श्रीमद्भागवत महापुराण चतुर्थ स्कन्ध भाग 1 — अध्याय 1–7, दक्ष–सती कथा और शिव महिमा
श्रीमद्भागवत महापुराण
चतुर्थ स्कन्ध • भाग १ • अध्याय १–७
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अभिमान से अशान्ति, क्षमा से मंगल
चतुर्थ स्कन्ध का आरम्भ मनु और प्रजापतियों के वंशवर्णन से होता है। फिर दक्ष के अभिमान, सती की पीड़ा, वीरभद्र के प्राकट्य और यज्ञविनाश की कथा आती है। ब्रह्मा की प्रार्थना पर शिव क्षमा करते हैं और भगवान हरि, ब्रह्मा तथा शिव के मूल एकत्व का उपदेश देते हैं।
अध्याय 1–7 के सभी 300 श्लोक क्रम से प्रस्तुत हैं। प्रत्येक का सरल हिंदी भावार्थ इस प्रकाशन के लिए स्वतंत्र रूप से लिखा गया है। आगे ध्रुव की भक्ति और अन्य प्रसंग आएँगे।
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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 1
मनुवंश, नर–नारायण और दक्ष की कन्याएँ
श्लोक 1.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—मनु और शतरूपा की तीन प्रसिद्ध कन्याएँ आकूति, देवहूति और प्रसूति हुईं।
श्लोक 1.2
सरल हिंदी भावार्थ: पुत्रों के होते हुए भी मनु ने शतरूपा की सहमति से आकूति का विवाह रुचि से पुत्रिका धर्म के अनुसार किया, जिसमें कन्या का पुत्र नाना के वंश का उत्तराधिकारी माना जाता था।
श्लोक 1.3
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मतेज से सम्पन्न प्रजापति रुचि ने गहन समाधि के प्रभाव से आकूति के गर्भ से एक पुत्र और एक पुत्री उत्पन्न किए।
श्लोक 1.4
सरल हिंदी भावार्थ: उनमें पुत्र यज्ञस्वरूप विष्णु थे और पुत्री दक्षिणा, उनसे अविच्छिन्न लक्ष्मी का अंश थीं।
श्लोक 1.5
सरल हिंदी भावार्थ: स्वायम्भुव मनु प्रसन्न होकर अपनी पुत्री के तेजस्वी पुत्र को घर ले आए और रुचि ने दक्षिणा को अपने पास रखा।
श्लोक 1.6
सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञभगवान ने अपने प्रति अनुराग रखने वाली दक्षिणा से विवाह किया और परस्पर प्रसन्नता से उनके बारह पुत्र हुए।
श्लोक 1.7
सरल हिंदी भावार्थ: उन बारह पुत्रों के नाम तोष, प्रतोष, सन्तोष, भद्र, शान्ति, इडस्पति, इध्म, कवि, विभु, स्वह्न, सुदेव और रोचन थे।
श्लोक 1.8
सरल हिंदी भावार्थ: स्वायम्भुव मन्वन्तर में वे तुषित नामक देवता हुए; मरीचि आदि ऋषि थे और यज्ञ देवताओं के अधिपति थे।
श्लोक 1.9
सरल हिंदी भावार्थ: मनु के प्रतापी पुत्र प्रियव्रत और उत्तानपाद थे; उनके पुत्र, पौत्र और आगे के वंशजों से उस मन्वन्तर का विस्तार हुआ।
श्लोक 1.10
सरल हिंदी भावार्थ: मनु ने देवहूति का विवाह कर्दम से किया था। उनसे सम्बन्धित कथा तुम मुझसे पहले लगभग पूरी सुन चुके हो।
श्लोक 1.11
सरल हिंदी भावार्थ: मनु ने प्रसूति को ब्रह्मापुत्र दक्ष के साथ विवाह में दिया; उनके द्वारा उत्पन्न वंश तीनों लोकों में फैला।
श्लोक 1.12
सरल हिंदी भावार्थ: कर्दम की जिन नौ कन्याओं का विवाह ब्रह्मर्षियों से हुआ था, अब उनकी सन्तानों का विवरण सुनो।
श्लोक 1.13
सरल हिंदी भावार्थ: मरीचि की पत्नी कला से कश्यप और पूर्णिमान उत्पन्न हुए; उनके वंशजों से जगत भर गया।
श्लोक 1.14
सरल हिंदी भावार्थ: पूर्णिमान से विरज, विश्वग और देवकुल्या हुए। देवकुल्या आगे भगवान के चरणधोवन से स्वर्गीय नदी बनीं।
श्लोक 1.15
सरल हिंदी भावार्थ: अत्रि की पत्नी अनसूया से दत्त, दुर्वासा और सोम नामक तीन यशस्वी पुत्र हुए, जो क्रमशः विष्णु, शिव और ब्रह्मा के अंश माने गए।
श्लोक 1.16
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर ने पूछा—गुरुदेव, सृष्टि, पालन और संहार के कारण ये श्रेष्ठ देव अत्रि के घर किस उद्देश्य से पुत्ररूप में आए?
श्लोक 1.17
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—ब्रह्मा से सन्तान उत्पन्न करने की प्रेरणा पाकर ब्रह्मज्ञानी अत्रि अपनी पत्नी के साथ ऋक्ष नामक पर्वत पर तप करने गए।
श्लोक 1.18
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ पुष्पगुच्छों, पलाश और अशोक के वृक्षों वाला वन था तथा चारों ओर निर्विन्ध्या नदी के जल की ध्वनि गूँजती थी।
श्लोक 1.19
सरल हिंदी भावार्थ: मुनि ने प्राणायाम से मन को संयमित करके सौ वर्ष तक एक पैर पर खड़े रहकर तप किया; वे द्वन्द्वों से परे केवल वायु पर निर्वाह करते रहे।
श्लोक 1.20
सरल हिंदी भावार्थ: वे मन में प्रार्थना करते थे—जो भी जगत के परम ईश्वर हैं, मैं उनकी शरण लेता हूँ; वे मुझे अपने समान सन्तान दें।
श्लोक 1.21
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी प्राणायामजनित तपोऽग्नि से तीनों लोक तपने लगे। यह देखकर ब्रह्मा, विष्णु और महेश वहाँ आने को उद्यत हुए।
श्लोक 1.22
सरल हिंदी भावार्थ: अप्सराएँ, मुनि, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर और नाग उनकी महिमा गाते हुए साथ चले और वे तीनों अत्रि के आश्रम पहुँचे।
श्लोक 1.23
सरल हिंदी भावार्थ: उनके प्राकट्य से मुनि का मन आलोकित हो गया। उन्होंने एक पैर पर खड़े रहते हुए उन श्रेष्ठ देवताओं को देखा।
श्लोक 1.24
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने भूमि पर दण्डवत प्रणाम किया और पूजा की सामग्री हाथ में लेकर उनका स्वागत किया। वे अपने चिह्नों से पहचाने जाते हुए क्रमशः वृषभ, हंस और गरुड़ पर स्थित थे।
श्लोक 1.25
सरल हिंदी भावार्थ: उनके हँसमुख, करुणापूर्ण दर्शन से मुनि आनन्दित हुए; उनके तेज के सामने उन्होंने आँखें मूँद लीं।
श्लोक 1.26
सरल हिंदी भावार्थ: मन को उन्हीं में लगाकर और हाथ जोड़कर अत्रि ने लोकश्रेष्ठ देवताओं की मधुर वाणी से स्तुति की।
श्लोक 1.27
सरल हिंदी भावार्थ: अत्रि बोले—आप ब्रह्मा, विष्णु और शिव सृष्टि, पालन और संहार के लिए माया के गुणों के अनुसार रूप धारण करते हैं। मैं आपको प्रणाम करता हूँ; मैंने आपमें किसका आह्वान किया था?
