श्रीमद्भागवत महापुराण तृतीय स्कन्ध भाग 2 — अध्याय 11–19, वराहावतार और जय-विजय कथा

भक्ति भावना • पुराण साहित्य

श्रीमद्भागवत महापुराण

तृतीय स्कन्ध • भाग २ • अध्याय ११–१९

३८१ मूल श्लोक • प्रत्येक श्लोक का सरल हिंदी भावार्थ

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काल की विराटता, भगवान की करुणा और पृथ्वी का उद्धार

इस भाग में सूक्ष्म कालगणना से कल्प तक का विस्तार, ब्रह्माजी की सृष्टि और मनु का प्राकट्य आता है। फिर वराहभगवान का पृथ्वी उद्धार, दिति–कश्यप संवाद, जय-विजय की कथा और हिरण्याक्षवध वर्णित हैं।

यहाँ अध्याय 11–19 के सभी 381 श्लोक क्रम से हैं। प्रत्येक का सरल हिंदी भावार्थ इस प्रकाशन के लिए स्वतंत्र रूप से लिखा गया है। शेष अध्याय आगे के भाग में आएँगे।

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 11

सूक्ष्म काल से कल्प और ब्रह्मा की आयु तक

श्लोक 11.1

मैत्रेय उवाच । चरमः सद्विशेषाणामनेकोऽसंयुतः सदा । परमाणुः स विज्ञेयो नृणामैक्यभ्रमो यतः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—दृश्य पदार्थ का अविभाजित, असंयुक्त सूक्ष्मतम अंश परमाणु कहलाता है; ऐसे अनेक अंश मिलकर एक वस्तु का अनुभव कराते हैं।

श्लोक 11.2

सत एव पदार्थस्य स्वरूपावस्थितस्य यत् । कैवल्यं परममहानविशेषो निरन्तरः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: समस्त कार्यभेद अप्रकट होने पर पदार्थ की अविभक्त, अखण्ड कारणावस्था को परममहान कहा जाता है।

श्लोक 11.3

एवं कालोऽप्यनुमितः सौक्ष्म्ये स्थौल्ये च सत्तम । संस्थानभुक्त्या भगवानव्यक्तो व्यक्तभुग्विभुः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अप्रकट काल को भी सूक्ष्म और स्थूल पदार्थों में होने वाली गति तथा परिवर्तन से समझा जाता है।

श्लोक 11.4

स कालः परमाणुर्वै यो भुङ्क्ते परमाणुताम् । सतोऽविशेषभुग्यस्तु स कालः परमो महान् ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक परमाणु का अतिक्रमण करने जितना काल परमाणुकाल है और सम्पूर्ण विस्तार व्यापने वाला काल परममहान है।

श्लोक 11.5

अणुर्द्वौ परमाणू स्यात्त्रसरेणुस्त्रयः स्मृतः । जालार्करश्म्यवगतः खमेवानुपतन्नगात् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: दो परमाणुओं का एक अणु और तीन अणुओं का त्रसरेणु कहा गया है; धूप की किरणों में उड़ते सूक्ष्म कण इसके उदाहरण हैं।

श्लोक 11.6

त्रसरेणुत्रिकं भुङ्क्ते यः कालः स त्रुटिः स्मृतः । शतभागस्तु वेधः स्यात्तैस्त्रिभिस्तु लवः स्मृतः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: तीन त्रसरेणुओं को पार करने का समय त्रुटि, सौ त्रुटियों का वेध और तीन वेधों का लव कहा गया है।

श्लोक 11.7

निमेषस्त्रिलवो ज्ञेय आम्नातस्ते त्रयः क्षणः । क्षणान् पञ्च विदुः काष्ठां लघु ता दश पञ्च च ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: तीन लव का निमेष, तीन निमेष का क्षण, पाँच क्षण की काष्ठा और पन्द्रह काष्ठाओं का लघु होता है।

श्लोक 11.8

लघूनि वै समाम्नाता दश पञ्च च नाडिका । ते द्वे मुहूर्तः प्रहरः षड्यामः सप्त वा नृणाम् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: पन्द्रह लघु की नाडिका, दो नाडिका का मुहूर्त और दिन-रात के अनुसार छह या सात नाडिकाओं का प्रहर होता है।

श्लोक 11.9

द्वादशार्धपलोन्मानं चतुर्भिश्चतुरङ्गुलैः । स्वर्णमाषैः कृतच्छिद्रं यावत्प्रस्थजलप्लुतम् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: निश्चित भार के ताँबे के पात्र में नियत आकार की स्वर्णशलाका से छिद्र करके जल में डुबोया जाता है; उसके भरने का समय नाडिका है।

श्लोक 11.10

यामाश्चत्वारश्चत्वारो मर्त्यानामहनी उभे । पक्षः पञ्चदशाहानि शुक्लः कृष्णश्च मानद ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्यों के दिन और रात में चार-चार प्रहर तथा पन्द्रह दिनों का एक शुक्ल या कृष्ण पक्ष होता है।

श्लोक 11.11

तयोः समुच्चयो मासः पितॄणां तदहर्निशम् । द्वौ तावृतुः षडयनं दक्षिणं चोत्तरं दिवि ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: दो पक्षों का महीना पितरों का एक दिन-रात है; दो महीनों की ऋतु और छह महीनों का उत्तरायण या दक्षिणायन होता है।

श्लोक 11.12

अयने चाहनी प्राहुर्वत्सरो द्वादश स्मृतः । संवत्सरशतं नॄणां परमायुर्निरूपितम् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: दोनों अयन देवों का दिन-रात और बारह महीने एक वर्ष हैं; मनुष्य की सामान्य पूर्ण आयु सौ वर्ष कही गई है।

श्लोक 11.13

ग्रहर्क्षतारा चक्रस्थः परमाण्वादिना जगत् । संवत्सरावसानेन पर्येत्यनिमिषो विभुः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: ग्रह, नक्षत्र और तारामण्डल में गतिशील सूर्य परमाणु से संवत्सर तक के कालविभागों को प्रकट करता है।

श्लोक 11.14

संवत्सरः परिवत्सर इडावत्सर एव च । अनुवत्सरो वत्सरश्च विदुरैवं प्रभाष्यते ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वर्षगणना के पाँच नाम संवत्सर, परिवत्सर, इडावत्सर, अनुवत्सर और वत्सर बताए जाते हैं।

श्लोक 11.15

यः सृज्यशक्तिमुरुधोच्छ्वसयन् स्वशक्त्या पुंसोऽभ्रमाय दिवि धावति भूतभेदः । कालाख्यया गुणमयं क्रतुभिर्वितन्वन् तस्मै बलिं हरत वत्सरपञ्चकाय ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूर्यरूप कालशक्ति सृजनसामर्थ्य जगाती और यज्ञ-ऋतु का क्रम चलाती है; उस पंचवर्षात्मक व्यवस्था के अधिष्ठाता की आराधना करो।

श्लोक 11.16

विदुर उवाच । पितृदेवमनुष्याणामायुः परमिदं स्मृतम् । परेषां गतिमाचक्ष्व ये स्युः कल्पाद्बहिर्विदः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर ने पूछा—पितर, देव और मनुष्यों की गणना समझी; अब कल्प से भी दीर्घ आयु वाले लोकों का काल बताइए।

श्लोक 11.17

भगवान् वेद कालस्य गतिं भगवतो ननु । विश्वं विचक्षते धीरा योगराद्धेन चक्षुषा ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप योगदृष्टि से विश्व को जानने वाले विवेकी हैं, अतः भगवान की कालशक्ति का क्रम समझा सकते हैं।

श्लोक 11.18

मैत्रेय उवाच । कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चेति चतुर्युगम् । दिव्यैर्द्वादशभिर्वर्षैः सावधानं निरूपितम् ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि मिलकर चतुर्युग बनाते हैं; सन्ध्या-सन्ध्यांश सहित इसकी गणना बारह हजार दिव्य वर्षों की है।

श्लोक 11.19

चत्वारि त्रीणि द्वे चैकं कृतादिषु यथाक्रमम् । सङ्ख्यातानि सहस्राणि द्विगुणानि शतानि च ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: चार युगों के मुख्य काल क्रमशः चार, तीन, दो और एक हजार दिव्य वर्ष हैं; उनके आरम्भ-अन्त में क्रमशः चार, तीन, दो और एक सौ वर्ष जुड़ते हैं।

श्लोक 11.20

सन्ध्यांशयोरन्तरेण यः कालः शतसङ्ख्ययोः । तमेवाहुर्युगं तज्ज्ञा यत्र धर्मो विधीयते ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुख्य युग अपने आरम्भ और अन्त के सन्धिकालों के बीच होता है; उसी में उस युग का धर्मक्रम चलता है।

श्लोक 11.21

धर्मश्चतुष्पान्मनुजान् कृते समनुवर्तते । स एवान्येष्वधर्मेण व्येति पादेन वर्धता ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: सत्ययुग में धर्म चार चरणों पर रहता है; अगले युगों में अधर्म बढ़ने से क्रमशः उसका एक-एक चरण घटता है।

श्लोक 11.22

त्रिलोक्या युगसाहस्रं बहिराब्रह्मणो दिनम् । तावत्येव निशा तात यन्निमीलति विश्वसृक् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक हजार चतुर्युग ब्रह्मा का दिन है और उतनी ही उनकी रात, जिसमें सृष्टिकर्ता प्रकट रचना को समेट लेते हैं।

श्लोक 11.23

निशावसान आरब्धो लोककल्पोऽनुवर्तते । यावद्दिनं भगवतो मनून् भुञ्जंश्चतुर्दश ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: रात समाप्त होने पर लोकसृष्टि फिर चलती है; ब्रह्मा के एक दिन में चौदह मनुओं के काल आते हैं।

श्लोक 11.24

स्वं स्वं कालं मनुर्भुङ्क्ते साधिकां ह्येकसप्ततिम् । मन्वन्तरेषु मनवस्तद्वंश्या ऋषयः सुराः । भवन्ति चैव युगपत्सुरेशाश्चानु ये च तान् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रत्येक मनु का काल लगभग इकहत्तर चतुर्युग से कुछ अधिक है; उसी क्रम में मनु, वंशज, ऋषि, देव और इन्द्र प्रकट होते हैं।

श्लोक 11.25

एष दैनन्दिनः सर्गो ब्राह्मस्त्रैलोक्यवर्तनः । तिर्यङ्नृपितृदेवानां सम्भवो यत्र कर्मभिः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा की यह दैनिक सृष्टि त्रिलोक की व्यवस्था चलाती है, जिसमें जीव अपने कर्मों के अनुसार विभिन्न योनियाँ पाते हैं।

श्लोक 11.26

मन्वन्तरेषु भगवान् बिभ्रत्सत्त्वं स्वमूर्तिभिः । मन्वादिभिरिदं विश्वमवत्युदितपौरुषः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: हर मन्वन्तर में भगवान सत्त्वमय रूपों, मनु आदि के माध्यम से अपना पराक्रम प्रकट कर विश्व की रक्षा करते हैं।

श्लोक 11.27

तमोमात्रामुपादाय प्रतिसंरुद्धविक्रमः । कालेनानुगताशेष आस्ते तूष्णीं दिनात्यये ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: दिन के अन्त में कालप्रभाव से सृजनक्रिया रुकती है और तमोगुणप्रधान विश्रामावस्था आती है।

श्लोक 11.28

तमेवान्वपिधीयन्ते लोका भूरादयस्त्रयः । निशायामनुवृत्तायां निर्मुक्तशशिभास्करम् ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस रात्रि में भूः, भुवः और स्वः लोक अप्रकट हो जाते हैं; सूर्य-चन्द्र का प्रकाश भी वहाँ नहीं रहता।

श्लोक 11.29

त्रिलोक्यां दह्यमानायां शक्त्या सङ्कर्षणाग्निना । यान्त्यूष्मणा महर्लोकाज्जनं भृग्वादयोऽर्दिताः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सङ्कर्षण की अग्नि से त्रिलोक तपने पर भृगु आदि महर्लोकवासी उष्णता से बचकर जनलोक चले जाते हैं।

श्लोक 11.30

तावत्त्रिभुवनं सद्यः कल्पान्तैधितसिन्धवः । प्लावयन्त्युत्कटाटोपचण्डवातेरितोर्मयः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रलयकालीन प्रबल वायु से उठी समुद्र की विशाल तरङ्गें तीनों लोकों को जल में डुबो देती हैं।

श्लोक 11.31

अन्तः स तस्मिन् सलिल आस्तेऽनन्तासनो हरिः । योगनिद्रानिमीलाक्षः स्तूयमानो जनालयैः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस जल के भीतर हरि अनन्तशय्या पर योगनिद्रा में स्थित रहते हैं और जनलोक के मुनि उनकी स्तुति करते हैं।

श्लोक 11.32

एवं विधैरहोरात्रैः कालगत्योपलक्षितैः । अपक्षितमिवास्यापि परमायुर्वयः शतम् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसे दिन-रातों की गणना से ब्रह्मा की आयु भी अपने सौ वर्षों तक सीमित कही गई है।

श्लोक 11.33

यदर्धमायुषस्तस्य परार्धमभिधीयते । पूर्वः परार्धोऽपक्रान्तो ह्यपरोऽद्य प्रवर्तते ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा की आधी आयु परार्ध कहलाती है; पहला परार्ध बीत चुका और वर्तमान में दूसरा चल रहा है।

श्लोक 11.34

पूर्वस्यादौ परार्धस्य ब्राह्मो नाम महानभूत् । कल्पो यत्राभवद्ब्रह्मा शब्दब्रह्मेति यं विदुः ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रथम परार्ध के आरम्भ में ब्राह्म नामक महान कल्प था, जिसमें वेदमय ब्रह्मा का प्राकट्य हुआ।

श्लोक 11.35

तस्यैव चान्ते कल्पोऽभूद्यं पाद्ममभिचक्षते । यद्धरेर्नाभिसरस आसील्लोकसरोरुहम् ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसी परार्ध के अन्त का कल्प पाद्म कहा गया, जब हरि के नाभिसरोवर से लोककमल प्रकट हुआ।

श्लोक 11.36

अयं तु कथितः कल्पो द्वितीयस्यापि भारत । वाराह इति विख्यातो यत्रासीत्सूकरो हरिः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: दूसरे परार्ध का वर्तमान कल्प वाराह नाम से प्रसिद्ध है, जिसमें भगवान ने वराहरूप धारण किया।

श्लोक 11.37

कालोऽयं द्विपरार्धाख्यो निमेष उपचर्यते । अव्याकृतस्यानन्तस्य अनादेर्जगदात्मनः ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: दो परार्धों का इतना विशाल काल भी अनादि, अनन्त और अव्यक्त परमात्मा के लिए निमेष के समान कहा जाता है।

श्लोक 11.38

कालोऽयं परमाण्वादिर्द्विपरार्धान्त ईश्वरः । नैवेशितुं प्रभुर्भूम्न ईश्वरो धाममानिनाम् ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: परमाणु से द्विपरार्ध तक का काल देहाभिमानी जीवों पर शासन करता है, किन्तु अनन्त भगवान पर उसका अधिकार नहीं।

श्लोक 11.39

विकारैः सहितो युक्तैर्विशेषादिभिरावृतः । आण्डकोशो बहिरयं पञ्चाशत्कोटि विस्तृतः ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: तत्त्वों और उनके आवरणों सहित ब्रह्माण्ड का बाहरी विस्तार पुराणगणना में पचास करोड़ योजन बताया गया है।

श्लोक 11.40

दशोत्तराधिकैर्यत्र प्रविष्टः परमाणुवत् । लक्ष्यतेऽन्तर्गताश्चान्ये कोटिशो ह्यण्डराशयः ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: दस-दस गुने आवरणों सहित ऐसे करोड़ों ब्रह्माण्ड परम आश्रय में परमाणु के समान सूक्ष्म प्रतीत होते हैं।

श्लोक 11.41

तदाहुरक्षरं ब्रह्म सर्वकारणकारणम् । विष्णोर्धाम परं साक्षात्पुरुषस्य महात्मनः ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस सबके परम आश्रय को अक्षर ब्रह्म, कारणों का कारण और महापुरुष विष्णु का परम धाम कहा जाता है।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 11 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 12

रुद्र, ऋषि, वेद और स्वायम्भुव मनु की उत्पत्ति

श्लोक 12.1

मैत्रेय उवाच । इति ते वर्णितः क्षत्तः कालाख्यः परमात्मनः । महिमा वेदगर्भोऽथ यथास्राक्षीन्निबोध मे ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—कालरूप परमात्मा की महिमा बताई; अब सुनो कि वेदगर्भ ब्रह्मा ने सृष्टि कैसे की।

श्लोक 12.2

ससर्जाग्रेऽन्धतामिस्रमथ तामिस्रमादिकृत् । महामोहं च मोहं च तमश्चाज्ञानवृत्तयः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने पहले अन्धतामिस्र, तामिस्र, महामोह, मोह और तम नामक अज्ञान की पाँच वृत्तियाँ उत्पन्न कीं।

श्लोक 12.3

दृष्ट्वा पापीयसीं सृष्टिं नात्मानं बह्वमन्यत । भगवद्ध्यानपूतेन मनसान्यां ततोऽसृजत् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस दोषमयी सृष्टि से सन्तोष न पाकर उन्होंने भगवद्ध्यान से शुद्ध मन द्वारा दूसरी सृष्टि की।

श्लोक 12.4

सनकं च सनन्दं च सनातनमथात्मभूः । सनत्कुमारं च मुनीन्निष्क्रियानूर्ध्वरेतसः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार नामक ऊर्ध्वरेता, कर्मासक्तिरहित चार मुनि उत्पन्न हुए।

श्लोक 12.5

तान् बभाषे स्वभूः पुत्रान् प्रजाः सृजत पुत्रकाः । तन्नैच्छन्मोक्षधर्माणो वासुदेवपरायणाः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा ने उन्हें प्रजा उत्पन्न करने को कहा; वासुदेवपरायण और मोक्षमार्गी कुमारों ने यह स्वीकार नहीं किया।

श्लोक 12.6

सोऽवध्यातः सुतैरेवं प्रत्याख्यातानुशासनैः । क्रोधं दुर्विषहं जातं नियन्तुमुपचक्रमे ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुत्रों द्वारा आज्ञा स्वीकार न किए जाने पर ब्रह्मा को तीव्र क्रोध आया, जिसे वे संयमित करने लगे।

श्लोक 12.7

धिया निगृह्यमाणोऽपि भ्रुवोर्मध्यात्प्रजापतेः । सद्योऽजायत तन्मन्युः कुमारो नीललोहितः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: बुद्धि से रोके जाने पर भी वह क्रोध भौंहों के बीच से नीललोहित बालक के रूप में प्रकट हुआ।

श्लोक 12.8

स वै रुरोद देवानां पूर्वजो भगवान् भवः । नामानि कुरु मे धातः स्थानानि च जगद्गुरो ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वही देवों से पहले प्रकट भगवान रुद्र थे; उन्होंने रोते हुए ब्रह्मा से अपने नाम और रहने के स्थान माँगे।

श्लोक 12.9

इति तस्य वचः पाद्मो भगवान् परिपालयन् । अभ्यधाद्भद्रया वाचा मा रोदीस्तत्करोमि ते ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: कमलज ब्रह्मा ने उनकी बात सुनकर कल्याणकारी वाणी में कहा—रोओ मत, मैं तुम्हारी व्यवस्था करता हूँ।

