श्रीमद्भागवत महापुराण प्रथम स्कन्ध भाग 6 — अध्याय 16–19, कलि निग्रह और शुकदेव आगमन
श्रीमद्भागवत महापुराण
प्रथम स्कन्ध • भाग ६ • अध्याय १६–१९
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कलि निग्रह और शुकदेव आगमन
राजा परीक्षित का धर्मरक्षण, कलि का निग्रह, शाप के बाद गङ्गातट पर वैराग्य और शुकदेवजी के आगमन की कथा।
यहाँ अध्याय 16–19 के सभी 171 श्लोक मूल क्रम में हैं। प्रत्येक के साथ स्वतंत्र रूप से लिखा सरल हिंदी भावार्थ है।
प्रथम स्कन्ध • अध्याय 16
परीक्षित का दिग्विजय और धर्म-पृथ्वी संवाद
श्लोक 16.1
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—महाभागवत परीक्षित श्रेष्ठ ब्राह्मणों की शिक्षा के अनुसार पृथ्वी का शासन करने लगे। जन्म के समय बताई गई महान विशेषताएँ उनमें प्रकट हुईं।
श्लोक 16.2
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने उत्तर की पुत्री इरावती से विवाह किया और उनसे जनमेजय आदि चार पुत्र हुए।
श्लोक 16.3
सरल हिंदी भावार्थ: कृपाचार्य को आचार्य बनाकर उन्होंने गङ्गातट पर तीन अश्वमेध यज्ञ किए, जिनमें बहुत दक्षिणा दी गई और देवताओं का प्रत्यक्ष दर्शन हुआ।
श्लोक 16.4
सरल हिंदी भावार्थ: दिग्विजय में उन्होंने राजवेशधारी कलि को गाय और बैल को पैरों से मारते देखा और अपने पराक्रम से उसका निग्रह किया।
श्लोक 16.5
सरल हिंदी भावार्थ: शौनकजी ने पूछा—राजा ने दिग्विजय में कलि का निग्रह क्यों किया? राजचिह्न धारण करके गाय को मारने वाला वह कौन था? यदि प्रसंग कृष्णकथा से जुड़ा है तो हमें सुनाइए।
श्लोक 16.6
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के चरणकमलों का रस लेने वाले संतों को निरर्थक बातों से क्या प्रयोजन? ऐसी चर्चा जीवन का व्यर्थ व्यय करती है।
श्लोक 16.7
सरल हिंदी भावार्थ: अल्पायु मनुष्यों के लिए अमृतमय कथा सुनने का अवसर देने हेतु यहाँ यज्ञ के कार्य में मृत्युदेव को भी बुलाया गया है।
श्लोक 16.8
सरल हिंदी भावार्थ: जब तक मृत्यु के अधिष्ठाता यहाँ उपस्थित हैं, तब तक मृत्यु का भय स्थगित रहे—इसी उद्देश्य से ऋषियों ने उन्हें आमन्त्रित किया है। आइए, भगवान की लीलामृत कथा का पान करें।
श्लोक 16.9
सरल हिंदी भावार्थ: अल्पायु और मन्दबुद्धि मनुष्य का समय रात को नींद में और दिन में व्यर्थ कामों में बीत जाता है।
श्लोक 16.10
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—कुरुजाङ्गल में परीक्षित को अपने राज्य में कलि के प्रवेश का अप्रिय समाचार मिला। युद्धकुशल राजा ने तत्काल धनुष उठाया।
श्लोक 16.11
सरल हिंदी भावार्थ: श्याम घोड़ों वाले सुसज्जित और सिंहध्वजयुक्त रथ पर चढ़कर वे रथ, घोड़े, हाथी तथा पैदल सेना के साथ दिग्विजय को निकले।
श्लोक 16.12
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने भद्राश्व, केतुमाल, भारत, उत्तरकुरु और किम्पुरुष आदि क्षेत्रों को अपने अधीन करके राजकर और भेंट स्वीकार की।
श्लोक 16.13
सरल हिंदी भावार्थ: स्थान-स्थान पर वे अपने महात्मा पूर्वजों का यश सुनते थे, जिसमें श्रीकृष्ण की महिमा प्रकट होती थी।
श्लोक 16.14
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने अश्वत्थामा के अस्त्र से अपनी रक्षा, यदुवंशियों और पाण्डवों की मित्रता तथा श्रीकृष्ण के प्रति उनकी भक्ति की कथाएँ सुनीं।
श्लोक 16.15
सरल हिंदी भावार्थ: इन कथाओं से अत्यन्त प्रसन्न होकर राजा प्रेम से खिले नेत्रों के साथ सुनाने वालों को धन, वस्त्र और हार प्रदान करते थे।
श्लोक 16.16
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने पाण्डवों के प्रेम में सारथि, सभासद, सेवक, मित्र और दूत की भूमिकाएँ निभाईं; वे उनके साथ चले, प्रणाम और स्तुति भी की। इन लीलाओं को सुनकर राजा की भक्ति बढ़ी।
श्लोक 16.17
सरल हिंदी भावार्थ: अपने पूर्वजों का आचरण अपनाकर इस प्रकार शासन करते परीक्षित के समय निकट ही एक अद्भुत घटना हुई; अब उसे सुनिए।
श्लोक 16.18
सरल हिंदी भावार्थ: एक पैर पर चलते धर्म ने गाय के रूप में पृथ्वी को देखा। वह बछड़े से बिछुड़ी माता जैसी शोभारहित और आँसू बहाती थी; धर्म ने उससे पूछा।
श्लोक 16.19
सरल हिंदी भावार्थ: धर्म बोले—हे भद्रे, क्या आप कुशल से हैं? आपका मुख मुरझाया और कान्तिहीन है। क्या कोई आन्तरिक पीड़ा है अथवा दूर गए किसी प्रिय का शोक है?
श्लोक 16.20
सरल हिंदी भावार्थ: क्या आप मेरे तीन चरण टूट जाने का दुःख करती हैं, या अपने ऊपर अधर्मियों का अधिकार होने का? क्या देवताओं के यज्ञभाग छिनने या वर्षा के अभाव से पीड़ित प्रजा की चिन्ता है?
