श्रीमद्भागवत महापुराण तृतीय स्कन्ध भाग 1 — अध्याय 1–10, विदुर संवाद और सृष्टि रहस्य
श्रीमद्भागवत महापुराण
तृतीय स्कन्ध • भाग १ • अध्याय १–१०
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विदुर की जिज्ञासा से सृष्टि के परम आश्रय तक
द्वितीय स्कन्ध के अन्त में उठी विदुरकथा की जिज्ञासा यहाँ आगे बढ़ती है। विदुर का गृहत्याग, उद्धव से मिलन, श्रीकृष्ण की लीलाओं का स्मरण और मैत्रेय से तत्त्वसंवाद क्रम से आते हैं। इसके बाद विराट पुरुष, जीव का बन्धन, ब्रह्माजी की उत्पत्ति, उनकी स्तुति और सृष्टि के विभागों का विवेचन है।
इस भाग में अध्याय 1–10 के सभी 381 श्लोक मूल क्रम में हैं। हर श्लोक का सरल हिंदी भावार्थ स्वतंत्र रूप से लिखा गया है। तृतीय स्कन्ध के शेष अध्याय आगे के भागों में आएँगे।
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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 1
विदुर का गृहत्याग और उद्धव से भेंट
श्लोक 1.1
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—समृद्ध घर छोड़कर वन गए विदुर ने पहले मैत्रेयजी से यही प्रश्न किया था।
श्लोक 1.2
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर के उसी घर में सर्वेश्वर श्रीकृष्ण दुर्योधन का भवन छोड़कर अपनेपन से ठहरे थे।
श्लोक 1.3
सरल हिंदी भावार्थ: परीक्षित ने पूछा—विदुर और मैत्रेयजी कहाँ मिले और उनका संवाद कब हुआ? कृपया बताइए।
श्लोक 1.4
सरल हिंदी भावार्थ: निर्मलचित्त विदुर का प्रश्न अवश्य ही महान कल्याण का विषय रहा होगा, जिसकी साधु प्रशंसा करते हैं।
श्लोक 1.5
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी कहते हैं—परीक्षित का प्रश्न सुनकर ज्ञानी शुकदेवजी प्रसन्न हुए और बोले, ध्यान से सुनो।
श्लोक 1.6
सरल हिंदी भावार्थ: धृतराष्ट्र पुत्रमोह में अधर्म का समर्थन करते रहे; पितृहीन पाण्डवों को लाक्षागृह में जलाने का षड्यन्त्र भी हुआ।
श्लोक 1.7
सरल हिंदी भावार्थ: सभा में रोती हुई पुत्रवधू द्रौपदी के केश खींचने का घोर अपमान भी उन्होंने नहीं रोका।
श्लोक 1.8
सरल हिंदी भावार्थ: अन्यायपूर्ण जुए के बाद वन से लौटे धर्मनिष्ठ युधिष्ठिर को समय आने पर उनका राज्यभाग भी नहीं दिया।
श्लोक 1.9
सरल हिंदी भावार्थ: पाण्डवों के दूत बनकर आए जगद्गुरु कृष्ण की कल्याणकारी वाणी को भी उन्होंने उचित सम्मान नहीं दिया।
श्लोक 1.10
सरल हिंदी भावार्थ: बड़े भाई ने परामर्श माँगा तो श्रेष्ठ नीतिज्ञ विदुर ने वह नीति कही जिसे विदुरनीति कहा जाता है।
श्लोक 1.11
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर ने कहा—आपके बड़े अपराध सह रहे युधिष्ठिर को उसका अधिकार दीजिए; क्रोधित भीम से आप स्वयं भयभीत हैं।
श्लोक 1.12
सरल हिंदी भावार्थ: देवों के भी आराध्य मुकुन्द पाण्डवों के रक्षक हैं; अनेक राजाओं को जीत चुके श्रीकृष्ण उनके पक्ष में हैं।
श्लोक 1.13
सरल हिंदी भावार्थ: पुत्र समझकर पाले जा रहे कृष्णविमुख दुर्योधन के अधर्म को कुलकल्याण के लिए त्याग दीजिए।
श्लोक 1.14
सरल हिंदी भावार्थ: यह सुनकर दुर्योधन क्रोध से काँप उठा; कर्ण, अपने भाइयों और शकुनि सहित उसने सम्माननीय विदुर का अपमान किया।
श्लोक 1.15
सरल हिंदी भावार्थ: दुर्योधन ने कहा—इसे किसने बुलाया? हमारा खाकर विरोधियों का काम करने वाले इस दासीपुत्र को तुरन्त निकालो।
श्लोक 1.16
सरल हिंदी भावार्थ: भाई के सामने कटुवचनों से आहत विदुर ने इसे माया का प्रभाव समझा, द्वार पर धनुष रखा और निर्विकार चले गए।
श्लोक 1.17
सरल हिंदी भावार्थ: हस्तिनापुर छोड़कर विदुर भगवान के पावन तीर्थस्थानों की यात्रा करने लगे; उनका जीवन कौरवकुल का पुण्य था।
श्लोक 1.18
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के चिह्नों से सुशोभित नगरों, उपवनों, पर्वतों, निर्मल नदियों और सरोवरों में वे अनन्यभाव से विचरे।
श्लोक 1.19
सरल हिंदी भावार्थ: पवित्र सरल जीवन, नियमित स्नान, धरती पर शयन और अवधूतवेष धारण कर वे हरि को प्रसन्न करने वाले व्रत करते रहे।
श्लोक 1.20
सरल हिंदी भावार्थ: भारतवर्ष में भ्रमण करते हुए वे प्रभास पहुँचे; तब तक कृष्ण की सहायता से युधिष्ठिर पृथ्वी के सम्राट हो चुके थे।
श्लोक 1.21
सरल हिंदी भावार्थ: बाँसों की रगड़ से जले वन की तरह परस्पर कलह से स्वजनों के नाश का समाचार सुनकर वे सरस्वती की ओर चले।
श्लोक 1.22
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने सरस्वती तट पर त्रित, उशना, मनु, पृथु, अग्नि, असित, वायु आदि से सम्बद्ध तीर्थों की सेवा की।
श्लोक 1.23
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने ऋषियों और देवों द्वारा स्थापित विष्णुमन्दिर देखे, जिनके चक्रादि चिह्न श्रीकृष्ण का स्मरण कराते हैं।
श्लोक 1.24
सरल हिंदी भावार्थ: सुराष्ट्र, सौवीर, मत्स्य और कुरुजाङ्गल पार करके वे यमुना पहुँचे, जहाँ भगवद्भक्त उद्धव मिले।
श्लोक 1.25
सरल हिंदी भावार्थ: शान्तचित्त, बृहस्पति के शिष्य और कृष्णसेवक उद्धव को प्रेम से आलिंगन कर विदुर ने स्वजनों का कुशल पूछा।
श्लोक 1.26
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने पूछा—जगत के कल्याण के लिए अवतीर्ण दोनों पुरातन पुरुष कृष्ण और बलराम शूरवंश में कुशल हैं?
श्लोक 1.27
सरल हिंदी भावार्थ: हमारे परम हितैषी उदार वसुदेव कुशल हैं, जो अपनी बहनों की पिता के समान देखभाल करते हैं?
श्लोक 1.28
सरल हिंदी भावार्थ: यदुवंश के वीर रथी प्रद्युम्न कुशल हैं, जिन्हें रुक्मिणी ने आराधना से श्रीकृष्ण के पुत्ररूप में पाया?
श्लोक 1.29
सरल हिंदी भावार्थ: सात्वत, वृष्णि, भोज और दाशार्हों के राजा उग्रसेन कुशल हैं, जिन्हें कृष्ण ने स्वयं सिंहासन पर बैठाया?
श्लोक 1.30
सरल हिंदी भावार्थ: जाम्बवती के पुत्र और कृष्ण के समान पराक्रमी साम्ब कुशल हैं, जिनका सम्बन्ध पूर्वजन्म के स्कन्द से बताया गया है?
श्लोक 1.31
सरल हिंदी भावार्थ: अर्जुन से धनुर्विद्या सीखने वाले सात्यकि कुशल हैं, जिन्होंने हरिसेवा से दुर्लभ आध्यात्मिक गति प्राप्त की?
श्लोक 1.32
सरल हिंदी भावार्थ: श्वफल्कपुत्र अक्रूर कुशल और स्वस्थ हैं, जो कृष्ण के चरणचिह्नों की धूल में प्रेमविह्वल होकर लोटते थे?
श्लोक 1.33
सरल हिंदी भावार्थ: देवमाता के समान देवकी कुशल हैं, जिन्होंने अपने गर्भ में भगवान को धारण किया?
श्लोक 1.34
सरल हिंदी भावार्थ: भक्तों की इच्छाएँ पूर्ण करने वाले अनिरुद्ध कुशल हैं, जिन्हें चतुर्व्यूह में मनतत्त्व का अधिष्ठाता कहा जाता है?
श्लोक 1.35
सरल हिंदी भावार्थ: हृदीक, सत्यभामा के पुत्र, चारुदेष्ण, गद और अन्य अनन्य कृष्णभक्त भी कुशलपूर्वक हैं?
श्लोक 1.36
सरल हिंदी भावार्थ: कृष्ण और अर्जुन के सहयोग से युधिष्ठिर धर्ममर्यादा की रक्षा कर रहे हैं, जिनका ऐश्वर्य देखकर दुर्योधन जलता था?
श्लोक 1.37
सरल हिंदी भावार्थ: क्या गदायुद्ध के महाबली भीम ने अपराधियों के प्रति अपना दीर्घकालीन क्रोध उतार लिया?
श्लोक 1.38
सरल हिंदी भावार्थ: शत्रुओं को शान्त करने वाले अर्जुन कुशल हैं, जिनके बाणकौशल से किरातवेषधारी शिवजी भी प्रसन्न हुए थे?
श्लोक 1.39
सरल हिंदी भावार्थ: पाण्डवों द्वारा नेत्रों की पलकों जैसी रक्षा पाए नकुल-सहदेव अपना अधिकार पुनः पाकर सुखी हैं?
श्लोक 1.40
सरल हिंदी भावार्थ: चारों दिशाओं को जीतने वाले पाण्डु के बिना भी क्या कुन्ती अपने पुत्रों के लिए जीवन धारण किए हैं?
श्लोक 1.41
सरल हिंदी भावार्थ: मुझे धृतराष्ट्र के अधःपतन का दुःख है; पुत्रों का पक्ष लेकर उन्होंने मृत भाई और अपने हितैषी मेरे साथ अन्याय किया।
श्लोक 1.42
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की मनुष्य जैसी लीला लोगों को भ्रमित करती है; उनकी कृपा से मैं उनकी व्यवस्था समझकर निराश्चर्य भ्रमण करता हूँ।
श्लोक 1.43
सरल हिंदी भावार्थ: अहंकार से पथभ्रष्ट राजाओं का भार हटाने और शरणागतों का दुःख मिटाने के लिए प्रभु ने कौरवों का अपराध कुछ समय सहा।
श्लोक 1.44
सरल हिंदी भावार्थ: जन्मरहित, निष्कर्म और गुणातीत भगवान लोकमार्ग सुधारने तथा जीवों को आकर्षित करने के लिए जन्म और कर्म की लीला करते हैं।
श्लोक 1.45
सरल हिंदी भावार्थ: हे उद्धव, शरणागतों और लोकपालों के हित में यदुवंश में प्रकट हुए उन पवित्रकीर्ति कृष्ण का समाचार सुनाइए।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 1 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 2
उद्धव का कृष्णविरह और व्रजलीला का स्मरण
श्लोक 2.1
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी कहते हैं—प्रिय प्रभु का समाचार पूछे जाने पर स्मरण और उत्कण्ठा से भरकर उद्धव तत्काल उत्तर नहीं दे सके।
श्लोक 2.2
सरल हिंदी भावार्थ: पाँच वर्ष की आयु में भी वे खेल-खेल में कृष्णपूजा करते और माता के बुलाने पर भोजन के लिए नहीं उठते थे।
श्लोक 2.3
सरल हिंदी भावार्थ: आजीवन कृष्णसेवा करके वृद्ध हुए उद्धव प्रभु के चरण याद आने पर सामान्य ढंग से उनका समाचार कैसे सुना सकते थे?