श्लोक 12.10

यदरोदीः सुरश्रेष्ठ सोद्वेग इव बालकः । ततस्त्वामभिधास्यन्ति नाम्ना रुद्र इति प्रजाः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम व्याकुल बालक की तरह रोए हो, इसलिए संसार तुम्हें रुद्र नाम से पुकारेगा।

श्लोक 12.11

हृदिन्द्रियाण्यसुर्व्योम वायुरग्निर्जलं मही । सूर्यश्चन्द्रस्तपश्चैव स्थानान्यग्रे कृतानि मे ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: हृदय, इन्द्रियाँ, प्राण, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र और तप तुम्हारे ग्यारह स्थान हैं।

श्लोक 12.12

मन्युर्मनुर्महिनसो महाञ्छिव ऋतध्वजः । उग्ररेता भवः कालो वामदेवो धृतव्रतः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मन्यु, मनु, महिनस, महान्, शिव, ऋतध्वज, उग्ररेता, भव, काल, वामदेव और धृतव्रत तुम्हारे नाम हैं।

श्लोक 12.13

धीर्वृत्तिरुशनोमा च नियुत्सर्पिरिलाम्बिका । इरावती सुधा दीक्षा रुद्राण्यो रुद्र ते स्त्रियः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: धी, वृत्ति, उशना, उमा, नियुत्, सर्पि, इला, अम्बिका, इरावती, सुधा और दीक्षा तुम्हारी रुद्राणियाँ हैं।

श्लोक 12.14

गृहाणैतानि नामानि स्थानानि च सयोषणः । एभिः सृज प्रजा बह्वीः प्रजानामसि यत्पतिः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन नामों, स्थानों और सहचारिणियों को स्वीकार कर अनेक प्रजाएँ उत्पन्न करो; तुम भी प्रजापति हो।

श्लोक 12.15

इत्यादिष्टः स गुरुणा भगवान्नीललोहितः । सत्त्वाकृतिस्वभावेन ससर्जात्मसमाः प्रजाः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा की आज्ञा से नीललोहित रुद्र ने अपने समान सामर्थ्य, रूप और स्वभाव वाली प्रजाएँ उत्पन्न कीं।

श्लोक 12.16

रुद्राणां रुद्रसृष्टानां समन्ताद्ग्रसतां जगत् । निशाम्यासङ्ख्यशो यूथान् प्रजापतिरशङ्कत ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके उत्पन्न किए असंख्य रुद्रगण चारों ओर जगत को ग्रसने लगे, जिसे देखकर ब्रह्मा चिन्तित हुए।

श्लोक 12.17

अलं प्रजाभिः सृष्टाभिरीदृशीभिः सुरोत्तम । मया सह दहन्तीभिर्दिशश्चक्षुर्भिरुल्बणैः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—हे देवश्रेष्ठ, ऐसी प्रजा अब और न बनाओ, जो अपनी उग्र दृष्टि से दिशाओं और मुझे भी जला रही है।

श्लोक 12.18

तप आतिष्ठ भद्रं ते सर्वभूतसुखावहम् । तपसैव यथा पूर्वं स्रष्टा विश्वमिदं भवान् ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: सब जीवों को सुख देने वाले तप में लगो; उससे उचित समय पर सृष्टि का कार्य कर सकोगे।

श्लोक 12.19

तपसैव परं ज्योतिर्भगवन्तमधोक्षजम् । सर्वभूतगुहावासमञ्जसा विन्दते पुमान् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: तप द्वारा ही सबके हृदय में रहने वाले परम ज्योतिस्वरूप भगवान का साक्षात्कार होता है।

श्लोक 12.20

मैत्रेय उवाच । एवमात्मभुवाऽऽदिष्टः परिक्रम्य गिरां पतिम् । बाढमित्यमुमामन्त्र्य विवेश तपसे वनम् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय कहते हैं—ब्रह्मा की आज्ञा स्वीकार करके रुद्र ने उनकी प्रदक्षिणा की और तप करने वन चले गए।

श्लोक 12.21

अथाभिध्यायतः सर्गं दशपुत्राः प्रजज्ञिरे । भगवच्छक्तियुक्तस्य लोकसन्तानहेतवः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर भगवच्छक्तियुक्त ब्रह्मा के सृष्टिचिन्तन से लोकविस्तार के लिए दस पुत्र उत्पन्न हुए।

श्लोक 12.22

मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । भृगुर्वसिष्ठो दक्षश्च दशमस्तत्र नारदः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, वसिष्ठ, दक्ष और नारद थे।

श्लोक 12.23

उत्सङ्गान्नारदो जज्ञे दक्षोऽङ्गुष्ठात्स्वयम्भुवः । प्राणाद्वसिष्ठः सञ्जातो भृगुस्त्वचि करात्क्रतुः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारद गोद से, दक्ष अँगूठे से, वसिष्ठ प्राण से, भृगु त्वचा से और क्रतु हाथ से उत्पन्न बताए गए हैं।

श्लोक 12.24

पुलहो नाभितो जज्ञे पुलस्त्यः कर्णयोः ऋषिः । अङ्गिरा मुखतोऽक्ष्णोऽत्रिर्मरीचिर्मनसोऽभवत् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुलह नाभि से, पुलस्त्य कानों से, अङ्गिरा मुख से, अत्रि नेत्रों से और मरीचि मन से प्रकट हुए।

श्लोक 12.25

धर्मः स्तनाद्दक्षिणतो यत्र नारायणः स्वयम् । अधर्मः पृष्ठतो यस्मान्मृत्युर्लोकभयङ्करः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: दाहिने स्तन से धर्म, जिसमें नारायण का निवास है, और पीठ से अधर्म प्रकट हुआ, जिसके वंश में भयकारी मृत्यु आई।

श्लोक 12.26

हृदि कामो भ्रुवः क्रोधो लोभश्चाधरदच्छदात् । आस्याद्वाक्सिन्धवो मेढ्रान्निरृतिः पायोरघाश्रयः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: हृदय से काम, भौंहों से क्रोध, अधर से लोभ, मुख से वाणी, जननेन्द्रिय से समुद्र और गुदा से अशुभ का आश्रय निरृति प्रकट हुई।

श्लोक 12.27

छायायाः कर्दमो जज्ञे देवहूत्याः पतिः प्रभुः । मनसो देहतश्चेदं जज्ञे विश्वकृतो जगत् ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: छाया से देवहूति के भावी पति कर्दम उत्पन्न हुए; इस प्रकार सृष्टिकर्ता के मन और शरीर से विविध जगत प्रकट हुआ।

श्लोक 12.28

वाचं दुहितरं तन्वीं स्वयम्भूर्हरतीं मनः । अकामां चकमे क्षत्तः सकाम इति नः श्रुतम् ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: कथा में आता है कि ब्रह्मा अपनी पुत्री वाक् की ओर कामभाव से आकृष्ट हुए, जबकि उसकी ऐसी इच्छा नहीं थी।

श्लोक 12.29

तमधर्मे कृतमतिं विलोक्य पितरं सुताः । मरीचिमुख्या मुनयो विश्रम्भात्प्रत्यबोधयन् ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: पिता की अधर्म की ओर झुकी बुद्धि देखकर मरीचि आदि मुनियों ने आदर और विश्वास से उन्हें समझाया।

श्लोक 12.30

नैतत्पूर्वैः कृतं त्वद्य न करिष्यन्ति चापरे । यत्त्वं दुहितरं गच्छेरनिगृह्याङ्गजं प्रभुः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—अपनी पुत्री के प्रति कामवश होना अनुचित है; ऐसा आचरण न पूर्व आदर्शों ने किया, न आगे के योग्य लोग करेंगे।

श्लोक 12.31

तेजीयसामपि ह्येतन्न सुश्लोक्यं जगद्गुरो । यद्वृत्तमनुतिष्ठन् वै लोकः क्षेमाय कल्पते ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: महान तेजस्वियों के लिए भी यह प्रशंसनीय नहीं; जगत के गुरु का आचरण लोककल्याण का आदर्श होना चाहिए।

श्लोक 12.32

तस्मै नमो भगवते य इदं स्वेन रोचिषा । आत्मस्थं व्यञ्जयामास स धर्मं पातुमर्हति ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिन भगवान ने अपने तेज से भीतर स्थित जगत प्रकट किया, उन्हें प्रणाम; वे ही धर्म की रक्षा करें।

श्लोक 12.33

स इत्थं गृणतः पुत्रान् पुरो दृष्ट्वा प्रजापतीन् । प्रजापतिपतिस्तन्वं तत्याज व्रीडितस्तदा । तां दिशो जगृहुर्घोरां नीहारं यद्विदुस्तमः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुत्रों की बात सुनकर लज्जित ब्रह्मा ने उस दोषयुक्त अवस्था का त्याग किया; दिशाओं ने उसे अन्धकारमय कोहरे के रूप में ग्रहण किया।

श्लोक 12.34

कदाचिद्ध्यायतः स्रष्टुर्वेदा आसंश्चतुर्मुखात् । कथं स्रक्ष्याम्यहं लोकान् समवेतान्यथा पुरा ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: पूर्व की तरह लोकव्यवस्था रचने का चिन्तन करते समय ब्रह्मा के चार मुखों से चार वेद प्रकट हुए।

श्लोक 12.35

चातुर्होत्रं कर्मतन्त्रमुपवेदनयैः सह । धर्मस्य पादाश्चत्वारस्तथैवाश्रमवृत्तयः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: चार ऋत्विजों का यज्ञकर्म, उपवेद, धर्म के चार आधार और आश्रमों की जीवनवृत्तियाँ भी प्रकट हुईं।

श्लोक 12.36

विदुर उवाच । स वै विश्वसृजामीशो वेदादीन् मुखतोऽसृजत् । यद्यद्येनासृजद्देवस्तन्मे ब्रूहि तपोधन ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर बोले—ब्रह्मा ने किस मुख से कौन वेद और सम्बन्धित विधियाँ प्रकट कीं? कृपया विस्तार से बताइए।

श्लोक 12.37

मैत्रेय उवाच । ऋग्यजुःसामाथर्वाख्यान् वेदान् पूर्वादिभिर्मुखैः । शास्त्रमिज्यां स्तुतिस्तोमं प्रायश्चित्तं व्यधात्क्रमात् ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—पूर्व आदि चार मुखों से क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद तथा उनके यज्ञ, स्तुति और प्रायश्चित्त-विधान प्रकट हुए।

श्लोक 12.38

आयुर्वेदं धनुर्वेदं गान्धर्वं वेदमात्मनः । स्थापत्यं चासृजद्वेदं क्रमात्पूर्वादिभिर्मुखैः ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्हीं मुखों से क्रमशः आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद और स्थापत्यविद्या प्रकट हुई।

श्लोक 12.39

इतिहासपुराणानि पञ्चमं वेदमीश्वरः । सर्वेभ्य एव वक्त्रेभ्यः ससृजे सर्वदर्शनः ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सभी मुखों से इतिहास और पुराण प्रकट हुए, जिन्हें व्यापक लोकशिक्षा के कारण पाँचवाँ वेद कहा गया।

श्लोक 12.40

षोडश्युक्थौ पूर्ववक्त्रात्पुरीष्यग्निष्टुतावथ । आप्तोर्यामातिरात्रौ च वाजपेयं सगोसवम् ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: विभिन्न मुखों से षोडशी-उक्थ, पुरीषी-अग्निष्टुत्, आप्तोर्याम-अतिरात्र तथा वाजपेय-गोसव जैसे यज्ञविधान प्रकट हुए।

श्लोक 12.41

विद्या दानं तपः सत्यं धर्मस्येति पदानि च । आश्रमांश्च यथासङ्ख्यमसृजत्सह वृत्तिभिः ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: विद्या, दान, तप और सत्य धर्म के चार चरण बने; चार आश्रम और उनके कर्तव्य भी स्थापित हुए।

श्लोक 12.42

सावित्रं प्राजापत्यं च ब्राह्मं चाथ बृहत्तथा । वार्तासञ्चयशालीनशिलोञ्छ इति वै गृहे ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मचर्य के सावित्र, प्राजापत्य, ब्राह्म और बृहत् विभाग तथा गृहस्थ की वार्ता, सञ्चय, शालीन और शिलोञ्छ वृत्तियाँ बताई गईं।

श्लोक 12.43

वैखानसा वालखिल्यौदुम्बराः फेनपा वने । न्यासे कुटीचकः पूर्वं बह्वोदो हंसनिष्क्रियौ ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: वानप्रस्थ के वैखानस, वालखिल्य, औदुम्बर और फेनप तथा संन्यास के कुटीचक, बह्वोद, हंस और निष्क्रिय विभाग हुए।

श्लोक 12.44

आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिस्तथैव च । एवं व्याहृतयश्चासन् प्रणवो ह्यस्य दह्रतः ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: तर्क-आत्मविद्या, वेदत्रयी, जीविका और शासननीति की विद्याएँ प्रकट हुईं; व्याहृतियाँ और हृदयाकाश से प्रणव का प्राकट्य बताया गया।

श्लोक 12.45

तस्योष्णिगासील्लोमभ्यो गायत्री च त्वचो विभोः । त्रिष्टुम्मांसात्स्नुतोऽनुष्टुब्जगत्यस्थ्नः प्रजापतेः ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: रोमों से उष्णिक्, त्वचा से गायत्री, मांस से त्रिष्टुप्, स्नायु से अनुष्टुप् और अस्थियों से जगती छन्द का सम्बन्ध बताया गया।

श्लोक 12.46

मज्जायाः पङ्क्तिरुत्पन्ना बृहती प्राणतोऽभवत् । स्पर्शस्तस्याभवज्जीवः स्वरो देह उदाहृतः ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मज्जा से पङ्क्ति और प्राण से बृहती छन्द प्रकट हुए; स्पर्शवर्ण उनके जीव और स्वरवर्ण उनके शरीर की उपमा पाए।

श्लोक 12.47

ऊष्माणमिन्द्रियाण्याहुरन्तःस्था बलमात्मनः । स्वराः सप्तविहारेण भवन्ति स्म प्रजापतेः ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऊष्मवर्ण इन्द्रियों और अन्तःस्थवर्ण बल के प्रतीक बताए गए; ब्रह्मा के विहार से संगीत के सात स्वर प्रकट हुए।

श्लोक 12.48

शब्दब्रह्मात्मनस्तस्य व्यक्ताव्यक्तात्मनः परः । ब्रह्मावभाति विततो नानाशक्त्युपबृंहितः ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: व्यक्त-अव्यक्त शब्दस्वरूप ब्रह्मा के माध्यम से अनेक शक्तियों वाला व्यापक परब्रह्म प्रकाशित होता है।

श्लोक 12.49

ततोऽपरामुपादाय स सर्गाय मनो दधे । ऋषीणां भूरिवीर्याणामपि सर्गमविस्तृतम् ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: महाशक्तिशाली ऋषियों के होते हुए भी प्रजाओं का पर्याप्त विस्तार न देखकर ब्रह्मा ने दूसरी सृष्टिविधि का विचार किया।

श्लोक 12.50

ज्ञात्वा तद्धृदये भूयश्चिन्तयामास कौरव । अहो अद्भुतमेतन्मे व्यापृतस्यापि नित्यदा ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने हृदय में फिर सोचा—निरन्तर प्रयत्न करने पर भी प्रजाओं का न बढ़ना आश्चर्यजनक है।

श्लोक 12.51

न ह्येधन्ते प्रजा नूनं दैवमत्र विघातकम् । एवं युक्तकृतस्तस्य दैवं चावेक्षतस्तदा ॥ ५१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने इसे दैवी अवरोध समझकर परम व्यवस्था की ओर ध्यान लगाया।

श्लोक 12.52

कस्य रूपमभूद्द्वेधा यत्कायमभिचक्षते । ताभ्यां रूपविभागाभ्यां मिथुनं समपद्यत ॥ ५२॥

सरल हिंदी भावार्थ: तब उनका रूप दो भागों में विभक्त हुआ और उन दोनों से स्त्री-पुरुष का जोड़ा प्रकट हुआ।

श्लोक 12.53

यस्तु तत्र पुमान् सोऽभून्मनुः स्वायम्भुवः स्वराट् । स्त्री याऽऽसीच्छतरूपाऽऽख्या महिष्यस्य महात्मनः ॥ ५३॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुरुष स्वायम्भुव मनु और स्त्री उनकी महारानी शतरूपा हुईं।

श्लोक 12.54

तदा मिथुनधर्मेण प्रजा ह्येधाम्बभूविरे । स चापि शतरूपायां पञ्चापत्यान्यजीजनत् ॥ ५४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनसे दाम्पत्य द्वारा प्रजावृद्धि का क्रम चला; मनु ने शतरूपा से पाँच सन्तानें उत्पन्न कीं।

श्लोक 12.55

प्रियव्रतोत्तानपादौ तिस्रः कन्याश्च भारत । आकूतिर्देवहूतिश्च प्रसूतिरिति सत्तम ॥ ५५॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रियव्रत और उत्तानपाद दो पुत्र तथा आकूति, देवहूति और प्रसूति तीन पुत्रियाँ थीं।

श्लोक 12.56

आकूतिं रुचये प्रादात्कर्दमाय तु मध्यमाम् । दक्षायादात्प्रसूतिं च यत आपूरितं जगत् ॥ ५६॥

सरल हिंदी भावार्थ: आकूति का विवाह रुचि, देवहूति का कर्दम और प्रसूति का दक्ष से हुआ; इनके वंशों से संसार विस्तृत हुआ।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 12 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 13

वराहावतार और पृथ्वी का उद्धार

श्लोक 13.1

श्रीशुक उवाच । निशम्य वाचं वदतो मुनेः पुण्यतमां नृप । भूयः पप्रच्छ कौरव्यो वासुदेवकथादृतः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—मुनि की पवित्र वाणी सुनकर वासुदेवकथा में प्रेम रखने वाले विदुर ने फिर प्रश्न किया।

श्लोक 13.2

विदुर उवाच । स वै स्वायम्भुवः सम्राट् प्रियः पुत्रः स्वयम्भुवः । प्रतिलभ्य प्रियां पत्नीं किं चकार ततो मुने ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर बोले—ब्रह्मा के प्रिय पुत्र सम्राट स्वायम्भुव मनु ने योग्य पत्नी मिलने के बाद क्या किया?

