श्रीमद्भागवत महापुराण द्वितीय स्कन्ध सम्पूर्ण — 10 अध्याय, 391 श्लोक और हिंदी भावार्थ
श्रीमद्भागवत महापुराण
द्वितीय स्कन्ध • सम्पूर्ण १० अध्याय
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श्रवण, स्मरण और परम आश्रय की खोज
प्रथम स्कन्ध के अन्त में परीक्षित ने शुकदेवजी से जीवन और अन्तकाल के कर्तव्य पूछे थे। द्वितीय स्कन्ध उन्हीं प्रश्नों का उत्तर हरिनाम, भगवान के ध्यान और भक्तियोग से आरम्भ करता है। आगे सृष्टि के तत्त्व, विराट पुरुष, प्रमुख अवतार, ब्रह्मा को चतुश्लोकी उपदेश और भागवत के दस लक्षणों का विवेचन है।
यहाँ चुने हुए आधार-पाठ के सभी 10 अध्याय और 391 श्लोक मूल क्रम में हैं। प्रत्येक का सरल हिंदी भावार्थ इस प्रकाशन के लिए स्वतंत्र रूप से लिखा गया है।
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द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 1
हरिनाम, अन्तकाल का कर्तव्य और विराट स्वरूप
श्लोक 1.1
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—राजन्, आपका प्रश्न लोककल्याणकारी, आत्मज्ञानियों द्वारा मान्य और सुनने योग्य विषयों में सर्वश्रेष्ठ है।
श्लोक 1.2
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मतत्त्व न समझने वाले गृहासक्त लोगों के लिए सुनने और करने के हजारों विषय रहते हैं।
श्लोक 1.3
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी रात नींद और विषयभोग में तथा दिन धन कमाने और परिवार के पालन में बीतता है।
श्लोक 1.4
सरल हिंदी भावार्थ: शरीर, संतान और जीवनसाथी आदि नश्वर सहारों में आसक्त मनुष्य मृत्यु देखते हुए भी अपनी अनित्यता नहीं समझता।
श्लोक 1.5
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए निर्भयता चाहने वाले को सबके आत्मा भगवान हरि का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करना चाहिए।
श्लोक 1.6
सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञान, योग और स्वधर्मपालन का सर्वोच्च फल यही है कि अन्तकाल में नारायण का स्मरण बना रहे।
श्लोक 1.7
सरल हिंदी भावार्थ: विधि-निषेध और गुणबन्धन से ऊपर उठे मुनि भी श्रीहरि के गुणों की कथा में रमते हैं।
श्लोक 1.8
सरल हिंदी भावार्थ: मैंने ब्रह्मतत्त्व से युक्त यह भागवत पुराण द्वापर के आरम्भ में अपने पिता वेदव्यास से पढ़ा था।
श्लोक 1.9
सरल हिंदी भावार्थ: गुणातीत आत्मस्थिति में प्रतिष्ठित होने पर भी भगवान की लीला ने मेरा चित्त आकर्षित किया, इसलिए मैंने इसका अध्ययन किया।
श्लोक 1.10
सरल हिंदी भावार्थ: आप भगवान के अनुगामी हैं; मैं आपको वह कथा सुनाऊँगा, जिस पर श्रद्धा रखने से मुकुन्द में निर्मल प्रेम शीघ्र जागता है।
श्लोक 1.11
सरल हिंदी भावार्थ: विरक्त, कामनायुक्त और निर्भयता चाहने वाले योगियों—सभी के लिए हरिनाम का कीर्तन निश्चित कल्याणमार्ग है।
श्लोक 1.12
सरल हिंदी भावार्थ: असावधानी में बीते अनेक वर्षों से वह जागरूक क्षण श्रेष्ठ है, जिसमें मनुष्य अपना कल्याण साध ले।
श्लोक 1.13
सरल हिंदी भावार्थ: राजर्षि खट्वाङ्ग ने जीवन की थोड़ी अवधि शेष जानकर सब आसक्ति छोड़ी और निर्भय श्रीहरि की शरण प्राप्त की।
श्लोक 1.14
सरल हिंदी भावार्थ: आपके पास सात दिन हैं; इस अवधि में जीवन के परम कल्याण का पूर्ण उपाय कीजिए।
श्लोक 1.15
सरल हिंदी भावार्थ: अन्तकाल निकट होने पर धैर्य रखकर अनासक्ति के शस्त्र से शरीर और उससे जुड़े संबंधों की पकड़ काटनी चाहिए।
श्लोक 1.16
सरल हिंदी भावार्थ: विरक्त साधक पवित्र तीर्थ में स्नान करके स्वच्छ एकान्त स्थान में विधिपूर्वक आसन लगाकर बैठे।
श्लोक 1.17
सरल हिंदी भावार्थ: शुद्ध प्रणव ॐ का मन से अभ्यास करे और श्वास को संयत रखते हुए उसके स्मरण से चित्त स्थिर करे।
श्लोक 1.18
सरल हिंदी भावार्थ: बुद्धि के निर्देशन में मन से इन्द्रियों को विषयों से हटाए और कर्मों से भटके मन को शुभ आश्रय में लगाए।
श्लोक 1.19
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के एक अंग का अखण्ड ध्यान करके मन को विषयों से हटाए; उसी विष्णुपद में चित्त शान्त होता है।
श्लोक 1.20
सरल हिंदी भावार्थ: रज और तम से भ्रमित तथा चंचल मन को धीर साधक धारणा से वश में करे; इससे मानसिक मल मिटता है।
श्लोक 1.21
सरल हिंदी भावार्थ: मंगलमय भगवान का आश्रय देखकर ऐसी धारणा करने वाले योगी में भक्तिस्वरूप योग शीघ्र उत्पन्न होता है।
श्लोक 1.22
सरल हिंदी भावार्थ: राजा ने पूछा—धारणा कैसे की जाए, उसका उचित आश्रय क्या है और कौन-सी धारणा मन का मल शीघ्र मिटाती है?
श्लोक 1.23
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—आसन, श्वास, आसक्ति और इन्द्रियों को संयत करके बुद्धि से भगवान के विराट स्वरूप में मन लगाए।
श्लोक 1.24
सरल हिंदी भावार्थ: यह दृश्य विश्व उनका स्थूलतम ध्यानरूप है, जिसमें भूत, वर्तमान और भविष्य का समस्त जगत समाया है।
श्लोक 1.25
सरल हिंदी भावार्थ: सात आवरणों से घिरे ब्रह्माण्डरूपी शरीर में विराजमान विराट पुरुष ही इस धारणा के आश्रय हैं।
श्लोक 1.26
सरल हिंदी भावार्थ: इस विराट कल्पना में पाताल चरणों का मूल, रसातल एड़ी और अगला भाग, महातल टखने तथा तलातल पिंडलियाँ हैं।
श्लोक 1.27
सरल हिंदी भावार्थ: सुतल दोनों घुटने, वितल और अतल जाँघें, पृथ्वी जघनभाग और आकाश नाभिसरोवर माना गया है।
श्लोक 1.28
सरल हिंदी भावार्थ: ज्योतिर्मय स्वर्गलोक वक्षःस्थल, महर्लोक ग्रीवा, जनलोक मुख, तपोलोक ललाट और सत्यलोक विराट पुरुष का सिर है।
श्लोक 1.29
सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्र आदि देवता उनकी भुजाएँ, दिशाएँ कान, शब्द श्रवणशक्ति, अश्विनीकुमार नासाछिद्र, गन्ध घ्राणशक्ति और अग्नि मुख हैं।
श्लोक 1.30
सरल हिंदी भावार्थ: आकाश आँखें, सूर्य दृष्टि, दिन-रात पलकें, ब्रह्मलोक भौंहों का विस्तार, जल तालु और रस जीभ की ध्यानकल्पना है।
श्लोक 1.31
सरल हिंदी भावार्थ: वेद उनके सिर का आश्रय, यम दाँतों की शक्ति और दन्तपंक्ति स्नेह का संकेत हैं; मोहकारिणी माया हास्य और सृष्टि उनकी दृष्टि का विस्तार है।
श्लोक 1.32
सरल हिंदी भावार्थ: लज्जा ऊपरी होंठ, लोभ निचला होंठ, धर्म वक्षभाग और अधर्म पीठ है; प्रजापति जननेन्द्रिय, मित्र-वरुण उसके सहायक, समुद्र उदर और पर्वत अस्थियाँ हैं।
श्लोक 1.33
सरल हिंदी भावार्थ: नदियाँ नाड़ियाँ, वृक्ष रोम, वायु श्वास, काल उनकी गति और गुणों का प्रवाह उनकी कर्मलीला है।
श्लोक 1.34
सरल हिंदी भावार्थ: बादल केश, संध्या वस्त्र, अव्यक्त प्रकृति हृदय और चन्द्रमा सहित मन विकारों का आश्रय माना जाता है।
श्लोक 1.35
सरल हिंदी भावार्थ: बुद्धि उनकी ज्ञानशक्ति, रुद्र अहंकार का अधिष्ठान, घोड़े-खच्चर-ऊँट-हाथी नख और अन्य पशु जघनप्रदेश की कल्पना हैं।
श्लोक 1.36
सरल हिंदी भावार्थ: पक्षियों की ध्वनियाँ उनकी विचित्र अभिव्यक्ति, मनु विवेकशक्ति और मनुष्य निवास हैं; गन्धर्वादि स्वर-स्मृति तथा असुर पराक्रम का संकेत हैं।
श्लोक 1.37
सरल हिंदी भावार्थ: ब्राह्मण मुख, क्षत्रिय भुजाएँ, वैश्य जाँघें और शूद्र चरणों के आश्रित हैं; विविध यज्ञसामग्री और देवताओं से युक्त यज्ञकर्म भी विराट रूप का अंग है।
श्लोक 1.38
सरल हिंदी भावार्थ: मैंने भगवान के विराट विग्रह की यह संक्षिप्त व्यवस्था कही। बुद्धि से इसमें मन स्थिर करें, क्योंकि इससे बाहर कोई वस्तु नहीं है।
श्लोक 1.39
सरल हिंदी भावार्थ: सभी चित्तवृत्तियों में अनुभूत एक आत्मा ही सबका साक्षी है। उसी सत्य और आनन्दनिधि का भजन करें; पतन कराने वाली दूसरी आसक्तियों में न फँसें।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 1 समाप्त ॥
द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 2
परमात्मध्यान, योगगति और भक्ति का सार
श्लोक 2.1
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—ब्रह्मा ने इसी धारणा से प्रसन्न भगवान की कृपा पाकर विस्मृत सृष्टिज्ञान फिर प्राप्त किया और पूर्ववत् जगत रचा।
श्लोक 2.2
सरल हिंदी भावार्थ: वेद के केवल कामनापूर्ण शब्दों में उलझा मनुष्य नामों और कल्पनाओं में घूमता रहता है, पर वास्तविक तृप्ति नहीं पाता।
श्लोक 2.3
सरल हिंदी भावार्थ: विवेकी मनुष्य व्यवहार में जितना आवश्यक हो उतना ही इन विषयों से संबंध रखे; अनावश्यक उपलब्धियों के लिए व्यर्थ श्रम न करे।
श्लोक 2.4
सरल हिंदी भावार्थ: विरक्त साधक के लिए धरती बिछौना, भुजा तकिया, अंजलि पात्र और साधारण वस्त्र पर्याप्त हैं; विलास जुटाने का आग्रह क्यों?
श्लोक 2.5
सरल हिंदी भावार्थ: प्रकृति में साधन और भगवान की शरण उपलब्ध होने पर आत्मज्ञानी धन के गर्व में अन्धे लोगों की चापलूसी क्यों करें?
श्लोक 2.6
सरल हिंदी भावार्थ: अपने चित्त में स्वयंप्रकाश और परम प्रिय अनन्त भगवान का शान्त भाव से भजन करें; उन्हीं में संसारबन्धन का कारण समाप्त होता है।
श्लोक 2.7
सरल हिंदी भावार्थ: अपने कर्मों से दुःख भोगते लोगों को देखकर कौन विवेकी भगवान के चिन्तन को छोड़कर असार आसक्तियों में लगेगा?
