श्रीमद्भागवत महापुराण तृतीय स्कन्ध भाग 3 — अध्याय 20–33, कपिल–देवहूति संवाद और भक्तियोग

भक्ति भावना • पुराण साहित्य

श्रीमद्भागवत महापुराण

तृतीय स्कन्ध • भाग ३ • अध्याय २०–३३

६४९ मूल श्लोक • प्रत्येक श्लोक का सरल हिंदी भावार्थ

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कपिलभगवान का ज्ञान और देवहूति की सिद्धि

इस अंतिम भाग में सृष्टिविस्तार से आगे कर्दम और देवहूति की कथा, कपिलभगवान का प्राकट्य तथा उनका भक्तियोग और आत्मज्ञान का उपदेश आता है। भगवान का ध्यान, सभी जीवों पर दया, जन्म-मरण के बन्धन से निवृत्ति और देवहूति की सिद्धि के साथ तृतीय स्कन्ध पूर्ण होता है।

यहाँ अध्याय 20–33 के सभी 649 श्लोक क्रम से हैं। प्रत्येक का सरल हिंदी भावार्थ स्वतंत्र रूप से लिखा गया है। पहले दो भागों सहित तृतीय स्कन्ध के चुने हुए आधार-पाठ के सभी 33 अध्याय और 1,411 श्लोक पूर्ण होते हैं।

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 20

सृष्टि के विविध विभागों का विस्तार

श्लोक 20.1

शौनक उवाच । महीं प्रतिष्ठामध्यस्य सौते स्वायम्भुवो मनुः । कान्यन्वतिष्ठद्द्वाराणि मार्गायावरजन्मनाम् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: शौनक ने पूछा—पृथ्वी का निवासस्थान प्राप्त होने पर स्वायम्भुव मनु ने प्रजाओं के कल्याण और वंशविस्तार के लिए क्या किया?

श्लोक 20.2

क्षत्ता महाभागवतः कृष्णस्यैकान्तिकः सुहृत् । यस्तत्याजाग्रजं कृष्णे सापत्यमघवानिति ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर कृष्ण के अनन्य भक्त और मित्र थे; कृष्णविरोधी अपराधों के कारण उन्होंने धृतराष्ट्र तथा उसके पुत्रों का साथ छोड़ दिया था।

श्लोक 20.3

द्वैपायनादनवरो महित्वे तस्य देहजः । सर्वात्मना श्रितः कृष्णं तत्परांश्चाप्यनुव्रतः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे व्यासजी के पुत्र, महिमा में उनके अनुरूप और कृष्ण तथा कृष्णभक्तों के पूर्ण आश्रित थे।

श्लोक 20.4

किमन्वपृच्छन्मैत्रेयं विरजास्तीर्थसेवया । उपगम्य कुशावर्त आसीनं तत्त्ववित्तमम् ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: तीर्थसेवा से निर्मल होकर कुशावर्त में तत्त्वज्ञ मैत्रेय के पास पहुँचने पर उन्होंने आगे क्या पूछा?

श्लोक 20.5

तयोः संवदतोः सूत प्रवृत्ता ह्यमलाः कथाः । आपो गाङ्गा इवाघघ्नीर्हरेः पादाम्बुजाश्रयाः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके संवाद में हरिचरणाश्रित ऐसी निर्मल कथाएँ निकलीं जो गंगाजल की तरह पापों को धोती हैं।

श्लोक 20.6

ता नः कीर्तय भद्रं ते कीर्तन्योदारकर्मणः । रसज्ञः को नु तृप्येत हरिलीलामृतं पिबन् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन कथाओं को हमें सुनाइए; हरिलीलामृत का रस जानने वाला उससे कैसे तृप्त हो सकता है?

श्लोक 20.7

एवमुग्रश्रवाः पृष्टः ऋषिभिर्नैमिषायनैः । भगवत्यर्पिताध्यात्मस्तानाह श्रूयतामिति ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: नैमिषारण्य के ऋषियों के प्रश्न पर भगवान में मन लगाए सूतजी बोले—ध्यान से सुनिए।

श्लोक 20.8

सूत उवाच । हरेर्धृतक्रोडतनोः स्वमायया निशम्य गोरुद्धरणं रसातलात् । लीलां हिरण्याक्षमवज्ञया हतं सञ्जातहर्षो मुनिमाह भारतः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी कहते हैं—वराहरूप हरि का पृथ्वीउद्धार और हिरण्याक्षवध सुनकर प्रसन्न विदुर ने मैत्रेय से पूछा।

श्लोक 20.9

विदुर उवाच । प्रजापतिपतिः सृष्ट्वा प्रजासर्गे प्रजापतीन् । किमारभत मे ब्रह्मन् प्रब्रूह्यव्यक्तमार्गवित् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रजापतियों को सृष्टिकार्य के लिए उत्पन्न करने के बाद ब्रह्मा ने आगे क्या किया?

श्लोक 20.10

ये मरीच्यादयो विप्रा यस्तु स्वायम्भुवो मनुः । ते वै ब्रह्मण आदेशात्कथमेतदभावयन् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: मरीचि आदि ऋषियों और स्वायम्भुव मनु ने ब्रह्मा की आज्ञा से जगत का विस्तार कैसे किया?

श्लोक 20.11

सद्वितीयाः किमसृजन् स्वतन्त्रा उत कर्मसु । आहोस्वित्संहताः सर्व इदं स्म समकल्पयन् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्या वे पत्नी सहित, स्वतंत्र रूप से या सभी मिलकर सृष्टि के कार्य में लगे?

श्लोक 20.12

मैत्रेय उवाच । दैवेन दुर्वितर्क्येण परेणानिमिषेण च । जातक्षोभाद्भगवतो महानासीद्गुणत्रयात् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—अचिन्त्य दैव, काल और परमात्मा की प्रेरणा से प्रकृति के तीन गुणों में क्षोभ हुआ और महत्तत्त्व प्रकट हुआ।

श्लोक 20.13

रजःप्रधानान् महतस्त्रिलिङ्गो दैवचोदितात् । जातः ससर्ज भूतादिर्वियदादीनि पञ्चशः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: दैवी प्रेरित महत्तत्त्व से त्रिविध अहंकार और फिर उसके द्वारा आकाश आदि पाँच भूततत्त्व उत्पन्न हुए।

श्लोक 20.14

तानि चैकैकशः स्रष्टुमसमर्थानि भौतिकम् । संहत्य दैवयोगेन हैममण्डमवासृजन् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे अकेले भौतिक जगत नहीं बना सके; दैवी संयोग से मिलकर उन्होंने तेजोमय ब्रह्माण्ड रचा।

श्लोक 20.15

सोऽशयिष्टाब्धिसलिले आण्डकोशो निरात्मकः । साग्रं वै वर्षसाहस्रमन्ववात्सीत्तमीश्वरः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह अचेतन ब्रह्माण्ड समुद्रजल में पड़ा रहा; सहस्र से अधिक वर्षों बाद ईश्वर ने उसमें प्रवेश किया।

श्लोक 20.16

तस्य नाभेरभूत्पद्मं सहस्रार्कोरुदीधिति । सर्वजीवनिकायौको यत्र स्वयमभूत्स्वराट् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी नाभि से सहस्र सूर्यों जैसा दीप्त कमल प्रकट हुआ; सभी जीवों के उस आश्रय में ब्रह्मा उत्पन्न हुए।

श्लोक 20.17

सोऽनुविष्टो भगवता यः शेते सलिलाशये । लोकसंस्थां यथापूर्वं निर्ममे संस्थया स्वया ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: जलशायी भगवान की प्रेरणा से ब्रह्मा ने अपनी शक्ति द्वारा पहले की तरह लोकव्यवस्था बनाई।

श्लोक 20.18

ससर्जच्छायया विद्यां पञ्च पर्वाणमग्रतः । तामिस्रमन्धतामिस्रं तमो मोहो महातमः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: पहले उन्होंने छायारूप से तामिस्र, अन्धतामिस्र, तम, मोह और महामोह की पाँच अज्ञानवृत्तियाँ उत्पन्न कीं।

श्लोक 20.19

विससर्जात्मनः कायं नाभिनन्दंस्तमोमयम् । जगृहुर्यक्षरक्षांसि रात्रिं क्षुत्तृट्समुद्भवाम् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: तमोमयी उस अवस्था से प्रसन्न न होकर उन्होंने उसका त्याग किया; यक्ष-राक्षसों ने भूख-प्यास की आधाररूप रात्रि को अपनाया।

श्लोक 20.20

क्षुत्तृड्भ्यामुपसृष्टास्ते तं जग्धुमभिदुद्रुवुः । मा रक्षतैनं जक्षध्वमित्यूचुः क्षुत्तृडर्दिताः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: भूख-प्यास से व्याकुल वे ब्रह्मा को खाने दौड़े और बोले—इसे बचाओ मत, खा डालो।

श्लोक 20.21

देवस्तानाह संविग्नो मा मां जक्षत रक्षत । अहो मे यक्षरक्षांसि प्रजा यूयं बभूविथ ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा बोले—मुझे मत खाओ, रक्षा करो; तुम मेरी ही यक्ष-राक्षस नामक प्रजाएँ हुए हो।

श्लोक 20.22

देवताः प्रभया या या दीव्यन् प्रमुखतोऽसृजत् । ते अहार्षुर्देवयन्तो विसृष्टां तां प्रभामहः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने अपने प्रकाश से देवता उत्पन्न किए; देवों ने उनके छोड़े प्रकाशमय दिन को स्वीकार किया।

श्लोक 20.23

देवोऽदेवाञ्जघनतः सृजति स्मातिलोलुपान् । त एनं लोलुपतया मैथुनायाभिपेदिरे ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर जघनभाग से अत्यन्त कामलोलुप असुर उत्पन्न हुए, जो विवेकहीन कामना से उन्हीं की ओर बढ़े।

श्लोक 20.24

ततो हसन् स भगवानसुरैर्निरपत्रपैः । अन्वीयमानस्तरसा क्रुद्धो भीतः परापतत् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: निर्लज्ज असुरों के पीछा करने पर ब्रह्मा पहले हँसे, फिर क्रोध और भय से दूर भागे।

श्लोक 20.25

स उपव्रज्य वरदं प्रपन्नार्तिहरं हरिम् । अनुग्रहाय भक्तानामनुरूपात्मदर्शनम् ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे शरणागतों के दुःख हरने और भक्तों के अनुरूप दर्शन देने वाले वरदाता हरि के पास पहुँचे।

श्लोक 20.26

पाहि मां परमात्मंस्ते प्रेषणेनासृजं प्रजाः । ता इमा यभितुं पापा उपाक्रामन्ति मां प्रभो ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—आपकी आज्ञा से ये प्रजाएँ रचीं, पर ये मुझे ही कामभाव से सताने दौड़ती हैं; रक्षा कीजिए।

श्लोक 20.27

त्वमेकः किल लोकानां क्लिष्टानां क्लेशनाशनः । त्वमेकः क्लेशदस्तेषामनासन्नपदां तव ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: दुःखी लोकों के क्लेश मिटाने वाले आप ही हैं; आपके चरणों से दूर रहने पर जीव क्लेश पाते हैं।

श्लोक 20.28

सोऽवधार्यास्य कार्पण्यं विविक्ताध्यात्मदर्शनः । विमुञ्चात्मतनुं घोरामित्युक्तो विमुमोच ह ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: अन्तर्यामी भगवान ने उनकी व्याकुलता समझकर वह उग्र अवस्था त्यागने को कहा; ब्रह्मा ने आज्ञा मानी।

श्लोक 20.29

तां क्वणच्चरणाम्भोजां मदविह्वललोचनाम् । काञ्चीकलापविलसद्दुकूलच्छन्नरोधसम् ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: त्यागी गई वह अवस्था नूपुरध्वनि वाले चरण, मादक नेत्र और चमकती करधनीयुक्त सुन्दर स्त्रीरूप में दिखाई दी।

श्लोक 20.30

अन्योन्यश्लेषयोत्तुङ्गनिरन्तरपयोधराम् । सुनासां सुद्विजां स्निग्द्धहासलीलावलोकनाम् ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसके सुडौल अंग, सुन्दर नासिका-दन्त और स्नेहमयी मुस्कान के साथ आकर्षक दृष्टि थी।

श्लोक 20.31

गूहन्तीं व्रीडयाऽऽत्मानं नीलालकवरूथिनीम् । उपलभ्यासुरा धर्म सर्वे सम्मुमुहुः स्त्रियम् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: नीले केशों और लज्जाभाव से अपने को ढकती उस स्त्रीरूप को देखकर असुर मोहित हो गए।

श्लोक 20.32

अहो रूपमहो धैर्यमहो अस्या नवं वयः । मध्ये कामयमानानामकामेव विसर्पति ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे बोले—कैसा रूप, धैर्य और नवयौवन है! हमारे बीच होकर भी यह अनासक्त-सी चलती है।

श्लोक 20.33

वितर्कयन्तो बहुधा तां सन्ध्यां प्रमदाकृतिम् । अभिसम्भाव्य विश्रम्भात्पर्यपृच्छन् कुमेधसः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस स्त्रीरूप सन्ध्या के विषय में अनेक कल्पनाएँ करके मूर्ख असुर विश्वास से प्रश्न करने लगे।

श्लोक 20.34

कासि कस्यासि रम्भोरु को वार्थस्तेऽत्र भामिनि । रूपद्रविणपण्येन दुर्भगान्नो विबाधसे ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम कौन हो और किसकी हो? यहाँ क्या प्रयोजन है? अपने सौन्दर्य से हम व्याकुलों को और क्यों सताती हो?

श्लोक 20.35

या वा काचित्त्वमबले दिष्ट्या सन्दर्शनं तव । उत्सुनोषीक्षमाणानां कन्दुकक्रीडया मनः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम जो भी हो, तुम्हारा दर्शन मिला; गेंद के खेल से तुम देखने वालों का मन हर रही हो।

श्लोक 20.36

नैकत्र ते जयति शालिनि पादपद्मं घ्नन्त्या मुहुः करतलेन पतत्पतङ्गम् । मध्यं विषीदति बृहत्स्तनभारभीतं शान्तेव दृष्टिरमला सुशिखासमूहः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: गेंद पर हाथ मारते तुम्हारे चरण लगातार चलते, कमर झुकती और केश बिखरते हैं, फिर भी दृष्टि शान्त लगती है।

श्लोक 20.37

इति सायन्तनीं सन्ध्यामसुराः प्रमदायतीम् । प्रलोभयन्तीं जगृहुर्मत्वा मूढधियः स्त्रियम् ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार बुद्धिहीन असुरों ने आकर्षक सायंसन्ध्या को वास्तविक स्त्री मानकर अपनाया।

श्लोक 20.38

प्रहस्य भावगम्भीरं जिघ्रन्त्यात्मानमात्मना । कान्त्या ससर्ज भगवान् गन्धर्वाप्सरसां गणान् ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर ब्रह्मा ने गम्भीर प्रसन्नता से अपने सौन्दर्य की अनुभूति करते हुए गन्धर्व और अप्सराओं के समूह रचे।

श्लोक 20.39

विससर्ज तनुं तां वै ज्योत्स्नां कान्तिमतीं प्रियाम् । त एव चाददुः प्रीत्या विश्वावसुपुरोगमाः ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने अपनी प्रिय कान्तिमयी चाँदनीरूप अवस्था छोड़ी; विश्वावसु आदि गन्धर्वों ने उसे प्रेम से ग्रहण किया।

श्लोक 20.40

सृष्ट्वा भूतपिशाचांश्च भगवानात्मतन्द्रिणा । दिग्वाससो मुक्तकेशान् वीक्ष्य चामीलयद्दृशौ ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: तन्द्रा से भूत-पिशाच उत्पन्न हुए; उनके दिगम्बर और खुले केश वाले रूप देखकर ब्रह्मा ने नेत्र मूँद लिए।

श्लोक 20.41

जगृहुस्तद्विसृष्टां तां जृम्भणाख्यां तनुं प्रभोः । निद्रामिन्द्रियविक्लेदो यया भूतेषु दृश्यते । येनोच्छिष्टान् धर्षयन्ति तमुन्मादं प्रचक्षते ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने ब्रह्मा की जम्हाई और निद्रारूप अवस्था अपनाई; कथा इसे चेतना की शिथिलता और उन्माद जैसी दशाओं से जोड़ती है।

श्लोक 20.42

ऊर्जस्वन्तं मन्यमान आत्मानं भगवानजः । साध्यान् गणान् पितृगणान् परोक्षेणासृजत्प्रभुः ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने में सृजनशक्ति अनुभव करके ब्रह्मा ने अप्रत्यक्ष रूप से साध्यदेव और पितृगण उत्पन्न किए।

श्लोक 20.43

त आत्मसर्गं तं कायं पितरः प्रतिपेदिरे । साध्येभ्यश्च पितृभ्यश्च कवयो यद्वितन्वते ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: पितरों ने उनकी उस अप्रकट अवस्था को ग्रहण किया; विद्वान इन्हीं साध्यों और पितरों के लिए अर्पण करते हैं।

श्लोक 20.44

सिद्धान् विद्याधरांश्चैव तिरोधानेन सोऽसृजत् । तेभ्योऽददात्तमात्मानमन्तर्धानाख्यमद्भुतम् ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: तिरोभाव की शक्ति से सिद्ध और विद्याधर उत्पन्न हुए; उन्हें अदृश्य होने की सामर्थ्य वाली अवस्था दी।

श्लोक 20.45

स किन्नरान् किम्पुरुषान् प्रत्यात्म्येनासृजत्प्रभुः । मानयन्नात्मनाऽऽत्मानमात्माभासं विलोकयन् ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने प्रतिबिम्ब को देखते और अपने रूप का सम्मान करते हुए ब्रह्मा ने किन्नर और किम्पुरुष रचे।

श्लोक 20.46

ते तु तज्जगृहू रूपं त्यक्तं यत्परमेष्ठिना । मिथुनीभूय गायन्तस्तमेवोषसि कर्मभिः ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने ब्रह्मा का छोड़ा प्रतिबिम्बरूप अपनाया और जोड़ों में प्रातःकाल उनका गुणगान करने लगे।

श्लोक 20.47

देहेन वै भोगवता शयानो बहुचिन्तया । सर्गेऽनुपचिते क्रोधादुत्ससर्ज ह तद्वपुः ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: सृष्टिविस्तार पर्याप्त न होने की चिन्ता में लेटे ब्रह्मा ने क्रोधपूर्वक उस विश्रामशील अवस्था को त्यागा।

श्लोक 20.48

येऽहीयन्तामुतः केशा अहयस्तेऽङ्ग जज्ञिरे । सर्पाः प्रसर्पतः क्रूरा नागा भोगोरुकन्धराः ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उससे गिरे केशों से सर्प और उसके फैलते अंगों से विशाल फनों वाले नाग प्रकट बताए गए हैं।

श्लोक 20.49

स आत्मानं मन्यमानः कृतकृत्यमिवात्मभूः । तदा मनून् ससर्जान्ते मनसा लोकभावनान् ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर अपने कार्य की सिद्धि का अनुभव करके ब्रह्मा ने लोकव्यवस्था चलाने वाले मनुओं को मन से उत्पन्न किया।

श्लोक 20.50

तेभ्यः सोऽसृजत्स्वीयं पुरं पुरुषमात्मवान् । तान् दृष्ट्वा ये पुरा सृष्टाः प्रशशंसुः प्रजापतिम् ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्हें अपना पुरुषाकार शरीर दिया; पहले उत्पन्न प्रजाओं ने यह देखकर सृष्टिकर्ता की प्रशंसा की।

श्लोक 20.51

अहो एतज्जगत्स्रष्टः सुकृतं बत ते कृतम् । प्रतिष्ठिताः क्रिया यस्मिन् साकमन्नमदामहे ॥ ५१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—आपने उत्तम व्यवस्था की; अब यज्ञादि कर्म स्थापित हुए और हम भी अर्पित अन्न प्राप्त करेंगे।

श्लोक 20.52

तपसा विद्यया युक्तो योगेन सुसमाधिना । ऋषीन् ऋषिर्हृषीकेशः ससर्जाभिमताः प्रजाः ॥ ५२॥

सरल हिंदी भावार्थ: तप, विद्या, योग और समाधि से सम्पन्न ब्रह्मा ने मनोनुकूल ऋषियों को उत्पन्न किया।

श्लोक 20.53

तेभ्यश्चैकैकशः स्वस्य देहस्यांशमदादजः । यत्तत्समाधियोगर्द्धितपोविद्याविरक्तिमत् ॥ ५३॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रत्येक ऋषि को समाधि, योगसामर्थ्य, तप, विद्या और वैराग्य से युक्त अपनी शक्ति का अंश प्रदान किया।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 20 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 21

कर्दम की तपस्या और भगवान का वरदान

श्लोक 21.1

विदुर उवाच । स्वायम्भुवस्य च मनोर्वंशः परमसम्मतः । कथ्यतां भगवन् यत्र मैथुनेनैधिरे प्रजाः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर बोले—स्वायम्भुव मनु का सम्माननीय वंश बताइए, जिसमें स्त्री-पुरुष के संयोग से प्रजाओं का विस्तार हुआ।

श्लोक 21.2

प्रियव्रतोत्तानपादौ सुतौ स्वायम्भुवस्य वै । यथाधर्मं जुगुपतुः सप्तद्वीपवतीं महीम् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके पुत्र प्रियव्रत और उत्तानपाद ने सात द्वीपों वाली पृथ्वी का धर्मपूर्वक पालन किया।

श्लोक 21.3

तस्य वै दुहिता ब्रह्मन् देवहूतीति विश्रुता । पत्नी प्रजापतेरुक्ता कर्दमस्य त्वयानघ ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपने उनकी प्रसिद्ध पुत्री देवहूति को प्रजापति कर्दम की पत्नी बताया है।

श्लोक 21.4

तस्यां स वै महायोगी युक्तायां योगलक्षणैः । ससर्ज कतिधा वीर्यं तन्मे शुश्रूषवे वद ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: योग्य देवहूति से महायोगी कर्दम की कितनी सन्तानें हुईं? मैं उनका प्रसंग सुनना चाहता हूँ।

श्लोक 21.5

रुचिर्यो भगवान् ब्रह्मन् दक्षो वा ब्रह्मणः सुतः । यथा ससर्ज भूतानि लब्ध्वा भार्यां च मानवीम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनु की पुत्रियों को पत्नी के रूप में पाकर रुचि और दक्ष ने किस प्रकार वंशविस्तार किया?

श्लोक 21.6

मैत्रेय उवाच । प्रजाः सृजेति भगवान् कर्दमो ब्रह्मणोदितः । सरस्वत्यां तपस्तेपे सहस्राणां समा दश ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—ब्रह्मा ने कर्दम को प्रजा उत्पन्न करने को कहा; उन्होंने सरस्वती तट पर दस हजार वर्षों तक तप किया।

श्लोक 21.7

ततः समाधियुक्तेन क्रियायोगेन कर्दमः । सम्प्रपेदे हरिं भक्त्या प्रपन्नवरदाशुषम् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: समाधि और साधनानुष्ठान सहित भक्ति से उन्होंने शरणागतों को वर देने वाले हरि को प्रसन्न किया।

श्लोक 21.8

तावत्प्रसन्नो भगवान् पुष्कराक्षः कृते युगे । दर्शयामास तं क्षत्तः शाब्दं ब्रह्म दधद्वपुः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: सत्ययुग में प्रसन्न कमलनयन भगवान वेदमय दिव्य रूप धारण करके उन्हें दर्शन देने आए।

श्लोक 21.9

स तं विरजमर्काभं सितपद्मोत्पलस्रजम् । स्निग्द्धनीलालकव्रातवक्त्राब्जं विरजोऽम्बरम् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनका निर्मल रूप सूर्य जैसा दीप्त था; उज्ज्वल कमलमाला, निर्मल वस्त्र और सुन्दर नीली अलकों से मुख सुशोभित था।

श्लोक 21.10

किरीटिनं कुण्डलिनं शङ्खचक्रगदाधरम् । श्वेतोत्पलक्रीडनकं मनःस्पर्शस्मितेक्षणम् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे मुकुट, कुण्डल, शङ्ख, चक्र और गदा धारण किए थे; हाथ में श्वेत कमल और दृष्टि में हृदयस्पर्शी मुस्कान थी।

श्लोक 21.11

विन्यस्तचरणाम्भोजमंसदेशे गरुत्मतः । दृष्ट्वा खेऽवस्थितं वक्षःश्रियं कौस्तुभकन्धरम् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: गरुड़ के कन्धे पर चरण रखे आकाश में स्थित प्रभु के वक्ष पर लक्ष्मी और कण्ठ में कौस्तुभ शोभित थे।

श्लोक 21.12

जातहर्षोऽपतन्मूर्ध्ना क्षितौ लब्धमनोरथः । गीर्भिस्त्वभ्यगृणात्प्रीतिस्वभावात्मा कृताञ्जलिः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनोरथ पूर्ण होने से कर्दम प्रसन्न होकर भूमि पर सिर रखकर गिरे और हाथ जोड़कर प्रेमभरी स्तुति की।

श्लोक 21.13

ऋषिरुवाच । जुष्टं बताद्याखिलसत्त्वराशेः सांसिद्ध्यमक्ष्णोस्तव दर्शनान्नः । यद्दर्शनं जन्मभिरीड्य सद्भि- राशासते योगिनो रूढयोगाः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: कर्दम बोले—आज आपके दर्शन से हमारी आँखें सफल हुईं; दृढ़योगी संत भी अनेक जन्मों से इस दर्शन की इच्छा करते हैं।

श्लोक 21.14

ये मायया ते हतमेधसस्त्व- त्पादारविन्दं भवसिन्धुपोतम् । उपासते कामलवाय तेषां रासीश कामान्निरयेऽपि ये स्युः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो संसारसागर पार कराने वाले आपके चरणों से तुच्छ विषयसुख माँगते हैं, उनकी बुद्धि माया से ढकी है; फिर भी आप उन्हें फल देते हैं।

श्लोक 21.15

तथा स चाहं परिवोढुकामः समानशीलां गृहमेधधेनुम् । उपेयिवान् मूलमशेषमूलं दुराशयः कामदुघाङ्घ्रिपस्य ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं भी समान स्वभाव वाली पत्नी चाहता हुआ सब इच्छाओं के मूल आश्रय आपके पास आया हूँ।

श्लोक 21.16

प्रजापतेस्ते वचसाधीश तन्त्या लोकः किलायं कामहतोऽनुबद्धः । अहं च लोकानुगतो वहामि बलिं च शुक्लानिमिषाय तुभ्यम् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपके सृजनादेश से कामनायुक्त संसार कर्तव्य में बँधा है; उसी क्रम का अनुसरण करके मैं भी आपको समर्पण करता हूँ।

श्लोक 21.17

लोकांश्च लोकानुगतान् पशूंश्च हित्वा श्रितास्ते चरणातपत्रम् । परस्परं त्वद्गुणवादसीधु- पीयूषनिर्यापितदेहधर्माः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपके अनन्य भक्त लोकासक्ति छोड़ चरणछत्र अपनाते और परस्पर गुणकथामृत से देहसम्बन्धी दुःख भुला देते हैं।

श्लोक 21.18

न तेऽजराक्षभ्रमिरायुरेषां त्रयोदशारं त्रिशतं षष्टिपर्व । षण्नेम्यनन्तच्छदि यत्त्रिणाभि- करालस्रोतो जगदाच्छिद्य धावत् ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वर्ष, महीने, दिन, ऋतु और कालविभागों वाला प्रबल कालचक्र जगत की आयु काटता है, किन्तु आपके भक्तों की आध्यात्मिक उपलब्धि नष्ट नहीं करता।

श्लोक 21.19

एकः स्वयं सन् जगतः सिसृक्षया द्वितीययाऽऽत्मन्नधियोगमायया । सृजस्यदः पासि पुनर्ग्रसिष्यसे यथोर्णनाभिर्भगवन् स्वशक्तिभिः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मकड़ी के समान अपनी शक्ति से एक आप ही योगमाया द्वारा जगत रचते, पालते और अपने में समेट लेते हैं।

श्लोक 21.20

नैतद्बताधीश पदं तवेप्सितं यन्मायया नस्तनुषे भूतसूक्ष्मम् । अनुग्रहायास्त्वपि यर्हि मायया लसत्तुलस्या तनुवा विलक्षितः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: मायिक जगत आपका अन्तिम परम स्वरूप नहीं; फिर भी भक्तानुग्रह के लिए तुलसीसुशोभित रूप में आपका दर्शन कल्याणकारी है।

श्लोक 21.21

तं त्वानुभूत्योपरतक्रियार्थं स्वमायया वर्तितलोकतन्त्रम् । नमाम्यभीक्ष्णं नमनीयपाद- सरोजमल्पीयसि कामवर्षम् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वरूपानन्द से पूर्ण, माया द्वारा लोकव्यवस्था चलाने वाले और छोटी प्रार्थना पर भी उदार फल देने वाले प्रभु को बार-बार प्रणाम।

श्लोक 21.22

ऋषिरुवाच । इत्यव्यलीकं प्रणुतोऽब्जनाभ- स्तमाबभाषे वचसामृतेन । सुपर्णपक्षोपरि रोचमानः प्रेमस्मितोद्वीक्षणविभ्रमद्भ्रूः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय कहते हैं—गरुड़ पर विराजमान कमलनाभ भगवान निष्कपट स्तुति से प्रसन्न होकर प्रेममुस्कान सहित अमृतवाणी बोले।

श्लोक 21.23

श्रीभगवानुवाच । विदित्वा तव चैत्यं मे पुरैव समयोजि तत् । यदर्थमात्मनियमैस्त्वयैवाहं समर्चितः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—तुमने जिनकी प्राप्ति के लिए मेरी आराधना की, वह अन्तर्मन की इच्छा जानकर उसकी व्यवस्था पहले ही कर दी है।

श्लोक 21.24

न वै जातु मृषैव स्यात्प्रजाध्यक्ष मदर्हणम् । भवद्विधेष्वतितरां मयि सङ्गृभितात्मनाम् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुझमें अपना मन समर्पित करने वाले तुम्हारे जैसे भक्त की उपासना कभी निष्फल नहीं होती।

श्लोक 21.25

प्रजापतिसुतः सम्राण्मनुर्विख्यातमङ्गलः । ब्रह्मावर्तं योऽधिवसन् शास्ति सप्तार्णवां महीम् ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मावर्त में रहने वाले, सात समुद्रों वाली पृथ्वी के शासक और कल्याणकीर्ति सम्पन्न सम्राट मनु हैं।