श्लोक 13.3

चरितं तस्य राजर्षेरादिराजस्य सत्तम । ब्रूहि मे श्रद्दधानाय विष्वक्सेनाश्रयो ह्यसौ ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे भगवान के आश्रित प्रथम राजर्षि थे; श्रद्धापूर्वक उनका पावन चरित्र सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 13.4

श्रुतस्य पुंसां सुचिरश्रमस्य नन्वञ्जसा सूरिभिरीडितोऽर्थः । यत्तद्गुणानुश्रवणं मुकुन्द- पादारविन्दं हृदयेषु येषाम् ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानी कहते हैं कि दीर्घ अध्ययन का सरल सार उन भक्तों के गुण सुनना है जिनके हृदय में मुकुन्द के चरण बसते हैं।

श्लोक 13.5

श्रीशुक उवाच । इति ब्रुवाणं विदुरं विनीतं सहस्रशीर्ष्णश्चरणोपधानम् । प्रहृष्टरोमा भगवत्कथायां प्रणीयमानो मुनिरभ्यचष्ट ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवच्चरणों के आश्रित विनम्र विदुर की बात सुनकर मैत्रेय हरिकथा के आनन्द से रोमाञ्चित हुए और बोले।

श्लोक 13.6

मैत्रेय उवाच । यदा स्वभार्यया साकं जातः स्वायम्भुवो मनुः । प्राञ्जलिः प्रणतश्चेदं वेदगर्भमभाषत ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—पत्नी सहित प्रकट होकर स्वायम्भुव मनु ने हाथ जोड़कर अपने पिता ब्रह्मा को प्रणाम किया।

श्लोक 13.7

त्वमेकः सर्वभूतानां जन्मकृद्वृत्तिदः पिता । अथापि नः प्रजानां ते शुश्रूषा केन वा भवेत् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—आप सब जीवों के जन्मदाता, पालक और पिता हैं; हम सन्तानें आपकी सेवा किस प्रकार करें?

श्लोक 13.8

तद्विधेहि नमस्तुभ्यं कर्मस्वीड्यात्मशक्तिषु । यत्कृत्वेह यशो विष्वगमुत्र च भवेद्गतिः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: हमें हमारी शक्ति के योग्य ऐसा कर्तव्य दीजिए जिससे इस लोक में सद्यश और परलोक में श्रेष्ठ गति मिले।

श्लोक 13.9

ब्रह्मोवाच । प्रीतस्तुभ्यमहं तात स्वस्ति स्ताद्वां क्षितीश्वर । यन्निर्व्यलीकेन हृदा शाधि मेऽत्यात्मनार्पितम् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा बोले—तुम्हारे निष्कपट आत्मसमर्पण से प्रसन्न हूँ; हे पृथ्वीपालक, तुम दोनों का कल्याण हो।

श्लोक 13.10

एतावत्यात्मजैर्वीर कार्या ह्यपचितिर्गुरौ । शक्त्याप्रमत्तैर्गृह्येत सादरं गतमत्सरैः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: सन्तान का गुरु के प्रति उचित सम्मान यही है कि ईर्ष्यारहित होकर आदर और सावधानी से आज्ञा का पालन करे।

श्लोक 13.11

स त्वमस्यामपत्यानि सदृशान्यात्मनो गुणैः । उत्पाद्य शास धर्मेण गां यज्ञैः पुरुषं यज ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: शतरूपा से अपने समान गुणवान सन्तानें उत्पन्न करो, धर्मपूर्वक पृथ्वी का शासन करो और यज्ञ द्वारा भगवान को पूजो।

श्लोक 13.12

परं शुश्रूषणं मह्यं स्यात्प्रजारक्षया नृप । भगवांस्ते प्रजाभर्तुर्हृषीकेशोऽनुतुष्यति ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रजा की रक्षा ही मेरी श्रेष्ठ सेवा होगी; प्रजापालक के इस कर्तव्य से हृषीकेश प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 13.13

येषां न तुष्टो भगवान् यज्ञलिङ्गो जनार्दनः । तेषां श्रमो ह्यपार्थाय यदात्मा नादृतः स्वयम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिनके सत्कर्मों से हृदयस्थित यज्ञेश्वर प्रसन्न नहीं होते, उनका परिश्रम वास्तविक उद्देश्य से रहित रहता है।

श्लोक 13.14

मनुरुवाच । आदेशेऽहं भगवतो वर्तेयामीवसूदन । स्थानं त्विहानुजानीहि प्रजानां मम च प्रभो ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनु बोले—मैं आपकी आज्ञा मानूँगा; कृपया मेरे और प्रजाओं के निवास का स्थान निर्धारित कीजिए।

श्लोक 13.15

यदोकः सर्वसत्त्वानां मही मग्ना महाम्भसि । अस्या उद्धरणे यत्नो देव देव्या विधीयताम् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: सब जीवों की निवासभूमि पृथ्वी विशाल जल में डूबी है; उसके उद्धार का उपाय कीजिए।

श्लोक 13.16

मैत्रेय उवाच । परमेष्ठी त्वपां मध्ये तथा सन्नामवेक्ष्य गाम् । कथमेनां समुन्नेष्य इति दध्यौ धिया चिरम् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—जल में डूबी पृथ्वी को देखकर ब्रह्मा देर तक विचार करने लगे कि इसे ऊपर कैसे उठाया जाए।

श्लोक 13.17

सृजतो मे क्षितिर्वार्भिः प्लाव्यमाना रसां गता । अथात्र किमनुष्ठेयमस्माभिः सर्गयोजितैः । यस्याहं हृदयादासं स ईशो विदधातु मे ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरे सृष्टिकार्य के बीच पृथ्वी रसातल में चली गई; जिन प्रभु से मैं उत्पन्न हुआ, वही उचित उपाय करें।

श्लोक 13.18

इत्यभिध्यायतो नासाविवरात्सहसानघ । वराहतोको निरगादङ्गुष्ठपरिमाणकः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसा चिन्तन करते समय उनकी नासिका से अँगूठे के बराबर एक छोटा वराह प्रकट हुआ।

श्लोक 13.19

तस्याभिपश्यतः खस्थः क्षणेन किल भारत । गजमात्रः प्रववृधे तदद्भुतमभून्महत् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा के देखते-देखते वह आकाश में क्षणभर में हाथी जितना बड़ा हो गया; यह अत्यन्त अद्भुत दृश्य था।

श्लोक 13.20

मरीचिप्रमुखैर्विप्रैः कुमारैर्मनुना सह । दृष्ट्वा तत्सौकरं रूपं तर्कयामास चित्रधा ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: मरीचि आदि ऋषि, कुमार और मनु सहित ब्रह्मा उस वराहरूप को देखकर अनेक प्रकार से विचार करने लगे।

श्लोक 13.21

किमेतत्सौकरव्याजं सत्त्वं दिव्यमवस्थितम् । अहो बताश्चर्यमिदं नासाया मे विनिःसृतम् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्या सूकर के रूप में कोई दिव्य सत्ता है? मेरी नासिका से ऐसा आश्चर्यजनक प्राकट्य कैसे हुआ?

श्लोक 13.22

दृष्टोऽङ्गुष्ठशिरोमात्रः क्षणाद्गण्डशिलासमः । अपि स्विद्भगवानेष यज्ञो मे खेदयन्मनः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो पहले अँगूठे जितना था, तुरन्त विशाल शिलाखण्ड जैसा हुआ; क्या यह स्वयं यज्ञपुरुष भगवान हैं?

श्लोक 13.23

इति मीमांसतस्तस्य ब्रह्मणः सह सूनुभिः । भगवान् यज्ञपुरुषो जगर्जागेन्द्रसन्निभः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब ब्रह्मा और उनके पुत्र विचार कर रहे थे, तभी पर्वताकार यज्ञपुरुष भगवान ने गम्भीर गर्जना की।

श्लोक 13.24

ब्रह्माणं हर्षयामास हरिस्तांश्च द्विजोत्तमान् । स्वगर्जितेन ककुभः प्रतिस्वनयता विभुः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी गर्जना से दिशाएँ गूँज उठीं और ब्रह्मा तथा श्रेष्ठ ऋषियों के हृदय में हर्ष भर गया।

श्लोक 13.25

निशम्य ते घर्घरितं स्वखेद- क्षयिष्णु मायामयसूकरस्य । जनस्तपःसत्यनिवासिनस्ते त्रिभिः पवित्रैर्मुनयोऽगृणन् स्म ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जन, तप और सत्यलोक के मुनियों ने अपना खेद मिटाने वाली वह ध्वनि सुनकर तीनों वेदों के पवित्र मन्त्रों से स्तुति की।

श्लोक 13.26

तेषां सतां वेदवितानमूर्तिः ब्रह्मावधार्यात्मगुणानुवादम् । विनद्य भूयो विबुधोदयाय गजेन्द्रलीलो जलमाविवेश ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वेदमय वराहभगवान ने मुनियों का गुणगान सुना और देवों के कल्याण के लिए फिर गर्जना करके हाथी की तरह जल में प्रवेश किया।

श्लोक 13.27

उत्क्षिप्तवालः खचरः कठोरः सटा विधुन्वन् खररोमशत्वक् । खुराहताभ्रः सितदंष्ट्र ईक्षा- ज्योतिर्बभासे भगवान् महीध्रः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: पूँछ उठाए, सटाएँ हिलाते, खुरों से मेघों को छूते, उज्ज्वल दाँत और दीप्त दृष्टि वाले पृथ्वीधारक भगवान सुशोभित थे।

श्लोक 13.28

घ्राणेन पृथ्व्याः पदवीं विजिघ्रन् क्रोडापदेशः स्वयमध्वराङ्गः । करालदंष्ट्रोऽप्यकरालदृग्भ्या- मुद्वीक्ष्य विप्रान् गृणतोऽविशत्कम् ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी का पता सूँघते हुए यज्ञस्वरूप वराह ने विकराल दाँतों के बीच भी कोमल दृष्टि से स्तुति करते ऋषियों को देखा और जल में उतरे।

श्लोक 13.29

स वज्रकूटाङ्गनिपातवेग- विशीर्णकुक्षिः स्तनयन्नुदन्वान् । उत्सृष्टदीर्घोर्मिभुजैरिवार्त- श्चुक्रोश यज्ञेश्वर पाहि मेति ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके वज्रसमान शरीर के प्रवेश से समुद्र विक्षुब्ध हुआ; उठती तरङ्गें मानो हाथ जोड़कर यज्ञेश्वर से रक्षा माँग रही थीं।

श्लोक 13.30

खुरैः क्षुरप्रैर्दरयंस्तदाप उत्पारपारं त्रिपरू रसायाम् । ददर्श गां तत्र सुषुप्सुरग्रे यां जीवधानीं स्वयमभ्यधत्त ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: तीखे खुरों से जल को चीरते हुए वे गहराई में पहुँचे और वह पृथ्वी देखी जिसे उन्होंने प्रलय में जीवों सहित अपने आश्रय में रखा था।

श्लोक 13.31

स्वदंष्ट्रयोद्धृत्य महीं निमग्नां स उत्थितः संरुरुचे रसायाः । तत्रापि दैत्यं गदयाऽऽपतन्तं सुनाभसन्दीपिततीव्रमन्युः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: डूबी पृथ्वी को दाँत पर उठाकर वे जल से ऊपर आए; तभी गदा लेकर आक्रमण करते दैत्य को देखकर उनका धर्मरक्षक क्रोध प्रकट हुआ।

श्लोक 13.32

जघान रुन्धानमसह्यविक्रमं स लीलयेभं मृगराडिवाम्भसि । तद्रक्तपङ्काङ्कितगण्डतुण्डो यथा गजेन्द्रो जगतीं विभिन्दन् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: असह्य पराक्रमी दैत्य को उन्होंने जल में सिंह द्वारा हाथी के वध जैसी सहज लीला से मार डाला; मुख पर उसका रक्त लग गया।

श्लोक 13.33

तमालनीलं सितदन्तकोट्या क्ष्मामुत्क्षिपन्तं गजलीलयाङ्ग । प्रज्ञाय बद्धाञ्जलयोऽनुवाकैः विरिञ्चिमुख्या उपतस्थुरीशम् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: तमालवर्ण भगवान को उज्ज्वल दाँतों पर पृथ्वी उठाए देखकर ब्रह्मा आदि ने हाथ जोड़कर वैदिक मन्त्रों से स्तुति की।

श्लोक 13.34

ऋषय ऊचुः । जितं जितं तेऽजितयज्ञभावन त्रयीं तनुं स्वां परिधुन्वते नमः । यद्रोमगर्तेषु निलिल्युरध्वरा- स्तस्मै नमः कारणसूकराय ते ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऋषि बोले—अजित यज्ञस्वरूप प्रभु, आपकी जय हो! आपके रोमकूपों में यज्ञों का आश्रय है; कारणरूप वराह को नमस्कार।

श्लोक 13.35

रूपं तवैतन्ननु दुष्कृतात्मनां दुर्दर्शनं देव यदध्वरात्मकम् । छन्दांसि यस्य त्वचि बर्हिरोम- स्वाज्यं दृशि त्वङ्घ्रिषु चातुर्होत्रम् ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपका यज्ञमय रूप दुष्टचित्त वालों को दुर्लभ है; त्वचा में छन्द, रोमों में कुश, नेत्रों में घृत और चरणों में ऋत्विज्कर्म का ध्यान है।

श्लोक 13.36

स्रुक्तुण्ड आसीत्स्रुव ईश नासयो- रिडोदरेचमसाः कर्णरन्ध्रे । प्राशित्रमास्ये ग्रसने ग्रहास्तु ते यच्चर्वणं ते भगवन्नग्निहोत्रम् ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: थूथन, नासिकाएँ, उदर, कान और मुख आदि यज्ञपात्रों तथा क्रियाओं के प्रतीक हैं; आपका भोजन भी अग्निहोत्ररूप है।

श्लोक 13.37

दीक्षानुजन्मोपसदः शिरोधरं त्वं प्रायणीयोदयनीयदंष्ट्रः । जिह्वा प्रवर्ग्यस्तव शीर्षकं क्रतोः सभ्यावसथ्यं चितयोऽसवो हि ते ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: दीक्षा, उपसद, प्रारम्भिक और अन्तिम यज्ञकर्म, प्रवर्ग्य, अग्नियाँ और चितियाँ आपके अंगों तथा प्राणों में ध्यान की जाती हैं।

श्लोक 13.38

सोमस्तु रेतः सवनान्यवस्थितिः संस्था विभेदास्तव देव धातवः । सत्राणि सर्वाणि शरीरसन्धि- स्त्वं सर्वयज्ञक्रतुरिष्टिबन्धनः ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: सोम, तीन सवन, यज्ञों के प्रकार, सत्र और अनुष्ठान आपके वीर्य, अवस्थाओं, धातुओं और सन्धियों के प्रतीक हैं; आप सम्पूर्ण यज्ञ हैं।

श्लोक 13.39

नमो नमस्तेऽखिलमन्त्रदेवता- द्रव्याय सर्वक्रतवे क्रियात्मने । वैराग्यभक्त्यात्मजयानुभावित- ज्ञानाय विद्यागुरवे नमो नमः ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सभी मन्त्र, देवता, द्रव्य और यज्ञक्रियाओं के स्वरूप को प्रणाम; वैराग्य, भक्ति और संयम से प्रकट ज्ञान के गुरु को नमस्कार।

श्लोक 13.40

दंष्ट्राग्रकोट्या भगवंस्त्वया धृता विराजते भूधर भूः सभूधरा । यथा वनान्निःसरतो दता धृता मतङ्गजेन्द्रस्य सपत्रपद्मिनी ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपके दाँत पर पर्वतों सहित पृथ्वी वैसी शोभित है जैसे वन से निकलते हाथी के दाँत पर पत्तों सहित कमलिनी।

श्लोक 13.41

त्रयीमयं रूपमिदं च सौकरं भूमण्डलेनाथ दता धृतेन ते । चकास्ति श‍ृङ्गोढघनेन भूयसा कुलाचलेन्द्रस्य यथैव विभ्रमः ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी धारण किए आपका वेदमय वराहरूप ऐसा लगता है जैसे विशाल पर्वत का शिखर मेघमाला को धारण किए हो।

श्लोक 13.42

संस्थापयैनां जगतां सतस्थुषां लोकाय पत्नीमसि मातरं पिता । विधेम चास्यै नमसा सह त्वया यस्यां स्वतेजोऽग्निमिवारणावधाः ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप जगत के पिता और पृथ्वी उसकी माता हैं; सब जीवों के निवास के लिए इसे स्थापित कीजिए। हम आप दोनों को प्रणाम करते हैं।

श्लोक 13.43

कः श्रद्दधीतान्यतमस्तव प्रभो रसां गताया भुव उद्विबर्हणम् । न विस्मयोऽसौ त्वयि विश्वविस्मये यो माययेदं ससृजेऽतिविस्मयम् ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: रसातल से पृथ्वी उठाने का कार्य अन्य कौन कर सकता है? अद्भुत विश्व रचने वाले आपमें यह आश्चर्य नहीं।

श्लोक 13.44

विधुन्वता वेदमयं निजं वपुः जनस्तपःसत्यनिवासिनो वयम् । सटाशिखोद्धूतशिवाम्बुबिन्दुभिः विमृज्यमाना भृशमीश पाविताः ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपकी वेदमयी देह और सटाओं से झरे पवित्र जलबिन्दुओं से जन, तप और सत्यलोकवासी हम मुनि अत्यन्त पावन हुए।

श्लोक 13.45

स वै बत भ्रष्टमतिस्तवैष ते यः कर्मणां पारमपारकर्मणः । यद्योगमायागुणयोगमोहितं विश्वं समस्तं भगवन् विधेहि शम् ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपकी अपार लीलाओं का अन्त पाने का दावा करने वाला भ्रमित है; आपकी योगमाया से मोहित जगत का कल्याण कीजिए।

श्लोक 13.46

मैत्रेय उवाच । इत्युपस्थीयमानस्तैः मुनिभिर्ब्रह्मवादिभिः । सलिले स्वखुराक्रान्त उपाधत्तावितावनिम् ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—ब्रह्मज्ञानी मुनियों की स्तुति के बीच भगवान ने अपने खुरों से जल को स्थिर करके पृथ्वी को व्यवस्थित किया।

श्लोक 13.47

स इत्थं भगवानुर्वीं विष्वक्सेनः प्रजापतिः । रसाया लीलयोन्नीतामप्सु न्यस्य ययौ हरिः ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: हरि ने पृथ्वी को रसातल से सहज उठाकर जल पर स्थापित किया और अपना कार्य पूर्ण करके चले गए।

श्लोक 13.48

य एवमेतां हरिमेधसो हरेः कथां सुभद्रां कथनीयमायिनः । श‍ृण्वीत भक्त्या श्रवयेत वोशतीं जनार्दनोऽस्याशु हृदि प्रसीदति ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो श्रद्धा से भगवान की इस कल्याणकारी कथा को सुनता या सुनाता है, उसके हृदय में जनार्दन शीघ्र प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 13.49

तस्मिन् प्रसन्ने सकलाशिषां प्रभौ किं दुर्लभं ताभिरलं लवात्मभिः । अनन्यदृष्ट्या भजतां गुहाशयः स्वयं विधत्ते स्वगतिं परः पराम् ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सभी आशीर्वादों के स्वामी प्रसन्न हों तो क्या दुर्लभ है? फिर भी अनन्य भक्त क्षुद्र फल नहीं चाहते; प्रभु उन्हें अपना परम पद देते हैं।

श्लोक 13.50

को नाम लोके पुरुषार्थसारवित् पुरा कथानां भगवत्कथासुधाम् । आपीय कर्णाञ्जलिभिर्भवापहा- महो विरज्येत विना नरेतरम् ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुरुषार्थ का सार जानने वाला हरिकथामृत पीकर उससे विरक्त कैसे होगा? वह कथा संसारबन्धन का नाश करती है।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 13 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 14

दिति–कश्यप संवाद और प्रह्लाद की भविष्यवाणी

श्लोक 14.1

श्रीशुक उवाच । निशम्य कौषारविणोपवर्णितां हरेः कथां कारणसूकरात्मनः । पुनः स पप्रच्छ तमुद्यताञ्जलि- र्नचातितृप्तो विदुरो धृतव्रतः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुकदेवजी बोले—वराहभगवान की कथा सुनकर भी तृप्त न हुए व्रतनिष्ठ विदुर ने हाथ जोड़कर फिर पूछा।

श्लोक 14.2

विदुर उवाच । तेनैव तु मुनिश्रेष्ठ हरिणा यज्ञमूर्तिना । आदिदैत्यो हिरण्याक्षो हत इत्यनुशुश्रुम ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर बोले—हमने सुना है कि उन्हीं यज्ञमूर्ति हरि ने आदिदैत्य हिरण्याक्ष का वध किया था।

श्लोक 14.3

तस्य चोद्धरतः क्षोणीं स्वदंष्ट्राग्रेण लीलया । दैत्यराजस्य च ब्रह्मन् कस्माद्धेतोरभून्मृधः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: दाँत पर पृथ्वी उठाने वाले भगवान और दैत्यराज के बीच युद्ध किस कारण हुआ?