श्लोक 1.28
सरल हिंदी भावार्थ: मैंने तो सन्तान के लिए एक ही परमेश्वर का चिन्तन किया था; फिर आप तीनों कैसे आ गए? जीवों की बुद्धि से परे प्रभुओ, कृपा करके मेरा यह आश्चर्य दूर कीजिए।
श्लोक 1.29
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—अत्रि की बात सुनकर तीनों देवता मुस्कराए और मुनि को कोमल वचन बोले।
श्लोक 1.30
सरल हिंदी भावार्थ: देवताओं ने कहा—तुम्हारा सत्य संकल्प अवश्य पूरा होगा। तुम जिस एक परम तत्त्व का ध्यान करते हो, हम उसी के रूप हैं।
श्लोक 1.31
सरल हिंदी भावार्थ: हमारे अंशरूप तीन विख्यात पुत्र तुम्हारे यहाँ जन्म लेंगे और तुम्हारा यश फैलाएँगे। तुम्हारा कल्याण हो।
श्लोक 1.32
सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार अभिलषित वर देकर वे देवता लौट गए; अत्रि और अनसूया उन्हें श्रद्धापूर्वक निहारते और सम्मान करते रहे।
श्लोक 1.33
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा के अंश से सोम, विष्णु के अंश से योगवेत्ता दत्त और शिव के अंश से दुर्वासा हुए। अब अङ्गिरा की सन्तान सुनो।
श्लोक 1.34
सरल हिंदी भावार्थ: अङ्गिरा की पत्नी श्रद्धा से सिनीवाली, कुहू, राका और अनुमति नामक चार कन्याएँ हुईं।
श्लोक 1.35
सरल हिंदी भावार्थ: उनसे उतथ्य और महान ब्रह्मज्ञानी बृहस्पति नामक दो पुत्र भी हुए, जो स्वारोचिष मन्वन्तर में प्रसिद्ध हुए।
श्लोक 1.36
सरल हिंदी भावार्थ: पुलस्त्य की पत्नी हविर्भू से अगस्त्य और तपस्वी विश्रवा हुए। अगस्त्य दूसरे जन्म में जठराग्नि से सम्बद्ध नाम से भी प्रसिद्ध हुए।
श्लोक 1.37
सरल हिंदी भावार्थ: विश्रवा की पत्नी इडविडा से यक्षराज कुबेर तथा दूसरी पत्नी से रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण हुए।
श्लोक 1.38
सरल हिंदी भावार्थ: पुलह की पत्नी गति से कर्मश्रेष्ठ, वरीयान और सहिष्णु नामक तीन श्रेष्ठ पुत्र हुए।
श्लोक 1.39
सरल हिंदी भावार्थ: क्रतु की पत्नी क्रिया से ब्रह्मतेज से चमकते साठ हजार वालखिल्य ऋषि उत्पन्न हुए।
श्लोक 1.40
सरल हिंदी भावार्थ: वसिष्ठ की पत्नी ऊर्जा से चित्रकेतु आदि सात निर्मल ब्रह्मर्षि पुत्र हुए।
श्लोक 1.41
सरल हिंदी भावार्थ: वे चित्रकेतु, सुरोचि, विरजा, मित्र, उल्बण, वसुभृद्यान और द्युमान थे; वसिष्ठ के अन्य सम्बन्ध से शक्ति आदि पुत्र भी हुए।
श्लोक 1.42
सरल हिंदी भावार्थ: अथर्वा की पत्नी चित्ति से दृढ़व्रती दध्यङ् हुए, जो अश्वशिरा नाम से प्रसिद्ध थे। अब भृगु का वंश सुनो।
श्लोक 1.43
सरल हिंदी भावार्थ: भृगु और उनकी पुण्यवती पत्नी ख्याति से धाता, विधाता और भगवान में परम अनुरक्त श्री उत्पन्न हुईं।
श्लोक 1.44
सरल हिंदी भावार्थ: मेरु ने अपनी कन्याएँ आयति और नियति क्रमशः धाता और विधाता को दीं; उनसे मृकण्ड और प्राण हुए।
श्लोक 1.45
सरल हिंदी भावार्थ: मृकण्ड से मार्कण्डेय और प्राण से वेदशिरा मुनि हुए। भृगुवंश में कवि भी हुए, जिनके पुत्र उशना अर्थात शुक्राचार्य थे।
श्लोक 1.46
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर, इन मुनियों ने अपने वंश से लोकों का विस्तार किया। कर्दम की पुत्रियों से उत्पन्न इस वंश का श्रद्धापूर्वक श्रवण शुद्धिदायक कहा गया है।
श्लोक 1.47
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मापुत्र दक्ष ने मनु की कन्या प्रसूति से विवाह किया और उनकी सोलह सुन्दर कन्याएँ हुईं।
श्लोक 1.48
सरल हिंदी भावार्थ: दक्ष ने उनमें तेरह कन्याएँ धर्म को, एक अग्नि को, एक पितरों को और एक संसारबन्धन हरने वाले शिव को दी।
श्लोक 1.49
सरल हिंदी भावार्थ: धर्म की पत्नियाँ श्रद्धा, मैत्री, दया, शान्ति, तुष्टि, पुष्टि, क्रिया, उन्नति, बुद्धि, मेधा, तितिक्षा, ह्री और मूर्ति थीं।
श्लोक 1.50
सरल हिंदी भावार्थ: श्रद्धा से शुभ, मैत्री से प्रसाद, दया से अभय, शान्ति से सुख, तुष्टि से मुद और पुष्टि से स्मय उत्पन्न हुए।
श्लोक 1.51
सरल हिंदी भावार्थ: क्रिया से योग, उन्नति से दर्प, बुद्धि से अर्थ, मेधा से स्मृति, तितिक्षा से क्षेम और ह्री से प्रश्रय उत्पन्न हुए। यह गुणों का मानवीकरण करते हुए वंशवर्णन है।
श्लोक 1.52
सरल हिंदी भावार्थ: समस्त सद्गुणों की जननी मूर्ति से नर और नारायण ऋषि प्रकट हुए।
श्लोक 1.53
सरल हिंदी भावार्थ: उनके जन्म पर जगत ने आनन्द मनाया; मन, दिशाएँ, वायु, नदियाँ और पर्वत सब प्रसन्न हो उठे।
श्लोक 1.54
सरल हिंदी भावार्थ: दिव्य वाद्य बजे, पुष्पवर्षा हुई, प्रसन्न मुनियों ने स्तुति की और गन्धर्वों ने गीत गाए।
श्लोक 1.55
सरल हिंदी भावार्थ: देवाङ्गनाएँ नृत्य करने लगीं और बड़ा मंगलमय उत्सव हुआ। ब्रह्मा आदि देवता स्तुति करने पहुँचे।
श्लोक 1.56
सरल हिंदी भावार्थ: देवताओं ने कहा—जो अपनी माया से अपने भीतर जगत की विविधता रचकर उसे प्रकट करते हैं और अब धर्म के घर ऋषिरूप में आए हैं, उन परम पुरुष को प्रणाम है।
श्लोक 1.57
सरल हिंदी भावार्थ: आपका तत्त्व बुद्धि से पूरी तरह नहीं जाना जा सकता। जगत की व्यवस्था बचाने के लिए हमें उत्पन्न करने वाले प्रभु, करुणापूर्ण निर्मल दृष्टि से हमारी ओर देखिए।
श्लोक 1.58
सरल हिंदी भावार्थ: देवताओं की स्तुति और पूजा स्वीकार करके तथा उन्हें कृपादृष्टि देकर नर–नारायण गन्धमादन पर्वत चले गए।
श्लोक 1.59
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के वही अंश धरती का भार दूर करने के लिए यदुवंश और कुरुवंश में श्रीकृष्ण और अर्जुन के रूप में आए।
श्लोक 1.60
सरल हिंदी भावार्थ: अग्नि की पत्नी स्वाहा से पावक, पवमान और शुचि नामक तीन पुत्र हुए, जो हवन की आहुति स्वीकार करते हैं।
श्लोक 1.61
सरल हिंदी भावार्थ: उन तीनों से पैंतालीस अग्नियाँ उत्पन्न हुईं; पिता और पितामह सहित उनकी कुल संख्या उनचास हुई।
श्लोक 1.62
सरल हिंदी भावार्थ: वैदिक यज्ञों में वेदज्ञ जिन नामों से अग्निसम्बन्धी इष्टियों का विधान करते हैं, वे इन्हीं अग्नियों के नाम हैं।
श्लोक 1.63
सरल हिंदी भावार्थ: अग्निष्वात्त, बर्हिषद, सौम्य और आज्यप पितरों के अग्निसहित तथा अग्निरहित विभाग हैं; दक्ष की कन्या स्वधा उनकी पत्नी हुईं।
श्लोक 1.64
सरल हिंदी भावार्थ: स्वधा से वयुना और धारिणी नाम की दो कन्याएँ हुईं; दोनों ब्रह्मविद्या तथा उसके अनुभव में पारंगत थीं।
श्लोक 1.65
सरल हिंदी भावार्थ: शिव की पत्नी सती अपने पति की अनन्य सेविका थीं; उन्हें शिव के समान गुण और शील वाला पुत्र नहीं हुआ।
श्लोक 1.66
सरल हिंदी भावार्थ: निर्दोष शिव के प्रति अपने पिता के अनुचित व्यवहार से अत्यन्त व्यथित सती ने युवावस्था में योग द्वारा देह त्याग दी।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 1 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 2
दक्ष का अभिमान और परस्पर शाप
श्लोक 2.1
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर ने पूछा—दक्ष अपनी पुत्री से स्नेह रखते थे, फिर सती की उपेक्षा करके उन्होंने शीलवानों में श्रेष्ठ शिव से द्वेष क्यों किया?
श्लोक 2.2
सरल हिंदी भावार्थ: चराचर जगत के गुरु, निर्वैर, शान्त, आत्मतृप्त और महान देवता शिव से कोई द्वेष कैसे कर सकता है?
श्लोक 2.3
सरल हिंदी भावार्थ: गुरुदेव, बताइए कि ससुर और दामाद में ऐसा वैर कैसे हुआ, जिसके कारण सती ने प्रिय प्राण भी छोड़ दिए।
श्लोक 2.4
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—एक बार प्रजापतियों के यज्ञ में महान ऋषि, देवता, अग्निदेव तथा उनके अनुचर एकत्र हुए।
श्लोक 2.5
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ दक्ष प्रवेश कर रहे थे। उनका तेज सूर्य के समान था और उनसे सभा प्रकाशित हो उठी।
श्लोक 2.6
सरल हिंदी भावार्थ: उन्हें देखकर ब्रह्मा और शिव को छोड़कर अग्निदेव सहित सभी सभासद अपने आसनों से उठ खड़े हुए।
श्लोक 2.7
सरल हिंदी भावार्थ: सभा के प्रमुखों ने दक्ष का सम्मान किया। दक्ष ने जगद्गुरु ब्रह्मा को प्रणाम करके उनकी अनुमति से आसन ग्रहण किया।
श्लोक 2.8
सरल हिंदी भावार्थ: शिव को पहले की तरह बैठे देखकर दक्ष ने उसे अपना अनादर माना। क्रोधभरी दृष्टि से देखते हुए वे कटु वचन बोलने लगे।
श्लोक 2.9
सरल हिंदी भावार्थ: दक्ष बोले—देवताओं, अग्नियों और ब्रह्मर्षियों, मेरी बात सुनिए। मैं अज्ञान या ईर्ष्या से नहीं, सदाचार की बात कह रहा हूँ। यह क्रुद्ध दक्ष का अपना दावा था।
