। घी डालने पर भी अग्नि ठीक से नहीं जलती; यह समय कौन-सी घटना लाने वाला है?
श्लोक 14.19
सरल हिंदी भावार्थ: बछड़े दूध नहीं पीते, गायें दूध नहीं देतीं और आँसू बहाती हैं; गोशाला के बैल भी प्रसन्न नहीं हैं।
श्लोक 14.20
सरल हिंदी भावार्थ: देवप्रतिमाएँ मानो रोती, पसीना बहाती और हिलती लगती हैं। देश, गाँव, नगर, उद्यान, खदानें और आश्रम शोभारहित तथा उदास हैं; ये क्या अनिष्ट सूचित करते हैं?
श्लोक 14.21
सरल हिंदी भावार्थ: इन महा उत्पातों से मुझे लगता है कि पृथ्वी अद्वितीय शोभा वाले भगवान के चरणचिह्नों से वंचित होकर अपना सौभाग्य खोने वाली है।
श्लोक 14.22
सरल हिंदी भावार्थ: राजा इन अशुभ संकेतों के कारण चिन्तित थे कि उसी समय कपिध्वज अर्जुन द्वारका से लौट आए।
श्लोक 14.23
सरल हिंदी भावार्थ: अर्जुन ने उनके चरणों में प्रणाम किया। पहले से भिन्न वे अत्यन्त व्याकुल, मुख झुकाए और आँखों से आँसू बहाते दिखाई दिए।
श्लोक 14.24
सरल हिंदी भावार्थ: अपने छोटे भाई को निस्तेज और दुःखी देखकर युधिष्ठिर का हृदय घबरा उठा। नारदजी के वचन याद करके उन्होंने स्वजनों के बीच प्रश्न किए।
श्लोक 14.25
सरल हिंदी भावार्थ: युधिष्ठिर बोले—क्या द्वारका में हमारे मधु, भोज, दशार्ह, अर्ह, सात्वत, अन्धक और वृष्णिवंशी स्वजन कुशल से हैं?
श्लोक 14.26
सरल हिंदी भावार्थ: क्या हमारे नाना शूर और मामा वसुदेव अपने छोटे भाइयों सहित सुखी हैं?
श्लोक 14.27
सरल हिंदी भावार्थ: क्या देवकी आदि सातों मौसियाँ, जो वसुदेवजी की पत्नियाँ हैं, अपने पुत्रों और पुत्रवधुओं सहित कुशल से हैं?
श्लोक 14.28
सरल हिंदी भावार्थ: क्या उग्रसेन जीवित और कुशल हैं, जिनका पुत्र कंस दुष्ट था? उनके भाई, हृदीक तथा उनके पुत्र, अक्रूर, जयन्त, गद और सारण कैसे हैं?
श्लोक 14.29
सरल हिंदी भावार्थ: शत्रुजित् आदि स्वजन कुशल से हैं? सात्वतों के स्वामी भगवान बलराम सुखी हैं?
श्लोक 14.30
सरल हिंदी भावार्थ: क्या महारथी प्रद्युम्न और गम्भीर पराक्रम वाले अनिरुद्ध कुशलपूर्वक हैं?
श्लोक 14.31
सरल हिंदी भावार्थ: सुषेण, चारुदेष्ण, जाम्बवतीपुत्र साम्ब तथा ऋषभ आदि श्रीकृष्ण के अन्य श्रेष्ठ पुत्र अपने पुत्रों सहित कुशल हैं?
श्लोक 14.32
सरल हिंदी भावार्थ: श्रुतदेव, उद्धव, सुनन्द, नन्द और अन्य श्रेष्ठ सात्वत सेवक कैसे हैं?
श्लोक 14.33
सरल हिंदी भावार्थ: बलराम और श्रीकृष्ण की भुजाओं के आश्रय में रहने वाले सब लोग सुखी हैं? क्या वे प्रेमपूर्वक हमारा स्मरण और कुशल-चिन्तन करते हैं?
श्लोक 14.34
सरल हिंदी भावार्थ: ब्राह्मणहितैषी और भक्तवत्सल भगवान गोविन्द क्या सुधर्मा सभा में स्वजनों से घिरे सुखपूर्वक विराजते हैं?
