श्रीमद्भागवत महापुराण चतुर्थ स्कन्ध भाग 1 — अध्याय 1–7, दक्ष–सती कथा और शिव महिमा

भक्ति भावना • पुराण साहित्य

श्रीमद्भागवत महापुराण

चतुर्थ स्कन्ध • भाग १ • अध्याय १–७

३०० मूल श्लोक • प्रत्येक श्लोक का सरल हिंदी भावार्थ

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अभिमान से अशान्ति, क्षमा से मंगल

चतुर्थ स्कन्ध का आरम्भ मनु और प्रजापतियों के वंशवर्णन से होता है। फिर दक्ष के अभिमान, सती की पीड़ा, वीरभद्र के प्राकट्य और यज्ञविनाश की कथा आती है। ब्रह्मा की प्रार्थना पर शिव क्षमा करते हैं और भगवान हरि, ब्रह्मा तथा शिव के मूल एकत्व का उपदेश देते हैं।

अध्याय 1–7 के सभी 300 श्लोक क्रम से प्रस्तुत हैं। प्रत्येक का सरल हिंदी भावार्थ इस प्रकाशन के लिए स्वतंत्र रूप से लिखा गया है। आगे ध्रुव की भक्ति और अन्य प्रसंग आएँगे।

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 1

मनुवंश, नर–नारायण और दक्ष की कन्याएँ

श्लोक 1.1

मैत्रेय उवाच । मनोस्तु शतरूपायां तिस्रः कन्याश्च जज्ञिरे । आकूतिर्देवहूतिश्च प्रसूतिरिति विश्रुताः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—मनु और शतरूपा की तीन प्रसिद्ध कन्याएँ आकूति, देवहूति और प्रसूति हुईं।

श्लोक 1.2

आकूतिं रुचये प्रादादपि भ्रातृमतीं नृपः । पुत्रिकाधर्ममाश्रित्य शतरूपानुमोदितः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुत्रों के होते हुए भी मनु ने शतरूपा की सहमति से आकूति का विवाह रुचि से पुत्रिका धर्म के अनुसार किया, जिसमें कन्या का पुत्र नाना के वंश का उत्तराधिकारी माना जाता था।

श्लोक 1.3

प्रजापतिः स भगवान् रुचिस्तस्यामजीजनत् । मिथुनं ब्रह्मवर्चस्वी परमेण समाधिना ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मतेज से सम्पन्न प्रजापति रुचि ने गहन समाधि के प्रभाव से आकूति के गर्भ से एक पुत्र और एक पुत्री उत्पन्न किए।

श्लोक 1.4

यस्तयोः पुरुषः साक्षाद्विष्णुर्यज्ञस्वरूपधृक् । या स्त्री सा दक्षिणा भूतेरंशभूतानपायिनी ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनमें पुत्र यज्ञस्वरूप विष्णु थे और पुत्री दक्षिणा, उनसे अविच्छिन्न लक्ष्मी का अंश थीं।

श्लोक 1.5

आनिन्ये स्वगृहं पुत्र्याः पुत्रं विततरोचिषम् । स्वायम्भुवो मुदा युक्तो रुचिर्जग्राह दक्षिणाम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वायम्भुव मनु प्रसन्न होकर अपनी पुत्री के तेजस्वी पुत्र को घर ले आए और रुचि ने दक्षिणा को अपने पास रखा।

श्लोक 1.6

तां कामयानां भगवानुवाह यजुषां पतिः । तुष्टायां तोषमापन्नोऽजनयद्द्वादशात्मजान् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञभगवान ने अपने प्रति अनुराग रखने वाली दक्षिणा से विवाह किया और परस्पर प्रसन्नता से उनके बारह पुत्र हुए।

श्लोक 1.7

तोषः प्रतोषः सन्तोषो भद्रः शान्तिरिडस्पतिः । इध्मः कविर्विभुः स्वह्नः सुदेवो रोचनो द्विषट् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन बारह पुत्रों के नाम तोष, प्रतोष, सन्तोष, भद्र, शान्ति, इडस्पति, इध्म, कवि, विभु, स्वह्न, सुदेव और रोचन थे।

श्लोक 1.8

तुषिता नाम ते देवा आसन् स्वायम्भुवान्तरे । मरीचिमिश्रा ऋषयो यज्ञः सुरगणेश्वरः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वायम्भुव मन्वन्तर में वे तुषित नामक देवता हुए; मरीचि आदि ऋषि थे और यज्ञ देवताओं के अधिपति थे।

श्लोक 1.9

प्रियव्रतोत्तानपादौ मनुपुत्रौ महौजसौ । तत्पुत्रपौत्रनप्तॄणामनुवृत्तं तदन्तरम् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनु के प्रतापी पुत्र प्रियव्रत और उत्तानपाद थे; उनके पुत्र, पौत्र और आगे के वंशजों से उस मन्वन्तर का विस्तार हुआ।

श्लोक 1.10

देवहूतिमदात्तात कर्दमायात्मजां मनुः । तत्सम्बन्धि श्रुतप्रायं भवता गदतो मम ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनु ने देवहूति का विवाह कर्दम से किया था। उनसे सम्बन्धित कथा तुम मुझसे पहले लगभग पूरी सुन चुके हो।

श्लोक 1.11

दक्षाय ब्रह्मपुत्राय प्रसूतिं भगवान् मनुः । प्रायच्छद्यत्कृतः सर्गस्त्रिलोक्यां विततो महान् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनु ने प्रसूति को ब्रह्मापुत्र दक्ष के साथ विवाह में दिया; उनके द्वारा उत्पन्न वंश तीनों लोकों में फैला।

श्लोक 1.12

याः कर्दमसुताः प्रोक्ता नव ब्रह्मर्षिपत्नयः । तासां प्रसूतिप्रसवं प्रोच्यमानं निबोध मे ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: कर्दम की जिन नौ कन्याओं का विवाह ब्रह्मर्षियों से हुआ था, अब उनकी सन्तानों का विवरण सुनो।

श्लोक 1.13

पत्नी मरीचेस्तु कला सुषुवे कर्दमात्मजा । कश्यपं पूर्णिमानं च ययोरापूरितं जगत् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मरीचि की पत्नी कला से कश्यप और पूर्णिमान उत्पन्न हुए; उनके वंशजों से जगत भर गया।

श्लोक 1.14

पूर्णिमासूत विरजं विश्वगं च परन्तप । देवकुल्यां हरेः पादशौचाद्याभूत्सरिद्दिवः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: पूर्णिमान से विरज, विश्वग और देवकुल्या हुए। देवकुल्या आगे भगवान के चरणधोवन से स्वर्गीय नदी बनीं।

श्लोक 1.15

अत्रेः पत्न्यनसूया त्रीञ्जज्ञे सुयशसः सुतान् । दत्तं दुर्वाससं सोममात्मेशब्रह्मसम्भवान् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अत्रि की पत्नी अनसूया से दत्त, दुर्वासा और सोम नामक तीन यशस्वी पुत्र हुए, जो क्रमशः विष्णु, शिव और ब्रह्मा के अंश माने गए।

श्लोक 1.16

विदुर उवाच । अत्रेर्गृहे सुरश्रेष्ठाः स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः । किञ्चिच्चिकीर्षवो जाता एतदाख्याहि मे गुरो ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर ने पूछा—गुरुदेव, सृष्टि, पालन और संहार के कारण ये श्रेष्ठ देव अत्रि के घर किस उद्देश्य से पुत्ररूप में आए?

श्लोक 1.17

मैत्रेय उवाच । ब्रह्मणा नोदितः सृष्टावत्रिर्ब्रह्मविदां वरः । सह पत्न्या ययावृक्षं कुलाद्रिं तपसि स्थितः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—ब्रह्मा से सन्तान उत्पन्न करने की प्रेरणा पाकर ब्रह्मज्ञानी अत्रि अपनी पत्नी के साथ ऋक्ष नामक पर्वत पर तप करने गए।

श्लोक 1.18

तस्मिन् प्रसूनस्तबकपलाशाशोककानने । वार्भिः स्रवद्भिरुद्घुष्टे निर्विन्ध्यायाः समन्ततः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ पुष्पगुच्छों, पलाश और अशोक के वृक्षों वाला वन था तथा चारों ओर निर्विन्ध्या नदी के जल की ध्वनि गूँजती थी।

श्लोक 1.19

प्राणायामेन संयम्य मनो वर्षशतं मुनिः । अतिष्ठदेकपादेन निर्द्वन्द्वोऽनिलभोजनः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुनि ने प्राणायाम से मन को संयमित करके सौ वर्ष तक एक पैर पर खड़े रहकर तप किया; वे द्वन्द्वों से परे केवल वायु पर निर्वाह करते रहे।

श्लोक 1.20

शरणं तं प्रपद्येऽहं य एव जगदीश्वरः । प्रजामात्मसमां मह्यं प्रयच्छत्विति चिन्तयन् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे मन में प्रार्थना करते थे—जो भी जगत के परम ईश्वर हैं, मैं उनकी शरण लेता हूँ; वे मुझे अपने समान सन्तान दें।

श्लोक 1.21

तप्यमानं त्रिभुवनं प्राणायामैधसाग्निना । निर्गतेन मुनेर्मूर्ध्नः समीक्ष्य प्रभवस्त्रयः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी प्राणायामजनित तपोऽग्नि से तीनों लोक तपने लगे। यह देखकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश वहाँ आने को उद्यत हुए।

श्लोक 1.22

अप्सरोमुनिगन्धर्वसिद्धविद्याधरोरगैः । वितायमानयशसस्तदाश्रमपदं ययुः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: अप्सराएँ, मुनि, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर और नाग उनकी महिमा गाते हुए साथ चले और वे तीनों अत्रि के आश्रम पहुँचे।

श्लोक 1.23

तत्प्रादुर्भावसंयोगविद्योतितमना मुनिः । उत्तिष्ठन्नेकपादेन ददर्श विबुधर्षभान् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके प्राकट्य से मुनि का मन आलोकित हो गया। उन्होंने एक पैर पर खड़े रहते हुए उन श्रेष्ठ देवताओं को देखा।

श्लोक 1.24

प्रणम्य दण्डवद्भूमावुपतस्थेऽर्हणाञ्जलिः । वृषहंससुपर्णस्थान् स्वैः स्वैश्चिह्नैश्च चिह्नितान् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने भूमि पर दण्डवत प्रणाम किया और पूजा की सामग्री हाथ में लेकर उनका स्वागत किया। वे अपने चिह्नों से पहचाने जाते हुए क्रमशः वृषभ, हंस और गरुड़ पर स्थित थे।

श्लोक 1.25

कृपावलोकेन हसद्वदनेनोपलम्भितान् । तद्रोचिषा प्रतिहते निमील्य मुनिरक्षिणी ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके हँसमुख, करुणापूर्ण दर्शन से मुनि आनन्दित हुए; उनके तेज के सामने उन्होंने आँखें मूँद लीं।

श्लोक 1.26

चेतस्तत्प्रवणं युञ्जन्नस्तावीत्संहताञ्जलिः । श्लक्ष्णया सूक्तया वाचा सर्वलोकगरीयसः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मन को उन्हीं में लगाकर और हाथ जोड़कर अत्रि ने लोकश्रेष्ठ देवताओं की मधुर वाणी से स्तुति की।

श्लोक 1.27

अत्रिरुवाच । विश्वोद्भवस्थितिलयेषु विभज्यमानै- र्मायागुणैरनुयुगं विगृहीतदेहाः । ते ब्रह्मविष्णुगिरिशाः प्रणतोऽस्म्यहं वः तेभ्यः क एव भवतां म इहोपहूतः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अत्रि बोले—आप ब्रह्मा, विष्णु और शिव सृष्टि, पालन और संहार के लिए माया के गुणों के अनुसार रूप धारण करते हैं। मैं आपको प्रणाम करता हूँ; मैंने आपमें किसका आह्वान किया था?

श्लोक 1.28

एको मयेह भगवान् विविधप्रधानै- श्चित्तीकृतः प्रजननाय कथं नु यूयम् । अत्रागतास्तनुभृतां मनसोऽपि दूराद्- ब्रूत प्रसीदत महानिह विस्मयो मे ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैंने तो सन्तान के लिए एक ही परमेश्वर का चिन्तन किया था; फिर आप तीनों कैसे आ गए? जीवों की बुद्धि से परे प्रभुओ, कृपा करके मेरा यह आश्चर्य दूर कीजिए।

श्लोक 1.29

मैत्रेय उवाच । इति तस्य वचः श्रुत्वा त्रयस्ते विबुधर्षभाः । प्रत्याहुः श्लक्ष्णया वाचा प्रहस्य तमृषिं प्रभो ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—अत्रि की बात सुनकर तीनों देवता मुस्कराए और मुनि को कोमल वचन बोले।

श्लोक 1.30

देवा ऊचुः । यथा कृतस्ते सङ्कल्पो भाव्यं तेनैव नान्यथा । सत्सङ्कल्पस्य ते ब्रह्मन् यद्वै ध्यायति ते वयम् ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवताओं ने कहा—तुम्हारा सत्य संकल्प अवश्य पूरा होगा। तुम जिस एक परम तत्त्व का ध्यान करते हो, हम उसी के रूप हैं।

श्लोक 1.31

अथास्मदंशभूतास्ते आत्मजा लोकविश्रुताः । भवितारोऽङ्ग भद्रं ते विस्रप्स्यन्ति च ते यशः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: हमारे अंशरूप तीन विख्यात पुत्र तुम्हारे यहाँ जन्म लेंगे और तुम्हारा यश फैलाएँगे। तुम्हारा कल्याण हो।

श्लोक 1.32

एवं कामवरं दत्त्वा प्रतिजग्मुः सुरेश्वराः । सभाजितास्तयोः सम्यग्दम्पत्योर्मिषतोस्ततः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार अभिलषित वर देकर वे देवता लौट गए; अत्रि और अनसूया उन्हें श्रद्धापूर्वक निहारते और सम्मान करते रहे।

श्लोक 1.33

सोमोऽभूद्ब्रह्मणोंऽशेन दत्तो विष्णोस्तु योगवित् । दुर्वासाः शङ्करस्यांशो निबोधाङ्गिरसः प्रजाः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा के अंश से सोम, विष्णु के अंश से योगवेत्ता दत्त और शिव के अंश से दुर्वासा हुए। अब अङ्गिरा की सन्तान सुनो।

श्लोक 1.34

श्रद्धा त्वङ्गिरसः पत्नी चतस्रोऽसूत कन्यकाः । सिनीवाली कुहू राका चतुर्थ्यनुमतिस्तथा ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: अङ्गिरा की पत्नी श्रद्धा से सिनीवाली, कुहू, राका और अनुमति नामक चार कन्याएँ हुईं।

श्लोक 1.35

तत्पुत्रावपरावास्तां ख्यातौ स्वारोचिषेऽन्तरे । उतथ्यो भगवान् साक्षाद्ब्रह्मिष्ठश्च बृहस्पतिः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनसे उतथ्य और महान ब्रह्मज्ञानी बृहस्पति नामक दो पुत्र भी हुए, जो स्वारोचिष मन्वन्तर में प्रसिद्ध हुए।

श्लोक 1.36

पुलस्त्योऽजनयत्पत्न्यामगस्त्यं च हविर्भुवि । सोऽन्यजन्मनि दह्राग्निर्विश्रवाश्च महातपाः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुलस्त्य की पत्नी हविर्भू से अगस्त्य और तपस्वी विश्रवा हुए। अगस्त्य दूसरे जन्म में जठराग्नि से सम्बद्ध नाम से भी प्रसिद्ध हुए।

श्लोक 1.37

तस्य यक्षपतिर्देवः कुबेरस्त्विडविडा सुतः । रावणः कुम्भकर्णश्च तथान्यस्यां विभीषणः ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: विश्रवा की पत्नी इडविडा से यक्षराज कुबेर तथा दूसरी पत्नी से रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण हुए।

श्लोक 1.38

पुलहस्य गतिर्भार्या त्रीनसूत सती सुतान् । कर्मश्रेष्ठं वरीयांसं सहिष्णुं च महामते ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुलह की पत्नी गति से कर्मश्रेष्ठ, वरीयान और सहिष्णु नामक तीन श्रेष्ठ पुत्र हुए।

श्लोक 1.39

क्रतोरपि क्रिया भार्या वालखिल्यानसूयत । ऋषीन् षष्टिसहस्राणि ज्वलतो ब्रह्मतेजसा ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्रतु की पत्नी क्रिया से ब्रह्मतेज से चमकते साठ हजार वालखिल्य ऋषि उत्पन्न हुए।

श्लोक 1.40

ऊर्जायां जज्ञिरे पुत्रा वसिष्ठस्य परन्तप । चित्रकेतुप्रधानास्ते सप्त ब्रह्मर्षयोऽमलाः ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वसिष्ठ की पत्नी ऊर्जा से चित्रकेतु आदि सात निर्मल ब्रह्मर्षि पुत्र हुए।

