श्रीमद्भागवत महापुराण प्रथम स्कन्ध भाग 6 — अध्याय 16–19, कलि निग्रह और शुकदेव आगमन

भक्ति भावना • पुराण साहित्य

श्रीमद्भागवत महापुराण

प्रथम स्कन्ध • भाग ६ • अध्याय १६–१९

१७१ मूल श्लोक • प्रत्येक श्लोक का सरल हिंदी भावार्थ

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कलि निग्रह और शुकदेव आगमन

राजा परीक्षित का धर्मरक्षण, कलि का निग्रह, शाप के बाद गङ्गातट पर वैराग्य और शुकदेवजी के आगमन की कथा।

यहाँ अध्याय 16–19 के सभी 171 श्लोक मूल क्रम में हैं। प्रत्येक के साथ स्वतंत्र रूप से लिखा सरल हिंदी भावार्थ है।

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प्रथम स्कन्ध • अध्याय 16

परीक्षित का दिग्विजय और धर्म-पृथ्वी संवाद

श्लोक 16.1

सूत उवाच । ततः परीक्षिद्द्विजवर्यशिक्षया महीं महाभागवतः शशास ह । यथा हि सूत्यामभिजातकोविदाः समादिशन् विप्र महद्गुणस्तथा ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—महाभागवत परीक्षित श्रेष्ठ ब्राह्मणों की शिक्षा के अनुसार पृथ्वी का शासन करने लगे। जन्म के समय बताई गई महान विशेषताएँ उनमें प्रकट हुईं।

श्लोक 16.2

स उत्तरस्य तनयामुपयेम इरावतीम् । जनमेजयादींश्चतुरस्तस्यामुत्पादयत्सुतान् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने उत्तर की पुत्री इरावती से विवाह किया और उनसे जनमेजय आदि चार पुत्र हुए।

श्लोक 16.3

आजहाराश्वमेधांस्त्रीन् गङ्गायां भूरिदक्षिणान् । शारद्वतं गुरुं कृत्वा देवा यत्राक्षिगोचराः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: कृपाचार्य को आचार्य बनाकर उन्होंने गङ्गातट पर तीन अश्वमेध यज्ञ किए, जिनमें बहुत दक्षिणा दी गई और देवताओं का प्रत्यक्ष दर्शन हुआ।

श्लोक 16.4

निजग्राहौजसा वीरः कलिं दिग्विजये क्वचित् । नृपलिङ्गधरं शूद्रं घ्नन्तं गोमिथुनं पदा ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: दिग्विजय में उन्होंने राजवेशधारी कलि को गाय और बैल को पैरों से मारते देखा और अपने पराक्रम से उसका निग्रह किया।

श्लोक 16.5

शौनक उवाच । कस्य हेतोर्निजग्राह कलिं दिग्विजये नृपः । नृदेवचिह्नधृक् शूद्रः कोऽसौ गां यः पदाहनत् । तत्कथ्यतां महाभाग यदि कृष्णकथाश्रयम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: शौनकजी ने पूछा—राजा ने दिग्विजय में कलि का निग्रह क्यों किया? राजचिह्न धारण करके गाय को मारने वाला वह कौन था? यदि प्रसंग कृष्णकथा से जुड़ा है तो हमें सुनाइए।

श्लोक 16.6

अथवास्य पदाम्भोजमकरन्दलिहां सताम् । किमन्यैरसदालापैरायुषो यदसद्व्ययः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के चरणकमलों का रस लेने वाले संतों को निरर्थक बातों से क्या प्रयोजन? ऐसी चर्चा जीवन का व्यर्थ व्यय करती है।

श्लोक 16.7

क्षुद्रायुषां नृणामङ्ग मर्त्यानामृतमिच्छताम् । इहोपहूतो भगवान् मृत्युः शामित्रकर्मणि ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अल्पायु मनुष्यों के लिए अमृतमय कथा सुनने का अवसर देने हेतु यहाँ यज्ञ के कार्य में मृत्युदेव को भी बुलाया गया है।

श्लोक 16.8

न कश्चिन्म्रियते तावद्यावदास्त इहान्तकः । एतदर्थं हि भगवानाहूतः परमर्षिभिः । अहो नृलोके पीयेत हरिलीलामृतं वचः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब तक मृत्यु के अधिष्ठाता यहाँ उपस्थित हैं, तब तक मृत्यु का भय स्थगित रहे—इसी उद्देश्य से ऋषियों ने उन्हें आमन्त्रित किया है। आइए, भगवान की लीलामृत कथा का पान करें।

श्लोक 16.9

मन्दस्य मन्दप्रज्ञस्य वयो मन्दायुषश्च वै । निद्रया ह्रियते नक्तं दिवा च व्यर्थकर्मभिः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: अल्पायु और मन्दबुद्धि मनुष्य का समय रात को नींद में और दिन में व्यर्थ कामों में बीत जाता है।

श्लोक 16.10

सूत उवाच । यदा परीक्षित्कुरुजाङ्गलेऽश‍ृणोत् कलिं प्रविष्टं निजचक्रवर्तिते । निशम्य वार्तामनतिप्रियां ततः शरासनं संयुगशौण्डिराददे ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—कुरुजाङ्गल में परीक्षित को अपने राज्य में कलि के प्रवेश का अप्रिय समाचार मिला। युद्धकुशल राजा ने तत्काल धनुष उठाया।

श्लोक 16.11

स्वलङ्कृतं श्यामतुरङ्गयोजितं रथं मृगेन्द्रध्वजमाश्रितः पुरात् । वृतो रथाश्वद्विपपत्तियुक्तया स्वसेनया दिग्विजयाय निर्गतः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्याम घोड़ों वाले सुसज्जित और सिंहध्वजयुक्त रथ पर चढ़कर वे रथ, घोड़े, हाथी तथा पैदल सेना के साथ दिग्विजय को निकले।

श्लोक 16.12

भद्राश्वं केतुमालं च भारतं चोत्तरान् कुरून् । किम्पुरुषादीनि वर्षाणि विजित्य जगृहे बलिम् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने भद्राश्व, केतुमाल, भारत, उत्तरकुरु और किम्पुरुष आदि क्षेत्रों को अपने अधीन करके राजकर और भेंट स्वीकार की।

श्लोक 16.13

तत्र तत्रोपश‍ृण्वानः स्वपूर्वेषां महात्मनाम् । प्रगीयमाणं च यशः कृष्णमाहात्म्यसूचकम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्थान-स्थान पर वे अपने महात्मा पूर्वजों का यश सुनते थे, जिसमें श्रीकृष्ण की महिमा प्रकट होती थी।

श्लोक 16.14

आत्मानं च परित्रातमश्वत्थाम्नोऽस्त्रतेजसः । स्नेहं च वृष्णिपार्थानां तेषां भक्तिं च केशवे ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने अश्वत्थामा के अस्त्र से अपनी रक्षा, यदुवंशियों और पाण्डवों की मित्रता तथा श्रीकृष्ण के प्रति उनकी भक्ति की कथाएँ सुनीं।

श्लोक 16.15

तेभ्यः परमसन्तुष्टः प्रीत्युज्जृम्भितलोचनः । महाधनानि वासांसि ददौ हारान् महामनाः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन कथाओं से अत्यन्त प्रसन्न होकर राजा प्रेम से खिले नेत्रों के साथ सुनाने वालों को धन, वस्त्र और हार प्रदान करते थे।

श्लोक 16.16

सारथ्यपारषदसेवनसख्यदौत्य- वीरासनानुगमनस्तवनप्रणामान् । स्निग्धेषु पाण्डुषु जगत्प्रणतिं च विष्णोः भक्तिं करोति नृपतिश्चरणारविन्दे ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने पाण्डवों के प्रेम में सारथि, सभासद, सेवक, मित्र और दूत की भूमिकाएँ निभाईं; वे उनके साथ चले, प्रणाम और स्तुति भी की। इन लीलाओं को सुनकर राजा की भक्ति बढ़ी।

श्लोक 16.17

तस्यैवं वर्तमानस्य पूर्वेषां वृत्तिमन्वहम् । नातिदूरे किलाश्चर्यं यदासीत्तन्निबोध मे ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने पूर्वजों का आचरण अपनाकर इस प्रकार शासन करते परीक्षित के समय निकट ही एक अद्भुत घटना हुई; अब उसे सुनिए।

श्लोक 16.18

धर्मः पदैकेन चरन् विच्छायामुपलभ्य गाम् । पृच्छति स्माश्रुवदनां विवत्सामिव मातरम् ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक पैर पर चलते धर्म ने गाय के रूप में पृथ्वी को देखा। वह बछड़े से बिछुड़ी माता जैसी शोभारहित और आँसू बहाती थी; धर्म ने उससे पूछा।

श्लोक 16.19

धर्म उवाच । कच्चिद्भद्रेऽनामयमात्मनस्ते विच्छायासि म्लायतेषन्मुखेन । आलक्षये भवतीमन्तराधिं दूरे बन्धुं शोचसि कञ्चनाम्ब ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: धर्म बोले—हे भद्रे, क्या आप कुशल से हैं? आपका मुख मुरझाया और कान्तिहीन है। क्या कोई आन्तरिक पीड़ा है अथवा दूर गए किसी प्रिय का शोक है?

श्लोक 16.20

पादैर्न्यूनं शोचसि मैकपाद- मात्मानं वा वृषलैर्भोक्ष्यमाणम् । आहो सुरादीन् हृतयज्ञभागान् प्रजा उत स्विन्मघवत्यवर्षति ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्या आप मेरे तीन चरण टूट जाने का दुःख करती हैं, या अपने ऊपर अधर्मियों का अधिकार होने का? क्या देवताओं के यज्ञभाग छिनने या वर्षा के अभाव से पीड़ित प्रजा की चिन्ता है?

