श्रीमद्भागवत महापुराण द्वितीय स्कन्ध सम्पूर्ण — 10 अध्याय, 391 श्लोक और हिंदी भावार्थ

भक्ति भावना • पुराण साहित्य

श्रीमद्भागवत महापुराण

द्वितीय स्कन्ध • सम्पूर्ण १० अध्याय

३९१ मूल श्लोक • प्रत्येक श्लोक का सरल हिंदी भावार्थ

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श्रवण, स्मरण और परम आश्रय की खोज

प्रथम स्कन्ध के अन्त में परीक्षित ने शुकदेवजी से जीवन और अन्तकाल के कर्तव्य पूछे थे। द्वितीय स्कन्ध उन्हीं प्रश्नों का उत्तर हरिनाम, भगवान के ध्यान और भक्तियोग से आरम्भ करता है। आगे सृष्टि के तत्त्व, विराट पुरुष, प्रमुख अवतार, ब्रह्मा को चतुश्लोकी उपदेश और भागवत के दस लक्षणों का विवेचन है।

यहाँ चुने हुए आधार-पाठ के सभी 10 अध्याय और 391 श्लोक मूल क्रम में हैं। प्रत्येक का सरल हिंदी भावार्थ इस प्रकाशन के लिए स्वतंत्र रूप से लिखा गया है।

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द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 1

हरिनाम, अन्तकाल का कर्तव्य और विराट स्वरूप

श्लोक 1.1

श्रीशुक उवाच । वरीयानेष ते प्रश्नः कृतो लोकहितं नृप । आत्मवित्सम्मतः पुंसां श्रोतव्यादिषु यः परः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—राजन्, आपका प्रश्न लोककल्याणकारी, आत्मज्ञानियों द्वारा मान्य और सुनने योग्य विषयों में सर्वश्रेष्ठ है।

श्लोक 1.2

श्रोतव्यादीनि राजेन्द्र नृणां सन्ति सहस्रशः । अपश्यतामात्मतत्त्वं गृहेषु गृहमेधिनाम् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: आत्मतत्त्व न समझने वाले गृहासक्त लोगों के लिए सुनने और करने के हजारों विषय रहते हैं।

श्लोक 1.3

निद्रया ह्रियते नक्तं व्यवायेन च वा वयः । दिवा चार्थेहया राजन् कुटुम्बभरणेन वा ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी रात नींद और विषयभोग में तथा दिन धन कमाने और परिवार के पालन में बीतता है।

श्लोक 1.4

देहापत्यकलत्रादिष्वात्मसैन्येष्वसत्स्वपि । तेषां प्रमत्तो निधनं पश्यन्नपि न पश्यति ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: शरीर, संतान और जीवनसाथी आदि नश्वर सहारों में आसक्त मनुष्य मृत्यु देखते हुए भी अपनी अनित्यता नहीं समझता।

श्लोक 1.5

तस्माद्भारत सर्वात्मा भगवानीश्वरो हरिः । श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च स्मर्तव्यश्चेच्छताभयम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए निर्भयता चाहने वाले को सबके आत्मा भगवान हरि का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करना चाहिए।

श्लोक 1.6

एतावान् साङ्ख्ययोगाभ्यां स्वधर्मपरिनिष्ठया । जन्मलाभः परः पुंसामन्ते नारायणस्मृतिः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञान, योग और स्वधर्मपालन का सर्वोच्च फल यही है कि अन्तकाल में नारायण का स्मरण बना रहे।

श्लोक 1.7

प्रायेण मुनयो राजन् निवृत्ता विधिषेधतः । नैर्गुण्यस्था रमन्ते स्म गुणानुकथने हरेः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: विधि-निषेध और गुणबन्धन से ऊपर उठे मुनि भी श्रीहरि के गुणों की कथा में रमते हैं।

श्लोक 1.8

इदं भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् । अधीतवान् द्वापरादौ पितुर्द्वैपायनादहम् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैंने ब्रह्मतत्त्व से युक्त यह भागवत पुराण द्वापर के आरम्भ में अपने पिता वेदव्यास से पढ़ा था।

श्लोक 1.9

परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य उत्तमश्लोकलीलया । गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुणातीत आत्मस्थिति में प्रतिष्ठित होने पर भी भगवान की लीला ने मेरा चित्त आकर्षित किया, इसलिए मैंने इसका अध्ययन किया।

श्लोक 1.10

तदहं तेऽभिधास्यामि महापौरुषिको भवान् । यस्य श्रद्दधतामाशु स्यान्मुकुन्दे मतिः सती ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप भगवान के अनुगामी हैं; मैं आपको वह कथा सुनाऊँगा, जिस पर श्रद्धा रखने से मुकुन्द में निर्मल प्रेम शीघ्र जागता है।

श्लोक 1.11

एतन्निर्विद्यमानानामिच्छतामकुतोभयम् । योगिनां नृप निर्णीतं हरेर्नामानुकीर्तनम् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: विरक्त, कामनायुक्त और निर्भयता चाहने वाले योगियों—सभी के लिए हरिनाम का कीर्तन निश्चित कल्याणमार्ग है।

श्लोक 1.12

किं प्रमत्तस्य बहुभिः परोक्षैर्हायनैरिह । वरं मुहूर्तं विदितं घटते श्रेयसे यतः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: असावधानी में बीते अनेक वर्षों से वह जागरूक क्षण श्रेष्ठ है, जिसमें मनुष्य अपना कल्याण साध ले।

श्लोक 1.13

खट्वाङ्गो नाम राजर्षिर्ज्ञात्वेयत्तामिहायुषः । मुहूर्तात्सर्वमुत्सृज्य गतवानभयं हरिम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजर्षि खट्वाङ्ग ने जीवन की थोड़ी अवधि शेष जानकर सब आसक्ति छोड़ी और निर्भय श्रीहरि की शरण प्राप्त की।

श्लोक 1.14

तवाप्येतर्हि कौरव्य सप्ताहं जीवितावधिः । उपकल्पय तत्सर्वं तावद्यत्साम्परायिकम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपके पास सात दिन हैं; इस अवधि में जीवन के परम कल्याण का पूर्ण उपाय कीजिए।

श्लोक 1.15

अन्तकाले तु पुरुष आगते गतसाध्वसः । छिन्द्यादसङ्गशस्त्रेण स्पृहां देहेऽनु ये च तम् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अन्तकाल निकट होने पर धैर्य रखकर अनासक्ति के शस्त्र से शरीर और उससे जुड़े संबंधों की पकड़ काटनी चाहिए।

श्लोक 1.16

गृहात्प्रव्रजितो धीरः पुण्यतीर्थजलाप्लुतः । शुचौ विविक्त आसीनो विधिवत्कल्पितासने ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: विरक्त साधक पवित्र तीर्थ में स्नान करके स्वच्छ एकान्त स्थान में विधिपूर्वक आसन लगाकर बैठे।

श्लोक 1.17

अभ्यसेन्मनसा शुद्धं त्रिवृद्ब्रह्माक्षरं परम् । मनो यच्छेज्जितश्वासो ब्रह्मबीजमविस्मरन् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुद्ध प्रणव ॐ का मन से अभ्यास करे और श्वास को संयत रखते हुए उसके स्मरण से चित्त स्थिर करे।

श्लोक 1.18

नियच्छेद्विषयेभ्योऽक्षान् मनसा बुद्धिसारथिः । मनः कर्मभिराक्षिप्तं शुभार्थे धारयेद्धिया ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: बुद्धि के निर्देशन में मन से इन्द्रियों को विषयों से हटाए और कर्मों से भटके मन को शुभ आश्रय में लगाए।

श्लोक 1.19

तत्रैकावयवं ध्यायेदव्युच्छिन्नेन चेतसा । मनो निर्विषयं युक्त्वा ततः किञ्चन न स्मरेत् । पदं तत्परमं विष्णोर्मनो यत्र प्रसीदति ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के एक अंग का अखण्ड ध्यान करके मन को विषयों से हटाए; उसी विष्णुपद में चित्त शान्त होता है।

श्लोक 1.20

रजस्तमोभ्यामाक्षिप्तं विमूढं मन आत्मनः । यच्छेद्धारणया धीरो हन्ति या तत्कृतं मलम् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: रज और तम से भ्रमित तथा चंचल मन को धीर साधक धारणा से वश में करे; इससे मानसिक मल मिटता है।

श्लोक 1.21

यस्यां सन्धार्यमाणायां योगिनो भक्तिलक्षणः । आशु सम्पद्यते योग आश्रयं भद्रमीक्षतः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मंगलमय भगवान का आश्रय देखकर ऐसी धारणा करने वाले योगी में भक्तिस्वरूप योग शीघ्र उत्पन्न होता है।

श्लोक 1.22

राजोवाच । यथा सन्धार्यते ब्रह्मन् धारणा यत्र सम्मता । यादृशी वा हरेदाशु पुरुषस्य मनोमलम् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा ने पूछा—धारणा कैसे की जाए, उसका उचित आश्रय क्या है और कौन-सी धारणा मन का मल शीघ्र मिटाती है?

श्लोक 1.23

श्रीशुक उवाच । जितासनो जितश्वासो जितसङ्गो जितेन्द्रियः । स्थूले भगवतो रूपे मनः सन्धारयेद्धिया ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—आसन, श्वास, आसक्ति और इन्द्रियों को संयत करके बुद्धि से भगवान के विराट स्वरूप में मन लगाए।

श्लोक 1.24

विशेषस्तस्य देहोऽयं स्थविष्ठश्च स्थवीयसाम् । यत्रेदं दृश्यते विश्वं भूतं भव्यं भवच्च सत् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह दृश्य विश्व उनका स्थूलतम ध्यानरूप है, जिसमें भूत, वर्तमान और भविष्य का समस्त जगत समाया है।

श्लोक 1.25

आण्डकोशे शरीरेऽस्मिन् सप्तावरणसंयुते । वैराजः पुरुषो योऽसौ भगवान् धारणाश्रयः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: सात आवरणों से घिरे ब्रह्माण्डरूपी शरीर में विराजमान विराट पुरुष ही इस धारणा के आश्रय हैं।

श्लोक 1.26

पातालमेतस्य हि पादमूलं पठन्ति पार्ष्णिप्रपदे रसातलम् । महातलं विश्वसृजोऽथ गुल्फौ तलातलं वै पुरुषस्य जङ्घे ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस विराट कल्पना में पाताल चरणों का मूल, रसातल एड़ी और अगला भाग, महातल टखने तथा तलातल पिंडलियाँ हैं।

श्लोक 1.27

द्वे जानुनी सुतलं विश्वमूर्ते- रूरुद्वयं वितलं चातलं च । महीतलं तज्जघनं महीपते नभस्तलं नाभिसरो गृणन्ति ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: सुतल दोनों घुटने, वितल और अतल जाँघें, पृथ्वी जघनभाग और आकाश नाभिसरोवर माना गया है।

श्लोक 1.28

उरःस्थलं ज्योतिरनीकमस्य ग्रीवा महर्वदनं वै जनोऽस्य । तपो रराटीं विदुरादिपुंसः सत्यं तु शीर्षाणि सहस्रशीर्ष्णः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: ज्योतिर्मय स्वर्गलोक वक्षःस्थल, महर्लोक ग्रीवा, जनलोक मुख, तपोलोक ललाट और सत्यलोक विराट पुरुष का सिर है।

श्लोक 1.29

इन्द्रादयो बाहव आहुरुस्राः कर्णौ दिशः श्रोत्रममुष्य शब्दः । नासत्यदस्रौ परमस्य नासे घ्राणोऽस्य गन्धो मुखमग्निरिद्धः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्र आदि देवता उनकी भुजाएँ, दिशाएँ कान, शब्द श्रवणशक्ति, अश्विनीकुमार नासाछिद्र, गन्ध घ्राणशक्ति और अग्नि मुख हैं।

श्लोक 1.30

द्यौरक्षिणी चक्षुरभूत्पतङ्गः पक्ष्माणि विष्णोरहनी उभे च । तद्भ्रूविजृम्भः परमेष्ठिधिष्ण्य- मापोऽस्य तालू रस एव जिह्वा ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: आकाश आँखें, सूर्य दृष्टि, दिन-रात पलकें, ब्रह्मलोक भौंहों का विस्तार, जल तालु और रस जीभ की ध्यानकल्पना है।

श्लोक 1.31

छन्दांस्यनन्तस्य शिरो गृणन्ति दंष्ट्रा यमः स्नेहकला द्विजानि । हासो जनोन्मादकरी च माया दुरन्तसर्गो यदपाङ्गमोक्षः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: वेद उनके सिर का आश्रय, यम दाँतों की शक्ति और दन्तपंक्ति स्नेह का संकेत हैं; मोहकारिणी माया हास्य और सृष्टि उनकी दृष्टि का विस्तार है।

श्लोक 1.32

व्रीडोत्तरोष्ठोऽधर एव लोभो धर्मः स्तनोऽधर्मपथोऽस्य पृष्ठम् । कस्तस्य मेढ्रं वृषणौ च मित्रौ कुक्षिः समुद्रा गिरयोऽस्थिसङ्घाः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: लज्जा ऊपरी होंठ, लोभ निचला होंठ, धर्म वक्षभाग और अधर्म पीठ है; प्रजापति जननेन्द्रिय, मित्र-वरुण उसके सहायक, समुद्र उदर और पर्वत अस्थियाँ हैं।

श्लोक 1.33

नद्योऽस्य नाड्योऽथ तनूरुहाणि महीरुहा विश्वतनोर्नृपेन्द्र । अनन्तवीर्यः श्वसितं मातरिश्वा गतिर्वयः कर्म गुणप्रवाहः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: नदियाँ नाड़ियाँ, वृक्ष रोम, वायु श्वास, काल उनकी गति और गुणों का प्रवाह उनकी कर्मलीला है।

श्लोक 1.34

ईशस्य केशान् विदुरम्बुवाहान् वासस्तु सन्ध्यां कुरुवर्य भूम्नः । अव्यक्तमाहुर्हृदयं मनश्च सचन्द्रमाः सर्वविकारकोशः ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: बादल केश, संध्या वस्त्र, अव्यक्त प्रकृति हृदय और चन्द्रमा सहित मन विकारों का आश्रय माना जाता है।

श्लोक 1.35

विज्ञानशक्तिं महिमामनन्ति सर्वात्मनोऽन्तःकरणं गिरित्रम् । अश्वाश्वतर्युष्ट्रगजा नखानि सर्वे मृगाः पशवः श्रोणिदेशे ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: बुद्धि उनकी ज्ञानशक्ति, रुद्र अहंकार का अधिष्ठान, घोड़े-खच्चर-ऊँट-हाथी नख और अन्य पशु जघनप्रदेश की कल्पना हैं।

श्लोक 1.36

वयांसि तद्व्याकरणं विचित्रं मनुर्मनीषा मनुजो निवासः । गन्धर्वविद्याधरचारणाप्सरः स्वरस्मृतीरसुरानीकवीर्यः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: पक्षियों की ध्वनियाँ उनकी विचित्र अभिव्यक्ति, मनु विवेकशक्ति और मनुष्य निवास हैं; गन्धर्वादि स्वर-स्मृति तथा असुर पराक्रम का संकेत हैं।

श्लोक 1.37

ब्रह्माऽऽननं क्षत्रभुजो महात्मा विडूरुरङ्घ्रिश्रितकृष्णवर्णः । नानाभिधाभीज्यगणोपपन्नो द्रव्यात्मकः कर्म वितानयोगः ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्राह्मण मुख, क्षत्रिय भुजाएँ, वैश्य जाँघें और शूद्र चरणों के आश्रित हैं; विविध यज्ञसामग्री और देवताओं से युक्त यज्ञकर्म भी विराट रूप का अंग है।

श्लोक 1.38

इयानसावीश्वरविग्रहस्य यः सन्निवेशः कथितो मया ते । सन्धार्यतेऽस्मिन् वपुषि स्थविष्ठे मनः स्वबुद्ध्या न यतोऽस्ति किञ्चित् ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैंने भगवान के विराट विग्रह की यह संक्षिप्त व्यवस्था कही। बुद्धि से इसमें मन स्थिर करें, क्योंकि इससे बाहर कोई वस्तु नहीं है।

श्लोक 1.39

स सर्वधीवृत्त्यनुभूतसर्व आत्मा यथा स्वप्नजनेक्षितैकः । तं सत्यमानन्दनिधिं भजेत नान्यत्र सज्जेद्यत आत्मपातः ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सभी चित्तवृत्तियों में अनुभूत एक आत्मा ही सबका साक्षी है। उसी सत्य और आनन्दनिधि का भजन करें; पतन कराने वाली दूसरी आसक्तियों में न फँसें।

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 1 समाप्त ॥

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द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 2

परमात्मध्यान, योगगति और भक्ति का सार

श्लोक 2.1

श्रीशुक उवाच । एवं पुरा धारणयाऽऽत्मयोनि- र्नष्टां स्मृतिं प्रत्यवरुध्य तुष्टात् । तथा ससर्जेदममोघदृष्टि- र्यथाप्ययात्प्राग्व्यवसायबुद्धिः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—ब्रह्मा ने इसी धारणा से प्रसन्न भगवान की कृपा पाकर विस्मृत सृष्टिज्ञान फिर प्राप्त किया और पूर्ववत् जगत रचा।

श्लोक 2.2

शाब्दस्य हि ब्रह्मण एष पन्था यन्नामभिर्ध्यायति धीरपार्थैः । परिभ्रमंस्तत्र न विन्दतेऽर्थान् मायामये वासनया शयानः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: वेद के केवल कामनापूर्ण शब्दों में उलझा मनुष्य नामों और कल्पनाओं में घूमता रहता है, पर वास्तविक तृप्ति नहीं पाता।

श्लोक 2.3

अतः कविर्नामसु यावदर्थः स्यादप्रमत्तो व्यवसायबुद्धिः । सिद्धेऽन्यथार्थे न यतेत तत्र परिश्रमं तत्र समीक्षमाणः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: विवेकी मनुष्य व्यवहार में जितना आवश्यक हो उतना ही इन विषयों से संबंध रखे; अनावश्यक उपलब्धियों के लिए व्यर्थ श्रम न करे।

श्लोक 2.4

सत्यां क्षितौ किं कशिपोः प्रयासै- र्बाहौ स्वसिद्धे ह्युपबर्हणैः किम् । सत्यञ्जलौ किं पुरुधान्नपात्र्या दिग्वल्कलादौ सति किं दुकूलैः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: विरक्त साधक के लिए धरती बिछौना, भुजा तकिया, अंजलि पात्र और साधारण वस्त्र पर्याप्त हैं; विलास जुटाने का आग्रह क्यों?

श्लोक 2.5

चीराणि किं पथि न सन्ति दिशन्ति भिक्षां नैवाङ्घ्रिपाः परभृतः सरितोऽप्यशुष्यन् । रुद्धा गुहाः किमजितोऽवति नोपसन्नान् कस्माद्भजन्ति कवयो धनदुर्मदान्धान् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रकृति में साधन और भगवान की शरण उपलब्ध होने पर आत्मज्ञानी धन के गर्व में अन्धे लोगों की चापलूसी क्यों करें?

श्लोक 2.6

एवं स्वचित्ते स्वत एव सिद्ध आत्मा प्रियोऽर्थो भगवाननन्तः । तं निर्वृतो नियतार्थो भजेत संसारहेतूपरमश्च यत्र ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने चित्त में स्वयंप्रकाश और परम प्रिय अनन्त भगवान का शान्त भाव से भजन करें; उन्हीं में संसारबन्धन का कारण समाप्त होता है।

श्लोक 2.7

कस्तां त्वनादृत्य परानुचिन्ता- मृते पशूनसतीं नाम युञ्ज्यात् । पश्यन् जनं पतितं वैतरण्यां स्वकर्मजान् परितापाञ्जुषाणम् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने कर्मों से दुःख भोगते लोगों को देखकर कौन विवेकी भगवान के चिन्तन को छोड़कर असार आसक्तियों में लगेगा?