श्लोक 1.41

चित्रकेतुः सुरोचिश्च विरजा मित्र एव च । उल्बणो वसुभृद्यानो द्युमान् शक्त्यादयोऽपरे ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे चित्रकेतु, सुरोचि, विरजा, मित्र, उल्बण, वसुभृद्यान और द्युमान थे; वसिष्ठ के अन्य सम्बन्ध से शक्ति आदि पुत्र भी हुए।

श्लोक 1.42

चित्तिस्त्वथर्वणः पत्नी लेभे पुत्रं धृतव्रतम् । दध्यञ्चमश्वशिरसं भृगोर्वंशं निबोध मे ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: अथर्वा की पत्नी चित्ति से दृढ़व्रती दध्यङ् हुए, जो अश्वशिरा नाम से प्रसिद्ध थे। अब भृगु का वंश सुनो।

श्लोक 1.43

भृगुः ख्यात्यां महाभागः पत्न्यां पुत्रानजीजनत् । धातारं च विधातारं श्रियं च भगवत्पराम् ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: भृगु और उनकी पुण्यवती पत्नी ख्याति से धाता, विधाता और भगवान में परम अनुरक्त श्री उत्पन्न हुईं।

श्लोक 1.44

आयतिं नियतिं चैव सुते मेरुस्तयोरदात् । ताभ्यां तयोरभवतां मृकण्डः प्राण एव च ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरु ने अपनी कन्याएँ आयति और नियति क्रमशः धाता और विधाता को दीं; उनसे मृकण्ड और प्राण हुए।

श्लोक 1.45

मार्कण्डेयो मृकण्डस्य प्राणाद्वेदशिरा मुनिः । कविश्च भार्गवो यस्य भगवानुशना सुतः ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मृकण्ड से मार्कण्डेय और प्राण से वेदशिरा मुनि हुए। भृगुवंश में कवि भी हुए, जिनके पुत्र उशना अर्थात शुक्राचार्य थे।

श्लोक 1.46

त एते मुनयः क्षत्तर्लोकान् सर्गैरभावयन् । एष कर्दमदौहित्रसन्तानः कथितस्तव । श‍ृण्वतः श्रद्दधानस्य सद्यः पापहरः परः ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर, इन मुनियों ने अपने वंश से लोकों का विस्तार किया। कर्दम की पुत्रियों से उत्पन्न इस वंश का श्रद्धापूर्वक श्रवण शुद्धिदायक कहा गया है।

श्लोक 1.47

प्रसूतिं मानवीं दक्ष उपयेमे ह्यजात्मजः । तस्यां ससर्ज दुहितॄः षोडशामललोचनाः ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मापुत्र दक्ष ने मनु की कन्या प्रसूति से विवाह किया और उनकी सोलह सुन्दर कन्याएँ हुईं।

श्लोक 1.48

त्रयोदशादाद्धर्माय तथैकामग्नये विभुः । पितृभ्य एकां युक्तेभ्यो भवायैकां भवच्छिदे ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: दक्ष ने उनमें तेरह कन्याएँ धर्म को, एक अग्नि को, एक पितरों को और एक संसारबन्धन हरने वाले शिव को दी।

श्लोक 1.49

श्रद्धा मैत्री दया शान्तिस्तुष्टिः पुष्टिः क्रियोन्नतिः । बुद्धिर्मेधा तितिक्षा ह्रीर्मूर्तिर्धर्मस्य पत्नयः ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: धर्म की पत्नियाँ श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ह्री और मूर्ति थीं।

श्लोक 1.50

श्रद्धासूत शुभं मैत्री प्रसादमभयं दया । शान्तिः सुखं मुदं तुष्टिः स्मयं पुष्टिरसूयत ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रद्धा से शुभ, मैत्री से प्रसाद, दया से अभय, शान्ति से सुख, तुष्टि से मुद और पुष्टि से स्मय उत्पन्न हुए।

श्लोक 1.51

योगं क्रियोन्नतिर्दर्पमर्थं बुद्धिरसूयत । मेधा स्मृतिं तितिक्षा तु क्षेमं ह्रीः प्रश्रयं सुतम् ॥ ५१॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्रिया से योग, उन्नति से दर्प, बुद्धि से अर्थ, मेधा से स्मृति, तितिक्षा से क्षेम और ह्री से प्रश्रय उत्पन्न हुए। यह गुणों का मानवीकरण करते हुए वंशवर्णन है।

श्लोक 1.52

मूर्तिः सर्वगुणोत्पत्तिर्नरनारायणावृषी ॥ ५२॥

सरल हिंदी भावार्थ: समस्त सद्गुणों की जननी मूर्ति से नर और नारायण ऋषि प्रकट हुए।

श्लोक 1.53

ययोर्जन्मन्यदो विश्वमभ्यनन्दत्सुनिर्वृतम् । मनांसि ककुभो वाताः प्रसेदुः सरितोऽद्रयः ॥ ५३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके जन्म पर जगत ने आनन्द मनाया; मन, दिशाएँ, वायु, नदियाँ और पर्वत सब प्रसन्न हो उठे।

श्लोक 1.54

दिव्यवाद्यन्त तूर्याणि पेतुः कुसुमवृष्टयः । मुनयस्तुष्टुवुस्तुष्टा जगुर्गन्धर्वकिन्नराः ॥ ५४॥

सरल हिंदी भावार्थ: दिव्य वाद्य बजे, पुष्पवर्षा हुई, प्रसन्न मुनियों ने स्तुति की और गन्धर्वों ने गीत गाए।

श्लोक 1.55

नृत्यन्ति स्म स्त्रियो देव्य आसीत्परममङ्गलम् । देवा ब्रह्मादयः सर्वे उपतस्थुरभिष्टवैः ॥ ५५॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवाङ्गनाएँ नृत्य करने लगीं और बड़ा मंगलमय उत्सव हुआ। ब्रह्मा आदि देवता स्तुति करने पहुँचे।

श्लोक 1.56

देवा ऊचुः । यो मायया विरचितं निजयाऽऽत्मनीदं खे रूपभेदमिव तत्प्रतिचक्षणाय । एतेन धर्मसदने ऋषिमूर्तिनाद्य प्रादुश्चकार पुरुषाय नमः परस्मै ॥ ५६॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवताओं ने कहा—जो अपनी माया से अपने भीतर जगत की विविधता रचकर उसे प्रकट करते हैं और अब धर्म के घर ऋषिरूप में आए हैं, उन परम पुरुष को प्रणाम है।

श्लोक 1.57

सोऽयं स्थितिव्यतिकरोपशमाय सृष्टान् सत्त्वेन नः सुरगणाननुमेयतत्त्वः । दृश्याददभ्रकरुणेन विलोकनेन यच्छ्रीनिकेतममलं क्षिपतारविन्दम् ॥ ५७॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपका तत्त्व बुद्धि से पूरी तरह नहीं जाना जा सकता। जगत की व्यवस्था बचाने के लिए हमें उत्पन्न करने वाले प्रभु, करुणापूर्ण निर्मल दृष्टि से हमारी ओर देखिए।

श्लोक 1.58

एवं सुरगणैस्तात भगवन्तावभिष्टुतौ । लब्धावलोकैर्ययतुरर्चितौ गन्धमादनम् ॥ ५८॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवताओं की स्तुति और पूजा स्वीकार करके तथा उन्हें कृपादृष्टि देकर नर–नारायण गन्धमादन पर्वत चले गए।

श्लोक 1.59

ताविमौ वै भगवतो हरेरंशाविहागतौ । भारव्ययाय च भुवः कृष्णौ यदुकुरूद्वहौ ॥ ५९॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के वही अंश धरती का भार दूर करने के लिए यदुवंश और कुरुवंश में श्रीकृष्ण और अर्जुन के रूप में आए।

श्लोक 1.60

स्वाहाभिमानिनश्चाग्नेरात्मजांस्त्रीनजीजनत् । पावकं पवमानं च शुचिं च हुतभोजनम् ॥ ६०॥

सरल हिंदी भावार्थ: अग्नि की पत्नी स्वाहा से पावक, पवमान और शुचि नामक तीन पुत्र हुए, जो हवन की आहुति स्वीकार करते हैं।

श्लोक 1.61

तेभ्योऽग्नयः समभवन् चत्वारिंशच्च पञ्च च । त एवैकोनपञ्चाशत्साकं पितृपितामहैः ॥ ६१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन तीनों से पैंतालीस अग्नियाँ उत्पन्न हुईं; पिता और पितामह सहित उनकी कुल संख्या उनचास हुई।

श्लोक 1.62

वैतानिके कर्मणि यन्नामभिर्ब्रह्मवादिभिः । आग्नेय्य इष्टयो यज्ञे निरूप्यन्तेऽग्नयस्तु ते ॥ ६२॥

सरल हिंदी भावार्थ: वैदिक यज्ञों में वेदज्ञ जिन नामों से अग्निसम्बन्धी इष्टियों का विधान करते हैं, वे इन्हीं अग्नियों के नाम हैं।

श्लोक 1.63

अग्निष्वात्ता बर्हिषदः सौम्याः पितर आज्यपाः । साग्नयोऽनग्नयस्तेषां पत्नी दाक्षायणी स्वधा ॥ ६३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अग्निष्वात्त, बर्हिषद, सौम्य और आज्यप पितरों के अग्निसहित तथा अग्निरहित विभाग हैं; दक्ष की कन्या स्वधा उनकी पत्नी हुईं।

श्लोक 1.64

तेभ्यो दधार कन्ये द्वे वयुनां धारिणीं स्वधा । उभे ते ब्रह्मवादिन्यौ ज्ञानविज्ञानपारगे ॥ ६४॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वधा से वयुना और धारिणी नाम की दो कन्याएँ हुईं; दोनों ब्रह्मविद्या तथा उसके अनुभव में पारंगत थीं।

श्लोक 1.65

भवस्य पत्नी तु सती भवं देवमनुव्रता । आत्मनः सदृशं पुत्रं न लेभे गुणशीलतः ॥ ६५॥

सरल हिंदी भावार्थ: शिव की पत्नी सती अपने पति की अनन्य सेविका थीं; उन्हें शिव के समान गुण और शील वाला पुत्र नहीं हुआ।

श्लोक 1.66

पितर्यप्रतिरूपे स्वे भवायानागसे रुषा । अप्रौढैवात्मनाऽऽत्मानमजहाद्योगसंयुता ॥ ६६॥

सरल हिंदी भावार्थ: निर्दोष शिव के प्रति अपने पिता के अनुचित व्यवहार से अत्यन्त व्यथित सती ने युवावस्था में योग द्वारा देह त्याग दी।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 1 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 2

दक्ष का अभिमान और परस्पर शाप

श्लोक 2.1

विदुर उवाच । भवे शीलवतां श्रेष्ठे दक्षो दुहितृवत्सलः । विद्वेषमकरोत्कस्मादनादृत्यात्मजां सतीम् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर ने पूछा—दक्ष अपनी पुत्री से स्नेह रखते थे, फिर सती की उपेक्षा करके उन्होंने शीलवानों में श्रेष्ठ शिव से द्वेष क्यों किया?

श्लोक 2.2

कस्तं चराचरगुरुं निर्वैरं शान्तविग्रहम् । आत्मारामं कथं द्वेष्टि जगतो दैवतं महत् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: चराचर जगत के गुरु, निर्वैर, शान्त, आत्मतृप्त और महान देवता शिव से कोई द्वेष कैसे कर सकता है?

श्लोक 2.3

एतदाख्याहि मे ब्रह्मन् जामातुः श्वशुरस्य च । विद्वेषस्तु यतः प्राणांस्तत्यजे दुस्त्यजान् सती ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुरुदेव, बताइए कि ससुर और दामाद में ऐसा वैर कैसे हुआ, जिसके कारण सती ने प्रिय प्राण भी छोड़ दिए।

श्लोक 2.4

मैत्रेय उवाच । पुरा विश्वसृजां सत्रे समेताः परमर्षयः । तथामरगणाः सर्वे सानुगा मुनयोऽग्नयः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—एक बार प्रजापतियों के यज्ञ में महान ऋषि, देवता, अग्निदेव तथा उनके अनुचर एकत्र हुए।

श्लोक 2.5

तत्र प्रविष्टमृषयो दृष्ट्वार्कमिव रोचिषा । भ्राजमानं वितिमिरं कुर्वन्तं तन्महत्सदः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ दक्ष प्रवेश कर रहे थे। उनका तेज सूर्य के समान था और उनसे सभा प्रकाशित हो उठी।

श्लोक 2.6

उदतिष्ठन्सदस्यास्ते स्वधिष्ण्येभ्यः सहाग्नयः । ऋते विरिञ्चं शर्वं च तद्भासाऽऽक्षिप्तचेतसः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्हें देखकर ब्रह्मा और शिव को छोड़कर अग्निदेव सहित सभी सभासद अपने आसनों से उठ खड़े हुए।

श्लोक 2.7

सदसस्पतिभिर्दक्षो भगवान् साधु सत्कृतः । अजं लोकगुरुं नत्वा निषसाद तदाज्ञया ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: सभा के प्रमुखों ने दक्ष का सम्मान किया। दक्ष ने जगद्गुरु ब्रह्मा को प्रणाम करके उनकी अनुमति से आसन ग्रहण किया।

श्लोक 2.8

प्राङ्निषण्णं मृडं दृष्ट्वा नामृष्यत्तदनादृतः । उवाच वामं चक्षुर्भ्यामभिवीक्ष्य दहन्निव ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: शिव को पहले की तरह बैठे देखकर दक्ष ने उसे अपना अनादर माना। क्रोधभरी दृष्टि से देखते हुए वे कटु वचन बोलने लगे।

श्लोक 2.9

श्रूयतां ब्रह्मर्षयो मे सह देवाः सहाग्नयः । साधूनां ब्रुवतो वृत्तं नाज्ञानान्न च मत्सरात् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: दक्ष बोले—देवताओं, अग्नियों और ब्रह्मर्षियों, मेरी बात सुनिए। मैं अज्ञान या ईर्ष्या से नहीं, सदाचार की बात कह रहा हूँ। यह क्रुद्ध दक्ष का अपना दावा था।

श्लोक 2.10

अयं तु लोकपालानां यशोघ्नो निरपत्रपः । सद्भिराचरितः पन्था येन स्तब्धेन दूषितः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने आरोप लगाया—यह निर्लज्ज और अभिमानी देवताओं की प्रतिष्ठा घटाता है तथा सज्जनों के मार्ग का उल्लंघन करता है।

श्लोक 2.11

एष मे शिष्यतां प्राप्तो यन्मे दुहितुरग्रहीत् । पाणिं विप्राग्निमुखतः सावित्र्या इव साधुवत् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसने ब्राह्मणों और अग्नि के सम्मुख मेरी कन्या का पाणिग्रहण किया है, इसलिए यह मेरा शिष्यतुल्य हुआ।

श्लोक 2.12

गृहीत्वा मृगशावाक्ष्याः पाणिं मर्कटलोचनः । प्रत्युत्थानाभिवादार्हे वाचाप्यकृत नोचितम् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: दक्ष ने शिव के रूप का उपहास करके कहा—मेरी मृगनयनी पुत्री का हाथ ग्रहण करने पर भी इसने उठकर या वचन से मेरा उचित अभिवादन नहीं किया।

श्लोक 2.13

लुप्तक्रियायाशुचये मानिने भिन्नसेतवे । अनिच्छन्नप्यदां बालां शूद्रायेवोशतीं गिरम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: दक्ष ने कहा—मैंने अनिच्छा से अपनी कन्या ऐसे व्यक्ति को दी जो मेरी दृष्टि में विधिहीन, अशुचि, अभिमानी और मर्यादाभङ्ग करने वाला है; उन्होंने इसे शूद्र को वेदवाणी सौंपने के अपने समय के तिरस्कारपूर्ण उपमान से जोड़ा। यह दक्ष की दोषदृष्टि और ऐतिहासिक सामाजिक पूर्वाग्रह की वाणी है।

श्लोक 2.14

प्रेतावासेषु घोरेषु प्रेतैर्भूतगणैर्वृतः । अटत्युन्मत्तवन्नग्नो व्युप्तकेशो हसन् रुदन् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—यह भयानक श्मशानों में भूत–प्रेतों से घिरा, खुले शरीर और बिखरे केशों वाला, उन्मत्त की तरह हँसता–रोता घूमता है।

श्लोक 2.15

चिताभस्मकृतस्नानः प्रेतस्रङ्न्रस्थिभूषणः । शिवापदेशो ह्यशिवो मत्तो मत्तजनप्रियः । पतिः प्रमथभूतानां तमोमात्रात्मकात्मनाम् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: चिताभस्म, अस्थियों और श्मशान की मालाओं का उल्लेख करके दक्ष ने शिव को अमंगलकारी बताया तथा उनके गणों को अज्ञानमय कहा। कथा यहाँ दक्ष की दोषदृष्टि दिखाती है।

श्लोक 2.16

तस्मा उन्मादनाथाय नष्टशौचाय दुर्हृदे । दत्ता बत मया साध्वी चोदिते परमेष्ठिना ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: दक्ष ने खेद जताया—ब्रह्मा की प्रेरणा से मैंने अपनी साध्वी पुत्री ऐसे व्यक्ति को दे दी, जिसे मैं उन्मत्तों का स्वामी, अशुचि और दुर्भावनावाला मानता हूँ।