श्लोक 2.10
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने आरोप लगाया—यह निर्लज्ज और अभिमानी देवताओं की प्रतिष्ठा घटाता है तथा सज्जनों के मार्ग का उल्लंघन करता है।
श्लोक 2.11
सरल हिंदी भावार्थ: इसने ब्राह्मणों और अग्नि के सम्मुख मेरी कन्या का पाणिग्रहण किया है, इसलिए यह मेरा शिष्यतुल्य हुआ।
श्लोक 2.12
सरल हिंदी भावार्थ: दक्ष ने शिव के रूप का उपहास करके कहा—मेरी मृगनयनी पुत्री का हाथ ग्रहण करने पर भी इसने उठकर या वचन से मेरा उचित अभिवादन नहीं किया।
श्लोक 2.13
सरल हिंदी भावार्थ: दक्ष ने कहा—मैंने अनिच्छा से अपनी कन्या ऐसे व्यक्ति को दी जो मेरी दृष्टि में विधिहीन, अशुचि, अभिमानी और मर्यादाभङ्ग करने वाला है; उन्होंने इसे शूद्र को वेदवाणी सौंपने के अपने समय के तिरस्कारपूर्ण उपमान से जोड़ा। यह दक्ष की दोषदृष्टि और ऐतिहासिक सामाजिक पूर्वाग्रह की वाणी है।
श्लोक 2.14
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—यह भयानक श्मशानों में भूत–प्रेतों से घिरा, खुले शरीर और बिखरे केशों वाला, उन्मत्त की तरह हँसता–रोता घूमता है।
श्लोक 2.15
सरल हिंदी भावार्थ: चिताभस्म, अस्थियों और श्मशान की मालाओं का उल्लेख करके दक्ष ने शिव को अमंगलकारी बताया तथा उनके गणों को अज्ञानमय कहा। कथा यहाँ दक्ष की दोषदृष्टि दिखाती है।
श्लोक 2.16
सरल हिंदी भावार्थ: दक्ष ने खेद जताया—ब्रह्मा की प्रेरणा से मैंने अपनी साध्वी पुत्री ऐसे व्यक्ति को दे दी, जिसे मैं उन्मत्तों का स्वामी, अशुचि और दुर्भावनावाला मानता हूँ।
श्लोक 2.17
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—शिव प्रतिवाद किए बिना शान्त बैठे रहे। उनकी निन्दा करने के बाद दक्ष ने आचमन किया और क्रोध से शाप देने लगे।
श्लोक 2.18
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने शाप दिया—शिव को देवयज्ञ में इन्द्र और उपेन्द्र आदि देवताओं के साथ यज्ञभाग न मिले।
श्लोक 2.19
सरल हिंदी भावार्थ: मुख्य सभासद उन्हें रोकते रहे, फिर भी दक्ष शाप देकर और अधिक क्रोध में अपने घर चले गए।
श्लोक 2.20
सरल हिंदी भावार्थ: यह सुनकर शिवगणों के प्रमुख नन्दीश्वर भी क्रोध से भर गए। उन्होंने दक्ष और उनकी निन्दा का अनुमोदन करने वाले ब्राह्मणों को कठोर प्रतिशाप दिया।
श्लोक 2.21
सरल हिंदी भावार्थ: नन्दीश्वर ने कहा—जो देह को ही सब कुछ मानकर निर्वैर भगवान शिव से द्वेष करता है, वह परम तत्त्व से विमुख हो।
श्लोक 2.22
सरल हिंदी भावार्थ: वह सांसारिक सुख की चाह में बाहरी कर्मकाण्ड और दिखावे के गृहधर्म में उलझे तथा वेद के केवल फलवादी अर्थ में उसकी बुद्धि अटक जाए।
श्लोक 2.23
सरल हिंदी भावार्थ: दूसरों के दोष सोचते हुए आत्महित भूलने वाला दक्ष विषयासक्ति में पशुवत हो और शीघ्र बकरे के मुख वाला बने।
श्लोक 2.24
सरल हिंदी भावार्थ: जो अज्ञानमय कर्मबन्धन को ही ज्ञान मानते हैं और शिव का अनादर करने वाले दक्ष का अनुसरण करते हैं, वे भी जन्म–मरण में भटकें।
श्लोक 2.25
सरल हिंदी भावार्थ: शिव से द्वेष करने वाले लोग वेद की आकर्षक फलश्रुतियों के लोभ में पड़कर मोहग्रस्त हों।
श्लोक 2.26
सरल हिंदी भावार्थ: नन्दीश्वर ने शाप दिया कि ऐसे ब्राह्मण विद्या, तप और व्रत को केवल आजीविका बनाकर धन, शरीर और इन्द्रियसुख में रमते हुए याचना करें। यह शाप प्रसंगविशेष के दोषियों के लिए है।
श्लोक 2.27
सरल हिंदी भावार्थ: ब्राह्मण समुदाय के प्रति ऐसा शाप सुनकर भृगु ने भी प्रत्युत्तर में कठोर ब्रह्मशाप दिया।
श्लोक 2.28
सरल हिंदी भावार्थ: भृगु ने कहा—जो शिव के व्रत का पालन करते हैं और उनके पीछे चलते हैं, वे मान्य शास्त्रों के विरोधी पाखण्डमार्ग में पड़ें। यह भी क्रोध से उपजा प्रतिशाप है।
श्लोक 2.29
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने शाप में कहा कि वे बाहरी शुचिता खोकर, जटा, भस्म और अस्थियाँ धारण करते हुए मदिरा को महत्त्व देने वाली विकृत दीक्षा अपनाएँ।
श्लोक 2.30
सरल हिंदी भावार्थ: भृगु ने आरोप लगाया—तुम वेद और ब्राह्मणों की निन्दा करते हो, जो मनुष्यों के आचरण की मर्यादा के आधार हैं; इसलिए पाखण्ड को प्राप्त हो।
श्लोक 2.31
सरल हिंदी भावार्थ: भृगु ने कहा—पूर्वजों द्वारा अपनाया गया वैदिक मार्ग लोकों के कल्याण का सनातन पथ है, जिसके प्रमाण जनार्दन हैं।
श्लोक 2.32
सरल हिंदी भावार्थ: उस निर्मल और सनातन मार्ग को निन्दित करने के कारण तुम उस विपथ में जाओ, जहाँ भूतनाथ को ही अपना एकमात्र देव मानकर दूसरों का विरोध किया जाता है।
श्लोक 2.33
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—भृगु को इस प्रकार शाप देते देखकर शिव कुछ उदास होकर अपने गणों के साथ सभा से निकल गए।
श्लोक 2.34
सरल हिंदी भावार्थ: इसके बाद प्रजापतियों ने एक हजार वर्ष तक वह यज्ञ सम्पन्न किया, जिसमें सर्वश्रेष्ठ पूज्य भगवान हरि की आराधना हुई।
श्लोक 2.35
सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञ के अन्त में गङ्गा–यमुना के संगम पर अवभृथ स्नान करके सब निर्मल मन से अपने स्थानों को लौटे।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 2 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 3
सती की जिज्ञासा और शिव का विवेकपूर्ण उपदेश
श्लोक 3.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—इस प्रकार ससुर दक्ष और दामाद शिव के बीच विरोध रहते हुए बहुत समय बीत गया।
श्लोक 3.2
सरल हिंदी भावार्थ: जब ब्रह्मा ने दक्ष को सभी प्रजापतियों का प्रमुख नियुक्त किया, तब उनके भीतर अभिमान बढ़ गया।
श्लोक 3.3
सरल हिंदी भावार्थ: वाजपेय यज्ञ करके और श्रेष्ठ ज्ञानियों की उपेक्षा करते हुए दक्ष ने बृहस्पतिसव नामक बड़ा यज्ञ आरम्भ किया।
श्लोक 3.4
सरल हिंदी भावार्थ: उसमें ब्रह्मर्षि, देवर्षि, पितर और देवता तथा उनकी पत्नियाँ अपने पतियों के साथ मंगलकर्म करके उपस्थित हुईं।
श्लोक 3.5
सरल हिंदी भावार्थ: दक्षपुत्री सती ने आकाश में जाते हुए देवसमूहों की बातचीत से पिता के यज्ञोत्सव का समाचार सुना।
श्लोक 3.6
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने देखा कि सुन्दर वस्त्र और गले के आभूषण पहने देवाङ्गनाएँ अपने प्रिय पतियों सहित विमानों से सभी दिशाओं से जा रही हैं।
श्लोक 3.7
सरल हिंदी भावार्थ: अपने निवास के पास से जाती, चमकते कुण्डलों वाली उन स्त्रियों को देखकर सती ने उत्सुक होकर भूतनाथ शिव से कहा।
श्लोक 3.8
सरल हिंदी भावार्थ: सती बोलीं—आपके ससुर प्रजापति दक्ष के यहाँ यज्ञोत्सव हो रहा है। यदि आपको उचित लगे तो हम भी चलें; ये देवता उसी के लिए जा रहे हैं।
श्लोक 3.9
सरल हिंदी भावार्थ: मेरी बहनें अपने पतियों के साथ सम्बन्धियों से मिलने अवश्य पहुँचेंगी। मैं भी आपके साथ वहाँ जाकर उपहार और आदर प्रस्तुत करना चाहती हूँ।
श्लोक 3.10
सरल हिंदी भावार्थ: बहुत दिनों से मैं अपनी बहनों, उनके पतियों, मौसियों और स्नेहमयी माता से मिलना चाहती हूँ। वहाँ ऋषियों द्वारा सम्पन्न यज्ञ भी देख सकूँगी।
श्लोक 3.11
सरल हिंदी भावार्थ: आप अजन्मा हैं और अपनी माया से बने इस त्रिगुणात्मक जगत के तत्त्व को जानते हैं। मैं अभी उस तत्त्व को पूरी तरह नहीं जानती और अपने जन्मस्थान को देखने की इच्छा रखती हूँ।
श्लोक 3.12
सरल हिंदी भावार्थ: देखिए, असम्बन्धित स्त्रियाँ भी सजधजकर अपने पतियों सहित जा रही हैं; हंसों जैसे सफेद विमानों से आकाश भर गया है।
श्लोक 3.13
सरल हिंदी भावार्थ: पिता के घर जाने की पुत्री की उत्सुकता सुनकर आपका मन क्यों नहीं पिघलता? प्रेम होने पर पति, गुरु और माता–पिता के घर बिना बुलाए भी जाया जाता है।
श्लोक 3.14
सरल हिंदी भावार्थ: करुणामय प्रभु, मेरी इच्छा पूरी कीजिए। आपने मुझे अपना अर्धाङ्ग माना है; मेरी प्रार्थना स्वीकार करके मुझ पर कृपा कीजिए।
श्लोक 3.15
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—प्रिय पत्नी की बात सुनकर शिव ने हल्की मुस्कान से उत्तर दिया। उन्हें सभा में दक्ष के कहे हृदयभेदी कटु वचन याद आ गए।
श्लोक 3.16
सरल हिंदी भावार्थ: शिव बोले—तुम्हारी बात ठीक है कि सम्बन्धियों के यहाँ बिना बुलाए जा सकते हैं, पर तभी जब वे देहाभिमान और क्रोध से दूसरों में दोष न ढूँढ़ते हों।
श्लोक 3.17