श्लोक 21.26

स चेह विप्र राजर्षिर्महिष्या शतरूपया । आयास्यति दिदृक्षुस्त्वां परश्वो धर्मकोविदः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: धर्मज्ञ राजर्षि मनु अपनी पत्नी शतरूपा सहित परसों तुम्हारे दर्शन के लिए यहाँ आएँगे।

श्लोक 21.27

आत्मजामसितापाङ्गीं वयःशीलगुणान्विताम् । मृगयन्तीं पतिं दास्यत्यनुरूपाय ते प्रभो ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे गुण, स्वभाव और आयु में योग्य अपनी पुत्री का विवाह तुम्हारे जैसे अनुरूप वर से करेंगे।

श्लोक 21.28

समाहितं ते हृदयं यत्रेमान् परिवत्सरान् । सा त्वां ब्रह्मन् नृपवधूः काममाशु भजिष्यति ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम जिस योग्य दाम्पत्य का चिन्तन करते रहे हो, वही राजकन्या प्रेमपूर्वक तुम्हारी सहधर्मिणी बनेगी।

श्लोक 21.29

या त आत्मभृतं वीर्यं नवधा प्रसविष्यति । वीर्ये त्वदीये ऋषय आधास्यन्त्यञ्जसाऽऽत्मनः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: उससे तुम्हारी नौ कन्याएँ होंगी; आगे ऋषि उनसे विवाह करके अपने वंशों का विस्तार करेंगे।

श्लोक 21.30

त्वं च सम्यगनुष्ठाय निदेशं म उशत्तमः । मयि तीर्थीकृताशेषक्रियार्थो मां प्रपत्स्यसे ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरी आज्ञा पूरी करके और सब कर्म मुझे समर्पित करके तुम अन्ततः मुझे प्राप्त करोगे।

श्लोक 21.31

कृत्वा दयां च जीवेषु दत्त्वा चाभयमात्मवान् । मय्यात्मानं सह जगद्द्रक्ष्यस्यात्मनि चापि माम् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जीवों पर दया और अभय देकर तुम मुझमें अपने सहित जगत तथा अपने भीतर मुझे देखोगे।

श्लोक 21.32

सहाहं स्वांशकलया त्वद्वीर्येण महामुने । तव क्षेत्रे देवहूत्यां प्रणेष्ये तत्त्वसंहिताम् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे मुनि, तुम्हारे द्वारा देवहूति के गर्भ में मैं अपने अंश से प्रकट होकर तत्त्वज्ञान का उपदेश करूँगा।

श्लोक 21.33

मैत्रेय उवाच । एवं तमनुभाष्याथ भगवान् प्रत्यगक्षजः । जगाम बिन्दुसरसः सरस्वत्या परिश्रितात् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—ऐसा कहकर अन्तर्यामी भगवान सरस्वती से घिरे बिन्दुसरोवर से प्रस्थान कर गए।

श्लोक 21.34

निरीक्षतस्तस्य ययावशेष- सिद्धेश्वराभिष्टुतसिद्धमार्गः । आकर्णयन् पत्ररथेन्द्रपक्षै- रुच्चारितं स्तोममुदीर्णसाम ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: कर्दम उन्हें देखते रहे; सिद्धों से वन्दित मार्ग पर जाते हुए प्रभु गरुड़ के पंखों से निकले सामगान को सुन रहे थे।

श्लोक 21.35

अथ सम्प्रस्थिते शुक्ले कर्दमो भगवान् ऋषिः । आस्ते स्म बिन्दुसरसि तं कालं प्रतिपालयन् ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के चले जाने पर कर्दम बिन्दुसरोवर पर ही उनके बताए समय की प्रतीक्षा करने लगे।

श्लोक 21.36

मनुः स्यन्दनमास्थाय शातकौम्भपरिच्छदम् । आरोप्य स्वां दुहितरं सभार्यः पर्यटन् महीम् ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनु सुवर्णसज्जित रथ पर पुत्री और पत्नी को साथ लेकर पृथ्वी का भ्रमण करते हुए निकले।

श्लोक 21.37

तस्मिन् सुधन्वन्नहनि भगवान् यत्समादिशत् । उपायादाश्रमपदं मुनेः शान्तव्रतस्य तत् ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: ठीक भगवान के बताए दिन वे शान्तव्रती कर्दम के आश्रम पर पहुँचे।

श्लोक 21.38

यस्मिन् भगवतो नेत्रान्न्यपतन्नश्रुबिन्दवः । कृपया सम्परीतस्य प्रपन्नेऽर्पितया भृशम् ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस स्थान पर शरणागत कर्दम के प्रति गहरी कृपा से भगवान के नेत्रों से आनन्दाश्रु गिरे थे।

श्लोक 21.39

तद्वै बिन्दुसरो नाम सरस्वत्या परिप्लुतम् । पुण्यं शिवामृतजलं महर्षिगणसेवितम् ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसीलिए वह बिन्दुसरोवर कहलाया; सरस्वती से पोषित पवित्र, कल्याणकारी और महर्षियों द्वारा सेवित तीर्थ था।

श्लोक 21.40

पुण्यद्रुमलताजालैः कूजत्पुण्यमृगद्विजैः । सर्वर्तुफलपुष्पाढ्यं वनराजिश्रियान्वितम् ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ पुण्य वृक्ष-लताएँ, मनोहर जीव-पक्षी और सभी ऋतुओं के फल-पुष्पों की वनशोभा थी।

श्लोक 21.41

मत्तद्विजगणैर्घुष्टं मत्तभ्रमरविभ्रमम् । मत्तबर्हिनटाटोपमाह्वयन् मत्तकोकिलम् ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: पक्षी मधुर स्वर करते, भौंरे गुँजारते, मोर नाचते और कोयलें कूकती थीं।

श्लोक 21.42

कदम्बचम्पकाशोककरञ्जबकुलासनैः । कुन्दमन्दारकुटजैश्चूतपोतैरलङ्कृतम् ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: कदम्ब, चम्पा, अशोक, करञ्ज, बकुल, असन, कुन्द, मन्दार, कुटज और आम के वृक्ष शोभा देते थे।

श्लोक 21.43

कारण्डवैः प्लवैर्हंसैः कुररैर्जलकुक्कुटैः । सारसैश्चक्रवाकैश्च चकोरैर्वल्गु कूजितम् ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: कारण्डव, जलपक्षी, हंस, कुरर, सारस, चकवे और चकोर मनोहर स्वर से वातावरण भरते थे।

श्लोक 21.44

तथैव हरिणैः क्रोडैः श्वाविद्गवयकुञ्जरैः । गोपुच्छैर्हरिभिर्मर्कैर्नकुलैर्नाभिभिर्वृतम् ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ हिरण, वराह, साही, गवय, हाथी, वानर, नेवले और कस्तूरीमृग आदि अनेक जीव विचरते थे।

श्लोक 21.45

प्रविश्य तत्तीर्थवरमादिराजः सहात्मजः । ददर्श मुनिमासीनं तस्मिन् हुतहुताशनम् ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुत्री सहित उस श्रेष्ठ तीर्थ में प्रवेश करके मनु ने अग्निहोत्र पूरा करके बैठे कर्दममुनि को देखा।

श्लोक 21.46

विद्योतमानं वपुषा तपस्युग्रयुजा चिरम् । नातिक्षामं भगवतः स्निग्धापाङ्गावलोकनात् । तद्व्याहृतामृतकलापीयूषश्रवणेन च ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: दीर्घ कठोर तप से वे तेजस्वी थे; भगवान की कृपादृष्टि और अमृतवाणी के कारण शरीर अत्यधिक क्षीण नहीं था।

श्लोक 21.47

प्रांशुं पद्मपलाशाक्षं जटिलं चीरवाससम् । उपसंश्रित्य मलिनं यथार्हणमसंस्कृतम् ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे लम्बे, कमलनेत्र, जटाधारी और चीरवस्त्र पहने थे; तपस्वी जीवन के कारण शरीर का अलङ्कार नहीं किया था।

श्लोक 21.48

अथोटजमुपायातं नृदेवं प्रणतं पुरः । सपर्यया पर्यगृह्णात्प्रतिनन्द्यानुरूपया ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: कुटी में आए प्रणाम करते राजा को उन्होंने उचित सम्मान और पूजा से स्वागत किया।

श्लोक 21.49

गृहीतार्हणमासीनं संयतं प्रीणयन् मुनिः । स्मरन् भगवदादेशमित्याह श्लक्ष्णया गिरा ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: आदर ग्रहण करके बैठे संयमी मनु को प्रसन्न करते हुए मुनि ने भगवान का आदेश स्मरण कर मधुर वाणी कही।

श्लोक 21.50

नूनं चङ्क्रमणं देव सतां संरक्षणाय ते । वधाय चासतां यस्त्वं हरेः शक्तिर्हि पालिनी ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे राजन्, आपका भ्रमण सज्जनों की रक्षा और दुष्टों के दमन के लिए है; आप हरि की पालकशक्ति के प्रतिनिधि हैं।

श्लोक 21.51

योऽर्केन्द्वग्नीन्द्रवायूनां यमधर्मप्रचेतसाम् । रूपाणि स्थान आधत्से तस्मै शुक्लाय ते नमः ॥ ५१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उचित अवसर पर सूर्य, चन्द्र, अग्नि, इन्द्र, वायु, यम और वरुण की शक्तियों जैसा शासनकर्तव्य निभाने वाले आपको प्रणाम।

श्लोक 21.52

न यदा रथमास्थाय जैत्रं मणिगणार्पितम् । विस्फूर्जच्चण्डकोदण्डो रथेन त्रासयन्नघान् ॥ ५२॥

सरल हिंदी भावार्थ: यदि आप विजयशील रथ पर धनुष धारण करके अपराधियों को भय दिखाने न निकलें—

श्लोक 21.53

स्वसैन्यचरणक्षुण्णं वेपयन् मण्डलं भुवः । विकर्षन् बृहतीं सेनां पर्यटस्यंशुमानिव ॥ ५३॥

सरल हिंदी भावार्थ: और अपनी अनुशासित सेना लेकर सूर्य की तरह पृथ्वी पर भ्रमण न करें—

श्लोक 21.54

तदैव सेतवः सर्वे वर्णाश्रमनिबन्धनाः । भगवद्रचिता राजन् भिद्येरन् बत दस्युभिः ॥ ५४॥

सरल हिंदी भावार्थ: तो भगवान की स्थापित सामाजिक और आश्रमसम्बन्धी मर्यादाएँ दस्युओं द्वारा तोड़ दी जाएँ।

श्लोक 21.55

अधर्मश्च समेधेत लोलुपैर्व्यङ्कुशैर्नृभिः । शयाने त्वयि लोकोऽयं दस्युग्रस्तो विनङ्क्ष्यति ॥ ५५॥

सरल हिंदी भावार्थ: लोभी और निरङ्कुश लोगों से अधर्म बढ़े; शासक के निष्क्रिय होने पर समाज लुटेरों से पीड़ित होकर नष्ट होगा।

श्लोक 21.56

अथापि पृच्छे त्वां वीर यदर्थं त्वमिहागतः । तद्वयं निर्व्यलीकेन प्रतिपद्यामहे हृदा ॥ ५६॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी आपके यहाँ आने का विशेष प्रयोजन पूछता हूँ; जो उचित होगा, निष्कपट हृदय से उसे पूरा करूँगा।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 21 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 22

देवहूति का विवाह और मनु का धर्मपालन

श्लोक 22.1

मैत्रेय उवाच । एवमाविष्कृताशेषगुणकर्मोदयो मुनिम् । सव्रीड इव तं सम्राडुपारतमुवाच ह ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—अपने गुण और कर्तव्यों की प्रशंसा सुनकर सम्राट कुछ संकोच के साथ मुनि से बोले।

श्लोक 22.2

मनुरुवाच । ब्रह्मासृजत्स्वमुखतो युष्मानात्मपरीप्सया । छन्दोमयस्तपोविद्यायोगयुक्तानलम्पटान् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनु बोले—ब्रह्मा ने वेद, तप, विद्या और योग से सम्पन्न संयमी ज्ञानरक्षकों को अपने मुख से प्रकट किया।

श्लोक 22.3

तत्त्राणायासृजच्चास्मान् दोःसहस्रात्सहस्रपात् । हृदयं तस्य हि ब्रह्म क्षत्रमङ्गं प्रचक्षते ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी रक्षा के लिए भुजाओं से हम शासक उत्पन्न हुए; ज्ञानशक्ति उनका हृदय और रक्षणशक्ति उनका अंग कही जाती है।

श्लोक 22.4

अतो ह्यन्योन्यमात्मानं ब्रह्म क्षत्रं च रक्षतः । रक्षति स्माव्ययो देवः स यः सदसदात्मकः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए ज्ञान और शासन की शक्तियाँ परस्पर संरक्षण करती हैं; इनके द्वारा अविनाशी भगवान समाज की रक्षा करते हैं।

श्लोक 22.5

तव सन्दर्शनादेव च्छिन्ना मे सर्वसंशयाः । यत्स्वयं भगवान् प्रीत्या धर्ममाह रिरक्षिषोः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपके दर्शन और धर्मोपदेश से अपने रक्षणकर्तव्य के विषय में मेरे संशय दूर हो गए।

श्लोक 22.6

दिष्ट्या मे भगवान् दृष्टो दुर्दर्शो योऽकृतात्मनाम् । दिष्ट्या पादरजः स्पृष्टं शीर्ष्णा मे भवतः शिवम् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: आज सौभाग्य से आपके दर्शन हुए, जो असंयमितों को दुर्लभ हैं; आपकी पावन चरणरज सिर पर लगी।

श्लोक 22.7

दिष्ट्या त्वयानुशिष्टोऽहं कृतश्चानुग्रहो महान् । अपावृतैः कर्णरन्ध्रैर्जुष्टा दिष्ट्योशतीर्गिरः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपकी शिक्षा से मुझ पर बड़ा अनुग्रह हुआ और मेरे कानों ने आपकी कल्याणकारी वाणी ग्रहण की।

श्लोक 22.8

स भवान् दुहितृस्नेहपरिक्लिष्टात्मनो मम । श्रोतुमर्हसि दीनस्य श्रावितं कृपया मुने ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: अब पुत्रीस्नेह से व्याकुल मेरे इस विनम्र निवेदन को कृपा करके सुनिए।

श्लोक 22.9

प्रियव्रतोत्तानपदोः स्वसेयं दुहिता मम । अन्विच्छति पतिं युक्तं वयःशीलगुणादिभिः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह मेरी पुत्री और प्रियव्रत-उत्तानपाद की बहन है; आयु, स्वभाव और गुणों से योग्य पति चाहती है।

श्लोक 22.10

यदा तु भवतः शीलश्रुतरूपवयोगुणान् । अश‍ृणोन्नारदादेषा त्वय्यासीत्कृतनिश्चया ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारदजी से आपके शील, अध्ययन, रूप, आयु और गुण सुनकर इसने आपको पति बनाने का निश्चय किया।

श्लोक 22.11

तत्प्रतीच्छ द्विजाग्र्येमां श्रद्धयोपहृतां मया । सर्वात्मनानुरूपां ते गृहमेधिषु कर्मसु ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: गृहस्थधर्म में आपकी सर्वथा अनुरूप इस कन्या को मैं श्रद्धापूर्वक प्रस्तुत करता हूँ; इसे स्वीकार कीजिए।

श्लोक 22.12

उद्यतस्य हि कामस्य प्रतिवादो न शस्यते । अपि निर्मुक्तसङ्गस्य कामरक्तस्य किं पुनः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वतः सामने आए उचित अवसर को त्यागना अनासक्त व्यक्ति के लिए भी आवश्यक नहीं, फिर इच्छुक के लिए तो और भी नहीं।

श्लोक 22.13

य उद्यतमनादृत्य कीनाशमभियाचते । क्षीयते तद्यशः स्फीतं मानश्चावज्ञया हतः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: सामने आए योग्य अवसर का अनादर करके बाद में कृपणों से याचना करने पर व्यक्ति का सम्मान और यश घटता है।

श्लोक 22.14

अहं त्वाश‍ृणवं विद्वन् विवाहार्थं समुद्यतम् । अतस्त्वमुपकुर्वाणः प्रत्तां प्रतिगृहाण मे ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैंने सुना है कि आप विवाह का विचार रखते हैं; अतः मेरी दी हुई कन्या स्वीकार करके हम पर कृपा कीजिए।

श्लोक 22.15

ऋषिरुवाच । बाढमुद्वोढुकामोऽहमप्रत्ता च तवात्मजा । आवयोरनुरूपोऽसावाद्यो वैवाहिको विधिः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: कर्दम बोले—मैं विवाह करना चाहता हूँ और आपकी कन्या अविवाहित है; हमारे लिए यह वैदिक विवाहविधि उपयुक्त है।

श्लोक 22.16

कामः स भूयान्नरदेव तेऽस्याः पुत्र्याः समाम्नायविधौ प्रतीतः । क एव ते तनयां नाद्रियेत स्वयैव कान्त्या क्षिपतीमिव श्रियम् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपकी पुत्री के विवाह की इच्छा शास्त्रसम्मत रीति से पूर्ण हो; अपने सौन्दर्य से लक्ष्मी की शोभा जैसी लगती कन्या का कौन अनादर करेगा?

श्लोक 22.17

यां हर्म्यपृष्ठे क्वणदङ्घ्रिशोभां विक्रीडतीं कन्दुकविह्वलाक्षीम् । विश्वावसुर्न्यपतत्स्वाद्विमाना- द्विलोक्य सम्मोहविमूढचेताः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक बार महल की छत पर गेंद खेलती इसकी शोभा देखकर विश्वावसु मोहित होकर अपने विमान से गिर पड़े थे।

श्लोक 22.18

तां प्रार्थयन्तीं ललनाललाम- मसेवितश्रीचरणैरदृष्टाम् । वत्सां मनोरुच्चपदः स्वसारं को नानुमन्येत बुधोऽभियाताम् ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनु की गुणवान पुत्री और उच्चपदस्थ राजपुत्रों की बहन स्वयं अनुराग लेकर आए, तो विवेकी उसे क्यों न स्वीकार करे?

श्लोक 22.19

अतो भजिष्ये समयेन साध्वीं यावत्तेजो बिभृयादात्मनो मे । अतो धर्मान् पारमहंस्यमुख्यान् शुक्लप्रोक्तान् बहु मन्येऽविहिंस्रान् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक शर्त से गृहस्थधर्म निभाऊँगा—सन्तान होने के बाद अहिंसामय, परमहंसों के श्रेष्ठ निवृत्तिधर्म को अपनाऊँगा।

श्लोक 22.20

यतोऽभवद्विश्वमिदं विचित्रं संस्थास्यते यत्र च वावतिष्ठते । प्रजापतीनां पतिरेष मह्यं परं प्रमाणं भगवाननन्तः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिनसे यह विविध जगत उत्पन्न, स्थित और अन्त में लीन होता है, वे अनन्त भगवान ही मेरे परम प्रमाण और मार्गदर्शक हैं।

श्लोक 22.21

मैत्रेय उवाच । स उग्रधन्वन्नियदेवाबभाषे आसीच्च तूष्णीमरविन्दनाभम् । धियोपगृह्णन् स्मितशोभितेन मुखेन चेतो लुलुभे देवहूत्याः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—कर्दम इतना कहकर कमलनाभ भगवान का ध्यान करते हुए मौन हुए; उनकी मधुर मुस्कान से देवहूति का मन आकर्षित हुआ।

श्लोक 22.22

सोऽनुज्ञात्वा व्यवसितं महिष्या दुहितुः स्फुटम् । तस्मै गुणगणाढ्याय ददौ तुल्यां प्रहर्षितः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: पत्नी और पुत्री का स्पष्ट निश्चय जानकर मनु ने प्रसन्नतापूर्वक गुणवान कर्दम को अनुरूप देवहूति का विवाह करके दिया।

श्लोक 22.23

शतरूपा महाराज्ञी पारिबर्हान् महाधनान् । दम्पत्योः पर्यदात्प्रीत्या भूषावासः परिच्छदान् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: महारानी शतरूपा ने नवदम्पती को प्रेम से वस्त्र, आभूषण और गृहस्थोपयोगी सामग्री भेंट की।

श्लोक 22.24

प्रत्तां दुहितरं सम्राट् सदृक्षाय गतव्यथः । उपगुह्य च बाहुभ्यामौत्कण्ठ्योन्मथिताशयः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: योग्य वर को पुत्री देकर मनु की चिन्ता दूर हुई, किन्तु विदा के समय स्नेह उमड़ा और उन्होंने उसे बाँहों में भर लिया।

श्लोक 22.25

अशक्नुवंस्तद्विरहं मुञ्चन् बाष्पकलां मुहुः । आसिञ्चदम्ब वत्सेति नेत्रोदैर्दुहितुः शिखाः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: विरह सहन न कर वे बार-बार बेटी कहकर रोए; आँसुओं से पुत्री के केश भीग गए।

श्लोक 22.26

आमन्त्र्य तं मुनिवरमनुज्ञातः सहानुगः । प्रतस्थे रथमारुह्य सभार्यः स्वपुरं नृपः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुनि से अनुमति लेकर मनु पत्नी और अनुचरों सहित रथ पर अपने नगर लौट चले।

श्लोक 22.27

उभयोः ऋषिकुल्यायाः सरस्वत्याः सुरोधसोः । ऋषीणामुपशान्तानां पश्यन्नाश्रमसम्पदः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मार्ग में सरस्वती के दोनों सुन्दर तटों पर शान्त ऋषियों के आश्रमों की शोभा देखते गए।

श्लोक 22.28

तमायान्तमभिप्रेत्य ब्रह्मावर्तात्प्रजाः पतिम् । गीतसंस्तुतिवादित्रैः प्रत्युदीयुः प्रहर्षिताः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मावर्त के निवासियों ने राजा के आगमन का समाचार पाकर गीत, स्तुति और वाद्यों से हर्षपूर्वक स्वागत किया।

श्लोक 22.29

बर्हिष्मती नाम पुरी सर्वसम्पत्समन्विता । न्यपतन् यत्र रोमाणि यज्ञस्याङ्गं विधुन्वतः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सम्पन्न नगरी का नाम बर्हिष्मती था; कथा के अनुसार यज्ञवराह के शरीर से झरे रोम वहीं गिरे थे।

श्लोक 22.30

कुशाः काशास्त एवासन् शश्वद्धरितवर्चसः । ऋषयो यैः पराभाव्य यज्ञघ्नान्यज्ञमीजिरे ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे रोम सदा हरित रहने वाले कुश और काश बने; उन्हीं से ऋषियों ने यज्ञविरोधी बाधाएँ दूर करके यज्ञ किए।

श्लोक 22.31

कुशकाशमयं बर्हिरास्तीर्य भगवान् मनुः । अयजद्यज्ञपुरुषं लब्धा स्थानं यतो भुवम् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनु ने कुश-काश का आसन बिछाकर यज्ञपुरुष की पूजा की, जिनकी कृपा से पृथ्वी निवास के लिए मिली थी।

श्लोक 22.32

बर्हिष्मतीं नाम विभुर्यां निर्विश्य समावसत् । तस्यां प्रविष्टो भवनं तापत्रयविनाशनम् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: बर्हिष्मती पहुँचकर वे अपने ऐसे भवन में प्रविष्ट हुए जो जीवन के विविध तापों से विश्राम देता था।

श्लोक 22.33

सभार्यः सप्रजः कामान् बुभुजेऽन्याविरोधतः । सङ्गीयमानसत्कीर्तिः सस्त्रीभिः सुरगायकैः । प्रत्यूषेष्वनुबद्धेन हृदा श‍ृण्वन् हरेः कथाः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: पत्नी और प्रजाओं सहित किसी के धर्म से टकराए बिना जीवनयापन करते और प्रतिदिन प्रातः एकाग्र होकर हरिकथा सुनते थे।

श्लोक 22.34

निष्णातं योगमायासु मुनिं स्वायम्भुवं मनुम् । यदा भ्रंशयितुं भोगा न शेकुर्भगवत्परम् ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान में स्थित और मायिक विषयों का स्वरूप जानने वाले मनु को भोग उनके साधनमार्ग से गिरा नहीं सके।

श्लोक 22.35

अयातयामास्तस्यासन् यामाः स्वान्तरयापनाः । श‍ृण्वतो ध्यायतो विष्णोः कुर्वतो ब्रुवतः कथाः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: विष्णुकथा सुनने, ध्यान करने, सेवा और गुणगान में लगे रहने से उनका समय व्यर्थ नहीं जाता था।

श्लोक 22.36

स एवं स्वान्तरं निन्ये युगानामेकसप्ततिम् । वासुदेवप्रसङ्गेन परिभूतगतित्रयः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वासुदेव के सत्सङ्ग से त्रिविध गतियों से ऊपर उठकर उन्होंने इकहत्तर चतुर्युगों का अपना मन्वन्तर बिताया।

श्लोक 22.37

शारीरा मानसा दिव्या वैयासे ये च मानुषाः । भौतिकाश्च कथं क्लेशा बाधन्ते हरिसंश्रयम् ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: हरि के आश्रित को शारीरिक, मानसिक, दैवी और अन्य प्राणियों से उत्पन्न क्लेश अन्तःकरण से पराजित कैसे कर सकते हैं?

श्लोक 22.38

यः पृष्टो मुनिभिः प्राह धर्मान्नानाविधान् शुभान् । नृणां वर्णाश्रमाणां च सर्वभूतहितः सदा ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: सब जीवों के हितैषी मनु ने मुनियों के पूछने पर मनुष्यों और वर्णाश्रमों के विविध कल्याणकारी कर्तव्य बताए।

श्लोक 22.39

एतत्त आदिराजस्य मनोश्चरितमद्भुतम् । वर्णितं वर्णनीयस्य तदपत्योदयं श‍ृणु ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार आदिराज मनु का अद्भुत चरित्र कहा; अब उनकी सन्तानों का विस्तार सुनो।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 22 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 23

देवहूति की सेवा और वैराग्य की जिज्ञासा

श्लोक 23.1

मैत्रेय उवाच । पितृभ्यां प्रस्थिते साध्वी पतिमिङ्गितकोविदा । नित्यं पर्यचरत्प्रीत्या भवानीव भवं प्रभुम् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—माता-पिता के जाने पर देवहूति पति का मनोभाव समझकर वैसे प्रेम से सेवा करतीं जैसे पार्वती शिव की।

श्लोक 23.2

विश्रम्भेणात्मशौचेन गौरवेण दमेन च । शुश्रूषया सौहृदेन वाचा मधुरया च भोः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: विश्वास, पवित्रता, आदर, संयम, सहयोग, मैत्री और मधुर वाणी से उनका जीवन सुशोभित था।

श्लोक 23.3

विसृज्य कामं दम्भं च द्वेषं लोभमघं मदम् । अप्रमत्तोद्यता नित्यं तेजीयांसमतोषयत् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: कामना, दम्भ, द्वेष, लोभ, पाप और मद छोड़कर वे सजग भाव से तपस्वी पति को प्रसन्न करती रहीं।

श्लोक 23.4

स वै देवर्षिवर्यस्तां मानवीं समनुव्रताम् । दैवाद्गरीयसः पत्युराशासानां महाशिषः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: कर्दम ने अपनी आज्ञाकारिणी सहधर्मिणी को देखा, जो पति की साधना से महान कल्याण की आशा रखती थीं।

श्लोक 23.5

कालेन भूयसा क्षामां कर्शितां व्रतचर्यया । प्रेमगद्गदया वाचा पीडितः कृपयाब्रवीत् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: दीर्घ व्रत और सेवा से देवहूति का शरीर दुर्बल हो गया था; करुणा से भरे कर्दम प्रेमविह्वल स्वर में बोले।

श्लोक 23.6

कर्दम उवाच । तुष्टोऽहमद्य तव मानवि मानदायाः शुश्रूषया परमया परया च भक्त्या । यो देहिनामयमतीव सुहृत्स्वदेहो नावेक्षितः समुचितः क्षपितुं मदर्थे ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कर्दम बोले—तुम्हारी श्रद्धा और प्रेमपूर्ण सेवा से प्रसन्न हूँ; तुमने मेरे सहयोग में अपने अत्यन्त प्रिय शरीर का भी ध्यान नहीं रखा।

श्लोक 23.7

ये मे स्वधर्मनिरतस्य तपः समाधि- विद्यात्मयोगविजिता भगवत्प्रसादाः । तानेव ते मदनुसेवनयावरुद्धान् दृष्टिं प्रपश्य वितराम्यभयानशोकान् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वधर्म, तप, समाधि, विद्या और आत्मयोग से मुझे जो भगवदनुग्रह मिला है, उसमें तुम भी सहभागी हो; भय-शोक से मुक्त वह अनुभव तुम्हें देता हूँ।

श्लोक 23.8

अन्ये पुनर्भगवतो भ्रुव उद्विजृम्भ- विभ्रंशितार्थरचनाः किमुरुक्रमस्य । सिद्धासि भुङ्क्ष्व विभवान् निजधर्मदोहान् दिव्यान्नरैर्दुरधिगान्नृपविक्रियाभिः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: अन्य ऐश्वर्य भगवान के संकेत से नष्ट हो सकते हैं; अपने धर्म से मिली दुर्लभ दिव्य विभूतियों का योग्य उपयोग करो।

श्लोक 23.9

एवं ब्रुवाणमबलाखिलयोगमाया- विद्याविचक्षणमवेक्ष्य गताधिरासीत् । सम्प्रश्रयप्रणयविह्वलया गिरेषद्- व्रीडावलोकविलसद्धसिताननाऽऽह ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: योगविद्या में निपुण पति का आश्वासन पाकर देवहूति की चिन्ता मिटी और वे विनय, प्रेम तथा लज्जामिश्रित मुस्कान से बोलीं।

श्लोक 23.10

देवहूतिरुवाच । राद्धं बत द्विजवृषैतदमोघयोग- मायाधिपे त्वयि विभो तदवैमि भर्तः । यस्तेऽभ्यधायि समयः सकृदङ्गसङ्गो भूयाद्गरीयसि गुणः प्रसवः सतीनाम् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवहूति बोलीं—आपकी योगशक्ति अचूक है, यह जानती हूँ; विवाह के समय कही सन्तानप्राप्ति की प्रतिज्ञा भी पूरी हो।

श्लोक 23.11

तत्रेतिकृत्यमुपशिक्ष यथोपदेशं येनैष मे कर्शितोऽतिरिरंसयाऽऽत्मा । सिद्ध्येत ते कृतमनोभवधर्षिताया दीनस्तदीश भवनं सदृशं विचक्ष्व ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरे दुर्बल शरीर और गृहस्थजीवन के अनुकूल व्यवस्था कीजिए; उचित निवास और आवश्यक साधन बताइए।