श्लोक 2.8

केचित्स्वदेहान्तर्हृदयावकाशे प्रादेशमात्रं पुरुषं वसन्तम् । चतुर्भुजं कञ्जरथाङ्गशङ्ख- गदाधरं धारणया स्मरन्ति ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: कुछ योगी हृदय के भीतर चतुर्भुज पुरुष का ध्यान करते हैं, जिनके हाथों में कमल, चक्र, शंख और गदा हैं।

श्लोक 2.9

प्रसन्नवक्त्रं नलिनायतेक्षणं कदम्बकिञ्जल्कपिशङ्गवाससम् । लसन्महारत्नहिरण्मयाङ्गदं स्फुरन्महारत्नकिरीटकुण्डलम् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनका मुख प्रसन्न, नेत्र कमल जैसे, वस्त्र पीतवर्ण, भुजाभूषण स्वर्णमय और मुकुट-कुण्डल उज्ज्वल रत्नों से शोभित हैं।

श्लोक 2.10

उन्निद्रहृत्पङ्कजकर्णिकालये योगेश्वरास्थापितपादपल्लवम् । श्रीलक्ष्मणं कौस्तुभरत्नकन्धर- मम्लानलक्ष्म्या वनमालयाऽऽचितम् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: योगियों के खिले हृदयकमल पर उनके चरण विराजते हैं; वक्ष पर श्रीवत्स, गले में कौस्तुभ और ताजी वनमाला शोभती है।

श्लोक 2.11

विभूषितं मेखलयाङ्गुलीयकै- र्महाधनैर्नूपुरकङ्कणादिभिः । स्निग्धामलाकुञ्चितनीलकुन्तलै- र्विरोचमानाननहासपेशलम् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे करधनी, अँगूठियों, नूपुर और कंगनों से विभूषित हैं; निर्मल घुँघराले श्याम केश और मधुर मुस्कान मुख को सुशोभित करते हैं।

श्लोक 2.12

अदीनलीलाहसितेक्षणोल्लस- द्भ्रूभङ्गसंसूचितभूर्यनुग्रहम् । ईक्षेत चिन्तामयमेनमीश्वरं यावन्मनो धारणयावतिष्ठते ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी सहज मुस्कान, दृष्टि और भौंहों के संकेत में भक्तों पर अनुग्रह झलकता है। चित्त स्थिर रहने तक इसी दिव्य स्वरूप का ध्यान करें।

श्लोक 2.13

एकैकशोऽङ्गानि धियानुभावयेत्- पादादि यावद्धसितं गदाभृतः । जितं जितं स्थानमपोह्य धारयेत् परं परं शुद्ध्यति धीर्यथा यथा ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: चरणों से लेकर मुस्कान तक एक-एक अंग का ध्यान करें; जहाँ चित्त स्थिर हो जाए, वहाँ से अगले अंग की ओर बढ़ें।

श्लोक 2.14

यावन्न जायेत परावरेऽस्मिन् विश्वेश्वरे द्रष्टरि भक्तियोगः । तावत्स्थवीयः पुरुषस्य रूपं क्रियावसाने प्रयतः स्मरेत ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब तक सर्वद्रष्टा विश्वेश्वर में प्रेममय भक्तियोग न जागे, तब तक कर्तव्य समाप्त कर सावधानी से विराट रूप का स्मरण करें।

श्लोक 2.15

स्थिरं सुखं चासनमास्थितो यति- र्यदा जिहासुरिममङ्ग लोकम् । काले च देशे च मनो न सज्जयेत् प्राणान् नियच्छेन्मनसा जितासुः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: लोकासक्ति छोड़ने को तैयार संयमी साधक स्थिर सुखद आसन पर बैठकर देश-काल की आसक्ति हटाए और मन तथा प्राण संयत करे।

श्लोक 2.16

मनः स्वबुध्यामलया नियम्य क्षेत्रज्ञ एतां निनयेत्तमात्मनि । आत्मानमात्मन्यवरुध्य धीरो लब्धोपशान्तिर्विरमेत कृत्यात् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: निर्मल बुद्धि से मन को संयत करके बुद्धि को जीवचैतन्य और उसे परमात्मा में स्थित करे; परम शान्ति पाकर कर्माग्रह से विरत हो।

श्लोक 2.17

न यत्र कालोऽनिमिषां परः प्रभुः कुतो नु देवा जगतां य ईशिरे । न यत्र सत्त्वं न रजस्तमश्च न वै विकारो न महान् प्रधानम् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस परम स्थिति में काल का भी अधिकार नहीं; वहाँ सांसारिक देवशासन, मिश्रित गुण, विकार, महत्तत्त्व और प्रकृति का बन्धन नहीं रहता।

श्लोक 2.18

परं पदं वैष्णवमामनन्ति तद्- यन्नेति नेतीत्यतदुत्सिसृक्षवः । विसृज्य दौरात्म्यमनन्यसौहृदा हृदोपगुह्यार्हपदं पदे पदे ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: साधक “यह नहीं, यह नहीं” के विवेक से असार आवरण छोड़कर प्रेमपूर्वक भगवान के पूज्य चरणों का आश्रय लेते हैं; यही परम वैष्णव पद है।

श्लोक 2.19

इत्थं मुनिस्तूपरमेद्व्यवस्थितो विज्ञानदृग्वीर्यसुरन्धिताशयः । स्वपार्ष्णिनाऽऽपीड्य गुदं ततोऽनिलं स्थानेषु षट्सून्नमयेज्जितक्लमः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसके आगे सिद्ध योगी के देहत्याग की विशेष योगपद्धति कही गई है—ज्ञान से वासनाएँ शान्त कर प्राण को क्रमशः ऊर्ध्व केन्द्रों में स्थिर करना।

श्लोक 2.20

नाभ्यां स्थितं हृद्यधिरोप्यतस्मा- दुदानगत्योरसि तं नयेन्मुनिः । ततोऽनुसन्धाय धिया मनस्वी स्वतालुमूलं शनकैर्नयेत ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस योगवर्णन में प्राण को नाभि से हृदय, फिर वक्षःस्थल और एकाग्र बुद्धि से तालुमूल की ओर ले जाने का क्रम है।

श्लोक 2.21

तस्माद्भ्रुवोरन्तरमुन्नयेत निरुद्धसप्तायतनोऽनपेक्षः । स्थित्वा मुहूर्तार्धमकुण्ठदृष्टि- र्निर्भिद्य मूर्धन् विसृजेत्परं गतः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर इन्द्रियों को पूर्ण समेटकर भ्रूमध्य में स्थिरता और अन्ततः ब्रह्मरन्ध्र से परमगति का वर्णन है; यह सिद्ध योग की विशिष्ट अवस्था है।

श्लोक 2.22

यदि प्रयास्यन् नृप पारमेष्ठ्यं वैहायसानामुत यद्विहारम् । अष्टाधिपत्यं गुणसन्निवाये सहैव गच्छेन्मनसेन्द्रियैश्च ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: यदि योगी ब्रह्मलोक, दिव्य लोकों के विहार अथवा अष्टसिद्धियों की इच्छा रखता है, तो सूक्ष्म मन और इन्द्रियों सहित क्रमगति करता है।

श्लोक 2.23

योगेश्वराणां गतिमाहुरन्त- र्बहिस्त्रिलोक्याः पवनान्तरात्मनाम् । न कर्मभिस्तां गतिमाप्नुवन्ति विद्यातपोयोगसमाधिभाजाम् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: भीतर-बाहर सूक्ष्म लोकों में विचरने की ऐसी गति ज्ञान, तप, योग और समाधि के साधकों की कही गई है; केवल कर्मों से नहीं मिलती।

श्लोक 2.24

वैश्वानरं याति विहायसा गतः सुषुम्णया ब्रह्मपथेन शोचिषा । विधूतकल्कोऽथ हरेरुदस्तात् प्रयाति चक्रं नृप शैशुमारम् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्रममुक्ति के वर्णन में योगी ज्योतिर्मय ब्रह्मपथ से वैश्वानर और फिर पवित्र होकर शिशुमारचक्र की ओर बढ़ता है।

श्लोक 2.25

तद्विश्वनाभिं त्वतिवर्त्य विष्णो- रणीयसा विरजेनात्मनैकः । नमस्कृतं ब्रह्मविदामुपैति कल्पायुषो यद्विबुधा रमन्ते ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस विश्वनाभि को पार करके निर्मल सूक्ष्म स्वरूप से वह ब्रह्मज्ञानियों द्वारा पूजित महर्लोक पहुँचता है, जहाँ कल्पायु ऋषि रहते हैं।

श्लोक 2.26

अथो अनन्तस्य मुखानलेन दन्दह्यमानं स निरीक्ष्य विश्वम् । निर्याति सिद्धेश्वरजुष्टधिष्ण्यं यद्द्वैपरार्ध्यं तदु पारमेष्ठ्यम् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कल्पान्त की अग्नि से विश्व को जलता देखकर वह सिद्धेश्वरों के निवास और ब्रह्मा की दीर्घ आयु वाले ब्रह्मलोक की ओर जाता है।

श्लोक 2.27

न यत्र शोको न जरा न मृत्यु- र्नार्तिर्नचोद्वेग ऋते कुतश्चित् । यच्चित्ततोऽदः कृपयानिदंविदां दुरन्तदुःखप्रभवानुदर्शनात् ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ शोक, जरा, मृत्यु, पीड़ा और भय नहीं; केवल अज्ञानी जीवों के गहरे दुःख देखकर करुणावश चिन्ता हो सकती है।

श्लोक 2.28

ततो विशेषं प्रतिपद्य निर्भय- स्तेनात्मनापोऽनलमूर्तिरत्वरन् । ज्योतिर्मयो वायुमुपेत्य काले वाय्वात्मना खं बृहदात्मलिङ्गम् ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर निर्भय योगी स्थूल और सूक्ष्म आवरणों को क्रमशः पार करता है—पृथ्वी से जल, अग्नि, वायु और व्यापक आकाश तक।

श्लोक 2.29

घ्राणेन गन्धं रसनेन वै रसं रूपं च दृष्ट्या श्वसनं त्वचैव । श्रोत्रेण चोपेत्य नभोगुणत्वं प्राणेन चाकूतिमुपैति योगी ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: घ्राण, रसना, दृष्टि, स्पर्श और श्रवण के विषयों को उनके मूल गुणों में समेटकर वह इन्द्रिय-क्रियाओं के सूक्ष्म कारण तक पहुँचता है।

श्लोक 2.30

स भूतसूक्ष्मेन्द्रियसन्निकर्षं मनोमयं देवमयं विकार्यम् । संसाद्य गत्या सह तेन याति विज्ञानतत्त्वं गुणसन्निरोधम् ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: भूतों, इन्द्रियों, मन और अधिष्ठाता देवताओं के सूक्ष्म कारणों को पार करके वह गुणों के शान्त होने पर महत्तत्त्व का भी अतिक्रमण करता है।

श्लोक 2.31

तेनात्मनाऽऽत्मानमुपैति शान्त- मानन्दमानन्दमयोऽवसाने । एतां गतिं भागवतीं गतो यः स वै पुनर्नेह विषज्जतेऽङ्ग ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: अन्त में आनन्दमय साधक शान्त परमात्मा को प्राप्त होता है। ऐसी भगवद्गति पाने वाला फिर संसारासक्ति में नहीं फँसता।

श्लोक 2.32

एते सृती ते नृप वेदगीते त्वयाभिपृष्टे ह सनातने च । ये वै पुरा ब्रह्मण आह पृष्ट आराधितो भगवान् वासुदेवः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: ये दोनों सनातन वेदोक्त गतियाँ मैंने बताईं; पूर्वकाल में आराधना से प्रसन्न वासुदेव ने ब्रह्मा के पूछने पर इन्हें कहा था।

श्लोक 2.33

न ह्यतोऽन्यः शिवः पन्था विशतः संसृताविह । वासुदेवे भगवति भक्तियोगो यतो भवेत् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: संसार में प्रवेश किए जीव के लिए सबसे मंगलकारी मार्ग वही है, जिससे भगवान वासुदेव में भक्तियोग उत्पन्न हो।

श्लोक 2.34

भगवान् ब्रह्म कार्त्स्न्येन त्रिरन्वीक्ष्य मनीषया । तदध्यवस्यत्कूटस्थो रतिरात्मन् यतो भवेत् ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा ने वेदों का बार-बार पूर्ण विचार करके यही निश्चय किया कि परमात्मा में प्रेम जगना ही उनका सार है।

श्लोक 2.35

भगवान् सर्वभूतेषु लक्षितः स्वात्मना हरिः । दृश्यैर्बुद्ध्यादिभिर्द्रष्टा लक्षणैरनुमापकैः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान हरि सब जीवों के भीतर साक्षी हैं; बुद्धि और अन्य ज्ञात अनुभवों से उस द्रष्टा का अस्तित्व पहचाना जाता है।

श्लोक 2.36

तस्मात्सर्वात्मना राजन् हरिः सर्वत्र सर्वदा । श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च स्मर्तव्यो भगवान् नृणाम् ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए सबको सर्वत्र, सदा और पूरे मन से भगवान हरि का श्रवण, कीर्तन और स्मरण करना चाहिए।

श्लोक 2.37

पिबन्ति ये भगवत आत्मनः सतां कथामृतं श्रवणपुटेषु सम्भृतम् । पुनन्ति ते विषयविदूषिताशयं व्रजन्ति तच्चरणसरोरुहान्तिकम् ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो संतों के प्रिय भगवान की कथामृत को कानों से ग्रहण करते हैं, वे विषयों से दूषित चित्त शुद्ध करके उनके चरणकमलों के निकट पहुँचते हैं।

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 2 समाप्त ॥

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द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 3

काम्य उपासना और निष्काम भक्तियोग

श्लोक 3.1

श्रीशुक उवाच । एवमेतन्निगदितं पृष्टवान् यद्भवान् मम । नृणां यन्म्रियमाणानां मनुष्येषु मनीषिणाम् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—मृत्यु निकट होने पर विवेकी मनुष्य को जो करना चाहिए, आपके प्रश्न के अनुसार उसका वर्णन कर दिया।

श्लोक 3.2

ब्रह्मवर्चसकामस्तु यजेत ब्रह्मणः पतिम् । इन्द्रमिन्द्रियकामस्तु प्रजाकामः प्रजापतीन् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: अब इच्छानुसार देवोपासना का वर्णन है: ब्रह्मतेज का इच्छुक बृहस्पति, इन्द्रियबल का इच्छुक इन्द्र और संतान का इच्छुक प्रजापतियों की उपासना करता है।

श्लोक 3.3

देवीं मायां तु श्रीकामस्तेजस्कामो विभावसुम् । वसुकामो वसून् रुद्रान् वीर्यकामोऽथ वीर्यवान् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: सम्पत्ति के लिए देवी माया, तेज के लिए अग्नि, धन के लिए वसु और पराक्रम के लिए रुद्रों की उपासना कही गई है।

श्लोक 3.4

अन्नाद्यकामस्त्वदितिं स्वर्गकामोऽदितेः सुतान् । विश्वान् देवान् राज्यकामः साध्यान् संसाधको विशाम् ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: अन्न के लिए अदिति, स्वर्ग के लिए आदित्य, राज्य के लिए विश्वेदेव और प्रजा की सफलता के लिए साध्यदेवों की उपासना है।

श्लोक 3.5

आयुष्कामोऽश्विनौ देवौ पुष्टिकाम इलां यजेत् । प्रतिष्ठाकामः पुरुषो रोदसी लोकमातरौ ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: दीर्घायु के लिए अश्विनीकुमार, पुष्टि के लिए पृथ्वी और प्रतिष्ठा के लिए पृथ्वी-आकाश की उपासना का उल्लेख है।

श्लोक 3.6

रूपाभिकामो गन्धर्वान् स्त्रीकामोऽप्सर उर्वशीम् । आधिपत्यकामः सर्वेषां यजेत परमेष्ठिनम् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: रूप के लिए गन्धर्व, जीवनसंगिनी की कामना के लिए उर्वशी और व्यापक आधिपत्य के लिए ब्रह्मा की उपासना कही गई है।

श्लोक 3.7

यज्ञं यजेद्यशस्कामः कोशकामः प्रचेतसम् । विद्याकामस्तु गिरिशं दाम्पत्यार्थ उमां सतीम् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: यश के लिए यज्ञपुरुष, धनभण्डार के लिए वरुण, विद्या के लिए शिव और दाम्पत्य के लिए उमा की उपासना बताई गई है।

श्लोक 3.8

धर्मार्थ उत्तमश्लोकं तन्तुं तन्वन् पितॄन् यजेत् । रक्षाकामः पुण्यजनानोजस्कामो मरुद्गणान् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: धर्म के लिए भगवान विष्णु, वंशवृद्धि के लिए पितर, रक्षा के लिए पुण्यजन और ओज के लिए मरुद्गणों की उपासना का वर्णन है।

श्लोक 3.9

राज्यकामो मनून् देवान् निरृतिं त्वभिचरन् यजेत् । कामकामो यजेत्सोममकामः पुरुषं परम् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: राज्य के लिए मनुओं, हानिकारक अभिचार की कामना में निरृति और भोग के लिए चन्द्रमा का उल्लेख है; निष्काम साधक परम पुरुष का भजन करे।

श्लोक 3.10

अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः । तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: चाहे कोई निष्काम हो, अनेक इच्छाओं वाला हो या मोक्ष चाहे—उदार बुद्धि से तीव्र भक्तियोग द्वारा परम पुरुष की आराधना करे।

श्लोक 3.11

एतावानेव यजतामिह निःश्रेयसोदयः । भगवत्यचलो भावो यद्भागवतसङ्गतः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: सभी उपासनाओं का परम कल्याण यही है कि भगवद्भक्तों की संगति से भगवान में अचल प्रेम जागे।

श्लोक 3.12

ज्ञानं यदा प्रतिनिवृत्तगुणोर्मिचक्र- मात्मप्रसाद उत यत्र गुणेष्वसङ्गः । कैवल्यसम्मतपथस्त्वथ भक्तियोगः को निर्वृतो हरिकथासु रतिं न कुर्यात् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: भक्ति से गुणों की लहरें शान्त होती हैं, आत्मप्रसाद और अनासक्ति मिलती है तथा मुक्ति का मार्ग खुलता है; ऐसा सुख पाकर कौन हरिकथा में प्रेम न करेगा?

श्लोक 3.13

शौनक उवाच । इत्यभिव्याहृतं राजा निशम्य भरतर्षभः । किमन्यत्पृष्टवान् भूयो वैयासकिमृषिं कविम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: शौनकजी ने पूछा—यह उपदेश सुनकर भरतवंशश्रेष्ठ राजा ने व्यासपुत्र ज्ञानी शुकदेवजी से आगे क्या पूछा?