श्लोक 14.4

मैत्रेय उवाच । साधु वीर त्वया पृष्टमवतारकथां हरेः । यत्त्वं पृच्छसि मर्त्यानां मृत्युपाशविशातनीम् ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—मृत्यु का बन्धन काटने वाली हरि की अवतारकथा का प्रश्न तुमने बहुत उत्तम किया है।

श्लोक 14.5

ययोत्तानपदः पुत्रो मुनिना गीतयार्भकः । मृत्योः कृत्वैव मूर्ध्न्यङ्घ्रिमारुरोह हरेः पदम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसी भगवान की कथा नारद से सुनकर बालक ध्रुव मृत्यु के सिर पर चरण रखकर हरिपद को प्राप्त हुए।

श्लोक 14.6

अथात्रापीतिहासोऽयं श्रुतो मे वर्णितः पुरा । ब्रह्मणा देवदेवेन देवानामनुपृच्छताम् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस सम्बन्ध का प्राचीन इतिहास मैंने सुना है, जिसे पूछने पर ब्रह्मा ने देवताओं को बताया था।

श्लोक 14.7

दितिर्दाक्षायणी क्षत्तर्मारीचं कश्यपं पतिम् । अपत्यकामा चकमे सन्ध्यायां हृच्छयार्दिता ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: सन्तान की इच्छा से कामपीड़ित दक्षकन्या दिति ने सन्ध्या के समय अपने पति कश्यप से दाम्पत्य का अनुरोध किया।

श्लोक 14.8

इष्ट्वाग्निजिह्वं पयसा पुरुषं यजुषां पतिम् । निम्लोचत्यर्क आसीनमग्न्यगारे समाहितम् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस समय कश्यप यज्ञपुरुष को दुग्धाहुति अर्पित करके सूर्यास्त के निकट अग्निशाला में ध्यानस्थ बैठे थे।

श्लोक 14.9

दितिरुवाच । एष मां त्वत्कृते विद्वन् काम आत्तशरासनः । दुनोति दीनां विक्रम्य रम्भामिव मतङ्गजः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: दिति बोली—आपके प्रति कामना मुझे वैसे पीड़ा दे रही है जैसे बलवान हाथी कोमल केले के वृक्ष को कुचल दे।

श्लोक 14.10

तद्भवान् दह्यमानायां सपत्नीनां समृद्धिभिः । प्रजावतीनां भद्रं ते मय्यायुङ्क्तामनुग्रहम् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपनी सन्तानवती सहपत्नियों का सुख देखकर मैं दुःखी हूँ; मुझ पर भी कृपा कीजिए।

श्लोक 14.11

भर्तर्याप्तोरुमानानां लोकानाविशते यशः । पतिर्भवद्विधो यासां प्रजया ननु जायते ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप जैसे पति से सम्मान और सन्तान पाने वाली स्त्रियों का यश फैलता है; सन्तान में पति का वंश फिर प्रकट होता है।

श्लोक 14.12

पुरा पिता नो भगवान् दक्षो दुहितृवत्सलः । कं वृणीत वरं वत्सा इत्यपृच्छत नः पृथक् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: हमारे पिता दक्ष ने स्नेह से प्रत्येक कन्या से पूछा था कि वह किसे पति चुनना चाहती है।

श्लोक 14.13

स विदित्वाऽऽत्मजानां नो भावं सन्तानभावनः । त्रयोदशाददात्तासां यास्ते शीलमनुव्रताः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: हमारी इच्छा और आपके प्रति अनुराग जानकर उन्होंने अपनी तेरह पुत्रियाँ आपके साथ ब्याही थीं।

श्लोक 14.14

अथ मे कुरु कल्याण कामं कञ्जविलोचन । आर्तोपसर्पणं भूमन्नमोघं हि महीयसि ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे कमलनयन, मेरी इच्छा पूर्ण कीजिए; पीड़ित का महापुरुष की शरण आना निष्फल नहीं होता।

श्लोक 14.15

इति तां वीर मारीचः कृपणां बहुभाषिणीम् । प्रत्याहानुनयन् वाचा प्रवृद्धानङ्गकश्मलाम् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—कामना से व्याकुल और बहुत प्रार्थना करती दिति को कश्यप ने समझाते हुए मधुर उत्तर दिया।

श्लोक 14.16

एष तेऽहं विधास्यामि प्रियं भीरु यदिच्छसि । तस्याः कामं न कः कुर्यात्सिद्धिस्त्रैवर्गिकी यतः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगा; धर्म, अर्थ और काम में सहायक पत्नी का प्रिय कार्य कौन नहीं करेगा?

श्लोक 14.17

सर्वाश्रमानुपादाय स्वाश्रमेण कलत्रवान् । व्यसनार्णवमत्येति जलयानैर्यथार्णवम् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: गृहस्थ अन्य आश्रमों का भी पोषण करते हुए पत्नी के सहयोग से संकटसागर पार करता है, जैसे नाव से समुद्र।

श्लोक 14.18

यामाहुरात्मनो ह्यर्धं श्रेयस्कामस्य मानिनि । यस्यां स्वधुरमध्यस्य पुमांश्चरति विज्वरः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: पत्नी को कल्याणकामी पुरुष का अर्धाङ्ग कहा गया है; उसे गृहभार सौंपकर वह निश्चिन्त कर्तव्य निभाता है।

श्लोक 14.19

यामाश्रित्येन्द्रियारातीन् दुर्जयानितराश्रमैः । वयं जयेम हेलाभिर्दस्यून् दुर्गपतिर्यथा ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: गृहस्थाश्रम का संयमित सहारा लेकर इन्द्रियरूपी शत्रुओं को वैसे जीता जाता है जैसे दुर्ग में रहकर लुटेरों को।

श्लोक 14.20

न वयं प्रभवस्तां त्वामनुकर्तुं गृहेश्वरि । अप्यायुषा वा कार्त्स्न्येन ये चान्ये गुणगृध्नवः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे गृहस्वामिनी, तुम्हारे उपकार का पूरा प्रतिदान हम जीवनभर भी नहीं कर सकते।

श्लोक 14.21

अथापि काममेतं ते प्रजात्यै करवाण्यलम् । यथा मां नातिरोचन्ति मुहूर्तं प्रतिपालय ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं सन्तान के लिए तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा, किन्तु थोड़ा समय प्रतीक्षा करो ताकि दोष न लगे।

श्लोक 14.22

एषा घोरतमा वेला घोराणां घोरदर्शना । चरन्ति यस्यां भूतानि भूतेशानुचराणि ह ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह सन्ध्या का उग्र समय है, जब भूतनाथ के अनुचर विचरते हैं; अभी संयम उचित है।

श्लोक 14.23

एतस्यां साध्वि सन्ध्यायां भगवान् भूतभावनः । परीतो भूतपर्षद्भिर्वृषेणाटति भूतराट् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस सन्ध्या में प्राणियों के स्वामी शिव अपने गणों सहित वृषभ पर भ्रमण करते हैं।

श्लोक 14.24

श्मशानचक्रानिलधूलिधूम्र- विकीर्णविद्योतजटाकलापः । भस्मावगुण्ठामलरुक्मदेहो देवस्त्रिभिः पश्यति देवरस्ते ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्मशानधूलि से धूसर जटाओं और भस्ममण्डित स्वर्णप्रभ देह वाले त्रिनेत्र शिव सब ओर देखते हैं; वे तुम्हारे सम्बन्धी भी हैं।

श्लोक 14.25

न यस्य लोके स्वजनः परो वा नात्यादृतो नोत कश्चिद्विगर्ह्यः । वयं व्रतैर्यच्चरणापविद्धा- माशास्महेऽजां बत भुक्तभोगाम् ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी दृष्टि में अपना-पराया या मान्य-निन्द्य का पक्षपात नहीं; हम भी उनके चरणों से तिरस्कृत मायिक सुखों से ऊपर उठना चाहते हैं।

श्लोक 14.26

यस्यानवद्याचरितं मनीषिणो गृणन्त्यविद्यापटलं बिभित्सवः । निरस्तसाम्यातिशयोऽपि यत्स्वयं पिशाचचर्यामचरद्गतिः सताम् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: अज्ञान मिटाने के इच्छुक ज्ञानी उनके निर्दोष चरित्र का गान करते हैं; सर्वोपरि होकर भी वे अवधूत जैसी लीला करते हैं।

श्लोक 14.27

हसन्ति यस्याचरितं हि दुर्भगाः स्वात्मन् रतस्याविदुषः समीहितम् । यैर्वस्त्रमाल्याभरणानुलेपनैः श्वभोजनं स्वात्मतयोपलालितम् ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो लोग नश्वर देह को वस्त्र, माला और आभूषणों से सजाकर ही अपना सर्वस्व मानते हैं, वे उनकी आत्माराम अवस्था नहीं समझते और हँसते हैं।

श्लोक 14.28

ब्रह्मादयो यत्कृतसेतुपाला यत्कारणं विश्वमिदं च माया । आज्ञाकरी तस्य पिशाचचर्या अहो विभूम्नश्चरितं विडम्बनम् ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा आदि उनकी स्थापित मर्यादा का पालन करते हैं और माया आज्ञाकारिणी है; फिर भी उनका अवधूतवेष अद्भुत लीला है।

श्लोक 14.29

मैत्रेय उवाच । सैवं संविदिते भर्त्रा मन्मथोन्मथितेन्द्रिया । जग्राह वासो ब्रह्मर्षेर्वृषलीव गतत्रपा ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—समझाए जाने पर भी दिति कामना से इन्द्रियसंयम खो बैठीं और लज्जा छोड़कर कश्यप का वस्त्र पकड़ लिया।

श्लोक 14.30

स विदित्वाथ भार्यायास्तं निर्बन्धं विकर्मणि । नत्वा दिष्टाय रहसि तयाथोपविवेश ह ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: पत्नी का हठ देखकर कश्यप ने दैव को प्रणाम किया और अनुचित समय में एकान्त दाम्पत्य स्वीकार किया।

श्लोक 14.31

अथोपस्पृश्य सलिलं प्राणानायम्य वाग्यतः । ध्यायञ्जजाप विरजं ब्रह्मज्योतिः सनातनम् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: बाद में उन्होंने जल का आचमन, प्राणसंयम और मौन रखकर निर्मल सनातन ब्रह्मज्योति का ध्यान-जप किया।

श्लोक 14.32

दितिस्तु व्रीडिता तेन कर्मावद्येन भारत । उपसङ्गम्य विप्रर्षिमधोमुख्यभ्यभाषत ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने अनुचित आग्रह पर लज्जित दिति सिर झुकाकर पति के पास आईं और निवेदन किया।

श्लोक 14.33

दितिरुवाच । मा मे गर्भमिमं ब्रह्मन् भूतानामृषभोऽवधीत् । रुद्रः पतिर्हि भूतानां यस्याकरवमंहसम् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैंने भूतपति रुद्र का अनादर किया है; वे मेरे इस गर्भ को नष्ट न करें।

श्लोक 14.34

नमो रुद्राय महते देवायोग्राय मीढुषे । शिवाय न्यस्तदण्डाय धृतदण्डाय मन्यवे ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: महान, उग्र, वरदाता, कल्याणमय और दण्ड को धारण तथा त्याग करने में समर्थ रुद्र को प्रणाम है।

श्लोक 14.35

स नः प्रसीदतां भामो भगवानुर्वनुग्रहः । व्याधस्याप्यनुकम्प्यानां स्त्रीणां देवः सतीपतिः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: सतीपति शिव हम पर प्रसन्न हों; वे बड़े कृपालु हैं और दुर्बलों पर दया करने वाले हैं।

श्लोक 14.36

मैत्रेय उवाच । स्वसर्गस्याशिषं लोक्यामाशासानां प्रवेपतीम् । निवृत्तसन्ध्यानियमो भार्यामाह प्रजापतिः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—गर्भ का कल्याण चाहती काँपती पत्नी से, सन्ध्याविधि पूरी करके कश्यप ने कहा।

श्लोक 14.37

कश्यप उवाच । अप्रायत्यादात्मनस्ते दोषान् मौहूर्तिकादुत । मन्निदेशातिचारेण देवानां चातिहेलनात् ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारे असंयम, समयदोष, मेरे निर्देश के उल्लङ्घन और देवों के अनादर के कारण प्रतिकूल फल होगा।

श्लोक 14.38

भविष्यतस्तवाभद्रावभद्रे जाठराधमौ । लोकान् सपालांस्त्रींश्चण्डि मुहुराक्रन्दयिष्यतः ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारे गर्भ से दो अमङ्गलकारी पुत्र उत्पन्न होंगे, जो लोकपालों सहित तीनों लोकों को रुलाएँगे।

श्लोक 14.39

प्राणिनां हन्यमानानां दीनानामकृतागसाम् । स्त्रीणां निगृह्यमाणानां कोपितेषु महात्मसु ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब वे निर्दोष प्राणियों को मारेंगे, स्त्रियों को सताएँगे और महात्माओं को कुपित करेंगे—

श्लोक 14.40

तदा विश्वेश्वरः क्रुद्धो भगवान् लोकभावनः । हनिष्यत्यवतीर्यासौ यथाद्रीन् शतपर्वधृक् ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: तब जगत के हितैषी भगवान अवतार लेकर उनका अन्त करेंगे, जैसे इन्द्र पर्वतों पर वज्र चलाते हैं।

श्लोक 14.41

दितिरुवाच । वधं भगवता साक्षात्सुनाभोदारबाहुना । आशासे पुत्रयोर्मह्यं मा क्रुद्धाद्ब्राह्मणाद्विभो ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: दिति बोली—मेरे पुत्रों का अन्त स्वयं चक्रधारी भगवान करें, किसी क्रुद्ध ब्राह्मण के शाप से न हो।

श्लोक 14.42

न ब्रह्मदण्डदग्द्धस्य न भूतभयदस्य च । नारकाश्चानुगृह्णन्ति यां यां योनिमसौ गतः ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्राह्मणशाप से नष्ट और जीवों को भय देने वाला जहाँ भी जन्म ले, दुःखमय दशाओं में भी उसे सहज अनुग्रह नहीं मिलता।

श्लोक 14.43

कश्यप उवाच । कृतशोकानुतापेन सद्यः प्रत्यवमर्शनात् । भगवत्युरुमानाच्च भवे मय्यपि चादरात् ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: कश्यप बोले—तुम्हारे पश्चात्ताप, तुरन्त दोषविचार और भगवान, शिव तथा मेरे प्रति आदर से एक शुभ फल भी होगा।

श्लोक 14.44

पुत्रस्यैव तु पुत्राणां भवितैकः सतां मतः । गास्यन्ति यद्यशः शुद्धं भगवद्यशसा समम् ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारे एक पुत्र का पुत्र महान संत होगा, जिसका निर्मल यश लोग भगवद्यश के साथ गाएँगे।

श्लोक 14.45

योगैर्हेमेव दुर्वर्णं भावयिष्यन्ति साधवः । निर्वैरादिभिरात्मानं यच्छीलमनुवर्तितुम् ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसके आचरण का अनुकरण करने के लिए साधु वैररहितता आदि से अपने मन को तपाएँगे, जैसे अग्नि में सोना शुद्ध होता है।

श्लोक 14.46

यत्प्रसादादिदं विश्वं प्रसीदति यदात्मकम् । स स्वदृग्भगवान् यस्य तोष्यतेऽनन्यया दृशा ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह अनन्यभक्ति से उन भगवान को प्रसन्न करेगा जिनकी प्रसन्नता से पूरा जगत प्रसन्न होता है।

श्लोक 14.47

स वै महाभागवतो महात्मा महानुभावो महतां महिष्ठः । प्रवृद्धभक्त्या ह्यनुभाविताशये निवेश्य वैकुण्ठमिमं विहास्यति ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह परम महाभागवत होगा; प्रबल भक्ति से शुद्ध हृदय में वैकुण्ठनाथ को स्थापित कर इस संसार का मोह छोड़ देगा।

श्लोक 14.48

अलम्पटः शीलधरो गुणाकरो हृष्टः परर्द्ध्या व्यथितो दुःखितेषु । अभूतशत्रुर्जगतः शोकहर्ता नैदाघिकं तापमिवोडुराजः ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह विषयलोलुप नहीं होगा; सदाचारी, गुणवान, दूसरों की उन्नति में प्रसन्न और दुःखियों के लिए व्यथित होकर चन्द्रमा की तरह ताप हरने वाला होगा।

श्लोक 14.49

अन्तर्बहिश्चामलमब्जनेत्रं स्वपूरुषेच्छानुगृहीतरूपम् । पौत्रस्तव श्रीललनाललामं द्रष्टा स्फुरत्कुण्डलमण्डिताननम् ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारा पौत्र भक्तों की इच्छा के अनुरूप रूप प्रकट करने वाले निर्मल कमलनयन भगवान को भीतर-बाहर देखेगा।

श्लोक 14.50

मैत्रेय उवाच । श्रुत्वा भागवतं पौत्रममोदत दितिर्भृशम् । पुत्रयोश्च वधं कृष्णाद्विदित्वाऽऽसीन्महामनाः ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—भक्त पौत्र की बात सुनकर दिति प्रसन्न हुईं और पुत्रों का अन्त कृष्ण के हाथों होगा जानकर आश्वस्त हुईं।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 14 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 15

सनकादि का वैकुण्ठगमन और जय-विजय को शाप

श्लोक 15.1

मैत्रेय उवाच । प्राजापत्यं तु तत्तेजः परतेजोहनं दितिः । दधार वर्षाणि शतं शङ्कमाना सुरार्दनात् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—देवों को कष्ट होने की आशंका से दिति ने दूसरों का तेज दबाने वाले कश्यप के उस गर्भतेज को सौ वर्षों तक धारण किया।

श्लोक 15.2

लोके तेन हतालोके लोकपाला हतौजसः । न्यवेदयन् विश्वसृजे ध्वान्तव्यतिकरं दिशाम् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसके प्रभाव से दिशाओं का प्रकाश मंद हुआ; शक्तिहीन-से देवताओं ने ब्रह्मा से अन्धकार की स्थिति बताई।