श्लोक 23.12

मैत्रेय उवाच । प्रियायाः प्रियमन्विच्छन् कर्दमो योगमास्थितः । विमानं कामगं क्षत्तस्तर्ह्येवाविरचीकरत् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—पत्नी का प्रिय करने के लिए कर्दम ने योगशक्ति से इच्छानुसार चलने वाला दिव्य विमान प्रकट किया।

श्लोक 23.13

सर्वकामदुघं दिव्यं सर्वरत्नसमन्वितम् । सर्वर्द्ध्युपचयोदर्कं मणिस्तम्भैरुपस्कृतम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह इच्छित सुविधाएँ देने वाला, विविध रत्नों और मणिमय स्तम्भों से सुशोभित तथा ऐश्वर्यसम्पन्न था।

श्लोक 23.14

दिव्योपकरणोपेतं सर्वकालसुखावहम् । पट्टिकाभिः पताकाभिर्विचित्राभिरलङ्कृतम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसमें सभी ऋतुओं के अनुकूल दिव्य उपकरण और सुन्दर ध्वज-पताकाएँ लगी थीं।

श्लोक 23.15

स्रग्भिर्विचित्रमाल्याभिर्मञ्जुशिञ्जत्षडङ्घ्रिभिः । दुकूलक्षौमकौशेयैर्नानावस्त्रैर्विराजितम् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: भौंरों से गुँजारित फूलमालाएँ और विविध रेशमी, सूती तथा महीन वस्त्र उसकी शोभा बढ़ाते थे।

श्लोक 23.16

उपर्युपरि विन्यस्तनिलयेषु पृथक्पृथक् । क्षिप्तैः कशिपुभिः कान्तं पर्यङ्कव्यजनासनैः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऊपर-नीचे अलग-अलग कक्षों में आरामदायक बिछौने, पलंग, पंखे और आसन थे।

श्लोक 23.17

तत्र तत्र विनिक्षिप्तनानाशिल्पोपशोभितम् । महामरकतस्थाल्या जुष्टं विद्रुमवेदिभिः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अनेक कलाकृतियाँ, पन्ने की भूमि और मूँगे की वेदियाँ उसकी सुन्दरता बढ़ाती थीं।

श्लोक 23.18

द्वाःसु विद्रुमदेहल्या भातं वज्रकपाटवत् । शिखरेष्विन्द्रनीलेषु हेमकुम्भैरधिश्रितम् ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: द्वारों पर मूँगे की देहरियाँ, वज्रमय कपाट, नीलम के शिखर और स्वर्णकलश थे।

श्लोक 23.19

चक्षुष्मत्पद्मरागाग्र्यैर्वज्रभित्तिषु निर्मितैः । जुष्टं विचित्रवैतानैर्महार्हैर्हेमतोरणैः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: दीवारों में श्रेष्ठ पद्मराग रत्न, बहुमूल्य चँदोवे और स्वर्णतोरण सुशोभित थे।

श्लोक 23.20

हंसपारावतव्रातैस्तत्र तत्र निकूजितम् । कृत्रिमान् मन्यमानैः स्वानधिरुह्याधिरुह्य च ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ बने कृत्रिम हंस-कबूतरों को अपने जैसा मानकर वास्तविक पक्षी उनके पास बैठते और कूजते थे।

श्लोक 23.21

विहारस्थानविश्रामसंवेशप्राङ्गणाजिरैः । यथोपजोषं रचितैर्विस्मापनमिवात्मनः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: विहार, विश्राम, शयन और आँगन आदि की इच्छानुकूल रचना स्वयं देखने वाले को भी विस्मित करती थी।

श्लोक 23.22

ईदृग्गृहं तत्पश्यन्तीं नातिप्रीतेन चेतसा । सर्वभूताशयाभिज्ञः प्रावोचत्कर्दमः स्वयम् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसा भवन देखकर भी देवहूति का मन पूरी तरह प्रसन्न नहीं हुआ; उनका भाव समझकर कर्दम ने कहा।

श्लोक 23.23

निमज्ज्यास्मिन् ह्रदे भीरु विमानमिदमारुह । इदं शुक्लकृतं तीर्थमाशिषां यापकं नृणाम् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस पवित्र सरोवर में स्नान करके विमान पर चढ़ो; भगवान से पावन हुआ यह तीर्थ कल्याणकारी है।

श्लोक 23.24

सा तद्भर्तुः समादाय वचः कुवलयेक्षणा । सरजं बिभ्रती वासो वेणीभूतांश्च मूर्धजान् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: पति की बात मानकर, पुराने वस्त्र और उलझे केशों वाली कमलनेत्र देवहूति आगे बढ़ीं।

श्लोक 23.25

अङ्गं च मलपङ्केन सञ्छन्नं शबलस्तनम् । आविवेश सरस्वत्याः सरः शिवजलाशयम् ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: तप से मलिन हुए शरीर सहित वे सरस्वती के मङ्गलकारी सरोवर में प्रविष्ट हुईं।

श्लोक 23.26

सान्तःसरसि वेश्मस्थाः शतानि दश कन्यकाः । सर्वाः किशोरवयसो ददर्शोत्पलगन्धयः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ भीतर के दिव्य भवन में उन्होंने कमलसुगन्ध और तरुण रूप वाली एक हजार परिचारिकाएँ देखीं।

श्लोक 23.27

तां दृष्ट्वा सहसोत्थाय प्रोचुः प्राञ्जलयः स्त्रियः । वयं कर्मकरीस्तुभ्यं शाधि नः करवाम किम् ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: परिचारिकाएँ हाथ जोड़कर उठीं और बोलीं—हम आपकी सेविकाएँ हैं; आज्ञा दीजिए, क्या करें?

श्लोक 23.28

स्नानेन तां महार्हेण स्नापयित्वा मनस्विनीम् । दुकूले निर्मले नूत्ने ददुरस्यै च मानदाः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने आदर से देवहूति को उत्तम स्नान कराया और नए निर्मल वस्त्र पहनाए।

श्लोक 23.29

भूषणानि परार्ध्यानि वरीयांसि द्युमन्ति च । अन्नं सर्वगुणोपेतं पानं चैवामृतासवम् ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रेष्ठ चमकते आभूषण, पौष्टिक भोजन और अमृततुल्य पेय प्रस्तुत किए।

श्लोक 23.30

अथादर्शे स्वमात्मानं स्रग्विणं विरजाम्बरम् । विरजं कृतस्वस्त्ययनं कन्याभिर्बहुमानितम् ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवहूति ने दर्पण में अपने को माला, निर्मल वस्त्र और मङ्गलसज्जा सहित देखा।

श्लोक 23.31

स्नातं कृतशिरःस्नानं सर्वाभरणभूषितम् । निष्कग्रीवं वलयिनं कूजत्काञ्चननूपुरम् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्नान और केशप्रसाधन के बाद हार, कङ्कण तथा बजते स्वर्णनूपुर उनके अंगों को सुशोभित कर रहे थे।

श्लोक 23.32

श्रोण्योरध्यस्तया काञ्च्या काञ्चन्या बहुरत्नया । हारेण च महार्हेण रुचकेन च भूषितम् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: रत्नयुक्त स्वर्णकरधनी, बहुमूल्य हार और तिलकादि प्रसाधन से वे अलङ्कृत थीं।

श्लोक 23.33

सुदता सुभ्रुवा श्लक्ष्णस्निग्धापाङ्गेन चक्षुषा । पद्मकोशस्पृधा नीलैरलकैश्च लसन्मुखम् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: सुन्दर दाँत, भौंहें, स्नेहमयी दृष्टि और नीली अलकों से उनका मुख कमलकोश जैसा शोभता था।

श्लोक 23.34

यदा सस्मार ऋषभमृषीणां दयितं पतिम् । तत्र चास्ते सह स्त्रीभिर्यत्रास्ते स प्रजापतिः ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे ही उन्होंने प्रिय पति कर्दम का स्मरण किया, वे परिचारिकाओं सहित उनके समीप उपस्थित हो गईं।

श्लोक 23.35

भर्तुः पुरस्तादात्मानं स्त्रीसहस्रवृतं तदा । निशाम्य तद्योगगतिं संशयं प्रत्यपद्यत ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने को सहस्र परिचारिकाओं सहित पति के सामने पाकर उन्हें उनकी अद्भुत योगशक्ति का अनुभव हुआ।

श्लोक 23.36

स तां कृतमलस्नानां विभ्राजन्तीमपूर्ववत् । आत्मनो बिभ्रतीं रूपं संवीतरुचिरस्तनीम् ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्नान के बाद नई शोभा और निर्मल वस्त्रों में अपनी सहधर्मिणी को देखकर कर्दम प्रसन्न हुए।

श्लोक 23.37

विद्याधरीसहस्रेण सेव्यमानां सुवाससम् । जातभावो विमानं तदारोहयदमित्रहन् ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: सहस्र विद्याधरियों से सेवित देवहूति को उन्होंने स्नेहपूर्वक दिव्य विमान पर चढ़ाया।

श्लोक 23.38

तस्मिन्नलुप्तमहिमा प्रिययानुरक्तो विद्याधरीभिरुपचीर्णवपुर्विमाने । बभ्राज उत्कचकुमुद्गणवानपीच्यः ताराभिरावृत इवोडुपतिर्नभःस्थः ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: पत्नी सहित विमान में विराजमान कर्दम, परिचारिकाओं के बीच, तारों से घिरे चन्द्रमा की तरह शोभित हुए।

श्लोक 23.39

तेनाष्टलोकपविहारकुलाचलेन्द्र- द्रोणीष्वनङ्गसखमारुतसौभगासु । सिद्धैर्नुतो द्युधुनिपातशिवस्वनासु रेमे चिरं धनदवल्ललना वरूथी ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: लोकपालों के विहारस्थानों, सुहावनी पर्वतघाटियों और गंगाप्रपातों के मधुर स्वरों वाले प्रदेशों में उन्होंने दीर्घ विहार किया।

श्लोक 23.40

वैश्रम्भके सुरसने नन्दने पुष्पभद्रके । मानसे चैत्ररथ्ये च स रेमे रामया रतः ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वैश्रम्भक, सुरसन, नन्दन, पुष्पभद्रक, मानस और चैत्ररथ जैसे दिव्य उपवनों में दम्पती ने भ्रमण किया।

श्लोक 23.41

भ्राजिष्णुना विमानेन कामगेन महीयसा । वैमानिकानत्यशेत चरंल्लोकान् यथानिलः ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: वायुसमान गतिशील, विशाल और दीप्त विमान से लोकों में विचरते हुए वे अन्य विमानवासियों से अधिक शोभित थे।

श्लोक 23.42

किं दुरापादनं तेषां पुंसामुद्दामचेतसाम् । यैराश्रितस्तीर्थपदश्चरणो व्यसनात्ययः ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिन उदारचित्तों ने विपत्तिहर भगवान के चरणों का आश्रय लिया है, उनके लिए कौन-सी उपलब्धि दुर्लभ है?

श्लोक 23.43

प्रेक्षयित्वा भुवो गोलं पत्न्यै यावान् स्वसंस्थया । बह्वाश्चर्यं महायोगी स्वाश्रमाय न्यवर्तत ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: महायोगी ने पृथ्वीमण्डल के अद्भुत दृश्य पत्नी को दिखाए और फिर अपने आश्रम लौट आए।

श्लोक 23.44

विभज्य नवधाऽऽत्मानं मानवीं सुरतोत्सुकाम् । रामां निरमयन् रेमे वर्षपूगान् मुहूर्तवत् ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: योगशक्ति से नौ रूपों में प्रकट होकर कर्दम ने अपनी सहधर्मिणी को सन्तोष दिया; अनेक वर्ष क्षण समान बीते।

श्लोक 23.45

तस्मिन् विमान उत्कृष्टां शय्यां रतिकरीं श्रिता । न चाबुध्यत तं कालं पत्यापीच्येन सङ्गता ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: दिव्य विमान में पति के सान्निध्य का आनन्द अनुभव करती देवहूति को बीतते काल का ध्यान नहीं रहा।

श्लोक 23.46

एवं योगानुभावेन दम्पत्यो रममाणयोः । शतं व्यतीयुः शरदः कामलालसयोर्मनाक् ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: योगसामर्थ्य से विहार करते दम्पती के सौ वर्ष थोड़े समय जैसे बीत गए।

श्लोक 23.47

तस्यामाधत्त रेतस्तां भावयन्नात्मनाऽऽत्मवित् । नोधा विधाय रूपं स्वं सर्वसङ्कल्पविद्विभुः ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर आत्मज्ञानी कर्दम ने नौ रूपों द्वारा देवहूति में सन्तानोत्पत्ति का संकल्प पूरा किया।

श्लोक 23.48

अतः सा सुषुवे सद्यो देवहूतिः स्त्रियः प्रजाः । सर्वास्ताश्चारुसर्वाङ्ग्यो लोहितोत्पलगन्धयः ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवहूति से नौ सुन्दर कन्याएँ उत्पन्न हुईं, जिनसे लाल कमल जैसी सुगन्ध आती थी।

श्लोक 23.49

पतिं सा प्रव्रजिष्यन्तं तदाऽऽलक्ष्योशती सती । स्मयमाना विक्लवेन हृदयेन विदूयता ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: कर्दम के वनप्रस्थान का विचार पहचानकर देवहूति के मन में विरहव्यथा उठी, यद्यपि वे बाहर से मुस्कराईं।

श्लोक 23.50

लिखन्त्यधोमुखी भूमिं पदा नखमणिश्रिया । उवाच ललितां वाचं निरुध्याश्रुकलां शनैः ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: सिर झुकाए चरणनखों से धरती कुरेदते और आँसू रोकते हुए उन्होंने धीरे से मधुर वाणी कही।

श्लोक 23.51

देवहूतिरुवाच । सर्वं तद्भगवान् मह्यमुपोवाह प्रतिश्रुतम् । अथापि मे प्रपन्नाया अभयं दातुमर्हसि ॥ ५१॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपने अपनी सभी प्रतिज्ञाएँ पूरी कीं; फिर भी शरण आई मुझको आध्यात्मिक अभय देना उचित है।

श्लोक 23.52

ब्रह्मन् दुहितृभिस्तुभ्यं विमृग्याः पतयः समाः । कश्चित्स्यान्मे विशोकाय त्वयि प्रव्रजिते वनम् ॥ ५२॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन पुत्रियों के योग्य पति खोजने हैं; आपके वन जाने पर मेरे शोक को दूर करने वाला कोई सहारा भी हो।

श्लोक 23.53

एतावतालं कालेन व्यतिक्रान्तेन मे प्रभो । इन्द्रियार्थप्रसङ्गेन परित्यक्तपरात्मनः ॥ ५३॥

सरल हिंदी भावार्थ: विषयसुख में लगे रहकर परमात्मा को भुलाते हुए मेरा बहुत समय व्यर्थ बीत गया।

श्लोक 23.54

इन्द्रियार्थेषु सज्जन्त्या प्रसङ्गस्त्वयि मे कृतः । अजानन्त्या परं भावं तथाप्यस्त्वभयाय मे ॥ ५४॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपका परम स्वरूप न जानकर मैंने आपमें लौकिक आसक्ति रखी; फिर भी वही सत्सङ्ग अब मेरे अभय का कारण बने।

श्लोक 23.55

सङ्गो यः संसृतेर्हेतुरसत्सु विहितोऽधिया । स एव साधुषु कृतो निःसङ्गत्वाय कल्पते ॥ ५५॥

सरल हिंदी भावार्थ: दुर्जनों में किया सङ्ग संसारबन्धन बनता है; वही सज्जनों में किया जाए तो आसक्ति से मुक्ति का साधन होता है।

श्लोक 23.56

नेह यत्कर्म धर्माय न विरागाय कल्पते । न तीर्थपदसेवायै जीवन्नपि मृतो हि सः ॥ ५६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिसके कर्म धर्म, वैराग्य और भगवान की सेवा की ओर न ले जाएँ, उसका जीवन अपने श्रेष्ठ उद्देश्य से रिक्त है।

श्लोक 23.57

साहं भगवतो नूनं वञ्चिता मायया दृढम् । यत्त्वां विमुक्तिदं प्राप्य न मुमुक्षेय बन्धनात् ॥ ५७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुक्ति देने वाले आप जैसे महापुरुष का साथ पाकर भी मैंने बन्धनमुक्ति नहीं चाही; यह माया का गहरा प्रभाव था।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 23 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 24

कपिलभगवान का प्राकट्य और कर्दम का संन्यास

श्लोक 24.1

मैत्रेय उवाच । निर्वेदवादिनीमेवं मनोर्दुहितरं मुनिः । दयालुः शालिनीमाह शुक्लाभिव्याहृतं स्मरन् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—देवहूति के वैराग्यपूर्ण शब्द सुनकर दयालु कर्दम ने भगवान का वचन याद किया और उन्हें समझाया।

श्लोक 24.2

ऋषिरुवाच । मा खिदो राजपुत्रीत्थमात्मानं प्रत्यनिन्दिते । भगवांस्तेऽक्षरो गर्भमदूरात्सम्प्रपत्स्यते ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: कर्दम बोले—हे निर्दोष राजकन्या, अपने को दोष देकर दुःखी न हो; अविनाशी भगवान शीघ्र तुम्हारे गर्भ से प्रकट होंगे।

श्लोक 24.3

धृतव्रतासि भद्रं ते दमेन नियमेन च । तपोद्रविणदानैश्च श्रद्धया चेश्वरं भज ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: व्रतनिष्ठ रहो; संयम, नियम, तप, दान और श्रद्धा सहित भगवान की आराधना करो।

श्लोक 24.4

स त्वयाऽऽराधितः शुक्लो वितन्वन् मामकं यशः । छेत्ता ते हृदयग्रन्थिमौदर्यो ब्रह्मभावनः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारी आराधना से प्रसन्न होकर पुत्ररूप भगवान ज्ञान का प्रकाश देंगे और तुम्हारी हृदयग्रन्थि काटेंगे।

श्लोक 24.5

मैत्रेय उवाच । देवहूत्यपि सन्देशं गौरवेण प्रजापतेः । सम्यक् श्रद्धाय पुरुषं कूटस्थमभजद्गुरुम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—पति की शिक्षा श्रद्धा और सम्मान से स्वीकार करके देवहूति ने अचल परमगुरु भगवान का भजन किया।

श्लोक 24.6

तस्यां बहुतिथे काले भगवान् मधुसूदनः । कार्दमं वीर्यमापन्नो जज्ञेऽग्निरिव दारुणि ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: समय आने पर मधुसूदन कर्दम के माध्यम से देवहूति में वैसे प्रकट हुए जैसे काष्ठ में अग्नि।

श्लोक 24.7

अवादयंस्तदा व्योम्नि वादित्राणि घनाघनाः । गायन्ति तं स्म गन्धर्वा नृत्यन्त्यप्सरसो मुदा ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: तब आकाश में दिव्य वाद्य और मेघगर्जना हुई; गन्धर्व गाने और अप्सराएँ प्रसन्न होकर नाचने लगीं।

श्लोक 24.8

पेतुः सुमनसो दिव्याः खेचरैरपवर्जिताः । प्रसेदुश्च दिशः सर्वा अम्भांसि च मनांसि च ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवों ने पुष्पवृष्टि की; दिशाएँ, जल और सबके मन प्रसन्न हो गए।

श्लोक 24.9

तत्कर्दमाश्रमपदं सरस्वत्या परिश्रितम् । स्वयम्भूः साकमृषिभिर्मरीच्यादिभिरभ्ययात् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा मरीचि आदि ऋषियों सहित सरस्वती से घिरे कर्दम के आश्रम पहुँचे।

श्लोक 24.10

भगवन्तं परं ब्रह्म सत्त्वेनांशेन शत्रुहन् । तत्त्वसङ्ख्यानविज्ञप्त्यै जातं विद्वानजः स्वराट् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे जानते थे कि परमब्रह्म भगवान तत्त्वों का ज्ञान समझाने के लिए निर्मल अंशरूप से प्रकट हुए हैं।

श्लोक 24.11

सभाजयन् विशुद्धेन चेतसा तच्चिकीर्षितम् । प्रहृष्यमाणैरसुभिः कर्दमं चेदमभ्यधात् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के इस अभिप्राय का शुद्धचित्त से सम्मान करके प्रसन्न ब्रह्मा ने कर्दम से कहा।

श्लोक 24.12

ब्रह्मोवाच । त्वया मेऽपचितिस्तात कल्पिता निर्व्यलीकतः । यन्मे सञ्जगृहे वाक्यं भवान् मानद मानयन् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुमने मेरी आज्ञा आदरपूर्वक और निष्कपट भाव से मानकर मेरा उचित सम्मान किया है।

श्लोक 24.13

एतावत्येव शुश्रूषा कार्या पितरि पुत्रकैः । बाढमित्यनुमन्येत गौरवेण गुरोर्वचः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुत्र का पिता और गुरु के प्रति कर्तव्य यही है कि उचित शिक्षा को आदर सहित स्वीकार करे।

श्लोक 24.14

इमा दुहितरः सभ्य तव वत्स सुमध्यमाः । सर्गमेतं प्रभावैः स्वैर्बृहयिष्यन्त्यनेकधा ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारी ये नौ पुत्रियाँ अपने प्रभाव से इस सृष्टि को अनेक प्रकार से विस्तृत करेंगी।

श्लोक 24.15

अतस्त्वमृषिमुख्येभ्यो यथाशीलं यथारुचि । आत्मजाः परिदेह्यद्य विस्तृणीहि यशो भुवि ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन्हें स्वभाव और रुचि के अनुरूप श्रेष्ठ ऋषियों को विवाह में दो और अपना यश फैलाओ।

श्लोक 24.16

वेदाहमाद्यं पुरुषमवतीर्णं स्वमायया । भूतानां शेवधिं देहं बिभ्राणं कपिलं मुने ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं जानता हूँ कि यह कपिलरूप स्वयं आदिपुरुष का अवतार है, जो सब प्राणियों के कल्याण का खजाना है।

श्लोक 24.17

ज्ञानविज्ञानयोगेन कर्मणामुद्धरन् जटाः । हिरण्यकेशः पद्माक्षः पद्ममुद्रापदाम्बुजः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: सुवर्णवर्ण केश, कमलनेत्र और कमलचिह्नित चरणों वाले ये ज्ञान-विज्ञान से कर्मबन्धन की जड़ें काटेंगे।

श्लोक 24.18

एष मानवि ते गर्भं प्रविष्टः कैटभार्दनः । अविद्यासंशयग्रन्थिं छित्त्वा गां विचरिष्यति ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे देवहूति, तुम्हारे गर्भ से प्रकट कैटभविनाशक भगवान अज्ञान और संशय की ग्रन्थि काटकर पृथ्वी पर विचरेंगे।

श्लोक 24.19

अयं सिद्धगणाधीशः साङ्ख्याचार्यैः सुसम्मतः । लोके कपिल इत्याख्यां गन्ता ते कीर्तिवर्धनः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सिद्धों के अधिपति और सांख्याचार्यों से सम्मानित यह पुत्र कपिल नाम से तुम्हारी कीर्ति बढ़ाएगा।

श्लोक 24.20

मैत्रेय उवाच । तावाश्वास्य जगत्स्रष्टा कुमारैः सह नारदः । हंसो हंसेन यानेन त्रिधाम परमं ययौ ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—दम्पती को आश्वस्त करके ब्रह्मा कुमारों और नारद सहित अपने हंसवाहन से परम लोक लौट गए।

श्लोक 24.21

गते शतधृतौ क्षत्तः कर्दमस्तेन चोदितः । यथोदितं स्वदुहितॄः प्रादाद्विश्वसृजां ततः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा की आज्ञा के अनुसार कर्दम ने फिर अपनी कन्याओं का विवाह सृष्टिविस्तार करने वाले ऋषियों से किया।

श्लोक 24.22

मरीचये कलां प्रादादनसूयामथात्रये । श्रद्धामङ्गिरसेऽयच्छत्पुलस्त्याय हविर्भुवम् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: कला मरीचि को, अनसूया अत्रि को, श्रद्धा अङ्गिरा को और हविर्भू पुलस्त्य को दी गईं।

श्लोक 24.23

पुलहाय गतिं युक्तां क्रतवे च क्रियां सतीम् । ख्यातिं च भृगवेऽयच्छद्वसिष्ठायाप्यरुन्धतीम् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: गति का विवाह पुलह, क्रिया का क्रतु, ख्याति का भृगु और अरुन्धती का वसिष्ठ से हुआ।

श्लोक 24.24

अथर्वणेऽददाच्छान्तिं यया यज्ञो वितन्यते । विप्रर्षभान् कृतोद्वाहान् सदारान् समलालयत् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: शान्ति अथर्वा को दी गईं; इन यज्ञपरम्परा के संवर्धक नवदम्पतियों का कर्दम ने आदर किया।

श्लोक 24.25

ततस्त ऋषयः क्षत्तः कृतदारा निमन्त्र्य तम् । प्रातिष्ठन् नन्दिमापन्नाः स्वं स्वमाश्रममण्डलम् ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऋषि विवाह करके प्रसन्नतापूर्वक कर्दम से विदा हुए और अपनी-अपनी पत्नियों सहित आश्रम लौट गए।

श्लोक 24.26

स चावतीर्णं त्रियुगमाज्ञाय विबुधर्षभम् । विविक्त उपसङ्गम्य प्रणम्य समभाषत ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर कर्दम ने अपने पुत्र को स्वयं भगवान का अवतार जानकर एकान्त में प्रणाम किया और प्रार्थना की।

श्लोक 24.27

अहो पापच्यमानानां निरये स्वैरमङ्गलैः । कालेन भूयसा नूनं प्रसीदन्तीह देवताः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अशुभ कर्मों के दुःख में पड़े जीवों पर लम्बे काल बाद ऐसा दिव्य अनुग्रह प्रकट होता है।

श्लोक 24.28

बहुजन्मविपक्वेन सम्यग्योगसमाधिना । द्रष्टुं यतन्ते यतयः शून्यागारेषु यत्पदम् ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिनके चरण देखने के लिए यति अनेक जन्मों की परिपक्व समाधि द्वारा एकान्त में प्रयत्न करते हैं—

श्लोक 24.29

स एव भगवानद्य हेलनं नगणय्य नः । गृहेषु जातो ग्राम्याणां यः स्वानां पक्षपोषणः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: वही भक्तवत्सल भगवान हमारी लौकिक अपूर्णताओं की उपेक्षा करके आज हमारे घर पुत्ररूप में आए हैं।

श्लोक 24.30

स्वीयं वाक्यं ऋतं कर्तुमवतीर्णोऽसि मे गृहे । चिकीर्षुर्भगवान् ज्ञानं भक्तानां मानवर्धनः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपना वचन सत्य करने, भक्तों का मान बढ़ाने और ज्ञान देने के लिए आपने मेरे घर अवतार लिया है।

श्लोक 24.31

तान्येव तेऽभिरूपाणि रूपाणि भगवंस्तव । यानि यानि च रोचन्ते स्वजनानामरूपिणः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप प्राकृत रूप से रहित होकर भी अपने भक्तों को प्रिय लगने वाले सुन्दर दिव्य रूप धारण करते हैं।

श्लोक 24.32

त्वां सूरिभिस्तत्त्वबुभुत्सयाद्धा सदाभिवादार्हणपादपीठम् । ऐश्वर्यवैराग्ययशोऽवबोध- वीर्यश्रिया पूर्तमहं प्रपद्ये ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐश्वर्य, वैराग्य, यश, ज्ञान, पराक्रम और श्री से पूर्ण, ज्ञानियों से पूजित आपके चरणों की शरण हूँ।

श्लोक 24.33

परं प्रधानं पुरुषं महान्तं कालं कविं त्रिवृतं लोकपालम् । आत्मानुभूत्यानुगतप्रपञ्चं स्वच्छन्दशक्तिं कपिलं प्रपद्ये ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रकृति, पुरुष, महत्तत्त्व, काल और त्रिगुणव्यवस्था के परम आश्रय, स्वाधीनशक्ति कपिलभगवान की शरण लेता हूँ।

श्लोक 24.34

आ स्माभिपृच्छेऽद्य पतिं प्रजानां त्वयावतीर्णार्ण उताप्तकामः । परिव्रजत्पदवीमास्थितोऽहं चरिष्ये त्वां हृदि युञ्जन् विशोकः ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपके अवतार से कर्तव्य पूर्ण हुआ; अब अनुमति चाहूँ कि परिव्राजक होकर हृदय में आपका ध्यान करता हुआ शोकमुक्त विचरूँ।

श्लोक 24.35

श्रीभगवानुवाच । मया प्रोक्तं हि लोकस्य प्रमाणं सत्यलौकिके । अथाजनि मया तुभ्यं यदवोचमृतं मुने ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—मेरी वाणी लौकिक और आध्यात्मिक दोनों क्षेत्रों में प्रमाण है; तुमसे कही बात सत्य करने ही मैं प्रकट हुआ।

श्लोक 24.36

एतन्मे जन्म लोकेऽस्मिन् मुमुक्षूणां दुराशयात् । प्रसङ्ख्यानाय तत्त्वानां सम्मतायात्मदर्शने ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरा यह जन्म मुक्ति चाहने वालों को तत्त्वों का यथार्थ विवेचन और आत्मदर्शन का मान्य मार्ग समझाने के लिए है।

श्लोक 24.37

एष आत्मपथोऽव्यक्तो नष्टः कालेन भूयसा । तं प्रवर्तयितुं देहमिमं विद्धि मया भृतम् ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: दीर्घकाल से लुप्त-सा हुआ यह आत्मज्ञानमार्ग फिर चलाने के लिए मैंने यह रूप धारण किया है।

श्लोक 24.38

गच्छ कामं मयाऽऽपृष्टो मयि सन्न्यस्तकर्मणा । जित्वा सुदुर्जयं मृत्युममृतत्वाय मां भज ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरी अनुमति से जाओ; कर्म मुझे अर्पित करके दुर्जय मृत्यु पार करने और अमृतपद पाने के लिए मेरा भजन करो।

श्लोक 24.39

मामात्मानं स्वयञ्ज्योतिः सर्वभूतगुहाशयम् । आत्मन्येवात्मना वीक्ष्य विशोकोऽभयमृच्छसि ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सबके हृदय में स्वयंप्रकाश आत्मारूप मुझे अपने भीतर देखोगे तो शोक और भय से मुक्त हो जाओगे।

श्लोक 24.40

मात्र आध्यात्मिकीं विद्यां शमनीं सर्वकर्मणाम् । वितरिष्ये यया चासौ भयं चातितरिष्यति ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं माता को कर्मबन्धन शान्त करने वाली अध्यात्मविद्या दूँगा, जिससे वे भी संसारभय पार करेंगी।