श्लोक 16.21
सरल हिंदी भावार्थ: क्या असुरक्षित स्त्रियों, पीड़ित बालकों, दुराचारी ब्राह्मणों में वेदविद्या की दुर्दशा या ब्राह्मणद्रोही राजपरिवारों में श्रेष्ठ लोगों की उपेक्षा से आप दुःखी हैं?
श्लोक 16.22
सरल हिंदी भावार्थ: क्या कलि से प्रभावित अयोग्य राजाओं और उनके उजाड़े राज्यों की चिन्ता है, या केवल भोजन, पेय, वस्त्र, स्नान और विषयभोग में लगे लोगों की?
श्लोक 16.23
सरल हिंदी भावार्थ: या पृथ्वी का भार दूर करने के लिए अवतरित श्रीहरि के अन्तर्धान के बाद, उनके मोक्षदायी कर्मों का स्मरण करके आप विरह अनुभव करती हैं?
श्लोक 16.24
सरल हिंदी भावार्थ: हे वसुन्धरे, अपनी पीड़ा का मूल मुझे बताइए। क्या सबसे बलवान काल ने देवताओं द्वारा पूजित आपका सौभाग्य छीन लिया है?
श्लोक 16.25
सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी बोलीं—हे धर्म, आप वह सब जानते हैं जिसके विषय में पूछ रहे हैं। जिनके कारण आप लोकों को सुख देने वाले चार चरणों पर प्रतिष्ठित थे, उन्हीं का वियोग है।
श्लोक 16.26
सरल हिंदी भावार्थ: उन भगवान में सत्य, पवित्रता, दया, क्षमा, त्याग, सन्तोष, सरलता, मन और इन्द्रियों का संयम, तप, समता, सहनशीलता, विरक्ति तथा शास्त्रज्ञान जैसे गुण हैं।
श्लोक 16.27
सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, वीरता, तेज, बल, स्मृति, स्वतन्त्रता, कुशलता, सौन्दर्य, धैर्य और कोमलता भी उन्हीं में पूर्ण हैं।
श्लोक 16.28
सरल हिंदी भावार्थ: वाक्पटुता, विनय, सदाचार, सहनशक्ति, ओज, सामर्थ्य, सौभाग्य, गम्भीरता, स्थिरता, आस्तिकता, कीर्ति, गौरव और अहंकाररहितता भी उनके गुण हैं।
श्लोक 16.29
सरल हिंदी भावार्थ: ये तथा अन्य सभी वांछनीय महान गुण भगवान में नित्य विद्यमान हैं; उनसे कभी अलग नहीं होते। महानता चाहने वाले इन्हीं गुणों की अभिलाषा करते हैं।
श्लोक 16.30
सरल हिंदी भावार्थ: सभी गुणों के आश्रय और लक्ष्मीनिवास श्रीकृष्ण से रहित जगत को अब पापमय कलि की दृष्टि में पड़ा देखकर मैं शोक करती हूँ।
श्लोक 16.31
सरल हिंदी भावार्थ: मैं अपने लिए, आपके लिए और देवताओं, पितरों, ऋषियों, साधुओं तथा समस्त वर्णों और आश्रमों के लिए भी दुःखी हूँ।
श्लोक 16.32
सरल हिंदी भावार्थ: जिन लक्ष्मीजी की कृपादृष्टि पाने के लिए ब्रह्मा आदि भगवान का आश्रय लेकर दीर्घ तप करते हैं, वे भी अपना कमलवन छोड़कर प्रेम से भगवान के चरणों की सेवा करती हैं।
श्लोक 16.33
सरल हिंदी भावार्थ: कमल, वज्र, अंकुश और ध्वजा के चिह्नों वाले भगवान के चरणों से मेरा अंग सुशोभित था। उस सौभाग्य से मैं तीनों लोकों में शोभती थी; अब भगवान ने उस गर्व को दूर करके प्रकट उपस्थिति समेट ली।
श्लोक 16.34
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने आसुरी राजाओं की सैकड़ों अक्षौहिणी सेनाओं का भार मुझसे हटाया और अपने पराक्रम से आपके टूटे चरणों को फिर सँभाला। इसी हेतु यदुवंश में सुन्दर रूप धारण किया था।
श्लोक 16.35
सरल हिंदी भावार्थ: उनके प्रेमपूर्ण दर्शन, मधुर मुस्कान और मनोहर वचन प्रियजनों का धैर्य भी हर लेते थे; उनके चरणस्पर्श से मुझे रोमांच होता था। ऐसे पुरुषोत्तम का वियोग कौन सह सकता है?
श्लोक 16.36
सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी और धर्म इस प्रकार संवाद कर रहे थे कि तभी राजर्षि परीक्षित पूर्ववाहिनी सरस्वती के तट पर पहुँचे।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 16 समाप्त ॥
प्रथम स्कन्ध • अध्याय 17
कलि का निग्रह और धर्म के चार चरण
श्लोक 17.1
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—वहाँ राजा ने गाय और बैल को अनाथों की तरह पिटते देखा। राजचिह्न पहने एक अधर्मी हाथ में दण्ड लिए उन्हें मार रहा था।
श्लोक 17.2
सरल हिंदी भावार्थ: कमलनाल जैसा श्वेत बैल एक पैर पर काँपते हुए खड़ा था; मार से भयभीत होकर वह असहाय हो गया था।
श्लोक 17.3
सरल हिंदी भावार्थ: धर्म का पोषण करने वाली गाय भी पैरों की चोट से दुःखी, बछड़े से रहित, दुर्बल और आँसू बहाती हुई घास चाह रही थी।
श्लोक 17.4
सरल हिंदी भावार्थ: स्वर्णसज्जित रथ पर बैठे राजा ने धनुष चढ़ाया और मेघ के समान गम्भीर स्वर में उस व्यक्ति से पूछा।
श्लोक 17.5
सरल हिंदी भावार्थ: तू कौन है जो मेरे संरक्षण में रहने वाले निर्बलों को बलपूर्वक मारता है? वेश राजा का है, किन्तु कर्म किसी नीच वृत्ति वाले नट जैसे हैं।
श्लोक 17.6
सरल हिंदी भावार्थ: श्रीकृष्ण और अर्जुन के प्रत्यक्ष संरक्षण से पृथ्वी के वंचित होते ही तू निर्दोषों पर एकान्त में प्रहार कर रहा है; तू दण्ड का पात्र है।
श्लोक 17.7
सरल हिंदी भावार्थ: फिर बैल से बोले—हे श्वेतवर्ण वृषभ, तीन चरण खोकर एक पर चलने वाले आप कौन हैं? क्या कोई देवता बैलरूप में हमारी परीक्षा कर रहे हैं?