श्लोक 2.8
सरल हिंदी भावार्थ: कुछ योगी हृदय के भीतर चतुर्भुज पुरुष का ध्यान करते हैं, जिनके हाथों में कमल, चक्र, शंख और गदा हैं।
श्लोक 2.9
सरल हिंदी भावार्थ: उनका मुख प्रसन्न, नेत्र कमल जैसे, वस्त्र पीतवर्ण, भुजाभूषण स्वर्णमय और मुकुट-कुण्डल उज्ज्वल रत्नों से शोभित हैं।
श्लोक 2.10
सरल हिंदी भावार्थ: योगियों के खिले हृदयकमल पर उनके चरण विराजते हैं; वक्ष पर श्रीवत्स, गले में कौस्तुभ और ताजी वनमाला शोभती है।
श्लोक 2.11
सरल हिंदी भावार्थ: वे करधनी, अँगूठियों, नूपुर और कंगनों से विभूषित हैं; निर्मल घुँघराले श्याम केश और मधुर मुस्कान मुख को सुशोभित करते हैं।
श्लोक 2.12
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी सहज मुस्कान, दृष्टि और भौंहों के संकेत में भक्तों पर अनुग्रह झलकता है। चित्त स्थिर रहने तक इसी दिव्य स्वरूप का ध्यान करें।
श्लोक 2.13
सरल हिंदी भावार्थ: चरणों से लेकर मुस्कान तक एक-एक अंग का ध्यान करें; जहाँ चित्त स्थिर हो जाए, वहाँ से अगले अंग की ओर बढ़ें।
श्लोक 2.14
सरल हिंदी भावार्थ: जब तक सर्वद्रष्टा विश्वेश्वर में प्रेममय भक्तियोग न जागे, तब तक कर्तव्य समाप्त कर सावधानी से विराट रूप का स्मरण करें।
श्लोक 2.15
सरल हिंदी भावार्थ: लोकासक्ति छोड़ने को तैयार संयमी साधक स्थिर सुखद आसन पर बैठकर देश-काल की आसक्ति हटाए और मन तथा प्राण संयत करे।
श्लोक 2.16
सरल हिंदी भावार्थ: निर्मल बुद्धि से मन को संयत करके बुद्धि को जीवचैतन्य और उसे परमात्मा में स्थित करे; परम शान्ति पाकर कर्माग्रह से विरत हो।
श्लोक 2.17
सरल हिंदी भावार्थ: उस परम स्थिति में काल का भी अधिकार नहीं; वहाँ सांसारिक देवशासन, मिश्रित गुण, विकार, महत्तत्त्व और प्रकृति का बन्धन नहीं रहता।
श्लोक 2.18
सरल हिंदी भावार्थ: साधक “यह नहीं, यह नहीं” के विवेक से असार आवरण छोड़कर प्रेमपूर्वक भगवान के पूज्य चरणों का आश्रय लेते हैं; यही परम वैष्णव पद है।
श्लोक 2.19
सरल हिंदी भावार्थ: इसके आगे सिद्ध योगी के देहत्याग की विशेष योगपद्धति कही गई है—ज्ञान से वासनाएँ शान्त कर प्राण को क्रमशः ऊर्ध्व केन्द्रों में स्थिर करना।
श्लोक 2.20
सरल हिंदी भावार्थ: उस योगवर्णन में प्राण को नाभि से हृदय, फिर वक्षःस्थल और एकाग्र बुद्धि से तालुमूल की ओर ले जाने का क्रम है।
श्लोक 2.21
सरल हिंदी भावार्थ: फिर इन्द्रियों को पूर्ण समेटकर भ्रूमध्य में स्थिरता और अन्ततः ब्रह्मरन्ध्र से परमगति का वर्णन है; यह सिद्ध योग की विशिष्ट अवस्था है।
श्लोक 2.22
सरल हिंदी भावार्थ: यदि योगी ब्रह्मलोक, दिव्य लोकों के विहार अथवा अष्टसिद्धियों की इच्छा रखता है, तो सूक्ष्म मन और इन्द्रियों सहित क्रमगति करता है।
श्लोक 2.23
सरल हिंदी भावार्थ: भीतर-बाहर सूक्ष्म लोकों में विचरने की ऐसी गति ज्ञान, तप, योग और समाधि के साधकों की कही गई है; केवल कर्मों से नहीं मिलती।
श्लोक 2.24
सरल हिंदी भावार्थ: क्रममुक्ति के वर्णन में योगी ज्योतिर्मय ब्रह्मपथ से वैश्वानर और फिर पवित्र होकर शिशुमारचक्र की ओर बढ़ता है।
श्लोक 2.25
सरल हिंदी भावार्थ: उस विश्वनाभि को पार करके निर्मल सूक्ष्म स्वरूप से वह ब्रह्मज्ञानियों द्वारा पूजित महर्लोक पहुँचता है, जहाँ कल्पायु ऋषि रहते हैं।
श्लोक 2.26
सरल हिंदी भावार्थ: कल्पान्त की अग्नि से विश्व को जलता देखकर वह सिद्धेश्वरों के निवास और ब्रह्मा की दीर्घ आयु वाले ब्रह्मलोक की ओर जाता है।
श्लोक 2.27
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ शोक, जरा, मृत्यु, पीड़ा और भय नहीं; केवल अज्ञानी जीवों के गहरे दुःख देखकर करुणावश चिन्ता हो सकती है।
श्लोक 2.28
सरल हिंदी भावार्थ: फिर निर्भय योगी स्थूल और सूक्ष्म आवरणों को क्रमशः पार करता है—पृथ्वी से जल, अग्नि, वायु और व्यापक आकाश तक।
श्लोक 2.29
सरल हिंदी भावार्थ: घ्राण, रसना, दृष्टि, स्पर्श और श्रवण के विषयों को उनके मूल गुणों में समेटकर वह इन्द्रिय-क्रियाओं के सूक्ष्म कारण तक पहुँचता है।
श्लोक 2.30
सरल हिंदी भावार्थ: भूतों, इन्द्रियों, मन और अधिष्ठाता देवताओं के सूक्ष्म कारणों को पार करके वह गुणों के शान्त होने पर महत्तत्त्व का भी अतिक्रमण करता है।
श्लोक 2.31
सरल हिंदी भावार्थ: अन्त में आनन्दमय साधक शान्त परमात्मा को प्राप्त होता है। ऐसी भगवद्गति पाने वाला फिर संसारासक्ति में नहीं फँसता।
श्लोक 2.32
सरल हिंदी भावार्थ: ये दोनों सनातन वेदोक्त गतियाँ मैंने बताईं; पूर्वकाल में आराधना से प्रसन्न वासुदेव ने ब्रह्मा के पूछने पर इन्हें कहा था।
श्लोक 2.33
सरल हिंदी भावार्थ: संसार में प्रवेश किए जीव के लिए सबसे मंगलकारी मार्ग वही है, जिससे भगवान वासुदेव में भक्तियोग उत्पन्न हो।
श्लोक 2.34
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा ने वेदों का बार-बार पूर्ण विचार करके यही निश्चय किया कि परमात्मा में प्रेम जगना ही उनका सार है।
श्लोक 2.35
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान हरि सब जीवों के भीतर साक्षी हैं; बुद्धि और अन्य ज्ञात अनुभवों से उस द्रष्टा का अस्तित्व पहचाना जाता है।
श्लोक 2.36
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए सबको सर्वत्र, सदा और पूरे मन से भगवान हरि का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करना चाहिए।
श्लोक 2.37
सरल हिंदी भावार्थ: जो संतों के प्रिय भगवान की कथामृत को कानों से ग्रहण करते हैं, वे विषयों से दूषित चित्त शुद्ध करके उनके चरणकमलों के निकट पहुँचते हैं।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 2 समाप्त ॥
द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 3
काम्य उपासना और निष्काम भक्तियोग
श्लोक 3.1
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—मृत्यु निकट होने पर विवेकी मनुष्य को जो करना चाहिए, आपके प्रश्न के अनुसार उसका वर्णन कर दिया।
श्लोक 3.2
सरल हिंदी भावार्थ: अब इच्छानुसार देवोपासना का वर्णन है: ब्रह्मतेज का इच्छुक बृहस्पति, इन्द्रियबल का इच्छुक इन्द्र और संतान का इच्छुक प्रजापतियों की उपासना करता है।
श्लोक 3.3
सरल हिंदी भावार्थ: सम्पत्ति के लिए देवी माया, तेज के लिए अग्नि, धन के लिए वसु और पराक्रम के लिए रुद्रों की उपासना कही गई है।
श्लोक 3.4
सरल हिंदी भावार्थ: अन्न के लिए अदिति, स्वर्ग के लिए आदित्य, राज्य के लिए विश्वेदेव और प्रजा की सफलता के लिए साध्यदेवों की उपासना है।
श्लोक 3.5
सरल हिंदी भावार्थ: दीर्घायु के लिए अश्विनीकुमार, पुष्टि के लिए पृथ्वी और प्रतिष्ठा के लिए पृथ्वी-आकाश की उपासना का उल्लेख है।
श्लोक 3.6
सरल हिंदी भावार्थ: रूप के लिए गन्धर्व, जीवनसंगिनी की कामना के लिए उर्वशी और व्यापक आधिपत्य के लिए ब्रह्मा की उपासना कही गई है।
श्लोक 3.7
सरल हिंदी भावार्थ: यश के लिए यज्ञपुरुष, धनभण्डार के लिए वरुण, विद्या के लिए शिव और दाम्पत्य के लिए उमा की उपासना बताई गई है।
श्लोक 3.8
सरल हिंदी भावार्थ: धर्म के लिए भगवान विष्णु, वंशवृद्धि के लिए पितर, रक्षा के लिए पुण्यजन और ओज के लिए मरुद्गणों की उपासना का वर्णन है।
श्लोक 3.9
सरल हिंदी भावार्थ: राज्य के लिए मनुओं, हानिकारक अभिचार की कामना में निरृति और भोग के लिए चन्द्रमा का उल्लेख है; निष्काम साधक परम पुरुष का भजन करे।
श्लोक 3.10
सरल हिंदी भावार्थ: चाहे कोई निष्काम हो, अनेक इच्छाओं वाला हो या मोक्ष चाहे—उदार बुद्धि से तीव्र भक्तियोग द्वारा परम पुरुष की आराधना करे।
श्लोक 3.11
सरल हिंदी भावार्थ: सभी उपासनाओं का परम कल्याण यही है कि भगवद्भक्तों की संगति से भगवान में अचल प्रेम जागे।
श्लोक 3.12
सरल हिंदी भावार्थ: भक्ति से गुणों की लहरें शान्त होती हैं, आत्मप्रसाद और अनासक्ति मिलती है तथा मुक्ति का मार्ग खुलता है; ऐसा सुख पाकर कौन हरिकथा में प्रेम न करेगा?
श्लोक 3.13
सरल हिंदी भावार्थ: शौनकजी ने पूछा—यह उपदेश सुनकर भरतवंशश्रेष्ठ राजा ने व्यासपुत्र ज्ञानी शुकदेवजी से आगे क्या पूछा?
