श्रीमद्भागवत महापुराण तृतीय स्कन्ध भाग 3 — अध्याय 20–33, कपिल–देवहूति संवाद और भक्तियोग
श्रीमद्भागवत महापुराण
तृतीय स्कन्ध • भाग ३ • अध्याय २०–३३
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कपिलभगवान का ज्ञान और देवहूति की सिद्धि
इस अंतिम भाग में सृष्टिविस्तार से आगे कर्दम और देवहूति की कथा, कपिलभगवान का प्राकट्य तथा उनका भक्तियोग और आत्मज्ञान का उपदेश आता है। भगवान का ध्यान, सभी जीवों पर दया, जन्म-मरण के बन्धन से निवृत्ति और देवहूति की सिद्धि के साथ तृतीय स्कन्ध पूर्ण होता है।
यहाँ अध्याय 20–33 के सभी 649 श्लोक क्रम से हैं। प्रत्येक का सरल हिंदी भावार्थ स्वतंत्र रूप से लिखा गया है। पहले दो भागों सहित तृतीय स्कन्ध के चुने हुए आधार-पाठ के सभी 33 अध्याय और 1,411 श्लोक पूर्ण होते हैं।
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 20
सृष्टि के विविध विभागों का विस्तार
श्लोक 20.1
सरल हिंदी भावार्थ: शौनक ने पूछा—पृथ्वी का निवासस्थान प्राप्त होने पर स्वायम्भुव मनु ने प्रजाओं के कल्याण और वंशविस्तार के लिए क्या किया?
श्लोक 20.2
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर कृष्ण के अनन्य भक्त और मित्र थे; कृष्णविरोधी अपराधों के कारण उन्होंने धृतराष्ट्र तथा उसके पुत्रों का साथ छोड़ दिया था।
श्लोक 20.3
सरल हिंदी भावार्थ: वे व्यासजी के पुत्र, महिमा में उनके अनुरूप और कृष्ण तथा कृष्णभक्तों के पूर्ण आश्रित थे।
श्लोक 20.4
सरल हिंदी भावार्थ: तीर्थसेवा से निर्मल होकर कुशावर्त में तत्त्वज्ञ मैत्रेय के पास पहुँचने पर उन्होंने आगे क्या पूछा?
श्लोक 20.5
सरल हिंदी भावार्थ: उनके संवाद में हरिचरणाश्रित ऐसी निर्मल कथाएँ निकलीं जो गंगाजल की तरह पापों को धोती हैं।
श्लोक 20.6
सरल हिंदी भावार्थ: उन कथाओं को हमें सुनाइए; हरिलीलामृत का रस जानने वाला उससे कैसे तृप्त हो सकता है?
श्लोक 20.7
सरल हिंदी भावार्थ: नैमिषारण्य के ऋषियों के प्रश्न पर भगवान में मन लगाए सूतजी बोले—ध्यान से सुनिए।
श्लोक 20.8
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी कहते हैं—वराहरूप हरि का पृथ्वीउद्धार और हिरण्याक्षवध सुनकर प्रसन्न विदुर ने मैत्रेय से पूछा।
श्लोक 20.9
सरल हिंदी भावार्थ: प्रजापतियों को सृष्टिकार्य के लिए उत्पन्न करने के बाद ब्रह्मा ने आगे क्या किया?
श्लोक 20.10
सरल हिंदी भावार्थ: मरीचि आदि ऋषियों और स्वायम्भुव मनु ने ब्रह्मा की आज्ञा से जगत का विस्तार कैसे किया?
श्लोक 20.11
सरल हिंदी भावार्थ: क्या वे पत्नी सहित, स्वतंत्र रूप से या सभी मिलकर सृष्टि के कार्य में लगे?
श्लोक 20.12
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—अचिन्त्य दैव, काल और परमात्मा की प्रेरणा से प्रकृति के तीन गुणों में क्षोभ हुआ और महत्तत्त्व प्रकट हुआ।
श्लोक 20.13
सरल हिंदी भावार्थ: दैवी प्रेरित महत्तत्त्व से त्रिविध अहंकार और फिर उसके द्वारा आकाश आदि पाँच भूततत्त्व उत्पन्न हुए।
श्लोक 20.14
सरल हिंदी भावार्थ: वे अकेले भौतिक जगत नहीं बना सके; दैवी संयोग से मिलकर उन्होंने तेजोमय ब्रह्माण्ड रचा।
श्लोक 20.15
सरल हिंदी भावार्थ: वह अचेतन ब्रह्माण्ड समुद्रजल में पड़ा रहा; सहस्र से अधिक वर्षों बाद ईश्वर ने उसमें प्रवेश किया।
श्लोक 20.16
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी नाभि से सहस्र सूर्यों जैसा दीप्त कमल प्रकट हुआ; सभी जीवों के उस आश्रय में ब्रह्मा उत्पन्न हुए।
श्लोक 20.17
सरल हिंदी भावार्थ: जलशायी भगवान की प्रेरणा से ब्रह्मा ने अपनी शक्ति द्वारा पहले की तरह लोकव्यवस्था बनाई।
श्लोक 20.18
सरल हिंदी भावार्थ: पहले उन्होंने छायारूप से तामिस्र, अन्धतामिस्र, तम, मोह और महामोह की पाँच अज्ञानवृत्तियाँ उत्पन्न कीं।
श्लोक 20.19
सरल हिंदी भावार्थ: तमोमयी उस अवस्था से प्रसन्न न होकर उन्होंने उसका त्याग किया; यक्ष-राक्षसों ने भूख-प्यास की आधाररूप रात्रि को अपनाया।
श्लोक 20.20
सरल हिंदी भावार्थ: भूख-प्यास से व्याकुल वे ब्रह्मा को खाने दौड़े और बोले—इसे बचाओ मत, खा डालो।
श्लोक 20.21
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा बोले—मुझे मत खाओ, रक्षा करो; तुम मेरी ही यक्ष-राक्षस नामक प्रजाएँ हुए हो।
श्लोक 20.22
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने अपने प्रकाश से देवता उत्पन्न किए; देवों ने उनके छोड़े प्रकाशमय दिन को स्वीकार किया।
श्लोक 20.23
सरल हिंदी भावार्थ: फिर जघनभाग से अत्यन्त कामलोलुप असुर उत्पन्न हुए, जो विवेकहीन कामना से उन्हीं की ओर बढ़े।
श्लोक 20.24
सरल हिंदी भावार्थ: निर्लज्ज असुरों के पीछा करने पर ब्रह्मा पहले हँसे, फिर क्रोध और भय से दूर भागे।
श्लोक 20.25
सरल हिंदी भावार्थ: वे शरणागतों के दुःख हरने और भक्तों के अनुरूप दर्शन देने वाले वरदाता हरि के पास पहुँचे।
श्लोक 20.26
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—आपकी आज्ञा से ये प्रजाएँ रचीं, पर ये मुझे ही कामभाव से सताने दौड़ती हैं; रक्षा कीजिए।
श्लोक 20.27
सरल हिंदी भावार्थ: दुःखी लोकों के क्लेश मिटाने वाले आप ही हैं; आपके चरणों से दूर रहने पर जीव क्लेश पाते हैं।
श्लोक 20.28
सरल हिंदी भावार्थ: अन्तर्यामी भगवान ने उनकी व्याकुलता समझकर वह उग्र अवस्था त्यागने को कहा; ब्रह्मा ने आज्ञा मानी।
श्लोक 20.29
सरल हिंदी भावार्थ: त्यागी गई वह अवस्था नूपुरध्वनि वाले चरण, मादक नेत्र और चमकती करधनीयुक्त सुन्दर स्त्रीरूप में दिखाई दी।
श्लोक 20.30
सरल हिंदी भावार्थ: उसके सुडौल अंग, सुन्दर नासिका-दन्त और स्नेहमयी मुस्कान के साथ आकर्षक दृष्टि थी।
श्लोक 20.31
सरल हिंदी भावार्थ: नीले केशों और लज्जाभाव से अपने को ढकती उस स्त्रीरूप को देखकर असुर मोहित हो गए।
श्लोक 20.32
सरल हिंदी भावार्थ: वे बोले—कैसा रूप, धैर्य और नवयौवन है! हमारे बीच होकर भी यह अनासक्त-सी चलती है।
श्लोक 20.33
सरल हिंदी भावार्थ: उस स्त्रीरूप सन्ध्या के विषय में अनेक कल्पनाएँ करके मूर्ख असुर विश्वास से प्रश्न करने लगे।
श्लोक 20.34
सरल हिंदी भावार्थ: तुम कौन हो और किसकी हो? यहाँ क्या प्रयोजन है? अपने सौन्दर्य से हम व्याकुलों को और क्यों सताती हो?
श्लोक 20.35
सरल हिंदी भावार्थ: तुम जो भी हो, तुम्हारा दर्शन मिला; गेंद के खेल से तुम देखने वालों का मन हर रही हो।
श्लोक 20.36
सरल हिंदी भावार्थ: गेंद पर हाथ मारते तुम्हारे चरण लगातार चलते, कमर झुकती और केश बिखरते हैं, फिर भी दृष्टि शान्त लगती है।
श्लोक 20.37
सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार बुद्धिहीन असुरों ने आकर्षक सायंसन्ध्या को वास्तविक स्त्री मानकर अपनाया।
श्लोक 20.38
सरल हिंदी भावार्थ: फिर ब्रह्मा ने गम्भीर प्रसन्नता से अपने सौन्दर्य की अनुभूति करते हुए गन्धर्व और अप्सराओं के समूह रचे।
श्लोक 20.39
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने अपनी प्रिय कान्तिमयी चाँदनीरूप अवस्था छोड़ी; विश्वावसु आदि गन्धर्वों ने उसे प्रेम से ग्रहण किया।
श्लोक 20.40
सरल हिंदी भावार्थ: तन्द्रा से भूत-पिशाच उत्पन्न हुए; उनके दिगम्बर और खुले केश वाले रूप देखकर ब्रह्मा ने नेत्र मूँद लिए।
श्लोक 20.41
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने ब्रह्मा की जम्हाई और निद्रारूप अवस्था अपनाई; कथा इसे चेतना की शिथिलता और उन्माद जैसी दशाओं से जोड़ती है।
श्लोक 20.42
सरल हिंदी भावार्थ: अपने में सृजनशक्ति अनुभव करके ब्रह्मा ने अप्रत्यक्ष रूप से साध्यदेव और पितृगण उत्पन्न किए।
श्लोक 20.43
सरल हिंदी भावार्थ: पितरों ने उनकी उस अप्रकट अवस्था को ग्रहण किया; विद्वान इन्हीं साध्यों और पितरों के लिए अर्पण करते हैं।
श्लोक 20.44
सरल हिंदी भावार्थ: तिरोभाव की शक्ति से सिद्ध और विद्याधर उत्पन्न हुए; उन्हें अदृश्य होने की सामर्थ्य वाली अवस्था दी।
श्लोक 20.45
सरल हिंदी भावार्थ: अपने प्रतिबिम्ब को देखते और अपने रूप का सम्मान करते हुए ब्रह्मा ने किन्नर और किम्पुरुष रचे।
श्लोक 20.46
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने ब्रह्मा का छोड़ा प्रतिबिम्बरूप अपनाया और जोड़ों में प्रातःकाल उनका गुणगान करने लगे।
श्लोक 20.47
सरल हिंदी भावार्थ: सृष्टिविस्तार पर्याप्त न होने की चिन्ता में लेटे ब्रह्मा ने क्रोधपूर्वक उस विश्रामशील अवस्था को त्यागा।
श्लोक 20.48
सरल हिंदी भावार्थ: उससे गिरे केशों से सर्प और उसके फैलते अंगों से विशाल फनों वाले नाग प्रकट बताए गए हैं।
श्लोक 20.49
सरल हिंदी भावार्थ: फिर अपने कार्य की सिद्धि का अनुभव करके ब्रह्मा ने लोकव्यवस्था चलाने वाले मनुओं को मन से उत्पन्न किया।
श्लोक 20.50
सरल हिंदी भावार्थ: उन्हें अपना पुरुषाकार शरीर दिया; पहले उत्पन्न प्रजाओं ने यह देखकर सृष्टिकर्ता की प्रशंसा की।
श्लोक 20.51
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—आपने उत्तम व्यवस्था की; अब यज्ञादि कर्म स्थापित हुए और हम भी अर्पित अन्न प्राप्त करेंगे।
श्लोक 20.52
सरल हिंदी भावार्थ: तप, विद्या, योग और समाधि से सम्पन्न ब्रह्मा ने मनोनुकूल ऋषियों को उत्पन्न किया।
श्लोक 20.53
सरल हिंदी भावार्थ: प्रत्येक ऋषि को समाधि, योगसामर्थ्य, तप, विद्या और वैराग्य से युक्त अपनी शक्ति का अंश प्रदान किया।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 20 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 21
कर्दम की तपस्या और भगवान का वरदान
श्लोक 21.1
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर बोले—स्वायम्भुव मनु का सम्माननीय वंश बताइए, जिसमें स्त्री-पुरुष के संयोग से प्रजाओं का विस्तार हुआ।
श्लोक 21.2
सरल हिंदी भावार्थ: उनके पुत्र प्रियव्रत और उत्तानपाद ने सात द्वीपों वाली पृथ्वी का धर्मपूर्वक पालन किया।
श्लोक 21.3
सरल हिंदी भावार्थ: आपने उनकी प्रसिद्ध पुत्री देवहूति को प्रजापति कर्दम की पत्नी बताया है।
श्लोक 21.4
सरल हिंदी भावार्थ: योग्य देवहूति से महायोगी कर्दम की कितनी सन्तानें हुईं? मैं उनका प्रसंग सुनना चाहता हूँ।
श्लोक 21.5
सरल हिंदी भावार्थ: मनु की पुत्रियों को पत्नी के रूप में पाकर रुचि और दक्ष ने किस प्रकार वंशविस्तार किया?
