श्रीमद्भागवत महापुराण चतुर्थ स्कन्ध भाग 2 — अध्याय 8–12, ध्रुव चरित्र और ध्रुव स्तुति
श्रीमद्भागवत महापुराण
चतुर्थ स्कन्ध • भाग २ • अध्याय ८–१२
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बालक की दृढ़ भक्ति से अचल परम पद तक
सौतेली माता के कठोर वचनों से व्यथित ध्रुव को माता सुनीति और देवर्षि नारद भगवान की शरण का मार्ग बताते हैं। ध्रुव तपस्या से भगवान के दर्शन पाते हैं; फिर मनु का उपदेश उन्हें क्रोध और सामूहिक प्रतिशोध से मुक्त करता है। कुबेर से वे धन नहीं, हरि की अचल स्मृति माँगते हैं।
इस भाग में अध्याय 8–12 के सभी 266 श्लोक और प्रत्येक का स्वतंत्र सरल हिंदी भावार्थ है। ध्रुव स्तुति अध्याय 9 के श्लोक 6–17 में पढ़ें। आगे पृथु चरित्र आएगा।
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 8
ध्रुव की वनयात्रा, नारद उपदेश और तपस्या
श्लोक 8.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—ब्रह्मा के पुत्र सनकादि, नारद, ऋभु, हंस, अरुणि और यति आजीवन ब्रह्मचारी रहे; उन्होंने गृहस्थाश्रम नहीं अपनाया।
श्लोक 8.2
सरल हिंदी भावार्थ: अधर्म की पत्नी मृषा से दम्भ और माया नामक जुड़वाँ सन्तान हुईं, जिन्हें सन्तानहीन निरृति ने अपनाया। यह दुर्गुणों का प्रतीकात्मक वंशवर्णन है।
श्लोक 8.3
सरल हिंदी भावार्थ: दम्भ और माया से लोभ तथा निकृति अर्थात छल उत्पन्न हुए; उनसे क्रोध और हिंसा तथा आगे दुरुक्ति और कलि हुए।
श्लोक 8.4
सरल हिंदी भावार्थ: कलि और दुरुक्ति से भय तथा मृत्यु और उनसे यातना तथा निरय उत्पन्न हुए। इस रूपक में अधर्म से दुःख की वृद्धि बताई गई है।
श्लोक 8.5
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर, मैंने सृष्टि का यह संक्षिप्त विस्तार बताया। इसका श्रद्धापूर्वक तीन बार श्रवण आत्ममल दूर करने वाला कहा गया है।
श्लोक 8.6
सरल हिंदी भावार्थ: अब भगवान के अंश से उत्पन्न पुण्यकीर्ति स्वायम्भुव मनु के वंश की कथा कहता हूँ।
श्लोक 8.7
सरल हिंदी भावार्थ: शतरूपा के पति मनु के दो पुत्र प्रियव्रत और उत्तानपाद थे। वे वासुदेव की शक्ति से जगत की रक्षा के कार्य में स्थित थे।
श्लोक 8.8
सरल हिंदी भावार्थ: उत्तानपाद की दो पत्नियाँ सुनीति और सुरुचि थीं। राजा सुरुचि को अधिक प्रिय मानते थे; सुनीति के पुत्र ध्रुव थे।
श्लोक 8.9
सरल हिंदी भावार्थ: एक बार राजा सुरुचि के पुत्र उत्तम को गोद में खिलाते रहे, पर गोद में चढ़ना चाहने वाले ध्रुव का स्वागत नहीं किया।
श्लोक 8.10
सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव को वैसा करते देखकर अत्यन्त अभिमानी सुरुचि ने राजा के सुनते हुए ईर्ष्याभरे वचन कहे।
श्लोक 8.11
सरल हिंदी भावार्थ: उसने कहा—बेटा, राजा के पुत्र होते हुए भी तुम उनकी गोद या राजासन के अधिकारी नहीं, क्योंकि तुम मेरे गर्भ से नहीं जन्मे हो।
श्लोक 8.12
सरल हिंदी भावार्थ: तुम अभी बच्चे हो; शायद नहीं जानते कि दूसरी स्त्री से जन्म लेने के कारण जिस पद की इच्छा कर रहे हो, वह तुम्हारे लिए दुर्लभ है।
श्लोक 8.13
सरल हिंदी भावार्थ: यदि राजासन चाहते हो तो तप करके परम पुरुष को प्रसन्न करो और उनकी कृपा से मेरे गर्भ में जन्म प्राप्त करो। यह सुरुचि का अपमानजनक कथन था।
श्लोक 8.14