श्लोक 24.41

मैत्रेय उवाच । एवं समुदितस्तेन कपिलेन प्रजापतिः । दक्षिणीकृत्य तं प्रीतो वनमेव जगाम ह ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—कपिलभगवान की आज्ञा पाकर प्रसन्न कर्दम ने उनकी प्रदक्षिणा की और वन चले गए।

श्लोक 24.42

व्रतं स आस्थितो मौनमात्मैकशरणो मुनिः । निःसङ्गो व्यचरत्क्षोणीमनग्निरनिकेतनः ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मौनव्रती, अनासक्त और परमात्माश्रित मुनि व्यक्तिगत यज्ञाग्नि तथा निश्चित गृह का आश्रय छोड़ पृथ्वी पर विचरने लगे।

श्लोक 24.43

मनो ब्रह्मणि युञ्जानो यत्तत्सदसतः परम् । गुणावभासे विगुण एकभक्त्यानुभाविते ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुणों को प्रकाशित करके भी उनसे परे, कार्यकारणातीत परमात्मा में उन्होंने अनन्य भक्ति से मन लगाया।

श्लोक 24.44

निरहङ्कृतिर्निर्ममश्च निर्द्वन्द्वः समदृक् स्वदृक् । प्रत्यक्प्रशान्तधीर्धीरः प्रशान्तोर्मिरिवोदधिः ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: अहंता-ममता, द्वन्द्व और विषमता से मुक्त उनकी अन्तर्बुद्धि तरङ्गरहित समुद्र की तरह शान्त हुई।

श्लोक 24.45

वासुदेवे भगवति सर्वज्ञे प्रत्यगात्मनि । परेण भक्तिभावेन लब्धात्मा मुक्तबन्धनः ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: सर्वज्ञ अन्तरात्मा वासुदेव में परम भक्ति से स्थित होकर उन्हें आत्मबोध और बन्धनमुक्ति प्राप्त हुई।

श्लोक 24.46

आत्मानं सर्वभूतेषु भगवन्तमवस्थितम् । अपश्यत्सर्वभूतानि भगवत्यपि चात्मनि ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने भगवान को सभी जीवों में और सभी जीवों को परमात्मा के आश्रय में स्थित देखा।

श्लोक 24.47

इच्छाद्वेषविहीनेन सर्वत्र समचेतसा । भगवद्भक्तियुक्तेन प्राप्ता भागवती गतिः ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: इच्छा-द्वेष छोड़, सर्वत्र समचित्त और भगवद्भक्तियुक्त होकर कर्दम ने भगवान की परम गति प्राप्त की।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 24 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 25

कपिल–देवहूति संवाद और भक्तियोग

श्लोक 25.1

शौनक उवाच । कपिलस्तत्त्वसङ्ख्याता भगवानात्ममायया । जातः स्वयमजः साक्षादात्मप्रज्ञप्तये नृणाम् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: शौनक बोले—अजन्मा भगवान कपिल अपनी योगमाया से मनुष्यों को आत्मज्ञान देने और तत्त्वों का विवेचन करने प्रकट हुए।

श्लोक 25.2

न ह्यस्य वर्ष्मणः पुंसां वरिम्णः सर्वयोगिनाम् । विश्रुतौ श्रुतदेवस्य भूरि तृप्यन्ति मेऽसवः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: योगियों में श्रेष्ठ उनके अवतार की महिमा सुनते हुए भी मेरे मन को पूरी तृप्ति नहीं होती।

श्लोक 25.3

यद्यद्विधत्ते भगवान् स्वच्छन्दात्माऽऽत्ममायया । तानि मे श्रद्दधानस्य कीर्तन्यान्यनुकीर्तय ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वतन्त्र भगवान अपनी शक्ति से जो-जो प्रशंसनीय लीला करते हैं, मुझ श्रद्धालु को सुनाइए।

श्लोक 25.4

सूत उवाच । द्वैपायनसखस्त्वेवं मैत्रेयो भगवांस्तथा । प्राहेदं विदुरं प्रीत आन्वीक्षिक्यां प्रचोदितः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूतजी बोले—आत्मविद्या का प्रश्न आने पर व्यासजी के मित्र मैत्रेय ने प्रसन्न होकर विदुर से कहा।

श्लोक 25.5

मैत्रेय उवाच । पितरि प्रस्थितेऽरण्यं मातुः प्रियचिकीर्षया । तस्मिन् बिन्दुसरेऽवात्सीद्भगवान् कपिलः किल ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—पिता के वन जाने पर माता का कल्याण करने के लिए कपिलभगवान बिन्दुसरोवर पर रहे।

श्लोक 25.6

तमासीनमकर्माणं तत्त्वमार्गाग्रदर्शनम् । स्वसुतं देवहूत्याह धातुः संस्मरती वचः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा का वचन स्मरण करके देवहूति ने एकान्त में बैठे निष्काम और तत्त्वमार्ग के अग्रदर्शी पुत्र से कहा।

श्लोक 25.7

देवहूतिरुवाच । निर्विण्णा नितरां भूमन्नसदिन्द्रियतर्षणात् । येन सम्भाव्यमानेन प्रपन्नान्धं तमः प्रभो ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवहूति बोलीं—अस्थायी इन्द्रियविषयों की प्यास से थक गई हूँ; उसी से घने अज्ञान में पड़ गई।

श्लोक 25.8

तस्य त्वं तमसोऽन्धस्य दुष्पारस्याद्य पारगम् । सच्चक्षुर्जन्मनामन्ते लब्धं मे त्वदनुग्रहात् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपकी कृपा से अब मुझे उस कठिन अन्धकार को पार कराने वाला सच्चा ज्ञाननेत्र मिला है।

श्लोक 25.9

य आद्यो भगवान् पुंसामीश्वरो वै भवान् किल । लोकस्य तमसान्धस्य चक्षुः सूर्य इवोदितः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप आदिपुरुष भगवान हैं, जो अज्ञानान्ध लोगों के लिए सूर्य जैसे ज्ञानप्रकाश बनकर प्रकट हुए।

श्लोक 25.10

अथ मे देव सम्मोहमपाक्रष्टुं त्वमर्हसि । योऽवग्रहोऽहम्ममेतीत्येतस्मिन् योजितस्त्वया ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: देह आदि में मैं और मेरा मानने का जो मोह लगा है, उसे दूर कीजिए।

श्लोक 25.11

तं त्वा गताहं शरणं शरण्यं स्वभृत्यसंसारतरोः कुठारम् । जिज्ञासयाहं प्रकृतेः पूरुषस्य नमामि सद्धर्मविदां वरिष्ठम् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: भक्तों के संसारवृक्ष को काटने वाले शरण्य प्रभु की शरण हूँ; प्रकृति और पुरुष जानने की इच्छा से आपको प्रणाम करती हूँ।

श्लोक 25.12

मैत्रेय उवाच । इति स्वमातुर्निरवद्यमीप्सितं निशम्य पुंसामपवर्गवर्धनम् । धियाभिनन्द्यात्मवतां सतां गति- र्बभाष ईषत्स्मितशोभिताननः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—माता की निष्कपट, मुक्ति का मार्ग बढ़ाने वाली इच्छा सुनकर कपिलभगवान प्रसन्न मुस्कान से बोले।

श्लोक 25.13

श्रीभगवानुवाच । योग आध्यात्मिकः पुंसां मतो निःश्रेयसाय मे । अत्यन्तोपरतिर्यत्र दुःखस्य च सुखस्य च ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—मनुष्य का परम कल्याण अध्यात्मयोग में है, जहाँ सुख-दुःख के द्वन्द्व का पूर्ण उपशम होता है।

श्लोक 25.14

तमिमं ते प्रवक्ष्यामि यमवोचं पुरानघे । ऋषीणां श्रोतुकामानां योगं सर्वाङ्गनैपुणम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे निष्पाप माता, वही सर्वाङ्गपूर्ण योग बताता हूँ जिसे पहले जिज्ञासु ऋषियों को कहा था।

श्लोक 25.15

चेतः खल्वस्य बन्धाय मुक्तये चात्मनो मतम् । गुणेषु सक्तं बन्धाय रतं वा पुंसि मुक्तये ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मन ही आत्मा के बन्धन और मुक्ति का कारण है; विषयगुणों में आसक्त हो तो बन्धन, परमपुरुष में रमे तो मुक्ति।

श्लोक 25.16

अहम्ममाभिमानोत्थैः कामलोभादिभिर्मलैः । वीतं यदा मनः शुद्धमदुःखमसुखं समम् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब मन अहंता-ममता से उत्पन्न काम-लोभ आदि मल छोड़कर शुद्ध होता है, तब सुख-दुःख से परे समता आती है।

श्लोक 25.17

तदा पुरुष आत्मानं केवलं प्रकृतेः परम् । निरन्तरं स्वयञ्ज्योतिरणिमानमखण्डितम् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: तब जीव अपने को प्रकृति से परे, एकरस, स्वयंप्रकाश और अखण्ड चेतन रूप में पहचानता है।

श्लोक 25.18

ज्ञानवैराग्ययुक्तेन भक्तियुक्तेन चात्मना । परिपश्यत्युदासीनं प्रकृतिं च हतौजसम् ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञान, वैराग्य और भक्ति से युक्त मन द्वारा वह आत्मा की असङ्गता तथा प्रकृति की क्षीण बन्धनशक्ति को देखता है।

श्लोक 25.19

न युज्यमानया भक्त्या भगवत्यखिलात्मनि । सदृशोऽस्ति शिवः पन्था योगिनां ब्रह्मसिद्धये ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सबके आत्मा भगवान में भक्ति जैसा कल्याणकारी मार्ग योगियों के ब्रह्मसाक्षात्कार के लिए दूसरा नहीं।

श्लोक 25.20

प्रसङ्गमजरं पाशमात्मनः कवयो विदुः । स एव साधुषु कृतो मोक्षद्वारमपावृतम् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: आसक्ति को ज्ञानी दृढ़ बन्धन कहते हैं; वही प्रेम साधुओं में लगे तो खुला हुआ मोक्षद्वार बनता है।

श्लोक 25.21

तितिक्षवः कारुणिकाः सुहृदः सर्वदेहिनाम् । अजातशत्रवः शान्ताः साधवः साधुभूषणाः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: साधु सहनशील, दयालु, सब जीवों के हितैषी, शत्रुभाव से रहित और शान्त होते हैं।

श्लोक 25.22

मय्यनन्येन भावेन भक्तिं कुर्वन्ति ये दृढाम् । मत्कृते त्यक्तकर्माणस्त्यक्तस्वजनबान्धवाः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे अनन्यभाव से दृढ़ भक्ति करते और मेरे लिए कर्मफल तथा स्वजनासक्ति का त्याग करते हैं।

श्लोक 25.23

मदाश्रयाः कथामृष्टाः श‍ृण्वन्ति कथयन्ति च । तपन्ति विविधास्तापा नैतान्मद्गतचेतसः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरे आश्रित संत मेरी पवित्र कथा सुनते-सुनाते हैं; मुझमें चित्त लगने से विविध ताप उन्हें अभिभूत नहीं करते।

श्लोक 25.24

त एते साधवः साध्वि सर्वसङ्गविवर्जिताः । सङ्गस्तेष्वथ ते प्रार्थ्यः सङ्गदोषहरा हि ते ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे माता, ऐसे अनासक्त साधुओं का सङ्ग चाहो; वे आसक्ति के दोष दूर करने वाले हैं।

श्लोक 25.25

सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो भवन्ति हृत्कर्णरसायनाः कथाः । तज्जोषणादाश्वपवर्गवर्त्मनि श्रद्धा रतिर्भक्तिरनुक्रमिष्यति ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: संतों के सत्सङ्ग में मेरी महिमा की कथा हृदय और कानों को आनन्द देती है; उससे क्रमशः श्रद्धा, प्रेम और भक्ति बढ़ती है।

श्लोक 25.26

भक्त्या पुमान् जातविराग ऐन्द्रिया- द्दृष्टश्रुतान् मद्रचनानुचिन्तया । चित्तस्य यत्तो ग्रहणे योगयुक्तो यतिष्यते ऋजुभिर्योगमार्गैः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: भक्ति और मेरी लीला के चिन्तन से लौकिक-पारलौकिक विषयों में वैराग्य आता है; साधक सरल योगमार्ग से चित्त स्थिर करने लगता है।

श्लोक 25.27

असेवयायं प्रकृतेर्गुणानां ज्ञानेन वैराग्यविजृम्भितेन । योगेन मय्यर्पितया च भक्त्या मां प्रत्यगात्मानमिहावरुन्धे ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुणविषयों का सेवन छोड़, वैराग्यमय ज्ञान, योग और समर्पित भक्ति से मनुष्य अपने अन्तरात्मा मुझको प्राप्त करता है।

श्लोक 25.28

देवहूतिरुवाच । काचित्त्वय्युचिता भक्तिः कीदृशी मम गोचरा । यया पदं ते निर्वाणमञ्जसान्वाश्नवा अहम् ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवहूति बोलीं—मेरे लिए कैसी भक्ति उपयुक्त और साध्य है, जिससे आपका निर्वाणपद सहज प्राप्त करूँ?

श्लोक 25.29

यो योगो भगवद्बाणो निर्वाणात्मंस्त्वयोदितः । कीदृशः कति चाङ्गानि यतस्तत्त्वावबोधनम् ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपने जिस लक्ष्यभेदी योग का वर्णन किया, उसका स्वरूप और अंग कितने हैं, जिनसे तत्त्वज्ञान होता है?

श्लोक 25.30

तदेतन्मे विजानीहि यथाहं मन्दधीर्हरे । सुखं बुद्ध्येय दुर्बोधं योषा भवदनुग्रहात् ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे हरि, अपनी कृपा से सरल रीति में समझाइए, ताकि मेरी सीमित बुद्धि भी इस कठिन विषय को जान सके।

श्लोक 25.31

मैत्रेय उवाच । विदित्वार्थं कपिलो मातुरित्थं जातस्नेहो यत्र तन्वाभिजातः । तत्त्वाम्नायं यत्प्रवदन्ति साङ्ख्यं प्रोवाच वै भक्तिवितानयोगम् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—माता की इच्छा समझकर कपिल ने स्नेह से भक्ति का विस्तार करने वाला सांख्य और योग समझाया।

श्लोक 25.32

श्रीभगवानुवाच । देवानां गुणलिङ्गानामानुश्रविककर्मणाम् । सत्त्व एवैकमनसो वृत्तिः स्वाभाविकी तु या ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: विषय और कर्म से जुड़ी इन्द्रियों की स्वाभाविक वृत्ति जब एकाग्र मन से निर्मल परमात्मा की ओर बहती है—

श्लोक 25.33

अनिमित्ता भागवती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी । जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: वही निष्काम भगवद्भक्ति है, जो मुक्ति से भी श्रेष्ठ है और सूक्ष्म बन्धन वैसे जला देती है जैसे अग्नि ईंधन को।

श्लोक 25.34

नैकात्मतां मे स्पृहयन्ति केचि- न्मत्पादसेवाभिरता मदीहाः । येऽन्योन्यतो भागवताः प्रसज्य सभाजयन्ते मम पौरुषाणि ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरी चरणसेवा में रमे भक्त परस्पर मिलकर मेरी लीलाओं का आदरपूर्वक गान करते हैं; वे अलग से एकात्ममोक्ष भी नहीं चाहते।

श्लोक 25.35

पश्यन्ति ते मे रुचिराण्यम्ब सन्तः प्रसन्नवक्त्रारुणलोचनानि । रूपाणि दिव्यानि वरप्रदानि साकं वाचं स्पृहणीयां वदन्ति ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे माता, वे मेरे प्रसन्न मुख, अरुण नेत्र और वरदाता दिव्य रूपों का दर्शन करते तथा मेरे साथ प्रिय वाणी का अनुभव करते हैं।

श्लोक 25.36

तैर्दर्शनीयावयवैरुदार- विलासहासेक्षितवामसूक्तैः । हृतात्मनो हृतप्राणांश्च भक्ति- रनिच्छतो मे गतिमण्वीं प्रयुङ्क्ते ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरे सुन्दर अंग, मुस्कान, दृष्टि और मधुर वचन उनके प्राणों को आकर्षित करते हैं; भक्ति उन्हें अनायास परम गति देती है।

श्लोक 25.37

अथो विभूतिं मम मायाविनस्ता- मैश्वर्यमष्टाङ्गमनुप्रवृत्तम् । श्रियं भागवतीं वा स्पृहयन्ति भद्रां परस्य मे तेऽश्नुवते तु लोके ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरे भक्त मायिक ऐश्वर्य, अष्टसिद्धि या दिव्य सम्पदा की चाह नहीं करते, फिर भी मेरे परम धाम में शुभ विभूतियाँ पाते हैं।

श्लोक 25.38

न कर्हिचिन्मत्पराः शान्तरूपे नङ्क्ष्यन्ति नो मेऽनिमिषो लेढि हेतिः । येषामहं प्रिय आत्मा सुतश्च सखा गुरुः सुहृदो दैवमिष्टम् ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो मुझे प्रियतम, आत्मा, पुत्र, मित्र, गुरु, हितैषी या आराध्य मानते हैं, उनकी आध्यात्मिक स्थिति को काल नष्ट नहीं करता।

श्लोक 25.39

इमं लोकं तथैवामुमात्मानमुभयायिनम् । आत्मानमनु ये चेह ये रायः पशवो गृहाः ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस लोक, परलोक, शरीर, उससे जुड़े सम्बन्धियों और धन, पशु तथा घर आदि की आसक्तियाँ—

श्लोक 25.40

विसृज्य सर्वानन्यांश्च मामेवं विश्वतोमुखम् । भजन्त्यनन्यया भक्त्या तान् मृत्योरतिपारये ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: छोड़कर जो अनन्यभाव से सर्वव्यापी मेरा भजन करते हैं, उन्हें मैं मृत्यु के पार ले जाता हूँ।

श्लोक 25.41

नान्यत्र मद्भगवतः प्रधानपुरुषेश्वरात् । आत्मनः सर्वभूतानां भयं तीव्रं निवर्तते ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रकृति-पुरुष के स्वामी और सबके आत्मा मेरे आश्रय के अतिरिक्त यह प्रबल संसारभय नहीं मिटता।

श्लोक 25.42

मद्भयाद्वाति वातोयं सूर्यस्तपति मद्भयात् । वर्षतीन्द्रो दहत्यग्निर्मृत्युश्चरति मद्भयात् ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरी व्यवस्था से वायु चलती, सूर्य तपता, इन्द्र वर्षा करता, अग्नि जलती और मृत्यु अपना कार्य करती है।

श्लोक 25.43

ज्ञानवैराग्ययुक्तेन भक्तियोगेन योगिनः । क्षेमाय पादमूलं मे प्रविशन्त्यकुतोभयम् ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञान-वैराग्ययुक्त भक्तियोग से योगी परम कल्याण के लिए मेरे निर्भय चरणाश्रय में प्रवेश करते हैं।

श्लोक 25.44

एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुंसां निःश्रेयसोदयः । तीव्रेण भक्तियोगेन मनो मय्यर्पितं स्थिरम् ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्य का परम कल्याण यही है कि तीव्र भक्ति से स्थिर मन मुझमें समर्पित हो जाए।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 25 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 26

प्रकृति, पुरुष और तत्त्वों का विवेचन

श्लोक 26.1

श्रीभगवानुवाच । अथ ते सम्प्रवक्ष्यामि तत्त्वानां लक्षणं पृथक् । यद्विदित्वा विमुच्येत पुरुषः प्राकृतैर्गुणैः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—अब तत्त्वों के पृथक् लक्षण बताऊँगा, जिन्हें जानकर जीव प्रकृति के गुणबन्धन से मुक्त होता है।

श्लोक 26.2

ज्ञानं निःश्रेयसार्थाय पुरुषस्यात्मदर्शनम् । यदाहुर्वर्णये तत्ते हृदयग्रन्थिभेदनम् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: परम कल्याण के लिए आत्मदर्शनरूप ज्ञान चाहिए; वही हृदयग्रन्थि काटने वाला विवेक समझाता हूँ।

श्लोक 26.3

अनादिरात्मा पुरुषो निर्गुणः प्रकृतेः परः । प्रत्यग्धामा स्वयञ्ज्योतिर्विश्वं येन समन्वितम् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा अनादि, निर्गुण, प्रकृति से परे और स्वयंप्रकाश चेतन है; उसी की उपस्थिति से अनुभव का जगत प्रकाशित है।

श्लोक 26.4

स एष प्रकृतिं सूक्ष्मां दैवीं गुणमयीं विभुः । यदृच्छयैवोपगतामभ्यपद्यत लीलया ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: परमपुरुष अपनी लीला से सामने आई सूक्ष्म, दैवी और गुणमयी प्रकृति को सृजन के लिए स्वीकार करते हैं।

श्लोक 26.5

गुणैर्विचित्राः सृजतीं सरूपाः प्रकृतिं प्रजाः । विलोक्य मुमुहे सद्यः स इह ज्ञानगूहया ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रकृति को गुणानुसार विविध प्रजाएँ रचते देखकर उससे सम्बद्ध जीव अपनी ज्ञानदृष्टि ढकने से मोहित होता है।

श्लोक 26.6

एवं पराभिध्यानेन कर्तृत्वं प्रकृतेः पुमान् । कर्मसु क्रियमाणेषु गुणैरात्मनि मन्यते ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: विषयचिन्तन से वह प्रकृति के गुणों द्वारा किए कर्मों का कर्तृत्व अपने ऊपर मान लेता है।

श्लोक 26.7

तदस्य संसृतिर्बन्धः पारतन्त्र्यं च तत्कृतम् । भवत्यकर्तुरीशस्य साक्षिणो निर्वृतात्मनः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसी अभिमान से असङ्ग, साक्षी और आनन्दस्वरूप जीव को संसारबन्धन तथा पराधीनता का अनुभव होता है।

श्लोक 26.8

कार्यकारणकर्तृत्वे कारणं प्रकृतिं विदुः । भोक्तृत्वे सुखदुःखानां पुरुषं प्रकृतेः परम् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: देह, इन्द्रिय और क्रियाओं के कार्यकारण में प्रकृति निमित्त है; सुख-दुःख का अनुभव चेतन पुरुष करता है।

श्लोक 26.9

देवहूतिरुवाच । प्रकृतेः पुरुषस्यापि लक्षणं पुरुषोत्तम । ब्रूहि कारणयोरस्य सदसच्च यदात्मकम् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवहूति बोलीं—हे पुरुषोत्तम, कार्यकारणात्मक जगत से जुड़े प्रकृति और पुरुष के अलग-अलग लक्षण बताइए।

श्लोक 26.10

श्रीभगवानुवाच । यत्तत्त्रिगुणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम् । प्रधानं प्रकृतिं प्राहुरविशेषं विशेषवत् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—अप्रकट, त्रिगुणमयी, कार्यकारण को सम्भावनारूप में धारण करने वाली समावस्था प्रधान प्रकृति कहलाती है।

श्लोक 26.11

पञ्चभिः पञ्चभिर्ब्रह्म चतुर्भिर्दशभिस्तथा । एतच्चतुर्विंशतिकं गणं प्राधानिकं विदुः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसके विस्तार में पाँच महाभूत, पाँच तन्मात्राएँ, दस इन्द्रियाँ और चार अन्तःकरण-वृत्तियाँ—चौबीस तत्त्व गिने जाते हैं।

श्लोक 26.12

महाभूतानि पञ्चैव भूरापोऽग्निर्मरुन्नभः । तन्मात्राणि च तावन्ति गन्धादीनि मतानि मे ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश पाँच महाभूत तथा गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द पाँच तन्मात्राएँ हैं।

श्लोक 26.13

इन्द्रियाणि दश श्रोत्रं त्वग् दृग्रसननासिकाः । वाक्करौ चरणौ मेढ्रं पायुर्दशम उच्यते ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: कान, त्वचा, आँख, जीभ, नाक और वाणी, हाथ, पाँव, जननेन्द्रिय, गुदा—दस इन्द्रियाँ हैं।

श्लोक 26.14

मनो बुद्धिरहङ्कारश्चित्तमित्यन्तरात्मकम् । चतुर्धा लक्ष्यते भेदो वृत्त्या लक्षणरूपया ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त अन्तःकरण के चार भेद हैं, जो अपनी-अपनी वृत्तियों से पहचाने जाते हैं।

श्लोक 26.15

एतावानेव सङ्ख्यातो ब्रह्मणः सगुणस्य ह । सन्निवेशो मया प्रोक्तो यः कालः पञ्चविंशकः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के सगुण विश्वविस्तार का यह तत्त्वसमूह है; काल को पच्चीसवाँ तत्त्व कहा गया है।

श्लोक 26.16

प्रभावं पौरुषं प्राहुः कालमेके यतो भयम् । अहङ्कारविमूढस्य कर्तुः प्रकृतिमीयुषः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कुछ ज्ञानी काल को परमपुरुष का प्रभाव कहते हैं, जिससे प्रकृतिआसक्त और कर्तृत्वाभिमानी जीव भय अनुभव करता है।

श्लोक 26.17

प्रकृतेर्गुणसाम्यस्य निर्विशेषस्य मानवि । चेष्टा यतः स भगवान् काल इत्युपलक्षितः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुणों की साम्यावस्था वाली प्रकृति में जिनकी प्रेरणा से चेष्टा आती है, वही भगवान काल नाम से समझे जाते हैं।

श्लोक 26.18

अन्तः पुरुषरूपेण कालरूपेण यो बहिः । समन्वेत्येष सत्त्वानां भगवानात्ममायया ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान अपनी माया से भीतर अन्तर्यामी पुरुष और बाहर काल के रूप में जीवों की व्यवस्था करते हैं।

श्लोक 26.19

दैवात्क्षुभितधर्मिण्यां स्वस्यां योनौ परः पुमान् आधत्त वीर्यं सासूत महत्तत्त्वं हिरण्मयम् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: परमपुरुष ने दैवी प्रेरणा से क्षुब्ध अपनी प्रकृति में सृजनशक्ति रखी; उससे तेजोमय महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ।

श्लोक 26.20

विश्वमात्मगतं व्यञ्जन् कूटस्थो जगदङ्कुरः । स्वतेजसापिबत्तीव्रमात्मप्रस्वापनं तमः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जगत के बीजरूप महत्तत्त्व ने अन्तर्निहित विश्व प्रकट किया और अपने प्रकाश से सुप्त अज्ञान का अन्धकार हटाया।

श्लोक 26.21

यत्तत्सत्त्वगुणं स्वच्छं शान्तं भगवतः पदम् । यदाहुर्वासुदेवाख्यं चित्तं तन्महदात्मकम् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: निर्मल, शान्त सत्त्व की अवस्था, जिसमें वासुदेव का प्रकाश हो, महत्तत्त्वात्मक शुद्ध चित्त कही गई है।

श्लोक 26.22

स्वच्छत्वमविकारित्वं शान्तत्वमिति चेतसः । वृत्तिभिर्लक्षणं प्रोक्तं यथापां प्रकृतिः परा ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुद्ध जल की तरह स्वच्छता, विकाररहितता और शान्ति चित्त की निर्मल वृत्ति के लक्षण हैं।

श्लोक 26.23

महत्तत्त्वाद्विकुर्वाणाद्भगवद्वीर्यसम्भवात् । क्रियाशक्तिरहङ्कारस्त्रिविधः समपद्यत ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवच्छक्ति से प्रकट महत्तत्त्व के परिवर्तन से त्रिविध क्रियाशक्तिरूप अहंकार उत्पन्न हुआ।

श्लोक 26.24

वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्च यतो भवः । मनसश्चेन्द्रियाणां च भूतानां महतामपि ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: सात्त्विक, राजस और तामस अहंकार से मन, इन्द्रियाँ और महाभूतों का विस्तार होता है।

श्लोक 26.25

सहस्रशिरसं साक्षाद्यमनन्तं प्रचक्षते । सङ्कर्षणाख्यं पुरुषं भूतेन्द्रियमनोमयम् ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: भूत, इन्द्रिय और मन के आश्रय की इसी शक्ति का अधिष्ठाता सहस्रशीर्ष अनन्त अथवा सङ्कर्षण कहलाता है।

श्लोक 26.26

कर्तृत्वं करणत्वं च कार्यत्वं चेति लक्षणम् । शान्तघोरविमूढत्वमिति वा स्यादहङ्कृतेः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: अहंकार में कर्ता, करण और कार्य की भावना तथा शान्त, उग्र और मूढ़ वृत्तियों के भेद दिखाई देते हैं।

श्लोक 26.27

वैकारिकाद्विकुर्वाणान्मनस्तत्त्वमजायत । यत्सङ्कल्पविकल्पाभ्यां वर्तते कामसम्भवः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: सात्त्विक अहंकार से मन प्रकट हुआ; उसके संकल्प-विकल्प से कामना का जन्म होता है।

श्लोक 26.28

यद्विदुर्ह्यनिरुद्धाख्यं हृषीकाणामधीश्वरम् । शारदेन्दीवरश्यामं संराध्यं योगिभिः शनैः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मन के अधिष्ठाता अनिरुद्ध हैं; योगी शरद्कालीन नीलकमल जैसे उनके स्वरूप का शान्तचित्त से ध्यान करते हैं।

श्लोक 26.29

तैजसात्तु विकुर्वाणाद्बुद्धितत्त्वमभूत्सति । द्रव्यस्फुरणविज्ञानमिन्द्रियाणामनुग्रहः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजस अहंकार से बुद्धि उत्पन्न हुई, जो विषयों का बोध और इन्द्रियों के अनुभव का निश्चय कराती है।

श्लोक 26.30

संशयोऽथ विपर्यासो निश्चयः स्मृतिरेव च । स्वाप इत्युच्यते बुद्धेर्लक्षणं वृत्तितः पृथक् ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: संशय, विपरीतज्ञान, निश्चय, स्मृति और निद्रा बुद्धि की भिन्न-भिन्न वृत्तियाँ हैं।

श्लोक 26.31

तैजसानीन्द्रियाण्येव क्रियाज्ञानविभागशः । प्राणस्य हि क्रियाशक्तिर्बुद्धेर्विज्ञानशक्तिता ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजस अहंकार से ज्ञान और कर्मेन्द्रियाँ भी हुईं; क्रियाशक्ति प्राण की और विशेषज्ञान की शक्ति बुद्धि की है।

श्लोक 26.32

तामसाच्च विकुर्वाणाद्भगवद्वीर्यचोदितात् । शब्दमात्रमभूत्तस्मान्नभः श्रोत्रं तु शब्दगम् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवच्छक्ति से प्रेरित तामस अहंकार से शब्दतन्मात्रा, उससे आकाश और शब्द ग्रहण करने वाला श्रवण प्रकट हुआ।