श्लोक 14.35
सरल हिंदी भावार्थ: आदि पुरुष श्रीकृष्ण अनन्त बलराम के साथ यदुवंशरूपी समुद्र में लोकों के मंगल, सुरक्षा और कल्याण के लिए रहते हैं।
श्लोक 14.36
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी भुजाओं से सुरक्षित द्वारका में यदुवंशी सम्मान और परम आनन्द के साथ ऐसे रहते हैं, जैसे दिव्य लोक के निवासी।
श्लोक 14.37
सरल हिंदी भावार्थ: उनके चरणों की सेवा को प्रधान मानने वाली सत्यभामा आदि रानियों को देवताओं पर विजय के बाद देवपत्नी के योग्य पारिजात आदि सौभाग्य प्राप्त हुए।
श्लोक 14.38
सरल हिंदी भावार्थ: श्रीकृष्ण के बाहुबल पर निर्भर निर्भय यदुवीर देवताओं के योग्य सुधर्मा सभा में प्रवेश करते और उसका उपयोग करते हैं।
श्लोक 14.39
सरल हिंदी भावार्थ: प्रिय अर्जुन, तुम स्वयं कुशल तो हो? तुम्हारा तेज मन्द लगता है। क्या तुम्हारा आदर नहीं हुआ, अपमान हुआ, अथवा अधिक समय बाहर रहने से दुःखी हो?
श्लोक 14.40
सरल हिंदी भावार्थ: क्या किसी ने कठोर और अमंगल वचनों से तुम्हें चोट पहुँचाई? कहीं आशा लेकर आए याचक को वचन देने पर भी तुम कुछ दे नहीं सके?
श्लोक 14.41
सरल हिंदी भावार्थ: शरण देने वाले अर्जुन, कहीं तुमने आश्रय माँगने वाले ब्राह्मण, बालक, गाय, वृद्ध, रोगी, स्त्री या किसी जीव को असहाय तो नहीं छोड़ दिया?
श्लोक 14.42
सरल हिंदी भावार्थ: कहीं तुमने अनुचित संबंध तो नहीं बनाया, या सम्मान योग्य स्त्री का अनादर तो नहीं किया? क्या मार्ग में अपने से हीन अथवा समान शत्रु से पराजय हुई?
श्लोक 14.43
सरल हिंदी भावार्थ: कहीं वृद्धों और बच्चों को भोजन कराए बिना स्वयं तो नहीं खा लिया? क्या कोई ऐसा निन्दनीय काम हुआ जिसे नहीं करना चाहिए था?
श्लोक 14.44
सरल हिंदी भावार्थ: या फिर अपने परम प्रिय, हृदयस्वरूप सखा श्रीकृष्ण से बिछुड़कर तुम स्वयं को शून्य अनुभव कर रहे हो? मुझे तुम्हारी ऐसी पीड़ा का दूसरा कारण नहीं लगता।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 14 समाप्त ॥
प्रथम स्कन्ध • अध्याय 15
अर्जुन का विरह, गीता-स्मरण और पाण्डवों का प्रस्थान
श्लोक 15.1
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—राजा के अनेक आशंकाभरे प्रश्न सुनकर श्रीकृष्ण के सखा अर्जुन और अधिक दुःखी हुए; उनका यह रूप भगवान के वियोग से हुआ था।
श्लोक 15.2
सरल हिंदी भावार्थ: शोक से उनका मुख और हृदय मुरझा गए थे, तेज मन्द था। वे भगवान का ही ध्यान करते हुए उत्तर नहीं दे पा रहे थे।
श्लोक 15.3
सरल हिंदी भावार्थ: कठिनाई से शोक सँभालकर और हाथ से आँसू पोंछकर उन्होंने अपने अदृश्य हुए सखा के लिए उमड़ती प्रेम-वेदना को रोका।
श्लोक 15.4
सरल हिंदी भावार्थ: सारथि रूप और अन्य अवसरों की मित्रता, आत्मीयता तथा प्रेम याद करके वे बड़े भाई से आँसुओं से रुंधे स्वर में बोले।
श्लोक 15.5
सरल हिंदी भावार्थ: अर्जुन बोले—महाराज, बन्धुरूप श्रीहरि ने मुझे अपने प्रत्यक्ष साथ से वंचित कर दिया है। उनके जाने से देवताओं को चकित करने वाला मेरा सामर्थ्य भी चला गया।
श्लोक 15.6
सरल हिंदी भावार्थ: जिनके क्षणभर के वियोग से संसार अप्रिय लगता है, वे ही हमारे जीवन थे; जैसे प्राण के बिना शरीर मृत कहलाता है।
श्लोक 15.7