श्लोक 16.21

अरक्ष्यमाणाः स्त्रिय उर्वि बालान् शोचस्यथो पुरुषादैरिवार्तान् । वाचं देवीं ब्रह्मकुले कुकर्म- ण्यब्रह्मण्ये राजकुले कुलाग्र्यान् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्या असुरक्षित स्त्रियों, पीड़ित बालकों, दुराचारी ब्राह्मणों में वेदविद्या की दुर्दशा या ब्राह्मणद्रोही राजपरिवारों में श्रेष्ठ लोगों की उपेक्षा से आप दुःखी हैं?

श्लोक 16.22

किं क्षत्रबन्धून् कलिनोपसृष्टान् राष्ट्राणि वा तैरवरोपितानि । इतस्ततो वाशनपानवासः स्नानव्यवायोन्मुखजीवलोकम् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्या कलि से प्रभावित अयोग्य राजाओं और उनके उजाड़े राज्यों की चिन्ता है, या केवल भोजन, पेय, वस्त्र, स्नान और विषयभोग में लगे लोगों की?

श्लोक 16.23

यद्वाम्ब ते भूरिभरावतार- कृतावतारस्य हरेर्धरित्रि । अन्तर्हितस्य स्मरती विसृष्टा कर्माणि निर्वाणविलम्बितानि ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: या पृथ्वी का भार दूर करने के लिए अवतरित श्रीहरि के अन्तर्धान के बाद, उनके मोक्षदायी कर्मों का स्मरण करके आप विरह अनुभव करती हैं?

श्लोक 16.24

इदं ममाचक्ष्व तवाधिमूलं वसुन्धरे येन विकर्शितासि । कालेन वा ते बलिनां बलीयसा सुरार्चितं किं हृतमम्ब सौभगम् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे वसुन्धरे, अपनी पीड़ा का मूल मुझे बताइए। क्या सबसे बलवान काल ने देवताओं द्वारा पूजित आपका सौभाग्य छीन लिया है?

श्लोक 16.25

धरण्युवाच । भवान् हि वेद तत्सर्वं यन्मां धर्मानुपृच्छसि । चतुर्भिर्वर्तसे येन पादैर्लोकसुखावहैः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी बोलीं—हे धर्म, आप वह सब जानते हैं जिसके विषय में पूछ रहे हैं। जिनके कारण आप लोकों को सुख देने वाले चार चरणों पर प्रतिष्ठित थे, उन्हीं का वियोग है।

श्लोक 16.26

सत्यं शौचं दया क्षान्तिस्त्यागः सन्तोष आर्जवम् । शमो दमस्तपः साम्यं तितिक्षोपरतिः श्रुतम् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन भगवान में सत्य, पवित्रता, दया, क्षमा, त्याग, सन्तोष, सरलता, मन और इन्द्रियों का संयम, तप, समता, सहनशीलता, विरक्ति तथा शास्त्रज्ञान जैसे गुण हैं।

श्लोक 16.27

ज्ञानं विरक्तिरैश्वर्यं शौर्यं तेजो बलं स्मृतिः । स्वातन्त्र्यं कौशलं कान्तिर्धैर्यं मार्दवमेव च ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, वीरता, तेज, बल, स्मृति, स्वतन्त्रता, कुशलता, सौन्दर्य, धैर्य और कोमलता भी उन्हीं में पूर्ण हैं।

श्लोक 16.28

प्रागल्भ्यं प्रश्रयः शीलं सह ओजो बलं भगः । गाम्भीर्यं स्थैर्यमास्तिक्यं कीर्तिर्मानोऽनहङ्कृतिः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वाक्पटुता, विनय, सदाचार, सहनशक्ति, ओज, सामर्थ्य, सौभाग्य, गम्भीरता, स्थिरता, आस्तिकता, कीर्ति, गौरव और अहंकाररहितता भी उनके गुण हैं।

श्लोक 16.29

एते चान्ये च भगवन् नित्या यत्र महागुणाः । प्रार्थ्या महत्त्वमिच्छद्भिर्न वियन्ति स्म कर्हिचित् ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: ये तथा अन्य सभी वांछनीय महान गुण भगवान में नित्य विद्यमान हैं; उनसे कभी अलग नहीं होते। महानता चाहने वाले इन्हीं गुणों की अभिलाषा करते हैं।

श्लोक 16.30

तेनाहं गुणपात्रेण श्रीनिवासेन साम्प्रतम् । शोचामि रहितं लोकं पाप्मना कलिनेक्षितम् ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: सभी गुणों के आश्रय और लक्ष्मीनिवास श्रीकृष्ण से रहित जगत को अब पापमय कलि की दृष्टि में पड़ा देखकर मैं शोक करती हूँ।

श्लोक 16.31

आत्मानं चानुशोचामि भवन्तं चामरोत्तमम् । देवान् पितॄनृषीन् साधून् सर्वान् वर्णांस्तथाऽऽश्रमान् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं अपने लिए, आपके लिए और देवताओं, पितरों, ऋषियों, साधुओं तथा समस्त वर्णों और आश्रमों के लिए भी दुःखी हूँ।

श्लोक 16.32

ब्रह्मादयो बहुतिथं यदपाङ्गमोक्ष- कामास्तपः समचरन् भगवत्प्रपन्नाः । सा श्रीः स्ववासमरविन्दवनं विहाय यत्पादसौभगमलं भजतेऽनुरक्ता ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिन लक्ष्मीजी की कृपादृष्टि पाने के लिए ब्रह्मा आदि भगवान का आश्रय लेकर दीर्घ तप करते हैं, वे भी अपना कमलवन छोड़कर प्रेम से भगवान के चरणों की सेवा करती हैं।

श्लोक 16.33

तस्याहमब्जकुलिशाङ्कुशकेतुकेतैः श्रीमत्पदैर्भगवतः समलङ्कृताङ्गी । त्रीनत्यरोच उपलभ्य ततो विभूतिं लोकान् स मां व्यसृजदुत्स्मयतीं तदन्ते ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: कमल, वज्र, अंकुश और ध्वजा के चिह्नों वाले भगवान के चरणों से मेरा अंग सुशोभित था। उस सौभाग्य से मैं तीनों लोकों में शोभती थी; अब भगवान ने उस गर्व को दूर करके प्रकट उपस्थिति समेट ली।

श्लोक 16.34

यो वै ममातिभरमासुरवंशराज्ञा- मक्षौहिणीशतमपानुददात्मतन्त्रः । त्वां दुःस्थमूनपदमात्मनि पौरुषेण सम्पादयन् यदुषु रम्यमबिभ्रदङ्गम् ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने आसुरी राजाओं की सैकड़ों अक्षौहिणी सेनाओं का भार मुझसे हटाया और अपने पराक्रम से आपके टूटे चरणों को फिर सँभाला। इसी हेतु यदुवंश में सुन्दर रूप धारण किया था।

श्लोक 16.35

का वा सहेत विरहं पुरुषोत्तमस्य प्रेमावलोकरुचिरस्मितवल्गुजल्पैः । स्थैर्यं समानमहरन्मधुमानिनीनां रोमोत्सवो मम यदङ्घ्रिविटङ्कितायाः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके प्रेमपूर्ण दर्शन, मधुर मुस्कान और मनोहर वचन प्रियजनों का धैर्य भी हर लेते थे; उनके चरणस्पर्श से मुझे रोमांच होता था। ऐसे पुरुषोत्तम का वियोग कौन सह सकता है?

श्लोक 16.36

तयोरेवं कथयतोः पृथिवीधर्मयोस्तदा । परीक्षिन्नाम राजर्षिः प्राप्तः प्राचीं सरस्वतीम् ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी और धर्म इस प्रकार संवाद कर रहे थे कि तभी राजर्षि परीक्षित पूर्ववाहिनी सरस्वती के तट पर पहुँचे।

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 16 समाप्त ॥

प्रथम स्कन्ध • अध्याय 17

कलि का निग्रह और धर्म के चार चरण

श्लोक 17.1

सूत उवाच । तत्र गोमिथुनं राजा हन्यमानमनाथवत् दण्डहस्तं च वृषलं ददृशे नृपलाञ्छनम् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—वहाँ राजा ने गाय और बैल को अनाथों की तरह पिटते देखा। राजचिह्न पहने एक अधर्मी हाथ में दण्ड लिए उन्हें मार रहा था।

श्लोक 17.2

वृषं मृणालधवलं मेहन्तमिव बिभ्यतम् । वेपमानं पदैकेन सीदन्तं शूद्रताडितम् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: कमलनाल जैसा श्वेत बैल एक पैर पर काँपते हुए खड़ा था; मार से भयभीत होकर वह असहाय हो गया था।

श्लोक 17.3

गां च धर्मदुघां दीनां भृशं शूद्रपदाहताम् । विवत्सां साश्रुवदनां क्षामां यवसमिच्छतीम् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: धर्म का पोषण करने वाली गाय भी पैरों की चोट से दुःखी, बछड़े से रहित, दुर्बल और आँसू बहाती हुई घास चाह रही थी।

श्लोक 17.4

पप्रच्छ रथमारूढः कार्तस्वरपरिच्छदम् । मेघगम्भीरया वाचा समारोपितकार्मुकः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वर्णसज्जित रथ पर बैठे राजा ने धनुष चढ़ाया और मेघ के समान गम्भीर स्वर में उस व्यक्ति से पूछा।

श्लोक 17.5

कस्त्वं मच्छरणे लोके बलाद्धंस्यबलान् बली । नरदेवोऽसि वेषेण नटवत्कर्मणाद्विजः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: तू कौन है जो मेरे संरक्षण में रहने वाले निर्बलों को बलपूर्वक मारता है? वेश राजा का है, किन्तु कर्म किसी नीच वृत्ति वाले नट जैसे हैं।

श्लोक 17.6

कस्त्वं कृष्णे गते दूरं सहगाण्डीवधन्वना । शोच्योऽस्यशोच्यान् रहसि प्रहरन् वधमर्हसि ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रीकृष्ण और अर्जुन के प्रत्यक्ष संरक्षण से पृथ्वी के वंचित होते ही तू निर्दोषों पर एकान्त में प्रहार कर रहा है; तू दण्ड का पात्र है।

श्लोक 17.7

त्वं वा मृणालधवलः पादैर्न्यूनः पदा चरन् । वृषरूपेण किं कश्चिद्देवो नः परिखेदयन् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर बैल से बोले—हे श्वेतवर्ण वृषभ, तीन चरण खोकर एक पर चलने वाले आप कौन हैं? क्या कोई देवता बैलरूप में हमारी परीक्षा कर रहे हैं?