सरल हिंदी भावार्थ: विद्या, तप, धन, रूप, आयु और कुल सज्जनों में सद्गुण बनते हैं; दुर्जनों में वही अभिमान पैदा करके विवेक नष्ट करते हैं और उन्हें महात्माओं की महिमा दिखाई नहीं देती।
श्लोक 3.18
सरल हिंदी भावार्थ: केवल सम्बन्ध का विचार करके ऐसे अस्थिरचित्त लोगों के घर नहीं जाना चाहिए, जो आने वाले को टेढ़ी दृष्टि और क्रोधभरी आँखों से देखते हैं।
श्लोक 3.19
सरल हिंदी भावार्थ: शत्रु के बाणों का घाव भी उतना नहीं दुखाता जितना अपनों के कटु वचन। उनसे आहत हृदय दिन–रात जलता रहता है।
श्लोक 3.20
सरल हिंदी भावार्थ: तुम दक्ष की प्रिय और सम्मानित पुत्री हो, फिर भी मुझसे सम्बन्ध होने के कारण वहाँ तुम्हें आदर नहीं मिलेगा; दक्ष मेरे कारण भीतर से जलते हैं।
श्लोक 3.21
सरल हिंदी भावार्थ: महात्माओं की समृद्धि देखकर जिसका हृदय ईर्ष्या से तपता है, वह उनके ऊँचे पद तक पहुँचने में असमर्थ होकर उनसे वैसे ही द्वेष करता है जैसे असुर हरि से करते हैं।
श्लोक 3.22
सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानीजन परस्पर उठकर स्वागत, विनय और प्रणाम करते हैं, पर उनके मन में वह आदर देहाभिमानी व्यक्ति के लिए नहीं, उसके भीतर स्थित परम पुरुष के लिए होता है।
श्लोक 3.23
सरल हिंदी भावार्थ: पूर्ण निर्मल चित्त को वसुदेव कहा जाता है, क्योंकि उसमें परम पुरुष आवरणरहित प्रकट होते हैं। उसी विशुद्ध स्थिति में मैं भगवान वासुदेव को प्रणाम करता हूँ।
श्लोक 3.24
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए दक्ष तुम्हारे पिता होते हुए भी मेरे प्रति द्वेष रखने के कारण तुम्हारे मिलने योग्य नहीं हैं; उनके समर्थक भी ऐसे ही हैं। उन्होंने यज्ञसभा में निर्दोष मेरा अपमान किया था।
श्लोक 3.25
सरल हिंदी भावार्थ: मेरी बात छोड़कर वहाँ जाने से तुम्हारा मंगल नहीं होगा। माननीय व्यक्ति का अपने ही लोगों से अपमानित होना अत्यन्त असह्य पीड़ा देता है।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 3 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 4
दक्ष के यज्ञ में सती का अपमान और देहत्याग
श्लोक 4.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—शिव मौन हो गए; उन्हें दोनों स्थितियों में सती के अनिष्ट की आशंका थी। सती सम्बन्धियों से मिलना चाहती थीं, पर शिव की चेतावनी से डरती हुई कभी बाहर जातीं और कभी भीतर लौट आतीं।
श्लोक 4.2
सरल हिंदी भावार्थ: अपनों से मिलने की इच्छा बाधित होने से वे दुखी हुईं। रोते हुए, क्रोध और कम्पन से व्याकुल होकर उन्होंने शान्त शिव की ओर अत्यन्त रोषभरी दृष्टि से देखा।
श्लोक 4.3
सरल हिंदी भावार्थ: अन्ततः सती गहरी साँस लेकर, शोक और क्रोध से पीड़ित मन से शिव को छोड़ माता–पिता के घर चली गईं। शिव ने प्रेम से उन्हें अपना आधा शरीर माना था।
श्लोक 4.4
सरल हिंदी भावार्थ: अकेली और शीघ्र जाती सती के पीछे मणिमान और मद आदि यक्षों सहित शिव के हजारों अनुचर नन्दी को आगे करके चल पड़े।
श्लोक 4.5
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने सती को वृषभ पर बैठाया और सारिका, कन्दुक, दर्पण, कमल, श्वेत छत्र, पंखे और मालाएँ लेकर, गीत तथा शङ्ख–दुन्दुभि–वंशी के साथ चले।
श्लोक 4.6
सरल हिंदी भावार्थ: सती उस यज्ञस्थल में पहुँचीं, जहाँ वेदध्वनि गूँज रही थी, ऋषि और देवता उपस्थित थे तथा मिट्टी, लकड़ी, धातु, स्वर्ण, कुश और चर्म के यज्ञोपकरण रखे थे।
श्लोक 4.7
सरल हिंदी भावार्थ: दक्ष के भय से किसी ने उनका स्वागत नहीं किया। केवल माता और बहनों ने प्रेम के आँसुओं से भरकर हर्षपूर्वक उन्हें गले लगाया।
श्लोक 4.8
सरल हिंदी भावार्थ: बहनों, माता और मौसियों ने कुशल पूछी तथा आसन और आदर दिया, पर पिता द्वारा उपेक्षित सती ने वह सत्कार स्वीकार नहीं किया।
श्लोक 4.9
सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञ में शिव का भाग न देखकर और पिता द्वारा उनका अनादर देखकर सती प्रचण्ड क्रोध से भर उठीं। वे यज्ञसभा में सम्मान की अधिकारिणी होते हुए भी उपेक्षित थीं।
श्लोक 4.10
सरल हिंदी भावार्थ: क्रोध से काँपती वाणी में उन्होंने शिवद्वेषी और कर्मकाण्ड के अभिमानी दक्ष को सबके सामने धिक्कारा। साथ ही आक्रमण को उठे अपने गणों को रोक दिया।
श्लोक 4.11
सरल हिंदी भावार्थ: सती बोलीं—शिव किसी को अत्यधिक प्रिय या अप्रिय नहीं मानते; वे सबके प्रिय आत्मा और निर्वैर हैं। आपके अतिरिक्त कौन उनका विरोध करेगा?
श्लोक 4.12
सरल हिंदी भावार्थ: सज्जन दूसरों के गुण स्वीकार करते हैं, पर आप उनमें भी दोष खोजते हैं। महात्मा तो थोड़ा गुण भी बढ़ाकर देखते हैं; आपने उन्हीं में अपराध देखा।
श्लोक 4.13
सरल हिंदी भावार्थ: जो लोग शरीर को ही आत्मा मानते हैं, उनमें महात्माओं की निन्दा होना आश्चर्य नहीं। महापुरुषों के चरणों की धूल के सामने उनका मिथ्या तेज टिकता नहीं, इसलिए वे ईर्ष्या करते हैं।
श्लोक 4.14
सरल हिंदी भावार्थ: जिस शिव के दो अक्षर का नाम एक बार सहज उच्चारण करने से भी पापहर कहा गया है, उन्हीं पवित्रकीर्ति और अटल शासन वाले शिव से आप द्वेष करते हैं।
श्लोक 4.15
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मानन्द चाहने वाले महात्माओं के मनरूपी भ्रमर जिनके चरणकमलों की सेवा करते हैं और जो जगत को आशीर्वाद देते हैं, उन विश्वबन्धु से आप विरोध रखते हैं।
श्लोक 4.16
सरल हिंदी भावार्थ: क्या ब्रह्मा आदि देवता शिव के श्मशानवास, जटा, भस्म और कपाल नहीं जानते? फिर भी वे उनके चरणों से उतरे पुष्प अपने मस्तक पर रखते हैं; उनके बाहरी रूप से उनकी महिमा नहीं घटती।
श्लोक 4.17
सरल हिंदी भावार्थ: सती ने धर्मरक्षक प्रभु की निन्दा को अत्यन्त असह्य बताते हुए प्राचीन कठोर प्रतिकार की बात कही—असमर्थ हो तो कान बन्द करके हटे और समर्थ हो तो निन्दा रोके, प्राण देकर भी। यह क्रुद्ध पात्र की प्रसंगगत वाणी है, आज किसी के प्रति हिंसा या आत्महानि का निर्देश नहीं।
श्लोक 4.18
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—शिव की निन्दा करने वाले आपसे उत्पन्न यह शरीर मैं नहीं रखूँगी। जैसे भूल से खाए अशुद्ध अन्न को निकालकर शुद्धि चाही जाती है, वैसे ही मैं इससे अलग होना चाहती हूँ।
श्लोक 4.19
सरल हिंदी भावार्थ: अपने आत्मस्वरूप में रमण करने वाले महामुनि की बुद्धि कर्मफलवादी कथनों के अधीन नहीं होती। देव और मनुष्य की गति भिन्न होती है; अपने धर्म में रहकर दूसरे को निन्दित नहीं करना चाहिए।
श्लोक 4.20
सरल हिंदी भावार्थ: वेद में प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों के लिए सत्य मार्ग बताए गए हैं, पर वे अलग अधिकारियों के लिए हैं। एक ही व्यक्ति में विरोधी आचरण साथ नहीं चलते; परम ब्रह्म इन कर्मबन्धनों से परे है।
श्लोक 4.21
सरल हिंदी भावार्थ: पिताजी, हमारी साधना की गति केवल यज्ञशाला के धूममार्ग तक सीमित नहीं। वह बाहरी चिह्नों से पूरी नहीं पहचानी जाती और अवधूत महात्मा उसकी सेवा करते हैं।
श्लोक 4.22
सरल हिंदी भावार्थ: शिव के अपराधी आपसे प्राप्त इस शरीर को रखना मुझे स्वीकार नहीं। महात्माओं की निन्दा करने वाले से जन्म का सम्बन्ध मेरे लिए लज्जाजनक हुआ है।
श्लोक 4.23
सरल हिंदी भावार्थ: जब शिव मुझे प्रेम से दाक्षायणी कहते हैं, तो आपके सम्बन्ध की स्मृति से मेरी प्रसन्नता मिट जाती है। इसलिए आपके शरीर से उत्पन्न इस देह को मैं छोड़ूँगी।
श्लोक 4.24
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—ऐसा कहकर सती यज्ञस्थल की भूमि पर उत्तरमुख होकर बैठ गईं। पीत वस्त्र ओढ़े, जलस्पर्श किया, वाणी शान्त की और आँखें मूँदकर योगसमाधि में स्थित हुईं।
श्लोक 4.25
सरल हिंदी भावार्थ: कथा के अनुसार उन्होंने आसन स्थिर करके प्राण–अपान का संयम किया और उदान को नाभि से हृदय, कण्ठ तथा भृकुटि के मध्य ले गईं। यह पौराणिक योगवर्णन है।
श्लोक 4.26
सरल हिंदी भावार्थ: जिस शरीर को शिव ने बार–बार प्रेम से गोद में लिया था, उसी को दक्ष के प्रति रोष से छोड़ने की इच्छा करते हुए सती ने योगाग्नि की धारणा की।
श्लोक 4.27
सरल हिंदी भावार्थ: वे केवल जगद्गुरु पति शिव के चरणकमलों का ध्यान कर रही थीं। कथा कहती है कि समाधि से उत्पन्न अग्नि में उनका शरीर प्रज्वलित हुआ।
श्लोक 4.28
सरल हिंदी भावार्थ: यह आश्चर्य देखकर पृथ्वी और आकाश में हाहाकार हुआ—देवाधिदेव की प्रिया सती को किसने इतना व्यथित किया कि उन्होंने देह त्याग दी?