श्लोक 3.14
सरल हिंदी भावार्थ: विद्वान सूतजी, हम सुनना चाहते हैं; संतसभा की चर्चा निश्चय ही हरिकथा को आगे बढ़ाने वाली होती है।
श्लोक 3.15
सरल हिंदी भावार्थ: पाण्डववंशी महारथी परीक्षित ऐसे भक्त थे कि बाललीलाओं में भी श्रीकृष्ण की लीलाओं का अनुकरण करते थे।
श्लोक 3.16
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी भी वासुदेवपरायण हैं; ऐसे संतों के मिलन में भगवान के उदार गुणों की चर्चा अवश्य होती है।
श्लोक 3.17
सरल हिंदी भावार्थ: उगता और अस्त होता सूर्य मनुष्य की आयु हरता है, किन्तु भगवान की कथा में बिताया क्षण जीवन को सार्थक करता है।
श्लोक 3.18
सरल हिंदी भावार्थ: केवल जीना, साँस लेना, खाना और उत्सर्जन करना श्रेष्ठता नहीं; वृक्ष, धौंकनी और पशु भी इन क्रियाओं के समान कार्य करते हैं।
श्लोक 3.19
सरल हिंदी भावार्थ: जिसके कानों में भगवान का नाम कभी न पहुँचे, उसकी केवल भौतिक प्रशंसा मनुष्यजीवन की सार्थकता सिद्ध नहीं करती।
श्लोक 3.20
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की कथा न सुनने वाले कान केवल छिद्र जैसे हैं और उनका गुणगान न करने वाली जीभ मेंढक की टर्राहट जैसी निष्फल कही गई है।
श्लोक 3.21
सरल हिंदी भावार्थ: मुकुट से सजा होकर भी भगवान को न झुकने वाला सिर भार है; स्वर्णकंगन पहने होकर भी उनकी सेवा न करने वाले हाथ निष्क्रिय हैं।
श्लोक 3.22
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के स्वरूप को न देखने वाली आँखें मोरपंख की आँखों जैसी और उनके तीर्थों तक न चलने वाले पैर वृक्ष के तने जैसे कहे गए हैं।
श्लोक 3.23
सरल हिंदी भावार्थ: जो भक्तों की चरणरज और भगवान को अर्पित तुलसी का सम्मान न पाए, उसका केवल शारीरिक जीवन आध्यात्मिक जागृति के बिना अधूरा है।
श्लोक 3.24
सरल हिंदी भावार्थ: हरिनाम से भी जिसका हृदय नहीं पिघलता, वह पत्थर जैसा कठोर कहा गया है; भगवत्प्रेम में आँखों के आँसू और रोमांच भाव के संकेत हैं।
श्लोक 3.25
सरल हिंदी भावार्थ: कृपा करके बताइए कि राजा के उत्तम प्रश्नों पर आत्मविद्या में निपुण शुकदेवजी ने आगे क्या कहा; आप श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 3 समाप्त ॥
द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 4
परीक्षित के प्रश्न और श्रीशुकदेव की प्रार्थना
श्लोक 4.1
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—शुकदेवजी के आत्मतत्त्वनिश्चय वाले वचन सुनकर परीक्षित ने अपना निर्मल मन श्रीकृष्ण में स्थिर किया।
श्लोक 4.2
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने शरीर, जीवनसाथी, संतान, घर, पशु, धन, संबंधियों और समृद्ध राज्य के प्रति पुरानी ममता छोड़ दी।
श्लोक 4.3
सरल हिंदी भावार्थ: श्रीकृष्ण की महिमा सुनने की श्रद्धा से उन्होंने वही प्रश्न किया, जो अब आप मुझसे पूछ रहे हैं।
श्लोक 4.4
सरल हिंदी भावार्थ: जीवन की अनित्यता समझकर धर्म-अर्थ-काम के फलार्थ कर्म छोड़े और वासुदेव में दृढ़ आत्मीयता स्थापित की।
श्लोक 4.5
सरल हिंदी भावार्थ: राजा बोले—निर्दोष सर्वज्ञ महात्मन्, आपके वचन यथार्थ हैं; हरिकथा सुनाने से मेरा अज्ञान मिट रहा है।
श्लोक 4.6
सरल हिंदी भावार्थ: अब मैं जानना चाहता हूँ कि भगवान अपनी माया से इस विश्व की रचना कैसे करते हैं, जिसे बड़े देवता भी पूर्णतः नहीं समझ पाते।
श्लोक 4.7
सरल हिंदी भावार्थ: वे किस शक्ति से जगत की रक्षा और संहार करते हैं तथा अपनी विविध शक्तियों से सृष्टि को खेल की तरह कैसे प्रकट और परिवर्तित करते हैं?
श्लोक 4.8
सरल हिंदी भावार्थ: अद्भुत कर्मों वाले श्रीहरि की लीला विद्वानों के लिए भी समझना कठिन जान पड़ती है।
श्लोक 4.9
सरल हिंदी भावार्थ: एक होते हुए वे प्रकृति के गुणों को एक साथ अथवा क्रम से धारण करके अनेक रूपों में विविध कार्य कैसे करते हैं?
श्लोक 4.10
सरल हिंदी भावार्थ: आप शब्दब्रह्म और परब्रह्म दोनों के ज्ञाता हैं; कृपया मेरे इस संशय का समाधान करें।
श्लोक 4.11
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—ऐसी प्रार्थना सुनकर शुकदेवजी ने हृषीकेश का स्मरण किया और भगवान के गुणों का वर्णन आरम्भ किया।
श्लोक 4.12
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—सृष्टि, पालन और संहार की लीला के लिए तीन शक्तियाँ ग्रहण करने वाले, जीवों के भीतर स्थित और अगम्य गति वाले परम पुरुष को प्रणाम है।
श्लोक 4.13
सरल हिंदी भावार्थ: साधुओं का दुःख मिटाने वाले, दुष्टता का निवारण करने वाले और परमहंसों को साधना का फल देने वाले सर्वस्वरूप भगवान को फिर प्रणाम है।
श्लोक 4.14
सरल हिंदी भावार्थ: सात्वतों के श्रेष्ठ स्वामी, कुटिल साधना वालों से दूर और अतुल ऐश्वर्य सहित अपने शुद्ध स्वरूप में रमण करने वाले प्रभु को बारम्बार प्रणाम है।
श्लोक 4.15
सरल हिंदी भावार्थ: जिनका कीर्तन, स्मरण, दर्शन, प्रणाम, श्रवण और पूजन लोगों का पापमल शीघ्र दूर करता है, उन मंगलकीर्ति भगवान को प्रणाम है।
श्लोक 4.16
सरल हिंदी भावार्थ: जिनके चरणों का आश्रय लेकर विवेकी भीतर-बाहर की आसक्ति छोड़ते हैं और क्लेशरहित ब्रह्मगति पाते हैं, उन्हें प्रणाम है।
श्लोक 4.17
सरल हिंदी भावार्थ: तपस्वी, दानी, यशस्वी, मनस्वी और मन्त्रज्ञ भी अपने साधन उन्हें अर्पित किए बिना परम कल्याण नहीं पाते; उन प्रभु को प्रणाम है।
श्लोक 4.18
सरल हिंदी भावार्थ: विभिन्न जनसमुदायों और पापपूर्ण जीवन वाले लोगों तक को जिनके भक्तों का आश्रय पवित्र करता है, उन सर्वसमर्थ विष्णु को प्रणाम है।
श्लोक 4.19
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मज्ञानियों के आत्मा, वेद, धर्म और तप के आश्रय तथा निर्मल ब्रह्मा-शिव आदि द्वारा पहचाने जाने वाले भगवान प्रसन्न हों।
श्लोक 4.20
सरल हिंदी भावार्थ: लक्ष्मी, यज्ञ, प्रजा, बुद्धि, लोक और पृथ्वी के स्वामी तथा यदुवंशियों और संतों के परम आश्रय भगवान मुझ पर प्रसन्न हों।
श्लोक 4.21
सरल हिंदी भावार्थ: जिनके चरणध्यान से शुद्ध बुद्धि वाले आत्मतत्त्व देखते हैं और अपनी दृष्टि के अनुसार उसका वर्णन करते हैं, वे मुकुन्द मुझ पर प्रसन्न हों।
श्लोक 4.22
सरल हिंदी भावार्थ: जिन्होंने ब्रह्मा के हृदय में सत्य ज्ञान जगाया और उनके मुख से वेदवाणी प्रकट की, वे ऋषियों के परम गुरु प्रसन्न हों।
श्लोक 4.23
सरल हिंदी भावार्थ: जो तत्त्वों से देहरूपी नगर बनाकर उनमें रहते और इन्द्रिय-मनादि की अनुभूति के साक्षी होते हैं, वे भगवान मेरी वाणी को समर्थ बनाएँ।
श्लोक 4.24
सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानदायी भगवान वासुदेवस्वरूप व्यास को प्रणाम है, जिनके मुखकमल से निकले ज्ञानामृत का संत पान करते हैं।
श्लोक 4.25
सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, यही विषय ब्रह्मा ने नारद के पूछने पर कहा था; उन्हें वह ज्ञान स्वयं भगवान से प्राप्त हुआ था।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 4 समाप्त ॥
द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 5
नारद–ब्रह्मा संवाद और सृष्टि के तत्त्व
श्लोक 5.1
सरल हिंदी भावार्थ: नारदजी बोले—हे देवाधिदेव, प्राणियों के पालक और आदिपुरुष ब्रह्माजी, आपको प्रणाम है; आत्मतत्त्व का ज्ञान मुझे बताइए।
श्लोक 5.2
सरल हिंदी भावार्थ: विश्व का स्वरूप, आधार, उत्पत्ति, लय और परम आश्रय क्या है? कृपा करके यथार्थ तत्त्व समझाइए।
श्लोक 5.3
सरल हिंदी भावार्थ: आप भूत, भविष्य और वर्तमान को जानते हैं; आपकी ज्ञानदृष्टि में विश्व हथेली पर रखे आँवले जैसा स्पष्ट है।
श्लोक 5.4
सरल हिंदी भावार्थ: आप किस ज्ञान, आधार और परम आश्रय से अपनी शक्ति द्वारा तत्त्वों से प्राणियों की रचना करते हैं?
श्लोक 5.5
सरल हिंदी भावार्थ: मकड़ी जैसे अपना जाल बनाती है, वैसे अपनी शक्ति से सबको प्रकट करके आप स्वयं बिना थके उनका पालन कैसे करते हैं?