श्लोक 17.8

न जातु पौरवेन्द्राणां दोर्दण्डपरिरम्भिते । भूतलेऽनुपतन्त्यस्मिन् विना ते प्राणिनां शुचः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुरुवंशी राजाओं की भुजाओं से सुरक्षित इस धरती पर प्राणी दुःखी नहीं होने पाते; आपको देखकर यह अनोखी पीड़ा दिखाई दे रही है।

श्लोक 17.9

मा सौरभेयानुशुचो व्येतु ते वृषलाद्भयम् । मा रोदीरम्ब भद्रं ते खलानां मयि शास्तरि ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे सुरभिनन्दन, शोक न करें; इस दुष्ट का भय छोड़ें। हे माता, आप भी न रोएँ। मेरे रहते दुष्टों को दण्ड मिलेगा और आपका कल्याण होगा।

श्लोक 17.10

यस्य राष्ट्रे प्रजाः सर्वास्त्रस्यन्ते साध्व्यसाधुभिः । तस्य मत्तस्य नश्यन्ति कीर्तिरायुर्भगो गतिः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिस राजा के राज्य में निर्दोष प्रजा दुष्टों से भयभीत रहे, उस असावधान राजा की कीर्ति, आयु, ऐश्वर्य और श्रेष्ठ गति नष्ट होने लगती है।

श्लोक 17.11

एष राज्ञां परो धर्मो ह्यार्तानामार्तिनिग्रहः । अत एनं वधिष्यामि भूतद्रुहमसत्तमम् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: पीड़ितों की पीड़ा दूर करना राजाओं का परम धर्म है। इसलिए प्राणियों से द्रोह करने वाले इस दुष्ट को मैं दण्ड दूँगा।

श्लोक 17.12

कोऽवृश्चत्तव पादांस्त्रीन् सौरभेय चतुष्पद । मा भूवंस्त्वादृशा राष्ट्रे राज्ञां कृष्णानुवर्तिनाम् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे चार चरणों वाले सुरभिनन्दन, आपके तीन पैर किसने काटे? श्रीकृष्ण का अनुसरण करने वाले राजाओं के राज्य में ऐसी पीड़ा नहीं होनी चाहिए।

श्लोक 17.13

आख्याहि वृष भद्रं वः साधूनामकृतागसाम् । आत्मवैरूप्यकर्तारं पार्थानां कीर्तिदूषणम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे वृषभ, निर्दोष साधुओं को यह कष्ट देने वाले का परिचय बताइए; वह पाण्डववंश की कीर्ति पर कलंक लगा रहा है।

श्लोक 17.14

जनेऽनागस्यघं युञ्जन् सर्वतोऽस्य च मद्भयम् । साधूनां भद्रमेव स्यादसाधुदमने कृते ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: निर्दोष को पीड़ा देने वाला मेरे दण्ड से कहीं नहीं बच सकता। दुष्ट का दमन होने पर साधुओं का कल्याण होता है।

श्लोक 17.15

अनागःस्विह भूतेषु य आगस्कृन्निरङ्कुशः । आहर्तास्मि भुजं साक्षादमर्त्यस्यापि साङ्गदम् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो निरंकुश होकर निरपराध प्राणियों को सताए, वह देवता भी हो तो मैं उसकी अपराध करने वाली भुजा को आभूषण सहित काटने का सामर्थ्य रखता हूँ।

श्लोक 17.16

राज्ञो हि परमो धर्मः स्वधर्मस्थानुपालनम् । शासतोऽन्यान् यथाशास्त्रमनापद्युत्पथानिह ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा का प्रधान कर्तव्य अपने धर्म में स्थित लोगों की रक्षा और बिना आपत्ति के भी कुमार्ग पर चलने वालों को शास्त्रानुसार अनुशासित करना है।

श्लोक 17.17

धर्म उवाच । एतद्वः पाण्डवेयानां युक्तमार्ताभयं वचः । येषां गुणगणैः कृष्णो दौत्यादौ भगवान् कृतः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: धर्म बोले—पीड़ितों को अभय देने वाला यह वचन पाण्डवों के वंशज के योग्य है। आपके पूर्वजों के गुणों ने भगवान को उनका दूत बनने तक के लिए प्रेरित किया था।

श्लोक 17.18

न वयं क्लेशबीजानि यतः स्युः पुरुषर्षभ । पुरुषं तं विजानीमो वाक्यभेदविमोहिताः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे पुरुषश्रेष्ठ, दुःखों का मूल कारण किसे कहें, यह विभिन्न मत सुनकर हम निश्चित नहीं कर पाते।

श्लोक 17.19

केचिद्विकल्पवसना आहुरात्मानमात्मनः । दैवमन्ये परे कर्म स्वभावमपरे प्रभुम् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: कुछ लोग स्वयं जीव को दुःख का कारण कहते हैं, कुछ दैव को, कुछ कर्म को और कुछ स्वभाव को प्रधान मानते हैं।

श्लोक 17.20

अप्रतर्क्यादनिर्देश्यादिति केष्वपि निश्चयः । अत्रानुरूपं राजर्षे विमृश स्वमनीषया ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: कुछ का मत है कि कारण तर्क और कथन से परे है। हे राजर्षि, आप अपनी विवेकबुद्धि से उचित विचार करें।

श्लोक 17.21

सूत उवाच । एवं धर्मे प्रवदति स सम्राड्-द्विजसत्तम । समाहितेन मनसा विखेदः पर्यचष्ट तम् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—धर्म के ये वचन सुनकर राजा ने एकाग्र और चिन्तित मन से उन्हें उत्तर दिया।

श्लोक 17.22

राजोवाच । धर्मं ब्रवीषि धर्मज्ञ धर्मोऽसि वृषरूपधृक् । यदधर्मकृतः स्थानं सूचकस्यापि तद्भवेत् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा बोले—हे धर्मज्ञ, आपकी वाणी धर्ममयी है; आप वृषभरूप धर्म ही हैं। आप दोष बताने में भी सावधान हैं, क्योंकि अनुचित दोषारोपण करने वाला भी अधर्म का भागी बन सकता है।

श्लोक 17.23

अथवा देवमायाया नूनं गतिरगोचरा । चेतसो वचसश्चापि भूतानामिति निश्चयः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अथवा इसका अर्थ यही है कि भगवान की माया की गति जीवों के मन और वाणी की पहुँच से परे है।

श्लोक 17.24

तपः शौचं दया सत्यमिति पादाः कृते कृताः । अधर्मांशैस्त्रयो भग्नाः स्मयसङ्गमदैस्तव ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: सत्ययुग में आपके चार चरण तप, पवित्रता, दया और सत्य थे। अहंकार, आसक्ति और मदरूपी अधर्म ने आपके तीन चरण क्षीण कर दिए हैं।

श्लोक 17.25

इदानीं धर्म पादस्ते सत्यं निर्वर्तयेद्यतः । तं जिघृक्षत्यधर्मोऽयमनृतेनैधितः कलिः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अब आप सत्य के एक चरण से टिके हैं। असत्य से बढ़ा यह अधर्मरूपी कलि उसे भी नष्ट करना चाहता है।

श्लोक 17.26

इयं च भूमिर्भगवता न्यासितोरुभरा सती । श्रीमद्भिस्तत्पदन्यासैः सर्वतः कृतकौतुका ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह पृथ्वी भगवान द्वारा अपना महान भार उतरने और उनके मंगलमय चरणचिह्न पड़ने से आनन्दित थी।

श्लोक 17.27

शोचत्यश्रुकला साध्वी दुर्भगेवोज्झिताधुना । अब्रह्मण्या नृपव्याजाः शूद्रा भोक्ष्यन्ति मामिति ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अब भगवान की प्रकट उपस्थिति से वंचित होकर यह आँसू बहाती है; इसे भय है कि ब्राह्मणहित-विरोधी और अधार्मिक राजवेशधारी इसका शोषण करेंगे।

श्लोक 17.28

इति धर्मं महीं चैव सान्त्वयित्वा महारथः । निशातमाददे खड्गं कलयेऽधर्महेतवे ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: धर्म और पृथ्वी को इस प्रकार आश्वस्त करके महारथी परीक्षित ने अधर्म के कारण कलि को दण्ड देने के लिए तीखी तलवार उठाई।

श्लोक 17.29

तं जिघांसुमभिप्रेत्य विहाय नृपलाञ्छनम् । तत्पादमूलं शिरसा समगाद्भयविह्वलः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: कलि ने राजा को मारने के लिए तैयार देखकर राजचिह्न त्याग दिए और भय से काँपता उनके चरणों में सिर रखकर गिर पड़ा।