श्लोक 21.6
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—ब्रह्मा ने कर्दम को प्रजा उत्पन्न करने को कहा; उन्होंने सरस्वती तट पर दस हजार वर्षों तक तप किया।
श्लोक 21.7
सरल हिंदी भावार्थ: समाधि और साधनानुष्ठान सहित भक्ति से उन्होंने शरणागतों को वर देने वाले हरि को प्रसन्न किया।
श्लोक 21.8
सरल हिंदी भावार्थ: सत्ययुग में प्रसन्न कमलनयन भगवान वेदमय दिव्य रूप धारण करके उन्हें दर्शन देने आए।
श्लोक 21.9
सरल हिंदी भावार्थ: उनका निर्मल रूप सूर्य जैसा दीप्त था; उज्ज्वल कमलमाला, निर्मल वस्त्र और सुन्दर नीली अलकों से मुख सुशोभित था।
श्लोक 21.10
सरल हिंदी भावार्थ: वे मुकुट, कुण्डल, शङ्ख, चक्र और गदा धारण किए थे; हाथ में श्वेत कमल और दृष्टि में हृदयस्पर्शी मुस्कान थी।
श्लोक 21.11
सरल हिंदी भावार्थ: गरुड़ के कन्धे पर चरण रखे आकाश में स्थित प्रभु के वक्ष पर लक्ष्मी और कण्ठ में कौस्तुभ शोभित थे।
श्लोक 21.12
सरल हिंदी भावार्थ: मनोरथ पूर्ण होने से कर्दम प्रसन्न होकर भूमि पर सिर रखकर गिरे और हाथ जोड़कर प्रेमभरी स्तुति की।
श्लोक 21.13
सरल हिंदी भावार्थ: कर्दम बोले—आज आपके दर्शन से हमारी आँखें सफल हुईं; दृढ़योगी संत भी अनेक जन्मों से इस दर्शन की इच्छा करते हैं।
श्लोक 21.14
सरल हिंदी भावार्थ: जो संसारसागर पार कराने वाले आपके चरणों से तुच्छ विषयसुख माँगते हैं, उनकी बुद्धि माया से ढकी है; फिर भी आप उन्हें फल देते हैं।
श्लोक 21.15
सरल हिंदी भावार्थ: मैं भी समान स्वभाव वाली पत्नी चाहता हुआ सब इच्छाओं के मूल आश्रय आपके पास आया हूँ।
श्लोक 21.16
सरल हिंदी भावार्थ: आपके सृजनादेश से कामनायुक्त संसार कर्तव्य में बँधा है; उसी क्रम का अनुसरण करके मैं भी आपको समर्पण करता हूँ।
श्लोक 21.17
सरल हिंदी भावार्थ: आपके अनन्य भक्त लोकासक्ति छोड़ चरणछत्र अपनाते और परस्पर गुणकथामृत से देहसम्बन्धी दुःख भुला देते हैं।
श्लोक 21.18
सरल हिंदी भावार्थ: वर्ष, महीने, दिन, ऋतु और कालविभागों वाला प्रबल कालचक्र जगत की आयु काटता है, किन्तु आपके भक्तों की आध्यात्मिक उपलब्धि नष्ट नहीं करता।
श्लोक 21.19
सरल हिंदी भावार्थ: मकड़ी के समान अपनी शक्ति से एक आप ही योगमाया द्वारा जगत रचते, पालते और अपने में समेट लेते हैं।
श्लोक 21.20
सरल हिंदी भावार्थ: मायिक जगत आपका अन्तिम परम स्वरूप नहीं; फिर भी भक्तानुग्रह के लिए तुलसीसुशोभित रूप में आपका दर्शन कल्याणकारी है।
श्लोक 21.21
सरल हिंदी भावार्थ: स्वरूपानन्द से पूर्ण, माया द्वारा लोकव्यवस्था चलाने वाले और छोटी प्रार्थना पर भी उदार फल देने वाले प्रभु को बार-बार प्रणाम।
श्लोक 21.22
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय कहते हैं—गरुड़ पर विराजमान कमलनाभ भगवान निष्कपट स्तुति से प्रसन्न होकर प्रेममुस्कान सहित अमृतवाणी बोले।
श्लोक 21.23
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—तुमने जिनकी प्राप्ति के लिए मेरी आराधना की, वह अन्तर्मन की इच्छा जानकर उसकी व्यवस्था पहले ही कर दी है।
श्लोक 21.24
सरल हिंदी भावार्थ: मुझमें अपना मन समर्पित करने वाले तुम्हारे जैसे भक्त की उपासना कभी निष्फल नहीं होती।
श्लोक 21.25
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मावर्त में रहने वाले, सात समुद्रों वाली पृथ्वी के शासक और कल्याणकीर्ति सम्पन्न सम्राट मनु हैं।
श्लोक 21.26
सरल हिंदी भावार्थ: धर्मज्ञ राजर्षि मनु अपनी पत्नी शतरूपा सहित परसों तुम्हारे दर्शन के लिए यहाँ आएँगे।
श्लोक 21.27
सरल हिंदी भावार्थ: वे गुण, स्वभाव और आयु में योग्य अपनी पुत्री का विवाह तुम्हारे जैसे अनुरूप वर से करेंगे।
श्लोक 21.28
सरल हिंदी भावार्थ: तुम जिस योग्य दाम्पत्य का चिन्तन करते रहे हो, वही राजकन्या प्रेमपूर्वक तुम्हारी सहधर्मिणी बनेगी।
श्लोक 21.29
सरल हिंदी भावार्थ: उससे तुम्हारी नौ कन्याएँ होंगी; आगे ऋषि उनसे विवाह करके अपने वंशों का विस्तार करेंगे।
श्लोक 21.30
सरल हिंदी भावार्थ: मेरी आज्ञा पूरी करके और सब कर्म मुझे समर्पित करके तुम अन्ततः मुझे प्राप्त करोगे।
श्लोक 21.31
सरल हिंदी भावार्थ: जीवों पर दया और अभय देकर तुम मुझमें अपने सहित जगत तथा अपने भीतर मुझे देखोगे।
श्लोक 21.32
सरल हिंदी भावार्थ: हे मुनि, तुम्हारे द्वारा देवहूति के गर्भ में मैं अपने अंश से प्रकट होकर तत्त्वज्ञान का उपदेश करूँगा।
श्लोक 21.33
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—ऐसा कहकर अन्तर्यामी भगवान सरस्वती से घिरे बिन्दुसरोवर से प्रस्थान कर गए।
श्लोक 21.34
सरल हिंदी भावार्थ: कर्दम उन्हें देखते रहे; सिद्धों से वन्दित मार्ग पर जाते हुए प्रभु गरुड़ के पंखों से निकले सामगान को सुन रहे थे।
श्लोक 21.35
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के चले जाने पर कर्दम बिन्दुसरोवर पर ही उनके बताए समय की प्रतीक्षा करने लगे।
श्लोक 21.36
सरल हिंदी भावार्थ: मनु सुवर्णसज्जित रथ पर पुत्री और पत्नी को साथ लेकर पृथ्वी का भ्रमण करते हुए निकले।
श्लोक 21.37
सरल हिंदी भावार्थ: ठीक भगवान के बताए दिन वे शान्तव्रती कर्दम के आश्रम पर पहुँचे।
श्लोक 21.38
सरल हिंदी भावार्थ: इस स्थान पर शरणागत कर्दम के प्रति गहरी कृपा से भगवान के नेत्रों से आनन्दाश्रु गिरे थे।
श्लोक 21.39
सरल हिंदी भावार्थ: इसीलिए वह बिन्दुसरोवर कहलाया; सरस्वती से पोषित पवित्र, कल्याणकारी और महर्षियों द्वारा सेवित तीर्थ था।
श्लोक 21.40
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ पुण्य वृक्ष-लताएँ, मनोहर जीव-पक्षी और सभी ऋतुओं के फल-पुष्पों की वनशोभा थी।
श्लोक 21.41
सरल हिंदी भावार्थ: पक्षी मधुर स्वर करते, भौंरे गुँजारते, मोर नाचते और कोयलें कूकती थीं।
श्लोक 21.42
सरल हिंदी भावार्थ: कदम्ब, चम्पा, अशोक, करञ्ज, बकुल, असन, कुन्द, मन्दार, कुटज और आम के वृक्ष शोभा देते थे।
श्लोक 21.43
सरल हिंदी भावार्थ: कारण्डव, जलपक्षी, हंस, कुरर, सारस, चकवे और चकोर मनोहर स्वर से वातावरण भरते थे।
श्लोक 21.44
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ हिरण, वराह, साही, गवय, हाथी, वानर, नेवले और कस्तूरीमृग आदि अनेक जीव विचरते थे।
श्लोक 21.45
सरल हिंदी भावार्थ: पुत्री सहित उस श्रेष्ठ तीर्थ में प्रवेश करके मनु ने अग्निहोत्र पूरा करके बैठे कर्दममुनि को देखा।
श्लोक 21.46
सरल हिंदी भावार्थ: दीर्घ कठोर तप से वे तेजस्वी थे; भगवान की कृपादृष्टि और अमृतवाणी के कारण शरीर अत्यधिक क्षीण नहीं था।
श्लोक 21.47
सरल हिंदी भावार्थ: वे लम्बे, कमलनेत्र, जटाधारी और चीरवस्त्र पहने थे; तपस्वी जीवन के कारण शरीर का अलङ्कार नहीं किया था।
श्लोक 21.48
सरल हिंदी भावार्थ: कुटी में आए प्रणाम करते राजा को उन्होंने उचित सम्मान और पूजा से स्वागत किया।
श्लोक 21.49
सरल हिंदी भावार्थ: आदर ग्रहण करके बैठे संयमी मनु को प्रसन्न करते हुए मुनि ने भगवान का आदेश स्मरण कर मधुर वाणी कही।
श्लोक 21.50
सरल हिंदी भावार्थ: हे राजन्, आपका भ्रमण सज्जनों की रक्षा और दुष्टों के दमन के लिए है; आप हरि की पालकशक्ति के प्रतिनिधि हैं।
श्लोक 21.51
सरल हिंदी भावार्थ: उचित अवसर पर सूर्य, चन्द्र, अग्नि, इन्द्र, वायु, यम और वरुण की शक्तियों जैसा शासनकर्तव्य निभाने वाले आपको प्रणाम।
श्लोक 21.52
सरल हिंदी भावार्थ: यदि आप विजयशील रथ पर धनुष धारण करके अपराधियों को भय दिखाने न निकलें—
श्लोक 21.53
सरल हिंदी भावार्थ: और अपनी अनुशासित सेना लेकर सूर्य की तरह पृथ्वी पर भ्रमण न करें—
श्लोक 21.54
सरल हिंदी भावार्थ: तो भगवान की स्थापित सामाजिक और आश्रमसम्बन्धी मर्यादाएँ दस्युओं द्वारा तोड़ दी जाएँ।
श्लोक 21.55
सरल हिंदी भावार्थ: लोभी और निरङ्कुश लोगों से अधर्म बढ़े; शासक के निष्क्रिय होने पर समाज लुटेरों से पीड़ित होकर नष्ट होगा।
श्लोक 21.56
सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी आपके यहाँ आने का विशेष प्रयोजन पूछता हूँ; जो उचित होगा, निष्कपट हृदय से उसे पूरा करूँगा।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 21 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 22
देवहूति का विवाह और मनु का धर्मपालन
श्लोक 22.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—अपने गुण और कर्तव्यों की प्रशंसा सुनकर सम्राट कुछ संकोच के साथ मुनि से बोले।
श्लोक 22.2
सरल हिंदी भावार्थ: मनु बोले—ब्रह्मा ने वेद, तप, विद्या और योग से सम्पन्न संयमी ज्ञानरक्षकों को अपने मुख से प्रकट किया।
श्लोक 22.3
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी रक्षा के लिए भुजाओं से हम शासक उत्पन्न हुए; ज्ञानशक्ति उनका हृदय और रक्षणशक्ति उनका अंग कही जाती है।
श्लोक 22.4
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए ज्ञान और शासन की शक्तियाँ परस्पर संरक्षण करती हैं; इनके द्वारा अविनाशी भगवान समाज की रक्षा करते हैं।
श्लोक 22.5
सरल हिंदी भावार्थ: आपके दर्शन और धर्मोपदेश से अपने रक्षणकर्तव्य के विषय में मेरे संशय दूर हो गए।
श्लोक 22.6
सरल हिंदी भावार्थ: आज सौभाग्य से आपके दर्शन हुए, जो असंयमितों को दुर्लभ हैं; आपकी पावन चरणरज सिर पर लगी।
श्लोक 22.7
सरल हिंदी भावार्थ: आपकी शिक्षा से मुझ पर बड़ा अनुग्रह हुआ और मेरे कानों ने आपकी कल्याणकारी वाणी ग्रहण की।
श्लोक 22.8
सरल हिंदी भावार्थ: अब पुत्रीस्नेह से व्याकुल मेरे इस विनम्र निवेदन को कृपा करके सुनिए।
श्लोक 22.9
सरल हिंदी भावार्थ: यह मेरी पुत्री और प्रियव्रत-उत्तानपाद की बहन है; आयु, स्वभाव और गुणों से योग्य पति चाहती है।
श्लोक 22.10
सरल हिंदी भावार्थ: नारदजी से आपके शील, अध्ययन, रूप, आयु और गुण सुनकर इसने आपको पति बनाने का निश्चय किया।
श्लोक 22.11
सरल हिंदी भावार्थ: गृहस्थधर्म में आपकी सर्वथा अनुरूप इस कन्या को मैं श्रद्धापूर्वक प्रस्तुत करता हूँ; इसे स्वीकार कीजिए।
श्लोक 22.12
सरल हिंदी भावार्थ: स्वतः सामने आए उचित अवसर को त्यागना अनासक्त व्यक्ति के लिए भी आवश्यक नहीं, फिर इच्छुक के लिए तो और भी नहीं।
श्लोक 22.13
सरल हिंदी भावार्थ: सामने आए योग्य अवसर का अनादर करके बाद में कृपणों से याचना करने पर व्यक्ति का सम्मान और यश घटता है।
श्लोक 22.14
सरल हिंदी भावार्थ: मैंने सुना है कि आप विवाह का विचार रखते हैं; अतः मेरी दी हुई कन्या स्वीकार करके हम पर कृपा कीजिए।
श्लोक 22.15
सरल हिंदी भावार्थ: कर्दम बोले—मैं विवाह करना चाहता हूँ और आपकी कन्या अविवाहित है; हमारे लिए यह वैदिक विवाहविधि उपयुक्त है।
श्लोक 22.16
सरल हिंदी भावार्थ: आपकी पुत्री के विवाह की इच्छा शास्त्रसम्मत रीति से पूर्ण हो; अपने सौन्दर्य से लक्ष्मी की शोभा जैसी लगती कन्या का कौन अनादर करेगा?
श्लोक 22.17
सरल हिंदी भावार्थ: एक बार महल की छत पर गेंद खेलती इसकी शोभा देखकर विश्वावसु मोहित होकर अपने विमान से गिर पड़े थे।
श्लोक 22.18
सरल हिंदी भावार्थ: मनु की गुणवान पुत्री और उच्चपदस्थ राजपुत्रों की बहन स्वयं अनुराग लेकर आए, तो विवेकी उसे क्यों न स्वीकार करे?
श्लोक 22.19
सरल हिंदी भावार्थ: एक शर्त से गृहस्थधर्म निभाऊँगा—सन्तान होने के बाद अहिंसामय, परमहंसों के श्रेष्ठ निवृत्तिधर्म को अपनाऊँगा।
श्लोक 22.20
सरल हिंदी भावार्थ: जिनसे यह विविध जगत उत्पन्न, स्थित और अन्त में लीन होता है, वे अनन्त भगवान ही मेरे परम प्रमाण और मार्गदर्शक हैं।
श्लोक 22.21
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—कर्दम इतना कहकर कमलनाभ भगवान का ध्यान करते हुए मौन हुए; उनकी मधुर मुस्कान से देवहूति का मन आकर्षित हुआ।
श्लोक 22.22
सरल हिंदी भावार्थ: पत्नी और पुत्री का स्पष्ट निश्चय जानकर मनु ने प्रसन्नतापूर्वक गुणवान कर्दम को अनुरूप देवहूति का विवाह करके दिया।
श्लोक 22.23
सरल हिंदी भावार्थ: महारानी शतरूपा ने नवदम्पती को प्रेम से वस्त्र, आभूषण और गृहस्थोपयोगी सामग्री भेंट की।
श्लोक 22.24
सरल हिंदी भावार्थ: योग्य वर को पुत्री देकर मनु की चिन्ता दूर हुई, किन्तु विदा के समय स्नेह उमड़ा और उन्होंने उसे बाँहों में भर लिया।
श्लोक 22.25
सरल हिंदी भावार्थ: विरह सहन न कर वे बार-बार बेटी कहकर रोए; आँसुओं से पुत्री के केश भीग गए।
श्लोक 22.26
सरल हिंदी भावार्थ: मुनि से अनुमति लेकर मनु पत्नी और अनुचरों सहित रथ पर अपने नगर लौट चले।
श्लोक 22.27
सरल हिंदी भावार्थ: मार्ग में सरस्वती के दोनों सुन्दर तटों पर शान्त ऋषियों के आश्रमों की शोभा देखते गए।
श्लोक 22.28
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मावर्त के निवासियों ने राजा के आगमन का समाचार पाकर गीत, स्तुति और वाद्यों से हर्षपूर्वक स्वागत किया।
श्लोक 22.29
सरल हिंदी भावार्थ: सम्पन्न नगरी का नाम बर्हिष्मती था; कथा के अनुसार यज्ञवराह के शरीर से झरे रोम वहीं गिरे थे।
श्लोक 22.30
सरल हिंदी भावार्थ: वे रोम सदा हरित रहने वाले कुश और काश बने; उन्हीं से ऋषियों ने यज्ञविरोधी बाधाएँ दूर करके यज्ञ किए।
श्लोक 22.31
सरल हिंदी भावार्थ: मनु ने कुश-काश का आसन बिछाकर यज्ञपुरुष की पूजा की, जिनकी कृपा से पृथ्वी निवास के लिए मिली थी।
श्लोक 22.32
सरल हिंदी भावार्थ: बर्हिष्मती पहुँचकर वे अपने ऐसे भवन में प्रविष्ट हुए जो जीवन के विविध तापों से विश्राम देता था।
श्लोक 22.33
सरल हिंदी भावार्थ: पत्नी और प्रजाओं सहित किसी के धर्म से टकराए बिना जीवनयापन करते और प्रतिदिन प्रातः एकाग्र होकर हरिकथा सुनते थे।
श्लोक 22.34
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान में स्थित और मायिक विषयों का स्वरूप जानने वाले मनु को भोग उनके साधनमार्ग से गिरा नहीं सके।
श्लोक 22.35
सरल हिंदी भावार्थ: विष्णुकथा सुनने, ध्यान करने, सेवा और गुणगान में लगे रहने से उनका समय व्यर्थ नहीं जाता था।
श्लोक 22.36
सरल हिंदी भावार्थ: वासुदेव के सत्सङ्ग से त्रिविध गतियों से ऊपर उठकर उन्होंने इकहत्तर चतुर्युगों का अपना मन्वन्तर बिताया।
श्लोक 22.37
सरल हिंदी भावार्थ: हरि के आश्रित को शारीरिक, मानसिक, दैवी और अन्य प्राणियों से उत्पन्न क्लेश अन्तःकरण से पराजित कैसे कर सकते हैं?
श्लोक 22.38
सरल हिंदी भावार्थ: सब जीवों के हितैषी मनु ने मुनियों के पूछने पर मनुष्यों और वर्णाश्रमों के विविध कल्याणकारी कर्तव्य बताए।
श्लोक 22.39
सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार आदिराज मनु का अद्भुत चरित्र कहा; अब उनकी सन्तानों का विस्तार सुनो।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 22 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 23
देवहूति की सेवा और वैराग्य की जिज्ञासा
श्लोक 23.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—माता-पिता के जाने पर देवहूति पति का मनोभाव समझकर वैसे प्रेम से सेवा करतीं जैसे पार्वती शिव की।
श्लोक 23.2
सरल हिंदी भावार्थ: विश्वास, पवित्रता, आदर, संयम, सहयोग, मैत्री और मधुर वाणी से उनका जीवन सुशोभित था।
श्लोक 23.3
सरल हिंदी भावार्थ: कामना, दम्भ, द्वेष, लोभ, पाप और मद छोड़कर वे सजग भाव से तपस्वी पति को प्रसन्न करती रहीं।
श्लोक 23.4
सरल हिंदी भावार्थ: कर्दम ने अपनी आज्ञाकारिणी सहधर्मिणी को देखा, जो पति की साधना से महान कल्याण की आशा रखती थीं।
श्लोक 23.5
सरल हिंदी भावार्थ: दीर्घ व्रत और सेवा से देवहूति का शरीर दुर्बल हो गया था; करुणा से भरे कर्दम प्रेमविह्वल स्वर में बोले।
श्लोक 23.6
सरल हिंदी भावार्थ: कर्दम बोले—तुम्हारी श्रद्धा और प्रेमपूर्ण सेवा से प्रसन्न हूँ; तुमने मेरे सहयोग में अपने अत्यन्त प्रिय शरीर का भी ध्यान नहीं रखा।
श्लोक 23.7
सरल हिंदी भावार्थ: स्वधर्म, तप, समाधि, विद्या और आत्मयोग से मुझे जो भगवदनुग्रह मिला है, उसमें तुम भी सहभागी हो; भय-शोक से मुक्त वह अनुभव तुम्हें देता हूँ।
श्लोक 23.8
सरल हिंदी भावार्थ: अन्य ऐश्वर्य भगवान के संकेत से नष्ट हो सकते हैं; अपने धर्म से मिली दुर्लभ दिव्य विभूतियों का योग्य उपयोग करो।
श्लोक 23.9
सरल हिंदी भावार्थ: योगविद्या में निपुण पति का आश्वासन पाकर देवहूति की चिन्ता मिटी और वे विनय, प्रेम तथा लज्जामिश्रित मुस्कान से बोलीं।
श्लोक 23.10
सरल हिंदी भावार्थ: देवहूति बोलीं—आपकी योगशक्ति अचूक है, यह जानती हूँ; विवाह के समय कही सन्तानप्राप्ति की प्रतिज्ञा भी पूरी हो।
श्लोक 23.11
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे दुर्बल शरीर और गृहस्थजीवन के अनुकूल व्यवस्था कीजिए; उचित निवास और आवश्यक साधन बताइए।
श्लोक 23.12
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—पत्नी का प्रिय करने के लिए कर्दम ने योगशक्ति से इच्छानुसार चलने वाला दिव्य विमान प्रकट किया।
श्लोक 23.13
सरल हिंदी भावार्थ: वह इच्छित सुविधाएँ देने वाला, विविध रत्नों और मणिमय स्तम्भों से सुशोभित तथा ऐश्वर्यसम्पन्न था।
श्लोक 23.14
सरल हिंदी भावार्थ: उसमें सभी ऋतुओं के अनुकूल दिव्य उपकरण और सुन्दर ध्वज-पताकाएँ लगी थीं।
श्लोक 23.15
सरल हिंदी भावार्थ: भौंरों से गुँजारित फूलमालाएँ और विविध रेशमी, सूती तथा महीन वस्त्र उसकी शोभा बढ़ाते थे।
श्लोक 23.16
सरल हिंदी भावार्थ: ऊपर-नीचे अलग-अलग कक्षों में आरामदायक बिछौने, पलंग, पंखे और आसन थे।
श्लोक 23.17
सरल हिंदी भावार्थ: अनेक कलाकृतियाँ, पन्ने की भूमि और मूँगे की वेदियाँ उसकी सुन्दरता बढ़ाती थीं।
श्लोक 23.18
सरल हिंदी भावार्थ: द्वारों पर मूँगे की देहरियाँ, वज्रमय कपाट, नीलम के शिखर और स्वर्णकलश थे।
श्लोक 23.19
सरल हिंदी भावार्थ: दीवारों में श्रेष्ठ पद्मराग रत्न, बहुमूल्य चँदोवे और स्वर्णतोरण सुशोभित थे।
श्लोक 23.20
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ बने कृत्रिम हंस-कबूतरों को अपने जैसा मानकर वास्तविक पक्षी उनके पास बैठते और कूजते थे।
श्लोक 23.21
सरल हिंदी भावार्थ: विहार, विश्राम, शयन और आँगन आदि की इच्छानुकूल रचना स्वयं देखने वाले को भी विस्मित करती थी।
श्लोक 23.22
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसा भवन देखकर भी देवहूति का मन पूरी तरह प्रसन्न नहीं हुआ; उनका भाव समझकर कर्दम ने कहा।
श्लोक 23.23
सरल हिंदी भावार्थ: इस पवित्र सरोवर में स्नान करके विमान पर चढ़ो; भगवान से पावन हुआ यह तीर्थ कल्याणकारी है।
श्लोक 23.24
सरल हिंदी भावार्थ: पति की बात मानकर, पुराने वस्त्र और उलझे केशों वाली कमलनेत्र देवहूति आगे बढ़ीं।
श्लोक 23.25
सरल हिंदी भावार्थ: तप से मलिन हुए शरीर सहित वे सरस्वती के मङ्गलकारी सरोवर में प्रविष्ट हुईं।
श्लोक 23.26
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ भीतर के दिव्य भवन में उन्होंने कमलसुगन्ध और तरुण रूप वाली एक हजार परिचारिकाएँ देखीं।
श्लोक 23.27
सरल हिंदी भावार्थ: परिचारिकाएँ हाथ जोड़कर उठीं और बोलीं—हम आपकी सेविकाएँ हैं; आज्ञा दीजिए, क्या करें?