श्लोक 2.17

मैत्रेय उवाच । विनिन्द्यैवं स गिरिशमप्रतीपमवस्थितम् । दक्षोऽथाप उपस्पृश्य क्रुद्धः शप्तुं प्रचक्रमे ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—शिव प्रतिवाद किए बिना शान्त बैठे रहे। उनकी निन्दा करने के बाद दक्ष ने आचमन किया और क्रोध से शाप देने लगे।

श्लोक 2.18

अयं तु देवयजन इन्द्रोपेन्द्रादिभिर्भवः । सह भागं न लभतां देवैर्देवगणाधमः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने शाप दिया—शिव को देवयज्ञ में इन्द्र और उपेन्द्र आदि देवताओं के साथ यज्ञभाग न मिले।

श्लोक 2.19

निषिध्यमानः स सदस्यमुख्यै- र्दक्षो गिरित्राय विसृज्य शापम् । तस्माद्विनिष्क्रम्य विवृद्धमन्यु- र्जगामकौरव्य निजं निकेतनम् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुख्य सभासद उन्हें रोकते रहे, फिर भी दक्ष शाप देकर और अधिक क्रोध में अपने घर चले गए।

श्लोक 2.20

विज्ञाय शापं गिरिशानुगाग्रणीः नन्दीश्वरो रोषकषायदूषितः । दक्षाय शापं विससर्ज दारुणं ये चान्वमोदंस्तदवाच्यतां द्विजाः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह सुनकर शिवगणों के प्रमुख नन्दीश्वर भी क्रोध से भर गए। उन्होंने दक्ष और उनकी निन्दा का अनुमोदन करने वाले ब्राह्मणों को कठोर प्रतिशाप दिया।

श्लोक 2.21

य एतन्मर्त्यमुद्दिश्य भगवत्यप्रतिद्रुहि । द्रुह्यत्यज्ञः पृथग्दृष्टिस्तत्त्वतो विमुखो भवेत् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: नन्दीश्वर ने कहा—जो देह को ही सब कुछ मानकर निर्वैर भगवान शिव से द्वेष करता है, वह परम तत्त्व से विमुख हो।

श्लोक 2.22

गृहेषु कूटधर्मेषु सक्तो ग्राम्यसुखेच्छया । कर्मतन्त्रं वितनुते वेदवादविपन्नधीः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह सांसारिक सुख की चाह में बाहरी कर्मकाण्ड और दिखावे के गृहधर्म में उलझे तथा वेद के केवल फलवादी अर्थ में उसकी बुद्धि अटक जाए।

श्लोक 2.23

बुद्ध्या पराभिध्यायिन्या विस्मृतात्मगतिः पशुः । स्त्रीकामः सोऽस्त्वतितरां दक्षो बस्तमुखोऽचिरात् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: दूसरों के दोष सोचते हुए आत्महित भूलने वाला दक्ष विषयासक्ति में पशुवत हो और शीघ्र बकरे के मुख वाला बने।

श्लोक 2.24

विद्याबुद्धिरविद्यायां कर्ममय्यामसौ जडः । संसरन्त्विह ये चामुमनु शर्वावमानिनम् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो अज्ञानमय कर्मबन्धन को ही ज्ञान मानते हैं और शिव का अनादर करने वाले दक्ष का अनुसरण करते हैं, वे भी जन्म–मरण में भटकें।

श्लोक 2.25

गिरः श्रुतायाः पुष्पिण्या मधुगन्धेन भूरिणा । मथ्ना चोन्मथितात्मानः सम्मुह्यन्तु हरद्विषः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: शिव से द्वेष करने वाले लोग वेद की आकर्षक फलश्रुतियों के लोभ में पड़कर मोहग्रस्त हों।

श्लोक 2.26

सर्वभक्षा द्विजा वृत्त्यै धृतविद्या तपोव्रताः । वित्तदेहेन्द्रियारामा याचका विचरन्त्विह ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: नन्दीश्वर ने शाप दिया कि ऐसे ब्राह्मण विद्या, तप और व्रत को केवल आजीविका बनाकर धन, शरीर और इन्द्रियसुख में रमते हुए याचना करें। यह शाप प्रसंगविशेष के दोषियों के लिए है।

श्लोक 2.27

तस्यैवं ददतः शापं श्रुत्वा द्विजकुलाय वै । भृगुः प्रत्यसृजच्छापं ब्रह्मदण्डं दुरत्ययम् ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्राह्मण समुदाय के प्रति ऐसा शाप सुनकर भृगु ने भी प्रत्युत्तर में कठोर ब्रह्मशाप दिया।

श्लोक 2.28

भवव्रतधरा ये च ये च तान् समनुव्रताः पाखण्डिनस्ते भवन्तु सच्छास्त्रपरिपन्थिनः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: भृगु ने कहा—जो शिव के व्रत का पालन करते हैं और उनके पीछे चलते हैं, वे मान्य शास्त्रों के विरोधी पाखण्डमार्ग में पड़ें। यह भी क्रोध से उपजा प्रतिशाप है।

श्लोक 2.29

नष्टशौचा मूढधियो जटाभस्मास्थिधारिणः । विशन्तु शिवदीक्षायां यत्र दैवं सुरासवम् ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने शाप में कहा कि वे बाहरी शुचिता खोकर, जटा, भस्म और अस्थियाँ धारण करते हुए मदिरा को महत्त्व देने वाली विकृत दीक्षा अपनाएँ।

श्लोक 2.30

ब्रह्म च ब्राह्मणांश्चैव यद्यूयं परिनिन्दथ । सेतुं विधारणं पुंसामतः पाखण्डमाश्रिताः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: भृगु ने आरोप लगाया—तुम वेद और ब्राह्मणों की निन्दा करते हो, जो मनुष्यों के आचरण की मर्यादा के आधार हैं; इसलिए पाखण्ड को प्राप्त हो।

श्लोक 2.31

एष एव हि लोकानां शिवः पन्थाः सनातनः । यं पूर्वे चानुसन्तस्थुर्यत्प्रमाणं जनार्दनः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: भृगु ने कहा—पूर्वजों द्वारा अपनाया गया वैदिक मार्ग लोकों के कल्याण का सनातन पथ है, जिसके प्रमाण जनार्दन हैं।

श्लोक 2.32

तद्ब्रह्म परमं शुद्धं सतां वर्त्म सनातनम् । विगर्ह्य यात पाखण्डं दैवं वो यत्र भूतराट् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस निर्मल और सनातन मार्ग को निन्दित करने के कारण तुम उस विपथ में जाओ, जहाँ भूतनाथ को ही अपना एकमात्र देव मानकर दूसरों का विरोध किया जाता है।

श्लोक 2.33

मैत्रेय उवाच । तस्यैवं वदतः शापं भृगोः स भगवान् भवः । निश्चक्राम ततः किञ्चिद्विमना इव सानुगः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—भृगु को इस प्रकार शाप देते देखकर शिव कुछ उदास होकर अपने गणों के साथ सभा से निकल गए।

श्लोक 2.34

तेऽपि विश्वसृजः सत्रं सहस्रपरिवत्सरान् । संविधाय महेष्वास यत्रेज्य ऋषभो हरिः ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसके बाद प्रजापतियों ने एक हजार वर्ष तक वह यज्ञ सम्पन्न किया, जिसमें सर्वश्रेष्ठ पूज्य भगवान हरि की आराधना हुई।

श्लोक 2.35

आप्लुत्यावभृथं यत्र गङ्गा यमुनयान्विता । विरजेनात्मना सर्वे स्वं स्वं धाम ययुस्ततः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञ के अन्त में गङ्गा–यमुना के संगम पर अवभृथ स्नान करके सब निर्मल मन से अपने स्थानों को लौटे।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 2 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 3

सती की जिज्ञासा और शिव का विवेकपूर्ण उपदेश

श्लोक 3.1

मैत्रेय उवाच । सदा विद्विषतोरेवं कालो वै ध्रियमाणयोः । जामातुः श्वशुरस्यापि सुमहानतिचक्रमे ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—इस प्रकार ससुर दक्ष और दामाद शिव के बीच विरोध रहते हुए बहुत समय बीत गया।

श्लोक 3.2

यदाभिषिक्तो दक्षस्तु ब्रह्मणा परमेष्ठिना । प्रजापतीनां सर्वेषामाधिपत्ये स्मयोऽभवत् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब ब्रह्मा ने दक्ष को सभी प्रजापतियों का प्रमुख नियुक्त किया, तब उनके भीतर अभिमान बढ़ गया।

श्लोक 3.3

इष्ट्वा स वाजपेयेन ब्रह्मिष्ठानभिभूय च । बृहस्पतिसवं नाम समारेभे क्रतूत्तमम् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: वाजपेय यज्ञ करके और श्रेष्ठ ज्ञानियों की उपेक्षा करते हुए दक्ष ने बृहस्पतिसव नामक बड़ा यज्ञ आरम्भ किया।

श्लोक 3.4

तस्मिन् ब्रह्मर्षयः सर्वे देवर्षिपितृदेवताः । आसन् कृतस्वस्त्ययनास्तत्पत्न्यश्च सभर्तृकाः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसमें ब्रह्मर्षि, देवर्षि, पितर और देवता तथा उनकी पत्नियाँ अपने पतियों के साथ मंगलकर्म करके उपस्थित हुईं।

श्लोक 3.5

तदुपश्रुत्य नभसि खेचराणां प्रजल्पताम् । सती दाक्षायणी देवी पितुर्यज्ञमहोत्सवम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: दक्षपुत्री सती ने आकाश में जाते हुए देवसमूहों की बातचीत से पिता के यज्ञोत्सव का समाचार सुना।

श्लोक 3.6

व्रजन्तीः सर्वतो दिग्भ्य उपदेववरस्त्रियः । विमानयानाः सप्रेष्ठा निष्ककण्ठीः सुवाससः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने देखा कि सुन्दर वस्त्र और गले के आभूषण पहने देवाङ्गनाएँ अपने प्रिय पतियों सहित विमानों से सभी दिशाओं से जा रही हैं।

श्लोक 3.7

दृष्ट्वा स्वनिलयाभ्याशे लोलाक्षीर्मृष्टकुण्डलाः । पतिं भूतपतिं देवमौत्सुक्यादभ्यभाषत ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने निवास के पास से जाती, चमकते कुण्डलों वाली उन स्त्रियों को देखकर सती ने उत्सुक होकर भूतनाथ शिव से कहा।

श्लोक 3.8

सत्युवाच । प्रजापतेस्ते श्वशुरस्य साम्प्रतं निर्यापितो यज्ञमहोत्सवः किल । वयं च तत्राभिसराम वाम ते यद्यर्थितामी विबुधा व्रजन्ति हि ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: सती बोलीं—आपके ससुर प्रजापति दक्ष के यहाँ यज्ञोत्सव हो रहा है। यदि आपको उचित लगे तो हम भी चलें; ये देवता उसी के लिए जा रहे हैं।

श्लोक 3.9

तस्मिन् भगिन्यो मम भर्तृभिः स्वकै- र्ध्रुवं गमिष्यन्ति सुहृद्दिदृक्षवः । अहं च तस्मिन् भवताभिकामये सहोपनीतं परिबर्हमर्हितुम् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरी बहनें अपने पतियों के साथ सम्बन्धियों से मिलने अवश्य पहुँचेंगी। मैं भी आपके साथ वहाँ जाकर उपहार और आदर प्रस्तुत करना चाहती हूँ।

श्लोक 3.10

तत्र स्वसॄर्मे ननु भर्तृसम्मिता मातृष्वसॄः क्लिन्नधियं च मातरम् । द्रक्ष्ये चिरोत्कण्ठमना महर्षिभि- रुन्नीयमानं च मृडाध्वरध्वजम् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: बहुत दिनों से मैं अपनी बहनों, उनके पतियों, मौसियों और स्नेहमयी माता से मिलना चाहती हूँ। वहाँ ऋषियों द्वारा सम्पन्न यज्ञ भी देख सकूँगी।

श्लोक 3.11

त्वय्येतदाश्चर्यमजात्ममायया विनिर्मितं भाति गुणत्रयात्मकम् । तथाप्यहं योषिदतत्त्वविच्च ते दीना दिदृक्षे भव मे भवक्षितिम् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप अजन्मा हैं और अपनी माया से बने इस त्रिगुणात्मक जगत के तत्त्व को जानते हैं। मैं अभी उस तत्त्व को पूरी तरह नहीं जानती और अपने जन्मस्थान को देखने की इच्छा रखती हूँ।

श्लोक 3.12

पश्य प्रयान्तीरभवान्ययोषितो- ऽप्यलङ्कृताः कान्तसखा वरूथशः । यासां व्रजद्भिः शितिकण्ठमण्डितं नभो विमानैः कलहंसपाण्डुभिः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: देखिए, असम्बन्धित स्त्रियाँ भी सजधजकर अपने पतियों सहित जा रही हैं; हंसों जैसे सफेद विमानों से आकाश भर गया है।

श्लोक 3.13

कथं सुतायाः पितृगेहकौतुकं निशम्य देहः सुरवर्य नेङ्गते । अनाहुता अप्यभियन्ति सौहृदं भर्तुर्गुरोर्देहकृतश्च केतनम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: पिता के घर जाने की पुत्री की उत्सुकता सुनकर आपका मन क्यों नहीं पिघलता? प्रेम होने पर पति, गुरु और माता–पिता के घर बिना बुलाए भी जाया जाता है।

श्लोक 3.14

तन्मे प्रसीदेदममर्त्यवाञ्छितं कर्तुं भवान् कारुणिको बतार्हति । त्वयाऽऽत्मनोऽर्धेऽहमदभ्रचक्षुषा निरूपिता मानुगृहाण याचितः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: करुणामय प्रभु, मेरी इच्छा पूरी कीजिए। आपने मुझे अपना अर्धाङ्ग माना है; मेरी प्रार्थना स्वीकार करके मुझ पर कृपा कीजिए।

श्लोक 3.15

ऋषिरुवाच । एवं गिरित्रः प्रिययाभिभाषितः प्रत्यभ्यधत्त प्रहसन् सुहृत्प्रियः । संस्मारितो मर्मभिदः कुवागिषून् यानाह को विश्वसृजां समक्षतः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—प्रिय पत्नी की बात सुनकर शिव ने हल्की मुस्कान से उत्तर दिया। उन्हें सभा में दक्ष के कहे हृदयभेदी कटु वचन याद आ गए।

श्लोक 3.16

श्रीभगवानुवाच । त्वयोदितं शोभनमेव शोभने अनाहुता अप्यभियन्ति बन्धुषु । ते यद्यनुत्पादितदोषदृष्टयो बलीयसानात्म्यमदेन मन्युना ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: शिव बोले—तुम्हारी बात ठीक है कि सम्बन्धियों के यहाँ बिना बुलाए जा सकते हैं, पर तभी जब वे देहाभिमान और क्रोध से दूसरों में दोष न ढूँढ़ते हों।

श्लोक 3.17

विद्यातपोवित्तवपुर्वयःकुलैः सतां गुणैः षड्भिरसत्तमेतरैः । स्मृतौ हतायां भृतमानदुर्दृशः स्तब्धा न पश्यन्ति हि धाम भूयसाम् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: विद्या, तप, धन, रूप, आयु और कुल सज्जनों में सद्गुण बनते हैं; दुर्जनों में वही अभिमान पैदा करके विवेक नष्ट करते हैं और उन्हें महात्माओं की महिमा दिखाई नहीं देती।

श्लोक 3.18

नैतादृशानां स्वजनव्यपेक्षया गृहान् प्रतीयादनवस्थितात्मनाम् । येऽभ्यागतान् वक्रधियाभिचक्षते आरोपितभ्रूभिरमर्षणाक्षिभिः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: केवल सम्बन्ध का विचार करके ऐसे अस्थिरचित्त लोगों के घर नहीं जाना चाहिए, जो आने वाले को टेढ़ी दृष्टि और क्रोधभरी आँखों से देखते हैं।

श्लोक 3.19

तथारिभिर्न व्यथते शिलीमुखैः शेतेऽर्दिताङ्गो हृदयेन दूयता । स्वानां यथा वक्रधियां दुरुक्तिभि- र्दिवानिशं तप्यति मर्मताडितः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: शत्रु के बाणों का घाव भी उतना नहीं दुखाता जितना अपनों के कटु वचन। उनसे आहत हृदय दिन–रात जलता रहता है।

श्लोक 3.20

व्यक्तं त्वमुत्कृष्टगतेः प्रजापतेः प्रियाऽऽत्मजानामसि सुभ्रु सम्मता । अथापि मानं न पितुः प्रपत्स्यसे मदाश्रयात्कः परितप्यते यतः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम दक्ष की प्रिय और सम्मानित पुत्री हो, फिर भी मुझसे सम्बन्ध होने के कारण वहाँ तुम्हें आदर नहीं मिलेगा; दक्ष मेरे कारण भीतर से जलते हैं।