श्लोक 15.3

देवा ऊचुः । तम एतद्विभो वेत्थ संविग्ना यद्वयं भृशम् । न ह्यव्यक्तं भगवतः कालेनास्पृष्टवर्त्मनः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: देव बोले—इस अन्धकार से हम अत्यन्त व्याकुल हैं; आप इसका कारण जानते हैं, आपकी ज्ञानगति काल से अवरुद्ध नहीं।

श्लोक 15.4

देवदेव जगद्धातर्लोकनाथशिखामणे । परेषामपरेषां त्वं भूतानामसि भाववित् ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे देवदेव, जगत के धारणकर्ता और लोकपालों के शिरोमणि, आप ऊँचे-नीचे सभी जीवों की अन्तःस्थिति जानते हैं।

श्लोक 15.5

नमो विज्ञानवीर्याय माययेदमुपेयुषे । गृहीतगुणभेदाय नमस्तेऽव्यक्तयोनये ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानसामर्थ्य वाले, माया द्वारा सृष्टि में प्रविष्ट और गुणभेद धारण करने वाले अप्रकट कारण को प्रणाम है।

श्लोक 15.6

ये त्वानन्येन भावेन भावयन्त्यात्मभावनम् । आत्मनि प्रोतभुवनं परं सदसदात्मकम् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो अनन्यभाव से सबके उद्गम, कार्यकारण के आश्रय और अपने में जगत पिरोए आपको ध्यान करते हैं—

श्लोक 15.7

तेषां सुपक्वयोगानां जितश्वासेन्द्रियात्मनाम् । लब्धयुष्मत्प्रसादानां न कुतश्चित्पराभवः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे परिपक्व योगी श्वास, इन्द्रिय और मन जीतकर आपकी कृपा पाते हैं; उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता।

श्लोक 15.8

यस्य वाचा प्रजाः सर्वा गावस्तन्त्येव यन्त्रिताः । हरन्ति बलिमायत्तास्तस्मै मुख्याय ते नमः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिनकी आज्ञा से सभी प्रजाएँ बँधे पशुओं की तरह नियन्त्रित होकर अपना कर्तव्य निभाती हैं, उन सृष्टिप्रमुख को प्रणाम।

श्लोक 15.9

स त्वं विधत्स्व शं भूमंस्तमसा लुप्तकर्मणाम् । अदभ्रदयया दृष्ट्या आपन्नानर्हसीक्षितुम् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: अन्धकार से हमारे कार्य रुक गए हैं; उदार कृपादृष्टि से हम संकटग्रस्तों का कल्याण कीजिए।

श्लोक 15.10

एष देव दितेर्गर्भ ओजः काश्यपमर्पितम् । दिशस्तिमिरयन् सर्वा वर्धतेऽग्निरिवैधसि ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: दिति के गर्भ में कश्यप का तेज अग्नि की तरह बढ़कर सभी दिशाओं को अन्धकारमय कर रहा है।

श्लोक 15.11

मैत्रेय उवाच । स प्रहस्य महाबाहो भगवान् शब्दगोचरः । प्रत्याचष्टात्मभूर्देवान् प्रीणन् रुचिरया गिरा ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—देवताओं की बात सुनकर स्वयम्भू ब्रह्मा मुस्कराए और मधुर वाणी में उन्हें सन्तोष दिया।

श्लोक 15.12

ब्रह्मोवाच । मानसा मे सुता युष्मत्पूर्वजाः सनकादयः । चेरुर्विहायसा लोकाँल्लोकेषु विगतस्पृहाः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा बोले—तुमसे पहले जन्मे मेरे मानसपुत्र सनकादि इच्छा और आसक्ति से रहित होकर लोकों में विचरते हैं।

श्लोक 15.13

त एकदा भगवतो वैकुण्ठस्यामलात्मनः । ययुर्वैकुण्ठनिलयं सर्वलोकनमस्कृतम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक बार वे निर्मल भगवान के सब लोकों से वन्दित वैकुण्ठधाम पहुँचे।

श्लोक 15.14

वसन्ति यत्र पुरुषाः सर्वे वैकुण्ठमूर्तयः । येऽनिमित्तनिमित्तेन धर्मेणाराधयन् हरिम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ हरि की निष्काम आराधना करने वाले निवासी भगवान के समान दिव्य स्वरूप वाले होते हैं।

श्लोक 15.15

यत्र चाद्यः पुमानास्ते भगवान् शब्दगोचरः । सत्त्वं विष्टभ्य विरजं स्वानां नो मृडयन् वृषः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ स्वयं आदिपुरुष भगवान अपने निर्मल सत्त्वमय स्वरूप से भक्तों को आनन्द देते हुए विराजते हैं।

श्लोक 15.16

यत्र नैःश्रेयसं नाम वनं कामदुघैर्द्रुमैः । सर्वर्तुश्रीभिर्विभ्राजत्कैवल्यमिव मूर्तिमत् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: नैःश्रेयस नामक वन में सभी ऋतुओं की शोभा वाले कल्पवृक्ष हैं; वह मानो मुक्त आनन्द का साकार रूप है।

श्लोक 15.17

वैमानिकाः सललनाश्चरितानि यत्र गायन्ति लोकशमलक्षपणानि भर्तुः । अन्तर्जलेऽनुविकसन्मधुमाधवीनां गन्धेन खण्डितधियोऽप्यनिलं क्षिपन्तः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: विमानों में भक्त अपनी सहचारिणियों सहित भगवान के पवित्र चरित्र गाते हैं; फूलों की सुगन्ध भी यदि ध्यान बाँटे तो उसे बाधा मानते हैं।

श्लोक 15.18

पारावतान्यभृतसारसचक्रवाक- दात्यूहहंसशुकतित्तिरिबर्हिणां यः । कोलाहलो विरमतेऽचिरमात्रमुच्चैः भृङ्गाधिपे हरिकथामिव गायमाने ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: कबूतर, कोयल, सारस, चकवे, हंस, तोते और मोर आदि चुप होकर भौंरे का गान सुनते हैं, मानो हरिकथा सुन रहे हों।

श्लोक 15.19

मन्दारकुन्दकुरबोत्पलचम्पकार्ण- पुन्नागनागबकुलाम्बुजपारिजाताः । गन्धेऽर्चिते तुलसिकाभरणेन तस्या यस्मिंस्तपः सुमनसो बहु मानयन्ति ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मन्दार, कुन्द, कमल, चम्पा, बकुल और पारिजात आदि फूल भी हरि के गले में तुलसी का सम्मान देखकर उसके तप को श्रेष्ठ मानते हैं।

श्लोक 15.20

यत्सङ्कुलं हरिपदानतिमात्रदृष्टै- र्वैदूर्यमारकतहेममयैर्विमानैः । येषां बृहत्कटितटाः स्मितशोभिमुख्यः कृष्णात्मनां न रज आदधुरुत्स्मयाद्यैः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ दिव्य रत्न और स्वर्ण के विमानों में रहने वाले कृष्णमय भक्त सौन्दर्यपूर्ण सहचारिणियों के आकर्षण से भी रजोगुण में नहीं फँसते।

श्लोक 15.21

श्री रूपिणी क्वणयती चरणारविन्दं लीलाम्बुजेन हरिसद्मनि मुक्तदोषा । संलक्ष्यते स्फटिककुड्य उपेतहेम्नि सम्मार्जतीव यदनुग्रहणेऽन्ययत्नः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिनकी कृपा पाने के लिए अन्य लोग प्रयत्न करते हैं, वे लक्ष्मी स्वयं निर्मल भगवान के स्वर्ण-स्फटिकमय भवन में सेवा करती दिखाई देती हैं।

श्लोक 15.22

वापीषु विद्रुमतटास्वमलामृताप्सु प्रेष्यान्विता निजवने तुलसीभिरीशम् । अभ्यर्चती स्वलकमुन्नसमीक्ष्य वक्त्र- मुच्छेषितं भगवतेत्यमताङ्ग यच्छ्रीः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने उपवन की निर्मल बावड़ियों पर सहेलियों सहित तुलसी से पूजा करती लक्ष्मी जल में अपना मुख देखकर प्रभु के प्रेमपूर्ण सान्निध्य का स्मरण करती हैं।

श्लोक 15.23

यन्न व्रजन्त्यघभिदो रचनानुवादात् श‍ृण्वन्ति येऽन्यविषयाः कुकथा मतिघ्नीः । यास्तु श्रुता हतभगैर्नृभिरात्तसारा- स्तांस्तान् क्षिपन्त्यशरणेषु तमःसु हन्त ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की कथा छोड़ बुद्धि दूषित करने वाली व्यर्थ बातें सुनने वाले उस धाम को नहीं पाते; वे अज्ञान की असहाय दशाओं में गिरते हैं।

श्लोक 15.24

येऽभ्यर्थितामपि च नो नृगतिं प्रपन्नाः ज्ञानं च तत्त्वविषयं सह धर्म यत्र । नाराधनं भगवतो वितरन्त्यमुष्य सम्मोहिता विततया बत मायया ते ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्यजन्म में धर्म और तत्त्वज्ञान की सम्भावना पाकर भी जो भगवान की आराधना नहीं करते, वे उनकी विस्तृत माया से मोहित हैं।

श्लोक 15.25

यच्च व्रजन्त्यनिमिषामृषभानुवृत्त्या दूरे यमा ह्युपरि नः स्पृहणीयशीलाः । भर्तुर्मिथः सुयशसः कथनानुराग- वैक्लव्यबाष्पकलया पुलकीकृताङ्गाः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: भक्त परस्पर प्रभु का यश कहते हुए प्रेमाश्रु और रोमाञ्च से भर जाते हैं; उनका आचरण देवों और हमारे लिए भी वाञ्छनीय है।

श्लोक 15.26

तद्विश्वगुर्वधिकृतं भुवनैकवन्द्यं दिव्यं विचित्रविबुधाग्र्यविमानशोचिः । आपुः परां मुदमपूर्वमुपेत्य योग- मायाबलेन मुनयस्तदथो विकुण्ठम् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: योगमाया के प्रभाव से उस जगद्वन्दित, दिव्य विमानों से सुशोभित वैकुण्ठ में पहुँचकर कुमारों को अनूठा परम आनन्द मिला।

श्लोक 15.27

तस्मिन्नतीत्य मुनयः षडसज्जमानाः कक्षाः समानवयसावथ सप्तमायाम् । देवावचक्षत गृहीतगदौ परार्ध्य- केयूरकुण्डलकिरीटविटङ्कवेषौ ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: छह द्वार पार करके सातवें पर उन्होंने समान आयु के दो गदाधारी पार्षद देखे, जो मुकुट, कुण्डल और बाजूबन्द से सुशोभित थे।

श्लोक 15.28

मत्तद्विरेफवनमालिकया निवीतौ विन्यस्तयासितचतुष्टयबाहुमध्ये । वक्त्रं भ्रुवा कुटिलया स्फुटनिर्गमाभ्यां रक्तेक्षणेन च मनाग्रभसं दधानौ ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्याम चार भुजाओं के बीच वनमाला थी; टेढ़ी भौंहों, लाल नेत्रों और तीव्र श्वास से उनके मुख पर कुछ उग्रता दिखती थी।

श्लोक 15.29

द्वार्येतयोर्निविविशुर्मिषतोरपृष्ट्वा पूर्वा यथा पुरटवज्रकपाटिका याः । सर्वत्र तेऽविषमया मुनयः स्वदृष्ट्या ये सञ्चरन्त्यविहता विगताभिशङ्काः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: समदृष्टि और निश्शङ्क होकर विचरने वाले कुमार पहले द्वारों की तरह वहाँ भी बिना पूछे भीतर जाने लगे।

श्लोक 15.30

तान् वीक्ष्य वातरशनांश्चतुरः कुमारान् वृद्धान् दशार्धवयसो विदितात्मतत्त्वान् । वेत्रेण चास्खलयतामतदर्हणांस्तौ तेजो विहस्य भगवत्प्रतिकूलशीलौ ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: दिगम्बर, आत्मज्ञानी और देखने में पाँच वर्ष के चार कुमारों को उन द्वारपालों ने छड़ी से रोका; ऐसा अनादर योग्य नहीं था।

श्लोक 15.31

ताभ्यां मिषत्स्वनिमिषेषु निषिध्यमानाः स्वर्हत्तमा ह्यपि हरेः प्रतिहारपाभ्याम् । ऊचुस्सुहृत्तमदिदृक्षितभङ्ग ईषत् कामानुजेन सहसा त उपप्लुताक्षाः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने प्रियतम हरि के दर्शन में बाधा पड़ने पर, श्रेष्ठ कुमारों के नेत्रों में तत्काल क्रोध की झलक आ गई।

श्लोक 15.32

मुनय ऊचुः । को वामिहैत्य भगवत्परिचर्ययोच्चैः तद्धर्मिणां निवसतां विषमः स्वभावः । तस्मिन् प्रशान्तपुरुषे गतविग्रहे वां को वाऽऽत्मवत्कुहकयोः परिशङ्कनीयः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुनि बोले—भगवान की सेवा और इस शान्त धाम में रहकर भी तुममें भेदभाव क्यों? यहाँ तुम्हें किससे भय है?

श्लोक 15.33

न ह्यन्तरं भगवतीह समस्तकुक्षा- वात्मानमात्मनि नभो नभसीव धीराः । पश्यन्ति यत्र युवयोः सुरलिङ्गिनोः किं व्युत्पादितं ह्युदरभेदि भयं यतोऽस्य ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानी भगवान और जीव में आश्रय का अभेद देखते हैं; दिव्य वेष वाले तुम दोनों ने अलगाव और संशय कहाँ से ग्रहण किया?

श्लोक 15.34

तद्वाममुष्य परमस्य विकुण्ठ भर्तुः कर्तुं प्रकृष्टमिह धीमहि मन्दधीभ्याम् । लोकानितो व्रजतमन्तरभावदृष्ट्या पापीयसस्त्रय इमे रिपवोऽस्य यत्र ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के हित में यही उचित समझते हैं कि भेददृष्टि वाले तुम ऐसे लोक में जाओ जहाँ काम, क्रोध और लोभ रहते हैं।

श्लोक 15.35

तेषामितीरितमुभाववधार्य घोरं तं ब्रह्मदण्डमनिवारणमस्त्रपूगैः । सद्यो हरेरनुचरावुरुबिभ्यतस्तत् पादग्रहावपततामतिकातरेण ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अस्त्रों से भी न टलने वाला ऋषिशाप सुनकर दोनों हरिपार्षद अत्यन्त भयभीत हुए और मुनियों के चरणों में गिर पड़े।

श्लोक 15.36

भूयादघोनि भगवद्भिरकारि दण्डो यो नौ हरेत सुरहेलनमप्यशेषम् । मा वोऽनुतापकलया भगवत्स्मृतिघ्नो मोहो भवेदिह तु नौ व्रजतोरधोऽधः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने प्रार्थना की—दण्ड हमारे संत-अनादर का दोष मिटाए; बस पतित अवस्था में भी ऐसा मोह न आए जिससे भगवत्स्मरण छूट जाए।

श्लोक 15.37

एवं तदैव भगवानरविन्दनाभः स्वानां विबुध्य सदतिक्रममार्यहृद्यः । तस्मिन्ययौ परमहंसमहामुनीनां अन्वेषणीयचरणौ चलयन् सह श्रीः ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने सेवकों का संतों के प्रति अपराध जानकर कमलनाभ भगवान लक्ष्मी सहित स्वयं वहाँ आए।

श्लोक 15.38

तं त्वागतं प्रतिहृतौपयिकं स्वपुम्भिः तेऽचक्षताक्षविषयं स्वसमाधिभाग्यम् । हंसश्रियोर्व्यजनयोः शिववायुलोल- च्छुभ्रातपत्रशशिकेसरशीकराम्बुम् ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुनियों ने अपने समाधि में मिलने वाले परम भाग्य को प्रत्यक्ष देखा; सेवक चँवर और श्वेत छत्र द्वारा उनकी सेवा कर रहे थे।

श्लोक 15.39

कृत्स्नप्रसादसुमुखं स्पृहणीयधाम- स्नेहावलोककलया हृदि संस्पृशन्तम् । श्यामे पृथावुरसि शोभितया श्रियास्व- श्चूडामणिं सुभगयन्तमिवात्मधिष्ण्यम् ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान का प्रसन्न मुख और प्रेमदृष्टि हृदय छू रही थी; श्याम वक्ष पर लक्ष्मी उनके अद्वितीय ऐश्वर्य की शोभा बढ़ा रही थीं।

श्लोक 15.40

पीतांशुके पृथु नितम्बिनि विस्फुरन्त्या काञ्च्यालिभिर्विरुतया वनमालया च । वल्गुप्रकोष्ठवलयं विनतासुतांसे विन्यस्तहस्तमितरेण धुनानमब्जम् ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: पीताम्बर, चमकती करधनी, वनमाला और कङ्कण धारण किए प्रभु ने एक हाथ गरुड़ के कन्धे पर रखा था और दूसरे में कमल घुमा रहे थे।

श्लोक 15.41

विद्युत्क्षिपन् मकरकुण्डलमण्डनार्ह- गण्डस्थलोन्नसमुखं मणिमत्किरीटम् । दोर्दण्डषण्डविवरे हरता परार्ध्य- हारेण कन्धरगतेन च कौस्तुभेन ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मकरकुण्डल, उन्नत नासिका, रत्नमुकुट, अमूल्य हार और कौस्तुभ से उनका दिव्य रूप अत्यन्त मनोहर था।

श्लोक 15.42

अत्रोपसृष्टमिति चोत्स्मितमिन्दिरायाः स्वानां धिया विरचितं बहु सौष्ठवाढ्यम् । मह्यं भवस्य भवतां च भजन्तमङ्गं नेमुर्निरीक्ष्य न वितृप्तदृशो मुदा कैः ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: लक्ष्मी के अभिमान को भी विनम्र करने वाला वह सुन्दर रूप देखकर मुनियों की आँखें तृप्त नहीं हुईं; उन्होंने प्रसन्न होकर सिर झुकाया।

श्लोक 15.43

तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द- किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः । अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां सङ्क्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के चरणों से मिली तुलसी की सुगन्ध नासिका में पहुँची तो निराकार ब्रह्म में रमे कुमार भी प्रेम से रोमाञ्चित हो उठे।

श्लोक 15.44

ते वा अमुष्य वदनासितपद्मकोश- मुद्वीक्ष्य सुन्दरतराधरकुन्दहासम् । लब्धाशिषः पुनरवेक्ष्य तदीयमङ्घ्रि- द्वन्द्वं नखारुणमणिश्रयणं निदध्युः ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: सुन्दर अधरों और कुन्दपुष्प जैसी मुस्कान वाला मुख देखकर, फिर अरुण नखमणियों वाले चरणों को निहारकर वे ध्यानमग्न हुए।

श्लोक 15.45

पुंसां गतिं मृगयतामिह योगमार्गैः ध्यानास्पदं बहु मतं नयनाभिरामम् । पौंस्नं वपुर्दर्शयानमनन्यसिद्धै- रौत्पत्तिकैः समगृणन् युतमष्टभोगैः ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: योगियों के ध्यान का परम आश्रय, स्वाभाविक सिद्धियों से युक्त मनोहर दिव्य पुरुषरूप देखकर उन्होंने स्तुति की।

श्लोक 15.46

कुमारा ऊचुः । योऽन्तर्हितो हृदि गतोऽपि दुरात्मनां त्वं सोऽद्यैव नो नयनमूलमनन्त राद्धः । यर्ह्येव कर्णविवरेण गुहां गतो नः पित्रानुवर्णितरहा भवदुद्भवेन ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कुमार बोले—पिता ब्रह्मा के वर्णन से आप पहले हमारे हृदय में आए; आज अन्तर्यामी होकर भी दुर्लभ आपका प्रत्यक्ष दर्शन मिला।

श्लोक 15.47

तं त्वां विदाम भगवन् परमात्मतत्त्वं सत्त्वेन सम्प्रति रतिं रचयन्तमेषाम् । तत्तेऽनुतापविदितैर्दृढभक्तियोगै- रुद्ग्रन्थयो हृदि विदुर्मुनयो विरागाः ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप परमात्मतत्त्व हैं और अपने निर्मल स्वरूप से हमारे भीतर प्रेम जगाते हैं; दृढ़ भक्ति और वैराग्य वाले मुनि आपको हृदय में जानते हैं।

श्लोक 15.48

नात्यन्तिकं विगणयन्त्यपि ते प्रसादं किन्त्वन्यदर्पितभयं भ्रुव उन्नयैस्ते । येऽङ्ग त्वदङ्घ्रिशरणा भवतः कथायाः कीर्तन्यतीर्थयशसः कुशला रसज्ञाः ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपकी कथा का रस जानने वाले चरणाश्रित भक्त मोक्ष को भी बड़ा फल नहीं मानते; भययुक्त अन्य ऐश्वर्य की बात ही क्या है!