श्लोक 23.28
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने आदर से देवहूति को उत्तम स्नान कराया और नए निर्मल वस्त्र पहनाए।
श्लोक 23.29
सरल हिंदी भावार्थ: श्रेष्ठ चमकते आभूषण, पौष्टिक भोजन और अमृततुल्य पेय प्रस्तुत किए।
श्लोक 23.30
सरल हिंदी भावार्थ: देवहूति ने दर्पण में अपने को माला, निर्मल वस्त्र और मङ्गलसज्जा सहित देखा।
श्लोक 23.31
सरल हिंदी भावार्थ: स्नान और केशप्रसाधन के बाद हार, कङ्कण तथा बजते स्वर्णनूपुर उनके अंगों को सुशोभित कर रहे थे।
श्लोक 23.32
सरल हिंदी भावार्थ: रत्नयुक्त स्वर्णकरधनी, बहुमूल्य हार और तिलकादि प्रसाधन से वे अलङ्कृत थीं।
श्लोक 23.33
सरल हिंदी भावार्थ: सुन्दर दाँत, भौंहें, स्नेहमयी दृष्टि और नीली अलकों से उनका मुख कमलकोश जैसा शोभता था।
श्लोक 23.34
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे ही उन्होंने प्रिय पति कर्दम का स्मरण किया, वे परिचारिकाओं सहित उनके समीप उपस्थित हो गईं।
श्लोक 23.35
सरल हिंदी भावार्थ: अपने को सहस्र परिचारिकाओं सहित पति के सामने पाकर उन्हें उनकी अद्भुत योगशक्ति का अनुभव हुआ।
श्लोक 23.36
सरल हिंदी भावार्थ: स्नान के बाद नई शोभा और निर्मल वस्त्रों में अपनी सहधर्मिणी को देखकर कर्दम प्रसन्न हुए।
श्लोक 23.37
सरल हिंदी भावार्थ: सहस्र विद्याधरियों से सेवित देवहूति को उन्होंने स्नेहपूर्वक दिव्य विमान पर चढ़ाया।
श्लोक 23.38
सरल हिंदी भावार्थ: पत्नी सहित विमान में विराजमान कर्दम, परिचारिकाओं के बीच, तारों से घिरे चन्द्रमा की तरह शोभित हुए।
श्लोक 23.39
सरल हिंदी भावार्थ: लोकपालों के विहारस्थानों, सुहावनी पर्वतघाटियों और गंगाप्रपातों के मधुर स्वरों वाले प्रदेशों में उन्होंने दीर्घ विहार किया।
श्लोक 23.40
सरल हिंदी भावार्थ: वैश्रम्भक, सुरसन, नन्दन, पुष्पभद्रक, मानस और चैत्ररथ जैसे दिव्य उपवनों में दम्पती ने भ्रमण किया।
श्लोक 23.41
सरल हिंदी भावार्थ: वायुसमान गतिशील, विशाल और दीप्त विमान से लोकों में विचरते हुए वे अन्य विमानवासियों से अधिक शोभित थे।
श्लोक 23.42
सरल हिंदी भावार्थ: जिन उदारचित्तों ने विपत्तिहर भगवान के चरणों का आश्रय लिया है, उनके लिए कौन-सी उपलब्धि दुर्लभ है?
श्लोक 23.43
सरल हिंदी भावार्थ: महायोगी ने पृथ्वीमण्डल के अद्भुत दृश्य पत्नी को दिखाए और फिर अपने आश्रम लौट आए।
श्लोक 23.44
सरल हिंदी भावार्थ: योगशक्ति से नौ रूपों में प्रकट होकर कर्दम ने अपनी सहधर्मिणी को सन्तोष दिया; अनेक वर्ष क्षण समान बीते।
श्लोक 23.45
सरल हिंदी भावार्थ: दिव्य विमान में पति के सान्निध्य का आनन्द अनुभव करती देवहूति को बीतते काल का ध्यान नहीं रहा।
श्लोक 23.46
सरल हिंदी भावार्थ: योगसामर्थ्य से विहार करते दम्पती के सौ वर्ष थोड़े समय जैसे बीत गए।
श्लोक 23.47
सरल हिंदी भावार्थ: फिर आत्मज्ञानी कर्दम ने नौ रूपों द्वारा देवहूति में सन्तानोत्पत्ति का संकल्प पूरा किया।
श्लोक 23.48
सरल हिंदी भावार्थ: देवहूति से नौ सुन्दर कन्याएँ उत्पन्न हुईं, जिनसे लाल कमल जैसी सुगन्ध आती थी।
श्लोक 23.49
सरल हिंदी भावार्थ: कर्दम के वनप्रस्थान का विचार पहचानकर देवहूति के मन में विरहव्यथा उठी, यद्यपि वे बाहर से मुस्कराईं।
श्लोक 23.50
सरल हिंदी भावार्थ: सिर झुकाए चरणनखों से धरती कुरेदते और आँसू रोकते हुए उन्होंने धीरे से मधुर वाणी कही।
श्लोक 23.51
सरल हिंदी भावार्थ: आपने अपनी सभी प्रतिज्ञाएँ पूरी कीं; फिर भी शरण आई मुझको आध्यात्मिक अभय देना उचित है।
श्लोक 23.52
सरल हिंदी भावार्थ: इन पुत्रियों के योग्य पति खोजने हैं; आपके वन जाने पर मेरे शोक को दूर करने वाला कोई सहारा भी हो।
श्लोक 23.53
सरल हिंदी भावार्थ: विषयसुख में लगे रहकर परमात्मा को भुलाते हुए मेरा बहुत समय व्यर्थ बीत गया।
श्लोक 23.54
सरल हिंदी भावार्थ: आपका परम स्वरूप न जानकर मैंने आपमें लौकिक आसक्ति रखी; फिर भी वही सत्सङ्ग अब मेरे अभय का कारण बने।
श्लोक 23.55
सरल हिंदी भावार्थ: दुर्जनों में किया सङ्ग संसारबन्धन बनता है; वही सज्जनों में किया जाए तो आसक्ति से मुक्ति का साधन होता है।
श्लोक 23.56
सरल हिंदी भावार्थ: जिसके कर्म धर्म, वैराग्य और भगवान की सेवा की ओर न ले जाएँ, उसका जीवन अपने श्रेष्ठ उद्देश्य से रिक्त है।
श्लोक 23.57
सरल हिंदी भावार्थ: मुक्ति देने वाले आप जैसे महापुरुष का साथ पाकर भी मैंने बन्धनमुक्ति नहीं चाही; यह माया का गहरा प्रभाव था।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 23 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 24
कपिलभगवान का प्राकट्य और कर्दम का संन्यास
श्लोक 24.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—देवहूति के वैराग्यपूर्ण शब्द सुनकर दयालु कर्दम ने भगवान का वचन याद किया और उन्हें समझाया।
श्लोक 24.2
सरल हिंदी भावार्थ: कर्दम बोले—हे निर्दोष राजकन्या, अपने को दोष देकर दुःखी न हो; अविनाशी भगवान शीघ्र तुम्हारे गर्भ से प्रकट होंगे।
श्लोक 24.3
सरल हिंदी भावार्थ: व्रतनिष्ठ रहो; संयम, नियम, तप, दान और श्रद्धा सहित भगवान की आराधना करो।
श्लोक 24.4
सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारी आराधना से प्रसन्न होकर पुत्ररूप भगवान ज्ञान का प्रकाश देंगे और तुम्हारी हृदयग्रन्थि काटेंगे।
श्लोक 24.5
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—पति की शिक्षा श्रद्धा और सम्मान से स्वीकार करके देवहूति ने अचल परमगुरु भगवान का भजन किया।
श्लोक 24.6
सरल हिंदी भावार्थ: समय आने पर मधुसूदन कर्दम के माध्यम से देवहूति में वैसे प्रकट हुए जैसे काष्ठ में अग्नि।
श्लोक 24.7
सरल हिंदी भावार्थ: तब आकाश में दिव्य वाद्य और मेघगर्जना हुई; गन्धर्व गाने और अप्सराएँ प्रसन्न होकर नाचने लगीं।
श्लोक 24.8
सरल हिंदी भावार्थ: देवों ने पुष्पवृष्टि की; दिशाएँ, जल और सबके मन प्रसन्न हो गए।
श्लोक 24.9
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा मरीचि आदि ऋषियों सहित सरस्वती से घिरे कर्दम के आश्रम पहुँचे।
श्लोक 24.10
सरल हिंदी भावार्थ: वे जानते थे कि परमब्रह्म भगवान तत्त्वों का ज्ञान समझाने के लिए निर्मल अंशरूप से प्रकट हुए हैं।
श्लोक 24.11
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के इस अभिप्राय का शुद्धचित्त से सम्मान करके प्रसन्न ब्रह्मा ने कर्दम से कहा।
श्लोक 24.12
सरल हिंदी भावार्थ: तुमने मेरी आज्ञा आदरपूर्वक और निष्कपट भाव से मानकर मेरा उचित सम्मान किया है।
श्लोक 24.13
सरल हिंदी भावार्थ: पुत्र का पिता और गुरु के प्रति कर्तव्य यही है कि उचित शिक्षा को आदर सहित स्वीकार करे।
श्लोक 24.14
सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारी ये नौ पुत्रियाँ अपने प्रभाव से इस सृष्टि को अनेक प्रकार से विस्तृत करेंगी।
श्लोक 24.15
सरल हिंदी भावार्थ: इन्हें स्वभाव और रुचि के अनुरूप श्रेष्ठ ऋषियों को विवाह में दो और अपना यश फैलाओ।
श्लोक 24.16
सरल हिंदी भावार्थ: मैं जानता हूँ कि यह कपिलरूप स्वयं आदिपुरुष का अवतार है, जो सब प्राणियों के कल्याण का खजाना है।
श्लोक 24.17
सरल हिंदी भावार्थ: सुवर्णवर्ण केश, कमलनेत्र और कमलचिह्नित चरणों वाले ये ज्ञान-विज्ञान से कर्मबन्धन की जड़ें काटेंगे।
श्लोक 24.18
सरल हिंदी भावार्थ: हे देवहूति, तुम्हारे गर्भ से प्रकट कैटभविनाशक भगवान अज्ञान और संशय की ग्रन्थि काटकर पृथ्वी पर विचरेंगे।
श्लोक 24.19
सरल हिंदी भावार्थ: सिद्धों के अधिपति और सांख्याचार्यों से सम्मानित यह पुत्र कपिल नाम से तुम्हारी कीर्ति बढ़ाएगा।
श्लोक 24.20
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—दम्पती को आश्वस्त करके ब्रह्मा कुमारों और नारद सहित अपने हंसवाहन से परम लोक लौट गए।
श्लोक 24.21
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा की आज्ञा के अनुसार कर्दम ने फिर अपनी कन्याओं का विवाह सृष्टिविस्तार करने वाले ऋषियों से किया।
श्लोक 24.22
सरल हिंदी भावार्थ: कला मरीचि को, अनसूया अत्रि को, श्रद्धा अङ्गिरा को और हविर्भू पुलस्त्य को दी गईं।
श्लोक 24.23
सरल हिंदी भावार्थ: गति का विवाह पुलह, क्रिया का क्रतु, ख्याति का भृगु और अरुन्धती का वसिष्ठ से हुआ।
श्लोक 24.24
सरल हिंदी भावार्थ: शान्ति अथर्वा को दी गईं; इन यज्ञपरम्परा के संवर्धक नवदम्पतियों का कर्दम ने आदर किया।
श्लोक 24.25
सरल हिंदी भावार्थ: ऋषि विवाह करके प्रसन्नतापूर्वक कर्दम से विदा हुए और अपनी-अपनी पत्नियों सहित आश्रम लौट गए।
श्लोक 24.26
सरल हिंदी भावार्थ: फिर कर्दम ने अपने पुत्र को स्वयं भगवान का अवतार जानकर एकान्त में प्रणाम किया और प्रार्थना की।
श्लोक 24.27
सरल हिंदी भावार्थ: अशुभ कर्मों के दुःख में पड़े जीवों पर लम्बे काल बाद ऐसा दिव्य अनुग्रह प्रकट होता है।
श्लोक 24.28
सरल हिंदी भावार्थ: जिनके चरण देखने के लिए यति अनेक जन्मों की परिपक्व समाधि द्वारा एकान्त में प्रयत्न करते हैं—
श्लोक 24.29
सरल हिंदी भावार्थ: वही भक्तवत्सल भगवान हमारी लौकिक अपूर्णताओं की उपेक्षा करके आज हमारे घर पुत्ररूप में आए हैं।
श्लोक 24.30
सरल हिंदी भावार्थ: अपना वचन सत्य करने, भक्तों का मान बढ़ाने और ज्ञान देने के लिए आपने मेरे घर अवतार लिया है।
श्लोक 24.31
सरल हिंदी भावार्थ: आप प्राकृत रूप से रहित होकर भी अपने भक्तों को प्रिय लगने वाले सुन्दर दिव्य रूप धारण करते हैं।
श्लोक 24.32
सरल हिंदी भावार्थ: ऐश्वर्य, वैराग्य, यश, ज्ञान, पराक्रम और श्री से पूर्ण, ज्ञानियों से पूजित आपके चरणों की शरण हूँ।
श्लोक 24.33
सरल हिंदी भावार्थ: प्रकृति, पुरुष, महत्तत्त्व, काल और त्रिगुणव्यवस्था के परम आश्रय, स्वाधीनशक्ति कपिलभगवान की शरण लेता हूँ।
श्लोक 24.34
सरल हिंदी भावार्थ: आपके अवतार से कर्तव्य पूर्ण हुआ; अब अनुमति चाहूँ कि परिव्राजक होकर हृदय में आपका ध्यान करता हुआ शोकमुक्त विचरूँ।
श्लोक 24.35
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—मेरी वाणी लौकिक और आध्यात्मिक दोनों क्षेत्रों में प्रमाण है; तुमसे कही बात सत्य करने ही मैं प्रकट हुआ।
श्लोक 24.36
सरल हिंदी भावार्थ: मेरा यह जन्म मुक्ति चाहने वालों को तत्त्वों का यथार्थ विवेचन और आत्मदर्शन का मान्य मार्ग समझाने के लिए है।
श्लोक 24.37
सरल हिंदी भावार्थ: दीर्घकाल से लुप्त-सा हुआ यह आत्मज्ञानमार्ग फिर चलाने के लिए मैंने यह रूप धारण किया है।
श्लोक 24.38
सरल हिंदी भावार्थ: मेरी अनुमति से जाओ; कर्म मुझे अर्पित करके दुर्जय मृत्यु पार करने और अमृतपद पाने के लिए मेरा भजन करो।
श्लोक 24.39
सरल हिंदी भावार्थ: सबके हृदय में स्वयंप्रकाश आत्मारूप मुझे अपने भीतर देखोगे तो शोक और भय से मुक्त हो जाओगे।
श्लोक 24.40
सरल हिंदी भावार्थ: मैं माता को कर्मबन्धन शान्त करने वाली अध्यात्मविद्या दूँगा, जिससे वे भी संसारभय पार करेंगी।
श्लोक 24.41
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—कपिलभगवान की आज्ञा पाकर प्रसन्न कर्दम ने उनकी प्रदक्षिणा की और वन चले गए।
श्लोक 24.42
सरल हिंदी भावार्थ: मौनव्रती, अनासक्त और परमात्माश्रित मुनि व्यक्तिगत यज्ञाग्नि तथा निश्चित गृह का आश्रय छोड़ पृथ्वी पर विचरने लगे।
श्लोक 24.43
सरल हिंदी भावार्थ: गुणों को प्रकाशित करके भी उनसे परे, कार्यकारणातीत परमात्मा में उन्होंने अनन्य भक्ति से मन लगाया।
श्लोक 24.44
सरल हिंदी भावार्थ: अहंता-ममता, द्वन्द्व और विषमता से मुक्त उनकी अन्तर्बुद्धि तरङ्गरहित समुद्र की तरह शान्त हुई।
श्लोक 24.45
सरल हिंदी भावार्थ: सर्वज्ञ अन्तरात्मा वासुदेव में परम भक्ति से स्थित होकर उन्हें आत्मबोध और बन्धनमुक्ति प्राप्त हुई।
श्लोक 24.46
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने भगवान को सभी जीवों में और सभी जीवों को परमात्मा के आश्रय में स्थित देखा।
श्लोक 24.47
सरल हिंदी भावार्थ: इच्छा-द्वेष छोड़, सर्वत्र समचित्त और भगवद्भक्तियुक्त होकर कर्दम ने भगवान की परम गति प्राप्त की।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 24 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 25
कपिल–देवहूति संवाद और भक्तियोग
श्लोक 25.1
सरल हिंदी भावार्थ: शौनक बोले—अजन्मा भगवान कपिल अपनी योगमाया से मनुष्यों को आत्मज्ञान देने और तत्त्वों का विवेचन करने प्रकट हुए।
श्लोक 25.2
सरल हिंदी भावार्थ: योगियों में श्रेष्ठ उनके अवतार की महिमा सुनते हुए भी मेरे मन को पूरी तृप्ति नहीं होती।
श्लोक 25.3
सरल हिंदी भावार्थ: स्वतन्त्र भगवान अपनी शक्ति से जो-जो प्रशंसनीय लीला करते हैं, मुझ श्रद्धालु को सुनाइए।
श्लोक 25.4
सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—आत्मविद्या का प्रश्न आने पर व्यासजी के मित्र मैत्रेय ने प्रसन्न होकर विदुर से कहा।
श्लोक 25.5
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—पिता के वन जाने पर माता का कल्याण करने के लिए कपिलभगवान बिन्दुसरोवर पर रहे।
श्लोक 25.6
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा का वचन स्मरण करके देवहूति ने एकान्त में बैठे निष्काम और तत्त्वमार्ग के अग्रदर्शी पुत्र से कहा।