श्लोक 17.8
सरल हिंदी भावार्थ: पुरुवंशी राजाओं की भुजाओं से सुरक्षित इस धरती पर प्राणी दुःखी नहीं होने पाते; आपको देखकर यह अनोखी पीड़ा दिखाई दे रही है।
श्लोक 17.9
सरल हिंदी भावार्थ: हे सुरभिनन्दन, शोक न करें; इस दुष्ट का भय छोड़ें। हे माता, आप भी न रोएँ। मेरे रहते दुष्टों को दण्ड मिलेगा और आपका कल्याण होगा।
श्लोक 17.10
सरल हिंदी भावार्थ: जिस राजा के राज्य में निर्दोष प्रजा दुष्टों से भयभीत रहे, उस असावधान राजा की कीर्ति, आयु, ऐश्वर्य और श्रेष्ठ गति नष्ट होने लगती है।
श्लोक 17.11
सरल हिंदी भावार्थ: पीड़ितों की पीड़ा दूर करना राजाओं का परम धर्म है। इसलिए प्राणियों से द्रोह करने वाले इस दुष्ट को मैं दण्ड दूँगा।
श्लोक 17.12
सरल हिंदी भावार्थ: हे चार चरणों वाले सुरभिनन्दन, आपके तीन पैर किसने काटे? श्रीकृष्ण का अनुसरण करने वाले राजाओं के राज्य में ऐसी पीड़ा नहीं होनी चाहिए।
श्लोक 17.13
सरल हिंदी भावार्थ: हे वृषभ, निर्दोष साधुओं को यह कष्ट देने वाले का परिचय बताइए; वह पाण्डववंश की कीर्ति पर कलंक लगा रहा है।
श्लोक 17.14
सरल हिंदी भावार्थ: निर्दोष को पीड़ा देने वाला मेरे दण्ड से कहीं नहीं बच सकता। दुष्ट का दमन होने पर साधुओं का कल्याण होता है।
श्लोक 17.15
सरल हिंदी भावार्थ: जो निरंकुश होकर निरपराध प्राणियों को सताए, वह देवता भी हो तो मैं उसकी अपराध करने वाली भुजा को आभूषण सहित काटने का सामर्थ्य रखता हूँ।
श्लोक 17.16
सरल हिंदी भावार्थ: राजा का प्रधान कर्तव्य अपने धर्म में स्थित लोगों की रक्षा और बिना आपत्ति के भी कुमार्ग पर चलने वालों को शास्त्रानुसार अनुशासित करना है।
श्लोक 17.17
सरल हिंदी भावार्थ: धर्म बोले—पीड़ितों को अभय देने वाला यह वचन पाण्डवों के वंशज के योग्य है। आपके पूर्वजों के गुणों ने भगवान को उनका दूत बनने तक के लिए प्रेरित किया था।
श्लोक 17.18
सरल हिंदी भावार्थ: हे पुरुषश्रेष्ठ, दुःखों का मूल कारण किसे कहें, यह विभिन्न मत सुनकर हम निश्चित नहीं कर पाते।
श्लोक 17.19
सरल हिंदी भावार्थ: कुछ लोग स्वयं जीव को दुःख का कारण कहते हैं, कुछ दैव को, कुछ कर्म को और कुछ स्वभाव को प्रधान मानते हैं।
श्लोक 17.20
सरल हिंदी भावार्थ: कुछ का मत है कि कारण तर्क और कथन से परे है। हे राजर्षि, आप अपनी विवेकबुद्धि से उचित विचार करें।
श्लोक 17.21
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—धर्म के ये वचन सुनकर राजा ने एकाग्र और चिन्तित मन से उन्हें उत्तर दिया।
श्लोक 17.22
सरल हिंदी भावार्थ: राजा बोले—हे धर्मज्ञ, आपकी वाणी धर्ममयी है; आप वृषभरूप धर्म ही हैं। आप दोष बताने में भी सावधान हैं, क्योंकि अनुचित दोषारोपण करने वाला भी अधर्म का भागी बन सकता है।
श्लोक 17.23
सरल हिंदी भावार्थ: अथवा इसका अर्थ यही है कि भगवान की माया की गति जीवों के मन और वाणी की पहुँच से परे है।
श्लोक 17.24
सरल हिंदी भावार्थ: सत्ययुग में आपके चार चरण तप, पवित्रता, दया और सत्य थे। अहंकार, आसक्ति और मदरूपी अधर्म ने आपके तीन चरण क्षीण कर दिए हैं।
श्लोक 17.25
सरल हिंदी भावार्थ: अब आप सत्य के एक चरण से टिके हैं। असत्य से बढ़ा यह अधर्मरूपी कलि उसे भी नष्ट करना चाहता है।
श्लोक 17.26
सरल हिंदी भावार्थ: यह पृथ्वी भगवान द्वारा अपना महान भार उतरने और उनके मंगलमय चरणचिह्न पड़ने से आनन्दित थी।
श्लोक 17.27
सरल हिंदी भावार्थ: अब भगवान की प्रकट उपस्थिति से वंचित होकर यह आँसू बहाती है; इसे भय है कि ब्राह्मणहित-विरोधी और अधार्मिक राजवेशधारी इसका शोषण करेंगे।
श्लोक 17.28
सरल हिंदी भावार्थ: धर्म और पृथ्वी को इस प्रकार आश्वस्त करके महारथी परीक्षित ने अधर्म के कारण कलि को दण्ड देने के लिए तीखी तलवार उठाई।
श्लोक 17.29
सरल हिंदी भावार्थ: कलि ने राजा को मारने के लिए तैयार देखकर राजचिह्न त्याग दिए और भय से काँपता उनके चरणों में सिर रखकर गिर पड़ा।
श्लोक 17.30
सरल हिंदी भावार्थ: शरणागत और दीनों पर दया करने वाले राजा ने उसे नहीं मारा। वे मानो मुस्कराते हुए उससे बोले।
श्लोक 17.31
सरल हिंदी भावार्थ: राजा बोले—अर्जुन के यश को आगे बढ़ाने वाले हमारे वंश के सामने हाथ जोड़कर शरण आए तुम्हें अब भय नहीं। किन्तु अधर्म के साथी होने के कारण तुम मेरे राज्य में नहीं रह सकते।
श्लोक 17.32