सरल हिंदी भावार्थ: सौतेली माता के कठोर वचनों से आहत ध्रुव, डण्डे से मारे सर्प की तरह क्रोध से साँस लेने लगे। मौन देखते पिता को छोड़ वे रोते हुए अपनी माँ के पास गए।
श्लोक 8.15
सरल हिंदी भावार्थ: सुनीति ने काँपते ओठों और भारी साँसों वाले बालक को गोद में उठाया। लोगों से सुरुचि के वचन सुनकर वे बहुत दुखी हुईं।
श्लोक 8.16
सरल हिंदी भावार्थ: शोक की अग्नि में लता के समान व्याकुल होकर वे धैर्य खो बैठीं और रोने लगीं। सौत के शब्द याद आते ही उनकी कमल जैसी आँखों में आँसू भर गए।
श्लोक 8.17
सरल हिंदी भावार्थ: दुःख से निकलने का उपाय न देखकर उन्होंने गहरी साँस ली और कहा—बेटा, किसी का अमंगल मत चाहो; दूसरों को दुःख देने वाला स्वयं उसका फल भोगता है।
श्लोक 8.18
सरल हिंदी भावार्थ: तुम मुझ उपेक्षित स्त्री के गर्भ से जन्मे और मेरे दूध से पले हो; राजा मुझे पत्नी कहने में भी संकोच करते हैं। सुरुचि ने हमारी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति का यही उल्लेख किया है।
श्लोक 8.19
सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी उसकी बात में जो सत्य उपाय है, उसे ईर्ष्या छोड़े हुए अपनाओ। यदि उत्तम जैसा स्थान चाहते हो तो भगवान के चरणकमलों की आराधना करो।
श्लोक 8.20
सरल हिंदी भावार्थ: उन चरणों की सेवा से ब्रह्मा को सृष्टिरचना का सर्वोच्च पद मिला, जिसकी वन्दना संयमी मुनि भी करते हैं।
श्लोक 8.21
सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारे पितामह मनु ने भी एकाग्रता और उदार दक्षिणाओं वाले यज्ञों से उन्हीं की पूजा करके सांसारिक सुख, दिव्य सुख और मुक्ति प्राप्त की, जो दूसरे उपायों से कठिन हैं।
श्लोक 8.22
सरल हिंदी भावार्थ: बेटा, भक्तवत्सल परम पुरुष की शरण लो। मुक्ति चाहने वाले जिन चरणों का मार्ग खोजते हैं, उन्हें अपने धर्म से शुद्ध मन में अनन्यभाव से स्थापित करके भजो।
श्लोक 8.23
सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारा दुःख दूर करने वाला उन कमलनयन प्रभु के अतिरिक्त मुझे कोई नहीं दिखता। जिन लक्ष्मी को जगत चाहता है, वे स्वयं कमल लेकर उनकी सेवा खोजती हैं।
श्लोक 8.24
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—माता के सार्थक वचन सुनकर ध्रुव ने मन को दृढ़ किया और पिता की नगरी से निकल पड़े।
श्लोक 8.25
सरल हिंदी भावार्थ: नारद ने समाचार सुनकर और ध्रुव का संकल्प जानकर आश्चर्य किया। उन्होंने पापहर हाथ बालक के मस्तक पर रखकर कहा।
श्लोक 8.26
सरल हिंदी भावार्थ: क्षत्रिय स्वभाव का तेज देखो! यह छोटा बालक भी सौतेली माता के अपमानजनक वचन मन में रखे है और मानभङ्ग सह नहीं पा रहा।
श्लोक 8.27
सरल हिंदी भावार्थ: नारद बोले—पुत्र, अभी तो तुम खेलने की आयु के बच्चे हो; तुम्हारे लिए मान–अपमान का गहरा विचार उचित समय से पहले है।
श्लोक 8.28
सरल हिंदी भावार्थ: संसार में कर्मफल से भिन्न–भिन्न स्थितियाँ आती हैं, पर असन्तोष का मूल कारण बाहरी भेद से अधिक मन का मोह है।
श्लोक 8.29
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए बुद्धिमान को ईश्वर की व्यवस्था समझकर दैव से जो प्राप्त हो, उतने में सन्तोष रखना चाहिए।
श्लोक 8.30
