श्रीमद्भागवत महापुराण चतुर्थ स्कन्ध भाग 2 — अध्याय 8–12, ध्रुव चरित्र और ध्रुव स्तुति

भक्ति भावना • पुराण साहित्य

श्रीमद्भागवत महापुराण

चतुर्थ स्कन्ध • भाग २ • अध्याय ८–१२

२६६ मूल श्लोक • प्रत्येक श्लोक का सरल हिंदी भावार्थ

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बालक की दृढ़ भक्ति से अचल परम पद तक

सौतेली माता के कठोर वचनों से व्यथित ध्रुव को माता सुनीति और देवर्षि नारद भगवान की शरण का मार्ग बताते हैं। ध्रुव तपस्या से भगवान के दर्शन पाते हैं; फिर मनु का उपदेश उन्हें क्रोध और सामूहिक प्रतिशोध से मुक्त करता है। कुबेर से वे धन नहीं, हरि की अचल स्मृति माँगते हैं।

इस भाग में अध्याय 8–12 के सभी 266 श्लोक और प्रत्येक का स्वतंत्र सरल हिंदी भावार्थ है। ध्रुव स्तुति अध्याय 9 के श्लोक 6–17 में पढ़ें। आगे पृथु चरित्र आएगा।

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 8

ध्रुव की वनयात्रा, नारद उपदेश और तपस्या

श्लोक 8.1

मैत्रेय उवाच । सनकाद्या नारदश्च ऋभुर्हंसोऽरुणिर्यतिः । नैते गृहान् ब्रह्मसुता ह्यावसन्नूर्ध्वरेतसः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—ब्रह्मा के पुत्र सनकादि, नारद, ऋभु, हंस, अरुणि और यति आजीवन ब्रह्मचारी रहे; उन्होंने गृहस्थाश्रम नहीं अपनाया।

श्लोक 8.2

मृषाधर्मस्य भार्यासीद्दम्भं मायां च शत्रुहन् । असूत मिथुनं तत्तु निरृतिर्जगृहेऽप्रजः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: अधर्म की पत्नी मृषा से दम्भ और माया नामक जुड़वाँ सन्तान हुईं, जिन्हें सन्तानहीन निरृति ने अपनाया। यह दुर्गुणों का प्रतीकात्मक वंशवर्णन है।

श्लोक 8.3

तयोः समभवल्लोभो निकृतिश्च महामते । ताभ्यां क्रोधश्च हिंसा च यद्दुरुक्तिः स्वसा कलिः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: दम्भ और माया से लोभ तथा निकृति अर्थात छल उत्पन्न हुए; उनसे क्रोध और हिंसा तथा आगे दुरुक्ति और कलि हुए।

श्लोक 8.4

दुरुक्तौ कलिराधत्त भयं मृत्युं च सत्तम । तयोश्च मिथुनं जज्ञे यातना निरयस्तथा ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: कलि और दुरुक्ति से भय तथा मृत्यु और उनसे यातना तथा निरय उत्पन्न हुए। इस रूपक में अधर्म से दुःख की वृद्धि बताई गई है।

श्लोक 8.5

सङ्ग्रहेण मयाऽऽख्यातः प्रतिसर्गस्तवानघ । त्रिः श्रुत्वैतत्पुमान् पुण्यं विधुनोत्यात्मनो मलम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर, मैंने सृष्टि का यह संक्षिप्त विस्तार बताया। इसका श्रद्धापूर्वक तीन बार श्रवण आत्ममल दूर करने वाला कहा गया है।

श्लोक 8.6

अथातः कीर्तये वंशं पुण्यकीर्तेः कुरूद्वह । स्वायम्भुवस्यापि मनोर्हरेरंशांशजन्मनः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: अब भगवान के अंश से उत्पन्न पुण्यकीर्ति स्वायम्भुव मनु के वंश की कथा कहता हूँ।

श्लोक 8.7

प्रियव्रतोत्तानपादौ शतरूपापतेः सुतौ । वासुदेवस्य कलया रक्षायां जगतः स्थितौ ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: शतरूपा के पति मनु के दो पुत्र प्रियव्रत और उत्तानपाद थे। वे वासुदेव की शक्ति से जगत की रक्षा के कार्य में स्थित थे।

श्लोक 8.8

जाये उत्तानपादस्य सुनीतिः सुरुचिस्तयोः । सुरुचिः प्रेयसी पत्युर्नेतरा यत्सुतो ध्रुवः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उत्तानपाद की दो पत्नियाँ सुनीति और सुरुचि थीं। राजा सुरुचि को अधिक प्रिय मानते थे; सुनीति के पुत्र ध्रुव थे।

श्लोक 8.9

एकदा सुरुचेः पुत्रमङ्कमारोप्य लालयन् । उत्तमं नारुरुक्षन्तं ध्रुवं राजाभ्यनन्दत ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक बार राजा सुरुचि के पुत्र उत्तम को गोद में खिलाते रहे, पर गोद में चढ़ना चाहने वाले ध्रुव का स्वागत नहीं किया।

श्लोक 8.10

तथा चिकीर्षमाणं तं सपत्न्यास्तनयं ध्रुवम् । सुरुचिः श‍ृण्वतो राज्ञः सेर्ष्यमाहातिगर्विता ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव को वैसा करते देखकर अत्यन्त अभिमानी सुरुचि ने राजा के सुनते हुए ईर्ष्याभरे वचन कहे।

श्लोक 8.11

न वत्स नृपतेर्धिष्ण्यं भवानारोढुमर्हति । न गृहीतो मया यत्त्वं कुक्षावपि नृपात्मजः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसने कहा—बेटा, राजा के पुत्र होते हुए भी तुम उनकी गोद या राजासन के अधिकारी नहीं, क्योंकि तुम मेरे गर्भ से नहीं जन्मे हो।

श्लोक 8.12

बालोऽसि बत नात्मानमन्यस्त्रीगर्भसम्भृतम् । नूनं वेद भवान् यस्य दुर्लभेऽर्थे मनोरथः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम अभी बच्चे हो; शायद नहीं जानते कि दूसरी स्त्री से जन्म लेने के कारण जिस पद की इच्छा कर रहे हो, वह तुम्हारे लिए दुर्लभ है।

श्लोक 8.13

तपसाऽऽराध्य पुरुषं तस्यैवानुग्रहेण मे । गर्भे त्वं साधयात्मानं यदीच्छसि नृपासनम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: यदि राजासन चाहते हो तो तप करके परम पुरुष को प्रसन्न करो और उनकी कृपा से मेरे गर्भ में जन्म प्राप्त करो। यह सुरुचि का अपमानजनक कथन था।

श्लोक 8.14

मैत्रेय उवाच । मातुः सपत्न्याः स दुरुक्तिविद्धः श्वसन् रुषा दण्डहतो यथाहिः । हित्वा मिषन्तं पितरं सन्नवाचं जगाम मातुः प्ररुदन् सकाशम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: सौतेली माता के कठोर वचनों से आहत ध्रुव, डण्डे से मारे सर्प की तरह क्रोध से साँस लेने लगे। मौन देखते पिता को छोड़ वे रोते हुए अपनी माँ के पास गए।

श्लोक 8.15

तं निःश्वसन्तं स्फुरिताधरोष्ठं सुनीतिरुत्सङ्ग उदूह्य बालम् । निशम्य तत्पौरमुखान्नितान्तं सा विव्यथे यद्गदितं सपत्न्या ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: सुनीति ने काँपते ओठों और भारी साँसों वाले बालक को गोद में उठाया। लोगों से सुरुचि के वचन सुनकर वे बहुत दुखी हुईं।

श्लोक 8.16

सोत्सृज्य धैर्यं विललाप शोक- दावाग्निना दावलतेव बाला । वाक्यं सपत्न्याः स्मरती सरोज- श्रिया दृशा बाष्पकलामुवाह ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: शोक की अग्नि में लता के समान व्याकुल होकर वे धैर्य खो बैठीं और रोने लगीं। सौत के शब्द याद आते ही उनकी कमल जैसी आँखों में आँसू भर गए।

श्लोक 8.17

दीर्घं श्वसन्ती वृजिनस्य पार- मपश्यती बालकमाह बाला । मामङ्गलं तात परेषु मंस्था भुङ्क्ते जनो यत्परदुःखदस्तत् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: दुःख से निकलने का उपाय न देखकर उन्होंने गहरी साँस ली और कहा—बेटा, किसी का अमंगल मत चाहो; दूसरों को दुःख देने वाला स्वयं उसका फल भोगता है।

श्लोक 8.18

सत्यं सुरुच्याभिहितं भवान् मे यद्दुर्भगाया उदरे गृहीतः । स्तन्येन वृद्धश्च विलज्जते यां भार्येति वा वोढुमिडस्पतिर्माम् ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम मुझ उपेक्षित स्त्री के गर्भ से जन्मे और मेरे दूध से पले हो; राजा मुझे पत्नी कहने में भी संकोच करते हैं। सुरुचि ने हमारी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति का यही उल्लेख किया है।

श्लोक 8.19

आतिष्ठ तत्तात विमत्सरस्त्व- मुक्तं समात्रापि यदव्यलीकम् । आराधयाधोक्षजपादपद्मं यदीच्छसेऽध्यासनमुत्तमो यथा ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी उसकी बात में जो सत्य उपाय है, उसे ईर्ष्या छोड़े हुए अपनाओ। यदि उत्तम जैसा स्थान चाहते हो तो भगवान के चरणकमलों की आराधना करो।

श्लोक 8.20

यस्याङ्घ्रिपद्मं परिचर्य विश्व- विभावनायात्तगुणाभिपत्तेः । अजोऽध्यतिष्ठत्खलु पारमेष्ठ्यं पदं जितात्मश्वसनाभिवन्द्यम् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन चरणों की सेवा से ब्रह्मा को सृष्टिरचना का सर्वोच्च पद मिला, जिसकी वन्दना संयमी मुनि भी करते हैं।

श्लोक 8.21

तथा मनुर्वो भगवान् पितामहो यमेकमत्या पुरुदक्षिणैर्मखैः । इष्ट्वाभिपेदे दुरवापमन्यतो भौमं सुखं दिव्यमथापवर्ग्यम् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारे पितामह मनु ने भी एकाग्रता और उदार दक्षिणाओं वाले यज्ञों से उन्हीं की पूजा करके सांसारिक सुख, दिव्य सुख और मुक्ति प्राप्त की, जो दूसरे उपायों से कठिन हैं।

श्लोक 8.22

तमेव वत्साश्रय भृत्यवत्सलं मुमुक्षुभिर्मृग्यपदाब्जपद्धतिम् । अनन्यभावे निजधर्मभाविते मनस्यवस्थाप्य भजस्व पूरुषम् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: बेटा, भक्तवत्सल परम पुरुष की शरण लो। मुक्ति चाहने वाले जिन चरणों का मार्ग खोजते हैं, उन्हें अपने धर्म से शुद्ध मन में अनन्यभाव से स्थापित करके भजो।

श्लोक 8.23

नान्यं ततः पद्मपलाशलोचना- द्दुःखच्छिदं ते मृगयामि कञ्चन । यो मृग्यते हस्तगृहीतपद्मया श्रियेतरैरङ्ग विमृग्यमाणया ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारा दुःख दूर करने वाला उन कमलनयन प्रभु के अतिरिक्त मुझे कोई नहीं दिखता। जिन लक्ष्मी को जगत चाहता है, वे स्वयं कमल लेकर उनकी सेवा खोजती हैं।

श्लोक 8.24

मैत्रेय उवाच । एवं सञ्जल्पितं मातुराकर्ण्यार्थागमं वचः । सन्नियम्यात्मनाऽऽत्मानं निश्चक्राम पितुः पुरात् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—माता के सार्थक वचन सुनकर ध्रुव ने मन को दृढ़ किया और पिता की नगरी से निकल पड़े।

श्लोक 8.25

नारदस्तदुपाकर्ण्य ज्ञात्वा तस्य चिकीर्षितम् । स्पृष्ट्वा मूर्धन्यघघ्नेन पाणिना प्राह विस्मितः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारद ने समाचार सुनकर और ध्रुव का संकल्प जानकर आश्चर्य किया। उन्होंने पापहर हाथ बालक के मस्तक पर रखकर कहा।

श्लोक 8.26

अहो तेजः क्षत्रियाणां मानभङ्गममृष्यताम् । बालोऽप्ययं हृदा धत्ते यत्समातुरसद्वचः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्षत्रिय स्वभाव का तेज देखो! यह छोटा बालक भी सौतेली माता के अपमानजनक वचन मन में रखे है और मानभङ्ग सह नहीं पा रहा।

श्लोक 8.27

नारद उवाच । नाधुनाप्यवमानं ते सम्मानं वापि पुत्रक । लक्षयामः कुमारस्य सक्तस्य क्रीडनादिषु ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारद बोले—पुत्र, अभी तो तुम खेलने की आयु के बच्चे हो; तुम्हारे लिए मान–अपमान का गहरा विचार उचित समय से पहले है।

श्लोक 8.28

विकल्पे विद्यमानेऽपि न ह्यसन्तोषहेतवः । पुंसो मोहमृते भिन्ना यल्लोके निजकर्मभिः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: संसार में कर्मफल से भिन्न–भिन्न स्थितियाँ आती हैं, पर असन्तोष का मूल कारण बाहरी भेद से अधिक मन का मोह है।

श्लोक 8.29

परितुष्येत्ततस्तात तावन्मात्रेण पूरुषः । दैवोपसादितं यावद्वीक्ष्येश्वरगतिं बुधः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए बुद्धिमान को ईश्वर की व्यवस्था समझकर दैव से जो प्राप्त हो, उतने में सन्तोष रखना चाहिए।

श्लोक 8.30

अथ मात्रोपदिष्टेन योगेनावरुरुत्ससि । यत्प्रसादं स वै पुंसां दुराराध्यो मतो मम ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: यदि माता के बताए उपाय से भगवान की कृपा पाना चाहते हो, तो जानो कि उनकी आराधना मनुष्यों के लिए बहुत कठिन मानी जाती है।

श्लोक 8.31

मुनयः पदवीं यस्य निःसङ्गेनोरुजन्मभिः । न विदुर्मृगयन्तोऽपि तीव्रयोगसमाधिना ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: अनासक्त मुनि अनेक जन्मों तक तीव्र योग और समाधि से खोजते हुए भी उनकी गति पूरी नहीं जान पाते।

