श्रीमद्भागवत महापुराण तृतीय स्कन्ध भाग 2 — अध्याय 11–19, वराहावतार और जय-विजय कथा
श्रीमद्भागवत महापुराण
तृतीय स्कन्ध • भाग २ • अध्याय ११–१९
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काल की विराटता, भगवान की करुणा और पृथ्वी का उद्धार
इस भाग में सूक्ष्म कालगणना से कल्प तक का विस्तार, ब्रह्माजी की सृष्टि और मनु का प्राकट्य आता है। फिर वराहभगवान का पृथ्वी उद्धार, दिति–कश्यप संवाद, जय-विजय की कथा और हिरण्याक्षवध वर्णित हैं।
यहाँ अध्याय 11–19 के सभी 381 श्लोक क्रम से हैं। प्रत्येक का सरल हिंदी भावार्थ इस प्रकाशन के लिए स्वतंत्र रूप से लिखा गया है। शेष अध्याय आगे के भाग में आएँगे।
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 11
सूक्ष्म काल से कल्प और ब्रह्मा की आयु तक
श्लोक 11.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—दृश्य पदार्थ का अविभाजित, असंयुक्त सूक्ष्मतम अंश परमाणु कहलाता है; ऐसे अनेक अंश मिलकर एक वस्तु का अनुभव कराते हैं।
श्लोक 11.2
सरल हिंदी भावार्थ: समस्त कार्यभेद अप्रकट होने पर पदार्थ की अविभक्त, अखण्ड कारणावस्था को परममहान कहा जाता है।
श्लोक 11.3
सरल हिंदी भावार्थ: अप्रकट काल को भी सूक्ष्म और स्थूल पदार्थों में होने वाली गति तथा परिवर्तन से समझा जाता है।
श्लोक 11.4
सरल हिंदी भावार्थ: एक परमाणु का अतिक्रमण करने जितना काल परमाणुकाल है और सम्पूर्ण विस्तार व्यापने वाला काल परममहान है।
श्लोक 11.5
सरल हिंदी भावार्थ: दो परमाणुओं का एक अणु और तीन अणुओं का त्रसरेणु कहा गया है; धूप की किरणों में उड़ते सूक्ष्म कण इसके उदाहरण हैं।
श्लोक 11.6
सरल हिंदी भावार्थ: तीन त्रसरेणुओं को पार करने का समय त्रुटि, सौ त्रुटियों का वेध और तीन वेधों का लव कहा गया है।
श्लोक 11.7
सरल हिंदी भावार्थ: तीन लव का निमेष, तीन निमेष का क्षण, पाँच क्षण की काष्ठा और पन्द्रह काष्ठाओं का लघु होता है।
श्लोक 11.8
सरल हिंदी भावार्थ: पन्द्रह लघु की नाडिका, दो नाडिका का मुहूर्त और दिन-रात के अनुसार छह या सात नाडिकाओं का प्रहर होता है।
श्लोक 11.9
सरल हिंदी भावार्थ: निश्चित भार के ताँबे के पात्र में नियत आकार की स्वर्णशलाका से छिद्र करके जल में डुबोया जाता है; उसके भरने का समय नाडिका है।
श्लोक 11.10
सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्यों के दिन और रात में चार-चार प्रहर तथा पन्द्रह दिनों का एक शुक्ल या कृष्ण पक्ष होता है।
श्लोक 11.11
सरल हिंदी भावार्थ: दो पक्षों का महीना पितरों का एक दिन-रात है; दो महीनों की ऋतु और छह महीनों का उत्तरायण या दक्षिणायन होता है।
श्लोक 11.12
सरल हिंदी भावार्थ: दोनों अयन देवों का दिन-रात और बारह महीने एक वर्ष हैं; मनुष्य की सामान्य पूर्ण आयु सौ वर्ष कही गई है।
श्लोक 11.13
सरल हिंदी भावार्थ: ग्रह, नक्षत्र और तारामण्डल में गतिशील सूर्य परमाणु से संवत्सर तक के कालविभागों को प्रकट करता है।
श्लोक 11.14
सरल हिंदी भावार्थ: वर्षगणना के पाँच नाम संवत्सर, परिवत्सर, इडावत्सर, अनुवत्सर और वत्सर बताए जाते हैं।
श्लोक 11.15
सरल हिंदी भावार्थ: सूर्यरूप कालशक्ति सृजनसामर्थ्य जगाती और यज्ञ-ऋतु का क्रम चलाती है; उस पंचवर्षात्मक व्यवस्था के अधिष्ठाता की आराधना करो।
श्लोक 11.16
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर ने पूछा—पितर, देव और मनुष्यों की गणना समझी; अब कल्प से भी दीर्घ आयु वाले लोकों का काल बताइए।
श्लोक 11.17
सरल हिंदी भावार्थ: आप योगदृष्टि से विश्व को जानने वाले विवेकी हैं, अतः भगवान की कालशक्ति का क्रम समझा सकते हैं।
श्लोक 11.18
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि मिलकर चतुर्युग बनाते हैं; सन्ध्या-सन्ध्यांश सहित इसकी गणना बारह हजार दिव्य वर्षों की है।
श्लोक 11.19
सरल हिंदी भावार्थ: चार युगों के मुख्य काल क्रमशः चार, तीन, दो और एक हजार दिव्य वर्ष हैं; उनके आरम्भ-अन्त में क्रमशः चार, तीन, दो और एक सौ वर्ष जुड़ते हैं।
श्लोक 11.20
सरल हिंदी भावार्थ: मुख्य युग अपने आरम्भ और अन्त के सन्धिकालों के बीच होता है; उसी में उस युग का धर्मक्रम चलता है।
श्लोक 11.21
सरल हिंदी भावार्थ: सत्ययुग में धर्म चार चरणों पर रहता है; अगले युगों में अधर्म बढ़ने से क्रमशः उसका एक-एक चरण घटता है।
श्लोक 11.22
सरल हिंदी भावार्थ: एक हजार चतुर्युग ब्रह्मा का दिन है और उतनी ही उनकी रात, जिसमें सृष्टिकर्ता प्रकट रचना को समेट लेते हैं।
श्लोक 11.23
सरल हिंदी भावार्थ: रात समाप्त होने पर लोकसृष्टि फिर चलती है; ब्रह्मा के एक दिन में चौदह मनुओं के काल आते हैं।
श्लोक 11.24
सरल हिंदी भावार्थ: प्रत्येक मनु का काल लगभग इकहत्तर चतुर्युग से कुछ अधिक है; उसी क्रम में मनु, वंशज, ऋषि, देव और इन्द्र प्रकट होते हैं।
श्लोक 11.25
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा की यह दैनिक सृष्टि त्रिलोक की व्यवस्था चलाती है, जिसमें जीव अपने कर्मों के अनुसार विभिन्न योनियाँ पाते हैं।
श्लोक 11.26
सरल हिंदी भावार्थ: हर मन्वन्तर में भगवान सत्त्वमय रूपों, मनु आदि के माध्यम से अपना पराक्रम प्रकट कर विश्व की रक्षा करते हैं।
श्लोक 11.27
सरल हिंदी भावार्थ: दिन के अन्त में कालप्रभाव से सृजनक्रिया रुकती है और तमोगुणप्रधान विश्रामावस्था आती है।
श्लोक 11.28
सरल हिंदी भावार्थ: उस रात्रि में भूः, भुवः और स्वः लोक अप्रकट हो जाते हैं; सूर्य-चन्द्र का प्रकाश भी वहाँ नहीं रहता।
श्लोक 11.29
सरल हिंदी भावार्थ: सङ्कर्षण की अग्नि से त्रिलोक तपने पर भृगु आदि महर्लोकवासी उष्णता से बचकर जनलोक चले जाते हैं।
श्लोक 11.30
सरल हिंदी भावार्थ: प्रलयकालीन प्रबल वायु से उठी समुद्र की विशाल तरङ्गें तीनों लोकों को जल में डुबो देती हैं।
श्लोक 11.31
सरल हिंदी भावार्थ: उस जल के भीतर हरि अनन्तशय्या पर योगनिद्रा में स्थित रहते हैं और जनलोक के मुनि उनकी स्तुति करते हैं।
श्लोक 11.32
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसे दिन-रातों की गणना से ब्रह्मा की आयु भी अपने सौ वर्षों तक सीमित कही गई है।
श्लोक 11.33
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा की आधी आयु परार्ध कहलाती है; पहला परार्ध बीत चुका और वर्तमान में दूसरा चल रहा है।
श्लोक 11.34
सरल हिंदी भावार्थ: प्रथम परार्ध के आरम्भ में ब्राह्म नामक महान कल्प था, जिसमें वेदमय ब्रह्मा का प्राकट्य हुआ।
श्लोक 11.35
सरल हिंदी भावार्थ: उसी परार्ध के अन्त का कल्प पाद्म कहा गया, जब हरि के नाभिसरोवर से लोककमल प्रकट हुआ।
श्लोक 11.36
सरल हिंदी भावार्थ: दूसरे परार्ध का वर्तमान कल्प वाराह नाम से प्रसिद्ध है, जिसमें भगवान ने वराहरूप धारण किया।
श्लोक 11.37
सरल हिंदी भावार्थ: दो परार्धों का इतना विशाल काल भी अनादि, अनन्त और अव्यक्त परमात्मा के लिए निमेष के समान कहा जाता है।
श्लोक 11.38
सरल हिंदी भावार्थ: परमाणु से द्विपरार्ध तक का काल देहाभिमानी जीवों पर शासन करता है, किन्तु अनन्त भगवान पर उसका अधिकार नहीं।
श्लोक 11.39
सरल हिंदी भावार्थ: तत्त्वों और उनके आवरणों सहित ब्रह्माण्ड का बाहरी विस्तार पुराणगणना में पचास करोड़ योजन बताया गया है।
श्लोक 11.40
सरल हिंदी भावार्थ: दस-दस गुने आवरणों सहित ऐसे करोड़ों ब्रह्माण्ड परम आश्रय में परमाणु के समान सूक्ष्म प्रतीत होते हैं।
श्लोक 11.41
सरल हिंदी भावार्थ: उस सबके परम आश्रय को अक्षर ब्रह्म, कारणों का कारण और महापुरुष विष्णु का परम धाम कहा जाता है।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 11 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 12
रुद्र, ऋषि, वेद और स्वायम्भुव मनु की उत्पत्ति
श्लोक 12.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—कालरूप परमात्मा की महिमा बताई; अब सुनो कि वेदगर्भ ब्रह्मा ने सृष्टि कैसे की।
श्लोक 12.2
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने पहले अन्धतामिस्र, तामिस्र, महामोह, मोह और तम नामक अज्ञान की पाँच वृत्तियाँ उत्पन्न कीं।
श्लोक 12.3
सरल हिंदी भावार्थ: इस दोषमयी सृष्टि से सन्तोष न पाकर उन्होंने भगवद्ध्यान से शुद्ध मन द्वारा दूसरी सृष्टि की।
श्लोक 12.4
सरल हिंदी भावार्थ: सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार नामक ऊर्ध्वरेता, कर्मासक्तिरहित चार मुनि उत्पन्न हुए।
श्लोक 12.5
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा ने उन्हें प्रजा उत्पन्न करने को कहा; वासुदेवपरायण और मोक्षमार्गी कुमारों ने यह स्वीकार नहीं किया।
श्लोक 12.6
सरल हिंदी भावार्थ: पुत्रों द्वारा आज्ञा स्वीकार न किए जाने पर ब्रह्मा को तीव्र क्रोध आया, जिसे वे संयमित करने लगे।