सरल हिंदी भावार्थ: तुम राजाओं के शरीर और मन में प्रवेश करते हो तो लोभ, असत्य, चोरी, अनाचार, दरिद्रता, छल, कलह और पाखण्ड भी पीछे-पीछे आ जाते हैं।
श्लोक 17.33
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए धर्म और सत्य से चलने वाले इस ब्रह्मावर्त में तुम्हारा निवास नहीं हो सकता, जहाँ यज्ञविधि जानने वाले यज्ञेश्वर भगवान की पूजा करते हैं।
श्लोक 17.34
सरल हिंदी भावार्थ: उस पूजा से भगवान स्थावर-जंगम सभी के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं। वे वायु की तरह भीतर-बाहर व्याप्त सबके आत्मस्वरूप हैं।
श्लोक 17.35
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—परीक्षित की आज्ञा सुनकर कलि काँप उठा और उठी हुई तलवार वाले दण्डदाता राजा से बोला।
श्लोक 17.36
सरल हिंदी भावार्थ: कलि बोला—हे सार्वभौम, आपकी आज्ञा से मैं जहाँ भी रहूँगा, वहाँ आपको धनुष-बाण सहित उपस्थित पाऊँगा।
श्लोक 17.37
सरल हिंदी भावार्थ: हे धर्मरक्षकों में श्रेष्ठ, कृपा करके ऐसा स्थान निश्चित कीजिए जहाँ आपकी आज्ञा का पालन करते हुए रह सकूँ।
श्लोक 17.38
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—उसके निवेदन पर राजा ने जुआ, मादक पान, अनैतिक यौन संबंध और पशुवध—इन चार अधर्मस्थलों में रहने की अनुमति दी।
श्लोक 17.39
सरल हिंदी भावार्थ: फिर माँगने पर राजा ने स्वर्ण में भी स्थान दिया; उससे जुड़ी लोभवृत्ति में असत्य, मद, काम, उग्र रजोगुण और वैर को आश्रय मिलता है।
श्लोक 17.40
सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार उत्तरापुत्र परीक्षित द्वारा दिए इन पाँच स्थानों में अधर्म की उत्पत्ति का कारण कलि उनकी आज्ञा के अधीन रहने लगा।
श्लोक 17.41
सरल हिंदी भावार्थ: कल्याण चाहने वाला मनुष्य इन अधर्ममय स्थानों और प्रवृत्तियों से बचे; विशेषकर धर्मशील राजा, लोकपाल और गुरु को सावधान रहना चाहिए।
श्लोक 17.42
सरल हिंदी भावार्थ: राजा ने धर्म के खोए तप, पवित्रता और दया रूप तीन चरण फिर प्रतिष्ठित किए तथा पृथ्वी को आश्वासन देकर उसकी समृद्धि बढ़ाई।
श्लोक 17.43
सरल हिंदी भावार्थ: यही परीक्षित उस राजसिंहासन पर प्रतिष्ठित हुए, जिसे वनगमन की इच्छा रखने वाले पितामह युधिष्ठिर ने उन्हें सौंपा था।
श्लोक 17.44
सरल हिंदी भावार्थ: वे महान यशस्वी, सौभाग्यशाली चक्रवर्ती राजर्षि हस्तिनापुर में कुरुवंश की राजश्री के साथ विराजते थे।
श्लोक 17.45
सरल हिंदी भावार्थ: अभिमन्युपुत्र परीक्षित ऐसे प्रभावशाली राजा थे; उनके पृथ्वीपालन के समय ही आप लोगों ने यह दीर्घ सत्रयज्ञ आरम्भ किया।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 17 समाप्त ॥
प्रथम स्कन्ध • अध्याय 18
परीक्षित को शाप और शमीक ऋषि का विवेक
श्लोक 18.1
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—अद्भुत कर्मों वाले श्रीकृष्ण की कृपा से परीक्षित माता के गर्भ में अश्वत्थामा के अस्त्र से झुलसकर भी नहीं मरे थे।
श्लोक 18.2
सरल हिंदी भावार्थ: बाद में ब्राह्मण के शाप से तक्षक द्वारा प्राण जाने की आशंका होने पर भी भगवान में चित्त अर्पित होने से वे भय और मोह में नहीं पड़े।
श्लोक 18.3
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी के शिष्य बनकर और भगवान का वास्तविक स्वरूप जानकर उन्होंने सब ओर की आसक्ति छोड़ी तथा गङ्गातट पर शरीर त्याग किया।
श्लोक 18.4
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की कथामृत का रस लेने और उनके चरणकमलों का स्मरण करने वालों को अन्तकाल में भी घबराहट नहीं होती।
श्लोक 18.5
सरल हिंदी भावार्थ: जब तक अभिमन्युपुत्र परीक्षित पृथ्वी के एकछत्र समर्थ शासक रहे, तब तक प्रवेश कर लेने पर भी कलि खुलकर प्रभावी नहीं हो सका।
श्लोक 18.6
सरल हिंदी भावार्थ: जिस दिन भगवान ने अपनी प्रकट पृथ्वीलीला समेटी, उसी दिन अधर्म को बढ़ाने वाला कलि यहाँ सक्रिय हुआ।
श्लोक 18.7
सरल हिंदी भावार्थ: सार ग्रहण करने वाले राजा कलि से केवल द्वेष नहीं करते थे; वे इस विशेषता को जानते थे कि इस युग में शुभ संकल्प शीघ्र फलते हैं, जबकि अशुभ का दोष उसके किए जाने पर लगता है।
श्लोक 18.8
सरल हिंदी भावार्थ: कलि असावधान और दुर्बलचित्त लोगों पर भेड़िए की तरह आक्रमण करता है, किन्तु सजग धीरों से डरता है। सावधान राजा के सामने उसका बल नहीं चलता था।
श्लोक 18.9
सरल हिंदी भावार्थ: आपने परीक्षित की जो कथा पूछी थी, उसका श्रीकृष्ण की कथा से युक्त पवित्र वर्णन मैंने किया है।