श्लोक 8.32

अतो निवर्ततामेष निर्बन्धस्तव निष्फलः । यतिष्यति भवान् काले श्रेयसां समुपस्थिते ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए अभी यह कठिन आग्रह छोड़कर लौट जाओ। कल्याण की साधना के अनुकूल समय आने पर प्रयत्न करना।

श्लोक 8.33

यस्य यद्दैवविहितं स तेन सुखदुःखयोः । आत्मानं तोषयन् देही तमसः पारमृच्छति ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो मनुष्य भाग्य से मिले सुख–दुःख में अपने मन को सन्तुष्ट रखता है, वह अज्ञान के पार पहुँच सकता है।

श्लोक 8.34

गुणाधिकान्मुदं लिप्सेदनुक्रोशं गुणाधमात् । मैत्रीं समानादन्विच्छेन्न तापैरभिभूयते ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने से अधिक गुणवान से प्रसन्नता, कम गुणवान पर करुणा और समान गुणवान से मित्रता रखो; तब मन अनेक तापों से बचता है।

श्लोक 8.35

ध्रुव उवाच । सोऽयं शमो भगवता सुखदुःखहतात्मनाम् । दर्शितः कृपया पुंसां दुर्दर्शोऽस्मद्विधैस्तु यः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव बोले—आपने कृपा करके सुख–दुःख से पीड़ित लोगों को शान्ति का मार्ग दिखाया है, पर हम जैसे लोगों के लिए उसका अनुभव कठिन है।

श्लोक 8.36

अथापि मेऽविनीतस्य क्षात्रं घोरमुपेयुषः । सुरुच्या दुर्वचो बाणैर्न भिन्ने श्रयते हृदि ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरा मन अभी अशान्त और क्षत्रिय गर्व से भरा है। सुरुचि के वचनबाणों से घायल हृदय में आपकी शान्ति की शिक्षा अभी ठहर नहीं रही।

श्लोक 8.37

पदं त्रिभुवनोत्कृष्टं जिगीषोः साधु वर्त्म मे । ब्रूह्यस्मत्पितृभिर्ब्रह्मन्नन्यैरप्यनधिष्ठितम् ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुरुदेव, मुझे ऐसा उत्तम मार्ग बताइए जिससे तीनों लोकों से ऊँचा वह पद पाऊँ, जहाँ मेरे पूर्वज और अन्य लोग भी न पहुँचे हों।

श्लोक 8.38

नूनं भवान् भगवतो योऽङ्गजः परमेष्ठिनः । वितुदन्नटते वीणां हितार्थं जगतोऽर्कवत् ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप ब्रह्मा के पुत्र हैं और सूर्य की तरह जगत का हित करते हुए वीणा बजाकर भ्रमण करते हैं; आप ही मुझे मार्ग दिखा सकते हैं।

श्लोक 8.39

मैत्रेय उवाच । इत्युदाहृतमाकर्ण्य भगवान्नारदस्तदा । प्रीतः प्रत्याह तं बालं सद्वाक्यमनुकम्पया ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—बालक के ये वचन सुनकर नारद प्रसन्न हुए और करुणा से उसे हितकारी उपदेश दिया।

श्लोक 8.40

नारद उवाच । जनन्याभिहितः पन्थाः स वै निःश्रेयसस्य ते । भगवान् वासुदेवस्तं भज तत्प्रवणात्मना ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारद बोले—माता ने जो मार्ग बताया है वही तुम्हारे परम कल्याण का है। भगवान वासुदेव को सर्वथा समर्पित मन से भजो।

श्लोक 8.41

धर्मार्थकाममोक्षाख्यं य इच्छेच्छ्रेय आत्मनः । एकमेव हरेस्तत्र कारणं पादसेवनम् ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो धर्म, अर्थ, काम अथवा मोक्ष के रूप में अपना कल्याण चाहता है, उसके लिए हरि के चरणों की सेवा ही मूल साधन है।

श्लोक 8.42

तत्तात गच्छ भद्रं ते यमुनायास्तटं शुचि । पुण्यं मधुवनं यत्र सान्निध्यं नित्यदा हरेः ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम यमुना के पवित्र तट पर मधुवन जाओ; वहाँ भगवान हरि का सान्निध्य नित्य है। तुम्हारा मंगल हो।

श्लोक 8.43

स्नात्वानुसवनं तस्मिन् कालिन्द्याः सलिले शिवे । कृत्वोचितानि निवसन्नात्मनः कल्पितासनः ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ यमुना के पवित्र जल में नियत समयों पर स्नान करके आवश्यक आचरण पूर्ण करो और उपयुक्त आसन पर निवास करो।

श्लोक 8.44

प्राणायामेन त्रिवृता प्राणेन्द्रियमनोमलम् । शनैर्व्युदस्याभिध्यायेन्मनसा गुरुणा गुरुम् ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारद ने ध्रुव को क्रमबद्ध प्राणायाम से प्राण, इन्द्रिय और मन की अशुद्धि घटाकर स्थिर चित्त से परम गुरु का ध्यान करने का उपदेश दिया।

श्लोक 8.45

प्रसादाभिमुखं शश्वत्प्रसन्नवदनेक्षणम् । सुनासं सुभ्रुवं चारुकपोलं सुरसुन्दरम् ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनका मुख और नेत्र सदा प्रसन्न हैं, वे कृपा करने को उन्मुख हैं; सुन्दर नासिका, भौहें और कपोल उनके दिव्य रूप को शोभा देते हैं।

श्लोक 8.46

तरुणं रमणीयाङ्गमरुणोष्ठेक्षणाधरम् । प्रणताश्रयणं नृम्णं शरण्यं करुणार्णवम् ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे युवा और रमणीय हैं; उनके अधर और नेत्र अरुण हैं। वे शरणागतों के आश्रय, सामर्थ्यवान और करुणा के सागर हैं।

श्लोक 8.47

श्रीवत्साङ्कं घनश्यामं पुरुषं वनमालिनम् । शङ्खचक्रगदापद्मैरभिव्यक्तचतुर्भुजम् ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके वक्ष पर श्रीवत्सचिह्न, वर्ण मेघश्याम और गले में वनमाला है। चार भुजाओं में शङ्ख, चक्र, गदा और कमल धारण करते हैं।

श्लोक 8.48

किरीटिनं कुण्डलिनं केयूरवलयान्वितम् । कौस्तुभाभरणग्रीवं पीतकौशेयवाससम् ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मस्तक पर किरीट, कानों में कुण्डल, भुजाओं में बाजूबन्द और कङ्कण, कण्ठ में कौस्तुभ तथा शरीर पर पीत रेशमी वस्त्र हैं।

श्लोक 8.49

काञ्चीकलापपर्यस्तं लसत्काञ्चननूपुरम् । दर्शनीयतमं शान्तं मनोनयनवर्धनम् ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: कमर में करधनी और चरणों में चमकते स्वर्ण नूपुर हैं। उनका शान्त रूप मन और नेत्रों को अपार आनन्द देता है।

श्लोक 8.50

पद्भ्यां नखमणिश्रेण्या विलसद्भ्यां समर्चताम् । हृत्पद्मकर्णिकाधिष्ण्यमाक्रम्यात्मन्यवस्थितम् ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: मणियों जैसे चमकते नखों वाले उनके चरण उपासक के हृदयकमल की कर्णिका पर विराजमान हैं; प्रभु भक्त के भीतर स्थित हैं।

श्लोक 8.51

स्मयमानमभिध्यायेत्सानुरागावलोकनम् । नियतेनैकभूतेन मनसा वरदर्षभम् ॥ ५१॥

सरल हिंदी भावार्थ: वरदाताओं में श्रेष्ठ उन मुस्कराते और प्रेमभरी दृष्टि से देखते भगवान का संयमित, एकाग्र मन से ध्यान करो।

श्लोक 8.52

एवं भगवतो रूपं सुभद्रं ध्यायतो मनः । निर्वृत्या परया तूर्णं सम्पन्नं न निवर्तते ॥ ५२॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसे परम मंगलमय रूप का ध्यान करने पर मन शीघ्र गहरी तृप्ति पाता है और फिर उससे हटना नहीं चाहता।

श्लोक 8.53

जप्यश्च परमो गुह्यः श्रूयतां मे नृपात्मज । यं सप्तरात्रं प्रपठन् पुमान् पश्यति खेचरान् ॥ ५३॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजकुमार, अब मुझसे परम गोपनीय जपमन्त्र सुनो। कथा में इसके सात रात जप से दिव्य खेचरों का दर्शन होने का फल बताया गया है।

श्लोक 8.54

ओं नमो भगवते वासुदेवाय । मन्त्रेणानेन देवस्य कुर्याद्द्रव्यमयीं बुधः । सपर्यां विविधैर्द्रव्यैर्देशकालविभागवित् ॥ ५४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मन्त्र है—ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। देश–काल का विचार करके इसी मन्त्र से उपलब्ध सामग्रियों द्वारा भगवान की पूजा करो।

श्लोक 8.55

सलिलैः शुचिभिर्माल्यैर्वन्यैर्मूलफलादिभिः । शस्ताङ्कुरांशुकैश्चार्चेत्तुलस्या प्रियया प्रभुम् ॥ ५५॥

सरल हिंदी भावार्थ: निर्मल जल, पुष्पमाला, वन के मूल–फल, उपयुक्त अङ्कुर, वस्त्र और भगवान को प्रिय तुलसी से अर्चन करो।

श्लोक 8.56

लब्ध्वा द्रव्यमयीमर्चां क्षित्यम्ब्वादिषु वार्चयेत् । आभृतात्मा मुनिः शान्तो यतवाङ्मितवन्यभुक् ॥ ५६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मूर्ति उपलब्ध हो तो उसमें, अन्यथा पृथ्वी या जल आदि में भगवान का पूजन करो। शान्त, मनोनिग्रही, संयतवाणी होकर वन में प्राप्त आहार से सादगी से रहो।

श्लोक 8.57

स्वेच्छावतारचरितैरचिन्त्यनिजमायया । करिष्यत्युत्तमश्लोकस्तद्ध्यायेद्धृदयङ्गमम् ॥ ५७॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान अपनी अचिन्त्य माया से इच्छानुसार अवतार लेकर जो मनोहर लीलाएँ करते हैं, उनका हृदय में ध्यान करो।

श्लोक 8.58

परिचर्या भगवतो यावत्यः पूर्वसेविताः । ता मन्त्रहृदयेनैव प्रयुञ्ज्यान्मन्त्रमूर्तये ॥ ५८॥

सरल हिंदी भावार्थ: पूर्व भक्तों ने भगवान की जो–जो सेवाएँ की हैं, उन्हें इस मन्त्र का भाव मन में रखते हुए मन्त्रमूर्ति प्रभु को समर्पित करो।

श्लोक 8.59

एवं कायेन मनसा वचसा च मनोगतम् । परिचर्यमाणो भगवान् भक्तिमत्परिचर्यया ॥ ५९॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार शरीर, मन और वाणी से, मन में बसे भगवान की भक्तिपूर्ण सेवा की जाती है।

श्लोक 8.60

पुंसाममायिनां सम्यग्भजतां भाववर्धनः । श्रेयो दिशत्यभिमतं यद्धर्मादिषु देहिनाम् ॥ ६०॥

सरल हिंदी भावार्थ: निष्कपट और सम्यक भजन करने वालों का प्रेम बढ़ाकर भगवान उन्हें धर्म आदि में अभिलषित कल्याण प्रदान करते हैं।

श्लोक 8.61

विरक्तश्चेन्द्रियरतौ भक्तियोगेन भूयसा । तं निरन्तरभावेन भजेताद्धा विमुक्तये ॥ ६१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो इन्द्रियसुख से विरक्त हो, वह गहन भक्तियोग और निरन्तर प्रेम से भगवान का भजन करे; इससे वास्तविक मुक्ति मिलती है।

श्लोक 8.62

इत्युक्तस्तं परिक्रम्य प्रणम्य च नृपार्भकः । ययौ मधुवनं पुण्यं हरेश्चरणचर्चितम् ॥ ६२॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह उपदेश पाकर राजकुमार ध्रुव ने नारद की परिक्रमा और प्रणाम किया तथा भगवान के चरणों से पवित्र मधुवन चले गए।

श्लोक 8.63

तपोवनं गते तस्मिन् प्रविष्टोऽन्तःपुरं मुनिः । अर्हितार्हणको राज्ञा सुखासीन उवाच तम् ॥ ६३॥

सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव के तपोवन जाने के बाद नारद राजा के अन्तःपुर पहुँचे। राजा ने उनका आदर किया; आसन पर बैठकर मुनि ने पूछा।

श्लोक 8.64

नारद उवाच । राजन् किं ध्यायसे दीर्घं मुखेन परिशुष्यता । किं वा न रिष्यते कामो धर्मो वार्थेन संयुतः ॥ ६४॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारद बोले—राजन्, आपका मुख क्यों सूखा है और आप किस गहरी चिन्ता में हैं? क्या धर्म, अर्थ या कोई इच्छा बाधित हुई है?

श्लोक 8.65

राजोवाच । सुतो मे बालको ब्रह्मन् स्त्रैणेनाकरुणात्मना । निर्वासितः पञ्चवर्षः सह मात्रा महान् कविः ॥ ६५॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा बोले—गुरुदेव, पत्नी के वश में और निर्दयी होकर मैंने अपनी उपेक्षित रानी के साथ पाँच वर्ष के बुद्धिमान पुत्र का भी तिरस्कार किया; अब वह चला गया है।

श्लोक 8.66

अप्यनाथं वने ब्रह्मन् मा स्मादन्त्यर्भकं वृकाः । श्रान्तं शयानं क्षुधितं परिम्लानमुखाम्बुजम् ॥ ६६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह बालक वन में अनाथ, थका, भूखा और मुरझाए मुख वाला सो रहा होगा। कहीं भेड़िए उसे खा न लें!