श्लोक 4.29
सरल हिंदी भावार्थ: लोग बोले—चराचर प्रजा के पालक दक्ष की कठोरता देखो! उनकी सम्मानयोग्य पुत्री सती उनके विरोध से आहत होकर प्राण छोड़ गईं।
श्लोक 4.30
सरल हिंदी भावार्थ: शिव का द्वेष करने वाले दक्ष ने अपने अपराध के कारण अपनी ही पुत्री को इस अनिष्ट से नहीं रोका; इससे उन्हें बड़ी अपकीर्ति मिलेगी।
श्लोक 4.31
सरल हिंदी भावार्थ: लोग ऐसा कह रहे थे। सती का अद्भुत देहत्याग देखकर उनके अनुचर अस्त्र उठाकर दक्ष को मारने के लिए खड़े हुए।
श्लोक 4.32
सरल हिंदी भावार्थ: उन्हें वेग से आते देखकर भृगु ने यज्ञविघ्न रोकने वाले मन्त्र से दक्षिणाग्नि में आहुति दी।
श्लोक 4.33
सरल हिंदी भावार्थ: उस आहुति से ऋभु नाम के हजारों तेजस्वी देवता प्रकट हुए, जिन्होंने तप से सोमपान का अधिकार पाया था।
श्लोक 4.34
सरल हिंदी भावार्थ: जलती लकड़ियों के अस्त्रधारी और ब्रह्मतेज से दमकते उन देवताओं से पीड़ित होकर प्रमथ और यक्ष सभी दिशाओं में भाग गए।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 4 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 5
वीरभद्र का प्राकट्य और दक्षयज्ञ का विनाश
श्लोक 5.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—नारद से सती के अपमान और देहत्याग तथा यज्ञ के ऋभुओं द्वारा अपने गणों को भगाए जाने का समाचार सुनकर शिव अत्यन्त क्रुद्ध हुए।
श्लोक 5.2
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने क्रोध में ओठ दबाए, बिजली और अग्नि जैसी चमकती एक जटा उखाड़ी और गम्भीर गर्जना करते हुए पृथ्वी पर पटक दी।
श्लोक 5.3
सरल हिंदी भावार्थ: उससे आकाश छूता विशाल, मेघवर्ण, हजार भुजाओं, तीन सूर्यसम नेत्रों, विकराल दाँतों, अग्निज्वालामय केशों और अनेक अस्त्रों वाला वीरभद्र प्रकट हुआ।
श्लोक 5.4
सरल हिंदी भावार्थ: उसने हाथ जोड़कर पूछा—क्या करूँ? शिव ने कहा—तुम मेरे अंश और गणों के सेनापति हो; दक्ष सहित उसके यज्ञ का विनाश करो।
श्लोक 5.5
सरल हिंदी भावार्थ: शिव की आज्ञा पाकर वीरभद्र ने उनकी परिक्रमा की। उनके अवरोधहीन तेज से अपने को बड़े–बड़े वीरों के बल का सामना करने योग्य समझा।
श्लोक 5.6
सरल हिंदी भावार्थ: भयंकर गर्जना करते शिवगण उसके पीछे चले। विनाशकारी शूल उठाए और पैरों के आभूषणों की ध्वनि करता हुआ वीरभद्र दौड़ पड़ा।
श्लोक 5.7
सरल हिंदी भावार्थ: उधर यज्ञ के पुरोहित, यजमान, सभासद और उनकी पत्नियाँ उत्तर दिशा से उठती धूल देखकर सोचने लगे—यह अँधेरा और धूल कहाँ से आई?
श्लोक 5.8
सरल हिंदी भावार्थ: न वायु चल रही है, न डाकुओं का भय है, क्योंकि कठोर दण्ड देने वाले राजा प्राचीनबर्हि जीवित हैं; गायें भी नहीं हाँकी जा रहीं। फिर क्या संसार का प्रलय होने वाला है?
श्लोक 5.9
सरल हिंदी भावार्थ: प्रसूति आदि स्त्रियाँ व्याकुल होकर बोलीं—यह उसी पाप का फल है; दक्ष ने अपनी निर्दोष पुत्री सती का उसकी बहनों के सामने अनादर किया था।
श्लोक 5.10
सरल हिंदी भावार्थ: प्रलय के समय शिव जटाएँ बिखेरकर, दिशाओं के गजराजों को शूल पर धारण करके, अस्त्रों वाली भुजाएँ फैलाकर नृत्य करते हैं; उनका अट्टहास दिशाओं को गुँजा देता है।
श्लोक 5.11
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसे असह्य तेज और उग्र भ्रूभङ्ग वाले शिव को क्रुद्ध करके क्या दक्ष का कल्याण हो सकता है? उनके प्रचण्ड रूप से आकाश के नक्षत्र भी विचलित होते हैं।
श्लोक 5.12
सरल हिंदी भावार्थ: दक्ष के यज्ञ में लोग बार–बार ऐसे भयभीत वचन कह रहे थे और पृथ्वी तथा आकाश में हजारों भयानक उत्पात दिखाई देने लगे।
श्लोक 5.13
सरल हिंदी भावार्थ: तभी अनेक अस्त्र लिए, छोटे–बड़े, पीले–भूरे तथा विचित्र मुखों वाले शिवगणों ने महान यज्ञस्थल को चारों ओर से घेर लिया।
श्लोक 5.14
सरल हिंदी भावार्थ: कुछ ने मुख्य मण्डप, कुछ ने पत्नीशाला, सभा, अग्नीध्रशाला, विश्रामस्थल और रसोई तोड़ डाली।
श्लोक 5.15
सरल हिंदी भावार्थ: कुछ ने यज्ञपात्र तोड़े, अग्नियाँ बुझाईं, कुण्डों को दूषित किया और वेदियों की मेखलाएँ नष्ट कर दीं।
श्लोक 5.16
सरल हिंदी भावार्थ: कुछ मुनियों को सताने लगे, कुछ ने पत्नियों को डराया और कुछ ने समीप मौजूद अथवा भागते देवताओं को पकड़ लिया।
श्लोक 5.17
सरल हिंदी भावार्थ: मणिमान ने भृगु को, वीरभद्र ने दक्ष को, चण्डेश ने पूषा को और नन्दीश्वर ने भग को पकड़ लिया।
श्लोक 5.18
सरल हिंदी भावार्थ: पुरोहित, सभासद और देवता पत्थरों की चोट से अत्यन्त पीड़ित होकर इधर–उधर भागने लगे।
श्लोक 5.19
सरल हिंदी भावार्थ: शिव के प्रतिनिधि वीरभद्र ने भृगु की दाढ़ी उखाड़ दी; भृगु ने सभा में शिव का उपहास करते समय दाढ़ी दिखाई थी।
श्लोक 5.20
सरल हिंदी भावार्थ: उसने भग को भूमि पर गिराकर उनके नेत्र निकाल दिए, क्योंकि सभा में उन्होंने आँखों के संकेत से दक्ष के शाप का समर्थन किया था।
श्लोक 5.21
सरल हिंदी भावार्थ: शिव की निन्दा पर दाँत दिखाकर हँसने वाले पूषा के दाँत गिरा दिए, जैसे बलराम ने कलिङ्गराज के दाँत तोड़े थे।
श्लोक 5.22
सरल हिंदी भावार्थ: वीरभद्र दक्ष की छाती पर चढ़कर तीक्ष्ण शस्त्र से उनका सिर अलग करने लगा, पर पहले प्रयास में सफल नहीं हुआ।
श्लोक 5.23
सरल हिंदी भावार्थ: अस्त्र–शस्त्रों से भी उनकी त्वचा न कटने पर वह बहुत चकित हुआ और देर तक उपाय सोचता रहा।
श्लोक 5.24
सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञ में पशु के वध की विधि देखकर उसने उसी विधि से यजमान दक्ष का सिर शरीर से अलग कर दिया।
श्लोक 5.25
सरल हिंदी भावार्थ: भूत, प्रेत और पिशाच उस कृत्य की प्रशंसा करने लगे, जबकि अन्य उपस्थित लोगों में विपरीत प्रतिक्रिया और हाहाकार हुआ।
श्लोक 5.26
सरल हिंदी भावार्थ: क्रुद्ध वीरभद्र ने दक्ष का सिर दक्षिणाग्नि में डाल दिया, यज्ञस्थल को जलाया और कैलास लौट गया।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 5 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 6
कैलास दर्शन और ब्रह्मा की क्षमाप्रार्थना
श्लोक 6.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—शिव की सेना से पराजित देवता शूल, पट्टिश, तलवार, गदा, परिघ और मुद्गरों की चोटों से घायल हो गए थे।
श्लोक 6.2
सरल हिंदी भावार्थ: टूटे–कटे अङ्गों वाले भयभीत देवता, पुरोहित और सभासद ब्रह्मा के पास पहुँचे; उन्हें प्रणाम करके सब घटना बताई।
श्लोक 6.3
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा और विश्वात्मा नारायण इस घटना को पहले से जानते थे, इसलिए वे दक्ष के यज्ञ में गए ही नहीं थे।
श्लोक 6.4
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा ने सुनकर कहा—अत्यन्त तेजस्वी महात्मा के प्रति अपराध होने पर जीवित और सुखी रहने की इच्छा रखने वालों का कल्याण सहज नहीं होता।
श्लोक 6.5
सरल हिंदी भावार्थ: तुमने यज्ञभाग के अधिकारी शिव को उससे वञ्चित करके अपराध किया है। अब निर्मल मन से उनके चरण पकड़कर उन्हें प्रसन्न करो; वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 6.6
सरल हिंदी भावार्थ: कटुवचनों से आहत और प्रिय पत्नी से वियुक्त उन प्रभु से शीघ्र क्षमा माँगो। उनके क्रुद्ध होने पर लोकपालों सहित जगत का टिकना कठिन है; यज्ञ को पुनःजीवन देना उन्हीं की कृपा से होगा।
श्लोक 6.7
सरल हिंदी भावार्थ: न मैं, न यज्ञरूप विष्णु, न तुम और न अन्य ऋषि उनके स्वतन्त्र स्वरूप और बल की सीमा जानते हैं; फिर कौन उनके विरुद्ध उपाय कर सकता है?