श्लोक 18.10
सरल हिंदी भावार्थ: कल्याण चाहने वाले लोगों को भगवान के महान कर्मों और गुणों से सम्बन्धित सभी पवित्र कथाओं का श्रवण करना चाहिए।
श्लोक 18.11
सरल हिंदी भावार्थ: ऋषियों ने कहा—सौम्य सूतजी, आप दीर्घजीवी हों! आप हमें श्रीकृष्ण का निर्मल यश सुनाते हैं, जो मरणशील मनुष्यों के लिए अमृत है।
श्लोक 18.12
सरल हिंदी भावार्थ: अनिश्चित फल वाले इस यज्ञ में धुएँ से धूमिल हुए हम लोगों को आप गोविन्द के चरणकमलों का मधुर रस पिला रहे हैं।
श्लोक 18.13
सरल हिंदी भावार्थ: भगवद्भक्तों की क्षणभर की संगति के बराबर हम स्वर्ग और मोक्ष को भी नहीं मानते; फिर नश्वर सांसारिक सुखों की क्या तुलना?
श्लोक 18.14
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की कथा का रस जानने वाला उससे कैसे तृप्त हो सकता है? ब्रह्मा और शिव जैसे योगेश्वर भी गुणातीत भगवान के गुणों का अन्त नहीं पा सके।
श्लोक 18.15
सरल हिंदी भावार्थ: आप भगवान को प्रधान मानने वाले ज्ञानी हैं। कृपा करके हम श्रद्धापूर्वक सुनने वालों के लिए श्रीहरि के उदार और निर्मल चरित्र का विस्तार करें।
श्लोक 18.16
सरल हिंदी भावार्थ: महाभागवत परीक्षित ने शुकदेवजी द्वारा दिए मोक्षप्रद ज्ञान से गरुड़ध्वज भगवान के चरणों का आश्रय प्राप्त किया।
श्लोक 18.17
सरल हिंदी भावार्थ: परीक्षित की वह परम पवित्र, स्पष्ट तत्त्वार्थ वाली, अद्भुत योगनिष्ठा और अनन्त भगवान की लीलाओं से युक्त कथा सुनाइए, जो भक्तों को प्रिय है।
श्लोक 18.18
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—आज हम जन्म से सफल हुए, क्योंकि श्रेष्ठजनों की सेवा और संगति मिली। जन्म की सामाजिक न्यूनता का दुःख भी महात्माओं के संग और स्मरण से शीघ्र दूर होता है।
श्लोक 18.19
सरल हिंदी भावार्थ: जब महात्माओं की संगति का इतना प्रभाव है, तब अनन्त शक्ति और अनन्त गुणों वाले भगवान का नाम लेने की महिमा तो और भी अधिक है।
श्लोक 18.20
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के अतुलनीय गुणों का संकेत इतना ही पर्याप्त है कि लक्ष्मीजी दूसरे आश्रय छोड़कर, भगवान के अनिच्छुक होने पर भी, उनके चरणरज की सेवा चाहती हैं।
श्लोक 18.21
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा द्वारा अर्पित चरणोदक उनके नखों से बहकर गङ्गारूप में शिव सहित जगत को पवित्र करता है। मुकुन्द के अतिरिक्त कौन भगवान शब्द का ऐसा पूर्ण आश्रय है?
श्लोक 18.22
सरल हिंदी भावार्थ: उनमें अनुरक्त धीर साधक देहादि की मोहजनित आसक्ति छोड़कर उस परम परमहंस स्थिति को प्राप्त होते हैं, जहाँ अहिंसा और शान्ति स्वाभाविक धर्म हैं।
श्लोक 18.23
सरल हिंदी भावार्थ: आपने प्रश्न किया है, इसलिए मैं अपनी समझ के अनुसार कहूँगा। जैसे पक्षी अपने सामर्थ्य तक आकाश में उड़ते हैं, वैसे ज्ञानी अपनी क्षमता के अनुसार विष्णु की महिमा समझाते हैं।
श्लोक 18.24
सरल हिंदी भावार्थ: एक दिन राजा परीक्षित धनुष लेकर वन में आखेट करते हुए मृगों के पीछे गए। वे थक गए और उन्हें अत्यन्त भूख-प्यास लगी।
श्लोक 18.25
सरल हिंदी भावार्थ: जलाशय न मिलने पर वे एक आश्रम में पहुँचे। वहाँ एक मुनि शान्त भाव से आँखें बन्द किए बैठे थे।
श्लोक 18.26
सरल हिंदी भावार्थ: मुनि इन्द्रियों, प्राण, मन और बुद्धि को शान्त करके जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे अविकारी ब्रह्मभाव में स्थित थे।
श्लोक 18.27
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी खुली जटाएँ और मृगचर्म शरीर पर थे। सूखे कण्ठ वाले राजा ने समाधिस्थ मुनि से जल माँगा।
श्लोक 18.28
सरल हिंदी भावार्थ: आसन, भूमि पर बैठने का संकेत, अर्घ्य या मधुर स्वागत-वचन कुछ न मिलने से राजा ने स्वयं को उपेक्षित समझा और क्रोधित हो गए।
श्लोक 18.29
सरल हिंदी भावार्थ: भूख-प्यास और थकान से पीड़ित राजा के मन में अचानक ब्राह्मण के प्रति ऐसा रोष उठा, जो उनके स्वभाव में पहले नहीं था।
श्लोक 18.30
सरल हिंदी भावार्थ: आश्रम से निकलते समय उन्होंने क्रोध में धनुष की नोक से एक मरा हुआ साँप उठाकर ऋषि के कन्धे पर रख दिया और नगर लौट आए।
श्लोक 18.31
सरल हिंदी भावार्थ: वे सोच रहे थे—क्या ऋषि सचमुच इन्द्रियाँ समेटकर समाधि में हैं, या हम जैसे क्षत्रियों की उपेक्षा करने के लिए आँखें बन्द किए बैठे हैं?