श्लोक 3.21

पापच्यमानेन हृदाऽऽतुरेन्द्रियः समृद्धिभिः पूरुषबुद्धिसाक्षिणाम् । अकल्प एषामधिरोढुमञ्जसा पदं परं द्वेष्टि यथासुरा हरिम् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: महात्माओं की समृद्धि देखकर जिसका हृदय ईर्ष्या से तपता है, वह उनके ऊँचे पद तक पहुँचने में असमर्थ होकर उनसे वैसे ही द्वेष करता है जैसे असुर हरि से करते हैं।

श्लोक 3.22

प्रत्युद्गमप्रश्रयणाभिवादनं विधीयते साधु मिथः सुमध्यमे । प्राज्ञैः परस्मै पुरुषाय चेतसा गुहाशयायैव न देहमानिने ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानीजन परस्पर उठकर स्वागत, विनय और प्रणाम करते हैं, पर उनके मन में वह आदर देहाभिमानी व्यक्ति के लिए नहीं, उसके भीतर स्थित परम पुरुष के लिए होता है।

श्लोक 3.23

सत्त्वं विशुद्धं वसुदेवशब्दितं यदीयते तत्र पुमानपावृतः । सत्त्वे च तस्मिन् भगवान् वासुदेवो ह्यधोक्षजो मे नमसा विधीयते ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: पूर्ण निर्मल चित्त को वसुदेव कहा जाता है, क्योंकि उसमें परम पुरुष आवरणरहित प्रकट होते हैं। उसी विशुद्ध स्थिति में मैं भगवान वासुदेव को प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 3.24

तत्ते निरीक्ष्यो न पितापि देहकृ- द्दक्षो मम द्विट् तदनुव्रताश्च ये । यो विश्वसृग्यज्ञगतं वरोरु मा- मनागसं दुर्वचसाकरोत्तिरः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए दक्ष तुम्हारे पिता होते हुए भी मेरे प्रति द्वेष रखने के कारण तुम्हारे मिलने योग्य नहीं हैं; उनके समर्थक भी ऐसे ही हैं। उन्होंने यज्ञसभा में निर्दोष मेरा अपमान किया था।

श्लोक 3.25

यदि व्रजिष्यस्यतिहाय मद्वचो भद्रं भवत्या न ततो भविष्यति । सम्भावितस्य स्वजनात्पराभवो यदा स सद्यो मरणाय कल्पते ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरी बात छोड़कर वहाँ जाने से तुम्हारा मंगल नहीं होगा। माननीय व्यक्ति का अपने ही लोगों से अपमानित होना अत्यन्त असह्य पीड़ा देता है।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 3 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 4

दक्ष के यज्ञ में सती का अपमान और देहत्याग

श्लोक 4.1

मैत्रेय उवाच । एतावदुक्त्वा विरराम शङ्करः पत्न्यङ्गनाशं ह्युभयत्र चिन्तयन् । सुहृद्दिदृक्षुः परिशङ्किता भवा- न्निष्क्रामती निर्विशती द्विधाऽऽस सा ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—शिव मौन हो गए; उन्हें दोनों स्थितियों में सती के अनिष्ट की आशंका थी। सती सम्बन्धियों से मिलना चाहती थीं, पर शिव की चेतावनी से डरती हुई कभी बाहर जातीं और कभी भीतर लौट आतीं।

श्लोक 4.2

सुहृद्दिदृक्षाप्रतिघातदुर्मनाः स्नेहाद्रुदत्यश्रुकलातिविह्वला । भवं भवान्यप्रतिपूरुषं रुषा प्रधक्ष्यतीवैक्षत जातवेपथुः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपनों से मिलने की इच्छा बाधित होने से वे दुखी हुईं। रोते हुए, क्रोध और कम्पन से व्याकुल होकर उन्होंने शान्त शिव की ओर अत्यन्त रोषभरी दृष्टि से देखा।

श्लोक 4.3

ततो विनिःश्वस्य सती विहाय तं शोकेन रोषेण च दूयता हृदा । पित्रोरगात्स्त्रैणविमूढधीर्गृहान् प्रेम्णाऽऽत्मनो योऽर्धमदात्सतां प्रियः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अन्ततः सती गहरी साँस लेकर, शोक और क्रोध से पीड़ित मन से शिव को छोड़ माता–पिता के घर चली गईं। शिव ने प्रेम से उन्हें अपना आधा शरीर माना था।

श्लोक 4.4

तामन्वगच्छन्द्रुतविक्रमां सती- मेकां त्रिनेत्रानुचराः सहस्रशः । सपार्षदयक्षा मणिमन्मदादयः पुरो वृषेन्द्रास्तरसा गतव्यथाः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: अकेली और शीघ्र जाती सती के पीछे मणिमान और मद आदि यक्षों सहित शिव के हजारों अनुचर नन्दी को आगे करके चल पड़े।

श्लोक 4.5

तां सारिकाकन्दुकदर्पणाम्बुज- श्वेतातपत्रव्यजनस्रगादिभिः । गीतायनैर्दुन्दुभिशङ्खवेणुभि- र्वृषेन्द्रमारोप्य विटङ्किता ययुः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने सती को वृषभ पर बैठाया और सारिका, कन्दुक, दर्पण, कमल, श्वेत छत्र, पंखे और मालाएँ लेकर, गीत तथा शङ्ख–दुन्दुभि–वंशी के साथ चले।

श्लोक 4.6

आब्रह्मघोषोर्जितयज्ञवैशसं विप्रर्षिजुष्टं विबुधैश्च सर्वशः । मृद्दार्वयःकाञ्चनदर्भचर्मभि- र्निसृष्टभाण्डं यजनं समाविशत् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: सती उस यज्ञस्थल में पहुँचीं, जहाँ वेदध्वनि गूँज रही थी, ऋषि और देवता उपस्थित थे तथा मिट्टी, लकड़ी, धातु, स्वर्ण, कुश और चर्म के यज्ञोपकरण रखे थे।

श्लोक 4.7

तामागतां तत्र न कश्चनाद्रिय- द्विमानितां यज्ञकृतो भयाज्जनः । ऋते स्वसॄर्वै जननीं च सादराः प्रेमाश्रुकण्ठ्यः परिषस्वजुर्मुदा ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: दक्ष के भय से किसी ने उनका स्वागत नहीं किया। केवल माता और बहनों ने प्रेम के आँसुओं से भरकर हर्षपूर्वक उन्हें गले लगाया।

श्लोक 4.8

सौदर्यसम्प्रश्नसमर्थवार्तया मात्रा च मातृष्वसृभिश्च सादरम् । दत्तां सपर्यां वरमासनं च सा नादत्त पित्राऽप्रतिनन्दिता सती ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: बहनों, माता और मौसियों ने कुशल पूछी तथा आसन और आदर दिया, पर पिता द्वारा उपेक्षित सती ने वह सत्कार स्वीकार नहीं किया।

श्लोक 4.9

अरुद्रभागं तमवेक्ष्य चाध्वरं पित्रा च देवे कृतहेलनं विभौ । अनादृता यज्ञसदस्यधीश्वरी चुकोप लोकानिव धक्ष्यती रुषा ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञ में शिव का भाग न देखकर और पिता द्वारा उनका अनादर देखकर सती प्रचण्ड क्रोध से भर उठीं। वे यज्ञसभा में सम्मान की अधिकारिणी होते हुए भी उपेक्षित थीं।

श्लोक 4.10

जगर्ह सामर्षविपन्नया गिरा शिवद्विषं धूमपथश्रमस्मयम् । स्वतेजसा भूतगणान् समुत्थितान् निगृह्य देवी जगतोऽभिश‍ृण्वतः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्रोध से काँपती वाणी में उन्होंने शिवद्वेषी और कर्मकाण्ड के अभिमानी दक्ष को सबके सामने धिक्कारा। साथ ही आक्रमण को उठे अपने गणों को रोक दिया।

श्लोक 4.11

देव्युवाच । न यस्य लोकेऽस्त्यतिशायनः प्रियः तथाप्रियो देहभृतां प्रियात्मनः । तस्मिन् समस्तात्मनि मुक्तवैरके ऋते भवन्तं कतमः प्रतीपयेत् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: सती बोलीं—शिव किसी को अत्यधिक प्रिय या अप्रिय नहीं मानते; वे सबके प्रिय आत्मा और निर्वैर हैं। आपके अतिरिक्त कौन उनका विरोध करेगा?

श्लोक 4.12

दोषान् परेषां हि गुणेषु साधवो गृह्णन्ति केचिन्न भवादृशा द्विज । गुणांश्च फल्गून् बहुलीकरिष्णवो महत्तमास्तेष्वविदद्भवानघम् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: सज्जन दूसरों के गुण स्वीकार करते हैं, पर आप उनमें भी दोष खोजते हैं। महात्मा तो थोड़ा गुण भी बढ़ाकर देखते हैं; आपने उन्हीं में अपराध देखा।

श्लोक 4.13

नाश्चर्यमेतद्यदसत्सु सर्वदा महद्विनिन्दा कुणपात्मवादिषु । सेर्ष्यं महापूरुषपादपांसुभिः निरस्ततेजःसु तदेव शोभनम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो लोग शरीर को ही आत्मा मानते हैं, उनमें महात्माओं की निन्दा होना आश्चर्य नहीं। महापुरुषों के चरणों की धूल के सामने उनका मिथ्या तेज टिकता नहीं, इसलिए वे ईर्ष्या करते हैं।

श्लोक 4.14

यद् द्व्यक्षरं नाम गिरेरितं नृणां सकृत्प्रसङ्गादघमाशु हन्ति तत् । पवित्रकीर्तिं तमलङ्घ्यशासनं भवानहो द्वेष्टि शिवं शिवेतरः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिस शिव के दो अक्षर का नाम एक बार सहज उच्चारण करने से भी पापहर कहा गया है, उन्हीं पवित्रकीर्ति और अटल शासन वाले शिव से आप द्वेष करते हैं।

श्लोक 4.15

यत्पादपद्मं महतां मनोऽलिभिः निषेवितं ब्रह्मरसासवार्थिभिः । लोकस्य यद्वर्षति चाशिषोऽर्थिनः तस्मै भवान् द्रुह्यति विश्वबन्धवे ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मानन्द चाहने वाले महात्माओं के मनरूपी भ्रमर जिनके चरणकमलों की सेवा करते हैं और जो जगत को आशीर्वाद देते हैं, उन विश्वबन्धु से आप विरोध रखते हैं।

श्लोक 4.16

किं वा शिवाख्यमशिवं न विदुस्त्वदन्ये ब्रह्मादयस्तमवकीर्य जटाः श्मशाने । तन्माल्यभस्मनृकपाल्यवसत्पिशाचै- र्ये मूर्धभिर्दधति तच्चरणावसृष्टम् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्या ब्रह्मा आदि देवता शिव के श्मशानवास, जटा, भस्म और कपाल नहीं जानते? फिर भी वे उनके चरणों से उतरे पुष्प अपने मस्तक पर रखते हैं; उनके बाहरी रूप से उनकी महिमा नहीं घटती।

श्लोक 4.17

कर्णौ पिधाय निरयाद्यदकल्प ईशे धर्मावितर्यसृणिभिर्नृभिरस्यमाने । छिन्द्यात्प्रसह्य रुशतीमसतीं प्रभुश्चे- ज्जिह्वामसूनपि ततो विसृजेत्स धर्मः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: सती ने धर्मरक्षक प्रभु की निन्दा को अत्यन्त असह्य बताते हुए प्राचीन कठोर प्रतिकार की बात कही—असमर्थ हो तो कान बन्द करके हटे और समर्थ हो तो निन्दा रोके, प्राण देकर भी। यह क्रुद्ध पात्र की प्रसंगगत वाणी है, आज किसी के प्रति हिंसा या आत्महानि का निर्देश नहीं।

श्लोक 4.18

अतस्तवोत्पन्नमिदं कलेवरं न धारयिष्ये शितिकण्ठगर्हिणः । जग्धस्य मोहाद्धि विशुद्धिमन्धसो जुगुप्सितस्योद्धरणं प्रचक्षते ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—शिव की निन्दा करने वाले आपसे उत्पन्न यह शरीर मैं नहीं रखूँगी। जैसे भूल से खाए अशुद्ध अन्न को निकालकर शुद्धि चाही जाती है, वैसे ही मैं इससे अलग होना चाहती हूँ।

श्लोक 4.19

न वेदवादाननुवर्तते मतिः स्व एव लोके रमतो महामुनेः । यथा गतिर्देवमनुष्ययोः पृथक् स्व एव धर्मे न परं क्षिपेत्स्थितः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने आत्मस्वरूप में रमण करने वाले महामुनि की बुद्धि कर्मफलवादी कथनों के अधीन नहीं होती। देव और मनुष्य की गति भिन्न होती है; अपने धर्म में रहकर दूसरे को निन्दित नहीं करना चाहिए।

श्लोक 4.20

कर्मप्रवृत्तं च निवृत्तमप्यृतं वेदे विविच्योभयलिङ्गमाश्रितम् । विरोधि तद्यौगपदैककर्तरि द्वयं तथा ब्रह्मणि कर्म नर्च्छति ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वेद में प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों के लिए सत्य मार्ग बताए गए हैं, पर वे अलग अधिकारियों के लिए हैं। एक ही व्यक्ति में विरोधी आचरण साथ नहीं चलते; परम ब्रह्म इन कर्मबन्धनों से परे है।

श्लोक 4.21

मा वः पदव्यः पितरस्मदास्थिता या यज्ञशालासु न धूमवर्त्मभिः । तदन्नतृप्तैरसुभृद्भिरीडिता अव्यक्तलिङ्गा अवधूतसेविताः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: पिताजी, हमारी साधना की गति केवल यज्ञशाला के धूममार्ग तक सीमित नहीं। वह बाहरी चिह्नों से पूरी नहीं पहचानी जाती और अवधूत महात्मा उसकी सेवा करते हैं।

श्लोक 4.22

नैतेन देहेन हरे कृतागसो देहोद्भवेनालमलं कुजन्मना । व्रीडा ममाभूत्कुजनप्रसङ्गतः तज्जन्म धिग्यो महतामवद्यकृत् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: शिव के अपराधी आपसे प्राप्त इस शरीर को रखना मुझे स्वीकार नहीं। महात्माओं की निन्दा करने वाले से जन्म का सम्बन्ध मेरे लिए लज्जाजनक हुआ है।

श्लोक 4.23

गोत्रं त्वदीयं भगवान् वृषध्वजो दाक्षायणीत्याह यदा सुदुर्मनाः । व्यपेतनर्मस्मितमाशु तद्ध्यहं व्युत्स्रक्ष्य एतत्कुणपं त्वदङ्गजम् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब शिव मुझे प्रेम से दाक्षायणी कहते हैं, तो आपके सम्बन्ध की स्मृति से मेरी प्रसन्नता मिट जाती है। इसलिए आपके शरीर से उत्पन्न इस देह को मैं छोड़ूँगी।

श्लोक 4.24

मैत्रेय उवाच । इत्यध्वरे दक्षमनूद्य शत्रुहन् क्षितावुदीचीं निषसाद शान्तवाक् । स्पृष्ट्वा जलं पीतदुकूलसंवृता निमील्य दृग्योगपथं समाविशत् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—ऐसा कहकर सती यज्ञस्थल की भूमि पर उत्तरमुख होकर बैठ गईं। पीत वस्त्र ओढ़े, जलस्पर्श किया, वाणी शान्त की और आँखें मूँदकर योगसमाधि में स्थित हुईं।

श्लोक 4.25

कृत्वा समानावनिलौ जितासना सोदानमुत्थाप्य च नाभिचक्रतः । शनैर्हृदि स्थाप्य धियोरसि स्थितं कण्ठाद्भ्रुवोर्मध्यमनिन्दितानयत् ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: कथा के अनुसार उन्होंने आसन स्थिर करके प्राण–अपान का संयम किया और उदान को नाभि से हृदय, कण्ठ तथा भृकुटि के मध्य ले गईं। यह पौराणिक योगवर्णन है।

श्लोक 4.26

एवं स्वदेहं महतां महीयसा मुहुः समारोपितमङ्कमादरात् । जिहासती दक्षरुषा मनस्विनी दधार गात्रेष्वनिलाग्निधारणाम् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिस शरीर को शिव ने बार–बार प्रेम से गोद में लिया था, उसी को दक्ष के प्रति रोष से छोड़ने की इच्छा करते हुए सती ने योगाग्नि की धारणा की।

श्लोक 4.27

ततः स्वभर्तुश्चरणाम्बुजासवं जगद्गुरोश्चिन्तयती न चापरम् । ददर्श देहो हतकल्मषः सती सद्यः प्रजज्वाल समाधिजाग्निना ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे केवल जगद्गुरु पति शिव के चरणकमलों का ध्यान कर रही थीं। कथा कहती है कि समाधि से उत्पन्न अग्नि में उनका शरीर प्रज्वलित हुआ।

श्लोक 4.28

तत्पश्यतां खे भुवि चाद्भुतं महत् हा हेति वादः सुमहानजायत । हन्त प्रिया दैवतमस्य देवी जहावसून् केन सती प्रकोपिता ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह आश्चर्य देखकर पृथ्वी और आकाश में हाहाकार हुआ—देवाधिदेव की प्रिया सती को किसने इतना व्यथित किया कि उन्होंने देह त्याग दी?