श्लोक 8.67

अहो मे बत दौरात्म्यं स्त्रीजितस्योपधारय । योऽङ्कं प्रेम्णाऽऽरुरुक्षन्तं नाभ्यनन्दमसत्तमः ॥ ६७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरी दुष्टता देखिए—पत्नी के मोह में मैंने प्रेम से गोद में चढ़ना चाहने वाले अपने बच्चे का स्वागत भी नहीं किया।

श्लोक 8.68

नारद उवाच । मा मा शुचः स्वतनयं देवगुप्तं विशाम्पते । तत्प्रभावमविज्ञाय प्रावृङ्क्ते यद्यशो जगत् ॥ ६८॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारद बोले—पुत्र के लिए शोक मत करो। भगवान उसकी रक्षा कर रहे हैं; तुम उसका प्रभाव नहीं जानते। उसका यश जगत में फैलेगा।

श्लोक 8.69

सुदुष्करं कर्म कृत्वा लोकपालैरपि प्रभुः । एष्यत्यचिरतो राजन् यशो विपुलयंस्तव ॥ ६९॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह शीघ्र ऐसा कठिन कार्य करके लौटेगा जिसे लोकपाल भी आसानी से नहीं कर सकते, और तुम्हारा यश बढ़ाएगा।

श्लोक 8.70

मैत्रेय उवाच । इति देवर्षिणा प्रोक्तं विश्रुत्य जगतीपतिः । राजलक्ष्मीमनादृत्य पुत्रमेवान्वचिन्तयत् ॥ ७०॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—देवर्षि के वचन सुनकर राजा ने राज्यवैभव से मन हटाया और पुत्र का ही चिन्तन करने लगे।

श्लोक 8.71

तत्राभिषिक्तः प्रयतस्तामुपोष्य विभावरीम् । समाहितः पर्यचरदृष्यादेशेन पूरुषम् ॥ ७१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उधर ध्रुव ने मधुवन में स्नान किया, वह रात उपवास से बिताई और एकाग्र होकर गुरु के निर्देश के अनुसार भगवान की सेवा की।

श्लोक 8.72

त्रिरात्रान्ते त्रिरात्रान्ते कपित्थबदराशनः । आत्मवृत्त्यनुसारेण मासं निन्येऽर्चयन् हरिम् ॥ ७२॥

सरल हिंदी भावार्थ: पहले महीने वे हर तीसरे दिन शरीरनिर्वाह के लिए कैथ और बेर खाते हुए हरि की पूजा करते रहे। यह ध्रुव की पौराणिक तपस्या का वर्णन है।

श्लोक 8.73

द्वितीयं च तथा मासं षष्ठे षष्ठेऽर्भको दिने । तृणपर्णादिभिः शीर्णैः कृतान्नोऽभ्यर्चयद्विभुम् ॥ ७३॥

सरल हिंदी भावार्थ: दूसरे महीने बालक ने हर छठे दिन सूखी घास और पत्ते आदि लेकर भगवान की आराधना की।

श्लोक 8.74

तृतीयं चानयन्मासं नवमे नवमेऽहनि । अब्भक्ष उत्तमश्लोकमुपाधावत्समाधिना ॥ ७४॥

सरल हिंदी भावार्थ: तीसरे महीने वे हर नौवें दिन केवल जल लेते और समाधि से उत्तमश्लोक भगवान की उपासना करते रहे।

श्लोक 8.75

चतुर्थमपि वै मासं द्वादशे द्वादशेऽहनि । वायुभक्षो जितश्वासो ध्यायन् देवमधारयत् ॥ ७५॥

सरल हिंदी भावार्थ: चौथे महीने वे हर बारहवें दिन वायु पर निर्वाह करते हुए श्वास संयम और ध्यान में स्थित रहे, ऐसा कथा में कहा गया है।

श्लोक 8.76

पञ्चमे मास्यनुप्राप्ते जितश्वासो नृपात्मजः । ध्यायन् ब्रह्म पदैकेन तस्थौ स्थाणुरिवाचलः ॥ ७६॥

सरल हिंदी भावार्थ: पाँचवें महीने में राजकुमार श्वास संयमित करके एक पैर पर वृक्ष की तरह अचल खड़े रहे और ब्रह्म का ध्यान करने लगे।

श्लोक 8.77

सर्वतो मन आकृष्य हृदि भूतेन्द्रियाशयम् । ध्यायन् भगवतो रूपं नाद्राक्षीत्किञ्चनापरम् ॥ ७७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने मन को सब ओर से हटाकर हृदय में स्थित भगवान के रूप में लगाया; उन्हें अन्य कोई वस्तु दिखाई नहीं देती थी।

श्लोक 8.78

आधारं महदादीनां प्रधानपुरुषेश्वरम् । ब्रह्म धारयमाणस्य त्रयो लोकाश्चकम्पिरे ॥ ७८॥

सरल हिंदी भावार्थ: महत्तत्त्व आदि के आधार और प्रकृति–पुरुष के अधीश्वर परम ब्रह्म में उनकी धारणा स्थिर हुई तो तीनों लोक काँप उठे।

श्लोक 8.79

यदैकपादेन स पार्थिवार्भक- स्तस्थौ तदङ्गुष्ठनिपीडिता मही । ननाम तत्रार्धमिभेन्द्रधिष्ठिता तरीव सव्येतरतः पदे पदे ॥ ७९॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके एक पैर के अँगूठे के दबाव से पृथ्वी उसी ओर झुकती दिखाई दी, जैसे विशाल हाथी चढ़ने से नाव एक ओर झुक जाती है। यह तपोमहिमा का पौराणिक चित्रण है।

श्लोक 8.80

तस्मिन्नभिध्यायति विश्वमात्मनो द्वारं निरुध्यासुमनन्यया धिया । लोका निरुच्छ्वासनिपीडिता भृशं सलोकपालाः शरणं ययुर्हरिम् ॥ ८०॥

सरल हिंदी भावार्थ: विश्वात्मा भगवान में अनन्य ध्यान और प्राणनिरोध से उनका चित्त एक हुआ तो लोकों के प्राण भी रुकने लगे। देवता और लोकपाल व्याकुल होकर हरि की शरण गए।

श्लोक 8.81

देवा ऊचुः । नैवं विदामो भगवन् प्राणरोधं चराचरस्याखिलसत्त्वधाम्नः । विधेहि तन्नो वृजिनाद्विमोक्षं प्राप्ता वयं त्वां शरणं शरण्यम् ॥ ८१॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवता बोले—प्रभु, चराचर जगत का ऐसा प्राणावरोध हमने नहीं जाना। हम आपकी शरण आए हैं; इस संकट से मुक्त कीजिए।

श्लोक 8.82

श्रीभगवानुवाच । मा भैष्ट बालं तपसो दुरत्यया- न्निवर्तयिष्ये प्रतियात स्वधाम । यतो हि वः प्राणनिरोध आसी- दौत्तानपादिर्मयि सङ्गतात्मा ॥ ८२॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने कहा—डरो मत, अपने लोकों को लौटो। उत्तानपाद का पुत्र मुझमें एकाग्र हो गया है, इसलिए यह हुआ; मैं उसे इस अत्यन्त कठिन तप से निवृत्त करूँगा।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 8 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 9

भगवान के दर्शन, ध्रुव स्तुति और नगरागमन

श्लोक 9.1

मैत्रेय उवाच । त एवमुत्सन्नभया उरुक्रमे कृतावनामाः प्रययुस्त्रिविष्टपम् । सहस्रशीर्षापि ततो गरुत्मता मधोर्वनं भृत्यदिदृक्षया गतः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—भय मिटने पर देवता भगवान को प्रणाम करके स्वर्ग लौट गए। भगवान अपने भक्त को देखने के लिए गरुड़ पर बैठकर मधुवन पहुँचे।

श्लोक 9.2

स वै धिया योगविपाकतीव्रया हृत्पद्मकोशे स्फुरितं तडित्प्रभम् । तिरोहितं सहसैवोपलक्ष्य बहिःस्थितं तदवस्थं ददर्श ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: गहन योग से ध्रुव के हृदयकमल में बिजली जैसे प्रकाश वाला जो रूप दिखाई देता था, वह अचानक अन्तर्धान हो गया। ध्रुव ने आँखें खोलीं तो वही रूप सामने खड़ा था।

श्लोक 9.3

तद्दर्शनेनागतसाध्वसः क्षिता- ववन्दताङ्गं विनमय्य दण्डवत् । दृग्भ्यां प्रपश्यन् प्रपिबन्निवार्भकः चुम्बन्निवास्येन भुजैरिवाश्लिषन् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: दर्शन से विस्मित बालक ने भूमि पर साष्टाङ्ग प्रणाम किया। वह ऐसी तन्मयता से देख रहा था मानो आँखों से रूप पी रहा हो, मुख से चूम रहा हो और भुजाओं से आलिङ्गन कर रहा हो।

श्लोक 9.4

स तं विवक्षन्तमतद्विदं हरिः ज्ञात्वास्य सर्वस्य च हृद्यवस्थितः । कृताञ्जलिं ब्रह्ममयेन कम्बुना पस्पर्श बालं कृपया कपोले ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव स्तुति करना चाहते थे पर विधि नहीं जानते थे। सबके हृदय में स्थित हरि ने यह जानकर कृपा से अपने वेदमय शङ्ख से उनके कपोल को स्पर्श किया।

श्लोक 9.5

स वै तदैव प्रतिपादितां गिरं दैवीं परिज्ञातपरात्मनिर्णयः । तं भक्तिभावोऽभ्यगृणादसत्वरं परिश्रुतोरुश्रवसं ध्रुवक्षितिः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसी क्षण उन्हें दिव्य वाणी और परमात्मतत्त्व का बोध हुआ। भक्ति से भरकर उन्होंने धीर भाव से विश्वविख्यात भगवान की स्तुति की।

श्लोक 9.6

ध्रुव उवाच । योऽन्तःप्रविश्य मम वाचमिमां प्रसुप्तां सञ्जीवयत्यखिलशक्तिधरः स्वधाम्ना । अन्यांश्च हस्तचरणश्रवणत्वगादीन् प्राणान् नमो भगवते पुरुषाय तुभ्यम् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव बोले—आप अपनी शक्ति से मेरे भीतर प्रवेश करके सोई हुई वाणी, हाथ, पैर, कान, त्वचा और प्राणों को चेतना देते हैं। उन सर्वशक्तिमान परम पुरुष को प्रणाम है।

श्लोक 9.7

एकस्त्वमेव भगवन्निदमात्मशक्त्या मायाख्ययोरुगुणया महदाद्यशेषम् । सृष्ट्वानुविश्य पुरुषस्तदसद्गुणेषु नानेव दारुषु विभावसुवद्विभासि ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप अकेले ही अपनी गुणमयी माया से महत्तत्त्व आदि सम्पूर्ण जगत रचते और उसमें प्रवेश करते हैं। अनेक लकड़ियों में एक अग्नि की तरह आप विविध रूपों में प्रकाशित होते हैं।

श्लोक 9.8

त्वद्दत्तया वयुनयेदमचष्ट विश्वं सुप्तप्रबुद्ध इव नाथ भवत्प्रपन्नः । तस्यापवर्ग्यशरणं तव पादमूलं विस्मर्यते कृतविदा कथमार्तबन्धो ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपसे मिला ज्ञान पाकर ब्रह्मा ने जागे हुए व्यक्ति की तरह जगत को देखा। दुःखियों के मित्र, आपका उपकार जानने वाला कौन आपके मुक्तिदायी चरण भूल सकता है?

श्लोक 9.9

नूनं विमुष्टमतयस्तव मायया ते ये त्वां भवाप्ययविमोक्षणमन्यहेतोः । अर्चन्ति कल्पकतरुं कुणपोपभोग्य- मिच्छन्ति यत्स्पर्शजं निरयेऽपि नॄणाम् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो जन्म–मरण से मुक्त करने वाले कल्पवृक्ष प्रभु को केवल देह के विषयसुख के लिए पूजते हैं, उनकी बुद्धि माया ने हर ली है; वैसे क्षणिक सुख नीच योनियों में भी मिलते हैं।

श्लोक 9.10

या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्म- ध्यानाद्भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात् । सा ब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत् किं त्वन्तकासिलुलितात्पततां विमानात् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपके चरणों का ध्यान और भक्तों से आपकी कथा सुनकर जो तृप्ति मिलती है, वह केवल निर्विशेष ब्रह्मानुभव में भी वैसी नहीं; फिर नश्वर स्वर्ग के सुख की क्या तुलना!

श्लोक 9.11

भक्तिं मुहुः प्रवहतां त्वयि मे प्रसङ्गो भूयादनन्त महताममलाशयानाम् । येनाञ्जसोल्बणमुरुव्यसनं भवाब्धिं नेष्ये भवद्गुणकथामृतपानमत्तः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: अनन्त प्रभु, मुझे निर्मल हृदय और निरन्तर भक्ति करने वाले महात्माओं का सङ्ग मिले। आपकी गुणकथा का अमृत पीकर मैं कठिन दुःखों वाले संसारसागर को सहज पार कर लूँगा।

श्लोक 9.12

ते न स्मरन्त्यतितरां प्रियमीश मर्त्यं ये चान्वदः सुतसुहृद्गृहवित्तदाराः । ये त्वब्जनाभ भवदीयपदारविन्द- सौगन्ध्यलुब्धहृदयेषु कृतप्रसङ्गाः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपके चरणों की सुगन्ध से आकृष्ट भक्तों का सङ्ग पाने वाले लोग अत्यन्त प्रिय शरीर और उससे जुड़े पुत्र, मित्र, घर, धन तथा पत्नी की आसक्ति में नहीं डूबे रहते।

श्लोक 9.13

तिर्यङ्नगद्विजसरीसृपदेवदैत्य- मर्त्यादिभिः परिचितं सदसद्विशेषम् । रूपं स्थविष्ठमज ते महदाद्यनेकं नातः परं परम वेद्मि न यत्र वादः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अजन्मा प्रभु, पशु, पर्वत, पक्षी, सरीसृप, देव, दैत्य और मनुष्य आदि तथा महत्तत्त्व से बने स्थूल जगतरूप को मैं जानता हूँ; पर विवाद से परे आपके परम स्वरूप को नहीं जानता।

श्लोक 9.14

कल्पान्त एतदखिलं जठरेण गृह्णन् शेते पुमान् स्वदृगनन्तसखस्तदङ्के । यन्नाभिसिन्धुरुहकाञ्चनलोकपद्म- गर्भे द्युमान् भगवते प्रणतोऽस्मि तस्मै ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: कल्पान्त में आप जगत को अपने भीतर लेकर शेषनाग पर शयन करते हैं; आपकी नाभि से निकले स्वर्णिम लोककमल में ब्रह्मा प्रकट होते हैं। उन स्वप्रकाश भगवान को प्रणाम है।

श्लोक 9.15

त्वं नित्यमुक्तपरिशुद्धविबुद्ध आत्मा कूटस्थ आदिपुरुषो भगवांस्त्र्यधीशः । यद्बुद्ध्यवस्थितिमखण्डितया स्वदृष्ट्या द्रष्टा स्थितावधिमखो व्यतिरिक्त आस्से ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप नित्यमुक्त, निर्मल, पूर्ण जाग्रत आत्मा, अविकारी आदिपुरुष और गुणों के अधीश्वर हैं। अखण्ड ज्ञान से बुद्धि की अवस्थाओं के साक्षी रहते हुए भी आप उनसे अलग हैं।