श्लोक 2.4
सरल हिंदी भावार्थ: वे कुछ समय मौन रहे; तीव्र भक्तियोग से कृष्णचरणों की सुधा में डूबकर परम आनन्द अनुभव करने लगे।
श्लोक 2.5
सरल हिंदी भावार्थ: उनका शरीर रोमाञ्चित था, बन्द होती आँखों से प्रेमाश्रु बह रहे थे; विदुर ने उनकी पूर्ण भक्ति पहचान ली।
श्लोक 2.6
सरल हिंदी भावार्थ: धीरे-धीरे सामान्य चेतना में लौटकर उन्होंने आँसू पोंछे और मन्द मुस्कान के साथ विदुर को उत्तर दिया।
श्लोक 2.7
सरल हिंदी भावार्थ: उद्धव बोले—कृष्णरूपी सूर्य अस्त हो गया और कालरूपी अजगर ने हमारा ऐश्वर्य निगल लिया; अब क्या कुशल कहूँ?
श्लोक 2.8
सरल हिंदी भावार्थ: संसार और विशेषकर यादव दुर्भाग्यशाली रहे; साथ रहते हुए भी वे कृष्ण को पूर्णतः नहीं पहचान सके, जैसे मछलियाँ चन्द्रमा को।
श्लोक 2.9
सरल हिंदी भावार्थ: यादव बुद्धिमान और घनिष्ठ सहचर थे, फिर भी सबके आश्रय भगवान को अपने कुल का एक श्रेष्ठ पुरुष ही समझते रहे।
श्लोक 2.10
सरल हिंदी भावार्थ: मायामोहित या असत्य आश्रयों में लगे लोगों की बातें उस भक्त की बुद्धि नहीं डिगातीं जिसका मन हरि में स्थिर है।
श्लोक 2.11
सरल हिंदी भावार्थ: लोगों की आँखें अभी तृप्त भी नहीं हुई थीं कि भगवान अपना अनुपम दर्शन देकर दृष्टि से ओझल हो गए।
श्लोक 2.12
सरल हिंदी भावार्थ: योगमाया से धारण किया उनका मनोहर मनुष्यरूप सौन्दर्य का सर्वोच्च आश्रय था; उनके अंग आभूषणों को भी सुशोभित करते थे।
श्लोक 2.13
सरल हिंदी भावार्थ: युधिष्ठिर के राजसूय में उनका रूप देखकर तीनों लोकों ने माना कि सृष्टिकर्ता का समस्त कौशल यहीं प्रकट हो गया है।
श्लोक 2.14
सरल हिंदी भावार्थ: प्रेमभरी मुस्कान, रास और कृपादृष्टि से सम्मान पाकर गोपियों का मन कृष्ण में ऐसा लगा कि अन्य काम भूल गए।
श्लोक 2.15
सरल हिंदी भावार्थ: जब दुष्टों ने शान्त भक्तों को सताया, तब अजन्मा भगवान करुणावश बलराम सहित अग्नि के समान प्रकट हुए।
श्लोक 2.16
सरल हिंदी भावार्थ: वसुदेवगृह में जन्म, व्रजवास और शत्रुभय जैसा पलायन—अनन्तवीर्य प्रभु की ये मानवीय लीलाएँ याद करके मेरा हृदय व्याकुल होता है।
श्लोक 2.17
सरल हिंदी भावार्थ: माता-पिता से उनके विनम्र शब्द याद आते हैं—कंस के भय से हम आपकी सेवा न कर सके, हमें क्षमा कीजिए।
श्लोक 2.18
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी चरणरज का अनुभव करने वाला उन्हें कैसे भूले, जिन्होंने भौंहों के संकेत से काल को प्रेरित कर पृथ्वी का भार हटाया?
श्लोक 2.19
सरल हिंदी भावार्थ: राजसूय में आपने देखा, द्वेषी शिशुपाल को भी वह गति मिली जिसे योगी चाहते हैं; ऐसे प्रभु का विरह कौन सहे?
श्लोक 2.20
सरल हिंदी भावार्थ: अन्य वीर भी युद्ध में कृष्ण का मुख देखते हुए अर्जुन के अस्त्रों से पवित्र होकर उनके परम पद को पहुँचे।
श्लोक 2.21
सरल हिंदी भावार्थ: उनके समान या उनसे बढ़कर कोई नहीं; वे पूर्णकाम स्वामी हैं, जिनकी चरणपीठ पर लोकपाल अपने मुकुट झुकाते हैं।
श्लोक 2.22
सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी वे सिंहासन पर बैठे उग्रसेन के सामने सेवक की तरह खड़े होकर विनम्र निवेदन करते थे—यह स्मरण मुझे विह्वल करता है।
श्लोक 2.23
सरल हिंदी भावार्थ: मारने के लिए विषभरा स्तन पिलाने वाली पूतना को भी उन्होंने धायमाता की गति दी; उनसे दयालु आश्रय और कौन है?
श्लोक 2.24
सरल हिंदी भावार्थ: वे असुर भी धन्य प्रतीत होते हैं जिनका मन विरोध से उन्हीं में लगा और जिन्होंने युद्ध में चक्रधारी प्रभु को गरुड़ पर देखा।
श्लोक 2.25
सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी का क्लेश मिटाने की ब्रह्माजी की प्रार्थना पर भगवान कंस के कारागार में देवकी-वसुदेव के यहाँ प्रकट हुए।
श्लोक 2.26
सरल हिंदी भावार्थ: कंस से बचाने के लिए पिता उन्हें नन्दव्रज ले गए; वहाँ बलराम सहित ग्यारह वर्ष अपनी महिमा छिपाकर रहे।
श्लोक 2.27
सरल हिंदी भावार्थ: ग्वालबालों से घिरे वे पक्षियों के कलरव वाले यमुना के उपवनों में बछड़े चराते और खेलते थे।
श्लोक 2.28
सरल हिंदी भावार्थ: कभी रोते, कभी हँसते और भोले बालक की तरह पीछे मुड़कर देखते हुए उन्होंने व्रजवासियों को मनोहर बाललीलाएँ दिखाईं।
श्लोक 2.29
सरल हिंदी भावार्थ: गाय-बैलों से सम्पन्न गोधन चराते हुए वे बाँसुरी की मधुर ध्वनि से साथ आए ग्वालों को आनन्द देते थे।
श्लोक 2.30
सरल हिंदी भावार्थ: कंस के भेजे रूप बदलने वाले मायावी असुरों को उन्होंने बालक के खिलौनों की तरह सहज ही नष्ट कर दिया।
श्लोक 2.31
सरल हिंदी भावार्थ: कालिय को वश में कर उन्होंने विष से पीड़ित गौओं को बचाया और यमुना का जल फिर निर्मल कर दिया।
श्लोक 2.32
सरल हिंदी भावार्थ: धन का उत्तम उपयोग कराने के लिए उन्होंने नन्दबाबा से श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा गोपूजन सम्बन्धी यज्ञ कराया।
श्लोक 2.33
सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्र के क्रोध से मूसलाधार वर्षा होने पर उन्होंने गोवर्धन को छत्र बनाकर भयभीत व्रज की रक्षा की।
श्लोक 2.34
सरल हिंदी भावार्थ: शरद् की चाँदनी रातों में वे मधुर गान करते हुए गोपियों के मण्डल की शोभा बनकर रासविहार करते थे।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 2 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 3
श्रीकृष्ण की द्वारका और कुरुक्षेत्र की लीलाएँ
श्लोक 3.1
सरल हिंदी भावार्थ: उद्धव कहते हैं—कृष्ण बलराम सहित मथुरा आए और माता-पिता को सुख देने के लिए ऊँचे मंच से कंस को गिराकर मार डाला।
श्लोक 3.2
सरल हिंदी भावार्थ: सान्दीपनि से एक बार सुनकर विस्तृत वेदविद्या ग्रहण की और गुरुदक्षिणा में उनके मृत पुत्र को लौटाया।
श्लोक 3.3
सरल हिंदी भावार्थ: रुक्मिणी के स्वयंवर में आए राजाओं के देखते-देखते उन्होंने गरुड़ के पराक्रम की तरह अपनी योग्य वधू का हरण किया।
श्लोक 3.4
सरल हिंदी भावार्थ: सात प्रबल बैलों को वश में करके नाग्नजिती से विवाह किया और विरोधी शस्त्रधारी राजाओं को परास्त किया।
श्लोक 3.5
सरल हिंदी भावार्थ: सत्यभामा के प्रिय कार्य के लिए पारिजात लाए; क्रोधित इन्द्र ने देवों सहित विरोध किया—यह भी उनकी प्रेमलीला थी।
श्लोक 3.6
सरल हिंदी भावार्थ: सुदर्शन से भौमासुर का वध करने पर पृथ्वीदेवी ने प्रार्थना की; भगवान ने उसके पुत्र को राज्य देकर अन्तःपुर में प्रवेश किया।
श्लोक 3.7
सरल हिंदी भावार्थ: बन्दी राजकन्याओं ने दुःखियों के बन्धु कृष्ण को देखकर हर्ष, लज्जा और प्रेमभरी दृष्टि से पति के रूप में स्वीकार किया।
श्लोक 3.8
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने अपनी योगमाया से अनेक रूप धारण कर एक ही समय अलग-अलग महलों में उन कन्याओं का पाणिग्रहण किया।
श्लोक 3.9
सरल हिंदी भावार्थ: गृहस्थलीला का विस्तार करते हुए प्रत्येक रानी से अपने समान गुणों वाले दस-दस पुत्र उत्पन्न किए।
श्लोक 3.10
सरल हिंदी भावार्थ: नगर को घेरने वाले कालयवन, जरासन्ध और शाल्व आदि को स्वयं या अपने वीर सहयोगियों के द्वारा परास्त कराया।
श्लोक 3.11
सरल हिंदी भावार्थ: शम्बर, द्विविद, बाण, मुर, बल्वल और दन्तवक्त्र आदि दुष्टों को उन्होंने स्वयं अथवा अपने भक्तों से पराजित कराया।
श्लोक 3.12
सरल हिंदी भावार्थ: धृतराष्ट्र और पाण्डु के पुत्रों के दोनों पक्षों में आए राजाओं की विशाल सेनाओं से कुरुक्षेत्र की भूमि काँप उठी।
श्लोक 3.13
सरल हिंदी भावार्थ: कर्ण, दुःशासन और शकुनि की कुमन्त्रणा से विनष्ट ऐश्वर्य वाला दुर्योधन टूटी जाँघों सहित पड़ा था; उसे देखकर कृष्ण प्रसन्न नहीं हुए।
श्लोक 3.14
सरल हिंदी भावार्थ: प्रभु ने सोचा—अठारह अक्षौहिणी सेना का भार तो घटा, पर मेरे अंशस्वरूप यादवों का असह्य पराक्रम अभी बना है।
श्लोक 3.15
सरल हिंदी भावार्थ: यादवों का अन्त परस्पर विवाद से ही होगा; मेरे रहते उन्हें कोई दूसरा नहीं जीत सकता—इस प्रकार उन्होंने लीला समेटने का विचार किया।
श्लोक 3.16
सरल हिंदी भावार्थ: युधिष्ठिर को राज्य पर स्थापित करके भगवान ने स्वजनों को सुख दिया और साधु आचरण का आदर्श दिखाया।
श्लोक 3.17
सरल हिंदी भावार्थ: अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में अश्वत्थामा के अस्त्र से नष्ट होने लगे परीक्षित की भगवान ने रक्षा की।
श्लोक 3.18
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने युधिष्ठिर से तीन अश्वमेध कराए; युधिष्ठिर भाइयों सहित प्रजा की रक्षा करते हुए कृष्ण का अनुसरण करते रहे।
श्लोक 3.19
सरल हिंदी भावार्थ: द्वारका में भगवान लोक और वेद की मर्यादा का पालन करते हुए विवेक और अनासक्ति सहित गृहस्थलीला करते थे।
श्लोक 3.20
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी स्नेहभरी मुस्कान, अमृतमयी वाणी, निर्दोष आचरण और लक्ष्मी के आश्रयरूप व्यक्तित्व से सब आनन्दित थे।
श्लोक 3.21
सरल हिंदी भावार्थ: वे इस लोक, परलोक और विशेषकर यादवों को सुख देते; रात्रि में प्रियजनों के साथ स्नेहमय व्यवहार करते थे।
श्लोक 3.22
सरल हिंदी भावार्थ: अनेक वर्षों तक गृहस्थलीला करने के बाद उन्होंने उसे समाप्त करने का वैराग्यमय संकल्प प्रकट किया।
श्लोक 3.23
सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्य और विषयसुख दोनों दैवाधीन हैं; योगेश्वर का अनुयायी विवेकी इन अस्थायी संयोगों पर कैसे निर्भर रहे?