श्लोक 12.7
सरल हिंदी भावार्थ: बुद्धि से रोके जाने पर भी वह क्रोध भौंहों के बीच से नीललोहित बालक के रूप में प्रकट हुआ।
श्लोक 12.8
सरल हिंदी भावार्थ: वही देवों से पहले प्रकट भगवान रुद्र थे; उन्होंने रोते हुए ब्रह्मा से अपने नाम और रहने के स्थान माँगे।
श्लोक 12.9
सरल हिंदी भावार्थ: कमलज ब्रह्मा ने उनकी बात सुनकर कल्याणकारी वाणी में कहा—रोओ मत, मैं तुम्हारी व्यवस्था करता हूँ।
श्लोक 12.10
सरल हिंदी भावार्थ: तुम व्याकुल बालक की तरह रोए हो, इसलिए संसार तुम्हें रुद्र नाम से पुकारेगा।
श्लोक 12.11
सरल हिंदी भावार्थ: हृदय, इन्द्रियाँ, प्राण, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र और तप तुम्हारे ग्यारह स्थान हैं।
श्लोक 12.12
सरल हिंदी भावार्थ: मन्यु, मनु, महिनस, महान्, शिव, ऋतध्वज, उग्ररेता, भव, काल, वामदेव और धृतव्रत तुम्हारे नाम हैं।
श्लोक 12.13
सरल हिंदी भावार्थ: धी, वृत्ति, उशना, उमा, नियुत्, सर्पि, इला, अम्बिका, इरावती, सुधा और दीक्षा तुम्हारी रुद्राणियाँ हैं।
श्लोक 12.14
सरल हिंदी भावार्थ: इन नामों, स्थानों और सहचारिणियों को स्वीकार कर अनेक प्रजाएँ उत्पन्न करो; तुम भी प्रजापति हो।
श्लोक 12.15
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा की आज्ञा से नीललोहित रुद्र ने अपने समान सामर्थ्य, रूप और स्वभाव वाली प्रजाएँ उत्पन्न कीं।
श्लोक 12.16
सरल हिंदी भावार्थ: उनके उत्पन्न किए असंख्य रुद्रगण चारों ओर जगत को ग्रसने लगे, जिसे देखकर ब्रह्मा चिन्तित हुए।
श्लोक 12.17
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—हे देवश्रेष्ठ, ऐसी प्रजा अब और न बनाओ, जो अपनी उग्र दृष्टि से दिशाओं और मुझे भी जला रही है।
श्लोक 12.18
सरल हिंदी भावार्थ: सब जीवों को सुख देने वाले तप में लगो; उससे उचित समय पर सृष्टि का कार्य कर सकोगे।
श्लोक 12.19
सरल हिंदी भावार्थ: तप द्वारा ही सबके हृदय में रहने वाले परम ज्योतिस्वरूप भगवान का साक्षात्कार होता है।
श्लोक 12.20
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय कहते हैं—ब्रह्मा की आज्ञा स्वीकार करके रुद्र ने उनकी प्रदक्षिणा की और तप करने वन चले गए।
श्लोक 12.21
सरल हिंदी भावार्थ: फिर भगवच्छक्तियुक्त ब्रह्मा के सृष्टिचिन्तन से लोकविस्तार के लिए दस पुत्र उत्पन्न हुए।
श्लोक 12.22
सरल हिंदी भावार्थ: वे मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ, दक्ष और नारद थे।
श्लोक 12.23
सरल हिंदी भावार्थ: नारद गोद से, दक्ष अँगूठे से, वसिष्ठ प्राण से, भृगु त्वचा से और क्रतु हाथ से उत्पन्न बताए गए हैं।
श्लोक 12.24
सरल हिंदी भावार्थ: पुलह नाभि से, पुलस्त्य कानों से, अङ्गिरा मुख से, अत्रि नेत्रों से और मरीचि मन से प्रकट हुए।
श्लोक 12.25
सरल हिंदी भावार्थ: दाहिने स्तन से धर्म, जिसमें नारायण का निवास है, और पीठ से अधर्म प्रकट हुआ, जिसके वंश में भयकारी मृत्यु आई।
श्लोक 12.26
सरल हिंदी भावार्थ: हृदय से काम, भौंहों से क्रोध, अधर से लोभ, मुख से वाणी, जननेन्द्रिय से समुद्र और गुदा से अशुभ का आश्रय निरृति प्रकट हुई।
श्लोक 12.27
सरल हिंदी भावार्थ: छाया से देवहूति के भावी पति कर्दम उत्पन्न हुए; इस प्रकार सृष्टिकर्ता के मन और शरीर से विविध जगत प्रकट हुआ।
श्लोक 12.28
सरल हिंदी भावार्थ: कथा में आता है कि ब्रह्मा अपनी पुत्री वाक् की ओर कामभाव से आकृष्ट हुए, जबकि उसकी ऐसी इच्छा नहीं थी।
श्लोक 12.29
सरल हिंदी भावार्थ: पिता की अधर्म की ओर झुकी बुद्धि देखकर मरीचि आदि मुनियों ने आदर और विश्वास से उन्हें समझाया।
श्लोक 12.30
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—अपनी पुत्री के प्रति कामवश होना अनुचित है; ऐसा आचरण न पूर्व आदर्शों ने किया, न आगे के योग्य लोग करेंगे।
श्लोक 12.31
सरल हिंदी भावार्थ: महान तेजस्वियों के लिए भी यह प्रशंसनीय नहीं; जगत के गुरु का आचरण लोककल्याण का आदर्श होना चाहिए।
श्लोक 12.32
सरल हिंदी भावार्थ: जिन भगवान ने अपने तेज से भीतर स्थित जगत प्रकट किया, उन्हें प्रणाम; वे ही धर्म की रक्षा करें।
श्लोक 12.33
सरल हिंदी भावार्थ: पुत्रों की बात सुनकर लज्जित ब्रह्मा ने उस दोषयुक्त अवस्था का त्याग किया; दिशाओं ने उसे अन्धकारमय कोहरे के रूप में ग्रहण किया।
श्लोक 12.34
सरल हिंदी भावार्थ: पूर्व की तरह लोकव्यवस्था रचने का चिन्तन करते समय ब्रह्मा के चार मुखों से चार वेद प्रकट हुए।
श्लोक 12.35
सरल हिंदी भावार्थ: चार ऋत्विजों का यज्ञकर्म, उपवेद, धर्म के चार आधार और आश्रमों की जीवनवृत्तियाँ भी प्रकट हुईं।
श्लोक 12.36
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर बोले—ब्रह्मा ने किस मुख से कौन वेद और सम्बन्धित विधियाँ प्रकट कीं? कृपया विस्तार से बताइए।
श्लोक 12.37
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—पूर्व आदि चार मुखों से क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद तथा उनके यज्ञ, स्तुति और प्रायश्चित्त-विधान प्रकट हुए।
श्लोक 12.38
सरल हिंदी भावार्थ: उन्हीं मुखों से क्रमशः आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद और स्थापत्यविद्या प्रकट हुई।
श्लोक 12.39
सरल हिंदी भावार्थ: सभी मुखों से इतिहास और पुराण प्रकट हुए, जिन्हें व्यापक लोकशिक्षा के कारण पाँचवाँ वेद कहा गया।
श्लोक 12.40
सरल हिंदी भावार्थ: विभिन्न मुखों से षोडशी-उक्थ, पुरीषी-अग्निष्टुत्, आप्तोर्याम-अतिरात्र तथा वाजपेय-गोसव जैसे यज्ञविधान प्रकट हुए।
श्लोक 12.41
सरल हिंदी भावार्थ: विद्या, दान, तप और सत्य धर्म के चार चरण बने; चार आश्रम और उनके कर्तव्य भी स्थापित हुए।
श्लोक 12.42
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मचर्य के सावित्र, प्राजापत्य, ब्राह्म और बृहत् विभाग तथा गृहस्थ की वार्ता, सञ्चय, शालीन और शिलोञ्छ वृत्तियाँ बताई गईं।
श्लोक 12.43
सरल हिंदी भावार्थ: वानप्रस्थ के वैखानस, वालखिल्य, औदुम्बर और फेनप तथा संन्यास के कुटीचक, बह्वोद, हंस और निष्क्रिय विभाग हुए।
श्लोक 12.44
सरल हिंदी भावार्थ: तर्क-आत्मविद्या, वेदत्रयी, जीविका और शासननीति की विद्याएँ प्रकट हुईं; व्याहृतियाँ और हृदयाकाश से प्रणव का प्राकट्य बताया गया।
श्लोक 12.45
सरल हिंदी भावार्थ: रोमों से उष्णिक्, त्वचा से गायत्री, मांस से त्रिष्टुप्, स्नायु से अनुष्टुप् और अस्थियों से जगती छन्द का सम्बन्ध बताया गया।
श्लोक 12.46
सरल हिंदी भावार्थ: मज्जा से पङ्क्ति और प्राण से बृहती छन्द प्रकट हुए; स्पर्शवर्ण उनके जीव और स्वरवर्ण उनके शरीर की उपमा पाए।
श्लोक 12.47
सरल हिंदी भावार्थ: ऊष्मवर्ण इन्द्रियों और अन्तःस्थवर्ण बल के प्रतीक बताए गए; ब्रह्मा के विहार से संगीत के सात स्वर प्रकट हुए।
श्लोक 12.48
सरल हिंदी भावार्थ: व्यक्त-अव्यक्त शब्दस्वरूप ब्रह्मा के माध्यम से अनेक शक्तियों वाला व्यापक परब्रह्म प्रकाशित होता है।
श्लोक 12.49
सरल हिंदी भावार्थ: महाशक्तिशाली ऋषियों के होते हुए भी प्रजाओं का पर्याप्त विस्तार न देखकर ब्रह्मा ने दूसरी सृष्टिविधि का विचार किया।
श्लोक 12.50
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने हृदय में फिर सोचा—निरन्तर प्रयत्न करने पर भी प्रजाओं का न बढ़ना आश्चर्यजनक है।
श्लोक 12.51
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने इसे दैवी अवरोध समझकर परम व्यवस्था की ओर ध्यान लगाया।
श्लोक 12.52
सरल हिंदी भावार्थ: तब उनका रूप दो भागों में विभक्त हुआ और उन दोनों से स्त्री-पुरुष का जोड़ा प्रकट हुआ।
श्लोक 12.53
सरल हिंदी भावार्थ: पुरुष स्वायम्भुव मनु और स्त्री उनकी महारानी शतरूपा हुईं।
श्लोक 12.54
सरल हिंदी भावार्थ: उनसे दाम्पत्य द्वारा प्रजावृद्धि का क्रम चला; मनु ने शतरूपा से पाँच सन्तानें उत्पन्न कीं।
श्लोक 12.55
सरल हिंदी भावार्थ: प्रियव्रत और उत्तानपाद दो पुत्र तथा आकूति, देवहूति और प्रसूति तीन पुत्रियाँ थीं।
श्लोक 12.56
सरल हिंदी भावार्थ: आकूति का विवाह रुचि, देवहूति का कर्दम और प्रसूति का दक्ष से हुआ; इनके वंशों से संसार विस्तृत हुआ।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 12 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 13
वराहावतार और पृथ्वी का उद्धार
श्लोक 13.1
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—मुनि की पवित्र वाणी सुनकर वासुदेवकथा में प्रेम रखने वाले विदुर ने फिर प्रश्न किया।
श्लोक 13.2
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर बोले—ब्रह्मा के प्रिय पुत्र सम्राट स्वायम्भुव मनु ने योग्य पत्नी मिलने के बाद क्या किया?