श्लोक 18.32
सरल हिंदी भावार्थ: ऋषि का तेजस्वी बालक पुत्र साथियों के साथ खेल रहा था। पिता के अपमान का समाचार सुनकर उसने क्रोध में कहना आरम्भ किया।
श्लोक 18.33
सरल हिंदी भावार्थ: उसने कहा—कर और भेंट से पले ये शासक अपने पालकों के प्रति ही अपराध करते हैं, जैसे द्वार की रखवाली करने वाला कुत्ता अपने स्वामी पर भौंके।
श्लोक 18.34
सरल हिंदी भावार्थ: उसके क्रोधित मत में क्षत्रिय ब्राह्मणों द्वारा नियुक्त रक्षक हैं; इसलिए उन्हें मर्यादा छोड़कर स्वामी के घर में अनुचित आचरण नहीं करना चाहिए।
श्लोक 18.35
सरल हिंदी भावार्थ: कुमार्गगामियों को दण्ड देने वाले भगवान कृष्ण चले गए हैं, इसलिए आज मैं मर्यादा तोड़ने वालों को दण्ड दूँगा; मेरा सामर्थ्य देखो।
श्लोक 18.36
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसा कहकर लाल नेत्रों वाले ऋषिकुमार ने कौशिकी नदी का जल छुआ और वज्र के समान कठोर शाप दिया।
श्लोक 18.37
सरल हिंदी भावार्थ: उसने कहा—मेरे पिता से द्रोह करके मर्यादा तोड़ने वाले राजा को मेरी प्रेरणा से सातवें दिन तक्षक सर्प डसेगा।
श्लोक 18.38
सरल हिंदी भावार्थ: फिर बालक आश्रम लौटा। पिता के गले में मृत सर्प देखकर वह दुःख से जोर-जोर से रोने लगा।
श्लोक 18.39
सरल हिंदी भावार्थ: आङ्गिरस वंश के मुनि ने पुत्र का रोना सुनकर धीरे-धीरे आँखें खोलीं और अपने कन्धे पर मरा हुआ साँप देखा।
श्लोक 18.40
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने सर्प को हटाकर पूछा—बेटा, क्यों रो रहे हो? तुम्हारे साथ किसने क्या किया? तब बालक ने सारी घटना कह सुनाई।
श्लोक 18.41
सरल हिंदी भावार्थ: निर्दोष नहीं, किन्तु इतने बड़े दण्ड के अयोग्य राजा को शाप दिए जाने पर ऋषि ने पुत्र की प्रशंसा नहीं की। बोले—अज्ञानी बालक, छोटी भूल पर इतना बड़ा दण्ड देकर तुमने भारी अपराध किया है।
श्लोक 18.42
सरल हिंदी भावार्थ: अपरिपक्व बुद्धि वाले पुत्र, समर्थ राजा को सामान्य मनुष्य के समान मत समझो। उसके शासन की शक्ति से सुरक्षित प्रजा निर्भय होकर कल्याण प्राप्त करती है।
श्लोक 18.43
सरल हिंदी भावार्थ: जब भगवान की रक्षक व्यवस्था का प्रतिनिधि राजा नहीं रहता, तब प्रजा चोरों से भर जाती है और बिना रखवाले भेड़ों की तरह शीघ्र संकट में पड़ती है।
श्लोक 18.44
सरल हिंदी भावार्थ: रक्षक के न रहने पर लुटेरे लोगों का धन, पशु और स्त्रियाँ छीनेंगे; लोग परस्पर मारेंगे और अपशब्द कहेंगे। ऐसे अनर्थ का दोष हम पर भी आएगा।
श्लोक 18.45
सरल हिंदी भावार्थ: तब शास्त्राधारित सामाजिक और आश्रमधर्म बिगड़ेंगे। केवल धन और भोग में लगे लोगों में संयम, उत्तरदायित्व और मर्यादा का लोप होने लगेगा।
श्लोक 18.46
सरल हिंदी भावार्थ: परीक्षित धर्मपालक, महान यशस्वी, महाभागवत और अश्वमेधकर्ता राजर्षि हैं। भूख-प्यास तथा थकान से विवश हुए वे हमारे ऐसे शाप के पात्र नहीं हैं।
श्लोक 18.47
सरल हिंदी भावार्थ: सर्वात्मा भगवान हमारे अपरिपक्व बालक द्वारा अपने निर्दोष सेवक के प्रति किए गए इस अपराध को क्षमा करें।
श्लोक 18.48
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के भक्त समर्थ होकर भी अपमान, छल, शाप, तिरस्कार और आघात के बदले प्रतिशोध नहीं लेते।
श्लोक 18.49
सरल हिंदी भावार्थ: महामुनि पुत्र के अपराध पर पछता रहे थे। राजा ने स्वयं उनका अपमान किया था, पर वे उस बात को मन में नहीं लाए।
श्लोक 18.50
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा को प्रकृति के गुणों से परे जानने वाले साधु दूसरों से सुख-दुःख मिलने पर प्रायः न व्याकुल होते हैं, न उन्मत्त प्रसन्नता में बहते हैं।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 18 समाप्त ॥
प्रथम स्कन्ध • अध्याय 19
गङ्गातट पर परीक्षित और शुकदेव का आगमन
श्लोक 19.1
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—नगर लौटकर परीक्षित अपने निन्दनीय कर्म पर बहुत दुःखी हुए। उन्होंने सोचा—निर्दोष और गुप्त तेज वाले ब्राह्मण के साथ मैंने अनार्य जैसा नीच व्यवहार किया।
श्लोक 19.2
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसे पूज्यजन का अपमान करने से शीघ्र ही कोई दुस्तर विपत्ति आएगी। वही मेरे अपराध का प्रायश्चित्त बने, जिससे मैं फिर ऐसी भूल न करूँ।
श्लोक 19.3
सरल हिंदी भावार्थ: ब्राह्मण के अपमान से उत्पन्न परिणाम मेरे राज्य, बल और भरे खजाने तक को नष्ट कर दे, पर ब्राह्मण, देवता और गाय के प्रति फिर ऐसी दुर्बुद्धि न हो।
श्लोक 19.4
सरल हिंदी भावार्थ: इसी विचार के बीच उन्हें ऋषिपुत्र के शाप और तक्षक द्वारा मृत्यु का समाचार मिला। संसार में आसक्त अपने मन के लिए उसे शीघ्र वैराग्य जगाने वाला अवसर मानकर उन्होंने स्वीकार किया।
श्लोक 19.5
सरल हिंदी भावार्थ: इस लोक और परलोक के भोगों को त्याज्य समझकर उन्होंने श्रीकृष्ण के चरणों की सेवा को सर्वोपरि माना और गङ्गातट पर अन्तिम साधना के लिए बैठ गए।
श्लोक 19.6
सरल हिंदी भावार्थ: तुलसी और भगवान के चरणरज से पवित्र गङ्गा लोकों तथा उनके अधिपतियों को शुद्ध करती है; अन्तकाल में कौन उसका आश्रय न चाहेगा?