श्लोक 26.33

अर्थाश्रयत्वं शब्दस्य द्रष्टुर्लिङ्गत्वमेव च । तन्मात्रत्वं च नभसो लक्षणं कवयो विदुः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: शब्द अर्थ प्रकट करता, वक्ता का संकेत देता और आकाश का सूक्ष्म गुण है—ज्ञानी उसके ये लक्षण बताते हैं।

श्लोक 26.34

भूतानां छिद्रदातृत्वं बहिरन्तरमेव च । प्राणेन्द्रियात्मधिष्ण्यत्वं नभसो वृत्तिलक्षणम् ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: भीतर-बाहर स्थान देना तथा प्राण, इन्द्रिय और मन की गतिविधियों का आधार होना आकाश का कार्य है।

श्लोक 26.35

नभसः शब्दतन्मात्रात्कालगत्या विकुर्वतः । स्पर्शोऽभवत्ततो वायुस्त्वक्स्पर्शस्य च सङ्ग्रहः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: कालप्रेरित शब्दगुणयुक्त आकाश से स्पर्श, उससे वायु और स्पर्श ग्रहण करने वाली त्वचा प्रकट हुई।

श्लोक 26.36

मृदुत्वं कठिनत्वं च शैत्यमुष्णत्वमेव च । एतत्स्पर्शस्य स्पर्शत्वं तन्मात्रत्वं नभस्वतः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कोमलता, कठोरता, शीतलता और उष्णता स्पर्श के भेद हैं; स्पर्श वायु का सूक्ष्म गुण है।

श्लोक 26.37

चालनं व्यूहनं प्राप्तिर्नेतृत्वं द्रव्यशब्दयोः । सर्वेन्द्रियाणामात्मत्वं वायोः कर्माभिलक्षणम् ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: चलाना, एकत्र करना, मिलाना, पदार्थ-शब्द पहुँचाना और इन्द्रियों की क्रियाओं को आधार देना वायु के कार्य हैं।

श्लोक 26.38

वायोश्च स्पर्शतन्मात्राद्रूपं दैवेरितादभूत् । समुत्थितं ततस्तेजश्चक्षू रूपोपलम्भनम् ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: दैवी प्रेरित स्पर्शगुणयुक्त वायु से रूपतन्मात्रा, उससे अग्नितत्त्व और रूप ग्रहण करने वाली दृष्टि प्रकट हुई।

श्लोक 26.39

द्रव्याकृतित्वं गुणता व्यक्तिसंस्थात्वमेव च । तेजस्त्वं तेजसः साध्वि रूपमात्रस्य वृत्तयः ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: पदार्थ का आकार, आकारानुसार विशेषता, विस्तार और दीप्ति रूप के द्वारा व्यक्त होते हैं।

श्लोक 26.40

द्योतनं पचनं पानमदनं हिममर्दनम् । तेजसो वृत्तयस्त्वेताः शोषणं क्षुत्तृडेव च ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रकाश, पकाना, भक्षण-पान में सहयोग, शीत हटाना, सुखाना और भूख-प्यास उत्पन्न करना अग्नितत्त्व के कार्य बताए हैं।

श्लोक 26.41

रूपमात्राद्विकुर्वाणात्तेजसो दैवचोदितात् । रसमात्रमभूत्तस्मादम्भो जिह्वा रसग्रहः ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: दैवी प्रेरणा से रूपगुणयुक्त अग्नि के परिवर्तन से रस, उससे जल और रस ग्रहण करने वाली जीभ प्रकट हुई।

श्लोक 26.42

कषायो मधुरस्तिक्तः कट्वम्ल इति नैकधा । भौतिकानां विकारेण रस एको विभिद्यते ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: पदार्थों के भेद से एक रसशक्ति कसैले, मीठे, कड़वे, तीखे और खट्टे आदि स्वादों में व्यक्त होती है।

श्लोक 26.43

क्लेदनं पिण्डनं तृप्तिः प्राणनाप्यायनोन्दनम् । तापापनोदो भूयस्त्वमम्भसो वृत्तयस्त्विमाः ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: भिगोना, जोड़ना, तृप्त करना, जीवन देना, पोषण, शीतलता और उपलब्धता जल के कार्य हैं।

श्लोक 26.44

रसमात्राद्विकुर्वाणादम्भसो दैवचोदितात् । गन्धमात्रमभूत्तस्मात्पृथ्वी घ्राणस्तु गन्धगः ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: रसगुणयुक्त जल के दैवी प्रेरित परिवर्तन से गन्ध, उससे पृथ्वी और गन्ध ग्रहण करने वाली नासिका प्रकट हुई।

श्लोक 26.45

करम्भपूतिसौरभ्यशान्तोग्राम्लादिभिः पृथक् । द्रव्यावयववैषम्याद्गन्ध एको विभिद्यते ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: पदार्थों के संघटनभेद से गन्ध मिली-जुली, सड़ी, सुगन्धित, मन्द, तीखी और खट्टी आदि होती है।

श्लोक 26.46

भावनं ब्रह्मणः स्थानं धारणं सद्विशेषणम् । सर्वसत्त्वगुणोद्भेदः पृथिवीवृत्तिलक्षणम् ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: रूपनिर्माण, निवास, धारण, वस्तुओं की पहचान और जीवों के विविध गुणों की अभिव्यक्ति पृथ्वी के कार्य हैं।

श्लोक 26.47

नभोगुणविशेषोऽर्थो यस्य तच्छ्रोत्रमुच्यते । वायोर्गुणविशेषोऽर्थो यस्य तत्स्पर्शनं विदुः ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: आकाश के विशिष्ट शब्दगुण को ग्रहण करने वाली इन्द्रिय कान और वायु के स्पर्शगुण को ग्रहण करने वाली त्वचा है।

श्लोक 26.48

तेजोगुणविशेषोऽर्थो यस्य तच्चक्षुरुच्यते । अम्भोगुणविशेषोऽर्थो यस्य तद्रसनं विदुः । भूमेर्गुणविशेषोऽर्थो यस्य स घ्राण उच्यते ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: अग्नि का रूपगुण आँख, जल का रसगुण जीभ और पृथ्वी का गन्धगुण नासिका ग्रहण करती है।

श्लोक 26.49

परस्य दृश्यते धर्मो ह्यपरस्मिन् समन्वयात् । अतो विशेषो भावानां भूमावेवोपलक्ष्यते ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: बाद के तत्त्व में पहले के गुण भी सम्मिलित हैं; इसलिए पृथ्वी में पाँचों विषयगुणों का अनुभव होता है।

श्लोक 26.50

एतान्यसंहत्य यदा महदादीनि सप्त वै । कालकर्मगुणोपेतो जगदादिरुपाविशत् ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब महत्तत्त्व आदि सात तत्त्व मिलकर कार्य नहीं कर सके, तब भगवान ने काल, कर्म और गुणों सहित उनमें प्रवेश किया।

श्लोक 26.51

ततस्तेनानुविद्धेभ्यो युक्तेभ्योऽण्डमचेतनम् । उत्थितं पुरुषो यस्मादुदतिष्ठदसौ विराट् ॥ ५१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके प्रवेश से तत्त्व संयुक्त हुए और अचेतन ब्रह्माण्ड बना, जिसमें विराट पुरुष प्रकट हुए।

श्लोक 26.52

एतदण्डं विशेषाख्यं क्रमवृद्धैर्दशोत्तरैः । तोयादिभिः परिवृतं प्रधानेनावृतैर्बहिः । यत्र लोकवितानोऽयं रूपं भगवतो हरेः ॥ ५२॥

सरल हिंदी भावार्थ: दस-दस गुने जल आदि आवरणों और बाहरी प्रधान प्रकृति से घिरा यह ब्रह्माण्ड हरि का विश्वरूप है।

श्लोक 26.53

हिरण्मयादण्डकोशादुत्थाय सलिलेशयात् । तमाविश्य महादेवो बहुधा निर्बिभेद खम् ॥ ५३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जल में स्थित तेजोमय ब्रह्माण्ड में प्रवेश करके परमपुरुष ने विराट में अनेक इन्द्रियस्थानों को प्रकट किया।

श्लोक 26.54

निरभिद्यतास्य प्रथमं मुखं वाणी ततोऽभवत् । वाण्या वह्निरथो नासे प्राणोऽतो घ्राण एतयोः ॥ ५४॥

सरल हिंदी भावार्थ: पहले मुख, उससे वाणी और अग्नि; फिर नासिकाएँ, प्राण तथा घ्राण की शक्ति प्रकट हुई।

श्लोक 26.55

घ्राणाद्वायुरभिद्येतामक्षिणी चक्षुरेतयोः । तस्मात्सूर्यो व्यभिद्येतां कर्णौ श्रोत्रं ततो दिशः ॥ ५५॥

सरल हिंदी भावार्थ: घ्राण से वायु, फिर नेत्र-दृष्टि-सूर्य और कान-श्रवण-दिशाओं का सम्बन्ध प्रकट हुआ।

श्लोक 26.56

निर्बिभेद विराजस्त्वग्रोमश्मश्र्वादयस्ततः । तत ओषधयश्चासन् शिश्नं निर्बिभिदे ततः ॥ ५६॥

सरल हिंदी भावार्थ: विराट की त्वचा से रोम और उनसे वनस्पतियाँ हुईं; फिर जननेन्द्रिय का स्थान खुला।

श्लोक 26.57

रेतस्तस्मादाप आसन् निरभिद्यत वै गुदम् । गुदादपानोऽपानाच्च मृत्युर्लोकभयङ्करः ॥ ५७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उससे प्रजननशक्ति और जल का सम्बन्ध तथा गुदा से अपान और भयकारी मृत्यु की व्यवस्था प्रकट हुई।

श्लोक 26.58

हस्तौ च निरभिद्येतां बलं ताभ्यां ततः स्वराट् । पादौ च निरभिद्येतां गतिस्ताभ्यां ततो हरिः ॥ ५८॥

सरल हिंदी भावार्थ: हाथों से बल और इन्द्र का तथा पाँवों से गति और विष्णु का सम्बन्ध प्रकट हुआ।

श्लोक 26.59

नाड्योऽस्य निरभिद्यन्त ताभ्यो लोहितमाभृतम् । नद्यस्ततः समभवन्नुदरं निरभिद्यत ॥ ५९॥

सरल हिंदी भावार्थ: नाड़ियों से रक्त और नदियों का सम्बन्ध बना; फिर उदर का स्थान खुला।

श्लोक 26.60

क्षुत्पिपासे ततः स्यातां समुद्रस्त्वेतयोरभूत् । अथास्य हृदयं भिन्नं हृदयान्मन उत्थितम् ॥ ६०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उदर से भूख-प्यास और समुद्र का सम्बन्ध हुआ; हृदय से मन प्रकट हुआ।

श्लोक 26.61

मनसश्चन्द्रमा जातो बुद्धिर्बुद्धेर्गिरां पतिः । अहङ्कारस्ततो रुद्रश्चित्तं चैत्यस्ततोऽभवत् ॥ ६१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मन से चन्द्रमा, बुद्धि से ब्रह्मा, अहंकार से रुद्र और चित्त से अन्तर्यामी के अधिष्ठान का सम्बन्ध बताया गया।

श्लोक 26.62

एते ह्यभ्युत्थिता देवा नैवास्योत्थापनेऽशकन् । पुनराविविशुः खानि तमुत्थापयितुं क्रमात् ॥ ६२॥

सरल हिंदी भावार्थ: ये देवशक्तियाँ मिलकर भी विराट को सक्रिय न कर सकीं; उन्होंने क्रम से उसके स्थानों में प्रवेश किया।

श्लोक 26.63

वह्निर्वाचा मुखं भेजे नोदतिष्ठत्तदा विराट् । घ्राणेन नासिके वायुर्नोदतिष्ठत्तदा विराट् ॥ ६३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अग्नि ने वाणी सहित मुख और वायु ने घ्राण सहित नासिकाओं में प्रवेश किया, फिर भी विराट नहीं उठा।

श्लोक 26.64

अक्षिणी चक्षुषाऽऽदित्यो नोदतिष्ठत्तदा विराट् । श्रोत्रेण कर्णौ च दिशो नोदतिष्ठत्तदा विराट् ॥ ६४॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूर्य दृष्टि सहित नेत्रों और दिशाएँ श्रवण सहित कानों में आईं, फिर भी विराट नहीं उठा।

श्लोक 26.65

त्वचं रोमभिरोषध्यो नोदतिष्ठत्तदा विराट् । रेतसा शिश्नमापस्तु नोदतिष्ठत्तदा विराट् ॥ ६५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वनस्पतियाँ रोमों सहित त्वचा और जल प्रजननशक्ति सहित जननेन्द्रिय में आया, फिर भी विराट नहीं उठा।

श्लोक 26.66

गुदं मृत्युरपानेन नोदतिष्ठत्तदा विराट् । हस्ताविन्द्रो बलेनैव नोदतिष्ठत्तदा विराट् ॥ ६६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मृत्यु अपान सहित गुदा और इन्द्र बल सहित हाथों में आए, फिर भी विराट नहीं उठा।

श्लोक 26.67

विष्णुर्गत्यैव चरणौ नोदतिष्ठत्तदा विराट् । नाडीर्नद्यो लोहितेन नोदतिष्ठत्तदा विराट् ॥ ६७॥

सरल हिंदी भावार्थ: विष्णु की गतिशक्ति चरणों और नदियाँ रक्त सहित नाड़ियों में आईं, फिर भी विराट नहीं उठा।

श्लोक 26.68

क्षुत्तृड्भ्यामुदरं सिन्धुर्नोदतिष्ठत्तदा विराट् । हृदयं मनसा चन्द्रो नोदतिष्ठत्तदा विराट् ॥ ६८॥

सरल हिंदी भावार्थ: समुद्र भूख-प्यास सहित उदर और चन्द्रमा मन सहित हृदय में आए, फिर भी विराट नहीं उठा।

श्लोक 26.69

बुद्ध्या ब्रह्मापि हृदयं नोदतिष्ठत्तदा विराट् । रुद्रोऽभिमत्या हृदयं नोदतिष्ठत्तदा विराट् ॥ ६९॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा बुद्धि और रुद्र अहंभाव सहित हृदय में आए, फिर भी विराट नहीं उठा।

श्लोक 26.70

चित्तेन हृदयं चैत्यः क्षेत्रज्ञः प्राविशद्यदा । विराट् तदैव पुरुषः सलिलादुदतिष्ठत ॥ ७०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब अन्तर्यामी क्षेत्रज्ञ चित्त सहित हृदय में प्रविष्ट हुए, तभी विराट पुरुष जल से उठकर सक्रिय हुआ।

श्लोक 26.71

यथा प्रसुप्तं पुरुषं प्राणेन्द्रियमनोधियः । प्रभवन्ति विना येन नोत्थापयितुमोजसा ॥ ७१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे चेतन आत्मा की उपस्थिति बिना प्राण, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि मिलकर भी सोए व्यक्ति को नहीं जगा सकते—

श्लोक 26.72

तमस्मिन् प्रत्यगात्मानं धिया योगप्रवृत्तया । भक्त्या विरक्त्या ज्ञानेन विविच्यात्मनि चिन्तयेत् ॥ ७२॥

सरल हिंदी भावार्थ: वैसे ही भक्ति, वैराग्य और ज्ञानयुक्त योगबुद्धि से विवेक करके उस अन्तरात्मा का अपने भीतर चिन्तन करना चाहिए।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 26 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 27

असङ्ग आत्मा और प्रकृतिबन्धन से मुक्ति

श्लोक 27.1

श्रीभगवानुवाच । प्रकृतिस्थोऽपि पुरुषो नाज्यते प्राकृतैर्गुणैः । अविकारादकर्तृत्वान्निर्गुणत्वाज्जलार्कवत् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—प्रकृति में स्थित होकर भी आत्मा निर्विकार, अकर्ता और निर्गुण होने से जल में दिखते सूर्य की तरह असङ्ग है।

श्लोक 27.2

स एष यर्हि प्रकृतेर्गुणेष्वभिविषज्जते । अहङ्क्रियाविमूढात्मा कर्तास्मीत्यभिमन्यते ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रकृति के गुणों में आसक्ति होने पर अहंकार से मोहित जीव अपने को कर्ता मानता है।

श्लोक 27.3

तेन संसारपदवीमवशोऽभ्येत्यनिर्वृतः । प्रासङ्गिकैः कर्मदोषैः सदसन्मिश्रयोनिषु ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसी से कर्मदोषों के वश होकर वह अच्छी, बुरी और मिश्र योनियों में जन्म लेकर असन्तुष्ट भटकता है।

श्लोक 27.4

अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते । ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वप्न की अनर्थप्रतीति जैसी विषयासक्ति होने पर बन्धन का स्वतंत्र सत्य न होते हुए भी संसारानुभव नहीं मिटता।

श्लोक 27.5

अत एव शनैश्चित्तं प्रसक्तमसतां पथि । भक्तियोगेन तीव्रेण विरक्त्या च नयेद्वशम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए विषयों में आसक्त मन को तीव्र भक्तियोग और वैराग्य से धीरे-धीरे वश में लाना चाहिए।

श्लोक 27.6

यमादिभिर्योगपथैरभ्यसन् श्रद्धयान्वितः । मयि भावेन सत्येन मत्कथाश्रवणेन च ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रद्धा से यमादि योगाङ्गों का अभ्यास, मुझमें सच्चा प्रेम और मेरी कथा का श्रवण करो।

श्लोक 27.7

सर्वभूतसमत्वेन निर्वैरेणाप्रसङ्गतः । ब्रह्मचर्येण मौनेन स्वधर्मेण बलीयसा ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: सब जीवों में समता, निर्वैरता, अनासक्ति, ब्रह्मचर्य, वाणीसंयम और दृढ़ स्वधर्म अपनाओ।

श्लोक 27.8

यदृच्छयोपलब्धेन सन्तुष्टो मितभुङ्मुनिः । विविक्तशरणः शान्तो मैत्रः करुण आत्मवान् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: सहज उपलब्ध साधनों में सन्तुष्ट, मिताहारी, एकान्तप्रिय, शान्त, मैत्रीपूर्ण, दयालु और संयमी बनो।

श्लोक 27.9

सानुबन्धे च देहेऽस्मिन्नकुर्वन्नसदाग्रहम् । ज्ञानेन दृष्टतत्त्वेन प्रकृतेः पुरुषस्य च ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रकृति और पुरुष का यथार्थ ज्ञान पाकर शरीर तथा उससे जुड़े सम्बन्धों में असत्य हठपूर्ण ममता न करो।

श्लोक 27.10

निवृत्तबुद्ध्यवस्थानो दूरीभूतान्यदर्शनः । उपलभ्यात्मनाऽऽत्मानं चक्षुषेवार्कमात्मदृक् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: विषयभेद से बुद्धि हटाकर आत्मविवेक द्वारा अपने को पहचानो, जैसे नेत्र से सूर्य का दर्शन होता है।

श्लोक 27.11

मुक्तलिङ्गं सदाभासमसति प्रतिपद्यते । सतो बन्धुमसच्चक्षुः सर्वानुस्यूतमद्वयम् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: तब जीव उपाधियों से परे, सबका आश्रय, साक्षी और सर्वव्यापी अद्वैत परमात्मा का अनुभव करता है।

श्लोक 27.12

यथा जलस्थ आभासः स्थलस्थेनावदृश्यते । स्वाभासेन तथा सूर्यो जलस्थेन दिविस्थितः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे जल के प्रतिबिम्ब से धरती पर प्रकाश पड़ता और उसके सहारे आकाशस्थ सूर्य का पता चलता है—

श्लोक 27.13

एवं त्रिवृदहङ्कारो भूतेन्द्रियमनोमयैः । स्वाभासैर्लक्षितोऽनेन सदाभासेन सत्यदृक् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: वैसे देह, इन्द्रिय और मन की वृत्तियों से अहंकार तथा उनके साक्षी चेतन के अस्तित्व का विवेक होता है।

श्लोक 27.14

भूतसूक्ष्मेन्द्रियमनोबुद्ध्यादिष्विह निद्रया । लीनेष्वसति यस्तत्र विनिद्रो निरहङ्क्रियः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: निद्रा में भूततत्त्व, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि की क्रियाएँ लीन हों, तब भी अहंकार से परे साक्षी चेतन बना रहता है।

श्लोक 27.15

मन्यमानस्तदाऽऽत्मानमनष्टो नष्टवन्मृषा । नष्टेऽहङ्करणे द्रष्टा नष्टवित्त इवातुरः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अहंवृत्ति शान्त होने पर भी आत्मा नष्ट नहीं होता; अज्ञान से व्यक्ति धन खोए दुखी मनुष्य की तरह अपने को खोया मानता है।

श्लोक 27.16

एवं प्रत्यवमृश्यासावात्मानं प्रतिपद्यते । साहङ्कारस्य द्रव्यस्य योऽवस्थानमनुग्रहः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसका विचार करके वह उस आत्मा को पहचानता है जिसके आश्रय से अहंकार सहित समस्त देहव्यवस्था टिकी है।

श्लोक 27.17

देवहूतिरुवाच । पुरुषं प्रकृतिर्ब्रह्मन् न विमुञ्चति कर्हिचित् । अन्योन्यापाश्रयत्वाच्च नित्यत्वादनयोः प्रभो ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवहूति बोलीं—प्रकृति और पुरुष दोनों अनादि तथा परस्पर सम्बद्ध हैं; प्रकृति जीव का साथ कैसे छोड़ेगी?

श्लोक 27.18

यथा गन्धस्य भूमेश्च न भावो व्यतिरेकतः । अपां रसस्य च यथा तथा बुद्धेः परस्य च ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे पृथ्वी-गन्ध और जल-रस अलग नहीं दिखाई देते, वैसे प्रकृति और चेतन का सम्बन्ध लगता है।

श्लोक 27.19

अकर्तुः कर्मबन्धोऽयं पुरुषस्य यदाश्रयः । गुणेषु सत्सु प्रकृतेः कैवल्यं तेष्वतः कथम् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: अकर्ता जीव का कर्मबन्धन प्रकृति के आश्रय से है; उसके गुण बने रहते हुए कैवल्यमुक्ति कैसे होगी?

श्लोक 27.20

क्वचित्तत्त्वावमर्शेन निवृत्तं भयमुल्बणम् । अनिवृत्तनिमित्तत्वात्पुनः प्रत्यवतिष्ठते ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: कभी तत्त्वविचार से भय दब जाए, किन्तु मूल कारण न मिटे तो वह फिर लौट आता है।

श्लोक 27.21

श्रीभगवानुवाच । अनिमित्तनिमित्तेन स्वधर्मेणामलात्मना । तीव्रया मयि भक्त्या च श्रुतसम्भृतया चिरम् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—निष्काम स्वधर्म, निर्मल मन और दीर्घ श्रवण से पुष्ट तीव्र भक्ति द्वारा—

श्लोक 27.22

ज्ञानेन दृष्टतत्त्वेन वैराग्येण बलीयसा । तपोयुक्तेन योगेन तीव्रेणात्मसमाधिना ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: तत्त्वदर्शी ज्ञान, प्रबल वैराग्य, तपयुक्त योग और गहन आत्मसमाधि के अभ्यास से—

श्लोक 27.23

प्रकृतिः पुरुषस्येह दह्यमाना त्वहर्निशम् । तिरोभवित्री शनकैरग्नेर्योनिरिवारणिः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रकृति का बन्धन धीरे-धीरे वैसे समाप्त होता है जैसे अरणिकाष्ठ से निकली अग्नि उसी काष्ठ को जला देती है।

श्लोक 27.24

भुक्तभोगा परित्यक्ता दृष्टदोषा च नित्यशः । नेश्वरस्याशुभं धत्ते स्वे महिम्नि स्थितस्य च ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिसका अनुभव करके दोष समझे और आसक्ति छोड़ी गई हो, वह प्रकृति स्वमहिमा में स्थित जीव को फिर बाँध नहीं पाती।

श्लोक 27.25

यथा ह्यप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापो बह्वनर्थभृत् । स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अजाग्रत को स्वप्न बड़े संकट देता है; जाग जाने पर वही स्वप्न उसे सत्य मानकर मोहित नहीं कर सकता।

श्लोक 27.26

एवं विदिततत्त्वस्य प्रकृतिर्मयि मानसम् । युञ्जतो नापकुरुत आत्मारामस्य कर्हिचित् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसी तरह तत्त्वज्ञानी और मुझमें मन लगाने वाले आत्माराम भक्त को प्रकृति बाँध नहीं पाती।

श्लोक 27.27

यदैवमध्यात्मरतः कालेन बहुजन्मना । सर्वत्र जातवैराग्य आब्रह्मभुवनान्मुनिः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: बहुजन्मों की साधना से अध्यात्म में रमे मुनि को ब्रह्मलोक तक के विषयों से वैराग्य होता है।

श्लोक 27.28

मद्भक्तः प्रतिबुद्धार्थो मत्प्रसादेन भूयसा । निःश्रेयसं स्वसंस्थानं कैवल्याख्यं मदाश्रयम् ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जाग्रत विवेक वाला मेरा भक्त मेरी विशेष कृपा से मेरे आश्रित कैवल्यरूप परम कल्याण को पाता है।

श्लोक 27.29

प्राप्नोतीहाञ्जसा धीरः स्वदृशाच्छिन्नसंशयः । यद्गत्वा न निवर्तेत योगी लिङ्गाद्विनिर्गमे ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: आत्मानुभव से संशयरहित योगी सूक्ष्म देह का बन्धन छूटने पर उस स्थिति को प्राप्त होता है जहाँ से पुनरागमन नहीं।

श्लोक 27.30

यदा न योगोपचितासु चेतो मायासु सिद्धस्य विषज्जतेऽङ्ग । अनन्यहेतुष्वथ मे गतिः स्या- दात्यन्तिकी यत्र न मृत्युहासः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: योग से प्राप्त सिद्धियों में भी मन न अटके तो अनन्य आश्रय मुझमें परम गति मिलती है, जहाँ मृत्यु का अधिकार नहीं।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 27 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 28

अष्टाङ्गयोग और भगवान के स्वरूप का ध्यान

श्लोक 28.1

श्रीभगवानुवाच । योगस्य लक्षणं वक्ष्ये सबीजस्य नृपात्मजे । मनो येनैव विधिना प्रसन्नं याति सत्पथम् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—हे राजकन्या, अब आलम्बन सहित योग बताता हूँ, जिससे मन प्रसन्न होकर सत्य के मार्ग पर स्थिर होता है।

श्लोक 28.2

स्वधर्माचरणं शक्त्या विधर्माच्च निवर्तनम् । दैवाल्लब्धेन सन्तोष आत्मविच्चरणार्चनम् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: यथाशक्ति स्वधर्मपालन, अधर्म से निवृत्ति, दैवप्राप्त साधनों में सन्तोष और आत्मज्ञानी संतों की सेवा इसके आधार हैं।

श्लोक 28.3

ग्राम्यधर्मनिवृत्तिश्च मोक्षधर्मरतिस्तथा । मितमेध्यादनं शश्वद्विविक्तक्षेमसेवनम् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: लौकिक भोगासक्ति घटाना, मोक्षधर्म में रुचि, नियमित शुद्ध मिताहार और शान्त एकान्त का सेवन करो।

श्लोक 28.4

अहिंसा सत्यमस्तेयं यावदर्थपरिग्रहः । ब्रह्मचर्यं तपः शौचं स्वाध्यायः पुरुषार्चनम् ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, आवश्यकतानुसार संग्रह, ब्रह्मचर्य, तप, पवित्रता, स्वाध्याय और भगवान की पूजा अपनाओ।

श्लोक 28.5

मौनं सदासनजयः स्थैर्यं प्राणजयः शनैः । प्रत्याहारश्चेन्द्रियाणां विषयान्मनसा हृदि ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वाणीसंयम, स्थिर आसन, धैर्य, क्रमशः प्राणसंयम और इन्द्रियों को विषयों से हटाकर हृदय में स्थिर करना योगाङ्ग हैं।

श्लोक 28.6

स्वधिष्ण्यानामेकदेशे मनसा प्राणधारणम् । वैकुण्ठलीलाभिध्यानं समाधानं तथाऽऽत्मनः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मन और प्राण को उपयुक्त आलम्बन में धारित करके भगवान की लीलाओं का ध्यान और चित्त की एकाग्रता करो।

श्लोक 28.7

एतैरन्यैश्च पथिभिर्मनो दुष्टमसत्पथम् । बुद्ध्या युञ्जीत शनकैर्जितप्राणो ह्यतन्द्रितः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन और अन्य उचित साधनों से सजग साधक विषयमार्ग में भटके मन को बुद्धिपूर्वक धीरे-धीरे नियन्त्रित करे।

श्लोक 28.8

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य विजितासन आसनम् । तस्मिन् स्वस्ति समासीन ऋजुकायः समभ्यसेत् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: शुद्ध स्थान पर स्थिर आसन लगाकर सुखपूर्वक सीधा बैठना और अभ्यास करना बताया गया है।

श्लोक 28.9

प्राणस्य शोधयेन्मार्गं पूरकुम्भकरेचकैः । प्रतिकूलेन वा चित्तं यथा स्थिरमचञ्चलम् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: योगपरम्परा में पूरक, कुम्भक और रेचक द्वारा प्राणमार्ग का शोधन तथा चित्तस्थिरता का अभ्यास वर्णित है।

श्लोक 28.10

मनोऽचिरात्स्याद्विरजं जितश्वासस्य योगिनः । वाय्वग्निभ्यां यथा लोहं ध्मातं त्यजति वै मलम् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे वायु और अग्नि में तपाया धातु मल छोड़ता है, वैसे संयमित श्वास वाला योगी मन की अशुद्धि हटाता है।

श्लोक 28.11

प्राणायामैर्दहेद्दोषान् धारणाभिश्च किल्बिषान् । प्रत्याहारेण संसर्गान् ध्यानेनानीश्वरान् गुणान् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्राणायाम से दोष, धारणा से पापवृत्ति, प्रत्याहार से विषयसङ्ग और ध्यान से गुणों की अधीनता घटाने का वर्णन है।

श्लोक 28.12

यदा मनः स्वं विरजं योगेन सुसमाहितम् । काष्ठां भगवतो ध्यायेत्स्वनासाग्रावलोकनः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: योग से निर्मल और एकाग्र मन होने पर दृष्टि संयमित रखते हुए भगवान के स्वरूप का ध्यान करे।