श्लोक 9.16

यस्मिन् विरुद्धगतयो ह्यनिशं पतन्ति विद्यादयो विविधशक्तय आनुपूर्व्यात् । तद्ब्रह्मविश्वभवमेकमनन्तमाद्य- मानन्दमात्रमविकारमहं प्रपद्ये ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञान आदि परस्पर भिन्न शक्तियाँ अन्ततः जिनमें एक आधार पाती हैं, उस विश्वकारण, अनन्त, आद्य, आनन्दमात्र और निर्विकार ब्रह्म की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 9.17

सत्याशिषो हि भगवंस्तव पादपद्म- माशीस्तथानुभजतः पुरुषार्थमूर्तेः । अप्येवमार्य भगवान् परिपाति दीनान् वाश्रेव वत्सकमनुग्रहकातरोऽस्मान् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपके चरण ही सच्चा वरदान और समस्त पुरुषार्थों की पूर्ति हैं। फिर भी दीन भक्तों पर कृपा करने को उत्सुक आप हमारी ऐसे रक्षा करते हैं जैसे रँभाती गाय अपने बछड़े की करती है।

श्लोक 9.18

मैत्रेय उवाच । अथाभिष्टुत एवं वै सत्सङ्कल्पेन धीमता । भृत्यानुरक्तो भगवान् प्रतिनन्द्येदमब्रवीत् ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—शुद्ध संकल्प वाले बुद्धिमान ध्रुव की स्तुति सुनकर भक्तप्रिय भगवान ने प्रसन्नतापूर्वक उनसे कहा।

श्लोक 9.19

श्रीभगवानुवाच । वेदाहं ते व्यवसितं हृदि राजन्यबालक । तत्प्रयच्छामि भद्रं ते दुरापमपि सुव्रत ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—सुव्रती राजकुमार, मैं तुम्हारे हृदय का संकल्प जानता हूँ। दूसरों के लिए दुर्लभ वह पद तुम्हें देता हूँ; तुम्हारा कल्याण हो।

श्लोक 9.20

नान्यैरधिष्ठितं भद्र यद्भ्राजिष्णु ध्रुवक्षिति । यत्र ग्रहर्क्षताराणां ज्योतिषां चक्रमाहितम् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह तेजस्वी ध्रुवस्थान किसी अन्य ने प्राप्त नहीं किया। उसमें ग्रहों, नक्षत्रों और तारों का ज्योतिश्चक्र स्थित है।

श्लोक 9.21

मेढ्यां गोचक्रवत्स्थास्नु परस्तात्कल्पवासिनाम् । धर्मोऽग्निः कश्यपः शुक्रो मुनयो ये वनौकसः । चरन्ति दक्षिणीकृत्य भ्रमन्तो यत्सतारकाः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे खूँटे के चारों ओर बैलों का चक्र घूमता है, वैसे धर्म, अग्नि, कश्यप, शुक्र और सप्तर्षि आदि तारों सहित उस स्थिर स्थान की परिक्रमा करते हैं। यह पुराण का लोकविन्यास है।

श्लोक 9.22

प्रस्थिते तु वनं पित्रा दत्त्वा गां धर्मसंश्रयः । षट्त्रिंशद्वर्षसाहस्रं रक्षिताव्याहतेन्द्रियः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: पिता तुम्हें पृथ्वी का राज्य देकर वन जाएँगे। तुम धर्म में स्थित और इन्द्रियों की शक्ति अक्षुण्ण रखते हुए छत्तीस हजार वर्ष उसका पालन करोगे।

श्लोक 9.23

त्वद्भ्रातर्युत्तमे नष्टे मृगयायां तु तन्मनाः । अन्वेषन्ती वनं माता दावाग्निं सा प्रवेक्ष्यति ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारा भाई उत्तम शिकार के समय मारा जाएगा। उसकी माता उसे खोजती हुई वन में जाएँगी और दावाग्नि में उनका अन्त होगा।

श्लोक 9.24

इष्ट्वा मां यज्ञहृदयं यज्ञैः पुष्कलदक्षिणैः । भुक्त्वा चेहाशिषः सत्या अन्ते मां संस्मरिष्यसि ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम उदार दक्षिणाओं वाले यज्ञों से मुझ यज्ञात्मा की पूजा करोगे, शुभ भोग प्राप्त करोगे और अन्तकाल में मेरा स्मरण करोगे।

श्लोक 9.25

ततो गन्तासि मत्स्थानं सर्वलोकनमस्कृतम् । उपरिष्टादृषिभ्यस्त्वं यतो नावर्तते गतः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर ऋषियों के लोकों से ऊपर, सबके वन्दनीय मेरे स्थान को प्राप्त करोगे, जहाँ पहुँचकर फिर संसार में लौटना नहीं होता।

श्लोक 9.26

मैत्रेय उवाच । इत्यर्चितः स भगवानतिदिश्यात्मनः पदम् । बालस्य पश्यतो धाम स्वमगाद्गरुडध्वजः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—इस प्रकार बालक को अपना पद देकर भगवान, उसके देखते–देखते अपने धाम को चले गए।

श्लोक 9.27

सोऽपि सङ्कल्पजं विष्णोः पादसेवोपसादितम् । प्राप्य सङ्कल्पनिर्वाणं नातिप्रीतोभ्यगात्पुरम् ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की चरणसेवा से अपना इच्छित और मनोकामना शान्त करने वाला पद पाकर भी ध्रुव अत्यधिक प्रसन्न नहीं थे; वे नगर लौटने लगे।

श्लोक 9.28

विदुर उवाच । सुदुर्लभं यत्परमं पदं हरे- र्मायाविनस्तच्चरणार्चनार्जितम् । लब्ध्वाप्यसिद्धार्थमिवैकजन्मना कथं स्वमात्मानममन्यतार्थवित् ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर ने पूछा—एक ही जन्म में भगवान की आराधना से दुर्लभ परम पद पाकर भी ध्रुव अपने को असफल जैसा क्यों मानने लगे?

श्लोक 9.29

मैत्रेय उवाच । मातुः सपत्न्या वाग्बाणैर्हृदि विद्धस्तु तान् स्मरन् । नैच्छन्मुक्तिपतेर्मुक्तिं तस्मात्तापमुपेयिवान् ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—सौतेली माता के वचनबाणों को याद करते हुए उन्होंने मुक्तिदाता भगवान से मुक्ति नहीं चाही थी। इसी कारण वे पछताए।

श्लोक 9.30

ध्रुव उवाच । समाधिना नैकभवेन यत्पदं विदुः सनन्दादय ऊर्ध्वरेतसः । मासैरहं षड्भिरमुष्यपादयोः छायामुपेत्यापगतः पृथङ्मतिः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव बोले—सनन्दन आदि ब्रह्मचारी अनेक जन्मों की समाधि से जिन चरणों तक पहुँचते हैं, उनकी छाया मुझे छह महीने में मिल गई; फिर भी भेदबुद्धि लेकर लौट आया।

श्लोक 9.31

अहो बत ममानात्म्यं मन्दभाग्यस्य पश्यत । भवच्छिदः पादमूलं गत्वा याचे यदन्तवत् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मेरी दुर्बुद्धि और दुर्भाग्य देखो! जन्म–मरण हरने वाले भगवान के चरणों में जाकर मैंने नश्वर वस्तु माँगी।

श्लोक 9.32

मतिर्विदूषिता देवैः पतद्भिरसहिष्णुभिः । यो नारदवचस्तथ्यं नाग्राहिषमसत्तमः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: गिरते हुए और दूसरों की उन्नति न सह सकने वाले देवताओं ने मेरी बुद्धि बिगाड़ दी होगी; मैंने नारद के सत्य वचन भी नहीं माने। यह ध्रुव का पश्चात्तापपूर्ण विचार है।

श्लोक 9.33

दैवीं मायामुपाश्रित्य प्रसुप्त इव भिन्नदृक् । तप्ये द्वितीयेऽप्यसति भ्रातृभ्रातृव्यहृद्रुजा ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: माया में सोए हुए की तरह मैंने अभिन्न जगत में भेद देखा और भाई को शत्रु मानकर व्यर्थ हृदय जलाया।

श्लोक 9.34

मयैतत्प्रार्थितं व्यर्थं चिकित्सेव गतायुषि । प्रसाद्य जगदात्मानं तपसा दुष्प्रसादनम् । भवच्छिदमयाचेऽहं भवं भाग्यविवर्जितः ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: दुर्लभ तप से विश्वात्मा को प्रसन्न करके भी संसारबन्धन हरने वाले प्रभु से मैंने वही बन्धन माँगा। मेरी प्रार्थना मृत व्यक्ति की चिकित्सा जैसी निष्फल थी।

श्लोक 9.35

स्वाराज्यं यच्छतो मौढ्यान्मानो मे भिक्षितो बत । ईश्वरात्क्षीणपुण्येन फलीकारानिवाधनः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वतन्त्र आत्मराज्य देने वाले ईश्वर से मैंने अज्ञान में मान–प्रतिष्ठा माँगी, जैसे कोई निर्धन सम्राट से अन्न के छिलके माँगे।

श्लोक 9.36

मैत्रेय उवाच । न वै मुकुन्दस्य पदारविन्दयोः रजोजुषस्तात भवादृशा जनाः । वाञ्छन्ति तद्दास्यमृतेऽर्थमात्मनो यदृच्छया लब्धमनः समृद्धयः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—विदुर, तुम्हारे जैसे भगवान के चरणरज का आश्रय लेने वाले लोग उनकी सेवा के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहते; स्वतः प्राप्त मन की समृद्धि में वे तृप्त रहते हैं।

श्लोक 9.37

आकर्ण्यात्मजमायान्तं सम्परेत्य यथाऽऽगतम् । राजा न श्रद्दधे भद्रमभद्रस्य कुतो मम ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुत्र के लौटने का समाचार राजा को मानो मरे हुए के लौटने जैसा लगा। वे पहले विश्वास न कर सके और सोचा—मेरे जैसे अपराधी को इतना मंगल कैसे मिले?

श्लोक 9.38

श्रद्धाय वाक्यं देवर्षेर्हर्षवेगेन धर्षितः । वार्ताहर्तुरतिप्रीतो हारं प्रादान्महाधनम् ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर नारद के वचन याद करके विश्वास किया और हर्ष से भरकर समाचार लाने वाले को बहुमूल्य हार दिया।

श्लोक 9.39

सदश्वं रथमारुह्य कार्तस्वरपरिष्कृतम् । ब्राह्मणैः कुलवृद्धैश्च पर्यस्तोऽमात्यबन्धुभिः ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे उत्तम घोड़ों से जुड़े, सोने से सजे रथ पर चढ़े। ब्राह्मण, कुलवृद्ध, मन्त्री और सम्बन्धी उनके साथ चले।

श्लोक 9.40

शङ्खदुन्दुभिनादेन ब्रह्मघोषेण वेणुभिः । निश्चक्राम पुरात्तूर्णमात्मजाभीक्षणोत्सुकः ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: शङ्ख, दुन्दुभि, वंशी और वेदध्वनि के बीच पुत्र को देखने की उत्कण्ठा से राजा शीघ्र नगर के बाहर निकले।

श्लोक 9.41

सुनीतिः सुरुचिश्चास्य महिष्यौ रुक्मभूषिते । आरुह्य शिबिकां सार्धमुत्तमेनाभिजग्मतुः ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वर्णाभूषण पहने रानियाँ सुनीति और सुरुचि भी उत्तम के साथ पालकियों पर बैठकर चलीं।

श्लोक 9.42

तं दृष्ट्वोपवनाभ्याश आयान्तं तरसा रथात् । अवरुह्य नृपस्तूर्णमासाद्य प्रेमविह्वलः ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: उपवन के पास ध्रुव को आते देखकर राजा तुरन्त रथ से उतरे और प्रेमविह्वल होकर उनकी ओर दौड़े।

श्लोक 9.43

परिरेभेऽङ्गजं दोर्भ्यां दीर्घोत्कण्ठमनाः श्वसन् । विष्वक्सेनाङ्घ्रिसंस्पर्शहताशेषाघबन्धनम् ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: बहुत दिनों की उत्कण्ठा से भारी साँस लेते हुए उन्होंने पुत्र को गले लगाया। भगवान के चरणस्पर्श से ध्रुव के पापबन्धन दूर हो चुके थे।

श्लोक 9.44

अथाजिघ्रन्मुहुर्मूर्ध्नि शीतैर्नयनवारिभिः । स्नापयामास तनयं जातोद्दाममनोरथः ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा बार–बार पुत्र का मस्तक सूँघते और आनन्द से निकले शीतल आँसुओं से उसे भिगोते रहे।

श्लोक 9.45

अभिवन्द्य पितुः पादावाशीर्भिश्चाभिमन्त्रितः । ननाम मातरौ शीर्ष्णा सत्कृतः सज्जनाग्रणीः ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव ने पिता के चरणों में प्रणाम किया और आशीर्वाद पाया। फिर दोनों माताओं को सिर झुकाकर प्रणाम किया।

श्लोक 9.46

सुरुचिस्तं समुत्थाप्य पादावनतमर्भकम् । परिष्वज्याह जीवेति बाष्पगद्गदया गिरा ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: सुरुचि ने चरणों में झुके बालक को उठाकर गले लगाया और आँसुओं से रुकी वाणी में कहा—चिरंजीवी हो।

श्लोक 9.47

यस्य प्रसन्नो भगवान् गुणैर्मैत्र्यादिभिर्हरिः । तस्मै नमन्ति भूतानि निम्नमाप इव स्वयम् ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्री आदि सद्गुणों से जिस पर हरि प्रसन्न हों, उसके प्रति सब जीव स्वयं नम्र हो जाते हैं, जैसे जल अपने आप नीचे की ओर बहता है।

श्लोक 9.48

उत्तमश्च ध्रुवश्चोभावन्योन्यं प्रेमविह्वलौ । अङ्गसङ्गादुत्पुलकावस्रौघं मुहुरूहतुः ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उत्तम और ध्रुव ने भी प्रेम से एक दूसरे को गले लगाया। दोनों के शरीर रोमाञ्चित हुए और आँखों से आँसू बह निकले।