सरल हिंदी भावार्थ: यदि माता के बताए उपाय से भगवान की कृपा पाना चाहते हो, तो जानो कि उनकी आराधना मनुष्यों के लिए बहुत कठिन मानी जाती है।
श्लोक 8.31
सरल हिंदी भावार्थ: अनासक्त मुनि अनेक जन्मों तक तीव्र योग और समाधि से खोजते हुए भी उनकी गति पूरी नहीं जान पाते।
श्लोक 8.32
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए अभी यह कठिन आग्रह छोड़कर लौट जाओ। कल्याण की साधना के अनुकूल समय आने पर प्रयत्न करना।
श्लोक 8.33
सरल हिंदी भावार्थ: जो मनुष्य भाग्य से मिले सुख–दुःख में अपने मन को सन्तुष्ट रखता है, वह अज्ञान के पार पहुँच सकता है।
श्लोक 8.34
सरल हिंदी भावार्थ: अपने से अधिक गुणवान से प्रसन्नता, कम गुणवान पर करुणा और समान गुणवान से मित्रता रखो; तब मन अनेक तापों से बचता है।
श्लोक 8.35
सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव बोले—आपने कृपा करके सुख–दुःख से पीड़ित लोगों को शान्ति का मार्ग दिखाया है, पर हम जैसे लोगों के लिए उसका अनुभव कठिन है।
श्लोक 8.36
सरल हिंदी भावार्थ: मेरा मन अभी अशान्त और क्षत्रिय गर्व से भरा है। सुरुचि के वचनबाणों से घायल हृदय में आपकी शान्ति की शिक्षा अभी ठहर नहीं रही।
श्लोक 8.37
सरल हिंदी भावार्थ: गुरुदेव, मुझे ऐसा उत्तम मार्ग बताइए जिससे तीनों लोकों से ऊँचा वह पद पाऊँ, जहाँ मेरे पूर्वज और अन्य लोग भी न पहुँचे हों।
श्लोक 8.38
सरल हिंदी भावार्थ: आप ब्रह्मा के पुत्र हैं और सूर्य की तरह जगत का हित करते हुए वीणा बजाकर भ्रमण करते हैं; आप ही मुझे मार्ग दिखा सकते हैं।
श्लोक 8.39
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—बालक के ये वचन सुनकर नारद प्रसन्न हुए और करुणा से उसे हितकारी उपदेश दिया।
श्लोक 8.40
सरल हिंदी भावार्थ: नारद बोले—माता ने जो मार्ग बताया है वही तुम्हारे परम कल्याण का है। भगवान वासुदेव को सर्वथा समर्पित मन से भजो।
श्लोक 8.41
सरल हिंदी भावार्थ: जो धर्म, अर्थ, काम अथवा मोक्ष के रूप में अपना कल्याण चाहता है, उसके लिए हरि के चरणों की सेवा ही मूल साधन है।
श्लोक 8.42
सरल हिंदी भावार्थ: तुम यमुना के पवित्र तट पर मधुवन जाओ; वहाँ भगवान हरि का सान्निध्य नित्य है। तुम्हारा मंगल हो।
श्लोक 8.43
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ यमुना के पवित्र जल में नियत समयों पर स्नान करके आवश्यक आचरण पूर्ण करो और उपयुक्त आसन पर निवास करो।
श्लोक 8.44
सरल हिंदी भावार्थ: नारद ने ध्रुव को क्रमबद्ध प्राणायाम से प्राण, इन्द्रिय और मन की अशुद्धि घटाकर स्थिर चित्त से परम गुरु का ध्यान करने का उपदेश दिया।
श्लोक 8.45
सरल हिंदी भावार्थ: उनका मुख और नेत्र सदा प्रसन्न हैं, वे कृपा करने को उन्मुख हैं; सुन्दर नासिका, भौहें और कपोल उनके दिव्य रूप को शोभा देते हैं।
श्लोक 8.46
सरल हिंदी भावार्थ: वे युवा और रमणीय हैं; उनके अधर और नेत्र अरुण हैं। वे शरणागतों के आश्रय, सामर्थ्यवान और करुणा के सागर हैं।
श्लोक 8.47
सरल हिंदी भावार्थ: उनके वक्ष पर श्रीवत्सचिह्न, वर्ण मेघश्याम और गले में वनमाला है। चार भुजाओं में शङ्ख, चक्र, गदा और कमल धारण करते हैं।
श्लोक 8.48
सरल हिंदी भावार्थ: मस्तक पर किरीट, कानों में कुण्डल, भुजाओं में बाजूबन्द और कङ्कण, कण्ठ में कौस्तुभ तथा शरीर पर पीत रेशमी वस्त्र हैं।