श्लोक 13.3
सरल हिंदी भावार्थ: वे भगवान के आश्रित प्रथम राजर्षि थे; श्रद्धापूर्वक उनका पावन चरित्र सुनना चाहता हूँ।
श्लोक 13.4
सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानी कहते हैं कि दीर्घ अध्ययन का सरल सार उन भक्तों के गुण सुनना है जिनके हृदय में मुकुन्द के चरण बसते हैं।
श्लोक 13.5
सरल हिंदी भावार्थ: भगवच्चरणों के आश्रित विनम्र विदुर की बात सुनकर मैत्रेय हरिकथा के आनन्द से रोमाञ्चित हुए और बोले।
श्लोक 13.6
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—पत्नी सहित प्रकट होकर स्वायम्भुव मनु ने हाथ जोड़कर अपने पिता ब्रह्मा को प्रणाम किया।
श्लोक 13.7
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—आप सब जीवों के जन्मदाता, पालक और पिता हैं; हम सन्तानें आपकी सेवा किस प्रकार करें?
श्लोक 13.8
सरल हिंदी भावार्थ: हमें हमारी शक्ति के योग्य ऐसा कर्तव्य दीजिए जिससे इस लोक में सद्यश और परलोक में श्रेष्ठ गति मिले।
श्लोक 13.9
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा बोले—तुम्हारे निष्कपट आत्मसमर्पण से प्रसन्न हूँ; हे पृथ्वीपालक, तुम दोनों का कल्याण हो।
श्लोक 13.10
सरल हिंदी भावार्थ: सन्तान का गुरु के प्रति उचित सम्मान यही है कि ईर्ष्यारहित होकर आदर और सावधानी से आज्ञा का पालन करे।
श्लोक 13.11
सरल हिंदी भावार्थ: शतरूपा से अपने समान गुणवान सन्तानें उत्पन्न करो, धर्मपूर्वक पृथ्वी का शासन करो और यज्ञ द्वारा भगवान को पूजो।
श्लोक 13.12
सरल हिंदी भावार्थ: प्रजा की रक्षा ही मेरी श्रेष्ठ सेवा होगी; प्रजापालक के इस कर्तव्य से हृषीकेश प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 13.13
सरल हिंदी भावार्थ: जिनके सत्कर्मों से हृदयस्थित यज्ञेश्वर प्रसन्न नहीं होते, उनका परिश्रम वास्तविक उद्देश्य से रहित रहता है।
श्लोक 13.14
सरल हिंदी भावार्थ: मनु बोले—मैं आपकी आज्ञा मानूँगा; कृपया मेरे और प्रजाओं के निवास का स्थान निर्धारित कीजिए।
श्लोक 13.15
सरल हिंदी भावार्थ: सब जीवों की निवासभूमि पृथ्वी विशाल जल में डूबी है; उसके उद्धार का उपाय कीजिए।
श्लोक 13.16
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—जल में डूबी पृथ्वी को देखकर ब्रह्मा देर तक विचार करने लगे कि इसे ऊपर कैसे उठाया जाए।
श्लोक 13.17
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे सृष्टिकार्य के बीच पृथ्वी रसातल में चली गई; जिन प्रभु से मैं उत्पन्न हुआ, वही उचित उपाय करें।
श्लोक 13.18
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसा चिन्तन करते समय उनकी नासिका से अँगूठे के बराबर एक छोटा वराह प्रकट हुआ।
श्लोक 13.19
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा के देखते-देखते वह आकाश में क्षणभर में हाथी जितना बड़ा हो गया; यह अत्यन्त अद्भुत दृश्य था।
श्लोक 13.20
सरल हिंदी भावार्थ: मरीचि आदि ऋषि, कुमार और मनु सहित ब्रह्मा उस वराहरूप को देखकर अनेक प्रकार से विचार करने लगे।
श्लोक 13.21
सरल हिंदी भावार्थ: क्या सूकर के रूप में कोई दिव्य सत्ता है? मेरी नासिका से ऐसा आश्चर्यजनक प्राकट्य कैसे हुआ?
श्लोक 13.22
सरल हिंदी भावार्थ: जो पहले अँगूठे जितना था, तुरन्त विशाल शिलाखण्ड जैसा हुआ; क्या यह स्वयं यज्ञपुरुष भगवान हैं?
श्लोक 13.23
सरल हिंदी भावार्थ: जब ब्रह्मा और उनके पुत्र विचार कर रहे थे, तभी पर्वताकार यज्ञपुरुष भगवान ने गम्भीर गर्जना की।
श्लोक 13.24
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी गर्जना से दिशाएँ गूँज उठीं और ब्रह्मा तथा श्रेष्ठ ऋषियों के हृदय में हर्ष भर गया।
श्लोक 13.25
सरल हिंदी भावार्थ: जन, तप और सत्यलोक के मुनियों ने अपना खेद मिटाने वाली वह ध्वनि सुनकर तीनों वेदों के पवित्र मन्त्रों से स्तुति की।
श्लोक 13.26
सरल हिंदी भावार्थ: वेदमय वराहभगवान ने मुनियों का गुणगान सुना और देवों के कल्याण के लिए फिर गर्जना करके हाथी की तरह जल में प्रवेश किया।
श्लोक 13.27
सरल हिंदी भावार्थ: पूँछ उठाए, सटाएँ हिलाते, खुरों से मेघों को छूते, उज्ज्वल दाँत और दीप्त दृष्टि वाले पृथ्वीधारक भगवान सुशोभित थे।
श्लोक 13.28
सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी का पता सूँघते हुए यज्ञस्वरूप वराह ने विकराल दाँतों के बीच भी कोमल दृष्टि से स्तुति करते ऋषियों को देखा और जल में उतरे।
श्लोक 13.29
सरल हिंदी भावार्थ: उनके वज्रसमान शरीर के प्रवेश से समुद्र विक्षुब्ध हुआ; उठती तरङ्गें मानो हाथ जोड़कर यज्ञेश्वर से रक्षा माँग रही थीं।
श्लोक 13.30
सरल हिंदी भावार्थ: तीखे खुरों से जल को चीरते हुए वे गहराई में पहुँचे और वह पृथ्वी देखी जिसे उन्होंने प्रलय में जीवों सहित अपने आश्रय में रखा था।
श्लोक 13.31
सरल हिंदी भावार्थ: डूबी पृथ्वी को दाँत पर उठाकर वे जल से ऊपर आए; तभी गदा लेकर आक्रमण करते दैत्य को देखकर उनका धर्मरक्षक क्रोध प्रकट हुआ।
श्लोक 13.32
सरल हिंदी भावार्थ: असह्य पराक्रमी दैत्य को उन्होंने जल में सिंह द्वारा हाथी के वध जैसी सहज लीला से मार डाला; मुख पर उसका रक्त लग गया।
श्लोक 13.33
सरल हिंदी भावार्थ: तमालवर्ण भगवान को उज्ज्वल दाँतों पर पृथ्वी उठाए देखकर ब्रह्मा आदि ने हाथ जोड़कर वैदिक मन्त्रों से स्तुति की।
श्लोक 13.34
सरल हिंदी भावार्थ: ऋषि बोले—अजित यज्ञस्वरूप प्रभु, आपकी जय हो! आपके रोमकूपों में यज्ञों का आश्रय है; कारणरूप वराह को नमस्कार।
श्लोक 13.35
सरल हिंदी भावार्थ: आपका यज्ञमय रूप दुष्टचित्त वालों को दुर्लभ है; त्वचा में छन्द, रोमों में कुश, नेत्रों में घृत और चरणों में ऋत्विज्कर्म का ध्यान है।
श्लोक 13.36
सरल हिंदी भावार्थ: थूथन, नासिकाएँ, उदर, कान और मुख आदि यज्ञपात्रों तथा क्रियाओं के प्रतीक हैं; आपका भोजन भी अग्निहोत्ररूप है।
श्लोक 13.37
सरल हिंदी भावार्थ: दीक्षा, उपसद, प्रारम्भिक और अन्तिम यज्ञकर्म, प्रवर्ग्य, अग्नियाँ और चितियाँ आपके अंगों तथा प्राणों में ध्यान की जाती हैं।
श्लोक 13.38
सरल हिंदी भावार्थ: सोम, तीन सवन, यज्ञों के प्रकार, सत्र और अनुष्ठान आपके वीर्य, अवस्थाओं, धातुओं और सन्धियों के प्रतीक हैं; आप सम्पूर्ण यज्ञ हैं।
श्लोक 13.39
सरल हिंदी भावार्थ: सभी मन्त्र, देवता, द्रव्य और यज्ञक्रियाओं के स्वरूप को प्रणाम; वैराग्य, भक्ति और संयम से प्रकट ज्ञान के गुरु को नमस्कार।
श्लोक 13.40
सरल हिंदी भावार्थ: आपके दाँत पर पर्वतों सहित पृथ्वी वैसी शोभित है जैसे वन से निकलते हाथी के दाँत पर पत्तों सहित कमलिनी।
श्लोक 13.41
सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी धारण किए आपका वेदमय वराहरूप ऐसा लगता है जैसे विशाल पर्वत का शिखर मेघमाला को धारण किए हो।
श्लोक 13.42
सरल हिंदी भावार्थ: आप जगत के पिता और पृथ्वी उसकी माता हैं; सब जीवों के निवास के लिए इसे स्थापित कीजिए। हम आप दोनों को प्रणाम करते हैं।
श्लोक 13.43
सरल हिंदी भावार्थ: रसातल से पृथ्वी उठाने का कार्य अन्य कौन कर सकता है? अद्भुत विश्व रचने वाले आपमें यह आश्चर्य नहीं।
श्लोक 13.44
सरल हिंदी भावार्थ: आपकी वेदमयी देह और सटाओं से झरे पवित्र जलबिन्दुओं से जन, तप और सत्यलोकवासी हम मुनि अत्यन्त पावन हुए।
श्लोक 13.45
सरल हिंदी भावार्थ: आपकी अपार लीलाओं का अन्त पाने का दावा करने वाला भ्रमित है; आपकी योगमाया से मोहित जगत का कल्याण कीजिए।
श्लोक 13.46
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—ब्रह्मज्ञानी मुनियों की स्तुति के बीच भगवान ने अपने खुरों से जल को स्थिर करके पृथ्वी को व्यवस्थित किया।
श्लोक 13.47
सरल हिंदी भावार्थ: हरि ने पृथ्वी को रसातल से सहज उठाकर जल पर स्थापित किया और अपना कार्य पूर्ण करके चले गए।
श्लोक 13.48
सरल हिंदी भावार्थ: जो श्रद्धा से भगवान की इस कल्याणकारी कथा को सुनता या सुनाता है, उसके हृदय में जनार्दन शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 13.49
सरल हिंदी भावार्थ: सभी आशीर्वादों के स्वामी प्रसन्न हों तो क्या दुर्लभ है? फिर भी अनन्य भक्त क्षुद्र फल नहीं चाहते; प्रभु उन्हें अपना परम पद देते हैं।
श्लोक 13.50
सरल हिंदी भावार्थ: पुरुषार्थ का सार जानने वाला हरिकथामृत पीकर उससे विरक्त कैसे होगा? वह कथा संसारबन्धन का नाश करती है।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 13 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 14
दिति–कश्यप संवाद और प्रह्लाद की भविष्यवाणी
श्लोक 14.1
सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—वराहभगवान की कथा सुनकर भी तृप्त न हुए व्रतनिष्ठ विदुर ने हाथ जोड़कर फिर पूछा।
श्लोक 14.2
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर बोले—हमने सुना है कि उन्हीं यज्ञमूर्ति हरि ने आदिदैत्य हिरण्याक्ष का वध किया था।
श्लोक 14.3
सरल हिंदी भावार्थ: दाँत पर पृथ्वी उठाने वाले भगवान और दैत्यराज के बीच युद्ध किस कारण हुआ?