श्लोक 28.13

प्रसन्नवदनाम्भोजं पद्मगर्भारुणेक्षणम् । नीलोत्पलदलश्यामं शङ्खचक्रगदाधरम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रसन्न कमलमुख, अरुण कमलनेत्र और नीलकमलवर्ण, शङ्ख-चक्र-गदाधारी भगवान को ध्यान में लाए।

श्लोक 28.14

लसत्पङ्कजकिञ्जल्कपीतकौशेयवाससम् । श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभामुक्तकन्धरम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे कमलकेसर जैसे पीले रेशमी वस्त्र पहने, वक्ष पर श्रीवत्स और कण्ठ में दीप्त कौस्तुभ धारण किए हैं।

श्लोक 28.15

मत्तद्विरेफकलया परीतं वनमालया । परार्ध्यहारवलयकिरीटाङ्गदनूपुरम् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुँजारते भौंरों वाली वनमाला, श्रेष्ठ हार, कङ्कण, मुकुट, बाजूबन्द और नूपुर उनकी शोभा हैं।

श्लोक 28.16

काञ्चीगुणोल्लसच्छ्रोणिं हृदयाम्भोजविष्टरम् । दर्शनीयतमं शान्तं मनोनयनवर्धनम् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कमर पर करधनी है और वे हृदयकमल पर विराजते हैं; उनका शान्त मनोहर रूप मन तथा नेत्रों को आनन्द देता है।

श्लोक 28.17

अपीच्यदर्शनं शश्वत्सर्वलोकनमस्कृतम् । सन्तं वयसि कैशोरे भृत्यानुग्रहकातरम् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: सदा किशोर, सब लोकों से वन्दित और भक्तों पर कृपा करने को उत्सुक उस सुन्दर रूप का स्मरण करे।

श्लोक 28.18

कीर्तन्यतीर्थयशसं पुण्यश्लोकयशस्करम् । ध्यायेद्देवं समग्राङ्गं यावन्न च्यवते मनः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिनका यश पवित्र करता और संतों को यश देता है, उनके समग्र अंगों का ध्यान करे, जब तक मन स्थिर न हो।

श्लोक 28.19

स्थितं व्रजन्तमासीनं शयानं वा गुहाशयम् । प्रेक्षणीयेहितं ध्यायेच्छुद्धभावेन चेतसा ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: हृदयवासी प्रभु को खड़े, चलते, बैठे या शयन करते हुए मनोहर लीला सहित शुद्धभाव से ध्यान करे।

श्लोक 28.20

तस्मिन् लब्धपदं चित्तं सर्वावयवसंस्थितम् । विलक्ष्यैकत्र संयुज्यादङ्गे भगवतो मुनिः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: समग्र रूप में मन टिक जाने पर साधक क्रम से भगवान के एक-एक अंग में चित्त एकाग्र करे।

श्लोक 28.21

सञ्चिन्तयेद्भगवतश्चरणारविन्दं वज्राङ्कुशध्वजसरोरुहलाञ्छनाढ्यम् । उत्तुङ्गरक्तविलसन्नखचक्रवाल- ज्योत्स्नाभिराहतमहद्धृदयान्धकारम् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: वज्र, अङ्कुश, ध्वज और कमलचिह्नों वाले चरणकमल का ध्यान करे, जिनकी नखज्योति हृदय का अज्ञानान्धकार मिटाती है।

श्लोक 28.22

यच्छौचनिःसृतसरित्प्रवरोदकेन तीर्थेन मूर्ध्न्यधिकृतेन शिवः शिवोऽभूत् । ध्यातुर्मनःशमलशैलनिसृष्टवज्रं ध्यायेच्चिरं भगवतश्चरणारविन्दम् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिनके चरणोदक की गंगा शिव के मस्तक पर सुशोभित है, उन चरणों को अज्ञानपर्वत तोड़ने वाले वज्र समान स्मरण करे।

श्लोक 28.23

जानुद्वयं जलजलोचनया जनन्या लक्ष्म्याखिलस्य सुरवन्दितया विधातुः । ऊर्वोर्निधाय करपल्लवरोचिषा यत् संलालितं हृदि विभोरभवस्य कुर्यात् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: लक्ष्मी द्वारा अपनी गोद में रखकर कोमल करों से सेवित भगवान के दोनों घुटनों का हृदय में ध्यान करे।

श्लोक 28.24

ऊरू सुपर्णभुजयोरधिशोभमाना- वोजोनिधी अतसिकाकुसुमावभासौ । व्यालम्बि पीतवरवाससि वर्तमान- काञ्चीकलापपरिरम्भिनितम्बबिम्बम् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: गरुड़ के कन्धों पर शोभित, अतसीपुष्पवर्ण और शक्ति के आधार ऊरुओं तथा पीताम्बर-करधनी से अलङ्कृत कटि का ध्यान करे।

श्लोक 28.25

नाभिह्रदं भुवनकोशगुहोदरस्थं यत्रात्मयोनिधिषणाखिललोकपद्मम् । व्यूढं हरिण्मणिवृषस्तनयोरमुष्य ध्यायेद्द्वयं विशदहारमयूखगौरम् ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: लोककमल और ब्रह्मा के उद्गमरूप नाभिसरोवर तथा हार की किरणों से आलोकित वक्षप्रदेश का स्मरण करे।

श्लोक 28.26

वक्षोऽधिवासमृषभस्य महाविभूतेः पुंसां मनोनयननिर्वृतिमादधानम् । कण्ठं च कौस्तुभमणेरधिभूषणार्थं कुर्यान्मनस्यखिललोकनमस्कृतस्य ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: लक्ष्मी के निवास वक्ष और कौस्तुभ को भी सुशोभित करने वाले कण्ठ का ध्यान करे, जो मन और नेत्रों को आनन्द देते हैं।

श्लोक 28.27

बाहूंश्च मन्दरगिरेः परिवर्तनेन निर्णिक्तबाहुवलयानधिलोकपालान् । सञ्चिन्तयेद्दशशतारमसह्यतेजः शङ्खं च तत्करसरोरुहराजहंसम् ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मन्दराचल मन्थन से शोभित भुजाओं, उनके आभूषणों, प्रचण्ड तेजस्वी चक्र और करकमल में श्वेत शङ्ख का ध्यान करे।

श्लोक 28.28

कौमोदकीं भगवतो दयितां स्मरेत दिग्धामरातिभटशोणितकर्दमेन । मालां मधुव्रतवरूथगिरोपघुष्टां चैत्यस्य तत्त्वममलं मणिमस्य कण्ठे ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: शत्रुओं का दमन करने वाली कौमोदकी गदा, भौंरों से गुँजारित माला और निर्मल जीवतत्त्वसूचक कौस्तुभ को स्मरण करे।

श्लोक 28.29

भृत्यानुकम्पितधियेह गृहीतमूर्तेः सञ्चिन्तयेद्भगवतो वदनारविन्दम् । यद्विस्फुरन्मकरकुण्डलवल्गितेन विद्योतितामलकपोलमुदारनासम् ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: भक्तों पर कृपा के लिए प्रकट मुखकमल का ध्यान करे, जिसके गाल मकरकुण्डलों से दीप्त और नासिका मनोहर है।

श्लोक 28.30

यच्छ्रीनिकेतमलिभिः परिसेव्यमानं भूत्या स्वया कुटिलकुन्तलवृन्दजुष्टम् । मीनद्वयाश्रयमधिक्षिपदब्जनेत्रं ध्यायेन्मनोमयमतन्द्रित उल्लसद्भ्रु ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: काले घुँघराले केश, सुन्दर भौंहें और कमलनेत्रों वाला लक्ष्मी का आश्रय मुख मन में सजगता से स्थापित करे।

श्लोक 28.31

तस्यावलोकमधिकं कृपयातिघोर- तापत्रयोपशमनाय निसृष्टमक्ष्णोः । स्निग्द्धस्मितानुगुणितं विपुलप्रसादं ध्यायेच्चिरं विपुलभावनया गुहायाम् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: तीनों ताप मिटाने के लिए करुणा से बहती, स्नेहमुस्कानयुक्त और परम प्रसन्न वह दृष्टि हृदय में बसाए।

श्लोक 28.32

हासं हरेरवनताखिललोकतीव्र- शोकाश्रुसागरविशोषणमत्युदारम् । सम्मोहनाय रचितं निजमाययास्य भ्रूमण्डलं मुनिकृते मकरध्वजस्य ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की उदार हँसी शरणागतों के शोकाश्रु सुखाती है; उनकी सुन्दर भौंहें कामदेव को भी मोहित करने वाली हैं।

श्लोक 28.33

ध्यानायनं प्रहसितं बहुलाधरोष्ठ- भासारुणायिततनुद्विजकुन्दपङ्क्ति । ध्यायेत्स्वदेहकुहरेऽवसितस्य विष्णोः भक्त्याऽऽर्द्रयार्पितमना न पृथग्दिदृक्षेत् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: हृदयवासी विष्णु की मुस्कान और अरुण अधरों से चमकती कुन्ददन्तपङ्क्ति का प्रेमपूर्वक ध्यान करे; अन्य विषय देखने की चाह छोड़ दे।

श्लोक 28.34

एवं हरौ भगवति प्रतिलब्धभावो भक्त्या द्रवद्धृदय उत्पुलकः प्रमोदात् । औत्कण्ठ्यबाष्पकलया मुहुरर्द्यमान- स्तच्चापि चित्तबडिशं शनकैर्वियुङ्क्ते ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसे ध्यान से हरिप्रेम जागता, हृदय पिघलता और रोमाञ्च-आँसू आते हैं; फिर साधक चित्त के सूक्ष्म आलम्बनबन्धन से भी ऊपर उठता है।

श्लोक 28.35

मुक्ताश्रयं यर्हि निर्विषयं विरक्तं निर्वाणमृच्छति मनः सहसा यथार्चिः । आत्मानमत्र पुरुषोऽव्यवधानमेक- मन्वीक्षते प्रतिनिवृत्तगुणप्रवाहः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: विषयरहित और विरक्त मन शान्त हो जाता है, जैसे ईंधन समाप्त होने पर ज्वाला; तब अखण्ड आत्मस्वरूप का अनुभव होता है।

श्लोक 28.36

सोऽप्येतया चरमया मनसो निवृत्त्या तस्मिन्महिम्न्यवसितः सुखदुःखबाह्ये । हेतुत्वमप्यसति कर्तरि दुःखयोर्यत् स्वात्मन् विधत्त उपलब्धपरात्मकाष्ठः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मन की परम निवृत्ति से सुख-दुःखातीत स्वरूप में स्थित साधक समझता है कि दुःख का कर्तृत्व आत्मा पर अज्ञान से आरोपित था।

श्लोक 28.37

देहं च तं न चरमः स्थितमुत्थितं वा सिद्धो विपश्यति यतोऽध्यगमत्स्वरूपम् । दैवादुपेतमथ दैववशादपेतं वासो यथा परिकृतं मदिरामदान्धः ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वरूपज्ञ सिद्ध शरीर की स्थितियों में पहले जैसी आसक्ति नहीं रखता; दैव से आए-जाते वस्त्र की तरह उसे देखता है।

श्लोक 28.38

देहोऽपि दैववशगः खलु कर्म यावत् स्वारम्भकं प्रतिसमीक्षत एव सासुः । तं स प्रपञ्चमधिरूढसमाधियोगः स्वाप्नं पुनर्न भजते प्रतिबुद्धवस्तुः ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रारब्ध कर्म रहने तक प्राणयुक्त शरीर चलता है; जाग्रत तत्त्वज्ञ उसकी स्वप्नसमान व्यवस्था को फिर अपना वास्तविक स्वरूप नहीं मानता।

श्लोक 28.39

यथा पुत्राच्च वित्ताच्च पृथङ्मर्त्यः प्रतीयते । अप्यात्मत्वेनाभिमताद्देहादेः पुरुषस्तथा ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे व्यक्ति पुत्र और धन से अलग है, वैसे अपना माने गए शरीर आदि से चेतन पुरुष पृथक् है।

श्लोक 28.40

यथोल्मुकाद्विस्फुलिङ्गाद्धूमाद्वापि स्वसम्भवात् । अप्यात्मत्वेनाभिमताद्यथाग्निः पृथगुल्मुकात् ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे अग्नि अपने से निकले धुएँ, चिनगारियों और जलती लकड़ी से भिन्न पहचानी जाती है—

श्लोक 28.41

भूतेन्द्रियान्तःकरणात्प्रधानाज्जीवसंज्ञितात् । आत्मा तथा पृथग् द्रष्टा भगवान् ब्रह्मसंज्ञितः ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: वैसे साक्षी आत्मा भूत, इन्द्रिय, अन्तःकरण और प्रकृति की उपाधियों से पृथक् है; परम आश्रय ब्रह्मस्वरूप भगवान हैं।

श्लोक 28.42

सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । ईक्षेतानन्यभावेन भूतेष्विव तदात्मताम् ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: सब जीवों में आत्मा और आत्माश्रय में सब जीवों को अभिन्न आश्रयभाव से देखे, जैसे सब पदार्थों में मूल तत्त्व।

श्लोक 28.43

स्वयोनिषु यथा ज्योतिरेकं नाना प्रतीयते । योनीनां गुणवैषम्यात्तथाऽऽत्मा प्रकृतौ स्थितः ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक अग्नि विभिन्न ईंधनों के कारण अलग दिखती है; वैसे एक चेतनतत्त्व प्रकृति की उपाधियों से अनेक रूप में प्रतीत होता है।

श्लोक 28.44

तस्मादिमां स्वां प्रकृतिं दैवीं सदसदात्मिकाम् । दुर्विभाव्यां पराभाव्य स्वरूपेणावतिष्ठते ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार दैवी कार्यकारणमयी प्रकृति के दुर्ज्ञेय प्रभाव को पार करके साधक अपने स्वरूप में स्थित होता है।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 28 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 29

निर्गुण भक्ति, सर्वभूतदया और कालस्वरूप

श्लोक 29.1

देवहूतिरुवाच । लक्षणं महदादीनां प्रकृतेः पुरुषस्य च । स्वरूपं लक्ष्यतेऽमीषां येन तत्पारमार्थिकम् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवहूति बोलीं—महत्तत्त्व आदि, प्रकृति और पुरुष के लक्षणों से उनका वास्तविक स्वरूप समझ में आता है।

श्लोक 29.2

यथा साङ्ख्येषु कथितं यन्मूलं तत्प्रचक्षते । भक्तियोगस्य मे मार्गं ब्रूहि विस्तरशः प्रभो ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: सांख्य में बताए उस मूल विवेक सहित भक्तियोग का मार्ग अब विस्तार से बताइए।

श्लोक 29.3

विरागो येन पुरुषो भगवन् सर्वतो भवेत् । आचक्ष्व जीवलोकस्य विविधा मम संसृतीः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिससे सर्वत्र वैराग्य हो, उसके लिए जीव की संसारगत विभिन्न अवस्थाएँ भी समझाइए।

श्लोक 29.4

कालस्येश्वररूपस्य परेषां च परस्य ते । स्वरूपं बत कुर्वन्ति यद्धेतोः कुशलं जनाः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: ईश्वररूप काल का स्वरूप बताइए, जिसके भय से लोग कल्याणकारी कार्यों में प्रवृत्त होते हैं।

श्लोक 29.5

लोकस्य मिथ्याभिमतेरचक्षुष- श्चिरं प्रसुप्तस्य तमस्यनाश्रये । श्रान्तस्य कर्मस्वनुविद्धया धिया त्वमाविरासीः किल योगभास्करः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप अज्ञान में सोए, मिथ्या अभिमान और कर्मों से थके संसार के लिए योगरूपी सूर्य बनकर प्रकट हुए हैं।

श्लोक 29.6

मैत्रेय उवाच । इति मातुर्वचः श्लक्ष्णं प्रतिनन्द्य महामुनिः । आबभाषे कुरुश्रेष्ठ प्रीतस्तां करुणार्दितः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—माता की मधुर जिज्ञासा का स्वागत करके करुणामय कपिल प्रसन्नता से उत्तर देने लगे।

श्लोक 29.7

श्रीभगवानुवाच । भक्तियोगो बहुविधो मार्गैर्भामिनि भाव्यते । स्वभावगुणमार्गेण पुंसां भावो विभिद्यते ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—स्वभाव और गुणों के भेद से लोगों की भावना बदलती है; उसी अनुसार भक्तियोग के भी अनेक प्रकार दिखते हैं।

श्लोक 29.8

अभिसन्धाय यो हिंसां दम्भं मात्सर्यमेव वा । संरम्भी भिन्नदृग्भावं मयि कुर्यात्स तामसः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: हिंसा, दम्भ, ईर्ष्या और क्रोध का उद्देश्य लेकर भेददृष्टि से मेरी उपासना करने वाला तामस भाव रखता है।

श्लोक 29.9

विषयानभिसन्धाय यश ऐश्वर्यमेव वा । अर्चादावर्चयेद्यो मां पृथग्भावः स राजसः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: विषयसुख, यश या ऐश्वर्य की इच्छा से विग्रह आदि में पूजा करने वाला राजस भाव वाला है।

श्लोक 29.10

कर्मनिर्हारमुद्दिश्य परस्मिन् वा तदर्पणम् । यजेद्यष्टव्यमिति वा पृथग्भावः स सात्त्विकः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: पापक्षय, कर्मसमर्पण या कर्तव्य समझकर भेदभाव सहित पूजा करने वाला सात्त्विक है।

श्लोक 29.11

मद्गुणश्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये । मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरे गुण सुनते ही सबके हृदयवासी मुझमें मन की अविच्छिन्न धारा बहे, जैसे गंगाजल समुद्र की ओर—

श्लोक 29.12

लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य ह्युदाहृतम् । अहैतुक्यव्यवहिता या भक्तिः पुरुषोत्तमे ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: यही निर्गुण भक्तियोग का लक्षण है: पुरुषोत्तम में बिना स्वार्थ और बिना अवरोध की भक्ति।

श्लोक 29.13

सालोक्यसार्ष्टिसामीप्यसारूप्यैकत्वमप्युत । दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरी सेवा के बिना भक्त सालोक्य, सार्ष्टि, सामीप्य, सारूप्य और एकत्वमुक्ति भी स्वीकार नहीं करते।

श्लोक 29.14

स एव भक्तियोगाख्य आत्यन्तिक उदाहृतः । येनातिव्रज्य त्रिगुणं मद्भावायोपपद्यते ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: यही परम भक्तियोग है, जिससे त्रिगुण पार करके साधक मेरे दिव्य भाव का अधिकारी होता है।

श्लोक 29.15

निषेवितेनानिमित्तेन स्वधर्मेण महीयसा । क्रियायोगेन शस्तेन नातिहिंस्रेण नित्यशः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: निष्काम श्रेष्ठ स्वधर्म और शास्त्रसम्मत, अनावश्यक हिंसा से रहित अनुष्ठान का नियमित पालन करे।

श्लोक 29.16

मद्धिष्ण्यदर्शनस्पर्शपूजास्तुत्यभिवन्दनैः । भूतेषु मद्भावनया सत्त्वेनासङ्गमेन च ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरे पवित्र स्थलों का दर्शन, पूजा, स्तुति और प्रणाम तथा जीवों में मेरा भाव और अनासक्ति अपनाए।

श्लोक 29.17

महतां बहुमानेन दीनानामनुकम्पया । मैत्र्या चैवात्मतुल्येषु यमेन नियमेन च ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: महात्माओं का सम्मान, दुःखियों पर दया, समकक्षों से मैत्री और यम-नियम का पालन करे।

श्लोक 29.18

आध्यात्मिकानुश्रवणान्नामसङ्कीर्तनाच्च मे । आर्जवेनार्यसङ्गेन निरहङ्क्रियया तथा ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: अध्यात्मश्रवण, मेरे नाम का सङ्कीर्तन, सरलता, संतसङ्ग और अहंकाररहित व्यवहार रखे।

श्लोक 29.19

मद्धर्मणो गुणैरेतैः परिसंशुद्ध आशयः । पुरुषस्याञ्जसाभ्येति श्रुतमात्रगुणं हि माम् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन भगवद्धर्मों से अन्तःकरण शुद्ध होने पर मेरा गुणश्रवण करते ही मन सहज मुझ तक पहुँचता है।

श्लोक 29.20

यथा वातरथो घ्राणमावृङ्क्ते गन्ध आशयात् । एवं योगरतं चेत आत्मानमविकारि यत् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे वायु सुगन्ध को उसके स्थान से नासिका तक पहुँचाती है, वैसे योगयुक्त निर्मल चित्त अविकारी आत्मा तक पहुँचता है।

श्लोक 29.21

अहं सर्वेषु भूतेषु भूतात्मावस्थितः सदा । तमवज्ञाय मां मर्त्यः कुरुतेऽर्चाविडम्बनम् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं सदा सब जीवों में उनके आत्मारूप स्थित हूँ; इसे उपेक्षित करके केवल बाहरी पूजा करना आराधना का दिखावा बनता है।

श्लोक 29.22

यो मां सर्वेषु भूतेषु सन्तमात्मानमीश्वरम् । हित्वार्चां भजते मौढ्याद्भस्मन्येव जुहोति सः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: सबमें स्थित मुझे तिरस्कृत करके केवल विग्रहपूजा करने वाला मानो राख में आहुति देता है।

श्लोक 29.23

द्विषतः परकाये मां मानिनो भिन्नदर्शिनः । भूतेषु बद्धवैरस्य न मनःशान्तिमृच्छति ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: दूसरे के शरीर में स्थित मुझसे द्वेष रखने वाले अहंकारी और जीवों से शत्रुता रखने वाले का मन शान्त नहीं होता।

श्लोक 29.24

अहमुच्चावचैर्द्रव्यैः क्रिययोत्पन्नयानघे । नैव तुष्येऽर्चितोऽर्चायां भूतग्रामावमानिनः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जीवसमूह का अपमान करने वाले के बहुमूल्य द्रव्य और बड़े अनुष्ठान वाली पूजा से मैं प्रसन्न नहीं होता।

श्लोक 29.25

अर्चादावर्चयेत्तावदीश्वरं मां स्वकर्मकृत् । यावन्न वेद स्वहृदि सर्वभूतेष्ववस्थितम् ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने कर्तव्य करते हुए साधक विग्रह आदि में मेरी आराधना करे और अपने सहित सबके हृदय में मुझे जानने की ओर बढ़े।

श्लोक 29.26

आत्मनश्च परस्यापि यः करोत्यन्तरोदरम् । तस्य भिन्नदृशो मृत्युर्विदधे भयमुल्बणम् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने और अन्य के अन्तःस्थित चेतन में द्वेषपूर्ण भेद करने वाले के लिए मृत्यु प्रबल भय बनती है।

श्लोक 29.27

अथ मां सर्वभूतेषु भूतात्मानं कृतालयम् । अर्हयेद्दानमानाभ्यां मैत्र्याभिन्नेन चक्षुषा ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए सब जीवों में निवास करने वाले मुझे दान, सम्मान, मैत्री और समदृष्टि द्वारा भी पूजो।

श्लोक 29.28

जीवाः श्रेष्ठा ह्यजीवानां ततः प्राणभृतः शुभे । ततः सचित्ताः प्रवरास्ततश्चेन्द्रियवृत्तयः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: अचेतन पदार्थों से जीव और उनमें प्राण, चित्त तथा इन्द्रियक्रियाओं की क्रमशः अधिक अभिव्यक्ति वाले रूपों का विवेचन किया जाता है।

श्लोक 29.29

तत्रापि स्पर्शवेदिभ्यः प्रवरा रसवेदिनः । तेभ्यो गन्धविदः श्रेष्ठास्ततः शब्दविदो वराः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्रियक्षमता के क्रम में स्पर्श से रस, उससे गन्ध और फिर शब्दग्रहण की अधिक विकसित शक्तियाँ बताई गई हैं।

श्लोक 29.30

रूपभेदविदस्तत्र ततश्चोभयतो दतः । तेषां बहुपदाः श्रेष्ठाश्चतुष्पादस्ततो द्विपात् ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: आगे रूपभेद पहचानने वाले, दाँतों के भेद वाले और बहुपद, चतुष्पद तथा द्विपद जीवों का क्रम बताया गया।

श्लोक 29.31

ततो वर्णाश्च चत्वारस्तेषां ब्राह्मण उत्तमः । ब्राह्मणेष्वपि वेदज्ञो ह्यर्थज्ञोऽभ्यधिकस्ततः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्यों के चार वर्णों में ज्ञानकर्तव्य वाला ब्राह्मण, उसमें वेदज्ञ और उससे वेद का अर्थ जानने वाला श्रेष्ठ कहा गया।

श्लोक 29.32

अर्थज्ञात्संशयच्छेत्ता ततः श्रेयान् स्वकर्मकृत् । मुक्तसङ्गस्ततो भूयानदोग्धा धर्ममात्मनः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: अर्थज्ञ से संशय मिटाने वाला, उससे आचरणकर्ता, फिर अनासक्त और निजी लाभ के लिए धर्म न करने वाला श्रेष्ठ है।

श्लोक 29.33

तस्मान्मय्यर्पिताशेषक्रियार्थात्मा निरन्तरः । मय्यर्पितात्मनः पुंसो मयि सन्न्यस्तकर्मणः । न पश्यामि परं भूतमकर्तुः समदर्शनात् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: सब कर्म, उनके फल और स्वयं को मुझमें समर्पित, कर्तृत्वाभिमानरहित समदर्शी भक्त से श्रेष्ठ मुझे कोई दिखाई नहीं देता।

श्लोक 29.34

मनसैतानि भूतानि प्रणमेद्बहुमानयन् । ईश्वरो जीवकलया प्रविष्टो भगवानिति ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: सभी जीवों को मन से आदर और प्रणाम करो, क्योंकि भगवान जीवचेतना के आश्रयरूप सबमें प्रविष्ट हैं।

श्लोक 29.35

भक्तियोगश्च योगश्च मया मानव्युदीरितः । ययोरेकतरेणैव पुरुषः पुरुषं व्रजेत् ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे देवहूति, भक्तियोग और आत्मविवेक का योग बताया; इनमें दृढ़ होकर जीव परमपुरुष तक पहुँचता है।

श्लोक 29.36

एतद्भगवतो रूपं ब्रह्मणः परमात्मनः । परं प्रधानं पुरुषं दैवं कर्मविचेष्टितम् ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: परमात्मा की शक्ति प्रकृति, पुरुष, दैव और कर्म की गतिविधियों में जगत का आधार है।

श्लोक 29.37

रूपभेदास्पदं दिव्यं काल इत्यभिधीयते । भूतानां महदादीनां यतो भिन्नदृशां भयम् ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: रूपों के परिवर्तन का यह दिव्य अधिष्ठान काल कहलाता है; भेद और देहाभिमान वाले जीव इससे भय पाते हैं।

श्लोक 29.38

योऽन्तःप्रविश्य भूतानि भूतैरत्त्यखिलाश्रयः । स विष्ण्वाख्योऽधियज्ञोऽसौ कालः कलयतां प्रभुः ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: सभी में प्रवेश करके जीवों का अन्य जीवों से संहार कराने वाली वही विष्णु की कालशक्ति है, जो सब गणना का स्वामी है।

श्लोक 29.39

न चास्य कश्चिद्दयितो न द्वेष्यो न च बान्धवः । आविशत्यप्रमत्तोऽसौ प्रमत्तं जनमन्तकृत् ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: काल का कोई प्रिय, द्वेष्य या सम्बन्धी नहीं; वह स्वयं सजग रहकर असावधान जीव का अन्त कर देता है।

श्लोक 29.40

यद्भयाद्वाति वातोऽयं सूर्यस्तपति यद्भयात् । यद्भयाद्वर्षते देवो भगणो भाति यद्भयात् ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसकी व्यवस्था के अधीन वायु चलती, सूर्य तपता, वर्षा होती और तारामण्डल प्रकाशित होता है।

श्लोक 29.41

यद्वनस्पतयो भीता लताश्चौषधिभिः सह । स्वे स्वे कालेऽभिगृह्णन्ति पुष्पाणि च फलानि च ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: वृक्ष, लताएँ और औषधियाँ उसी नियम के अनुसार अपने-अपने समय पर फूल और फल धारण करते हैं।

श्लोक 29.42

स्रवन्ति सरितो भीता नोत्सर्पत्युदधिर्यतः । अग्निरिन्धे सगिरिभिर्भूर्न मज्जति यद्भयात् ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: नदियाँ बहतीं, समुद्र मर्यादा में रहता, अग्नि जलती और पर्वतों सहित पृथ्वी स्थिर रहती है।

श्लोक 29.43

नभो ददाति श्वसतां पदं यन्नियमाददः । लोकं स्वदेहं तनुते महान्सप्तभिरावृतम् ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसी नियम से आकाश जीवों को स्थान देता और महत्तत्त्व सात आवरणों वाले विश्वविस्तार को प्रकट करता है।

श्लोक 29.44

गुणाभिमानिनो देवाः सर्गादिष्वस्य यद्भयात् । वर्तन्तेऽनुयुगं येषां वश एतच्चराचरम् ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुणों के अधिष्ठाता देव सृष्टि आदि अपने कार्यों में उसी व्यवस्था का पालन करते हैं; उनसे चराचर का क्रम चलता है।

श्लोक 29.45

सोऽनन्तोऽन्तकरः कालोऽनादिरादिकृदव्ययः । जनं जनेन जनयन् मारयन् मृत्युनान्तकम् ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अनादि, अविनाशी काल जीवों को जीवों से जन्म देता और मृत्यु द्वारा सबका अन्त करता हुआ स्वयं अनन्त रहता है।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 29 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 30

अधर्मपूर्ण आसक्ति और कर्मफल

श्लोक 30.1

कपिल उवाच । तस्यैतस्य जनो नूनं नायं वेदोरुविक्रमम् । काल्यमानोऽपि बलिनो वायोरिव घनावलिः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: कपिल बोले—प्रबल वायु से बादलों की तरह काल द्वारा चलाया जाता मनुष्य भी उसका महान पराक्रम नहीं समझता।

श्लोक 30.2

यं यमर्थमुपादत्ते दुःखेन सुखहेतवे । तं तं धुनोति भगवान् पुमान् शोचति यत्कृते ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: सुख के लिए जो वस्तु बड़े दुःख से जुटाता है, काल उसे नष्ट कर देता है और मनुष्य शोक करता है।

श्लोक 30.3

यदध्रुवस्य देहस्य सानुबन्धस्य दुर्मतिः । ध्रुवाणि मन्यते मोहाद्गृहक्षेत्रवसूनि च ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मोहवश वह नश्वर शरीर, घर, भूमि और धन को स्थायी मान लेता है।