श्लोक 17.30

पतितं पादयोर्वीरः कृपया दीनवत्सलः । शरण्यो नावधीच्छ्लोक्य आह चेदं हसन्निव ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: शरणागत और दीनों पर दया करने वाले राजा ने उसे नहीं मारा। वे मानो मुस्कराते हुए उससे बोले।

श्लोक 17.31

राजोवाच । न ते गुडाकेशयशोधराणां बद्धाञ्जलेर्वै भयमस्ति किञ्चित् । न वर्तितव्यं भवता कथञ्चन क्षेत्रे मदीये त्वमधर्मबन्धुः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा बोले—अर्जुन के यश को आगे बढ़ाने वाले हमारे वंश के सामने हाथ जोड़कर शरण आए तुम्हें अब भय नहीं। किन्तु अधर्म के साथी होने के कारण तुम मेरे राज्य में नहीं रह सकते।

श्लोक 17.32

त्वां वर्तमानं नरदेवदेहे- ष्वनुप्रवृत्तोऽयमधर्मपूगः । लोभोऽनृतं चौर्यमनार्यमंहो ज्येष्ठा च माया कलहश्च दम्भः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम राजाओं के शरीर और मन में प्रवेश करते हो तो लोभ, असत्य, चोरी, अनाचार, दरिद्रता, छल, कलह और पाखण्ड भी पीछे-पीछे आ जाते हैं।

श्लोक 17.33

न वर्तितव्यं तदधर्मबन्धो धर्मेण सत्येन च वर्तितव्ये । ब्रह्मावर्ते यत्र यजन्ति यज्ञै- र्यज्ञेश्वरं यज्ञवितानविज्ञाः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए धर्म और सत्य से चलने वाले इस ब्रह्मावर्त में तुम्हारा निवास नहीं हो सकता, जहाँ यज्ञविधि जानने वाले यज्ञेश्वर भगवान की पूजा करते हैं।

श्लोक 17.34

यस्मिन् हरिर्भगवानिज्यमान इज्यामूर्तिर्यजतां शं तनोति । कामानमोघान् स्थिरजङ्गमाना- मन्तर्बहिर्वायुरिवैष आत्मा ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस पूजा से भगवान स्थावर-जंगम सभी के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं। वे वायु की तरह भीतर-बाहर व्याप्त सबके आत्मस्वरूप हैं।

श्लोक 17.35

सूत उवाच । परीक्षितैवमादिष्टः स कलिर्जातवेपथुः । तमुद्यतासिमाहेदं दण्डपाणिमिवोद्यतम् ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—परीक्षित की आज्ञा सुनकर कलि काँप उठा और उठी हुई तलवार वाले दण्डदाता राजा से बोला।

श्लोक 17.36

कलिरुवाच । यत्र क्वचन वत्स्यामि सार्वभौम तवाज्ञया । लक्षये तत्र तत्रापि त्वामात्तेषुशरासनम् ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कलि बोला—हे सार्वभौम, आपकी आज्ञा से मैं जहाँ भी रहूँगा, वहाँ आपको धनुष-बाण सहित उपस्थित पाऊँगा।

श्लोक 17.37

तन्मे धर्मभृतां श्रेष्ठ स्थानं निर्देष्टुमर्हसि । यत्रैव नियतो वत्स्य आतिष्ठंस्तेऽनुशासनम् ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे धर्मरक्षकों में श्रेष्ठ, कृपा करके ऐसा स्थान निश्चित कीजिए जहाँ आपकी आज्ञा का पालन करते हुए रह सकूँ।

श्लोक 17.38

सूत उवाच । अभ्यर्थितस्तदा तस्मै स्थानानि कलये ददौ । द्यूतं पानं स्त्रियः सूना यत्राधर्मश्चतुर्विधः ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—उसके निवेदन पर राजा ने जुआ, मादक पान, अनैतिक यौन संबंध और पशुवध—इन चार अधर्मस्थलों में रहने की अनुमति दी।

श्लोक 17.39

पुनश्च याचमानाय जातरूपमदात्प्रभुः । ततोऽनृतं मदं कामं रजो वैरं च पञ्चमम् ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर माँगने पर राजा ने स्वर्ण में भी स्थान दिया; उससे जुड़ी लोभवृत्ति में असत्य, मद, काम, उग्र रजोगुण और वैर को आश्रय मिलता है।

श्लोक 17.40

अमूनि पञ्च स्थानानि ह्यधर्मप्रभवः कलिः । औत्तरेयेण दत्तानि न्यवसत्तन्निदेशकृत् ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार उत्तरापुत्र परीक्षित द्वारा दिए इन पाँच स्थानों में अधर्म की उत्पत्ति का कारण कलि उनकी आज्ञा के अधीन रहने लगा।

श्लोक 17.41

अथैतानि न सेवेत बुभूषुः पुरुषः क्वचित् । विशेषतो धर्मशीलो राजा लोकपतिर्गुरुः ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: कल्याण चाहने वाला मनुष्य इन अधर्ममय स्थानों और प्रवृत्तियों से बचे; विशेषकर धर्मशील राजा, लोकपाल और गुरु को सावधान रहना चाहिए।

श्लोक 17.42

वृषस्य नष्टांस्त्रीन् पादान् तपः शौचं दयामिति । प्रतिसन्दध आश्वास्य महीं च समवर्धयत् ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा ने धर्म के खोए तप, पवित्रता और दया रूप तीन चरण फिर प्रतिष्ठित किए तथा पृथ्वी को आश्वासन देकर उसकी समृद्धि बढ़ाई।

श्लोक 17.43

स एष एतर्ह्यध्यास्त आसनं पार्थिवोचितम् । पितामहेनोपन्यस्तं राज्ञारण्यं विविक्षता ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: यही परीक्षित उस राजसिंहासन पर प्रतिष्ठित हुए, जिसे वनगमन की इच्छा रखने वाले पितामह युधिष्ठिर ने उन्हें सौंपा था।

श्लोक 17.44

आस्तेऽधुना स राजर्षिः कौरवेन्द्रश्रियोल्लसन् । गजाह्वये महाभागश्चक्रवर्ती बृहच्छ्रवाः ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे महान यशस्वी, सौभाग्यशाली चक्रवर्ती राजर्षि हस्तिनापुर में कुरुवंश की राजश्री के साथ विराजते थे।

श्लोक 17.45

इत्थम्भूतानुभावोऽयमभिमन्युसुतो नृपः । यस्य पालयतः क्षोणीं यूयं सत्राय दीक्षिताः ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अभिमन्युपुत्र परीक्षित ऐसे प्रभावशाली राजा थे; उनके पृथ्वीपालन के समय ही आप लोगों ने यह दीर्घ सत्रयज्ञ आरम्भ किया।

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 17 समाप्त ॥

प्रथम स्कन्ध • अध्याय 18

परीक्षित को शाप और शमीक ऋषि का विवेक

श्लोक 18.1

सूत उवाच । यो वै द्रौण्यस्त्रविप्लुष्टो न मातुरुदरे मृतः । अनुग्रहाद्भगवतः कृष्णस्याद्भुतकर्मणः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—अद्भुत कर्मों वाले श्रीकृष्ण की कृपा से परीक्षित माता के गर्भ में अश्वत्थामा के अस्त्र से झुलसकर भी नहीं मरे थे।

श्लोक 18.2

ब्रह्मकोपोत्थिताद्यस्तु तक्षकात्प्राणविप्लवात् । न सम्मुमोहोरुभयाद्भगवत्यर्पिताशयः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: बाद में ब्राह्मण के शाप से तक्षक द्वारा प्राण जाने की आशंका होने पर भी भगवान में चित्त अर्पित होने से वे भय और मोह में नहीं पड़े।

श्लोक 18.3

उत्सृज्य सर्वतः सङ्गं विज्ञाताजितसंस्थितिः । वैयासकेर्जहौ शिष्यो गङ्गायां स्वं कलेवरम् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी के शिष्य बनकर और भगवान का वास्तविक स्वरूप जानकर उन्होंने सब ओर की आसक्ति छोड़ी तथा गङ्गातट पर शरीर त्याग किया।

श्लोक 18.4

नोत्तमश्लोकवार्तानां जुषतां तत्कथामृतम् । स्यात्सम्भ्रमोऽन्तकालेऽपि स्मरतां तत्पदाम्बुजम् ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की कथामृत का रस लेने और उनके चरणकमलों का स्मरण करने वालों को अन्तकाल में भी घबराहट नहीं होती।

श्लोक 18.5

तावत्कलिर्न प्रभवेत्प्रविष्टोऽपीह सर्वतः । यावदीशो महानुर्व्यामाभिमन्यव एकराट् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब तक अभिमन्युपुत्र परीक्षित पृथ्वी के एकछत्र समर्थ शासक रहे, तब तक प्रवेश कर लेने पर भी कलि खुलकर प्रभावी नहीं हो सका।

श्लोक 18.6

यस्मिन्नहनि यर्ह्येव भगवानुत्ससर्ज गाम् । तदैवेहानुवृत्तोऽसावधर्मप्रभवः कलिः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिस दिन भगवान ने अपनी प्रकट पृथ्वीलीला समेटी, उसी दिन अधर्म को बढ़ाने वाला कलि यहाँ सक्रिय हुआ।

श्लोक 18.7

नानुद्वेष्टि कलिं सम्राट् सारङ्ग इव सारभुक् । कुशलान्याशु सिद्ध्यन्ति नेतराणि कृतानि यत् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: सार ग्रहण करने वाले राजा कलि से केवल द्वेष नहीं करते थे; वे इस विशेषता को जानते थे कि इस युग में शुभ संकल्प शीघ्र फलते हैं, जबकि अशुभ का दोष उसके किए जाने पर लगता है।