श्लोक 3.14

एतच्छुश्रूषतां विद्वन् सूत नोऽर्हसि भाषितुम् । कथा हरिकथोदर्काः सतां स्युः सदसि ध्रुवम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: विद्वान सूतजी, हम सुनना चाहते हैं; संतसभा की चर्चा निश्चय ही हरिकथा को आगे बढ़ाने वाली होती है।

श्लोक 3.15

स वै भागवतो राजा पाण्डवेयो महारथः । बालक्रीडनकैः क्रीडन् कृष्णक्रीडां य आददे ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: पाण्डववंशी महारथी परीक्षित ऐसे भक्त थे कि बाललीलाओं में भी श्रीकृष्ण की लीलाओं का अनुकरण करते थे।

श्लोक 3.16

वैयासकिश्च भगवान् वासुदेवपरायणः । उरुगायगुणोदाराः सतां स्युर्हि समागमे ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी भी वासुदेवपरायण हैं; ऐसे संतों के मिलन में भगवान के उदार गुणों की चर्चा अवश्य होती है।

श्लोक 3.17

आयुर्हरति वै पुंसामुद्यन्नस्तं च यन्नसौ । तस्यर्ते यत्क्षणो नीत उत्तमश्लोकवार्तया ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उगता और अस्त होता सूर्य मनुष्य की आयु हरता है, किन्तु भगवान की कथा में बिताया क्षण जीवन को सार्थक करता है।

श्लोक 3.18

तरवः किं न जीवन्ति भस्त्राः किं न श्वसन्त्युत । न खादन्ति न मेहन्ति किं ग्रामपशवोऽपरे ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: केवल जीना, साँस लेना, खाना और उत्सर्जन करना श्रेष्ठता नहीं; वृक्ष, धौंकनी और पशु भी इन क्रियाओं के समान कार्य करते हैं।

श्लोक 3.19

श्वविड्वराहोष्ट्रखरैः संस्तुतः पुरुषः पशुः । न यत्कर्णपथोपेतो जातु नाम गदाग्रजः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिसके कानों में भगवान का नाम कभी न पहुँचे, उसकी केवल भौतिक प्रशंसा मनुष्यजीवन की सार्थकता सिद्ध नहीं करती।

श्लोक 3.20

बिले बतोरुक्रमविक्रमान् ये न श‍ृण्वतः कर्णपुटे नरस्य । जिह्वासती दार्दुरिकेव सूत न चोपगायत्युरुगायगाथाः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की कथा न सुनने वाले कान केवल छिद्र जैसे हैं और उनका गुणगान न करने वाली जीभ मेंढक की टर्राहट जैसी निष्फल कही गई है।

श्लोक 3.21

भारः परं पट्टकिरीटजुष्ट- मप्युत्तमाङ्गं न नमेन्मुकुन्दम् । शावौ करौ नो कुरुतः सपर्यां हरेर्लसत्काञ्चनकङ्कणौ वा ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुकुट से सजा होकर भी भगवान को न झुकने वाला सिर भार है; स्वर्णकंगन पहने होकर भी उनकी सेवा न करने वाले हाथ निष्क्रिय हैं।

श्लोक 3.22

बर्हायिते ते नयने नराणां लिङ्गानि विष्णोर्न निरीक्षतो ये । पादौ नृणां तौ द्रुमजन्मभाजौ क्षेत्राणि नानुव्रजतो हरेर्यौ ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के स्वरूप को न देखने वाली आँखें मोरपंख की आँखों जैसी और उनके तीर्थों तक न चलने वाले पैर वृक्ष के तने जैसे कहे गए हैं।

श्लोक 3.23

जीवञ्छवो भागवताङ्घ्रिरेणुं न जातु मर्त्योऽभिलभेत यस्तु । श्रीविष्णुपद्या मनुजस्तुलस्याः श्वसञ्छवो यस्तु न वेद गन्धम् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो भक्तों की चरणरज और भगवान को अर्पित तुलसी का सम्मान न पाए, उसका केवल शारीरिक जीवन आध्यात्मिक जागृति के बिना अधूरा है।

श्लोक 3.24

तदश्मसारं हृदयं बतेदं यद्गृह्यमाणैर्हरिनामधेयैः । न विक्रियेताथ यदा विकारो नेत्रे जलं गात्ररुहेषु हर्षः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: हरिनाम से भी जिसका हृदय नहीं पिघलता, वह पत्थर जैसा कठोर कहा गया है; भगवत्प्रेम में आँखों के आँसू और रोमांच भाव के संकेत हैं।

श्लोक 3.25

अथाभिधेह्यङ्ग मनोऽनुकूलं प्रभाषसे भागवतप्रधानः । यदाह वैयासकिरात्मविद्या- विशारदो नृपतिं साधु पृष्टः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: कृपा करके बताइए कि राजा के उत्तम प्रश्नों पर आत्मविद्या में निपुण शुकदेवजी ने आगे क्या कहा; आप श्रेष्ठ भगवद्भक्त हैं।

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 3 समाप्त ॥

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द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 4

परीक्षित के प्रश्न और श्रीशुकदेव की प्रार्थना

श्लोक 4.1

सूत उवाच । वैयासकेरिति वचस्तत्त्वनिश्चयमात्मनः । उपधार्य मतिं कृष्णे औत्तरेयः सतीं व्यधात् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—शुकदेवजी के आत्मतत्त्वनिश्चय वाले वचन सुनकर परीक्षित ने अपना निर्मल मन श्रीकृष्ण में स्थिर किया।

श्लोक 4.2

आत्मजायासुतागारपशुद्रविणबन्धुषु । राज्ये चाविकले नित्यं विरूढां ममतां जहौ ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने शरीर, जीवनसाथी, संतान, घर, पशु, धन, संबंधियों और समृद्ध राज्य के प्रति पुरानी ममता छोड़ दी।

श्लोक 4.3

पप्रच्छ चेममेवार्थं यन्मां पृच्छथ सत्तमाः । कृष्णानुभावश्रवणे श्रद्दधानो महामनाः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रीकृष्ण की महिमा सुनने की श्रद्धा से उन्होंने वही प्रश्न किया, जो अब आप मुझसे पूछ रहे हैं।

श्लोक 4.4

संस्थां विज्ञाय सन्न्यस्य कर्म त्रैवर्गिकं च यत् । वासुदेवे भगवति आत्मभावं दृढं गतः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जीवन की अनित्यता समझकर धर्म-अर्थ-काम के फलार्थ कर्म छोड़े और वासुदेव में दृढ़ आत्मीयता स्थापित की।

श्लोक 4.5

राजोवाच । समीचीनं वचो ब्रह्मन् सर्वज्ञस्य तवानघ । तमो विशीर्यते मह्यं हरेः कथयतः कथाम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा बोले—निर्दोष सर्वज्ञ महात्मन्, आपके वचन यथार्थ हैं; हरिकथा सुनाने से मेरा अज्ञान मिट रहा है।

श्लोक 4.6

भूय एव विवित्सामि भगवानात्ममायया । यथेदं सृजते विश्वं दुर्विभाव्यमधीश्वरैः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: अब मैं जानना चाहता हूँ कि भगवान अपनी माया से इस विश्व की रचना कैसे करते हैं, जिसे बड़े देवता भी पूर्णतः नहीं समझ पाते।

श्लोक 4.7

यथा गोपायति विभुर्यथा संयच्छते पुनः । यां यां शक्तिमुपाश्रित्य पुरुशक्तिः परः पुमान् । आत्मानं क्रीडयन् क्रीडन् करोति विकरोति च ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे किस शक्ति से जगत की रक्षा और संहार करते हैं तथा अपनी विविध शक्तियों से सृष्टि को खेल की तरह कैसे प्रकट और परिवर्तित करते हैं?

श्लोक 4.8

नूनं भगवतो ब्रह्मन् हरेरद्भुतकर्मणः । दुर्विभाव्यमिवाभाति कविभिश्चापि चेष्टितम् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: अद्भुत कर्मों वाले श्रीहरि की लीला विद्वानों के लिए भी समझना कठिन जान पड़ती है।

श्लोक 4.9

यथा गुणांस्तु प्रकृतेर्युगपत्क्रमशोऽपि वा । बिभर्ति भूरिशस्त्वेकः कुर्वन् कर्माणि जन्मभिः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक होते हुए वे प्रकृति के गुणों को एक साथ अथवा क्रम से धारण करके अनेक रूपों में विविध कार्य कैसे करते हैं?

श्लोक 4.10

विचिकित्सितमेतन्मे ब्रवीतु भगवान् यथा । शाब्दे ब्रह्मणि निष्णातः परस्मिंश्च भवान् खलु ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप शब्दब्रह्म और परब्रह्म दोनों के ज्ञाता हैं; कृपया मेरे इस संशय का समाधान करें।

श्लोक 4.11

सूत उवाच । इत्युपामन्त्रितो राज्ञा गुणानुकथने हरेः । हृषीकेशमनुस्मृत्य प्रतिवक्तुं प्रचक्रमे ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—ऐसी प्रार्थना सुनकर शुकदेवजी ने हृषीकेश का स्मरण किया और भगवान के गुणों का वर्णन आरम्भ किया।

श्लोक 4.12

श्रीशुक उवाच । नमः परस्मै पुरुषाय भूयसे सदुद्भवस्थाननिरोधलीलया । गृहीतशक्तित्रितयाय देहिना- मन्तर्भवायानुपलक्ष्यवर्त्मने ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—सृष्टि, पालन और संहार की लीला के लिए तीन शक्तियाँ ग्रहण करने वाले, जीवों के भीतर स्थित और अगम्य गति वाले परम पुरुष को प्रणाम है।

श्लोक 4.13

भूयो नमः सद्वृजिनच्छिदेऽसता- मसम्भवायाखिलसत्त्वमूर्तये । पुंसां पुनः पारमहंस्य आश्रमे व्यवस्थितानामनुमृग्यदाशुषे ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: साधुओं का दुःख मिटाने वाले, दुष्टता का निवारण करने वाले और परमहंसों को साधना का फल देने वाले सर्वस्वरूप भगवान को फिर प्रणाम है।

श्लोक 4.14

नमो नमस्तेऽस्त्वृषभाय सात्वतां विदूरकाष्ठाय मुहुः कुयोगिनाम् । निरस्तसाम्यातिशयेन राधसा स्वधामनि ब्रह्मणि रंस्यते नमः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: सात्वतों के श्रेष्ठ स्वामी, कुटिल साधना वालों से दूर और अतुल ऐश्वर्य सहित अपने शुद्ध स्वरूप में रमण करने वाले प्रभु को बारम्बार प्रणाम है।

श्लोक 4.15

यत्कीर्तनं यत्स्मरणं यदीक्षणं यद्वन्दनं यच्छ्रवणं यदर्हणम् । लोकस्य सद्यो विधुनोति कल्मषं तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिनका कीर्तन, स्मरण, दर्शन, प्रणाम, श्रवण और पूजन लोगों का पापमल शीघ्र दूर करता है, उन मंगलकीर्ति भगवान को प्रणाम है।

श्लोक 4.16

विचक्षणा यच्चरणोपसादनात् सङ्गं व्युदस्योभयतोऽन्तरात्मनः । विन्दन्ति हि ब्रह्मगतिं गतक्लमा- स्तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिनके चरणों का आश्रय लेकर विवेकी भीतर-बाहर की आसक्ति छोड़ते हैं और क्लेशरहित ब्रह्मगति पाते हैं, उन्हें प्रणाम है।

श्लोक 4.17

तपस्विनो दानपरा यशस्विनो मनस्विनो मन्त्रविदः सुमङ्गलाः । क्षेमं न विन्दन्ति विना यदर्पणं तस्मै सुभद्रश्रवसे नमो नमः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: तपस्वी, दानी, यशस्वी, मनस्वी और मन्त्रज्ञ भी अपने साधन उन्हें अर्पित किए बिना परम कल्याण नहीं पाते; उन प्रभु को प्रणाम है।

श्लोक 4.18

किरातहूणान्ध्रपुलिन्दपुल्कसा आभीरकङ्का यवनाः खसादयः । येऽन्ये च पापा यदपाश्रयाश्रयाः शुध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नमः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: विभिन्न जनसमुदायों और पापपूर्ण जीवन वाले लोगों तक को जिनके भक्तों का आश्रय पवित्र करता है, उन सर्वसमर्थ विष्णु को प्रणाम है।

श्लोक 4.19

स एष आत्माऽऽत्मवतामधीश्वर- स्त्रयीमयो धर्ममयस्तपोमयः । गतव्यलीकैरजशङ्करादिभि- र्वितर्क्यलिङ्गो भगवान् प्रसीदताम् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: आत्मज्ञानियों के आत्मा, वेद, धर्म और तप के आश्रय तथा निर्मल ब्रह्मा-शिव आदि द्वारा पहचाने जाने वाले भगवान प्रसन्न हों।

श्लोक 4.20

श्रियः पतिर्यज्ञपतिः प्रजापति- र्धियाम्पतिर्लोकपतिर्धरापतिः । पतिर्गतिश्चान्धकवृष्णिसात्वतां प्रसीदतां मे भगवान् सतां पतिः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: लक्ष्मी, यज्ञ, प्रजा, बुद्धि, लोक और पृथ्वी के स्वामी तथा यदुवंशियों और संतों के परम आश्रय भगवान मुझ पर प्रसन्न हों।

श्लोक 4.21

यदङ्घ्र्यभिध्यानसमाधिधौतया धियानुपश्यन्ति हि तत्त्वमात्मनः । वदन्ति चैतत्कवयो यथारुचं स मे मुकुन्दो भगवान् प्रसीदताम् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिनके चरणध्यान से शुद्ध बुद्धि वाले आत्मतत्त्व देखते हैं और अपनी दृष्टि के अनुसार उसका वर्णन करते हैं, वे मुकुन्द मुझ पर प्रसन्न हों।

श्लोक 4.22

प्रचोदिता येन पुरा सरस्वती वितन्वताजस्य सतीं स्मृतिं हृदि । स्वलक्षणा प्रादुरभूत्किलास्यतः स मे ऋषीणामृषभः प्रसीदताम् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिन्होंने ब्रह्मा के हृदय में सत्य ज्ञान जगाया और उनके मुख से वेदवाणी प्रकट की, वे ऋषियों के परम गुरु प्रसन्न हों।

श्लोक 4.23

भूतैर्महद्भिर्य इमाः पुरो विभु- र्निर्माय शेते यदमूषु पूरुषः । भुङ्क्ते गुणान् षोडश षोडशात्मकः सोऽलङ्कृषीष्ट भगवान् वचांसि मे ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो तत्त्वों से देहरूपी नगर बनाकर उनमें रहते और इन्द्रिय-मनादि की अनुभूति के साक्षी होते हैं, वे भगवान मेरी वाणी को समर्थ बनाएँ।

श्लोक 4.24

नमस्तस्मै भगवते वासुदेवाय वेधसे । पपुर्ज्ञानमयं सौम्या यन्मुखाम्बुरुहासवम् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानदायी भगवान वासुदेवस्वरूप व्यास को प्रणाम है, जिनके मुखकमल से निकले ज्ञानामृत का संत पान करते हैं।

श्लोक 4.25

एतदेवात्मभू राजन् नारदाय विपृच्छते । वेदगर्भोऽभ्यधात्साक्षाद्यदाह हरिरात्मनः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, यही विषय ब्रह्मा ने नारद के पूछने पर कहा था; उन्हें वह ज्ञान स्वयं भगवान से प्राप्त हुआ था।

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 4 समाप्त ॥

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द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 5

नारद–ब्रह्मा संवाद और सृष्टि के तत्त्व

श्लोक 5.1

नारद उवाच । देवदेव नमस्तेऽस्तु भूतभावन पूर्वज । तद्विजानीहि यज्ज्ञानमात्मतत्त्वनिदर्शनम् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारदजी बोले—हे देवाधिदेव, प्राणियों के पालक और आदिपुरुष ब्रह्माजी, आपको प्रणाम है; आत्मतत्त्व का ज्ञान मुझे बताइए।

श्लोक 5.2

यद्रूपं यदधिष्ठानं यतः सृष्टमिदं प्रभो । यत्संस्थं यत्परं यच्च तत्तत्त्वं वद तत्त्वतः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: विश्व का स्वरूप, आधार, उत्पत्ति, लय और परम आश्रय क्या है? कृपा करके यथार्थ तत्त्व समझाइए।

श्लोक 5.3

सर्वं ह्येतद्भवान् वेद भूतभव्यभवत्प्रभुः । करामलकवद्विश्वं विज्ञानावसितं तव ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप भूत, भविष्य और वर्तमान को जानते हैं; आपकी ज्ञानदृष्टि में विश्व हथेली पर रखे आँवले जैसा स्पष्ट है।

श्लोक 5.4

यद्विज्ञानो यदाधारो यत्परस्त्वं यदात्मकः । एकः सृजसि भूतानि भूतैरेवात्ममायया ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप किस ज्ञान, आधार और परम आश्रय से अपनी शक्ति द्वारा तत्त्वों से प्राणियों की रचना करते हैं?

श्लोक 5.5

आत्मन् भावयसे तानि न पराभावयन् स्वयम् । आत्मशक्तिमवष्टभ्य ऊर्णनाभिरिवाक्लमः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मकड़ी जैसे अपना जाल बनाती है, वैसे अपनी शक्ति से सबको प्रकट करके आप स्वयं बिना थके उनका पालन कैसे करते हैं?

श्लोक 5.6

नाहं वेद परं ह्यस्मिन् नापरं न समं विभो । मरूपगुणैर्भाव्यं सदसत्किञ्चिदन्यतः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं इस विश्व में आपसे उच्च, निम्न या समान किसी अन्य स्वतंत्र सृष्टिकर्ता को नहीं जानता।

श्लोक 5.7

स भवानचरद्घोरं यत्तपः सुसमाहितः । तेन खेदयसे नस्त्वं पराशङ्कां प्रयच्छसि ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: किन्तु आपने एकाग्र होकर कठोर तप किया; इससे संशय होता है कि आपके ऊपर भी कोई परम सत्ता है।

श्लोक 5.8

एतन्मे पृच्छतः सर्वं सर्वज्ञ सकलेश्वर । विजानीहि यथैवेदमहं बुध्येऽनुशासितः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे सर्वज्ञ प्रभो, मेरे सभी प्रश्नों का ऐसा समाधान कीजिए कि आपके उपदेश से मैं वास्तविकता समझ सकूँ।

श्लोक 5.9

ब्रह्मोवाच । सम्यक्कारुणिकस्येदं वत्स ते विचिकित्सितम् । यदहं चोदितः सौम्य भगवद्वीर्यदर्शने ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्माजी बोले—वत्स, तुम्हारा प्रश्न करुणापूर्ण और उचित है; इससे मुझे भगवान की शक्ति का वर्णन करने की प्रेरणा मिली है।

श्लोक 5.10

नानृतं तव तच्चापि यथा मां प्रब्रवीषि भोः । अविज्ञाय परं मत्त एतावत्त्वं यतो हि मे ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुमने मेरी जो महिमा कही, वह व्यवहारतः असत्य नहीं, किन्तु मेरे परम आश्रय को न जानने से अपूर्ण है।

श्लोक 5.11

येन स्वरोचिषा विश्वं रोचितं रोचयाम्यहम् । यथार्कोऽग्निर्यथा सोमो यथर्क्षग्रहतारकाः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिनके प्रकाश से विश्व प्रकाशित है, उन्हीं से शक्ति पाकर मैं सृष्टि प्रकट करता हूँ; जैसे सूर्य, अग्नि, चन्द्र और तारों का प्रकाश मूल शक्ति पर निर्भर है।

श्लोक 5.12

तस्मै नमो भगवते वासुदेवाय धीमहि । यन्मायया दुर्जयया मां ब्रुवन्ति जगद्गुरुम् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन वासुदेव को प्रणाम और उन्हीं का ध्यान है, जिनकी दुर्जय माया से लोग मुझे ही परम जगद्गुरु मान बैठते हैं।

श्लोक 5.13

विलज्जमानया यस्य स्थातुमीक्षापथेऽमुया । विमोहिता विकत्थन्ते ममाहमिति दुर्धियः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: माया जिन भगवान के सामने लज्जित रहती है, उसी से मोहित अज्ञानी “मैं” और “मेरा” कहकर अभिमान करते हैं।

श्लोक 5.14

द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च । वासुदेवात्परो ब्रह्मन् न चान्योऽर्थोऽस्ति तत्त्वतः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: द्रव्य, कर्म, काल, स्वभाव और जीव—तत्त्वतः कुछ भी वासुदेव से स्वतंत्र या पृथक परम सत्ता नहीं है।

श्लोक 5.15

नारायणपरा वेदा देवा नारायणाङ्गजाः । नारायणपरा लोका नारायणपरा मखाः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वेद नारायण को लक्ष्य करते हैं, देवता उनके अंगों से सम्बद्ध हैं और लोक तथा यज्ञ भी उन्हीं पर आश्रित हैं।

श्लोक 5.16

नारायणपरो योगो नारायणपरं तपः । नारायणपरं ज्ञानं नारायणपरा गतिः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: योग, तप, ज्ञान और परमगति—सभी का आश्रय और लक्ष्य नारायण हैं।

श्लोक 5.17

तस्यापि द्रष्टुरीशस्य कूटस्थस्याखिलात्मनः । सृज्यं सृजामि सृष्टोऽहमीक्षयैवाभिचोदितः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: सर्वसाक्षी, अविकारी और सबके आत्मा ईश्वर ने मुझे रचा; उनकी दृष्टि और प्रेरणा से मैं उनकी इच्छित सृष्टि करता हूँ।

श्लोक 5.18

सत्त्वं रजस्तम इति निर्गुणस्य गुणास्त्रयः । स्थितिसर्गनिरोधेषु गृहीता मायया विभोः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुणातीत भगवान अपनी माया से पालन, सृष्टि और संहार के लिए सत्त्व, रज और तम ग्रहण करते हैं।

श्लोक 5.19

कार्यकारणकर्तृत्वे द्रव्यज्ञानक्रियाश्रयाः । बध्नन्ति नित्यदा मुक्तं मायिनं पुरुषं गुणाः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: द्रव्य, ज्ञान और क्रिया के आधार ये गुण कार्य-कारण और कर्तापन के भाव से मूलतः मुक्त जीव को बन्धन में डालते हैं।