श्लोक 6.8
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसा कहकर ब्रह्मा देवताओं, पितरों और प्रजापतियों को साथ लेकर अपने स्थान से शिव के प्रिय श्रेष्ठ पर्वत कैलास की ओर चले।
श्लोक 6.9
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ जन्म, औषधि, तप, मन्त्र या योग से सिद्धियाँ प्राप्त करने वाले दिव्यजन, किन्नर, गन्धर्व और अप्सराएँ निवास करते थे।
श्लोक 6.10
सरल हिंदी भावार्थ: विविध रत्नों और धातुओं से चमकते शिखर, अनेक वृक्ष, लताएँ, झाड़ियाँ और तरह–तरह के पशु उस पर्वत को सुशोभित करते थे।
श्लोक 6.11
सरल हिंदी भावार्थ: निर्मल झरनों, गुफाओं और पर्वततटों वाला वह स्थान अपने प्रियजनों के साथ विहार करती सिद्ध स्त्रियों के लिए रमणीय था।
श्लोक 6.12
सरल हिंदी भावार्थ: मोरों की पुकार, मत्त भ्रमरों की गुंजार, कोयलों और दूसरे पक्षियों का मधुर कलरव वहाँ गूँजता था।
श्लोक 6.13
सरल हिंदी भावार्थ: फलदायी वृक्ष अपनी उठी शाखाओं से पक्षियों को बुलाते से लगते, पर्वत हाथियों के साथ चलता सा और झरनों की ध्वनि से गाता सा प्रतीत होता था।
श्लोक 6.14
सरल हिंदी भावार्थ: मन्दार, पारिजात, सरल, तमाल, शाल, ताल, कोविदार, आसन और अर्जुन के वृक्ष वहाँ शोभित थे।
श्लोक 6.15
सरल हिंदी भावार्थ: आम, कदम्ब, नीप, नागकेसर, पुन्नाग, चम्पा, पाटल, अशोक, बकुल, कुन्द और कुरबक भी थे।
श्लोक 6.16
सरल हिंदी भावार्थ: स्वर्णवर्ण कमलों, शतपत्रों और अनेक सुगन्धित पुष्पों, कुब्जक, मल्लिका तथा माधवी की लताओं से वह सजा था।
श्लोक 6.17
सरल हिंदी भावार्थ: कटहल, गूलर, पीपल, पाकड़, बरगद, हींग, भोजपत्र, औषधियाँ, सुपारी और जामुन के वृक्ष भी वहाँ थे।
श्लोक 6.18
सरल हिंदी भावार्थ: खजूर, आम्रातक, आम, चिरौंजी, महुआ, इङ्गुदी तथा अन्य अनेक वृक्ष और बाँसों के झुरमुट कैलास की शोभा बढ़ाते थे।
श्लोक 6.19
सरल हिंदी भावार्थ: सरोवरों में कुमुद, उत्पल, कह्लार और कमल खिले थे; जलपक्षियों के मधुर समूह उन्हें सुशोभित करते थे।
श्लोक 6.20
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ हरिण, बन्दर, सूअर, सिंह, भालू, साही, गवय, शरभ, व्याघ्र, रुरु और भैंसे जैसे अनेक वन्यजीव थे।
श्लोक 6.21
सरल हिंदी भावार्थ: कथा में कर्णान्त्र, एकपद, अश्वमुख और कस्तूरीमृग जैसे जीवों का भी वर्णन है। केले के वनों से घिरे सरोवरों के तट बड़े रमणीय थे।
श्लोक 6.22
सरल हिंदी भावार्थ: सती के स्नान से और पवित्र हुई नन्दा नदी उस पर्वत को घेरे हुए थी। शिव के इस दिव्य पर्वत को देखकर देवता आश्चर्यचकित हुए।
श्लोक 6.23
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने वहाँ रमणीय अलकापुरी और सौगन्धिक नामक वन देखा, जिसमें उसी नाम के सुगन्धित कमल खिलते थे।
श्लोक 6.24
सरल हिंदी भावार्थ: पुरी के बाहर नन्दा और अलकनन्दा नामक दो नदियाँ थीं, जो भगवान के चरणकमलों की रज से अत्यन्त पवित्र थीं।
श्लोक 6.25
सरल हिंदी भावार्थ: देवाङ्गनाएँ अपने लोकों से उतरकर उनमें प्रवेश करतीं और प्रियजनों पर जल छिड़कते हुए क्रीड़ा करती थीं।
श्लोक 6.26
सरल हिंदी भावार्थ: उनके स्नान से मिले ताजे कुङ्कुम से जल पीला पड़ जाता था; हाथी अपनी हथिनियों को पिलाकर स्वयं प्यास न होने पर भी उसे पीते थे।
श्लोक 6.27
सरल हिंदी भावार्थ: अलकापुरी चाँदी, सोने और बहुमूल्य रत्नों के सैकड़ों विमानों तथा यक्षस्त्रियों से ऐसे शोभित थी जैसे बिजलीयुक्त मेघों से आकाश।
श्लोक 6.28
सरल हिंदी भावार्थ: देवता कुबेर की पुरी और रंगीन फूल, फल तथा पत्तियों वाले मनोहर वृक्षों से भरे सौगन्धिक वन को पीछे छोड़ आगे बढ़े।
श्लोक 6.29
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ कोयलों और पक्षियों की मधुर ध्वनि में भ्रमरों की गुंजार मिलती थी; हंसों के प्रिय सरोवरों में कमल खिले थे।
श्लोक 6.30
सरल हिंदी भावार्थ: वनहाथियों के रगड़ने से हरिचन्दन की सुगन्ध वायु में फैलती और यक्षस्त्रियों के मन को बार–बार आकर्षित करती थी।
श्लोक 6.31
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने वैदूर्य की सीढ़ियों और नीलकमलों वाली बावड़ियाँ देखीं, जहाँ किम्पुरुष आते थे। आगे उन्हें एक विशाल वटवृक्ष दिखाई दिया।
श्लोक 6.32
सरल हिंदी भावार्थ: कथा में उस वटवृक्ष की ऊँचाई सौ योजन और शाखाओं का विस्तार पचहत्तर योजन बताया गया है। उसकी स्थिर छाया ताप से रहित और पक्षियों के घोंसलों से खाली थी।
श्लोक 6.33
सरल हिंदी भावार्थ: मुक्ति चाहने वालों के उस योगमय आश्रय में उन्होंने शान्त बैठे शिव को देखा, मानो क्रोध त्यागकर स्वयं संहारकर्ता विराज रहे हों।
श्लोक 6.34
सरल हिंदी भावार्थ: सनन्दन आदि शान्त महासिद्ध और यक्ष–राक्षसों के स्वामी उनके मित्र कुबेर उनकी सेवा कर रहे थे; शिव का स्वरूप पूर्ण शान्त था।
श्लोक 6.35
सरल हिंदी भावार्थ: वे विद्या, तप और योगमार्ग में स्थित अधीश्वर थे। समस्त जगत के हितैषी होकर वात्सल्य से लोकमंगल का आचरण करते थे।
श्लोक 6.36
सरल हिंदी भावार्थ: उनका शरीर सन्ध्या के मेघ जैसा दमकता था। वे तपस्वियों के प्रिय चिह्न—भस्म, दण्ड, जटा, मृगचर्म और मस्तक पर चन्द्रकला—धारण किए थे।
श्लोक 6.37
सरल हिंदी भावार्थ: कुश के आसन पर बैठे शिव, नारद के प्रश्नों के उत्तर में उपस्थित संतों को सनातन ब्रह्मतत्त्व का उपदेश दे रहे थे।
श्लोक 6.38
सरल हिंदी भावार्थ: उनका बायाँ चरण दाहिनी जाँघ पर और बायाँ हाथ घुटने पर था; बाँह पर रुद्राक्षमाला थी और वे ज्ञान की तर्कमुद्रा में बैठे थे।
श्लोक 6.39
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मसमाधि में स्थित, योगपट्ट धारण किए और प्राचीन गुरु शिव को देखकर लोकपालों तथा ऋषियों ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया।
श्लोक 6.40
सरल हिंदी भावार्थ: देव और असुर जिनके चरणों की वन्दना करते हैं, उन शिव ने ब्रह्मा को आते देखकर उठकर सिर झुकाया; जैसे विष्णु बड़ों का सम्मान करते हैं, वैसे ही उन्होंने आदर किया।
श्लोक 6.41
सरल हिंदी भावार्थ: शिव के पास उपस्थित अन्य सिद्धों ने भी ब्रह्मा को प्रणाम किया। प्रणाम स्वीकार करके ब्रह्मा ने चन्द्रशेखर शिव से प्रसन्नतापूर्वक कहा।
श्लोक 6.42
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा बोले—मैं जानता हूँ कि आप जगत के ईश्वर हैं; कारणरूप प्रकृति और पुरुष से भी परे, अखण्ड परम ब्रह्म हैं।
श्लोक 6.43
सरल हिंदी भावार्थ: आप ही शिव और शक्ति के अपने रूपों से जगत रचते, पालते और समेटते हैं, जैसे मकड़ी अपने जाल के साथ क्रीड़ा करती है।
श्लोक 6.44
सरल हिंदी भावार्थ: धर्म और अर्थ का कल्याणकारी फल देने के लिए आपने दक्ष के माध्यम से यज्ञ की व्यवस्था बनाई और वे मर्यादाएँ स्थापित कीं जिन्हें व्रतशील वेदज्ञ मानते हैं।
श्लोक 6.45
सरल हिंदी भावार्थ: आप शुभ कर्म करने वालों को स्वर्ग अथवा परम गति और अशुभ कर्म करने वालों को दुःखद अधोगति देते हैं; फिर किसी के फल में उलटफेर क्यों हुआ, यह समझने योग्य है।
श्लोक 6.46
सरल हिंदी भावार्थ: जिन संतों ने अपना मन आपके चरणों में अर्पित किया है और जो आपको सब प्राणियों में तथा प्राणियों को अपने से अभिन्न देखते हैं, उन्हें अज्ञानी की तरह क्रोध वश में नहीं करता।