श्लोक 4.29

अहो अनात्म्यं महदस्य पश्यत प्रजापतेर्यस्य चराचरं प्रजाः । जहावसून् यद्विमताऽऽत्मजा सती मनस्विनी मानमभीक्ष्णमर्हति ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: लोग बोले—चराचर प्रजा के पालक दक्ष की कठोरता देखो! उनकी सम्मानयोग्य पुत्री सती उनके विरोध से आहत होकर प्राण छोड़ गईं।

श्लोक 4.30

सोऽयं दुर्मर्षहृदयो ब्रह्मध्रुक् च लोकेऽपकीर्तिं महतीमवाप्स्यति । यदङ्गजां स्वां पुरुषद्विडुद्यतां न प्रत्यषेधन्मृतयेऽपराधतः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: शिव का द्वेष करने वाले दक्ष ने अपने अपराध के कारण अपनी ही पुत्री को इस अनिष्ट से नहीं रोका; इससे उन्हें बड़ी अपकीर्ति मिलेगी।

श्लोक 4.31

वदत्येवं जने सत्या दृष्ट्वासुत्यागमद्भुतम् । दक्षं तत्पार्षदा हन्तुमुदतिष्ठन्नुदायुधाः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: लोग ऐसा कह रहे थे। सती का अद्भुत देहत्याग देखकर उनके अनुचर अस्त्र उठाकर दक्ष को मारने के लिए खड़े हुए।

श्लोक 4.32

तेषामापततां वेगं निशाम्य भगवान् भृगुः । यज्ञघ्नघ्नेन यजुषा दक्षिणाग्नौ जुहाव ह ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्हें वेग से आते देखकर भृगु ने यज्ञविघ्न रोकने वाले मन्त्र से दक्षिणाग्नि में आहुति दी।

श्लोक 4.33

अध्वर्युणा हूयमाने देवा उत्पेतुरोजसा । ऋभवो नाम तपसा सोमं प्राप्ताः सहस्रशः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस आहुति से ऋभु नाम के हजारों तेजस्वी देवता प्रकट हुए, जिन्होंने तप से सोमपान का अधिकार पाया था।

श्लोक 4.34

तैरलातायुधैः सर्वे प्रमथाः सह गुह्यकाः । हन्यमाना दिशो भेजुरुशद्भिर्ब्रह्मतेजसा ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जलती लकड़ियों के अस्त्रधारी और ब्रह्मतेज से दमकते उन देवताओं से पीड़ित होकर प्रमथ और यक्ष सभी दिशाओं में भाग गए।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 4 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 5

वीरभद्र का प्राकट्य और दक्षयज्ञ का विनाश

श्लोक 5.1

मैत्रेय उवाच । भवो भवान्या निधनं प्रजापते- रसत्कृताया अवगम्य नारदात् । स्वपार्षदसैन्यं च तदध्वरर्भुभि- र्विद्रावितं क्रोधमपारमादधे ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—नारद से सती के अपमान और देहत्याग तथा यज्ञ के ऋभुओं द्वारा अपने गणों को भगाए जाने का समाचार सुनकर शिव अत्यन्त क्रुद्ध हुए।

श्लोक 5.2

क्रुद्धः सुदष्टौष्ठपुटः स धूर्जटि- र्जटां तडिद्वह्निसटोग्ररोचिषम् । उत्कृत्य रुद्रः सहसोत्थितो हसन् गम्भीरनादो विससर्ज तां भुवि ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने क्रोध में ओठ दबाए, बिजली और अग्नि जैसी चमकती एक जटा उखाड़ी और गम्भीर गर्जना करते हुए पृथ्वी पर पटक दी।

श्लोक 5.3

ततोऽतिकायस्तनुवा स्पृशन् दिवं सहस्रबाहुर्घनरुक् त्रिसूर्यदृक् । करालदंष्ट्रो ज्वलदग्निमूर्धजः कपालमाली विविधोद्यतायुधः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उससे आकाश छूता विशाल, मेघवर्ण, हजार भुजाओं, तीन सूर्यसम नेत्रों, विकराल दाँतों, अग्निज्वालामय केशों और अनेक अस्त्रों वाला वीरभद्र प्रकट हुआ।

श्लोक 5.4

तं किं करोमीति गृणन्तमाह बद्धाञ्जलिं भगवान् भूतनाथः । दक्षं सयज्ञं जहि मद्भटानां त्वमग्रणी रुद्रभटांशको मे ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसने हाथ जोड़कर पूछा—क्या करूँ? शिव ने कहा—तुम मेरे अंश और गणों के सेनापति हो; दक्ष सहित उसके यज्ञ का विनाश करो।

श्लोक 5.5

आज्ञप्त एवं कुपितेन मन्युना स देवदेवं परिचक्रमे विभुम् । मेने तदात्मानमसङ्गरंहसा महीयसां तात सहः सहिष्णुम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: शिव की आज्ञा पाकर वीरभद्र ने उनकी परिक्रमा की। उनके अवरोधहीन तेज से अपने को बड़े–बड़े वीरों के बल का सामना करने योग्य समझा।

श्लोक 5.6

अन्वीयमानः स तु रुद्र पार्षदै- र्भृशन्नदद्भिर्व्यनदत्सुभैरवम् । उद्यम्य शूलं जगदन्तकान्तकं स प्राद्रवद्घोषणभूषणाङ्घ्रिः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: भयंकर गर्जना करते शिवगण उसके पीछे चले। विनाशकारी शूल उठाए और पैरों के आभूषणों की ध्वनि करता हुआ वीरभद्र दौड़ पड़ा।

श्लोक 5.7

अथर्त्विजो यजमानः सदस्याः ककुभ्युदीच्यां प्रसमीक्ष्य रेणुम् । तमः किमेतत्कुत एतद्रजोऽभू- दिति द्विजा द्विजपत्न्यश्च दध्युः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उधर यज्ञ के पुरोहित, यजमान, सभासद और उनकी पत्नियाँ उत्तर दिशा से उठती धूल देखकर सोचने लगे—यह अँधेरा और धूल कहाँ से आई?

श्लोक 5.8

वाता न वान्ति न हि सन्ति दस्यवः प्राचीनबर्हिर्जीवति होग्रदण्डः । गावो न काल्यन्त इदं कुतो रजो लोकोऽधुना किं प्रलयाय कल्पते ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: न वायु चल रही है, न डाकुओं का भय है, क्योंकि कठोर दण्ड देने वाले राजा प्राचीनबर्हि जीवित हैं; गायें भी नहीं हाँकी जा रहीं। फिर क्या संसार का प्रलय होने वाला है?

श्लोक 5.9

प्रसूतिमिश्राः स्त्रिय उद्विग्नचित्ता ऊचुर्विपाको वृजिनस्यैव तस्य । यत्पश्यन्तीनां दुहितॄणां प्रजेशः सुतां सतीमवदध्यावनागाम् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रसूति आदि स्त्रियाँ व्याकुल होकर बोलीं—यह उसी पाप का फल है; दक्ष ने अपनी निर्दोष पुत्री सती का उसकी बहनों के सामने अनादर किया था।

श्लोक 5.10

यस्त्वन्तकाले व्युप्तजटाकलापः स्वशूलसूच्यर्पितदिग्गजेन्द्रः । वितत्य नृत्यत्युदितास्त्रदोर्ध्वजा- नुच्चाट्टहासस्तनयित्नुभिन्नदिक् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रलय के समय शिव जटाएँ बिखेरकर, दिशाओं के गजराजों को शूल पर धारण करके, अस्त्रों वाली भुजाएँ फैलाकर नृत्य करते हैं; उनका अट्टहास दिशाओं को गुँजा देता है।

श्लोक 5.11

अमर्षयित्वा तमसह्यतेजसं मन्युप्लुतं दुर्विषहं भ्रुकुट्या । करालदंष्ट्राभिरुदस्तभागणं स्यात्स्वस्ति किं कोपयतो विधातुः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसे असह्य तेज और उग्र भ्रूभङ्ग वाले शिव को क्रुद्ध करके क्या दक्ष का कल्याण हो सकता है? उनके प्रचण्ड रूप से आकाश के नक्षत्र भी विचलित होते हैं।

श्लोक 5.12

बह्वेवमुद्विग्नदृशोच्यमाने जनेन दक्षस्य मुहुर्महात्मनः । उत्पेतुरुत्पाततमाः सहस्रशो भयावहा दिवि भूमौ च पर्यक् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: दक्ष के यज्ञ में लोग बार–बार ऐसे भयभीत वचन कह रहे थे और पृथ्वी तथा आकाश में हजारों भयानक उत्पात दिखाई देने लगे।

श्लोक 5.13

तावत्स रुद्रानुचरैर्मखो महान् नानायुधैर्वामनकैरुदायुधैः । पिङ्गैः पिशङ्गैर्मकरोदराननैः पर्याद्रवद्भिर्विदुरान्वरुध्यत ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: तभी अनेक अस्त्र लिए, छोटे–बड़े, पीले–भूरे तथा विचित्र मुखों वाले शिवगणों ने महान यज्ञस्थल को चारों ओर से घेर लिया।

श्लोक 5.14

केचिद्बभञ्जुः प्राग्वंशं पत्नीशालां तथापरे । सद आग्नीध्रशालां च तद्विहारं महानसम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: कुछ ने मुख्य मण्डप, कुछ ने पत्नीशाला, सभा, अग्नीध्रशाला, विश्रामस्थल और रसोई तोड़ डाली।

श्लोक 5.15

रुरुजुर्यज्ञपात्राणि तथैकेऽग्नीननाशयन् । कुण्डेष्वमूत्रयन् केचिद्बिभिदुर्वेदिमेखलाः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: कुछ ने यज्ञपात्र तोड़े, अग्नियाँ बुझाईं, कुण्डों को दूषित किया और वेदियों की मेखलाएँ नष्ट कर दीं।

श्लोक 5.16

अबाधन्त मुनीनन्ये एके पत्नीरतर्जयन् । अपरे जगृहुर्देवान् प्रत्यासन्नान् पलायितान् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कुछ मुनियों को सताने लगे, कुछ ने पत्नियों को डराया और कुछ ने समीप मौजूद अथवा भागते देवताओं को पकड़ लिया।

श्लोक 5.17

भृगुं बबन्ध मणिमान् वीरभद्रः प्रजापतिम् । चण्डेशः पूषणं देवं भगं नन्दीश्वरोऽग्रहीत् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मणिमान ने भृगु को, वीरभद्र ने दक्ष को, चण्डेश ने पूषा को और नन्दीश्वर ने भग को पकड़ लिया।

श्लोक 5.18

सर्व एवर्त्विजो दृष्ट्वा सदस्याः सदिवौकसः । तैरर्द्यमानाः सुभृशं ग्रावभिर्नैकधाद्रवन् ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुरोहित, सभासद और देवता पत्थरों की चोट से अत्यन्त पीड़ित होकर इधर–उधर भागने लगे।

श्लोक 5.19

जुह्वतः स्रुवहस्तस्य श्मश्रूणि भगवान् भवः । भृगोर्लुलुञ्चे सदसि योऽहसच्छ्मश्रु दर्शयन् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: शिव के प्रतिनिधि वीरभद्र ने भृगु की दाढ़ी उखाड़ दी; भृगु ने सभा में शिव का उपहास करते समय दाढ़ी दिखाई थी।

श्लोक 5.20

भगस्य नेत्रे भगवान् पातितस्य रुषा भुवि । उज्जहार सदःस्थोऽक्ष्णा यः शपन्तमसूसुचत् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसने भग को भूमि पर गिराकर उनके नेत्र निकाल दिए, क्योंकि सभा में उन्होंने आँखों के संकेत से दक्ष के शाप का समर्थन किया था।

श्लोक 5.21

पूष्णश्चापातयद्दन्तान् कालिङ्गस्य यथा बलः । शप्यमाने गरिमणि योऽहसद्दर्शयन् दतः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: शिव की निन्दा पर दाँत दिखाकर हँसने वाले पूषा के दाँत गिरा दिए, जैसे बलराम ने कलिङ्गराज के दाँत तोड़े थे।

श्लोक 5.22

आक्रम्योरसि दक्षस्य शितधारेण हेतिना । छिन्दन्नपि तदुद्धर्तुं नाशक्नोत्त्र्यम्बकस्तदा ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: वीरभद्र दक्ष की छाती पर चढ़कर तीक्ष्ण शस्त्र से उनका सिर अलग करने लगा, पर पहले प्रयास में सफल नहीं हुआ।

श्लोक 5.23

शस्त्रैरस्त्रान्वितैरेवमनिर्भिन्नत्वचं हरः । विस्मयं परमापन्नो दध्यौ पशुपतिश्चिरम् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अस्त्र–शस्त्रों से भी उनकी त्वचा न कटने पर वह बहुत चकित हुआ और देर तक उपाय सोचता रहा।

श्लोक 5.24

दृष्ट्वा संज्ञपनं योगं पशूनां स पतिर्मखे । यजमानपशोः कस्य कायात्तेनाहरच्छिरः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञ में पशु के वध की विधि देखकर उसने उसी विधि से यजमान दक्ष का सिर शरीर से अलग कर दिया।

श्लोक 5.25

साधुवादस्तदा तेषां कर्म तत्तस्य शंसताम् । भूतप्रेतपिशाचानामन्येषां तद्विपर्ययः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: भूत, प्रेत और पिशाच उस कृत्य की प्रशंसा करने लगे, जबकि अन्य उपस्थित लोगों में विपरीत प्रतिक्रिया और हाहाकार हुआ।

श्लोक 5.26

जुहावैतच्छिरस्तस्मिन् दक्षिणाग्नावमर्षितः । तद्देवयजनं दग्ध्वा प्रातिष्ठद्गुह्यकालयम् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्रुद्ध वीरभद्र ने दक्ष का सिर दक्षिणाग्नि में डाल दिया, यज्ञस्थल को जलाया और कैलास लौट गया।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 5 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 6

कैलास दर्शन और ब्रह्मा की क्षमाप्रार्थना

श्लोक 6.1

मैत्रेय उवाच । अथ देवगणाः सर्वे रुद्रानीकैः पराजिताः । शूलपट्टिशनिस्त्रिंशगदापरिघमुद्गरैः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—शिव की सेना से पराजित देवता शूल, पट्टिश, तलवार, गदा, परिघ और मुद्गरों की चोटों से घायल हो गए थे।

श्लोक 6.2

सञ्छिन्नभिन्नसर्वाङ्गाः सर्त्विक्सभ्या भयाकुलाः । स्वयम्भुवे नमस्कृत्य कार्त्स्न्येनैतन्न्यवेदयन् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: टूटे–कटे अङ्गों वाले भयभीत देवता, पुरोहित और सभासद ब्रह्मा के पास पहुँचे; उन्हें प्रणाम करके सब घटना बताई।

श्लोक 6.3

उपलभ्य पुरैवैतद्भगवानब्जसम्भवः । नारायणश्च विश्वात्मा न कस्याध्वरमीयतुः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा और विश्वात्मा नारायण इस घटना को पहले से जानते थे, इसलिए वे दक्ष के यज्ञ में गए ही नहीं थे।

श्लोक 6.4

तदाकर्ण्य विभुः प्राह तेजीयसि कृतागसि । क्षेमाय तत्र सा भूयान्न प्रायेण बुभूषताम् ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा ने सुनकर कहा—अत्यन्त तेजस्वी महात्मा के प्रति अपराध होने पर जीवित और सुखी रहने की इच्छा रखने वालों का कल्याण सहज नहीं होता।

श्लोक 6.5

अथापि यूयं कृतकिल्बिषा भवं ये बर्हिषो भागभाजं परादुः । प्रसादयध्वं परिशुद्धचेतसा क्षिप्रप्रसादं प्रगृहीताङ्घ्रिपद्मम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुमने यज्ञभाग के अधिकारी शिव को उससे वञ्चित करके अपराध किया है। अब निर्मल मन से उनके चरण पकड़कर उन्हें प्रसन्न करो; वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 6.6

आशासाना जीवितमध्वरस्य लोकः सपालः कुपिते न यस्मिन् । तमाशु देवं प्रियया विहीनं क्षमापयध्वं हृदि विद्धं दुरुक्तैः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कटुवचनों से आहत और प्रिय पत्नी से वियुक्त उन प्रभु से शीघ्र क्षमा माँगो। उनके क्रुद्ध होने पर लोकपालों सहित जगत का टिकना कठिन है; यज्ञ को पुनःजीवन देना उन्हीं की कृपा से होगा।

श्लोक 6.7

नाहं न यज्ञो न च यूयमन्ये ये देहभाजो मुनयश्च तत्त्वम् । विदुः प्रमाणं बलवीर्ययोर्वा यस्यात्मतन्त्रस्य क उपायं विधित्सेत् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: न मैं, न यज्ञरूप विष्णु, न तुम और न अन्य ऋषि उनके स्वतन्त्र स्वरूप और बल की सीमा जानते हैं; फिर कौन उनके विरुद्ध उपाय कर सकता है?