श्लोक 14.4
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—मृत्यु का बन्धन काटने वाली हरि की अवतारकथा का प्रश्न तुमने बहुत उत्तम किया है।
श्लोक 14.5
सरल हिंदी भावार्थ: इसी भगवान की कथा नारद से सुनकर बालक ध्रुव मृत्यु के सिर पर चरण रखकर हरिपद को प्राप्त हुए।
श्लोक 14.6
सरल हिंदी भावार्थ: इस सम्बन्ध का प्राचीन इतिहास मैंने सुना है, जिसे पूछने पर ब्रह्मा ने देवताओं को बताया था।
श्लोक 14.7
सरल हिंदी भावार्थ: सन्तान की इच्छा से कामपीड़ित दक्षकन्या दिति ने सन्ध्या के समय अपने पति कश्यप से दाम्पत्य का अनुरोध किया।
श्लोक 14.8
सरल हिंदी भावार्थ: उस समय कश्यप यज्ञपुरुष को दुग्धाहुति अर्पित करके सूर्यास्त के निकट अग्निशाला में ध्यानस्थ बैठे थे।
श्लोक 14.9
सरल हिंदी भावार्थ: दिति बोली—आपके प्रति कामना मुझे वैसे पीड़ा दे रही है जैसे बलवान हाथी कोमल केले के वृक्ष को कुचल दे।
श्लोक 14.10
सरल हिंदी भावार्थ: अपनी सन्तानवती सहपत्नियों का सुख देखकर मैं दुःखी हूँ; मुझ पर भी कृपा कीजिए।
श्लोक 14.11
सरल हिंदी भावार्थ: आप जैसे पति से सम्मान और सन्तान पाने वाली स्त्रियों का यश फैलता है; सन्तान में पति का वंश फिर प्रकट होता है।
श्लोक 14.12
सरल हिंदी भावार्थ: हमारे पिता दक्ष ने स्नेह से प्रत्येक कन्या से पूछा था कि वह किसे पति चुनना चाहती है।
श्लोक 14.13
सरल हिंदी भावार्थ: हमारी इच्छा और आपके प्रति अनुराग जानकर उन्होंने अपनी तेरह पुत्रियाँ आपके साथ ब्याही थीं।
श्लोक 14.14
सरल हिंदी भावार्थ: हे कमलनयन, मेरी इच्छा पूर्ण कीजिए; पीड़ित का महापुरुष की शरण आना निष्फल नहीं होता।
श्लोक 14.15
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—कामना से व्याकुल और बहुत प्रार्थना करती दिति को कश्यप ने समझाते हुए मधुर उत्तर दिया।
श्लोक 14.16
सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा; धर्म, अर्थ और काम में सहायक पत्नी का प्रिय कार्य कौन नहीं करेगा?
श्लोक 14.17
सरल हिंदी भावार्थ: गृहस्थ अन्य आश्रमों का भी पोषण करते हुए पत्नी के सहयोग से संकटसागर पार करता है, जैसे नाव से समुद्र।
श्लोक 14.18
सरल हिंदी भावार्थ: पत्नी को कल्याणकामी पुरुष का अर्धाङ्ग कहा गया है; उसे गृहभार सौंपकर वह निश्चिन्त कर्तव्य निभाता है।
श्लोक 14.19
सरल हिंदी भावार्थ: गृहस्थाश्रम का संयमित सहारा लेकर इन्द्रियरूपी शत्रुओं को वैसे जीता जाता है जैसे दुर्ग में रहकर लुटेरों को।
श्लोक 14.20
सरल हिंदी भावार्थ: हे गृहस्वामिनी, तुम्हारे उपकार का पूरा प्रतिदान हम जीवनभर भी नहीं कर सकते।
श्लोक 14.21
सरल हिंदी भावार्थ: मैं सन्तान के लिए तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा, किन्तु थोड़ा समय प्रतीक्षा करो ताकि दोष न लगे।
श्लोक 14.22
सरल हिंदी भावार्थ: यह सन्ध्या का उग्र समय है, जब भूतनाथ के अनुचर विचरते हैं; अभी संयम उचित है।
श्लोक 14.23
सरल हिंदी भावार्थ: इस सन्ध्या में प्राणियों के स्वामी शिव अपने गणों सहित वृषभ पर भ्रमण करते हैं।
श्लोक 14.24
सरल हिंदी भावार्थ: श्मशानधूलि से धूसर जटाओं और भस्ममण्डित स्वर्णप्रभ देह वाले त्रिनेत्र शिव सब ओर देखते हैं; वे तुम्हारे सम्बन्धी भी हैं।
श्लोक 14.25
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी दृष्टि में अपना-पराया या मान्य-निन्द्य का पक्षपात नहीं; हम भी उनके चरणों से तिरस्कृत मायिक सुखों से ऊपर उठना चाहते हैं।
श्लोक 14.26
सरल हिंदी भावार्थ: अज्ञान मिटाने के इच्छुक ज्ञानी उनके निर्दोष चरित्र का गान करते हैं; सर्वोपरि होकर भी वे अवधूत जैसी लीला करते हैं।
श्लोक 14.27
सरल हिंदी भावार्थ: जो लोग नश्वर देह को वस्त्र, माला और आभूषणों से सजाकर ही अपना सर्वस्व मानते हैं, वे उनकी आत्माराम अवस्था नहीं समझते और हँसते हैं।
श्लोक 14.28
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा आदि उनकी स्थापित मर्यादा का पालन करते हैं और माया आज्ञाकारिणी है; फिर भी उनका अवधूतवेष अद्भुत लीला है।
श्लोक 14.29
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—समझाए जाने पर भी दिति कामना से इन्द्रियसंयम खो बैठीं और लज्जा छोड़कर कश्यप का वस्त्र पकड़ लिया।
श्लोक 14.30
सरल हिंदी भावार्थ: पत्नी का हठ देखकर कश्यप ने दैव को प्रणाम किया और अनुचित समय में एकान्त दाम्पत्य स्वीकार किया।
श्लोक 14.31
सरल हिंदी भावार्थ: बाद में उन्होंने जल का आचमन, प्राणसंयम और मौन रखकर निर्मल सनातन ब्रह्मज्योति का ध्यान-जप किया।
श्लोक 14.32
सरल हिंदी भावार्थ: अपने अनुचित आग्रह पर लज्जित दिति सिर झुकाकर पति के पास आईं और निवेदन किया।
श्लोक 14.33
सरल हिंदी भावार्थ: मैंने भूतपति रुद्र का अनादर किया है; वे मेरे इस गर्भ को नष्ट न करें।
श्लोक 14.34
सरल हिंदी भावार्थ: महान, उग्र, वरदाता, कल्याणमय और दण्ड को धारण तथा त्याग करने में समर्थ रुद्र को प्रणाम है।
श्लोक 14.35
सरल हिंदी भावार्थ: सतीपति शिव हम पर प्रसन्न हों; वे बड़े कृपालु हैं और दुर्बलों पर दया करने वाले हैं।
श्लोक 14.36
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—गर्भ का कल्याण चाहती काँपती पत्नी से, सन्ध्याविधि पूरी करके कश्यप ने कहा।
श्लोक 14.37
सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारे असंयम, समयदोष, मेरे निर्देश के उल्लङ्घन और देवों के अनादर के कारण प्रतिकूल फल होगा।
श्लोक 14.38
सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारे गर्भ से दो अमङ्गलकारी पुत्र उत्पन्न होंगे, जो लोकपालों सहित तीनों लोकों को रुलाएँगे।
श्लोक 14.39
सरल हिंदी भावार्थ: जब वे निर्दोष प्राणियों को मारेंगे, स्त्रियों को सताएँगे और महात्माओं को कुपित करेंगे—
श्लोक 14.40
सरल हिंदी भावार्थ: तब जगत के हितैषी भगवान अवतार लेकर उनका अन्त करेंगे, जैसे इन्द्र पर्वतों पर वज्र चलाते हैं।
श्लोक 14.41
सरल हिंदी भावार्थ: दिति बोली—मेरे पुत्रों का अन्त स्वयं चक्रधारी भगवान करें, किसी क्रुद्ध ब्राह्मण के शाप से न हो।
श्लोक 14.42
सरल हिंदी भावार्थ: ब्राह्मणशाप से नष्ट और जीवों को भय देने वाला जहाँ भी जन्म ले, दुःखमय दशाओं में भी उसे सहज अनुग्रह नहीं मिलता।
श्लोक 14.43
सरल हिंदी भावार्थ: कश्यप बोले—तुम्हारे पश्चात्ताप, तुरन्त दोषविचार और भगवान, शिव तथा मेरे प्रति आदर से एक शुभ फल भी होगा।
श्लोक 14.44
सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारे एक पुत्र का पुत्र महान संत होगा, जिसका निर्मल यश लोग भगवद्यश के साथ गाएँगे।
श्लोक 14.45
सरल हिंदी भावार्थ: उसके आचरण का अनुकरण करने के लिए साधु वैररहितता आदि से अपने मन को तपाएँगे, जैसे अग्नि में सोना शुद्ध होता है।
श्लोक 14.46
सरल हिंदी भावार्थ: वह अनन्यभक्ति से उन भगवान को प्रसन्न करेगा जिनकी प्रसन्नता से पूरा जगत प्रसन्न होता है।
श्लोक 14.47
सरल हिंदी भावार्थ: वह परम महाभागवत होगा; प्रबल भक्ति से शुद्ध हृदय में वैकुण्ठनाथ को स्थापित कर इस संसार का मोह छोड़ देगा।
श्लोक 14.48
सरल हिंदी भावार्थ: वह विषयलोलुप नहीं होगा; सदाचारी, गुणवान, दूसरों की उन्नति में प्रसन्न और दुःखियों के लिए व्यथित होकर चन्द्रमा की तरह ताप हरने वाला होगा।
श्लोक 14.49
सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारा पौत्र भक्तों की इच्छा के अनुरूप रूप प्रकट करने वाले निर्मल कमलनयन भगवान को भीतर-बाहर देखेगा।
श्लोक 14.50
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—भक्त पौत्र की बात सुनकर दिति प्रसन्न हुईं और पुत्रों का अन्त कृष्ण के हाथों होगा जानकर आश्वस्त हुईं।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 14 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 15
सनकादि का वैकुण्ठगमन और जय-विजय को शाप
श्लोक 15.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—देवों को कष्ट होने की आशंका से दिति ने दूसरों का तेज दबाने वाले कश्यप के उस गर्भतेज को सौ वर्षों तक धारण किया।
श्लोक 15.2
सरल हिंदी भावार्थ: उसके प्रभाव से दिशाओं का प्रकाश मंद हुआ; शक्तिहीन-से देवताओं ने ब्रह्मा से अन्धकार की स्थिति बताई।
श्लोक 15.3