श्लोक 5.6
सरल हिंदी भावार्थ: मैं इस विश्व में आपसे उच्च, निम्न या समान किसी अन्य स्वतंत्र सृष्टिकर्ता को नहीं जानता।
श्लोक 5.7
सरल हिंदी भावार्थ: किन्तु आपने एकाग्र होकर कठोर तप किया; इससे संशय होता है कि आपके ऊपर भी कोई परम सत्ता है।
श्लोक 5.8
सरल हिंदी भावार्थ: हे सर्वज्ञ प्रभो, मेरे सभी प्रश्नों का ऐसा समाधान कीजिए कि आपके उपदेश से मैं वास्तविकता समझ सकूँ।
श्लोक 5.9
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्माजी बोले—वत्स, तुम्हारा प्रश्न करुणापूर्ण और उचित है; इससे मुझे भगवान की शक्ति का वर्णन करने की प्रेरणा मिली है।
श्लोक 5.10
सरल हिंदी भावार्थ: तुमने मेरी जो महिमा कही, वह व्यवहारतः असत्य नहीं, किन्तु मेरे परम आश्रय को न जानने से अपूर्ण है।
श्लोक 5.11
सरल हिंदी भावार्थ: जिनके प्रकाश से विश्व प्रकाशित है, उन्हीं से शक्ति पाकर मैं सृष्टि प्रकट करता हूँ; जैसे सूर्य, अग्नि, चन्द्र और तारों का प्रकाश मूल शक्ति पर निर्भर है।
श्लोक 5.12
सरल हिंदी भावार्थ: उन वासुदेव को प्रणाम और उन्हीं का ध्यान है, जिनकी दुर्जय माया से लोग मुझे ही परम जगद्गुरु मान बैठते हैं।
श्लोक 5.13
सरल हिंदी भावार्थ: माया जिन भगवान के सामने लज्जित रहती है, उसी से मोहित अज्ञानी “मैं” और “मेरा” कहकर अभिमान करते हैं।
श्लोक 5.14
सरल हिंदी भावार्थ: द्रव्य, कर्म, काल, स्वभाव और जीव—तत्त्वतः कुछ भी वासुदेव से स्वतंत्र या पृथक परम सत्ता नहीं है।
श्लोक 5.15
सरल हिंदी भावार्थ: वेद नारायण को लक्ष्य करते हैं, देवता उनके अंगों से सम्बद्ध हैं और लोक तथा यज्ञ भी उन्हीं पर आश्रित हैं।
श्लोक 5.16
सरल हिंदी भावार्थ: योग, तप, ज्ञान और परमगति—सभी का आश्रय और लक्ष्य नारायण हैं।
श्लोक 5.17
सरल हिंदी भावार्थ: सर्वसाक्षी, अविकारी और सबके आत्मा ईश्वर ने मुझे रचा; उनकी दृष्टि और प्रेरणा से मैं उनकी इच्छित सृष्टि करता हूँ।
श्लोक 5.18
सरल हिंदी भावार्थ: गुणातीत भगवान अपनी माया से पालन, सृष्टि और संहार के लिए सत्त्व, रज और तम ग्रहण करते हैं।
श्लोक 5.19
सरल हिंदी भावार्थ: द्रव्य, ज्ञान और क्रिया के आधार ये गुण कार्य-कारण और कर्तापन के भाव से मूलतः मुक्त जीव को बन्धन में डालते हैं।
श्लोक 5.20
सरल हिंदी भावार्थ: गुणों के इन संकेतों से जिनका अस्तित्व जाना जाता है, वे अधोक्षज भगवान मेरे और सभी के स्वामी हैं।
श्लोक 5.21
सरल हिंदी भावार्थ: सृष्टि प्रकट करने की इच्छा से मायापति ने अपनी शक्ति में काल, कर्म और स्वभाव को सक्रिय किया।
श्लोक 5.22
सरल हिंदी भावार्थ: काल से गुणों का सन्तुलन बदला, स्वभाव से परिवर्तन हुआ और भगवान के अधिष्ठान में कर्मानुसार महत्तत्त्व प्रकट हुआ।
श्लोक 5.23
सरल हिंदी भावार्थ: रज और सत्त्व से विकसित महत्तत्त्व के परिवर्तन से तमप्रधान, द्रव्य-ज्ञान-क्रिया का कारण अहंकार उत्पन्न हुआ।
श्लोक 5.24
सरल हिंदी भावार्थ: वह अहंकार वैकारिक, तैजस और तामस—तीन प्रकार का हुआ; उनसे ज्ञान, क्रिया और द्रव्य की शक्तियाँ प्रकट हुईं।
श्लोक 5.25
सरल हिंदी भावार्थ: तामस अहंकार के परिवर्तन से आकाश बना। उसका गुण शब्द है, जो सुनने वाले और सुने जाने वाले के संबंध का संकेत है।
श्लोक 5.26
सरल हिंदी भावार्थ: आकाश से स्पर्शगुण वाला वायु बना, जिसमें पूर्ववर्ती शब्दगुण भी है; प्राण, ओज और बल उससे सम्बद्ध हैं।
श्लोक 5.27
सरल हिंदी भावार्थ: काल, कर्म और स्वभाव के प्रभाव से वायु से तेज प्रकट हुआ, जिसमें रूप के साथ स्पर्श और शब्द भी हैं।
श्लोक 5.28
सरल हिंदी भावार्थ: तेज से जल उत्पन्न हुआ। उसमें रस तथा पहले के रूप, स्पर्श और शब्दगुण भी विद्यमान हैं।
श्लोक 5.29
सरल हिंदी भावार्थ: जल के परिवर्तन से गन्धगुण वाली पृथ्वी बनी; उसमें रस, स्पर्श, शब्द और रूप भी समाहित हैं।
श्लोक 5.30
सरल हिंदी भावार्थ: सात्त्विक अहंकार से मन और इन्द्रियों के दस अधिष्ठाता देवता—दिशा, वायु, सूर्य, वरुण, अश्विनी, अग्नि, इन्द्र, विष्णु, मित्र और प्रजापति—प्रकट हुए।
श्लोक 5.31
सरल हिंदी भावार्थ: तैजस अहंकार से दस इन्द्रियाँ, बुद्धि और प्राण प्रकट हुए: कान, त्वचा, नाक, आँख, जीभ, वाणी, हाथ, जननेन्द्रिय, पैर और गुदा।
श्लोक 5.32
सरल हिंदी भावार्थ: जब भूत, इन्द्रियाँ और मन आदि अलग-अलग थे, तब वे जीव के निवासरूप शरीर की रचना नहीं कर सके।
श्लोक 5.33
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की शक्ति से प्रेरित होकर वे परस्पर मिले और कारण तथा कार्यरूप दोनों को लेकर विश्व का निर्माण हुआ।
श्लोक 5.34
सरल हिंदी भावार्थ: दीर्घकाल तक जल में स्थित ब्रह्माण्ड में परम पुरुष ने काल, कर्म और स्वभाव के माध्यम से चेतना का संचार किया।
श्लोक 5.35
सरल हिंदी भावार्थ: फिर उसी अण्ड से सहस्र जाँघ, चरण, भुजा, नेत्र, मुख और सिर वाला विराट पुरुष प्रकट हुआ।
श्लोक 5.36
सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानी उसके अंगों में लोकों का ध्यान करते हैं—कटि आदि में सात अधोलोक और जघन आदि से ऊपर सात ऊर्ध्वलोक।
श्लोक 5.37
सरल हिंदी भावार्थ: विराट पुरुष के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जाँघों से वैश्य और चरणों से शूद्र की प्रतीकात्मक कल्पना कही गई है।
श्लोक 5.38
सरल हिंदी भावार्थ: पैरों में भूर्लोक, नाभि में भुवर्लोक, हृदय में स्वर्लोक और वक्ष में महर्लोक का ध्यान किया जाता है।
श्लोक 5.39
सरल हिंदी भावार्थ: ग्रीवा में जनलोक, वक्ष के ऊपरी भाग में तपोलोक और मस्तक में सनातन सत्यलोक अथवा ब्रह्मलोक माना गया है।
श्लोक 5.40
सरल हिंदी भावार्थ: कटि में अतल, जाँघों में वितल, घुटनों में सुतल और पिंडलियों में तलातल का ध्यान है।
श्लोक 5.41
सरल हिंदी भावार्थ: टखनों में महातल, पैरों के अगले भाग में रसातल और तलवों में पाताल—इस प्रकार पुरुष लोकमय हैं।
श्लोक 5.42
सरल हिंदी भावार्थ: संक्षिप्त तीन-लोक ध्यान में चरण भूर्लोक, नाभि भुवर्लोक और मस्तक स्वर्लोक माना जाता है।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 5 समाप्त ॥
द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 6
विराट पुरुष और भगवान की विभूतियाँ
श्लोक 6.1
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्माजी बोले—विराट पुरुष का मुख वाणी और अग्नि का क्षेत्र, सात धातुएँ वेदछन्दों का आधार और जीभ समस्त रस तथा अन्न का आश्रय है।
श्लोक 6.2
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी नासिका प्राण और वायु का आश्रय तथा घ्राणशक्ति अश्विनीकुमारों, औषधियों और सुगन्धजनित आनन्द का आधार है।
श्लोक 6.3
सरल हिंदी भावार्थ: उनके नेत्र रूप, प्रकाश, सूर्य और आकाश का, कान दिशाओं का तथा श्रवण आकाश और शब्द का आश्रय हैं; शरीर सौन्दर्य का भण्डार है।
श्लोक 6.4
सरल हिंदी भावार्थ: त्वचा स्पर्श, वायु और यज्ञसंबंधी शक्तियों का आधार है; रोमों से यज्ञ में उपयोगी वनस्पतियों की प्रतीकात्मक उत्पत्ति मानी गई है।
श्लोक 6.5
सरल हिंदी भावार्थ: केश, दाढ़ी और नख शिला, धातु, बादल और बिजली के आधार तथा भुजाएँ लोकपालों और रक्षाकर्म का आश्रय हैं।
श्लोक 6.6
सरल हिंदी भावार्थ: उनके विस्तार में भूः, भुवः और स्वः लोक हैं। श्रीहरि के चरण सुरक्षा, शरण और अभीष्ट वरों का आधार हैं।
श्लोक 6.7
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी जननशक्ति जल, वीर्य, सृष्टि, वर्षा और प्रजापति से सम्बद्ध है; उससे संतान और जीवनविस्तार का आनन्द जुड़ा है।
श्लोक 6.8
सरल हिंदी भावार्थ: विसर्जन की शक्ति मित्रदेव और त्याग का आधार है; गुदाप्रदेश हिंसा, मृत्यु, विनाश और नरक की प्रतीकात्मक कल्पना का स्थान है।
श्लोक 6.9
सरल हिंदी भावार्थ: पीठ पराभव, अधर्म और अन्धकार का संकेत, नाड़ियाँ नदियों तथा अस्थिसमूह पर्वतों का आश्रय हैं।
श्लोक 6.10
सरल हिंदी भावार्थ: उदर अव्यक्त प्रकृति, रस, समुद्र और प्राणियों के लय का आधार तथा हृदय मन का स्थान है।
श्लोक 6.11
सरल हिंदी भावार्थ: उनका अन्तःस्थित स्वरूप धर्म, ब्रह्मा, नारद, सनकादि, शिव, ज्ञान, सत्त्व और परम तत्त्व का आश्रय है।
श्लोक 6.12
सरल हिंदी भावार्थ: मैं, तुम, शिव, पूर्वज ऋषि, देवता, असुर, मनुष्य, नाग, पक्षी, मृग और सरीसृप—सब उसी पुरुष के आश्रित हैं।
श्लोक 6.13
सरल हिंदी भावार्थ: गन्धर्व, अप्सराएँ, यक्ष, राक्षस, भूत, सर्प, पशु, पितर, सिद्ध, विद्याधर, चारण और वृक्ष भी उन्हीं में स्थित हैं।
श्लोक 6.14
सरल हिंदी भावार्थ: जल, थल और आकाश के सभी जीव, ग्रह, नक्षत्र, धूमकेतु, तारे, बिजली और गर्जन भी उसी विराट के अन्तर्गत हैं।
श्लोक 6.15
सरल हिंदी भावार्थ: भूत, भविष्य और वर्तमान—सब पुरुष ही हैं। वे विश्व को व्याप्त करके भी उससे परे विराजते हैं।
श्लोक 6.16
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे सूर्य अपने मण्डल और बाहर दोनों को प्रकाशित करता है, वैसे परम पुरुष विराट के भीतर-बाहर प्रकाशमान हैं।
श्लोक 6.17
सरल हिंदी भावार्थ: वे नश्वर भोगों से परे अमृत और अभय के स्वामी हैं; उनकी यह महिमा अत्यन्त दुर्गम है।
श्लोक 6.18
सरल हिंदी भावार्थ: समस्त प्राणी उनके एक अंश में स्थित हैं; अमरता, सुरक्षा और अभय उनके उससे परे उच्च स्वरूप में प्रतिष्ठित हैं।
श्लोक 6.19
सरल हिंदी भावार्थ: त्यागप्रधान तीन आश्रम उस ऊर्ध्वगति की ओर उन्मुख हैं; भोगासक्त गृहस्थ जीवन त्रिलोकी के सीमित क्षेत्र में बँधता है।
श्लोक 6.20
सरल हिंदी भावार्थ: विद्या और अविद्या से प्राप्त त्याग तथा भोग की दोनों गतियों का आधार वही पुरुष हैं।
श्लोक 6.21
सरल हिंदी भावार्थ: जिनसे भूत, इन्द्रिय और गुणयुक्त विराट ब्रह्माण्ड बना, वे उससे परे रहकर भी सूर्यकिरणों की तरह उसे प्रकाशित करते हैं।
श्लोक 6.22
सरल हिंदी भावार्थ: जब मैं उनके नाभिकमल से उत्पन्न हुआ, तब भगवान के अंगों से पृथक कोई यज्ञसामग्री मुझे नहीं मिली।
श्लोक 6.23
सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञपशु, वनस्पति, कुश, यज्ञभूमि और यज्ञ के अनुकूल काल—सभी उन्हीं के अंगों में प्राप्त हुए।
श्लोक 6.24
सरल हिंदी भावार्थ: औषधियाँ, घृत, रस, धातु, मिट्टी, जल, ऋक्-यजुः-साम और चार प्रकार के ऋत्विजों का कार्य भी उन्हीं से उपलब्ध हुआ।
श्लोक 6.25
सरल हिंदी भावार्थ: देवताओं के नाम, मन्त्र, दक्षिणा, व्रत, पूजाक्रम, विधि, संकल्प और अनुष्ठान की व्यवस्था भी उसी आश्रय से है।
श्लोक 6.26
सरल हिंदी भावार्थ: साधन, भावनाएँ, श्रद्धा, प्रायश्चित्त और समर्पण—इन सभी यज्ञसम्भारों को मैंने विराट पुरुष के अंगों से ही जुटाया।
श्लोक 6.27
सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार उन्हीं से मिली सामग्री द्वारा मैंने यज्ञस्वरूप उन्हीं परमेश्वर की आराधना की।
श्लोक 6.28
सरल हिंदी भावार्थ: फिर तुम्हारे नौ प्रजापति भाइयों ने एकाग्र भाव से व्यक्त-अव्यक्त के आश्रय उस पुरुष की उपासना की।
श्लोक 6.29
सरल हिंदी भावार्थ: समय-समय पर मनु, ऋषि, पितर, देवता, दैत्य और मनुष्य भी यज्ञों से उन्हीं की आराधना करते आए।
श्लोक 6.30
सरल हिंदी भावार्थ: यह विश्व नारायण में स्थित है; वे स्वयं गुणातीत होकर सृष्टि आदि के लिए माया के गुण ग्रहण करते हैं।
श्लोक 6.31
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी आज्ञा से मैं सृष्टि करता हूँ, उनके वश में शिव संहार करते हैं और वे स्वयं पुरुषरूप से पालन करते हैं।
श्लोक 6.32
सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारे प्रश्नों के अनुसार मैंने यही बताया कि कारण और कार्यरूप कोई वस्तु भगवान से स्वतंत्र नहीं है।
श्लोक 6.33
सरल हिंदी भावार्थ: श्रीहरि को उत्कण्ठापूर्ण हृदय में धारण करने से मेरी वाणी असत्य, मन मिथ्या चिन्तन और इन्द्रियाँ कुमार्ग की ओर नहीं जातीं।
श्लोक 6.34
सरल हिंदी भावार्थ: मैं वेद और तप का आश्रय तथा प्रजापतियों का पूज्य स्वामी होकर भी एकाग्र योग से अपने परम मूल का पूर्ण अन्त नहीं पा सका।
श्लोक 6.35
सरल हिंदी भावार्थ: मैं उनके मंगलकारी चरणों में प्रणाम करता हूँ, जो शरणागत का संसारबन्धन काटते हैं। उनकी माया की महिमा अपार है; अन्य लोग उसका अन्त कैसे पाएँ?