श्लोक 6.8

स इत्थमादिश्य सुरानजस्तैः समन्वितः पितृभिः सप्रजेशैः । ययौ स्वधिष्ण्यान्निलयं पुरद्विषः कैलासमद्रिप्रवरं प्रियं प्रभोः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसा कहकर ब्रह्मा देवताओं, पितरों और प्रजापतियों को साथ लेकर अपने स्थान से शिव के प्रिय श्रेष्ठ पर्वत कैलास की ओर चले।

श्लोक 6.9

जन्मौषधितपोमन्त्रयोगसिद्धैर्नरेतरैः । जुष्टं किन्नरगन्धर्वैरप्सरोभिर्वृतं सदा ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ जन्म, औषधि, तप, मन्त्र या योग से सिद्धियाँ प्राप्त करने वाले दिव्यजन, किन्नर, गन्धर्व और अप्सराएँ निवास करते थे।

श्लोक 6.10

नानामणिमयैः श‍ृङ्गैर्नानाधातुविचित्रितैः । नानाद्रुमलतागुल्मैर्नानामृगगणावृतैः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: विविध रत्नों और धातुओं से चमकते शिखर, अनेक वृक्ष, लताएँ, झाड़ियाँ और तरह–तरह के पशु उस पर्वत को सुशोभित करते थे।

श्लोक 6.11

नानामलप्रस्रवणैर्नानाकन्दरसानुभिः । रमणं विहरन्तीनां रमणैः सिद्धयोषिताम् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: निर्मल झरनों, गुफाओं और पर्वततटों वाला वह स्थान अपने प्रियजनों के साथ विहार करती सिद्ध स्त्रियों के लिए रमणीय था।

श्लोक 6.12

मयूरकेकाभिरुतं मदान्धालिविमूर्च्छितम् । प्लावितै रक्तकण्ठानां कूजितैश्च पतत्त्रिणाम् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मोरों की पुकार, मत्त भ्रमरों की गुंजार, कोयलों और दूसरे पक्षियों का मधुर कलरव वहाँ गूँजता था।

श्लोक 6.13

आह्वयन्तमिवोद्धस्तैर्द्विजान् कामदुघैर्द्रुमैः । व्रजन्तमिव मातङ्गैर्गृणन्तमिव निर्झरैः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: फलदायी वृक्ष अपनी उठी शाखाओं से पक्षियों को बुलाते से लगते, पर्वत हाथियों के साथ चलता सा और झरनों की ध्वनि से गाता सा प्रतीत होता था।

श्लोक 6.14

मन्दारैः पारिजातैश्च सरलैश्चोपशोभितम् । तमालैः शालतालैश्च कोविदारासनार्जुनैः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मन्दार, पारिजात, सरल, तमाल, शाल, ताल, कोविदार, आसन और अर्जुन के वृक्ष वहाँ शोभित थे।

श्लोक 6.15

चूतैः कदम्बैर्नीपैश्च नागपुन्नागचम्पकैः । पाटलाशोकबकुलैः कुन्दैः कुरबकैरपि ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: आम, कदम्ब, नीप, नागकेसर, पुन्नाग, चम्पा, पाटल, अशोक, बकुल, कुन्द और कुरबक भी थे।

श्लोक 6.16

स्वर्णार्णशतपत्रैश्च वररेणुकजातिभिः । कुब्जकैर्मल्लिकाभिश्च माधवीभिश्च मण्डितम् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वर्णवर्ण कमलों, शतपत्रों और अनेक सुगन्धित पुष्पों, कुब्जक, मल्लिका तथा माधवी की लताओं से वह सजा था।

श्लोक 6.17

पनसोदुम्बराश्वत्थप्लक्षन्यग्रोधहिङ्गुभिः । भूर्जैरोषधिभिः पूगै राजपूगैश्च जम्बुभिः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: कटहल, गूलर, पीपल, पाकड़, बरगद, हींग, भोजपत्र, औषधियाँ, सुपारी और जामुन के वृक्ष भी वहाँ थे।

श्लोक 6.18

खर्जूराम्रातकाम्राद्यैः प्रियालमधुकेङ्गुदैः । द्रुमजातिभिरन्यैश्च राजितं वेणुकीचकैः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: खजूर, आम्रातक, आम, चिरौंजी, महुआ, इङ्गुदी तथा अन्य अनेक वृक्ष और बाँसों के झुरमुट कैलास की शोभा बढ़ाते थे।

श्लोक 6.19

कुमुदोत्पलकह्लारशतपत्रवनर्द्धिभिः । नलिनीषु कलं कूजत्खगवृन्दोपशोभितम् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सरोवरों में कुमुद, उत्पल, कह्लार और कमल खिले थे; जलपक्षियों के मधुर समूह उन्हें सुशोभित करते थे।

श्लोक 6.20

मृगैः शाखामृगैः क्रोडैर्मृगेन्द्रैरृक्षशल्यकैः गवयैः शरभैर्व्याघ्रै रुरुभिर्महिषादिभिः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ हरिण, बन्दर, सूअर, सिंह, भालू, साही, गवय, शरभ, व्याघ्र, रुरु और भैंसे जैसे अनेक वन्यजीव थे।

श्लोक 6.21

कर्णान्त्रैकपदाश्वास्यैर्निर्जुष्टं वृकनाभिभिः । कदलीखण्डसंरुद्धनलिनीपुलिनश्रियम् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: कथा में कर्णान्त्र, एकपद, अश्वमुख और कस्तूरीमृग जैसे जीवों का भी वर्णन है। केले के वनों से घिरे सरोवरों के तट बड़े रमणीय थे।

श्लोक 6.22

पर्यस्तं नन्दया सत्याः स्नानपुण्यतरोदया । विलोक्य भूतेशगिरिं विबुधा विस्मयं ययुः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: सती के स्नान से और पवित्र हुई नन्दा नदी उस पर्वत को घेरे हुए थी। शिव के इस दिव्य पर्वत को देखकर देवता आश्चर्यचकित हुए।

श्लोक 6.23

ददृशुस्तत्र ते रम्यामलकां नाम वै पुरीम् । वनं सौगन्धिकं चापि यत्र तन्नामपङ्कजम् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने वहाँ रमणीय अलकापुरी और सौगन्धिक नामक वन देखा, जिसमें उसी नाम के सुगन्धित कमल खिलते थे।

श्लोक 6.24

नन्दा चालकनन्दा च सरितौ बाह्यतः पुरः । तीर्थपादपदाम्भोजरजसातीव पावने ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुरी के बाहर नन्दा और अलकनन्दा नामक दो नदियाँ थीं, जो भगवान के चरणकमलों की रज से अत्यन्त पवित्र थीं।

श्लोक 6.25

ययोः सुरस्त्रियः क्षत्तरवरुह्य स्वधिष्ण्यतः । क्रीडन्ति पुंसः सिञ्चन्त्यो विगाह्य रतिकर्शिताः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवाङ्गनाएँ अपने लोकों से उतरकर उनमें प्रवेश करतीं और प्रियजनों पर जल छिड़कते हुए क्रीड़ा करती थीं।

श्लोक 6.26

ययोस्तत्स्नानविभ्रष्टनवकुङ्कुमपिञ्जरम् । वितृषोऽपि पिबन्त्यम्भः पाययन्तो गजा गजीः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके स्नान से मिले ताजे कुङ्कुम से जल पीला पड़ जाता था; हाथी अपनी हथिनियों को पिलाकर स्वयं प्यास न होने पर भी उसे पीते थे।

श्लोक 6.27

तारहेममहारत्नविमानशतसङ्कुलाम् । जुष्टां पुण्यजनस्त्रीभिर्यथा खं सतडिद्घनम् ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अलकापुरी चाँदी, सोने और बहुमूल्य रत्नों के सैकड़ों विमानों तथा यक्षस्त्रियों से ऐसे शोभित थी जैसे बिजलीयुक्त मेघों से आकाश।

श्लोक 6.28

हित्वा यक्षेश्वरपुरीं वनं सौगन्धिकं च तत् । द्रुमैः कामदुघैर्हृद्यं चित्रमाल्यफलच्छदैः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवता कुबेर की पुरी और रंगीन फूल, फल तथा पत्तियों वाले मनोहर वृक्षों से भरे सौगन्धिक वन को पीछे छोड़ आगे बढ़े।

श्लोक 6.29

रक्तकण्ठखगानीकस्वरमण्डितषट्पदम् । कलहंसकुलप्रेष्ठं खरदण्डजलाशयम् ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ कोयलों और पक्षियों की मधुर ध्वनि में भ्रमरों की गुंजार मिलती थी; हंसों के प्रिय सरोवरों में कमल खिले थे।

श्लोक 6.30

वनकुञ्जरसङ्घृष्टहरिचन्दनवायुना । अधि पुण्यजनस्त्रीणां मुहुरुन्मथयन् मनः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वनहाथियों के रगड़ने से हरिचन्दन की सुगन्ध वायु में फैलती और यक्षस्त्रियों के मन को बार–बार आकर्षित करती थी।

श्लोक 6.31

वैदूर्यकृतसोपाना वाप्य उत्पलमालिनीः । प्राप्तं किम्पुरुषैर्दृष्ट्वा त आराद्ददृशुर्वटम् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने वैदूर्य की सीढ़ियों और नीलकमलों वाली बावड़ियाँ देखीं, जहाँ किम्पुरुष आते थे। आगे उन्हें एक विशाल वटवृक्ष दिखाई दिया।

श्लोक 6.32

स योजनशतोत्सेधः पादोनविटपायतः । पर्यक्कृताचलच्छायो निर्नीडस्तापवर्जितः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: कथा में उस वटवृक्ष की ऊँचाई सौ योजन और शाखाओं का विस्तार पचहत्तर योजन बताया गया है। उसकी स्थिर छाया ताप से रहित और पक्षियों के घोंसलों से खाली थी।

श्लोक 6.33

तस्मिन् महायोगमये मुमुक्षुशरणे सुराः । ददृशुः शिवमासीनं त्यक्तामर्षमिवान्तकम् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुक्ति चाहने वालों के उस योगमय आश्रय में उन्होंने शान्त बैठे शिव को देखा, मानो क्रोध त्यागकर स्वयं संहारकर्ता विराज रहे हों।

श्लोक 6.34

सनन्दनाद्यैर्महासिद्धैः शान्तैः संशान्तविग्रहम् । उपास्यमानं सख्या च भर्त्रा गुह्यकरक्षसाम् ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: सनन्दन आदि शान्त महासिद्ध और यक्ष–राक्षसों के स्वामी उनके मित्र कुबेर उनकी सेवा कर रहे थे; शिव का स्वरूप पूर्ण शान्त था।

श्लोक 6.35

विद्यातपोयोगपथमास्थितं तमधीश्वरम् । चरन्तं विश्वसुहृदं वात्सल्याल्लोकमङ्गलम् ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे विद्या, तप और योगमार्ग में स्थित अधीश्वर थे। समस्त जगत के हितैषी होकर वात्सल्य से लोकमंगल का आचरण करते थे।

श्लोक 6.36

लिङ्गं च तापसाभीष्टं भस्मदण्डजटाजिनम् । अङ्गेन सन्ध्याभ्ररुचा चन्द्रलेखां च बिभ्रतम् ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनका शरीर सन्ध्या के मेघ जैसा दमकता था। वे तपस्वियों के प्रिय चिह्न—भस्म, दण्ड, जटा, मृगचर्म और मस्तक पर चन्द्रकला—धारण किए थे।

श्लोक 6.37

उपविष्टं दर्भमय्यां बृस्यां ब्रह्म सनातनम् । नारदाय प्रवोचन्तं पृच्छते श‍ृण्वतां सताम् ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: कुश के आसन पर बैठे शिव, नारद के प्रश्नों के उत्तर में उपस्थित संतों को सनातन ब्रह्मतत्त्व का उपदेश दे रहे थे।

श्लोक 6.38

कृत्वोरौ दक्षिणे सव्यं पादपद्मं च जानुनि । बाहुं प्रकोष्ठेऽक्षमालामासीनं तर्कमुद्रया ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनका बायाँ चरण दाहिनी जाँघ पर और बायाँ हाथ घुटने पर था; बाँह पर रुद्राक्षमाला थी और वे ज्ञान की तर्कमुद्रा में बैठे थे।

श्लोक 6.39

तं ब्रह्मनिर्वाणसमाधिमाश्रितं व्युपाश्रितं गिरिशं योगकक्षाम् । सलोकपाला मुनयो मनूना- माद्यम्मनुं प्राञ्जलयः प्रणेमुः ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मसमाधि में स्थित, योगपट्ट धारण किए और प्राचीन गुरु शिव को देखकर लोकपालों तथा ऋषियों ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया।

श्लोक 6.40

स तूपलभ्यागतमात्मयोनिं सुरासुरेशैरभिवन्दिताङ्घ्रिः । उत्थाय चक्रे शिरसाभिवन्दन- मर्हत्तमः कस्य यथैव विष्णुः ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: देव और असुर जिनके चरणों की वन्दना करते हैं, उन शिव ने ब्रह्मा को आते देखकर उठकर सिर झुकाया; जैसे विष्णु बड़ों का सम्मान करते हैं, वैसे ही उन्होंने आदर किया।

श्लोक 6.41

तथापरे सिद्धगणा महर्षिभि- र्येवै समन्तादनु नीललोहितम् । नमस्कृतः प्राह शशाङ्कशेखरं कृतप्रणामं प्रहसन्निवात्मभूः ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: शिव के पास उपस्थित अन्य सिद्धों ने भी ब्रह्मा को प्रणाम किया। प्रणाम स्वीकार करके ब्रह्मा ने चन्द्रशेखर शिव से प्रसन्नतापूर्वक कहा।

श्लोक 6.42

ब्रह्मोवाच । जाने त्वामीशं विश्वस्य जगतो योनिबीजयोः । शक्तेः शिवस्य च परं यत्तद्ब्रह्म निरन्तरम् ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा बोले—मैं जानता हूँ कि आप जगत के ईश्वर हैं; कारणरूप प्रकृति और पुरुष से भी परे, अखण्ड परम ब्रह्म हैं।

श्लोक 6.43

त्वमेव भगवन्नेतच्छिवशक्त्योः स्वरूपयोः । विश्वं सृजसि पास्यत्सि क्रीडन्नूर्णपटो यथा ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप ही शिव और शक्ति के अपने रूपों से जगत रचते, पालते और समेटते हैं, जैसे मकड़ी अपने जाल के साथ क्रीड़ा करती है।

श्लोक 6.44

त्वमेव धर्मार्थदुघाभिपत्तये दक्षेण सूत्रेण ससर्जिथाध्वरम् । त्वयैव लोकेऽवसिताश्च सेतवो यान् ब्राह्मणाः श्रद्दधते धृतव्रताः ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: धर्म और अर्थ का कल्याणकारी फल देने के लिए आपने दक्ष के माध्यम से यज्ञ की व्यवस्था बनाई और वे मर्यादाएँ स्थापित कीं जिन्हें व्रतशील वेदज्ञ मानते हैं।

श्लोक 6.45

त्वं कर्मणां मङ्गलमङ्गलानां कर्तुः स्म लोकं तनुषे स्वः परं वा । अमङ्गलानां च तमिस्रमुल्बणं विपर्ययः केन तदेव कस्यचित् ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप शुभ कर्म करने वालों को स्वर्ग अथवा परम गति और अशुभ कर्म करने वालों को दुःखद अधोगति देते हैं; फिर किसी के फल में उलटफेर क्यों हुआ, यह समझने योग्य है।

श्लोक 6.46

न वै सतां त्वच्चरणार्पितात्मनां भूतेषु सर्वेष्वभिपश्यतां तव । भूतानि चात्मन्यपृथग्दिदृक्षतां प्रायेण रोषोऽभिभवेद्यथा पशुम् ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिन संतों ने अपना मन आपके चरणों में अर्पित किया है और जो आपको सब प्राणियों में तथा प्राणियों को अपने से अभिन्न देखते हैं, उन्हें अज्ञानी की तरह क्रोध वश में नहीं करता।

श्लोक 6.47

पृथग्धियः कर्मदृशो दुराशयाः परोदयेनार्पितहृद्रुजोऽनिशम् । परान् दुरुक्तैर्वितुदन्त्यरुन्तुदाः तान् मावधीद्दैववधान् भवद्विधः ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: भेदबुद्धि और कर्ममात्र में अटके लोग दूसरों की उन्नति से दुखी होकर कटुवचन कहते हैं। वे अपने ही दुर्भाग्य से नष्ट हो रहे हैं; आपके जैसे महात्मा उन्हें और दण्ड न दें।

श्लोक 6.48

यस्मिन् यदा पुष्करनाभमायया दुरन्तया स्पृष्टधियः पृथग्दृशः । कुर्वन्ति तत्र ह्यनुकम्पया कृपां न साधवो दैवबलात्कृते क्रमम् ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की दुस्तर माया से बुद्धि भ्रमित होने पर लोग अपराध करते हैं। संत ऐसे लोगों पर करुणा करते हैं और दैववश हुई भूल का कठोर प्रतिकार नहीं करते।