श्लोक 25.7
सरल हिंदी भावार्थ: देवहूति बोलीं—अस्थायी इन्द्रियविषयों की प्यास से थक गई हूँ; उसी से घने अज्ञान में पड़ गई।
श्लोक 25.8
सरल हिंदी भावार्थ: आपकी कृपा से अब मुझे उस कठिन अन्धकार को पार कराने वाला सच्चा ज्ञाननेत्र मिला है।
श्लोक 25.9
सरल हिंदी भावार्थ: आप आदिपुरुष भगवान हैं, जो अज्ञानान्ध लोगों के लिए सूर्य जैसे ज्ञानप्रकाश बनकर प्रकट हुए।
श्लोक 25.10
सरल हिंदी भावार्थ: देह आदि में मैं और मेरा मानने का जो मोह लगा है, उसे दूर कीजिए।
श्लोक 25.11
सरल हिंदी भावार्थ: भक्तों के संसारवृक्ष को काटने वाले शरण्य प्रभु की शरण हूँ; प्रकृति और पुरुष जानने की इच्छा से आपको प्रणाम करती हूँ।
श्लोक 25.12
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—माता की निष्कपट, मुक्ति का मार्ग बढ़ाने वाली इच्छा सुनकर कपिलभगवान प्रसन्न मुस्कान से बोले।
श्लोक 25.13
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—मनुष्य का परम कल्याण अध्यात्मयोग में है, जहाँ सुख-दुःख के द्वन्द्व का पूर्ण उपशम होता है।
श्लोक 25.14
सरल हिंदी भावार्थ: हे निष्पाप माता, वही सर्वाङ्गपूर्ण योग बताता हूँ जिसे पहले जिज्ञासु ऋषियों को कहा था।
श्लोक 25.15
सरल हिंदी भावार्थ: मन ही आत्मा के बन्धन और मुक्ति का कारण है; विषयगुणों में आसक्त हो तो बन्धन, परमपुरुष में रमे तो मुक्ति।
श्लोक 25.16
सरल हिंदी भावार्थ: जब मन अहंता-ममता से उत्पन्न काम-लोभ आदि मल छोड़कर शुद्ध होता है, तब सुख-दुःख से परे समता आती है।
श्लोक 25.17
सरल हिंदी भावार्थ: तब जीव अपने को प्रकृति से परे, एकरस, स्वयंप्रकाश और अखण्ड चेतन रूप में पहचानता है।
श्लोक 25.18
सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञान, वैराग्य और भक्ति से युक्त मन द्वारा वह आत्मा की असङ्गता तथा प्रकृति की क्षीण बन्धनशक्ति को देखता है।
श्लोक 25.19
सरल हिंदी भावार्थ: सबके आत्मा भगवान में भक्ति जैसा कल्याणकारी मार्ग योगियों के ब्रह्मसाक्षात्कार के लिए दूसरा नहीं।
श्लोक 25.20
सरल हिंदी भावार्थ: आसक्ति को ज्ञानी दृढ़ बन्धन कहते हैं; वही प्रेम साधुओं में लगे तो खुला हुआ मोक्षद्वार बनता है।
श्लोक 25.21
सरल हिंदी भावार्थ: साधु सहनशील, दयालु, सब जीवों के हितैषी, शत्रुभाव से रहित और शान्त होते हैं।
श्लोक 25.22
सरल हिंदी भावार्थ: वे अनन्यभाव से दृढ़ भक्ति करते और मेरे लिए कर्मफल तथा स्वजनासक्ति का त्याग करते हैं।
श्लोक 25.23
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे आश्रित संत मेरी पवित्र कथा सुनते-सुनाते हैं; मुझमें चित्त लगने से विविध ताप उन्हें अभिभूत नहीं करते।
श्लोक 25.24
सरल हिंदी भावार्थ: हे माता, ऐसे अनासक्त साधुओं का सङ्ग चाहो; वे आसक्ति के दोष दूर करने वाले हैं।
श्लोक 25.25
सरल हिंदी भावार्थ: संतों के सत्सङ्ग में मेरी महिमा की कथा हृदय और कानों को आनन्द देती है; उससे क्रमशः श्रद्धा, प्रेम और भक्ति बढ़ती है।
श्लोक 25.26
सरल हिंदी भावार्थ: भक्ति और मेरी लीला के चिन्तन से लौकिक-पारलौकिक विषयों में वैराग्य आता है; साधक सरल योगमार्ग से चित्त स्थिर करने लगता है।
श्लोक 25.27
सरल हिंदी भावार्थ: गुणविषयों का सेवन छोड़, वैराग्यमय ज्ञान, योग और समर्पित भक्ति से मनुष्य अपने अन्तरात्मा मुझको प्राप्त करता है।
श्लोक 25.28
सरल हिंदी भावार्थ: देवहूति बोलीं—मेरे लिए कैसी भक्ति उपयुक्त और साध्य है, जिससे आपका निर्वाणपद सहज प्राप्त करूँ?
श्लोक 25.29
सरल हिंदी भावार्थ: आपने जिस लक्ष्यभेदी योग का वर्णन किया, उसका स्वरूप और अंग कितने हैं, जिनसे तत्त्वज्ञान होता है?
श्लोक 25.30
सरल हिंदी भावार्थ: हे हरि, अपनी कृपा से सरल रीति में समझाइए, ताकि मेरी सीमित बुद्धि भी इस कठिन विषय को जान सके।
श्लोक 25.31
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—माता की इच्छा समझकर कपिल ने स्नेह से भक्ति का विस्तार करने वाला सांख्य और योग समझाया।
श्लोक 25.32
सरल हिंदी भावार्थ: विषय और कर्म से जुड़ी इन्द्रियों की स्वाभाविक वृत्ति जब एकाग्र मन से निर्मल परमात्मा की ओर बहती है—
श्लोक 25.33
सरल हिंदी भावार्थ: वही निष्काम भगवद्भक्ति है, जो मुक्ति से भी श्रेष्ठ है और सूक्ष्म बन्धन वैसे जला देती है जैसे अग्नि ईंधन को।
श्लोक 25.34
सरल हिंदी भावार्थ: मेरी चरणसेवा में रमे भक्त परस्पर मिलकर मेरी लीलाओं का आदरपूर्वक गान करते हैं; वे अलग से एकात्ममोक्ष भी नहीं चाहते।
श्लोक 25.35
सरल हिंदी भावार्थ: हे माता, वे मेरे प्रसन्न मुख, अरुण नेत्र और वरदाता दिव्य रूपों का दर्शन करते तथा मेरे साथ प्रिय वाणी का अनुभव करते हैं।
श्लोक 25.36
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे सुन्दर अंग, मुस्कान, दृष्टि और मधुर वचन उनके प्राणों को आकर्षित करते हैं; भक्ति उन्हें अनायास परम गति देती है।
श्लोक 25.37
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे भक्त मायिक ऐश्वर्य, अष्टसिद्धि या दिव्य सम्पदा की चाह नहीं करते, फिर भी मेरे परम धाम में शुभ विभूतियाँ पाते हैं।
श्लोक 25.38
सरल हिंदी भावार्थ: जो मुझे प्रियतम, आत्मा, पुत्र, मित्र, गुरु, हितैषी या आराध्य मानते हैं, उनकी आध्यात्मिक स्थिति को काल नष्ट नहीं करता।
श्लोक 25.39
सरल हिंदी भावार्थ: इस लोक, परलोक, शरीर, उससे जुड़े सम्बन्धियों और धन, पशु तथा घर आदि की आसक्तियाँ—
श्लोक 25.40
सरल हिंदी भावार्थ: छोड़कर जो अनन्यभाव से सर्वव्यापी मेरा भजन करते हैं, उन्हें मैं मृत्यु के पार ले जाता हूँ।
श्लोक 25.41
सरल हिंदी भावार्थ: प्रकृति-पुरुष के स्वामी और सबके आत्मा मेरे आश्रय के अतिरिक्त यह प्रबल संसारभय नहीं मिटता।
श्लोक 25.42
सरल हिंदी भावार्थ: मेरी व्यवस्था से वायु चलती, सूर्य तपता, इन्द्र वर्षा करता, अग्नि जलती और मृत्यु अपना कार्य करती है।
श्लोक 25.43
सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञान-वैराग्ययुक्त भक्तियोग से योगी परम कल्याण के लिए मेरे निर्भय चरणाश्रय में प्रवेश करते हैं।
श्लोक 25.44
सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्य का परम कल्याण यही है कि तीव्र भक्ति से स्थिर मन मुझमें समर्पित हो जाए।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 25 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 26
प्रकृति, पुरुष और तत्त्वों का विवेचन
श्लोक 26.1
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—अब तत्त्वों के पृथक् लक्षण बताऊँगा, जिन्हें जानकर जीव प्रकृति के गुणबन्धन से मुक्त होता है।
श्लोक 26.2
सरल हिंदी भावार्थ: परम कल्याण के लिए आत्मदर्शनरूप ज्ञान चाहिए; वही हृदयग्रन्थि काटने वाला विवेक समझाता हूँ।
श्लोक 26.3
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा अनादि, निर्गुण, प्रकृति से परे और स्वयंप्रकाश चेतन है; उसी की उपस्थिति से अनुभव का जगत प्रकाशित है।
श्लोक 26.4
सरल हिंदी भावार्थ: परमपुरुष अपनी लीला से सामने आई सूक्ष्म, दैवी और गुणमयी प्रकृति को सृजन के लिए स्वीकार करते हैं।
श्लोक 26.5
सरल हिंदी भावार्थ: प्रकृति को गुणानुसार विविध प्रजाएँ रचते देखकर उससे सम्बद्ध जीव अपनी ज्ञानदृष्टि ढकने से मोहित होता है।
श्लोक 26.6
सरल हिंदी भावार्थ: विषयचिन्तन से वह प्रकृति के गुणों द्वारा किए कर्मों का कर्तृत्व अपने ऊपर मान लेता है।
श्लोक 26.7
सरल हिंदी भावार्थ: इसी अभिमान से असङ्ग, साक्षी और आनन्दस्वरूप जीव को संसारबन्धन तथा पराधीनता का अनुभव होता है।
श्लोक 26.8
सरल हिंदी भावार्थ: देह, इन्द्रिय और क्रियाओं के कार्यकारण में प्रकृति निमित्त है; सुख-दुःख का अनुभव चेतन पुरुष करता है।
श्लोक 26.9
सरल हिंदी भावार्थ: देवहूति बोलीं—हे पुरुषोत्तम, कार्यकारणात्मक जगत से जुड़े प्रकृति और पुरुष के अलग-अलग लक्षण बताइए।
श्लोक 26.10
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—अप्रकट, त्रिगुणमयी, कार्यकारण को सम्भावनारूप में धारण करने वाली समावस्था प्रधान प्रकृति कहलाती है।
श्लोक 26.11
सरल हिंदी भावार्थ: उसके विस्तार में पाँच महाभूत, पाँच तन्मात्राएँ, दस इन्द्रियाँ और चार अन्तःकरण-वृत्तियाँ—चौबीस तत्त्व गिने जाते हैं।
श्लोक 26.12
सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश पाँच महाभूत तथा गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द पाँच तन्मात्राएँ हैं।
श्लोक 26.13
सरल हिंदी भावार्थ: कान, त्वचा, आँख, जीभ, नाक और वाणी, हाथ, पाँव, जननेन्द्रिय, गुदा—दस इन्द्रियाँ हैं।
श्लोक 26.14
सरल हिंदी भावार्थ: मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त अन्तःकरण के चार भेद हैं, जो अपनी-अपनी वृत्तियों से पहचाने जाते हैं।
श्लोक 26.15
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के सगुण विश्वविस्तार का यह तत्त्वसमूह है; काल को पच्चीसवाँ तत्त्व कहा गया है।
श्लोक 26.16
सरल हिंदी भावार्थ: कुछ ज्ञानी काल को परमपुरुष का प्रभाव कहते हैं, जिससे प्रकृतिआसक्त और कर्तृत्वाभिमानी जीव भय अनुभव करता है।
श्लोक 26.17
सरल हिंदी भावार्थ: गुणों की साम्यावस्था वाली प्रकृति में जिनकी प्रेरणा से चेष्टा आती है, वही भगवान काल नाम से समझे जाते हैं।
श्लोक 26.18
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान अपनी माया से भीतर अन्तर्यामी पुरुष और बाहर काल के रूप में जीवों की व्यवस्था करते हैं।
श्लोक 26.19
सरल हिंदी भावार्थ: परमपुरुष ने दैवी प्रेरणा से क्षुब्ध अपनी प्रकृति में सृजनशक्ति रखी; उससे तेजोमय महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ।
श्लोक 26.20
सरल हिंदी भावार्थ: जगत के बीजरूप महत्तत्त्व ने अन्तर्निहित विश्व प्रकट किया और अपने प्रकाश से सुप्त अज्ञान का अन्धकार हटाया।
श्लोक 26.21
सरल हिंदी भावार्थ: निर्मल, शान्त सत्त्व की अवस्था, जिसमें वासुदेव का प्रकाश हो, महत्तत्त्वात्मक शुद्ध चित्त कही गई है।
श्लोक 26.22
सरल हिंदी भावार्थ: शुद्ध जल की तरह स्वच्छता, विकाररहितता और शान्ति चित्त की निर्मल वृत्ति के लक्षण हैं।
श्लोक 26.23
सरल हिंदी भावार्थ: भगवच्छक्ति से प्रकट महत्तत्त्व के परिवर्तन से त्रिविध क्रियाशक्तिरूप अहंकार उत्पन्न हुआ।
श्लोक 26.24
सरल हिंदी भावार्थ: सात्त्विक, राजस और तामस अहंकार से मन, इन्द्रियाँ और महाभूतों का विस्तार होता है।
श्लोक 26.25
सरल हिंदी भावार्थ: भूत, इन्द्रिय और मन के आश्रय की इसी शक्ति का अधिष्ठाता सहस्रशीर्ष अनन्त अथवा सङ्कर्षण कहलाता है।
श्लोक 26.26
सरल हिंदी भावार्थ: अहंकार में कर्ता, करण और कार्य की भावना तथा शान्त, उग्र और मूढ़ वृत्तियों के भेद दिखाई देते हैं।
श्लोक 26.27
सरल हिंदी भावार्थ: सात्त्विक अहंकार से मन प्रकट हुआ; उसके संकल्प-विकल्प से कामना का जन्म होता है।
श्लोक 26.28
सरल हिंदी भावार्थ: मन के अधिष्ठाता अनिरुद्ध हैं; योगी शरद्कालीन नीलकमल जैसे उनके स्वरूप का शान्तचित्त से ध्यान करते हैं।
श्लोक 26.29
सरल हिंदी भावार्थ: राजस अहंकार से बुद्धि उत्पन्न हुई, जो विषयों का बोध और इन्द्रियों के अनुभव का निश्चय कराती है।
श्लोक 26.30
सरल हिंदी भावार्थ: संशय, विपरीतज्ञान, निश्चय, स्मृति और निद्रा बुद्धि की भिन्न-भिन्न वृत्तियाँ हैं।
श्लोक 26.31
सरल हिंदी भावार्थ: राजस अहंकार से ज्ञान और कर्मेन्द्रियाँ भी हुईं; क्रियाशक्ति प्राण की और विशेषज्ञान की शक्ति बुद्धि की है।
श्लोक 26.32
सरल हिंदी भावार्थ: भगवच्छक्ति से प्रेरित तामस अहंकार से शब्दतन्मात्रा, उससे आकाश और शब्द ग्रहण करने वाला श्रवण प्रकट हुआ।
श्लोक 26.33
सरल हिंदी भावार्थ: शब्द अर्थ प्रकट करता, वक्ता का संकेत देता और आकाश का सूक्ष्म गुण है—ज्ञानी उसके ये लक्षण बताते हैं।
श्लोक 26.34
सरल हिंदी भावार्थ: भीतर-बाहर स्थान देना तथा प्राण, इन्द्रिय और मन की गतिविधियों का आधार होना आकाश का कार्य है।
श्लोक 26.35
सरल हिंदी भावार्थ: कालप्रेरित शब्दगुणयुक्त आकाश से स्पर्श, उससे वायु और स्पर्श ग्रहण करने वाली त्वचा प्रकट हुई।
श्लोक 26.36
सरल हिंदी भावार्थ: कोमलता, कठोरता, शीतलता और उष्णता स्पर्श के भेद हैं; स्पर्श वायु का सूक्ष्म गुण है।
श्लोक 26.37
सरल हिंदी भावार्थ: चलाना, एकत्र करना, मिलाना, पदार्थ-शब्द पहुँचाना और इन्द्रियों की क्रियाओं को आधार देना वायु के कार्य हैं।
श्लोक 26.38
सरल हिंदी भावार्थ: दैवी प्रेरित स्पर्शगुणयुक्त वायु से रूपतन्मात्रा, उससे अग्नितत्त्व और रूप ग्रहण करने वाली दृष्टि प्रकट हुई।
श्लोक 26.39
सरल हिंदी भावार्थ: पदार्थ का आकार, आकारानुसार विशेषता, विस्तार और दीप्ति रूप के द्वारा व्यक्त होते हैं।
श्लोक 26.40
सरल हिंदी भावार्थ: प्रकाश, पकाना, भक्षण-पान में सहयोग, शीत हटाना, सुखाना और भूख-प्यास उत्पन्न करना अग्नितत्त्व के कार्य बताए हैं।
श्लोक 26.41
सरल हिंदी भावार्थ: दैवी प्रेरणा से रूपगुणयुक्त अग्नि के परिवर्तन से रस, उससे जल और रस ग्रहण करने वाली जीभ प्रकट हुई।
श्लोक 26.42
सरल हिंदी भावार्थ: पदार्थों के भेद से एक रसशक्ति कसैले, मीठे, कड़वे, तीखे और खट्टे आदि स्वादों में व्यक्त होती है।