सरल हिंदी भावार्थ: देव बोले—इस अन्धकार से हम अत्यन्त व्याकुल हैं; आप इसका कारण जानते हैं, आपकी ज्ञानगति काल से अवरुद्ध नहीं।
श्लोक 15.4
सरल हिंदी भावार्थ: हे देवदेव, जगत के धारणकर्ता और लोकपालों के शिरोमणि, आप ऊँचे-नीचे सभी जीवों की अन्तःस्थिति जानते हैं।
श्लोक 15.5
सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानसामर्थ्य वाले, माया द्वारा सृष्टि में प्रविष्ट और गुणभेद धारण करने वाले अप्रकट कारण को प्रणाम है।
श्लोक 15.6
सरल हिंदी भावार्थ: जो अनन्यभाव से सबके उद्गम, कार्यकारण के आश्रय और अपने में जगत पिरोए आपको ध्यान करते हैं—
श्लोक 15.7
सरल हिंदी भावार्थ: वे परिपक्व योगी श्वास, इन्द्रिय और मन जीतकर आपकी कृपा पाते हैं; उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता।
श्लोक 15.8
सरल हिंदी भावार्थ: जिनकी आज्ञा से सभी प्रजाएँ बँधे पशुओं की तरह नियन्त्रित होकर अपना कर्तव्य निभाती हैं, उन सृष्टिप्रमुख को प्रणाम।
श्लोक 15.9
सरल हिंदी भावार्थ: अन्धकार से हमारे कार्य रुक गए हैं; उदार कृपादृष्टि से हम संकटग्रस्तों का कल्याण कीजिए।
श्लोक 15.10
सरल हिंदी भावार्थ: दिति के गर्भ में कश्यप का तेज अग्नि की तरह बढ़कर सभी दिशाओं को अन्धकारमय कर रहा है।
श्लोक 15.11
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—देवताओं की बात सुनकर स्वयम्भू ब्रह्मा मुस्कराए और मधुर वाणी में उन्हें सन्तोष दिया।
श्लोक 15.12
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा बोले—तुमसे पहले जन्मे मेरे मानसपुत्र सनकादि इच्छा और आसक्ति से रहित होकर लोकों में विचरते हैं।
श्लोक 15.13
सरल हिंदी भावार्थ: एक बार वे निर्मल भगवान के सब लोकों से वन्दित वैकुण्ठधाम पहुँचे।
श्लोक 15.14
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ हरि की निष्काम आराधना करने वाले निवासी भगवान के समान दिव्य स्वरूप वाले होते हैं।
श्लोक 15.15
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ स्वयं आदिपुरुष भगवान अपने निर्मल सत्त्वमय स्वरूप से भक्तों को आनन्द देते हुए विराजते हैं।
श्लोक 15.16
सरल हिंदी भावार्थ: नैःश्रेयस नामक वन में सभी ऋतुओं की शोभा वाले कल्पवृक्ष हैं; वह मानो मुक्त आनन्द का साकार रूप है।
श्लोक 15.17
सरल हिंदी भावार्थ: विमानों में भक्त अपनी सहचारिणियों सहित भगवान के पवित्र चरित्र गाते हैं; फूलों की सुगन्ध भी यदि ध्यान बाँटे तो उसे बाधा मानते हैं।
श्लोक 15.18
सरल हिंदी भावार्थ: कबूतर, कोयल, सारस, चकवे, हंस, तोते और मोर आदि चुप होकर भौंरे का गान सुनते हैं, मानो हरिकथा सुन रहे हों।
श्लोक 15.19
सरल हिंदी भावार्थ: मन्दार, कुन्द, कमल, चम्पा, बकुल और पारिजात आदि फूल भी हरि के गले में तुलसी का सम्मान देखकर उसके तप को श्रेष्ठ मानते हैं।
श्लोक 15.20
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ दिव्य रत्न और स्वर्ण के विमानों में रहने वाले कृष्णमय भक्त सौन्दर्यपूर्ण सहचारिणियों के आकर्षण से भी रजोगुण में नहीं फँसते।
श्लोक 15.21
सरल हिंदी भावार्थ: जिनकी कृपा पाने के लिए अन्य लोग प्रयत्न करते हैं, वे लक्ष्मी स्वयं निर्मल भगवान के स्वर्ण-स्फटिकमय भवन में सेवा करती दिखाई देती हैं।
श्लोक 15.22
सरल हिंदी भावार्थ: अपने उपवन की निर्मल बावड़ियों पर सहेलियों सहित तुलसी से पूजा करती लक्ष्मी जल में अपना मुख देखकर प्रभु के प्रेमपूर्ण सान्निध्य का स्मरण करती हैं।
श्लोक 15.23
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की कथा छोड़ बुद्धि दूषित करने वाली व्यर्थ बातें सुनने वाले उस धाम को नहीं पाते; वे अज्ञान की असहाय दशाओं में गिरते हैं।
श्लोक 15.24
सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्यजन्म में धर्म और तत्त्वज्ञान की सम्भावना पाकर भी जो भगवान की आराधना नहीं करते, वे उनकी विस्तृत माया से मोहित हैं।
श्लोक 15.25
सरल हिंदी भावार्थ: भक्त परस्पर प्रभु का यश कहते हुए प्रेमाश्रु और रोमाञ्च से भर जाते हैं; उनका आचरण देवों और हमारे लिए भी वाञ्छनीय है।
श्लोक 15.26
सरल हिंदी भावार्थ: योगमाया के प्रभाव से उस जगद्वन्दित, दिव्य विमानों से सुशोभित वैकुण्ठ में पहुँचकर कुमारों को अनूठा परम आनन्द मिला।
श्लोक 15.27
सरल हिंदी भावार्थ: छह द्वार पार करके सातवें पर उन्होंने समान आयु के दो गदाधारी पार्षद देखे, जो मुकुट, कुण्डल और बाजूबन्द से सुशोभित थे।
श्लोक 15.28
सरल हिंदी भावार्थ: श्याम चार भुजाओं के बीच वनमाला थी; टेढ़ी भौंहों, लाल नेत्रों और तीव्र श्वास से उनके मुख पर कुछ उग्रता दिखती थी।
श्लोक 15.29
सरल हिंदी भावार्थ: समदृष्टि और निश्शङ्क होकर विचरने वाले कुमार पहले द्वारों की तरह वहाँ भी बिना पूछे भीतर जाने लगे।
श्लोक 15.30
सरल हिंदी भावार्थ: दिगम्बर, आत्मज्ञानी और देखने में पाँच वर्ष के चार कुमारों को उन द्वारपालों ने छड़ी से रोका; ऐसा अनादर योग्य नहीं था।
श्लोक 15.31
सरल हिंदी भावार्थ: अपने प्रियतम हरि के दर्शन में बाधा पड़ने पर, श्रेष्ठ कुमारों के नेत्रों में तत्काल क्रोध की झलक आ गई।
श्लोक 15.32
सरल हिंदी भावार्थ: मुनि बोले—भगवान की सेवा और इस शान्त धाम में रहकर भी तुममें भेदभाव क्यों? यहाँ तुम्हें किससे भय है?
श्लोक 15.33
सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानी भगवान और जीव में आश्रय का अभेद देखते हैं; दिव्य वेष वाले तुम दोनों ने अलगाव और संशय कहाँ से ग्रहण किया?
श्लोक 15.34
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के हित में यही उचित समझते हैं कि भेददृष्टि वाले तुम ऐसे लोक में जाओ जहाँ काम, क्रोध और लोभ रहते हैं।
श्लोक 15.35
सरल हिंदी भावार्थ: अस्त्रों से भी न टलने वाला ऋषिशाप सुनकर दोनों हरिपार्षद अत्यन्त भयभीत हुए और मुनियों के चरणों में गिर पड़े।
श्लोक 15.36
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने प्रार्थना की—दण्ड हमारे संत-अनादर का दोष मिटाए; बस पतित अवस्था में भी ऐसा मोह न आए जिससे भगवत्स्मरण छूट जाए।
श्लोक 15.37
सरल हिंदी भावार्थ: अपने सेवकों का संतों के प्रति अपराध जानकर कमलनाभ भगवान लक्ष्मी सहित स्वयं वहाँ आए।
श्लोक 15.38
सरल हिंदी भावार्थ: मुनियों ने अपने समाधि में मिलने वाले परम भाग्य को प्रत्यक्ष देखा; सेवक चँवर और श्वेत छत्र द्वारा उनकी सेवा कर रहे थे।
श्लोक 15.39
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान का प्रसन्न मुख और प्रेमदृष्टि हृदय छू रही थी; श्याम वक्ष पर लक्ष्मी उनके अद्वितीय ऐश्वर्य की शोभा बढ़ा रही थीं।
श्लोक 15.40
सरल हिंदी भावार्थ: पीताम्बर, चमकती करधनी, वनमाला और कङ्कण धारण किए प्रभु ने एक हाथ गरुड़ के कन्धे पर रखा था और दूसरे में कमल घुमा रहे थे।
श्लोक 15.41
सरल हिंदी भावार्थ: मकरकुण्डल, उन्नत नासिका, रत्नमुकुट, अमूल्य हार और कौस्तुभ से उनका दिव्य रूप अत्यन्त मनोहर था।
श्लोक 15.42
सरल हिंदी भावार्थ: लक्ष्मी के अभिमान को भी विनम्र करने वाला वह सुन्दर रूप देखकर मुनियों की आँखें तृप्त नहीं हुईं; उन्होंने प्रसन्न होकर सिर झुकाया।
श्लोक 15.43
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के चरणों से मिली तुलसी की सुगन्ध नासिका में पहुँची तो निराकार ब्रह्म में रमे कुमार भी प्रेम से रोमाञ्चित हो उठे।
श्लोक 15.44
सरल हिंदी भावार्थ: सुन्दर अधरों और कुन्दपुष्प जैसी मुस्कान वाला मुख देखकर, फिर अरुण नखमणियों वाले चरणों को निहारकर वे ध्यानमग्न हुए।
श्लोक 15.45
सरल हिंदी भावार्थ: योगियों के ध्यान का परम आश्रय, स्वाभाविक सिद्धियों से युक्त मनोहर दिव्य पुरुषरूप देखकर उन्होंने स्तुति की।
श्लोक 15.46
सरल हिंदी भावार्थ: कुमार बोले—पिता ब्रह्मा के वर्णन से आप पहले हमारे हृदय में आए; आज अन्तर्यामी होकर भी दुर्लभ आपका प्रत्यक्ष दर्शन मिला।
श्लोक 15.47
सरल हिंदी भावार्थ: आप परमात्मतत्त्व हैं और अपने निर्मल स्वरूप से हमारे भीतर प्रेम जगाते हैं; दृढ़ भक्ति और वैराग्य वाले मुनि आपको हृदय में जानते हैं।
श्लोक 15.48
सरल हिंदी भावार्थ: आपकी कथा का रस जानने वाले चरणाश्रित भक्त मोक्ष को भी बड़ा फल नहीं मानते; भययुक्त अन्य ऐश्वर्य की बात ही क्या है!