सरल हिंदी भावार्थ: उन्हीं के आश्रय से मैंने द्रौपदी के स्वयंवर में गर्वित राजाओं का तेज दबाया, धनुष चढ़ाकर मत्स्यलक्ष्य भेदा और द्रौपदी को प्राप्त किया।
श्लोक 15.8
सरल हिंदी भावार्थ: उन्हीं के साथ मैंने देवताओं सहित इन्द्र का सामना करके खाण्डव वन अग्नि को दिया। मय की बनाई अद्भुत सभा मिली और आपके यज्ञ में दिशाओं के राजा भेंट लाए।
श्लोक 15.9
सरल हिंदी भावार्थ: उन्हीं के प्रभाव से भीम ने दस हजार हाथियों के बल वाले जरासन्ध को मार गिराया। उसके द्वारा बन्दी बनाए गए राजा मुक्त होकर आपके यज्ञ में उपहार लाए।
श्लोक 15.10
सरल हिंदी भावार्थ: राजसूय में अभिषिक्त द्रौपदी के सुन्दर केश सभा में दुष्टों ने पकड़कर बिखेरे थे। उनके आँसुओं भरे समर्पण का प्रतिकार भगवान ने उन अपराधियों की पत्नियों को विधवा करके किया।
श्लोक 15.11
सरल हिंदी भावार्थ: वनवास में शत्रुओं की योजना से आए दुर्वासा और उनके हजारों शिष्यों के प्रसंग में भगवान ने बचे हुए अन्न का अंश खाकर हमारी रक्षा की; स्नान कर रहे सबने स्वयं को पूर्ण तृप्त पाया।
श्लोक 15.12
सरल हिंदी भावार्थ: उन्हीं के प्रभाव से युद्ध में शिवजी और पार्वती प्रसन्न हुए तथा मुझे दिव्य अस्त्र मिला। इसी शरीर से मुझे इन्द्रलोक में इन्द्र के साथ आसन का भाग भी प्राप्त हुआ।
श्लोक 15.13
सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्रलोक में देवताओं ने दैत्यों के वध के लिए मेरी उन्हीं गाण्डीवधारी भुजाओं का आश्रय लिया, जिन्हें श्रीकृष्ण ने सामर्थ्य दिया था। आज उसी परम पुरुष के बिना मैं निर्बल हूँ।
श्लोक 15.14
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी सहायता से मैंने अकेले रथ पर बैठकर कौरवसेनारूपी दुस्तर समुद्र पार किया, विरोधियों से गोधन और सम्पत्ति लौटाई तथा उनके मस्तकों के रत्नमय मुकुट छीन लिए।
श्लोक 15.15
सरल हिंदी भावार्थ: भीष्म, कर्ण, द्रोण और शल्य आदि की विशाल सेनाओं के सामने मेरे आगे रहते हुए भगवान अपनी दृष्टि से शत्रु रथियों की आयु, उत्साह और शक्ति क्षीण कर देते थे।
श्लोक 15.16
सरल हिंदी भावार्थ: द्रोण, भीष्म, कर्ण, अश्वत्थामा, त्रिगर्त, शल्य, जयद्रथ और बाह्लीक आदि के अमोघ अस्त्र उनके आश्रय से मुझे नहीं छू सके, जैसे असुरों के अस्त्र प्रह्लाद को हानि न पहुँचा सके।
श्लोक 15.17
सरल हिंदी भावार्थ: जिन भगवान के चरणों का साधु मुक्ति के लिए भजन करते हैं, उन्हें मैंने सारथि बनाया। उनके प्रभाव से घोड़ों को जल पिलाते समय रथ से उतरे मुझ पर शत्रु प्रहार नहीं कर सके।
श्लोक 15.18
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी मधुर मुस्कान, हँसी-ठिठोली और “हे पार्थ, हे अर्जुन, हे सखा, हे कुरुनन्दन” जैसे आत्मीय सम्बोधन याद करके मेरा हृदय व्याकुल हो उठता है।
श्लोक 15.19
सरल हिंदी भावार्थ: साथ सोते, बैठते, घूमते और खाते समय निकटता में मैंने कभी उन्हें उलाहना भी दिया। वे मेरी सभी भूलें मित्र की तरह, और पिता जैसे पुत्र की, सहते रहे।
श्लोक 15.20
सरल हिंदी भावार्थ: आज अपने प्रिय सखा और हितैषी पुरुषोत्तम के बिना मेरा हृदय सूना है। मार्ग में उनकी रानियों की रक्षा करते हुए साधारण लुटेरों से मैं असहाय की तरह हार गया।
श्लोक 15.21
सरल हिंदी भावार्थ: वही धनुष, बाण, रथ, घोड़े और मैं धनुर्धर था, जिसके सामने राजा झुकते थे; पर भगवान के बिना सब क्षणभर में निष्फल हो गया, जैसे राख में आहुति या ऊसर में बीज।