श्लोक 26.43
सरल हिंदी भावार्थ: भिगोना, जोड़ना, तृप्त करना, जीवन देना, पोषण, शीतलता और उपलब्धता जल के कार्य हैं।
श्लोक 26.44
सरल हिंदी भावार्थ: रसगुणयुक्त जल के दैवी प्रेरित परिवर्तन से गन्ध, उससे पृथ्वी और गन्ध ग्रहण करने वाली नासिका प्रकट हुई।
श्लोक 26.45
सरल हिंदी भावार्थ: पदार्थों के संघटनभेद से गन्ध मिली-जुली, सड़ी, सुगन्धित, मन्द, तीखी और खट्टी आदि होती है।
श्लोक 26.46
सरल हिंदी भावार्थ: रूपनिर्माण, निवास, धारण, वस्तुओं की पहचान और जीवों के विविध गुणों की अभिव्यक्ति पृथ्वी के कार्य हैं।
श्लोक 26.47
सरल हिंदी भावार्थ: आकाश के विशिष्ट शब्दगुण को ग्रहण करने वाली इन्द्रिय कान और वायु के स्पर्शगुण को ग्रहण करने वाली त्वचा है।
श्लोक 26.48
सरल हिंदी भावार्थ: अग्नि का रूपगुण आँख, जल का रसगुण जीभ और पृथ्वी का गन्धगुण नासिका ग्रहण करती है।
श्लोक 26.49
सरल हिंदी भावार्थ: बाद के तत्त्व में पहले के गुण भी सम्मिलित हैं; इसलिए पृथ्वी में पाँचों विषयगुणों का अनुभव होता है।
श्लोक 26.50
सरल हिंदी भावार्थ: जब महत्तत्त्व आदि सात तत्त्व मिलकर कार्य नहीं कर सके, तब भगवान ने काल, कर्म और गुणों सहित उनमें प्रवेश किया।
श्लोक 26.51
सरल हिंदी भावार्थ: उनके प्रवेश से तत्त्व संयुक्त हुए और अचेतन ब्रह्माण्ड बना, जिसमें विराट पुरुष प्रकट हुए।
श्लोक 26.52
सरल हिंदी भावार्थ: दस-दस गुने जल आदि आवरणों और बाहरी प्रधान प्रकृति से घिरा यह ब्रह्माण्ड हरि का विश्वरूप है।
श्लोक 26.53
सरल हिंदी भावार्थ: जल में स्थित तेजोमय ब्रह्माण्ड में प्रवेश करके परमपुरुष ने विराट में अनेक इन्द्रियस्थानों को प्रकट किया।
श्लोक 26.54
सरल हिंदी भावार्थ: पहले मुख, उससे वाणी और अग्नि; फिर नासिकाएँ, प्राण तथा घ्राण की शक्ति प्रकट हुई।
श्लोक 26.55
सरल हिंदी भावार्थ: घ्राण से वायु, फिर नेत्र-दृष्टि-सूर्य और कान-श्रवण-दिशाओं का सम्बन्ध प्रकट हुआ।
श्लोक 26.56
सरल हिंदी भावार्थ: विराट की त्वचा से रोम और उनसे वनस्पतियाँ हुईं; फिर जननेन्द्रिय का स्थान खुला।
श्लोक 26.57
सरल हिंदी भावार्थ: उससे प्रजननशक्ति और जल का सम्बन्ध तथा गुदा से अपान और भयकारी मृत्यु की व्यवस्था प्रकट हुई।
श्लोक 26.58
सरल हिंदी भावार्थ: हाथों से बल और इन्द्र का तथा पाँवों से गति और विष्णु का सम्बन्ध प्रकट हुआ।
श्लोक 26.59
सरल हिंदी भावार्थ: नाड़ियों से रक्त और नदियों का सम्बन्ध बना; फिर उदर का स्थान खुला।
श्लोक 26.60
सरल हिंदी भावार्थ: उदर से भूख-प्यास और समुद्र का सम्बन्ध हुआ; हृदय से मन प्रकट हुआ।
श्लोक 26.61
सरल हिंदी भावार्थ: मन से चन्द्रमा, बुद्धि से ब्रह्मा, अहंकार से रुद्र और चित्त से अन्तर्यामी के अधिष्ठान का सम्बन्ध बताया गया।
श्लोक 26.62
सरल हिंदी भावार्थ: ये देवशक्तियाँ मिलकर भी विराट को सक्रिय न कर सकीं; उन्होंने क्रम से उसके स्थानों में प्रवेश किया।
श्लोक 26.63
सरल हिंदी भावार्थ: अग्नि ने वाणी सहित मुख और वायु ने घ्राण सहित नासिकाओं में प्रवेश किया, फिर भी विराट नहीं उठा।
श्लोक 26.64
सरल हिंदी भावार्थ: सूर्य दृष्टि सहित नेत्रों और दिशाएँ श्रवण सहित कानों में आईं, फिर भी विराट नहीं उठा।
श्लोक 26.65
सरल हिंदी भावार्थ: वनस्पतियाँ रोमों सहित त्वचा और जल प्रजननशक्ति सहित जननेन्द्रिय में आया, फिर भी विराट नहीं उठा।
श्लोक 26.66
सरल हिंदी भावार्थ: मृत्यु अपान सहित गुदा और इन्द्र बल सहित हाथों में आए, फिर भी विराट नहीं उठा।
श्लोक 26.67
सरल हिंदी भावार्थ: विष्णु की गतिशक्ति चरणों और नदियाँ रक्त सहित नाड़ियों में आईं, फिर भी विराट नहीं उठा।
श्लोक 26.68
सरल हिंदी भावार्थ: समुद्र भूख-प्यास सहित उदर और चन्द्रमा मन सहित हृदय में आए, फिर भी विराट नहीं उठा।
श्लोक 26.69
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा बुद्धि और रुद्र अहंभाव सहित हृदय में आए, फिर भी विराट नहीं उठा।
श्लोक 26.70
सरल हिंदी भावार्थ: जब अन्तर्यामी क्षेत्रज्ञ चित्त सहित हृदय में प्रविष्ट हुए, तभी विराट पुरुष जल से उठकर सक्रिय हुआ।
श्लोक 26.71
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे चेतन आत्मा की उपस्थिति बिना प्राण, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि मिलकर भी सोए व्यक्ति को नहीं जगा सकते—
श्लोक 26.72
सरल हिंदी भावार्थ: वैसे ही भक्ति, वैराग्य और ज्ञानयुक्त योगबुद्धि से विवेक करके उस अन्तरात्मा का अपने भीतर चिन्तन करना चाहिए।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 26 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 27
असङ्ग आत्मा और प्रकृतिबन्धन से मुक्ति
श्लोक 27.1
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—प्रकृति में स्थित होकर भी आत्मा निर्विकार, अकर्ता और निर्गुण होने से जल में दिखते सूर्य की तरह असङ्ग है।
श्लोक 27.2
सरल हिंदी भावार्थ: प्रकृति के गुणों में आसक्ति होने पर अहंकार से मोहित जीव अपने को कर्ता मानता है।
श्लोक 27.3
सरल हिंदी भावार्थ: उसी से कर्मदोषों के वश होकर वह अच्छी, बुरी और मिश्र योनियों में जन्म लेकर असन्तुष्ट भटकता है।
श्लोक 27.4
सरल हिंदी भावार्थ: स्वप्न की अनर्थप्रतीति जैसी विषयासक्ति होने पर बन्धन का स्वतंत्र सत्य न होते हुए भी संसारानुभव नहीं मिटता।
श्लोक 27.5
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए विषयों में आसक्त मन को तीव्र भक्तियोग और वैराग्य से धीरे-धीरे वश में लाना चाहिए।
श्लोक 27.6
सरल हिंदी भावार्थ: श्रद्धा से यमादि योगाङ्गों का अभ्यास, मुझमें सच्चा प्रेम और मेरी कथा का श्रवण करो।
श्लोक 27.7
सरल हिंदी भावार्थ: सब जीवों में समता, निर्वैरता, अनासक्ति, ब्रह्मचर्य, वाणीसंयम और दृढ़ स्वधर्म अपनाओ।
श्लोक 27.8
सरल हिंदी भावार्थ: सहज उपलब्ध साधनों में सन्तुष्ट, मिताहारी, एकान्तप्रिय, शान्त, मैत्रीपूर्ण, दयालु और संयमी बनो।
श्लोक 27.9
सरल हिंदी भावार्थ: प्रकृति और पुरुष का यथार्थ ज्ञान पाकर शरीर तथा उससे जुड़े सम्बन्धों में असत्य हठपूर्ण ममता न करो।
श्लोक 27.10
सरल हिंदी भावार्थ: विषयभेद से बुद्धि हटाकर आत्मविवेक द्वारा अपने को पहचानो, जैसे नेत्र से सूर्य का दर्शन होता है।
श्लोक 27.11
सरल हिंदी भावार्थ: तब जीव उपाधियों से परे, सबका आश्रय, साक्षी और सर्वव्यापी अद्वैत परमात्मा का अनुभव करता है।
श्लोक 27.12
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे जल के प्रतिबिम्ब से धरती पर प्रकाश पड़ता और उसके सहारे आकाशस्थ सूर्य का पता चलता है—
श्लोक 27.13
सरल हिंदी भावार्थ: वैसे देह, इन्द्रिय और मन की वृत्तियों से अहंकार तथा उनके साक्षी चेतन के अस्तित्व का विवेक होता है।
श्लोक 27.14
सरल हिंदी भावार्थ: निद्रा में भूततत्त्व, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि की क्रियाएँ लीन हों, तब भी अहंकार से परे साक्षी चेतन बना रहता है।
श्लोक 27.15
सरल हिंदी भावार्थ: अहंवृत्ति शान्त होने पर भी आत्मा नष्ट नहीं होता; अज्ञान से व्यक्ति धन खोए दुखी मनुष्य की तरह अपने को खोया मानता है।
श्लोक 27.16
सरल हिंदी भावार्थ: इसका विचार करके वह उस आत्मा को पहचानता है जिसके आश्रय से अहंकार सहित समस्त देहव्यवस्था टिकी है।
श्लोक 27.17
सरल हिंदी भावार्थ: देवहूति बोलीं—प्रकृति और पुरुष दोनों अनादि तथा परस्पर सम्बद्ध हैं; प्रकृति जीव का साथ कैसे छोड़ेगी?
श्लोक 27.18
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे पृथ्वी-गन्ध और जल-रस अलग नहीं दिखाई देते, वैसे प्रकृति और चेतन का सम्बन्ध लगता है।
श्लोक 27.19
सरल हिंदी भावार्थ: अकर्ता जीव का कर्मबन्धन प्रकृति के आश्रय से है; उसके गुण बने रहते हुए कैवल्यमुक्ति कैसे होगी?
श्लोक 27.20
सरल हिंदी भावार्थ: कभी तत्त्वविचार से भय दब जाए, किन्तु मूल कारण न मिटे तो वह फिर लौट आता है।
श्लोक 27.21
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—निष्काम स्वधर्म, निर्मल मन और दीर्घ श्रवण से पुष्ट तीव्र भक्ति द्वारा—
श्लोक 27.22
सरल हिंदी भावार्थ: तत्त्वदर्शी ज्ञान, प्रबल वैराग्य, तपयुक्त योग और गहन आत्मसमाधि के अभ्यास से—
श्लोक 27.23
सरल हिंदी भावार्थ: प्रकृति का बन्धन धीरे-धीरे वैसे समाप्त होता है जैसे अरणिकाष्ठ से निकली अग्नि उसी काष्ठ को जला देती है।
श्लोक 27.24
सरल हिंदी भावार्थ: जिसका अनुभव करके दोष समझे और आसक्ति छोड़ी गई हो, वह प्रकृति स्वमहिमा में स्थित जीव को फिर बाँध नहीं पाती।
श्लोक 27.25
सरल हिंदी भावार्थ: अजाग्रत को स्वप्न बड़े संकट देता है; जाग जाने पर वही स्वप्न उसे सत्य मानकर मोहित नहीं कर सकता।
श्लोक 27.26
सरल हिंदी भावार्थ: इसी तरह तत्त्वज्ञानी और मुझमें मन लगाने वाले आत्माराम भक्त को प्रकृति बाँध नहीं पाती।
श्लोक 27.27
सरल हिंदी भावार्थ: बहुजन्मों की साधना से अध्यात्म में रमे मुनि को ब्रह्मलोक तक के विषयों से वैराग्य होता है।
श्लोक 27.28
सरल हिंदी भावार्थ: जाग्रत विवेक वाला मेरा भक्त मेरी विशेष कृपा से मेरे आश्रित कैवल्यरूप परम कल्याण को पाता है।
श्लोक 27.29
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मानुभव से संशयरहित योगी सूक्ष्म देह का बन्धन छूटने पर उस स्थिति को प्राप्त होता है जहाँ से पुनरागमन नहीं।
श्लोक 27.30
सरल हिंदी भावार्थ: योग से प्राप्त सिद्धियों में भी मन न अटके तो अनन्य आश्रय मुझमें परम गति मिलती है, जहाँ मृत्यु का अधिकार नहीं।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 27 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 28
अष्टाङ्गयोग और भगवान के स्वरूप का ध्यान
श्लोक 28.1
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—हे राजकन्या, अब आलम्बन सहित योग बताता हूँ, जिससे मन प्रसन्न होकर सत्य के मार्ग पर स्थिर होता है।
श्लोक 28.2
सरल हिंदी भावार्थ: यथाशक्ति स्वधर्मपालन, अधर्म से निवृत्ति, दैवप्राप्त साधनों में सन्तोष और आत्मज्ञानी संतों की सेवा इसके आधार हैं।
श्लोक 28.3
सरल हिंदी भावार्थ: लौकिक भोगासक्ति घटाना, मोक्षधर्म में रुचि, नियमित शुद्ध मिताहार और शान्त एकान्त का सेवन करो।
श्लोक 28.4
सरल हिंदी भावार्थ: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, आवश्यकतानुसार संग्रह, ब्रह्मचर्य, तप, पवित्रता, स्वाध्याय और भगवान की पूजा अपनाओ।
श्लोक 28.5
सरल हिंदी भावार्थ: वाणीसंयम, स्थिर आसन, धैर्य, क्रमशः प्राणसंयम और इन्द्रियों को विषयों से हटाकर हृदय में स्थिर करना योगाङ्ग हैं।
श्लोक 28.6
सरल हिंदी भावार्थ: मन और प्राण को उपयुक्त आलम्बन में धारित करके भगवान की लीलाओं का ध्यान और चित्त की एकाग्रता करो।
श्लोक 28.7
सरल हिंदी भावार्थ: इन और अन्य उचित साधनों से सजग साधक विषयमार्ग में भटके मन को बुद्धिपूर्वक धीरे-धीरे नियन्त्रित करे।
श्लोक 28.8
सरल हिंदी भावार्थ: शुद्ध स्थान पर स्थिर आसन लगाकर सुखपूर्वक सीधा बैठना और अभ्यास करना बताया गया है।
श्लोक 28.9
सरल हिंदी भावार्थ: योगपरम्परा में पूरक, कुम्भक और रेचक द्वारा प्राणमार्ग का शोधन तथा चित्तस्थिरता का अभ्यास वर्णित है।
श्लोक 28.10
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे वायु और अग्नि में तपाया धातु मल छोड़ता है, वैसे संयमित श्वास वाला योगी मन की अशुद्धि हटाता है।
श्लोक 28.11
सरल हिंदी भावार्थ: प्राणायाम से दोष, धारणा से पापवृत्ति, प्रत्याहार से विषयसङ्ग और ध्यान से गुणों की अधीनता घटाने का वर्णन है।
श्लोक 28.12
सरल हिंदी भावार्थ: योग से निर्मल और एकाग्र मन होने पर दृष्टि संयमित रखते हुए भगवान के स्वरूप का ध्यान करे।
श्लोक 28.13
सरल हिंदी भावार्थ: प्रसन्न कमलमुख, अरुण कमलनेत्र और नीलकमलवर्ण, शङ्ख-चक्र-गदाधारी भगवान को ध्यान में लाए।
श्लोक 28.14
सरल हिंदी भावार्थ: वे कमलकेसर जैसे पीले रेशमी वस्त्र पहने, वक्ष पर श्रीवत्स और कण्ठ में दीप्त कौस्तुभ धारण किए हैं।
श्लोक 28.15
सरल हिंदी भावार्थ: गुँजारते भौंरों वाली वनमाला, श्रेष्ठ हार, कङ्कण, मुकुट, बाजूबन्द और नूपुर उनकी शोभा हैं।
श्लोक 28.16
सरल हिंदी भावार्थ: कमर पर करधनी है और वे हृदयकमल पर विराजते हैं; उनका शान्त मनोहर रूप मन तथा नेत्रों को आनन्द देता है।
श्लोक 28.17
सरल हिंदी भावार्थ: सदा किशोर, सब लोकों से वन्दित और भक्तों पर कृपा करने को उत्सुक उस सुन्दर रूप का स्मरण करे।
श्लोक 28.18
सरल हिंदी भावार्थ: जिनका यश पवित्र करता और संतों को यश देता है, उनके समग्र अंगों का ध्यान करे, जब तक मन स्थिर न हो।
श्लोक 28.19
सरल हिंदी भावार्थ: हृदयवासी प्रभु को खड़े, चलते, बैठे या शयन करते हुए मनोहर लीला सहित शुद्धभाव से ध्यान करे।
श्लोक 28.20
सरल हिंदी भावार्थ: समग्र रूप में मन टिक जाने पर साधक क्रम से भगवान के एक-एक अंग में चित्त एकाग्र करे।
श्लोक 28.21
सरल हिंदी भावार्थ: वज्र, अङ्कुश, ध्वज और कमलचिह्नों वाले चरणकमल का ध्यान करे, जिनकी नखज्योति हृदय का अज्ञानान्धकार मिटाती है।
श्लोक 28.22
सरल हिंदी भावार्थ: जिनके चरणोदक की गंगा शिव के मस्तक पर सुशोभित है, उन चरणों को अज्ञानपर्वत तोड़ने वाले वज्र समान स्मरण करे।