श्लोक 3.24
सरल हिंदी भावार्थ: एक दिन खेलते हुए यदु-भोजकुमारों ने मुनियों को कुपित किया और उनसे शाप पाया; मुनि भी भगवान का अभिप्राय जानते थे।
श्लोक 3.25
सरल हिंदी भावार्थ: कुछ महीने बाद दैवी प्रेरणा से वृष्णि, भोज और अन्धकवंशी प्रसन्न होकर रथों से प्रभास पहुँचे।
श्लोक 3.26
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ स्नान करके उन्होंने पितरों, देवों और ऋषियों का तर्पण किया तथा ब्राह्मणों को उत्तम गौएँ दान दीं।
श्लोक 3.27
सरल हिंदी भावार्थ: सोना, चाँदी, शय्या, वस्त्र, मृगचर्म, कम्बल, वाहन, रथ, हाथी और निर्वाह योग्य भूमि आदि का दान किया।
श्लोक 3.28
सरल हिंदी भावार्थ: स्वादिष्ट अन्न भगवान को समर्पित करके ब्राह्मणों को खिलाया; गौ-ब्राह्मणहित में लगे वीरों ने धरती पर सिर रखकर प्रणाम किया।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 3 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 4
उद्धव को उपदेश और विदुर का मैत्रेय के पास जाना
श्लोक 4.1
सरल हिंदी भावार्थ: उद्धव बोले—भोजन और मदिरापान के बाद यादवों का विवेक भ्रष्ट हुआ और कटुवचनों से वे एक-दूसरे को आहत करने लगे।
श्लोक 4.2
सरल हिंदी भावार्थ: मदिरा से विक्षुब्ध हुए यादव सूर्यास्त के समय परस्पर ऐसे भिड़े जैसे बाँस आपस में रगड़ खाकर नष्ट होते हैं।
श्लोक 4.3
सरल हिंदी भावार्थ: अपनी माया का यह क्रम देखकर भगवान ने सरस्वती का आचमन किया और एक वृक्ष के नीचे बैठ गए।
श्लोक 4.4
सरल हिंदी भावार्थ: अपने कुल की लीला समेटते समय शरणागतवत्सल भगवान ने मुझे बदरिकाश्रम जाने की आज्ञा दी।
श्लोक 4.5
सरल हिंदी भावार्थ: उनका अभिप्राय जानते हुए भी चरणवियोग असह्य होने से मैं उनके पीछे-पीछे चला गया।
श्लोक 4.6
सरल हिंदी भावार्थ: प्रिय स्वामी को खोजते हुए मैंने उन्हें सरस्वती तट पर अकेले बैठे देखा; सर्वाश्रय प्रभु ने वहीं अपना निवास बनाया था।
श्लोक 4.7
सरल हिंदी भावार्थ: उनका श्यामसुन्दर शरीर निर्मल था, नेत्र शान्त अरुण, चार भुजाएँ थीं और वे पीत रेशमी वस्त्र पहने थे।
श्लोक 4.8
सरल हिंदी भावार्थ: वे बाईं जाँघ पर दायाँ चरण रखकर छोटे पीपल के सहारे बैठे थे; विषयसुख से विरत होकर भी उनका सौन्दर्य पूर्ण था।
श्लोक 4.9
सरल हिंदी भावार्थ: उसी समय लोकों में भ्रमण करते हुए व्यासजी के मित्र और परम भक्त मैत्रेयमुनि भी वहाँ आ पहुँचे।
श्लोक 4.10
सरल हिंदी भावार्थ: प्रेम से सिर झुकाए मैत्रेय सुन रहे थे; कृष्ण ने स्नेहपूर्ण मुस्कान और दृष्टि से मुझे आश्वस्त करते हुए कहा।
श्लोक 4.11
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—मैं तुम्हारी अन्तःकरण की इच्छा जानता हूँ; पूर्वजन्म में वसु रहते तुमने मुझे पाने के लिए आराधना की थी।
श्लोक 4.12
सरल हिंदी भावार्थ: मेरी कृपा से यह तुम्हारा अन्तिम जन्म है; लोकलीला समेटते समय तुम्हें मेरा यह एकान्त दर्शन मिला है।
श्लोक 4.13
सरल हिंदी भावार्थ: सृष्टि के प्रारम्भ में मैंने नाभिकमल पर बैठे ब्रह्मा को अपनी महिमा प्रकट करने वाला परम भागवतज्ञान दिया था।
श्लोक 4.14
सरल हिंदी भावार्थ: उद्धव बोले—उनकी ऐसी आदरभरी वाणी से मैं रोमाञ्चित हुआ; आँसू बहाते और रुँधे स्वर में हाथ जोड़कर निवेदन किया।
श्लोक 4.15
सरल हिंदी भावार्थ: आपके सेवक के लिए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष भी दुर्लभ नहीं; किन्तु मुझे केवल आपके चरणों की सेवा चाहिए।
श्लोक 4.16
सरल हिंदी भावार्थ: निष्कर्म का कर्म, अजन्मा का जन्म, निर्भय का पलायन और आत्माराम की गृहस्थलीला देखकर ज्ञानी की बुद्धि भी चकित होती है।
श्लोक 4.17
सरल हिंदी भावार्थ: आप अखण्ड ज्ञानस्वरूप होकर भी परामर्श के लिए मुझे बुलाकर अज्ञानी की तरह पूछते थे; आपकी लीला मन को विस्मित करती है।
श्लोक 4.18
सरल हिंदी भावार्थ: हे स्वामी, अपने स्वरूप का रहस्य प्रकाशित करने वाला वह परमज्ञान मुझे सरलता से बताइए जिससे संसार का क्लेश पार करूँ।
श्लोक 4.19
सरल हिंदी भावार्थ: मेरी अन्तरंग प्रार्थना सुनकर कमलनयन भगवान ने मुझे अपने परम स्वरूप की स्थिति का उपदेश दिया।
श्लोक 4.20
सरल हिंदी भावार्थ: उनसे आत्मतत्त्व का मार्ग सीखकर, चरणवन्दना और प्रदक्षिणा करके मैं विरह से व्याकुल यहाँ आया हूँ।
श्लोक 4.21
सरल हिंदी भावार्थ: दर्शन का आनन्द और वियोग का दुःख दोनों लेकर अब मैं उनके प्रिय बदरिकाश्रम जाऊँगा।
श्लोक 4.22
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ जगत के हितैषी नर और नारायण ऋषि दीर्घकाल से शान्त किन्तु कठोर तप करते हैं।
श्लोक 4.23
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी कहते हैं—स्वजनों के असह्य विनाश का समाचार सुनकर विदुर ने उत्पन्न शोक को तत्त्वज्ञान से शान्त किया।
श्लोक 4.24
सरल हिंदी भावार्थ: फिर उन्होंने कृष्ण के परम प्रिय भक्त उद्धव से विश्वासपूर्वक एक विनम्र निवेदन किया।
श्लोक 4.25
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर बोले—योगेश्वर ने आपको जो आत्मरहस्य का ज्ञान दिया है, मुझे भी सुनाइए; भगवान के सेवक अन्य सेवकों का हित करते हैं।
श्लोक 4.26
सरल हिंदी भावार्थ: उद्धव ने कहा—मैत्रेय ऋषि निकट ही हैं; लोकलीला समेटते समय भगवान ने उन्हें आपके उपदेश का आदेश दिया था।
श्लोक 4.27
सरल हिंदी भावार्थ: यमुना तट पर कृष्णकथामृत से विरहताप शान्त करते हुए दोनों की रात क्षण जैसी बीत गई; फिर उद्धव चले गए।
श्लोक 4.28
सरल हिंदी भावार्थ: परीक्षित ने पूछा—यादववीरों के नाश और भगवान के अन्तर्धान के बाद मुख्य भक्त उद्धव कैसे शेष रहे?
श्लोक 4.29
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—ब्रह्मशाप को निमित्त बनाकर कुललीला समेटते समय अचूक संकल्प वाले भगवान ने विचार किया।
श्लोक 4.30
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे प्रकट दर्शन समाप्त होने पर मेरे आश्रित ज्ञान को धारण करने के योग्य आत्मज्ञानियों में श्रेष्ठ उद्धव ही हैं।
श्लोक 4.31
सरल हिंदी भावार्थ: उद्धव मुझसे ज्ञान में न्यून नहीं और गुणों से अभिभूत नहीं होते; वे जगत को मेरा ज्ञान समझाने के लिए रहें।
श्लोक 4.32
सरल हिंदी भावार्थ: त्रिलोकगुरु की आज्ञा पाकर उद्धव बदरिकाश्रम गए और समाधि द्वारा हरि की आराधना करने लगे।
श्लोक 4.33
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर ने उद्धव से परमात्मा कृष्ण की प्रशंसनीय लीलाएँ सुनीं, जिन्होंने खेल के लिए मनुष्यरूप धारण किया था।
श्लोक 4.34
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने प्रभु की लीला-समाप्ति भी सुनी, जो विवेकियों को धैर्य देती है किन्तु देहासक्त और व्याकुल जनों को कठिन लगती है।
श्लोक 4.35
सरल हिंदी भावार्थ: कृष्ण ने मेरा भी स्मरण किया—यह सोचकर उद्धव के जाने के बाद विदुर प्रेमविह्वल होकर रो पड़े।
श्लोक 4.36
सरल हिंदी भावार्थ: कुछ दिनों बाद विदुर यमुना से गंगातट पहुँचे, जहाँ मैत्रेयमुनि विराजमान थे।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 4 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 5
विदुर–मैत्रेय संवाद और सृष्टितत्त्व
श्लोक 5.1
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—गंगाद्वार पर बैठे अगाधज्ञानी, सौम्य मैत्रेयजी के पास जाकर कृष्णभक्ति से निर्मल विदुर ने प्रश्न किया।
श्लोक 5.2
सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्य सुख के लिए कर्म करता है, पर उनसे न स्थायी सुख मिलता है न दुःख का अन्त; कृपया इसका उचित उपाय बताइए।
श्लोक 5.3
सरल हिंदी भावार्थ: कृष्णविमुख और अधर्म से दुःखी लोगों पर कृपा करने के लिए ही भगवान के कल्याणकारी भक्त संसार में विचरते हैं।
श्लोक 5.4
सरल हिंदी भावार्थ: वह कल्याणमार्ग बताइए जिससे भगवान प्रसन्न होकर भक्तिपवित्र हृदय में अपने स्वरूप का यथार्थ ज्ञान प्रदान करते हैं।
श्लोक 5.5
सरल हिंदी भावार्थ: स्वतन्त्र भगवान अवतारों में कौन-कौन से कर्म करते हैं और निष्काम रहकर सृष्टि तथा जगत की जीविका कैसे स्थापित करते हैं?