श्लोक 6.49

भवांस्तु पुंसः परमस्य मायया दुरन्तयास्पृष्टमतिः समस्तदृक् । तया हतात्मस्वनुकर्मचेतः- स्वनुग्रहं कर्तुमिहार्हसि प्रभो ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रभु, आपकी बुद्धि माया से अछूती और दृष्टि समग्र है। माया से आत्मबोध खोकर कर्म में उलझे इन लोगों पर अनुग्रह कीजिए।

श्लोक 6.50

कुर्वध्वरस्योद्धरणं हतस्य भोः त्वयासमाप्तस्य मनो प्रजापतेः । न यत्र भागं तव भागिनो ददुः कुयज्विनो येन मखो निनीयते ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनु के पुत्र दक्ष का जो यज्ञ आपके दण्ड से अधूरा रह गया है, उसका उद्धार कीजिए। इन अयोग्य याजकों ने आपका यज्ञभाग नहीं दिया, इसलिए यज्ञ नष्ट हुआ।

श्लोक 6.51

जीवताद्यजमानोऽयं प्रपद्येताक्षिणी भगः । भृगोः श्मश्रूणि रोहन्तु पूष्णो दन्ताश्च पूर्ववत् ॥ ५१॥

सरल हिंदी भावार्थ: यजमान दक्ष फिर जीवित हों, भग को नेत्र मिलें, भृगु की दाढ़ी उगे और पूषा के दाँत पहले जैसे हो जाएँ।

श्लोक 6.52

देवानां भग्नगात्राणां ऋत्विजां चायुधाश्मभिः । भवतानुगृहीतानामाशु मन्योऽस्त्वनातुरम् ॥ ५२॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवताओं और पुरोहितों के जिन अङ्गों को अस्त्रों तथा पत्थरों से चोट लगी है, वे आपकी कृपा से शीघ्र स्वस्थ हो जाएँ।

श्लोक 6.53

एष ते रुद्र भागोऽस्तु यदुच्छिष्टोऽध्वरस्य वै । यज्ञस्ते रुद्रभागेन कल्पतामद्य यज्ञहन् ॥ ५३॥

सरल हिंदी भावार्थ: रुद्रदेव, यज्ञ में अवशिष्ट सम्पूर्ण भाग आपका हो। आपके यज्ञभाग को अर्पित करके यह यज्ञ आज पुनः पूर्ण हो।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 6 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 7

शिव की क्षमा, यज्ञपूर्ति और हरि–हर एकत्व

श्लोक 7.1

मैत्रेय उवाच । इत्यजेनानुनीतेन भवेन परितुष्यता । अभ्यधायि महाबाहो प्रहस्य श्रूयतामिति ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—ब्रह्मा की प्रार्थना सुनकर भगवान शिव प्रसन्न हो गए और हँसते हुए बोले।

श्लोक 7.2

महादेव उवाच । नाघं प्रजेश बालानां वर्णये नानुचिन्तये । देवमायाभिभूतानां दण्डस्तत्र धृतो मया ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: शिव ने कहा—मैं अज्ञानियों के अपराधों को न महत्त्व देता हूँ, न मन में रखता हूँ। माया से भ्रमित लोगों को सुधारने के लिए ही दण्ड दिया है।

श्लोक 7.3

प्रजापतेर्दग्धशीर्ष्णो भवत्वजमुखं शिरः । मित्रस्य चक्षुषेक्षेत भागं स्वं बर्हिषो भगः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिन दक्ष का सिर जल गया है, उन्हें बकरे का सिर मिले। भग अपने मित्र देवता की दृष्टि से यज्ञभाग देख सकें।

श्लोक 7.4

पूषा तु यजमानस्य दद्भिर्जक्षतु पिष्टभुक् । देवाः प्रकृतसर्वाङ्गा ये म उच्छेषणं ददुः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: पूषा यजमान के दाँतों के माध्यम से पिसा हुआ अन्न खाएँ। जिन देवताओं ने मुझे यज्ञ का अवशिष्ट भाग दिया था, उनके अङ्ग पूर्ववत हो जाएँ।

श्लोक 7.5

बाहुभ्यामश्विनोः पूष्णो हस्ताभ्यां कृतबाहवः । भवन्त्वध्वर्यवश्चान्ये बस्तश्मश्रुर्भृगुर्भवेत् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिन पुरोहितों की भुजाएँ और हाथ नष्ट हुए हैं, वे अश्विनीकुमारों की भुजाओं तथा पूषा के हाथों से कर्म कर सकें। भृगु को बकरे जैसी दाढ़ी मिले।

श्लोक 7.6

मैत्रेय उवाच । तदा सर्वाणि भूतानि श्रुत्वा मीढुष्टमोदितम् । परितुष्टात्मभिस्तात साधु साध्वित्यथाब्रुवन् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—शिव के ये वचन सुनकर सब प्राणी प्रसन्न मन से उनकी प्रशंसा करने लगे।

श्लोक 7.7

ततो मीढ्वांसमामन्त्र्य शुनासीराः सहर्षिभिः । भूयस्तद्देवयजनं समीढ्वद्वेधसो ययुः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसके बाद देवता और ऋषि शिव को साथ चलने के लिए आमन्त्रित करके ब्रह्मा सहित पुनः यज्ञस्थल पहुँचे।

श्लोक 7.8

विधाय कार्त्स्न्येन च तद्यदाह भगवान् भवः । सन्दधुः कस्य कायेन सवनीयपशोः शिरः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने शिव की आज्ञा के अनुसार सब व्यवस्था की और दक्ष के शरीर से यज्ञपशु बकरे का सिर जोड़ दिया।

श्लोक 7.9

सन्धीयमाने शिरसि दक्षो रुद्राभिवीक्षितः । सद्यः सुप्त इवोत्तस्थौ ददृशे चाग्रतो मृडम् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सिर जुड़ते ही शिव की कृपादृष्टि से दक्ष सोए हुए की तरह उठ खड़े हुए और सामने भगवान शङ्कर को देखा।

श्लोक 7.10

तदा वृषध्वजद्वेषकलिलात्मा प्रजापतिः । शिवावलोकादभवच्छरद्ध्रद इवामलः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: शिवद्वेष से मलिन दक्ष का मन उनके दर्शन से शरदकालीन सरोवर की तरह निर्मल हो गया।

श्लोक 7.11

भवस्तवाय कृतधीर्नाशक्नोदनुरागतः । औत्कण्ठ्याद्बाष्पकलया सम्परेतां सुतां स्मरन् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे शिव की स्तुति करना चाहते थे, पर दिवंगत पुत्री को याद करके प्रेम और उत्कण्ठा से रो पड़े; उनकी वाणी रुक गई।

श्लोक 7.12

कृच्छ्रात्संस्तभ्य च मनः प्रेमविह्वलितः सुधीः । शशंस निर्व्यलीकेन भावेनेशं प्रजापतिः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: कठिनाई से मन को सँभालकर भावविह्वल दक्ष ने निष्कपट भाव से भगवान की प्रशंसा की।

श्लोक 7.13

दक्ष उवाच । भूयाननुग्रह अहो भवता कृतो मे दण्डस्त्वया मयि भृतो यदपि प्रलब्धः । न ब्रह्मबन्धुषु च वां भगवन्नवज्ञा तुभ्यं हरेश्च कुत एव धृतव्रतेषु ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: दक्ष बोले—प्रभु, आपने मुझे दण्ड देकर भी बड़ा अनुग्रह किया। तिरस्कृत करने वाले मुझ जैसे नाममात्र के ब्राह्मण से भी आपको द्वेष नहीं; फिर व्रतशील संतों के प्रति आपका और हरि का आदर कितना होगा!

श्लोक 7.14

विद्यातपोव्रतधरान् मुखतः स्म विप्रान् ब्रह्मात्मतत्त्वमवितुं प्रथमं त्वमस्राक् । तद्ब्राह्मणान् परम सर्वविपत्सु पासि पालः पशूनिव विभो प्रगृहीतदण्डः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपने ब्रह्मज्ञान की रक्षा के लिए विद्या, तप और व्रतधारी ब्राह्मणों को प्रकट किया। जैसे ग्वाला दण्ड लेकर पशुओं को बचाता है, वैसे आप उन्हें सब विपत्तियों से बचाते हैं।

श्लोक 7.15

योऽसौ मयाविदिततत्त्वदृशा सभायां क्षिप्तो दुरुक्तिविशिखैर्विगणय्य तन्माम् । अर्वाक्पतन्तमर्हत्तम निन्दयापा- द्दृष्ट्याऽऽर्द्रया स भगवान् स्वकृतेन तुष्येत् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपका तत्त्व न जानकर मैंने सभा में कटुवचनों के बाण चलाए। आपने उस अपराध को छोड़कर निन्दा के कारण गिरते मुझे कृपादृष्टि से बचाया; अपनी करुणा से ही प्रसन्न होइए।

श्लोक 7.16

मैत्रेय उवाच । क्षमाप्यैवं स मीढ्वांसं ब्रह्मणा चानुमन्त्रितः । कर्म सन्तानयामास सोपाध्यायर्त्विगादिभिः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—इस प्रकार शिव से क्षमा माँगकर दक्ष ने ब्रह्मा की अनुमति से आचार्यों और पुरोहितों सहित यज्ञ फिर आरम्भ किया।

श्लोक 7.17

वैष्णवं यज्ञसन्तत्यै त्रिकपालं द्विजोत्तमाः । पुरोडाशं निरवपन् वीरसंसर्गशुद्धये ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञ की पुनःपूर्ति और रुद्रगणों के संसर्ग से आए विघ्न की शुद्धि के लिए श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने विष्णु को समर्पित त्रिकपाल पुरोडाश की आहुति दी।

श्लोक 7.18

अध्वर्युणाऽऽत्तहविषा यजमानो विशाम्पते । धिया विशुद्धया दध्यौ तथा प्रादुरभूद्धरिः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: अध्वर्यु के आहुति ग्रहण करते समय यजमान दक्ष ने शुद्ध मन से भगवान का ध्यान किया और हरि प्रकट हो गए।

श्लोक 7.19

तदा स्वप्रभया तेषां द्योतयन्त्या दिशो दश । मुष्णंस्तेज उपानीतस्तार्क्ष्येण स्तोत्रवाजिना ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: वेदस्तोत्ररूपी पंखों वाले गरुड़ उन्हें लाए। उनके तेज से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं और अन्य सबका तेज मानो दब गया।

श्लोक 7.20

श्यामो हिरण्यरशनोऽर्ककिरीटजुष्टो नीलालकभ्रमरमण्डितकुण्डलास्यः । कम्ब्वब्जचक्रशरचापगदासिचर्म- व्यग्रैर्हिरण्मयभुजैरिव कर्णिकारः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनका वर्ण श्याम, कमरबन्द स्वर्णमय और किरीट सूर्य के समान था। नील केश और कुण्डलों से मुख शोभित था; आठ भुजाओं में शङ्ख, कमल, चक्र, बाण, धनुष, गदा, तलवार और ढाल थीं।

श्लोक 7.21

वक्षस्यधिश्रितवधूर्वनमाल्युदार- हासावलोककलया रमयंश्च विश्वम् । पार्श्वभ्रमद्व्यजनचामरराजहंसः श्वेतातपत्रशशिनोपरि रज्यमानः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: वक्षस्थल पर लक्ष्मी और गले में वनमाला थीं। उदार मुस्कान और कृपादृष्टि से वे जगत को आनन्दित कर रहे थे; दोनों ओर चँवर डुल रहे थे और ऊपर श्वेत छत्र था।

श्लोक 7.22

तमुपागतमालक्ष्य सर्वे सुरगणादयः । प्रणेमुः सहसोत्थाय ब्रह्मेन्द्रत्र्यक्षनायकाः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्हें आया देखकर ब्रह्मा, इन्द्र और शिव सहित सभी देवता तुरन्त उठ खड़े हुए और प्रणाम किया।

श्लोक 7.23

तत्तेजसा हतरुचः सन्नजिह्वाः ससाध्वसाः । मूर्ध्ना धृताञ्जलिपुटा उपतस्थुरधोक्षजम् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके प्रकाश से अपना तेज फीका पड़ता देखकर सब विस्मय और आदर से मौन हो गए; सिर पर हाथ जोड़कर अधोक्षज भगवान की सेवा में खड़े हुए।

श्लोक 7.24

अप्यर्वाग्वृत्तयो यस्य महि त्वात्मभुवादयः । यथामति गृणन्ति स्म कृतानुग्रहविग्रहम् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा आदि की बुद्धि भी उनकी सम्पूर्ण महिमा तक नहीं पहुँचती, फिर भी कृपा के लिए प्रकट हुए भगवान की सबने अपनी समझ के अनुसार स्तुति की।

श्लोक 7.25

दक्षो गृहीतार्हणसादनोत्तमं यज्ञेश्वरं विश्वसृजां परं गुरुम् । सुनन्दनन्दाद्यनुगैर्वृतं मुदा गृणन् प्रपेदे प्रयतः कृताञ्जलिः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: दक्ष पूजा की उत्तम सामग्री लेकर हाथ जोड़े हुए, नन्द–सुनन्द आदि पार्षदों से घिरे विश्वगुरु और यज्ञेश्वर के पास प्रसन्नतापूर्वक आए।

श्लोक 7.26

दक्ष उवाच । शुद्धं स्वधाम्न्युपरताखिलबुद्ध्यवस्थं चिन्मात्रमेकमभयं प्रतिषिध्य मायाम् । तिष्ठंस्तयैव पुरुषत्वमुपेत्य तस्या- मास्तेभवानपरिशुद्ध इवात्मतन्त्रः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: दक्ष बोले—आप शुद्ध चेतन, अद्वितीय और निर्भय हैं; अपनी ज्योति में स्थित होकर माया से परे हैं। फिर भी उसी माया में पुरुषरूप धारण करके रहते हैं, मानो उसमें लिप्त हों, जबकि आप पूर्ण स्वतन्त्र हैं।

श्लोक 7.27

ऋत्विज ऊचुः । तत्त्वं न ते वयमनञ्जन रुद्रशापात् कर्मण्यवग्रहधियो भगवन् विदामः । धर्मोपलक्षणमिदं त्रिवृदध्वराख्यं ज्ञातं यदर्थमधिदैवमदो व्यवस्थाः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुरोहित बोले—रुद्र के शाप और कर्म में अटकी बुद्धि के कारण हम आपका निर्मल तत्त्व नहीं जानते। हम केवल यज्ञ की विधि जानते हैं, जिसके उद्देश्य और अधिदेवता आप हैं।

श्लोक 7.28

सदस्या ऊचुः । उत्पत्त्यध्वन्यशरण उरुक्लेशदुर्गेऽन्तकोग्र- व्यालान्विष्टे विषयमृगतृष्णाऽऽत्मगेहोरुभारः । द्वन्द्वश्वभ्रे खलमृगभये शोकदावेऽज्ञसार्थः पादौकस्ते शरणद कदा याति कामोपसृष्टः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: सभासद बोले—जन्म–मरण के दुर्गम मार्ग में जीव मृत्यु के सर्प, विषयों की मृगतृष्णा, गृहभार, द्वन्द्वों के गड्ढों, दुष्टों के भय और शोक की अग्नि से घिरा है। वह कब आपके शरणदायी चरणों तक पहुँचेगा?