श्लोक 9.49

सुनीतिरस्य जननी प्राणेभ्योऽपि प्रियं सुतम् । उपगुह्य जहावाधिं तदङ्गस्पर्शनिर्वृता ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: माता सुनीति ने प्राणों से प्रिय पुत्र को हृदय से लगाया। उसके स्पर्श की तृप्ति से उनकी सारी चिन्ता दूर हो गई।

श्लोक 9.50

पयः स्तनाभ्यां सुस्राव नेत्रजैः सलिलैः शिवैः । तदाभिषिच्यमानाभ्यां वीर वीरसुवो मुहुः ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वीर पुत्र की माता के स्तनों से वात्सल्य का दूध और आँखों से शुभ आँसू बहने लगे; ध्रुव उनसे बार–बार भीग गए।

श्लोक 9.51

तां शशंसुर्जना राज्ञीं दिष्ट्या ते पुत्र आर्तिहा । प्रतिलब्धश्चिरं नष्टो रक्षिता मण्डलं भुवः ॥ ५१॥

सरल हिंदी भावार्थ: लोग रानी की प्रशंसा करने लगे—सौभाग्य से तुम्हारा खोया हुआ पुत्र मिल गया। वह तुम्हारा दुःख हरने वाला और पृथ्वी का रक्षक होगा।

श्लोक 9.52

अभ्यर्चितस्त्वया नूनं भगवान् प्रणतार्तिहा । यदनुध्यायिनो धीरा मृत्युं जिग्युः सुदुर्जयम् ॥ ५२॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुमने अवश्य शरणागतों की पीड़ा हरने वाले भगवान की आराधना की है; उनका ध्यान करने वाले धीरजन दुर्जय मृत्यु को भी जीतते हैं।

श्लोक 9.53

लाल्यमानं जनैरेवं ध्रुवं सभ्रातरं नृपः । आरोप्य करिणीं हृष्टः स्तूयमानोऽविशत्पुरम् ॥ ५३॥

सरल हिंदी भावार्थ: लोग ध्रुव का इस प्रकार स्वागत कर रहे थे। राजा ने दोनों भाइयों को हथिनी पर बैठाया और जयगान के बीच प्रसन्न होकर नगर में प्रवेश किया।

श्लोक 9.54

तत्र तत्रोपसङ्कॢप्तैर्लसन्मकरतोरणैः । सवृन्दैः कदलीस्तम्भैः पूगपोतैश्च तद्विधैः ॥ ५४॥

सरल हिंदी भावार्थ: नगर में स्थान–स्थान पर चमकते मकराकार तोरण, गुच्छों वाले केले के स्तम्भ और सुपारी के पौधे सजाए गए थे।

श्लोक 9.55

चूतपल्लववासःस्रङ् मुक्तादामविलम्बिभिः । उपस्कृतं प्रतिद्वारमपां कुम्भैः सदीपकैः ॥ ५५॥

सरल हिंदी भावार्थ: हर द्वार पर आम के पत्ते, वस्त्र, पुष्पमालाएँ और मोतियों की लड़ियाँ थीं; जलभरे कलश तथा दीपक रखे गए थे।

श्लोक 9.56

प्राकारैर्गोपुरागारैः शातकुम्भपरिच्छदैः । सर्वतोऽलङ्कृतं श्रीमद्विमानशिखरद्युभिः ॥ ५६॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्राकार, प्रवेशद्वार और भवन स्वर्णसज्जा से शोभित थे; ऊँचे महलों के शिखरों की चमक चारों ओर फैल रही थी।

श्लोक 9.57

मृष्टचत्वररथ्याट्टमार्गं चन्दनचर्चितम् । लाजाक्षतैः पुष्पफलैस्तण्डुलैर्बलिभिर्युतम् ॥ ५७॥

सरल हिंदी भावार्थ: चौराहे, गलियाँ, बाजार और मार्ग स्वच्छ करके चन्दनजल से सींचे गए थे। लावा, अक्षत, पुष्प, फल और चावल की मंगलभेंटें रखी थीं।

श्लोक 9.58

ध्रुवाय पथि दृष्टाय तत्र तत्र पुरस्त्रियः सिद्धार्थाक्षतदध्यम्बुदूर्वापुष्पफलानि च ॥ ५८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मार्ग में ध्रुव को देखकर नगर की स्त्रियाँ सरसों, अक्षत, दही, जल, दूर्वा, पुष्प और फल लेकर आगे आती थीं।

श्लोक 9.59

उपजह्रुः प्रयुञ्जाना वात्सल्यादाशिषः सतीः । श‍ृण्वंस्तद्वल्गुगीतानि प्राविशद्भवनं पितुः ॥ ५९॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे स्नेह से आशीर्वाद देती और भेंट अर्पित करती थीं। उनके मधुर गीत सुनते हुए ध्रुव पिता के महल में पहुँचे।

श्लोक 9.60

महामणिव्रातमये स तस्मिन् भवनोत्तमे । लालितो नितरां पित्रा न्यवसद्दिवि देववत् ॥ ६०॥

सरल हिंदी भावार्थ: बहुमूल्य रत्नों से बने उस श्रेष्ठ भवन में पिता का भरपूर स्नेह पाकर वे स्वर्ग के देवता की तरह रहने लगे।

श्लोक 9.61

पयःफेननिभाः शय्या दान्ता रुक्मपरिच्छदाः । आसनानि महार्हाणि यत्र रौक्मा उपस्कराः ॥ ६१॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ दूध के फेन जैसे सफेद बिछौने, हाथीदाँत और सोने से सजी शय्याएँ, बहुमूल्य आसन तथा स्वर्ण उपकरण थे।

श्लोक 9.62

यत्र स्फटिककुड्येषु महामारकतेषु च । मणिप्रदीपा आभान्ति ललनारत्नसंयुताः ॥ ६२॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्फटिक और विशाल पन्नों की दीवारों पर रत्नदीप चमकते थे; श्रेष्ठ स्त्रियों के आभूषणों की प्रभा भी उनमें मिलती थी।

श्लोक 9.63

उद्यानानि च रम्याणि विचित्रैरमरद्रुमैः । कूजद्विहङ्गमिथुनैर्गायन् मत्तमधुव्रतैः ॥ ६३॥

सरल हिंदी भावार्थ: रमणीय उद्यानों में विविध दिव्य वृक्ष, जोड़ों में गाते पक्षी और मत्त भ्रमरों की गुंजार थी।

श्लोक 9.64

वाप्यो वैदूर्यसोपानाः पद्मोत्पलकुमुद्वतीः । हंसकारण्डवकुलैर्जुष्टाश्चक्राह्वसारसैः ॥ ६४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वैदूर्य की सीढ़ियों वाली बावड़ियाँ कमल, उत्पल और कुमुद से भरी थीं; हंस, कारण्डव, चकवा और सारस उनमें विहार करते थे।

श्लोक 9.65

उत्तानपादो राजर्षिः प्रभावं तनयस्य तम् । श्रुत्वा दृष्ट्वाद्भुततमं प्रपेदे विस्मयं परम् ॥ ६५॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजर्षि उत्तानपाद ने पुत्र का अद्भुत प्रभाव सुना और देखा तो वे अत्यन्त विस्मित हुए।

श्लोक 9.66

वीक्ष्योढवयसं तं च प्रकृतीनां च सम्मतम् । अनुरक्तप्रजं राजा ध्रुवं चक्रे भुवः पतिम् ॥ ६६॥

सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव के युवा होने, मन्त्रियों की स्वीकृति और प्रजा के प्रेम को देखकर राजा ने उन्हें पृथ्वी का राजा बनाया।

श्लोक 9.67

आत्मानं च प्रवयसमाकलय्य विशाम्पतिः । वनं विरक्तः प्रातिष्ठद्विमृशन्नात्मनो गतिम् ॥ ६७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपनी बढ़ी आयु का विचार करके उत्तानपाद वैराग्यपूर्वक आत्मकल्याण का चिन्तन करते हुए वन चले गए।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 9 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 10

उत्तम की मृत्यु और यक्षों से ध्रुव का युद्ध

श्लोक 10.1

मैत्रेय उवाच । प्रजापतेर्दुहितरं शिशुमारस्य वै ध्रुवः । उपयेमे भ्रमिं नाम तत्सुतौ कल्पवत्सरौ ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—ध्रुव ने प्रजापति शिशुमार की कन्या भ्रमि से विवाह किया; उनके कल्प और वत्सर नामक दो पुत्र हुए।

श्लोक 10.2

इलायामपि भार्यायां वायोः पुत्र्यां महाबलः । पुत्रमुत्कलनामानं योषिद्रत्नमजीजनत् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: वायु की पुत्री इला नामक दूसरी पत्नी से बलवान ध्रुव के उत्कल नामक पुत्र और एक सुन्दर कन्या हुई।

श्लोक 10.3

उत्तमस्त्वकृतोद्वाहो मृगयायां बलीयसा । हतः पुण्यजनेनाद्रौ तन्मातास्य गतिं गता ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अविवाहित उत्तम को पर्वत पर शिकार करते समय एक बलवान यक्ष ने मार दिया। उनकी माता भी उन्हें खोजते हुए मृत्यु को प्राप्त हुईं।

श्लोक 10.4

ध्रुवो भ्रातृवधं श्रुत्वा कोपामर्षः शुचार्पितः । जैत्रं स्यन्दनमास्थाय गतः पुण्यजनालयम् ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: भाई के वध का समाचार सुनकर ध्रुव शोक और रोष से भर गए। वे विजयी रथ पर बैठकर यक्षों के निवास की ओर चले।

श्लोक 10.5

गत्वोदीचीं दिशं राजा रुद्रानुचरसेविताम् । ददर्श हिमवद्द्रोण्यां पुरीं गुह्यकसङ्कुलाम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उत्तर दिशा में हिमालय की घाटी में उन्होंने शिव के अनुचरों से सेवित और यक्षों से भरी नगरी देखी।

श्लोक 10.6

दध्मौ शङ्खं बृहद्बाहुः खं दिशश्चानुनादयन् । येनोद्विग्नदृशः क्षत्तरुपदेव्योऽत्रसन् भृशम् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: बलशाली ध्रुव ने ऐसा शङ्ख बजाया कि आकाश और दिशाएँ गूँज उठीं। उसकी ध्वनि से यक्षस्त्रियाँ बहुत डर गईं।

श्लोक 10.7

ततो निष्क्रम्य बलिन उपदेवमहाभटाः । असहन्तस्तन्निनादमभिपेतुरुदायुधाः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस नाद को सह न सकने वाले बलवान यक्षयोद्धा अस्त्र उठाकर नगरी से बाहर आए और उन पर टूट पड़े।

श्लोक 10.8

स तानापततो वीर उग्रधन्वा महारथः । एकैकं युगपत्सर्वानहन् बाणैस्त्रिभिस्त्रिभिः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: धनुषधारी महारथी ध्रुव ने आते हुए हर योद्धा को एक साथ तीन–तीन बाण मारे।

श्लोक 10.9

ते वै ललाटलग्नैस्तैरिषुभिः सर्व एव हि । मत्वा निरस्तमात्मानमाशंसन् कर्म तस्य तत् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मस्तक में लगे बाणों से सबने अपने पराजित होने का अनुमान किया और ध्रुव के रणकौशल की प्रशंसा की।

श्लोक 10.10

तेऽपि चामुममृष्यन्तः पादस्पर्शमिवोरगाः । शरैरविध्यन् युगपद्द्विगुणं प्रचिकीर्षवः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी अपमान सह न सकने वाले वे योद्धा पैर से छुए सर्पों की तरह क्रुद्ध हुए और बदला लेने के लिए दुगुने बाण चलाने लगे।

श्लोक 10.11

ततः परिघनिस्त्रिंशैः प्रासशूलपरश्वधैः । शक्त्यृष्टिभिर्भुशुण्डीभिश्चित्रवाजैः शरैरपि ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने परिघ, तलवार, प्रास, शूल, फरसे, शक्ति, ऋष्टि, भुशुण्डी और रंगीन पंखों वाले बाण उठाए।

श्लोक 10.12

अभ्यवर्षन् प्रकुपिताः सरथं सह सारथिम् । इच्छन्तस्तत्प्रतीकर्तुमयुतानि त्रयोदश ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक लाख तीस हजार क्रुद्ध यक्षों ने प्रतिकार की इच्छा से ध्रुव, उनके रथ और सारथि पर अस्त्रों की वर्षा की।

श्लोक 10.13

औत्तानपादिः स तदा शस्त्रवर्षेण भूरिणा । न उपादृश्यतच्छन्न आसारेण यथा गिरिः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस भारी शस्त्रवृष्टि में ध्रुव ढक गए, जैसे मूसलधार वर्षा में पर्वत ओझल हो जाता है।

श्लोक 10.14

हाहाकारस्तदैवासीत्सिद्धानां दिवि पश्यताम् । हतोऽयं मानवः सूर्यो मग्नः पुण्यजनार्णवे ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: आकाश से देखते सिद्ध हाहाकार करने लगे—यक्षसागर में मनुवंश का यह सूर्य डूब गया, मानो मारा गया हो!