श्लोक 15.22
सरल हिंदी भावार्थ: जिन द्वारकावासी स्वजनों की कुशल आपने पूछी, वे ब्राह्मणों के शाप से विवेक खोकर परस्पर लड़ पड़े।
श्लोक 15.23
सरल हिंदी भावार्थ: मदिरा के नशे से उन्मत्त होकर वे एक-दूसरे को मानो पहचान न सके और आपसी प्रहार में केवल चार-पाँच ही बचे।
श्लोक 15.24
सरल हिंदी भावार्थ: मुझे लगता है कि यह ईश्वर की ही लीला है, जिनकी व्यवस्था में जीव एक-दूसरे के जीवन और विनाश का कारण बनते हैं।
श्लोक 15.25
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे जल में बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियों को खाती हैं और बड़े बलवान आपस में भी लड़ते हैं, वैसे ही यह घटना हुई।
श्लोक 15.26
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने शक्तिशाली यदुवंशियों से अन्य भारस्वरूप यदुओं को और फिर परस्पर संघर्ष से शेष यदुओं को पृथ्वी से हटा दिया।
श्लोक 15.27
सरल हिंदी भावार्थ: समय, परिस्थिति और प्रयोजन के अनुसार कहे गोविन्द के वे वचन, जो हृदय का ताप मिटाते थे, स्मरण करने पर आज भी मेरा चित्त हर लेते हैं।
श्लोक 15.28
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—इस प्रकार गहरे प्रेम से श्रीकृष्ण के चरणकमलों का चिन्तन करते-करते अर्जुन की बुद्धि निर्मल और शान्त हो गई।
श्लोक 15.29
सरल हिंदी भावार्थ: वासुदेव के चरणों के ध्यान से बढ़ी भक्ति ने अर्जुन की बुद्धि के समस्त आन्तरिक मल और विकारों को दूर कर दिया।
श्लोक 15.30
सरल हिंदी भावार्थ: रणभूमि में भगवान ने जो गीता का ज्ञान दिया था और जो काल, कर्म तथा अज्ञान से ढक गया था, वह उन्हें फिर स्पष्ट हो गया।
श्लोक 15.31
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मस्वरूप की अनुभूति से उनका शोक और द्वैत के संशय मिट गए। प्रकृति के गुणों का बन्धन छूटने से पुनर्जन्म का कारण भी समाप्त हो गया।
श्लोक 15.32
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की लीला-समाप्ति और यदुवंश के विनाश का समाचार सुनकर युधिष्ठिर ने मन स्थिर किया और संसार से प्रस्थान का निश्चय किया।
श्लोक 15.33
सरल हिंदी भावार्थ: अर्जुन से यदुवंश के विनाश और भगवान के अन्तर्धान का समाचार सुनकर कुन्ती ने अनन्य भक्ति से अपना चित्त भगवान में लगाया और संसारबन्धन से मुक्त हुईं।
श्लोक 15.34
सरल हिंदी भावार्थ: अजन्मा भगवान ने पृथ्वी का भार दूर करने वाली अपनी प्रकट लीला समेट ली। उनके लिए भारहरण और लीला-समापन दोनों समान रूप से स्वाधीन हैं, जैसे काँटे से काँटा निकालकर दोनों छोड़ दिए जाएँ।
श्लोक 15.35
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे नट अनेक वेश धारण करके उन्हें छोड़ता है, वैसे भगवान मत्स्य आदि रूपों की लीला करते हैं; पृथ्वी का भार मिटने पर उन्होंने यह प्रकट लीला भी समेट ली।
श्लोक 15.36
सरल हिंदी भावार्थ: जिस दिन श्रवणयोग्य पवित्र कथाओं वाले मुकुन्द ने अपनी प्रकट उपस्थिति पृथ्वी से समेटी, उसी दिन असावधान लोगों में अधर्म का कारण कलि प्रभावी होने लगा।
श्लोक 15.37
सरल हिंदी भावार्थ: नगर, राज्य, घर और मन में लोभ, असत्य, कुटिलता तथा हिंसा बढ़ते देखकर विवेकी युधिष्ठिर ने प्रस्थान की तैयारी की।
श्लोक 15.38