श्लोक 5.20

स एष भगवाँल्लिङ्गैस्त्रिभिरेभिरधोक्षजः । स्वलक्षितगतिर्ब्रह्मन् सर्वेषां मम चेश्वरः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुणों के इन संकेतों से जिनका अस्तित्व जाना जाता है, वे अधोक्षज भगवान मेरे और सभी के स्वामी हैं।

श्लोक 5.21

कालं कर्म स्वभावं च मायेशो मायया स्वया । आत्मन् यदृच्छया प्राप्तं विबुभूषुरुपाददे ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: सृष्टि प्रकट करने की इच्छा से मायापति ने अपनी शक्ति में काल, कर्म और स्वभाव को सक्रिय किया।

श्लोक 5.22

कालाद्गुणव्यतिकरः परिणामः स्वभावतः । कर्मणो जन्म महतः पुरुषाधिष्ठितादभूत् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: काल से गुणों का सन्तुलन बदला, स्वभाव से परिवर्तन हुआ और भगवान के अधिष्ठान में कर्मानुसार महत्तत्त्व प्रकट हुआ।

श्लोक 5.23

महतस्तु विकुर्वाणाद्रजःसत्त्वोपबृंहितात् । तमःप्रधानस्त्वभवद्द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: रज और सत्त्व से विकसित महत्तत्त्व के परिवर्तन से तमप्रधान, द्रव्य-ज्ञान-क्रिया का कारण अहंकार उत्पन्न हुआ।

श्लोक 5.24

सोऽहङ्कार इति प्रोक्तो विकुर्वन् समभूत्त्रिधा । वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेति यद्भिदा । द्रव्यशक्तिः क्रियाशक्तिर्ज्ञानशक्तिरिति प्रभो ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह अहंकार वैकारिक, तैजस और तामस—तीन प्रकार का हुआ; उनसे ज्ञान, क्रिया और द्रव्य की शक्तियाँ प्रकट हुईं।

श्लोक 5.25

तामसादपि भूतादेर्विकुर्वाणादभून्नभः । तस्य मात्रा गुणः शब्दो लिङ्गं यद्द्रष्टृदृश्ययोः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: तामस अहंकार के परिवर्तन से आकाश बना। उसका गुण शब्द है, जो सुनने वाले और सुने जाने वाले के संबंध का संकेत है।

श्लोक 5.26

नभसोऽथ विकुर्वाणादभूत्स्पर्शगुणोऽनिलः । परान्वयाच्छब्दवांश्च प्राण ओजः सहो बलम् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: आकाश से स्पर्शगुण वाला वायु बना, जिसमें पूर्ववर्ती शब्दगुण भी है; प्राण, ओज और बल उससे सम्बद्ध हैं।

श्लोक 5.27

वायोरपि विकुर्वाणात्कालकर्मस्वभावतः । उदपद्यत तेजो वै रूपवत्स्पर्शशब्दवत् ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: काल, कर्म और स्वभाव के प्रभाव से वायु से तेज प्रकट हुआ, जिसमें रूप के साथ स्पर्श और शब्द भी हैं।

श्लोक 5.28

तेजसस्तु विकुर्वाणादासीदम्भो रसात्मकम् । रूपवत्स्पर्शवच्चाम्भो घोषवच्च परान्वयात् ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: तेज से जल उत्पन्न हुआ। उसमें रस तथा पहले के रूप, स्पर्श और शब्दगुण भी विद्यमान हैं।

श्लोक 5.29

विशेषस्तु विकुर्वाणादम्भसो गन्धवानभूत् । परान्वयाद्रसस्पर्शशब्दरूपगुणान्वितः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जल के परिवर्तन से गन्धगुण वाली पृथ्वी बनी; उसमें रस, स्पर्श, शब्द और रूप भी समाहित हैं।

श्लोक 5.30

वैकारिकान्मनो जज्ञे देवा वैकारिका दश । दिग्वातार्कप्रचेतोऽश्विवह्नीन्द्रोपेन्द्रमित्रकाः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: सात्त्विक अहंकार से मन और इन्द्रियों के दस अधिष्ठाता देवता—दिशा, वायु, सूर्य, वरुण, अश्विनी, अग्नि, इन्द्र, विष्णु, मित्र और प्रजापति—प्रकट हुए।

श्लोक 5.31

तैजसात्तु विकुर्वाणादिन्द्रियाणि दशाभवन् । ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिर्बुद्धिः प्राणश्च तैजसौ । श्रोत्रं त्वग्घ्राणदृग्जिह्वा वाग्दोर्मेढ्राङ्घ्रिपायवः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: तैजस अहंकार से दस इन्द्रियाँ, बुद्धि और प्राण प्रकट हुए: कान, त्वचा, नाक, आँख, जीभ, वाणी, हाथ, जननेन्द्रिय, पैर और गुदा।

श्लोक 5.32

यदैतेऽसङ्गता भावा भूतेन्द्रियमनोगुणाः । यदायतननिर्माणे न शेकुर्ब्रह्मवित्तम ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब भूत, इन्द्रियाँ और मन आदि अलग-अलग थे, तब वे जीव के निवासरूप शरीर की रचना नहीं कर सके।

श्लोक 5.33

तदा संहत्य चान्योन्यं भगवच्छक्तिचोदिताः । सदसत्त्वमुपादाय चोभयं ससृजुर्ह्यदः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की शक्ति से प्रेरित होकर वे परस्पर मिले और कारण तथा कार्यरूप दोनों को लेकर विश्व का निर्माण हुआ।

श्लोक 5.34

वर्षपूगसहस्रान्ते तदण्डमुदकेशयम् । कालकर्मस्वभावस्थो जीवोऽजीवमजीवयत् ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: दीर्घकाल तक जल में स्थित ब्रह्माण्ड में परम पुरुष ने काल, कर्म और स्वभाव के माध्यम से चेतना का संचार किया।

श्लोक 5.35

स एव पुरुषस्तस्मादण्डं निर्भिद्य निर्गतः । सहस्रोर्वङ्घ्रिबाह्वक्षः सहस्राननशीर्षवान् ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर उसी अण्ड से सहस्र जाँघ, चरण, भुजा, नेत्र, मुख और सिर वाला विराट पुरुष प्रकट हुआ।

श्लोक 5.36

यस्येहावयवैर्लोकान् कल्पयन्ति मनीषिणः । कट्यादिभिरधः सप्त सप्तोर्ध्वं जघनादिभिः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानी उसके अंगों में लोकों का ध्यान करते हैं—कटि आदि में सात अधोलोक और जघन आदि से ऊपर सात ऊर्ध्वलोक।

श्लोक 5.37

पुरुषस्य मुखं ब्रह्म क्षत्रमेतस्य बाहवः । ऊर्वोर्वैश्यो भगवतः पद्भ्यां शूद्रो व्यजायत ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: विराट पुरुष के मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जाँघों से वैश्य और चरणों से शूद्र की प्रतीकात्मक कल्पना कही गई है।

श्लोक 5.38

भूर्लोकः कल्पितः पद्भ्यां भुवर्लोकोऽस्य नाभितः । हृदा स्वर्लोक उरसा महर्लोको महात्मनः ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: पैरों में भूर्लोक, नाभि में भुवर्लोक, हृदय में स्वर्लोक और वक्ष में महर्लोक का ध्यान किया जाता है।

श्लोक 5.39

ग्रीवायां जनलोकश्च तपोलोकः स्तनद्वयात् । मूर्धभिः सत्यलोकस्तु ब्रह्मलोकः सनातनः ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: ग्रीवा में जनलोक, वक्ष के ऊपरी भाग में तपोलोक और मस्तक में सनातन सत्यलोक अथवा ब्रह्मलोक माना गया है।

श्लोक 5.40

तत्कट्यां चातलं कॢप्तमूरुभ्यां वितलं विभोः । जानुभ्यां सुतलं शुद्धं जङ्घाभ्यां तु तलातलम् ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: कटि में अतल, जाँघों में वितल, घुटनों में सुतल और पिंडलियों में तलातल का ध्यान है।

श्लोक 5.41

महातलं तु गुल्फाभ्यां प्रपदाभ्यां रसातलम् । पातालं पादतलत इति लोकमयः पुमान् ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: टखनों में महातल, पैरों के अगले भाग में रसातल और तलवों में पाताल—इस प्रकार पुरुष लोकमय हैं।

श्लोक 5.42

भूर्लोकः कल्पितः पद्भ्यां भुवर्लोकोऽस्य नाभितः । स्वर्लोकः कल्पितो मूर्ध्ना इति वा लोककल्पना ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: संक्षिप्त तीन-लोक ध्यान में चरण भूर्लोक, नाभि भुवर्लोक और मस्तक स्वर्लोक माना जाता है।

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 5 समाप्त ॥

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द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 6

विराट पुरुष और भगवान की विभूतियाँ

श्लोक 6.1

ब्रह्मोवाच । वाचां वह्नेर्मुखं क्षेत्रं छन्दसां सप्त धातवः । हव्यकव्यामृतान्नानां जिह्वा सर्वरसस्य च ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्माजी बोले—विराट पुरुष का मुख वाणी और अग्नि का क्षेत्र, सात धातुएँ वेदछन्दों का आधार और जीभ समस्त रस तथा अन्न का आश्रय है।

श्लोक 6.2

सर्वासूनां च वायोश्च तन्नासे परमायने । अश्विनोरोषधीनां च घ्राणो मोदप्रमोदयोः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी नासिका प्राण और वायु का आश्रय तथा घ्राणशक्ति अश्विनीकुमारों, औषधियों और सुगन्धजनित आनन्द का आधार है।

श्लोक 6.3

रूपाणां तेजसां चक्षुर्दिवः सूर्यस्य चाक्षिणी । कर्णौ दिशां च तीर्थानां श्रोत्रमाकाशशब्दयोः । तद्गात्रं वस्तुसाराणां सौभगस्य च भाजनम् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके नेत्र रूप, प्रकाश, सूर्य और आकाश का, कान दिशाओं का तथा श्रवण आकाश और शब्द का आश्रय हैं; शरीर सौन्दर्य का भण्डार है।

श्लोक 6.4

त्वगस्य स्पर्शवायोश्च सर्वमेधस्य चैव हि । रोमाण्युद्भिज्जजातीनां यैर्वा यज्ञस्तु सम्भृतः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: त्वचा स्पर्श, वायु और यज्ञसंबंधी शक्तियों का आधार है; रोमों से यज्ञ में उपयोगी वनस्पतियों की प्रतीकात्मक उत्पत्ति मानी गई है।

श्लोक 6.5

केशश्मश्रुनखान्यस्य शिलालोहाभ्रविद्युताम् । बाहवो लोकपालानां प्रायशः क्षेमकर्मणाम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: केश, दाढ़ी और नख शिला, धातु, बादल और बिजली के आधार तथा भुजाएँ लोकपालों और रक्षाकर्म का आश्रय हैं।

श्लोक 6.6

विक्रमो भूर्भुवः स्वश्च क्षेमस्य शरणस्य च । सर्वकामवरस्यापि हरेश्चरण आस्पदम् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके विस्तार में भूः, भुवः और स्वः लोक हैं। श्रीहरि के चरण सुरक्षा, शरण और अभीष्ट वरों का आधार हैं।

श्लोक 6.7

अपां वीर्यस्य सर्गस्य पर्जन्यस्य प्रजापतेः । पुंसः शिश्न उपस्थस्तु प्रजात्यानन्दनिर्वृतेः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी जननशक्ति जल, वीर्य, सृष्टि, वर्षा और प्रजापति से सम्बद्ध है; उससे संतान और जीवनविस्तार का आनन्द जुड़ा है।

श्लोक 6.8

पायुर्यमस्य मित्रस्य परिमोक्षस्य नारद । हिंसाया निरृतेर्मृत्योर्निरयस्य गुदं स्मृतः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: विसर्जन की शक्ति मित्रदेव और त्याग का आधार है; गुदाप्रदेश हिंसा, मृत्यु, विनाश और नरक की प्रतीकात्मक कल्पना का स्थान है।

श्लोक 6.9

पराभूतेरधर्मस्य तमसश्चापि पश्चिमः । नाड्यो नदनदीनां तु गोत्राणामस्थिसंहतिः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: पीठ पराभव, अधर्म और अन्धकार का संकेत, नाड़ियाँ नदियों तथा अस्थिसमूह पर्वतों का आश्रय हैं।

श्लोक 6.10

अव्यक्तरससिन्धूनां भूतानां निधनस्य च । उदरं विदितं पुंसो हृदयं मनसः पदम् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उदर अव्यक्त प्रकृति, रस, समुद्र और प्राणियों के लय का आधार तथा हृदय मन का स्थान है।

श्लोक 6.11

धर्मस्य मम तुभ्यं च कुमाराणां भवस्य च । विज्ञानस्य च सत्त्वस्य परस्यात्मा परायणम् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनका अन्तःस्थित स्वरूप धर्म, ब्रह्मा, नारद, सनकादि, शिव, ज्ञान, सत्त्व और परम तत्त्व का आश्रय है।

श्लोक 6.12

अहं भवान् भवश्चैव त इमे मुनयोऽग्रजाः । सुरासुरनरा नागाः खगा मृगसरीसृपाः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं, तुम, शिव, पूर्वज ऋषि, देवता, असुर, मनुष्य, नाग, पक्षी, मृग और सरीसृप—सब उसी पुरुष के आश्रित हैं।

श्लोक 6.13

गन्धर्वाप्सरसो यक्षा रक्षोभूतगणोरगाः । पशवः पितरः सिद्धा विद्याध्राश्चारणा द्रुमाः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: गन्धर्व, अप्सराएँ, यक्ष, राक्षस, भूत, सर्प, पशु, पितर, सिद्ध, विद्याधर, चारण और वृक्ष भी उन्हीं में स्थित हैं।

श्लोक 6.14

अन्ये च विविधा जीवा जलस्थलनभौकसः । ग्रहर्क्षकेतवस्तारास्तडितः स्तनयित्नवः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जल, थल और आकाश के सभी जीव, ग्रह, नक्षत्र, धूमकेतु, तारे, बिजली और गर्जन भी उसी विराट के अन्तर्गत हैं।

श्लोक 6.15

सर्वं पुरुष एवेदं भूतं भव्यं भवच्च यत् । तेनेदमावृतं विश्वं वितस्तिमधितिष्ठति ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: भूत, भविष्य और वर्तमान—सब पुरुष ही हैं। वे विश्व को व्याप्त करके भी उससे परे विराजते हैं।

श्लोक 6.16

स्वधिष्ण्यं प्रतपन् प्राणो बहिश्च प्रतपत्यसौ । एवं विराजं प्रतपंस्तपत्यन्तर्बहिः पुमान् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे सूर्य अपने मण्डल और बाहर दोनों को प्रकाशित करता है, वैसे परम पुरुष विराट के भीतर-बाहर प्रकाशमान हैं।

श्लोक 6.17

सोऽमृतस्याभयस्येशो मर्त्यमन्नं यदत्यगात् । महिमैष ततो ब्रह्मन् पुरुषस्य दुरत्ययः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे नश्वर भोगों से परे अमृत और अभय के स्वामी हैं; उनकी यह महिमा अत्यन्त दुर्गम है।

श्लोक 6.18

पादेषु सर्वभूतानि पुंसः स्थितिपदो विदुः । अमृतं क्षेममभयं त्रिमूर्ध्नोऽधायि मूर्धसु ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: समस्त प्राणी उनके एक अंश में स्थित हैं; अमरता, सुरक्षा और अभय उनके उससे परे उच्च स्वरूप में प्रतिष्ठित हैं।

श्लोक 6.19

पादास्त्रयो बहिश्चासन्नप्रजानां य आश्रमाः । अन्तस्त्रिलोक्यास्त्वपरो गृहमेधोऽबृहद्व्रतः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: त्यागप्रधान तीन आश्रम उस ऊर्ध्वगति की ओर उन्मुख हैं; भोगासक्त गृहस्थ जीवन त्रिलोकी के सीमित क्षेत्र में बँधता है।

श्लोक 6.20

सृती विचक्रमे विष्वङ् साशनानशने उभे । यदविद्या च विद्या च पुरुषस्तूभयाश्रयः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: विद्या और अविद्या से प्राप्त त्याग तथा भोग की दोनों गतियों का आधार वही पुरुष हैं।

श्लोक 6.21

यस्मादण्डं विराड्जज्ञे भूतेन्द्रियगुणात्मकः । तद्द्रव्यमत्यगाद्विश्वं गोभिः सूर्य इवातपन् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिनसे भूत, इन्द्रिय और गुणयुक्त विराट ब्रह्माण्ड बना, वे उससे परे रहकर भी सूर्यकिरणों की तरह उसे प्रकाशित करते हैं।

श्लोक 6.22

यदास्य नाभ्यान्नलिनादहमासं महात्मनः । नाविदं यज्ञसम्भारान् पुरुषावयवादृते ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब मैं उनके नाभिकमल से उत्पन्न हुआ, तब भगवान के अंगों से पृथक कोई यज्ञसामग्री मुझे नहीं मिली।

श्लोक 6.23

तेषु यज्ञस्य पशवः सवनस्पतयः कुशाः । इदं च देवयजनं कालश्चोरुगुणान्वितः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञपशु, वनस्पति, कुश, यज्ञभूमि और यज्ञ के अनुकूल काल—सभी उन्हीं के अंगों में प्राप्त हुए।

श्लोक 6.24

वस्तून्योषधयः स्नेहा रसलोहमृदो जलम् । ऋचो यजूंषि सामानि चातुर्होत्रं च सत्तम ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: औषधियाँ, घृत, रस, धातु, मिट्टी, जल, ऋक्-यजुः-साम और चार प्रकार के ऋत्विजों का कार्य भी उन्हीं से उपलब्ध हुआ।

श्लोक 6.25

नामधेयानि मन्त्राश्च दक्षिणाश्च व्रतानि च । देवतानुक्रमः कल्पः सङ्कल्पस्तन्त्रमेव च ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवताओं के नाम, मन्त्र, दक्षिणा, व्रत, पूजाक्रम, विधि, संकल्प और अनुष्ठान की व्यवस्था भी उसी आश्रय से है।

श्लोक 6.26

गतयो मतयः श्रद्धा प्रायश्चित्तं समर्पणम् । पुरुषावयवैरेते सम्भाराः सम्भृता मया ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: साधन, भावनाएँ, श्रद्धा, प्रायश्चित्त और समर्पण—इन सभी यज्ञसम्भारों को मैंने विराट पुरुष के अंगों से ही जुटाया।

श्लोक 6.27

इति सम्भृतसम्भारः पुरुषावयवैरहम् । तमेव पुरुषं यज्ञं तेनैवायजमीश्वरम् ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार उन्हीं से मिली सामग्री द्वारा मैंने यज्ञस्वरूप उन्हीं परमेश्वर की आराधना की।

श्लोक 6.28

ततस्ते भ्रातर इमे प्रजानां पतयो नव । अयजन् व्यक्तमव्यक्तं पुरुषं सुसमाहिताः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर तुम्हारे नौ प्रजापति भाइयों ने एकाग्र भाव से व्यक्त-अव्यक्त के आश्रय उस पुरुष की उपासना की।

श्लोक 6.29

ततश्च मनवः काले ईजिरे ऋषयोऽपरे । पितरो विबुधा दैत्या मनुष्याः क्रतुभिर्विभुम् ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: समय-समय पर मनु, ऋषि, पितर, देवता, दैत्य और मनुष्य भी यज्ञों से उन्हीं की आराधना करते आए।

श्लोक 6.30

नारायणे भगवति तदिदं विश्वमाहितम् । गृहीतमायोरुगुणः सर्गादावगुणः स्वतः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह विश्व नारायण में स्थित है; वे स्वयं गुणातीत होकर सृष्टि आदि के लिए माया के गुण ग्रहण करते हैं।

श्लोक 6.31

सृजामि तन्नियुक्तोऽहं हरो हरति तद्वशः । विश्वं पुरुषरूपेण परिपाति त्रिशक्तिधृक् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी आज्ञा से मैं सृष्टि करता हूँ, उनके वश में शिव संहार करते हैं और वे स्वयं पुरुषरूप से पालन करते हैं।

श्लोक 6.32

इति तेऽभिहितं तात यथेदमनुपृच्छसि । नान्यद्भगवतः किञ्चिद्भाव्यं सदसदात्मकम् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारे प्रश्नों के अनुसार मैंने यही बताया कि कारण और कार्यरूप कोई वस्तु भगवान से स्वतंत्र नहीं है।

श्लोक 6.33

न भारती मेऽङ्ग मृषोपलक्ष्यते न वै क्वचिन्मे मनसो मृषा गतिः । न मे हृषीकाणि पतन्त्यसत्पथे यन्मे हृदौत्कण्ठ्यवता धृतो हरिः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रीहरि को उत्कण्ठापूर्ण हृदय में धारण करने से मेरी वाणी असत्य, मन मिथ्या चिन्तन और इन्द्रियाँ कुमार्ग की ओर नहीं जातीं।

श्लोक 6.34

सोऽहं समाम्नायमयस्तपोमयः प्रजापतीनामभिवन्दितः पतिः । आस्थाय योगं निपुणं समाहितः तं नाध्यगच्छं यत आत्मसम्भवः ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं वेद और तप का आश्रय तथा प्रजापतियों का पूज्य स्वामी होकर भी एकाग्र योग से अपने परम मूल का पूर्ण अन्त नहीं पा सका।

श्लोक 6.35

नतोऽस्म्यहं तच्चरणं समीयुषां भवच्छिदं स्वस्त्ययनं सुमङ्गलम् । यो ह्यात्ममायाविभवं स्म पर्यगात् यथा नभः स्वान्तमथापरे कुतः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं उनके मंगलकारी चरणों में प्रणाम करता हूँ, जो शरणागत का संसारबन्धन काटते हैं। उनकी माया की महिमा अपार है; अन्य लोग उसका अन्त कैसे पाएँ?