श्लोक 28.23
सरल हिंदी भावार्थ: लक्ष्मी द्वारा अपनी गोद में रखकर कोमल करों से सेवित भगवान के दोनों घुटनों का हृदय में ध्यान करे।
श्लोक 28.24
सरल हिंदी भावार्थ: गरुड़ के कन्धों पर शोभित, अतसीपुष्पवर्ण और शक्ति के आधार ऊरुओं तथा पीताम्बर-करधनी से अलङ्कृत कटि का ध्यान करे।
श्लोक 28.25
सरल हिंदी भावार्थ: लोककमल और ब्रह्मा के उद्गमरूप नाभिसरोवर तथा हार की किरणों से आलोकित वक्षप्रदेश का स्मरण करे।
श्लोक 28.26
सरल हिंदी भावार्थ: लक्ष्मी के निवास वक्ष और कौस्तुभ को भी सुशोभित करने वाले कण्ठ का ध्यान करे, जो मन और नेत्रों को आनन्द देते हैं।
श्लोक 28.27
सरल हिंदी भावार्थ: मन्दराचल मन्थन से शोभित भुजाओं, उनके आभूषणों, प्रचण्ड तेजस्वी चक्र और करकमल में श्वेत शङ्ख का ध्यान करे।
श्लोक 28.28
सरल हिंदी भावार्थ: शत्रुओं का दमन करने वाली कौमोदकी गदा, भौंरों से गुँजारित माला और निर्मल जीवतत्त्वसूचक कौस्तुभ को स्मरण करे।
श्लोक 28.29
सरल हिंदी भावार्थ: भक्तों पर कृपा के लिए प्रकट मुखकमल का ध्यान करे, जिसके गाल मकरकुण्डलों से दीप्त और नासिका मनोहर है।
श्लोक 28.30
सरल हिंदी भावार्थ: काले घुँघराले केश, सुन्दर भौंहें और कमलनेत्रों वाला लक्ष्मी का आश्रय मुख मन में सजगता से स्थापित करे।
श्लोक 28.31
सरल हिंदी भावार्थ: तीनों ताप मिटाने के लिए करुणा से बहती, स्नेहमुस्कानयुक्त और परम प्रसन्न वह दृष्टि हृदय में बसाए।
श्लोक 28.32
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की उदार हँसी शरणागतों के शोकाश्रु सुखाती है; उनकी सुन्दर भौंहें कामदेव को भी मोहित करने वाली हैं।
श्लोक 28.33
सरल हिंदी भावार्थ: हृदयवासी विष्णु की मुस्कान और अरुण अधरों से चमकती कुन्ददन्तपङ्क्ति का प्रेमपूर्वक ध्यान करे; अन्य विषय देखने की चाह छोड़ दे।
श्लोक 28.34
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसे ध्यान से हरिप्रेम जागता, हृदय पिघलता और रोमाञ्च-आँसू आते हैं; फिर साधक चित्त के सूक्ष्म आलम्बनबन्धन से भी ऊपर उठता है।
श्लोक 28.35
सरल हिंदी भावार्थ: विषयरहित और विरक्त मन शान्त हो जाता है, जैसे ईंधन समाप्त होने पर ज्वाला; तब अखण्ड आत्मस्वरूप का अनुभव होता है।
श्लोक 28.36
सरल हिंदी भावार्थ: मन की परम निवृत्ति से सुख-दुःखातीत स्वरूप में स्थित साधक समझता है कि दुःख का कर्तृत्व आत्मा पर अज्ञान से आरोपित था।
श्लोक 28.37
सरल हिंदी भावार्थ: स्वरूपज्ञ सिद्ध शरीर की स्थितियों में पहले जैसी आसक्ति नहीं रखता; दैव से आए-जाते वस्त्र की तरह उसे देखता है।
श्लोक 28.38
सरल हिंदी भावार्थ: प्रारब्ध कर्म रहने तक प्राणयुक्त शरीर चलता है; जाग्रत तत्त्वज्ञ उसकी स्वप्नसमान व्यवस्था को फिर अपना वास्तविक स्वरूप नहीं मानता।
श्लोक 28.39
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे व्यक्ति पुत्र और धन से अलग है, वैसे अपना माने गए शरीर आदि से चेतन पुरुष पृथक् है।
श्लोक 28.40
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे अग्नि अपने से निकले धुएँ, चिनगारियों और जलती लकड़ी से भिन्न पहचानी जाती है—
श्लोक 28.41
सरल हिंदी भावार्थ: वैसे साक्षी आत्मा भूत, इन्द्रिय, अन्तःकरण और प्रकृति की उपाधियों से पृथक् है; परम आश्रय ब्रह्मस्वरूप भगवान हैं।
श्लोक 28.42
सरल हिंदी भावार्थ: सब जीवों में आत्मा और आत्माश्रय में सब जीवों को अभिन्न आश्रयभाव से देखे, जैसे सब पदार्थों में मूल तत्त्व।
श्लोक 28.43
सरल हिंदी भावार्थ: एक अग्नि विभिन्न ईंधनों के कारण अलग दिखती है; वैसे एक चेतनतत्त्व प्रकृति की उपाधियों से अनेक रूप में प्रतीत होता है।
श्लोक 28.44
सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार दैवी कार्यकारणमयी प्रकृति के दुर्ज्ञेय प्रभाव को पार करके साधक अपने स्वरूप में स्थित होता है।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 28 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 29
निर्गुण भक्ति, सर्वभूतदया और कालस्वरूप
श्लोक 29.1
सरल हिंदी भावार्थ: देवहूति बोलीं—महत्तत्त्व आदि, प्रकृति और पुरुष के लक्षणों से उनका वास्तविक स्वरूप समझ में आता है।
श्लोक 29.2
सरल हिंदी भावार्थ: सांख्य में बताए उस मूल विवेक सहित भक्तियोग का मार्ग अब विस्तार से बताइए।
श्लोक 29.3
सरल हिंदी भावार्थ: जिससे सर्वत्र वैराग्य हो, उसके लिए जीव की संसारगत विभिन्न अवस्थाएँ भी समझाइए।
श्लोक 29.4
सरल हिंदी भावार्थ: ईश्वररूप काल का स्वरूप बताइए, जिसके भय से लोग कल्याणकारी कार्यों में प्रवृत्त होते हैं।
श्लोक 29.5
सरल हिंदी भावार्थ: आप अज्ञान में सोए, मिथ्या अभिमान और कर्मों से थके संसार के लिए योगरूपी सूर्य बनकर प्रकट हुए हैं।
श्लोक 29.6
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—माता की मधुर जिज्ञासा का स्वागत करके करुणामय कपिल प्रसन्नता से उत्तर देने लगे।
श्लोक 29.7
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—स्वभाव और गुणों के भेद से लोगों की भावना बदलती है; उसी अनुसार भक्तियोग के भी अनेक प्रकार दिखते हैं।
श्लोक 29.8
सरल हिंदी भावार्थ: हिंसा, दम्भ, ईर्ष्या और क्रोध का उद्देश्य लेकर भेददृष्टि से मेरी उपासना करने वाला तामस भाव रखता है।
श्लोक 29.9
सरल हिंदी भावार्थ: विषयसुख, यश या ऐश्वर्य की इच्छा से विग्रह आदि में पूजा करने वाला राजस भाव वाला है।
श्लोक 29.10
सरल हिंदी भावार्थ: पापक्षय, कर्मसमर्पण या कर्तव्य समझकर भेदभाव सहित पूजा करने वाला सात्त्विक है।
श्लोक 29.11
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे गुण सुनते ही सबके हृदयवासी मुझमें मन की अविच्छिन्न धारा बहे, जैसे गंगाजल समुद्र की ओर—
श्लोक 29.12
सरल हिंदी भावार्थ: यही निर्गुण भक्तियोग का लक्षण है: पुरुषोत्तम में बिना स्वार्थ और बिना अवरोध की भक्ति।
श्लोक 29.13
सरल हिंदी भावार्थ: मेरी सेवा के बिना भक्त सालोक्य, सार्ष्टि, सामीप्य, सारूप्य और एकत्वमुक्ति भी स्वीकार नहीं करते।
श्लोक 29.14
सरल हिंदी भावार्थ: यही परम भक्तियोग है, जिससे त्रिगुण पार करके साधक मेरे दिव्य भाव का अधिकारी होता है।
श्लोक 29.15
सरल हिंदी भावार्थ: निष्काम श्रेष्ठ स्वधर्म और शास्त्रसम्मत, अनावश्यक हिंसा से रहित अनुष्ठान का नियमित पालन करे।
श्लोक 29.16
सरल हिंदी भावार्थ: मेरे पवित्र स्थलों का दर्शन, पूजा, स्तुति और प्रणाम तथा जीवों में मेरा भाव और अनासक्ति अपनाए।
श्लोक 29.17
सरल हिंदी भावार्थ: महात्माओं का सम्मान, दुःखियों पर दया, समकक्षों से मैत्री और यम-नियम का पालन करे।
श्लोक 29.18
सरल हिंदी भावार्थ: अध्यात्मश्रवण, मेरे नाम का सङ्कीर्तन, सरलता, संतसङ्ग और अहंकाररहित व्यवहार रखे।
श्लोक 29.19
सरल हिंदी भावार्थ: इन भगवद्धर्मों से अन्तःकरण शुद्ध होने पर मेरा गुणश्रवण करते ही मन सहज मुझ तक पहुँचता है।
श्लोक 29.20
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे वायु सुगन्ध को उसके स्थान से नासिका तक पहुँचाती है, वैसे योगयुक्त निर्मल चित्त अविकारी आत्मा तक पहुँचता है।
श्लोक 29.21
सरल हिंदी भावार्थ: मैं सदा सब जीवों में उनके आत्मारूप स्थित हूँ; इसे उपेक्षित करके केवल बाहरी पूजा करना आराधना का दिखावा बनता है।
श्लोक 29.22
सरल हिंदी भावार्थ: सबमें स्थित मुझे तिरस्कृत करके केवल विग्रहपूजा करने वाला मानो राख में आहुति देता है।
श्लोक 29.23
सरल हिंदी भावार्थ: दूसरे के शरीर में स्थित मुझसे द्वेष रखने वाले अहंकारी और जीवों से शत्रुता रखने वाले का मन शान्त नहीं होता।
श्लोक 29.24
सरल हिंदी भावार्थ: जीवसमूह का अपमान करने वाले के बहुमूल्य द्रव्य और बड़े अनुष्ठान वाली पूजा से मैं प्रसन्न नहीं होता।
श्लोक 29.25
सरल हिंदी भावार्थ: अपने कर्तव्य करते हुए साधक विग्रह आदि में मेरी आराधना करे और अपने सहित सबके हृदय में मुझे जानने की ओर बढ़े।
श्लोक 29.26
सरल हिंदी भावार्थ: अपने और अन्य के अन्तःस्थित चेतन में द्वेषपूर्ण भेद करने वाले के लिए मृत्यु प्रबल भय बनती है।
श्लोक 29.27
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए सब जीवों में निवास करने वाले मुझे दान, सम्मान, मैत्री और समदृष्टि द्वारा भी पूजो।
श्लोक 29.28
सरल हिंदी भावार्थ: अचेतन पदार्थों से जीव और उनमें प्राण, चित्त तथा इन्द्रियक्रियाओं की क्रमशः अधिक अभिव्यक्ति वाले रूपों का विवेचन किया जाता है।
श्लोक 29.29
सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्रियक्षमता के क्रम में स्पर्श से रस, उससे गन्ध और फिर शब्दग्रहण की अधिक विकसित शक्तियाँ बताई गई हैं।
श्लोक 29.30
सरल हिंदी भावार्थ: आगे रूपभेद पहचानने वाले, दाँतों के भेद वाले और बहुपद, चतुष्पद तथा द्विपद जीवों का क्रम बताया गया।
श्लोक 29.31
सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्यों के चार वर्णों में ज्ञानकर्तव्य वाला ब्राह्मण, उसमें वेदज्ञ और उससे वेद का अर्थ जानने वाला श्रेष्ठ कहा गया।
श्लोक 29.32
सरल हिंदी भावार्थ: अर्थज्ञ से संशय मिटाने वाला, उससे आचरणकर्ता, फिर अनासक्त और निजी लाभ के लिए धर्म न करने वाला श्रेष्ठ है।
श्लोक 29.33
सरल हिंदी भावार्थ: सब कर्म, उनके फल और स्वयं को मुझमें समर्पित, कर्तृत्वाभिमानरहित समदर्शी भक्त से श्रेष्ठ मुझे कोई दिखाई नहीं देता।
श्लोक 29.34
सरल हिंदी भावार्थ: सभी जीवों को मन से आदर और प्रणाम करो, क्योंकि भगवान जीवचेतना के आश्रयरूप सबमें प्रविष्ट हैं।
श्लोक 29.35
सरल हिंदी भावार्थ: हे देवहूति, भक्तियोग और आत्मविवेक का योग बताया; इनमें दृढ़ होकर जीव परमपुरुष तक पहुँचता है।
श्लोक 29.36
सरल हिंदी भावार्थ: परमात्मा की शक्ति प्रकृति, पुरुष, दैव और कर्म की गतिविधियों में जगत का आधार है।
श्लोक 29.37
सरल हिंदी भावार्थ: रूपों के परिवर्तन का यह दिव्य अधिष्ठान काल कहलाता है; भेद और देहाभिमान वाले जीव इससे भय पाते हैं।
श्लोक 29.38
सरल हिंदी भावार्थ: सभी में प्रवेश करके जीवों का अन्य जीवों से संहार कराने वाली वही विष्णु की कालशक्ति है, जो सब गणना का स्वामी है।
श्लोक 29.39
सरल हिंदी भावार्थ: काल का कोई प्रिय, द्वेष्य या सम्बन्धी नहीं; वह स्वयं सजग रहकर असावधान जीव का अन्त कर देता है।
श्लोक 29.40
सरल हिंदी भावार्थ: उसकी व्यवस्था के अधीन वायु चलती, सूर्य तपता, वर्षा होती और तारामण्डल प्रकाशित होता है।
श्लोक 29.41
सरल हिंदी भावार्थ: वृक्ष, लताएँ और औषधियाँ उसी नियम के अनुसार अपने-अपने समय पर फूल और फल धारण करते हैं।
श्लोक 29.42
सरल हिंदी भावार्थ: नदियाँ बहतीं, समुद्र मर्यादा में रहता, अग्नि जलती और पर्वतों सहित पृथ्वी स्थिर रहती है।
श्लोक 29.43
सरल हिंदी भावार्थ: उसी नियम से आकाश जीवों को स्थान देता और महत्तत्त्व सात आवरणों वाले विश्वविस्तार को प्रकट करता है।
श्लोक 29.44
सरल हिंदी भावार्थ: गुणों के अधिष्ठाता देव सृष्टि आदि अपने कार्यों में उसी व्यवस्था का पालन करते हैं; उनसे चराचर का क्रम चलता है।
श्लोक 29.45
सरल हिंदी भावार्थ: अनादि, अविनाशी काल जीवों को जीवों से जन्म देता और मृत्यु द्वारा सबका अन्त करता हुआ स्वयं अनन्त रहता है।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 29 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 30
अधर्मपूर्ण आसक्ति और कर्मफल
श्लोक 30.1
सरल हिंदी भावार्थ: कपिल बोले—प्रबल वायु से बादलों की तरह काल द्वारा चलाया जाता मनुष्य भी उसका महान पराक्रम नहीं समझता।
श्लोक 30.2
सरल हिंदी भावार्थ: सुख के लिए जो वस्तु बड़े दुःख से जुटाता है, काल उसे नष्ट कर देता है और मनुष्य शोक करता है।
श्लोक 30.3
सरल हिंदी भावार्थ: मोहवश वह नश्वर शरीर, घर, भूमि और धन को स्थायी मान लेता है।
श्लोक 30.4
सरल हिंदी भावार्थ: जीव जिस योनि में जन्म लेता है, उसी की दशा में सुख खोजकर उससे विरक्त नहीं हो पाता।
श्लोक 30.5
सरल हिंदी भावार्थ: माया से मोहित होकर दुःखमय अवस्था में भी वह शरीर छोड़ना नहीं चाहता और उसी में थोड़ा सुख मानता है।
श्लोक 30.6
सरल हिंदी भावार्थ: शरीर, पत्नी, सन्तान, घर, पशु, धन और सम्बन्धियों में गहरी आसक्ति से वह अपने को बड़ा समझता है।
श्लोक 30.7
सरल हिंदी भावार्थ: उनका भार सँभालने की चिन्ता में जलता हुआ भी अविवेकी मनुष्य बार-बार अनुचित कर्म करता है।
श्लोक 30.8
सरल हिंदी भावार्थ: असंयमित दाम्पत्य-आकर्षण और बच्चों की तोतली बातों में उसका मन तथा इन्द्रियाँ उलझ जाती हैं।
श्लोक 30.9
सरल हिंदी भावार्थ: छलपूर्ण लौकिक व्यवहार और दुःखों से भरे घर में वह केवल दुःख का अस्थायी उपचार करके उसे सुख समझता है।
श्लोक 30.10
सरल हिंदी भावार्थ: दूसरों को कष्ट देकर जुटाए धन से परिवार पालता और बचे हुए से स्वयं जीता है; हिंसामय कमाई उसे अधोगति देती है।
श्लोक 30.11
सरल हिंदी भावार्थ: बार-बार जीविका बिगड़ने पर भी लोभ नहीं छोड़ता और दूसरे के धन की इच्छा करने लगता है।
श्लोक 30.12
सरल हिंदी भावार्थ: परिवार पालने में असमर्थ, साधनहीन और निष्फल प्रयत्न से थका हुआ वह चिन्ता तथा आहें भरता रहता है।
श्लोक 30.13