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने अपने समान सद्गुणों वाले विनयी पौत्र परीक्षित का हस्तिनापुर में समुद्रपर्यन्त पृथ्वी के राजा के रूप में अभिषेक किया।
श्लोक 15.39
सरल हिंदी भावार्थ: मथुरा में वज्र को शूरसेन का राजा बनाया और प्राजापत्य अनुष्ठान करके अग्नियों को अपने भीतर समाहित किया।
श्लोक 15.40
सरल हिंदी भावार्थ: रेशमी वस्त्र और आभूषण आदि छोड़कर वे ममता, अहंकार और शेष बन्धनों से मुक्त हो गए।
श्लोक 15.41
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने वाणी को मन में, मन को प्राण में और प्राण को अपान में लीन किया; फिर अपान और देहत्याग के भाव को पंचतत्त्वों में समर्पित किया।
श्लोक 15.42
सरल हिंदी भावार्थ: पाँच तत्त्वों को उनके कारण गुणों में, गुणों को उनके मूल कारण में और समस्त कारणों को आत्मा में लीन करके आत्मा को अविनाशी ब्रह्म में स्थित किया।
श्लोक 15.43
सरल हिंदी भावार्थ: चीरवस्त्र धारण करके, भोजन और वाणी का संयम करके तथा केश खुले रखकर वे लोकव्यवहार से विरक्त, साधारण दृष्टि में जड़ अथवा उन्मत्त जैसे दिखाई देते थे।
श्लोक 15.44
सरल हिंदी भावार्थ: किसी की ओर अपेक्षा से न देखते और किसी पुकार पर न रुकते हुए वे महात्माओं के मार्ग से उत्तर दिशा को चले। हृदय में उस परब्रह्म का ध्यान था, जहाँ से लौटना नहीं पड़ता।
श्लोक 15.45
सरल हिंदी भावार्थ: अधर्म के मित्र कलि का प्रजा पर प्रभाव देखकर उनके सभी भाइयों ने भी दृढ़ निश्चय से उन्हीं का अनुसरण किया।
श्लोक 15.46
सरल हिंदी भावार्थ: जीवन के आवश्यक कर्तव्य पूर्ण करके और परम कल्याण का निश्चय जानकर उन्होंने मन में भगवान के चरणकमलों को धारण किया।
श्लोक 15.47
सरल हिंदी भावार्थ: उस ध्यान से प्रबल हुई भक्ति ने उनकी बुद्धि शुद्ध कर दी। वे एकनिष्ठ होकर नारायण के परम पद की ओर अग्रसर हुए।
श्लोक 15.48
सरल हिंदी भावार्थ: पापमल से मुक्त होकर उन्होंने निर्मल आत्मभाव से वह दुर्लभ परम स्थिति प्राप्त की, जो विषयासक्त और असत्प्रवृत्ति वाले लोगों के लिए दुर्गम है।
श्लोक 15.49
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर ने भी प्रभास में शरीर त्यागकर श्रीकृष्ण में चित्त लगाया और अपने मूल यमस्वरूप के धाम को प्राप्त हुए।
श्लोक 15.50
सरल हिंदी भावार्थ: द्रौपदी ने पतियों की संसार से पूर्ण विरक्ति जानकर भगवान वासुदेव में एकनिष्ठ मन लगाया और उन्हीं को प्राप्त हुईं।
श्लोक 15.51
सरल हिंदी भावार्थ: जो श्रद्धा से भगवान के प्रिय पाण्डवों के इस पवित्र और कल्याणकारी प्रस्थान की कथा सुनता है, वह श्रीहरि की भक्ति पाकर जीवन की सिद्धि की ओर बढ़ता है।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 15 समाप्त ॥
पाठाधार और संपादकीय जानकारी
मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents का “श्रीमद्भागवतं—प्रथमस्कन्धः” है। कोष्ठकों में दिए अतिरिक्त पाठ और वैकल्पिक पाठान्तर मुख्य श्लोकों में नहीं जोड़े गए हैं। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना की स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है; किसी आधुनिक टीका की प्रतिलिपि नहीं है। यह प्रथम स्कन्ध का क्रमिक भाग 5 है।
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