श्लोक 10.15

नदत्सु यातुधानेषु जयकाशिष्वथो मृधे । उदतिष्ठद्रथस्तस्य नीहारादिव भास्करः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: यक्ष विजय की आशा में गर्ज रहे थे कि ध्रुव का रथ कुहरे से निकलते सूर्य की तरह फिर दिखाई दिया।

श्लोक 10.16

धनुर्विस्फूर्जयन् दिव्यं द्विषतां खेदमुद्वहन् । अस्त्रौघं व्यधमद्बाणैर्घनानीकमिवानिलः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: दिव्य धनुष की टङ्कार से शत्रुओं को विचलित करते हुए उन्होंने बाणों से अस्त्रसमूह को ऐसे उड़ा दिया जैसे वायु मेघों को उड़ा देती है।

श्लोक 10.17

तस्य ते चापनिर्मुक्ता भित्त्वा वर्माणि रक्षसाम् । कायानाविविशुस्तिग्मा गिरीनशनयो यथा ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके तीखे बाण कवच चीरकर यक्षों के शरीर में घुस गए, जैसे वज्र पर्वत में प्रवेश करता है।

श्लोक 10.18

भल्लैः सञ्छिद्यमानानां शिरोभिश्चारुकुण्डलैः । ऊरुभिर्हेमतालाभैर्दोर्भिर्वलयवल्गुभिः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: युद्ध में उनके तीक्ष्ण बाणों से कटे, सुन्दर कुण्डलों वाले सिर, स्वर्णस्तम्भ जैसी जाँघें और कङ्कणधारी भुजाएँ भूमि पर गिरीं।

श्लोक 10.19

हारकेयूरमुकुटैरुष्णीषैश्च महाधनैः । आस्तृतास्ता रणभुवो रेजुर्वीर मनोहराः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: हार, बाजूबन्द, मुकुट और बहुमूल्य पगड़ियाँ भी रणभूमि में बिखर गईं; कथा उस समय के वीररस में इस दृश्य का वर्णन करती है।

श्लोक 10.20

हतावशिष्टा इतरे रणाजिरा- द्रक्षोगणाः क्षत्रियवर्यसायकैः । प्रायो विवृक्णावयवा विदुद्रुवुः मृगेन्द्रविक्रीडितयूथपा इव ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: बचे हुए योद्धा ध्रुव के बाणों से घायल और अनेक अङ्ग कटे हुए युद्धभूमि से भागे, जैसे सिंह के आक्रमण से हाथियों का झुण्ड भागता है।

श्लोक 10.21

अपश्यमानः स तदाततायिनं महामृधे कञ्चन मानवोत्तमः । पुरीं दिदृक्षन्नपि नाविशद्द्विषां न मायिनां वेद चिकीर्षितं जनः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: सामने कोई आक्रमणकारी न देखकर भी ध्रुव शत्रुनगरी में नहीं गए। उन्होंने सोचा—मायावी लोग आगे क्या करना चाहते हैं, यह कोई नहीं जानता।

श्लोक 10.22

इति ब्रुवंश्चित्ररथः स्वसारथिं यत्तः परेषां प्रतियोगशङ्कितः । शुश्राव शब्दं जलधेरिवेरितं नभस्वतो दिक्षु रजोऽन्वदृश्यत ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: सारथि से ऐसा कहते हुए वे सावधान रहे। तभी समुद्र जैसी गर्जना सुनाई दी, वायु चली और दिशाओं में धूल छा गई।

श्लोक 10.23

क्षणेनाच्छादितं व्योम घनानीकेन सर्वतः । विस्फुरत्तडिता दिक्षु त्रासयत्स्तनयित्नुना ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्षणभर में आकाश मेघों से ढक गया; बिजली चमकने और भयावह गर्जना होने लगी।

श्लोक 10.24

ववृषू रुधिरौघासृक्पूयविण्मूत्रमेदसः । निपेतुर्गगनादस्य कबन्धान्यग्रतोऽनघ ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मायाप्रदर्शन से रक्त, पीब, मल, मूत्र और चर्बी की वर्षा होती तथा आकाश से सिरहीन शरीर गिरते दिखाई दिए।

श्लोक 10.25

ततः खेऽदृश्यत गिरिर्निपेतुः सर्वतोदिशम् । गदापरिघनिस्त्रिंशमुसलाः साश्मवर्षिणः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर आकाश में पर्वत दिखाई दिया और पत्थरों सहित गदा, परिघ, तलवार तथा मूसल सब दिशाओं से गिरने लगे।

श्लोक 10.26

अहयोऽशनिनिःश्वासा वमन्तोऽग्निं रुषाक्षिभिः । अभ्यधावन् गजा मत्ताः सिंहव्याघ्राश्च यूथशः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: अग्नि उगलते, क्रोधभरे सर्प और मत्त हाथी, सिंह तथा व्याघ्रों के झुण्ड उनकी ओर दौड़ते दिखाई दिए।

श्लोक 10.27

समुद्र ऊर्मिभिर्भीमः प्लावयन् सर्वतोभुवम् । आससाद महाह्रादः कल्पान्त इव भीषणः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: विशाल लहरों और गर्जना वाला समुद्र मानो प्रलयकाल की तरह चारों ओर पृथ्वी डुबोता हुआ सामने आया।

श्लोक 10.28

एवं विधान्यनेकानि त्रासनान्यमनस्विनाम् । ससृजुस्तिग्मगतय आसुर्या माययासुराः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: तीव्र शक्तिवाले असुरभावी यक्षों ने आसुरी माया से ऐसे अनेक भयप्रद दृश्य रचे, जो अस्थिर मनवालों को डरा दें।

श्लोक 10.29

ध्रुवे प्रयुक्तामसुरैस्तां मायामतिदुस्तराम् । निशाम्य तस्य मुनयः समाशंसन् समागताः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव पर प्रयुक्त उस दुस्तर माया को देखकर वहाँ आए मुनियों ने उनके कल्याण की प्रार्थना की।

श्लोक 10.30

मुनय ऊचुः । औत्तानपादे भगवांस्तव शार्ङ्गधन्वा देवः क्षिणोत्ववनतार्तिहरो विपक्षान् । यन्नामधेयमभिधाय निशम्य चाद्धा लोकोऽञ्जसा तरति दुस्तरमङ्ग मृत्युम् ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुनि बोले—उत्तानपाद के पुत्र, शरणागतों का दुःख हरने वाले शार्ङ्गधारी भगवान तुम्हारे विरोधियों को दूर करें। जिनका नाम कहने और सुनने से मनुष्य कठिन मृत्यु पार करता है, वे तुम्हारी रक्षा करें।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 10 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 11

मनु का उपदेश और क्रोध से निवृत्ति

श्लोक 11.1

मैत्रेय उवाच । निशम्य गदतामेवं ऋषीणां धनुषि ध्रुवः । सन्दधेऽस्त्रमुपस्पृश्य यन्नारायणनिर्मितम् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—ऋषियों के ये वचन सुनकर ध्रुव ने आचमन किया और नारायण द्वारा प्रदत्त अस्त्र धनुष पर चढ़ाया।

श्लोक 11.2

सन्धीयमान एतस्मिन् माया गुह्यकनिर्मिताः । क्षिप्रं विनेशुर्विदुर क्लेशा ज्ञानोदये यथा ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: अस्त्र चढ़ाते ही यक्षों की माया शीघ्र मिट गई, जैसे ज्ञान का उदय होने पर क्लेश मिट जाते हैं।

श्लोक 11.3

तस्यार्षास्त्रं धनुषि प्रयुञ्जतः सुवर्णपुङ्खाः कलहंसवाससः । विनिःसृता आविविशुर्द्विषद्बलं यथा वनं भीमरवाः शिखण्डिनः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस दिव्य अस्त्र से स्वर्णपुच्छ और हंसपंख वाले बाण निकले तथा गर्जते मोरों के वन में प्रवेश की तरह शत्रुसेना में जा घुसे।

श्लोक 11.4

तैस्तिग्मधारैः प्रधने शिलीमुखै- रितस्ततः पुण्यजना उपद्रुताः । तमभ्यधावन् कुपिता उदायुधाः सुपर्णमुन्नद्धफणा इवाहयः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: तीखे बाणों से पीड़ित यक्ष अस्त्र उठाए क्रुद्ध होकर ध्रुव की ओर दौड़े, जैसे फन उठाए सर्प गरुड़ की ओर बढ़ें।

श्लोक 11.5

स तान् पृषत्कैरभिधावतो मृधे निकृत्तबाहूरुशिरोधरोदरान् । निनाय लोकं परमर्कमण्डलं व्रजन्ति निर्भिद्य यमूर्ध्वरेतसः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव ने आक्रमणकारी योद्धाओं के अङ्ग बाणों से काट दिए और उन्हें उस वीरगति के लोक में भेजा, जहाँ ऊर्ध्वरेता योगी सूर्यमण्डल भेदकर पहुँचते हैं, ऐसा कथा में कहा गया है।

श्लोक 11.6

तान् हन्यमानानभिवीक्ष्य गुह्यका- ननागसश्चित्ररथेन भूरिशः । औत्तानपादिं कृपया पितामहो मनुर्जगादोपगतः सहर्षिभिः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव को बहुत से निर्दोष यक्षों को भी मारते देखकर पितामह मनु को दया आई। वे ऋषियों सहित वहाँ आए और उन्हें समझाने लगे।

श्लोक 11.7

मनुरुवाच । अलं वत्सातिरोषेण तमोद्वारेण पाप्मना । येन पुण्यजनानेतानवधीस्त्वमनागसः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनु बोले—बेटा, अत्यधिक क्रोध छोड़ो; यह अधोगति का पापमय द्वार है। इसी के कारण तुमने इन निर्दोष यक्षों को मार डाला।

श्लोक 11.8

नास्मत्कुलोचितं तात कर्मैतत्सद्विगर्हितम् । वधो यदुपदेवानामारब्धस्तेऽकृतैनसाम् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: निर्दोष दिव्यजनों का वध हमारे कुल के योग्य नहीं। सज्जन ऐसे कर्म की निन्दा करते हैं।

श्लोक 11.9

नन्वेकस्यापराधेन प्रसङ्गाद्बहवो हताः । भ्रातुर्वधाभितप्तेन त्वयाङ्ग भ्रातृवत्सल ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम अपने भाई से स्नेह रखते हो, पर उसके वध के दुःख में एक के अपराध के कारण इतने लोगों को मार दिया।

श्लोक 11.10

नायं मार्गो हि साधूनां हृषीकेशानुवर्तिनाम् । यदात्मानं पराग्गृह्य पशुवद्भूतवैशसम् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: देह को ही अपना स्वरूप मानकर पशुवत प्राणियों का संहार करना भगवान हृषीकेश के भक्त सज्जनों का मार्ग नहीं है।

श्लोक 11.11

सर्वभूतात्मभावेन भूतावासं हरिं भवान् । आराध्याप दुराराध्यं विष्णोस्तत्परमं पदम् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुमने सभी प्राणियों में आत्मभाव से रहने वाले हरि की आराधना करके भगवान विष्णु का दुर्लभ परम पद पाया है।

श्लोक 11.12

स त्वं हरेरनुध्यातस्तत्पुंसामपि सम्मतः । कथं त्ववद्यं कृतवाननुशिक्षन् सतां व्रतम् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: हरि स्वयं तुम पर कृपा रखते हैं और उनके भक्त भी तुम्हारा सम्मान करते हैं। संतों के आचरण का अनुसरण करते हुए तुम ऐसा निन्दनीय कर्म कैसे कर बैठे?

श्लोक 11.13

तितिक्षया करुणया मैत्र्या चाखिलजन्तुषु । समत्वेन च सर्वात्मा भगवान् सम्प्रसीदति ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: सहनशीलता, करुणा, मैत्री और सभी प्राणियों के प्रति समदृष्टि से सर्वात्मा भगवान प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 11.14

सम्प्रसन्ने भगवति पुरुषः प्राकृतैर्गुणैः । विमुक्तो जीवनिर्मुक्तो ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान प्रसन्न होने पर मनुष्य प्रकृति के गुणों और जीवभाव के बन्धन से मुक्त होकर ब्रह्मशान्ति प्राप्त करता है।

श्लोक 11.15

भूतैः पञ्चभिरारब्धैर्योषित्पुरुष एव हि । तयोर्व्यवायात्सम्भूतिर्योषित्पुरुषयोरिह ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्त्री और पुरुष के शरीर पाँच भूतों से बने हैं; उनके सम्बन्ध से फिर स्त्री–पुरुष की सन्तान उत्पन्न होती है।

श्लोक 11.16

एवं प्रवर्तते सर्गः स्थितिः संयम एव च । गुणव्यतिकराद्राजन् मायया परमात्मनः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रकृति के गुणों की परस्पर क्रिया और परमात्मा की माया से जगत की उत्पत्ति, स्थिति और संहार चलता है।

श्लोक 11.17

निमित्तमात्रं तत्रासीन्निर्गुणः पुरुषर्षभः । व्यक्ताव्यक्तमिदं विश्वं यत्र भ्रमति लोहवत् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुणातीत परम पुरुष इसमें अधिष्ठान और निमित्त हैं; व्यक्त–अव्यक्त जगत उनके प्रभाव में ऐसे चलता है जैसे चुम्बक के पास लोहा।

श्लोक 11.18

स खल्विदं भगवान् कालशक्त्या गुणप्रवाहेण विभक्तवीर्यः । करोत्यकर्तैव निहन्त्यहन्ता चेष्टा विभूम्नः खलु दुर्विभाव्या ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान कालशक्ति और गुणप्रवाह से विविध कार्य करते दिखाई देते हैं, पर स्वरूप से कर्तापन और हिंसा से परे हैं। अनन्त प्रभु की लीला समझना कठिन है।

श्लोक 11.19

सोऽनन्तोऽन्तकरः कालोऽनादिरादिकृदव्ययः । जनं जनेन जनयन् मारयन् मृत्युनान्तकम् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे अनादि, अविनाशी और अनन्त कालरूप हैं; जीवों के माध्यम से जन्म और मृत्यु के माध्यम से अन्त की व्यवस्था चलाते हैं।

श्लोक 11.20

न वै स्वपक्षोऽस्य विपक्ष एव वा परस्य मृत्योर्विशतः समं प्रजाः । तं धावमानमनुधावन्त्यनीशा यथा रजांस्यनिलं भूतसङ्घाः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: समान रूप से सब प्राणियों में मृत्यु बनकर प्रवेश करने वाले काल का कोई अपना या पराया पक्ष नहीं। असहाय जीव उनके पीछे चलते हैं जैसे वायु के साथ धूलकण।

श्लोक 11.21

आयुषोऽपचयं जन्तोस्तथैवोपचयं विभुः । उभाभ्यां रहितः स्वस्थो दुःस्थस्य विदधात्यसौ ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वयं वृद्धि और क्षय से रहित प्रभु जीवों की आयु का बढ़ना और घटना नियत करते हैं; वे स्थिर रहते हैं और जीव परिवर्तन भोगता है।

श्लोक 11.22

केचित्कर्म वदन्त्येनं स्वभावमपरे नृप । एके कालं परे दैवं पुंसः काममुतापरे ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, इसी नियामक तत्त्व को कोई कर्म, कोई स्वभाव, कोई काल, कोई दैव और कोई परम पुरुष की इच्छा कहता है।

श्लोक 11.23

अव्यक्तस्याप्रमेयस्य नानाशक्त्युदयस्य च । न वै चिकीर्षितं तात को वेदाथ स्वसम्भवम् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह अव्यक्त, अप्रमेय और अनेक शक्तियों का उद्गम है। उसका पूरा उद्देश्य कौन जान सकता है? जीव स्वयं उसी से उत्पन्न है।

श्लोक 11.24

न चैते पुत्रक भ्रातुर्हन्तारो धनदानुगाः । विसर्गादानयोस्तात पुंसो दैवं हि कारणम् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: बेटा, कुबेर के ये सब अनुचर तुम्हारे भाई के हत्यारे नहीं हैं। जन्म और मृत्यु की व्यवस्था में दैव भी कारण है; पूरे समुदाय को दोषी मत मानो।