श्लोक 30.4

जन्तुर्वै भव एतस्मिन् यां यां योनिमनुव्रजेत् । तस्यां तस्यां स लभते निर्वृतिं न विरज्यते ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जीव जिस योनि में जन्म लेता है, उसी की दशा में सुख खोजकर उससे विरक्त नहीं हो पाता।

श्लोक 30.5

नरकस्थोऽपि देहं वै न पुमांस्त्यक्तुमिच्छति । नारक्यां निर्वृतौ सत्यां देवमायाविमोहितः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: माया से मोहित होकर दुःखमय अवस्था में भी वह शरीर छोड़ना नहीं चाहता और उसी में थोड़ा सुख मानता है।

श्लोक 30.6

आत्मजायासुतागारपशुद्रविणबन्धुषु । निरूढमूलहृदय आत्मानं बहु मन्यते ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: शरीर, पत्नी, सन्तान, घर, पशु, धन और सम्बन्धियों में गहरी आसक्ति से वह अपने को बड़ा समझता है।

श्लोक 30.7

सन्दह्यमानसर्वाङ्ग एषामुद्वहनाधिना । करोत्यविरतं मूढो दुरितानि दुराशयः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनका भार सँभालने की चिन्ता में जलता हुआ भी अविवेकी मनुष्य बार-बार अनुचित कर्म करता है।

श्लोक 30.8

आक्षिप्तात्मेन्द्रियः स्त्रीणामसतीनां च मायया । रहो रचितयाऽऽलापैः शिशूनां कलभाषिणाम् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: असंयमित दाम्पत्य-आकर्षण और बच्चों की तोतली बातों में उसका मन तथा इन्द्रियाँ उलझ जाती हैं।

श्लोक 30.9

गृहेषु कूटधर्मेषु दुःखतन्त्रेष्वतन्द्रितः । कुर्वन् दुःखप्रतीकारं सुखवन्मन्यते गृही ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: छलपूर्ण लौकिक व्यवहार और दुःखों से भरे घर में वह केवल दुःख का अस्थायी उपचार करके उसे सुख समझता है।

श्लोक 30.10

अर्थैरापादितैर्गुर्व्या हिंसयेतस्ततश्च तान् । पुष्णाति येषां पोषेण शेषभुग्यात्यधः स्वयम् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: दूसरों को कष्ट देकर जुटाए धन से परिवार पालता और बचे हुए से स्वयं जीता है; हिंसामय कमाई उसे अधोगति देती है।

श्लोक 30.11

वार्तायां लुप्यमानायामारब्धायां पुनः पुनः । लोभाभिभूतो निःसत्त्वः परार्थे कुरुते स्पृहाम् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: बार-बार जीविका बिगड़ने पर भी लोभ नहीं छोड़ता और दूसरे के धन की इच्छा करने लगता है।

श्लोक 30.12

कुटुम्बभरणाकल्पो मन्दभाग्यो वृथोद्यमः । श्रिया विहीनः कृपणो ध्यायन् श्वसिति मूढधीः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: परिवार पालने में असमर्थ, साधनहीन और निष्फल प्रयत्न से थका हुआ वह चिन्ता तथा आहें भरता रहता है।

श्लोक 30.13

एवं स्वभरणाकल्पं तत्कलत्रादयस्तथा । नाद्रियन्ते यथापूर्वं कीनाशा इव गोजरम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब वह निर्वाह न कर सके तो स्वजन पहले जैसा आदर नहीं करते, जैसे कृपण किसान बूढ़े बैल की उपेक्षा करता है।

श्लोक 30.14

तत्राप्यजातनिर्वेदो भ्रियमाणः स्वयम्भृतैः । जरयोपात्तवैरूप्यो मरणाभिमुखो गृहे ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी आसक्ति न छूटे तो पहले जिनका पोषण किया, उन्हीं पर निर्भर होकर वृद्ध और मृत्यु के निकट घर में पड़ा रहता है।

श्लोक 30.15

आस्तेऽवमत्योपन्यस्तं गृहपाल इवाहरन् । आमयाव्यप्रदीप्ताग्निरल्पाहारोऽल्पचेष्टितः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: रोग, मन्द पाचन और कम क्रियाशक्ति के साथ वह अनादर से दिया थोड़ा भोजन ग्रहण करता है।

श्लोक 30.16

वायुनोत्क्रमतोत्तारः कफसंरुद्धनाडिकः । कासश्वासकृतायासः कण्ठे घुरघुरायते ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: अन्तसमय में श्वास ऊपर चढ़ती, कफ से मार्ग रुकता और खाँसी-श्वासकष्ट से गले में घरघराहट होती है।

श्लोक 30.17

शयानः परिशोचद्भिः परिवीतः स्वबन्धुभिः । वाच्यमानोऽपि न ब्रूते कालपाशवशं गतः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: शोक करते स्वजनों से घिरा वह बुलाने पर भी बोल नहीं पाता; काल का पाश उस पर हावी होता है।

श्लोक 30.18

एवं कुटुम्बभरणे व्यापृतात्माजितेन्द्रियः । म्रियते रुदतां स्वानामुरुवेदनयास्तधीः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्रियाँ न जीतकर केवल परिवार में लगा व्यक्ति अन्ततः तीव्र वेदना और क्षीण चेतना के साथ प्राण छोड़ता है।

श्लोक 30.19

यमदूतौ तदा प्राप्तौ भीमौ सरभसेक्षणौ । स दृष्ट्वा त्रस्तहृदयः शकृन्मूत्रं विमुञ्चति ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुराणवर्णन में उस समय दो भयङ्कर यमदूत दिखते हैं; भय से उसका संयम छूट जाता है।

श्लोक 30.20

यातनादेह आवृत्य पाशैर्बद्ध्वा गले बलात् । नयतो दीर्घमध्वानं दण्ड्यं राजभटा यथा ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूक्ष्म यातनादेह में बाँधकर वे दण्डनीय को राजसैनिकों की तरह लम्बे मार्ग पर ले जाते हैं।

श्लोक 30.21

तयोर्निर्भिन्नहृदयस्तर्जनैर्जातवेपथुः । पथि श्वभिर्भक्ष्यमाण आर्तोऽघं स्वमनुस्मरन् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी धमकियों और मार्ग की पीड़ाओं से काँपता वह अपने पापों का स्मरण करता है।

श्लोक 30.22

क्षुत्तृट् परीतोऽर्कदवानलानिलैः सन्तप्यमानः पथि तप्तवालुके । कृच्छ्रेण पृष्ठे कशया च ताडितः चलत्यशक्तोऽपि निराश्रमोदके ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: भूख-प्यास, तप्त भूमि, धूप, अग्नि और वायु से पीड़ित होकर बिना विश्राम या जल के कठिन मार्ग चलता है।

श्लोक 30.23

तत्र तत्र पतन् श्रान्तो मूर्च्छितः पुनरुत्थितः । पथा पापीयसा नीतस्तमसा यमसादनम् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: बार-बार गिरते, मूर्च्छित होते और उठाए जाते हुए वह अन्धकारपूर्ण मार्ग से यमसदन पहुँचता है।

श्लोक 30.24

योजनानां सहस्राणि नवतिं नव चाध्वनः । त्रिभिर्मुहूर्तैर्द्वाभ्यां वा नीतः प्राप्नोति यातनाः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वर्णन के अनुसार निन्यानबे हजार योजन का मार्ग दो-तीन मुहूर्त में पार कराकर उसे कर्मफल की यातनाएँ दी जाती हैं।

श्लोक 30.25

आदीपनं स्वगात्राणां वेष्टयित्वोल्मुकादिभिः । आत्ममांसादनं क्वापि स्वकृत्तं परतोऽपि वा ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: ग्रंथ अग्निताप और देहपीड़ा जैसी भीषण अवस्थाओं का वर्णन कर्मों के कठोर फल के रूप में करता है।

श्लोक 30.26

जीवतश्चान्त्राभ्युद्धारः श्वगृध्रैर्यमसादने । सर्पवृश्चिकदंशाद्यैर्दशद्भिश्चात्मवैशसम् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: पशु-पक्षियों और विषैले जीवों से पीड़ा के चित्र द्वारा हिंसा तथा अधर्म के परिणाम बताए गए हैं।

श्लोक 30.27

कृन्तनं चावयवशो गजादिभ्यो भिदापनम् । पातनं गिरिश‍ृङ्गेभ्यो रोधनं चाम्बुगर्तयोः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अंगच्छेदन, कुचलना, ऊँचाई से गिरना और जलगर्त में निरोध जैसी यातनाएँ भी इस वर्णन में आती हैं।

श्लोक 30.28

यास्तामिस्रान्धतामिस्रा रौरवाद्याश्च यातनाः । भुङ्क्ते नरो वा नारी वा मिथः सङ्गेन निर्मिताः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्त्री या पुरुष—जो आसक्त और अधर्मी सम्बन्धों से कर्म रचता है, वह तामिस्र, अन्धतामिस्र और रौरव जैसे दुःखफल भोगता है।

श्लोक 30.29

अत्रैव नरकः स्वर्ग इति मातः प्रचक्षते । या यातना वै नारक्यस्ता इहाप्युपलक्षिताः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे माता, स्वर्ग और नरक की झलक यहीं भी दिखाई देती है; अनेक नरकसमान कष्ट इसी संसार में देखे जाते हैं।

श्लोक 30.30

एवं कुटुम्बं बिभ्राण उदरम्भर एव वा । विसृज्येहोभयं प्रेत्य भुङ्क्ते तत्फलमीदृशम् ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: केवल अपना या परिवार का पेट पालने के लिए अधर्म करने वाला शरीर और सम्बन्ध छोड़कर भी कर्मफल भोगता है।

श्लोक 30.31

एकः प्रपद्यते ध्वान्तं हित्वेदं स्वकलेवरम् । कुशलेतरपाथेयो भूतद्रोहेण यद्भृतम् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: दूसरे जीवों को सताकर पाले शरीर को छोड़ वह अकेला अन्धकार में जाता है; उसके साथ अशुभ कर्मों का पाथेय रहता है।

श्लोक 30.32

दैवेनासादितं तस्य शमलं निरये पुमान् । भुङ्क्ते कुटुम्बपोषस्य हृतवित्त इवातुरः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: दैवव्यवस्था से मिला अशुद्ध कर्मफल भोगते समय वह धन खोए व्याकुल व्यक्ति जैसा कष्ट अनुभव करता है।

श्लोक 30.33

केवलेन ह्यधर्मेण कुटुम्बभरणोत्सुकः । याति जीवोऽन्धतामिस्रं चरमं तमसः पदम् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मात्र अधर्म के सहारे परिवारपालन की धुन वाला जीव अन्धतामिस्र की गहन अज्ञानमय दशा में जाता है।

श्लोक 30.34

अधस्तान्नरलोकस्य यावतीर्यातनादयः । क्रमशः समनुक्रम्य पुनरत्राव्रजेच्छुचिः ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: कर्मानुसार अधोगतियों का फल क्रम से भोगकर, शुद्धि की प्रक्रिया के बाद जीव फिर मनुष्यलोक में जन्म लेता है।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 30 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 31

जन्म-मरण का चक्र और आसक्ति से निवृत्ति

श्लोक 31.1

श्रीभगवानुवाच । कर्मणा दैवनेत्रेण जन्तुर्देहोपपत्तये । स्त्रियाः प्रविष्ट उदरं पुंसो रेतः कणाश्रयः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—जीव अपने कर्म और दैवी व्यवस्था के अनुसार नया शरीर पाने के लिए पिता के बीज के माध्यम से मातृगर्भ में आता है।

श्लोक 31.2

कललं त्वेकरात्रेण पञ्चरात्रेण बुद्बुदम् । दशाहेन तु कर्कन्धूः पेश्यण्डं वा ततः परम् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: ग्रंथ के प्राचीन गर्भवर्णन में आरम्भिक द्रव अवस्था, बुद्बुद, छोटे पिण्ड और फिर मांसपिण्ड के क्रम से विकास बताया गया है।

श्लोक 31.3

मासेन तु शिरो द्वाभ्यां बाह्वङ्घ्र्याद्यङ्गविग्रहः । नखलोमास्थिचर्माणि लिङ्गच्छिद्रोद्भवस्त्रिभिः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसी वर्णन में पहले सिर, फिर हाथ-पाँव और आगे नख, रोम, अस्थि, त्वचा तथा इन्द्रियस्थानों का प्राकट्य कहा गया है।

श्लोक 31.4

चतुर्भिर्धातवः सप्त पञ्चभिः क्षुत्तृडुद्भवः । षड्भिर्जरायुणा वीतः कुक्षौ भ्राम्यति दक्षिणे ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: आगे धातुओं का विकास, भूख-प्यास और गर्भावरण में स्थित शरीर का क्रमशः बढ़ना वर्णित है।

श्लोक 31.5

मातुर्जग्धान्नपानाद्यैरेधद्धातुरसम्मते । शेते विण्मूत्रयोर्गर्ते स जन्तुर्जन्तुसम्भवे ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: माता के आहार-पान से शरीर बढ़ता है; ग्रंथ इस गर्भावस्था को संकुचित, पराधीन और दुःखमय स्थिति के रूप में चित्रित करता है।

श्लोक 31.6

कृमिभिः क्षतसर्वाङ्गः सौकुमार्यात्प्रतिक्षणम् । मूर्च्छामाप्नोत्युरुक्लेशस्तत्रत्यैः क्षुधितैर्मुहुः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: शरीर की अत्यन्त कोमलता और गर्भस्थ पीड़ा का वर्णन यहाँ जीव की असहायता समझाने के लिए किया गया है।

श्लोक 31.7

कटुतीक्ष्णोष्णलवणरूक्षाम्लादिभिरुल्बणैः । मातृभुक्तैरुपस्पृष्टः सर्वाङ्गोत्थितवेदनः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: माता के तीखे, उष्ण, लवणयुक्त आदि आहारों से गर्भस्थ जीव के प्रभावित होने की बात इस प्राचीन वर्णन में कही गई है।

श्लोक 31.8

उल्बेन संवृतस्तस्मिन्नन्त्रैश्च बहिरावृतः । आस्ते कृत्वा शिरः कुक्षौ भुग्नपृष्ठशिरोधरः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: गर्भावरण से घिरा जीव सिर और पीठ झुकाए, शरीर समेटकर रहता है।

श्लोक 31.9

अकल्पः स्वाङ्गचेष्टायां शकुन्त इव पञ्जरे । तत्र लब्धस्मृतिर्दैवात्कर्मजन्मशतोद्भवम् । स्मरन् दीर्घमनुच्छ्वासं शर्म किं नाम विन्दते ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: पिंजरे के पक्षी जैसा असमर्थ वह दैव से पूर्वजन्मों के कर्मों का स्मरण पाकर दुःख का अनुभव करता है।

श्लोक 31.10

आरभ्य सप्तमान्मासाल्लब्धबोधोऽपि वेपितः । नैकत्रास्ते सूतिवातैर्विष्ठाभूरिव सोदरः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: सातवें महीने से बोधप्राप्त जीव को भी गर्भ की पराधीन गति में स्थिरता और आराम नहीं मिलता—ऐसा ग्रंथ का वर्णन है।

श्लोक 31.11

नाथमान ऋषिर्भीतः सप्तवध्रिः कृताञ्जलिः । स्तुवीत तं विक्लवया वाचा येनोदरेऽर्पितः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: भयभीत और बन्धनग्रस्त होकर वह हाथ जोड़े उन भगवान की व्याकुल प्रार्थना करता है जिनकी व्यवस्था से यह जन्म मिला।

श्लोक 31.12

जन्तुरुवाच । तस्योपसन्नमवितुं जगदिच्छयाऽऽत्त- नानातनोर्भुवि चलच्चरणारविन्दम् । सोऽहं व्रजामि शरणं ह्यकुतोभयं मे येनेदृशी गतिरदर्श्यसतोऽनुरूपा ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जीव प्रार्थना करता है—शरणागतों की रक्षा के लिए अनेक अवतार लेने वाले आपके निर्भय चरणों की शरण हूँ।

श्लोक 31.13

यस्त्वत्र बद्ध इव कर्मभिरावृतात्मा भूतेन्द्रियाशयमयीमवलम्ब्य मायाम् । आस्ते विशुद्धमविकारमखण्डबोध- मातप्यमानहृदयेऽवसितं नमामि ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: कर्म, देह, इन्द्रिय और मन के आवरण में बँधा-सा होकर भी भीतर स्थित शुद्ध, निर्विकार और अखण्ड चेतन प्रभु को प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 31.14

यः पञ्चभूतरचिते रहितः शरीरे छन्नो यथेन्द्रियगुणार्थचिदात्मकोऽहम् । तेनाविकुण्ठमहिमानमृषिं तमेनं वन्दे परं प्रकृतिपूरुषयोः पुमांसम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: पञ्चभूतमय शरीर में आवृत चेतन जीव मैं प्रकृति और पुरुष के परम स्वामी, असीम महिमावाले अन्तर्यामी की वन्दना करता हूँ।

श्लोक 31.15

यन्माययोरुगुणकर्मनिबन्धनेऽस्मिन् सांसारिके पथि चरंस्तदभिश्रमेण । नष्टस्मृतिः पुनरयं प्रवृणीत लोकं युक्त्या कया महदनुग्रहमन्तरेण ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपकी माया से गुण-कर्म में बँधकर स्मृति खोया जीव आपकी महान कृपा बिना इस संसारचक्र से कैसे निकले?

श्लोक 31.16

ज्ञानं यदेतददधात्कतमः स देवः त्रैकालिकं स्थिरचरेष्वनुवर्तितांशः । तं जीवकर्मपदवीमनुवर्तमाना- स्तापत्रयोपशमनाय वयं भजेम ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिस परमदेव ने यह विवेक दिया और जो सब प्राणियों में अन्तर्यामी हैं, उन्हीं का तीनों ताप मिटाने के लिए भजन करें।

श्लोक 31.17

देह्यन्यदेहविवरे जठराग्निनासृग्- विण्मूत्रकूपपतितो भृशतप्तदेहः । इच्छन्नितो विवसितुं गणयन् स्वमासान् निर्वास्यते कृपणधीर्भगवन् कदा नु ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: दूसरे शरीर के भीतर संकुचित और तप्त दशा में रहकर मैं महीने गिनता हूँ; हे प्रभु, इससे बाहर कब निकलूँगा?

श्लोक 31.18

येनेदृशीं गतिमसौ दशमास्य ईश सङ्ग्राहितः पुरुदयेन भवादृशेन । स्वेनैव तुष्यतु कृतेन स दीननाथः को नाम तत्प्रति विनाञ्जलिमस्य कुर्यात् ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपकी उदार कृपा से इस दशा में भी विवेक मिला; हे दीननाथ, हाथ जोड़ने के अतिरिक्त इसका प्रतिदान क्या दे सकता हूँ?

श्लोक 31.19

पश्यत्ययं धिषणया ननु सप्तवध्रिः शारीरके दमशरीर्यपरः स्वदेहे । यत्सृष्टयाऽऽसं तमहं पुरुषं पुराणं पश्ये बहिर्हृदि च चैत्यमिव प्रतीतम् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: बँधा होकर भी मुझे आपका दिया विवेक मिला है; उसी से भीतर-बाहर पुरातन अन्तर्यामी पुरुष का दर्शन करना चाहता हूँ।

श्लोक 31.20

सोऽहं वसन्नपि विभो बहुदुःखवासं गर्भान्न निर्जिगमिषे बहिरन्धकूपे । यत्रोपयातमुपसर्पति देवमाया मिथ्यामतिर्यदनु संसृतिचक्रमेतत् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस दुःखमय गर्भ से भी बाहर आने पर माया के अन्धकूप में फिर मिथ्याबुद्धि और संसारचक्र घेर सकता है।

श्लोक 31.21

तस्मादहं विगतविक्लव उद्धरिष्य आत्मानमाशु तमसः सुहृदात्मनैव । भूयो यथा व्यसनमेतदनेकरन्ध्रं मा मे भविष्यदुपसादितविष्णुपादः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए व्याकुलता छोड़कर विवेक द्वारा अज्ञान से उबरूँगा और विष्णुचरण का आश्रय लूँगा, ताकि पुनः ऐसा बन्धन न हो।

श्लोक 31.22

कपिल उवाच । एवं कृतमतिर्गर्भे दशमास्यः स्तुवन् ऋषिः । सद्यः क्षिपत्यवाचीनं प्रसूत्यै सूतिमारुतः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: कपिल बोले—इस प्रकार प्रार्थना का संकल्प किए जीव को जन्मसमय की वायु नीचे की ओर प्रेरित करती है।

श्लोक 31.23

तेनावसृष्टः सहसा कृत्वावाक्शिर आतुरः । विनिष्क्रामति कृच्छ्रेण निरुच्छ्वासो हतस्मृतिः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह कठिन प्रसवमार्ग से सिर नीचे किए निकलता है; कष्ट और पराधीनता से पूर्वस्मृति ढक जाती है।

श्लोक 31.24

पतितो भुव्यसृङ्मूत्रे विष्ठाभूरिव चेष्टते । रोरूयति गते ज्ञाने विपरीतां गतिं गतः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जन्म के बाद शरीर की नई दशा में पड़ा शिशु पहले का ज्ञान भूलकर रोने लगता है।

श्लोक 31.25

परच्छन्दं न विदुषा पुष्यमाणो जनेन सः । अनभिप्रेतमापन्नः प्रत्याख्यातुमनीश्वरः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: दूसरों की इच्छा पर पलता शिशु अपनी चाह न समझे जाने पर अनचाही स्थिति का प्रतिरोध भी नहीं कर पाता।

श्लोक 31.26

शायितोऽशुचिपर्यङ्के जन्तुः स्वेदजदूषिते । नेशः कण्डूयनेऽङ्गानामासनोत्थानचेष्टने ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: अशुद्ध या असुविधाजनक बिछौने पर वह स्वयं खुजला, बैठ या उठ नहीं सकता।

श्लोक 31.27

तुदन्त्यामत्वचं दंशा मशका मत्कुणादयः । रुदन्तं विगतज्ञानं कृमयः कृमिकं यथा ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मच्छर, खटमल आदि उसकी कोमल त्वचा को पीड़ा देते हैं और वह असहाय होकर रोता है।

श्लोक 31.28

इत्येवं शैशवं भुक्त्वा दुःखं पौगण्डमेव च । अलब्धाभीप्सितोऽज्ञानादिद्धमन्युः शुचार्पितः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: शैशव और बाल्य की कठिनाइयों के बाद इच्छित वस्तु न मिलने पर अज्ञान से क्रोध और शोक बढ़ते हैं।

श्लोक 31.29

सह देहेन मानेन वर्धमानेन मन्युना । करोति विग्रहं कामी कामिष्वन्ताय चात्मनः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: शरीर के साथ अभिमान और क्रोध बढ़ें तो कामनाग्रस्त जीव दूसरों से संघर्ष करके अपना ही अहित करता है।

श्लोक 31.30

भूतैः पञ्चभिरारब्धे देहे देह्यबुधोऽसकृत् । अहं ममेत्यसद्ग्राहः करोति कुमतिर्मतिम् ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: पञ्चभूतमय शरीर में अविवेकी जीव बार-बार मैं और मेरा की गलत पकड़ स्थापित करता है।

श्लोक 31.31

तदर्थं कुरुते कर्म यद्बद्धो याति संसृतिम् । योऽनुयाति ददत्क्लेशमविद्याकर्मबन्धनः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसी देहासक्ति के लिए कर्म करके वह अज्ञान और कर्मबन्धन के कारण दुःखद संसारचक्र में चलता रहता है।

श्लोक 31.32

यद्यसद्भिः पथि पुनः शिश्नोदरकृतोद्यमैः । आस्थितो रमते जन्तुस्तमो विशति पूर्ववत् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: यदि फिर केवल काम और पेट के लिए जीने वाले दुर्जनों का सङ्ग करे तो पहले जैसा अज्ञान लौट आता है।

श्लोक 31.33

सत्यं शौचं दया मौनं बुद्धिः श्रीर्ह्रीर्यशः क्षमा । शमो दमो भगश्चेति यत्सङ्गाद्याति सङ्क्षयम् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसे सङ्ग से सत्य, पवित्रता, दया, संयम, बुद्धि, शोभा, लज्जा, यश, क्षमा और शान्ति आदि घटते हैं।

श्लोक 31.34

तेष्वशान्तेषु मूढेषु खण्डितात्मस्वसाधुषु । सङ्गं न कुर्याच्छोच्येषु योषित्क्रीडामृगेषु च ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए अशान्त, मूढ़, असंयमी और विषयसुख के दास बने दुराचारी लोगों का सङ्ग नहीं करना चाहिए।

श्लोक 31.35

न तथास्य भवेन्मोहो बन्धश्चान्यप्रसङ्गतः । योषित्सङ्गाद्यथा पुंसो यथा तत्सङ्गिसङ्गतः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वैराग्यमार्गी पुरुष के लिए अनियन्त्रित स्त्री-आसक्ति और उसी आसक्ति में लगे लोगों का सङ्ग विशेष बन्धनकारी बताया गया है।

श्लोक 31.36

प्रजापतिः स्वां दुहितरं दृष्ट्वा तद्रूपधर्षितः । रोहिद्भूतां सोऽन्वधावदृक्षरूपी हतत्रपः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उदाहरण में प्रजापति के अपनी ही कन्या के रूप से मोहित होकर उसके पीछे दौड़ने की कथा दी गई है।

श्लोक 31.37

तत्सृष्टसृष्टसृष्टेषु को न्वखण्डितधीः पुमान् । ऋषिं नारायणमृते योषिन्मय्येह मायया ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारायण ऋषि जैसे परम संयमी के अतिरिक्त, माया के इस आकर्षण से सामान्य जीव की बुद्धि विचलित हो सकती है।

श्लोक 31.38

बलं मे पश्य मायायाः स्त्रीमय्या जयिनो दिशाम् । या करोति पदाक्रान्तान् भ्रूविजृम्भेण केवलम् ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: काममयी माया की शक्ति देखो; वह दिशाएँ जीतने वाले वीर को भी एक कटाक्ष से अपने अधीन कर देती है।

श्लोक 31.39

सङ्गं न कुर्यात्प्रमदासु जातु योगस्य पारं परमारुरुक्षुः । मत्सेवया प्रतिलब्धात्मलाभो वदन्ति या निरयद्वारमस्य ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: योग की परम सिद्धि चाहने वाला और भगवत्सेवा से आत्मलाभ पाने वाला साधक कामासक्त सङ्ग से बचे, जिसे पतन का द्वार कहा है।

श्लोक 31.40

योपयाति शनैर्माया योषिद्देवविनिर्मिता । तामीक्षेतात्मनो मृत्युं तृणैः कूपमिवावृतम् ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: आकर्षक रूप में धीरे-धीरे आने वाली अनियन्त्रित आसक्ति को घास से ढके कुएँ की तरह छिपे संकट के रूप में देखे।

श्लोक 31.41

यां मन्यते पतिं मोहान्मन्मायामृषभायतीम् । स्त्रीत्वं स्त्रीसङ्गतः प्राप्तो वित्तापत्यगृहप्रदम् ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्त्रीरूप जन्म पाने वाला जीव भी धन, सन्तान और गृह देने वाले पति को मोह से अपना सर्वस्व मान सकता है।

श्लोक 31.42

तामात्मनो विजानीयात्पत्यपत्यगृहात्मकम् । दैवोपसादितं मृत्युं मृगयोर्गायनं यथा ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसी पति-पुत्र-गृह की बन्धनकारी आसक्ति उसके लिए भी शिकारी के लुभावने गीत जैसी है; विवेक दोनों के लिए आवश्यक है।

श्लोक 31.43

देहेन जीवभूतेन लोकाल्लोकमनुव्रजन् । भुञ्जान एव कर्माणि करोत्यविरतं पुमान् ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जीव सूक्ष्म देह सहित लोक-लोकान्तर जाता, पुराने कर्मों का फल भोगता और नए कर्म करता रहता है।

श्लोक 31.44

जीवो ह्यस्यानुगो देहो भूतेन्द्रियमनोमयः । तन्निरोधोऽस्य मरणमाविर्भावस्तु सम्भवः ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: भूत, इन्द्रिय और मन से बनी देहव्यवस्था जीव का अनुसरण करती है; उसकी क्रिया का अवरोध मृत्यु और प्राकट्य जन्म कहलाता है।

श्लोक 31.45

द्रव्योपलब्धिस्थानस्य द्रव्येक्षायोग्यता यदा । तत्पञ्चत्वमहम्मानादुत्पत्तिर्द्रव्यदर्शनम् ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: शरीर की विषयग्रहण क्षमता समाप्त हो तो उसका विघटन मृत्यु है; नई विषयग्रहण व्यवस्था से अहंभाव जुड़े तो जन्म का अनुभव होता है।

श्लोक 31.46

यथाक्ष्णोर्द्रव्यावयवदर्शनायोग्यता यदा । तदैव चक्षुषो द्रष्टुर्द्रष्टृत्वायोग्यतानयोः ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे नेत्र देखने में असमर्थ हों तो उनके माध्यम से दृष्टि का व्यवहार रुकता है, वैसे देह की क्षमता बदलने से अनुभव बदलता है।

श्लोक 31.47

तस्मान्न कार्यः सन्त्रासो न कार्पण्यं न सम्भ्रमः । बुद्ध्वा जीवगतिं धीरो मुक्तसङ्गश्चरेदिह ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: जीव की गति समझकर धैर्यवान मनुष्य भय, दीनता और घबराहट छोड़ अनासक्त भाव से जीवन बिताए।

श्लोक 31.48

सम्यग्दर्शनया बुद्ध्या योगवैराग्ययुक्तया । मायाविरचिते लोके चरेन्न्यस्य कलेवरम् ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: सम्यक् विवेक, योग और वैराग्य से युक्त होकर मायामय जगत में देहाभिमान छोड़कर विचरे।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 31 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 32

सकाम गति और भगवद्भक्ति का परम लक्ष्य

श्लोक 32.1

कपिल उवाच । अथ यो गृहमेधीयान् धर्मानेवावसन् गृहे । काममर्थं च धर्मान् स्वान् दोग्धि भूयः पिपर्ति तान् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: कपिल बोले—गृहासक्त व्यक्ति अपने धर्म से केवल अर्थ और काम प्राप्त करता तथा उन्हीं के लिए फिर कर्म करता है।

श्लोक 32.2

स चापि भगवद्धर्मात्काममूढः पराङ्मुखः । यजते क्रतुभिर्देवान् पितॄंश्च श्रद्धयान्वितः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: कामना से मोहित होकर भगवद्भक्ति से विमुख ऐसा व्यक्ति भी श्रद्धा से देव-पितरों के यज्ञ करता है।