श्लोक 6.36

नाहं न यूयं यदृतां गतिं विदु- र्न वामदेवः किमुतापरे सुराः । तन्मायया मोहितबुद्धयस्त्विदं विनिर्मितं चात्मसमं विचक्ष्महे ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं, तुम और शिव भी भगवान की पूर्ण गति नहीं जानते; फिर अन्य देवताओं की क्या बात? माया से मोहित बुद्धि सृष्टि को अपने सीमित मान से आँकती है।

श्लोक 6.37

यस्यावतारकर्माणि गायन्ति ह्यस्मदादयः । न यं विदन्ति तत्त्वेन तस्मै भगवते नमः ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: हम जैसे लोग जिनकी अवतारलीलाओं का गान करते हुए भी उन्हें तत्त्वतः पूरी तरह नहीं जान पाते, उन भगवान को प्रणाम है।

श्लोक 6.38

स एष आद्यः पुरुषः कल्पे कल्पे सृजत्यजः । आत्माऽऽत्मन्यात्मनाऽऽत्मानं संयच्छति च पाति च ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: अजन्मा आदि पुरुष प्रत्येक कल्प में अपने ही आश्रय और शक्ति से जगत रचते, सँभालते और समेटते हैं।

श्लोक 6.39

विशुद्धं केवलं ज्ञानं प्रत्यक् सम्यगवस्थितम् । सत्यं पूर्णमनाद्यन्तं निर्गुणं नित्यमद्वयम् ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनका परम स्वरूप शुद्ध ज्ञान, अन्तरात्मा में स्थित सत्य, पूर्ण, अनादि-अनन्त, गुणातीत, नित्य और अद्वैत है।

श्लोक 6.40

ऋषे विदन्ति मुनयः प्रशान्तात्मेन्द्रियाशयाः । यदा तदेवासत्तर्कैस्तिरोधीयेत विप्लुतम् ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: शान्त मन और संयत इन्द्रियों वाले मुनि उन्हें अनुभव करते हैं; असार तर्क और चंचलता से वही अनुभूति ढक जाती है।

श्लोक 6.41

आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य कालः स्वभावः सदसन्मनश्च । द्रव्यं विकारो गुण इन्द्रियाणि विराट् स्वराट् स्थास्नु चरिष्णु भूम्नः ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुरुषावतार, काल, स्वभाव, कारण-कार्य, मन, द्रव्य, गुण, इन्द्रियाँ, विराट और सब चराचर—सभी परमात्मा के अधीन हैं।

श्लोक 6.42

अहं भवो यज्ञ इमे प्रजेशा दक्षादयो ये भवदादयश्च । स्वर्लोकपालाः खगलोकपाला नृलोकपालास्तललोकपालाः ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं, शिव, यज्ञपुरुष, दक्ष आदि प्रजापति, नारदादि ऋषि और स्वर्ग, आकाश, पृथ्वी तथा अधोलोक के अधिपति उन्हीं की विभूतियाँ हैं।

श्लोक 6.43

गन्धर्वविद्याधरचारणेशा ये यक्षरक्षोरगनागनाथाः । ये वा ऋषीणामृषभाः पितॄणां दैत्येन्द्रसिद्धेश्वरदानवेन्द्राः । अन्ये च ये प्रेतपिशाचभूत- कूष्माण्डयादोमृगपक्ष्यधीशाः ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: गन्धर्व, विद्याधर, चारण, यक्ष, नाग, पितर, दैत्य, सिद्ध, भूत, जलचर, पशु और पक्षियों के सभी अधिपति भी उसी शक्ति से समर्थ हैं।

श्लोक 6.44

यत्किञ्च लोके भगवन् महस्व- दोजःसहस्वद्बलवत्क्षमावत् । श्रीह्रीविभूत्यात्मवदद्भुतार्णं तत्त्वं परं रूपवदस्वरूपम् ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जगत में जो तेज, ओज, बल, क्षमा, शोभा, विनय, ऐश्वर्य, आत्मसंयम और अद्भुत महिमा है, उसे परम पुरुष की अभिव्यक्ति समझो।

श्लोक 6.45

प्राधान्यतो यान् ऋष आमनन्ति लीलावतारान् पुरुषस्य भूम्नः । आपीयतां कर्णकषायशोषा- ननुक्रमिष्ये त इमान् सुपेशान् ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अब मैं उन प्रमुख और मनोहर लीलावतारों का क्रम कहूँगा, जिनका श्रवण कानों और चित्त का मल दूर करता है।

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 6 समाप्त ॥

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द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 7

प्रमुख अवतारों का वर्णन और माया से मुक्ति

श्लोक 7.1

ब्रह्मोवाच । यत्रोद्यतः क्षितितलोद्धरणाय बिभ्रत्- क्रौडीं तनुं सकलयज्ञमयीमनन्तः । अन्तर्महार्णव उपागतमादिदैत्यं तं दंष्ट्रयाद्रिमिव वज्रधरो ददार ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्माजी बोले—पृथ्वी के उद्धार के लिए भगवान ने यज्ञमय वराह रूप धारण किया और समुद्र में हिरण्याक्ष को दंष्ट्रा से वैसे विदीर्ण किया, जैसे इन्द्र पर्वत को वज्र से।

श्लोक 7.2

जातो रुचेरजनयत्सुयमान् सुयज्ञ आकूतिसूनुरमरानथ दक्षिणायाम् । लोकत्रयस्य महतीमहरद्यदार्तिं स्वायम्भुवेन मनुना हरिरित्यनूक्तः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: रुचि और आकूति के पुत्र सुयज्ञ ने दक्षिणा से देवपुत्र उत्पन्न किए। तीनों लोकों की पीड़ा हरने के कारण स्वायम्भुव मनु ने उन्हें हरि कहा।

श्लोक 7.3

जज्ञे च कर्दमगृहे द्विज देवहूत्यां स्त्रीभिः समं नवभिरात्मगतिं स्वमात्रे । ऊचे ययाऽऽत्मशमलं गुणसङ्गपङ्क- मस्मिन्विधूय कपिलस्य गतिं प्रपेदे ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: कर्दम और देवहूति के घर नौ बहनों सहित कपिल अवतरित हुए। उनके आत्मज्ञानोपदेश से माता ने गुणासक्ति का मल मिटाकर परमगति पाई।

श्लोक 7.4

अत्रेरपत्यमभिकाङ्क्षत आह तुष्टो दत्तो मयाहमिति यद्भगवान् स दत्तः । यत्पादपङ्कजपरागपवित्रदेहा योगर्द्धिमापुरुभयीं यदुहैहयाद्याः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: अत्रि की पुत्रकामना से प्रसन्न भगवान ने स्वयं को उन्हें दिया, इसलिए दत्तात्रेय कहलाए; उनके चरणरज से यदु और हैहय आदि ने योगसम्पदा पाई।

श्लोक 7.5

तप्तं तपो विविधलोकसिसृक्षया मे आदौ सनात्स्वतपसः स चतुःसनोऽभूत् । प्राक्कल्पसम्प्लवविनष्टमिहात्मतत्त्वं सम्यग्जगाद मुनयो यदचक्षतात्मन् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरी सृष्टि की तपस्या में भगवान सनकादि चार कुमारों के रूप में प्रकट हुए और प्रलय से विस्मृत आत्मतत्त्व पुनः बताया।

श्लोक 7.6

धर्मस्य दक्षदुहितर्यजनिष्ट मूर्त्यां नारायणो नर इति स्वतपःप्रभावः । दृष्ट्वाऽऽत्मनो भगवतो नियमावलोपं देव्यस्त्वनङ्गपृतना घटितुं न शेकुः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: धर्म और दक्षकन्या मूर्ति के पुत्र नर-नारायण ने तप की महिमा प्रकट की। कामदेव की सेना और अप्सराएँ उनका संयम नहीं तोड़ सकीं।

श्लोक 7.7

कामं दहन्ति कृतिनो ननु रोषदृष्ट्या रोषं दहन्तमुत ते न दहन्त्यसह्यम् । सोऽयं यदन्तरमलं प्रविशन् बिभेति कामः कथं नु पुनरस्य मनः श्रयेत ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: तपस्वी क्रोध से काम को जला सकते हैं, पर अपने क्रोध को जीतना कठिन है। नर-नारायण के निकट क्रोध भी प्रवेश से डरता है; काम उन्हें कैसे विचलित करे?

श्लोक 7.8

विद्धः सपत्न्युदितपत्रिभिरन्ति राज्ञो बालोऽपि सन्नुपगतस्तपसे वनानि । तस्मा अदाद्ध्रुवगतिं गृणते प्रसन्नो दिव्याः स्तुवन्ति मुनयो यदुपर्यधस्तात् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: सौतेली माता के कटु वचनों से व्यथित बालक ध्रुव वन में तप करने गए। प्रसन्न भगवान ने उन्हें ध्रुवपद दिया, जिसकी ऋषि-देवता स्तुति करते हैं।

श्लोक 7.9

यद्वेनमुत्पथगतं द्विजवाक्यवज्र- विप्लुष्टपौरुषभगं निरये पतन्तम् । त्रात्वार्थितो जगति पुत्रपदं च लेभे दुग्धा वसूनि वसुधा सकलानि येन ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: दुराचारी वेन के विनाश के बाद भगवान पृथु रूप में उसके पुत्र बने, उसका उद्धार किया और पृथ्वी से लोकहित की सम्पदा प्राप्त कराई।

श्लोक 7.10

नाभेरसावृषभ आस सुदेविसूनु- र्यो वै चचार समदृग्जडयोगचर्याम् । यत्पारमहंस्यमृषयः पदमामनन्ति स्वस्थः प्रशान्तकरणः परिमुक्तसङ्गः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: नाभि और सुदेवी के पुत्र ऋषभ ने समदृष्टि, शान्त इन्द्रियों और अनासक्ति से परम अवधूतचर्या की; ऋषि उसे परमहंस पद कहते हैं।

श्लोक 7.11

सत्रे ममास भगवान् हयशीरषाथो साक्षात्स यज्ञपुरुषस्तपनीयवर्णः । छन्दोमयो मखमयोऽखिलदेवताऽऽत्मा वाचो बभूवुरुशतीः श्वसतोऽस्य नस्तः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरे यज्ञ में स्वर्णमय हयग्रीव रूप प्रकट हुआ। वे वेदमय यज्ञपुरुष और सर्वदेवस्वरूप हैं; उनकी श्वास से वेदवाणी प्रकट हुई।

श्लोक 7.12

मत्स्यो युगान्तसमये मनुनोपलब्धः क्षोणीमयो निखिलजीवनिकायकेतः । विस्रंसितानुरुभये सलिले मुखान्मे आदाय तत्र विजहार ह वेदमार्गान् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: युगान्त के भयावह जल में मत्स्यरूप भगवान मनु को मिले। उन्होंने जीवसमूह और मेरे मुख से निकले वेदों की रक्षा की।

श्लोक 7.13

क्षीरोदधावमरदानवयूथपाना- मुन्मथ्नताममृतलब्धय आदिदेवः । पृष्ठेन कच्छपवपुर्विदधार गोत्रं निद्राक्षणोऽद्रिपरिवर्तकषाणकण्डूः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अमृत के लिए समुद्रमन्थन करते देवों-असुरों को सहारा देने भगवान कूर्म बने और पीठ पर मन्दराचल धारण किया।

श्लोक 7.14

त्रैविष्टपोरुभयहा स नृसिंहरूपं कृत्वा भ्रमद्भ्रुकुटिदंष्ट्रकरालवक्त्रम् । दैत्येन्द्रमाशु गदयाभिपतन्तमारा- दूरौ निपात्य विददार नखैः स्फुरन्तम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवताओं का भय हरने वाले नरसिंह ने उग्र मुख और दंष्ट्राओं सहित प्रकट होकर आक्रमणकारी हिरण्यकशिपु को जाँघों पर रखकर नखों से विदीर्ण किया।

श्लोक 7.15

अन्तःसरस्युरुबलेन पदे गृहीतो ग्राहेण यूथपतिरम्बुजहस्त आर्तः । आहेदमादिपुरुषाखिललोकनाथ तीर्थश्रवः श्रवणमङ्गलनामधेय ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: ग्राह के पकड़ने पर संकटग्रस्त गजेन्द्र ने हाथ में कमल लेकर आदिपुरुष, विश्वनाथ और मंगलनाम भगवान को पुकारा।

श्लोक 7.16

श्रुत्वा हरिस्तमरणार्थिनमप्रमेय- श्चक्रायुधः पतगराजभुजाधिरूढः । चक्रेण नक्रवदनं विनिपाट्य तस्मा- द्धस्ते प्रगृह्य भगवान् कृपयोज्जहार ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसकी शरणागति सुनकर चक्रधारी श्रीहरि गरुड़ पर आए, ग्राह का मुख चीरकर दयापूर्वक गजेन्द्र को हाथ पकड़कर छुड़ाया।

श्लोक 7.17

ज्यायान् गुणैरवरजोऽप्यदितेः सुतानां लोकान् विचक्रम इमान् यदथाधियज्ञः । क्ष्मां वामनेन जगृहे त्रिपदच्छलेन याच्ञामृते पथि चरन् प्रभुभिर्न चाल्यः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अदिति के छोटे पुत्र वामन गुणों में सबसे बड़े थे। उन्होंने तीन पग भूमि माँगकर लोक नाप लिए; दानवीरों से भी उन्होंने याचना द्वारा ही कार्य किया।

श्लोक 7.18

नार्थो बलेरयमुरुक्रमपादशौच- मापः शिखाधृतवतो विबुधाधिपत्यम् । यो वै प्रतिश्रुतमृते न चिकीर्षदन्य- दात्मानमङ्ग स शिरसा हरयेऽभिमेने ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान का चरणोदक सिर पर रखने वाले बलि के लिए स्वर्गराज्य प्रधान नहीं था; उन्होंने वचन निभाने के लिए अपना मस्तक और स्वयं को भगवान को अर्पित किया।

श्लोक 7.19

तुभ्यं च नारद भृशं भगवान् विवृद्ध- भावेन साधु परितुष्ट उवाच योगम् । ज्ञानं च भागवतमात्मसतत्त्वदीपं यद्वासुदेवशरणा विदुरञ्जसैव ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे नारद, तुम्हारे बढ़े हुए प्रेम से प्रसन्न भगवान ने तुम्हें भक्तियोग और आत्मतत्त्व प्रकाशित करने वाला भागवतज्ञान दिया।

श्लोक 7.20

चक्रं च दिक्ष्वविहतं दशसु स्वतेजो मन्वन्तरेषु मनुवंशधरो बिभर्ति । दुष्टेषु राजसु दमं व्यदधात्स्वकीर्तिं सत्ये त्रिपृष्ठ उशतीं प्रथयंश्चरित्रैः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: मन्वन्तरों में मनुवंशी रूप से वे शासनशक्ति धारण करके दुष्ट राजाओं का दमन करते और सत्य चरित्रों से कीर्ति फैलाते हैं।

श्लोक 7.21

धन्वन्तरिश्च भगवान् स्वयमेव कीर्ति- र्नाम्ना नृणां पुरुरुजां रुज आशु हन्ति । यज्ञे च भागममृतायुरवावरुन्ध- मायुष्च वेदमनुशास्त्यवतीर्य लोके ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: धन्वन्तरि रूप में भगवान ने आयुर्वेद का उपदेश दिया, अमृत का अधिकार प्रकट किया और रोगों से पीड़ित जीवों के कल्याण का मार्ग बताया।

श्लोक 7.22

क्षत्रं क्षयाय विधिनोपभृतं महात्मा ब्रह्मध्रुगुज्झितपथं नरकार्तिलिप्सु । उद्धन्त्यसाववनिकण्टकमुग्रवीर्यः त्रिःसप्तकृत्व उरुधारपरश्वधेन ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: परशुराम रूप में उन्होंने धर्मत्यागी, ब्राह्मणद्रोही और पृथ्वी का भार बने अत्याचारी क्षत्रियों का इक्कीस बार दमन किया।

श्लोक 7.23

अस्मत्प्रसादसुमुखः कलया कलेश इक्ष्वाकुवंश अवतीर्य गुरोर्निदेशे । तिष्ठन् वनं सदयितानुज आविवेश यस्मिन् विरुध्य दशकन्धर आर्तिमार्च्छत् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवताओं पर कृपा करके भगवान इक्ष्वाकुवंश में राम रूप में आए। पिता की आज्ञा से पत्नी और भाई सहित वन गए; उनसे वैर करके रावण विपत्ति में पड़ा।

श्लोक 7.24

यस्मा अदादुदधिरूढभयाङ्गवेपो मार्गं सपद्यरिपुरं हरवद्दिधक्षोः । दूरे सुहृन्मथितरोषसुशोणदृष्ट्या तातप्यमानमकरोरगनक्रचक्रः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रिय सीता के हरण से उत्पन्न धर्मयुक्त रोष में भगवान की दृष्टि से समुद्र के जीव व्याकुल हुए और समुद्र ने उन्हें मार्ग प्रदान किया।

श्लोक 7.25

वक्षःस्थलस्पर्शरुग्णमहेन्द्रवाह- दन्तैर्विडम्बितककुब्जुष ऊढहासम् । सद्योऽसुभिः सह विनेष्यति दारहर्तु- र्विस्फूर्जितैर्धनुष उच्चरतोऽधिसैन्ये ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्र के हाथी के दाँतों को भी अपने वक्ष से तोड़ने वाला गर्वित रावण युद्ध में राम के धनुष की टंकार और बाणों से प्राण तथा अभिमान खो बैठा।

श्लोक 7.26

भूमेः सुरेतरवरूथविमर्दितायाः क्लेशव्ययाय कलया सितकृष्णकेशः । जातः करिष्यति जनानुपलक्ष्यमार्गः कर्माणि चात्ममहिमोपनिबन्धनानि ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: असुरसेनाओं से पीड़ित पृथ्वी का भार दूर करने भगवान बलराम और कृष्ण रूप में आए; उनकी लीला का मार्ग सामान्य समझ से परे है।

श्लोक 7.27

तोकेन जीवहरणं यदुलूकिकायाः त्रैमासिकस्य च पदा शकटोऽपवृत्तः । यद्रिङ्गतान्तरगतेन दिविस्पृशोर्वा उन्मूलनं त्वितरथार्जुनयोर्न भाव्यम् ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: बालकृष्ण ने पूतना का प्राणहरण, तीन महीने में शकट का उलटना और घुटनों से चलते हुए यमलार्जुन वृक्षों का उखाड़ना जैसी असाधारण लीलाएँ कीं।

श्लोक 7.28

यद्वै व्रजे व्रजपशून् विषतोयपीथान् पालांस्त्वजीवयदनुग्रहदृष्टिवृष्ट्या । तच्छुद्धयेऽतिविषवीर्यविलोलजिह्व- मुच्चाटयिष्यदुरगं विहरन् ह्रदिन्याम् ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: विषैला जल पीने से संकट में पड़े ग्वालबालों और पशुओं को उन्होंने कृपादृष्टि से जीवन दिया तथा यमुना शुद्ध करने कालिय का दमन किया।