श्लोक 6.36
सरल हिंदी भावार्थ: मैं, तुम और शिव भी भगवान की पूर्ण गति नहीं जानते; फिर अन्य देवताओं की क्या बात? माया से मोहित बुद्धि सृष्टि को अपने सीमित मान से आँकती है।
श्लोक 6.37
सरल हिंदी भावार्थ: हम जैसे लोग जिनकी अवतारलीलाओं का गान करते हुए भी उन्हें तत्त्वतः पूरी तरह नहीं जान पाते, उन भगवान को प्रणाम है।
श्लोक 6.38
सरल हिंदी भावार्थ: अजन्मा आदि पुरुष प्रत्येक कल्प में अपने ही आश्रय और शक्ति से जगत रचते, सँभालते और समेटते हैं।
श्लोक 6.39
सरल हिंदी भावार्थ: उनका परम स्वरूप शुद्ध ज्ञान, अन्तरात्मा में स्थित सत्य, पूर्ण, अनादि-अनन्त, गुणातीत, नित्य और अद्वैत है।
श्लोक 6.40
सरल हिंदी भावार्थ: शान्त मन और संयत इन्द्रियों वाले मुनि उन्हें अनुभव करते हैं; असार तर्क और चंचलता से वही अनुभूति ढक जाती है।
श्लोक 6.41
सरल हिंदी भावार्थ: पुरुषावतार, काल, स्वभाव, कारण-कार्य, मन, द्रव्य, गुण, इन्द्रियाँ, विराट और सब चराचर—सभी परमात्मा के अधीन हैं।
श्लोक 6.42
सरल हिंदी भावार्थ: मैं, शिव, यज्ञपुरुष, दक्ष आदि प्रजापति, नारदादि ऋषि और स्वर्ग, आकाश, पृथ्वी तथा अधोलोक के अधिपति उन्हीं की विभूतियाँ हैं।
श्लोक 6.43
सरल हिंदी भावार्थ: गन्धर्व, विद्याधर, चारण, यक्ष, नाग, पितर, दैत्य, सिद्ध, भूत, जलचर, पशु और पक्षियों के सभी अधिपति भी उसी शक्ति से समर्थ हैं।
श्लोक 6.44
सरल हिंदी भावार्थ: जगत में जो तेज, ओज, बल, क्षमा, शोभा, विनय, ऐश्वर्य, आत्मसंयम और अद्भुत महिमा है, उसे परम पुरुष की अभिव्यक्ति समझो।
श्लोक 6.45
सरल हिंदी भावार्थ: अब मैं उन प्रमुख और मनोहर लीलावतारों का क्रम कहूँगा, जिनका श्रवण कानों और चित्त का मल दूर करता है।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 6 समाप्त ॥
द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 7
प्रमुख अवतारों का वर्णन और माया से मुक्ति
श्लोक 7.1
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्माजी बोले—पृथ्वी के उद्धार के लिए भगवान ने यज्ञमय वराह रूप धारण किया और समुद्र में हिरण्याक्ष को दंष्ट्रा से वैसे विदीर्ण किया, जैसे इन्द्र पर्वत को वज्र से।
श्लोक 7.2
सरल हिंदी भावार्थ: रुचि और आकूति के पुत्र सुयज्ञ ने दक्षिणा से देवपुत्र उत्पन्न किए। तीनों लोकों की पीड़ा हरने के कारण स्वायम्भुव मनु ने उन्हें हरि कहा।
श्लोक 7.3
सरल हिंदी भावार्थ: कर्दम और देवहूति के घर नौ बहनों सहित कपिल अवतरित हुए। उनके आत्मज्ञानोपदेश से माता ने गुणासक्ति का मल मिटाकर परमगति पाई।
श्लोक 7.4
सरल हिंदी भावार्थ: अत्रि की पुत्रकामना से प्रसन्न भगवान ने स्वयं को उन्हें दिया, इसलिए दत्तात्रेय कहलाए; उनके चरणरज से यदु और हैहय आदि ने योगसम्पदा पाई।
श्लोक 7.5
सरल हिंदी भावार्थ: मेरी सृष्टि की तपस्या में भगवान सनकादि चार कुमारों के रूप में प्रकट हुए और प्रलय से विस्मृत आत्मतत्त्व पुनः बताया।
श्लोक 7.6
सरल हिंदी भावार्थ: धर्म और दक्षकन्या मूर्ति के पुत्र नर-नारायण ने तप की महिमा प्रकट की। कामदेव की सेना और अप्सराएँ उनका संयम नहीं तोड़ सकीं।
श्लोक 7.7
सरल हिंदी भावार्थ: तपस्वी क्रोध से काम को जला सकते हैं, पर अपने क्रोध को जीतना कठिन है। नर-नारायण के निकट क्रोध भी प्रवेश से डरता है; काम उन्हें कैसे विचलित करे?
श्लोक 7.8
सरल हिंदी भावार्थ: सौतेली माता के कटु वचनों से व्यथित बालक ध्रुव वन में तप करने गए। प्रसन्न भगवान ने उन्हें ध्रुवपद दिया, जिसकी ऋषि-देवता स्तुति करते हैं।
श्लोक 7.9
सरल हिंदी भावार्थ: दुराचारी वेन के विनाश के बाद भगवान पृथु रूप में उसके पुत्र बने, उसका उद्धार किया और पृथ्वी से लोकहित की सम्पदा प्राप्त कराई।
श्लोक 7.10
सरल हिंदी भावार्थ: नाभि और सुदेवी के पुत्र ऋषभ ने समदृष्टि, शान्त इन्द्रियों और अनासक्ति से परम अवधूतचर्या की; ऋषि उसे परमहंस पद कहते हैं।
श्लोक 7.11
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे यज्ञ में स्वर्णमय हयग्रीव रूप प्रकट हुआ। वे वेदमय यज्ञपुरुष और सर्वदेवस्वरूप हैं; उनकी श्वास से वेदवाणी प्रकट हुई।
श्लोक 7.12
सरल हिंदी भावार्थ: युगान्त के भयावह जल में मत्स्यरूप भगवान मनु को मिले। उन्होंने जीवसमूह और मेरे मुख से निकले वेदों की रक्षा की।
श्लोक 7.13
सरल हिंदी भावार्थ: अमृत के लिए समुद्रमन्थन करते देवों-असुरों को सहारा देने भगवान कूर्म बने और पीठ पर मन्दराचल धारण किया।
श्लोक 7.14
सरल हिंदी भावार्थ: देवताओं का भय हरने वाले नरसिंह ने उग्र मुख और दंष्ट्राओं सहित प्रकट होकर आक्रमणकारी हिरण्यकशिपु को जाँघों पर रखकर नखों से विदीर्ण किया।
श्लोक 7.15
सरल हिंदी भावार्थ: ग्राह के पकड़ने पर संकटग्रस्त गजेन्द्र ने हाथ में कमल लेकर आदिपुरुष, विश्वनाथ और मंगलनाम भगवान को पुकारा।
श्लोक 7.16
सरल हिंदी भावार्थ: उसकी शरणागति सुनकर चक्रधारी श्रीहरि गरुड़ पर आए, ग्राह का मुख चीरकर दयापूर्वक गजेन्द्र को हाथ पकड़कर छुड़ाया।
श्लोक 7.17
सरल हिंदी भावार्थ: अदिति के छोटे पुत्र वामन गुणों में सबसे बड़े थे। उन्होंने तीन पग भूमि माँगकर लोक नाप लिए; दानवीरों से भी उन्होंने याचना द्वारा ही कार्य किया।
श्लोक 7.18
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान का चरणोदक सिर पर रखने वाले बलि के लिए स्वर्गराज्य प्रधान नहीं था; उन्होंने वचन निभाने के लिए अपना मस्तक और स्वयं को भगवान को अर्पित किया।
श्लोक 7.19
सरल हिंदी भावार्थ: हे नारद, तुम्हारे बढ़े हुए प्रेम से प्रसन्न भगवान ने तुम्हें भक्तियोग और आत्मतत्त्व प्रकाशित करने वाला भागवतज्ञान दिया।
श्लोक 7.20
सरल हिंदी भावार्थ: मन्वन्तरों में मनुवंशी रूप से वे शासनशक्ति धारण करके दुष्ट राजाओं का दमन करते और सत्य चरित्रों से कीर्ति फैलाते हैं।
श्लोक 7.21
सरल हिंदी भावार्थ: धन्वन्तरि रूप में भगवान ने आयुर्वेद का उपदेश दिया, अमृत का अधिकार प्रकट किया और रोगों से पीड़ित जीवों के कल्याण का मार्ग बताया।
श्लोक 7.22
सरल हिंदी भावार्थ: परशुराम रूप में उन्होंने धर्मत्यागी, ब्राह्मणद्रोही और पृथ्वी का भार बने अत्याचारी क्षत्रियों का इक्कीस बार दमन किया।
श्लोक 7.23
सरल हिंदी भावार्थ: देवताओं पर कृपा करके भगवान इक्ष्वाकुवंश में राम रूप में आए। पिता की आज्ञा से पत्नी और भाई सहित वन गए; उनसे वैर करके रावण विपत्ति में पड़ा।
श्लोक 7.24
सरल हिंदी भावार्थ: प्रिय सीता के हरण से उत्पन्न धर्मयुक्त रोष में भगवान की दृष्टि से समुद्र के जीव व्याकुल हुए और समुद्र ने उन्हें मार्ग प्रदान किया।
श्लोक 7.25
सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्र के हाथी के दाँतों को भी अपने वक्ष से तोड़ने वाला गर्वित रावण युद्ध में राम के धनुष की टंकार और बाणों से प्राण तथा अभिमान खो बैठा।
श्लोक 7.26
सरल हिंदी भावार्थ: असुरसेनाओं से पीड़ित पृथ्वी का भार दूर करने भगवान बलराम और कृष्ण रूप में आए; उनकी लीला का मार्ग सामान्य समझ से परे है।
श्लोक 7.27
सरल हिंदी भावार्थ: बालकृष्ण ने पूतना का प्राणहरण, तीन महीने में शकट का उलटना और घुटनों से चलते हुए यमलार्जुन वृक्षों का उखाड़ना जैसी असाधारण लीलाएँ कीं।
श्लोक 7.28
सरल हिंदी भावार्थ: विषैला जल पीने से संकट में पड़े ग्वालबालों और पशुओं को उन्होंने कृपादृष्टि से जीवन दिया तथा यमुना शुद्ध करने कालिय का दमन किया।
श्लोक 7.29
सरल हिंदी भावार्थ: वन में रात्रि की दावाग्नि से घिरे व्रज को भगवान ने बलराम सहित बचाया; उनके अगाध सामर्थ्य के सामने ग्वालों को केवल आँखें बन्द करनी पड़ीं।
श्लोक 7.30
सरल हिंदी भावार्थ: माता यशोदा जितनी रस्सी लातीं, बाँधने को छोटी पड़ती। एक बार उनके मुख में विश्व देखकर माता चकित हुईं और भगवान की माया से फिर मातृभाव में लौटीं।
श्लोक 7.31
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने नन्द को वरुण के बन्धन से और ग्वालबालों को व्योमासुर की गुफा से छुड़ाया; गोकुलवासियों को अपने दिव्य लोक का दर्शन कराया।
श्लोक 7.32
सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्र की प्रचण्ड वर्षा से पशुओं और व्रज की रक्षा करने सात वर्षीय कृष्ण ने गोवर्धन को एक हाथ पर सात दिन छत्र की तरह धारण किया।
