श्रीमद्भागवत महापुराण तृतीय स्कन्ध भाग 1 — अध्याय 1–10, विदुर संवाद और सृष्टि रहस्य

भक्ति भावना • पुराण साहित्य

श्रीमद्भागवत महापुराण

तृतीय स्कन्ध • भाग १ • अध्याय १–१०

३८१ मूल श्लोक • प्रत्येक श्लोक का सरल हिंदी भावार्थ

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विदुर की जिज्ञासा से सृष्टि के परम आश्रय तक

द्वितीय स्कन्ध के अन्त में उठी विदुरकथा की जिज्ञासा यहाँ आगे बढ़ती है। विदुर का गृहत्याग, उद्धव से मिलन, श्रीकृष्ण की लीलाओं का स्मरण और मैत्रेय से तत्त्वसंवाद क्रम से आते हैं। इसके बाद विराट पुरुष, जीव का बन्धन, ब्रह्माजी की उत्पत्ति, उनकी स्तुति और सृष्टि के विभागों का विवेचन है।

इस भाग में अध्याय 1–10 के सभी 381 श्लोक मूल क्रम में हैं। हर श्लोक का सरल हिंदी भावार्थ स्वतंत्र रूप से लिखा गया है। तृतीय स्कन्ध के शेष अध्याय आगे के भागों में आएँगे।

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 1

विदुर का गृहत्याग और उद्धव से भेंट

श्लोक 1.1

श्रीशुक उवाच । एवमेतत्पुरा पृष्टो मैत्रेयो भगवान् किल । क्षत्त्रा वनं प्रविष्टेन त्यक्त्वा स्वगृहमृद्धिमत् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—समृद्ध घर छोड़कर वन गए विदुर ने पहले मैत्रेयजी से यही प्रश्न किया था।

श्लोक 1.2

यद्वा अयं मन्त्रकृद्वो भगवानखिलेश्वरः । पौरवेन्द्रगृहं हित्वा प्रविवेशात्मसात्कृतम् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर के उसी घर में सर्वेश्वर श्रीकृष्ण दुर्योधन का भवन छोड़कर अपनेपन से ठहरे थे।

श्लोक 1.3

राजोवाच । कुत्र क्षत्तुर्भगवता मैत्रेयेणास सङ्गमः । कदा वा सह संवाद एतद्वर्णय नः प्रभो ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: परीक्षित ने पूछा—विदुर और मैत्रेयजी कहाँ मिले और उनका संवाद कब हुआ? कृपया बताइए।

श्लोक 1.4

न ह्यल्पार्थोदयस्तस्य विदुरस्यामलात्मनः । तस्मिन् वरीयसि प्रश्नः साधुवादोपबृंहितः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: निर्मलचित्त विदुर का प्रश्न अवश्य ही महान कल्याण का विषय रहा होगा, जिसकी साधु प्रशंसा करते हैं।

श्लोक 1.5

सूत उवाच । स एवमृषिवर्योऽयं पृष्टो राज्ञा परीक्षिता । प्रत्याह तं सुबहुवित्प्रीतात्मा श्रूयतामिति ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी कहते हैं—परीक्षित का प्रश्न सुनकर ज्ञानी शुकदेवजी प्रसन्न हुए और बोले, ध्यान से सुनो।

श्लोक 1.6

श्रीशुक उवाच । यदा तु राजा स्वसुतानसाधून् पुष्णन्नधर्मेण विनष्टदृष्टिः । भ्रातुर्यविष्ठस्य सुतान् विबन्धून् प्रवेश्य लाक्षाभवने ददाह ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: धृतराष्ट्र पुत्रमोह में अधर्म का समर्थन करते रहे; पितृहीन पाण्डवों को लाक्षागृह में जलाने का षड्यन्त्र भी हुआ।

श्लोक 1.7

यदा सभायां कुरुदेवदेव्याः केशाभिमर्शं सुतकर्म गर्ह्यम् । न वारयामास नृपः स्नुषायाः स्वास्रैर्हरन्त्याः कुचकुङ्कुमानि ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: सभा में रोती हुई पुत्रवधू द्रौपदी के केश खींचने का घोर अपमान भी उन्होंने नहीं रोका।

श्लोक 1.8

द्यूते त्वधर्मेण जितस्य साधोः सत्यावलम्बस्य वनागतस्य । न याचतोऽदात्समयेन दायं तमो जुषाणो यदजातशत्रोः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: अन्यायपूर्ण जुए के बाद वन से लौटे धर्मनिष्ठ युधिष्ठिर को समय आने पर उनका राज्यभाग भी नहीं दिया।

श्लोक 1.9

यदा च पार्थप्रहितः सभायां जगद्गुरुर्यानि जगाद कृष्णः । न तानि पुंसाममृतायनानि राजोरु मेने क्षतपुण्यलेशः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: पाण्डवों के दूत बनकर आए जगद्गुरु कृष्ण की कल्याणकारी वाणी को भी उन्होंने उचित सम्मान नहीं दिया।

श्लोक 1.10

यदोपहूतो भवनं प्रविष्टो मन्त्राय पृष्टः किल पूर्वजेन । अथाह तन्मन्त्रदृशां वरीयान् यन्मन्त्रिणो वैदुरिकं वदन्ति ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: बड़े भाई ने परामर्श माँगा तो श्रेष्ठ नीतिज्ञ विदुर ने वह नीति कही जिसे विदुरनीति कहा जाता है।

श्लोक 1.11

अजातशत्रोः प्रतियच्छ दायं तितिक्षतो दुर्विषहं तवागः । सहानुजो यत्र वृकोदराहिः श्वसन् रुषा यत्त्वमलं बिभेषि ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर ने कहा—आपके बड़े अपराध सह रहे युधिष्ठिर को उसका अधिकार दीजिए; क्रोधित भीम से आप स्वयं भयभीत हैं।

श्लोक 1.12

पार्थांस्तु देवो भगवान्मुकुन्दो गृहीतवान् सक्षितिदेवदेवः । आस्ते स्वपुर्यां यदुदेवदेवो विनिर्जिताशेषनृदेवदेवः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवों के भी आराध्य मुकुन्द पाण्डवों के रक्षक हैं; अनेक राजाओं को जीत चुके श्रीकृष्ण उनके पक्ष में हैं।

श्लोक 1.13

स एष दोषः पुरुषद्विडास्ते गृहान् प्रविष्टो यमपत्यमत्या । पुष्णासि कृष्णाद्विमुखो गतश्रीः त्यजाश्वशैवं कुलकौशलाय ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुत्र समझकर पाले जा रहे कृष्णविमुख दुर्योधन के अधर्म को कुलकल्याण के लिए त्याग दीजिए।

श्लोक 1.14

इत्यूचिवांस्तत्र सुयोधनेन प्रवृद्धकोपस्फुरिताधरेण । असत्कृतः सत्स्पृहणीयशीलः क्षत्ता सकर्णानुजसौबलेन ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह सुनकर दुर्योधन क्रोध से काँप उठा; कर्ण, अपने भाइयों और शकुनि सहित उसने सम्माननीय विदुर का अपमान किया।

श्लोक 1.15

क एनमत्रोपजुहाव जिह्मं दास्याः सुतं यद्बलिनैव पुष्टः । तस्मिन् प्रतीपः परकृत्य आस्ते निर्वास्यतामाशु पुराच्छ्वसानः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: दुर्योधन ने कहा—इसे किसने बुलाया? हमारा खाकर विरोधियों का काम करने वाले इस दासीपुत्र को तुरन्त निकालो।

श्लोक 1.16

स इत्थमत्युल्बणकर्णबाणैः भ्रातुः पुरो मर्मसु ताडितोऽपि । स्वयं धनुर्द्वारि निधाय मायां गतव्यथोऽयादुरुमानयानः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: भाई के सामने कटुवचनों से आहत विदुर ने इसे माया का प्रभाव समझा, द्वार पर धनुष रखा और निर्विकार चले गए।

श्लोक 1.17

स निर्गतः कौरवपुण्यलब्धो गजाह्वयात्तीर्थपदः पदानि । अन्वाक्रमत्पुण्यचिकीर्षयोर्व्यां स्वधिष्ठितो यानि सहस्रमूर्तिः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: हस्तिनापुर छोड़कर विदुर भगवान के पावन तीर्थस्थानों की यात्रा करने लगे; उनका जीवन कौरवकुल का पुण्य था।

श्लोक 1.18

पुरेषु पुण्योपवनाद्रिकुञ्जे- ष्वपङ्कतोयेषु सरित्सरःसु । अनन्तलिङ्गैः समलङ्कृतेषु चचार तीर्थायतनेष्वनन्यः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के चिह्नों से सुशोभित नगरों, उपवनों, पर्वतों, निर्मल नदियों और सरोवरों में वे अनन्यभाव से विचरे।

श्लोक 1.19

गां पर्यटन्मेध्यविविक्तवृत्तिः सदाऽऽप्लुतोऽधःशयनोऽवधूतः । अलक्षितः स्वैरवधूतवेषो व्रतानि चेरे हरितोषणानि ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: पवित्र सरल जीवन, नियमित स्नान, धरती पर शयन और अवधूतवेष धारण कर वे हरि को प्रसन्न करने वाले व्रत करते रहे।

श्लोक 1.20

इत्थं व्रजन्भारतमेव वर्षं कालेन यावद्गतवान्प्रभासम् । तावच्छशास क्षितिमेकचक्रा- मेकातपत्रामजितेन पार्थः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: भारतवर्ष में भ्रमण करते हुए वे प्रभास पहुँचे; तब तक कृष्ण की सहायता से युधिष्ठिर पृथ्वी के सम्राट हो चुके थे।

श्लोक 1.21

तत्राथ शुश्राव सुहृद्विनष्टिं वनं यथा वेणुजवह्निसंश्रयम् । संस्पर्धया दग्द्धमथानुशोचन् सरस्वतीं प्रत्यगियाय तूष्णीम् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: बाँसों की रगड़ से जले वन की तरह परस्पर कलह से स्वजनों के नाश का समाचार सुनकर वे सरस्वती की ओर चले।

श्लोक 1.22

तस्यां त्रितस्योशनसो मनोश्च पृथोरथाग्नेरसितस्य वायोः । तीर्थं सुदासस्य गवां गुहस्य यच्छ्राद्धदेवस्य स आसिषेवे ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने सरस्वती तट पर त्रित, उशना, मनु, पृथु, अग्नि, असित, वायु आदि से सम्बद्ध तीर्थों की सेवा की।

श्लोक 1.23

अन्यानि चेह द्विजदेवदेवैः कृतानि नानाऽऽयतनानि विष्णोः । प्रत्यङ्गमुख्याङ्कितमन्दिराणि यद्दर्शनात्कृष्णमनुस्मरन्ति ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने ऋषियों और देवों द्वारा स्थापित विष्णुमन्दिर देखे, जिनके चक्रादि चिह्न श्रीकृष्ण का स्मरण कराते हैं।

श्लोक 1.24

ततस्त्वतिव्रज्य सुराष्ट्रमृद्धं सौवीरमत्स्यान् कुरुजाङ्गलांश्च । कालेन तावद्यमुनामुपेत्य तत्रोद्धवं भागवतं ददर्श ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: सुराष्ट्र, सौवीर, मत्स्य और कुरुजाङ्गल पार करके वे यमुना पहुँचे, जहाँ भगवद्भक्त उद्धव मिले।

श्लोक 1.25

स वासुदेवानुचरं प्रशान्तं बृहस्पतेः प्राक्तनयं प्रतीतम् । आलिङ्ग्य गाढं प्रणयेन भद्रं स्वानामपृच्छद्भगवत्प्रजानाम् ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: शान्तचित्त, बृहस्पति के शिष्य और कृष्णसेवक उद्धव को प्रेम से आलिंगन कर विदुर ने स्वजनों का कुशल पूछा।

श्लोक 1.26

कच्चित्पुराणौ पुरुषौ स्वनाभ्य- पाद्मानुवृत्त्येह किलावतीर्णौ । आसात उर्व्याः कुशलं विधाय कृतक्षणौ कुशलं शूरगेहे ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने पूछा—जगत के कल्याण के लिए अवतीर्ण दोनों पुरातन पुरुष कृष्ण और बलराम शूरवंश में कुशल हैं?

श्लोक 1.27

कच्चित्कुरूणां परमः सुहृन्नो भामः स आस्ते सुखमङ्ग शौरिः । यो वै स्वसॄणां पितृवद्ददाति वरान् वदान्यो वरतर्पणेन ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: हमारे परम हितैषी उदार वसुदेव कुशल हैं, जो अपनी बहनों की पिता के समान देखभाल करते हैं?

श्लोक 1.28

कच्चिद्वरूथाधिपतिर्यदूनां प्रद्युम्न आस्ते सुखमङ्ग वीरः । यं रुक्मिणी भगवतोऽभिलेभे आराध्य विप्रान् स्मरमादिसर्गे ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: यदुवंश के वीर रथी प्रद्युम्न कुशल हैं, जिन्हें रुक्मिणी ने आराधना से श्रीकृष्ण के पुत्ररूप में पाया?

श्लोक 1.29

कच्चित्सुखं सात्वतवृष्णिभोज- दाशार्हकाणामधिपः स आस्ते । यमभ्यषिञ्चच्छतपत्रनेत्रो नृपासनाशां परिहृत्य दूरात् ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सात्वत, वृष्णि, भोज और दाशार्हों के राजा उग्रसेन कुशल हैं, जिन्हें कृष्ण ने स्वयं सिंहासन पर बैठाया?

श्लोक 1.30

कच्चिद्धरेः सौम्य सुतः सदृक्ष आस्तेऽग्रणी रथिनां साधु साम्बः । असूत यं जाम्बवती व्रताढ्या देवं गुहं योंऽबिकया धृतोऽग्रे ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जाम्बवती के पुत्र और कृष्ण के समान पराक्रमी साम्ब कुशल हैं, जिनका सम्बन्ध पूर्वजन्म के स्कन्द से बताया गया है?

श्लोक 1.31

क्षेमं स कच्चिद्युयुधान आस्ते यः फाल्गुनाल्लब्धधनूरहस्यः । लेभेऽञ्जसाधोक्षजसेवयैव गतिं तदीयां यतिभिर्दुरापाम् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: अर्जुन से धनुर्विद्या सीखने वाले सात्यकि कुशल हैं, जिन्होंने हरिसेवा से दुर्लभ आध्यात्मिक गति प्राप्त की?

श्लोक 1.32

कच्चिद्बुधः स्वस्त्यनमीव आस्ते श्वफल्कपुत्रो भगवत्प्रपन्नः । यः कृष्णपादाङ्कितमार्गपांसु- ष्वचेष्टत प्रेमविभिन्नधैर्यः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्वफल्कपुत्र अक्रूर कुशल और स्वस्थ हैं, जो कृष्ण के चरणचिह्नों की धूल में प्रेमविह्वल होकर लोटते थे?

श्लोक 1.33

कच्चिच्छिवं देवकभोजपुत्र्या विष्णुप्रजाया इव देवमातुः । या वै स्वगर्भेण दधार देवं त्रयी यथा यज्ञवितानमर्थम् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवमाता के समान देवकी कुशल हैं, जिन्होंने अपने गर्भ में भगवान को धारण किया?

श्लोक 1.34

अपिस्विदास्ते भगवान्सुखं वो यः सात्वतां कामदुघोऽनिरुद्धः । यमामनन्ति स्म ह शब्दयोनिं मनोमयं सत्त्वतुरीयतत्त्वम् ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: भक्तों की इच्छाएँ पूर्ण करने वाले अनिरुद्ध कुशल हैं, जिन्हें चतुर्व्यूह में मनतत्त्व का अधिष्ठाता कहा जाता है?

श्लोक 1.35

अपिस्विदन्ये च निजात्मदैव- मनन्यवृत्त्या समनुव्रता ये । हृदीकसत्यात्मजचारुदेष्ण- गदादयः स्वस्ति चरन्ति सौम्य ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: हृदीक, सत्यभामा के पुत्र, चारुदेष्ण, गद और अन्य अनन्य कृष्णभक्त भी कुशलपूर्वक हैं?

श्लोक 1.36

अपि स्वदोर्भ्यां विजयाच्युताभ्यां धर्मेण धर्मः परिपाति सेतुम् । दुर्योधनोऽतप्यत यत्सभायां साम्राज्यलक्ष्म्या विजयानुवृत्त्या ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कृष्ण और अर्जुन के सहयोग से युधिष्ठिर धर्ममर्यादा की रक्षा कर रहे हैं, जिनका ऐश्वर्य देखकर दुर्योधन जलता था?

श्लोक 1.37

किं वा कृताघेष्वघमत्यमर्षी भीमोऽहिवद्दीर्घतमं व्यमुञ्चत् । यस्याङ्घ्रिपातं रणभूर्न सेहे मार्गं गदायाश्चरतो विचित्रम् ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्या गदायुद्ध के महाबली भीम ने अपराधियों के प्रति अपना दीर्घकालीन क्रोध उतार लिया?

श्लोक 1.38

कच्चिद्यशोधा रथयूथपानां गाण्डीवधन्वोपरतारिरास्ते । अलक्षितो यच्छरकूटगूढो मायाकिरातो गिरिशस्तुतोष ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: शत्रुओं को शान्त करने वाले अर्जुन कुशल हैं, जिनके बाणकौशल से किरातवेषधारी शिवजी भी प्रसन्न हुए थे?

श्लोक 1.39

यमावुतस्वित्तनयौ पृथायाः पार्थैर्वृतौ पक्ष्मभिरक्षिणीव । रेमात उद्दाय मृधे स्वरिक्थं परात्सुपर्णाविव वज्रिवक्त्रात् ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: पाण्डवों द्वारा नेत्रों की पलकों जैसी रक्षा पाए नकुल-सहदेव अपना अधिकार पुनः पाकर सुखी हैं?

श्लोक 1.40

अहो पृथापि ध्रियतेऽर्भकार्थे राजर्षिवर्येण विनापि तेन । यस्त्वेकवीरोऽधिरथो विजिग्ये धनुर्द्वितीयः ककुभश्चतस्रः ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: चारों दिशाओं को जीतने वाले पाण्डु के बिना भी क्या कुन्ती अपने पुत्रों के लिए जीवन धारण किए हैं?