श्लोक 18.8

किं नु बालेषु शूरेण कलिना धीरभीरुणा । अप्रमत्तः प्रमत्तेषु यो वृको नृषु वर्तते ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: कलि असावधान और दुर्बलचित्त लोगों पर भेड़िए की तरह आक्रमण करता है, किन्तु सजग धीरों से डरता है। सावधान राजा के सामने उसका बल नहीं चलता था।

श्लोक 18.9

उपवर्णितमेतद्वः पुण्यं पारीक्षितं मया । वासुदेवकथोपेतमाख्यानं यदपृच्छत ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपने परीक्षित की जो कथा पूछी थी, उसका श्रीकृष्ण की कथा से युक्त पवित्र वर्णन मैंने किया है।

श्लोक 18.10

या याः कथा भगवतः कथनीयोरुकर्मणः । गुणकर्माश्रयाः पुम्भिः संसेव्यास्ता बुभूषुभिः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: कल्याण चाहने वाले लोगों को भगवान के महान कर्मों और गुणों से सम्बन्धित सभी पवित्र कथाओं का श्रवण करना चाहिए।

श्लोक 18.11

ऋषय ऊचुः । सूत जीव समाः सौम्य शाश्वतीर्विशदं यशः । यस्त्वं शंससि कृष्णस्य मर्त्यानाममृतं हि नः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऋषियों ने कहा—सौम्य सूतजी, आप दीर्घजीवी हों! आप हमें श्रीकृष्ण का निर्मल यश सुनाते हैं, जो मरणशील मनुष्यों के लिए अमृत है।

श्लोक 18.12

कर्मण्यस्मिन्ननाश्वासे धूमधूम्रात्मनां भवान् । आपाययति गोविन्दपादपद्मासवं मधु ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: अनिश्चित फल वाले इस यज्ञ में धुएँ से धूमिल हुए हम लोगों को आप गोविन्द के चरणकमलों का मधुर रस पिला रहे हैं।

श्लोक 18.13

तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम् । भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताशिषः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवद्भक्तों की क्षणभर की संगति के बराबर हम स्वर्ग और मोक्ष को भी नहीं मानते; फिर नश्वर सांसारिक सुखों की क्या तुलना?

श्लोक 18.14

को नाम तृप्येद्रसवित्कथायां महत्तमैकान्तपरायणस्य । नान्तं गुणानामगुणस्य जग्मु- र्योगेश्वरा ये भवपाद्ममुख्याः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की कथा का रस जानने वाला उससे कैसे तृप्त हो सकता है? ब्रह्मा और शिव जैसे योगेश्वर भी गुणातीत भगवान के गुणों का अन्त नहीं पा सके।

श्लोक 18.15

तन्नो भवान् वै भगवत्प्रधानो महत्तमैकान्तपरायणस्य । हरेरुदारं चरितं विशुद्धं शुश्रूषतां नो वितनोतु विद्वन् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप भगवान को प्रधान मानने वाले ज्ञानी हैं। कृपा करके हम श्रद्धापूर्वक सुनने वालों के लिए श्रीहरि के उदार और निर्मल चरित्र का विस्तार करें।

श्लोक 18.16

स वै महाभागवतः परीक्षि- द्येनापवर्गाख्यमदभ्रबुद्धिः । ज्ञानेन वैयासकिशब्दितेन भेजे खगेन्द्रध्वजपादमूलम् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: महाभागवत परीक्षित ने शुकदेवजी द्वारा दिए मोक्षप्रद ज्ञान से गरुड़ध्वज भगवान के चरणों का आश्रय प्राप्त किया।

श्लोक 18.17

तन्नः परं पुण्यमसंवृतार्थ- माख्यानमत्यद्भुतयोगनिष्ठम् । आख्याह्यनन्ताचरितोपपन्नं पारीक्षितं भागवताभिरामम् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: परीक्षित की वह परम पवित्र, स्पष्ट तत्त्वार्थ वाली, अद्भुत योगनिष्ठा और अनन्त भगवान की लीलाओं से युक्त कथा सुनाइए, जो भक्तों को प्रिय है।

श्लोक 18.18

सूत उवाच । अहो वयं जन्मभृतोऽद्य हास्म वृद्धानुवृत्त्यापि विलोमजाताः । दौष्कुल्यमाधिं विधुनोति शीघ्रं महत्तमानामभिधानयोगः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—आज हम जन्म से सफल हुए, क्योंकि श्रेष्ठजनों की सेवा और संगति मिली। जन्म की सामाजिक न्यूनता का दुःख भी महात्माओं के संग और स्मरण से शीघ्र दूर होता है।

श्लोक 18.19

कुतः पुनर्गृणतो नाम तस्य महत्तमैकान्तपरायणस्य । योऽनन्तशक्तिर्भगवाननन्तो महद्गुणत्वाद्यमनन्तमाहुः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब महात्माओं की संगति का इतना प्रभाव है, तब अनन्त शक्ति और अनन्त गुणों वाले भगवान का नाम लेने की महिमा तो और भी अधिक है।

श्लोक 18.20

एतावतालं ननु सूचितेन गुणैरसाम्यानतिशायनस्य । हित्वेतरान् प्रार्थयतो विभूति- र्यस्याङ्घ्रिरेणुं जुषतेऽनभीप्सोः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के अतुलनीय गुणों का संकेत इतना ही पर्याप्त है कि लक्ष्मीजी दूसरे आश्रय छोड़कर, भगवान के अनिच्छुक होने पर भी, उनके चरणरज की सेवा चाहती हैं।

श्लोक 18.21

अथापि यत्पादनखावसृष्टं जगद्विरिञ्चोपहृतार्हणाम्भः । सेशं पुनात्यन्यतमो मुकुन्दा- त्को नाम लोके भगवत्पदार्थः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा द्वारा अर्पित चरणोदक उनके नखों से बहकर गङ्गारूप में शिव सहित जगत को पवित्र करता है। मुकुन्द के अतिरिक्त कौन भगवान शब्द का ऐसा पूर्ण आश्रय है?

श्लोक 18.22

यत्रानुरक्ताः सहसैव धीरा व्यपोह्य देहादिषु सङ्गमूढम् । व्रजन्ति तत्पारमहंस्यमन्त्यं यस्मिन्नहिंसोपशमः स्वधर्मः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनमें अनुरक्त धीर साधक देहादि की मोहजनित आसक्ति छोड़कर उस परम परमहंस स्थिति को प्राप्त होते हैं, जहाँ अहिंसा और शान्ति स्वाभाविक धर्म हैं।

श्लोक 18.23

अहं हि पृष्टोऽर्यमणो भवद्भि- राचक्ष आत्मावगमोऽत्र यावान् । नभः पतन्त्यात्मसमं पतत्त्रिण- स्तथा समं विष्णुगतिं विपश्चितः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपने प्रश्न किया है, इसलिए मैं अपनी समझ के अनुसार कहूँगा। जैसे पक्षी अपने सामर्थ्य तक आकाश में उड़ते हैं, वैसे ज्ञानी अपनी क्षमता के अनुसार विष्णु की महिमा समझाते हैं।

श्लोक 18.24

एकदा धनुरुद्यम्य विचरन् मृगयां वने । मृगाननुगतः श्रान्तः क्षुधितस्तृषितो भृशम् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक दिन राजा परीक्षित धनुष लेकर वन में आखेट करते हुए मृगों के पीछे गए। वे थक गए और उन्हें अत्यन्त भूख-प्यास लगी।

श्लोक 18.25

जलाशयमचक्षाणः प्रविवेश तमाश्रमम् । ददर्श मुनिमासीनं शान्तं मीलितलोचनम् ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जलाशय न मिलने पर वे एक आश्रम में पहुँचे। वहाँ एक मुनि शान्त भाव से आँखें बन्द किए बैठे थे।

श्लोक 18.26

प्रतिरुद्धेन्द्रियप्राणमनोबुद्धिमुपारतम् । स्थानत्रयात्परं प्राप्तं ब्रह्मभूतमविक्रियम् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुनि इन्द्रियों, प्राण, मन और बुद्धि को शान्त करके जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे अविकारी ब्रह्मभाव में स्थित थे।

श्लोक 18.27

विप्रकीर्णजटाच्छन्नं रौरवेणाजिनेन च । विशुष्यत्तालुरुदकं तथाभूतमयाचत ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी खुली जटाएँ और मृगचर्म शरीर पर थे। सूखे कण्ठ वाले राजा ने समाधिस्थ मुनि से जल माँगा।

श्लोक 18.28

अलब्धतृणभूम्यादिरसम्प्राप्तार्घ्यसूनृतः । अवज्ञातमिवात्मानं मन्यमानश्चुकोप ह ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: आसन, भूमि पर बैठने का संकेत, अर्घ्य या मधुर स्वागत-वचन कुछ न मिलने से राजा ने स्वयं को उपेक्षित समझा और क्रोधित हो गए।

श्लोक 18.29

अभूतपूर्वः सहसा क्षुत्तृड्भ्यामर्दितात्मनः । ब्राह्मणं प्रत्यभूद्ब्रह्मन् मत्सरो मन्युरेव च ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: भूख-प्यास और थकान से पीड़ित राजा के मन में अचानक ब्राह्मण के प्रति ऐसा रोष उठा, जो उनके स्वभाव में पहले नहीं था।

श्लोक 18.30

स तु ब्रह्मऋषेरंसे गतासुमुरगं रुषा । विनिर्गच्छन् धनुष्कोट्या निधाय पुरमागमत् ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: आश्रम से निकलते समय उन्होंने क्रोध में धनुष की नोक से एक मरा हुआ साँप उठाकर ऋषि के कन्धे पर रख दिया और नगर लौट आए।

श्लोक 18.31

एष किं निभृताशेषकरणो मीलितेक्षणः । मृषासमाधिराहोस्वित्किं नु स्यात्क्षत्रबन्धुभिः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे सोच रहे थे—क्या ऋषि सचमुच इन्द्रियाँ समेटकर समाधि में हैं, या हम जैसे क्षत्रियों की उपेक्षा करने के लिए आँखें बन्द किए बैठे हैं?