श्लोक 5.6
सरल हिंदी भावार्थ: वे जगत को अपने में समेटकर योगनिद्रा कैसे करते हैं और एक होकर उसमें अनेक रूपों से कैसे प्रवेश करते हैं?
श्लोक 5.7
सरल हिंदी भावार्थ: गौ, ब्राह्मण और देवों के हित में उनकी अवतारलीलाएँ सुनते-सुनते भी हमारा मन तृप्त नहीं होता।
श्लोक 5.8
सरल हिंदी भावार्थ: किन तत्त्वों से उन्होंने लोक, लोकालोक और लोकपाल बनाए, जिनमें विभिन्न जीवसमूह अपने स्थान पाते हैं?
श्लोक 5.9
सरल हिंदी भावार्थ: नारायण से उत्पन्न ब्रह्मा ने जीवों के कर्म, रूप और नामों के विविध विभाग कैसे किए? यह समझाइए।
श्लोक 5.10
सरल हिंदी भावार्थ: व्यासजी से अनेक ऊँचे-नीचे कर्ममार्ग सुन चुका हूँ; क्षणिक सुख देने वाले उन विषयों से तृप्ति नहीं मिली, कृष्णकथा ही सार है।
श्लोक 5.11
सरल हिंदी भावार्थ: आपके सत्सङ्ग में गाई जाने वाली हरिकथा से कौन तृप्त हो सकता है? वह कानों में प्रवेश करके बन्धनकारी गृहासक्ति काटती है।
श्लोक 5.12
सरल हिंदी भावार्थ: आपके मित्र व्यासजी ने महाभारत में लौकिक प्रसंगों से मन आकर्षित करके लोगों को हरिकथा की ओर लगाया।
श्लोक 5.13
सरल हिंदी भावार्थ: श्रद्धा से बढ़ती कृष्णकथा-रुचि अन्य आसक्तियाँ घटाती है और हरिचरणस्मरण का आनन्द देकर दुःखों का नाश करती है।
श्लोक 5.14
सरल हिंदी भावार्थ: मुझे उन अज्ञानियों पर दया आती है जो हरिकथा से विमुख होकर निरर्थक वाद-विवाद में अपना अमूल्य जीवन खो देते हैं।
श्लोक 5.15
सरल हिंदी भावार्थ: हे मैत्रेय, जैसे फूलों से सार लिया जाता है, वैसे कथाओं का सार हरिकथा निकालकर हमारे कल्याण के लिए सुनाइए।
श्लोक 5.16
सरल हिंदी भावार्थ: सृष्टि, पालन और संहार के लिए शक्तियाँ प्रकट करने वाले भगवान के अलौकिक कार्य मुझे सुनाइए।
श्लोक 5.17
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी कहते हैं—सबके परम कल्याण का प्रश्न सुनकर मैत्रेयजी ने विदुर का आदर करते हुए उत्तर दिया।
श्लोक 5.18
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—साधु विदुर, तुम्हारा प्रश्न उत्तम है; इससे लोगों का कल्याण और तुम्हारी भगवद्भक्ति का यश फैलता है।
श्लोक 5.19
सरल हिंदी भावार्थ: व्यासजी के पुत्र और हरि के अनन्य भक्त होने के कारण तुम्हारा ऐसा प्रश्न करना आश्चर्य की बात नहीं।
श्लोक 5.20
सरल हिंदी भावार्थ: माण्डव्यमुनि के शाप से यमराज ने व्यासजी द्वारा दासी के गर्भ में विदुर के रूप में जन्म लिया था।
श्लोक 5.21
सरल हिंदी भावार्थ: तुम भगवान और उनके अनुयायियों के सदैव प्रिय हो; जाते समय उन्होंने मुझे तुम्हें ज्ञान देने की आज्ञा दी थी।
श्लोक 5.22
सरल हिंदी भावार्थ: अब मैं योगमाया से विस्तृत भगवान की सृष्टि, स्थिति और प्रलय की लीलाएँ क्रम से बताता हूँ।
श्लोक 5.23
सरल हिंदी भावार्थ: सृष्टि से पहले सबके आत्मा, स्वतन्त्र और सर्वव्यापी भगवान ही थे; विविध नाम-रूप उनकी इच्छा के अधीन प्रकट होते हैं।
श्लोक 5.24
सरल हिंदी भावार्थ: उस समय उनकी सृजनशक्ति अप्रकट थी; वे जाग्रत साक्षी थे, किन्तु देखने योग्य अलग जगत प्रकट नहीं था।
श्लोक 5.25
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी सत्-असत् कार्यकारणरूप शक्ति को माया कहते हैं; उसी से प्रभु इस जगत की रचना करते हैं।
श्लोक 5.26
सरल हिंदी भावार्थ: काल की प्रेरणा से भगवान ने अपने पुरुषस्वरूप द्वारा त्रिगुणमयी माया में सृजनसामर्थ्य स्थापित किया।
श्लोक 5.27
सरल हिंदी भावार्थ: कालप्रेरित अव्यक्त प्रकृति से महत्तत्त्व प्रकट हुआ, जिसने अज्ञान का आवरण हटाकर विश्व की अभिव्यक्ति सम्भव की।
श्लोक 5.28
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की दृष्टि, काल और गुणों से युक्त महत्तत्त्व ने विश्वरचना के लिए अपने में परिवर्तन किया।
श्लोक 5.29
सरल हिंदी भावार्थ: महत्तत्त्व के विकार से अहंकार उत्पन्न हुआ, जो भूत, इन्द्रिय और मनरूप कार्य, कारण तथा कर्तृत्व का आधार बना।
श्लोक 5.30
सरल हिंदी भावार्थ: अहंकार सात्त्विक, राजस और तामस—तीन प्रकार का हुआ; सात्त्विक से मन और इन्द्रियों के अधिष्ठाता देव प्रकट हुए।
श्लोक 5.31
सरल हिंदी भावार्थ: राजस अहंकार से ज्ञान और कर्म की इन्द्रियाँ तथा तामस से सूक्ष्म भूतकारण और शब्दगुणयुक्त आकाश उत्पन्न हुआ।
श्लोक 5.32
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की दृष्टि और काल-माया के संयोग से आकाश में स्पर्शतत्त्व प्रकट हुआ और उससे वायु बनी।
श्लोक 5.33
सरल हिंदी भावार्थ: वायु के परिवर्तन से रूपतन्मात्रा और प्रकाशरूप अग्नितत्त्व उत्पन्न हुआ, जो देखने का आधार है।
श्लोक 5.34
सरल हिंदी भावार्थ: वायु सहित अग्नितत्त्व में काल-माया और प्रभुदृष्टि से परिवर्तन हुआ और रसगुणयुक्त जल प्रकट हुआ।
श्लोक 5.35
सरल हिंदी भावार्थ: अग्नि और जल के संयोग में परमात्मा की प्रेरणा से परिवर्तन हुआ और गन्धगुणयुक्त पृथ्वीतत्त्व प्रकट हुआ।
श्लोक 5.36
सरल हिंदी भावार्थ: आकाश से पृथ्वी तक बाद के प्रत्येक तत्त्व में अपने गुण के साथ पूर्ववर्ती तत्त्वों के गुण भी क्रम से रहते हैं।
श्लोक 5.37
सरल हिंदी भावार्थ: विष्णु की शक्तिरूप तत्त्वदेवता अलग-अलग होने से संयुक्त कार्य न कर सके और हाथ जोड़कर प्रभु से प्रार्थना करने लगे।
श्लोक 5.38
सरल हिंदी भावार्थ: देवता बोले—हम आपके चरणकमलों को प्रणाम करते हैं, जो शरणागतों के ताप मिटाने वाला छत्र और संसारदुःख से मुक्ति का आश्रय हैं।
श्लोक 5.39
सरल हिंदी भावार्थ: जीव तीन प्रकार के तापों से दुःखी हैं; इसलिए हम ज्ञान प्रदान करने वाली आपके चरणों की शीतल छाया चाहते हैं।
श्लोक 5.40
सरल हिंदी भावार्थ: वेदों के सहारे ऋषि एकान्त में आपके चरणों को खोजते हैं; उन्हीं से पावन गंगा का प्राकट्य माना जाता है।
श्लोक 5.41
सरल हिंदी भावार्थ: श्रद्धा, श्रवण और भक्ति से हृदय शुद्ध करके हम ज्ञान तथा वैराग्य के बल से आपके चरणाश्रय को प्राप्त हों।
श्लोक 5.42
सरल हिंदी भावार्थ: आप सृष्टि, पालन और प्रलय के लिए प्रकट होते हैं; हम उन चरणों की शरण लें जिनका स्मरण भक्तों को अभय देता है।
श्लोक 5.43
सरल हिंदी भावार्थ: देह और घर में अहंता-ममता का हठ रखने वालों से आप दूर प्रतीत होते हैं, यद्यपि उनके हृदय में ही विराजते हैं।
श्लोक 5.44
सरल हिंदी भावार्थ: असत् विषयों में इन्द्रियाँ लगाकर मन हर लेने वाले लोग आपको और आपके भक्तों के पवित्र मार्ग को नहीं देख पाते।
श्लोक 5.45
सरल हिंदी भावार्थ: कथामृत से बढ़ी भक्ति और निर्मल मन वाले भक्त वैराग्ययुक्त ज्ञान पाकर सहज ही आपके वैकुण्ठधाम पहुँचते हैं।
श्लोक 5.46
सरल हिंदी भावार्थ: दूसरे साधक कठिन समाधियोग से प्रकृति को जीतकर आपको पाते हैं; आपकी सेवाभक्ति में वैसा श्रम नहीं होता।
श्लोक 5.47
सरल हिंदी भावार्थ: आपने हमें तीन गुणों सहित जगत रचने के लिए उत्पन्न किया है; अलग-अलग रहकर हम आपकी इच्छित रचना नहीं कर पा रहे।
श्लोक 5.48
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसी व्यवस्था कीजिए कि हम समय पर आपको अर्पण करें, अपना निर्वाह पाएँ और जीव भी परस्पर पोषण का क्रम निभाएँ।
श्लोक 5.49
सरल हिंदी भावार्थ: आप हम देवों और हमारी शक्तियों के अचल मूल हैं; अजन्मा होकर आपने प्रकृति में महत्तत्त्व की सृजनशक्ति स्थापित की है।
श्लोक 5.50
सरल हिंदी भावार्थ: हे प्रभु, हमें बताइए कि किस प्रकार आपकी सेवा करें; कार्य सिद्ध करने के लिए अपनी ज्ञानदृष्टि और सामर्थ्य प्रदान कीजिए।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 5 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 6