श्लोक 1.41

सौम्यानुशोचे तमधःपतन्तं भ्रात्रे परेताय विदुद्रुहे यः । निर्यापितो येन सुहृत्स्वपुर्या अहं स्वपुत्रान्समनुव्रतेन ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुझे धृतराष्ट्र के अधःपतन का दुःख है; पुत्रों का पक्ष लेकर उन्होंने मृत भाई और अपने हितैषी मेरे साथ अन्याय किया।

श्लोक 1.42

सोऽहं हरेर्मर्त्यविडम्बनेन दृशो नृणां चालयतो विधातुः । नान्योपलक्ष्यः पदवीं प्रसादा- च्चरामि पश्यन् गतविस्मयोऽत्र ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की मनुष्य जैसी लीला लोगों को भ्रमित करती है; उनकी कृपा से मैं उनकी व्यवस्था समझकर निराश्चर्य भ्रमण करता हूँ।

श्लोक 1.43

नूनं नृपाणां त्रिमदोत्पथानां महीं मुहुश्चालयतां चमूभिः । वधात्प्रपन्नार्तिजिहीर्षयेशो- ऽप्युपैक्षताघं भगवान्कुरूणाम् ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अहंकार से पथभ्रष्ट राजाओं का भार हटाने और शरणागतों का दुःख मिटाने के लिए प्रभु ने कौरवों का अपराध कुछ समय सहा।

श्लोक 1.44

अजस्य जन्मोत्पथनाशनाय कर्माण्यकर्तुर्ग्रहणाय पुंसाम् । नन्वन्यथा कोऽर्हति देहयोगं परो गुणानामुत कर्मतन्त्रम् ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जन्मरहित, निष्कर्म और गुणातीत भगवान लोकमार्ग सुधारने तथा जीवों को आकर्षित करने के लिए जन्म और कर्म की लीला करते हैं।

श्लोक 1.45

तस्य प्रपन्नाखिललोकपाना- मवस्थितानामनुशासने स्वे । अर्थाय जातस्य यदुष्वजस्य वार्तां सखे कीर्तय तीर्थकीर्तेः ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे उद्धव, शरणागतों और लोकपालों के हित में यदुवंश में प्रकट हुए उन पवित्रकीर्ति कृष्ण का समाचार सुनाइए।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 1 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 2

उद्धव का कृष्णविरह और व्रजलीला का स्मरण

श्लोक 2.1

श्रीशुक उवाच । इति भागवतः पृष्टः क्षत्त्रा वार्तां प्रियाश्रयाम् । प्रतिवक्तुं न चोत्सेह औत्कण्ठ्यात्स्मारितेश्वरः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी कहते हैं—प्रिय प्रभु का समाचार पूछे जाने पर स्मरण और उत्कण्ठा से भरकर उद्धव तत्काल उत्तर नहीं दे सके।

श्लोक 2.2

यः पञ्चहायनो मात्रा प्रातराशाय याचितः । तन्नैच्छद्रचयन्यस्य सपर्यां बाललीलया ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: पाँच वर्ष की आयु में भी वे खेल-खेल में कृष्णपूजा करते और माता के बुलाने पर भोजन के लिए नहीं उठते थे।

श्लोक 2.3

स कथं सेवया तस्य कालेन जरसं गतः । पृष्टो वार्तां प्रतिब्रूयाद्भर्तुः पादावनुस्मरन् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: आजीवन कृष्णसेवा करके वृद्ध हुए उद्धव प्रभु के चरण याद आने पर सामान्य ढंग से उनका समाचार कैसे सुना सकते थे?

श्लोक 2.4

स मुहूर्तमभूत्तूष्णीं कृष्णाङ्घ्रिसुधया भृशम् । तीव्रेण भक्तियोगेन निमग्नः साधु निर्वृतः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे कुछ समय मौन रहे; तीव्र भक्तियोग से कृष्णचरणों की सुधा में डूबकर परम आनन्द अनुभव करने लगे।

श्लोक 2.5

पुलकोद्भिन्नसर्वाङ्गो मुञ्चन्मीलद्दृशा शुचः । पूर्णार्थो लक्षितस्तेन स्नेहप्रसरसम्प्लुतः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनका शरीर रोमाञ्चित था, बन्द होती आँखों से प्रेमाश्रु बह रहे थे; विदुर ने उनकी पूर्ण भक्ति पहचान ली।

श्लोक 2.6

शनकैर्भगवल्लोकान्नृलोकं पुनरागतः । विमृज्य नेत्रे विदुरं प्रत्याहोद्धव उत्स्मयन् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: धीरे-धीरे सामान्य चेतना में लौटकर उन्होंने आँसू पोंछे और मन्द मुस्कान के साथ विदुर को उत्तर दिया।

श्लोक 2.7

उद्धव उवाच । कृष्णद्युमणिनिम्लोचे गीर्णेष्वजगरेण ह । किं नु नः कुशलं ब्रूयां गतश्रीषु गृहेष्वहम् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उद्धव बोले—कृष्णरूपी सूर्य अस्त हो गया और कालरूपी अजगर ने हमारा ऐश्वर्य निगल लिया; अब क्या कुशल कहूँ?

श्लोक 2.8

दुर्भगो बत लोकोऽयं यदवो नितरामपि । ये संवसन्तो न विदुर्हरिं मीना इवोडुपम् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: संसार और विशेषकर यादव दुर्भाग्यशाली रहे; साथ रहते हुए भी वे कृष्ण को पूर्णतः नहीं पहचान सके, जैसे मछलियाँ चन्द्रमा को।

श्लोक 2.9

इङ्गितज्ञाः पुरुप्रौढा एकारामाश्च सात्त्वताः । सात्त्वतामृषभं सर्वे भूतावासममंसत ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: यादव बुद्धिमान और घनिष्ठ सहचर थे, फिर भी सबके आश्रय भगवान को अपने कुल का एक श्रेष्ठ पुरुष ही समझते रहे।

श्लोक 2.10

देवस्य मायया स्पृष्टा ये चान्यदसदाश्रिताः । भ्राम्यते धीर्न तद्वाक्यैरात्मन्युप्तात्मनो हरौ ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: मायामोहित या असत्य आश्रयों में लगे लोगों की बातें उस भक्त की बुद्धि नहीं डिगातीं जिसका मन हरि में स्थिर है।

श्लोक 2.11

प्रदर्श्यातप्ततपसामवितृप्तदृशां नृणाम् । आदायान्तरधाद्यस्तु स्वबिम्बं लोकलोचनम् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: लोगों की आँखें अभी तृप्त भी नहीं हुई थीं कि भगवान अपना अनुपम दर्शन देकर दृष्टि से ओझल हो गए।

श्लोक 2.12

यन्मर्त्यलीलौपयिकं स्वयोग- मायाबलं दर्शयता गृहीतम् । विस्मापनं स्वस्य च सौभगर्द्धेः परं पदं भूषणभूषणाङ्गम् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: योगमाया से धारण किया उनका मनोहर मनुष्यरूप सौन्दर्य का सर्वोच्च आश्रय था; उनके अंग आभूषणों को भी सुशोभित करते थे।

श्लोक 2.13

यद्धर्मसूनोर्बत राजसूये निरीक्ष्य दृक्स्वस्त्ययनं त्रिलोकः । कार्त्स्न्येन चाद्येह गतं विधातु- रर्वाक्सृतौ कौशलमित्यमन्यत ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: युधिष्ठिर के राजसूय में उनका रूप देखकर तीनों लोकों ने माना कि सृष्टिकर्ता का समस्त कौशल यहीं प्रकट हो गया है।

श्लोक 2.14

यस्यानुरागप्लुतहासरास- लीलावलोकप्रतिलब्धमानाः । व्रजस्त्रियो दृग्भिरनुप्रवृत्त- धियोऽवतस्थुः किल कृत्यशेषाः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रेमभरी मुस्कान, रास और कृपादृष्टि से सम्मान पाकर गोपियों का मन कृष्ण में ऐसा लगा कि अन्य काम भूल गए।

श्लोक 2.15

स्वशान्तरूपेष्वितरैः स्वरूपै- रभ्यर्द्यमानेष्वनुकम्पितात्मा । परावरेशो महदंशयुक्तो ह्यजोऽपि जातो भगवान् यथाग्निः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब दुष्टों ने शान्त भक्तों को सताया, तब अजन्मा भगवान करुणावश बलराम सहित अग्नि के समान प्रकट हुए।

श्लोक 2.16

मां खेदयत्येतदजस्य जन्म विडम्बनं यद्वसुदेवगेहे । व्रजे च वासोऽरिभयादिव स्वयं पुराद्व्यवात्सीद्यदनन्तवीर्यः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वसुदेवगृह में जन्म, व्रजवास और शत्रुभय जैसा पलायन—अनन्तवीर्य प्रभु की ये मानवीय लीलाएँ याद करके मेरा हृदय व्याकुल होता है।

श्लोक 2.17

दुनोति चेतः स्मरतो ममैत- द्यदाह पादावभिवन्द्य पित्रोः । ताताम्ब कंसादुरुशङ्कितानां प्रसीदतं नोऽकृतनिष्कृतीनाम् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: माता-पिता से उनके विनम्र शब्द याद आते हैं—कंस के भय से हम आपकी सेवा न कर सके, हमें क्षमा कीजिए।

श्लोक 2.18

को वा अमुष्याङ्घ्रिसरोजरेणुं विस्मर्तुमीशीत पुमान्विजिघ्रन् । यो विस्फुरद्भ्रूविटपेन भूमे- र्भारं कृतान्तेन तिरश्चकार ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी चरणरज का अनुभव करने वाला उन्हें कैसे भूले, जिन्होंने भौंहों के संकेत से काल को प्रेरित कर पृथ्वी का भार हटाया?

श्लोक 2.19

दृष्टा भवद्भिर्ननु राजसूये चैद्यस्य कृष्णं द्विषतोऽपि सिद्धिः । यां योगिनः संस्पृहयन्ति सम्य- ग्योगेन कस्तद्विरहं सहेत ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजसूय में आपने देखा, द्वेषी शिशुपाल को भी वह गति मिली जिसे योगी चाहते हैं; ऐसे प्रभु का विरह कौन सहे?

श्लोक 2.20

तथैव चान्ये नरलोकवीरा य आहवे कृष्णमुखारविन्दम् । नेत्रैः पिबन्तो नयनाभिरामं पार्थास्त्रपूताः पदमापुरस्य ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: अन्य वीर भी युद्ध में कृष्ण का मुख देखते हुए अर्जुन के अस्त्रों से पवित्र होकर उनके परम पद को पहुँचे।

श्लोक 2.21

स्वयं त्वसाम्यातिशयस्त्र्यधीशः स्वाराज्यलक्ष्म्याऽऽप्तसमस्तकामः । बलिं हरद्भिश्चिरलोकपालैः किरीटकोट्येडितपादपीठः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके समान या उनसे बढ़कर कोई नहीं; वे पूर्णकाम स्वामी हैं, जिनकी चरणपीठ पर लोकपाल अपने मुकुट झुकाते हैं।

श्लोक 2.22

तत्तस्य कैङ्कर्यमलं भृतान्नो विग्लापयत्यङ्ग यदुग्रसेनम् । तिष्ठन्निषण्णं परमेष्ठिधिष्ण्ये न्यबोधयद्देव निधारयेति ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी वे सिंहासन पर बैठे उग्रसेन के सामने सेवक की तरह खड़े होकर विनम्र निवेदन करते थे—यह स्मरण मुझे विह्वल करता है।

श्लोक 2.23

अहो बकी यं स्तनकालकूटं जिघांसयापाययदप्यसाध्वी । लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं कं वा दयालुं शरणं व्रजेम ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मारने के लिए विषभरा स्तन पिलाने वाली पूतना को भी उन्होंने धायमाता की गति दी; उनसे दयालु आश्रय और कौन है?

श्लोक 2.24

मन्येऽसुरान्भागवतांस्त्र्यधीशे संरम्भमार्गाभिनिविष्टचित्तान् । ये संयुगेऽचक्षत तार्क्ष्यपुत्र- मंसे सुनाभायुधमापतन्तम् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे असुर भी धन्य प्रतीत होते हैं जिनका मन विरोध से उन्हीं में लगा और जिन्होंने युद्ध में चक्रधारी प्रभु को गरुड़ पर देखा।

श्लोक 2.25

वसुदेवस्य देवक्यां जातो भोजेन्द्रबन्धने । चिकीर्षुर्भगवानस्याः शमजेनाभियाचितः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी का क्लेश मिटाने की ब्रह्माजी की प्रार्थना पर भगवान कंस के कारागार में देवकी-वसुदेव के यहाँ प्रकट हुए।

श्लोक 2.26

ततो नन्दव्रजमितः पित्रा कंसाद्विबिभ्यता । एकादशसमास्तत्र गूढार्चिः सबलोऽवसत् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कंस से बचाने के लिए पिता उन्हें नन्दव्रज ले गए; वहाँ बलराम सहित ग्यारह वर्ष अपनी महिमा छिपाकर रहे।

श्लोक 2.27

परीतो वत्सपैर्वत्सांश्चारयन्व्यहरद्विभुः । यमुनोपवने कूजद्द्विजसङ्कुलिताङ्घ्रिपे ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: ग्वालबालों से घिरे वे पक्षियों के कलरव वाले यमुना के उपवनों में बछड़े चराते और खेलते थे।

श्लोक 2.28

कौमारीं दर्शयंश्चेष्टां प्रेक्षणीयां व्रजौकसाम् । रुदन्निव हसन्मुग्द्धबालसिंहावलोकनः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: कभी रोते, कभी हँसते और भोले बालक की तरह पीछे मुड़कर देखते हुए उन्होंने व्रजवासियों को मनोहर बाललीलाएँ दिखाईं।

श्लोक 2.29

स एव गोधनं लक्ष्म्या निकेतं सितगोवृषम् । चारयन्ननुगान्गोपान् रणद्वेणुररीरमत् ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: गाय-बैलों से सम्पन्न गोधन चराते हुए वे बाँसुरी की मधुर ध्वनि से साथ आए ग्वालों को आनन्द देते थे।

श्लोक 2.30

प्रयुक्तान् भोजराजेन मायिनः कामरूपिणः । लीलया व्यनुदत्तांस्तान् बालः क्रीडनकानिव ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: कंस के भेजे रूप बदलने वाले मायावी असुरों को उन्होंने बालक के खिलौनों की तरह सहज ही नष्ट कर दिया।

श्लोक 2.31

विपन्नान्विषपानेन निगृह्य भुजगाधिपम् । उत्थाप्यापाययद्गावस्तत्तोयं प्रकृतिस्थितम् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: कालिय को वश में कर उन्होंने विष से पीड़ित गौओं को बचाया और यमुना का जल फिर निर्मल कर दिया।

श्लोक 2.32

अयाजयद्गोसवेन गोपराजं द्विजोत्तमैः । वित्तस्य चोरुभारस्य चिकीर्षन् सद्व्ययं विभुः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: धन का उत्तम उपयोग कराने के लिए उन्होंने नन्दबाबा से श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा गोपूजन सम्बन्धी यज्ञ कराया।

श्लोक 2.33

वर्षतीन्द्रे व्रजः कोपाद्भग्नमानेऽतिविह्वलः । गोत्रलीलातपत्रेण त्रातो भद्रानुगृह्णता ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्र के क्रोध से मूसलाधार वर्षा होने पर उन्होंने गोवर्धन को छत्र बनाकर भयभीत व्रज की रक्षा की।

श्लोक 2.34

शरच्छशिकरैर्मृष्टं मानयन् रजनीमुखम् । गायन् कलपदं रेमे स्त्रीणां मण्डलमण्डनः ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: शरद् की चाँदनी रातों में वे मधुर गान करते हुए गोपियों के मण्डल की शोभा बनकर रासविहार करते थे।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 2 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 3

श्रीकृष्ण की द्वारका और कुरुक्षेत्र की लीलाएँ

श्लोक 3.1

उद्धव उवाच । ततः स आगत्य पुरं स्वपित्रो- श्चिकीर्षया शं बलदेवसंयुतः । निपात्य तुङ्गाद्रिपुयूथनाथं हतं व्यकर्षद्व्यसुमोजसोर्व्याम् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: उद्धव कहते हैं—कृष्ण बलराम सहित मथुरा आए और माता-पिता को सुख देने के लिए ऊँचे मंच से कंस को गिराकर मार डाला।

श्लोक 3.2

सान्दीपनेः सकृत्प्रोक्तं ब्रह्माधीत्य सविस्तरम् । तस्मै प्रादाद्वरं पुत्रं मृतं पञ्चजनोदरात् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: सान्दीपनि से एक बार सुनकर विस्तृत वेदविद्या ग्रहण की और गुरुदक्षिणा में उनके मृत पुत्र को लौटाया।

श्लोक 3.3

समाहुता भीष्मककन्यया ये श्रियः सवर्णेन बुभूषयैषाम् । गान्धर्ववृत्त्या मिषतां स्वभागं जह्रे पदं मूर्ध्नि दधत्सुपर्णः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: रुक्मिणी के स्वयंवर में आए राजाओं के देखते-देखते उन्होंने गरुड़ के पराक्रम की तरह अपनी योग्य वधू का हरण किया।

श्लोक 3.4

ककुद्मतोऽविद्धनसो दमित्वा स्वयंवरे नाग्नजितीमुवाह । तद्भग्नमानानपि गृध्यतोऽज्ञान् जघ्नेऽक्षतः शस्त्रभृतः स्वशस्त्रैः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: सात प्रबल बैलों को वश में करके नाग्नजिती से विवाह किया और विरोधी शस्त्रधारी राजाओं को परास्त किया।

श्लोक 3.5

प्रियं प्रभुर्ग्राम्य इव प्रियाया विधित्सुरार्च्छद् द्युतरुं यदर्थे । वज्र्याद्रवत्तं सगणो रुषान्धः क्रीडामृगो नूनमयं वधूनाम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: सत्यभामा के प्रिय कार्य के लिए पारिजात लाए; क्रोधित इन्द्र ने देवों सहित विरोध किया—यह भी उनकी प्रेमलीला थी।

श्लोक 3.6

सुतं मृधे खं वपुषा ग्रसन्तं दृष्ट्वा सुनाभोन्मथितं धरित्र्या । आमन्त्रितस्तत्तनयाय शेषं दत्त्वा तदन्तःपुरमाविवेश ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: सुदर्शन से भौमासुर का वध करने पर पृथ्वीदेवी ने प्रार्थना की; भगवान ने उसके पुत्र को राज्य देकर अन्तःपुर में प्रवेश किया।

श्लोक 3.7

तत्राहृतास्ता नरदेवकन्याः कुजेन दृष्ट्वा हरिमार्तबन्धुम् । उत्थाय सद्यो जगृहुः प्रहर्ष- व्रीडानुरागप्रहितावलोकैः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: बन्दी राजकन्याओं ने दुःखियों के बन्धु कृष्ण को देखकर हर्ष, लज्जा और प्रेमभरी दृष्टि से पति के रूप में स्वीकार किया।

श्लोक 3.8

आसां मुहूर्त एकस्मिन्नानागारेषु योषिताम् । सविधं जगृहे पाणीननुरूपः स्वमायया ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने अपनी योगमाया से अनेक रूप धारण कर एक ही समय अलग-अलग महलों में उन कन्याओं का पाणिग्रहण किया।

श्लोक 3.9

तास्वपत्यान्यजनयदात्मतुल्यानि सर्वतः । एकैकस्यां दश दश प्रकृतेर्विबुभूषया ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: गृहस्थलीला का विस्तार करते हुए प्रत्येक रानी से अपने समान गुणों वाले दस-दस पुत्र उत्पन्न किए।

श्लोक 3.10

कालमागधशाल्वादीननीकै रुन्धतः पुरम् । अजीघनत्स्वयं दिव्यं स्वपुंसां तेज आदिशत् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: नगर को घेरने वाले कालयवन, जरासन्ध और शाल्व आदि को स्वयं या अपने वीर सहयोगियों के द्वारा परास्त कराया।

श्लोक 3.11

शम्बरं द्विविदं बाणं मुरं बल्वलमेव च । अन्यांश्च दन्तवक्त्रादीनवधीत्कांश्च घातयत् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: शम्बर, द्विविद, बाण, मुर, बल्वल और दन्तवक्त्र आदि दुष्टों को उन्होंने स्वयं अथवा अपने भक्तों से पराजित कराया।

श्लोक 3.12

अथ ते भ्रातृपुत्राणां पक्षयोः पतितान्नृपान् । चचाल भूः कुरुक्षेत्रं येषामापततां बलैः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: धृतराष्ट्र और पाण्डु के पुत्रों के दोनों पक्षों में आए राजाओं की विशाल सेनाओं से कुरुक्षेत्र की भूमि काँप उठी।