श्लोक 15.49
सरल हिंदी भावार्थ: अपने दोषों से हमें नरक भी मिले तो स्वीकार है, यदि मन आपके चरणों में रमे, वाणी तुलसी जैसी सेवा बने और कान आपका गुणगान सुनें।
श्लोक 15.50
सरल हिंदी भावार्थ: आपके प्रकट रूप से हमारी दृष्टि परम तृप्त हुई; अनात्मदृष्टि वालों को दुर्लभ किन्तु भक्तों को सुलभ भगवान को नमस्कार।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 15 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 16
भगवान की विनयलीला और पार्षदों का अवतरण
श्लोक 16.1
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा बोले—योगनिष्ठ कुमारों की स्तुति का अभिनन्दन करके वैकुण्ठनाथ भगवान ने उत्तर दिया।
श्लोक 16.2
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—ये मेरे पार्षद जय और विजय हैं; इन्होंने आपका अनादर करके मेरी आज्ञा का भी उल्लङ्घन किया है।
श्लोक 16.3
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे अनुयायी मुनियों ने इनके संत-अवमान पर जो दण्ड दिया है, उसका मैं अनुमोदन करता हूँ।
श्लोक 16.4
सरल हिंदी भावार्थ: आप मेरे लिए परम पूज्य हैं; मेरे सेवकों द्वारा आपका अपमान हुआ, इसलिए उसे अपना अपराध मानकर आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ।
श्लोक 16.5
सरल हिंदी भावार्थ: सेवक का दोष होने पर लोग स्वामी का भी नाम लेते हैं; वैसी निन्दा यश को ऐसे क्षति पहुँचाती है जैसे रोग त्वचा को।
श्लोक 16.6
सरल हिंदी भावार्थ: मेरा निर्मल यश सुनना सबको पवित्र करता है; भक्तों से ही मेरा यश फैलता है, इसलिए आपके विरोध में हो तो मैं अपनी भुजा भी त्याग दूँ।
श्लोक 16.7
सरल हिंदी भावार्थ: जिन लक्ष्मी की कृपादृष्टि के लिए लोग व्रत करते हैं, वे भी मेरी अनासक्ति के बावजूद सेवा और पवित्र चरणाश्रय के कारण मुझे नहीं छोड़तीं।
श्लोक 16.8
सरल हिंदी भावार्थ: प्रेमपूर्वक अर्पित भोजन से तृप्त संत के माध्यम से जितना आनन्द पाता हूँ, उतना केवल अग्नि में घृताहुति से नहीं।
श्लोक 16.9
सरल हिंदी भावार्थ: मैं ज्ञानी संतों की निर्मल चरणरज मुकुट पर धारण करता हूँ; जिनकी सेवा का जल लोकों को पावन करता है, उनका अनादर कौन करे?
श्लोक 16.10
सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानी जन, गौएँ और निराश्रित जीव मेरे अपने रूप हैं; क्रोध और भेदबुद्धि से उन्हें सताने वालों को कठोर कर्मफल मिलता है।
श्लोक 16.11
सरल हिंदी भावार्थ: जो मुझे स्मरण करके कटुवचन कहने वाले ज्ञानी जन से भी प्रेम, विनय और पुत्रवत् स्नेह से बोलते हैं, वे मुझे वश में कर लेते हैं।
श्लोक 16.12
सरल हिंदी भावार्थ: इन दोनों ने मेरे मन का भाव न समझकर आपका अपराध किया; ऐसी कृपा हो कि इनका निर्वासन छोटा हो और ये शीघ्र मेरे पास लौटें।
श्लोक 16.13
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा कहते हैं—क्रोध से प्रभावित मुनियों ने भगवान की सरस वाणी सुनी; उसका अमृत जितना पीते, उतनी ही तृप्ति की चाह बढ़ती थी।
श्लोक 16.14
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की सरल किन्तु गम्भीर अर्थभरी वाणी में डूबकर भी वे उनका पूरा अभिप्राय समझ नहीं सके।
श्लोक 16.15
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की योगमाया और अनुग्रह से चकित कुमार प्रसन्न, रोमाञ्चित होकर हाथ जोड़कर बोले।
श्लोक 16.16
सरल हिंदी भावार्थ: हे प्रभु, हम आपका अभिप्राय नहीं समझते; सर्वाध्यक्ष होकर भी आप कहते हैं कि हमने आपका उपकार किया।
श्लोक 16.17
सरल हिंदी भावार्थ: आप ज्ञान और संतों का आदर करते हैं, किन्तु स्वयं उन सबके परम आराध्य और अन्तरात्मा हैं।
श्लोक 16.18
सरल हिंदी भावार्थ: सनातन धर्म आपसे उत्पन्न और आपके अवतारों द्वारा रक्षित है; आप उस धर्म का निर्विकार, परम गूढ़ आश्रय हैं।
श्लोक 16.19
सरल हिंदी भावार्थ: आपकी कृपा से वैराग्यवान योगी मृत्यु पार करते हैं; ऐसे स्वामी पर दूसरा कौन अनुग्रह कर सकता है?
श्लोक 16.20
सरल हिंदी भावार्थ: धन चाहने वाले जिन लक्ष्मी की चरणरज सिर पर रखते हैं, वे आपके तुलसीसुशोभित चरणों और वनमाला के आश्रय की इच्छा करती हैं।
श्लोक 16.21
सरल हिंदी भावार्थ: आप लक्ष्मी से भी अनासक्त रहकर भक्तों के सत्सङ्ग में रमे हैं; फिर संतों की चरणरज से पवित्र होने की बात आपकी विनयलीला ही है।
श्लोक 16.22
सरल हिंदी भावार्थ: धर्मस्वरूप प्रभु, अपने धर्म के आधारों से आप चराचर जगत को धारण करते हैं; कृपामय सत्त्वरूप से विरोधी रज और तम हटाइए।
श्लोक 16.23
सरल हिंदी भावार्थ: यदि आप ज्ञानरक्षक संतपरम्परा का आदर और मधुर वाणी से संरक्षण न करें तो लोग भी उसका सम्मान छोड़ देंगे।
श्लोक 16.24
सरल हिंदी भावार्थ: शत्रुओं का नाश करके जगत का कल्याण करने वाले आप विनम्र हों तो तेज घटता नहीं; यह आपकी अपनी आनन्दलीला है।
श्लोक 16.25
सरल हिंदी भावार्थ: इन सेवकों या हमारे लिए जो दण्ड और व्यवस्था आपको उचित लगे, हम निष्कपट भाव से स्वीकार करते हैं।
श्लोक 16.26
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—ये असुरयोनि पाकर मेरे प्रति प्रबल विरोध से भी चित्त मुझमें लगाए रखेंगे और शीघ्र लौटेंगे; यह शाप मेरी लीला का निमित्त बना है।
श्लोक 16.27
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा कहते हैं—मुनियों ने नेत्रों को आनन्द देने वाले वैकुण्ठधाम और स्वयंप्रकाश भगवान के दर्शन किए।
श्लोक 16.28
सरल हिंदी भावार्थ: फिर उनकी प्रदक्षिणा, प्रणाम और आज्ञा लेकर भगवान के वैभव का गुणगान करते हुए प्रसन्नतापूर्वक लौटे।
श्लोक 16.29
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने पार्षदों से कहा—जाओ, डरो मत; कल्याण होगा। ऋषितेज मिटाने में समर्थ होकर भी मैं ऐसा नहीं चाहता।
श्लोक 16.30
सरल हिंदी भावार्थ: पूर्व में लक्ष्मी को मेरे विश्राम के समय द्वार पर रोकने पर उन्होंने भी क्रुद्ध होकर ऐसा परिणाम कहा था।
श्लोक 16.31
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे प्रति तीव्र चित्तलगाव द्वारा संत-अनादर का फल पार करके तुम थोड़े समय में फिर मेरे पास आओगे।
श्लोक 16.32
सरल हिंदी भावार्थ: द्वारपालों को आदेश देकर भगवान अपूर्व ऐश्वर्य और दिव्य विमानों से सुशोभित अपने धाम में लौट गए।
श्लोक 16.33
सरल हिंदी भावार्थ: ऋषिशाप से उन श्रेष्ठ पार्षदों का वैकुण्ठवैभव छूट गया और उनका अभिमान मिट गया।
श्लोक 16.34
सरल हिंदी भावार्थ: वैकुण्ठ से उनके नीचे आने पर विमानों में रहने वाले भक्तों में बड़ा हाहाकार हुआ।
श्लोक 16.35
सरल हिंदी भावार्थ: हे देवताओं, वे ही दोनों श्रेष्ठ पार्षद अब कश्यप के प्रबल गर्भतेज के रूप में दिति के उदर में आए हैं।
श्लोक 16.36
सरल हिंदी भावार्थ: उन जुड़वाँ असुरों के तेज ने अभी तुम्हारा तेज दबा दिया है; भगवान स्वयं इसकी उचित व्यवस्था करेंगे।
श्लोक 16.37
सरल हिंदी भावार्थ: जो जगत के आदिकारण, पालक और संहारकर्ता हैं तथा जिनकी योगमाया अजेय है, वही हमारा कल्याण करेंगे; अत्यधिक चिन्ता व्यर्थ है।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 16 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 17
हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष का जन्म
श्लोक 17.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—ब्रह्मा से यह कारण सुनकर देवताओं का भय और संशय मिट गया और वे स्वर्ग लौट गए।
श्लोक 17.2
सरल हिंदी भावार्थ: सन्तानों के अनिष्ट की आशंका रखती दिति ने सौ वर्ष पूरे होने पर दो जुड़वाँ पुत्रों को जन्म दिया।
श्लोक 17.3
सरल हिंदी भावार्थ: उनके जन्म के समय आकाश, पृथ्वी और अन्तरिक्ष में अनेक भयकारी उत्पात प्रकट हुए।
श्लोक 17.4
सरल हिंदी भावार्थ: पर्वतों सहित पृथ्वी काँपी, दिशाएँ दहकती लगीं और उल्काएँ, वज्र तथा अशुभ धूमकेतु दिखाई दिए।
श्लोक 17.5
सरल हिंदी भावार्थ: तीखी, गर्जन करती वायु चली; धूल के झण्डे उठाती आँधियाँ बड़े वृक्ष उखाड़ने लगीं।
श्लोक 17.6
सरल हिंदी भावार्थ: बिजली चमकते मेघों और घने अन्धकार से तारे छिप गए; मार्ग तक दिखाई नहीं देता था।
श्लोक 17.7
सरल हिंदी भावार्थ: समुद्र विक्षुब्ध होकर गरजने लगा; नदियाँ और जलाशय हिल उठे तथा कमल मुरझाने लगे।
श्लोक 17.8
सरल हिंदी भावार्थ: सूर्य-चन्द्र के चारों ओर वलय और ग्रहण जैसे संकेत हुए; पर्वतगुहाओं से वज्र और रथ जैसी ध्वनियाँ आईं।
श्लोक 17.9
सरल हिंदी भावार्थ: गाँवों में सियारियाँ मुख से अग्नि निकलती जैसी दिखाई देतीं और सियार-उल्लुओं के साथ अमङ्गल स्वर करती थीं।
श्लोक 17.10
सरल हिंदी भावार्थ: कुत्ते गर्दन उठाकर कहीं गाने और कहीं रोने जैसे अनेक प्रकार के स्वर करने लगे।
श्लोक 17.11
सरल हिंदी भावार्थ: गधे झुण्डों में उन्मत्त होकर दौड़ते, कठोर खुरों से धरती पीटते और तीखा रेंकते थे।
श्लोक 17.12
सरल हिंदी भावार्थ: गधों की आवाज से भयभीत पक्षी घोंसलों से उड़ गए; गाँव और वन के पशु भय से मल-मूत्र त्यागने लगे।
श्लोक 17.13
सरल हिंदी भावार्थ: कथा में गौओं से रक्तमिश्रित दुग्ध, दूषित वर्षा, प्रतिमाओं का रोना और बिना हवा वृक्षों का गिरना जैसे उत्पात वर्णित हैं।
श्लोक 17.14
सरल हिंदी भावार्थ: अशुभ ग्रह अत्यन्त चमककर शुभ ग्रहों और नक्षत्रों को पार करते तथा वक्रगति में परस्पर संघर्ष जैसे दिखाई दिए।
श्लोक 17.15
सरल हिंदी भावार्थ: कारण न जानने वाली प्रजा इन उत्पातों से प्रलय समझकर डर गई; केवल ब्रह्मा के पुत्र वास्तविक रहस्य जानते थे।
श्लोक 17.16
सरल हिंदी भावार्थ: दोनों आदिदैत्य अपना पराक्रम प्रकट करते हुए शीघ्र ही कठोर शरीर वाले विशाल पर्वतों जैसे बढ़ गए।
श्लोक 17.17
सरल हिंदी भावार्थ: उनके स्वर्णमुकुट मानो आकाश छूते, भुजाएँ दिशाएँ घेरतीं और हर कदम धरती काँपती थी; उनका तेज प्रबल था।
श्लोक 17.18
सरल हिंदी भावार्थ: कश्यप ने दोनों के नाम हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष रखे; हिरण्यकशिपु को गर्भक्रम से ज्येष्ठ कहा गया।
श्लोक 17.19
सरल हिंदी भावार्थ: हिरण्यकशिपु ने अपने बाहुबल और ब्रह्मा के वरदान से निर्भय-अहंकारी होकर लोकपालों सहित तीनों लोक वश में कर लिए।
श्लोक 17.20
सरल हिंदी भावार्थ: उसका प्रिय छोटा भाई हिरण्याक्ष गदा लेकर युद्ध की खोज में स्वर्ग जा पहुँचा।
श्लोक 17.21
सरल हिंदी भावार्थ: उसके वेग को सहना कठिन था; स्वर्णनूपुर बजते, वैजयन्ती माला शोभती और कन्धे पर विशाल गदा थी।
श्लोक 17.22
सरल हिंदी भावार्थ: बल, साहस और वरदान के मद से उन्मत्त उस निरङ्कुश दैत्य को देखकर देव गरुड़ से डरे सर्पों की तरह छिप गए।
श्लोक 17.23
सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्र सहित देवों को अपने तेज से छिपा हुआ पाकर हिरण्याक्ष जोर-जोर से गर्जना करने लगा।
श्लोक 17.24
सरल हिंदी भावार्थ: वह वहाँ से लौटकर उन्मत्त हाथी की तरह खेलता हुआ गम्भीर और गर्जनशील समुद्र में उतर गया।
श्लोक 17.25
सरल हिंदी भावार्थ: उसके समुद्र में घुसते ही वरुण के सैनिक जलचर भयभीत हो गए; बिना प्रहार के ही उसके तेज से दूर भागे।
श्लोक 17.26
सरल हिंदी भावार्थ: वर्षों तक समुद्र में घूमते और तरङ्गों को गदा से पीटते हुए वह वरुण की विभावरी नगरी पहुँचा।
श्लोक 17.27
सरल हिंदी भावार्थ: जलचरों के अधिपति वरुण के सामने उपहासपूर्ण विनय से झुककर बोला—हे अधिराज, मुझे युद्ध दीजिए।
श्लोक 17.28
सरल हिंदी भावार्थ: आप प्रसिद्ध लोकपाल हैं, अभिमानी वीरों का मद तोड़ते हैं और दैत्य-दानवों को जीतकर राजसूय कर चुके हैं।
श्लोक 17.29
सरल हिंदी भावार्थ: उसके उपहास से क्रोध आने पर भी वरुण ने विवेक से उसे शान्त किया और कहा—हम अब युद्ध से विरत हो चुके हैं।
श्लोक 17.30
सरल हिंदी भावार्थ: तुम जैसे युद्धकुशल का सामना करने योग्य पुरातन पुरुष भगवान के अतिरिक्त कोई नहीं दिखता; उन्हीं के पास जाओ।
श्लोक 17.31
सरल हिंदी भावार्थ: उनके पास पहुँचकर तुम्हारा अभिमान मिटेगा और तुम रणभूमि में गिरोगे; वे संतों की रक्षा और दुष्टों की शान्ति के लिए रूप धारण करते हैं।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 17 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 18
वराहभगवान और हिरण्याक्ष का युद्ध
श्लोक 18.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—वरुण की चेतावनी को तुच्छ मानकर हिरण्याक्ष ने नारद से भगवान का स्थान जाना और शीघ्र रसातल पहुँचा।
श्लोक 18.2
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ उसने लाल नेत्रों की दीप्ति वाले वराहभगवान को दाँत पर पृथ्वी उठाते देखा और हँसकर कहा—यह वन का पशु है!
श्लोक 18.3
सरल हिंदी भावार्थ: उसने अपमानपूर्वक कहा—पृथ्वी छोड़ दो; यह रसातलवासियों को सौंपी गई है। मेरे सामने इसे ले जाकर कुशल से नहीं लौटोगे।
श्लोक 18.4
सरल हिंदी भावार्थ: क्या हमारे शत्रुओं ने तुम्हें असुरों को छल से मारने के लिए रखा है? मैं तुम्हें समाप्त कर अपने स्वजनों का शोक मिटाऊँगा।
श्लोक 18.5
सरल हिंदी भावार्थ: मेरी गदा से तुम्हारा सिर चूर होने पर तुम्हारे आश्रित देव और ऋषि भी आधारहीन होकर नष्ट हो जाएँगे।
श्लोक 18.6
सरल हिंदी भावार्थ: शत्रु के कटुवचन सहते हुए भगवान भयभीत पृथ्वी की रक्षा के लिए जल से बाहर आए, जैसे हथिनी को बचाता हाथी।
श्लोक 18.7
सरल हिंदी भावार्थ: हिरण्याक्ष पीछे दौड़ा और गरजकर फिर अपमान करने लगा; निर्लज्ज दुष्ट के लिए कौन-सी निन्दित बात कठिन होती है?
श्लोक 18.8
सरल हिंदी भावार्थ: शत्रु के सामने ही प्रभु ने पृथ्वी को जल के ऊपर स्थिर करके उसमें धारणशक्ति स्थापित की; ब्रह्मा ने स्तुति और देवों ने पुष्पवृष्टि की।
श्लोक 18.9
सरल हिंदी भावार्थ: स्वर्णालङ्कृत कवच और विशाल गदा वाले दैत्य के तीखे अपशब्द सुनकर भगवान धर्मरक्षक क्रोध सहित हँसते हुए बोले।
श्लोक 18.10
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—हाँ, हम वनचारी हैं और तुम जैसे उद्दण्डों को खोजते हैं; मृत्यु के फन्दे में पड़े तुम्हारे घमण्ड को वीर महत्व नहीं देते।
श्लोक 18.11
सरल हिंदी भावार्थ: मान लिया हम रसातल की धरोहर लेने वाले और तुम्हारी गदा से डराए गए हैं; फिर भी रण में खड़े हैं, अब कहाँ जाएँ?