श्लोक 6.47
सरल हिंदी भावार्थ: भेदबुद्धि और कर्ममात्र में अटके लोग दूसरों की उन्नति से दुखी होकर कटुवचन कहते हैं। वे अपने ही दुर्भाग्य से नष्ट हो रहे हैं; आपके जैसे महात्मा उन्हें और दण्ड न दें।
श्लोक 6.48
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की दुस्तर माया से बुद्धि भ्रमित होने पर लोग अपराध करते हैं। संत ऐसे लोगों पर करुणा करते हैं और दैववश हुई भूल का कठोर प्रतिकार नहीं करते।
श्लोक 6.49
सरल हिंदी भावार्थ: प्रभु, आपकी बुद्धि माया से अछूती और दृष्टि समग्र है। माया से आत्मबोध खोकर कर्म में उलझे इन लोगों पर अनुग्रह कीजिए।
श्लोक 6.50
सरल हिंदी भावार्थ: मनु के पुत्र दक्ष का जो यज्ञ आपके दण्ड से अधूरा रह गया है, उसका उद्धार कीजिए। इन अयोग्य याजकों ने आपका यज्ञभाग नहीं दिया, इसलिए यज्ञ नष्ट हुआ।
श्लोक 6.51
सरल हिंदी भावार्थ: यजमान दक्ष फिर जीवित हों, भग को नेत्र मिलें, भृगु की दाढ़ी उगे और पूषा के दाँत पहले जैसे हो जाएँ।
श्लोक 6.52
सरल हिंदी भावार्थ: देवताओं और पुरोहितों के जिन अङ्गों को अस्त्रों तथा पत्थरों से चोट लगी है, वे आपकी कृपा से शीघ्र स्वस्थ हो जाएँ।
श्लोक 6.53
सरल हिंदी भावार्थ: रुद्रदेव, यज्ञ में अवशिष्ट सम्पूर्ण भाग आपका हो। आपके यज्ञभाग को अर्पित करके यह यज्ञ आज पुनः पूर्ण हो।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 6 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 7
शिव की क्षमा, यज्ञपूर्ति और हरि–हर एकत्व
श्लोक 7.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—ब्रह्मा की प्रार्थना सुनकर भगवान शिव प्रसन्न हो गए और हँसते हुए बोले।
श्लोक 7.2
सरल हिंदी भावार्थ: शिव ने कहा—मैं अज्ञानियों के अपराधों को न महत्त्व देता हूँ, न मन में रखता हूँ। माया से भ्रमित लोगों को सुधारने के लिए ही दण्ड दिया है।
श्लोक 7.3
सरल हिंदी भावार्थ: जिन दक्ष का सिर जल गया है, उन्हें बकरे का सिर मिले। भग अपने मित्र देवता की दृष्टि से यज्ञभाग देख सकें।
श्लोक 7.4
सरल हिंदी भावार्थ: पूषा यजमान के दाँतों के माध्यम से पिसा हुआ अन्न खाएँ। जिन देवताओं ने मुझे यज्ञ का अवशिष्ट भाग दिया था, उनके अङ्ग पूर्ववत हो जाएँ।
श्लोक 7.5
सरल हिंदी भावार्थ: जिन पुरोहितों की भुजाएँ और हाथ नष्ट हुए हैं, वे अश्विनीकुमारों की भुजाओं तथा पूषा के हाथों से कर्म कर सकें। भृगु को बकरे जैसी दाढ़ी मिले।
श्लोक 7.6
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—शिव के ये वचन सुनकर सब प्राणी प्रसन्न मन से उनकी प्रशंसा करने लगे।
श्लोक 7.7
सरल हिंदी भावार्थ: इसके बाद देवता और ऋषि शिव को साथ चलने के लिए आमन्त्रित करके ब्रह्मा सहित पुनः यज्ञस्थल पहुँचे।
श्लोक 7.8
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने शिव की आज्ञा के अनुसार सब व्यवस्था की और दक्ष के शरीर से यज्ञपशु बकरे का सिर जोड़ दिया।
श्लोक 7.9
सरल हिंदी भावार्थ: सिर जुड़ते ही शिव की कृपादृष्टि से दक्ष सोए हुए की तरह उठ खड़े हुए और सामने भगवान शङ्कर को देखा।
श्लोक 7.10
सरल हिंदी भावार्थ: शिवद्वेष से मलिन दक्ष का मन उनके दर्शन से शरदकालीन सरोवर की तरह निर्मल हो गया।
श्लोक 7.11
सरल हिंदी भावार्थ: वे शिव की स्तुति करना चाहते थे, पर दिवंगत पुत्री को याद करके प्रेम और उत्कण्ठा से रो पड़े; उनकी वाणी रुक गई।
श्लोक 7.12
सरल हिंदी भावार्थ: कठिनाई से मन को सँभालकर भावविह्वल दक्ष ने निष्कपट भाव से भगवान की प्रशंसा की।
श्लोक 7.13
सरल हिंदी भावार्थ: दक्ष बोले—प्रभु, आपने मुझे दण्ड देकर भी बड़ा अनुग्रह किया। तिरस्कृत करने वाले मुझ जैसे नाममात्र के ब्राह्मण से भी आपको द्वेष नहीं; फिर व्रतशील संतों के प्रति आपका और हरि का आदर कितना होगा!
श्लोक 7.14
सरल हिंदी भावार्थ: आपने ब्रह्मज्ञान की रक्षा के लिए विद्या, तप और व्रतधारी ब्राह्मणों को प्रकट किया। जैसे ग्वाला दण्ड लेकर पशुओं को बचाता है, वैसे आप उन्हें सब विपत्तियों से बचाते हैं।
श्लोक 7.15
सरल हिंदी भावार्थ: आपका तत्त्व न जानकर मैंने सभा में कटुवचनों के बाण चलाए। आपने उस अपराध को छोड़कर निन्दा के कारण गिरते मुझे कृपादृष्टि से बचाया; अपनी करुणा से ही प्रसन्न होइए।
श्लोक 7.16
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—इस प्रकार शिव से क्षमा माँगकर दक्ष ने ब्रह्मा की अनुमति से आचार्यों और पुरोहितों सहित यज्ञ फिर आरम्भ किया।
श्लोक 7.17
सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञ की पुनःपूर्ति और रुद्रगणों के संसर्ग से आए विघ्न की शुद्धि के लिए श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने विष्णु को समर्पित त्रिकपाल पुरोडाश की आहुति दी।
श्लोक 7.18
सरल हिंदी भावार्थ: अध्वर्यु के आहुति ग्रहण करते समय यजमान दक्ष ने शुद्ध मन से भगवान का ध्यान किया और हरि प्रकट हो गए।
श्लोक 7.19
सरल हिंदी भावार्थ: वेदस्तोत्ररूपी पंखों वाले गरुड़ उन्हें लाए। उनके तेज से दसों दिशाएँ जगमगा उठीं और अन्य सबका तेज मानो दब गया।
श्लोक 7.20
सरल हिंदी भावार्थ: उनका वर्ण श्याम, कमरबन्द स्वर्णमय और किरीट सूर्य के समान था। नील केश और कुण्डलों से मुख शोभित था; आठ भुजाओं में शङ्ख, कमल, चक्र, बाण, धनुष, गदा, तलवार और ढाल थीं।
श्लोक 7.21
सरल हिंदी भावार्थ: वक्षस्थल पर लक्ष्मी और गले में वनमाला थीं। उदार मुस्कान और कृपादृष्टि से वे जगत को आनन्दित कर रहे थे; दोनों ओर चँवर डुल रहे थे और ऊपर श्वेत छत्र था।
श्लोक 7.22
सरल हिंदी भावार्थ: उन्हें आया देखकर ब्रह्मा, इन्द्र और शिव सहित सभी देवता तुरन्त उठ खड़े हुए और प्रणाम किया।
श्लोक 7.23
सरल हिंदी भावार्थ: उनके प्रकाश से अपना तेज फीका पड़ता देखकर सब विस्मय और आदर से मौन हो गए; सिर पर हाथ जोड़कर अधोक्षज भगवान की सेवा में खड़े हुए।
श्लोक 7.24
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा आदि की बुद्धि भी उनकी सम्पूर्ण महिमा तक नहीं पहुँचती, फिर भी कृपा के लिए प्रकट हुए भगवान की सबने अपनी समझ के अनुसार स्तुति की।
श्लोक 7.25
सरल हिंदी भावार्थ: दक्ष पूजा की उत्तम सामग्री लेकर हाथ जोड़े हुए, नन्द–सुनन्द आदि पार्षदों से घिरे विश्वगुरु और यज्ञेश्वर के पास प्रसन्नतापूर्वक आए।
श्लोक 7.26
सरल हिंदी भावार्थ: दक्ष बोले—आप शुद्ध चेतन, अद्वितीय और निर्भय हैं; अपनी ज्योति में स्थित होकर माया से परे हैं। फिर भी उसी माया में पुरुषरूप धारण करके रहते हैं, मानो उसमें लिप्त हों, जबकि आप पूर्ण स्वतन्त्र हैं।
श्लोक 7.27
सरल हिंदी भावार्थ: पुरोहित बोले—रुद्र के शाप और कर्म में अटकी बुद्धि के कारण हम आपका निर्मल तत्त्व नहीं जानते। हम केवल यज्ञ की विधि जानते हैं, जिसके उद्देश्य और अधिदेवता आप हैं।
श्लोक 7.28
सरल हिंदी भावार्थ: सभासद बोले—जन्म–मरण के दुर्गम मार्ग में जीव मृत्यु के सर्प, विषयों की मृगतृष्णा, गृहभार, द्वन्द्वों के गड्ढों, दुष्टों के भय और शोक की अग्नि से घिरा है। वह कब आपके शरणदायी चरणों तक पहुँचेगा?