श्लोक 3.13

सकर्णदुःशासनसौबलानां कुमन्त्रपाकेन हतश्रियायुषम् । सुयोधनं सानुचरं शयानं भग्नोरुमुर्व्यां न ननन्द पश्यन् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: कर्ण, दुःशासन और शकुनि की कुमन्त्रणा से विनष्ट ऐश्वर्य वाला दुर्योधन टूटी जाँघों सहित पड़ा था; उसे देखकर कृष्ण प्रसन्न नहीं हुए।

श्लोक 3.14

कियान्भुवोऽयं क्षपितोरुभारो यद्द्रोणभीष्मार्जुनभीममूलैः । अष्टादशाक्षौहिणिको मदंशै- रास्ते बलं दुर्विषहं यदूनाम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रभु ने सोचा—अठारह अक्षौहिणी सेना का भार तो घटा, पर मेरे अंशस्वरूप यादवों का असह्य पराक्रम अभी बना है।

श्लोक 3.15

मिथो यदैषां भविता विवादो मध्वामदाताम्रविलोचनानाम् । नैषां वधोपाय इयानतोऽन्यो मय्युद्यतेऽन्तर्दधते स्वयं स्म ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: यादवों का अन्त परस्पर विवाद से ही होगा; मेरे रहते उन्हें कोई दूसरा नहीं जीत सकता—इस प्रकार उन्होंने लीला समेटने का विचार किया।

श्लोक 3.16

एवं सञ्चिन्त्य भगवान्स्वराज्ये स्थाप्य धर्मजम् । नन्दयामास सुहृदः साधूनां वर्त्म दर्शयन् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: युधिष्ठिर को राज्य पर स्थापित करके भगवान ने स्वजनों को सुख दिया और साधु आचरण का आदर्श दिखाया।

श्लोक 3.17

उत्तरायां धृतः पूरोर्वंशः साध्वभिमन्युना । स वै द्रौण्यस्त्रसञ्च्छिन्नः पुनर्भगवता धृतः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में अश्वत्थामा के अस्त्र से नष्ट होने लगे परीक्षित की भगवान ने रक्षा की।

श्लोक 3.18

अयाजयद्धर्मसुतमश्वमेधैस्त्रिभिर्विभुः । सोऽपि क्ष्मामनुजै रक्षन् रेमे कृष्णमनुव्रतः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने युधिष्ठिर से तीन अश्वमेध कराए; युधिष्ठिर भाइयों सहित प्रजा की रक्षा करते हुए कृष्ण का अनुसरण करते रहे।

श्लोक 3.19

भगवानपि विश्वात्मा लोकवेदपथानुगः । कामान् सिषेवे द्वार्वत्यामसक्तः साङ्ख्यमास्थितः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: द्वारका में भगवान लोक और वेद की मर्यादा का पालन करते हुए विवेक और अनासक्ति सहित गृहस्थलीला करते थे।

श्लोक 3.20

स्निग्द्धस्मितावलोकेन वाचा पीयूषकल्पया । चरित्रेणानवद्येन श्रीनिकेतेन चात्मना ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी स्नेहभरी मुस्कान, अमृतमयी वाणी, निर्दोष आचरण और लक्ष्मी के आश्रयरूप व्यक्तित्व से सब आनन्दित थे।

श्लोक 3.21

इमं लोकममुं चैव रमयन् सुतरां यदून् । रेमे क्षणदया दत्तक्षणस्त्रीक्षणसौहृदः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे इस लोक, परलोक और विशेषकर यादवों को सुख देते; रात्रि में प्रियजनों के साथ स्नेहमय व्यवहार करते थे।

श्लोक 3.22

तस्यैवं रममाणस्य संवत्सरगणान् बहून् । गृहमेधेषु योगेषु विरागः समजायत ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: अनेक वर्षों तक गृहस्थलीला करने के बाद उन्होंने उसे समाप्त करने का वैराग्यमय संकल्प प्रकट किया।

श्लोक 3.23

दैवाधीनेषु कामेषु दैवाधीनः स्वयं पुमान् । को विश्रम्भेत योगेन योगेश्वरमनुव्रतः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्य और विषयसुख दोनों दैवाधीन हैं; योगेश्वर का अनुयायी विवेकी इन अस्थायी संयोगों पर कैसे निर्भर रहे?

श्लोक 3.24

पुर्यां कदाचित्क्रीडद्भिर्यदुभोजकुमारकैः । कोपिता मुनयः शेपुर्भगवन्मतकोविदाः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक दिन खेलते हुए यदु-भोजकुमारों ने मुनियों को कुपित किया और उनसे शाप पाया; मुनि भी भगवान का अभिप्राय जानते थे।

श्लोक 3.25

ततः कतिपयैर्मासैर्वृष्णिभोजान्धकादयः । ययुः प्रभासं संहृष्टा रथैर्देवविमोहिताः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: कुछ महीने बाद दैवी प्रेरणा से वृष्णि, भोज और अन्धकवंशी प्रसन्न होकर रथों से प्रभास पहुँचे।

श्लोक 3.26

तत्र स्नात्वा पितॄन् देवान् ऋषींश्चैव तदम्भसा । तर्पयित्वाथ विप्रेभ्यो गावो बहुगुणा ददुः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ स्नान करके उन्होंने पितरों, देवों और ऋषियों का तर्पण किया तथा ब्राह्मणों को उत्तम गौएँ दान दीं।

श्लोक 3.27

हिरण्यं रजतं शय्यां वासांस्यजिनकम्बलान् । यानं रथानिभान्कन्या धरां वृत्तिकरीमपि ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: सोना, चाँदी, शय्या, वस्त्र, मृगचर्म, कम्बल, वाहन, रथ, हाथी और निर्वाह योग्य भूमि आदि का दान किया।

श्लोक 3.28

अन्नं चोरुरसं तेभ्यो दत्त्वा भगवदर्पणम् । गोविप्रार्थासवः शूराः प्रणेमुर्भुवि मूर्धभिः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वादिष्ट अन्न भगवान को समर्पित करके ब्राह्मणों को खिलाया; गौ-ब्राह्मणहित में लगे वीरों ने धरती पर सिर रखकर प्रणाम किया।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 3 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 4

उद्धव को उपदेश और विदुर का मैत्रेय के पास जाना

श्लोक 4.1

उद्धव उवाच । अथ ते तदनुज्ञाता भुक्त्वा पीत्वा च वारुणीम् । तया विभ्रंशितज्ञाना दुरुक्तैर्मर्म पस्पृशुः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: उद्धव बोले—भोजन और मदिरापान के बाद यादवों का विवेक भ्रष्ट हुआ और कटुवचनों से वे एक-दूसरे को आहत करने लगे।

श्लोक 4.2

तेषां मैरेयदोषेण विषमीकृतचेतसाम् । निम्लोचति रवावासीद्वेणूनामिव मर्दनम् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: मदिरा से विक्षुब्ध हुए यादव सूर्यास्त के समय परस्पर ऐसे भिड़े जैसे बाँस आपस में रगड़ खाकर नष्ट होते हैं।

श्लोक 4.3

भगवान् स्वात्ममायाया गतिं तामवलोक्य सः । सरस्वतीमुपस्पृश्य वृक्षमूलमुपाविशत् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपनी माया का यह क्रम देखकर भगवान ने सरस्वती का आचमन किया और एक वृक्ष के नीचे बैठ गए।

श्लोक 4.4

अहं चोक्तो भगवता प्रपन्नार्तिहरेण ह । बदरीं त्वं प्रयाहीति स्वकुलं सञ्जिहीर्षुणा ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने कुल की लीला समेटते समय शरणागतवत्सल भगवान ने मुझे बदरिकाश्रम जाने की आज्ञा दी।

श्लोक 4.5

अथापि तदभिप्रेतं जानन्नहमरिन्दम । पृष्ठतोऽन्वगमं भर्तुः पादविश्लेषणाक्षमः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनका अभिप्राय जानते हुए भी चरणवियोग असह्य होने से मैं उनके पीछे-पीछे चला गया।

श्लोक 4.6

अद्राक्षमेकमासीनं विचिन्वन् दयितं पतिम् । श्रीनिकेतं सरस्वत्यां कृतकेतमकेतनम् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रिय स्वामी को खोजते हुए मैंने उन्हें सरस्वती तट पर अकेले बैठे देखा; सर्वाश्रय प्रभु ने वहीं अपना निवास बनाया था।

श्लोक 4.7

श्यामावदातं विरजं प्रशान्तारुणलोचनम् । दोर्भिश्चतुर्भिर्विदितं पीतकौशाम्बरेण च ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनका श्यामसुन्दर शरीर निर्मल था, नेत्र शान्त अरुण, चार भुजाएँ थीं और वे पीत रेशमी वस्त्र पहने थे।

श्लोक 4.8

वाम ऊरावधिश्रित्य दक्षिणाङ्घ्रिसरोरुहम् । अपाश्रितार्भकाश्वत्थमकृशं त्यक्तपिप्पलम् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे बाईं जाँघ पर दायाँ चरण रखकर छोटे पीपल के सहारे बैठे थे; विषयसुख से विरत होकर भी उनका सौन्दर्य पूर्ण था।

श्लोक 4.9

तस्मिन्महाभागवतो द्वैपायनसुहृत्सखा । लोकाननुचरन् सिद्ध आससाद यदृच्छया ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसी समय लोकों में भ्रमण करते हुए व्यासजी के मित्र और परम भक्त मैत्रेयमुनि भी वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 4.10

तस्यानुरक्तस्य मुनेर्मुकुन्दः प्रमोदभावानतकन्धरस्य । आश‍ृण्वतो मामनुरागहास- समीक्षया विश्रमयन्नुवाच ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रेम से सिर झुकाए मैत्रेय सुन रहे थे; कृष्ण ने स्नेहपूर्ण मुस्कान और दृष्टि से मुझे आश्वस्त करते हुए कहा।

श्लोक 4.11

श्रीभगवानुवाच । वेदाहमन्तर्मनसीप्सितं ते ददामि यत्तद्दुरवापमन्यैः । सत्रे पुरा विश्वसृजां वसूनां मत्सिद्धिकामेन वसो त्वयेष्टः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—मैं तुम्हारी अन्तःकरण की इच्छा जानता हूँ; पूर्वजन्म में वसु रहते तुमने मुझे पाने के लिए आराधना की थी।

श्लोक 4.12

स एष साधो चरमो भवाना- मासादितस्ते मदनुग्रहो यत् । यन्मां नृलोकान् रह उत्सृजन्तं दिष्ट्या ददृश्वान् विशदानुवृत्त्या ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरी कृपा से यह तुम्हारा अन्तिम जन्म है; लोकलीला समेटते समय तुम्हें मेरा यह एकान्त दर्शन मिला है।

श्लोक 4.13

पुरा मया प्रोक्तमजाय नाभ्ये पद्मे निषण्णाय ममादिसर्गे । ज्ञानं परं मन्महिमावभासं यत्सूरयो भागवतं वदन्ति ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: सृष्टि के प्रारम्भ में मैंने नाभिकमल पर बैठे ब्रह्मा को अपनी महिमा प्रकट करने वाला परम भागवतज्ञान दिया था।

श्लोक 4.14

इत्यादृतोक्तः परमस्य पुंसः प्रतिक्षणानुग्रहभाजनोऽहम् । स्नेहोत्थरोमा स्खलिताक्षरस्तं मुञ्चञ्छुचः प्राञ्जलिराबभाषे ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उद्धव बोले—उनकी ऐसी आदरभरी वाणी से मैं रोमाञ्चित हुआ; आँसू बहाते और रुँधे स्वर में हाथ जोड़कर निवेदन किया।

श्लोक 4.15

को न्वीश ते पादसरोजभाजां सुदुर्लभोऽर्थेषु चतुर्ष्वपीह । तथापि नाहं प्रवृणोमि भूमन् भवत्पदाम्भोजनिषेवणोत्सुकः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपके सेवक के लिए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष भी दुर्लभ नहीं; किन्तु मुझे केवल आपके चरणों की सेवा चाहिए।

श्लोक 4.16

कर्माण्यनीहस्य भवोऽभवस्य ते दुर्गाश्रयोऽथारिभयात्पलायनम् । कालात्मनो यत्प्रमदायुताश्रमः स्वात्मन् रतेः खिद्यति धीर्विदामिह ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: निष्कर्म का कर्म, अजन्मा का जन्म, निर्भय का पलायन और आत्माराम की गृहस्थलीला देखकर ज्ञानी की बुद्धि भी चकित होती है।

श्लोक 4.17

मन्त्रेषु मां वा उपहूय यत्त्व- मकुण्ठिताखण्डसदात्मबोधः । पृच्छेः प्रभो मुग्द्ध इवाप्रमत्तः तन्नो मनो मोहयतीव देव ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप अखण्ड ज्ञानस्वरूप होकर भी परामर्श के लिए मुझे बुलाकर अज्ञानी की तरह पूछते थे; आपकी लीला मन को विस्मित करती है।

श्लोक 4.18

ज्ञानं परं स्वात्मरहःप्रकाशं प्रोवाच कस्मै भगवान् समग्रम् । अपि क्षमं नो ग्रहणाय भर्तः वदाञ्जसा यद्वृजिनं तरेम ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे स्वामी, अपने स्वरूप का रहस्य प्रकाशित करने वाला वह परमज्ञान मुझे सरलता से बताइए जिससे संसार का क्लेश पार करूँ।

श्लोक 4.19

इत्यावेदितहार्दाय मह्यं स भगवान् परः । आदिदेशारविन्दाक्ष आत्मनः परमां स्थितिम् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरी अन्तरंग प्रार्थना सुनकर कमलनयन भगवान ने मुझे अपने परम स्वरूप की स्थिति का उपदेश दिया।

श्लोक 4.20

स एवमाराधितपादतीर्था- दधीततत्त्वात्मविबोधमार्गः । प्रणम्य पादौ परिवृत्य देव- मिहागतोऽहं विरहातुरात्मा ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनसे आत्मतत्त्व का मार्ग सीखकर, चरणवन्दना और प्रदक्षिणा करके मैं विरह से व्याकुल यहाँ आया हूँ।

श्लोक 4.21

सोऽहं तद्दर्शनाह्लादवियोगार्तियुतः प्रभो । गमिष्ये दयितं तस्य बदर्याश्रममण्डलम् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: दर्शन का आनन्द और वियोग का दुःख दोनों लेकर अब मैं उनके प्रिय बदरिकाश्रम जाऊँगा।

श्लोक 4.22

यत्र नारायणो देवो नरश्च भगवान् ऋषिः । मृदु तीव्रं तपो दीर्घं तेपाते लोकभावनौ ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ जगत के हितैषी नर और नारायण ऋषि दीर्घकाल से शान्त किन्तु कठोर तप करते हैं।

श्लोक 4.23

श्रीशुक उवाच । इत्युद्धवादुपाकर्ण्य सुहृदां दुःसहं वधम् । ज्ञानेनाशमयत्क्षत्ता शोकमुत्पतितं बुधः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी कहते हैं—स्वजनों के असह्य विनाश का समाचार सुनकर विदुर ने उत्पन्न शोक को तत्त्वज्ञान से शान्त किया।

श्लोक 4.24

स तं महाभागवतं व्रजन्तं कौरवर्षभः । विश्रम्भादभ्यधत्तेदं मुख्यं कृष्णपरिग्रहे ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर उन्होंने कृष्ण के परम प्रिय भक्त उद्धव से विश्वासपूर्वक एक विनम्र निवेदन किया।

श्लोक 4.25

विदुर उवाच । ज्ञानं परं स्वात्मरहःप्रकाशं यदाह योगेश्वर ईश्वरस्ते । वक्तुं भवान्नोऽर्हति यद्धि विष्णो- र्भृत्याः स्वभृत्यार्थकृतश्चरन्ति ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर बोले—योगेश्वर ने आपको जो आत्मरहस्य का ज्ञान दिया है, मुझे भी सुनाइए; भगवान के सेवक अन्य सेवकों का हित करते हैं।

श्लोक 4.26

उद्धव उवाच । ननु ते तत्त्वसंराध्य ऋषिः कौषारवोऽन्ति मे । साक्षाद्भगवताऽऽदिष्टो मर्त्यलोकं जिहासता ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उद्धव ने कहा—मैत्रेय ऋषि निकट ही हैं; लोकलीला समेटते समय भगवान ने उन्हें आपके उपदेश का आदेश दिया था।

श्लोक 4.27

श्रीशुक उवाच । इति सह विदुरेण विश्वमूर्ते- र्गुणकथया सुधया प्लावितोरुतापः । क्षणमिव पुलिने यमस्वसुस्तां समुषित औपगविर्निशां ततोऽगात् ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: यमुना तट पर कृष्णकथामृत से विरहताप शान्त करते हुए दोनों की रात क्षण जैसी बीत गई; फिर उद्धव चले गए।

श्लोक 4.28

राजोवाच । निधनमुपगतेषु वृष्णिभोजे- ष्वधिरथयूथपयूथपेषु मुख्यः । स तु कथमवशिष्ट उद्धवो य- द्धरिरपि तत्यज आकृतिं त्र्यधीशः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: परीक्षित ने पूछा—यादववीरों के नाश और भगवान के अन्तर्धान के बाद मुख्य भक्त उद्धव कैसे शेष रहे?