श्लोक 8.49
सरल हिंदी भावार्थ: कमर में करधनी और चरणों में चमकते स्वर्ण नूपुर हैं। उनका शान्त रूप मन और नेत्रों को अपार आनन्द देता है।
श्लोक 8.50
सरल हिंदी भावार्थ: मणियों जैसे चमकते नखों वाले उनके चरण उपासक के हृदयकमल की कर्णिका पर विराजमान हैं; प्रभु भक्त के भीतर स्थित हैं।
श्लोक 8.51
सरल हिंदी भावार्थ: वरदाताओं में श्रेष्ठ उन मुस्कराते और प्रेमभरी दृष्टि से देखते भगवान का संयमित, एकाग्र मन से ध्यान करो।
श्लोक 8.52
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसे परम मंगलमय रूप का ध्यान करने पर मन शीघ्र गहरी तृप्ति पाता है और फिर उससे हटना नहीं चाहता।
श्लोक 8.53
सरल हिंदी भावार्थ: राजकुमार, अब मुझसे परम गोपनीय जपमन्त्र सुनो। कथा में इसके सात रात जप से दिव्य खेचरों का दर्शन होने का फल बताया गया है।
श्लोक 8.54
सरल हिंदी भावार्थ: मन्त्र है—ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। देश–काल का विचार करके इसी मन्त्र से उपलब्ध सामग्रियों द्वारा भगवान की पूजा करो।
श्लोक 8.55
सरल हिंदी भावार्थ: निर्मल जल, पुष्पमाला, वन के मूल–फल, उपयुक्त अङ्कुर, वस्त्र और भगवान को प्रिय तुलसी से अर्चन करो।
श्लोक 8.56
सरल हिंदी भावार्थ: मूर्ति उपलब्ध हो तो उसमें, अन्यथा पृथ्वी या जल आदि में भगवान का पूजन करो। शान्त, मनोनिग्रही, संयतवाणी होकर वन में प्राप्त आहार से सादगी से रहो।
श्लोक 8.57
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान अपनी अचिन्त्य माया से इच्छानुसार अवतार लेकर जो मनोहर लीलाएँ करते हैं, उनका हृदय में ध्यान करो।
श्लोक 8.58
सरल हिंदी भावार्थ: पूर्व भक्तों ने भगवान की जो–जो सेवाएँ की हैं, उन्हें इस मन्त्र का भाव मन में रखते हुए मन्त्रमूर्ति प्रभु को समर्पित करो।
श्लोक 8.59
सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार शरीर, मन और वाणी से, मन में बसे भगवान की भक्तिपूर्ण सेवा की जाती है।
श्लोक 8.60
सरल हिंदी भावार्थ: निष्कपट और सम्यक भजन करने वालों का प्रेम बढ़ाकर भगवान उन्हें धर्म आदि में अभिलषित कल्याण प्रदान करते हैं।
श्लोक 8.61
सरल हिंदी भावार्थ: जो इन्द्रियसुख से विरक्त हो, वह गहन भक्तियोग और निरन्तर प्रेम से भगवान का भजन करे; इससे वास्तविक मुक्ति मिलती है।
श्लोक 8.62
सरल हिंदी भावार्थ: यह उपदेश पाकर राजकुमार ध्रुव ने नारद की परिक्रमा और प्रणाम किया तथा भगवान के चरणों से पवित्र मधुवन चले गए।
श्लोक 8.63
सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव के तपोवन जाने के बाद नारद राजा के अन्तःपुर पहुँचे। राजा ने उनका आदर किया; आसन पर बैठकर मुनि ने पूछा।
श्लोक 8.64
सरल हिंदी भावार्थ: नारद बोले—राजन्, आपका मुख क्यों सूखा है और आप किस गहरी चिन्ता में हैं? क्या धर्म, अर्थ या कोई इच्छा बाधित हुई है?
श्लोक 8.65
सरल हिंदी भावार्थ: राजा बोले—गुरुदेव, पत्नी के वश में और निर्दयी होकर मैंने अपनी उपेक्षित रानी के साथ पाँच वर्ष के बुद्धिमान पुत्र का भी तिरस्कार किया; अब वह चला गया है।
श्लोक 8.66
सरल हिंदी भावार्थ: वह बालक वन में अनाथ, थका, भूखा और मुरझाए मुख वाला सो रहा होगा। कहीं भेड़िए उसे खा न लें!