श्लोक 11.25

स एव विश्वं सृजति स एवावति हन्ति च । अथापि ह्यनहङ्कारान्नाज्यते गुणकर्मभिः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वही परमात्मा जगत को रचता, पालता और समेटता है, फिर भी अहंकार न होने से गुणों और कर्मों में लिप्त नहीं होता।

श्लोक 11.26

एष भूतानि भूतात्मा भूतेशो भूतभावनः । स्वशक्त्या मायया युक्तः सृजत्यत्ति च पाति च ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: सब प्राणियों के आत्मा, स्वामी और पोषक प्रभु अपनी मायाशक्ति के द्वारा सृष्टि, पालन और संहार करते हैं।

श्लोक 11.27

तमेव मृत्युममृतं तात दैवं सर्वात्मनोपेहि जगत्परायणम् । यस्मै बलिं विश्वसृजो हरन्ति गावो यथा वै नसि दामयन्त्रिताः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मृत्यु और अमरत्व दोनों के नियन्ता तथा जगत के परम आश्रय उन्हीं भगवान की सर्वभाव से शरण लो। प्रजापति भी उनके अधीन अपना कर्तव्य करते हैं, जैसे नाक की रस्सी से नियंत्रित बैल।

श्लोक 11.28

यः पञ्चवर्षो जननीं त्वं विहाय मातुः सपत्न्या वचसा भिन्नमर्मा । वनं गतस्तपसा प्रत्यगक्ष- माराध्य लेभे मूर्ध्नि पदं त्रिलोक्याः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुमने पाँच वर्ष की आयु में सौतेली माता के अपमान से व्यथित होकर माँ को छोड़ा, वन में तप किया और इन्द्रियों से परे प्रभु की आराधना से तीनों लोकों से ऊँचा पद पाया था।

श्लोक 11.29

तमेनमङ्गात्मनि मुक्तविग्रहे व्यपाश्रितं निर्गुणमेकमक्षरम् । आत्मानमन्विच्छ विमुक्तमात्मदृ- ग्यस्मिन्निदं भेदमसत्प्रतीयते ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: अब उन्हीं अद्वितीय, अविनाशी और गुणातीत आत्मा को अपने मुक्त अन्तःकरण में खोजो, जिनमें दिखाई देने वाला भेद वास्तविक स्वतन्त्र सत्ता नहीं रखता।

श्लोक 11.30

त्वं प्रत्यगात्मनि तदा भगवत्यनन्त आनन्दमात्र उपपन्नसमस्तशक्तौ । भक्तिं विधाय परमां शनकैरविद्या- ग्रन्थिं विभेत्स्यसि ममाहमिति प्ररूढम् ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: भीतर स्थित अनन्त, आनन्दमय और सर्वशक्तिमान भगवान में परम भक्ति करो; तब धीरे–धीरे अहंता–ममता की गहरी अज्ञानग्रन्थि कटेगी।

श्लोक 11.31

संयच्छ रोषं भद्रं ते प्रतीपं श्रेयसां परम् । श्रुतेन भूयसा राजन्नगदेन यथाऽऽमयम् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: कल्याण के महान बाधक क्रोध को व्यापक शास्त्रज्ञान से सँभालो, जैसे औषधि से रोग को रोकते हैं। तुम्हारा मंगल हो।

श्लोक 11.32

येनोपसृष्टात्पुरुषाल्लोक उद्विजते भृशम् । न बुधस्तद्वशं गच्छेदिच्छन्नभयमात्मनः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्रोधग्रस्त व्यक्ति से संसार बहुत डरता है। अपना अभय चाहने वाला बुद्धिमान उसके वश में नहीं जाता।

श्लोक 11.33

हेलनं गिरिशभ्रातुर्धनदस्य त्वया कृतम् । यज्जघ्निवान् पुण्यजनान् भ्रातृघ्नानित्यमर्षितः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: भाई के हत्यारे समझकर इतने यक्षों को मारने से तुमने शिव के मित्र और भ्रातृतुल्य धनाध्यक्ष कुबेर का अनादर किया है।

श्लोक 11.34

तं प्रसादय वत्साशु सन्नत्या प्रश्रयोक्तिभिः । न यावन्महतां तेजः कुलं नोऽभिभविष्यति ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: शीघ्र विनय और नम्र वचनों से उन्हें प्रसन्न करो, जिससे महात्माओं का तेज हमारे कुल को हानि न पहुँचाए।

श्लोक 11.35

एवं स्वायम्भुवः पौत्रमनुशास्य मनुर्ध्रुवम् । तेनाभिवन्दितः साकमृषिभिः स्वपुरं ययौ ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार पौत्र को उपदेश देकर मनु ने ध्रुव का प्रणाम स्वीकार किया और ऋषियों के साथ अपने स्थान को लौट गए।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 11 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 12

कुबेर का वर, ध्रुवपद और कथा की फलश्रुति

श्लोक 12.1

मैत्रेय उवाच । ध्रुवं निवृत्तं प्रतिबुद्ध्य वैशसा- दपेतमन्युं भगवान् धनेश्वरः । तत्रागतश्चारणयक्षकिन्नरैः संस्तूयमानोऽभ्यवदत्कृताञ्जलिम् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—ध्रुव को हिंसा से निवृत्त और क्रोधरहित जानकर कुबेर वहाँ आए। चारण, यक्ष और किन्नर उनकी स्तुति कर रहे थे; हाथ जोड़े ध्रुव से उन्होंने कहा।

श्लोक 12.2

धनद उवाच । भो भोः क्षत्रियदायाद परितुष्टोऽस्मि तेऽनघ । यत्त्वं पितामहादेशाद्वैरं दुस्त्यजमत्यजः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: कुबेर बोले—क्षत्रियकुमार, पितामह के कहने से तुमने कठिनाई से छूटने वाला वैर त्याग दिया; इससे मैं बहुत प्रसन्न हूँ।

श्लोक 12.3

न भवानवधीद्यक्षान् न यक्षा भ्रातरं तव । काल एव हि भूतानां प्रभुरप्ययभावयोः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: परम दृष्टि से न तुम यक्षों के स्वतन्त्र मृत्युकारण हो, न यक्ष तुम्हारे भाई के; प्राणियों के जन्म और विनाश पर काल का शासन है।

श्लोक 12.4

अहं त्वमित्यपार्था धीरज्ञानात्पुरुषस्य हि । स्वाप्नीवाभात्यतद्ध्यानाद्यया बन्धविपर्ययौ ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: अज्ञान से उत्पन्न मैं–तुम की भेदबुद्धि स्वप्न की तरह प्रतीत होती है। उसी मिथ्या चिन्तन से बन्धन और उलटा ज्ञान पैदा होता है।

श्लोक 12.5

तद्गच्छ ध्रुव भद्रं ते भगवन्तमधोक्षजम् । सर्वभूतात्मभावेन सर्वभूतात्मविग्रहम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव, तुम्हारा कल्याण हो। अब सब प्राणियों में आत्मीयभाव रखते हुए उन अधोक्षज भगवान की ओर मन लगाओ, जो सबके आत्मा हैं।

श्लोक 12.6

भजस्व भजनीयाङ्घ्रिमभवाय भवच्छिदम् । युक्तं विरहितं शक्त्या गुणमय्याऽऽत्ममायया ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जन्मबन्धन मिटाने वाले उनके पूजनीय चरणों को भजो। वे अपनी गुणमयी मायाशक्ति से सम्बन्धित होकर भी स्वरूप से उससे सर्वथा अलग हैं।

श्लोक 12.7

वृणीहि कामं नृप यन्मनोगतं मत्तस्त्वमौत्तानपदेऽविशङ्कितः । वरं वरार्होऽम्बुजनाभपादयो- रनन्तरं त्वां वयमङ्ग शुश्रुम ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, अपने मन का कोई वर मुझसे निःसंकोच माँगो। तुम वर पाने योग्य हो; हमने सुना है कि तुम भगवान के चरणों के अत्यन्त निकट हो।

श्लोक 12.8

मैत्रेय उवाच । स राजराजेन वराय चोदितो ध्रुवो महाभागवतो महामतिः । हरौ स वव्रेऽचलितां स्मृतिं यया तरत्ययत्नेन दुरत्ययं तमः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—कुबेर के वर माँगने को कहने पर महामति भक्त ध्रुव ने हरि की अचल स्मृति माँगी, जिससे कठिन अज्ञानसागर सहज पार होता है।

श्लोक 12.9

तस्य प्रीतेन मनसा तां दत्त्वैडविडस्ततः । पश्यतोऽन्तर्दधे सोऽपि स्वपुरं प्रत्यपद्यत ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: इडविडा के पुत्र कुबेर ने प्रसन्न होकर वह वर दिया और अन्तर्धान हो गए। ध्रुव भी अपनी नगरी लौट आए।

श्लोक 12.10

अथायजत यज्ञेशं क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः । द्रव्यक्रियादेवतानां कर्म कर्मफलप्रदम् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने उदार दक्षिणाओं वाले यज्ञों से यज्ञेश्वर की आराधना की, जो सामग्री, क्रिया और देवताओं के मूल आधार तथा कर्मफलदाता हैं।

श्लोक 12.11

सर्वात्मन्यच्युतेऽसर्वे तीव्रौघां भक्तिमुद्वहन् । ददर्शात्मनि भूतेषु तमेवावस्थितं विभुम् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: सर्वात्मा होकर भी सब उपाधियों से परे अच्युत में उनकी भक्ति तीव्र प्रवाह से बढ़ी। उन्होंने अपने भीतर और सभी प्राणियों में उन्हीं प्रभु को देखा।

श्लोक 12.12

तमेवं शीलसम्पन्नं ब्रह्मण्यं दीनवत्सलम् । गोप्तारं धर्मसेतूनां मेनिरे पितरं प्रजाः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे शीलवान, ज्ञानियों का सम्मान करने वाले, दीनों पर स्नेह रखने वाले और धर्ममर्यादा के रक्षक थे; प्रजा उन्हें पिता मानती थी।

श्लोक 12.13

षट्त्रिंशद्वर्षसाहस्रं शशास क्षितिमण्डलम् । भोगैः पुण्यक्षयं कुर्वन्नभोगैरशुभक्षयम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: कथा के अनुसार उन्होंने छत्तीस हजार वर्ष राज्य किया। पुण्यफल को भोग से और अशुभ कर्मफल को संयम तथा त्याग से क्षीण किया।

श्लोक 12.14

एवं बहुसवं कालं महात्माविचलेन्द्रियः । त्रिवर्गौपयिकं नीत्वा पुत्रायादान्नृपासनम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार अनेक यज्ञ करते हुए, इन्द्रियों की शक्ति अक्षुण्ण रखते हुए धर्म, अर्थ और काम के अनुकूल जीवन बिताकर उन्होंने पुत्र को राजासन दे दिया।

श्लोक 12.15

मन्यमान इदं विश्वं मायारचितमात्मनि । अविद्यारचितस्वप्नगन्धर्वनगरोपमम् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे समझ गए कि आत्मा में माया से बना यह विश्व अज्ञानजनित स्वप्न और आकाश में दिखने वाले काल्पनिक नगर जैसा है।

श्लोक 12.16

आत्मस्त्र्यपत्यसुहृदो बलमृद्धकोश- मन्तःपुरं परिविहारभुवश्च रम्याः । भूमण्डलं जलधिमेखलमाकलय्य कालोपसृष्टमिति स प्रययौ विशालाम् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: शरीर, पत्नी, सन्तान, मित्र, सेना, भरा कोश, महल, उद्यान और समुद्रपर्यन्त राज्य सब काल के अधीन हैं—ऐसा विचार करके वे बदरिकाश्रम चले गए।

श्लोक 12.17

तस्यां विशुद्धकरणः शिववार्विगाह्य- बद्ध्वाऽऽसनं जितमरुन्मनसाऽऽहृताक्षः । स्थूले दधार भगवत्प्रतिरूप एत- द्ध्यायंस्तदव्यवहितो व्यसृजत्समाधौ ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ पवित्र जल में स्नान करके, आसन और प्राण संयमित करके तथा इन्द्रियाँ समेटकर उन्होंने भगवान के विराट रूप में चित्त लगाया; फिर गहन समाधि में स्थूल ध्यान से भी ऊपर उठे।

श्लोक 12.18

भक्तिं हरौ भगवति प्रवहन्नजस्र- मानन्दबाष्पकलया मुहुरर्द्यमानः । विक्लिद्यमानहृदयः पुलकाचिताङ्गो नात्मानमस्मरदसाविति मुक्तलिङ्गः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: हरि में निरन्तर भक्ति बहने लगी। आनन्दाश्रु, पिघलते हृदय और रोमाञ्च के बीच वे देहाभिमान भूल गए और सूक्ष्म बन्धन से मुक्त हुए।

श्लोक 12.19

स ददर्श विमानाग्र्यं नभसोऽवतरद्ध्रुवः । विभ्राजयद्दश दिशो राकापतिमिवोदितम् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव ने आकाश से उतरता श्रेष्ठ विमान देखा, जो उदित पूर्णचन्द्र की तरह दसों दिशाओं को प्रकाशित कर रहा था।

श्लोक 12.20

तत्रानु देवप्रवरौ चतुर्भुजौ श्यामौ किशोरावरुणाम्बुजेक्षणौ । स्थिताववष्टभ्य गदां सुवाससौ किरीटहाराङ्गदचारुकुण्डलौ ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसमें चार भुजाओं वाले दो दिव्य किशोर खड़े थे। वे श्यामवर्ण, अरुणकमलनयन, गदाधारी और किरीट, हार, बाजूबन्द तथा कुण्डलों से सुसज्जित थे।

श्लोक 12.21

विज्ञाय तावुत्तमगायकिङ्करा- वभ्युत्थितः साध्वसविस्मृतक्रमः । नाम नामानि गृणन् मधुद्विषः पार्षत्प्रधानाविति संहताञ्जलिः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्हें भगवान के सेवक जानकर ध्रुव उठे। विस्मय से स्वागत की विधि भूल गए और हरि के नाम लेते हुए हाथ जोड़कर प्रमुख पार्षदों को प्रणाम किया।