श्लोक 4.29

श्रीशुक उवाच । ब्रह्मशापापदेशेन कालेनामोघवाञ्छितः । संहृत्य स्वकुलं नूनं त्यक्ष्यन् देहमचिन्तयत् ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—ब्रह्मशाप को निमित्त बनाकर कुललीला समेटते समय अचूक संकल्प वाले भगवान ने विचार किया।

श्लोक 4.30

अस्माल्लोकादुपरते मयि ज्ञानं मदाश्रयम् । अर्हत्युद्धव एवाद्धा सम्प्रत्यात्मवतां वरः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरे प्रकट दर्शन समाप्त होने पर मेरे आश्रित ज्ञान को धारण करने के योग्य आत्मज्ञानियों में श्रेष्ठ उद्धव ही हैं।

श्लोक 4.31

नोद्धवोऽण्वपि मन्न्यूनो यद्गुणैर्नार्दितः प्रभुः । अतो मद्वयुनं लोकं ग्राहयन्निह तिष्ठतु ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उद्धव मुझसे ज्ञान में न्यून नहीं और गुणों से अभिभूत नहीं होते; वे जगत को मेरा ज्ञान समझाने के लिए रहें।

श्लोक 4.32

एवं त्रिलोकगुरुणा सन्दिष्टः शब्दयोनिना । बदर्याश्रममासाद्य हरिमीजे समाधिना ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: त्रिलोकगुरु की आज्ञा पाकर उद्धव बदरिकाश्रम गए और समाधि द्वारा हरि की आराधना करने लगे।

श्लोक 4.33

विदुरोऽप्युद्धवाच्छ्रुत्वा कृष्णस्य परमात्मनः । क्रीडयोपात्तदेहस्य कर्माणि श्लाघितानि च ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर ने उद्धव से परमात्मा कृष्ण की प्रशंसनीय लीलाएँ सुनीं, जिन्होंने खेल के लिए मनुष्यरूप धारण किया था।

श्लोक 4.34

देहन्यासं च तस्यैवं धीराणां धैर्यवर्धनम् । अन्येषां दुष्करतरं पशूनां विक्लवात्मनाम् ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने प्रभु की लीला-समाप्ति भी सुनी, जो विवेकियों को धैर्य देती है किन्तु देहासक्त और व्याकुल जनों को कठिन लगती है।

श्लोक 4.35

आत्मानं च कुरुश्रेष्ठ कृष्णेन मनसेक्षितम् । ध्यायन् गते भागवते रुरोद प्रेमविह्वलः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: कृष्ण ने मेरा भी स्मरण किया—यह सोचकर उद्धव के जाने के बाद विदुर प्रेमविह्वल होकर रो पड़े।

श्लोक 4.36

कालिन्द्याः कतिभिः सिद्ध अहोभिर्भरतर्षभ । प्रापद्यत स्वःसरितं यत्र मित्रासुतो मुनिः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कुछ दिनों बाद विदुर यमुना से गंगातट पहुँचे, जहाँ मैत्रेयमुनि विराजमान थे।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 4 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 5

विदुर–मैत्रेय संवाद और सृष्टितत्त्व

श्लोक 5.1

श्रीशुक उवाच । द्वारि द्युनद्या ऋषभः कुरूणां मैत्रेयमासीनमगाधबोधम् । क्षत्तोपसृत्याच्युतभावशुद्धः पप्रच्छ सौशील्यगुणाभितृप्तः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—गंगाद्वार पर बैठे अगाधज्ञानी, सौम्य मैत्रेयजी के पास जाकर कृष्णभक्ति से निर्मल विदुर ने प्रश्न किया।

श्लोक 5.2

विदुर उवाच । सुखाय कर्माणि करोति लोको न तैः सुखं वान्यदुपारमं वा । विन्देत भूयस्तत एव दुःखं यदत्र युक्तं भगवान् वदेन्नः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्य सुख के लिए कर्म करता है, पर उनसे न स्थायी सुख मिलता है न दुःख का अन्त; कृपया इसका उचित उपाय बताइए।

श्लोक 5.3

जनस्य कृष्णाद्विमुखस्य दैवा- दधर्मशीलस्य सुदुःखितस्य । अनुग्रहायेह चरन्ति नूनं भूतानि भव्यानि जनार्दनस्य ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: कृष्णविमुख और अधर्म से दुःखी लोगों पर कृपा करने के लिए ही भगवान के कल्याणकारी भक्त संसार में विचरते हैं।

श्लोक 5.4

तत्साधुवर्यादिश वर्त्म शं नः संराधितो भगवान् येन पुंसाम् । हृदि स्थितो यच्छति भक्तिपूते ज्ञानं स तत्त्वाधिगमं पुराणम् ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह कल्याणमार्ग बताइए जिससे भगवान प्रसन्न होकर भक्तिपवित्र हृदय में अपने स्वरूप का यथार्थ ज्ञान प्रदान करते हैं।

श्लोक 5.5

करोति कर्माणि कृतावतारो यान्यात्मतन्त्रो भगवांस्त्र्यधीशः । यथा ससर्जाग्र इदं निरीहः संस्थाप्य वृत्तिं जगतो विधत्ते ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वतन्त्र भगवान अवतारों में कौन-कौन से कर्म करते हैं और निष्काम रहकर सृष्टि तथा जगत की जीविका कैसे स्थापित करते हैं?

श्लोक 5.6

यथा पुनः स्वे ख इदं निवेश्य शेते गुहायां स निवृत्तवृत्तिः । योगेश्वराधीश्वर एक एत- दनुप्रविष्टो बहुधा यथाऽऽसीत् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे जगत को अपने में समेटकर योगनिद्रा कैसे करते हैं और एक होकर उसमें अनेक रूपों से कैसे प्रवेश करते हैं?

श्लोक 5.7

क्रीडन्विधत्ते द्विजगोसुराणां क्षेमाय कर्माण्यवतारभेदैः । मनो न तृप्यत्यपि श‍ृण्वतां नः सुश्लोकमौलेश्चरितामृतानि ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: गौ, ब्राह्मण और देवों के हित में उनकी अवतारलीलाएँ सुनते-सुनते भी हमारा मन तृप्त नहीं होता।

श्लोक 5.8

यैस्तत्त्वभेदैरधिलोकनाथो लोकानलोकान् सह लोकपालान् । अचीक्लृपद्यत्र हि सर्वसत्त्व- निकायभेदोऽधिकृतः प्रतीतः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: किन तत्त्वों से उन्होंने लोक, लोकालोक और लोकपाल बनाए, जिनमें विभिन्न जीवसमूह अपने स्थान पाते हैं?

श्लोक 5.9

येन प्रजानामुत आत्मकर्म- रूपाभिधानां च भिदां व्यधत्त । नारायणो विश्वसृगात्मयोनि- रेतच्च नो वर्णय विप्रवर्य ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारायण से उत्पन्न ब्रह्मा ने जीवों के कर्म, रूप और नामों के विविध विभाग कैसे किए? यह समझाइए।

श्लोक 5.10

परावरेषां भगवन्व्रतानि श्रुतानि मे व्यासमुखादभीक्ष्णम् । अतृप्नुम क्षुल्लसुखावहानां तेषामृते कृष्णकथामृतौघात् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: व्यासजी से अनेक ऊँचे-नीचे कर्ममार्ग सुन चुका हूँ; क्षणिक सुख देने वाले उन विषयों से तृप्ति नहीं मिली, कृष्णकथा ही सार है।

श्लोक 5.11

कस्तृप्नुयात्तीर्थपदोऽभिधाना- त्सत्रेषु वः सूरिभिरीड्यमानात् । यः कर्णनाडीं पुरुषस्य यातो भवप्रदां गेहरतिं छिनत्ति ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपके सत्सङ्ग में गाई जाने वाली हरिकथा से कौन तृप्त हो सकता है? वह कानों में प्रवेश करके बन्धनकारी गृहासक्ति काटती है।

श्लोक 5.12

मुनिर्विवक्षुर्भगवद्गुणानां सखापि ते भारतमाह कृष्णः । यस्मिन्नृणां ग्राम्यसुखानुवादै- र्मतिर्गृहीता नु हरेः कथायाम् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपके मित्र व्यासजी ने महाभारत में लौकिक प्रसंगों से मन आकर्षित करके लोगों को हरिकथा की ओर लगाया।

श्लोक 5.13

सा श्रद्दधानस्य विवर्धमाना विरक्तिमन्यत्र करोति पुंसः । हरेः पदानुस्मृतिनिर्वृतस्य समस्तदुःखाप्ययमाशु धत्ते ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रद्धा से बढ़ती कृष्णकथा-रुचि अन्य आसक्तियाँ घटाती है और हरिचरणस्मरण का आनन्द देकर दुःखों का नाश करती है।

श्लोक 5.14

ताञ्छोच्यशोच्यानविदोऽनुशोचे हरेः कथायां विमुखानघेन । क्षिणोति देवोऽनिमिषस्तु येषा- मायुर्वृथा वादगतिस्मृतीनाम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुझे उन अज्ञानियों पर दया आती है जो हरिकथा से विमुख होकर निरर्थक वाद-विवाद में अपना अमूल्य जीवन खो देते हैं।

श्लोक 5.15

तदस्य कौषारव शर्म दातु- र्हरेः कथामेव कथासु सारम् । उद्धृत्य पुष्पेभ्य इवार्तबन्धो शिवाय नः कीर्तय तीर्थकीर्तेः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे मैत्रेय, जैसे फूलों से सार लिया जाता है, वैसे कथाओं का सार हरिकथा निकालकर हमारे कल्याण के लिए सुनाइए।

श्लोक 5.16

स विश्वजन्मस्थितिसंयमार्थे कृतावतारः प्रगृहीतशक्तिः । चकार कर्माण्यतिपूरुषाणि यानीश्वरः कीर्तय तानि मह्यम् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: सृष्टि, पालन और संहार के लिए शक्तियाँ प्रकट करने वाले भगवान के अलौकिक कार्य मुझे सुनाइए।

श्लोक 5.17

श्रीशुक उवाच । स एवं भगवान् पृष्टः क्षत्त्रा कौषारविर्मुनिः । पुंसां निःश्रेयसार्थेन तमाह बहुमानयन् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी कहते हैं—सबके परम कल्याण का प्रश्न सुनकर मैत्रेयजी ने विदुर का आदर करते हुए उत्तर दिया।

श्लोक 5.18

मैत्रेय उवाच । साधु पृष्टं त्वया साधो लोकान् साध्वनुगृह्णता । कीर्तिं वितन्वता लोके आत्मनोऽधोक्षजात्मनः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—साधु विदुर, तुम्हारा प्रश्न उत्तम है; इससे लोगों का कल्याण और तुम्हारी भगवद्भक्ति का यश फैलता है।

श्लोक 5.19

नैतच्चित्रं त्वयि क्षत्तर्बादरायणवीर्यजे । गृहीतोऽनन्यभावेन यत्त्वया हरिरीश्वरः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: व्यासजी के पुत्र और हरि के अनन्य भक्त होने के कारण तुम्हारा ऐसा प्रश्न करना आश्चर्य की बात नहीं।

श्लोक 5.20

माण्डव्यशापाद्भगवान् प्रजासंयमनो यमः । भ्रातुः क्षेत्रे भुजिष्यायां जातः सत्यवतीसुतात् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: माण्डव्यमुनि के शाप से यमराज ने व्यासजी द्वारा दासी के गर्भ में विदुर के रूप में जन्म लिया था।

श्लोक 5.21

भवान्भगवतो नित्यं सम्मतः सानुगस्य ह । यस्य ज्ञानोपदेशाय मादिशद्भगवान् व्रजन् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम भगवान और उनके अनुयायियों के सदैव प्रिय हो; जाते समय उन्होंने मुझे तुम्हें ज्ञान देने की आज्ञा दी थी।

श्लोक 5.22

अथ ते भगवल्लीलायोगमायोरुबृंहिताः । विश्वस्थित्युद्भवान्तार्था वर्णयाम्यनुपूर्वशः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: अब मैं योगमाया से विस्तृत भगवान की सृष्टि, स्थिति और प्रलय की लीलाएँ क्रम से बताता हूँ।

श्लोक 5.23

भगवानेक आसेदमग्र आत्माऽऽत्मनां विभुः । आत्मेच्छानुगतावात्मा नानामत्युपलक्षणः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: सृष्टि से पहले सबके आत्मा, स्वतन्त्र और सर्वव्यापी भगवान ही थे; विविध नाम-रूप उनकी इच्छा के अधीन प्रकट होते हैं।

श्लोक 5.24

स वा एष तदा द्रष्टा नापश्यद्‍दृश्यमेकराट् । मेनेऽसन्तमिवात्मानं सुप्तशक्तिरसुप्तदृक् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस समय उनकी सृजनशक्ति अप्रकट थी; वे जाग्रत साक्षी थे, किन्तु देखने योग्य अलग जगत प्रकट नहीं था।

श्लोक 5.25

सा वा एतस्य सन्द्रष्टुः शक्तिः सदसदात्मिका । माया नाम महाभाग ययेदं निर्ममे विभुः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी सत्-असत् कार्यकारणरूप शक्ति को माया कहते हैं; उसी से प्रभु इस जगत की रचना करते हैं।

श्लोक 5.26

कालवृत्त्या तु मायायां गुणमय्यामधोक्षजः । पुरुषेणात्मभूतेन वीर्यमाधत्त वीर्यवान् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: काल की प्रेरणा से भगवान ने अपने पुरुषस्वरूप द्वारा त्रिगुणमयी माया में सृजनसामर्थ्य स्थापित किया।

श्लोक 5.27

ततोऽभवन्महत्तत्त्वमव्यक्तात्कालचोदितात् । विज्ञानात्माऽऽत्मदेहस्थं विश्वं व्यञ्जंस्तमोनुदः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: कालप्रेरित अव्यक्त प्रकृति से महत्तत्त्व प्रकट हुआ, जिसने अज्ञान का आवरण हटाकर विश्व की अभिव्यक्ति सम्भव की।

श्लोक 5.28

सोऽप्यंशगुणकालात्मा भगवद्‍दृष्टिगोचरः । आत्मानं व्यकरोदात्मा विश्वस्यास्य सिसृक्षया ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की दृष्टि, काल और गुणों से युक्त महत्तत्त्व ने विश्वरचना के लिए अपने में परिवर्तन किया।

श्लोक 5.29

महत्तत्त्वाद्विकुर्वाणादहन्तत्त्वं व्यजायत । कार्यकारणकर्त्रात्मा भूतेन्द्रियमनोमयः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: महत्तत्त्व के विकार से अहंकार उत्पन्न हुआ, जो भूत, इन्द्रिय और मनरूप कार्य, कारण तथा कर्तृत्व का आधार बना।

श्लोक 5.30

वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेत्यहं त्रिधा । अहन्तत्त्वाद्विकुर्वाणान्मनो वैकारिकादभूत् । वैकारिकाश्च ये देवा अर्थाभिव्यञ्जनं यतः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: अहंकार सात्त्विक, राजस और तामस—तीन प्रकार का हुआ; सात्त्विक से मन और इन्द्रियों के अधिष्ठाता देव प्रकट हुए।

श्लोक 5.31

तैजसानीन्द्रियाण्येव ज्ञानकर्ममयानि च । तामसो भूतसूक्ष्मादिर्यतः खं लिङ्गमात्मनः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजस अहंकार से ज्ञान और कर्म की इन्द्रियाँ तथा तामस से सूक्ष्म भूतकारण और शब्दगुणयुक्त आकाश उत्पन्न हुआ।

श्लोक 5.32

कालमायांशयोगेन भगवद्वीक्षितं नभः । नभसोऽनुसृतं स्पर्शं विकुर्वन्निर्ममेऽनिलम् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की दृष्टि और काल-माया के संयोग से आकाश में स्पर्शतत्त्व प्रकट हुआ और उससे वायु बनी।

श्लोक 5.33

अनिलोऽपि विकुर्वाणो नभसोरुबलान्वितः । ससर्ज रूपतन्मात्रं ज्योतिर्लोकस्य लोचनम् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: वायु के परिवर्तन से रूपतन्मात्रा और प्रकाशरूप अग्नितत्त्व उत्पन्न हुआ, जो देखने का आधार है।

श्लोक 5.34

अनिलेनान्वितं ज्योतिर्विकुर्वत्परवीक्षितम् । आधत्ताम्भो रसमयं कालमायांशयोगतः ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वायु सहित अग्नितत्त्व में काल-माया और प्रभुदृष्टि से परिवर्तन हुआ और रसगुणयुक्त जल प्रकट हुआ।

श्लोक 5.35

ज्योतिषाम्भोऽनुसंसृष्टं विकुर्वद्ब्रह्मवीक्षितम् । महीं गन्धगुणामाधात्कालमायांशयोगतः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अग्नि और जल के संयोग में परमात्मा की प्रेरणा से परिवर्तन हुआ और गन्धगुणयुक्त पृथ्वीतत्त्व प्रकट हुआ।

श्लोक 5.36

भूतानां नभ आदीनां यद्यद्भव्यावरावरम् । तेषां परानुसंसर्गाद्यथा सङ्ख्यं गुणान् विदुः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: आकाश से पृथ्वी तक बाद के प्रत्येक तत्त्व में अपने गुण के साथ पूर्ववर्ती तत्त्वों के गुण भी क्रम से रहते हैं।

श्लोक 5.37

एते देवाः कला विष्णोः कालमायांशलिङ्गिनः । नानात्वात्स्वक्रियानीशाः प्रोचुः प्राञ्जलयो विभुम् ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: विष्णु की शक्तिरूप तत्त्वदेवता अलग-अलग होने से संयुक्त कार्य न कर सके और हाथ जोड़कर प्रभु से प्रार्थना करने लगे।

श्लोक 5.38

देवा ऊचुः । नमाम ते देवपदारविन्दं प्रपन्नतापोपशमातपत्रम् । यन्मूलकेता यतयोऽञ्जसोरु- संसारदुःखं बहिरुत्क्षिपन्ति ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवता बोले—हम आपके चरणकमलों को प्रणाम करते हैं, जो शरणागतों के ताप मिटाने वाला छत्र और संसारदुःख से मुक्ति का आश्रय हैं।

श्लोक 5.39

धातर्यदस्मिन् भव ईश जीवा- स्तापत्रयेणोपहता न शर्म । आत्मँल्लभन्ते भगवंस्तवाङ्घ्रि- च्छायां सविद्यामत आश्रयेम ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जीव तीन प्रकार के तापों से दुःखी हैं; इसलिए हम ज्ञान प्रदान करने वाली आपके चरणों की शीतल छाया चाहते हैं।

श्लोक 5.40

मार्गन्ति यत्ते मुखपद्मनीडै- श्छन्दःसुपर्णैरृषयो विविक्ते । यस्याघमर्षोदसरिद्वरायाः पदं पदं तीर्थपदः प्रपन्नाः ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वेदों के सहारे ऋषि एकान्त में आपके चरणों को खोजते हैं; उन्हीं से पावन गंगा का प्राकट्य माना जाता है।

श्लोक 5.41

यच्छ्रद्धया श्रुतवत्या च भक्त्या सम्मृज्यमाने हृदयेऽवधाय । ज्ञानेन वैराग्यबलेन धीरा व्रजेम तत्तेऽङ्घ्रिसरोजपीठम् ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रद्धा, श्रवण और भक्ति से हृदय शुद्ध करके हम ज्ञान तथा वैराग्य के बल से आपके चरणाश्रय को प्राप्त हों।

श्लोक 5.42

विश्वस्य जन्मस्थितिसंयमार्थे कृतावतारस्य पदाम्बुजं ते । व्रजेम सर्वे शरणं यदीश स्मृतं प्रयच्छत्यभयं स्वपुंसाम् ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप सृष्टि, पालन और प्रलय के लिए प्रकट होते हैं; हम उन चरणों की शरण लें जिनका स्मरण भक्तों को अभय देता है।

श्लोक 5.43

यत्सानुबन्धेऽसति देहगेहे ममाहमित्यूढदुराग्रहाणाम् । पुंसां सुदूरं वसतोऽपि पुर्यां भजेम तत्ते भगवन् पदाब्जम् ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: देह और घर में अहंता-ममता का हठ रखने वालों से आप दूर प्रतीत होते हैं, यद्यपि उनके हृदय में ही विराजते हैं।

श्लोक 5.44

तान्वै ह्यसद्वृत्तिभिरक्षिभिर्ये पराहृतान्तर्मनसः परेश । अथो न पश्यन्त्युरुगाय नूनं ये ते पदन्यासविलासलक्ष्याः ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: असत् विषयों में इन्द्रियाँ लगाकर मन हर लेने वाले लोग आपको और आपके भक्तों के पवित्र मार्ग को नहीं देख पाते।

श्लोक 5.45

पानेन ते देव कथासुधायाः प्रवृद्धभक्त्या विशदाशया ये । वैराग्यसारं प्रतिलभ्य बोधं यथाञ्जसान्वीयुरकुण्ठधिष्ण्यम् ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: कथामृत से बढ़ी भक्ति और निर्मल मन वाले भक्त वैराग्ययुक्त ज्ञान पाकर सहज ही आपके वैकुण्ठधाम पहुँचते हैं।

श्लोक 5.46

तथापरे चात्मसमाधियोग- बलेन जित्वा प्रकृतिं बलिष्ठाम् । त्वामेव धीराः पुरुषं विशन्ति तेषां श्रमः स्यान्न तु सेवया ते ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: दूसरे साधक कठिन समाधियोग से प्रकृति को जीतकर आपको पाते हैं; आपकी सेवाभक्ति में वैसा श्रम नहीं होता।

श्लोक 5.47

तत्ते वयं लोकसिसृक्षयाद्य त्वयानुसृष्टास्त्रिभिरात्मभिः स्म । सर्वे वियुक्ताः स्वविहारतन्त्रं न शक्नुमस्तत्प्रतिहर्तवे ते ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपने हमें तीन गुणों सहित जगत रचने के लिए उत्पन्न किया है; अलग-अलग रहकर हम आपकी इच्छित रचना नहीं कर पा रहे।