श्लोक 15.49

कामं भवः स्ववृजिनैर्निरयेषु नः स्ता- च्चेतोऽलिवद्यदि नु ते पदयो रमेत । वाचश्च नस्तुलसिवद्यदि तेऽङ्घ्रिशोभाः पूर्येत ते गुणगणैर्यदि कर्णरन्ध्रः ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने दोषों से हमें नरक भी मिले तो स्वीकार है, यदि मन आपके चरणों में रमे, वाणी तुलसी जैसी सेवा बने और कान आपका गुणगान सुनें।

श्लोक 15.50

प्रादुश्चकर्थ यदिदं पुरुहूत रूपं तेनेश निर्वृतिमवापुरलं दृशो नः । तस्मा इदं भगवते नम इद्विधेम योऽनात्मनां दुरुदयो भगवान् प्रतीतः ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपके प्रकट रूप से हमारी दृष्टि परम तृप्त हुई; अनात्मदृष्टि वालों को दुर्लभ किन्तु भक्तों को सुलभ भगवान को नमस्कार।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 15 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 16

भगवान की विनयलीला और पार्षदों का अवतरण

श्लोक 16.1

ब्रह्मोवाच । इति तद्गृणतां तेषां मुनीनां योगधर्मिणाम् । प्रतिनन्द्य जगादेदं विकुण्ठनिलयो विभुः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा बोले—योगनिष्ठ कुमारों की स्तुति का अभिनन्दन करके वैकुण्ठनाथ भगवान ने उत्तर दिया।

श्लोक 16.2

श्रीभगवानुवाच । एतौ तौ पार्षदौ मह्यं जयो विजय एव च । कदर्थीकृत्य मां यद्वो बह्वक्रातामतिक्रमम् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—ये मेरे पार्षद जय और विजय हैं; इन्होंने आपका अनादर करके मेरी आज्ञा का भी उल्लङ्घन किया है।

श्लोक 16.3

यस्त्वेतयोर्धृतो दण्डो भवद्भिर्मामनुव्रतैः । स एवानुमतोऽस्माभिर्मुनयो देवहेलनात् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरे अनुयायी मुनियों ने इनके संत-अवमान पर जो दण्ड दिया है, उसका मैं अनुमोदन करता हूँ।

श्लोक 16.4

तद्वः प्रसादयाम्यद्य ब्रह्म दैवं परं हि मे । तद्धीत्यात्मकृतं मन्ये यत्स्वपुम्भिरसत्कृताः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप मेरे लिए परम पूज्य हैं; मेरे सेवकों द्वारा आपका अपमान हुआ, इसलिए उसे अपना अपराध मानकर आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ।

श्लोक 16.5

यन्नामानि च गृह्णाति लोको भृत्ये कृतागसि । सोऽसाधुवादस्तत्कीर्तिं हन्ति त्वचमिवामयः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: सेवक का दोष होने पर लोग स्वामी का भी नाम लेते हैं; वैसी निन्दा यश को ऐसे क्षति पहुँचाती है जैसे रोग त्वचा को।

श्लोक 16.6

यस्यामृतामलयशः श्रवणावगाहः सद्यः पुनाति जगदाश्वपचाद्विकुण्ठः । सोऽहं भवद्भ्य उपलब्धसुतीर्थकीर्ति- श्छिन्द्यां स्वबाहुमपि वः प्रतिकूलवृत्तिम् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरा निर्मल यश सुनना सबको पवित्र करता है; भक्तों से ही मेरा यश फैलता है, इसलिए आपके विरोध में हो तो मैं अपनी भुजा भी त्याग दूँ।

श्लोक 16.7

यत्सेवया चरणपद्मपवित्ररेणुं सद्यः क्षताखिलमलं प्रतिलब्धशीलम् । न श्रीर्विरक्तमपि मां विजहाति यस्याः प्रेक्षालवार्थ इतरे नियमान् वहन्ति ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिन लक्ष्मी की कृपादृष्टि के लिए लोग व्रत करते हैं, वे भी मेरी अनासक्ति के बावजूद सेवा और पवित्र चरणाश्रय के कारण मुझे नहीं छोड़तीं।

श्लोक 16.8

नाहं तथाद्मि यजमानहविर्विताने श्च्योतद्घृतप्लुतमदन् हुतभुङ्मुखेन । यद्ब्राह्मणस्य मुखतश्चरतोऽनुघासं तुष्टस्य मय्यवहितैर्निजकर्मपाकैः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रेमपूर्वक अर्पित भोजन से तृप्त संत के माध्यम से जितना आनन्द पाता हूँ, उतना केवल अग्नि में घृताहुति से नहीं।

श्लोक 16.9

येषां बिभर्म्यहमखण्डविकुण्ठयोग- मायाविभूतिरमलाङ्घ्रिरजःकिरीटैः । विप्रांस्तु को न विषहेत यदर्हणाम्भः सद्यः पुनाति सह चन्द्रललाम लोकान् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं ज्ञानी संतों की निर्मल चरणरज मुकुट पर धारण करता हूँ; जिनकी सेवा का जल लोकों को पावन करता है, उनका अनादर कौन करे?

श्लोक 16.10

ये मे तनूर्द्विजवरान् दुहतीर्मदीया भूतान्यलब्धशरणानि च भेदबुद्ध्या । द्रक्ष्यन्त्यघक्षतदृशो ह्यहिमन्यवस्तान् गृध्रा रुषा मम कुषन्त्यधिदण्डनेतुः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानी जन, गौएँ और निराश्रित जीव मेरे अपने रूप हैं; क्रोध और भेदबुद्धि से उन्हें सताने वालों को कठोर कर्मफल मिलता है।

श्लोक 16.11

ये ब्राह्मणान् मयि धिया क्षिपतोऽर्चयन्तः तुष्यद्धृदः स्मितसुधोक्षितपद्मवक्त्राः । वाण्यानुरागकलयाऽऽत्मजवद्गृणन्तः सम्बोधयन्त्यहमिवाहमुपाहृतस्तैः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो मुझे स्मरण करके कटुवचन कहने वाले ज्ञानी जन से भी प्रेम, विनय और पुत्रवत् स्नेह से बोलते हैं, वे मुझे वश में कर लेते हैं।

श्लोक 16.12

तन्मे स्वभर्तुरवसायमलक्षमाणौ युष्मद्व्यतिक्रमगतिं प्रतिपद्य सद्यः । भूयो ममान्तिकमितां तदनुग्रहो मे यत्कल्पतामचिरतो भृतयोर्विवासः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन दोनों ने मेरे मन का भाव न समझकर आपका अपराध किया; ऐसी कृपा हो कि इनका निर्वासन छोटा हो और ये शीघ्र मेरे पास लौटें।

श्लोक 16.13

ब्रह्मोवाच । अथ तस्योशतीं देवीमृषिकुल्यां सरस्वतीम् । नास्वाद्य मन्युदष्टानां तेषामात्माप्यतृप्यत ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा कहते हैं—क्रोध से प्रभावित मुनियों ने भगवान की सरस वाणी सुनी; उसका अमृत जितना पीते, उतनी ही तृप्ति की चाह बढ़ती थी।

श्लोक 16.14

सतीं व्यादाय श‍ृण्वन्तो लघ्वीं गुर्वर्थगह्वराम् । विगाह्यागाधगम्भीरां न विदुस्तच्चिकीर्षितम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की सरल किन्तु गम्भीर अर्थभरी वाणी में डूबकर भी वे उनका पूरा अभिप्राय समझ नहीं सके।

श्लोक 16.15

ते योगमाययाऽऽरब्धपारमेष्ठ्यमहोदयम् । प्रोचुः प्राञ्जलयो विप्राः प्रहृष्टाः क्षुभितत्वचः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की योगमाया और अनुग्रह से चकित कुमार प्रसन्न, रोमाञ्चित होकर हाथ जोड़कर बोले।

श्लोक 16.16

ऋषय ऊचुः । न वयं भगवन् विद्मस्तव देव चिकीर्षितम् । कृतो मेऽनुग्रहश्चेति यदध्यक्षः प्रभाषसे ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे प्रभु, हम आपका अभिप्राय नहीं समझते; सर्वाध्यक्ष होकर भी आप कहते हैं कि हमने आपका उपकार किया।

श्लोक 16.17

ब्रह्मण्यस्य परं दैवं ब्राह्मणाः किल ते प्रभो । विप्राणां देवदेवानां भगवानात्मदैवतम् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप ज्ञान और संतों का आदर करते हैं, किन्तु स्वयं उन सबके परम आराध्य और अन्तरात्मा हैं।

श्लोक 16.18

त्वत्तः सनातनो धर्मो रक्ष्यते तनुभिस्तव । धर्मस्य परमो गुह्यो निर्विकारो भवान्मतः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: सनातन धर्म आपसे उत्पन्न और आपके अवतारों द्वारा रक्षित है; आप उस धर्म का निर्विकार, परम गूढ़ आश्रय हैं।

श्लोक 16.19

तरन्ति ह्यञ्जसा मृत्युं निवृत्ता यदनुग्रहात् । योगिनः स भवान् किं स्विदनुगृह्येत यत्परैः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपकी कृपा से वैराग्यवान योगी मृत्यु पार करते हैं; ऐसे स्वामी पर दूसरा कौन अनुग्रह कर सकता है?

श्लोक 16.20

यं वै विभूतिरुपयात्यनुवेलमन्यै- रर्थार्थिभिः स्वशिरसा धृतपादरेणुः । धन्यार्पिताङ्घ्रितुलसी नवदामधाम्नो लोकं मधुव्रतपतेरिव कामयाना ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: धन चाहने वाले जिन लक्ष्मी की चरणरज सिर पर रखते हैं, वे आपके तुलसीसुशोभित चरणों और वनमाला के आश्रय की इच्छा करती हैं।

श्लोक 16.21

यस्तां विविक्तचरितैरनुवर्तमानां नात्याद्रियत्परमभागवतप्रसङ्गः । स त्वं द्विजानुपथपुण्यरजःपुनीतः श्रीवत्सलक्ष्म किमगा भगभाजनस्त्वम् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप लक्ष्मी से भी अनासक्त रहकर भक्तों के सत्सङ्ग में रमे हैं; फिर संतों की चरणरज से पवित्र होने की बात आपकी विनयलीला ही है।

श्लोक 16.22

धर्मस्य ते भगवतस्त्रियुग त्रिभिः स्वैः पद्भिश्चराचरमिदं द्विजदेवतार्थम् । नूनं भृतं तदभिघाति रजस्तमश्च सत्त्वेन नो वरदया तनुवा निरस्य ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: धर्मस्वरूप प्रभु, अपने धर्म के आधारों से आप चराचर जगत को धारण करते हैं; कृपामय सत्त्वरूप से विरोधी रज और तम हटाइए।

श्लोक 16.23

न त्वं द्विजोत्तमकुलं यदि हात्मगोपं गोप्ता वृषः स्वर्हणेन स सूनृतेन । तर्ह्येव नङ्क्ष्यति शिवस्तव देव पन्था लोकोऽग्रहीष्यदृषभस्य हि तत्प्रमाणम् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: यदि आप ज्ञानरक्षक संतपरम्परा का आदर और मधुर वाणी से संरक्षण न करें तो लोग भी उसका सम्मान छोड़ देंगे।

श्लोक 16.24

तत्तेऽनभीष्टमिव सत्त्वनिधेर्विधित्सोः क्षेमं जनाय निजशक्तिभिरुद्धृतारेः । नैतावता त्र्यधिपतेर्बत विश्वभर्तुः तेजः क्षतं त्ववनतस्य स ते विनोदः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: शत्रुओं का नाश करके जगत का कल्याण करने वाले आप विनम्र हों तो तेज घटता नहीं; यह आपकी अपनी आनन्दलीला है।

श्लोक 16.25

यं वानयोर्दममधीश भवान् विधत्ते वृत्तिं नु वा तदनुमन्महि निर्व्यलीकम् । अस्मासु वा य उचितो ध्रियतां स दण्डो येऽनागसौ वयमयुङ्क्ष्महि किल्बिषेण ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन सेवकों या हमारे लिए जो दण्ड और व्यवस्था आपको उचित लगे, हम निष्कपट भाव से स्वीकार करते हैं।

श्लोक 16.26

श्रीभगवानुवाच । एतौ सुरेतरगतिं प्रतिपद्य सद्यः संरम्भसम्भृतसमाध्यनुबद्धयोगौ । भूयः सकाशमुपयास्यत आशु यो वः शापो मयैव निमितस्तदवैत विप्राः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—ये असुरयोनि पाकर मेरे प्रति प्रबल विरोध से भी चित्त मुझमें लगाए रखेंगे और शीघ्र लौटेंगे; यह शाप मेरी लीला का निमित्त बना है।

श्लोक 16.27

ब्रह्मोवाच । अथ ते मुनयो दृष्ट्वा नयनानन्दभाजनम् । वैकुण्ठं तदधिष्ठानं विकुण्ठं च स्वयम्प्रभम् ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा कहते हैं—मुनियों ने नेत्रों को आनन्द देने वाले वैकुण्ठधाम और स्वयंप्रकाश भगवान के दर्शन किए।

श्लोक 16.28

भगवन्तं परिक्रम्य प्रणिपत्यानुमान्य च । प्रतिजग्मुः प्रमुदिताः शंसन्तो वैष्णवीं श्रियम् ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर उनकी प्रदक्षिणा, प्रणाम और आज्ञा लेकर भगवान के वैभव का गुणगान करते हुए प्रसन्नतापूर्वक लौटे।

श्लोक 16.29

भगवाननुगावाह यातं मा भैष्टमस्तु शम् । ब्रह्मतेजः समर्थोऽपि हन्तुं नेच्छे मतं तु मे ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने पार्षदों से कहा—जाओ, डरो मत; कल्याण होगा। ऋषितेज मिटाने में समर्थ होकर भी मैं ऐसा नहीं चाहता।

श्लोक 16.30

एतत्पुरैव निर्दिष्टं रमया क्रुद्धया यदा । पुरापवारिता द्वारि विशन्ती मय्युपारते ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: पूर्व में लक्ष्मी को मेरे विश्राम के समय द्वार पर रोकने पर उन्होंने भी क्रुद्ध होकर ऐसा परिणाम कहा था।

श्लोक 16.31

मयि संरम्भयोगेन निस्तीर्य ब्रह्महेलनम् । प्रत्येष्यतं निकाशं मे कालेनाल्पीयसा पुनः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरे प्रति तीव्र चित्तलगाव द्वारा संत-अनादर का फल पार करके तुम थोड़े समय में फिर मेरे पास आओगे।

श्लोक 16.32

द्वाःस्थावादिश्य भगवान् विमानश्रेणिभूषणम् । सर्वातिशयया लक्ष्म्या जुष्टं स्वं धिष्ण्यमाविशत् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: द्वारपालों को आदेश देकर भगवान अपूर्व ऐश्वर्य और दिव्य विमानों से सुशोभित अपने धाम में लौट गए।

श्लोक 16.33

तौ तु गीर्वाणऋषभौ दुस्तराद्धरिलोकतः । हतश्रियौ ब्रह्मशापादभूतां विगतस्मयौ ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऋषिशाप से उन श्रेष्ठ पार्षदों का वैकुण्ठवैभव छूट गया और उनका अभिमान मिट गया।

श्लोक 16.34

तदा विकुण्ठधिषणात्तयोर्निपतमानयोः । हाहाकारो महानासीद्विमानाग्र्येषु पुत्रकाः ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वैकुण्ठ से उनके नीचे आने पर विमानों में रहने वाले भक्तों में बड़ा हाहाकार हुआ।

श्लोक 16.35

तावेव ह्यधुना प्राप्तौ पार्षदप्रवरौ हरेः । दितेर्जठरनिर्विष्टं काश्यपं तेज उल्बणम् ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे देवताओं, वे ही दोनों श्रेष्ठ पार्षद अब कश्यप के प्रबल गर्भतेज के रूप में दिति के उदर में आए हैं।

श्लोक 16.36

तयोरसुरयोरद्य तेजसा यमयोर्हि वः । आक्षिप्तं तेज एतर्हि भगवांस्तद्विधित्सति ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन जुड़वाँ असुरों के तेज ने अभी तुम्हारा तेज दबा दिया है; भगवान स्वयं इसकी उचित व्यवस्था करेंगे।

श्लोक 16.37

विश्वस्य यः स्थितिलयोद्भवहेतुराद्यो योगेश्वरैरपि दुरत्यययोगमायः । क्षेमं विधास्यति स नो भगवांस्त्र्यधीशः तत्रास्मदीयविमृशेन कियानिहार्थः ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो जगत के आदिकारण, पालक और संहारकर्ता हैं तथा जिनकी योगमाया अजेय है, वही हमारा कल्याण करेंगे; अत्यधिक चिन्ता व्यर्थ है।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 16 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 17

हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष का जन्म

श्लोक 17.1

मैत्रेय उवाच । निशम्यात्मभुवा गीतं कारणं शङ्कयोज्झिताः । ततः सर्वे न्यवर्तन्त त्रिदिवाय दिवौकसः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—ब्रह्मा से यह कारण सुनकर देवताओं का भय और संशय मिट गया और वे स्वर्ग लौट गए।

श्लोक 17.2

दितिस्तु भर्तुरादेशादपत्यपरिशङ्किनी । पूर्णे वर्षशते साध्वी पुत्रौ प्रसुषुवे यमौ ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: सन्तानों के अनिष्ट की आशंका रखती दिति ने सौ वर्ष पूरे होने पर दो जुड़वाँ पुत्रों को जन्म दिया।

श्लोक 17.3

उत्पाता बहवस्तत्र निपेतुर्जायमानयोः । दिवि भुव्यन्तरिक्षे च लोकस्योरुभयावहाः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके जन्म के समय आकाश, पृथ्वी और अन्तरिक्ष में अनेक भयकारी उत्पात प्रकट हुए।