श्लोक 7.33
सरल हिंदी भावार्थ: चाँदनी रात्रि में रासलीला के समय गोपियों को हरने वाले कुबेर के अनुचर शङ्खचूड़ का उन्होंने वध किया।
श्लोक 7.34
सरल हिंदी भावार्थ: प्रलम्ब, धेनुक, बक, केशी, अरिष्ट, मल्ल, कुवलयापीड, कंस, कालयवन, नरकासुर, पौण्ड्रक, शाल्व, द्विविद, बल्वल, दन्तवक्त्र और अन्य दुष्टों का नाश हुआ।
श्लोक 7.35
सरल हिंदी भावार्थ: काम्बोज, मत्स्य, कुरु, कैकय और सृञ्जय आदि के युद्धवीर भी बलराम, अर्जुन और भीम आदि को निमित्त बनाकर भगवान की व्यवस्था में अन्त को प्राप्त हुए।
श्लोक 7.36
सरल हिंदी भावार्थ: अल्पायु मनुष्यों की घटती समझ देखकर भगवान सत्यवतीपुत्र व्यास रूप में प्रकट हुए और विशाल वेदवृक्ष को शाखाओं में विभाजित किया।
श्लोक 7.37
सरल हिंदी भावार्थ: एक अवतार में वे वेदमार्ग का दुरुपयोग करके लोकों को सताने वालों की बुद्धि मोड़ने के लिए ऐसा उपदेश देंगे, जिससे उनके हिंसक आग्रह छूटें।
श्लोक 7.38
सरल हिंदी भावार्थ: युगान्त में जब हरिकथा, वैदिक अनुष्ठान और धर्मरक्षण लुप्तप्राय होंगे, तब भगवान कल्कि रूप में अधर्मियों का दमन करेंगे।
श्लोक 7.39
सरल हिंदी भावार्थ: सृष्टि में ब्रह्मा और प्रजापति, पालन में धर्म, यज्ञ, मनु, देव और राजा तथा संहार में रुद्रादि शक्तियाँ—सभी उनकी मायाविभूतियाँ हैं।
श्लोक 7.40
सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी की धूल के कण गिन सकने वाला भी विष्णु का पराक्रम कैसे गिने? उन्होंने अपनी अविचल शक्ति से लोकों को स्थिर रखा।
श्लोक 7.41
सरल हिंदी भावार्थ: मैं और मुझसे पहले के ऋषि भी उनकी मायाशक्ति का अन्त नहीं जानते। सहस्रमुख शेष आज भी गुणगान करते हुए पार नहीं पा सके।
श्लोक 7.42
सरल हिंदी भावार्थ: जो निष्कपट होकर सर्वात्मभाव से उनके चरणों का आश्रय लेते हैं, उन पर अनन्त भगवान कृपा करते हैं; वे देहाभिमान छोड़कर माया पार करते हैं।
श्लोक 7.43
सरल हिंदी भावार्थ: मैं, तुम, शिव, प्रह्लाद, मनु, शतरूपा, मनुपुत्र, प्राचीनबर्हि, ऋभु, अङ्ग और ध्रुव उनकी योगमाया का अनुभव जानते हैं।
श्लोक 7.44
सरल हिंदी भावार्थ: इक्ष्वाकु, पुरूरवा, मुचुकुन्द, जनक, गाधि, रघु, अम्बरीष, सगर, गय, नहुष, मान्धाता, अलर्क, रन्तिदेव, भीष्म, बलि और दिलीप आदि भी उसके ज्ञाता हैं।
श्लोक 7.45
सरल हिंदी भावार्थ: सौभरि, उतङ्क, शिबि, देवल, पिप्पलाद, सारस्वत, उद्धव, पराशर, भूरिषेण, विभीषण, हनुमान, दत्त, अर्जुन, विदुर और श्रुतदेव आदि भी भगवान के आश्रित हैं।
श्लोक 7.46
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की शरण और भक्ति की शिक्षा से कोई भी जनसमूह उनकी माया पार कर सकता है; पशुयोनि तक में भक्ति सम्भव है, फिर श्रुतिज्ञों की क्या बात?
श्लोक 7.47
सरल हिंदी भावार्थ: परमात्मतत्त्व नित्य शान्त, निर्भय, शुद्ध चेतन, सम और कारण-कार्य से परे है। उसके सामने कर्मफलप्रधान शब्द और माया की पकड़ नहीं रहती।
श्लोक 7.48
सरल हिंदी भावार्थ: उसी नित्यसुख और शोकविहीन भगवत्पद को ब्रह्म कहते हैं। उसे पाकर संयमी साधक अनावश्यक साधन छोड़ते हैं, जैसे जल मिलने पर कुआँ खोदने का उपकरण छोड़ दिया जाए।
श्लोक 7.49
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान समस्त कल्याण के स्वामी हैं। शरीर के तत्त्व बिखरने पर भी अजन्मा आत्मा नहीं बिखरती, जैसे घट के टूटने पर आकाश नष्ट नहीं होता।
श्लोक 7.50
सरल हिंदी भावार्थ: तात, विश्व के पालक भगवान की यह महिमा संक्षेप में कही। कारण-कार्यरूप सब उन्हीं पर आश्रित है, स्वतंत्र कुछ नहीं।
श्लोक 7.51
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान से प्राप्त यह भागवत उनकी विभूतियों का संक्षिप्त संग्रह है; तुम इसका विस्तार करो।
श्लोक 7.52
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसा संकल्प करके वर्णन करो कि मनुष्यों में सबके आत्मा और आधार श्रीहरि की भक्ति जागे।
श्लोक 7.53
सरल हिंदी भावार्थ: जो भगवान की लीला का वर्णन, अनुमोदन और श्रद्धापूर्वक नित्य श्रवण करता है, उसकी आत्मबुद्धि माया से मोहित नहीं होती।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 7 समाप्त ॥
द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 8
परीक्षित की व्यापक तत्त्वजिज्ञासा
श्लोक 8.1
सरल हिंदी भावार्थ: राजा ने पूछा—ब्रह्मा की आज्ञा पाकर देवदर्शी नारद ने गुणातीत भगवान के गुणों का उपदेश किन-किन को और कैसे दिया?
श्लोक 8.2
सरल हिंदी भावार्थ: हे वेदज्ञश्रेष्ठ, मैं यह तत्त्व जानना चाहता हूँ; अद्भुत सामर्थ्य वाले श्रीहरि की कथाएँ समस्त लोकों का मंगल करती हैं।
श्लोक 8.3
सरल हिंदी भावार्थ: कृपा करके ऐसी कथा कहिए कि मैं अनासक्त मन को सर्वात्मा श्रीकृष्ण में लगाकर शरीर छोड़ सकूँ।
श्लोक 8.4
सरल हिंदी भावार्थ: श्रद्धा से भगवान की लीला नित्य सुनने और कहने वाले के हृदय में वे शीघ्र प्रवेश करते हैं।
श्लोक 8.5
सरल हिंदी भावार्थ: कानों द्वारा हृदयकमल में प्रवेश करके कृष्ण उसका मल वैसे मिटाते हैं, जैसे शरदऋतु जल को निर्मल करती है।
श्लोक 8.6
सरल हिंदी भावार्थ: चित्त शुद्ध होने पर मनुष्य उनके चरण नहीं छोड़ता, जैसे यात्रा के कष्टों से मुक्त पथिक अपना घर पाकर विश्राम करता है।
श्लोक 8.7
सरल हिंदी भावार्थ: अशरीरी जीव को भौतिक तत्त्वों से शरीर कैसे मिलता है—क्या यह अपने-आप होता है या किसी कारण से?
श्लोक 8.8
सरल हिंदी भावार्थ: जिस पुरुष की नाभि से लोकव्यवस्था का कमल निकला, उसका विराट स्वरूप और विभिन्न अंगों का विस्तार कैसे समझा जाए?
श्लोक 8.9
सरल हिंदी भावार्थ: जिनकी कृपा से ब्रह्मा प्राणियों की रचना करते हैं, उस नाभिकमल से उत्पन्न ब्रह्मा ने भगवान का दर्शन कैसे किया?
श्लोक 8.10
सरल हिंदी भावार्थ: सृष्टि, पालन और संहार के आधार वह मायापति अपनी माया से परे किस स्वरूप में विश्राम करते हैं?
श्लोक 8.11
सरल हिंदी भावार्थ: कहीं भगवान के अंगों से लोकों की और कहीं लोकों से उनके अंगों की कल्पना कही जाती है; इन दोनों का संबंध समझाइए।
श्लोक 8.12
सरल हिंदी भावार्थ: कल्प और उसके विभाग कितने हैं, काल कैसे जाना जाता है तथा भूत-वर्तमान-भविष्य और विभिन्न आयुओं का माप क्या है?
श्लोक 8.13
सरल हिंदी भावार्थ: काल की सूक्ष्म और विशाल गति कैसी है तथा कर्मानुसार जीवों की कितनी प्रकार की गतियाँ होती हैं?
श्लोक 8.14
सरल हिंदी भावार्थ: जीव के कर्म कैसे संचित होकर फल देते हैं और गुणों से सम्बद्ध जीवों में परिवर्तन कैसे होता है?
श्लोक 8.15
सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी, पाताल, दिशाएँ, आकाश, ग्रह, नक्षत्र, पर्वत, नदियाँ, समुद्र, द्वीप और उनके निवासियों की उत्पत्ति बताइए।
श्लोक 8.16
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्माण्ड के भीतर-बाहर का विस्तार, महात्माओं के चरित्र और वर्णाश्रमधर्म का निश्चय समझाइए।
श्लोक 8.17
सरल हिंदी भावार्थ: युगों के नाम, उनका परिमाण, प्रत्येक युग का धर्म और भगवान के अद्भुत अवतारचरित्र बताइए।
श्लोक 8.18
सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्यों का सामान्य तथा विशेष धर्म, व्यवसायसमूहों, राजर्षियों और संकट में जीवन बिताने वालों के कर्तव्य क्या हैं?
श्लोक 8.19
सरल हिंदी भावार्थ: तत्त्वों की संख्या, लक्षण, कारण, भगवान की आराधना और आत्मयोग की विधि बताइए।
श्लोक 8.20
सरल हिंदी भावार्थ: योगियों की ऐश्वर्यगति और सूक्ष्म देह की निवृत्ति तथा वेद, उपवेद, धर्मशास्त्र, इतिहास और पुराण के विषय समझाइए।
श्लोक 8.21
सरल हिंदी भावार्थ: प्राणियों का प्रलय, सृष्टि-पुनर्सृष्टि और यज्ञ, लोकहितकारी कार्य तथा काम्यकर्मों की व्यवस्था क्या है?
श्लोक 8.22
सरल हिंदी भावार्थ: सुप्त कर्मसंस्कारों वाले जीवों की पुनरुत्पत्ति, पाखण्ड की उत्पत्ति, आत्मा का बन्धन-मोक्ष और निजस्वरूप में स्थिति कैसे होती है?
श्लोक 8.23
सरल हिंदी भावार्थ: स्वतन्त्र भगवान अपनी माया से लीला कैसे करते हैं और उससे असंग रहकर साक्षी की तरह कैसे स्थित हैं?