श्लोक 5.48

यावद्बलिं तेऽज हराम काले यथा वयं चान्नमदाम यत्र । यथोभयेषां त इमे हि लोका बलिं हरन्तोऽन्नमदन्त्यनूहाः ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसी व्यवस्था कीजिए कि हम समय पर आपको अर्पण करें, अपना निर्वाह पाएँ और जीव भी परस्पर पोषण का क्रम निभाएँ।

श्लोक 5.49

त्वं नः सुराणामसि सान्वयानां कूटस्थ आद्यः पुरुषः पुराणः । त्वं देव शक्त्यां गुणकर्मयोनौ रेतस्त्वजायां कविमादधेऽजः ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप हम देवों और हमारी शक्तियों के अचल मूल हैं; अजन्मा होकर आपने प्रकृति में महत्तत्त्व की सृजनशक्ति स्थापित की है।

श्लोक 5.50

ततो वयं सत्प्रमुखा यदर्थे बभूविमात्मन् करवाम किं ते । त्वं नः स्वचक्षुः परिदेहि शक्त्या देव क्रियार्थे यदनुग्रहाणाम् ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे प्रभु, हमें बताइए कि किस प्रकार आपकी सेवा करें; कार्य सिद्ध करने के लिए अपनी ज्ञानदृष्टि और सामर्थ्य प्रदान कीजिए।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 5 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 6

विराट पुरुष और इन्द्रियशक्तियों का प्राकट्य

श्लोक 6.1

ऋषिरुवाच । इति तासां स्वशक्तीनां सतीनामसमेत्य सः । प्रसुप्तलोकतन्त्राणां निशाम्य गतिमीश्वरः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेयजी कहते हैं—भगवान ने देखा कि उनकी शक्तियाँ अलग-अलग हैं और संयुक्त जगत-व्यवस्था अभी जाग्रत नहीं हुई।

श्लोक 6.2

कालसञ्ज्ञां तदा देवीं बिभ्रच्छक्तिमुरुक्रमः । त्रयोविंशति तत्त्वानां गणं युगपदाविशत् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: तब उन्होंने कालशक्ति धारण करके तेईस तत्त्वों के समूह में एक साथ प्रवेश किया।

श्लोक 6.3

सोऽनुप्रविष्टो भगवांश्चेष्टारूपेण तं गणम् । भिन्नं संयोजयामास सुप्तं कर्म प्रबोधयन् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: चेष्टाशक्ति के रूप में प्रवेश करके प्रभु ने बिखरे तत्त्वों को जोड़ा और उनकी सुप्त कार्यक्षमता जगाई।

श्लोक 6.4

प्रबुद्धकर्मा दैवेन त्रयोविंशतिको गणः । प्रेरितोऽजनयत्स्वाभिर्मात्राभिरधिपूरुषम् ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: दैवी प्रेरणा से जागे तेईस तत्त्वों ने अपनी शक्तियों के संयोग से विराट पुरुष को प्रकट किया।

श्लोक 6.5

परेण विशता स्वस्मिन्मात्रया विश्वसृग्गणः । चुक्षोभान्योन्यमासाद्य यस्मिन् लोकाश्चराचराः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के अंशप्रवेश से सृष्टितत्त्व परस्पर मिले और वह विराट रूप बना जिसमें चराचर लोक स्थित हैं।

श्लोक 6.6

हिरण्मयः स पुरुषः सहस्रपरिवत्सरान् । आण्डकोश उवासाप्सु सर्वसत्त्वोपबृंहितः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: सभी जीवों की सम्भावनाएँ धारण करने वाला वह तेजोमय पुरुष जल में स्थित ब्रह्माण्ड के भीतर सहस्र वर्षों तक रहा।

श्लोक 6.7

स वै विश्वसृजां गर्भो देवकर्मात्मशक्तिमान् । विबभाजात्मनाऽऽत्मानमेकधा दशधा त्रिधा ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवता, कर्म और आत्मशक्तियाँ उसमें थीं; उसने अपने को एक, दस और तीन रूपों में विभक्त किया।

श्लोक 6.8

एष ह्यशेषसत्त्वानामात्मांशः परमात्मनः । आद्योऽवतारो यत्रासौ भूतग्रामो विभाव्यते ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह सब जीवों का आश्रय और परमात्मा का प्रथम विराट अवतार है, जिसमें समस्त भूतसमूह का ध्यान किया जाता है।

श्लोक 6.9

साध्यात्मः साधिदैवश्च साधिभूत इति त्रिधा । विराट् प्राणो दशविध एकधा हृदयेन च ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: अध्यात्म, अधिदैव और अधिभूत से वह तीन प्रकार का, प्राणों से दस प्रकार का और हृदय से एक है।

श्लोक 6.10

स्मरन्विश्वसृजामीशो विज्ञापितमधोक्षजः । विराजमतपत्स्वेन तेजसैषां विवृत्तये ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: तत्त्वदेवों की प्रार्थना स्मरण करके भगवान ने उनकी अभिव्यक्ति के लिए विराट को अपने तेज से प्रेरित किया।

श्लोक 6.11

अथ तस्याभितप्तस्य कति चायतनानि ह । निरभिद्यन्त देवानां तानि मे गदतः श‍ृणु ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस प्रेरणा से विराट में देवशक्तियों के अनेक स्थान खुले; अब उनका वर्णन सुनो।

श्लोक 6.12

तस्याग्निरास्यं निर्भिन्नं लोकपालोऽविशत्पदम् । वाचा स्वांशेन वक्तव्यं ययासौ प्रतिपद्यते ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुख प्रकट हुआ तो अग्निदेव ने वाणीशक्ति सहित उसमें प्रवेश किया; इससे बोलने की क्रिया सम्भव हुई।

श्लोक 6.13

निर्भिन्नं तालु वरुणो लोकपालोऽविशद्धरेः । जिह्वयांशेन च रसं ययासौ प्रतिपद्यते ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: तालु के स्थान में वरुणदेव जिह्वा और रसग्रहण की शक्ति के साथ स्थित हुए।

श्लोक 6.14

निर्भिन्ने अश्विनौ नासे विष्णोराविशतां पदम् । घ्राणेनांशेन गन्धस्य प्रतिपत्तिर्यतो भवेत् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: नासिकाएँ खुलीं तो अश्विनीकुमार घ्राणशक्ति सहित उनमें आए; उनसे गन्ध का अनुभव होने लगा।

श्लोक 6.15

निर्भिन्ने अक्षिणी त्वष्टा लोकपालोऽविशद्विभोः । चक्षुषांशेन रूपाणां प्रतिपत्तिर्यतो भवेत् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: नेत्र प्रकट हुए तो सूर्यदेव दृष्टिशक्ति सहित उनमें प्रविष्ट हुए; उनसे रूप का ज्ञान होता है।

श्लोक 6.16

निर्भिन्नान्यस्य चर्माणि लोकपालोऽनिलोऽविशत् । प्राणेनांशेन संस्पर्शं येनासौ प्रतिपद्यते ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्पर्शग्राही त्वचा के स्थान में वायुदेव अपनी शक्ति सहित आए; उससे स्पर्श का अनुभव होने लगा।

श्लोक 6.17

कर्णावस्य विनिर्भिन्नौ धिष्ण्यं स्वं विविशुर्दिशः । श्रोत्रेणांशेन शब्दस्य सिद्धिं येन प्रपद्यते ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: कान प्रकट होने पर दिशाएँ श्रवणशक्ति सहित उनमें आईं; इससे शब्द सुने जाते हैं।

श्लोक 6.18

त्वचमस्य विनिर्भिन्नां विविशुर्धिष्ण्यमोषधीः । अंशेन रोमभिः कण्डूं यैरसौ प्रतिपद्यते ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: त्वचा के रोमस्थानों में औषधि-वनस्पति की शक्तियाँ आईं; रोमों से खुजली आदि संवेदनाएँ जुड़ीं।

श्लोक 6.19

मेढ्रं तस्य विनिर्भिन्नं स्वधिष्ण्यं क उपाविशत् । रेतसांशेन येनासावानन्दं प्रतिपद्यते ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जननेन्द्रिय के स्थान में प्रजापति प्रजननशक्ति सहित आए; उससे सन्तानोत्पत्ति सम्बन्धी सुख का अनुभव होता है।

श्लोक 6.20

गुदं पुंसो विनिर्भिन्नं मित्रो लोकेश आविशत् । पायुनांशेन येनासौ विसर्गं प्रतिपद्यते ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुदास्थान में मित्रदेव उत्सर्जनशक्ति सहित आए; इससे शरीर के मल का त्याग सम्भव हुआ।

श्लोक 6.21

हस्तावस्य विनिर्भिन्नाविन्द्रः स्वर्पतिराविशत् । वार्तयांशेन पुरुषो यया वृत्तिं प्रपद्यते ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: हाथों में इन्द्रदेव कार्यशक्ति सहित आए; इनके द्वारा मनुष्य कर्म करके अपनी जीविका चलाता है।

श्लोक 6.22

पादावस्य विनिर्भिन्नौ लोकेशो विष्णुराविशत् । गत्या स्वांशेन पुरुषो यया प्राप्यं प्रपद्यते ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: चरणों में विष्णु की गतिशक्ति प्रकट हुई; इससे जीव अपने गन्तव्य तक पहुँचता है।

श्लोक 6.23

बुद्धिं चास्य विनिर्भिन्नां वागीशो धिष्ण्यमाविशत् । बोधेनांशेन बोद्धव्यप्रतिपत्तिर्यतो भवेत् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: बुद्धि के स्थान में ब्रह्मा बोधशक्ति सहित आए; उससे समझने योग्य विषय का निश्चय होता है।

श्लोक 6.24

हृदयं चास्य निर्भिन्नं चन्द्रमा धिष्ण्यमाविशत् । मनसांशेन येनासौ विक्रियां प्रतिपद्यते ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: हृदय में चन्द्रमा मनशक्ति सहित आए; उससे संकल्प-विकल्प और विभिन्न मानसिक वृत्तियाँ प्रकट होती हैं।

श्लोक 6.25

आत्मानं चास्य निर्भिन्नमभिमानोऽविशत्पदम् । कर्मणांशेन येनासौ कर्तव्यं प्रतिपद्यते ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अहंभाव के स्थान में अभिमान की शक्ति आई; उससे अपने को कर्ता मानने और कर्म करने की प्रवृत्ति होती है।

श्लोक 6.26

सत्त्वं चास्य विनिर्भिन्नं महान् धिष्ण्यमुपाविशत् । चित्तेनांशेन येनासौ विज्ञानं प्रतिपद्यते ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: चित्त के स्थान में महत्तत्त्व अपनी ज्ञानशक्ति सहित स्थित हुआ; उससे चेतना और विशेष बोध का अनुभव होता है।

श्लोक 6.27

शीर्ष्णोऽस्य द्यौर्धरा पद्भ्यां खं नाभेरुदपद्यत । गुणानां वृत्तयो येषु प्रतीयन्ते सुरादयः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: विराट के सिर से स्वर्ग, चरणों से पृथ्वी और नाभि से अन्तरिक्ष का ध्यान किया गया; गुणानुसार जीव इनके निवासी हैं।

श्लोक 6.28

आत्यन्तिकेन सत्त्वेन दिवं देवाः प्रपेदिरे । धरां रजः स्वभावेन पणयो ये च ताननु ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: सत्त्व की प्रधानता वाले देव स्वर्ग में और रजोगुणप्रधान मनुष्य तथा उनके सहचर पृथ्वी में स्थित हुए।

श्लोक 6.29

तार्तीयेन स्वभावेन भगवन्नाभिमाश्रिताः । उभयोरन्तरं व्योम ये रुद्रपार्षदां गणाः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: तमोगुणप्रधान रुद्रगण आदि दोनों के बीच अन्तरिक्ष में स्थित हुए; यह विराटध्यान की प्रतीकात्मक व्यवस्था है।

श्लोक 6.30

मुखतोऽवर्तत ब्रह्म पुरुषस्य कुरूद्वह । यस्तून्मुखत्वाद्वर्णानां मुख्योऽभूद्ब्राह्मणो गुरुः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: विराट के मुख से वेदज्ञान और ब्राह्मण-वृत्ति प्रकट बताई गई, जिसका कार्य समाज में ज्ञान और शिक्षा देना है।

श्लोक 6.31

बाहुभ्योऽवर्तत क्षत्रं क्षत्रियस्तदनुव्रतः । यो जातस्त्रायते वर्णान् पौरुषः कण्टकक्षतात् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: भुजाओं से क्षात्रशक्ति और क्षत्रिय-वृत्ति प्रकट हुई, जिसका धर्म लोगों की अत्याचार और संकट से रक्षा करना है।

श्लोक 6.32

विशोऽवर्तन्त तस्योर्वोर्लोकवृत्तिकरीर्विभोः । वैश्यस्तदुद्भवो वार्तां नृणां यः समवर्तयत् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऊरुओं से वैश्य-वृत्ति प्रकट हुई, जो कृषि, गोपालन और व्यापार आदि से समाज का निर्वाह चलाती है।

श्लोक 6.33

पद्भ्यां भगवतो जज्ञे शुश्रूषा धर्मसिद्धये । तस्यां जातः पुरा शूद्रो यद्वृत्त्या तुष्यते हरिः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: चरणों से सेवा-वृत्ति प्रकट हुई; उससे जुड़ा शूद्रधर्म सेवा द्वारा हरि को प्रसन्न करने का मार्ग बताया गया है।

श्लोक 6.34

एते वर्णाः स्वधर्मेण यजन्ति स्वगुरुं हरिम् । श्रद्धयाऽऽत्मविशुद्ध्यर्थं यज्जाताः सह वृत्तिभिः ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन सभी सामाजिक वृत्तियों का उद्देश्य अपने कर्तव्य द्वारा श्रद्धापूर्वक हरि की आराधना और आत्मशुद्धि करना है।

श्लोक 6.35

एतत्क्षत्तर्भगवतो दैवकर्मात्मरूपिणः । कः श्रद्दध्यादुपाकर्तुं योगमायाबलोदयम् ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की देवता, कर्म और आत्मशक्तिरूप योगमाया के इस विस्तार का पूरा वर्णन करने का सामर्थ्य किसमें है?

श्लोक 6.36

अथापि कीर्तयाम्यङ्ग यथामति यथाश्रुतम् । कीर्तिं हरेः स्वां सत्कर्तुं गिरमन्याभिधासतीम् ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी अन्य विषयों में लगी अपनी वाणी पवित्र करने के लिए मैं सुने हुए ज्ञान और अपनी बुद्धि के अनुसार हरियश कहता हूँ।

श्लोक 6.37

एकान्तलाभं वचसो नु पुंसां सुश्लोकमौलेर्गुणवादमाहुः । श्रुतेश्च विद्वद्भिरुपाकृतायां कथा सुधायामुपसम्प्रयोगम् ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: वाणी की सर्वोत्तम सफलता हरिगुणगान है और कानों की सफलता ज्ञानी भक्तों से कथामृत सुनने में है।

श्लोक 6.38

आत्मनोऽवसितो वत्स महिमा कविनाऽऽदिना । संवत्सरसहस्रान्ते धिया योगविपक्वया ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: आदिकवि ब्रह्मा भी सहस्र वर्षों के परिपक्व योग के बाद अपने विराट विस्तार की महिमा समझ सके।

श्लोक 6.39

अतो भगवतो माया मायिनामपि मोहिनी । यत्स्वयं चात्मवर्त्मात्मा न वेद किमुतापरे ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की माया मायावियों को भी मोहित करती है; जिसकी सीमा का पूर्ण ज्ञान सृष्टिकर्ता को नहीं, दूसरों को कैसे होगा?

श्लोक 6.40

यतोऽप्राप्य न्यवर्तन्त वाचश्च मनसा सह । अहं चान्य इमे देवास्तस्मै भगवते नमः ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिन तक मन और वाणी भी पूरी तरह नहीं पहुँचते, मैं और सभी देव उन भगवान को प्रणाम करते हैं।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 6 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 7

जीवबन्धन, माया और तत्त्वजिज्ञासा

श्लोक 7.1

श्रीशुक उवाच । एवं ब्रुवाणं मैत्रेयं द्वैपायनसुतो बुधः । प्रीणयन्निव भारत्या विदुरः प्रत्यभाषत ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी कहते हैं—मैत्रेय का वर्णन सुनकर बुद्धिमान विदुर ने आदरभरी वाणी में फिर प्रश्न किया।

श्लोक 7.2

विदुर उवाच । ब्रह्मन् कथं भगवतश्चिन्मात्रस्याविकारिणः । लीलया चापि युज्येरन्निर्गुणस्य गुणाः क्रियाः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर बोले—शुद्ध चेतन, निर्विकार और निर्गुण भगवान में लीला के रूप में भी गुण और क्रियाएँ कैसे समझी जाएँ?

श्लोक 7.3

क्रीडायामुद्यमोऽर्भस्य कामश्चिक्रीडिषान्यतः । स्वतस्तृप्तस्य च कथं निवृत्तस्य सदान्यतः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: बालक इच्छा या किसी प्रेरणा से खेलता है; सदा स्वतः तृप्त और असंग भगवान में खेल की प्रेरणा कैसे आती है?

श्लोक 7.4

अस्राक्षीद्भगवान्विश्वं गुणमय्याऽऽत्ममायया । तया संस्थापयत्येतद्भूयः प्रत्यपिधास्यति ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान अपनी गुणमयी माया से जगत बनाते, सँभालते और समेटते हैं—इसका रहस्य समझाइए।

श्लोक 7.5

देशतः कालतो योऽसाववस्थातः स्वतोऽन्यतः । अविलुप्तावबोधात्मा स युज्येताजया कथम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिनका ज्ञान देश, काल, अवस्था या किसी अन्य कारण से लुप्त नहीं होता, उनका अजा माया से सम्बन्ध कैसे होता है?

श्लोक 7.6

भगवानेक एवैष सर्वक्षेत्रेष्ववस्थितः । अमुष्य दुर्भगत्वं वा क्लेशो वा कर्मभिः कुतः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक परमात्मा सब शरीरों में स्थित है; तब जीव के दुर्भाग्य और कर्मजन्य क्लेश का कारण क्या है?