श्लोक 17.4

सहाचला भुवश्चेलुर्दिशः सर्वाः प्रजज्वलुः । सोल्काश्चाशनयः पेतुः केतवश्चार्तिहेतवः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: पर्वतों सहित पृथ्वी काँपी, दिशाएँ दहकती लगीं और उल्काएँ, वज्र तथा अशुभ धूमकेतु दिखाई दिए।

श्लोक 17.5

ववौ वायुः सुदुःस्पर्शः फूत्कारानीरयन् मुहुः । उन्मूलयन्नगपतीन् वात्यानीको रजोध्वजः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: तीखी, गर्जन करती वायु चली; धूल के झण्डे उठाती आँधियाँ बड़े वृक्ष उखाड़ने लगीं।

श्लोक 17.6

उद्धसत्तडिदम्भोदघटया नष्टभागणे । व्योम्नि प्रविष्टतमसा न स्म व्यादृश्यते पदम् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: बिजली चमकते मेघों और घने अन्धकार से तारे छिप गए; मार्ग तक दिखाई नहीं देता था।

श्लोक 17.7

चुक्रोश विमना वार्धिरुदूर्मिः क्षुभितोदरः । सोदपानाश्च सरितश्चुक्षुभुः शुष्कपङ्कजाः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: समुद्र विक्षुब्ध होकर गरजने लगा; नदियाँ और जलाशय हिल उठे तथा कमल मुरझाने लगे।

श्लोक 17.8

मुहुः परिधयोऽभूवन् सराह्वोः शशिसूर्ययोः । निर्घाता रथनिर्ह्रादा विवरेभ्यः प्रजज्ञिरे ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूर्य-चन्द्र के चारों ओर वलय और ग्रहण जैसे संकेत हुए; पर्वतगुहाओं से वज्र और रथ जैसी ध्वनियाँ आईं।

श्लोक 17.9

अन्तर्ग्रामेषु मुखतो वमन्त्यो वह्निमुल्बणम् । सृगालोलूकटङ्कारैः प्रणेदुरशिवं शिवाः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: गाँवों में सियारियाँ मुख से अग्नि निकलती जैसी दिखाई देतीं और सियार-उल्लुओं के साथ अमङ्गल स्वर करती थीं।

श्लोक 17.10

सङ्गीतवद्रोदनवदुन्नमय्य शिरोधराम् । व्यमुञ्चन् विविधा वाचो ग्रामसिंहास्ततस्ततः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: कुत्ते गर्दन उठाकर कहीं गाने और कहीं रोने जैसे अनेक प्रकार के स्वर करने लगे।

श्लोक 17.11

खराश्च कर्कशैः क्षत्तः खुरैर्घ्नन्तो धरातलम् । खार्काररभसा मत्ताः पर्यधावन् वरूथशः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: गधे झुण्डों में उन्मत्त होकर दौड़ते, कठोर खुरों से धरती पीटते और तीखा रेंकते थे।

श्लोक 17.12

रुदन्तो रासभत्रस्ता नीडादुदपतन् खगाः । घोषेऽरण्ये च पशवः शकृन्मूत्रमकुर्वत ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: गधों की आवाज से भयभीत पक्षी घोंसलों से उड़ गए; गाँव और वन के पशु भय से मल-मूत्र त्यागने लगे।

श्लोक 17.13

गावोऽत्रसन्नसृग्दोहास्तोयदाः पूयवर्षिणः । व्यरुदन् देवलिङ्गानि द्रुमाः पेतुर्विनानिलम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: कथा में गौओं से रक्तमिश्रित दुग्ध, दूषित वर्षा, प्रतिमाओं का रोना और बिना हवा वृक्षों का गिरना जैसे उत्पात वर्णित हैं।

श्लोक 17.14

ग्रहान् पुण्यतमानन्ये भगणांश्चापि दीपिताः । अतिचेरुर्वक्रगत्या युयुधुश्च परस्परम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: अशुभ ग्रह अत्यन्त चमककर शुभ ग्रहों और नक्षत्रों को पार करते तथा वक्रगति में परस्पर संघर्ष जैसे दिखाई दिए।

श्लोक 17.15

दृष्ट्वान्यांश्च महोत्पातानतत्तत्त्वविदः प्रजाः । ब्रह्मपुत्रान् ऋते भीता मेनिरे विश्वसम्प्लवम् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: कारण न जानने वाली प्रजा इन उत्पातों से प्रलय समझकर डर गई; केवल ब्रह्मा के पुत्र वास्तविक रहस्य जानते थे।

श्लोक 17.16

तावादिदैत्यौ सहसा व्यज्यमानात्मपौरुषौ । ववृधातेऽश्मसारेण कायेनाद्रिपती इव ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: दोनों आदिदैत्य अपना पराक्रम प्रकट करते हुए शीघ्र ही कठोर शरीर वाले विशाल पर्वतों जैसे बढ़ गए।

श्लोक 17.17

दिविस्पृशौ हेमकिरीटकोटिभिः निरुद्धकाष्ठौ स्फुरदङ्गदा भुजौ । गां कम्पयन्तौ चरणैः पदे पदे कट्या सुकाञ्च्यार्कमतीत्य तस्थतुः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके स्वर्णमुकुट मानो आकाश छूते, भुजाएँ दिशाएँ घेरतीं और हर कदम धरती काँपती थी; उनका तेज प्रबल था।

श्लोक 17.18

प्रजापतिर्नाम तयोरकार्षीद्- यः प्राक् स्वदेहाद्यमयोरजायत । तं वै हिरण्यकशिपुं विदुः प्रजा यं तं हिरण्याक्षमसूत साग्रतः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: कश्यप ने दोनों के नाम हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष रखे; हिरण्यकशिपु को गर्भक्रम से ज्येष्ठ कहा गया।

श्लोक 17.19

चक्रे हिरण्यकशिपुर्दोर्भ्यां ब्रह्मवरेण च । वशे सपालान् लोकांस्त्रीनकुतोमृत्युरुद्धतः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: हिरण्यकशिपु ने अपने बाहुबल और ब्रह्मा के वरदान से निर्भय-अहंकारी होकर लोकपालों सहित तीनों लोक वश में कर लिए।

श्लोक 17.20

हिरण्याक्षोऽनुजस्तस्य प्रियः प्रीतिकृदन्वहम् । गदापाणिर्दिवं यातो युयुत्सुर्मृगयन् रणम् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसका प्रिय छोटा भाई हिरण्याक्ष गदा लेकर युद्ध की खोज में स्वर्ग जा पहुँचा।

श्लोक 17.21

तं वीक्ष्य दुःसहजवं रणत्काञ्चननूपुरम् । वैजयन्त्या स्रजा जुष्टमंसन्यस्तमहागदम् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसके वेग को सहना कठिन था; स्वर्णनूपुर बजते, वैजयन्ती माला शोभती और कन्धे पर विशाल गदा थी।

श्लोक 17.22

मनोवीर्यवरोत्सिक्तमसृण्यमकुतोभयम् । भीता निलिल्यिरे देवास्तार्क्ष्यत्रस्ता इवाहयः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: बल, साहस और वरदान के मद से उन्मत्त उस निरङ्कुश दैत्य को देखकर देव गरुड़ से डरे सर्पों की तरह छिप गए।

श्लोक 17.23

स वै तिरोहितान् दृष्ट्वा महसा स्वेन दैत्यराट् । सेन्द्रान् देवगणान् क्षीबानपश्यन् व्यनदद्भृशम् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्र सहित देवों को अपने तेज से छिपा हुआ पाकर हिरण्याक्ष जोर-जोर से गर्जना करने लगा।

श्लोक 17.24

ततो निवृत्तः क्रीडिष्यन् गम्भीरं भीमनिःस्वनम् । विजगाहे महासत्त्वो वार्धिं मत्त इव द्विपः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह वहाँ से लौटकर उन्मत्त हाथी की तरह खेलता हुआ गम्भीर और गर्जनशील समुद्र में उतर गया।

श्लोक 17.25

तस्मिन् प्रविष्टे वरुणस्य सैनिका यादोगणाः सन्नधियः ससाध्वसाः । अहन्यमाना अपि तस्य वर्चसा प्रधर्षिता दूरतरं प्रदुद्रुवुः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसके समुद्र में घुसते ही वरुण के सैनिक जलचर भयभीत हो गए; बिना प्रहार के ही उसके तेज से दूर भागे।

श्लोक 17.26

स वर्षपूगानुदधौ महाबल- श्चरन्महोर्मीञ्छ्वसनेरितान् मुहुः । मौर्व्याभिजघ्ने गदया विभावरी- मासेदिवांस्तात पुरीं प्रचेतसः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वर्षों तक समुद्र में घूमते और तरङ्गों को गदा से पीटते हुए वह वरुण की विभावरी नगरी पहुँचा।

श्लोक 17.27

तत्रोपलभ्यासुरलोकपालकं यादोगणानामृषभं प्रचेतसम् । स्मयन् प्रलब्धुं प्रणिपत्य नीचव- ज्जगादमे देह्यधिराज संयुगम् ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: जलचरों के अधिपति वरुण के सामने उपहासपूर्ण विनय से झुककर बोला—हे अधिराज, मुझे युद्ध दीजिए।

श्लोक 17.28

त्वं लोकपालोऽधिपतिर्बृहच्छ्रवा वीर्यापहो दुर्मदवीरमानिनाम् । विजित्य लोकेऽखिलदैत्यदानवान् यद्राजसूयेन पुरायजत्प्रभो ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप प्रसिद्ध लोकपाल हैं, अभिमानी वीरों का मद तोड़ते हैं और दैत्य-दानवों को जीतकर राजसूय कर चुके हैं।

श्लोक 17.29

स एवमुत्सिक्तमदेन विद्विषा दृढं प्रलब्धो भगवानपाम्पतिः । रोषं समुत्थं शमयन् स्वया धिया व्यवोचदङ्गोपशमं गता वयम् ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसके उपहास से क्रोध आने पर भी वरुण ने विवेक से उसे शान्त किया और कहा—हम अब युद्ध से विरत हो चुके हैं।

श्लोक 17.30

पश्यामि नान्यं पुरुषात्पुरातनात् यः संयुगे त्वां रणमार्गकोविदम् । आराधयिष्यत्यसुरर्षभेहि तं मनस्विनो यं गृणते भवादृशाः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम जैसे युद्धकुशल का सामना करने योग्य पुरातन पुरुष भगवान के अतिरिक्त कोई नहीं दिखता; उन्हीं के पास जाओ।

श्लोक 17.31

तं वीरमारादभिपद्य विस्मयः शयिष्यसे वीरशये श्वभिर्वृतः । यस्त्वद्विधानामसतां प्रशान्तये रूपाणि धत्ते सदनुग्रहेच्छया ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके पास पहुँचकर तुम्हारा अभिमान मिटेगा और तुम रणभूमि में गिरोगे; वे संतों की रक्षा और दुष्टों की शान्ति के लिए रूप धारण करते हैं।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 17 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 18

वराहभगवान और हिरण्याक्ष का युद्ध

श्लोक 18.1

मैत्रेय उवाच । तदेवमाकर्ण्य जलेशभाषितं महामनास्तद्विगणय्य दुर्मदः । हरेर्विदित्वा गतिमङ्ग नारदा- द्रसातलं निर्विविशे त्वरान्वितः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—वरुण की चेतावनी को तुच्छ मानकर हिरण्याक्ष ने नारद से भगवान का स्थान जाना और शीघ्र रसातल पहुँचा।

श्लोक 18.2

ददर्श तत्राभिजितं धराधरं प्रोन्नीयमानावनिमग्रदंष्ट्रया । मुष्णन्तमक्ष्णा स्वरुचोऽरुणश्रिया जहास चाहो वनगोचरो मृगः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ उसने लाल नेत्रों की दीप्ति वाले वराहभगवान को दाँत पर पृथ्वी उठाते देखा और हँसकर कहा—यह वन का पशु है!

श्लोक 18.3

आहैनमेह्यज्ञ महीं विमुञ्च नो रसौकसां विश्वसृजेयमर्पिता । न स्वस्ति यास्यस्यनया ममेक्षतः सुराधमासादितसूकराकृते ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसने अपमानपूर्वक कहा—पृथ्वी छोड़ दो; यह रसातलवासियों को सौंपी गई है। मेरे सामने इसे ले जाकर कुशल से नहीं लौटोगे।

श्लोक 18.4

त्वं नः सपत्नैरभवाय किं भृतो यो मायया हन्त्यसुरान् परोक्षजित् । त्वां योगमायाबलमल्पपौरुषं संस्थाप्य मूढ प्रमृजे सुहृच्छुचः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्या हमारे शत्रुओं ने तुम्हें असुरों को छल से मारने के लिए रखा है? मैं तुम्हें समाप्त कर अपने स्वजनों का शोक मिटाऊँगा।

श्लोक 18.5

त्वयि संस्थिते गदया शीर्णशीर्ष- ण्यस्मद्भुजच्युतया ये च तुभ्यम् । बलिं हरन्त्यृषयो ये च देवाः स्वयं सर्वे न भविष्यन्त्यमूलाः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरी गदा से तुम्हारा सिर चूर होने पर तुम्हारे आश्रित देव और ऋषि भी आधारहीन होकर नष्ट हो जाएँगे।

श्लोक 18.6

स तुद्यमानोऽरिदुरुक्ततोमरै- र्दंष्ट्राग्रगां गामुपलक्ष्य भीताम् । तोदं मृषन् निरगादम्बुमध्या- द्ग्राहाहतः स करेणुर्यथेभः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: शत्रु के कटुवचन सहते हुए भगवान भयभीत पृथ्वी की रक्षा के लिए जल से बाहर आए, जैसे हथिनी को बचाता हाथी।

श्लोक 18.7

तं निःसरन्तं सलिलादनुद्रुतो हिरण्यकेशो द्विरदं यथा झषः । करालदंष्ट्रोऽशनिनिस्वनोऽब्रवी- द्गतह्रियां किं त्वसतां विगर्हितम् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: हिरण्याक्ष पीछे दौड़ा और गरजकर फिर अपमान करने लगा; निर्लज्ज दुष्ट के लिए कौन-सी निन्दित बात कठिन होती है?

श्लोक 18.8

स गामुदस्तात्सलिलस्य गोचरे विन्यस्य तस्यामदधात्स्वसत्त्वम् । अभिष्टुतो विश्वसृजा प्रसूनै- रापूर्यमाणो विबुधैः पश्यतोऽरेः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: शत्रु के सामने ही प्रभु ने पृथ्वी को जल के ऊपर स्थिर करके उसमें धारणशक्ति स्थापित की; ब्रह्मा ने स्तुति और देवों ने पुष्पवृष्टि की।

श्लोक 18.9

परानुषक्तं तपनीयोपकल्पं महागदं काञ्चनचित्रदंशम् । मर्माण्यभीक्ष्णं प्रतुदन्तं दुरुक्तैः प्रचण्डमन्युः प्रहसंस्तं बभाषे ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वर्णालङ्कृत कवच और विशाल गदा वाले दैत्य के तीखे अपशब्द सुनकर भगवान धर्मरक्षक क्रोध सहित हँसते हुए बोले।

श्लोक 18.10

श्रीभगवानुवाच । सत्यं वयं भो वनगोचरा मृगा युष्मद्विधान् मृगये ग्रामसिंहान् । न मृत्युपाशैः प्रतिमुक्तस्य वीरा विकत्थनं तव गृह्णन्त्यभद्र ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—हाँ, हम वनचारी हैं और तुम जैसे उद्दण्डों को खोजते हैं; मृत्यु के फन्दे में पड़े तुम्हारे घमण्ड को वीर महत्व नहीं देते।

श्लोक 18.11

एते वयं न्यासहरा रसौकसां गतह्रियो गदया द्रावितास्ते । तिष्ठामहेऽथापि कथञ्चिदाजौ स्थेयं क्व यामो बलिनोत्पाद्य वैरम् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: मान लिया हम रसातल की धरोहर लेने वाले और तुम्हारी गदा से डराए गए हैं; फिर भी रण में खड़े हैं, अब कहाँ जाएँ?

श्लोक 18.12

त्वं पद्रथानां किल यूथपाधिपो घटस्व नोऽस्वस्तय आश्वनूहः । संस्थाप्य चास्मान् प्रमृजाश्रु स्वकानां यः स्वां प्रतिज्ञां नातिपिपर्त्यसभ्यः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम पैदल योद्धाओं के बड़े सेनापति हो, इसलिए अपना पराक्रम दिखाओ; अपनी प्रतिज्ञा पूरी करके स्वजनों के आँसू पोंछो।

श्लोक 18.13

मैत्रेय उवाच । सोऽधिक्षिप्तो भगवता प्रलब्धश्च रुषा भृशम् । आजहारोल्बणं क्रोधं क्रीड्यमानोऽहिराडिव ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—भगवान के परिहास से वह दैत्य छेड़े हुए बड़े सर्प की तरह अत्यन्त क्रुद्ध हो गया।

श्लोक 18.14

सृजन्नमर्षितः श्वासान् मन्युप्रचलितेन्द्रियः । आसाद्य तरसा दैत्यो गदयाभ्यहनद्धरिम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्रोध से काँपते और फुफकारते हुए उसने तेजी से पास आकर हरि पर गदा चलाई।

श्लोक 18.15

भगवांस्तु गदावेगं विसृष्टं रिपुणोरसि । अवञ्चयत्तिरश्चीनो योगारूढ इवान्तकम् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने शरीर तिरछा करके वक्ष पर आता प्रहार बचाया, जैसे सिद्ध योगी मृत्यु के आक्रमण को पार कर ले।

श्लोक 18.16

पुनर्गदां स्वामादाय भ्रामयन्तमभीक्ष्णशः । अभ्यधावद्धरिः क्रुद्धः संरम्भाद्दष्टदच्छदम् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: दैत्य फिर गदा घुमाने लगा; हरि उसके सामने बढ़े, जबकि वह क्रोध से अपना अधर काट रहा था।

श्लोक 18.17

ततश्च गदयारातिं दक्षिणस्यां भ्रुवि प्रभुः । आजघ्ने स तु तां सौम्य गदया कोविदोऽहनत् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने उसकी दाहिनी भौंह की ओर गदा चलाई; युद्धकुशल दैत्य ने अपनी गदा से उसे रोक लिया।

श्लोक 18.18

एवं गदाभ्यां गुर्वीभ्यां हर्यक्षो हरिरेव च । जिगीषया सुसंरब्धावन्योन्यमभिजघ्नतुः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार हरि और हिरण्याक्ष जीतने की इच्छा से भारी गदाओं द्वारा एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे।

श्लोक 18.19

तयोः स्पृधोस्तिग्मगदाहताङ्गयोः क्षतास्रवघ्राणविवृद्धमन्य्वोः । विचित्रमार्गांश्चरतोर्जिगीषया व्यभादिलायामिव शुष्मिणोर्मृधः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: तीखे प्रहारों से दोनों के अंगों पर घाव हुए; क्रोध और विविध रणचालों से उनका युद्ध दो प्रबल साँड़ों के संघर्ष जैसा शोभित हुआ।