श्लोक 18.32

तस्य पुत्रोऽतितेजस्वी विहरन् बालकोऽर्भकैः । राज्ञाघं प्रापितं तातं श्रुत्वा तत्रेदमब्रवीत् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऋषि का तेजस्वी बालक पुत्र साथियों के साथ खेल रहा था। पिता के अपमान का समाचार सुनकर उसने क्रोध में कहना आरम्भ किया।

श्लोक 18.33

अहो अधर्मः पालानां पीव्नां बलिभुजामिव । स्वामिन्यघं यद्दासानां द्वारपानां शुनामिव ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसने कहा—कर और भेंट से पले ये शासक अपने पालकों के प्रति ही अपराध करते हैं, जैसे द्वार की रखवाली करने वाला कुत्ता अपने स्वामी पर भौंके।

श्लोक 18.34

ब्राह्मणैः क्षत्रबन्धुर्हि गृहपालो निरूपितः । स कथं तद्गृहे द्वाःस्थः सभाण्डं भोक्तुमर्हति ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसके क्रोधित मत में क्षत्रिय ब्राह्मणों द्वारा नियुक्त रक्षक हैं; इसलिए उन्हें मर्यादा छोड़कर स्वामी के घर में अनुचित आचरण नहीं करना चाहिए।

श्लोक 18.35

कृष्णे गते भगवति शास्तर्युत्पथगामिनाम् । तद्भिन्नसेतूनद्याहं शास्मि पश्यत मे बलम् ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: कुमार्गगामियों को दण्ड देने वाले भगवान कृष्ण चले गए हैं, इसलिए आज मैं मर्यादा तोड़ने वालों को दण्ड दूँगा; मेरा सामर्थ्य देखो।

श्लोक 18.36

इत्युक्त्वा रोषताम्राक्षो वयस्यान् ऋषिबालकः । कौशिक्याप उपस्पृश्य वाग्वज्रं विससर्ज ह ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसा कहकर लाल नेत्रों वाले ऋषिकुमार ने कौशिकी नदी का जल छुआ और वज्र के समान कठोर शाप दिया।

श्लोक 18.37

इति लङ्घितमर्यादं तक्षकः सप्तमेऽहनि । दङ्क्ष्यति स्म कुलाङ्गारं चोदितो मे ततद्रुहम् ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसने कहा—मेरे पिता से द्रोह करके मर्यादा तोड़ने वाले राजा को मेरी प्रेरणा से सातवें दिन तक्षक सर्प डसेगा।

श्लोक 18.38

ततोऽभ्येत्याश्रमं बालो गले सर्पकलेवरम् । पितरं वीक्ष्य दुःखार्तो मुक्तकण्ठो रुरोद ह ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर बालक आश्रम लौटा। पिता के गले में मृत सर्प देखकर वह दुःख से जोर-जोर से रोने लगा।

श्लोक 18.39

स वा आङ्गिरसो ब्रह्मन् श्रुत्वा सुतविलापनम् । उन्मील्य शनकैर्नेत्रे दृष्ट्वा स्वांसे मृतोरगम् ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: आङ्गिरस वंश के मुनि ने पुत्र का रोना सुनकर धीरे-धीरे आँखें खोलीं और अपने कन्धे पर मरा हुआ साँप देखा।

श्लोक 18.40

विसृज्य तं च पप्रच्छ वत्स कस्माद्धि रोदिषि । केन वा ते प्रतिकृतमित्युक्तः स न्यवेदयत् ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने सर्प को हटाकर पूछा—बेटा, क्यों रो रहे हो? तुम्हारे साथ किसने क्या किया? तब बालक ने सारी घटना कह सुनाई।

श्लोक 18.41

निशम्य शप्तमतदर्हं नरेन्द्रं स ब्राह्मणो नात्मजमभ्यनन्दत् । अहो बतांहो महदज्ञ ते कृत- मल्पीयसि द्रोह उरुर्दमो धृतः ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: निर्दोष नहीं, किन्तु इतने बड़े दण्ड के अयोग्य राजा को शाप दिए जाने पर ऋषि ने पुत्र की प्रशंसा नहीं की। बोले—अज्ञानी बालक, छोटी भूल पर इतना बड़ा दण्ड देकर तुमने भारी अपराध किया है।

श्लोक 18.42

न वै नृभिर्नरदेवं पराख्यं सम्मातुमर्हस्यविपक्वबुद्धे । यत्तेजसा दुर्विषहेण गुप्ता विन्दन्ति भद्राण्यकुतोभयाः प्रजाः ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपरिपक्व बुद्धि वाले पुत्र, समर्थ राजा को सामान्य मनुष्य के समान मत समझो। उसके शासन की शक्ति से सुरक्षित प्रजा निर्भय होकर कल्याण प्राप्त करती है।

श्लोक 18.43

अलक्ष्यमाणे नरदेवनाम्नि रथाङ्गपाणावयमङ्ग लोकः । तदा हि चौरप्रचुरो विनङ्क्ष्य- त्यरक्ष्यमाणोऽविवरूथवत्क्षणात् ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब भगवान की रक्षक व्यवस्था का प्रतिनिधि राजा नहीं रहता, तब प्रजा चोरों से भर जाती है और बिना रखवाले भेड़ों की तरह शीघ्र संकट में पड़ती है।

श्लोक 18.44

तदद्य नः पापमुपैत्यनन्वयं यन्नष्टनाथस्य वसोर्विलुम्पकात् । परस्परं घ्नन्ति शपन्ति वृञ्जते पशून् स्त्रियोऽर्थान् पुरुदस्यवो जनाः ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: रक्षक के न रहने पर लुटेरे लोगों का धन, पशु और स्त्रियाँ छीनेंगे; लोग परस्पर मारेंगे और अपशब्द कहेंगे। ऐसे अनर्थ का दोष हम पर भी आएगा।

श्लोक 18.45

तदाऽऽर्यधर्मश्च विलीयते नृणां वर्णाश्रमाचारयुतस्त्रयीमयः । ततोऽर्थकामाभिनिवेशितात्मनां शुनां कपीनामिव वर्णसङ्करः ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: तब शास्त्राधारित सामाजिक और आश्रमधर्म बिगड़ेंगे। केवल धन और भोग में लगे लोगों में संयम, उत्तरदायित्व और मर्यादा का लोप होने लगेगा।

श्लोक 18.46

धर्मपालो नरपतिः स तु सम्राड्बृहच्छ्रवाः । साक्षान्महाभागवतो राजर्षिर्हयमेधयाट् । क्षुत्तृट् श्रमयुतो दीनो नैवास्मच्छापमर्हति ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: परीक्षित धर्मपालक, महान यशस्वी, महाभागवत और अश्वमेधकर्ता राजर्षि हैं। भूख-प्यास तथा थकान से विवश हुए वे हमारे ऐसे शाप के पात्र नहीं हैं।

श्लोक 18.47

अपापेषु स्वभृत्येषु बालेनापक्वबुद्धिना । पापं कृतं तद्भगवान् सर्वात्मा क्षन्तुमर्हति ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: सर्वात्मा भगवान हमारे अपरिपक्व बालक द्वारा अपने निर्दोष सेवक के प्रति किए गए इस अपराध को क्षमा करें।

श्लोक 18.48

तिरस्कृता विप्रलब्धाः शप्ताः क्षिप्ता हता अपि । नास्य तत्प्रतिकुर्वन्ति तद्भक्ताः प्रभवोऽपि हि ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के भक्त समर्थ होकर भी अपमान, छल, शाप, तिरस्कार और आघात के बदले प्रतिशोध नहीं लेते।

श्लोक 18.49

इति पुत्रकृताघेन सोऽनुतप्तो महामुनिः । स्वयं विप्रकृतो राज्ञा नैवाघं तदचिन्तयत् ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: महामुनि पुत्र के अपराध पर पछता रहे थे। राजा ने स्वयं उनका अपमान किया था, पर वे उस बात को मन में नहीं लाए।

श्लोक 18.50

प्रायशः साधवो लोके परैर्द्वन्द्वेषु योजिताः । न व्यथन्ति न हृष्यन्ति यत आत्मागुणाश्रयः ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा को प्रकृति के गुणों से परे जानने वाले साधु दूसरों से सुख-दुःख मिलने पर प्रायः न व्याकुल होते हैं, न उन्मत्त प्रसन्नता में बहते हैं।

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 18 समाप्त ॥

प्रथम स्कन्ध • अध्याय 19

गङ्गातट पर परीक्षित और शुकदेव का आगमन

श्लोक 19.1

सूत उवाच । महीपतिस्त्वथ तत्कर्म गर्ह्यं विचिन्तयन्नात्मकृतं सुदुर्मनाः । अहो मया नीचमनार्यवत्कृतं निरागसि ब्रह्मणि गूढतेजसि ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—नगर लौटकर परीक्षित अपने निन्दनीय कर्म पर बहुत दुःखी हुए। उन्होंने सोचा—निर्दोष और गुप्त तेज वाले ब्राह्मण के साथ मैंने अनार्य जैसा नीच व्यवहार किया।