श्लोक 7.7

एतस्मिन् मे मनो विद्वन्खिद्यतेऽज्ञानसङ्कटे । तन्नः पराणुद विभो कश्मलं मानसं महत् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन प्रश्नों के अज्ञानजन्य उलझाव से मेरा मन खिन्न है; कृपा करके यह बड़ा मानसिक संशय दूर कीजिए।

श्लोक 7.8

श्रीशुक उवाच । स इत्थं चोदितः क्षत्त्रा तत्त्वजिज्ञासुना मुनिः । प्रत्याह भगवच्चित्तः स्मयन्निव गतस्मयः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—तत्त्व जानने के इच्छुक विदुर का प्रश्न सुनकर अहंकाररहित, भगवन्मय मैत्रेय ने मुस्कराकर उत्तर दिया।

श्लोक 7.9

मैत्रेय उवाच । सेयं भगवतो माया यन्नयेन विरुध्यते । ईश्वरस्य विमुक्तस्य कार्पण्यमुत बन्धनम् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—मुक्त चेतन में दीनता और बन्धन का अनुभव ही माया की ऐसी विचित्रता है जो सीधे तर्क से नहीं सुलझती।

श्लोक 7.10

यदर्थेन विनामुष्य पुंस आत्मविपर्ययः । प्रतीयत उपद्रष्टुः स्वशिरश्छेदनादिकः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे स्वप्न में अपना सिर कटता दिखे जबकि वास्तव में न कटे, वैसे साक्षी आत्मा में विपरीत अनुभव प्रतीत होता है।

श्लोक 7.11

यथा जले चन्द्रमसः कम्पादिस्तत्कृतो गुणः । दृश्यतेऽसन्नपि द्रष्टुरात्मनोऽनात्मनो गुणः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: जल हिलने से चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब हिलता दिखता है; इसी तरह अनात्मा के गुण आत्मा में आरोपित प्रतीत होते हैं।

श्लोक 7.12

स वै निवृत्तिधर्मेण वासुदेवानुकम्पया । भगवद्भक्तियोगेन तिरोधत्ते शनैरिह ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: निवृत्तिमार्ग, वासुदेव की कृपा और भक्तियोग से यह भ्रम धीरे-धीरे मिटता है।

श्लोक 7.13

यदेन्द्रियोपरामोऽथ द्रष्ट्रात्मनि परे हरौ । विलीयन्ते तदा क्लेशाः संसुप्तस्येव कृत्स्नशः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्रियाँ शान्त होकर साक्षी परमात्मा हरि में स्थिर होती हैं तो क्लेश वैसे शान्त होते हैं जैसे गहरी निद्रा में।

श्लोक 7.14

अशेषसङ्क्लेशशमं विधत्ते गुणानुवादश्रवणं मुरारेः । कुतः पुनस्तच्चरणारविन्द- परागसेवा रतिरात्मलब्धा ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुरारि के गुणों का श्रवण-कीर्तन ही क्लेश मिटाता है; फिर चरणरज की सेवा और अन्तरंग प्रेम का फल कितना महान होगा!

श्लोक 7.15

विदुर उवाच । सञ्छिन्नः संशयो मह्यं तव सूक्तासिना विभो । उभयत्रापि भगवन् मनो मे सम्प्रधावति ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर बोले—आपकी सुवाणी की तलवार से मेरा संशय कट गया; मन ईश्वर और जीव के इस सम्बन्ध को समझने में प्रवृत्त है।

श्लोक 7.16

साध्वेतद्व्याहृतं विद्वन्नात्ममायायनं हरेः । आभात्यपार्थं निर्मूलं विश्वमूलं न यद्बहिः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपने ठीक समझाया कि हरि की माया से मूलरहित-सा भ्रम प्रकट होता है, किन्तु वह जगत के परम आधार से अलग नहीं है।

श्लोक 7.17

यश्च मूढतमो लोके यश्च बुद्धेः परं गतः । तावुभौ सुखमेधेते क्लिश्यत्यन्तरितो जनः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अत्यन्त अज्ञानी और बुद्धि से परे तत्त्वज्ञ दोनों अपने ढंग से निश्चिन्त दिखते हैं; बीच की संशयग्रस्त अवस्था दुःख देती है।

श्लोक 7.18

अर्थाभावं विनिश्चित्य प्रतीतस्यापि नात्मनः । तां चापि युष्मच्चरणसेवयाहं पराणुदे ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा के बन्धन की प्रतीति का स्वतंत्र सत्य न होने का निश्चय हुआ; शेष भ्रम भी आपकी सेवा से दूर करूँगा।

श्लोक 7.19

यत्सेवया भगवतः कूटस्थस्य मधुद्विषः । रतिरासो भवेत्तीव्रः पादयोर्व्यसनार्दनः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सत्पुरुषों की सेवा से अचल भगवान के चरणों में प्रबल प्रेम जागता है, जो विपत्तियों का अन्त करता है।

श्लोक 7.20

दुरापा ह्यल्पतपसः सेवा वैकुण्ठवर्त्मसु । यत्रोपगीयते नित्यं देवदेवो जनार्दनः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वैकुण्ठमार्ग के संतों की सेवा अल्प पुण्य वालों को दुर्लभ है; उनके सत्सङ्ग में जनार्दन का निरन्तर गुणगान होता है।

श्लोक 7.21

सृष्ट्वाग्रे महदादीनि सविकाराण्यनुक्रमात् । तेभ्यो विराजमुद्धृत्य तमनु प्राविशद्विभुः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपने बताया कि महत्तत्त्व आदि उत्पन्न करके भगवान ने उनसे विराट बनाया और उसमें प्रवेश किया।

श्लोक 7.22

यमाहुराद्यं पुरुषं सहस्राङ्घ्र्यूरुबाहुकम् । यत्र विश्व इमे लोकाः सविकासं समासते ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस सहस्र चरण, ऊरु और भुजाओं वाले आदिपुरुष में समस्त लोक अपने विस्तार सहित स्थित हैं।

श्लोक 7.23

यस्मिन् दशविधः प्राणः सेन्द्रियार्थेन्द्रियस्त्रिवृत् । त्वयेरितो यतो वर्णास्तद्विभूतीर्वदस्व नः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसमें दस प्रकार के प्राण, इन्द्रिय-विषय और त्रिविध अधिष्ठान हैं तथा वर्ण उत्पन्न हुए; अब उसकी अन्य विभूतियाँ बताइए।

श्लोक 7.24

यत्र पुत्रैश्च पौत्रैश्च नप्तृभिः सह गोत्रजैः । प्रजा विचित्राकृतय आसन् याभिरिदं ततम् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुत्र, पौत्र और वंशजों द्वारा विविध आकृतियों वाली प्रजाओं से यह जगत किस प्रकार विस्तृत हुआ?

श्लोक 7.25

प्रजापतीनां स पतिश्चक्लृपे कान् प्रजापतीन् । सर्गांश्चैवानुसर्गांश्च मनून्मन्वन्तराधिपान् ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा ने कौन-कौन से प्रजापति, सृष्टि के विभाग, मनु और मन्वन्तर के अधिपति बनाए?

श्लोक 7.26

एतेषामपि वंशांश्च वंशानुचरितानि च । उपर्यधश्च ये लोका भूमेर्मित्रात्मजासते ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके वंश और चरित्र तथा पृथ्वी के ऊपर-नीचे स्थित लोकों का वर्णन कीजिए।

श्लोक 7.27

तेषां संस्थां प्रमाणं च भूर्लोकस्य च वर्णय । तिर्यङ्मानुषदेवानां सरीसृपपतत्त्रिणाम् । वद नः सर्गसंव्यूहं गार्भस्वेदद्विजोद्भिदाम् ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: लोकों की रचना और विस्तार तथा गर्भ, अण्ड, स्वेद और उद्भिज्ज रूपों में विभिन्न जीवों की उत्पत्ति बताइए।

श्लोक 7.28

गुणावतारैर्विश्वस्य सर्गस्थित्यप्ययाश्रयम् । सृजतः श्रीनिवासस्य व्याचक्ष्वोदारविक्रमम् ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुणावतारों द्वारा सृष्टि, पालन और प्रलय करने वाले लक्ष्मीपति के उदार पराक्रम समझाइए।

श्लोक 7.29

वर्णाश्रमविभागांश्च रूपशीलस्वभावतः । ऋषीणां जन्मकर्मादि वेदस्य च विकर्षणम् ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: रूप, आचरण और स्वभाव से वर्णाश्रम के विभाग, ऋषियों के जन्म-कर्म तथा वेदों के विभाजन बताइए।

श्लोक 7.30

यज्ञस्य च वितानानि योगस्य च पथः प्रभो । नैष्कर्म्यस्य च साङ्ख्यस्य तन्त्रं वा भगवत्स्मृतम् ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञ का विस्तार, योग के मार्ग, निष्काम कर्म, सांख्य और भगवान की आराधना की परम्परा समझाइए।

श्लोक 7.31

पाखण्डपथवैषम्यं प्रतिलोमनिवेशनम् । जीवस्य गतयो याश्च यावतीर्गुणकर्मजाः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: भ्रमपूर्ण मतों के मार्ग, वर्णव्यवस्था के विपरीत संयोग और गुण-कर्म के अनुसार जीवों की विभिन्न गतियाँ बताइए।

श्लोक 7.32

धर्मार्थकाममोक्षाणां निमित्तान्यविरोधतः । वार्ताया दण्डनीतेश्च श्रुतस्य च विधिं पृथक् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के परस्पर अविरोधी साधन तथा जीविका, शासननीति और अध्ययन की विधियाँ बताइए।

श्लोक 7.33

श्राद्धस्य च विधिं ब्रह्मन् पितॄणां सर्गमेव च । ग्रहनक्षत्रताराणां कालावयवसंस्थितिम् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्राद्धविधि, पितरों की उत्पत्ति तथा ग्रह, नक्षत्र और तारों से जुड़े कालविभाग समझाइए।

श्लोक 7.34

दानस्य तपसो वापि यच्चेष्टापूर्तयोः फलम् । प्रवासस्थस्य यो धर्मो यश्च पुंस उतापदि ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: दान, तप, यज्ञ और लोकहित कार्यों के फल तथा यात्रा और आपत्ति की दशा में कर्तव्य बताइए।

श्लोक 7.35

येन वा भगवांस्तुष्येद्धर्मयोनिर्जनार्दनः । सम्प्रसीदति वा येषामेतदाख्याहि चानघ ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: धर्म के मूल जनार्दन किन आचरणों और किन भक्तों से प्रसन्न होते हैं? यह भी कहिए।

श्लोक 7.36

अनुव्रतानां शिष्याणां पुत्राणां च द्विजोत्तम । अनापृष्टमपि ब्रूयुर्गुरवो दीनवत्सलाः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: दयालु गुरु आज्ञाकारी शिष्य और पुत्र के कल्याण की बात बिना पूछे भी समझाते हैं।

श्लोक 7.37

तत्त्वानां भगवंस्तेषां कतिधा प्रतिसङ्क्रमः । तत्रेमं क उपासीरन् क उ स्विदनुशेरते ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन तत्त्वों का लय कितने प्रकार से होता है? उस समय कौन भगवान की उपासना करते और कौन अप्रकट अवस्था में रहते हैं?

श्लोक 7.38

पुरुषस्य च संस्थानं स्वरूपं वा परस्य च । ज्ञानं च नैगमं यत्तद्गुरुशिष्यप्रयोजनम् ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जीव तथा परमपुरुष का स्वरूप और वैदिक ज्ञान में गुरु-शिष्य सम्बन्ध का प्रयोजन समझाइए।

श्लोक 7.39

निमित्तानि च तस्येह प्रोक्तान्यनघ सूरिभिः । स्वतो ज्ञानं कुतः पुंसां भक्तिर्वैराग्यमेव वा ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानी लोग उस ज्ञान के कौन साधन बताते हैं? मनुष्य में ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का उदय कैसे होता है?

श्लोक 7.40

एतान्मे पृच्छतः प्रश्नान् हरेः कर्मविवित्सया । ब्रूहि मेऽज्ञस्य मित्रत्वादजया नष्टचक्षुषः ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: माया से जिसकी विवेकदृष्टि ढक गई है, ऐसे मुझ मित्र को हरि के कार्य समझने के लिए पूछे ये प्रश्न बताइए।

श्लोक 7.41

सर्वे वेदाश्च यज्ञाश्च तपो दानानि चानघ । जीवाभयप्रदानस्य न कुर्वीरन् कलामपि ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जीवों को अभय देने की महिमा ऐसी है कि वेदाध्ययन, यज्ञ, तप और दान भी उसकी तुलना में अल्प कहे गए हैं।

श्लोक 7.42

श्रीशुक उवाच । स इत्थमापृष्टपुराणकल्पः कुरुप्रधानेन मुनिप्रधानः । प्रवृद्धहर्षो भगवत्कथायां सञ्चोदितस्तं प्रहसन्निवाह ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी कहते हैं—पुराणप्रसंगों के इन प्रश्नों से प्रेरित होकर मैत्रेय भगवान की कथा सुनाने के उत्साह में प्रसन्न हुए।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 7 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 8

नाभिकमल से ब्रह्मा का जन्म और भगवान के दर्शन

श्लोक 8.1

मैत्रेय उवाच । सत्सेवनीयो बत पूरुवंशो यल्लोकपालो भगवत्प्रधानः । बभूविथेहाजितकीर्तिमालां पदे पदे नूतनयस्यभीक्ष्णम् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—पूरुवंश धन्य है जिसमें तुम जैसे भगवत्परायण व्यक्ति हुए, जो हरि की कीर्तिमाला को बार-बार नया रस देते हैं।

श्लोक 8.2

सोऽहं नृणां क्षुल्लसुखाय दुःखं महद्गतानां विरमाय तस्य । प्रवर्तये भागवतं पुराणं यदाह साक्षाद्भगवान् ऋषिभ्यः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्षणिक सुख के लिए बड़े दुःख उठाने वाले लोगों का दुःख मिटाने हेतु मैं वह भागवतपुराण कहूँगा जो भगवान ने ऋषियों को सुनाया।

श्लोक 8.3

आसीनमुर्व्यां भगवन्तमाद्यं सङ्कर्षणं देवमकुण्ठसत्त्वम् । विवित्सवस्तत्त्वमतःपरस्य कुमारमुख्या मुनयोऽन्वपृच्छन् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: पूर्वकाल में सनत्कुमार आदि मुनियों ने परम तत्त्व जानने के लिए पाताल में विराजमान सङ्कर्षण भगवान से प्रश्न किए।

श्लोक 8.4

स्वमेव धिष्ण्यं बहु मानयन्तं यं वासुदेवाभिधमामनन्ति । प्रत्यग्धृताक्षाम्बुजकोशमीष- दुन्मीलयन्तं विबुधोदयाय ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: सङ्कर्षण अपने आराध्य वासुदेव में ध्यानस्थ थे; मुनियों के कल्याण हेतु उन्होंने कमलनेत्र थोड़े खोले।

श्लोक 8.5

स्वर्धुन्युदार्द्रैः स्वजटाकलापै- रुपस्पृशन्तश्चरणोपधानम् । पद्मं यदर्चन्त्यहिराजकन्याः सप्रेमनानाबलिभिर्वरार्थाः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुनियों ने गंगाजल से भीगी जटाओं सहित उनके चरणों को छुआ, जिनकी नागकन्याएँ प्रेमपूर्वक पूजा करती हैं।

श्लोक 8.6

मुहुर्गृणन्तो वचसानुराग- स्खलत्पदेनास्य कृतानि तज्ज्ञाः । किरीटसाहस्रमणिप्रवेक- प्रद्योतितोद्दामफणासहस्रम् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे प्रेम से रुँधे स्वर में भगवान की लीलाएँ गाते थे; उनके सहस्र फणों पर मुकुटमणियाँ प्रकाश फैला रही थीं।

श्लोक 8.7

प्रोक्तं किलैतद्भगवत्तमेन निवृत्तिधर्माभिरताय तेन । सनत्कुमाराय स चाह पृष्टः साङ्ख्यायनायाङ्ग धृतव्रताय ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: सङ्कर्षण ने निवृत्तिधर्म में रत सनत्कुमार को यह ज्ञान दिया; उन्होंने पूछने पर व्रतनिष्ठ साङ्ख्यायन को सुनाया।

श्लोक 8.8

साङ्ख्यायनः पारमहंस्यमुख्यो विवक्षमाणो भगवद्विभूतीः । जगाद सोऽस्मद्गुरवेऽन्विताय पराशरायाथ बृहस्पतेश्च ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: परमहंस साङ्ख्यायन ने भगवान की विभूतियाँ हमारे गुरु पराशर और बृहस्पति को समझाईं।

श्लोक 8.9

प्रोवाच मह्यं स दयालुरुक्तो मुनिः पुलस्त्येन पुराणमाद्यम् । सोऽहं तवैतत्कथयामि वत्स श्रद्धालवे नित्यमनुव्रताय ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुलस्त्य का वर पाए दयालु पराशर ने मुझे यह पुराण सुनाया; अब श्रद्धालु और आज्ञाकारी तुम्हें मैं सुनाता हूँ।

श्लोक 8.10

उदाप्लुतं विश्वमिदं तदासी- द्यन्निद्रयामीलितदृङ्न्यमीलयत् । अहीन्द्रतल्पेऽधिशयान एकः कृतक्षणः स्वात्मरतौ निरीहः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रलय में जगत जलमग्न था; एक भगवान शेषशय्या पर नेत्र मूँदकर निष्काम, आत्मानन्द में स्थित थे।

श्लोक 8.11

सोऽन्तःशरीरेऽर्पितभूतसूक्ष्मः कालात्मिकां शक्तिमुदीरयाणः । उवास तस्मिन् सलिले पदे स्वे यथानलो दारुणि रुद्धवीर्यः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: जीवों के सूक्ष्म कारण अपने भीतर रखकर वे कालशक्ति सहित जल में वैसे रहे जैसे काष्ठ में अग्नि की शक्ति छिपी रहती है।

श्लोक 8.12

चतुर्युगानां च सहस्रमप्सु स्वपन् स्वयोदीरितया स्वशक्त्या । कालाख्ययाऽऽसादितकर्मतन्त्रो लोकानपीतान् ददृशे स्वदेहे ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: सहस्र चतुर्युग बीतने पर अपनी कालशक्ति से जीवकर्मों को जाग्रत करते हुए उन्होंने अपने भीतर लीन लोकों को देखा।

श्लोक 8.13

तस्यार्थसूक्ष्माभिनिविष्टदृष्टे- रन्तर्गतोऽर्थो रजसा तनीयान् । गुणेन कालानुगतेन विद्धः सूष्यंस्तदाभिद्यत नाभिदेशात् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: काल से प्रेरित रजोगुण द्वारा सूक्ष्म जगत सृजन की ओर प्रवृत्त हुआ और उनकी नाभि से प्रकट होने लगा।

श्लोक 8.14

स पद्मकोशः सहसोदतिष्ठ- त्कालेन कर्मप्रतिबोधनेन । स्वरोचिषा तत्सलिलं विशालं विद्योतयन्नर्क इवात्मयोनिः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: कर्मशक्ति जगाने वाले काल के प्रभाव से कमल प्रकट हुआ और अपने प्रकाश से प्रलयजल को सूर्य की तरह आलोकित किया।

श्लोक 8.15

तल्लोकपद्मं स उ एव विष्णुः प्रावीविशत्सर्वगुणावभासम् । तस्मिन् स्वयं वेदमयो विधाता स्वयम्भुवं यं स्म वदन्ति सोऽभूत् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: सभी गुणों की अभिव्यक्ति वाले उस लोककमल में विष्णु प्रविष्ट हुए; उसमें वेदमय स्वयम्भू ब्रह्मा प्रकट हुए।

श्लोक 8.16

तस्यां स चाम्भोरुहकर्णिकाया- मवस्थितो लोकमपश्यमानः । परिक्रमन् व्योम्नि विवृत्तनेत्र- श्चत्वारि लेभेऽनुदिशं मुखानि ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कमल की कर्णिका पर बैठे ब्रह्मा ने चारों ओर देखा; दिशाओं में देखने से उनके चार मुख प्रकट हुए।

श्लोक 8.17

तस्माद्युगान्तश्वसनावघूर्ण- जलोर्मिचक्रात्सलिलाद्विरूढम् । उपाश्रितः कञ्जमु लोकतत्त्वं नात्मानमद्धाविददादिदेवः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रलयवायु से उठती जलतरङ्गों के बीच उस कमल पर स्थित ब्रह्मा प्रारम्भ में अपने और अपने मूल को नहीं जान सके।