सरल हिंदी भावार्थ: जब वह निर्वाह न कर सके तो स्वजन पहले जैसा आदर नहीं करते, जैसे कृपण किसान बूढ़े बैल की उपेक्षा करता है।
श्लोक 30.14
सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी आसक्ति न छूटे तो पहले जिनका पोषण किया, उन्हीं पर निर्भर होकर वृद्ध और मृत्यु के निकट घर में पड़ा रहता है।
श्लोक 30.15
सरल हिंदी भावार्थ: रोग, मन्द पाचन और कम क्रियाशक्ति के साथ वह अनादर से दिया थोड़ा भोजन ग्रहण करता है।
श्लोक 30.16
सरल हिंदी भावार्थ: अन्तसमय में श्वास ऊपर चढ़ती, कफ से मार्ग रुकता और खाँसी-श्वासकष्ट से गले में घरघराहट होती है।
श्लोक 30.17
सरल हिंदी भावार्थ: शोक करते स्वजनों से घिरा वह बुलाने पर भी बोल नहीं पाता; काल का पाश उस पर हावी होता है।
श्लोक 30.18
सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्रियाँ न जीतकर केवल परिवार में लगा व्यक्ति अन्ततः तीव्र वेदना और क्षीण चेतना के साथ प्राण छोड़ता है।
श्लोक 30.19
सरल हिंदी भावार्थ: पुराणवर्णन में उस समय दो भयङ्कर यमदूत दिखते हैं; भय से उसका संयम छूट जाता है।
श्लोक 30.20
सरल हिंदी भावार्थ: सूक्ष्म यातनादेह में बाँधकर वे दण्डनीय को राजसैनिकों की तरह लम्बे मार्ग पर ले जाते हैं।
श्लोक 30.21
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी धमकियों और मार्ग की पीड़ाओं से काँपता वह अपने पापों का स्मरण करता है।
श्लोक 30.22
सरल हिंदी भावार्थ: भूख-प्यास, तप्त भूमि, धूप, अग्नि और वायु से पीड़ित होकर बिना विश्राम या जल के कठिन मार्ग चलता है।
श्लोक 30.23
सरल हिंदी भावार्थ: बार-बार गिरते, मूर्च्छित होते और उठाए जाते हुए वह अन्धकारपूर्ण मार्ग से यमसदन पहुँचता है।
श्लोक 30.24
सरल हिंदी भावार्थ: वर्णन के अनुसार निन्यानबे हजार योजन का मार्ग दो-तीन मुहूर्त में पार कराकर उसे कर्मफल की यातनाएँ दी जाती हैं।
श्लोक 30.25
सरल हिंदी भावार्थ: ग्रंथ अग्निताप और देहपीड़ा जैसी भीषण अवस्थाओं का वर्णन कर्मों के कठोर फल के रूप में करता है।
श्लोक 30.26
सरल हिंदी भावार्थ: पशु-पक्षियों और विषैले जीवों से पीड़ा के चित्र द्वारा हिंसा तथा अधर्म के परिणाम बताए गए हैं।
श्लोक 30.27
सरल हिंदी भावार्थ: अंगच्छेदन, कुचलना, ऊँचाई से गिरना और जलगर्त में निरोध जैसी यातनाएँ भी इस वर्णन में आती हैं।
श्लोक 30.28
सरल हिंदी भावार्थ: स्त्री या पुरुष—जो आसक्त और अधर्मी सम्बन्धों से कर्म रचता है, वह तामिस्र, अन्धतामिस्र और रौरव जैसे दुःखफल भोगता है।
श्लोक 30.29
सरल हिंदी भावार्थ: हे माता, स्वर्ग और नरक की झलक यहीं भी दिखाई देती है; अनेक नरकसमान कष्ट इसी संसार में देखे जाते हैं।
श्लोक 30.30
सरल हिंदी भावार्थ: केवल अपना या परिवार का पेट पालने के लिए अधर्म करने वाला शरीर और सम्बन्ध छोड़कर भी कर्मफल भोगता है।
श्लोक 30.31
सरल हिंदी भावार्थ: दूसरे जीवों को सताकर पाले शरीर को छोड़ वह अकेला अन्धकार में जाता है; उसके साथ अशुभ कर्मों का पाथेय रहता है।
श्लोक 30.32
सरल हिंदी भावार्थ: दैवव्यवस्था से मिला अशुद्ध कर्मफल भोगते समय वह धन खोए व्याकुल व्यक्ति जैसा कष्ट अनुभव करता है।
श्लोक 30.33
सरल हिंदी भावार्थ: मात्र अधर्म के सहारे परिवारपालन की धुन वाला जीव अन्धतामिस्र की गहन अज्ञानमय दशा में जाता है।
श्लोक 30.34
सरल हिंदी भावार्थ: कर्मानुसार अधोगतियों का फल क्रम से भोगकर, शुद्धि की प्रक्रिया के बाद जीव फिर मनुष्यलोक में जन्म लेता है।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 30 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 31
जन्म-मरण का चक्र और आसक्ति से निवृत्ति
श्लोक 31.1
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—जीव अपने कर्म और दैवी व्यवस्था के अनुसार नया शरीर पाने के लिए पिता के बीज के माध्यम से मातृगर्भ में आता है।
श्लोक 31.2
सरल हिंदी भावार्थ: ग्रंथ के प्राचीन गर्भवर्णन में आरम्भिक द्रव अवस्था, बुद्बुद, छोटे पिण्ड और फिर मांसपिण्ड के क्रम से विकास बताया गया है।
श्लोक 31.3
सरल हिंदी भावार्थ: उसी वर्णन में पहले सिर, फिर हाथ-पाँव और आगे नख, रोम, अस्थि, त्वचा तथा इन्द्रियस्थानों का प्राकट्य कहा गया है।
श्लोक 31.4
सरल हिंदी भावार्थ: आगे धातुओं का विकास, भूख-प्यास और गर्भावरण में स्थित शरीर का क्रमशः बढ़ना वर्णित है।
श्लोक 31.5
सरल हिंदी भावार्थ: माता के आहार-पान से शरीर बढ़ता है; ग्रंथ इस गर्भावस्था को संकुचित, पराधीन और दुःखमय स्थिति के रूप में चित्रित करता है।
श्लोक 31.6
सरल हिंदी भावार्थ: शरीर की अत्यन्त कोमलता और गर्भस्थ पीड़ा का वर्णन यहाँ जीव की असहायता समझाने के लिए किया गया है।
श्लोक 31.7
सरल हिंदी भावार्थ: माता के तीखे, उष्ण, लवणयुक्त आदि आहारों से गर्भस्थ जीव के प्रभावित होने की बात इस प्राचीन वर्णन में कही गई है।
श्लोक 31.8
सरल हिंदी भावार्थ: गर्भावरण से घिरा जीव सिर और पीठ झुकाए, शरीर समेटकर रहता है।
श्लोक 31.9
सरल हिंदी भावार्थ: पिंजरे के पक्षी जैसा असमर्थ वह दैव से पूर्वजन्मों के कर्मों का स्मरण पाकर दुःख का अनुभव करता है।
श्लोक 31.10
सरल हिंदी भावार्थ: सातवें महीने से बोधप्राप्त जीव को भी गर्भ की पराधीन गति में स्थिरता और आराम नहीं मिलता—ऐसा ग्रंथ का वर्णन है।
श्लोक 31.11
सरल हिंदी भावार्थ: भयभीत और बन्धनग्रस्त होकर वह हाथ जोड़े उन भगवान की व्याकुल प्रार्थना करता है जिनकी व्यवस्था से यह जन्म मिला।
श्लोक 31.12
सरल हिंदी भावार्थ: जीव प्रार्थना करता है—शरणागतों की रक्षा के लिए अनेक अवतार लेने वाले आपके निर्भय चरणों की शरण हूँ।
श्लोक 31.13
सरल हिंदी भावार्थ: कर्म, देह, इन्द्रिय और मन के आवरण में बँधा-सा होकर भी भीतर स्थित शुद्ध, निर्विकार और अखण्ड चेतन प्रभु को प्रणाम करता हूँ।
श्लोक 31.14
सरल हिंदी भावार्थ: पञ्चभूतमय शरीर में आवृत चेतन जीव मैं प्रकृति और पुरुष के परम स्वामी, असीम महिमावाले अन्तर्यामी की वन्दना करता हूँ।
श्लोक 31.15
सरल हिंदी भावार्थ: आपकी माया से गुण-कर्म में बँधकर स्मृति खोया जीव आपकी महान कृपा बिना इस संसारचक्र से कैसे निकले?
श्लोक 31.16
सरल हिंदी भावार्थ: जिस परमदेव ने यह विवेक दिया और जो सब प्राणियों में अन्तर्यामी हैं, उन्हीं का तीनों ताप मिटाने के लिए भजन करें।
श्लोक 31.17
सरल हिंदी भावार्थ: दूसरे शरीर के भीतर संकुचित और तप्त दशा में रहकर मैं महीने गिनता हूँ; हे प्रभु, इससे बाहर कब निकलूँगा?
श्लोक 31.18
सरल हिंदी भावार्थ: आपकी उदार कृपा से इस दशा में भी विवेक मिला; हे दीननाथ, हाथ जोड़ने के अतिरिक्त इसका प्रतिदान क्या दे सकता हूँ?
श्लोक 31.19
सरल हिंदी भावार्थ: बँधा होकर भी मुझे आपका दिया विवेक मिला है; उसी से भीतर-बाहर पुरातन अन्तर्यामी पुरुष का दर्शन करना चाहता हूँ।
श्लोक 31.20
सरल हिंदी भावार्थ: इस दुःखमय गर्भ से भी बाहर आने पर माया के अन्धकूप में फिर मिथ्याबुद्धि और संसारचक्र घेर सकता है।
श्लोक 31.21
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए व्याकुलता छोड़कर विवेक द्वारा अज्ञान से उबरूँगा और विष्णुचरण का आश्रय लूँगा, ताकि पुनः ऐसा बन्धन न हो।
श्लोक 31.22
सरल हिंदी भावार्थ: कपिल बोले—इस प्रकार प्रार्थना का संकल्प किए जीव को जन्मसमय की वायु नीचे की ओर प्रेरित करती है।
श्लोक 31.23
सरल हिंदी भावार्थ: वह कठिन प्रसवमार्ग से सिर नीचे किए निकलता है; कष्ट और पराधीनता से पूर्वस्मृति ढक जाती है।
श्लोक 31.24
सरल हिंदी भावार्थ: जन्म के बाद शरीर की नई दशा में पड़ा शिशु पहले का ज्ञान भूलकर रोने लगता है।
श्लोक 31.25
सरल हिंदी भावार्थ: दूसरों की इच्छा पर पलता शिशु अपनी चाह न समझे जाने पर अनचाही स्थिति का प्रतिरोध भी नहीं कर पाता।
श्लोक 31.26
सरल हिंदी भावार्थ: अशुद्ध या असुविधाजनक बिछौने पर वह स्वयं खुजला, बैठ या उठ नहीं सकता।
श्लोक 31.27
सरल हिंदी भावार्थ: मच्छर, खटमल आदि उसकी कोमल त्वचा को पीड़ा देते हैं और वह असहाय होकर रोता है।
श्लोक 31.28
सरल हिंदी भावार्थ: शैशव और बाल्य की कठिनाइयों के बाद इच्छित वस्तु न मिलने पर अज्ञान से क्रोध और शोक बढ़ते हैं।
श्लोक 31.29
सरल हिंदी भावार्थ: शरीर के साथ अभिमान और क्रोध बढ़ें तो कामनाग्रस्त जीव दूसरों से संघर्ष करके अपना ही अहित करता है।
श्लोक 31.30
सरल हिंदी भावार्थ: पञ्चभूतमय शरीर में अविवेकी जीव बार-बार मैं और मेरा की गलत पकड़ स्थापित करता है।
श्लोक 31.31
सरल हिंदी भावार्थ: उसी देहासक्ति के लिए कर्म करके वह अज्ञान और कर्मबन्धन के कारण दुःखद संसारचक्र में चलता रहता है।
श्लोक 31.32
सरल हिंदी भावार्थ: यदि फिर केवल काम और पेट के लिए जीने वाले दुर्जनों का सङ्ग करे तो पहले जैसा अज्ञान लौट आता है।
श्लोक 31.33
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसे सङ्ग से सत्य, पवित्रता, दया, संयम, बुद्धि, शोभा, लज्जा, यश, क्षमा और शान्ति आदि घटते हैं।
श्लोक 31.34
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए अशान्त, मूढ़, असंयमी और विषयसुख के दास बने दुराचारी लोगों का सङ्ग नहीं करना चाहिए।
श्लोक 31.35
सरल हिंदी भावार्थ: वैराग्यमार्गी पुरुष के लिए अनियन्त्रित स्त्री-आसक्ति और उसी आसक्ति में लगे लोगों का सङ्ग विशेष बन्धनकारी बताया गया है।
श्लोक 31.36
सरल हिंदी भावार्थ: उदाहरण में प्रजापति के अपनी ही कन्या के रूप से मोहित होकर उसके पीछे दौड़ने की कथा दी गई है।
श्लोक 31.37
सरल हिंदी भावार्थ: नारायण ऋषि जैसे परम संयमी के अतिरिक्त, माया के इस आकर्षण से सामान्य जीव की बुद्धि विचलित हो सकती है।
श्लोक 31.38
सरल हिंदी भावार्थ: काममयी माया की शक्ति देखो; वह दिशाएँ जीतने वाले वीर को भी एक कटाक्ष से अपने अधीन कर देती है।
श्लोक 31.39
सरल हिंदी भावार्थ: योग की परम सिद्धि चाहने वाला और भगवत्सेवा से आत्मलाभ पाने वाला साधक कामासक्त सङ्ग से बचे, जिसे पतन का द्वार कहा है।
श्लोक 31.40
सरल हिंदी भावार्थ: आकर्षक रूप में धीरे-धीरे आने वाली अनियन्त्रित आसक्ति को घास से ढके कुएँ की तरह छिपे संकट के रूप में देखे।
श्लोक 31.41
सरल हिंदी भावार्थ: स्त्रीरूप जन्म पाने वाला जीव भी धन, सन्तान और गृह देने वाले पति को मोह से अपना सर्वस्व मान सकता है।
श्लोक 31.42
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसी पति-पुत्र-गृह की बन्धनकारी आसक्ति उसके लिए भी शिकारी के लुभावने गीत जैसी है; विवेक दोनों के लिए आवश्यक है।
श्लोक 31.43
सरल हिंदी भावार्थ: जीव सूक्ष्म देह सहित लोक-लोकान्तर जाता, पुराने कर्मों का फल भोगता और नए कर्म करता रहता है।
श्लोक 31.44
सरल हिंदी भावार्थ: भूत, इन्द्रिय और मन से बनी देहव्यवस्था जीव का अनुसरण करती है; उसकी क्रिया का अवरोध मृत्यु और प्राकट्य जन्म कहलाता है।
श्लोक 31.45
सरल हिंदी भावार्थ: शरीर की विषयग्रहण क्षमता समाप्त हो तो उसका विघटन मृत्यु है; नई विषयग्रहण व्यवस्था से अहंभाव जुड़े तो जन्म का अनुभव होता है।
श्लोक 31.46
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे नेत्र देखने में असमर्थ हों तो उनके माध्यम से दृष्टि का व्यवहार रुकता है, वैसे देह की क्षमता बदलने से अनुभव बदलता है।
श्लोक 31.47
सरल हिंदी भावार्थ: जीव की गति समझकर धैर्यवान मनुष्य भय, दीनता और घबराहट छोड़ अनासक्त भाव से जीवन बिताए।
श्लोक 31.48
सरल हिंदी भावार्थ: सम्यक् विवेक, योग और वैराग्य से युक्त होकर मायामय जगत में देहाभिमान छोड़कर विचरे।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 31 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 32
सकाम गति और भगवद्भक्ति का परम लक्ष्य
श्लोक 32.1
सरल हिंदी भावार्थ: कपिल बोले—गृहासक्त व्यक्ति अपने धर्म से केवल अर्थ और काम प्राप्त करता तथा उन्हीं के लिए फिर कर्म करता है।
श्लोक 32.2
सरल हिंदी भावार्थ: कामना से मोहित होकर भगवद्भक्ति से विमुख ऐसा व्यक्ति भी श्रद्धा से देव-पितरों के यज्ञ करता है।
श्लोक 32.3
सरल हिंदी भावार्थ: उन उपासनाओं के फल से चन्द्रलोक आदि प्राप्त करता है, किन्तु पुण्य समाप्त होने पर फिर लौटता है।
श्लोक 32.4
सरल हिंदी भावार्थ: प्रलय में हरि अनन्तशय्या पर योगनिद्रा करें तो ऐसे सकाम उपासकों के प्राप्त लोक भी लीन हो जाते हैं।
श्लोक 32.5
सरल हिंदी भावार्थ: इसके विपरीत धीर साधक स्वधर्म को अर्थ-काम की दुहाई नहीं बनाते; वे अनासक्त, समर्पित और शुद्धचित्त रहते हैं।
श्लोक 32.6
सरल हिंदी भावार्थ: निवृत्तिधर्म में रत, ममता-अहंकाररहित होकर कर्तव्यपालन से उनका मन अधिक निर्मल होता है।
श्लोक 32.7
सरल हिंदी भावार्थ: वे उत्तरमार्ग से सर्वव्यापी परमपुरुष के उच्च आश्रय तक जाते हैं, जो प्रकृति और उसके उदय-अन्त के स्वामी हैं।
श्लोक 32.8
सरल हिंदी भावार्थ: परमात्मचिन्तन में लगे वे ब्रह्मा के द्विपरार्ध पूर्ण होने के प्रलय तक उच्च लोक में रहते हैं।
श्लोक 32.9
सरल हिंदी भावार्थ: जब ब्रह्मा अपनी आयु पूरी करके भूत, इन्द्रिय, मन और अहंकारयुक्त ब्रह्माण्ड को समेटते हुए अव्यक्त में प्रवेश करते हैं—
श्लोक 32.10
सरल हिंदी भावार्थ: तब वैराग्य, प्राण-मनसंयम और निरभिमान से युक्त योगी उनके साथ पुरातन अमृत पुरुष के परम आश्रय को पाते हैं।