विराट पुरुष और इन्द्रियशक्तियों का प्राकट्य
श्लोक 6.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेयजी कहते हैं—भगवान ने देखा कि उनकी शक्तियाँ अलग-अलग हैं और संयुक्त जगत-व्यवस्था अभी जाग्रत नहीं हुई।
श्लोक 6.2
सरल हिंदी भावार्थ: तब उन्होंने कालशक्ति धारण करके तेईस तत्त्वों के समूह में एक साथ प्रवेश किया।
श्लोक 6.3
सरल हिंदी भावार्थ: चेष्टाशक्ति के रूप में प्रवेश करके प्रभु ने बिखरे तत्त्वों को जोड़ा और उनकी सुप्त कार्यक्षमता जगाई।
श्लोक 6.4
सरल हिंदी भावार्थ: दैवी प्रेरणा से जागे तेईस तत्त्वों ने अपनी शक्तियों के संयोग से विराट पुरुष को प्रकट किया।
श्लोक 6.5
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के अंशप्रवेश से सृष्टितत्त्व परस्पर मिले और वह विराट रूप बना जिसमें चराचर लोक स्थित हैं।
श्लोक 6.6
सरल हिंदी भावार्थ: सभी जीवों की सम्भावनाएँ धारण करने वाला वह तेजोमय पुरुष जल में स्थित ब्रह्माण्ड के भीतर सहस्र वर्षों तक रहा।
श्लोक 6.7
सरल हिंदी भावार्थ: देवता, कर्म और आत्मशक्तियाँ उसमें थीं; उसने अपने को एक, दस और तीन रूपों में विभक्त किया।
श्लोक 6.8
सरल हिंदी भावार्थ: यह सब जीवों का आश्रय और परमात्मा का प्रथम विराट अवतार है, जिसमें समस्त भूतसमूह का ध्यान किया जाता है।
श्लोक 6.9
सरल हिंदी भावार्थ: अध्यात्म, अधिदैव और अधिभूत से वह तीन प्रकार का, प्राणों से दस प्रकार का और हृदय से एक है।
श्लोक 6.10
सरल हिंदी भावार्थ: तत्त्वदेवों की प्रार्थना स्मरण करके भगवान ने उनकी अभिव्यक्ति के लिए विराट को अपने तेज से प्रेरित किया।
श्लोक 6.11
सरल हिंदी भावार्थ: उस प्रेरणा से विराट में देवशक्तियों के अनेक स्थान खुले; अब उनका वर्णन सुनो।
श्लोक 6.12
सरल हिंदी भावार्थ: मुख प्रकट हुआ तो अग्निदेव ने वाणीशक्ति सहित उसमें प्रवेश किया; इससे बोलने की क्रिया सम्भव हुई।
श्लोक 6.13
सरल हिंदी भावार्थ: तालु के स्थान में वरुणदेव जिह्वा और रसग्रहण की शक्ति के साथ स्थित हुए।
श्लोक 6.14
सरल हिंदी भावार्थ: नासिकाएँ खुलीं तो अश्विनीकुमार घ्राणशक्ति सहित उनमें आए; उनसे गन्ध का अनुभव होने लगा।
श्लोक 6.15
सरल हिंदी भावार्थ: नेत्र प्रकट हुए तो सूर्यदेव दृष्टिशक्ति सहित उनमें प्रविष्ट हुए; उनसे रूप का ज्ञान होता है।
श्लोक 6.16
सरल हिंदी भावार्थ: स्पर्शग्राही त्वचा के स्थान में वायुदेव अपनी शक्ति सहित आए; उससे स्पर्श का अनुभव होने लगा।
श्लोक 6.17
सरल हिंदी भावार्थ: कान प्रकट होने पर दिशाएँ श्रवणशक्ति सहित उनमें आईं; इससे शब्द सुने जाते हैं।
श्लोक 6.18
सरल हिंदी भावार्थ: त्वचा के रोमस्थानों में औषधि-वनस्पति की शक्तियाँ आईं; रोमों से खुजली आदि संवेदनाएँ जुड़ीं।
श्लोक 6.19
सरल हिंदी भावार्थ: जननेन्द्रिय के स्थान में प्रजापति प्रजननशक्ति सहित आए; उससे सन्तानोत्पत्ति सम्बन्धी सुख का अनुभव होता है।
श्लोक 6.20
सरल हिंदी भावार्थ: गुदास्थान में मित्रदेव उत्सर्जनशक्ति सहित आए; इससे शरीर के मल का त्याग सम्भव हुआ।
श्लोक 6.21
सरल हिंदी भावार्थ: हाथों में इन्द्रदेव कार्यशक्ति सहित आए; इनके द्वारा मनुष्य कर्म करके अपनी जीविका चलाता है।
श्लोक 6.22
सरल हिंदी भावार्थ: चरणों में विष्णु की गतिशक्ति प्रकट हुई; इससे जीव अपने गन्तव्य तक पहुँचता है।
श्लोक 6.23
सरल हिंदी भावार्थ: बुद्धि के स्थान में ब्रह्मा बोधशक्ति सहित आए; उससे समझने योग्य विषय का निश्चय होता है।
श्लोक 6.24
सरल हिंदी भावार्थ: हृदय में चन्द्रमा मनशक्ति सहित आए; उससे संकल्प-विकल्प और विभिन्न मानसिक वृत्तियाँ प्रकट होती हैं।
श्लोक 6.25
सरल हिंदी भावार्थ: अहंभाव के स्थान में अभिमान की शक्ति आई; उससे अपने को कर्ता मानने और कर्म करने की प्रवृत्ति होती है।
श्लोक 6.26
सरल हिंदी भावार्थ: चित्त के स्थान में महत्तत्त्व अपनी ज्ञानशक्ति सहित स्थित हुआ; उससे चेतना और विशेष बोध का अनुभव होता है।
श्लोक 6.27
सरल हिंदी भावार्थ: विराट के सिर से स्वर्ग, चरणों से पृथ्वी और नाभि से अन्तरिक्ष का ध्यान किया गया; गुणानुसार जीव इनके निवासी हैं।
श्लोक 6.28
सरल हिंदी भावार्थ: सत्त्व की प्रधानता वाले देव स्वर्ग में और रजोगुणप्रधान मनुष्य तथा उनके सहचर पृथ्वी में स्थित हुए।
श्लोक 6.29
सरल हिंदी भावार्थ: तमोगुणप्रधान रुद्रगण आदि दोनों के बीच अन्तरिक्ष में स्थित हुए; यह विराटध्यान की प्रतीकात्मक व्यवस्था है।
श्लोक 6.30
सरल हिंदी भावार्थ: विराट के मुख से वेदज्ञान और ब्राह्मण-वृत्ति प्रकट बताई गई, जिसका कार्य समाज में ज्ञान और शिक्षा देना है।
श्लोक 6.31
सरल हिंदी भावार्थ: भुजाओं से क्षात्रशक्ति और क्षत्रिय-वृत्ति प्रकट हुई, जिसका धर्म लोगों की अत्याचार और संकट से रक्षा करना है।
श्लोक 6.32
सरल हिंदी भावार्थ: ऊरुओं से वैश्य-वृत्ति प्रकट हुई, जो कृषि, गोपालन और व्यापार आदि से समाज का निर्वाह चलाती है।
श्लोक 6.33
सरल हिंदी भावार्थ: चरणों से सेवा-वृत्ति प्रकट हुई; उससे जुड़ा शूद्रधर्म सेवा द्वारा हरि को प्रसन्न करने का मार्ग बताया गया है।
श्लोक 6.34
सरल हिंदी भावार्थ: इन सभी सामाजिक वृत्तियों का उद्देश्य अपने कर्तव्य द्वारा श्रद्धापूर्वक हरि की आराधना और आत्मशुद्धि करना है।
श्लोक 6.35
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की देवता, कर्म और आत्मशक्तिरूप योगमाया के इस विस्तार का पूरा वर्णन करने का सामर्थ्य किसमें है?
श्लोक 6.36
सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी अन्य विषयों में लगी अपनी वाणी पवित्र करने के लिए मैं सुने हुए ज्ञान और अपनी बुद्धि के अनुसार हरियश कहता हूँ।
श्लोक 6.37
सरल हिंदी भावार्थ: वाणी की सर्वोत्तम सफलता हरिगुणगान है और कानों की सफलता ज्ञानी भक्तों से कथामृत सुनने में है।
श्लोक 6.38
सरल हिंदी भावार्थ: आदिकवि ब्रह्मा भी सहस्र वर्षों के परिपक्व योग के बाद अपने विराट विस्तार की महिमा समझ सके।
श्लोक 6.39
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की माया मायावियों को भी मोहित करती है; जिसकी सीमा का पूर्ण ज्ञान सृष्टिकर्ता को नहीं, दूसरों को कैसे होगा?
श्लोक 6.40
सरल हिंदी भावार्थ: जिन तक मन और वाणी भी पूरी तरह नहीं पहुँचते, मैं और सभी देव उन भगवान को प्रणाम करते हैं।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 6 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 7
जीवबन्धन, माया और तत्त्वजिज्ञासा
श्लोक 7.1
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी कहते हैं—मैत्रेय का वर्णन सुनकर बुद्धिमान विदुर ने आदरभरी वाणी में फिर प्रश्न किया।
श्लोक 7.2
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर बोले—शुद्ध चेतन, निर्विकार और निर्गुण भगवान में लीला के रूप में भी गुण और क्रियाएँ कैसे समझी जाएँ?
श्लोक 7.3
सरल हिंदी भावार्थ: बालक इच्छा या किसी प्रेरणा से खेलता है; सदा स्वतः तृप्त और असंग भगवान में खेल की प्रेरणा कैसे आती है?
श्लोक 7.4
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान अपनी गुणमयी माया से जगत बनाते, सँभालते और समेटते हैं—इसका रहस्य समझाइए।
श्लोक 7.5
सरल हिंदी भावार्थ: जिनका ज्ञान देश, काल, अवस्था या किसी अन्य कारण से लुप्त नहीं होता, उनका अजा माया से सम्बन्ध कैसे होता है?
श्लोक 7.6
सरल हिंदी भावार्थ: एक परमात्मा सब शरीरों में स्थित है; तब जीव के दुर्भाग्य और कर्मजन्य क्लेश का कारण क्या है?