श्लोक 18.12
सरल हिंदी भावार्थ: तुम पैदल योद्धाओं के बड़े सेनापति हो, इसलिए अपना पराक्रम दिखाओ; अपनी प्रतिज्ञा पूरी करके स्वजनों के आँसू पोंछो।
श्लोक 18.13
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—भगवान के परिहास से वह दैत्य छेड़े हुए बड़े सर्प की तरह अत्यन्त क्रुद्ध हो गया।
श्लोक 18.14
सरल हिंदी भावार्थ: क्रोध से काँपते और फुफकारते हुए उसने तेजी से पास आकर हरि पर गदा चलाई।
श्लोक 18.15
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने शरीर तिरछा करके वक्ष पर आता प्रहार बचाया, जैसे सिद्ध योगी मृत्यु के आक्रमण को पार कर ले।
श्लोक 18.16
सरल हिंदी भावार्थ: दैत्य फिर गदा घुमाने लगा; हरि उसके सामने बढ़े, जबकि वह क्रोध से अपना अधर काट रहा था।
श्लोक 18.17
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने उसकी दाहिनी भौंह की ओर गदा चलाई; युद्धकुशल दैत्य ने अपनी गदा से उसे रोक लिया।
श्लोक 18.18
सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार हरि और हिरण्याक्ष जीतने की इच्छा से भारी गदाओं द्वारा एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे।
श्लोक 18.19
सरल हिंदी भावार्थ: तीखे प्रहारों से दोनों के अंगों पर घाव हुए; क्रोध और विविध रणचालों से उनका युद्ध दो प्रबल साँड़ों के संघर्ष जैसा शोभित हुआ।
श्लोक 18.20
सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञाङ्गों वाले वराहभगवान और दैत्य का पृथ्वी के लिए युद्ध देखने ब्रह्मा ऋषियों सहित वहाँ आए।
श्लोक 18.21
सरल हिंदी भावार्थ: दैत्य को निर्भय, रणकुशल और प्रबल प्रत्युत्तर देता देखकर ब्रह्मा ने आदिवराह नारायण से निवेदन किया।
श्लोक 18.22
सरल हिंदी भावार्थ: हे देव, आपके चरणाश्रित देवों, ब्राह्मणों, गौओं और निर्दोष जीवों के विरुद्ध यह अत्याचार करता है।
श्लोक 18.23
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे वरदान से उन्मत्त यह असुर लोकों का कण्टक बनकर अपने योग्य प्रतिद्वन्द्वी खोजता फिरता है।
श्लोक 18.24
सरल हिंदी भावार्थ: इस मायावी, घमण्डी और निरङ्कुश दुष्ट से बालक की तरह अधिक खेल मत कीजिए; यह उठे हुए विषधर जैसा है।
श्लोक 18.25
सरल हिंदी भावार्थ: इसकी बलवृद्धि का अनुकूल समय आने से पहले अपनी शक्ति से इस पापकारी का अन्त कीजिए।
श्लोक 18.26
सरल हिंदी भावार्थ: भयकारी सन्ध्या निकट आ रही है; हे सर्वात्मन्, देवों को विजय प्रदान कीजिए।
श्लोक 18.27
सरल हिंदी भावार्थ: अभिजित् नामक शुभ मुहूर्त का योग आया है; हम शुभचिन्तकों के कल्याण के लिए इस कठिन संकट को शीघ्र दूर कीजिए।
श्लोक 18.28
सरल हिंदी भावार्थ: सौभाग्य से यह स्वयं आपके पास आया है, जो इसकी नियत मृत्यु हैं; इसे परास्त करके लोकों को शान्ति दीजिए।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 18 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 19
हिरण्याक्षवध और देवताओं की स्तुति
श्लोक 19.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—ब्रह्मा की निष्कपट अमृतमयी वाणी सुनकर भगवान ने प्रेमपूर्ण दृष्टि और मुस्कान से उसका अनुमोदन किया।
श्लोक 19.2
सरल हिंदी भावार्थ: फिर सामने निर्भय घूमते दैत्य की ठोड़ी की ओर भगवान ने उछलकर गदा का प्रहार किया।
श्लोक 19.3
सरल हिंदी भावार्थ: दैत्य की गदा के आघात से भगवान की गदा घूमती हुई हाथ से नीचे गिर गई; यह अद्भुत दृश्य था।
श्लोक 19.4
सरल हिंदी भावार्थ: अवसर पाकर भी दैत्य ने निहत्थे भगवान पर वार नहीं किया; इस रणमर्यादा से उसने हरि के पराक्रम को और उकसाया।
श्लोक 19.5
सरल हिंदी भावार्थ: गदा गिरते ही देवों में हाहाकार हुआ; भगवान ने शत्रु की युद्धमर्यादा का सम्मान करके सुदर्शनचक्र का स्मरण किया।
श्लोक 19.6
सरल हिंदी भावार्थ: अपने ही प्रमुख पार्षद के दैत्यरूप से युद्ध करते चक्रधारी प्रभु को देखकर रहस्य न जानने वाले देव बोले—आपकी जय हो, इसे मारिए।
श्लोक 19.7
सरल हिंदी भावार्थ: कमलनयन भगवान को चक्र सहित सामने देखकर दैत्य की इन्द्रियाँ क्रोध से भर गईं; वह अधर काटकर फुफकारने लगा।
श्लोक 19.8
सरल हिंदी भावार्थ: विकराल दाँत और जलती-सी दृष्टि से उछलकर उसने गदा चलाई और कहा—अब तुम मारे गए!
श्लोक 19.9
सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञवराह भगवान ने शत्रु के देखते-देखते वेगवान गदा को अपने बाएँ चरण से सहज ही दूर कर दिया।
श्लोक 19.10
सरल हिंदी भावार्थ: प्रभु ने कहा—हथियार उठाओ और जीतना चाहते हो तो पूरा प्रयत्न करो। यह सुनकर दैत्य ने गर्जना करके फिर प्रहार किया।
श्लोक 19.11
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने स्थिर रहकर आती गदा वैसे पकड़ ली जैसे गरुड़ सर्प को पकड़ लेते हैं।
श्लोक 19.12
सरल हिंदी भावार्थ: पराक्रम निष्फल होने से उसका अभिमान और तेज घट गया; भगवान के लौटाने पर भी उसने गदा नहीं ली।
श्लोक 19.13
सरल हिंदी भावार्थ: उसने धधकती अग्नि जैसा तीन नोकों वाला शूल उठाया और यज्ञवराह पर वैरभाव से चलाया।
श्लोक 19.14
सरल हिंदी भावार्थ: आकाश में दीप्तिमान उस प्रबल शूल को भगवान ने तीखी धार वाले चक्र से काट दिया।
श्लोक 19.15
सरल हिंदी भावार्थ: शूल टूटने पर दैत्य क्रोध से पास आया, भगवान के विशाल वक्ष पर कठोर मुक्का मारा और अदृश्य हो गया।
श्लोक 19.16
सरल हिंदी भावार्थ: उस प्रहार से आदिवराह भगवान जरा भी नहीं हिले, जैसे फूलों की माला से मारा हाथी विचलित नहीं होता।
श्लोक 19.17
सरल हिंदी भावार्थ: फिर उसने योगमाया के स्वामी हरि के सामने अनेक आसुरी मायाएँ रचीं; उन्हें देखकर प्रजा प्रलय का भय मानने लगी।
श्लोक 19.18
सरल हिंदी भावार्थ: प्रचण्ड आँधियों ने धूल का अन्धकार फैलाया और दिशाओं से मानो प्रक्षेपास्त्रों द्वारा फेंके पत्थर बरसने लगे।
श्लोक 19.19
सरल हिंदी भावार्थ: बिजली और गर्जन वाले घने मेघों ने आकाश ढक दिया; मायारूप से रक्त, अस्थि और दूषित पदार्थों की वर्षा दिखाई दी।
श्लोक 19.20
सरल हिंदी भावार्थ: अनेक आयुध छोड़ते पर्वत और खुले केशों वाली शूलधारिणी राक्षसियाँ दिखाई देने लगीं।
श्लोक 19.21
सरल हिंदी भावार्थ: पैदल, घोड़े, रथ और हाथियों सहित यक्ष-राक्षसों की मायावी सेनाएँ हिंसक ध्वनियाँ करने लगीं।
श्लोक 19.22
सरल हिंदी भावार्थ: इन आसुरी मायाओं को नष्ट करने के लिए भगवान ने अपना प्रिय सुदर्शन अस्त्र चलाया।
श्लोक 19.23
सरल हिंदी भावार्थ: उसी समय दिति को पति की भविष्यवाणी याद आई; उनका हृदय काँप उठा और स्तनों से रक्त बहने लगा।
श्लोक 19.24
सरल हिंदी भावार्थ: मायाएँ नष्ट होने पर हिरण्याक्ष फिर भगवान को बाँहों में जकड़ने दौड़ा, किन्तु उन्हें अपने घेरे के बाहर ही पाया।
श्लोक 19.25
सरल हिंदी भावार्थ: वह वज्र जैसे मुक्कों से प्रहार करने लगा; भगवान ने उसके कान के मूल पर हाथ से चोट की।
श्लोक 19.26
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के उस सहज आघात से उसके अंग चक्कर खाकर ढीले पड़े और वह आँधी से उखड़े विशाल वृक्ष की तरह गिर गया।
श्लोक 19.27
सरल हिंदी भावार्थ: धरती पर पड़े उस विकराल और तेजस्वी दैत्य को देखकर ब्रह्मा आदि बोले—ऐसा अन्त किसे सुलभ होता है!
श्लोक 19.28
सरल हिंदी भावार्थ: जिन्हें योगी बन्धनमुक्ति के लिए एकान्त समाधि में ध्यान करते हैं, उन्हीं भगवान का मुख देखते हुए इस दैत्य ने शरीर छोड़ा।
श्लोक 19.29
सरल हिंदी भावार्थ: ये दोनों उन्हीं के पार्षद हैं, जो शाप से असुरयोनि में आए; कुछ जन्मों के बाद अपने धाम लौट जाएँगे।
श्लोक 19.30
सरल हिंदी भावार्थ: देव बोले—समस्त यज्ञों के आधार और पालन हेतु निर्मल सत्त्वरूप लेने वाले प्रभु को प्रणाम; जगतपीड़क असुर मरा और हम आपकी भक्ति से शान्त हुए।
श्लोक 19.31
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—हिरण्याक्ष का अन्त करके, ब्रह्मा आदि की स्तुति स्वीकार कर आदिवराह हरि अपने निरन्तर उत्सवमय धाम लौट गए।
श्लोक 19.32
सरल हिंदी भावार्थ: हे मित्र, मैंने सुनी हुई परम्परा के अनुसार बताया कि भगवान ने अवतार लेकर प्रबल हिरण्याक्ष को खेल की तरह कैसे परास्त किया।
श्लोक 19.33
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—मैत्रेय से यह भगवत्कथा सुनकर महाभागवत विदुर ने परम आनन्द पाया।
श्लोक 19.34
सरल हिंदी भावार्थ: महान संतों का यश सुनकर ही आनन्द मिलता है; फिर श्रीवत्सचिह्नधारी स्वयं भगवान की कथा का क्या कहना!
श्लोक 19.35
सरल हिंदी भावार्थ: गजेन्द्र ने मगर के संकट में चरणकमल का ध्यान किया तो भगवान ने विलाप करती हथिनियों के बीच उसे तुरन्त छुड़ाया था।
श्लोक 19.36
सरल हिंदी भावार्थ: सरल और अनन्यशरण भक्तों से सहज प्रसन्न होने वाले, किन्तु दुष्टों को दुर्लभ उन कृतज्ञ प्रभु की सेवा कौन नहीं करेगा?
श्लोक 19.37
सरल हिंदी भावार्थ: कथा की फलश्रुति कहती है कि वराहभगवान की इस अद्भुत लीला का श्रद्धापूर्वक श्रवण, गान और अनुमोदन महापापों से भी शुद्ध करता है।
श्लोक 19.38
सरल हिंदी भावार्थ: यह कथा पुण्य, पवित्रता, यश, शुभ जीवन और साहस का आश्रय कही गई है; श्रद्धालु श्रोता का अन्तिम आश्रय नारायण होते हैं।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 19 समाप्त ॥
इस भाग का भक्ति-सन्देश
विशाल कालचक्र के बीच भगवान की शरण, संतों का सम्मान और संयम मनुष्य को सही दिशा देते हैं। वराहावतार रक्षा और धर्मस्थापना की कथा है। जय-विजय का प्रसंग अहंकार से बचने और भूल होने पर विनम्रता अपनाने की शिक्षा देता है।
पाठाधार और संपादकीय जानकारी
प्राचीन मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents का “श्रीमद्भागवतम्—तृतीयस्कन्धः” है। अध्याय 11–19 में क्रमशः 41, 56, 50, 50, 50, 37, 31, 28 और 38 श्लोक हैं; कुल 381। कोष्ठकों में दिए गए अतिरिक्त वैकल्पिक पद मुख्य क्रम में नहीं मिलाए गए हैं। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना की स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है, किसी आधुनिक टीका की प्रतिलिपि नहीं। काल, लोक और उत्पातों का वर्णन पुराणपरम्परा के अनुसार है। अध्याय 11 के युगों की कुल गणना आगे दिए संख्याविभाग के अनुसार 12,000 दिव्य वर्ष है। अध्याय 13 में संक्षेप से कहा गया हिरण्याक्षवध अध्याय 18–19 में विस्तार पाता है।
॥ तृतीय स्कन्ध • भाग २ समाप्त ॥
॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
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