श्लोक 18.20

दैत्यस्य यज्ञावयवस्य माया- गृहीतवाराहतनोर्महात्मनः । कौरव्य मह्यां द्विषतोर्विमर्दनं दिदृक्षुरागादृषिभिर्वृतः स्वराट् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञाङ्गों वाले वराहभगवान और दैत्य का पृथ्वी के लिए युद्ध देखने ब्रह्मा ऋषियों सहित वहाँ आए।

श्लोक 18.21

आसन्नशौण्डीरमपेतसाध्वसं कृतप्रतीकारमहार्यविक्रमम् । विलक्ष्य दैत्यं भगवान् सहस्रणी- र्जगाद नारायणमादिसूकरम् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: दैत्य को निर्भय, रणकुशल और प्रबल प्रत्युत्तर देता देखकर ब्रह्मा ने आदिवराह नारायण से निवेदन किया।

श्लोक 18.22

ब्रह्मोवाच । एष ते देव देवानामङ्घ्रिमूलमुपेयुषाम् । विप्राणां सौरभेयीणां भूतानामप्यनागसाम् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे देव, आपके चरणाश्रित देवों, ब्राह्मणों, गौओं और निर्दोष जीवों के विरुद्ध यह अत्याचार करता है।

श्लोक 18.23

आगस्कृद्भयकृद्दुष्कृदस्मद्राद्धवरोऽसुरः । अन्वेषन्नप्रतिरथो लोकानटति कण्टकः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरे वरदान से उन्मत्त यह असुर लोकों का कण्टक बनकर अपने योग्य प्रतिद्वन्द्वी खोजता फिरता है।

श्लोक 18.24

मैनं मायाविनं दृप्तं निरङ्कुशमसत्तमम् । आक्रीड बालवद्देव यथाशीविषमुत्थितम् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस मायावी, घमण्डी और निरङ्कुश दुष्ट से बालक की तरह अधिक खेल मत कीजिए; यह उठे हुए विषधर जैसा है।

श्लोक 18.25

न यावदेष वर्धेत स्वां वेलां प्राप्य दारुणः । स्वां देव मायामास्थाय तावज्जह्यघमच्युत ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसकी बलवृद्धि का अनुकूल समय आने से पहले अपनी शक्ति से इस पापकारी का अन्त कीजिए।

श्लोक 18.26

एषा घोरतमा सन्ध्या लोकच्छम्बट्करी प्रभो । उपसर्पति सर्वात्मन् सुराणां जयमावह ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: भयकारी सन्ध्या निकट आ रही है; हे सर्वात्मन्, देवों को विजय प्रदान कीजिए।

श्लोक 18.27

अधुनैषोऽभिजिन्नाम योगो मौहूर्तिको ह्यगात् । शिवाय नस्त्वं सुहृदामाशु निस्तर दुस्तरम् ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अभिजित् नामक शुभ मुहूर्त का योग आया है; हम शुभचिन्तकों के कल्याण के लिए इस कठिन संकट को शीघ्र दूर कीजिए।

श्लोक 18.28

दिष्ट्या त्वां विहितं मृत्युमयमासादितः स्वयम् । विक्रम्यैनं मृधे हत्वा लोकानाधेहि शर्मणि ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: सौभाग्य से यह स्वयं आपके पास आया है, जो इसकी नियत मृत्यु हैं; इसे परास्त करके लोकों को शान्ति दीजिए।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 18 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 19

हिरण्याक्षवध और देवताओं की स्तुति

श्लोक 19.1

मैत्रेय उवाच । अवधार्य विरिञ्चस्य निर्व्यलीकामृतं वचः । प्रहस्य प्रेमगर्भेण तदपाङ्गेन सोऽग्रहीत् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—ब्रह्मा की निष्कपट अमृतमयी वाणी सुनकर भगवान ने प्रेमपूर्ण दृष्टि और मुस्कान से उसका अनुमोदन किया।

श्लोक 19.2

ततः सपत्नं मुखतश्चरन्तमकुतोभयम् । जघानोत्पत्य गदया हनावसुरमक्षजः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर सामने निर्भय घूमते दैत्य की ठोड़ी की ओर भगवान ने उछलकर गदा का प्रहार किया।

श्लोक 19.3

सा हता तेन गदया विहता भगवत्करात् । विघूर्णितापतद्रेजे तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: दैत्य की गदा के आघात से भगवान की गदा घूमती हुई हाथ से नीचे गिर गई; यह अद्भुत दृश्य था।

श्लोक 19.4

स तदा लब्धतीर्थोऽपि न बबाधे निरायुधम् । मानयन् स मृधे धर्मं विष्वक्सेनं प्रकोपयन् ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: अवसर पाकर भी दैत्य ने निहत्थे भगवान पर वार नहीं किया; इस रणमर्यादा से उसने हरि के पराक्रम को और उकसाया।

श्लोक 19.5

गदायामपविद्धायां हाहाकारे विनिर्गते । मानयामास तद्धर्मं सुनाभं चास्मरद्विभुः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: गदा गिरते ही देवों में हाहाकार हुआ; भगवान ने शत्रु की युद्धमर्यादा का सम्मान करके सुदर्शनचक्र का स्मरण किया।

श्लोक 19.6

तं व्यग्रचक्रं दितिपुत्राधमेन स्वपार्षदमुख्येन विषज्जमानम् । चित्रा वाचोऽतद्विदां खेचराणां तत्रा स्मासन् स्वस्ति तेऽमुं जहीति ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने ही प्रमुख पार्षद के दैत्यरूप से युद्ध करते चक्रधारी प्रभु को देखकर रहस्य न जानने वाले देव बोले—आपकी जय हो, इसे मारिए।

श्लोक 19.7

स तं निशाम्यात्तरथाङ्गमग्रतो व्यवस्थितं पद्मपलाशलोचनम् । विलोक्य चामर्षपरिप्लुतेन्द्रियो रुषा स्वदन्तच्छदमादशच्छ्वसन् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: कमलनयन भगवान को चक्र सहित सामने देखकर दैत्य की इन्द्रियाँ क्रोध से भर गईं; वह अधर काटकर फुफकारने लगा।

श्लोक 19.8

करालदंष्ट्रश्चक्षुर्भ्यां सञ्चक्षाणो दहन्निव । अभिप्लुत्य स्वगदया हतोऽसीत्याहनद्धरिम् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: विकराल दाँत और जलती-सी दृष्टि से उछलकर उसने गदा चलाई और कहा—अब तुम मारे गए!

श्लोक 19.9

पदा सव्येन तां साधो भगवान् यज्ञसूकरः । लीलया मिषतः शत्रोः प्राहरद्वातरंहसम् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञवराह भगवान ने शत्रु के देखते-देखते वेगवान गदा को अपने बाएँ चरण से सहज ही दूर कर दिया।

श्लोक 19.10

आह चायुधमाधत्स्व घटस्व त्वं जिगीषसि । इत्युक्तः स तदा भूयस्ताडयन् व्यनदद्भृशम् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रभु ने कहा—हथियार उठाओ और जीतना चाहते हो तो पूरा प्रयत्न करो। यह सुनकर दैत्य ने गर्जना करके फिर प्रहार किया।

श्लोक 19.11

तां स आपततीं वीक्ष्य भगवान् समवस्थितः । जग्राह लीलया प्राप्तां गरुत्मानिव पन्नगीम् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने स्थिर रहकर आती गदा वैसे पकड़ ली जैसे गरुड़ सर्प को पकड़ लेते हैं।

श्लोक 19.12

स्वपौरुषे प्रतिहते हतमानो महासुरः । नैच्छद्गदां दीयमानां हरिणा विगतप्रभः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: पराक्रम निष्फल होने से उसका अभिमान और तेज घट गया; भगवान के लौटाने पर भी उसने गदा नहीं ली।

श्लोक 19.13

जग्राह त्रिशिखं शूलं ज्वलज्ज्वलनलोलुपम् । यज्ञाय धृतरूपाय विप्रायाभिचरन् यथा ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसने धधकती अग्नि जैसा तीन नोकों वाला शूल उठाया और यज्ञवराह पर वैरभाव से चलाया।

श्लोक 19.14

तदोजसा दैत्यमहाभटार्पितं चकासदन्तःख उदीर्णदीधिति । -चक्रेण चिच्छेद निशातनेमिना हरिर्यथा तार्क्ष्यपतत्रमुज्झितम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: आकाश में दीप्तिमान उस प्रबल शूल को भगवान ने तीखी धार वाले चक्र से काट दिया।

श्लोक 19.15

वृक्णे स्वशूले बहुधारिणा हरेः प्रत्येत्य विस्तीर्णमुरो विभूतिमत् । प्रवृद्धरोषः स कठोरमुष्टिना नदन् प्रहृत्यान्तरधीयतासुरः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: शूल टूटने पर दैत्य क्रोध से पास आया, भगवान के विशाल वक्ष पर कठोर मुक्का मारा और अदृश्य हो गया।

श्लोक 19.16

तेनेत्थमाहतः क्षत्तर्भगवानादिसूकरः । नाकम्पत मनाक् क्वापि स्रजा हत इव द्विपः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस प्रहार से आदिवराह भगवान जरा भी नहीं हिले, जैसे फूलों की माला से मारा हाथी विचलित नहीं होता।

श्लोक 19.17

अथोरुधाऽसृजन्मायां योगमायेश्वरे हरौ । यां विलोक्य प्रजास्त्रस्ता मेनिरेऽस्योपसंयमम् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर उसने योगमाया के स्वामी हरि के सामने अनेक आसुरी मायाएँ रचीं; उन्हें देखकर प्रजा प्रलय का भय मानने लगी।

श्लोक 19.18

प्रववुर्वायवश्चण्डास्तमः पांसवमैरयन् । दिग्भ्यो निपेतुर्ग्रावाणः क्षेपणैः प्रहिता इव ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रचण्ड आँधियों ने धूल का अन्धकार फैलाया और दिशाओं से मानो प्रक्षेपास्त्रों द्वारा फेंके पत्थर बरसने लगे।

श्लोक 19.19

द्यौर्नष्टभगणाभ्रौघैः सविद्युत्स्तनयित्नुभिः । वर्षद्भिः पूयकेशासृग्विण्मूत्रास्थीनि चासकृत् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: बिजली और गर्जन वाले घने मेघों ने आकाश ढक दिया; मायारूप से रक्त, अस्थि और दूषित पदार्थों की वर्षा दिखाई दी।

श्लोक 19.20

गिरयः प्रत्यदृश्यन्त नानायुधमुचोऽनघ । दिग्वाससो यातुधान्यः शूलिन्यो मुक्तमूर्धजाः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: अनेक आयुध छोड़ते पर्वत और खुले केशों वाली शूलधारिणी राक्षसियाँ दिखाई देने लगीं।

श्लोक 19.21

बहुभिर्यक्षरक्षोभिः पत्त्यश्वरथकुञ्जरैः । आततायिभिरुत्सृष्टा हिंस्रा वाचोऽतिवैशसाः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: पैदल, घोड़े, रथ और हाथियों सहित यक्ष-राक्षसों की मायावी सेनाएँ हिंसक ध्वनियाँ करने लगीं।

श्लोक 19.22

प्रादुष्कृतानां मायानामासुरीणां विनाशयत् । सुदर्शनास्त्रं भगवान् प्रायुङ्क्त दयितं त्रिपात् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन आसुरी मायाओं को नष्ट करने के लिए भगवान ने अपना प्रिय सुदर्शन अस्त्र चलाया।

श्लोक 19.23

तदा दितेः समभवत्सहसा हृदि वेपथुः । स्मरन्त्या भर्तुरादेशं स्तनाच्चासृक् प्रसुस्रुवे ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसी समय दिति को पति की भविष्यवाणी याद आई; उनका हृदय काँप उठा और स्तनों से रक्त बहने लगा।

श्लोक 19.24

विनष्टासु स्वमायासु भूयश्चाव्रज्य केशवम् । रुषोपगूहमानोऽमुं ददृशेऽवस्थितं बहिः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मायाएँ नष्ट होने पर हिरण्याक्ष फिर भगवान को बाँहों में जकड़ने दौड़ा, किन्तु उन्हें अपने घेरे के बाहर ही पाया।

श्लोक 19.25

तं मुष्टिभिर्विनिघ्नन्तं वज्रसारैरधोक्षजः । करेण कर्णमूलेऽहन् यथा त्वाष्ट्रं मरुत्पतिः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह वज्र जैसे मुक्कों से प्रहार करने लगा; भगवान ने उसके कान के मूल पर हाथ से चोट की।

श्लोक 19.26

स आहतो विश्वजिता ह्यवज्ञया परिभ्रमद्गात्र उदस्तलोचनः । विशीर्णबाह्वङ्घ्रिशिरोरुहोऽपत- द्यथा नगेन्द्रो लुलितो नभस्वता ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के उस सहज आघात से उसके अंग चक्कर खाकर ढीले पड़े और वह आँधी से उखड़े विशाल वृक्ष की तरह गिर गया।

श्लोक 19.27

क्षितौ शयानं तमकुण्ठवर्चसं करालदंष्ट्रं परिदष्टदच्छदम् । अजादयो वीक्ष्य शशंसुरागता अहो इमं को नु लभेत संस्थितिम् ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: धरती पर पड़े उस विकराल और तेजस्वी दैत्य को देखकर ब्रह्मा आदि बोले—ऐसा अन्त किसे सुलभ होता है!

श्लोक 19.28

यं योगिनो योगसमाधिना रहो ध्यायन्ति लिङ्गादसतो मुमुक्षया । तस्यैष दैत्यऋषभः पदाहतो मुखं प्रपश्यंस्तनुमुत्ससर्ज ह ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिन्हें योगी बन्धनमुक्ति के लिए एकान्त समाधि में ध्यान करते हैं, उन्हीं भगवान का मुख देखते हुए इस दैत्य ने शरीर छोड़ा।

श्लोक 19.29

एतौ तौ पार्षदावस्य शापाद्यातावसद्गतिम् । पुनः कतिपयैः स्थानं प्रपत्स्येते ह जन्मभिः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: ये दोनों उन्हीं के पार्षद हैं, जो शाप से असुरयोनि में आए; कुछ जन्मों के बाद अपने धाम लौट जाएँगे।

श्लोक 19.30

देवा ऊचुः । नमो नमस्तेऽखिलयज्ञतन्तवे स्थितौ गृहीतामलसत्त्वमूर्तये । दिष्ट्या हतोऽयं जगतामरुन्तुदः त्वत्पादभक्त्या वयमीश निर्वृताः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: देव बोले—समस्त यज्ञों के आधार और पालन हेतु निर्मल सत्त्वरूप लेने वाले प्रभु को प्रणाम; जगतपीड़क असुर मरा और हम आपकी भक्ति से शान्त हुए।

श्लोक 19.31

मैत्रेय उवाच । एवं हिरण्याक्षमसह्यविक्रमं स सादयित्वा हरिरादिसूकरः । जगाम लोकं स्वमखण्डितोत्सवं समीडितः पुष्करविष्टरादिभिः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—हिरण्याक्ष का अन्त करके, ब्रह्मा आदि की स्तुति स्वीकार कर आदिवराह हरि अपने निरन्तर उत्सवमय धाम लौट गए।

श्लोक 19.32

मया यथानूक्तमवादि ते हरेः कृतावतारस्य सुमित्रचेष्टितम् । यथा हिरण्याक्ष उदारविक्रमो महामृधे क्रीडनवन्निराकृतः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे मित्र, मैंने सुनी हुई परम्परा के अनुसार बताया कि भगवान ने अवतार लेकर प्रबल हिरण्याक्ष को खेल की तरह कैसे परास्त किया।

श्लोक 19.33

सूत उवाच । इति कौषारवाख्यातामाश्रुत्य भगवत्कथाम् । क्षत्ताऽऽनन्दं परं लेभे महाभागवतो द्विज ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—मैत्रेय से यह भगवत्कथा सुनकर महाभागवत विदुर ने परम आनन्द पाया।

श्लोक 19.34

अन्येषां पुण्यश्लोकानामुद्दामयशसां सताम् । उपश्रुत्य भवेन्मोदः श्रीवत्साङ्कस्य किं पुनः ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: महान संतों का यश सुनकर ही आनन्द मिलता है; फिर श्रीवत्सचिह्नधारी स्वयं भगवान की कथा का क्या कहना!

श्लोक 19.35

यो गजेन्द्रं झषग्रस्तं ध्यायन्तं चरणाम्बुजम् । क्रोशन्तीनां करेणूनां कृच्छ्रतोऽमोचयद्द्रुतम् ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: गजेन्द्र ने मगर के संकट में चरणकमल का ध्यान किया तो भगवान ने विलाप करती हथिनियों के बीच उसे तुरन्त छुड़ाया था।

श्लोक 19.36

तं सुखाराध्यमृजुभिरनन्यशरणैर्नृभिः । कृतज्ञः को न सेवेत दुराराध्यमसाधुभिः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: सरल और अनन्यशरण भक्तों से सहज प्रसन्न होने वाले, किन्तु दुष्टों को दुर्लभ उन कृतज्ञ प्रभु की सेवा कौन नहीं करेगा?

श्लोक 19.37

यो वै हिरण्याक्षवधं महाद्भुतं विक्रीडितं कारणसूकरात्मनः । श‍ृणोति गायत्यनुमोदतेऽञ्जसा विमुच्यते ब्रह्मवधादपि द्विजाः ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: कथा की फलश्रुति कहती है कि वराहभगवान की इस अद्भुत लीला का श्रद्धापूर्वक श्रवण, गान और अनुमोदन महापापों से भी शुद्ध करता है।

श्लोक 19.38

एतन्महापुण्यमलं पवित्रं धन्यं यशस्यं पदमायुराशिषाम् । प्राणेन्द्रियाणां युधि शौर्यवर्धनं नारायणोऽन्ते गतिरङ्ग श‍ृण्वताम् ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह कथा पुण्य, पवित्रता, यश, शुभ जीवन और साहस का आश्रय कही गई है; श्रद्धालु श्रोता का अन्तिम आश्रय नारायण होते हैं।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 19 समाप्त ॥

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इस भाग का भक्ति-सन्देश

विशाल कालचक्र के बीच भगवान की शरण, संतों का सम्मान और संयम मनुष्य को सही दिशा देते हैं। वराहावतार रक्षा और धर्मस्थापना की कथा है। जय-विजय का प्रसंग अहंकार से बचने और भूल होने पर विनम्रता अपनाने की शिक्षा देता है।

पाठाधार और संपादकीय जानकारी

प्राचीन मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents का “श्रीमद्भागवतम्—तृतीयस्कन्धः” है। अध्याय 11–19 में क्रमशः 41, 56, 50, 50, 50, 37, 31, 28 और 38 श्लोक हैं; कुल 381। कोष्ठकों में दिए गए अतिरिक्त वैकल्पिक पद मुख्य क्रम में नहीं मिलाए गए हैं। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना की स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है, किसी आधुनिक टीका की प्रतिलिपि नहीं। काल, लोक और उत्पातों का वर्णन पुराणपरम्परा के अनुसार है। अध्याय 11 के युगों की कुल गणना आगे दिए संख्याविभाग के अनुसार 12,000 दिव्य वर्ष है। अध्याय 13 में संक्षेप से कहा गया हिरण्याक्षवध अध्याय 18–19 में विस्तार पाता है।

॥ तृतीय स्कन्ध • भाग २ समाप्त ॥

॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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