श्लोक 8.24
सरल हिंदी भावार्थ: हे महामुनि, शरणागत होकर पूछे मेरे इन प्रश्नों का क्रम से यथार्थ उत्तर देने की कृपा करें।
श्लोक 8.25
सरल हिंदी भावार्थ: इस विषय में आप ब्रह्मा के समान प्रमाणभूत हैं; अन्य लोग तो अपने पूर्वजों की स्थापित परम्परा का अनुसरण करते हैं।
श्लोक 8.26
सरल हिंदी भावार्थ: अच्युत की कथामृत पीते हुए मुझे उपवास से जीवन का क्षय नहीं लगता; ब्राह्मण के शाप से निर्धारित मृत्यु ही शेष कारण है।
श्लोक 8.27
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—सभा में विष्णुरात परीक्षित के इस कथा-निवेदन से शुकदेवजी अत्यन्त प्रसन्न हुए।
श्लोक 8.28
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने वही ब्रह्मतत्त्वयुक्त भागवत पुराण सुनाना आरम्भ किया, जो ब्रह्मकल्प के आरम्भ में भगवान ने ब्रह्मा से कहा था।
श्लोक 8.29
सरल हिंदी भावार्थ: पाण्डववंशश्रेष्ठ परीक्षित ने जो-जो पूछा, उसका शुकदेवजी ने क्रमशः पूर्ण विवेचन आरम्भ किया।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 8 समाप्त ॥
द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 9
ब्रह्मा को उपदेश और चतुश्लोकी भागवत
श्लोक 9.1
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—स्वयंप्रकाश आत्मा का विषयों से बन्धन माया के बिना नहीं बनता; स्वप्नद्रष्टा का स्वप्नसंबंध इसी का दृष्टान्त है।
श्लोक 9.2
सरल हिंदी भावार्थ: विविध माया से आत्मा अनेक रूपों में दिखाई देती है और गुणों में आसक्त होकर “मैं” तथा “मेरा” मानती है।
श्लोक 9.3
सरल हिंदी भावार्थ: जब जीव काल और माया से परे अपने परम स्वरूप में आनन्द पाता है, तब मोह छोड़कर दोनों अहंभाव-ममत्व से असंग हो जाता है।
श्लोक 9.4
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मतत्त्व की शुद्ध समझ के लिए भगवान ने निष्कपट तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा को अपना रूप दिखाया और सत्य उपदेश दिया।
श्लोक 9.5
सरल हिंदी भावार्थ: सृष्टि की इच्छा से अपने कमलासन पर बैठे ब्रह्मा ने विचार किया, पर सृष्टिनिर्माण की उचित विधि नहीं समझ पाए।
श्लोक 9.6
सरल हिंदी भावार्थ: तभी जल में उन्हें दो बार दो अक्षरों का उपदेश सुनाई दिया—“तप”; निष्काम साधकों का यही महान धन है।
श्लोक 9.7
सरल हिंदी भावार्थ: वक्ता को खोजने पर किसी को न देखकर उन्होंने उस उपदेश को हितकारी समझा और कमलासन पर तप में मन लगाया।
श्लोक 9.8
सरल हिंदी भावार्थ: मन, प्राण और इन्द्रियों को जीतकर उन्होंने दिव्य सहस्र वर्ष तक एकाग्र और प्रभावशाली तप किया।
श्लोक 9.9
सरल हिंदी भावार्थ: प्रसन्न भगवान ने उन्हें अपना सर्वोपरि लोक दिखाया, जहाँ क्लेश, मोह और भय नहीं तथा आत्मदर्शी भक्त उनकी स्तुति करते हैं।
श्लोक 9.10
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ रज, तम, मिश्रित सत्त्व और काल का विकार नहीं; माया भी प्रवेश नहीं करती। वहाँ भगवान के अनुगामी निवास करते हैं।
श्लोक 9.11
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ के पार्षद श्याम और उज्ज्वल वर्ण, कमलनयन, पीतवस्त्रधारी तथा चार भुजाओं वाले हैं; दिव्य आभूषण, मुकुट और कुण्डल उनकी शोभा बढ़ाते हैं।
श्लोक 9.12
सरल हिंदी भावार्थ: महात्माओं के चमकते विमानों और दिव्य स्त्रियों की प्रभा से वह लोक बिजलीयुक्त बादलों से भरे आकाश जैसा सुशोभित है।
श्लोक 9.13
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ लक्ष्मीजी अपनी विभूतियों सहित भगवान के चरणों की सेवा करती हैं और उनकी प्रिय लीलाओं का गान करती हैं।
श्लोक 9.14
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा ने वहाँ भक्तों, लक्ष्मी, यज्ञ और जगत के स्वामी को सुनन्द, नन्द, प्रबल और अर्हण आदि प्रमुख पार्षदों से सेवित देखा।
श्लोक 9.15
सरल हिंदी भावार्थ: उनका मुख प्रसन्न मुस्कान और लालिमा लिए नेत्रों से सुन्दर था; वे भक्तों पर कृपा के लिए तत्पर, चतुर्भुज, मुकुट-कुण्डल और पीताम्बरधारी थे।
श्लोक 9.16
सरल हिंदी भावार्थ: वे सर्वोच्च आसन पर अपनी विविध शक्तियों और नित्य ऐश्वर्यों से घिरे, अपने ही धाम में रमण कर रहे थे।
श्लोक 9.17
सरल हिंदी भावार्थ: दर्शन से ब्रह्मा का हृदय आनन्द से भर गया, शरीर रोमांचित और आँखें प्रेमाश्रुपूर्ण हुईं; उन्होंने भगवान के चरणों में प्रणाम किया।
श्लोक 9.18
सरल हिंदी भावार्थ: प्रजा-सृष्टि में आज्ञापालन के योग्य प्रिय ब्रह्मा का हाथ छूकर भगवान ने स्नेह और हल्की मुस्कान से कहा।
श्लोक 9.19
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—हे वेदगर्भ, सृष्टि के लिए किए तुम्हारे दीर्घ तप से मैं प्रसन्न हूँ; कपटयोग से मुझे प्रसन्न नहीं किया जा सकता।
श्लोक 9.20
सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारा कल्याण हो; वरों के स्वामी मुझसे मनचाहा वर माँगो। कल्याणसाधना का परम फल मेरा दर्शन है।
श्लोक 9.21
सरल हिंदी भावार्थ: एकान्त में सुना उपदेश मानकर जो तप तुमने किया, उसी का फल मेरे धाम का यह दर्शन है।
श्लोक 9.22
सरल हिंदी भावार्थ: सृष्टिकर्म में भ्रमित होने पर मैंने ही तुम्हें तप का उपदेश दिया था। तप मेरा हृदय और मैं तप का आत्मस्वरूप हूँ।
श्लोक 9.23
सरल हिंदी भावार्थ: तपशक्ति से मैं विश्व रचता, सँभालता और समेटता हूँ; यह दुश्चर तप मेरी सामर्थ्य का प्रकाश है।
श्लोक 9.24
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा बोले—आप सभी के हृदय में अधिष्ठित सर्वसाक्षी हैं; अपने निर्बाध ज्ञान से मेरी इच्छा पहले ही जानते हैं।
श्लोक 9.25
सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी नाथ, कृपा करके ऐसा ज्ञान दें कि मैं आपके स्थूल-सूक्ष्म रूपों और उनसे परे स्वरूप को ठीक समझूँ।
श्लोक 9.26
सरल हिंदी भावार्थ: आप अपनी माया और अनेक शक्तियों से स्वयं में ही रचना, पालन और संहार की लीला करते हैं।
श्लोक 9.27
सरल हिंदी भावार्थ: मकड़ी की तरह अपनी शक्ति से सब प्रकट करते हुए आपका संकल्प निष्फल नहीं होता; हे माधव, इसकी समझ मुझे दें।
श्लोक 9.28
सरल हिंदी भावार्थ: आपके उपदेश के अनुसार सावधानी से प्रजासृष्टि करूँ, पर आपकी कृपा से कर्मबन्धन में न पड़ूँ।
श्लोक 9.29
सरल हिंदी भावार्थ: आपने मित्र की तरह मुझे सृष्टिसेवा में लगाया है। आपकी सेवा करते हुए मेरे मन में स्वतंत्र सृष्टिकर्ता होने का अभिमान न उठे।
श्लोक 9.30
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—मेरा परम गोपनीय ज्ञान, उसका अनुभव, भक्ति का रहस्य और उसके साधन मेरे उपदेश से ग्रहण करो।
श्लोक 9.31
सरल हिंदी भावार्थ: मेरी कृपा से तुम्हें मेरे स्वरूप, स्वभाव, रूप, गुण और कर्म का यथार्थ अनुभव प्राप्त हो।
श्लोक 9.32
सरल हिंदी भावार्थ: सृष्टि से पहले केवल मैं था—कारण और कार्य से भी परे। सृष्टि के बाद भी मैं हूँ; जो दृश्य है और अन्त में शेष रहता है, वह भी मेरे ही आश्रय में है।
श्लोक 9.33
सरल हिंदी भावार्थ: जो वस्तु मेरे वास्तविक आश्रय से पृथक जान पड़े अथवा मेरा स्वरूप न जानने दे, उसे मेरी माया समझो—जैसे मिथ्या प्रतिबिम्ब और अन्धकार।
श्लोक 9.34
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे महाभूत छोटे-बड़े शरीरों में प्रवेश करके भी अपने व्यापक रूप में उनसे अलग हैं, वैसे मैं उनमें व्याप्त होकर भी उनसे सीमित नहीं हूँ।
श्लोक 9.35
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मतत्त्व के जिज्ञासु को अन्वय और व्यतिरेक से उसी सत्य को खोजना चाहिए, जो सर्वत्र और सदैव विद्यमान है।
श्लोक 9.36
सरल हिंदी भावार्थ: इस उपदेश में पूर्ण एकाग्रता से स्थित रहो; तब सृष्टि और प्रलय के विविध क्रमों में भी मोहित नहीं होगे।
श्लोक 9.37
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—ब्रह्मा को यह उपदेश देकर अजन्मा श्रीहरि ने उनके देखते-देखते अपना प्रत्यक्ष रूप अन्तर्धान कर लिया।
श्लोक 9.38
सरल हिंदी भावार्थ: अदृश्य हुए भगवान को प्रणाम करके ब्रह्मा ने पूर्ववत् विश्व की सृष्टि की।
श्लोक 9.39
सरल हिंदी भावार्थ: एक समय प्रजापति ब्रह्मा प्रजा के कल्याण और अपने कर्तव्य की सिद्धि के लिए यम-नियमों का पालन कर रहे थे।
श्लोक 9.40
सरल हिंदी भावार्थ: उनके अत्यन्त प्रिय पुत्र नारद ने सेवा, विनय और इन्द्रियसंयम से उनका अनुसरण किया।
श्लोक 9.41
सरल हिंदी भावार्थ: मायापति विष्णु की शक्ति जानने की इच्छा से महाभागवत नारद ने पिता को प्रसन्न किया।
श्लोक 9.42
सरल हिंदी भावार्थ: पिता को प्रसन्न देखकर देवर्षि ने वही प्रश्न किया, जो अब तुम मुझसे पूछ रहे हो।
श्लोक 9.43
सरल हिंदी भावार्थ: तब ब्रह्मा ने भगवान से प्राप्त दस लक्षणों वाला यह भागवत पुराण प्रसन्न होकर अपने पुत्र को सुनाया।
श्लोक 9.44
सरल हिंदी भावार्थ: नारद ने सरस्वतीतट पर परब्रह्म का ध्यान करते महातेजस्वी व्यास को यह उपदेश दिया।
श्लोक 9.45
सरल हिंदी भावार्थ: अब विराट पुरुष से विश्व की उत्पत्ति और तुम्हारे अन्य सभी प्रश्नों का मैं क्रम से विवेचन करूँगा।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 9 समाप्त ॥
द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 10
भागवत के दस लक्षण और विदुरकथा की भूमिका
श्लोक 10.1
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—भागवत के दस विषय हैं: सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय।
श्लोक 10.2
सरल हिंदी भावार्थ: दसवें विषय परम आश्रय को स्पष्ट करने के लिए महात्मा पहले नौ विषयों का शास्त्रीय वर्णन और तात्पर्य बताते हैं।
श्लोक 10.3