श्लोक 32.3

तच्छ्रद्धयाक्रान्तमतिः पितृदेवव्रतः पुमान् । गत्वा चान्द्रमसं लोकं सोमपाः पुनरेष्यति ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन उपासनाओं के फल से चन्द्रलोक आदि प्राप्त करता है, किन्तु पुण्य समाप्त होने पर फिर लौटता है।

श्लोक 32.4

यदा चाहीन्द्रशय्यायां शेतेऽनन्तासनो हरिः । तदा लोका लयं यान्ति त एते गृहमेधिनाम् ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रलय में हरि अनन्तशय्या पर योगनिद्रा करें तो ऐसे सकाम उपासकों के प्राप्त लोक भी लीन हो जाते हैं।

श्लोक 32.5

ये स्वधर्मान् न दुह्यन्ति धीराः कामार्थहेतवे । निःसङ्गा न्यस्तकर्माणः प्रशान्ताः शुद्धचेतसः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसके विपरीत धीर साधक स्वधर्म को अर्थ-काम की दुहाई नहीं बनाते; वे अनासक्त, समर्पित और शुद्धचित्त रहते हैं।

श्लोक 32.6

निवृत्तिधर्मनिरता निर्ममा निरहङ्कृताः । स्वधर्माख्येन सत्त्वेन परिशुद्धेन चेतसा ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: निवृत्तिधर्म में रत, ममता-अहंकाररहित होकर कर्तव्यपालन से उनका मन अधिक निर्मल होता है।

श्लोक 32.7

सूर्यद्वारेण ते यान्ति पुरुषं विश्वतोमुखम् । परावरेशं प्रकृतिमस्योत्पत्त्यन्तभावनम् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे उत्तरमार्ग से सर्वव्यापी परमपुरुष के उच्च आश्रय तक जाते हैं, जो प्रकृति और उसके उदय-अन्त के स्वामी हैं।

श्लोक 32.8

द्विपरार्धावसाने यः प्रलयो ब्रह्मणस्तु ते । तावदध्यासते लोकं परस्य परचिन्तकाः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: परमात्मचिन्तन में लगे वे ब्रह्मा के द्विपरार्ध पूर्ण होने के प्रलय तक उच्च लोक में रहते हैं।

श्लोक 32.9

क्ष्माम्भोऽनलानिलवियन्मन इन्द्रियार्थ- भूतादिभिः परिवृतं प्रतिसञ्जिहीर्षुः । अव्याकृतं विशति यर्हि गुणत्रयात्मा कालं पराख्यमनुभूय परः स्वयम्भूः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब ब्रह्मा अपनी आयु पूरी करके भूत, इन्द्रिय, मन और अहंकारयुक्त ब्रह्माण्ड को समेटते हुए अव्यक्त में प्रवेश करते हैं—

श्लोक 32.10

एवं परेत्य भगवन्तमनुप्रविष्टा ये योगिनो जितमरुन्मनसो विरागाः । तेनैव साकममृतं पुरुषं पुराणं ब्रह्म प्रधानमुपयान्त्यगताभिमानाः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: तब वैराग्य, प्राण-मनसंयम और निरभिमान से युक्त योगी उनके साथ पुरातन अमृत पुरुष के परम आश्रय को पाते हैं।

श्लोक 32.11

अथ तं सर्वभूतानां हृत्पद्मेषु कृतालयम् । श्रुतानुभावं शरणं व्रज भावेन भामिनि ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए हे माता, सबके हृदयकमल में रहने वाले और सुनी महिमा से परिचित उन प्रभु की प्रेमपूर्वक शरण लो।

श्लोक 32.12

आद्यः स्थिरचराणां यो वेदगर्भः सहर्षिभिः । योगेश्वरैः कुमाराद्यैः सिद्धैर्योगप्रवर्तकैः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा, उनके सहचर ऋषि, योगप्रवर्तक और सिद्ध भी उच्च आध्यात्मिक पदों के अधिकारी होते हैं।

श्लोक 32.13

भेददृष्ट्याभिमानेन निःसङ्गेनापि कर्मणा । कर्तृत्वात्सगुणं ब्रह्म पुरुषं पुरुषर्षभम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी जहाँ पृथक् दृष्टि या सूक्ष्म कर्तृत्वाभिमान शेष है, वहाँ सगुण जगत से सम्बन्ध बना रह सकता है।

श्लोक 32.14

स संसृत्य पुनः काले कालेनेश्वरमूर्तिना । जाते गुणव्यतिकरे यथापूर्वं प्रजायते ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: कालरूप ईश्वर से गुणों में पुनः क्षोभ होने पर ऐसी सृष्टिशक्तियाँ फिर पहले की तरह प्रकट होती हैं।

श्लोक 32.15

ऐश्वर्यं पारमेष्ठ्यं च तेऽपि धर्मविनिर्मितम् । निषेव्य पुनरायान्ति गुणव्यतिकरे सति ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: धर्म से प्राप्त ब्रह्मलोक का ऐश्वर्य भोगने वाले भी सूक्ष्म आसक्ति शेष रहने पर पुनः सृष्टिक्रम में आते हैं।

श्लोक 32.16

ये त्विहासक्तमनसः कर्मसु श्रद्धयान्विताः । कुर्वन्त्यप्रतिषिद्धानि नित्यान्यपि च कृत्स्नशः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो यहाँ कर्मों में आसक्ति रखकर श्रद्धापूर्वक सभी निषिद्धरहित नित्यकर्म भी करते हैं—

श्लोक 32.17

रजसा कुण्ठमनसः कामात्मानोऽजितेन्द्रियाः । पितॄन् यजन्त्यनुदिनं गृहेष्वभिरताशयाः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: परन्तु रजोगुण, कामना और इन्द्रियासक्ति से घर में रमे रहते तथा प्रतिदिन पितरों की पूजा करते हैं—

श्लोक 32.18

त्रैवर्गिकास्ते पुरुषा विमुखा हरिमेधसः । कथायां कथनीयोरुविक्रमस्य मधुद्विषः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे धर्म-अर्थ-काम तक सीमित होकर भगवान की महान लीलाकथा के रस से विमुख रहते हैं।

श्लोक 32.19

नूनं दैवेन विहता ये चाच्युतकथासुधाम् । हित्वा श‍ृण्वन्त्यसद्गाथाः पुरीषमिव विड्भुजः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: अच्युतकथामृत छोड़कर बुद्धि को गिराने वाली बातें सुनना महान दुर्भाग्य है, जैसे उत्तम आहार छोड़ अशुद्ध वस्तु ग्रहण करना।

श्लोक 32.20

दक्षिणेन पथार्यम्णः पितृलोकं व्रजन्ति ते । प्रजामनु प्रजायन्ते श्मशानान्तक्रियाकृतः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसे सकाम कर्मी दक्षिणमार्ग से पितृलोक जाते और अन्ततः फिर सन्ततियों के बीच जन्म लेते हैं।

श्लोक 32.21

ततस्ते क्षीणसुकृताः पुनर्लोकमिमं सति । पतन्ति विवशा देवैः सद्यो विभ्रंशितोदयाः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुण्य क्षीण होने पर उनके उच्चलोक का सुख छूटता है और वे पराधीन होकर पुनः इसी संसार में आते हैं।

श्लोक 32.22

तस्मात्त्वं सर्वभावेन भजस्व परमेष्ठिनम् । तद्गुणाश्रयया भक्त्या भजनीयपदाबुजम् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए सर्वभाव से परमेश्वर का उनके गुणों में मन लगाने वाली भक्ति से भजन करो।

श्लोक 32.23

वासुदेवे भगवति भक्तियोगः प्रयोजितः । जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं यद्ब्रह्मदर्शनम् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: वासुदेव में लगाया भक्तियोग शीघ्र वैराग्य और ब्रह्मदर्शन कराने वाला ज्ञान उत्पन्न करता है।

श्लोक 32.24

यदास्य चित्तमर्थेषु समेष्विन्द्रियवृत्तिभिः । न विगृह्णाति वैषम्यं प्रियमप्रियमित्युत ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब चित्त विषयों को प्रिय-अप्रिय मानकर राग-द्वेष की विषमता नहीं बनाता—

श्लोक 32.25

स तदैवात्मनाऽऽत्मानं निःसङ्गं समदर्शनम् । हेयोपादेयरहितमारूढं पदमीक्षते ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: तभी साधक आत्मा को असङ्ग, समदर्शी और ग्रहण-त्याग की अशान्ति से परे स्थिति में देखता है।

श्लोक 32.26

ज्ञानमात्रं परं ब्रह्म परमात्मेश्वरः पुमान् । दृश्यादिभिः पृथग्भावैर्भगवानेक ईयते ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानस्वरूप ब्रह्म, परमात्मा, ईश्वर और परमपुरुष—एक भगवान को विभिन्न दृष्टियों से इन नामों में जाना जाता है।

श्लोक 32.27

एतावानेव योगेन समग्रेणेह योगिनः । युज्यतेऽभिमतो ह्यर्थो यदसङ्गस्तु कृत्स्नशः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: समग्र योग का अभिप्रेत फल यही है कि साधक पूर्ण अनासक्ति को प्राप्त हो।

श्लोक 32.28

ज्ञानमेकं पराचीनैरिन्द्रियैर्ब्रह्म निर्गुणम् । अवभात्यर्थरूपेण भ्रान्त्या शब्दादिधर्मिणा ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: निर्गुण ज्ञानस्वरूप ब्रह्म बहिर्मुख इन्द्रियों और भ्रम के कारण शब्द आदि विषयों के रूप में भिन्न-भिन्न दिखता है।

श्लोक 32.29

यथा महानहं रूपस्त्रिवृत्पञ्चविधः स्वराट् । एकादशविधस्तस्य वपुरण्डं जगद्यतः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसी एक आधार की शक्ति महत्तत्त्व, अहंकार, गुण, भूत और इन्द्रियों के भेद से ब्रह्माण्डरूप विस्तार प्रकट करती है।

श्लोक 32.30

एतद्वै श्रद्धया भक्त्या योगाभ्यासेन नित्यशः । समाहितात्मा निःसङ्गो विरक्त्या परिपश्यति ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रद्धा, भक्ति, नियमित योगाभ्यास और वैराग्य से समाहित साधक इस सत्य को प्रत्यक्ष समझता है।

श्लोक 32.31

इत्येतत्कथितं गुर्वि ज्ञानं तद्ब्रह्मदर्शनम् । येनावबुद्ध्यते तत्त्वं प्रकृतेः पुरुषस्य च ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे आदरणीय माता, यही ब्रह्मदर्शन कराने वाला ज्ञान है, जिससे प्रकृति और पुरुष का तत्त्व जाना जाता है।

श्लोक 32.32

ज्ञानयोगश्च मन्निष्ठो नैर्गुण्यो भक्तिलक्षणः । द्वयोरप्येक एवार्थो भगवच्छब्दलक्षणः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुझमें निष्ठित ज्ञानयोग और निर्गुण भक्तियोग दोनों का परम लक्ष्य एक ही भगवान हैं।

श्लोक 32.33

यथेन्द्रियैः पृथग्द्वारैरर्थो बहुगुणाश्रयः । एको नानेयते तद्वद्भगवान् शास्त्रवर्त्मभिः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक पदार्थ अलग इन्द्रियों से अलग गुणों में जाना जाता है; वैसे एक भगवान विभिन्न शास्त्रमार्गों से अनुभूत होते हैं।

श्लोक 32.34

क्रियया क्रतुभिर्दानैस्तपःस्वाध्यायमर्शनैः । आत्मेन्द्रियजयेनापि सन्न्यासेन च कर्मणाम् ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: सत्कर्म, यज्ञ, दान, तप, स्वाध्याय, विवेक, मन-इन्द्रियसंयम और कर्मसमर्पण—

श्लोक 32.35

योगेन विविधाङ्गेन भक्तियोगेन चैव हि । धर्मेणोभयचिह्नेन यः प्रवृत्तिनिवृत्तिमान् ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: विविध योगाङ्ग, भक्तियोग तथा प्रवृत्ति और निवृत्ति के धर्म—

श्लोक 32.36

आत्मतत्त्वावबोधेन वैराग्येण दृढेन च । ईयते भगवानेभिः सगुणो निर्गुणः स्वदृक् ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: आत्मतत्त्वज्ञान और दृढ़ वैराग्य सहित इन साधनों से स्वयंप्रकाश भगवान के सगुण तथा निर्गुण स्वरूप का बोध होता है।

श्लोक 32.37

प्रावोचं भक्तियोगस्य स्वरूपं ते चतुर्विधम् । कालस्य चाव्यक्तगतेर्योऽन्तर्धावति जन्तुषु ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हें तीन गुणों और निर्गुण भाव के अनुसार भक्ति के चार प्रकार तथा भीतर से सक्रिय अप्रकट कालगति बताई।

श्लोक 32.38

जीवस्य संसृतीर्बह्वीरविद्याकर्मनिर्मिताः । यास्वङ्ग प्रविशन्नात्मा न वेद गतिमात्मनः ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: अविद्या और कर्म से बनी जीव की अनेक संसारगत अवस्थाएँ भी कही हैं, जिनमें वह अपनी वास्तविक गति भूलता है।

श्लोक 32.39

नैतत्खलायोपदिशेन्नाविनीताय कर्हिचित् । न स्तब्धाय न भिन्नाय नैव धर्मध्वजाय च ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह ज्ञान दुष्ट, अविनयी, घमण्डी, द्वेषपूर्ण या धर्म का दिखावा करने वाले को अनुचित रीति से न दिया जाए।

श्लोक 32.40

न लोलुपायोपदिशेन्न गृहारूढचेतसे । नाभक्ताय च मे जातु न मद्भक्तद्विषामपि ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: लोभी, अत्यधिक गृहासक्त, भक्ति से विमुख या भक्तों से द्वेष रखने वाले में इसकी ग्रहणशीलता पहले विकसित करनी चाहिए।

श्लोक 32.41

श्रद्दधानाय भक्ताय विनीतायानसूयवे । भूतेषु कृतमैत्राय शुश्रूषाभिरताय च ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसे श्रद्धालु, भक्त, विनम्र, दोषदृष्टिरहित, सब जीवों से मैत्री करने वाले और सुनने-सेवा करने के इच्छुक को दो।

श्लोक 32.42

बहिर्जातविरागाय शान्तचित्ताय दीयताम् । निर्मत्सराय शुचये यस्याहं प्रेयसां प्रियः ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: विषयवैराग्य, शान्तचित्त, निर्मत्सरता और पवित्रता वाले, जिसके लिए मैं प्रियतम हूँ, ऐसे साधक को यह शिक्षा फलती है।

श्लोक 32.43

य इदं श‍ृणुयादम्ब श्रद्धया पुरुषः सकृत् । यो वाभिधत्ते मच्चित्तः स ह्येति पदवीं च मे ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे माता, जो श्रद्धा से यह उपदेश सुने अथवा मुझमें मन लगाकर सुनाए, वह मेरी गति प्राप्त करता है।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 32 समाप्त ॥

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तृतीय स्कन्ध • अध्याय 33

देवहूति की स्तुति, साधना और सिद्धि

श्लोक 33.1

मैत्रेय उवाच । एवं निशम्य कपिलस्य वचो जनित्री सा कर्दमस्य दयिता किल देवहूतिः । विस्रस्तमोहपटला तमभिप्रणम्य तुष्टाव तत्त्वविषयाङ्कितसिद्धिभूमिम् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—कपिल का उपदेश सुनकर देवहूति का मोहावरण हट गया; उन्होंने तत्त्वसिद्धि के आश्रय पुत्ररूप भगवान को प्रणाम करके स्तुति की।

श्लोक 33.2

देवहूतिरुवाच । अथाप्यजोऽन्तःसलिले शयानं भूतेन्द्रियार्थात्ममयं वपुस्ते । गुणप्रवाहं सदशेषबीजं दध्यौ स्वयं यज्जठराब्जजातः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवहूति बोलीं—आपके नाभिकमल से जन्मे ब्रह्मा ने भी जलशायी आपके भूत, इन्द्रिय और विषयों के बीजरूप विश्वशरीर का ध्यान किया।

श्लोक 33.3

स एव विश्वस्य भवान् विधत्ते गुणप्रवाहेण विभक्तवीर्यः । सर्गाद्यनीहोऽवितथाभिसन्धि- रात्मेश्वरोऽतर्क्यसहस्रशक्तिः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: निष्काम और सत्यसंकल्प आप ही अचिन्त्य शक्तियों तथा गुणप्रवाह द्वारा विश्व की सृष्टि, स्थिति और प्रलय करते हैं।

श्लोक 33.4

स त्वं भृतो मे जठरेण नाथ कथं नु यस्योदर एतदासीत् । विश्वं युगान्ते वटपत्र एकः शेते स्म मायाशिशुरङ्घ्रिपानः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिनके उदर में समस्त विश्व रहता और जो प्रलय में वटपत्र पर बालक बनकर चरण चूसते हैं, वे आप मेरे गर्भ में कैसे समाए!

श्लोक 33.5

त्वं देहतन्त्रः प्रशमाय पाप्मनां निदेशभाजां च विभो विभूतये । यथावतारास्तव सूकरादय- स्तथायमप्यात्मपथोपलब्धये ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे वराह आदि अवतार पापशमन और भक्तकल्याण के लिए हैं, वैसे कपिलावतार आत्ममार्ग प्रकट करने के लिए है।

श्लोक 33.6

यन्नामधेयश्रवणानुकीर्तना- द्यत्प्रह्वणाद्यत्स्मरणादपि क्वचित् । श्वादोऽपि सद्यः सवनाय कल्पते कुतः पुनस्ते भगवन् नु दर्शनात् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपका नाम सुनने, गाने, प्रणाम और स्मरण से सामाजिक रूप से तिरस्कृत व्यक्ति भी पवित्र हो सकता है; प्रत्यक्ष दर्शन की महिमा तो और बड़ी है।

श्लोक 33.7

अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम् । तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिसकी जिह्वा पर आपका नाम है, वह जन्म की सामाजिक स्थिति से परे सम्माननीय है; नामस्मरण तप, यज्ञ, पवित्रता और वेदाध्ययन का सार देता है।

श्लोक 33.8

तं त्वामहं ब्रह्म परं पुमांसं प्रत्यक्स्रोतस्यात्मनि संविभाव्यम् । स्वतेजसा ध्वस्तगुणप्रवाहं वन्दे विष्णुं कपिलं वेदगर्भम् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: अन्तर्मुख चेतना में अनुभूत, अपने तेज से गुणमोह मिटाने वाले परब्रह्म पुरुष, वेदमय कपिलविष्णु को मैं प्रणाम करती हूँ।

श्लोक 33.9

मैत्रेय उवाच । ईडितो भगवानेवं कपिलाख्यः परः पुमान् । वाचा विक्लवयेत्याह मातरं मातृवत्सलः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—इस प्रकार स्तुति किए जाने पर मातृवत्सल कपिल ने स्नेह से विह्वल वाणी में माता को उत्तर दिया।

श्लोक 33.10

कपिल उवाच । मार्गेणानेन मातस्ते सुसेव्येनोदितेन मे । आस्थितेन परां काष्ठामचिरादवरोत्स्यसि ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: कपिल बोले—हे माता, मेरे बताए इस सुगम साधनामार्ग पर स्थित होकर तुम शीघ्र परम अवस्था प्राप्त करोगी।

श्लोक 33.11

श्रद्धत्स्वैतन्मतं मह्यं जुष्टं यद्ब्रह्मवादिभिः । येन मामभवं याया मृत्युमृच्छन्त्यतद्विदः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मज्ञानी भी इस शिक्षा को अपनाते हैं; श्रद्धा रखो, इससे अजन्मा मुझे प्राप्त करोगी, जबकि अज्ञान में मृत्युचक्र बना रहता है।

श्लोक 33.12

मैत्रेय उवाच । इति प्रदर्श्य भगवान् सतीं तामात्मनो गतिम् । स्वमात्रा ब्रह्मवादिन्या कपिलोऽनुमतो ययौ ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय बोले—माता को अपनी प्राप्ति का मार्ग दिखाकर कपिल ने उनसे अनुमति ली और प्रस्थान किया।

श्लोक 33.13

सा चापि तनयोक्तेन योगादेशेन योगयुक् । तस्मिन्नाश्रम आपीडे सरस्वत्याः समाहिता ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवहूति उसी सरस्वतीतट के आश्रम में पुत्र के बताए योग का एकाग्र अभ्यास करने लगीं।

श्लोक 33.14

अभीक्ष्णावगाहकपिशान् जटिलान् कुटिलालकान् । आत्मानं चोग्रतपसा बिभ्रती चीरिणं कृशम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: नियमित स्नान से उनके केश जटिल और कठोर तप से शरीर कृश हुआ; वे तपस्वी वस्त्र धारण करती थीं।

श्लोक 33.15

प्रजापतेः कर्दमस्य तपोयोगविजृम्भितम् । स्वगार्हस्थ्यमनौपम्यं प्रार्थ्यं वैमानिकैरपि ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: कर्दम की तप-योगशक्ति से प्राप्त उनका गृहस्थवैभव अनुपम था, जिसे देवविमानों के निवासी भी चाहते थे।

श्लोक 33.16

पयःफेननिभाः शय्या दान्ता रुक्मपरिच्छदाः । आसनानि च हैमानि सुस्पर्शास्तरणानि च ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसमें दूध के फेन जैसे श्वेत बिछौने, कलात्मक शय्याएँ, स्वर्णासनों और कोमल आच्छादनों का वैभव था।

श्लोक 33.17

स्वच्छस्फटिककुड्येषु महामारकतेषु च । रत्नप्रदीपा आभान्ति ललनारत्नसंयुताः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वच्छ स्फटिक और पन्ने की दीवारों के बीच रत्नदीप तथा सुन्दर कलाकृतियाँ प्रकाश देती थीं।

श्लोक 33.18

गृहोद्यानं कुसुमितै रम्यं बह्वमरद्रुमैः । कूजद्विहङ्गमिथुनं गायन् मत्तमधुव्रतम् ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उपवन कल्पवृक्षों, फूलों, पक्षियों के जोड़ों और गुँजारते भौंरों से रमणीय था।

श्लोक 33.19

यत्र प्रविष्टमात्मानं विबुधानुचरा जगुः । वाप्यामुत्पलगन्धिन्यां कर्दमेनोपलालितम् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: कमलसुगन्ध वाली बावड़ी में कर्दम सहित उनके विहार के समय दिव्य परिचारिकाएँ गुणगान करती थीं।

श्लोक 33.20

हित्वा तदीप्सिततममप्याखण्डलयोषिताम् । किञ्चिच्चकार वदनं पुत्रविश्लेषणातुरा ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवाङ्गनाओं को भी वाञ्छनीय वह वैभव छोड़कर वे पुत्रवियोग में कुछ समय उदास रहीं।

श्लोक 33.21

वनं प्रव्रजिते पत्यावपत्यविरहातुरा । ज्ञाततत्त्वाप्यभून्नष्टे वत्से गौरिव वत्सला ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: पति वन जा चुके थे; तत्त्वज्ञान होने पर भी वात्सल्य से वे बछड़े से बिछुड़ी गाय की तरह व्याकुल हुईं।

श्लोक 33.22

तमेव ध्यायती देवमपत्यं कपिलं हरिम् । बभूवाचिरतो वत्स निःस्पृहा तादृशे गृहे ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुत्ररूप कपिलहरि का निरन्तर ध्यान करते हुए शीघ्र ही उस ऐश्वर्यपूर्ण घर से उनकी आसक्ति मिट गई।

श्लोक 33.23

ध्यायती भगवद्रूपं यदाह ध्यानगोचरम् । सुतः प्रसन्नवदनं समस्तव्यस्तचिन्तया ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने पुत्र के बताए प्रसन्नमुख भगवान का समग्र और एक-एक अंग करके ध्यान किया।

श्लोक 33.24

भक्तिप्रवाहयोगेन वैराग्येण बलीयसा । युक्तानुष्ठानजातेन ज्ञानेन ब्रह्महेतुना ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: अविच्छिन्न भक्ति, प्रबल वैराग्य और यथाविधि साधना से उत्पन्न ब्रह्मज्ञान द्वारा—

श्लोक 33.25

विशुद्धेन तदाऽऽत्मानमात्मना विश्वतोमुखम् । स्वानुभूत्या तिरोभूतमायागुणविशेषणम् ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: निर्मल चित्त में सर्वव्यापी आत्मस्वरूप का अनुभव हुआ और माया के गुणों का आवरण मिट गया।

श्लोक 33.26

ब्रह्मण्यवस्थितमतिर्भगवत्यात्मसंश्रये । निवृत्तजीवापत्तित्वात्क्षीणक्लेशाऽऽप्तनिर्वृतिः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: सबके आत्माश्रय भगवान में बुद्धि स्थिर होने से जीवभाव के क्लेश घटे और परम शान्ति प्राप्त हुई।

श्लोक 33.27

नित्यारूढसमाधित्वात्परावृत्तगुणभ्रमा । न सस्मार तदाऽऽत्मानं स्वप्ने दृष्टमिवोत्थितः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: नित्य समाधि से गुणों का भ्रम छूट गया; शरीराभिमान वैसे भूल गया जैसे जागने पर स्वप्न की पकड़ छूटती है।

श्लोक 33.28

तद्देहः परतः पोषोऽप्यकृशश्चाध्यसम्भवात् । बभौ मलैरवच्छन्नः सधूम इव पावकः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: परिचारिकाओं से पोषित शरीर तप के बावजूद अत्यधिक क्षीण नहीं हुआ; मलिन बाह्य अवस्था में भी वे धुएँ से ढकी अग्नि जैसी तेजस्वी थीं।

श्लोक 33.29

स्वाङ्गं तपोयोगमयं मुक्तकेशं गताम्बरम् । दैवगुप्तं न बुबुधे वासुदेवप्रविष्टधीः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: वासुदेव में बुद्धि लीन होने से उन्हें केश, वस्त्र और बाहरी देहावस्था का पहले जैसा बोध न रहा; दैव उनका संरक्षण करता था।

श्लोक 33.30

एवं सा कपिलोक्तेन मार्गेणाचिरतः परम् । आत्मानं ब्रह्मनिर्वाणं भगवन्तमवाप ह ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: कपिल के बताए मार्ग से देवहूति ने शीघ्र ही परमात्मा भगवान और ब्रह्मनिर्वाण की अवस्था प्राप्त की।

श्लोक 33.31

तद्वीरासीत्पुण्यतमं क्षेत्रं त्रैलोक्यविश्रुतम् । नाम्ना सिद्धपदं यत्र सा संसिद्धिमुपेयुषी ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ उन्हें सिद्धि मिली, वह स्थान तीनों लोकों में सिद्धपद नाम से प्रसिद्ध पवित्र क्षेत्र हुआ।

श्लोक 33.32

तस्यास्तद्योगविधुतमार्त्यं मर्त्यमभूत्सरित् । स्रोतसां प्रवरा सौम्य सिद्धिदा सिद्धसेविता ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: कथा में उनकी योगशुद्ध देह का पावन सरिता के रूप में प्राकट्य बताया गया, जो सिद्धों द्वारा सेवित है।

श्लोक 33.33

कपिलोऽपि महायोगी भगवान् पितुराश्रमात् । मातरं समनुज्ञाप्य प्रागुदीचीं दिशं ययौ ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: माता की अनुमति लेकर महायोगी कपिल पिता के आश्रम से उत्तरपूर्व दिशा की ओर गए।

श्लोक 33.34

सिद्धचारणगन्धर्वैर्मुनिभिश्चाप्सरोगणैः । स्तूयमानः समुद्रेण दत्तार्हणनिकेतनः ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: सिद्ध, चारण, गन्धर्व, मुनि और अप्सराएँ उनकी स्तुति करती रहीं; समुद्र ने आदर और निवासस्थान दिया।

श्लोक 33.35

आस्ते योगं समास्थाय साङ्ख्याचार्यैरभिष्टुतः । त्रयाणामपि लोकानामुपशान्त्यै समाहितः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ सांख्याचार्यों से वन्दित भगवान तीनों लोकों की शान्ति के लिए योग में समाहित रहते हैं।

श्लोक 33.36

एतन्निगदितं तात यत्पृष्टोऽहं तवानघ । कपिलस्य च संवादो देवहूत्याश्च पावनः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: हे विदुर, तुम्हारे पूछे विषय और कपिल–देवहूति का यह पवित्र संवाद इस प्रकार सुनाया।

श्लोक 33.37

य इदमनुश‍ृणोति योऽभिधत्ते कपिलमुनेर्मतमात्मयोगगुह्यम् । भगवति कृतधीः सुपर्णकेता- वुपलभते भगवत्पदारविन्दम् ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो कपिल के गूढ़ आत्मयोग को श्रद्धा से सुनता या कहता और गरुड़ध्वज भगवान में बुद्धि लगाता है, वह उनके चरणकमल प्राप्त करता है।

॥ तृतीय स्कन्ध • अध्याय 33 समाप्त ॥

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इस भाग का भक्ति-सन्देश

संतसङ्ग, हरिनाम, सरलता और सभी जीवों पर दया से भक्ति जीवन में उतरती है। कपिलभगवान का उपदेश बताता है कि मन विषयों में आसक्त हो तो बन्धन और परमात्मा में स्थिर हो तो मुक्ति का साधन है। देवहूति ने इसी ज्ञान, वैराग्य और प्रेममयी साधना से परम सिद्धि पाई।

पाठाधार और संपादकीय जानकारी

प्राचीन मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents का “श्रीमद्भागवतम्—तृतीयस्कन्धः” है। अध्याय 20–33 में क्रमशः 53, 56, 39, 57, 47, 44, 72, 30, 44, 45, 34, 48, 43 और 37 श्लोक हैं; कुल 649। समस्त तृतीय स्कन्ध में 1,411 श्लोक हैं। कोष्ठकों में दिए गए अतिरिक्त वैकल्पिक पद मुख्य क्रम में नहीं मिलाए गए हैं। हिंदी भावार्थ भक्ति भावना की स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है, किसी आधुनिक टीका की प्रतिलिपि नहीं। गर्भविकास, लोक और कर्मफल के वर्णन प्राचीन पुराणपरम्परा के अनुसार हैं, आधुनिक चिकित्सकीय विवरण नहीं। योग और प्राणायाम का पाठ ग्रंथ का भावार्थ है, व्यक्तिगत अभ्यास-प्रशिक्षण नहीं। वैराग्यप्रकरण की आसक्तिसम्बन्धी शिक्षा पुरुष और स्त्री दोनों के लिए लागू प्रसंग में पढ़ें।

॥ तृतीय स्कन्ध सम्पूर्ण ॥

॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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