श्लोक 7.29

तत्कर्म दिव्यमिव यन्निशि निःशयानं दावाग्निना शुचिवने परिदह्यमाने । उन्नेष्यति व्रजमतोऽवसितान्तकालं नेत्रे पिधाय्य सबलोऽनधिगम्यवीर्यः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: वन में रात्रि की दावाग्नि से घिरे व्रज को भगवान ने बलराम सहित बचाया; उनके अगाध सामर्थ्य के सामने ग्वालों को केवल आँखें बन्द करनी पड़ीं।

श्लोक 7.30

गृह्णीत यद्यदुपबन्धममुष्य माता शुल्बं सुतस्य न तु तत्तदमुष्य माति । यज्जृम्भतोऽस्य वदने भुवनानि गोपी संवीक्ष्य शङ्कितमनाः प्रतिबोधिताऽऽसीत् ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: माता यशोदा जितनी रस्सी लातीं, बाँधने को छोटी पड़ती। एक बार उनके मुख में विश्व देखकर माता चकित हुईं और भगवान की माया से फिर मातृभाव में लौटीं।

श्लोक 7.31

नन्दं च मोक्ष्यति भयाद्वरुणस्य पाशा- द्गोपान् बिलेषु पिहितान् मयसूनुना च । अह्न्यापृतं निशि शयानमतिश्रमेण लोकं विकुण्ठमुपनेष्यति गोकुलं स्म ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने नन्द को वरुण के बन्धन से और ग्वालबालों को व्योमासुर की गुफा से छुड़ाया; गोकुलवासियों को अपने दिव्य लोक का दर्शन कराया।

श्लोक 7.32

गोपैर्मखे प्रतिहते व्रजविप्लवाय देवेऽभिवर्षति पशून् कृपया रिरक्षुः । धर्तोच्छिलीन्ध्रमिव सप्तदिनानि सप्त- वर्षो महीध्रमनघैककरे सलीलम् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्र की प्रचण्ड वर्षा से पशुओं और व्रज की रक्षा करने सात वर्षीय कृष्ण ने गोवर्धन को एक हाथ पर सात दिन छत्र की तरह धारण किया।

श्लोक 7.33

क्रीडन् वने निशि निशाकररश्मिगौर्यां रासोन्मुखः कलपदायतमूर्च्छितेन । उद्दीपितस्मररुजां व्रजभृद्वधूनां हर्तुर्हरिष्यति शिरो धनदानुगस्य ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: चाँदनी रात्रि में रासलीला के समय गोपियों को हरने वाले कुबेर के अनुचर शङ्खचूड़ का उन्होंने वध किया।

श्लोक 7.34

ये च प्रलम्बखरदर्दुरकेश्यरिष्ट- मल्लेभकंसयवनाः कुजपौण्ड्रकाद्याः । अन्ये च शाल्वकपिबल्वलदन्तवक्त्र- सप्तोक्षशम्बरविदूरथरुक्मिमुख्याः ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रलम्ब, धेनुक, बक, केशी, अरिष्ट, मल्ल, कुवलयापीड, कंस, कालयवन, नरकासुर, पौण्ड्रक, शाल्व, द्विविद, बल्वल, दन्तवक्त्र और अन्य दुष्टों का नाश हुआ।

श्लोक 7.35

ये वा मृधे समितिशालिन आत्तचापाः काम्बोजमत्स्यकुरुकैकयसृञ्जयाद्याः । यास्यन्त्यदर्शनमलं बलपार्थभीम- व्याजाह्वयेन हरिणा निलयं तदीयम् ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: काम्बोज, मत्स्य, कुरु, कैकय और सृञ्जय आदि के युद्धवीर भी बलराम, अर्जुन और भीम आदि को निमित्त बनाकर भगवान की व्यवस्था में अन्त को प्राप्त हुए।

श्लोक 7.36

कालेन मीलितधियामवमृश्य नॄणां स्तोकायुषां स्वनिगमो बत दूरपारः । आविर्हितस्त्वनुयुगं स हि सत्यवत्यां वेदद्रुमं विटपशो विभजिष्यति स्म ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: अल्पायु मनुष्यों की घटती समझ देखकर भगवान सत्यवतीपुत्र व्यास रूप में प्रकट हुए और विशाल वेदवृक्ष को शाखाओं में विभाजित किया।

श्लोक 7.37

देवद्विषां निगमवर्त्मनि निष्ठितानां पूर्भिर्मयेन विहिताभिरदृश्यतूर्भिः । लोकान् घ्नतां मतिविमोहमतिप्रलोभं वेषं विधाय बहु भाष्यत औपधर्म्यम् ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक अवतार में वे वेदमार्ग का दुरुपयोग करके लोकों को सताने वालों की बुद्धि मोड़ने के लिए ऐसा उपदेश देंगे, जिससे उनके हिंसक आग्रह छूटें।

श्लोक 7.38

यर्ह्यालयेष्वपि सतां न हरेः कथाः स्युः पाखण्डिनो द्विजजना वृषला नृदेवाः । स्वाहा स्वधा वषडिति स्म गिरो न यत्र शास्ता भविष्यति कलेर्भगवान् युगान्ते ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: युगान्त में जब हरिकथा, वैदिक अनुष्ठान और धर्मरक्षण लुप्तप्राय होंगे, तब भगवान कल्कि रूप में अधर्मियों का दमन करेंगे।

श्लोक 7.39

सर्गे तपोऽहमृषयो नव ये प्रजेशाः स्थाने च धर्ममखमन्वमरावनीशाः । अन्ते त्वधर्महरमन्युवशासुराद्या मायाविभूतय इमाः पुरुशक्तिभाजः ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सृष्टि में ब्रह्मा और प्रजापति, पालन में धर्म, यज्ञ, मनु, देव और राजा तथा संहार में रुद्रादि शक्तियाँ—सभी उनकी मायाविभूतियाँ हैं।

श्लोक 7.40

विष्णोर्नु वीर्यगणनां कतमोऽर्हतीह यः पार्थिवान्यपि कविर्विममे रजांसि । चस्कम्भ यः स्वरहसास्खलता त्रिपृष्ठं यस्मात्त्रिसाम्यसदनादुरुकम्पयानम् ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी की धूल के कण गिन सकने वाला भी विष्णु का पराक्रम कैसे गिने? उन्होंने अपनी अविचल शक्ति से लोकों को स्थिर रखा।

श्लोक 7.41

नान्तं विदाम्यहममी मुनयोऽग्रजास्ते मायाबलस्य पुरुषस्य कुतोऽपरे ये । गायन् गुणान् दशशतानन आदिदेवः शेषोऽधुनापि समवस्यति नास्य पारम् ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं और मुझसे पहले के ऋषि भी उनकी मायाशक्ति का अन्त नहीं जानते। सहस्रमुख शेष आज भी गुणगान करते हुए पार नहीं पा सके।

श्लोक 7.42

येषां स एव भगवान् दययेदनन्तः सर्वात्मनाऽऽश्रितपदो यदि निर्व्यलीकम् । ते दुस्तरामतितरन्ति च देवमायां नैषां ममाहमिति धीः श्वश‍ृगालभक्ष्ये ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो निष्कपट होकर सर्वात्मभाव से उनके चरणों का आश्रय लेते हैं, उन पर अनन्त भगवान कृपा करते हैं; वे देहाभिमान छोड़कर माया पार करते हैं।

श्लोक 7.43

वेदाहमङ्ग परमस्य हि योगमायां यूयं भवश्च भगवानथ दैत्यवर्यः । पत्नी मनोः स च मनुश्च तदात्मजाश्च प्राचीनबर्हिरृभुरङ्ग उत ध्रुवश्च ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं, तुम, शिव, प्रह्लाद, मनु, शतरूपा, मनुपुत्र, प्राचीनबर्हि, ऋभु, अङ्ग और ध्रुव उनकी योगमाया का अनुभव जानते हैं।

श्लोक 7.44

इक्ष्वाकुरैलमुचुकुन्दविदेहगाधि- रघ्वम्बरीषसगरा गयनाहुषाद्याः । मान्धात्रलर्कशतधन्वनुरन्तिदेवा देवव्रतो बलिरमूर्त्तरयो दिलीपः ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: इक्ष्वाकु, पुरूरवा, मुचुकुन्द, जनक, गाधि, रघु, अम्बरीष, सगर, गय, नहुष, मान्धाता, अलर्क, रन्तिदेव, भीष्म, बलि और दिलीप आदि भी उसके ज्ञाता हैं।

श्लोक 7.45

सौभर्युतङ्कशिबिदेवलपिप्पलाद- सारस्वतोद्धवपराशरभूरिषेणाः । येऽन्ये विभीषणहनूमदुपेन्द्रदत्त- पार्थार्ष्टिषेणविदुरश्रुतदेववर्याः ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: सौभरि, उतङ्क, शिबि, देवल, पिप्पलाद, सारस्वत, उद्धव, पराशर, भूरिषेण, विभीषण, हनुमान, दत्त, अर्जुन, विदुर और श्रुतदेव आदि भी भगवान के आश्रित हैं।

श्लोक 7.46

ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां स्त्रीशूद्रहूणशबरा अपि पापजीवाः । यद्यद्भुतक्रमपरायणशीलशिक्षा- स्तिर्यग्जना अपि किमु श्रुतधारणा ये ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की शरण और भक्ति की शिक्षा से कोई भी जनसमूह उनकी माया पार कर सकता है; पशुयोनि तक में भक्ति सम्भव है, फिर श्रुतिज्ञों की क्या बात?

श्लोक 7.47

शश्वत्प्रशान्तमभयं प्रतिबोधमात्रं शुद्धं समं सदसतः परमात्मतत्त्वम् । शब्दो न यत्र पुरुकारकवान् क्रियार्थो माया परैत्यभिमुखे च विलज्जमाना ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: परमात्मतत्त्व नित्य शान्त, निर्भय, शुद्ध चेतन, सम और कारण-कार्य से परे है। उसके सामने कर्मफलप्रधान शब्द और माया की पकड़ नहीं रहती।

श्लोक 7.48

तद्वै पदं भगवतः परमस्य पुंसो ब्रह्मेति यद्विदुरजस्रसुखं विशोकम् । सध्र्यङ् नियम्य यतयो यमकर्तहेतिं जह्युः स्वराडिव निपानखनित्रमिन्द्रः ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसी नित्यसुख और शोकविहीन भगवत्पद को ब्रह्म कहते हैं। उसे पाकर संयमी साधक अनावश्यक साधन छोड़ते हैं, जैसे जल मिलने पर कुआँ खोदने का उपकरण छोड़ दिया जाए।

श्लोक 7.49

स श्रेयसामपि विभुर्भगवान् यतोऽस्य भावस्वभावविहितस्य सतः प्रसिद्धिः । देहे स्वधातुविगमेऽनुविशीर्यमाणे व्योमेव तत्र पुरुषो न विशीर्यतेऽजः ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान समस्त कल्याण के स्वामी हैं। शरीर के तत्त्व बिखरने पर भी अजन्मा आत्मा नहीं बिखरती, जैसे घट के टूटने पर आकाश नष्ट नहीं होता।

श्लोक 7.50

सोऽयं तेऽभिहितस्तात भगवान् विश्वभावनः । समासेन हरेर्नान्यदन्यस्मात्सदसच्च यत् ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: तात, विश्व के पालक भगवान की यह महिमा संक्षेप में कही। कारण-कार्यरूप सब उन्हीं पर आश्रित है, स्वतंत्र कुछ नहीं।

श्लोक 7.51

इदं भागवतं नाम यन्मे भगवतोदितम् । सङ्ग्रहोऽयं विभूतीनां त्वमेतद्विपुलीकुरु ॥ ५१॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान से प्राप्त यह भागवत उनकी विभूतियों का संक्षिप्त संग्रह है; तुम इसका विस्तार करो।

श्लोक 7.52

यथा हरौ भगवति नृणां भक्तिर्भविष्यति । सर्वात्मन्यखिलाधारे इति सङ्कल्प्य वर्णय ॥ ५२॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसा संकल्प करके वर्णन करो कि मनुष्यों में सबके आत्मा और आधार श्रीहरि की भक्ति जागे।

श्लोक 7.53

मायां वर्णयतोऽमुष्य ईश्वरस्यानुमोदतः । श‍ृण्वतः श्रद्धया नित्यं माययाऽऽत्मा न मुह्यति ॥ ५३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो भगवान की लीला का वर्णन, अनुमोदन और श्रद्धापूर्वक नित्य श्रवण करता है, उसकी आत्मबुद्धि माया से मोहित नहीं होती।

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 7 समाप्त ॥

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द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 8

परीक्षित की व्यापक तत्त्वजिज्ञासा

श्लोक 8.1

राजोवाच । ब्रह्मणा चोदितो ब्रह्मन् गुणाख्यानेऽगुणस्य च । यस्मै यस्मै यथा प्राह नारदो देवदर्शनः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा ने पूछा—ब्रह्मा की आज्ञा पाकर देवदर्शी नारद ने गुणातीत भगवान के गुणों का उपदेश किन-किन को और कैसे दिया?

श्लोक 8.2

एतद्वेदितुमिच्छामि तत्त्वं वेदविदां वर । हरेरद्भुतवीर्यस्य कथा लोकसुमङ्गलाः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे वेदज्ञश्रेष्ठ, मैं यह तत्त्व जानना चाहता हूँ; अद्भुत सामर्थ्य वाले श्रीहरि की कथाएँ समस्त लोकों का मंगल करती हैं।

श्लोक 8.3

कथयस्व महाभाग यथाहमखिलात्मनि । कृष्णे निवेश्य निःसङ्गं मनस्त्यक्ष्ये कलेवरम् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: कृपा करके ऐसी कथा कहिए कि मैं अनासक्त मन को सर्वात्मा श्रीकृष्ण में लगाकर शरीर छोड़ सकूँ।

श्लोक 8.4

श‍ृण्वतः श्रद्धया नित्यं गृणतश्च स्वचेष्टितम् । कालेन नातिदीर्घेण भगवान् विशते हृदि ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रद्धा से भगवान की लीला नित्य सुनने और कहने वाले के हृदय में वे शीघ्र प्रवेश करते हैं।

श्लोक 8.5

प्रविष्टः कर्णरन्ध्रेण स्वानां भावसरोरुहम् । धुनोति शमलं कृष्णः सलिलस्य यथा शरत् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: कानों द्वारा हृदयकमल में प्रवेश करके कृष्ण उसका मल वैसे मिटाते हैं, जैसे शरदऋतु जल को निर्मल करती है।

श्लोक 8.6

धौतात्मा पुरुषः कृष्णपादमूलं न मुञ्चति । मुक्तसर्वपरिक्लेशः पान्थः स्वशरणं यथा ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: चित्त शुद्ध होने पर मनुष्य उनके चरण नहीं छोड़ता, जैसे यात्रा के कष्टों से मुक्त पथिक अपना घर पाकर विश्राम करता है।

श्लोक 8.7

यदधातुमतो ब्रह्मन् देहारम्भोऽस्य धातुभिः । यदृच्छया हेतुना वा भवन्तो जानते यथा ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अशरीरी जीव को भौतिक तत्त्वों से शरीर कैसे मिलता है—क्या यह अपने-आप होता है या किसी कारण से?

श्लोक 8.8

आसीद्यदुदरात्पद्मं लोकसंस्थानलक्षणम् । यावानयं वै पुरुष इयत्तावयवैः पृथक् । तावानसाविति प्रोक्तः संस्थावयववानिव ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिस पुरुष की नाभि से लोकव्यवस्था का कमल निकला, उसका विराट स्वरूप और विभिन्न अंगों का विस्तार कैसे समझा जाए?

श्लोक 8.9

अजः सृजति भूतानि भूतात्मा यदनुग्रहात् । ददृशे येन तद्रूपं नाभिपद्मसमुद्भवः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिनकी कृपा से ब्रह्मा प्राणियों की रचना करते हैं, उस नाभिकमल से उत्पन्न ब्रह्मा ने भगवान का दर्शन कैसे किया?

श्लोक 8.10

स चापि यत्र पुरुषो विश्वस्थित्युद्भवाप्ययः । मुक्त्वाऽऽत्ममायां मायेशः शेते सर्वगुहाशयः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: सृष्टि, पालन और संहार के आधार वह मायापति अपनी माया से परे किस स्वरूप में विश्राम करते हैं?

श्लोक 8.11

पुरुषावयवैर्लोकाः सपालाः पूर्वकल्पिताः । लोकैरमुष्यावयवाः सपालैरिति शुश्रुम ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: कहीं भगवान के अंगों से लोकों की और कहीं लोकों से उनके अंगों की कल्पना कही जाती है; इन दोनों का संबंध समझाइए।

श्लोक 8.12

यावान् कल्पो विकल्पो वा यथा कालोऽनुमीयते । भूतभव्यभवच्छब्द आयुर्मानं च यत्सतः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: कल्प और उसके विभाग कितने हैं, काल कैसे जाना जाता है तथा भूत-वर्तमान-भविष्य और विभिन्न आयुओं का माप क्या है?

श्लोक 8.13

कालस्यानुगतिर्या तु लक्ष्यतेऽण्वी बृहत्यपि । यावत्यः कर्मगतयो यादृशीर्द्विजसत्तम ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: काल की सूक्ष्म और विशाल गति कैसी है तथा कर्मानुसार जीवों की कितनी प्रकार की गतियाँ होती हैं?

श्लोक 8.14

यस्मिन् कर्मसमावायो यथा येनोपगृह्यते । गुणानां गुणिनां चैव परिणाममभीप्सताम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जीव के कर्म कैसे संचित होकर फल देते हैं और गुणों से सम्बद्ध जीवों में परिवर्तन कैसे होता है?

श्लोक 8.15

भूपातालककुब्व्योम ग्रहनक्षत्रभूभृताम् । सरित्समुद्रद्वीपानां सम्भवश्चैतदोकसाम् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी, पाताल, दिशाएँ, आकाश, ग्रह, नक्षत्र, पर्वत, नदियाँ, समुद्र, द्वीप और उनके निवासियों की उत्पत्ति बताइए।

श्लोक 8.16

प्रमाणमण्डकोशस्य बाह्याभ्यन्तरभेदतः । महतां चानुचरितं वर्णाश्रमविनिश्चयः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्माण्ड के भीतर-बाहर का विस्तार, महात्माओं के चरित्र और वर्णाश्रमधर्म का निश्चय समझाइए।

श्लोक 8.17

युगानि युगमानं च धर्मो यश्च युगे युगे । अवतारानुचरितं यदाश्चर्यतमं हरेः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: युगों के नाम, उनका परिमाण, प्रत्येक युग का धर्म और भगवान के अद्भुत अवतारचरित्र बताइए।

श्लोक 8.18

नृणां साधारणो धर्मः सविशेषश्च यादृशः । श्रेणीनां राजर्षीणां च धर्मः कृच्छ्रेषु जीवताम् ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्यों का सामान्य तथा विशेष धर्म, व्यवसायसमूहों, राजर्षियों और संकट में जीवन बिताने वालों के कर्तव्य क्या हैं?

श्लोक 8.19

तत्त्वानां परिसङ्ख्यानं लक्षणं हेतुलक्षणम् । पुरुषाराधनविधिर्योगस्याध्यात्मिकस्य च ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: तत्त्वों की संख्या, लक्षण, कारण, भगवान की आराधना और आत्मयोग की विधि बताइए।

श्लोक 8.20

योगेश्वरैश्वर्यगतिर्लिङ्गभङ्गस्तु योगिनाम् । वेदोपवेदधर्माणामितिहासपुराणयोः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: योगियों की ऐश्वर्यगति और सूक्ष्म देह की निवृत्ति तथा वेद, उपवेद, धर्मशास्त्र, इतिहास और पुराण के विषय समझाइए।

श्लोक 8.21

सम्प्लवः सर्वभूतानां विक्रमः प्रतिसङ्क्रमः । इष्टापूर्तस्य काम्यानां त्रिवर्गस्य च यो विधिः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्राणियों का प्रलय, सृष्टि-पुनर्सृष्टि और यज्ञ, लोकहितकारी कार्य तथा काम्यकर्मों की व्यवस्था क्या है?