सरल हिंदी भावार्थ: गुणों में विषमता से भूत, सूक्ष्म विषय, इन्द्रियाँ और बुद्धि की उत्पत्ति सर्ग तथा ब्रह्मा द्वारा जीव-देहों की रचना विसर्ग कहलाती है।
श्लोक 10.4
सरल हिंदी भावार्थ: विश्व की व्यवस्थित रक्षा स्थान, भगवान का अनुग्रह पोषण, मनुओं का सद्धर्म मन्वन्तर और कर्मवासना ऊति है।
श्लोक 10.5
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के अवतारों और उनके अनुगामी संतों के चरित्र, विभिन्न आख्यानों सहित, ईशानुकथा कहे जाते हैं।
श्लोक 10.6
सरल हिंदी भावार्थ: जीव और उसकी शक्तियों का भगवान में शयनरूप लय निरोध है; पराया आरोपित रूप छोड़कर निजस्वरूप में स्थित होना मुक्ति है।
श्लोक 10.7
सरल हिंदी भावार्थ: जिनसे प्रकट होना और लय दोनों जाने जाते हैं, वे परम आश्रय हैं; उन्हें परब्रह्म और परमात्मा कहते हैं।
श्लोक 10.8
सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्रिय के अनुभवकर्ता, उसके अधिष्ठाता देव और अनुभव का भौतिक आधार—ये अध्यात्म, अधिदैव और अधिभूत परस्पर सम्बद्ध हैं।
श्लोक 10.9
सरल हिंदी भावार्थ: इनमें किसी एक के बिना अन्य का अनुभव नहीं होता; तीनों का ज्ञाता आत्मा उनसे परे और उनके आश्रय का भी आश्रय है।
श्लोक 10.10
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्माण्ड को प्रकट करके पुरुष ने अपने निवास के लिए निर्मल जल की रचना की।
श्लोक 10.11
सरल हिंदी भावार्थ: अपने बनाए जल में दीर्घकाल स्थित होने से वे नारायण कहलाए; जल नर अर्थात् पुरुष से उत्पन्न है और उनका अयन है।
श्लोक 10.12
सरल हिंदी भावार्थ: द्रव्य, कर्म, काल, स्वभाव और जीव उन्हीं की कृपा से प्रकट रहते हैं; उनकी शक्ति हटने पर यह व्यवस्था नहीं रहती।
श्लोक 10.13
सरल हिंदी भावार्थ: एक से अनेक प्रकट करने की इच्छा से भगवान योगनिद्रा से उठे और अपनी शक्ति को तीन प्रकार से प्रकट किया।
श्लोक 10.14
सरल हिंदी भावार्थ: वही एक पौरुषशक्ति अधिदैव, अध्यात्म और अधिभूत—तीन रूपों में कैसे विभाजित हुई, सुनो।
श्लोक 10.15
सरल हिंदी भावार्थ: विराट शरीर के भीतर के आकाश में चेष्टा होने पर ओज, सहनशक्ति और बल प्रकट हुए; फिर प्रधान प्राण प्रकट हुआ।
श्लोक 10.16
सरल हिंदी भावार्थ: जिस प्रधान प्राण के सक्रिय होने पर अन्य प्राण सक्रिय होते हैं और शान्त होने पर शान्त होते हैं, जैसे प्रजा राजा का अनुसरण करती है।
श्लोक 10.17
सरल हिंदी भावार्थ: प्राण की गति से भूख-प्यास जगी; खाने-पीने की अभिव्यक्ति के लिए मुख प्रकट हुआ।
श्लोक 10.18
सरल हिंदी भावार्थ: मुख में तालु और जीभ प्रकट हुए तथा जीभ से ग्रहण किए जाने वाले विविध रस बने।
श्लोक 10.19
सरल हिंदी भावार्थ: बोलने की इच्छा से वाणी, उसका अधिष्ठाता अग्नि और कथन प्रकट हुए; पूर्व की जलमय अवस्था में यह शक्ति सुप्त थी।
श्लोक 10.20
सरल हिंदी भावार्थ: वायु की गति और सुगन्ध ग्रहण करने की इच्छा से नासाछिद्र, गन्धवाह वायु और घ्राणशक्ति प्रकट हुए।
श्लोक 10.21
सरल हिंदी भावार्थ: प्रकाश और अपने रूप को देखने की इच्छा से नेत्र, दृष्टि तथा रूप ग्रहण करने वाली ज्योति प्रकट हुई।
श्लोक 10.22
सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानियों के कथन को ग्रहण करने की इच्छा से कान, दिशाएँ और शब्द ग्रहण करने वाली श्रवणशक्ति प्रकट हुई।
श्लोक 10.23
सरल हिंदी भावार्थ: कोमलता, कठोरता, हल्केपन, भारीपन, गर्मी और ठण्ड के अनुभव हेतु त्वचा, रोम तथा स्पर्शवाहक वायु प्रकट हुए।
श्लोक 10.24
सरल हिंदी भावार्थ: विविध कर्म करने की इच्छा से हाथ, उनकी शक्ति और अधिष्ठाता इन्द्र प्रकट हुए; वस्तु ग्रहण करना उनका कार्य है।
श्लोक 10.25
सरल हिंदी भावार्थ: इच्छित स्थान की ओर जाने के लिए पैर और उनके अधिष्ठाता विष्णु प्रकट हुए; उन्हीं के माध्यम से यज्ञादि कर्मों तक पहुँचा जाता है।
श्लोक 10.26
सरल हिंदी भावार्थ: संतान और उसके आनन्द की अभिव्यक्ति के लिए जननेन्द्रिय तथा उससे सम्बद्ध प्रजननशक्ति प्रकट हुई।
श्लोक 10.27
सरल हिंदी भावार्थ: शरीर का मल त्यागने के लिए गुदा, पायु और अधिष्ठाता मित्र प्रकट हुए; विसर्जन उनका संयुक्त कार्य है।
श्लोक 10.28
सरल हिंदी भावार्थ: एक देह से दूसरी देह में जाने की व्यवस्था में नाभि, अपान और मृत्यु की भूमिका प्रकट हुई।
श्लोक 10.29
सरल हिंदी भावार्थ: अन्न-पान ग्रहण करने के लिए उदर, आँतें और नाड़ियाँ बनीं; उनके विराट आधार नदियाँ और समुद्र तथा फल तृप्ति-पुष्टि हैं।
श्लोक 10.30
सरल हिंदी भावार्थ: अपनी शक्ति के चिन्तन के लिए हृदय, मन, चन्द्रमा और संकल्प-कामना की वृत्तियाँ प्रकट हुईं।
श्लोक 10.31
सरल हिंदी भावार्थ: त्वचा, चर्म, मांस, रक्त, मेद, मज्जा और अस्थि पृथ्वी, जल तथा तेज से सम्बद्ध हैं; प्राण आकाश, जल और वायु पर आश्रित है।
श्लोक 10.32
सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्रियाँ गुणमय हैं, विषय सूक्ष्म भूतकारण से उत्पन्न होते हैं; मन विविध वृत्तियों का और बुद्धि निश्चयात्मक ज्ञान का रूप है।
श्लोक 10.33
सरल हिंदी भावार्थ: मैंने भगवान का यह स्थूल ध्यानरूप बताया, जो पृथ्वी आदि आठ आवरणों से बाहर घिरा हुआ है।
श्लोक 10.34
सरल हिंदी भावार्थ: इसके परे सूक्ष्मतम, अव्यक्त, विशेषरहित, अनादि-अनन्त, नित्य और वाणी-मन से परे स्वरूप है।
श्लोक 10.35
सरल हिंदी भावार्थ: ये स्थूल-सूक्ष्म ध्यानरूप बताए गए हैं; विवेकी इन्हीं मायिक उपाधियों को भगवान का सम्पूर्ण परम स्वरूप नहीं मानते।
श्लोक 10.36
सरल हिंदी भावार्थ: परम भगवान नाम और अर्थ दोनों के आश्रय होकर ब्रह्मारूप से नाम, रूप और क्रिया की व्यवस्था करते हैं, फिर भी कर्म से असंग हैं।
श्लोक 10.37
सरल हिंदी भावार्थ: प्रजापति, मनु, देवता, ऋषि, पितर, सिद्ध, चारण, गन्धर्व, विद्याधर, असुर और गुह्यक उनकी सृष्टि में प्रकट होते हैं।
श्लोक 10.38
सरल हिंदी भावार्थ: किन्नर, अप्सराएँ, नाग, सर्प, किम्पुरुष, मातृगण, राक्षस, पिशाच, प्रेत, भूत और विनायकगण भी उसी व्यवस्था में हैं।
श्लोक 10.39
सरल हिंदी भावार्थ: कूष्माण्ड, उन्मादक शक्तियाँ, वेताल, यातुधान, ग्रह तथा पक्षी, मृग, पशु, वृक्ष, पर्वत और सरीसृप भी उसमें सम्मिलित हैं।
श्लोक 10.40
सरल हिंदी भावार्थ: जल, थल और आकाश में रहने वाले विभिन्न जन्मप्रकारों के जीव शुभ, अशुभ और मिश्र कर्मों के अनुसार विविध गतियाँ पाते हैं।
श्लोक 10.41
सरल हिंदी भावार्थ: सत्त्व, रज और तम से दिव्य, मानवीय और अधोगतियाँ बनती हैं; गुणों के परस्पर मिश्रण से प्रत्येक के भी अनेक विभाग होते हैं।
श्लोक 10.42
सरल हिंदी भावार्थ: वही विश्वधारक भगवान धर्मरूप धारण करके देव, मनुष्य और अन्य प्राणियों के माध्यम से जगत का पालन करते हैं।
श्लोक 10.43
सरल हिंदी भावार्थ: फिर कालाग्निरुद्र रूप से समय आने पर सृष्टि समेट लेते हैं, जैसे हवा बादलों को छिन्न-भिन्न कर देती है।
श्लोक 10.44
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की यह सृष्ट्यादि लीला का व्यवहारिक वर्णन है; उनका परम स्वरूप इससे भी परे समझा जाता है।
श्लोक 10.45
सरल हिंदी भावार्थ: परमात्मा पर जन्म और कर्म का बन्धन लागू नहीं होता; स्वतंत्र कर्तापन का अहंकार मिटाने के लिए उनकी मायाशक्ति का वर्णन किया गया है।
श्लोक 10.46
सरल हिंदी भावार्थ: यह ब्रह्मकल्प और उसके विभागों का सामान्य वर्णन हुआ, जिसमें मूल तत्त्वों और विविध प्राणियों की सृष्टि का क्रम है।
श्लोक 10.47
सरल हिंदी भावार्थ: काल और कल्पों का विस्तृत परिमाण आगे कहूँगा; अब पाद्मकल्प से सम्बन्धित कथा सुनो।
श्लोक 10.48
सरल हिंदी भावार्थ: शौनकजी बोले—सूतजी, आपने कहा था कि श्रेष्ठ भगवद्भक्त विदुर कठिनाई से छूटने वाले स्वजनों को छोड़कर तीर्थयात्रा करते रहे।
श्लोक 10.49
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेयजी के साथ उनका आत्मतत्त्वविषयक संवाद कहाँ हुआ और पूछने पर उन्होंने विदुर को क्या उपदेश दिया?
श्लोक 10.50
सरल हिंदी भावार्थ: कृपा करके विदुर का चरित्र, स्वजनों को छोड़ने का कारण और फिर लौटने का प्रसंग सुनाइए।
श्लोक 10.51
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—परीक्षित के प्रश्नों के अनुसार महामुनि शुकदेवजी ने जो कहा, वह अब आपको सुनाऊँगा; ध्यान से सुनिए।
॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 10 समाप्त ॥
द्वितीय स्कन्ध का भक्ति-सन्देश
जीवन का सार भगवान के स्मरण में जागना है। समस्त जगत को उनके आश्रय में देखकर अहंकार शान्त होता है और हरिकथा के श्रवण से हृदय निर्मल होता है। सृष्टि के विविध विषय अन्ततः एक ही प्रश्न को स्पष्ट करते हैं—सबका परम आश्रय कौन है?
पाठाधार और संपादकीय जानकारी
प्राचीन मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents का “श्रीमद्भागवतं—द्वितीयस्कन्धः” है। चुने हुए पाठ में अध्यायवार श्लोक-संख्या 39, 37, 25, 25, 42, 45, 53, 29, 45 और 51 है; कुल 391 श्लोक हैं। संस्करणों में संख्या और पाठभेद मिल सकते हैं। यहाँ चतुश्लोकी का पाठ अध्याय 9 के श्लोक 32–35 में है। कोष्ठकीय विकल्प मुख्य पाठ में नहीं मिलाए गए हैं। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना की स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है, किसी आधुनिक टीका की प्रतिलिपि नहीं। विराट स्वरूप के अंगों में विश्व का वर्णन ध्यान की प्रतीकात्मक पद्धति है। योगगति का वर्णन ग्रंथ का भावार्थ है, व्यक्तिगत प्राणायाम-प्रशिक्षण नहीं।
॥ द्वितीय स्कन्ध सम्पूर्ण ॥
॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
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