श्लोक 7.7
सरल हिंदी भावार्थ: इन प्रश्नों के अज्ञानजन्य उलझाव से मेरा मन खिन्न है; कृपा करके यह बड़ा मानसिक संशय दूर कीजिए।
श्लोक 7.8
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—तत्त्व जानने के इच्छुक विदुर का प्रश्न सुनकर अहंकाररहित, भगवन्मय मैत्रेय ने मुस्कराकर उत्तर दिया।
श्लोक 7.9
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—मुक्त चेतन में दीनता और बन्धन का अनुभव ही माया की ऐसी विचित्रता है जो सीधे तर्क से नहीं सुलझती।
श्लोक 7.10
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे स्वप्न में अपना सिर कटता दिखे जबकि वास्तव में न कटे, वैसे साक्षी आत्मा में विपरीत अनुभव प्रतीत होता है।
श्लोक 7.11
सरल हिंदी भावार्थ: जल हिलने से चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब हिलता दिखता है; इसी तरह अनात्मा के गुण आत्मा में आरोपित प्रतीत होते हैं।
श्लोक 7.12
सरल हिंदी भावार्थ: निवृत्तिमार्ग, वासुदेव की कृपा और भक्तियोग से यह भ्रम धीरे-धीरे मिटता है।
श्लोक 7.13
सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्रियाँ शान्त होकर साक्षी परमात्मा हरि में स्थिर होती हैं तो क्लेश वैसे शान्त होते हैं जैसे गहरी निद्रा में।
श्लोक 7.14
सरल हिंदी भावार्थ: मुरारि के गुणों का श्रवण-कीर्तन ही क्लेश मिटाता है; फिर चरणरज की सेवा और अन्तरंग प्रेम का फल कितना महान होगा!
श्लोक 7.15
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर बोले—आपकी सुवाणी की तलवार से मेरा संशय कट गया; मन ईश्वर और जीव के इस सम्बन्ध को समझने में प्रवृत्त है।
श्लोक 7.16
सरल हिंदी भावार्थ: आपने ठीक समझाया कि हरि की माया से मूलरहित-सा भ्रम प्रकट होता है, किन्तु वह जगत के परम आधार से अलग नहीं है।
श्लोक 7.17
सरल हिंदी भावार्थ: अत्यन्त अज्ञानी और बुद्धि से परे तत्त्वज्ञ दोनों अपने ढंग से निश्चिन्त दिखते हैं; बीच की संशयग्रस्त अवस्था दुःख देती है।
श्लोक 7.18
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा के बन्धन की प्रतीति का स्वतंत्र सत्य न होने का निश्चय हुआ; शेष भ्रम भी आपकी सेवा से दूर करूँगा।
श्लोक 7.19
सरल हिंदी भावार्थ: सत्पुरुषों की सेवा से अचल भगवान के चरणों में प्रबल प्रेम जागता है, जो विपत्तियों का अन्त करता है।
श्लोक 7.20
सरल हिंदी भावार्थ: वैकुण्ठमार्ग के संतों की सेवा अल्प पुण्य वालों को दुर्लभ है; उनके सत्सङ्ग में जनार्दन का निरन्तर गुणगान होता है।
श्लोक 7.21
सरल हिंदी भावार्थ: आपने बताया कि महत्तत्त्व आदि उत्पन्न करके भगवान ने उनसे विराट बनाया और उसमें प्रवेश किया।
श्लोक 7.22
सरल हिंदी भावार्थ: उस सहस्र चरण, ऊरु और भुजाओं वाले आदिपुरुष में समस्त लोक अपने विस्तार सहित स्थित हैं।
श्लोक 7.23
सरल हिंदी भावार्थ: उसमें दस प्रकार के प्राण, इन्द्रिय-विषय और त्रिविध अधिष्ठान हैं तथा वर्ण उत्पन्न हुए; अब उसकी अन्य विभूतियाँ बताइए।
श्लोक 7.24
सरल हिंदी भावार्थ: पुत्र, पौत्र और वंशजों द्वारा विविध आकृतियों वाली प्रजाओं से यह जगत किस प्रकार विस्तृत हुआ?
श्लोक 7.25
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा ने कौन-कौन से प्रजापति, सृष्टि के विभाग, मनु और मन्वन्तर के अधिपति बनाए?
श्लोक 7.26
सरल हिंदी भावार्थ: उनके वंश और चरित्र तथा पृथ्वी के ऊपर-नीचे स्थित लोकों का वर्णन कीजिए।
श्लोक 7.27
सरल हिंदी भावार्थ: लोकों की रचना और विस्तार तथा गर्भ, अण्ड, स्वेद और उद्भिज्ज रूपों में विभिन्न जीवों की उत्पत्ति बताइए।
श्लोक 7.28
सरल हिंदी भावार्थ: गुणावतारों द्वारा सृष्टि, पालन और प्रलय करने वाले लक्ष्मीपति के उदार पराक्रम समझाइए।
श्लोक 7.29
सरल हिंदी भावार्थ: रूप, आचरण और स्वभाव से वर्णाश्रम के विभाग, ऋषियों के जन्म-कर्म तथा वेदों के विभाजन बताइए।
श्लोक 7.30
सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञ का विस्तार, योग के मार्ग, निष्काम कर्म, सांख्य और भगवान की आराधना की परम्परा समझाइए।
श्लोक 7.31
सरल हिंदी भावार्थ: भ्रमपूर्ण मतों के मार्ग, वर्णव्यवस्था के विपरीत संयोग और गुण-कर्म के अनुसार जीवों की विभिन्न गतियाँ बताइए।
श्लोक 7.32
सरल हिंदी भावार्थ: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के परस्पर अविरोधी साधन तथा जीविका, शासननीति और अध्ययन की विधियाँ बताइए।
श्लोक 7.33
सरल हिंदी भावार्थ: श्राद्धविधि, पितरों की उत्पत्ति तथा ग्रह, नक्षत्र और तारों से जुड़े कालविभाग समझाइए।
श्लोक 7.34
सरल हिंदी भावार्थ: दान, तप, यज्ञ और लोकहित कार्यों के फल तथा यात्रा और आपत्ति की दशा में कर्तव्य बताइए।
श्लोक 7.35
सरल हिंदी भावार्थ: धर्म के मूल जनार्दन किन आचरणों और किन भक्तों से प्रसन्न होते हैं? यह भी कहिए।
श्लोक 7.36
सरल हिंदी भावार्थ: दयालु गुरु आज्ञाकारी शिष्य और पुत्र के कल्याण की बात बिना पूछे भी समझाते हैं।
श्लोक 7.37
सरल हिंदी भावार्थ: इन तत्त्वों का लय कितने प्रकार से होता है? उस समय कौन भगवान की उपासना करते और कौन अप्रकट अवस्था में रहते हैं?
श्लोक 7.38
सरल हिंदी भावार्थ: जीव तथा परमपुरुष का स्वरूप और वैदिक ज्ञान में गुरु-शिष्य सम्बन्ध का प्रयोजन समझाइए।
श्लोक 7.39
सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानी लोग उस ज्ञान के कौन साधन बताते हैं? मनुष्य में ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का उदय कैसे होता है?
श्लोक 7.40
सरल हिंदी भावार्थ: माया से जिसकी विवेकदृष्टि ढक गई है, ऐसे मुझ मित्र को हरि के कार्य समझने के लिए पूछे ये प्रश्न बताइए।
श्लोक 7.41
सरल हिंदी भावार्थ: जीवों को अभय देने की महिमा ऐसी है कि वेदाध्ययन, यज्ञ, तप और दान भी उसकी तुलना में अल्प कहे गए हैं।
श्लोक 7.42
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी कहते हैं—पुराणप्रसंगों के इन प्रश्नों से प्रेरित होकर मैत्रेय भगवान की कथा सुनाने के उत्साह में प्रसन्न हुए।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 7 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 8
नाभिकमल से ब्रह्मा का जन्म और भगवान के दर्शन
श्लोक 8.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—पूरुवंश धन्य है जिसमें तुम जैसे भगवत्परायण व्यक्ति हुए, जो हरि की कीर्तिमाला को बार-बार नया रस देते हैं।
श्लोक 8.2
सरल हिंदी भावार्थ: क्षणिक सुख के लिए बड़े दुःख उठाने वाले लोगों का दुःख मिटाने हेतु मैं वह भागवतपुराण कहूँगा जो भगवान ने ऋषियों को सुनाया।
श्लोक 8.3
सरल हिंदी भावार्थ: पूर्वकाल में सनत्कुमार आदि मुनियों ने परम तत्त्व जानने के लिए पाताल में विराजमान सङ्कर्षण भगवान से प्रश्न किए।
श्लोक 8.4
सरल हिंदी भावार्थ: सङ्कर्षण अपने आराध्य वासुदेव में ध्यानस्थ थे; मुनियों के कल्याण हेतु उन्होंने कमलनेत्र थोड़े खोले।
श्लोक 8.5
सरल हिंदी भावार्थ: मुनियों ने गंगाजल से भीगी जटाओं सहित उनके चरणों को छुआ, जिनकी नागकन्याएँ प्रेमपूर्वक पूजा करती हैं।
श्लोक 8.6
सरल हिंदी भावार्थ: वे प्रेम से रुँधे स्वर में भगवान की लीलाएँ गाते थे; उनके सहस्र फणों पर मुकुटमणियाँ प्रकाश फैला रही थीं।
श्लोक 8.7
सरल हिंदी भावार्थ: सङ्कर्षण ने निवृत्तिधर्म में रत सनत्कुमार को यह ज्ञान दिया; उन्होंने पूछने पर व्रतनिष्ठ साङ्ख्यायन को सुनाया।
श्लोक 8.8
सरल हिंदी भावार्थ: परमहंस साङ्ख्यायन ने भगवान की विभूतियाँ हमारे गुरु पराशर और बृहस्पति को समझाईं।
श्लोक 8.9
सरल हिंदी भावार्थ: पुलस्त्य का वर पाए दयालु पराशर ने मुझे यह पुराण सुनाया; अब श्रद्धालु और आज्ञाकारी तुम्हें मैं सुनाता हूँ।
श्लोक 8.10
सरल हिंदी भावार्थ: प्रलय में जगत जलमग्न था; एक भगवान शेषशय्या पर नेत्र मूँदकर निष्काम, आत्मानन्द में स्थित थे।
श्लोक 8.11
सरल हिंदी भावार्थ: जीवों के सूक्ष्म कारण अपने भीतर रखकर वे कालशक्ति सहित जल में वैसे रहे जैसे काष्ठ में अग्नि की शक्ति छिपी रहती है।
श्लोक 8.12
सरल हिंदी भावार्थ: सहस्र चतुर्युग बीतने पर अपनी कालशक्ति से जीवकर्मों को जाग्रत करते हुए उन्होंने अपने भीतर लीन लोकों को देखा।
श्लोक 8.13
सरल हिंदी भावार्थ: काल से प्रेरित रजोगुण द्वारा सूक्ष्म जगत सृजन की ओर प्रवृत्त हुआ और उनकी नाभि से प्रकट होने लगा।
श्लोक 8.14
सरल हिंदी भावार्थ: कर्मशक्ति जगाने वाले काल के प्रभाव से कमल प्रकट हुआ और अपने प्रकाश से प्रलयजल को सूर्य की तरह आलोकित किया।
श्लोक 8.15
सरल हिंदी भावार्थ: सभी गुणों की अभिव्यक्ति वाले उस लोककमल में विष्णु प्रविष्ट हुए; उसमें वेदमय स्वयम्भू ब्रह्मा प्रकट हुए।
श्लोक 8.16
सरल हिंदी भावार्थ: कमल की कर्णिका पर बैठे ब्रह्मा ने चारों ओर देखा; दिशाओं में देखने से उनके चार मुख प्रकट हुए।
श्लोक 8.17
सरल हिंदी भावार्थ: प्रलयवायु से उठती जलतरङ्गों के बीच उस कमल पर स्थित ब्रह्मा प्रारम्भ में अपने और अपने मूल को नहीं जान सके।
श्लोक 8.18
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने विचार किया—मैं कौन हूँ? यह जल में अकेला कमल कहाँ से आया? इसका कोई आधार अवश्य होना चाहिए।
श्लोक 8.19
सरल हिंदी भावार्थ: कमलनाल की भीतरी नाड़ियों से वे जल में उतरे और मूल खोजा, किन्तु नाभिरूप कारण तक नहीं पहुँच सके।
श्लोक 8.20
सरल हिंदी भावार्थ: असीम अन्धकार में अपना उद्गम खोजते हुए दीर्घकाल बीता; वही काल देहधारियों की आयु क्षीण करता है।
श्लोक 8.21
सरल हिंदी भावार्थ: मूल न पाकर ब्रह्मा फिर कमल पर लौटे और श्वास तथा चित्त संयमित करके समाधि में बैठ गए।
श्लोक 8.22
सरल हिंदी भावार्थ: दीर्घ साधना से ज्ञान परिपक्व होने पर उन्हें अपने हृदय में वह प्रभु दिखाई दिए जो पहले बाहरी खोज से नहीं मिले थे।
श्लोक 8.23
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कमलनाल जैसे गौर शेषनाग की विस्तृत शय्या पर भगवान को देखा; फणमणियों का प्रकाश अन्धकार मिटा रहा था।