श्लोक 7.29
सरल हिंदी भावार्थ: रुद्र बोले—वरदाता प्रभु, मेरे मन की इच्छा है कि वह आपके उन चरणों में लगा रहे जिन्हें अनासक्त मुनि भी आदर से पूजते हैं। आपकी कृपा रहे तो अज्ञानी लोग मेरे आचरण पर जो भी कहें, मैं उसकी चिन्ता नहीं करता।
श्लोक 7.30
सरल हिंदी भावार्थ: भृगु बोले—आपकी गहन माया से ब्रह्मा आदि देहधारियों का भी आत्मबोध ढक जाता है और वे हृदय में स्थित आपका तत्त्व नहीं जान पाते। शरणागतों के मित्र, हम पर प्रसन्न हों।
श्लोक 7.31
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा बोले—इन्द्रियों के विषयभेद से देखा जाने वाला रूप ही आपका पूर्ण स्वरूप नहीं है। आप ज्ञान, विषय और गुणों के आश्रय होकर भी मायिक जगत से परे हैं।
श्लोक 7.32
सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्र बोले—अच्युत, आपका यह विश्वपालक रूप मन और नेत्रों को आनन्द देता है; देवशत्रुओं का नाश करने वाले अस्त्रों से युक्त आपकी आठ भुजाएँ शोभित हैं।
श्लोक 7.33
सरल हिंदी भावार्थ: ऋषियों की पत्नियाँ बोलीं—ब्रह्मा ने आपकी पूजा के लिए यह यज्ञ रचा था, जो दक्ष के प्रति शिव के क्रोध से नष्ट हुआ। यज्ञस्वरूप प्रभु, श्मशान की तरह निष्प्राण हुए इसे अपनी कमलदृष्टि से पवित्र कीजिए।
श्लोक 7.34
सरल हिंदी भावार्थ: ऋषि बोले—आपकी लीला अद्भुत है; कर्म करते हुए भी आप उससे नहीं बँधते। दूसरे ऐश्वर्य के लिए आपकी शरण आते हैं, पर सहज अनुगामिनी लक्ष्मी को भी आप आसक्त होकर नहीं चाहते।
श्लोक 7.35
सरल हिंदी भावार्थ: सिद्ध बोले—क्लेश की दावाग्नि से जला हमारा मनरूपी हाथी आपकी कथामृत नदी में उतर गया है। अब वह पुराने ताप को भूलकर ब्रह्मानन्द में डूबे जीवन्मुक्त की तरह उससे निकलना नहीं चाहता।
श्लोक 7.36
सरल हिंदी भावार्थ: यजमान की पत्नी बोलीं—लक्ष्मी के प्रिय आश्रय, आपका स्वागत है; प्रसन्न होकर हमारी रक्षा कीजिए। आपके बिना सब उपकरणों वाला यज्ञ भी सिरहीन शरीर की तरह शोभाहीन है।
श्लोक 7.37
सरल हिंदी भावार्थ: लोकपाल बोले—विषयों में फँसी हमारी आँखें आपको कैसे देखें? आप भीतर के द्रष्टा हैं जिनसे सब दृश्य प्रकाशित होते हैं। पाँच भूतों में उनसे परे छठे नियन्ता के रूप में आपका प्रकट होना आपकी माया है।
श्लोक 7.38
सरल हिंदी भावार्थ: योगेश्वर बोले—सबके आत्मा आपसे जिसे अभेद का बोध है, वह आपको अत्यन्त प्रिय है। फिर भी जो अनन्य भक्ति से आपकी शरण आते हैं, उन पर भी कृपा कीजिए।
श्लोक 7.39
सरल हिंदी भावार्थ: सृष्टि, पालन और संहार के लिए गुणमयी माया से अनेक रूपों में दिखाई देने पर भी आप अपने स्वरूप में स्थित और भेदभ्रम से मुक्त हैं; आपको प्रणाम है।
श्लोक 7.40
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा बोले—धर्म आदि की उत्पत्ति के लिए शुद्ध सत्त्व धारण करने वाले और वास्तव में गुणातीत प्रभु को प्रणाम। आपके परम स्वरूप की सीमा मैं और अन्य देवता नहीं जानते।
श्लोक 7.41
सरल हिंदी भावार्थ: अग्नि बोले—आपके तेज से ही मैं प्रज्वलित होकर घृतसिक्त आहुति पहुँचाता हूँ। पाँच प्रकार के यज्ञस्वरूप और विविध वैदिक मन्त्रों से पूजित आपको प्रणाम करता हूँ।
श्लोक 7.42
सरल हिंदी भावार्थ: देवता बोले—कल्पान्त में जगत को अपने भीतर समेटकर आप प्रलयजल में शेषनाग पर शयन करते हैं; सिद्धजन हृदय में आपका ध्यान करते हैं। वही आदिपुरुष आज हमारे सामने आकर अपने सेवकों की रक्षा कर रहे हैं।
श्लोक 7.43
सरल हिंदी भावार्थ: गन्धर्व बोले—मरीचि, ब्रह्मा, इन्द्र और रुद्र आदि सब आपके अंशों के अंश हैं। यह जगत जिसकी क्रीड़ा की सामग्री है, उन अनन्त नाथ को हम नित्य प्रणाम करते हैं।
श्लोक 7.44
सरल हिंदी भावार्थ: विद्याधर बोले—आपकी माया से जीव शरीर को अपना सब कुछ मानकर अहंता–ममता में भटकता और दुख पाकर भी विषयों को चाहता है। आपकी कथामृत का सेवन करने वाला उस आत्ममोह को दूर कर सकता है।
श्लोक 7.45
सरल हिंदी भावार्थ: ब्राह्मण बोले—यज्ञ, हवि, अग्नि, मन्त्र, समिधा, कुश, पात्र, सभासद, पुरोहित, यजमान दम्पति, देवता, अग्निहोत्र, स्वधा, सोम, घृत और यज्ञपशु—सबमें आप ही विद्यमान हैं।
श्लोक 7.46
सरल हिंदी भावार्थ: त्रयीमय यज्ञस्वरूप प्रभु, आपने वराह बनकर जल में डूबी पृथ्वी को दाँतों पर ऐसे उठाया जैसे गजराज कमलिनी उठाता है; योगी आपकी स्तुति कर रहे थे।
श्लोक 7.47
सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञेश्वर, विघ्न से सत्कर्मों से च्युत हम आपके दर्शन के इच्छुक हैं; प्रसन्न होइए। जिनका नाम गाने से यज्ञ के विघ्न नष्ट होते हैं, उन्हें प्रणाम है।
श्लोक 7.48
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—इस प्रकार यज्ञ के आधार हृषीकेश की स्तुति करते हुए दक्ष ने रुद्र द्वारा बाधित यज्ञ को फिर व्यवस्थित किया।
श्लोक 7.49
सरल हिंदी भावार्थ: सबके आत्मा और समस्त यज्ञभागों के भोक्ता भगवान अपना भाग स्वीकार करके प्रसन्नतापूर्वक दक्ष से बोले।
श्लोक 7.50
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने कहा—मैं, ब्रह्मा और शिव जगत के कारणरूप एक ही परम तत्त्व के रूप हैं। वह अन्तर्यामी, साक्षी, स्वप्रकाश और उपाधियों से रहित है।
श्लोक 7.51
सरल हिंदी भावार्थ: अपनी गुणमयी माया में प्रवेश करके मैं ही सृष्टि, पालन और संहार करता हूँ तथा कार्य के अनुसार अलग नाम धारण करता हूँ।
श्लोक 7.52
सरल हिंदी भावार्थ: अज्ञान के कारण मनुष्य उस अद्वितीय परमात्मा में ब्रह्मा, रुद्र और दूसरे जीवों को स्वतन्त्र तथा परस्पर असम्बद्ध तत्त्व मानता है।
श्लोक 7.53
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे मनुष्य सिर और हाथ आदि अपने अङ्गों को पराया नहीं मानता, वैसे ही मेरा भक्त सभी प्राणियों में आत्मीयता देखता है।
श्लोक 7.54
सरल हिंदी भावार्थ: जो इन तीनों के एक तत्त्व को समझकर भेदद्वेष नहीं करता और उन्हें सभी प्राणियों के आत्मा से जुड़ा जानता है, वह शान्ति प्राप्त करता है।
श्लोक 7.55
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—भगवान के इस उपदेश के अनुसार दक्ष ने अपने यज्ञ से हरि की आराधना की और अन्य देवताओं को भी विधिपूर्वक भाग दिया।
श्लोक 7.56
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने एकाग्र होकर रुद्र को उनका भाग दिया, समापन के कर्म से सोमपायी तथा अन्य देवताओं की पूजा की और पुरोहितों सहित अवभृथ स्नान किया।
श्लोक 7.57
सरल हिंदी भावार्थ: देवताओं ने अपने स्वाभाविक प्रभाव से यज्ञसिद्धि प्राप्त दक्ष की बुद्धि धर्म में स्थिर की और स्वर्ग लौट गए।
श्लोक 7.58
सरल हिंदी भावार्थ: हमने सुना है कि पूर्व शरीर छोड़ने वाली दक्षपुत्री सती फिर हिमवान और मेना की पुत्री के रूप में उत्पन्न हुईं।
श्लोक 7.59
सरल हिंदी भावार्थ: अम्बिका ने फिर उसी प्रिय पति शिव को चुना। वे अनन्यभाव से उन्हीं का आश्रय लेती हैं, जैसे प्रलय में शक्ति पुरुष में निहित रहती है।
श्लोक 7.60
सरल हिंदी भावार्थ: दक्ष के यज्ञ का विनाश करने वाले भगवान शम्भु की यह कथा मैंने बृहस्पति के शिष्य, महान भक्त उद्धव से सुनी थी।
श्लोक 7.61
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर, परमेश्वर की यह पवित्र कथा श्रद्धा से नित्य सुनने और सुनाने वाले के लिए यश, शुभ जीवन और पापशुद्धि का फल कहा गया है।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 7 समाप्त ॥
इस भाग का भक्ति-सन्देश
विद्या, पद और प्रतिष्ठा विनय के साथ ही शोभा पाते हैं। दूसरों का अनादर कलह बढ़ाता है; क्षमा और आत्मीय दृष्टि उससे मुक्त करती है। इस कथा का समापन हरि–हर में भेदद्वेष छोड़कर सभी प्राणियों में एक परमात्मा का दर्शन करने की शिक्षा से होता है।
पाठाधार और संपादकीय जानकारी
प्राचीन मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents का “श्रीमद्भागवतं—चतुर्थस्कन्धः” है। अध्याय 1–7 में क्रमशः 66, 35, 25, 34, 26, 53 और 61 श्लोक हैं; कुल 300। अध्याय 6 के श्लोक 34 से पहले कोष्ठक में दिया गया अनङ्कित जयघोष मुख्य श्लोक में सम्मिलित नहीं है। हिंदी भावार्थ स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है, किसी आधुनिक टीका की प्रतिलिपि नहीं। दक्ष, नन्दीश्वर और भृगु के कटु आरोप उनके प्रसंगगत वचन हैं; कथा का निष्कर्ष भेदद्वेष का त्याग है। सती का देहत्याग और युद्ध पौराणिक घटनावर्णन हैं, अनुकरण के निर्देश नहीं। वंश, दिव्य आयु, योजन और योग का विवरण पुराणपरम्परा के अनुसार है।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • भाग १ समाप्त ॥
॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
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