श्लोक 8.18

क एष योऽसावहमब्जपृष्ठ एतत्कुतो वाब्जमनन्यदप्सु । अस्ति ह्यधस्तादिह किञ्चनैत- दधिष्ठितं यत्र सता नु भाव्यम् ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने विचार किया—मैं कौन हूँ? यह जल में अकेला कमल कहाँ से आया? इसका कोई आधार अवश्य होना चाहिए।

श्लोक 8.19

स इत्थमुद्वीक्ष्य तदब्जनाल- नाडीभिरन्तर्जलमाविवेश । नार्वाग्गतस्तत्खरनालनाल- नाभिं विचिन्वंस्तदविन्दताजः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: कमलनाल की भीतरी नाड़ियों से वे जल में उतरे और मूल खोजा, किन्तु नाभिरूप कारण तक नहीं पहुँच सके।

श्लोक 8.20

तमस्यपारे विदुरात्मसर्गं विचिन्वतोऽभूत्सुमहांस्त्रिणेमिः । यो देहभाजां भयमीरयाणः परिक्षिणोत्यायुरजस्य हेतिः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: असीम अन्धकार में अपना उद्गम खोजते हुए दीर्घकाल बीता; वही काल देहधारियों की आयु क्षीण करता है।

श्लोक 8.21

ततो निवृत्तोऽप्रतिलब्धकामः स्वधिष्ण्यमासाद्य पुनः स देवः । शनैर्जितश्वासनिवृत्तचित्तो न्यषीददारूढसमाधियोगः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मूल न पाकर ब्रह्मा फिर कमल पर लौटे और श्वास तथा चित्त संयमित करके समाधि में बैठ गए।

श्लोक 8.22

कालेन सोऽजः पुरुषायुषाभि- प्रवृत्तयोगेन विरूढबोधः । स्वयं तदन्तर्हृदयेऽवभात- मपश्यतापश्यत यन्न पूर्वम् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: दीर्घ साधना से ज्ञान परिपक्व होने पर उन्हें अपने हृदय में वह प्रभु दिखाई दिए जो पहले बाहरी खोज से नहीं मिले थे।

श्लोक 8.23

मृणालगौरायतशेषभोग- पर्यङ्क एकं पुरुषं शयानम् । फणातपत्रायुतमूर्धरत्न- द्युभिर्हतध्वान्तयुगान्ततोये ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कमलनाल जैसे गौर शेषनाग की विस्तृत शय्या पर भगवान को देखा; फणमणियों का प्रकाश अन्धकार मिटा रहा था।

श्लोक 8.24

प्रेक्षां क्षिपन्तं हरितोपलाद्रेः सन्ध्याभ्रनीवेरुरुरुक्ममूर्ध्नः । रत्नोदधारौषधिसौमनस्य- वनस्रजो वेणुभुजाङ्घ्रिपाङ्घ्रेः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनका स्वरूप हरित रत्नमय पर्वत-सा था; पीताम्बर, सुवर्णमुकुट, रत्न और वनमाला पर्वत की विविध शोभाओं जैसे लगते थे।

श्लोक 8.25

आयामतो विस्तरतः स्वमान- देहेन लोकत्रयसङ्ग्रहेण । विचित्रदिव्याभरणांशुकानां कृतश्रियापाश्रितवेषदेहम् ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: तीनों लोकों को अपने में समेटने वाला उनका दिव्य शरीर अनुपम विस्तार और मनोहर आभूषण-वस्त्रों से सुशोभित था।

श्लोक 8.26

पुंसां स्वकामाय विविक्तमार्गै- रभ्यर्चतां कामदुघाङ्घ्रिपद्मम् । प्रदर्शयन्तं कृपया नखेन्दु- मयूखभिन्नाङ्गुलिचारुपत्रम् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे उपासकों पर कृपा करके इच्छित फल देने वाले चरणकमल दिखा रहे थे, जिनकी अँगुलियाँ नखचन्द्र की किरणों से चमकती थीं।

श्लोक 8.27

मुखेन लोकार्तिहरस्मितेन परिस्फुरत्कुण्डलमण्डितेन । शोणायितेनाधरबिम्बभासा प्रत्यर्हयन्तं सुनसेन सुभ्र्वा ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: सुन्दर नासिका, भौंहें, दमकते कुण्डल और अरुण अधरों वाले मुख की मुस्कान लोकों का दुःख हर रही थी।

श्लोक 8.28

कदम्बकिञ्जल्कपिशङ्गवाससा स्वलङ्कृतं मेखलया नितम्बे । हारेण चानन्तधनेन वत्स श्रीवत्सवक्षःस्थलवल्लभेन ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: कमर पर पीताम्बर और मेखला थी; श्रीवत्सयुक्त वक्षस्थल अमूल्य हार से सुशोभित था।

श्लोक 8.29

परार्ध्यकेयूरमणिप्रवेक- पर्यस्तदोर्दण्डसहस्रशाखम् । अव्यक्तमूलं भुवनाङ्घ्रिपेन्द्र- महीन्द्रभोगैरधिवीतवल्शम् ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: रत्नजटित बाजूबन्दों वाली भुजाएँ विश्ववृक्ष की शाखाओं जैसी थीं; उसका मूल अप्रकट था और शेषनाग उसकी जड़ों को घेरे थे।

श्लोक 8.30

चराचरौको भगवन् महीध्र- महीन्द्रबन्धुं सलिलोपगूढम् । किरीटसाहस्रहिरण्यश‍ृङ्ग- माविर्भवत्कौस्तुभरत्नगर्भम् ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: चराचर के आश्रय भगवान जल में स्थित पर्वत जैसे थे; स्वर्णमुकुट शिखर और कौस्तुभ उसके भीतर चमकते रत्न जैसा था।

श्लोक 8.31

निवीतमाम्नायमधुव्रतश्रिया स्वकीर्तिमय्या वनमालया हरिम् । सूर्येन्दुवाय्वग्न्यगमं त्रिधामभिः परिक्रमत्प्राधनिकैर्दुरासदम् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: वेदरूपी भ्रमर जिनकी कीर्तिमयी वनमाला का गान करते हैं, उन हरि के पास सूर्य, चन्द्र, वायु और अग्नि भी स्वतंत्रतः नहीं पहुँचते।

श्लोक 8.32

तर्ह्येव तन्नाभिसरःसरोज- मात्मानमम्भः श्वसनं वियच्च । ददर्श देवो जगतो विधाता नातः परं लोकविसर्गदृष्टिः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जगत के रचयिता ब्रह्मा को भगवान, उनका नाभिकमल, स्वयं अपना रूप, जल, वायु और आकाश दिखाई दिए; आगे की सृष्टि अभी अप्रकट थी।

श्लोक 8.33

स कर्मबीजं रजसोपरक्तः प्रजाः सिसृक्षन्नियदेव दृष्ट्वा । अस्तौद्विसर्गाभिमुखस्तमीड्य- मव्यक्तवर्त्मन्यभिवेशितात्मा ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: सृजन की इच्छा से रजोगुण में प्रवृत्त ब्रह्मा ने अदृश्य परमेश्वर में मन लगाकर उन पूज्य प्रभु की स्तुति की।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 8 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 9

ब्रह्माजी की स्तुति और भगवान का उपदेश

श्लोक 9.1

ब्रह्मोवाच । ज्ञातोऽसि मेऽद्य सुचिरान्ननु देहभाजां न ज्ञायते भगवतो गतिरित्यवद्यम् । नान्यत्त्वदस्ति भगवन्नपि तन्न शुद्धं मायागुणव्यतिकराद्यदुरुर्विभासि ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा बोले—दीर्घकाल बाद आज आपको जाना; देहासक्त जीव आपकी गति नहीं जान पाते। विविध जगत आपकी मायाशक्ति से प्रकट है।

श्लोक 9.2

रूपं यदेतदवबोधरसोदयेन शश्वन्निवृत्ततमसः सदनुग्रहाय । आदौ गृहीतमवतारशतैकबीजं यन्नाभिपद्मभवनादहमाविरासम् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपका यह ज्ञानप्रकाशमय, अज्ञानरहित रूप भक्तों पर कृपा और सभी अवतारों के मूल के रूप में प्रकट है; उसी के नाभिकमल से मैं उत्पन्न हुआ।

श्लोक 9.3

नातःपरं परम यद्भवतः स्वरूप- मानन्दमात्रमविकल्पमविद्धवर्चः । पश्यामि विश्वसृजमेकमविश्वमात्मन् भूतेन्द्रियात्मकमदस्त उपाश्रितोऽस्मि ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपका परम स्वरूप अखण्ड आनन्द और अविच्छिन्न तेज है; जगत के कारण होकर भी उससे असंग प्रभु, मैं आपकी शरण हूँ।

श्लोक 9.4

तद्वा इदं भुवनमङ्गल मङ्गलाय ध्याने स्म नो दर्शितं त उपासकानाम् । तस्मै नमो भगवतेऽनुविधेम तुभ्यं योऽनादृतो नरकभाग्भिरसत्प्रसङ्गैः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जगत का मङ्गल करने वाला यह रूप आपने उपासकों को ध्यान में दिखाया; मैं सेवा और प्रणाम करता हूँ, यद्यपि विषयासक्त इसका अनादर करते हैं।

श्लोक 9.5

ये तु त्वदीयचरणाम्बुजकोशगन्धं जिघ्रन्ति कर्णविवरैः श्रुतिवातनीतम् । भक्त्या गृहीतचरणः परया च तेषां नापैषि नाथ हृदयाम्बुरुहात्स्वपुंसाम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रवण द्वारा आपके चरणों की सुगन्ध ग्रहण कर प्रेम से आपको बाँधने वाले भक्तों के हृदयकमल से आप कभी दूर नहीं होते।

श्लोक 9.6

तावद्भयं द्रविणदेहसुहृन्निमित्तं शोकः स्पृहा परिभवो विपुलश्च लोभः । तावन्ममेत्यसदवग्रह आर्तिमूलं यावन्न तेऽङ्घ्रिमभयं प्रवृणीत लोकः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब तक आपके अभयचरण नहीं अपनाए जाते, देह-धन-स्वजनों की ममता से भय, शोक, इच्छा, अपमान और लोभ बने रहते हैं।

श्लोक 9.7

दैवेन ते हतधियो भवतः प्रसङ्गात् सर्वाशुभोपशमनाद्विमुखेन्द्रिया ये । कुर्वन्ति कामसुखलेशलवाय दीनाः लोभाभिभूतमनसोऽकुशलानि शश्वत् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो आपके कल्याणकारी सत्सङ्ग से विमुख हैं, वे लोभ में पड़कर थोड़े विषयसुख के लिए बार-बार अशुभ कर्म करते हैं।

श्लोक 9.8

क्षुत्तृट् त्रिधातुभिरिमा मुहुरर्द्यमानाः शीतोष्णवातवरषैरितरेतराच्च । कामाग्निनाच्युत रुषा च सुदुर्भरेण सम्पश्यतो मन उरुक्रम सीदते मे ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: भूख-प्यास, शारीरिक विकार, सर्दी-गर्मी, वायु-वर्षा, परस्पर संघर्ष, काम और क्रोध से पीड़ित जीवों को देखकर मेरा मन दुःखी होता है।

श्लोक 9.9

यावत्पृथक्त्वमिदमात्मन इन्द्रियार्थ- मायाबलं भगवतो जन ईश पश्येत् । तावन्न संसृतिरसौ प्रतिसङ्क्रमेत व्यर्थापि दुःखनिवहं वहती क्रियार्था ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब तक मनुष्य विषयों को परमात्मा से अलग स्वतन्त्र सत्य मानता है, तब तक दुःख देने वाला यह भ्रमपूर्ण संसारबन्धन नहीं मिटता।

श्लोक 9.10

अह्न्यापृतार्तकरणा निशि निःशयाना नानामनोरथधिया क्षणभग्ननिद्राः । दैवाहतार्थरचना ऋषयोऽपि देव युष्मत्प्रसङ्गविमुखा इह संसरन्ति ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: दिन में कर्मों से थके और रात में मनोरथों से टूटी नींद वाले विद्वान भी आपके प्रसङ्ग से विमुख होकर जन्म-मरण में भटकते हैं।

श्लोक 9.11

त्वं भावयोगपरिभावितहृत्सरोज आस्से श्रुतेक्षितपथो ननु नाथ पुंसाम् । यद्यद्धिया त उरुगाय विभावयन्ति तत्तद्वपुः प्रणयसे सदनुग्रहाय ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रवण और प्रेमयोग से शुद्ध हृदय में आप रहते हैं; भक्त जिस भाव से ध्यान करते हैं, कृपापूर्वक उसी अनुरूप रूप प्रकट करते हैं।

श्लोक 9.12

नातिप्रसीदति तथोपचितोपचारै- राराधितः सुरगणैर्हृदि बद्धकामैः । यत्सर्वभूतदययासदलभ्ययैको नानाजनेष्ववहितः सुहृदन्तरात्मा ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: सबके हृदय में सुहृद् बनकर स्थित आप कामनाभरे बड़े अनुष्ठानों से उतने प्रसन्न नहीं होते जितने सब जीवों पर दया से।

श्लोक 9.13

पुंसामतो विविधकर्मभिरध्वराद्यैः दानेन चोग्रतपसा व्रतचर्यया च । आराधनं भगवतस्तव सत्क्रियार्थो धर्मोऽर्पितः कर्हिचिद्ध्रियते न यत्र ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञ, दान, तप और व्रत आदि सत्कर्मों का वास्तविक फल आपकी आराधना है; आपको समर्पित धर्म निष्फल नहीं होता।

श्लोक 9.14

शश्वत्स्वरूपमहसैव निपीतभेद- मोहाय बोधधिषणाय नमः परस्मै । विश्वोद्भवस्थितिलयेषु निमित्तलीला- रासाय ते नम इदं चकृमेश्वराय ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने नित्य ज्ञानप्रकाश से भेदमोह मिटाने वाले परमेश्वर को प्रणाम, जिनके संकल्प से सृष्टि, पालन और प्रलय की लीला होती है।

श्लोक 9.15

यस्यावतारगुणकर्मविडम्बनानि नामानि येऽसुविगमे विवशा गृणन्ति । ते नैकजन्मशमलं सहसैव हित्वा संयान्त्यपावृतमृतं तमजं प्रपद्ये ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मृत्यु के समय विवश होकर भी आपके अवतार, गुण और कर्मसूचक नाम लेने वाले अनेक जन्मों का मल छोड़ अमृतपद पाते हैं।

श्लोक 9.16

यो वा अहं च गिरिशश्च विभुः स्वयं च स्थित्युद्भवप्रलयहेतव आत्ममूलम् । भित्त्वा त्रिपाद्ववृध एक उरुप्ररोह- स्तस्मै नमो भगवते भुवनद्रुमाय ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक ही भगवान जगत के वृक्षरूप विस्तार में ब्रह्मा, विष्णु और शिव की सृष्टि-पालन-संहार शक्तियाँ प्रकट करते हैं; उन्हें नमस्कार है।

श्लोक 9.17

लोको विकर्मनिरतः कुशले प्रमत्तः कर्मण्ययं त्वदुदिते भवदर्चने स्वे । यस्तावदस्य बलवानिह जीविताशां सद्यश्छिनत्त्यनिमिषाय नमोऽस्तु तस्मै ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्य स्वधर्म और आपकी पूजा भूलकर निषिद्ध कर्म करता है; उसकी जीवनाशा काटने वाले आपके कालस्वरूप को प्रणाम है।

श्लोक 9.18

यस्माद्बिभेम्यहमपि द्विपरार्धधिष्ण्य- मध्यासितः सकललोकनमस्कृतं यत् । तेपे तपो बहुसवोऽवरुरुत्समान- स्तस्मै नमो भगवतेऽधिमखाय तुभ्यम् ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: दीर्घायु और सब लोकों से पूजित ब्रह्मपद पर रहकर भी मैं काल से डरता हूँ और आपकी प्राप्ति के लिए तप करता हूँ।

श्लोक 9.19

तिर्यङ्मनुष्यविबुधादिषु जीवयोनि- ष्वात्मेच्छयाऽऽत्मकृतसेतुपरीप्सया यः । रेमे निरस्तरतिरप्यवरुद्धदेह- स्तस्मै नमो भगवते पुरुषोत्तमाय ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपनी बनाई धर्ममर्यादा की रक्षा के लिए पशु, मनुष्य और देव आदि में इच्छापूर्वक अवतार लेने वाले निष्काम पुरुषोत्तम को प्रणाम।

श्लोक 9.20

योऽविद्ययानुपहतोऽपि दशार्धवृत्त्या निद्रामुवाह जठरीकृतलोकयात्रः । अन्तर्जलेऽहिकशिपुस्पर्शानुकूलां भीमोर्मिमालिनि जनस्य सुखं विवृण्वन् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप अज्ञान से अछूते हैं, फिर भी लोकों को अपने में समेटकर प्रलयजल में शेषशय्या पर योगनिद्रा की सुखमयी लीला करते हैं।

श्लोक 9.21

यन्नाभिपद्मभवनादहमासमीड्य लोकत्रयोपकरणो यदनुग्रहेण । तस्मै नमस्त उदरस्थभवाय योग- निद्रावसानविकसन्नलिनेक्षणाय ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपके नाभिकमल से जन्म लेकर आपकी कृपा से मैं त्रिलोक की रचना करता हूँ; योगनिद्रा के बाद कमलनेत्र खोलने वाले प्रभु को प्रणाम।

श्लोक 9.22

सोऽयं समस्तजगतां सुहृदेक आत्मा सत्त्वेन यन्मृडयते भगवान् भगेन । तेनैव मे दृशमनुस्पृशताद्यथाहं स्रक्ष्यामि पूर्ववदिदं प्रणतप्रियोऽसौ ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: सबके एक आत्मा और सुहृद् प्रभु अपनी सत्त्वमयी कृपा से मेरी दृष्टि जाग्रत करें, जिससे पहले की तरह सृष्टि कर सकूँ।

श्लोक 9.23

एष प्रपन्नवरदो रमयाऽऽत्मशक्त्या यद्यत्करिष्यति गृहीतगुणावतारः । तस्मिन् स्वविक्रममिदं सृजतोऽपि चेतो युञ्जीत कर्मशमलं च यथा विजह्याम् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं आपके शक्तिमय अवतारों और कार्यों में चित्त लगाकर सृष्टि करूँ, ताकि कर्म का अहंकार और दोष मुझे न बाँधें।

श्लोक 9.24

नाभिह्रदादिह सतोऽम्भसि यस्य पुंसो विज्ञानशक्तिरहमासमनन्तशक्तेः । रूपं विचित्रमिदमस्य विवृण्वतो मे मा रीरिषीष्ट निगमस्य गिरां विसर्गः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपकी ज्ञानशक्ति से उत्पन्न मैं आपके विविध रूप प्रकट करता हूँ; मेरी वेदवाणी का उच्चारण और सृजनबुद्धि विचलित न हों।

श्लोक 9.25

सोऽसावदभ्रकरुणो भगवान् विवृद्ध- प्रेमस्मितेन नयनाम्बुरुहं विजृम्भन् । उत्थाय विश्वविजयाय च नो विषादं माध्व्या गिरापनयतात्पुरुषः पुराणः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: असीम करुणामय पुरातन पुरुष प्रेममुस्कान सहित नेत्र खोलें और मधुर वाणी से हमारा विषाद मिटाएँ।

श्लोक 9.26

मैत्रेय उवाच । स्वसम्भवं निशाम्यैवं तपोविद्यासमाधिभिः । यावन्मनो वचः स्तुत्वा विरराम स खिन्नवत् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—तप, विद्या और समाधि से प्रकट अपने उद्गम प्रभु की यथाशक्ति स्तुति करके ब्रह्मा कुछ खिन्न-से मौन हो गए।