श्लोक 12.22

तं कृष्णपादाभिनिविष्टचेतसं बद्धाञ्जलिं प्रश्रयनम्रकन्धरम् । सुनन्दनन्दावुपसृत्य सस्मितं प्रत्यूचतुः पुष्करनाभसम्मतौ ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: कृष्ण के चरणों में मन लगाए, हाथ जोड़े और विनय से सिर झुकाए ध्रुव के पास भगवान के प्रिय नन्द और सुनन्द आए तथा मुस्कराकर बोले।

श्लोक 12.23

सुनन्दनन्दावूचतुः भो भो राजन् सुभद्रं ते वाचं नोऽवहितः श‍ृणु । यः पञ्चवर्षस्तपसा भवान् देवमतीतृपत् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: नन्द–सुनन्द ने कहा—राजन्, तुम्हारा मंगल हो। हमारी बात ध्यान से सुनो; तुमने पाँच वर्ष की आयु में ही तप से भगवान को प्रसन्न कर लिया था।

श्लोक 12.24

तस्याखिलजगद्धातुरावां देवस्य शार्ङ्गिणः । पार्षदाविह सम्प्राप्तौ नेतुं त्वां भगवत्पदम् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: हम समस्त जगत को धारण करने वाले शार्ङ्गधारी भगवान के पार्षद हैं और तुम्हें उनके परम पद तक ले जाने आए हैं।

श्लोक 12.25

सुदुर्जयं विष्णुपदं जितं त्वया यत्सूरयोऽप्राप्य विचक्षते परम् । आतिष्ठ तच्चन्द्रदिवाकरादयो ग्रहर्क्षताराः परियन्ति दक्षिणम् ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुमने वह दुर्लभ विष्णुपद पाया है जिसे ज्ञानी भी सर्वोच्च कहते हैं। वहाँ चलो, जिसकी चन्द्र, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र और तारे परिक्रमा करते हैं।

श्लोक 12.26

अनास्थितं ते पितृभिरन्यैरप्यङ्ग कर्हिचित् । आतिष्ठ जगतां वन्द्यं तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जगत के वन्दनीय उस परम विष्णुपद को प्राप्त करो, जहाँ तुम्हारे पूर्वज या दूसरे लोग पहले कभी नहीं पहुँचे।

श्लोक 12.27

एतद्विमानप्रवरमुत्तमश्लोकमौलिना । उपस्थापितमायुष्मन्नधिरोढुं त्वमर्हसि ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: दीर्घायु भक्त, भगवान ने तुम्हारे लिए यह श्रेष्ठ विमान भेजा है। अब इसमें आरोहण करो।

श्लोक 12.28

मैत्रेय उवाच । निशम्य वैकुण्ठनियोज्यमुख्ययो- र्मधुच्युतं वाचमुरुक्रमप्रियः । कृताभिषेकः कृतनित्यमङ्गलो मुनीन् प्रणम्याशिषमभ्यवादयत् ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—वैकुण्ठ के प्रमुख सेवकों की अमृतमय वाणी सुनकर ध्रुव ने स्नान और नित्य मंगलकर्म किए, मुनियों को प्रणाम किया और आशीर्वाद लिया।

श्लोक 12.29

परीत्याभ्यर्च्य धिष्ण्याग्र्यं पार्षदावभिवन्द्य च । इयेष तदधिष्ठातुं बिभ्रद्रूपं हिरण्मयम् ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने विमान की परिक्रमा और पूजा की, पार्षदों को प्रणाम किया और स्वर्णप्रभा वाले दिव्य रूप से उसमें चढ़ने को उद्यत हुए।

श्लोक 12.30

तदोत्तानपदः पुत्रो ददर्शान्तकमागतम् । मृत्योर्मूर्ध्नि पदं दत्त्वा आरुरोहाद्भुतं गृहम् ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: तभी उन्हें मृत्यु सामने दिखाई दी। कथा कहती है कि ध्रुव मृत्यु के मस्तक पर चरण रखकर उस अद्भुत विमान में चढ़ गए—यह उनकी मृत्युविजय का चित्रण है।

श्लोक 12.31

तदा दुन्दुभयो नेदुर्मृदङ्गपणवादयः । गन्धर्वमुख्याः प्रजगुः पेतुः कुसुमवृष्टयः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: दुन्दुभि, मृदङ्ग और पणव बजे; गन्धर्वों ने गीत गाए और पुष्पवर्षा हुई।

श्लोक 12.32

स च स्वर्लोकमारोक्ष्यन् सुनीतिं जननीं ध्रुवः । अन्वस्मरदगं हित्वा दीनां यास्ये त्रिविष्टपम् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: दिव्यलोक जाते समय ध्रुव को माता सुनीति याद आईं। उन्होंने सोचा—मैं अपनी असहाय माता को छोड़कर कैसे चला जाऊँ?

श्लोक 12.33

इति व्यवसितं तस्य व्यवसाय सुरोत्तमौ । दर्शयामासतुर्देवीं पुरो यानेन गच्छतीम् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनका भाव जानकर दोनों पार्षदों ने दिखाया कि सुनीति भी आगे दूसरे विमान से जा रही हैं।

श्लोक 12.34

तत्र तत्र प्रशंसद्भिः पथि वैमानिकैः सुरैः । अवकीर्यमाणो ददृशे कुसुमैः क्रमशो ग्रहान् ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मार्ग में विमानों पर स्थित देवता उनकी प्रशंसा और पुष्पवर्षा करते रहे। वे क्रमशः विभिन्न ग्रहलोकों को देखते हुए आगे बढ़े।

श्लोक 12.35

त्रिलोकीं देवयानेन सोऽतिव्रज्य मुनीनपि । परस्ताद्यद्ध्रुवगतिर्विष्णोः पदमथाभ्यगात् ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवयान मार्ग से तीनों लोक और ऋषियों के लोक पार करके वे उस विष्णुपद को पहुँचे, जो ध्रुव की अचल गति है।

श्लोक 12.36

यद्भ्राजमानं स्वरुचैव सर्वतो लोकास्त्रयो ह्यनुविभ्राजन्त एते । यन्नाव्रजन् जन्तुषु येऽननुग्रहा व्रजन्ति भद्राणि चरन्ति येऽनिशम् ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह अपनी ही ज्योति से प्रकाशित है और उससे तीनों लोक प्रकाशित होते हैं। निर्दयी लोग वहाँ नहीं पहुँचते; नित्य शुभ आचरण करने वाले वहाँ जाते हैं।

श्लोक 12.37

शान्ताः समदृशः शुद्धाः सर्वभूतानुरञ्जनाः । यान्त्यञ्जसाच्युतपदमच्युतप्रियबान्धवाः ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: शान्त, समदर्शी, निर्मल और सब प्राणियों को सुख देने वाले, भगवान को ही प्रिय बन्धु मानने वाले भक्त सहज अच्युतपद प्राप्त करते हैं।

श्लोक 12.38

इत्युत्तानपदः पुत्रो ध्रुवः कृष्णपरायणः । अभूत्त्रयाणां लोकानां चूडामणिरिवामलः ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार कृष्णपरायण ध्रुव तीनों लोकों के निर्मल चूड़ामणि के समान हुए।

श्लोक 12.39

गम्भीरवेगोऽनिमिषं ज्योतिषां चक्रमाहितम् । यस्मिन् भ्रमति कौरव्य मेढ्यामिव गवां गणः ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर, पुराण के वर्णन में गम्भीर वेग वाला ज्योतिश्चक्र उनके चारों ओर निरन्तर घूमता है, जैसे खूँटे के चारों ओर बैल घूमते हैं।

श्लोक 12.40

महिमानं विलोक्यास्य नारदो भगवान् ऋषिः । आतोद्यं वितुदञ्श्लोकान् सत्रेऽगायत्प्रचेतसाम् ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव की यह महिमा देखकर नारद ने प्रचेताओं के यज्ञ में वीणा बजाते हुए उनके यश का गान किया।

श्लोक 12.41

नारद उवाच । नूनं सुनीतेः पतिदेवताया- स्तपःप्रभावस्य सुतस्य तां गतिम् । दृष्ट्वाभ्युपायानपि वेदवादिनो नैवाधिगन्तुं प्रभवन्ति किं नृपाः ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारद बोले—पतिव्रता सुनीति के तपस्वी पुत्र की गति देखकर बड़े वेदज्ञ भी उसे पाने के उपाय पूरी तरह नहीं जान सकते; साधारण राजाओं की तो बात ही क्या!

श्लोक 12.42

यः पञ्चवर्षो गुरुदारवाक्शरै- र्भिन्नेन यातो हृदयेन दूयता । वनं मदादेशकरोऽजितं प्रभुं जिगाय तद्भक्तगुणैः पराजितम् ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: सौतेली माता के वचनबाणों से घायल पाँच वर्ष का वह बालक वन गया, मेरे उपदेश का पालन किया और भक्तगुणों से वश होने वाले अजेय भगवान को प्रसन्न कर लिया।

श्लोक 12.43

यः क्षत्रबन्धुर्भुवि तस्याधिरूढ- मन्वारुरुक्षेदपि वर्षपूगैः । षट्पञ्चवर्षो यदहोभिरल्पैः प्रसाद्य वैकुण्ठमवाप तत्पदम् ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिस पद को उसने पाँच–छह वर्ष की आयु में थोड़े दिनों में वैकुण्ठनाथ को प्रसन्न करके पाया, वहाँ दूसरे राजा वर्षों प्रयत्न करके भी कैसे पहुँच सकते हैं!

श्लोक 12.44

मैत्रेय उवाच । एतत्तेऽभिहितं सर्वं यत्पृष्टोऽहमिह त्वया । ध्रुवस्योद्दामयशसश्चरितं सम्मतं सताम् ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—विदुर, तुम्हारे पूछने पर मैंने संतों द्वारा प्रशंसित महान यशस्वी ध्रुव का पूरा चरित्र सुनाया।

श्लोक 12.45

धन्यं यशस्यमायुष्यं पुण्यं स्वस्त्ययनं महत् । स्वर्ग्यं ध्रौव्यं सौमनस्यं प्रशस्यमघमर्षणम् ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह कथा धन्यता, यश, शुभ आयु, पुण्य, मंगल, स्वर्गीय कल्याण, स्थिरता, प्रसन्नता और पापशुद्धि देने वाली कही गई है।

श्लोक 12.46

श्रुत्वैतच्छ्रद्धयाभीक्ष्णमच्युतप्रियचेष्टितम् । भवेद्भक्तिर्भगवति यया स्यात्क्लेशसङ्क्षयः ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के प्रिय भक्त के इस चरित्र को बार–बार श्रद्धा से सुनने पर भगवान में भक्ति बढ़ती है, जिससे क्लेश घटते हैं।

श्लोक 12.47

महत्त्वमिच्छतां तीर्थं श्रोतुः शीलादयो गुणाः । यत्र तेजस्तदिच्छूनां मानो यत्र मनस्विनाम् ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उत्कर्ष चाहने वाले श्रोता के लिए यह कथा तीर्थ समान है; उससे शील आदि गुण, तेज और उदारचित्त लोगों का सम्मान प्राप्त होता है।

श्लोक 12.48

प्रयतः कीर्तयेत्प्रातः समवाये द्विजन्मनाम् । सायं च पुण्यश्लोकस्य ध्रुवस्य चरितं महत् ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: पवित्र होकर ज्ञानियों की सभा में प्रातः और सायं पुण्यश्लोक ध्रुव की महान कथा का कीर्तन करना चाहिए।

श्लोक 12.49

पौर्णमास्यां सिनीवाल्यां द्वादश्यां श्रवणेऽथवा । दिनक्षये व्यतीपाते सङ्क्रमेऽर्कदिनेऽपि वा ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: पूर्णिमा, अमावस्या, द्वादशी, श्रवण नक्षत्र, तिथि के अन्त, व्यतीपात, संक्रान्ति और रविवार जैसे अवसरों का कथा में विशेष उल्लेख है।

श्लोक 12.50

श्रावयेच्छ्रद्दधानानां तीर्थपादपदाश्रयः । नेच्छंस्तत्रात्मनाऽऽत्मानं सन्तुष्ट इति सिध्यति ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के चरणों का आश्रय लेकर श्रद्धालुओं को यह कथा निष्काम भाव से सुनाए। आत्मतृप्त कथावाचक ऐसी सेवा से सिद्धि पाता है।

श्लोक 12.51

ज्ञानमज्ञाततत्त्वाय यो दद्यात्सत्पथेऽमृतम् । कृपालोर्दीननाथस्य देवास्तस्यानुगृह्णते ॥ ५१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो करुणामय व्यक्ति तत्त्व न जानने वाले को सत्पथ पर ले जाने वाला अमृततुल्य ज्ञान देता है, उस दीनहितैषी पर देवता भी कृपा करते हैं।

श्लोक 12.52

इदं मया तेऽभिहितं कुरूद्वह ध्रुवस्य विख्यातविशुद्धकर्मणः । हित्वार्भकः क्रीडनकानि मातु- र्गृहं च विष्णुं शरणं यो जगाम ॥ ५२॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर, यही ध्रुव के विख्यात और शुद्ध कर्मों की कथा मैंने सुनाई—वह बालक जिसने खिलौने और माता का घर छोड़कर भगवान विष्णु की शरण ली थी।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 12 समाप्त ॥

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इस भाग का भक्ति-सन्देश

ध्रुव का चरित्र दृढ़ भक्ति के साथ अन्तःकरण के परिवर्तन की कथा है। मान–प्रतिष्ठा की इच्छा भगवान के दर्शन से प्रेम में बदलती है। मनु सहनशीलता, करुणा, मैत्री और समता को भगवान की प्रसन्नता का मार्ग बताते हैं; अन्त में ध्रुव अचल हरिस्मरण माँगते हैं।

पाठाधार और संपादकीय जानकारी

प्राचीन मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents का “श्रीमद्भागवतं—चतुर्थस्कन्धः” है। अध्याय 8–12 में क्रमशः 82, 67, 30, 35 और 52 श्लोक हैं; कुल 266। हिंदी भावार्थ स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है, किसी आधुनिक टीका की प्रतिलिपि नहीं। ध्रुव की बाल्यावस्था की तपस्या, अत्यल्प आहार और प्राणनिरोध पौराणिक वृत्तान्त हैं, व्यवहार में अपनाने की साधना या स्वास्थ्यविधि नहीं। ध्रुवलोक, दिव्य आयु और ज्योतिश्चक्र का वर्णन पुराण के लोकविन्यास के अनुसार है। युद्ध के बाद मनु का उपदेश निर्दोषों के वध और सामूहिक प्रतिशोध को स्पष्टतः अनुचित बताता है।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • भाग २ समाप्त ॥

॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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