श्लोक 7.29

रुद्र उवाच । तव वरद वराङ्घ्रावाशिषेहाखिलार्थे ह्यपि मुनिभिरसक्तैरादरेणार्हणीये । यदि रचितधियं माविद्यलोकोऽपविद्धं जपति न गणये तत्त्वत्परानुग्रहेण ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: रुद्र बोले—वरदाता प्रभु, मेरे मन की इच्छा है कि वह आपके उन चरणों में लगा रहे जिन्हें अनासक्त मुनि भी आदर से पूजते हैं। आपकी कृपा रहे तो अज्ञानी लोग मेरे आचरण पर जो भी कहें, मैं उसकी चिन्ता नहीं करता।

श्लोक 7.30

भृगुरुवाच । यन्मायया गहनयापहृतात्मबोधा ब्रह्मादयस्तनुभृतस्तमसि स्वपन्तः । नात्मन् श्रितं तव विदन्त्यधुनापि तत्त्वं सोऽयं प्रसीदतु भवान् प्रणतात्मबन्धुः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: भृगु बोले—आपकी गहन माया से ब्रह्मा आदि देहधारियों का भी आत्मबोध ढक जाता है और वे हृदय में स्थित आपका तत्त्व नहीं जान पाते। शरणागतों के मित्र, हम पर प्रसन्न हों।

श्लोक 7.31

ब्रह्मोवाच । नैतत्स्वरूपं भवतोऽसौ पदार्थ- भेदग्रहैः पुरुषो यावदीक्षेत् । ज्ञानस्य चार्थस्य गुणस्य चाश्रयो मायामयाद्व्यतिरिक्तो यतस्त्वम् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा बोले—इन्द्रियों के विषयभेद से देखा जाने वाला रूप ही आपका पूर्ण स्वरूप नहीं है। आप ज्ञान, विषय और गुणों के आश्रय होकर भी मायिक जगत से परे हैं।

श्लोक 7.32

इन्द्र उवाच । इदमप्यच्युत विश्वभावनं वपुरानन्दकरं मनोदृशाम् । सुरविद्विट्क्षपणैरुदायुधैर्भुजदण्डैरुपपन्नमष्टभिः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्र बोले—अच्युत, आपका यह विश्वपालक रूप मन और नेत्रों को आनन्द देता है; देवशत्रुओं का नाश करने वाले अस्त्रों से युक्त आपकी आठ भुजाएँ शोभित हैं।

श्लोक 7.33

पत्न्य ऊचुः । यज्ञोऽयं तव यजनाय केन सृष्टो विध्वस्तः पशुपतिनाद्य दक्षकोपात् । तं नस्त्वं शवशयनाभशान्तमेधं यज्ञात्मन् नलिनरुचा दृशा पुनीहि ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऋषियों की पत्नियाँ बोलीं—ब्रह्मा ने आपकी पूजा के लिए यह यज्ञ रचा था, जो दक्ष के प्रति शिव के क्रोध से नष्ट हुआ। यज्ञस्वरूप प्रभु, श्मशान की तरह निष्प्राण हुए इसे अपनी कमलदृष्टि से पवित्र कीजिए।

श्लोक 7.34

ऋषय ऊचुः । अनन्वितं ते भगवन् विचेष्टितं यदात्मना चरसि हि कर्म नाज्यसे । विभूतये यत उपसेदुरीश्वरीं न मन्यते स्वयमनुवर्ततीं भवान् ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऋषि बोले—आपकी लीला अद्भुत है; कर्म करते हुए भी आप उससे नहीं बँधते। दूसरे ऐश्वर्य के लिए आपकी शरण आते हैं, पर सहज अनुगामिनी लक्ष्मी को भी आप आसक्त होकर नहीं चाहते।

श्लोक 7.35

सिद्धा ऊचुः । अयं त्वत्कथामृष्टपीयूषनद्यां मनोवारणः क्लेशदावाग्निदग्धः । तृषार्तोऽवगाढो न सस्मार दावं न निष्क्रामति ब्रह्मसम्पन्नवन्नः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: सिद्ध बोले—क्लेश की दावाग्नि से जला हमारा मनरूपी हाथी आपकी कथामृत नदी में उतर गया है। अब वह पुराने ताप को भूलकर ब्रह्मानन्द में डूबे जीवन्मुक्त की तरह उससे निकलना नहीं चाहता।

श्लोक 7.36

यजमान्युवाच । स्वागतं ते प्रसीदेश तुभ्यं नमः श्रीनिवास श्रिया कान्तया त्राहि नः । त्वामृतेऽधीश नाङ्गैर्मखः शोभते शीर्षहीनः कबन्धो यथा पूरुषः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: यजमान की पत्नी बोलीं—लक्ष्मी के प्रिय आश्रय, आपका स्वागत है; प्रसन्न होकर हमारी रक्षा कीजिए। आपके बिना सब उपकरणों वाला यज्ञ भी सिरहीन शरीर की तरह शोभाहीन है।

श्लोक 7.37

लोकपाला ऊचुः । दृष्टः किं नो दृग्भिरसद्ग्रहैस्त्वं प्रत्यग्द्रष्टा दृश्यते येन दृश्यम् । माया ह्येषा भवदीया हि भूमन् यस्त्वं षष्ठः पञ्चभिर्भासि भूतैः ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: लोकपाल बोले—विषयों में फँसी हमारी आँखें आपको कैसे देखें? आप भीतर के द्रष्टा हैं जिनसे सब दृश्य प्रकाशित होते हैं। पाँच भूतों में उनसे परे छठे नियन्ता के रूप में आपका प्रकट होना आपकी माया है।

श्लोक 7.38

योगेश्वरा ऊचुः । प्रेयान्न तेऽन्योऽस्त्यमुतस्त्वयि प्रभो विश्वात्मनीक्षेन्न पृथग्य आत्मनः । अथापि भक्त्येश तयोपधावता- मनन्यवृत्त्यानुगृहाण वत्सल ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: योगेश्वर बोले—सबके आत्मा आपसे जिसे अभेद का बोध है, वह आपको अत्यन्त प्रिय है। फिर भी जो अनन्य भक्ति से आपकी शरण आते हैं, उन पर भी कृपा कीजिए।

श्लोक 7.39

जगदुद्भवस्थितिलयेषु दैवतो बहुभिद्यमान गुणयाऽऽत्ममायया । रचितात्मभेदमतये स्वसंस्थया विनिवर्तितभ्रमगुणात्मने नमः ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सृष्टि, पालन और संहार के लिए गुणमयी माया से अनेक रूपों में दिखाई देने पर भी आप अपने स्वरूप में स्थित और भेदभ्रम से मुक्त हैं; आपको प्रणाम है।

श्लोक 7.40

ब्रह्मोवाच । नमस्ते श्रितसत्त्वाय धर्मादीनां च सूतये । निर्गुणाय च यत्काष्ठां नाहं वेदापरेऽपि च ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा बोले—धर्म आदि की उत्पत्ति के लिए शुद्ध सत्त्व धारण करने वाले और वास्तव में गुणातीत प्रभु को प्रणाम। आपके परम स्वरूप की सीमा मैं और अन्य देवता नहीं जानते।

श्लोक 7.41

अग्निरुवाच । यत्तेजसाहं सुसमिद्धतेजा हव्यं वहे स्वध्वर आज्यसिक्तम् । तं यज्ञियं पञ्चविधं च पञ्चभिः स्विष्टं यजुर्भिः प्रणतोऽस्मि यज्ञम् ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: अग्नि बोले—आपके तेज से ही मैं प्रज्वलित होकर घृतसिक्त आहुति पहुँचाता हूँ। पाँच प्रकार के यज्ञस्वरूप और विविध वैदिक मन्त्रों से पूजित आपको प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 7.42

देवा ऊचुः । पुरा कल्पापाये स्वकृतमुदरीकृत्य विकृतं त्वमेवाद्यस्तस्मिन् सलिल उरगेन्द्राधिशयने । पुमान् शेषे सिद्धैर्हृदि विमृशिताध्यात्मपदविः स एवाद्याक्ष्णोर्यः पथि चरसि भृत्यानवसि नः ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवता बोले—कल्पान्त में जगत को अपने भीतर समेटकर आप प्रलयजल में शेषनाग पर शयन करते हैं; सिद्धजन हृदय में आपका ध्यान करते हैं। वही आदिपुरुष आज हमारे सामने आकर अपने सेवकों की रक्षा कर रहे हैं।

श्लोक 7.43

गन्धर्वा ऊचुः । अंशांशास्ते देव मरीच्यादय एते ब्रह्मेन्द्राद्या देवगणा रुद्रपुरोगाः । क्रीडाभाण्डं विश्वमिदं यस्य विभूमन् तस्मै नित्यं नाथ नमस्ते करवाम ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: गन्धर्व बोले—मरीचि, ब्रह्मा, इन्द्र और रुद्र आदि सब आपके अंशों के अंश हैं। यह जगत जिसकी क्रीड़ा की सामग्री है, उन अनन्त नाथ को हम नित्य प्रणाम करते हैं।

श्लोक 7.44

विद्याधरा ऊचुः । त्वन्माययार्थमभिपद्य कलेवरेऽस्मिन् कृत्वा ममाहमिति दुर्मतिरुत्पथैः स्वैः । क्षिप्तोऽप्यसद्विषयलालस आत्ममोहं युष्मत्कथामृतनिषेवक उद्व्युदस्येत् ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: विद्याधर बोले—आपकी माया से जीव शरीर को अपना सब कुछ मानकर अहंता–ममता में भटकता और दुख पाकर भी विषयों को चाहता है। आपकी कथामृत का सेवन करने वाला उस आत्ममोह को दूर कर सकता है।

श्लोक 7.45

ब्राह्मणा ऊचुः । त्वं क्रतुस्त्वं हविस्त्वं हुताशः स्वयं त्वं हि मन्त्रः समिद्दर्भ पात्राणि च । त्वं सदस्यर्त्विजो दम्पती देवता अग्निहोत्रं स्वधा सोम आज्यं पशुः ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्राह्मण बोले—यज्ञ, हवि, अग्नि, मन्त्र, समिधा, कुश, पात्र, सभासद, पुरोहित, यजमान दम्पति, देवता, अग्निहोत्र, स्वधा, सोम, घृत और यज्ञपशु—सबमें आप ही विद्यमान हैं।

श्लोक 7.46

त्वं पुरा गां रसाया महासूकरो दंष्ट्रया पद्मिनीं वारणेन्द्रो यथा । स्तूयमानो नदँल्लीलया योगिभि- र्व्युज्जहर्थ त्रयीगात्र यज्ञक्रतुः ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: त्रयीमय यज्ञस्वरूप प्रभु, आपने वराह बनकर जल में डूबी पृथ्वी को दाँतों पर ऐसे उठाया जैसे गजराज कमलिनी उठाता है; योगी आपकी स्तुति कर रहे थे।

श्लोक 7.47

स प्रसीद त्वमस्माकमाकाङ्क्षतां दर्शनं ते परिभ्रष्टसत्कर्मणाम् । कीर्त्यमाने नृभिर्नाम्नि यज्ञेश ते यज्ञविघ्नाः क्षयं यान्ति तस्मै नमः ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञेश्वर, विघ्न से सत्कर्मों से च्युत हम आपके दर्शन के इच्छुक हैं; प्रसन्न होइए। जिनका नाम गाने से यज्ञ के विघ्न नष्ट होते हैं, उन्हें प्रणाम है।

श्लोक 7.48

मैत्रेय उवाच । इति दक्षः कविर्यज्ञं भद्र रुद्राभिमर्शितम् । कीर्त्यमाने हृषीकेशे सन्निन्ये यज्ञभावने ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—इस प्रकार यज्ञ के आधार हृषीकेश की स्तुति करते हुए दक्ष ने रुद्र द्वारा बाधित यज्ञ को फिर व्यवस्थित किया।

श्लोक 7.49

भगवान् स्वेन भागेन सर्वात्मा सर्वभागभुक् । दक्षं बभाष आभाष्य प्रीयमाण इवानघ ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सबके आत्मा और समस्त यज्ञभागों के भोक्ता भगवान अपना भाग स्वीकार करके प्रसन्नतापूर्वक दक्ष से बोले।

श्लोक 7.50

श्रीभगवानुवाच । अहं ब्रह्मा च शर्वश्च जगतः कारणं परम् । आत्मेश्वर उपद्रष्टा स्वयन्दृगविशेषणः ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने कहा—मैं, ब्रह्मा और शिव जगत के कारणरूप एक ही परम तत्त्व के रूप हैं। वह अन्तर्यामी, साक्षी, स्वप्रकाश और उपाधियों से रहित है।

श्लोक 7.51

आत्ममायां समाविश्य सोऽहं गुणमयीं द्विज । सृजन् रक्षन् हरन् विश्वं दध्रे संज्ञां क्रियोचिताम् ॥ ५१॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपनी गुणमयी माया में प्रवेश करके मैं ही सृष्टि, पालन और संहार करता हूँ तथा कार्य के अनुसार अलग नाम धारण करता हूँ।

श्लोक 7.52

तस्मिन् ब्रह्मण्यद्वितीये केवले परमात्मनि । ब्रह्मरुद्रौ च भूतानि भेदेनाज्ञोऽनुपश्यति ॥ ५२॥

सरल हिंदी भावार्थ: अज्ञान के कारण मनुष्य उस अद्वितीय परमात्मा में ब्रह्मा, रुद्र और दूसरे जीवों को स्वतन्त्र तथा परस्पर असम्बद्ध तत्त्व मानता है।

श्लोक 7.53

यथा पुमान् न स्वाङ्गेषु शिरः पाण्यादिषु क्वचित् । पारक्यबुद्धिं कुरुते एवं भूतेषु मत्परः ॥ ५३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे मनुष्य सिर और हाथ आदि अपने अङ्गों को पराया नहीं मानता, वैसे ही मेरा भक्त सभी प्राणियों में आत्मीयता देखता है।

श्लोक 7.54

त्रयाणामेकभावानां यो न पश्यति वै भिदाम् । सर्वभूतात्मनां ब्रह्मन् स शान्तिमधिगच्छति ॥ ५४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो इन तीनों के एक तत्त्व को समझकर भेदद्वेष नहीं करता और उन्हें सभी प्राणियों के आत्मा से जुड़ा जानता है, वह शान्ति प्राप्त करता है।

श्लोक 7.55

मैत्रेय उवाच । एवं भगवताऽऽदिष्टः प्रजापतिपतिर्हरिम् । अर्चित्वा क्रतुना स्वेन देवानुभयतोऽयजत् ॥ ५५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—भगवान के इस उपदेश के अनुसार दक्ष ने अपने यज्ञ से हरि की आराधना की और अन्य देवताओं को भी विधिपूर्वक भाग दिया।

श्लोक 7.56

रुद्रं च स्वेन भागेन ह्युपाधावत्समाहितः । कर्मणोदवसानेन सोमपानितरानपि । उदवस्य सहर्त्विग्भिः सस्नाववभृथं ततः ॥ ५६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने एकाग्र होकर रुद्र को उनका भाग दिया, समापन के कर्म से सोमपायी तथा अन्य देवताओं की पूजा की और पुरोहितों सहित अवभृथ स्नान किया।

श्लोक 7.57

तस्मा अप्यनुभावेन स्वेनैवावाप्तराधसे । धर्म एव मतिं दत्त्वा त्रिदशास्ते दिवं ययुः ॥ ५७॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवताओं ने अपने स्वाभाविक प्रभाव से यज्ञसिद्धि प्राप्त दक्ष की बुद्धि धर्म में स्थिर की और स्वर्ग लौट गए।

श्लोक 7.58

एवं दाक्षायणी हित्वा सती पूर्वकलेवरम् । जज्ञे हिमवतः क्षेत्रे मेनायामिति शुश्रुम ॥ ५८॥

सरल हिंदी भावार्थ: हमने सुना है कि पूर्व शरीर छोड़ने वाली दक्षपुत्री सती फिर हिमवान और मेना की पुत्री के रूप में उत्पन्न हुईं।

श्लोक 7.59

तमेव दयितं भूय आवृङ्क्ते पतिमम्बिका । अनन्यभावैकगतिं शक्तिः सुप्तेव पूरुषम् ॥ ५९॥

सरल हिंदी भावार्थ: अम्बिका ने फिर उसी प्रिय पति शिव को चुना। वे अनन्यभाव से उन्हीं का आश्रय लेती हैं, जैसे प्रलय में शक्ति पुरुष में निहित रहती है।

श्लोक 7.60

एतद्भगवतः शम्भोः कर्म दक्षाध्वरद्रुहः । श्रुतं भागवताच्छिष्यादुद्धवान्मे बृहस्पतेः ॥ ६०॥

सरल हिंदी भावार्थ: दक्ष के यज्ञ का विनाश करने वाले भगवान शम्भु की यह कथा मैंने बृहस्पति के शिष्य, महान भक्त उद्धव से सुनी थी।

श्लोक 7.61

इदं पवित्रं परमीशचेष्टितं यशस्यमायुष्यमघौघमर्षणम् । यो नित्यदाऽऽकर्ण्य नरोऽनुकीर्तये- द्धुनोत्यघं कौरव भक्तिभावतः ॥ ६१॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर, परमेश्वर की यह पवित्र कथा श्रद्धा से नित्य सुनने और सुनाने वाले के लिए यश, शुभ जीवन और पापशुद्धि का फल कहा गया है।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 7 समाप्त ॥

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इस भाग का भक्ति-सन्देश

विद्या, पद और प्रतिष्ठा विनय के साथ ही शोभा पाते हैं। दूसरों का अनादर कलह बढ़ाता है; क्षमा और आत्मीय दृष्टि उससे मुक्त करती है। इस कथा का समापन हरि–हर में भेदद्वेष छोड़कर सभी प्राणियों में एक परमात्मा का दर्शन करने की शिक्षा से होता है।

पाठाधार और संपादकीय जानकारी

प्राचीन मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents का “श्रीमद्भागवतं—चतुर्थस्कन्धः” है। अध्याय 1–7 में क्रमशः 66, 35, 25, 34, 26, 53 और 61 श्लोक हैं; कुल 300। अध्याय 6 के श्लोक 34 से पहले कोष्ठक में दिया गया अनङ्कित जयघोष मुख्य श्लोक में सम्मिलित नहीं है। हिंदी भावार्थ स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है, किसी आधुनिक टीका की प्रतिलिपि नहीं। दक्ष, नन्दीश्वर और भृगु के कटु आरोप उनके प्रसंगगत वचन हैं; कथा का निष्कर्ष भेदद्वेष का त्याग है। सती का देहत्याग और युद्ध पौराणिक घटनावर्णन हैं, अनुकरण के निर्देश नहीं। वंश, दिव्य आयु, योजन और योग का विवरण पुराणपरम्परा के अनुसार है।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • भाग १ समाप्त ॥

॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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