श्लोक 19.7
सरल हिंदी भावार्थ: परीक्षित ने गङ्गातट पर संसार की आसक्ति छोड़ दी, मुनिव्रत ग्रहण किया और अनन्य भाव से मुकुन्द के चरणों का ध्यान करने लगे।
श्लोक 19.8
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ शिष्यों सहित अनेक प्रभावशाली मुनि आए, जो जगत को पवित्र करते हैं। संत तीर्थयात्रा के बहाने स्वयं तीर्थों को भी पवित्र करते हैं।
श्लोक 19.9
सरल हिंदी भावार्थ: अत्रि, वसिष्ठ, च्यवन, शरद्वान्, अरिष्टनेमि, भृगु, अङ्गिरा, पराशर, विश्वामित्र, परशुराम, उतथ्य, इन्द्रप्रमद और इध्मवाह वहाँ आए।
श्लोक 19.10
सरल हिंदी भावार्थ: मेधातिथि, देवल, आर्ष्टिषेण, भारद्वाज, गौतम, पिप्पलाद, मैत्रेय, और्व, कवष, अगस्त्य, व्यास और नारद भी पधारे।
श्लोक 19.11
सरल हिंदी भावार्थ: अन्य श्रेष्ठ देवर्षि, ब्रह्मर्षि और अरुण आदि राजर्षि भी आए। राजा ने विभिन्न ऋषिपरम्पराओं के इन महात्माओं का सत्कार करके मस्तक झुकाया।
श्लोक 19.12
सरल हिंदी भावार्थ: सबके सुखपूर्वक बैठने पर राजा ने फिर प्रणाम किया और निर्मल चित्त से सामने हाथ जोड़कर अपना निश्चय बताया।
श्लोक 19.13
सरल हिंदी भावार्थ: राजा बोले—हम राजाओं में धन्य हैं कि आप महात्माओं की कृपा के पात्र बने। राजकुल के कठोर कर्म उसे ब्राह्मणों की चरणसेवा से दूर कर देते हैं, फिर भी आपने मुझे अपनाया।
श्लोक 19.14
सरल हिंदी भावार्थ: गृहासक्ति से भरे मेरे अपराधी मन में वैराग्य जगाने के लिए परमेश्वर ने ब्राह्मण के शाप का रूप धारण किया है; ऐसे शाप से आसक्त मन शीघ्र सावधान हो जाता है।
श्लोक 19.15
सरल हिंदी भावार्थ: हे ब्राह्मणो और गङ्गामाता, भगवान में चित्त लगाए शरणागत मुझे स्वीकार कीजिए। शाप से प्रेरित तक्षक आए अथवा अन्य रूप से मृत्यु हो—आप भगवान विष्णु की कथा का गान कीजिए।
श्लोक 19.16
सरल हिंदी भावार्थ: मैं जहाँ भी जन्म लूँ, अनन्त भगवान में प्रेम, उनके आश्रित महात्माओं की संगति और सब प्राणियों के प्रति मैत्री बनी रहे। ब्राह्मणों को मेरा प्रणाम है।
श्लोक 19.17
सरल हिंदी भावार्थ: राज्य का भार पुत्र को सौंपकर धीर राजा गङ्गा के दक्षिणी तट पर उत्तराभिमुख बैठ गए। उनके कुशासन के मूल पूर्व दिशा की ओर थे।
श्लोक 19.18
सरल हिंदी भावार्थ: उनके दृढ़ वैराग्यपूर्ण निश्चय की देवताओं ने प्रशंसा की, पुष्प बरसाए और आकाश में हर्ष से दुन्दुभियाँ बजाईं।
श्लोक 19.19
सरल हिंदी भावार्थ: प्राणियों पर अनुग्रह करने वाले महर्षियों ने भी “साधु, साधु” कहकर प्रशंसा की और भगवान के गुणों के अनुरूप वचन कहे।
श्लोक 19.20
सरल हिंदी भावार्थ: हे राजर्षिश्रेष्ठ, श्रीकृष्ण के अनुगामी आपके वंश में यह आश्चर्य नहीं। आपके पूर्वज भी भगवान का सान्निध्य चाहकर मुकुटधारी राजसिंहासन तत्काल छोड़ गए थे।
श्लोक 19.21
सरल हिंदी भावार्थ: हम सब यहाँ तब तक रहेंगे, जब तक यह श्रेष्ठ भगवद्भक्त शरीर छोड़कर रजोगुण और शोक से रहित परम लोक को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 19.22
सरल हिंदी भावार्थ: मधुर, गम्भीर और सत्य ऋषिवचन सुनकर परीक्षित ने उनका अभिनन्दन किया और भगवान की कथा सुनने की इच्छा से फिर कहा।
श्लोक 19.23
सरल हिंदी भावार्थ: आप सभी दिशाओं से ऐसे आए हैं, जैसे वेद मूर्तिमान होकर एकत्र हुए हों। परोपकार के अतिरिक्त आपको इस लोक या परलोक का कोई स्वार्थ नहीं है।
श्लोक 19.24
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए मैं आप पर विश्वास करके पूछता हूँ—मनुष्य का, विशेषकर मृत्यु निकट होने पर, शुद्ध और सर्वथा करने योग्य कर्तव्य क्या है? कृपा करके विचारपूर्वक बताइए।
श्लोक 19.25
सरल हिंदी भावार्थ: उसी समय व्यासपुत्र शुकदेव स्वेच्छा से पृथ्वी पर विचरते वहाँ आ पहुँचे। वे किसी अपेक्षा या आश्रमचिह्न से बँधे नहीं थे, आत्मतृप्त अवधूतवेश में थे और बालक उनके पीछे चल रहे थे।