श्लोक 8.22

यश्चानुशायिनां सर्गः पाखण्डस्य च सम्भवः । आत्मनो बन्धमोक्षौ च व्यवस्थानं स्वरूपतः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: सुप्त कर्मसंस्कारों वाले जीवों की पुनरुत्पत्ति, पाखण्ड की उत्पत्ति, आत्मा का बन्धन-मोक्ष और निजस्वरूप में स्थिति कैसे होती है?

श्लोक 8.23

यथाऽऽत्मतन्त्रो भगवान् विक्रीडत्यात्ममायया । विसृज्य वा यथा मायामुदास्ते साक्षिवद्विभुः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वतन्त्र भगवान अपनी माया से लीला कैसे करते हैं और उससे असंग रहकर साक्षी की तरह कैसे स्थित हैं?

श्लोक 8.24

सर्वमेतच्च भगवन् पृच्छते मेऽनुपूर्वशः । तत्त्वतोऽर्हस्युदाहर्तुं प्रपन्नाय महामुने ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे महामुनि, शरणागत होकर पूछे मेरे इन प्रश्नों का क्रम से यथार्थ उत्तर देने की कृपा करें।

श्लोक 8.25

अत्र प्रमाणं हि भवान् परमेष्ठी यथाऽऽत्मभूः । परे चेहानुतिष्ठन्ति पूर्वेषां पूर्वजैः कृतम् ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस विषय में आप ब्रह्मा के समान प्रमाणभूत हैं; अन्य लोग तो अपने पूर्वजों की स्थापित परम्परा का अनुसरण करते हैं।

श्लोक 8.26

न मेऽसवः परायन्ति ब्रह्मन्ननशनादमी । पिबतोऽच्युतपीयूषमन्यत्र कुपिताद्द्विजात् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: अच्युत की कथामृत पीते हुए मुझे उपवास से जीवन का क्षय नहीं लगता; ब्राह्मण के शाप से निर्धारित मृत्यु ही शेष कारण है।

श्लोक 8.27

सूत उवाच । स उपामन्त्रितो राज्ञा कथायामिति सत्पतेः । ब्रह्मरातो भृशं प्रीतो विष्णुरातेन संसदि ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—सभा में विष्णुरात परीक्षित के इस कथा-निवेदन से शुकदेवजी अत्यन्त प्रसन्न हुए।

श्लोक 8.28

प्राह भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् । ब्रह्मणे भगवत्प्रोक्तं ब्रह्मकल्प उपागते ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने वही ब्रह्मतत्त्वयुक्त भागवत पुराण सुनाना आरम्भ किया, जो ब्रह्मकल्प के आरम्भ में भगवान ने ब्रह्मा से कहा था।

श्लोक 8.29

यद्यत्परीक्षिदृषभः पाण्डूनामनुपृच्छति । आनुपूर्व्येण तत्सर्वमाख्यातुमुपचक्रमे ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: पाण्डववंशश्रेष्ठ परीक्षित ने जो-जो पूछा, उसका शुकदेवजी ने क्रमशः पूर्ण विवेचन आरम्भ किया।

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 8 समाप्त ॥

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द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 9

ब्रह्मा को उपदेश और चतुश्लोकी भागवत

श्लोक 9.1

श्रीशुक उवाच । आत्ममायामृते राजन् परस्यानुभवात्मनः । न घटेतार्थसम्बन्धः स्वप्नद्रष्टुरिवाञ्जसा ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—स्वयंप्रकाश आत्मा का विषयों से बन्धन माया के बिना नहीं बनता; स्वप्नद्रष्टा का स्वप्नसंबंध इसी का दृष्टान्त है।

श्लोक 9.2

बहुरूप इवाभाति मायया बहुरूपया । रममाणो गुणेष्वस्या ममाहमिति मन्यते ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: विविध माया से आत्मा अनेक रूपों में दिखाई देती है और गुणों में आसक्त होकर “मैं” तथा “मेरा” मानती है।

श्लोक 9.3

यर्हि वाव महिम्नि स्वे परस्मिन् कालमाययोः । रमेत गतसम्मोहस्त्यक्त्वोदास्ते तदोभयम् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब जीव काल और माया से परे अपने परम स्वरूप में आनन्द पाता है, तब मोह छोड़कर दोनों अहंभाव-ममत्व से असंग हो जाता है।

श्लोक 9.4

आत्मतत्त्वविशुद्ध्यर्थं यदाह भगवान् ऋतम् । ब्रह्मणे दर्शयन् रूपमव्यलीकव्रतादृतः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: आत्मतत्त्व की शुद्ध समझ के लिए भगवान ने निष्कपट तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा को अपना रूप दिखाया और सत्य उपदेश दिया।

श्लोक 9.5

स आदिदेवो जगतां परो गुरुः स्वधिष्ण्यमास्थाय सिसृक्षयैक्षत । तां नाध्यगच्छद्दृशमत्र सम्मतां प्रपञ्चनिर्माणविधिर्यया भवेत् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: सृष्टि की इच्छा से अपने कमलासन पर बैठे ब्रह्मा ने विचार किया, पर सृष्टिनिर्माण की उचित विधि नहीं समझ पाए।

श्लोक 9.6

स चिन्तयन् द्व्यक्षरमेकदाम्भसि उपाश‍ृणोद्द्विर्गदितं वचो विभुः । स्पर्शेषु यत्षोडशमेकविंशं निष्किञ्चनानां नृप यद्धनं विदुः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: तभी जल में उन्हें दो बार दो अक्षरों का उपदेश सुनाई दिया—“तप”; निष्काम साधकों का यही महान धन है।

श्लोक 9.7

निशम्य तद्वक्तृदिदृक्षया दिशो विलोक्य तत्रान्यदपश्यमानः । स्वधिष्ण्यमास्थाय विमृश्य तद्धितं तपस्युपादिष्ट इवादधे मनः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: वक्ता को खोजने पर किसी को न देखकर उन्होंने उस उपदेश को हितकारी समझा और कमलासन पर तप में मन लगाया।

श्लोक 9.8

दिव्यं सहस्राब्दममोघदर्शनो जितानिलात्मा विजितोभयेन्द्रियः । अतप्यत स्माखिललोकतापनं तपस्तपीयांस्तपतां समाहितः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मन, प्राण और इन्द्रियों को जीतकर उन्होंने दिव्य सहस्र वर्ष तक एकाग्र और प्रभावशाली तप किया।

श्लोक 9.9

तस्मै स्वलोकं भगवान् सभाजितः सन्दर्शयामास परं न यत्परम् । व्यपेतसङ्क्लेशविमोहसाध्वसं स्वदृष्टवद्भिर्पुरुषैरभिष्टुतम् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रसन्न भगवान ने उन्हें अपना सर्वोपरि लोक दिखाया, जहाँ क्लेश, मोह और भय नहीं तथा आत्मदर्शी भक्त उनकी स्तुति करते हैं।

श्लोक 9.10

प्रवर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः सत्त्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः । न यत्र माया किमुतापरे हरे- रनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ रज, तम, मिश्रित सत्त्व और काल का विकार नहीं; माया भी प्रवेश नहीं करती। वहाँ भगवान के अनुगामी निवास करते हैं।

श्लोक 9.11

श्यामावदाताः शतपत्रलोचनाः पिशङ्गवस्त्राः सुरुचः सुपेशसः । सर्वे चतुर्बाहव उन्मिषन्मणि- प्रवेकनिष्काभरणाः सुवर्चसः । प्रवालवैदूर्यमृणालवर्चसः परिस्फुरत्कुण्डलमौलिमालिनः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ के पार्षद श्याम और उज्ज्वल वर्ण, कमलनयन, पीतवस्त्रधारी तथा चार भुजाओं वाले हैं; दिव्य आभूषण, मुकुट और कुण्डल उनकी शोभा बढ़ाते हैं।

श्लोक 9.12

भ्राजिष्णुभिर्यः परितो विराजते लसद्विमानावलिभिर्महात्मनाम् । विद्योतमानः प्रमदोत्तमाद्युभिः सविद्युदभ्रावलिभिर्यथा नभः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: महात्माओं के चमकते विमानों और दिव्य स्त्रियों की प्रभा से वह लोक बिजलीयुक्त बादलों से भरे आकाश जैसा सुशोभित है।

श्लोक 9.13

श्रीर्यत्र रूपिण्युरुगायपादयोः करोति मानं बहुधा विभूतिभिः । प्रेङ्खं श्रिता या कुसुमाकरानुगै- र्विगीयमाना प्रियकर्म गायती ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ लक्ष्मीजी अपनी विभूतियों सहित भगवान के चरणों की सेवा करती हैं और उनकी प्रिय लीलाओं का गान करती हैं।

श्लोक 9.14

ददर्श तत्राखिलसात्वतां पतिं श्रियः पतिं यज्ञपतिं जगत्पतिम् । सुनन्दनन्दप्रबलार्हणादिभिः स्वपार्षदमुख्यैः परिसेवितं विभुम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा ने वहाँ भक्तों, लक्ष्मी, यज्ञ और जगत के स्वामी को सुनन्द, नन्द, प्रबल और अर्हण आदि प्रमुख पार्षदों से सेवित देखा।

श्लोक 9.15

भृत्यप्रसादाभिमुखं दृगासवं प्रसन्नहासारुणलोचनाननम् । किरीटिनं कुण्डलिनं चतुर्भुजं पीताम्बरं वक्षसि लक्षितं श्रिया ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनका मुख प्रसन्न मुस्कान और लालिमा लिए नेत्रों से सुन्दर था; वे भक्तों पर कृपा के लिए तत्पर, चतुर्भुज, मुकुट-कुण्डल और पीताम्बरधारी थे।

श्लोक 9.16

अध्यर्हणीयासनमास्थितं परं वृतं चतुःषोडशपञ्चशक्तिभिः । युक्तं भगैः स्वैरितरत्र चाध्रुवैः स्व एव धामन् रममाणमीश्वरम् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे सर्वोच्च आसन पर अपनी विविध शक्तियों और नित्य ऐश्वर्यों से घिरे, अपने ही धाम में रमण कर रहे थे।

श्लोक 9.17

तद्दर्शनाह्लादपरिप्लुतान्तरो हृष्यत्तनुः प्रेमभराश्रुलोचनः । ननाम पादाम्बुजमस्य विश्वसृग्- यत्पारमहंस्येन पथाधिगम्यते ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: दर्शन से ब्रह्मा का हृदय आनन्द से भर गया, शरीर रोमांचित और आँखें प्रेमाश्रुपूर्ण हुईं; उन्होंने भगवान के चरणों में प्रणाम किया।

श्लोक 9.18

तं प्रीयमाणं समुपस्थितं तदा प्रजाविसर्गे निजशासनार्हणम् । बभाष ईषत्स्मितशोचिषा गिरा प्रियः प्रियं प्रीतमनाः करे स्पृशन् ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रजा-सृष्टि में आज्ञापालन के योग्य प्रिय ब्रह्मा का हाथ छूकर भगवान ने स्नेह और हल्की मुस्कान से कहा।

श्लोक 9.19

श्रीभगवानुवाच । त्वयाहं तोषितः सम्यग्वेदगर्भ सिसृक्षया । चिरं भृतेन तपसा दुस्तोषः कूटयोगिनाम् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—हे वेदगर्भ, सृष्टि के लिए किए तुम्हारे दीर्घ तप से मैं प्रसन्न हूँ; कपटयोग से मुझे प्रसन्न नहीं किया जा सकता।

श्लोक 9.20

वरं वरय भद्रं ते वरेशं माभिवाञ्छितम् । ब्रह्मञ्छ्रेयःपरिश्रामः पुंसो मद्दर्शनावधिः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारा कल्याण हो; वरों के स्वामी मुझसे मनचाहा वर माँगो। कल्याणसाधना का परम फल मेरा दर्शन है।

श्लोक 9.21

मनीषितानुभावोऽयं मम लोकावलोकनम् । यदुपश्रुत्य रहसि चकर्थ परमं तपः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: एकान्त में सुना उपदेश मानकर जो तप तुमने किया, उसी का फल मेरे धाम का यह दर्शन है।

श्लोक 9.22

प्रत्यादिष्टं मया तत्र त्वयि कर्मविमोहिते । तपो मे हृदयं साक्षादात्माहं तपसोऽनघ ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: सृष्टिकर्म में भ्रमित होने पर मैंने ही तुम्हें तप का उपदेश दिया था। तप मेरा हृदय और मैं तप का आत्मस्वरूप हूँ।

श्लोक 9.23

सृजामि तपसैवेदं ग्रसामि तपसा पुनः । बिभर्मि तपसा विश्वं वीर्यं मे दुश्चरं तपः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: तपशक्ति से मैं विश्व रचता, सँभालता और समेटता हूँ; यह दुश्चर तप मेरी सामर्थ्य का प्रकाश है।

श्लोक 9.24

ब्रह्मोवाच । भगवन् सर्वभूतानामध्यक्षोऽवस्थितो गुहाम् । वेद ह्यप्रतिरुद्धेन प्रज्ञानेन चिकीर्षितम् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा बोले—आप सभी के हृदय में अधिष्ठित सर्वसाक्षी हैं; अपने निर्बाध ज्ञान से मेरी इच्छा पहले ही जानते हैं।

श्लोक 9.25

तथापि नाथमानस्य नाथ नाथय नाथितम् । परावरे यथा रूपे जानीयां ते त्वरूपिणः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी नाथ, कृपा करके ऐसा ज्ञान दें कि मैं आपके स्थूल-सूक्ष्म रूपों और उनसे परे स्वरूप को ठीक समझूँ।

श्लोक 9.26

यथाऽऽत्ममायायोगेन नानाशक्त्युपबृंहितम् । विलुम्पन् विसृजन् गृह्णन् बिभ्रदात्मानमात्मना ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप अपनी माया और अनेक शक्तियों से स्वयं में ही रचना, पालन और संहार की लीला करते हैं।

श्लोक 9.27

क्रीडस्यमोघसङ्कल्प ऊर्णनाभिर्यथोर्णुते । तथा तद्विषयां धेहि मनीषां मयि माधव ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मकड़ी की तरह अपनी शक्ति से सब प्रकट करते हुए आपका संकल्प निष्फल नहीं होता; हे माधव, इसकी समझ मुझे दें।

श्लोक 9.28

भगवच्छिक्षितमहं करवाणि ह्यतन्द्रितः । नेहमानः प्रजासर्गं बध्येयं यदनुग्रहात् ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपके उपदेश के अनुसार सावधानी से प्रजासृष्टि करूँ, पर आपकी कृपा से कर्मबन्धन में न पड़ूँ।

श्लोक 9.29

यावत्सखा सख्युरिवेश ते कृतः प्रजाविसर्गे विभजामि भो जनम् । अविक्लवस्ते परिकर्मणि स्थितो मा मे समुन्नद्धमदोऽजमानिनः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपने मित्र की तरह मुझे सृष्टिसेवा में लगाया है। आपकी सेवा करते हुए मेरे मन में स्वतंत्र सृष्टिकर्ता होने का अभिमान न उठे।

श्लोक 9.30

श्रीभगवानुवाच । ज्ञानं परमगुह्यं मे यद्विज्ञानसमन्वितम् । सरहस्यं तदङ्गं च गृहाण गदितं मया ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—मेरा परम गोपनीय ज्ञान, उसका अनुभव, भक्ति का रहस्य और उसके साधन मेरे उपदेश से ग्रहण करो।

श्लोक 9.31

यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मकः । तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरी कृपा से तुम्हें मेरे स्वरूप, स्वभाव, रूप, गुण और कर्म का यथार्थ अनुभव प्राप्त हो।

श्लोक 9.32

अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम् । पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: सृष्टि से पहले केवल मैं था—कारण और कार्य से भी परे। सृष्टि के बाद भी मैं हूँ; जो दृश्य है और अन्त में शेष रहता है, वह भी मेरे ही आश्रय में है।

श्लोक 9.33

ऋतेऽर्थं यत्प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि । तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो वस्तु मेरे वास्तविक आश्रय से पृथक जान पड़े अथवा मेरा स्वरूप न जानने दे, उसे मेरी माया समझो—जैसे मिथ्या प्रतिबिम्ब और अन्धकार।

श्लोक 9.34

यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु । प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे महाभूत छोटे-बड़े शरीरों में प्रवेश करके भी अपने व्यापक रूप में उनसे अलग हैं, वैसे मैं उनमें व्याप्त होकर भी उनसे सीमित नहीं हूँ।

श्लोक 9.35

एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः । अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत्स्यात्सर्वत्र सर्वदा ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: आत्मतत्त्व के जिज्ञासु को अन्वय और व्यतिरेक से उसी सत्य को खोजना चाहिए, जो सर्वत्र और सदैव विद्यमान है।

श्लोक 9.36

एतन्मतं समातिष्ठ परमेण समाधिना । भवान् कल्पविकल्पेषु न विमुह्यति कर्हिचित् ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस उपदेश में पूर्ण एकाग्रता से स्थित रहो; तब सृष्टि और प्रलय के विविध क्रमों में भी मोहित नहीं होगे।

श्लोक 9.37

श्रीशुक उवाच । सम्प्रदिश्यैवमजनो जनानां परमेष्ठिनम् । पश्यतस्तस्य तद्रूपमात्मनो न्यरुणद्धरिः ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—ब्रह्मा को यह उपदेश देकर अजन्मा श्रीहरि ने उनके देखते-देखते अपना प्रत्यक्ष रूप अन्तर्धान कर लिया।

श्लोक 9.38

अन्तर्हितेन्द्रियार्थाय हरये विहिताञ्जलिः । सर्वभूतमयो विश्वं ससर्जेदं स पूर्ववत् ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: अदृश्य हुए भगवान को प्रणाम करके ब्रह्मा ने पूर्ववत् विश्व की सृष्टि की।

श्लोक 9.39

प्रजापतिर्धर्मपतिरेकदा नियमान् यमान् । भद्रं प्रजानामन्विच्छन्नातिष्ठत्स्वार्थकाम्यया ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक समय प्रजापति ब्रह्मा प्रजा के कल्याण और अपने कर्तव्य की सिद्धि के लिए यम-नियमों का पालन कर रहे थे।

श्लोक 9.40

तं नारदः प्रियतमो रिक्थादानामनुव्रतः । शुश्रूषमाणः शीलेन प्रश्रयेण दमेन च ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके अत्यन्त प्रिय पुत्र नारद ने सेवा, विनय और इन्द्रियसंयम से उनका अनुसरण किया।

श्लोक 9.41

मायां विविदिषन् विष्णोर्मायेशस्य महामुनिः । महाभागवतो राजन् पितरं पर्यतोषयत् ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मायापति विष्णु की शक्ति जानने की इच्छा से महाभागवत नारद ने पिता को प्रसन्न किया।

श्लोक 9.42

तुष्टं निशाम्य पितरं लोकानां प्रपितामहम् । देवर्षिः परिपप्रच्छ भवान् यन्मानुपृच्छति ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: पिता को प्रसन्न देखकर देवर्षि ने वही प्रश्न किया, जो अब तुम मुझसे पूछ रहे हो।

श्लोक 9.43

तस्मा इदं भागवतं पुराणं दशलक्षणम् । प्रोक्तं भगवता प्राह प्रीतः पुत्राय भूतकृत् ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: तब ब्रह्मा ने भगवान से प्राप्त दस लक्षणों वाला यह भागवत पुराण प्रसन्न होकर अपने पुत्र को सुनाया।

श्लोक 9.44

नारदः प्राह मुनये सरस्वत्यास्तटे नृप । ध्यायते ब्रह्म परमं व्यासायामिततेजसे ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारद ने सरस्वतीतट पर परब्रह्म का ध्यान करते महातेजस्वी व्यास को यह उपदेश दिया।

श्लोक 9.45

यदुताहं त्वया पृष्टो वैराजात्पुरुषादिदम् । यथाऽऽसीत्तदुपाख्यास्ये प्रश्नानन्यांश्च कृत्स्नशः ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अब विराट पुरुष से विश्व की उत्पत्ति और तुम्हारे अन्य सभी प्रश्नों का मैं क्रम से विवेचन करूँगा।

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 9 समाप्त ॥

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द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 10

भागवत के दस लक्षण और विदुरकथा की भूमिका

श्लोक 10.1

श्रीशुक उवाच । अत्र सर्गो विसर्गश्च स्थानं पोषणमूतयः । मन्वन्तरेशानुकथा निरोधो मुक्तिराश्रयः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—भागवत के दस विषय हैं: सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मन्वन्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति और आश्रय।