श्लोक 8.24
सरल हिंदी भावार्थ: उनका स्वरूप हरित रत्नमय पर्वत-सा था; पीताम्बर, सुवर्णमुकुट, रत्न और वनमाला पर्वत की विविध शोभाओं जैसे लगते थे।
श्लोक 8.25
सरल हिंदी भावार्थ: तीनों लोकों को अपने में समेटने वाला उनका दिव्य शरीर अनुपम विस्तार और मनोहर आभूषण-वस्त्रों से सुशोभित था।
श्लोक 8.26
सरल हिंदी भावार्थ: वे उपासकों पर कृपा करके इच्छित फल देने वाले चरणकमल दिखा रहे थे, जिनकी अँगुलियाँ नखचन्द्र की किरणों से चमकती थीं।
श्लोक 8.27
सरल हिंदी भावार्थ: सुन्दर नासिका, भौंहें, दमकते कुण्डल और अरुण अधरों वाले मुख की मुस्कान लोकों का दुःख हर रही थी।
श्लोक 8.28
सरल हिंदी भावार्थ: कमर पर पीताम्बर और मेखला थी; श्रीवत्सयुक्त वक्षस्थल अमूल्य हार से सुशोभित था।
श्लोक 8.29
सरल हिंदी भावार्थ: रत्नजटित बाजूबन्दों वाली भुजाएँ विश्ववृक्ष की शाखाओं जैसी थीं; उसका मूल अप्रकट था और शेषनाग उसकी जड़ों को घेरे थे।
श्लोक 8.30
सरल हिंदी भावार्थ: चराचर के आश्रय भगवान जल में स्थित पर्वत जैसे थे; स्वर्णमुकुट शिखर और कौस्तुभ उसके भीतर चमकते रत्न जैसा था।
श्लोक 8.31
सरल हिंदी भावार्थ: वेदरूपी भ्रमर जिनकी कीर्तिमयी वनमाला का गान करते हैं, उन हरि के पास सूर्य, चन्द्र, वायु और अग्नि भी स्वतंत्रतः नहीं पहुँचते।
श्लोक 8.32
सरल हिंदी भावार्थ: जगत के रचयिता ब्रह्मा को भगवान, उनका नाभिकमल, स्वयं अपना रूप, जल, वायु और आकाश दिखाई दिए; आगे की सृष्टि अभी अप्रकट थी।
श्लोक 8.33
सरल हिंदी भावार्थ: सृजन की इच्छा से रजोगुण में प्रवृत्त ब्रह्मा ने अदृश्य परमेश्वर में मन लगाकर उन पूज्य प्रभु की स्तुति की।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 8 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 9
ब्रह्माजी की स्तुति और भगवान का उपदेश
श्लोक 9.1
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा बोले—दीर्घकाल बाद आज आपको जाना; देहासक्त जीव आपकी गति नहीं जान पाते। विविध जगत आपकी मायाशक्ति से प्रकट है।
श्लोक 9.2
सरल हिंदी भावार्थ: आपका यह ज्ञानप्रकाशमय, अज्ञानरहित रूप भक्तों पर कृपा और सभी अवतारों के मूल के रूप में प्रकट है; उसी के नाभिकमल से मैं उत्पन्न हुआ।
श्लोक 9.3
सरल हिंदी भावार्थ: आपका परम स्वरूप अखण्ड आनन्द और अविच्छिन्न तेज है; जगत के कारण होकर भी उससे असंग प्रभु, मैं आपकी शरण हूँ।
श्लोक 9.4
सरल हिंदी भावार्थ: जगत का मङ्गल करने वाला यह रूप आपने उपासकों को ध्यान में दिखाया; मैं सेवा और प्रणाम करता हूँ, यद्यपि विषयासक्त इसका अनादर करते हैं।
श्लोक 9.5
सरल हिंदी भावार्थ: श्रवण द्वारा आपके चरणों की सुगन्ध ग्रहण कर प्रेम से आपको बाँधने वाले भक्तों के हृदयकमल से आप कभी दूर नहीं होते।
श्लोक 9.6
सरल हिंदी भावार्थ: जब तक आपके अभयचरण नहीं अपनाए जाते, देह-धन-स्वजनों की ममता से भय, शोक, इच्छा, अपमान और लोभ बने रहते हैं।
श्लोक 9.7
सरल हिंदी भावार्थ: जो आपके कल्याणकारी सत्सङ्ग से विमुख हैं, वे लोभ में पड़कर थोड़े विषयसुख के लिए बार-बार अशुभ कर्म करते हैं।
श्लोक 9.8
सरल हिंदी भावार्थ: भूख-प्यास, शारीरिक विकार, सर्दी-गर्मी, वायु-वर्षा, परस्पर संघर्ष, काम और क्रोध से पीड़ित जीवों को देखकर मेरा मन दुःखी होता है।
श्लोक 9.9
सरल हिंदी भावार्थ: जब तक मनुष्य विषयों को परमात्मा से अलग स्वतन्त्र सत्य मानता है, तब तक दुःख देने वाला यह भ्रमपूर्ण संसारबन्धन नहीं मिटता।
श्लोक 9.10
सरल हिंदी भावार्थ: दिन में कर्मों से थके और रात में मनोरथों से टूटी नींद वाले विद्वान भी आपके प्रसङ्ग से विमुख होकर जन्म-मरण में भटकते हैं।
श्लोक 9.11
सरल हिंदी भावार्थ: श्रवण और प्रेमयोग से शुद्ध हृदय में आप रहते हैं; भक्त जिस भाव से ध्यान करते हैं, कृपापूर्वक उसी अनुरूप रूप प्रकट करते हैं।
श्लोक 9.12
सरल हिंदी भावार्थ: सबके हृदय में सुहृद् बनकर स्थित आप कामनाभरे बड़े अनुष्ठानों से उतने प्रसन्न नहीं होते जितने सब जीवों पर दया से।
श्लोक 9.13
सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञ, दान, तप और व्रत आदि सत्कर्मों का वास्तविक फल आपकी आराधना है; आपको समर्पित धर्म निष्फल नहीं होता।
श्लोक 9.14
सरल हिंदी भावार्थ: अपने नित्य ज्ञानप्रकाश से भेदमोह मिटाने वाले परमेश्वर को प्रणाम, जिनके संकल्प से सृष्टि, पालन और प्रलय की लीला होती है।
श्लोक 9.15
सरल हिंदी भावार्थ: मृत्यु के समय विवश होकर भी आपके अवतार, गुण और कर्मसूचक नाम लेने वाले अनेक जन्मों का मल छोड़ अमृतपद पाते हैं।
श्लोक 9.16
सरल हिंदी भावार्थ: एक ही भगवान जगत के वृक्षरूप विस्तार में ब्रह्मा, विष्णु और शिव की सृष्टि-पालन-संहार शक्तियाँ प्रकट करते हैं; उन्हें नमस्कार है।
श्लोक 9.17
सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्य स्वधर्म और आपकी पूजा भूलकर निषिद्ध कर्म करता है; उसकी जीवनाशा काटने वाले आपके कालस्वरूप को प्रणाम है।
श्लोक 9.18
सरल हिंदी भावार्थ: दीर्घायु और सब लोकों से पूजित ब्रह्मपद पर रहकर भी मैं काल से डरता हूँ और आपकी प्राप्ति के लिए तप करता हूँ।
श्लोक 9.19
सरल हिंदी भावार्थ: अपनी बनाई धर्ममर्यादा की रक्षा के लिए पशु, मनुष्य और देव आदि में इच्छापूर्वक अवतार लेने वाले निष्काम पुरुषोत्तम को प्रणाम।
श्लोक 9.20
सरल हिंदी भावार्थ: आप अज्ञान से अछूते हैं, फिर भी लोकों को अपने में समेटकर प्रलयजल में शेषशय्या पर योगनिद्रा की सुखमयी लीला करते हैं।
श्लोक 9.21
सरल हिंदी भावार्थ: आपके नाभिकमल से जन्म लेकर आपकी कृपा से मैं त्रिलोक की रचना करता हूँ; योगनिद्रा के बाद कमलनेत्र खोलने वाले प्रभु को प्रणाम।
श्लोक 9.22
सरल हिंदी भावार्थ: सबके एक आत्मा और सुहृद् प्रभु अपनी सत्त्वमयी कृपा से मेरी दृष्टि जाग्रत करें, जिससे पहले की तरह सृष्टि कर सकूँ।
श्लोक 9.23
सरल हिंदी भावार्थ: मैं आपके शक्तिमय अवतारों और कार्यों में चित्त लगाकर सृष्टि करूँ, ताकि कर्म का अहंकार और दोष मुझे न बाँधें।
श्लोक 9.24
सरल हिंदी भावार्थ: आपकी ज्ञानशक्ति से उत्पन्न मैं आपके विविध रूप प्रकट करता हूँ; मेरी वेदवाणी का उच्चारण और सृजनबुद्धि विचलित न हों।
श्लोक 9.25
सरल हिंदी भावार्थ: असीम करुणामय पुरातन पुरुष प्रेममुस्कान सहित नेत्र खोलें और मधुर वाणी से हमारा विषाद मिटाएँ।
श्लोक 9.26
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—तप, विद्या और समाधि से प्रकट अपने उद्गम प्रभु की यथाशक्ति स्तुति करके ब्रह्मा कुछ खिन्न-से मौन हो गए।
श्लोक 9.27
सरल हिंदी भावार्थ: मधुसूदन ने ब्रह्मा का अभिप्राय समझा; प्रलयजल और लोकों की रचना की चिन्ता से उनका मन विषण्ण था।
श्लोक 9.28
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने अपनी गम्भीर वाणी से उनकी चिन्ता शान्त करते हुए लोकव्यवस्था का मार्ग समझाया।
श्लोक 9.29
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—हे वेदगर्भ ब्रह्मा, निरुत्साह न हो; सृष्टि में लगो। तुम्हारी प्रार्थना के अनुरूप सामर्थ्य मैंने पहले ही दिया है।
श्लोक 9.30
सरल हिंदी भावार्थ: फिर तप और मेरे आश्रित ज्ञान का अभ्यास करो; उनसे तुम्हें हृदय में लोकों का अप्रच्छन्न रूप दिखाई देगा।
श्लोक 9.31
सरल हिंदी भावार्थ: भक्तियुक्त समाधि से तुम मुझे अपने में और सब लोकों में व्याप्त तथा सभी लोकों को मुझमें स्थित देखोगे।
श्लोक 9.32
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे लकड़ी में अग्नि रहती है, वैसे सब जीवों में मुझे स्थित देखने वाला मनुष्य अपना अज्ञानमल छोड़ देता है।
श्लोक 9.33
सरल हिंदी भावार्थ: देह, इन्द्रिय, गुण और वासनाओं से पृथक आत्मा को मेरे आश्रय में देखकर मनुष्य आत्मस्वतन्त्रता प्राप्त करता है।
श्लोक 9.34
सरल हिंदी भावार्थ: अनेक कर्मप्रवृत्तियों वाली प्रजाएँ रचते समय भी मेरा विशेष अनुग्रह तुम्हारे मन को विषाद से बचाएगा।
श्लोक 9.35
सरल हिंदी भावार्थ: सृष्टि करते हुए तुम्हारा मन मुझमें बँधा रहेगा; इसलिए रजोगुण तुम्हें बाँध नहीं सकेगा।
श्लोक 9.36
सरल हिंदी भावार्थ: तुमने मुझे भूत, इन्द्रिय और गुणों से असंग समझा है; इसी से दुर्लभ होने पर भी आज मेरा सही ज्ञान पाया है।
श्लोक 9.37
सरल हिंदी भावार्थ: कमलनाल के भीतर जल में मूल खोजते समय बाहरी खोज से दर्शन न हुए; जिज्ञासा और ध्यान से मैंने भीतर अपना स्वरूप दिखाया।
श्लोक 9.38
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे गुण और कथाओं से युक्त तुम्हारी स्तुति तथा तप में निष्ठा भी मेरी कृपा के ही परिणाम हैं।
श्लोक 9.39
सरल हिंदी भावार्थ: लोकसृष्टि की इच्छा से तुमने गुणातीत मेरे गुणमय प्राकट्य का वर्णन किया है; मैं प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो।
श्लोक 9.40
सरल हिंदी भावार्थ: जो प्रतिदिन इस स्तोत्र से मेरी स्तुति और भक्ति करेगा, उस पर सभी वर देने वाला मैं शीघ्र प्रसन्न होऊँगा।
श्लोक 9.41
सरल हिंदी भावार्थ: लोकहित, तप, यज्ञ, दान और योगसमाधि की परम सिद्धि मेरी प्रसन्नता है—तत्त्वज्ञ ऐसा मानते हैं।
श्लोक 9.42
सरल हिंदी भावार्थ: मैं सब आत्माओं का प्रियतम आत्मा हूँ; देह आदि मेरे कारण ही प्रिय लगते हैं, इसलिए मुझमें प्रेम लगाओ।
श्लोक 9.43
सरल हिंदी भावार्थ: हे स्वयम्भू, अपने वेदमय ज्ञान और मेरे आश्रय से पहले की तरह उन प्रजाओं को रचो जो मुझमें सुप्त हैं।
श्लोक 9.44
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—प्रकृति और पुरुष के स्वामी कमलनाभ भगवान ने जगत्स्रष्टा को इस प्रकार उपदेश देकर अन्तर्धान किया।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 9 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 10
कालशक्ति और सृष्टि के विभाग
श्लोक 10.1
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर बोले—भगवान के अन्तर्धान होने पर लोकपितामह ब्रह्मा ने शरीर और मन से कितने प्रकार की प्रजाएँ उत्पन्न कीं?