श्लोक 9.27

अथाभिप्रेतमन्वीक्ष्य ब्रह्मणो मधुसूदनः । विषण्णचेतसं तेन कल्पव्यतिकराम्भसा ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मधुसूदन ने ब्रह्मा का अभिप्राय समझा; प्रलयजल और लोकों की रचना की चिन्ता से उनका मन विषण्ण था।

श्लोक 9.28

लोकसंस्थानविज्ञान आत्मनः परिखिद्यतः । तमाहागाधया वाचा कश्मलं शमयन्निव ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने अपनी गम्भीर वाणी से उनकी चिन्ता शान्त करते हुए लोकव्यवस्था का मार्ग समझाया।

श्लोक 9.29

श्रीभगवानुवाच । मा वेदगर्भ गास्तन्द्रीं सर्ग उद्यममावह । तन्मयाऽऽपादितं ह्यग्रे यन्मां प्रार्थयते भवान् ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—हे वेदगर्भ ब्रह्मा, निरुत्साह न हो; सृष्टि में लगो। तुम्हारी प्रार्थना के अनुरूप सामर्थ्य मैंने पहले ही दिया है।

श्लोक 9.30

भूयस्त्वं तप आतिष्ठ विद्यां चैव मदाश्रयाम् । ताभ्यामन्तर्हृदि ब्रह्मन् लोकान् द्रक्ष्यस्यपावृतान् ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर तप और मेरे आश्रित ज्ञान का अभ्यास करो; उनसे तुम्हें हृदय में लोकों का अप्रच्छन्न रूप दिखाई देगा।

श्लोक 9.31

तत आत्मनि लोके च भक्तियुक्तः समाहितः । द्रष्टासि मां ततं ब्रह्मन् मयि लोकांस्त्वमात्मनः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: भक्तियुक्त समाधि से तुम मुझे अपने में और सब लोकों में व्याप्त तथा सभी लोकों को मुझमें स्थित देखोगे।

श्लोक 9.32

यदा तु सर्वभूतेषु दारुष्वग्निमिव स्थितम् । प्रतिचक्षीत मां लोको जह्यात्तर्ह्येव कश्मलम् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे लकड़ी में अग्नि रहती है, वैसे सब जीवों में मुझे स्थित देखने वाला मनुष्य अपना अज्ञानमल छोड़ देता है।

श्लोक 9.33

यदा रहितमात्मानं भूतेन्द्रियगुणाशयैः । स्वरूपेण मयोपेतं पश्यन् स्वाराज्यमृच्छति ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: देह, इन्द्रिय, गुण और वासनाओं से पृथक आत्मा को मेरे आश्रय में देखकर मनुष्य आत्मस्वतन्त्रता प्राप्त करता है।

श्लोक 9.34

नानाकर्मवितानेन प्रजा बह्वीः सिसृक्षतः । नात्मावसीदत्यस्मिंस्ते वर्षीयान्मदनुग्रहः ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: अनेक कर्मप्रवृत्तियों वाली प्रजाएँ रचते समय भी मेरा विशेष अनुग्रह तुम्हारे मन को विषाद से बचाएगा।

श्लोक 9.35

ऋषिमाद्यं न बध्नाति पापीयांस्त्वां रजो गुणः । यन्मनो मयि निर्बद्धं प्रजाः संसृजतोऽपि ते ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: सृष्टि करते हुए तुम्हारा मन मुझमें बँधा रहेगा; इसलिए रजोगुण तुम्हें बाँध नहीं सकेगा।

श्लोक 9.36

ज्ञातोऽहं भवता त्वद्य दुर्विज्ञेयोऽपि देहिनाम् । यन्मां त्वं मन्यसेऽयुक्तं भूतेन्द्रियगुणात्मभिः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुमने मुझे भूत, इन्द्रिय और गुणों से असंग समझा है; इसी से दुर्लभ होने पर भी आज मेरा सही ज्ञान पाया है।

श्लोक 9.37

तुभ्यं मद्विचिकित्सायामात्मा मे दर्शितोऽबहिः । नालेन सलिले मूलं पुष्करस्य विचिन्वतः ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: कमलनाल के भीतर जल में मूल खोजते समय बाहरी खोज से दर्शन न हुए; जिज्ञासा और ध्यान से मैंने भीतर अपना स्वरूप दिखाया।

श्लोक 9.38

यच्चकर्थाङ्ग मत्स्तोत्रं मत्कथाभ्युदयाङ्कितम् । यद्वा तपसि ते निष्ठा स एष मदनुग्रहः ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरे गुण और कथाओं से युक्त तुम्हारी स्तुति तथा तप में निष्ठा भी मेरी कृपा के ही परिणाम हैं।

श्लोक 9.39

प्रीतोऽहमस्तु भद्रं ते लोकानां विजयेच्छया । यदस्तौषीर्गुणमयं निर्गुणं मानुवर्णयन् ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: लोकसृष्टि की इच्छा से तुमने गुणातीत मेरे गुणमय प्राकट्य का वर्णन किया है; मैं प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो।

श्लोक 9.40

य एतेन पुमान्नित्यं स्तुत्वा स्तोत्रेण मां भजेत् । तस्याशु सम्प्रसीदेयं सर्वकामवरेश्वरः ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो प्रतिदिन इस स्तोत्र से मेरी स्तुति और भक्ति करेगा, उस पर सभी वर देने वाला मैं शीघ्र प्रसन्न होऊँगा।

श्लोक 9.41

पूर्तेन तपसा यज्ञैर्दानैर्योगसमाधिना । राद्धं निःश्रेयसं पुंसां मत्प्रीतिस्तत्त्वविन्मतम् ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: लोकहित, तप, यज्ञ, दान और योगसमाधि की परम सिद्धि मेरी प्रसन्नता है—तत्त्वज्ञ ऐसा मानते हैं।

श्लोक 9.42

अहमात्माऽऽत्मनां धातः प्रेष्ठः सन् प्रेयसामपि । अतो मयि रतिं कुर्याद्देहादिर्यत्कृते प्रियः ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं सब आत्माओं का प्रियतम आत्मा हूँ; देह आदि मेरे कारण ही प्रिय लगते हैं, इसलिए मुझमें प्रेम लगाओ।

श्लोक 9.43

सर्ववेदमयेनेदमात्मनाऽऽत्माऽऽत्मयोनिना । प्रजाः सृज यथा पूर्वं याश्च मय्यनुशेरते ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे स्वयम्भू, अपने वेदमय ज्ञान और मेरे आश्रय से पहले की तरह उन प्रजाओं को रचो जो मुझमें सुप्त हैं।

श्लोक 9.44

मैत्रेय उवाच । तस्मा एवं जगत्स्रष्ट्रे प्रधानपुरुषेश्वरः । व्यज्येदं स्वेन रूपेण कञ्जनाभस्तिरोदधे ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—प्रकृति और पुरुष के स्वामी कमलनाभ भगवान ने जगत्स्रष्टा को इस प्रकार उपदेश देकर अन्तर्धान किया।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 9 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 10

कालशक्ति और सृष्टि के विभाग

श्लोक 10.1

विदुर उवाच । अन्तर्हिते भगवति ब्रह्मा लोकपितामहः । प्रजाः ससर्ज कतिधा दैहिकीर्मानसीर्विभुः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर बोले—भगवान के अन्तर्धान होने पर लोकपितामह ब्रह्मा ने शरीर और मन से कितने प्रकार की प्रजाएँ उत्पन्न कीं?

श्लोक 10.2

ये च मे भगवन् पृष्टास्त्वय्यर्था बहुवित्तम । तान् वदस्वानुपूर्व्येण छिन्धि नः सर्वसंशयान् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैंने जो अन्य विषय पूछे हैं, उन्हें भी क्रम से समझाकर कृपया मेरे सभी संशय दूर कीजिए।

श्लोक 10.3

सूत उवाच । एवं सञ्चोदितस्तेन क्षत्त्रा कौषारवो मुनिः । प्रीतः प्रत्याह तान् प्रश्नान् हृदिस्थानथ भार्गव ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी कहते हैं—विदुर की प्रेरणा से प्रसन्न मैत्रेय ने उनके मन में स्थित प्रश्नों के उत्तर दिए।

श्लोक 10.4

मैत्रेय उवाच । विरिञ्चोऽपि तथा चक्रे दिव्यं वर्षशतं तपः । आत्मन्यात्मानमावेश्य यदाह भगवानजः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—भगवान की आज्ञा के अनुसार ब्रह्मा ने मन परमात्मा में लगाकर सौ दिव्य वर्षों तक तप किया।

श्लोक 10.5

तद्विलोक्याब्जसम्भूतो वायुना यदधिष्ठितः । पद्ममम्भश्च तत्कालकृतवीर्येण कम्पितम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने देखा कि जिस कमल पर वे बैठे हैं वह और प्रलयजल कालप्रेरित प्रबल वायु से काँप रहे हैं।

श्लोक 10.6

तपसा ह्येधमानेन विद्यया चात्मसंस्थया । विवृद्धविज्ञानबलो न्यपाद्वायुं सहाम्भसा ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: तप और आत्मविद्या से उनकी ज्ञानशक्ति बढ़ी; उस शक्ति से उन्होंने वायु और जल को अपने नियन्त्रण में समेट लिया।

श्लोक 10.7

तद्विलोक्य वियद्व्यापि पुष्करं यदधिष्ठितम् । अनेन लोकान् प्राग्लीनान् कल्पितास्मीत्यचिन्तयत् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: आकाश में विस्तृत अपने आश्रय कमल को देखकर उन्होंने विचार किया कि इससे पूर्व में लीन हुए लोक रचूँगा।

श्लोक 10.8

पद्मकोशं तदाऽऽविश्य भगवत्कर्मचोदितः । एकं व्यभाङ्क्षीदुरुधा त्रिधा भाव्यं द्विसप्तधा ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की प्रेरणा से कमलकोश में प्रवेश कर उन्होंने उसे पहले तीन और फिर विस्तार से चौदह लोकों में विभक्त किया।

श्लोक 10.9

एतावाञ्जीवलोकस्य संस्थाभेदः समाहृतः । धर्मस्य ह्यनिमित्तस्य विपाकः परमेष्ठ्यसौ ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जीवों के निवास की व्यवस्था का यह संक्षेप है; निष्काम धर्म का उच्च फल ब्रह्मलोक कहा गया है।

श्लोक 10.10

विदुर उवाच । यदात्थ बहुरूपस्य हरेरद्भुतकर्मणः । कालाख्यं लक्षणं ब्रह्मन् यथा वर्णय नः प्रभो ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर ने पूछा—विविध अद्भुत कार्यों वाले हरि की जिस कालशक्ति का उल्लेख किया, उसका स्वरूप भी समझाइए।

श्लोक 10.11

मैत्रेय उवाच । गुणव्यतिकराकारो निर्विशेषोऽप्रतिष्ठितः । पुरुषस्तदुपादानमात्मानं लीलयासृजत् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—काल गुणों के परिवर्तन का निमित्त है, स्वयं निराकार और अनाश्रित है; भगवान उसी से सृष्टिलीला प्रकट करते हैं।

श्लोक 10.12

विश्वं वै ब्रह्म तन्मात्रं संस्थितं विष्णुमायया । ईश्वरेण परिच्छिन्नं कालेनाव्यक्तमूर्तिना ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: अप्रकट कालस्वरूप ईश्वर विष्णुमाया में स्थित विश्व को क्रम, रूप और विभाग प्रदान करते हैं।

श्लोक 10.13

यथेदानीं तथाग्रे च पश्चादप्येतदीदृशम् । सर्गो नवविधस्तस्य प्राकृतो वैकृतस्तु यः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसा जगत अभी है, वैसी ही सृष्टिप्रक्रिया पूर्व और भविष्य में भी होती है; प्राकृत-वैकृत मिलाकर उसके नौ मुख्य प्रकार हैं।

श्लोक 10.14

कालद्रव्यगुणैरस्य त्रिविधः प्रतिसङ्क्रमः । आद्यस्तु महतः सर्गो गुणवैषम्यमात्मनः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: काल, द्रव्य और गुणों के आधार पर प्रलय के भी विभाग हैं; प्रथम सृष्टि गुणों के असन्तुलन से महत्तत्त्व की है।

श्लोक 10.15

द्वितीयस्त्वहमो यत्र द्रव्यज्ञानक्रियोदयः । भूतसर्गस्तृतीयस्तु तन्मात्रो द्रव्यशक्तिमान् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: दूसरी अहंकार की है जिससे द्रव्य, ज्ञान और क्रियाशक्तियाँ निकलती हैं; तीसरी भूतों के सूक्ष्म तन्मात्रारूप कारणों की है।

श्लोक 10.16

चतुर्थ ऐन्द्रियः सर्गो यस्तु ज्ञानक्रियात्मकः । वैकारिको देवसर्गः पञ्चमो यन्मयं मनः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: चौथी ज्ञान-कर्मेन्द्रियों की और पाँचवीं सात्त्विक अहंकार से अधिष्ठाता देवों तथा मन की सृष्टि है।

श्लोक 10.17

षष्ठस्तु तमसः सर्गो यस्त्वबुद्धिकृतः प्रभो । षडिमे प्राकृताः सर्गा वैकृतानपि मे श‍ृणु ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: छठी अविद्याजनित तमस की सृष्टि है; ये छह प्राकृत सृष्टियाँ हैं। अब वैकृत अर्थात् आगे के रूपविस्तार सुनो।

श्लोक 10.18

रजोभाजो भगवतो लीलेयं हरिमेधसः । सप्तमो मुख्यसर्गस्तु षड्विधस्तस्थुषां च यः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: रजोगुण द्वारा सृष्टि करना भगवान की लीला है; सातवीं स्थावर अर्थात् वनस्पतियों की सृष्टि छह विभागों में है।

श्लोक 10.19

वनस्पत्योषधिलता त्वक्सारा वीरुधो द्रुमाः । उत्स्रोतसस्तमःप्राया अन्तःस्पर्शा विशेषिणः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: वनस्पति, औषधि, लता, त्वक्सार, वीरुध और वृक्ष इन छह वर्गों में रस ऊपर चढ़ता है; उनका अनुभव अन्तर्मुख और चेतना आवृत्त है।

श्लोक 10.20

तिरश्चामष्टमः सर्गः सोऽष्टाविंशद्विधो मतः । अविदो भूरितमसः घ्राणज्ञा हृद्यवेदिनः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: आठवीं पशु-पक्षी आदि तिर्यक् जीवों की सृष्टि अट्ठाईस वर्गों में कही गई है; उनमें गन्धाधारित पहचान और सीमित विवेक की प्रधानता बताई है।

श्लोक 10.21

गौरजो महिषः कृष्णः सूकरो गवयो रुरुः । द्विशफाः पशवश्चेमे अविरुष्ट्रश्च सत्तम ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: गाय, बकरी, भैंस, कृष्णमृग, सूअर, गवय, रुरु, भेड़ और ऊँट आदि दो खुर वाले जीव गिनाए गए हैं।

श्लोक 10.22

खरोऽश्वोऽश्वतरो गौरः शरभश्चमरी तथा । एते चैकशफाः क्षत्तः श‍ृणु पञ्चनखान् पशून् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: गधा, घोड़ा, खच्चर, गौर, शरभ और चमरी आदि एक खुर वाले वर्ग में गिनाए हैं; अब पाँच नख वाले सुनो।

श्लोक 10.23

श्वा सृगालो वृको व्याघ्रो मार्जारः शशशल्लकौ । सिंहः कपिर्गजः कूर्मो गोधा च मकरादयः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: कुत्ता, सियार, भेड़िया, बाघ, बिल्ली, खरहा, साही, सिंह, वानर, हाथी, कछुआ, गोह और मकर आदि का उल्लेख है।

श्लोक 10.24

कङ्कगृध्रबकश्येनभासभल्लूकबर्हिणः । हंससारसचक्राह्वकाकोलूकादयः खगाः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: कङ्क, गिद्ध, बगुला, बाज, भास, भल्लूक, मोर, हंस, सारस, चकवा, कौआ और उल्लू आदि पक्षिवर्ग में बताए गए हैं।

श्लोक 10.25

अर्वाक्स्रोतस्तु नवमः क्षत्तरेकविधो नृणाम् । रजोऽधिकाः कर्मपरा दुःखे च सुखमानिनः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: नौवीं मनुष्य-सृष्टि है; मनुष्यों में रजोगुण, कर्मप्रवृत्ति और दुःखमिश्रित विषयों को सुख मानने की प्रवृत्ति प्रधान होती है।

श्लोक 10.26

वैकृतास्त्रय एवैते देवसर्गश्च सत्तम । वैकारिकस्तु यः प्रोक्तः कौमारस्तूभयात्मकः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्थावर, तिर्यक्, मनुष्य और आगे बताई देवसृष्टि वैकृत हैं; कुमारों की सृष्टि में प्राकृत और वैकृत दोनों का पक्ष है।

श्लोक 10.27

देवसर्गश्चाष्टविधो विबुधाः पितरोऽसुराः । गन्धर्वाप्सरसः सिद्धा यक्षरक्षांसि चारणाः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवसृष्टि के आठ विभागों में देव, पितर, असुर, गन्धर्व-अप्सरा, सिद्ध, यक्ष-राक्षस और चारण आदि आते हैं।

श्लोक 10.28

भूतप्रेतपिशाचाश्च विद्याध्राः किन्नरादयः । दशैते विदुराख्याताः सर्गास्ते विश्वसृक्कृताः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: भूत, प्रेत, पिशाच, विद्याधर और किन्नर आदि भी इसमें सम्मिलित हैं; कुमारसृष्टि सहित दस सृष्टिविभाग बताए गए।

श्लोक 10.29

अतः परं प्रवक्ष्यामि वंशान् मन्वन्तराणि च । एवं रजःप्लुतः स्रष्टा कल्पादिष्वात्मभूर्हरिः । सृजत्यमोघसङ्कल्प आत्मैवात्मानमात्मना ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: अब आगे वंश और मन्वन्तर बताऊँगा; भगवान से प्रेरित ब्रह्मा प्रत्येक कल्प के आरम्भ में रजोगुण द्वारा यह विस्तार रचते हैं।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 10 समाप्त ॥

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इस भाग का भक्ति-सन्देश

सुख का स्थायी आश्रय केवल बाहरी परिस्थितियाँ नहीं हैं। विदुर की जिज्ञासा, उद्धव का प्रेम और ब्रह्मा की साधना बताते हैं कि सत्सङ्ग, हरिकथा, नम्रता और आत्मचिन्तन से विवेक जागता है। सभी प्राणियों पर दया और अपने कर्तव्य का भगवान को समर्पण भक्ति को जीवन में उतारते हैं।

पाठाधार और संपादकीय जानकारी

प्राचीन मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents पर उपलब्ध “श्रीमद्भागवतम्—तृतीयस्कन्धः” है। इस भाग में अध्यायवार 45, 34, 28, 36, 50, 40, 42, 33, 44 और 29 श्लोक हैं; कुल 381। संस्करणों में पाठभेद या गणना में अन्तर मिल सकता है। मूल पाठ का क्रम सुरक्षित रखा गया है। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना की स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है; किसी आधुनिक टीका की प्रतिलिपि नहीं। विराट के अंगों और सामाजिक वृत्तियों का वर्णन ग्रंथ की प्रतीकात्मक ध्यानपद्धति के अनुसार है। सृष्टि और जीववर्गों की चर्चा प्राचीन पुराणपरम्परा का वर्णन है।

॥ तृतीय स्कन्ध • भाग १ समाप्त ॥

॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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