श्लोक 19.2

ध्रुवं ततो मे कृतदेवहेलना- द्दुरत्ययं व्यसनं नातिदीर्घात् । तदस्तु कामं त्वघनिष्कृताय मे यथा न कुर्यां पुनरेवमद्धा ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसे पूज्यजन का अपमान करने से शीघ्र ही कोई दुस्तर विपत्ति आएगी। वही मेरे अपराध का प्रायश्चित्त बने, जिससे मैं फिर ऐसी भूल न करूँ।

श्लोक 19.3

अद्यैव राज्यं बलमृद्धकोशं प्रकोपितब्रह्मकुलानलो मे । दहत्वभद्रस्य पुनर्न मेऽभू- त्पापीयसी धीर्द्विजदेवगोभ्यः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्राह्मण के अपमान से उत्पन्न परिणाम मेरे राज्य, बल और भरे खजाने तक को नष्ट कर दे, पर ब्राह्मण, देवता और गाय के प्रति फिर ऐसी दुर्बुद्धि न हो।

श्लोक 19.4

स चिन्तयन्नित्थमथाश‍ृणोद्यथा मुनेः सुतोक्तो निरृतिस्तक्षकाख्यः । स साधु मेने न चिरेण तक्षका- नलं प्रसक्तस्य विरक्तिकारणम् ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसी विचार के बीच उन्हें ऋषिपुत्र के शाप और तक्षक द्वारा मृत्यु का समाचार मिला। संसार में आसक्त अपने मन के लिए उसे शीघ्र वैराग्य जगाने वाला अवसर मानकर उन्होंने स्वीकार किया।

श्लोक 19.5

अथो विहायेमममुं च लोकं विमर्शितौ हेयतया पुरस्तात् । कृष्णाङ्घ्रिसेवामधिमन्यमान उपाविशत्प्रायममर्त्यनद्याम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस लोक और परलोक के भोगों को त्याज्य समझकर उन्होंने श्रीकृष्ण के चरणों की सेवा को सर्वोपरि माना और गङ्गातट पर अन्तिम साधना के लिए बैठ गए।

श्लोक 19.6

या वै लसच्छ्रीतुलसीविमिश्र- कृष्णाङ्घ्रिरेण्वभ्यधिकाम्बुनेत्री । पुनाति लोकानुभयत्र सेशान् कस्तां न सेवेत मरिष्यमाणः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुलसी और भगवान के चरणरज से पवित्र गङ्गा लोकों तथा उनके अधिपतियों को शुद्ध करती है; अन्तकाल में कौन उसका आश्रय न चाहेगा?

श्लोक 19.7

इति व्यवच्छिद्य स पाण्डवेयः प्रायोपवेशं प्रति विष्णुपद्याम् । दध्यौ मुकुन्दाङ्घ्रिमनन्यभावो मुनिव्रतो मुक्तसमस्तसङ्गः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: परीक्षित ने गङ्गातट पर संसार की आसक्ति छोड़ दी, मुनिव्रत ग्रहण किया और अनन्य भाव से मुकुन्द के चरणों का ध्यान करने लगे।

श्लोक 19.8

तत्रोपजग्मुर्भुवनं पुनाना महानुभावा मुनयः सशिष्याः । प्रायेण तीर्थाभिगमापदेशैः स्वयं हि तीर्थानि पुनन्ति सन्तः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ शिष्यों सहित अनेक प्रभावशाली मुनि आए, जो जगत को पवित्र करते हैं। संत तीर्थयात्रा के बहाने स्वयं तीर्थों को भी पवित्र करते हैं।

श्लोक 19.9

अत्रिर्वसिष्ठश्च्यवनः शरद्वा- नरिष्टनेमिर्भृगुरङ्गिराश्च । पराशरो गाधिसुतोऽथ राम उतथ्य इन्द्रप्रमदेध्मवाहौ ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: अत्रि, वसिष्ठ, च्यवन, शरद्वान्, अरिष्टनेमि, भृगु, अङ्गिरा, पराशर, विश्वामित्र, परशुराम, उतथ्य, इन्द्रप्रमद और इध्मवाह वहाँ आए।

श्लोक 19.10

मेधातिथिर्देवल आर्ष्टिषेणो भारद्वाजो गौतमः पिप्पलादः । मैत्रेय और्वः कवषः कुम्भयोनि- र्द्वैपायनो भगवान्नारदश्च ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेधातिथि, देवल, आर्ष्टिषेण, भारद्वाज, गौतम, पिप्पलाद, मैत्रेय, और्व, कवष, अगस्त्य, व्यास और नारद भी पधारे।

श्लोक 19.11

अन्ये च देवर्षिब्रह्मर्षिवर्या राजर्षिवर्या अरुणादयश्च । नानार्षेयप्रवरान् समेता- नभ्यर्च्य राजा शिरसा ववन्दे ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: अन्य श्रेष्ठ देवर्षि, ब्रह्मर्षि और अरुण आदि राजर्षि भी आए। राजा ने विभिन्न ऋषिपरम्पराओं के इन महात्माओं का सत्कार करके मस्तक झुकाया।

श्लोक 19.12

सुखोपविष्टेष्वथ तेषु भूयः कृतप्रणामः स्वचिकीर्षितं यत् । विज्ञापयामास विविक्तचेता उपस्थितोऽग्रेऽभिगृहीतपाणिः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: सबके सुखपूर्वक बैठने पर राजा ने फिर प्रणाम किया और निर्मल चित्त से सामने हाथ जोड़कर अपना निश्चय बताया।

श्लोक 19.13

राजोवाच । अहो वयं धन्यतमा नृपाणां महत्तमानुग्रहणीयशीलाः । राज्ञां कुलं ब्राह्मणपादशौचा- द्दूराद्विसृष्टं बत गर्ह्यकर्म ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा बोले—हम राजाओं में धन्य हैं कि आप महात्माओं की कृपा के पात्र बने। राजकुल के कठोर कर्म उसे ब्राह्मणों की चरणसेवा से दूर कर देते हैं, फिर भी आपने मुझे अपनाया।

श्लोक 19.14

तस्यैव मेऽघस्य परावरेशो व्यासक्तचित्तस्य गृहेष्वभीक्ष्णम् । निर्वेदमूलो द्विजशापरूपो यत्र प्रसक्तो भयमाशु धत्ते ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: गृहासक्ति से भरे मेरे अपराधी मन में वैराग्य जगाने के लिए परमेश्वर ने ब्राह्मण के शाप का रूप धारण किया है; ऐसे शाप से आसक्त मन शीघ्र सावधान हो जाता है।

श्लोक 19.15

तं मोपयातं प्रतियन्तु विप्रा गङ्गा च देवी धृतचित्तमीशे । द्विजोपसृष्टः कुहकस्तक्षको वा दशत्वलं गायत विष्णुगाथाः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे ब्राह्मणो और गङ्गामाता, भगवान में चित्त लगाए शरणागत मुझे स्वीकार कीजिए। शाप से प्रेरित तक्षक आए अथवा अन्य रूप से मृत्यु हो—आप भगवान विष्णु की कथा का गान कीजिए।

श्लोक 19.16

पुनश्च भूयाद्भगवत्यनन्ते रतिः प्रसङ्गश्च तदाश्रयेषु । महत्सु यां यामुपयामि सृष्टिं मैत्र्यस्तु सर्वत्र नमो द्विजेभ्यः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं जहाँ भी जन्म लूँ, अनन्त भगवान में प्रेम, उनके आश्रित महात्माओं की संगति और सब प्राणियों के प्रति मैत्री बनी रहे। ब्राह्मणों को मेरा प्रणाम है।

श्लोक 19.17

इति स्म राजाध्यवसाययुक्तः प्राचीनमूलेषु कुशेषु धीरः । उदङ्मुखो दक्षिणकूल आस्ते समुद्रपत्न्याः स्वसुतन्यस्तभारः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: राज्य का भार पुत्र को सौंपकर धीर राजा गङ्गा के दक्षिणी तट पर उत्तराभिमुख बैठ गए। उनके कुशासन के मूल पूर्व दिशा की ओर थे।

श्लोक 19.18

एवं च तस्मिन् नरदेवदेवे प्रायोपविष्टे दिवि देवसङ्घाः । प्रशस्य भूमौ व्यकिरन् प्रसूनै- र्मुदा मुहुर्दुन्दुभयश्च नेदुः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके दृढ़ वैराग्यपूर्ण निश्चय की देवताओं ने प्रशंसा की, पुष्प बरसाए और आकाश में हर्ष से दुन्दुभियाँ बजाईं।

श्लोक 19.19

महर्षयो वै समुपागता ये प्रशस्य साध्वित्यनुमोदमानाः । ऊचुः प्रजानुग्रहशीलसारा यदुत्तमश्लोकगुणाभिरूपम् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्राणियों पर अनुग्रह करने वाले महर्षियों ने भी “साधु, साधु” कहकर प्रशंसा की और भगवान के गुणों के अनुरूप वचन कहे।

श्लोक 19.20

न वा इदं राजर्षिवर्य चित्रं भवत्सु कृष्णं समनुव्रतेषु । येऽध्यासनं राजकिरीटजुष्टं सद्यो जहुर्भगवत्पार्श्वकामाः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे राजर्षिश्रेष्ठ, श्रीकृष्ण के अनुगामी आपके वंश में यह आश्चर्य नहीं। आपके पूर्वज भी भगवान का सान्निध्य चाहकर मुकुटधारी राजसिंहासन तत्काल छोड़ गए थे।

श्लोक 19.21

सर्वे वयं तावदिहास्महेऽद्य कलेवरं यावदसौ विहाय । लोकं परं विरजस्कं विशोकं यास्यत्ययं भागवतप्रधानः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: हम सब यहाँ तब तक रहेंगे, जब तक यह श्रेष्ठ भगवद्भक्त शरीर छोड़कर रजोगुण और शोक से रहित परम लोक को प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 19.22