श्लोक 10.2
सरल हिंदी भावार्थ: मैंने जो अन्य विषय पूछे हैं, उन्हें भी क्रम से समझाकर कृपया मेरे सभी संशय दूर कीजिए।
श्लोक 10.3
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी कहते हैं—विदुर की प्रेरणा से प्रसन्न मैत्रेय ने उनके मन में स्थित प्रश्नों के उत्तर दिए।
श्लोक 10.4
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—भगवान की आज्ञा के अनुसार ब्रह्मा ने मन परमात्मा में लगाकर सौ दिव्य वर्षों तक तप किया।
श्लोक 10.5
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने देखा कि जिस कमल पर वे बैठे हैं वह और प्रलयजल कालप्रेरित प्रबल वायु से काँप रहे हैं।
श्लोक 10.6
सरल हिंदी भावार्थ: तप और आत्मविद्या से उनकी ज्ञानशक्ति बढ़ी; उस शक्ति से उन्होंने वायु और जल को अपने नियन्त्रण में समेट लिया।
श्लोक 10.7
सरल हिंदी भावार्थ: आकाश में विस्तृत अपने आश्रय कमल को देखकर उन्होंने विचार किया कि इससे पूर्व में लीन हुए लोक रचूँगा।
श्लोक 10.8
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की प्रेरणा से कमलकोश में प्रवेश कर उन्होंने उसे पहले तीन और फिर विस्तार से चौदह लोकों में विभक्त किया।
श्लोक 10.9
सरल हिंदी भावार्थ: जीवों के निवास की व्यवस्था का यह संक्षेप है; निष्काम धर्म का उच्च फल ब्रह्मलोक कहा गया है।
श्लोक 10.10
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर ने पूछा—विविध अद्भुत कार्यों वाले हरि की जिस कालशक्ति का उल्लेख किया, उसका स्वरूप भी समझाइए।
श्लोक 10.11
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—काल गुणों के परिवर्तन का निमित्त है, स्वयं निराकार और अनाश्रित है; भगवान उसी से सृष्टिलीला प्रकट करते हैं।
श्लोक 10.12
सरल हिंदी भावार्थ: अप्रकट कालस्वरूप ईश्वर विष्णुमाया में स्थित विश्व को क्रम, रूप और विभाग प्रदान करते हैं।
श्लोक 10.13
सरल हिंदी भावार्थ: जैसा जगत अभी है, वैसी ही सृष्टिप्रक्रिया पूर्व और भविष्य में भी होती है; प्राकृत-वैकृत मिलाकर उसके नौ मुख्य प्रकार हैं।
श्लोक 10.14
सरल हिंदी भावार्थ: काल, द्रव्य और गुणों के आधार पर प्रलय के भी विभाग हैं; प्रथम सृष्टि गुणों के असन्तुलन से महत्तत्त्व की है।
श्लोक 10.15
सरल हिंदी भावार्थ: दूसरी अहंकार की है जिससे द्रव्य, ज्ञान और क्रियाशक्तियाँ निकलती हैं; तीसरी भूतों के सूक्ष्म तन्मात्रारूप कारणों की है।
श्लोक 10.16
सरल हिंदी भावार्थ: चौथी ज्ञान-कर्मेन्द्रियों की और पाँचवीं सात्त्विक अहंकार से अधिष्ठाता देवों तथा मन की सृष्टि है।
श्लोक 10.17
सरल हिंदी भावार्थ: छठी अविद्याजनित तमस की सृष्टि है; ये छह प्राकृत सृष्टियाँ हैं। अब वैकृत अर्थात् आगे के रूपविस्तार सुनो।
श्लोक 10.18
सरल हिंदी भावार्थ: रजोगुण द्वारा सृष्टि करना भगवान की लीला है; सातवीं स्थावर अर्थात् वनस्पतियों की सृष्टि छह विभागों में है।
श्लोक 10.19
सरल हिंदी भावार्थ: वनस्पति, औषधि, लता, त्वक्सार, वीरुध और वृक्ष इन छह वर्गों में रस ऊपर चढ़ता है; उनका अनुभव अन्तर्मुख और चेतना आवृत्त है।
श्लोक 10.20
सरल हिंदी भावार्थ: आठवीं पशु-पक्षी आदि तिर्यक् जीवों की सृष्टि अट्ठाईस वर्गों में कही गई है; उनमें गन्धाधारित पहचान और सीमित विवेक की प्रधानता बताई है।
श्लोक 10.21
सरल हिंदी भावार्थ: गाय, बकरी, भैंस, कृष्णमृग, सूअर, गवय, रुरु, भेड़ और ऊँट आदि दो खुर वाले जीव गिनाए गए हैं।
श्लोक 10.22
सरल हिंदी भावार्थ: गधा, घोड़ा, खच्चर, गौर, शरभ और चमरी आदि एक खुर वाले वर्ग में गिनाए हैं; अब पाँच नख वाले सुनो।
श्लोक 10.23
सरल हिंदी भावार्थ: कुत्ता, सियार, भेड़िया, बाघ, बिल्ली, खरहा, साही, सिंह, वानर, हाथी, कछुआ, गोह और मकर आदि का उल्लेख है।
श्लोक 10.24
सरल हिंदी भावार्थ: कङ्क, गिद्ध, बगुला, बाज, भास, भल्लूक, मोर, हंस, सारस, चकवा, कौआ और उल्लू आदि पक्षिवर्ग में बताए गए हैं।
श्लोक 10.25
सरल हिंदी भावार्थ: नौवीं मनुष्य-सृष्टि है; मनुष्यों में रजोगुण, कर्मप्रवृत्ति और दुःखमिश्रित विषयों को सुख मानने की प्रवृत्ति प्रधान होती है।
श्लोक 10.26
सरल हिंदी भावार्थ: स्थावर, तिर्यक्, मनुष्य और आगे बताई देवसृष्टि वैकृत हैं; कुमारों की सृष्टि में प्राकृत और वैकृत दोनों का पक्ष है।
श्लोक 10.27
सरल हिंदी भावार्थ: देवसृष्टि के आठ विभागों में देव, पितर, असुर, गन्धर्व-अप्सरा, सिद्ध, यक्ष-राक्षस और चारण आदि आते हैं।
श्लोक 10.28
सरल हिंदी भावार्थ: भूत, प्रेत, पिशाच, विद्याधर और किन्नर आदि भी इसमें सम्मिलित हैं; कुमारसृष्टि सहित दस सृष्टिविभाग बताए गए।
श्लोक 10.29
सरल हिंदी भावार्थ: अब आगे वंश और मन्वन्तर बताऊँगा; भगवान से प्रेरित ब्रह्मा प्रत्येक कल्प के आरम्भ में रजोगुण द्वारा यह विस्तार रचते हैं।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 10 समाप्त ॥
इस भाग का भक्ति-सन्देश
सुख का स्थायी आश्रय केवल बाहरी परिस्थितियाँ नहीं हैं। विदुर की जिज्ञासा, उद्धव का प्रेम और ब्रह्मा की साधना बताते हैं कि सत्सङ्ग, हरिकथा, नम्रता और आत्मचिन्तन से विवेक जागता है। सभी प्राणियों पर दया और अपने कर्तव्य का भगवान को समर्पण भक्ति को जीवन में उतारते हैं।
पाठाधार और संपादकीय जानकारी
प्राचीन मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents पर उपलब्ध “श्रीमद्भागवतम्—तृतीयस्कन्धः” है। इस भाग में अध्यायवार 45, 34, 28, 36, 50, 40, 42, 33, 44 और 29 श्लोक हैं; कुल 381। संस्करणों में पाठभेद या गणना में अन्तर मिल सकता है। मूल पाठ का क्रम सुरक्षित रखा गया है। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना की स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है; किसी आधुनिक टीका की प्रतिलिपि नहीं। विराट के अंगों और सामाजिक वृत्तियों का वर्णन ग्रंथ की प्रतीकात्मक ध्यानपद्धति के अनुसार है। सृष्टि और जीववर्गों की चर्चा प्राचीन पुराणपरम्परा का वर्णन है।
॥ तृतीय स्कन्ध • भाग १ समाप्त ॥
॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
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