श्लोक 19.26
सरल हिंदी भावार्थ: वे सोलह वर्ष के जैसे तरुण थे। उनके हाथ, पैर, जाँघ, भुजाएँ, कन्धे और गाल कोमल थे; विशाल नेत्र, उन्नत नासिका, सम कान, सुन्दर भौंहें और शंख जैसी गर्दन थी।
श्लोक 19.27
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी हँसली भीतर ढकी थी, वक्षःस्थल चौड़ा, नाभि गम्भीर और उदर सुन्दर था। वे दिगम्बर, मुख पर बिखरे केश और लम्बी भुजाओं वाले श्रेष्ठ दिव्य पुरुष जैसे थे।
श्लोक 19.28
सरल हिंदी भावार्थ: श्यामवर्ण तरुण स्वरूप और मधुर मुस्कान से वे मनोहर थे। उनका तेज छिपा होने पर भी लक्षण पहचानकर सभी मुनि अपने आसनों से उठ खड़े हुए।
श्लोक 19.29
सरल हिंदी भावार्थ: विष्णुरात परीक्षित ने अतिथि के रूप में आए उनका सिर झुकाकर पूजन किया। तब उनके पीछे आए अनजान बालक और स्त्रियाँ लौट गए; शुकदेव उच्च आसन पर बैठे।
श्लोक 19.30
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मर्षियों, राजर्षियों और देवर्षियों से घिरे वे ऐसे शोभित थे, जैसे ग्रहों, नक्षत्रों और तारों के बीच चन्द्रमा।
श्लोक 19.31
सरल हिंदी भावार्थ: शान्त और निर्बाध बुद्धि वाले मुनि के पास भक्तराज परीक्षित गए, मस्तक झुकाया और हाथ जोड़कर मधुर वाणी से पूछा।
श्लोक 19.32
सरल हिंदी भावार्थ: परीक्षित बोले—आज हम क्षत्रिय होकर भी संतों की सेवा के योग्य बन गए। आपने कृपा करके अतिथि रूप में आकर हमें तीर्थ जैसा पवित्र कर दिया।
श्लोक 19.33
सरल हिंदी भावार्थ: आप जैसे महात्माओं के स्मरण से ही घर पवित्र होते हैं; फिर दर्शन, स्पर्श, चरणप्रक्षालन और आसन अर्पण की महिमा तो और अधिक है।
श्लोक 19.34
सरल हिंदी भावार्थ: हे महायोगी, आपके सान्निध्य से महान पाप भी वैसे नष्ट हो जाते हैं, जैसे भगवान विष्णु के सामने असुर टिक नहीं सकते।
श्लोक 19.35
सरल हिंदी भावार्थ: क्या पाण्डवों के प्रिय श्रीकृष्ण मुझ पर प्रसन्न हैं? अपने फुफेरे भाइयों के प्रेम के कारण ही उन्होंने हमारे वंश से आत्मीयता रखी है।
श्लोक 19.36
सरल हिंदी भावार्थ: अन्यथा आपकी गति साधारण लोगों से छिपी रहती है; मृत्यु के निकट खड़े हम लोगों को आप जैसे आत्मसिद्ध महात्मा का दर्शन कैसे मिलता?
श्लोक 19.37
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए योगियों के परम गुरु आपसे पूछता हूँ—जीवन में और विशेषकर मृत्यु निकट होने पर मनुष्य को अपनी सिद्धि के लिए क्या करना चाहिए?
श्लोक 19.38
सरल हिंदी भावार्थ: हे प्रभो, क्या सुनना, किसका जप करना, कौन-सा कर्म करना, किसका स्मरण और भजन करना चाहिए? और किन बातों से बचना चाहिए?
श्लोक 19.39
सरल हिंदी भावार्थ: आप गृहस्थों के घरों में प्रायः गाय दुहने जितनी देर भी नहीं ठहरते; इसलिए आपके इस सान्निध्य का अवसर हमारे लिए अत्यन्त दुर्लभ है।
श्लोक 19.40
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—राजा के मधुर वचनों में पूछे इन प्रश्नों पर धर्मज्ञ भगवान शुकदेवजी ने उत्तर देना आरम्भ किया।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • प्रथम स्कन्ध • अध्याय 19 समाप्त ॥
पाठाधार और संपादकीय जानकारी
मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents का “श्रीमद्भागवतं—प्रथमस्कन्धः” है। कोष्ठकों में दिए अतिरिक्त पाठ और वैकल्पिक पाठान्तर मुख्य श्लोकों में नहीं जोड़े गए हैं। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना की स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है; किसी आधुनिक टीका की प्रतिलिपि नहीं है। यह प्रथम स्कन्ध का क्रमिक भाग 6 है। इस भाग के साथ प्रथम स्कन्ध के सभी 19 अध्यायों का क्रम पूरा होता है।
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