श्लोक 32.11
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए हे माता, सबके हृदयकमल में रहने वाले और सुनी महिमा से परिचित उन प्रभु की प्रेमपूर्वक शरण लो।
श्लोक 32.12
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा, उनके सहचर ऋषि, योगप्रवर्तक और सिद्ध भी उच्च आध्यात्मिक पदों के अधिकारी होते हैं।
श्लोक 32.13
सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी जहाँ पृथक् दृष्टि या सूक्ष्म कर्तृत्वाभिमान शेष है, वहाँ सगुण जगत से सम्बन्ध बना रह सकता है।
श्लोक 32.14
सरल हिंदी भावार्थ: कालरूप ईश्वर से गुणों में पुनः क्षोभ होने पर ऐसी सृष्टिशक्तियाँ फिर पहले की तरह प्रकट होती हैं।
श्लोक 32.15
सरल हिंदी भावार्थ: धर्म से प्राप्त ब्रह्मलोक का ऐश्वर्य भोगने वाले भी सूक्ष्म आसक्ति शेष रहने पर पुनः सृष्टिक्रम में आते हैं।
श्लोक 32.16
सरल हिंदी भावार्थ: जो यहाँ कर्मों में आसक्ति रखकर श्रद्धापूर्वक सभी निषिद्धरहित नित्यकर्म भी करते हैं—
श्लोक 32.17
सरल हिंदी भावार्थ: परन्तु रजोगुण, कामना और इन्द्रियासक्ति से घर में रमे रहते तथा प्रतिदिन पितरों की पूजा करते हैं—
श्लोक 32.18
सरल हिंदी भावार्थ: वे धर्म-अर्थ-काम तक सीमित होकर भगवान की महान लीलाकथा के रस से विमुख रहते हैं।
श्लोक 32.19
सरल हिंदी भावार्थ: अच्युतकथामृत छोड़कर बुद्धि को गिराने वाली बातें सुनना महान दुर्भाग्य है, जैसे उत्तम आहार छोड़ अशुद्ध वस्तु ग्रहण करना।
श्लोक 32.20
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसे सकाम कर्मी दक्षिणमार्ग से पितृलोक जाते और अन्ततः फिर सन्ततियों के बीच जन्म लेते हैं।
श्लोक 32.21
सरल हिंदी भावार्थ: पुण्य क्षीण होने पर उनके उच्चलोक का सुख छूटता है और वे पराधीन होकर पुनः इसी संसार में आते हैं।
श्लोक 32.22
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए सर्वभाव से परमेश्वर का उनके गुणों में मन लगाने वाली भक्ति से भजन करो।
श्लोक 32.23
सरल हिंदी भावार्थ: वासुदेव में लगाया भक्तियोग शीघ्र वैराग्य और ब्रह्मदर्शन कराने वाला ज्ञान उत्पन्न करता है।
श्लोक 32.24
सरल हिंदी भावार्थ: जब चित्त विषयों को प्रिय-अप्रिय मानकर राग-द्वेष की विषमता नहीं बनाता—
श्लोक 32.25
सरल हिंदी भावार्थ: तभी साधक आत्मा को असङ्ग, समदर्शी और ग्रहण-त्याग की अशान्ति से परे स्थिति में देखता है।
श्लोक 32.26
सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानस्वरूप ब्रह्म, परमात्मा, ईश्वर और परमपुरुष—एक भगवान को विभिन्न दृष्टियों से इन नामों में जाना जाता है।
श्लोक 32.27
सरल हिंदी भावार्थ: समग्र योग का अभिप्रेत फल यही है कि साधक पूर्ण अनासक्ति को प्राप्त हो।
श्लोक 32.28
सरल हिंदी भावार्थ: निर्गुण ज्ञानस्वरूप ब्रह्म बहिर्मुख इन्द्रियों और भ्रम के कारण शब्द आदि विषयों के रूप में भिन्न-भिन्न दिखता है।
श्लोक 32.29
सरल हिंदी भावार्थ: उसी एक आधार की शक्ति महत्तत्त्व, अहंकार, गुण, भूत और इन्द्रियों के भेद से ब्रह्माण्डरूप विस्तार प्रकट करती है।
श्लोक 32.30
सरल हिंदी भावार्थ: श्रद्धा, भक्ति, नियमित योगाभ्यास और वैराग्य से समाहित साधक इस सत्य को प्रत्यक्ष समझता है।
श्लोक 32.31
सरल हिंदी भावार्थ: हे आदरणीय माता, यही ब्रह्मदर्शन कराने वाला ज्ञान है, जिससे प्रकृति और पुरुष का तत्त्व जाना जाता है।
श्लोक 32.32
सरल हिंदी भावार्थ: मुझमें निष्ठित ज्ञानयोग और निर्गुण भक्तियोग दोनों का परम लक्ष्य एक ही भगवान हैं।
श्लोक 32.33
सरल हिंदी भावार्थ: एक पदार्थ अलग इन्द्रियों से अलग गुणों में जाना जाता है; वैसे एक भगवान विभिन्न शास्त्रमार्गों से अनुभूत होते हैं।
श्लोक 32.34
सरल हिंदी भावार्थ: सत्कर्म, यज्ञ, दान, तप, स्वाध्याय, विवेक, मन-इन्द्रियसंयम और कर्मसमर्पण—
श्लोक 32.35
सरल हिंदी भावार्थ: विविध योगाङ्ग, भक्तियोग तथा प्रवृत्ति और निवृत्ति के धर्म—
श्लोक 32.36
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मतत्त्वज्ञान और दृढ़ वैराग्य सहित इन साधनों से स्वयंप्रकाश भगवान के सगुण तथा निर्गुण स्वरूप का बोध होता है।
श्लोक 32.37
सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हें तीन गुणों और निर्गुण भाव के अनुसार भक्ति के चार प्रकार तथा भीतर से सक्रिय अप्रकट कालगति बताई।
श्लोक 32.38
सरल हिंदी भावार्थ: अविद्या और कर्म से बनी जीव की अनेक संसारगत अवस्थाएँ भी कही हैं, जिनमें वह अपनी वास्तविक गति भूलता है।
श्लोक 32.39
सरल हिंदी भावार्थ: यह ज्ञान दुष्ट, अविनयी, घमण्डी, द्वेषपूर्ण या धर्म का दिखावा करने वाले को अनुचित रीति से न दिया जाए।
श्लोक 32.40
सरल हिंदी भावार्थ: लोभी, अत्यधिक गृहासक्त, भक्ति से विमुख या भक्तों से द्वेष रखने वाले में इसकी ग्रहणशीलता पहले विकसित करनी चाहिए।
श्लोक 32.41
सरल हिंदी भावार्थ: इसे श्रद्धालु, भक्त, विनम्र, दोषदृष्टिरहित, सब जीवों से मैत्री करने वाले और सुनने-सेवा करने के इच्छुक को दो।
श्लोक 32.42
सरल हिंदी भावार्थ: विषयवैराग्य, शान्तचित्त, निर्मत्सरता और पवित्रता वाले, जिसके लिए मैं प्रियतम हूँ, ऐसे साधक को यह शिक्षा फलती है।
श्लोक 32.43
सरल हिंदी भावार्थ: हे माता, जो श्रद्धा से यह उपदेश सुने अथवा मुझमें मन लगाकर सुनाए, वह मेरी गति प्राप्त करता है।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 32 समाप्त ॥
तृतीय स्कन्ध • अध्याय 33
देवहूति की स्तुति, साधना और सिद्धि
श्लोक 33.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—कपिल का उपदेश सुनकर देवहूति का मोहावरण हट गया; उन्होंने तत्त्वसिद्धि के आश्रय पुत्ररूप भगवान को प्रणाम करके स्तुति की।
श्लोक 33.2
सरल हिंदी भावार्थ: देवहूति बोलीं—आपके नाभिकमल से जन्मे ब्रह्मा ने भी जलशायी आपके भूत, इन्द्रिय और विषयों के बीजरूप विश्वशरीर का ध्यान किया।
श्लोक 33.3
सरल हिंदी भावार्थ: निष्काम और सत्यसंकल्प आप ही अचिन्त्य शक्तियों तथा गुणप्रवाह द्वारा विश्व की सृष्टि, स्थिति और प्रलय करते हैं।
श्लोक 33.4
सरल हिंदी भावार्थ: जिनके उदर में समस्त विश्व रहता और जो प्रलय में वटपत्र पर बालक बनकर चरण चूसते हैं, वे आप मेरे गर्भ में कैसे समाए!
श्लोक 33.5
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे वराह आदि अवतार पापशमन और भक्तकल्याण के लिए हैं, वैसे कपिलावतार आत्ममार्ग प्रकट करने के लिए है।
श्लोक 33.6
सरल हिंदी भावार्थ: आपका नाम सुनने, गाने, प्रणाम और स्मरण से सामाजिक रूप से तिरस्कृत व्यक्ति भी पवित्र हो सकता है; प्रत्यक्ष दर्शन की महिमा तो और बड़ी है।
श्लोक 33.7
सरल हिंदी भावार्थ: जिसकी जिह्वा पर आपका नाम है, वह जन्म की सामाजिक स्थिति से परे सम्माननीय है; नामस्मरण तप, यज्ञ, पवित्रता और वेदाध्ययन का सार देता है।
श्लोक 33.8
सरल हिंदी भावार्थ: अन्तर्मुख चेतना में अनुभूत, अपने तेज से गुणमोह मिटाने वाले परब्रह्म पुरुष, वेदमय कपिलविष्णु को मैं प्रणाम करती हूँ।
श्लोक 33.9
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—इस प्रकार स्तुति किए जाने पर मातृवत्सल कपिल ने स्नेह से विह्वल वाणी में माता को उत्तर दिया।
श्लोक 33.10
सरल हिंदी भावार्थ: कपिल बोले—हे माता, मेरे बताए इस सुगम साधनामार्ग पर स्थित होकर तुम शीघ्र परम अवस्था प्राप्त करोगी।
श्लोक 33.11
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मज्ञानी भी इस शिक्षा को अपनाते हैं; श्रद्धा रखो, इससे अजन्मा मुझे प्राप्त करोगी, जबकि अज्ञान में मृत्युचक्र बना रहता है।
श्लोक 33.12
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—माता को अपनी प्राप्ति का मार्ग दिखाकर कपिल ने उनसे अनुमति ली और प्रस्थान किया।
श्लोक 33.13
सरल हिंदी भावार्थ: देवहूति उसी सरस्वतीतट के आश्रम में पुत्र के बताए योग का एकाग्र अभ्यास करने लगीं।
श्लोक 33.14
सरल हिंदी भावार्थ: नियमित स्नान से उनके केश जटिल और कठोर तप से शरीर कृश हुआ; वे तपस्वी वस्त्र धारण करती थीं।
श्लोक 33.15
सरल हिंदी भावार्थ: कर्दम की तप-योगशक्ति से प्राप्त उनका गृहस्थवैभव अनुपम था, जिसे देवविमानों के निवासी भी चाहते थे।
श्लोक 33.16
सरल हिंदी भावार्थ: उसमें दूध के फेन जैसे श्वेत बिछौने, कलात्मक शय्याएँ, स्वर्णासनों और कोमल आच्छादनों का वैभव था।
श्लोक 33.17
सरल हिंदी भावार्थ: स्वच्छ स्फटिक और पन्ने की दीवारों के बीच रत्नदीप तथा सुन्दर कलाकृतियाँ प्रकाश देती थीं।
श्लोक 33.18
सरल हिंदी भावार्थ: उपवन कल्पवृक्षों, फूलों, पक्षियों के जोड़ों और गुँजारते भौंरों से रमणीय था।
श्लोक 33.19
सरल हिंदी भावार्थ: कमलसुगन्ध वाली बावड़ी में कर्दम सहित उनके विहार के समय दिव्य परिचारिकाएँ गुणगान करती थीं।
श्लोक 33.20
सरल हिंदी भावार्थ: देवाङ्गनाओं को भी वाञ्छनीय वह वैभव छोड़कर वे पुत्रवियोग में कुछ समय उदास रहीं।
श्लोक 33.21
सरल हिंदी भावार्थ: पति वन जा चुके थे; तत्त्वज्ञान होने पर भी वात्सल्य से वे बछड़े से बिछुड़ी गाय की तरह व्याकुल हुईं।
श्लोक 33.22
सरल हिंदी भावार्थ: पुत्ररूप कपिलहरि का निरन्तर ध्यान करते हुए शीघ्र ही उस ऐश्वर्यपूर्ण घर से उनकी आसक्ति मिट गई।
श्लोक 33.23
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने पुत्र के बताए प्रसन्नमुख भगवान का समग्र और एक-एक अंग करके ध्यान किया।
श्लोक 33.24
सरल हिंदी भावार्थ: अविच्छिन्न भक्ति, प्रबल वैराग्य और यथाविधि साधना से उत्पन्न ब्रह्मज्ञान द्वारा—
श्लोक 33.25
सरल हिंदी भावार्थ: निर्मल चित्त में सर्वव्यापी आत्मस्वरूप का अनुभव हुआ और माया के गुणों का आवरण मिट गया।
श्लोक 33.26
सरल हिंदी भावार्थ: सबके आत्माश्रय भगवान में बुद्धि स्थिर होने से जीवभाव के क्लेश घटे और परम शान्ति प्राप्त हुई।
श्लोक 33.27
सरल हिंदी भावार्थ: नित्य समाधि से गुणों का भ्रम छूट गया; शरीराभिमान वैसे भूल गया जैसे जागने पर स्वप्न की पकड़ छूटती है।
श्लोक 33.28
सरल हिंदी भावार्थ: परिचारिकाओं से पोषित शरीर तप के बावजूद अत्यधिक क्षीण नहीं हुआ; मलिन बाह्य अवस्था में भी वे धुएँ से ढकी अग्नि जैसी तेजस्वी थीं।
श्लोक 33.29
सरल हिंदी भावार्थ: वासुदेव में बुद्धि लीन होने से उन्हें केश, वस्त्र और बाहरी देहावस्था का पहले जैसा बोध न रहा; दैव उनका संरक्षण करता था।
श्लोक 33.30
सरल हिंदी भावार्थ: कपिल के बताए मार्ग से देवहूति ने शीघ्र ही परमात्मा भगवान और ब्रह्मनिर्वाण की अवस्था प्राप्त की।
श्लोक 33.31
सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ उन्हें सिद्धि मिली, वह स्थान तीनों लोकों में सिद्धपद नाम से प्रसिद्ध पवित्र क्षेत्र हुआ।
श्लोक 33.32
सरल हिंदी भावार्थ: कथा में उनकी योगशुद्ध देह का पावन सरिता के रूप में प्राकट्य बताया गया, जो सिद्धों द्वारा सेवित है।
श्लोक 33.33
सरल हिंदी भावार्थ: माता की अनुमति लेकर महायोगी कपिल पिता के आश्रम से उत्तरपूर्व दिशा की ओर गए।
श्लोक 33.34
सरल हिंदी भावार्थ: सिद्ध, चारण, गन्धर्व, मुनि और अप्सराएँ उनकी स्तुति करती रहीं; समुद्र ने आदर और निवासस्थान दिया।
श्लोक 33.35
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ सांख्याचार्यों से वन्दित भगवान तीनों लोकों की शान्ति के लिए योग में समाहित रहते हैं।
श्लोक 33.36
सरल हिंदी भावार्थ: हे विदुर, तुम्हारे पूछे विषय और कपिल–देवहूति का यह पवित्र संवाद इस प्रकार सुनाया।
श्लोक 33.37
सरल हिंदी भावार्थ: जो कपिल के गूढ़ आत्मयोग को श्रद्धा से सुनता या कहता और गरुड़ध्वज भगवान में बुद्धि लगाता है, वह उनके चरणकमल प्राप्त करता है।
॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 33 समाप्त ॥
इस भाग का भक्ति-सन्देश
संतसङ्ग, हरिनाम, सरलता और सभी जीवों पर दया से भक्ति जीवन में उतरती है। कपिलभगवान का उपदेश बताता है कि मन विषयों में आसक्त हो तो बन्धन और परमात्मा में स्थिर हो तो मुक्ति का साधन है। देवहूति ने इसी ज्ञान, वैराग्य और प्रेममयी साधना से परम सिद्धि पाई।
पाठाधार और संपादकीय जानकारी
प्राचीन मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents का “श्रीमद्भागवतम्—तृतीयस्कन्धः” है। अध्याय 20–33 में क्रमशः 53, 56, 39, 57, 47, 44, 72, 30, 44, 45, 34, 48, 43 और 37 श्लोक हैं; कुल 649। समस्त तृतीय स्कन्ध में 1,411 श्लोक हैं। कोष्ठकों में दिए गए अतिरिक्त वैकल्पिक पद मुख्य क्रम में नहीं मिलाए गए हैं। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना की स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है, किसी आधुनिक टीका की प्रतिलिपि नहीं। गर्भविकास, लोक और कर्मफल के वर्णन प्राचीन पुराणपरम्परा के अनुसार हैं, आधुनिक चिकित्सकीय विवरण नहीं। योग और प्राणायाम का पाठ ग्रंथ का भावार्थ है, व्यक्तिगत अभ्यास-प्रशिक्षण नहीं। वैराग्यप्रकरण की आसक्तिसम्बन्धी शिक्षा पुरुष और स्त्री दोनों के लिए लागू प्रसंग में पढ़ें।
॥ तृतीय स्कन्ध सम्पूर्ण ॥
॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
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