श्लोक 10.2

दशमस्य विशुद्ध्यर्थं नवानामिह लक्षणम् । वर्णयन्ति महात्मानः श्रुतेनार्थेन चाञ्जसा ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: दसवें विषय परम आश्रय को स्पष्ट करने के लिए महात्मा पहले नौ विषयों का शास्त्रीय वर्णन और तात्पर्य बताते हैं।

श्लोक 10.3

भूतमात्रेन्द्रियधियां जन्म सर्ग उदाहृतः । ब्रह्मणो गुणवैषम्याद्विसर्गः पौरुषः स्मृतः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुणों में विषमता से भूत, सूक्ष्म विषय, इन्द्रियाँ और बुद्धि की उत्पत्ति सर्ग तथा ब्रह्मा द्वारा जीव-देहों की रचना विसर्ग कहलाती है।

श्लोक 10.4

स्थितिर्वैकुण्ठविजयः पोषणं तदनुग्रहः । मन्वन्तराणि सद्धर्म ऊतयः कर्मवासनाः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: विश्व की व्यवस्थित रक्षा स्थान, भगवान का अनुग्रह पोषण, मनुओं का सद्‍धर्म मन्वन्तर और कर्मवासना ऊति है।

श्लोक 10.5

अवतारानुचरितं हरेश्चास्यानुवर्तिनाम् । सतामीशकथाः प्रोक्ता नानाख्यानोपबृंहिताः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के अवतारों और उनके अनुगामी संतों के चरित्र, विभिन्न आख्यानों सहित, ईशानुकथा कहे जाते हैं।

श्लोक 10.6

निरोधोऽस्यानुशयनमात्मनः सह शक्तिभिः । मुक्तिर्हित्वान्यथा रूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जीव और उसकी शक्तियों का भगवान में शयनरूप लय निरोध है; पराया आरोपित रूप छोड़कर निजस्वरूप में स्थित होना मुक्ति है।

श्लोक 10.7

आभासश्च निरोधश्च यतश्चाध्यवसीयते । स आश्रयः परं ब्रह्म परमात्मेति शब्द्यते ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिनसे प्रकट होना और लय दोनों जाने जाते हैं, वे परम आश्रय हैं; उन्हें परब्रह्म और परमात्मा कहते हैं।

श्लोक 10.8

योऽध्यात्मिकोऽयं पुरुषः सोऽसावेवाधिदैविकः । यस्तत्रोभयविच्छेदः पुरुषो ह्याधिभौतिकः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्रिय के अनुभवकर्ता, उसके अधिष्ठाता देव और अनुभव का भौतिक आधार—ये अध्यात्म, अधिदैव और अधिभूत परस्पर सम्बद्ध हैं।

श्लोक 10.9

एकमेकतराभावे यदा नोपलभामहे । त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रयाश्रयः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: इनमें किसी एक के बिना अन्य का अनुभव नहीं होता; तीनों का ज्ञाता आत्मा उनसे परे और उनके आश्रय का भी आश्रय है।

श्लोक 10.10

पुरुषोऽण्डं विनिर्भिद्य यदासौ स विनिर्गतः । आत्मनोऽयनमन्विच्छन्नपोऽस्राक्षीच्छुचिः शुचीः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्माण्ड को प्रकट करके पुरुष ने अपने निवास के लिए निर्मल जल की रचना की।

श्लोक 10.11

तास्ववात्सीत्स्वसृष्टासु सहस्रपरिवत्सरान् । तेन नारायणो नाम यदापः पुरुषोद्भवाः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने बनाए जल में दीर्घकाल स्थित होने से वे नारायण कहलाए; जल नर अर्थात् पुरुष से उत्पन्न है और उनका अयन है।

श्लोक 10.12

द्रव्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च । यदनुग्रहतः सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: द्रव्य, कर्म, काल, स्वभाव और जीव उन्हीं की कृपा से प्रकट रहते हैं; उनकी शक्ति हटने पर यह व्यवस्था नहीं रहती।

श्लोक 10.13

एको नानात्वमन्विच्छन् योगतल्पात्समुत्थितः । वीर्यं हिरण्मयं देवो मायया व्यसृजत्त्रिधा ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक से अनेक प्रकट करने की इच्छा से भगवान योगनिद्रा से उठे और अपनी शक्ति को तीन प्रकार से प्रकट किया।

श्लोक 10.14

अधिदैवमथाध्यात्ममधिभूतमिति प्रभुः । यथैकं पौरुषं वीर्यं त्रिधाभिद्यत तच्छृणु ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वही एक पौरुषशक्ति अधिदैव, अध्यात्म और अधिभूत—तीन रूपों में कैसे विभाजित हुई, सुनो।

श्लोक 10.15

अन्तःशरीर आकाशात्पुरुषस्य विचेष्टतः । ओजः सहो बलं जज्ञे ततः प्राणो महानसुः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: विराट शरीर के भीतर के आकाश में चेष्टा होने पर ओज, सहनशक्ति और बल प्रकट हुए; फिर प्रधान प्राण प्रकट हुआ।

श्लोक 10.16

अनुप्राणन्ति यं प्राणाः प्राणन्तं सर्वजन्तुषु । अपानन्तमपानन्ति नरदेवमिवानुगाः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिस प्रधान प्राण के सक्रिय होने पर अन्य प्राण सक्रिय होते हैं और शान्त होने पर शान्त होते हैं, जैसे प्रजा राजा का अनुसरण करती है।

श्लोक 10.17

प्राणेन क्षिपता क्षुत्तृडन्तरा जायते प्रभोः । पिपासतो जक्षतश्च प्राङ्मुखं निरभिद्यत ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्राण की गति से भूख-प्यास जगी; खाने-पीने की अभिव्यक्ति के लिए मुख प्रकट हुआ।

श्लोक 10.18

मुखतस्तालु निर्भिन्नं जिह्वा तत्रोपजायते । ततो नानारसो जज्ञे जिह्वया योऽधिगम्यते ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुख में तालु और जीभ प्रकट हुए तथा जीभ से ग्रहण किए जाने वाले विविध रस बने।

श्लोक 10.19

विवक्षोर्मुखतो भूम्नो वह्निर्वाग्व्याहृतं तयोः । जले वै तस्य सुचिरं निरोधः समजायत ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: बोलने की इच्छा से वाणी, उसका अधिष्ठाता अग्नि और कथन प्रकट हुए; पूर्व की जलमय अवस्था में यह शक्ति सुप्त थी।

श्लोक 10.20

नासिके निरभिद्येतां दोधूयति नभस्वति । तत्र वायुर्गन्धवहो घ्राणो नसि जिघृक्षतः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वायु की गति और सुगन्ध ग्रहण करने की इच्छा से नासाछिद्र, गन्धवाह वायु और घ्राणशक्ति प्रकट हुए।

श्लोक 10.21

यदात्मनि निरालोकमात्मानं च दिदृक्षतः । निर्भिन्ने ह्यक्षिणी तस्य ज्योतिश्चक्षुर्गुणग्रहः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रकाश और अपने रूप को देखने की इच्छा से नेत्र, दृष्टि तथा रूप ग्रहण करने वाली ज्योति प्रकट हुई।

श्लोक 10.22

बोध्यमानस्य ऋषिभिरात्मनस्तज्जिघृक्षतः । कर्णौ च निरभिद्येतां दिशः श्रोत्रं गुणग्रहः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानियों के कथन को ग्रहण करने की इच्छा से कान, दिशाएँ और शब्द ग्रहण करने वाली श्रवणशक्ति प्रकट हुई।

श्लोक 10.23

वस्तुनो मृदुकाठिन्यलघुगुर्वोष्णशीतताम् । जिघृक्षतस्त्वङ् निर्भिन्ना तस्यां रोममहीरुहाः । तत्र चान्तर्बहिर्वातस्त्वचा लब्धगुणो वृतः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: कोमलता, कठोरता, हल्केपन, भारीपन, गर्मी और ठण्ड के अनुभव हेतु त्वचा, रोम तथा स्पर्शवाहक वायु प्रकट हुए।

श्लोक 10.24

हस्तौ रुरुहतुस्तस्य नानाकर्मचिकीर्षया । तयोस्तु बलमिन्द्रश्च आदानमुभयाश्रयम् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: विविध कर्म करने की इच्छा से हाथ, उनकी शक्ति और अधिष्ठाता इन्द्र प्रकट हुए; वस्तु ग्रहण करना उनका कार्य है।

श्लोक 10.25

गतिं जिगीषतः पादौ रुरुहातेऽभिकामिकाम् । पद्भ्यां यज्ञः स्वयं हव्यं कर्मभिः क्रियते नृभिः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: इच्छित स्थान की ओर जाने के लिए पैर और उनके अधिष्ठाता विष्णु प्रकट हुए; उन्हीं के माध्यम से यज्ञादि कर्मों तक पहुँचा जाता है।

श्लोक 10.26

निरभिद्यत शिश्नो वै प्रजानन्दामृतार्थिनः । उपस्थ आसीत्कामानां प्रियं तदुभयाश्रयम् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: संतान और उसके आनन्द की अभिव्यक्ति के लिए जननेन्द्रिय तथा उससे सम्बद्ध प्रजननशक्ति प्रकट हुई।

श्लोक 10.27

उत्सिसृक्षोर्धातुमलं निरभिद्यत वै गुदम् । ततः पायुस्ततो मित्र उत्सर्ग उभयाश्रयः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: शरीर का मल त्यागने के लिए गुदा, पायु और अधिष्ठाता मित्र प्रकट हुए; विसर्जन उनका संयुक्त कार्य है।

श्लोक 10.28

आसिसृप्सोः पुरः पुर्या नाभिद्वारमपानतः । तत्रापानस्ततो मृत्युः पृथक्त्वमुभयाश्रयम् ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक देह से दूसरी देह में जाने की व्यवस्था में नाभि, अपान और मृत्यु की भूमिका प्रकट हुई।

श्लोक 10.29

आदित्सोरन्नपानानामासन् कुक्ष्यन्त्रनाडयः । नद्यः समुद्राश्च तयोस्तुष्टिः पुष्टिस्तदाश्रये ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: अन्न-पान ग्रहण करने के लिए उदर, आँतें और नाड़ियाँ बनीं; उनके विराट आधार नदियाँ और समुद्र तथा फल तृप्ति-पुष्टि हैं।

श्लोक 10.30

निदिध्यासोरात्ममायां हृदयं निरभिद्यत । ततो मनस्ततश्चन्द्रः सङ्कल्पः काम एव च ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपनी शक्ति के चिन्तन के लिए हृदय, मन, चन्द्रमा और संकल्प-कामना की वृत्तियाँ प्रकट हुईं।

श्लोक 10.31

त्वक्चर्ममांसरुधिरमेदोमज्जास्थिधातवः । भूम्यप्तेजोमयाः सप्त प्राणो व्योमाम्बुवायुभिः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: त्वचा, चर्म, मांस, रक्त, मेद, मज्जा और अस्थि पृथ्वी, जल तथा तेज से सम्बद्ध हैं; प्राण आकाश, जल और वायु पर आश्रित है।

श्लोक 10.32

गुणात्मकानीन्द्रियाणि भूतादिप्रभवा गुणाः । मनः सर्वविकारात्मा बुद्धिर्विज्ञानरूपिणी ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्रियाँ गुणमय हैं, विषय सूक्ष्म भूतकारण से उत्पन्न होते हैं; मन विविध वृत्तियों का और बुद्धि निश्चयात्मक ज्ञान का रूप है।

श्लोक 10.33

एतद्भगवतो रूपं स्थूलं ते व्याहृतं मया । मह्यादिभिश्चावरणैरष्टभिर्बहिरावृतम् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैंने भगवान का यह स्थूल ध्यानरूप बताया, जो पृथ्वी आदि आठ आवरणों से बाहर घिरा हुआ है।

श्लोक 10.34

अतः परं सूक्ष्मतममव्यक्तं निर्विशेषणम् । अनादिमध्यनिधनं नित्यं वाङ्मनसः परम् ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसके परे सूक्ष्मतम, अव्यक्त, विशेषरहित, अनादि-अनन्त, नित्य और वाणी-मन से परे स्वरूप है।

श्लोक 10.35

अमुनी भगवद्रूपे मया ते अनुवर्णिते । उभे अपि न गृह्णन्ति मायासृष्टे विपश्चितः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: ये स्थूल-सूक्ष्म ध्यानरूप बताए गए हैं; विवेकी इन्हीं मायिक उपाधियों को भगवान का सम्पूर्ण परम स्वरूप नहीं मानते।

श्लोक 10.36

स वाच्यवाचकतया भगवान् ब्रह्मरूपधृक् । नामरूपक्रिया धत्ते सकर्माकर्मकः परः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: परम भगवान नाम और अर्थ दोनों के आश्रय होकर ब्रह्मारूप से नाम, रूप और क्रिया की व्यवस्था करते हैं, फिर भी कर्म से असंग हैं।

श्लोक 10.37

प्रजापतीन् मनून् देवान् ऋषीन् पितृगणान् पृथक् । सिद्धचारणगन्धर्वान् विद्याध्रासुरगुह्यकान् ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रजापति, मनु, देवता, ऋषि, पितर, सिद्ध, चारण, गन्धर्व, विद्याधर, असुर और गुह्यक उनकी सृष्टि में प्रकट होते हैं।

श्लोक 10.38

किन्नराप्सरसो नागान् सर्पान् किम्पुरुषोरगान् । मातॄरक्षःपिशाचांश्च प्रेतभूतविनायकान् ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: किन्नर, अप्सराएँ, नाग, सर्प, किम्पुरुष, मातृगण, राक्षस, पिशाच, प्रेत, भूत और विनायकगण भी उसी व्यवस्था में हैं।

श्लोक 10.39

कूष्माण्डोन्मादवेतालान् यातुधानान् ग्रहानपि । खगान् मृगान् पशून् वृक्षान् गिरीन् नृप सरीसृपान् ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: कूष्माण्ड, उन्मादक शक्तियाँ, वेताल, यातुधान, ग्रह तथा पक्षी, मृग, पशु, वृक्ष, पर्वत और सरीसृप भी उसमें सम्मिलित हैं।

श्लोक 10.40

द्विविधाश्चतुर्विधा येऽन्ये जलस्थलनभौकसः । कुशलाकुशला मिश्राः कर्मणां गतयस्त्विमाः ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जल, थल और आकाश में रहने वाले विभिन्न जन्मप्रकारों के जीव शुभ, अशुभ और मिश्र कर्मों के अनुसार विविध गतियाँ पाते हैं।

श्लोक 10.41

सत्त्वं रजस्तम इति तिस्रः सुरनृनारकाः । तत्राप्येकैकशो राजन् भिद्यन्ते गतयस्त्रिधा । यदैकैकतरोऽन्याभ्यां स्वभाव उपहन्यते ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: सत्त्व, रज और तम से दिव्य, मानवीय और अधोगतियाँ बनती हैं; गुणों के परस्पर मिश्रण से प्रत्येक के भी अनेक विभाग होते हैं।

श्लोक 10.42

स एवेदं जगद्धाता भगवान् धर्मरूपधृक् । पुष्णाति स्थापयन् विश्वं तिर्यङ् नरसुरात्मभिः ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: वही विश्वधारक भगवान धर्मरूप धारण करके देव, मनुष्य और अन्य प्राणियों के माध्यम से जगत का पालन करते हैं।

श्लोक 10.43

ततः कालाग्निरुद्रात्मा यत्सृष्टमिदमात्मनः । सन्नियच्छति कालेन घनानीकमिवानिलः ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर कालाग्निरुद्र रूप से समय आने पर सृष्टि समेट लेते हैं, जैसे हवा बादलों को छिन्न-भिन्न कर देती है।

श्लोक 10.44

इत्थम्भावेन कथितो भगवान् भगवत्तमः । नेत्थम्भावेन हि परं द्रष्टुमर्हन्ति सूरयः ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की यह सृष्ट्यादि लीला का व्यवहारिक वर्णन है; उनका परम स्वरूप इससे भी परे समझा जाता है।

श्लोक 10.45

नास्य कर्मणि जन्मादौ परस्यानुविधीयते । कर्तृत्वप्रतिषेधार्थं माययाऽऽरोपितं हि तत् ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: परमात्मा पर जन्म और कर्म का बन्धन लागू नहीं होता; स्वतंत्र कर्तापन का अहंकार मिटाने के लिए उनकी मायाशक्ति का वर्णन किया गया है।

श्लोक 10.46

अयं तु ब्रह्मणः कल्पः सविकल्प उदाहृतः । विधिः साधारणो यत्र सर्गाः प्राकृतवैकृताः ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह ब्रह्मकल्प और उसके विभागों का सामान्य वर्णन हुआ, जिसमें मूल तत्त्वों और विविध प्राणियों की सृष्टि का क्रम है।

श्लोक 10.47

परिमाणं च कालस्य कल्पलक्षणविग्रहम् । यथा पुरस्ताद्व्याख्यास्ये पाद्मं कल्पमथो श‍ृणु ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: काल और कल्पों का विस्तृत परिमाण आगे कहूँगा; अब पाद्मकल्प से सम्बन्धित कथा सुनो।

श्लोक 10.48

शौनक उवाच । यदाह नो भवान् सूत क्षत्ता भागवतोत्तमः । चचार तीर्थानि भुवस्त्यक्त्वा बन्धून् सुदुस्त्यजान् ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: शौनकजी बोले—सूतजी, आपने कहा था कि श्रेष्ठ भगवद्भक्त विदुर कठिनाई से छूटने वाले स्वजनों को छोड़कर तीर्थयात्रा करते रहे।

श्लोक 10.49

कुत्र कौषारवेस्तस्य संवादोऽध्यात्मसंश्रितः । यद्वा स भगवांस्तस्मै पृष्टस्तत्त्वमुवाच ह ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेयजी के साथ उनका आत्मतत्त्वविषयक संवाद कहाँ हुआ और पूछने पर उन्होंने विदुर को क्या उपदेश दिया?

श्लोक 10.50

ब्रूहि नस्तदिदं सौम्य विदुरस्य विचेष्टितम् । बन्धुत्यागनिमित्तं च तथैवागतवान् पुनः ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: कृपा करके विदुर का चरित्र, स्वजनों को छोड़ने का कारण और फिर लौटने का प्रसंग सुनाइए।

श्लोक 10.51

सूत उवाच । राज्ञा परीक्षिता पृष्टो यदवोचन्महामुनिः । तद्वोऽभिधास्ये श‍ृणुत राज्ञः प्रश्नानुसारतः ॥ ५१॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—परीक्षित के प्रश्नों के अनुसार महामुनि शुकदेवजी ने जो कहा, वह अब आपको सुनाऊँगा; ध्यान से सुनिए।

॥ श्रीमद्भागवत महापुराण • द्वितीय स्कन्ध • अध्याय 10 समाप्त ॥

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द्वितीय स्कन्ध का भक्ति-सन्देश

जीवन का सार भगवान के स्मरण में जागना है। समस्त जगत को उनके आश्रय में देखकर अहंकार शान्त होता है और हरिकथा के श्रवण से हृदय निर्मल होता है। सृष्टि के विविध विषय अन्ततः एक ही प्रश्न को स्पष्ट करते हैं—सबका परम आश्रय कौन है?

पाठाधार और संपादकीय जानकारी

प्राचीन मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents का “श्रीमद्भागवतं—द्वितीयस्कन्धः” है। चुने हुए पाठ में अध्यायवार श्लोक-संख्या 39, 37, 25, 25, 42, 45, 53, 29, 45 और 51 है; कुल 391 श्लोक हैं। संस्करणों में संख्या और पाठभेद मिल सकते हैं। यहाँ चतुश्लोकी का पाठ अध्याय 9 के श्लोक 32–35 में है। कोष्ठकीय विकल्प मुख्य पाठ में नहीं मिलाए गए हैं। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना की स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है, किसी आधुनिक टीका की प्रतिलिपि नहीं। विराट स्वरूप के अंगों में विश्व का वर्णन ध्यान की प्रतीकात्मक पद्धति है। योगगति का वर्णन ग्रंथ का भावार्थ है, व्यक्तिगत प्राणायाम-प्रशिक्षण नहीं।

॥ द्वितीय स्कन्ध सम्पूर्ण ॥

॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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भक्ति भावना • मूल पाठ और सरल हिंदी भावार्थ

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