आश्रुत्य तदृषिगणवचः परीक्षि- त्समं मधुच्युद्गुरु चाव्यलीकम् । आभाषतैनानभिनन्द्य युक्तान् शुश्रूषमाणश्चरितानि विष्णोः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मधुर, गम्भीर और सत्य ऋषिवचन सुनकर परीक्षित ने उनका अभिनन्दन किया और भगवान की कथा सुनने की इच्छा से फिर कहा।

श्लोक 19.23

समागताः सर्वत एव सर्वे वेदा यथा मूर्तिधरास्त्रिपृष्ठे । नेहाथवामुत्र च कश्चनार्थ ऋते परानुग्रहमात्मशीलम् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप सभी दिशाओं से ऐसे आए हैं, जैसे वेद मूर्तिमान होकर एकत्र हुए हों। परोपकार के अतिरिक्त आपको इस लोक या परलोक का कोई स्वार्थ नहीं है।

श्लोक 19.24

ततश्च वः पृच्छ्यमिमं विपृच्छे विश्रभ्य विप्रा इति कृत्यतायाम् । सर्वात्मना म्रियमाणैश्च कृत्यं शुद्धं च तत्रामृशताभियुक्ताः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए मैं आप पर विश्वास करके पूछता हूँ—मनुष्य का, विशेषकर मृत्यु निकट होने पर, शुद्ध और सर्वथा करने योग्य कर्तव्य क्या है? कृपा करके विचारपूर्वक बताइए।

श्लोक 19.25

तत्राभवद्भगवान् व्यासपुत्रो यदृच्छया गामटमानोऽनपेक्षः । अलक्ष्यलिङ्गो निजलाभतुष्टो वृतश्च बालैरवधूतवेषः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसी समय व्यासपुत्र शुकदेव स्वेच्छा से पृथ्वी पर विचरते वहाँ आ पहुँचे। वे किसी अपेक्षा या आश्रमचिह्न से बँधे नहीं थे, आत्मतृप्त अवधूतवेश में थे और बालक उनके पीछे चल रहे थे।

श्लोक 19.26

तं द्व्यष्टवर्षं सुकुमारपाद- करोरुबाह्वंसकपोलगात्रम् । चार्वायताक्षोन्नसतुल्यकर्ण- सुभ्र्वाननं कम्बुसुजातकण्ठम् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे सोलह वर्ष के जैसे तरुण थे। उनके हाथ, पैर, जाँघ, भुजाएँ, कन्धे और गाल कोमल थे; विशाल नेत्र, उन्नत नासिका, सम कान, सुन्दर भौंहें और शंख जैसी गर्दन थी।

श्लोक 19.27

निगूढजत्रुं पृथुतुङ्गवक्षस- मावर्तनाभिं वलिवल्गूदरं च । दिगम्बरं वक्त्रविकीर्णकेशं प्रलम्बबाहुं स्वमरोत्तमाभम् ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी हँसली भीतर ढकी थी, वक्षःस्थल चौड़ा, नाभि गम्भीर और उदर सुन्दर था। वे दिगम्बर, मुख पर बिखरे केश और लम्बी भुजाओं वाले श्रेष्ठ दिव्य पुरुष जैसे थे।

श्लोक 19.28

श्यामं सदापीच्यवयोऽङ्गलक्ष्म्या स्त्रीणां मनोज्ञं रुचिरस्मितेन । प्रत्युत्थितास्ते मुनयः स्वासनेभ्य- स्तल्लक्षणज्ञा अपि गूढवर्चसम् ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्यामवर्ण तरुण स्वरूप और मधुर मुस्कान से वे मनोहर थे। उनका तेज छिपा होने पर भी लक्षण पहचानकर सभी मुनि अपने आसनों से उठ खड़े हुए।

श्लोक 19.29

स विष्णुरातोऽतिथय आगताय तस्मै सपर्यां शिरसाऽऽजहार । ततो निवृत्ता ह्यबुधाः स्त्रियोऽर्भका महासने सोपविवेश पूजितः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: विष्णुरात परीक्षित ने अतिथि के रूप में आए उनका सिर झुकाकर पूजन किया। तब उनके पीछे आए अनजान बालक और स्त्रियाँ लौट गए; शुकदेव उच्च आसन पर बैठे।

श्लोक 19.30

स संवृतस्तत्र महान् महीयसां ब्रह्मर्षिराजर्षिदेवर्षिसङ्घैः । व्यरोचतालं भगवान् यथेन्दु- र्ग्रहर्क्षतारानिकरैः परीतः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मर्षियों, राजर्षियों और देवर्षियों से घिरे वे ऐसे शोभित थे, जैसे ग्रहों, नक्षत्रों और तारों के बीच चन्द्रमा।

श्लोक 19.31

प्रशान्तमासीनमकुण्ठमेधसं मुनिं नृपो भागवतोऽभ्युपेत्य । प्रणम्य मूर्ध्नावहितः कृताञ्जलि- र्नत्वा गिरा सूनृतयान्वपृच्छत् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: शान्त और निर्बाध बुद्धि वाले मुनि के पास भक्तराज परीक्षित गए, मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर मधुर वाणी से पूछा।

श्लोक 19.32

परीक्षिदुवाच । अहो अद्य वयं ब्रह्मन् सत्सेव्याः क्षत्रबन्धवः । कृपयातिथिरूपेण भवद्भिस्तीर्थकाः कृताः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: परीक्षित बोले—आज हम क्षत्रिय होकर भी संतों की सेवा के योग्य बन गए। आपने कृपा करके अतिथि रूप में आकर हमें तीर्थ जैसा पवित्र कर दिया।

श्लोक 19.33

येषां संस्मरणात्पुंसां सद्यः शुध्यन्ति वै गृहाः । किं पुनर्दर्शनस्पर्शपादशौचासनादिभिः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप जैसे महात्माओं के स्मरण से ही घर पवित्र होते हैं; फिर दर्शन, स्पर्श, चरणप्रक्षालन और आसन अर्पण की महिमा तो और अधिक है।

श्लोक 19.34

सान्निध्यात्ते महायोगिन् पातकानि महान्त्यपि । सद्यो नश्यन्ति वै पुंसां विष्णोरिव सुरेतराः ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे महायोगी, आपके सान्निध्य से महान पाप भी वैसे नष्ट हो जाते हैं, जैसे भगवान विष्णु के सामने असुर टिक नहीं सकते।

श्लोक 19.35

अपि मे भगवान् प्रीतः कृष्णः पाण्डुसुतप्रियः । पैतृष्वसेयप्रीत्यर्थं तद्गोत्रस्यात्तबान्धवः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्या पाण्डवों के प्रिय श्रीकृष्ण मुझ पर प्रसन्न हैं? अपने फुफेरे भाइयों के प्रेम के कारण ही उन्होंने हमारे वंश से आत्मीयता रखी है।

श्लोक 19.36

अन्यथा तेऽव्यक्तगतेर्दर्शनं नः कथं नृणाम् । नितरां म्रियमाणानां संसिद्धस्य वनीयसः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: अन्यथा आपकी गति साधारण लोगों से छिपी रहती है; मृत्यु के निकट खड़े हम लोगों को आप जैसे आत्मसिद्ध महात्मा का दर्शन कैसे मिलता?

श्लोक 19.37

अतः पृच्छामि संसिद्धिं योगिनां परमं गुरुम् । पुरुषस्येह यत्कार्यं म्रियमाणस्य सर्वथा ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए योगियों के परम गुरु आपसे पूछता हूँ—जीवन में और विशेषकर मृत्यु निकट होने पर मनुष्य को अपनी सिद्धि के लिए क्या करना चाहिए?

श्लोक 19.38

यच्छ्रोतव्यमथो जप्यं यत्कर्तव्यं नृभिः प्रभो । स्मर्तव्यं भजनीयं वा ब्रूहि यद्वा विपर्ययम् ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे प्रभो, क्या सुनना, किसका जप करना, कौन-सा कर्म करना, किसका स्मरण और भजन करना चाहिए? और किन बातों से बचना चाहिए?

श्लोक 19.39

नूनं भगवतो ब्रह्मन् गृहेषु गृहमेधिनाम् । न लक्ष्यते ह्यवस्थानमपि गोदोहनं क्वचित् ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप गृहस्थों के घरों में प्रायः गाय दुहने जितनी देर भी नहीं ठहरते; इसलिए आपके इस सान्निध्य का अवसर हमारे लिए अत्यन्त दुर्लभ है।

श्लोक 19.40

सूत उवाच । एवमाभाषितः पृष्टः स राज्ञा श्लक्ष्णया गिरा । प्रत्यभाषत धर्मज्ञो भगवान् बादरायणिः ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—राजा के मधुर वचनों में पूछे इन प्रश्नों पर धर्मज्ञ भगवान शुकदेवजी ने उत्तर देना आरम्भ किया।

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 19 समाप्त ॥

पाठाधार और संपादकीय जानकारी

मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents का “श्रीमद्भागवतं—प्रथमस्कन्धः” है। कोष्ठकों में दिए अतिरिक्त पाठ और वैकल्पिक पाठान्तर मुख्य श्लोकों में नहीं जोड़े गए हैं। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना की स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है; किसी आधुनिक टीका की प्रतिलिपि नहीं है। यह प्रथम स्कन्ध का क्रमिक भाग 6 है। इस भाग के साथ प्रथम स्कन्ध के सभी 19 अध्यायों का क्रम पूरा होता है।

भक्ति भावना • मूल पाठ और सरल हिंदी भावार्थ

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