श्लोक 8.67
सरल हिंदी भावार्थ: मेरी दुष्टता देखिए—पत्नी के मोह में मैंने प्रेम से गोद में चढ़ना चाहने वाले अपने बच्चे का स्वागत भी नहीं किया।
श्लोक 8.68
सरल हिंदी भावार्थ: नारद बोले—पुत्र के लिए शोक मत करो। भगवान उसकी रक्षा कर रहे हैं; तुम उसका प्रभाव नहीं जानते। उसका यश जगत में फैलेगा।
श्लोक 8.69
सरल हिंदी भावार्थ: वह शीघ्र ऐसा कठिन कार्य करके लौटेगा जिसे लोकपाल भी आसानी से नहीं कर सकते, और तुम्हारा यश बढ़ाएगा।
श्लोक 8.70
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—देवर्षि के वचन सुनकर राजा ने राज्यवैभव से मन हटाया और पुत्र का ही चिन्तन करने लगे।
श्लोक 8.71
सरल हिंदी भावार्थ: उधर ध्रुव ने मधुवन में स्नान किया, वह रात उपवास से बिताई और एकाग्र होकर गुरु के निर्देश के अनुसार भगवान की सेवा की।
श्लोक 8.72
सरल हिंदी भावार्थ: पहले महीने वे हर तीसरे दिन शरीरनिर्वाह के लिए कैथ और बेर खाते हुए हरि की पूजा करते रहे। यह ध्रुव की पौराणिक तपस्या का वर्णन है।
श्लोक 8.73
सरल हिंदी भावार्थ: दूसरे महीने बालक ने हर छठे दिन सूखी घास और पत्ते आदि लेकर भगवान की आराधना की।
श्लोक 8.74
सरल हिंदी भावार्थ: तीसरे महीने वे हर नौवें दिन केवल जल लेते और समाधि से उत्तमश्लोक भगवान की उपासना करते रहे।
श्लोक 8.75
सरल हिंदी भावार्थ: चौथे महीने वे हर बारहवें दिन वायु पर निर्वाह करते हुए श्वास संयम और ध्यान में स्थित रहे, ऐसा कथा में कहा गया है।
श्लोक 8.76
सरल हिंदी भावार्थ: पाँचवें महीने में राजकुमार श्वास संयमित करके एक पैर पर वृक्ष की तरह अचल खड़े रहे और ब्रह्म का ध्यान करने लगे।
श्लोक 8.77
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने मन को सब ओर से हटाकर हृदय में स्थित भगवान के रूप में लगाया; उन्हें अन्य कोई वस्तु दिखाई नहीं देती थी।
श्लोक 8.78
सरल हिंदी भावार्थ: महत्तत्त्व आदि के आधार और प्रकृति–पुरुष के अधीश्वर परम ब्रह्म में उनकी धारणा स्थिर हुई तो तीनों लोक काँप उठे।
श्लोक 8.79
सरल हिंदी भावार्थ: उनके एक पैर के अँगूठे के दबाव से पृथ्वी उसी ओर झुकती दिखाई दी, जैसे विशाल हाथी चढ़ने से नाव एक ओर झुक जाती है। यह तपोमहिमा का पौराणिक चित्रण है।
श्लोक 8.80
सरल हिंदी भावार्थ: विश्वात्मा भगवान में अनन्य ध्यान और प्राणनिरोध से उनका चित्त एक हुआ तो लोकों के प्राण भी रुकने लगे। देवता और लोकपाल व्याकुल होकर हरि की शरण गए।
श्लोक 8.81
सरल हिंदी भावार्थ: देवता बोले—प्रभु, चराचर जगत का ऐसा प्राणावरोध हमने नहीं जाना। हम आपकी शरण आए हैं; इस संकट से मुक्त कीजिए।
श्लोक 8.82
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने कहा—डरो मत, अपने लोकों को लौटो। उत्तानपाद का पुत्र मुझमें एकाग्र हो गया है, इसलिए यह हुआ; मैं उसे इस अत्यन्त कठिन तप से निवृत्त करूँगा।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 8 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 9
भगवान के दर्शन, ध्रुव स्तुति और नगरागमन
श्लोक 9.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—भय मिटने पर देवता भगवान को प्रणाम करके स्वर्ग लौट गए। भगवान अपने भक्त को देखने के लिए गरुड़ पर बैठकर मधुवन पहुँचे।
श्लोक 9.2
सरल हिंदी भावार्थ: गहन योग से ध्रुव के हृदयकमल में बिजली जैसे प्रकाश वाला जो रूप दिखाई देता था, वह अचानक अन्तर्धान हो गया। ध्रुव ने आँखें खोलीं तो वही रूप सामने खड़ा था।
श्लोक 9.3
सरल हिंदी भावार्थ: दर्शन से विस्मित बालक ने भूमि पर साष्टाङ्ग प्रणाम किया। वह ऐसी तन्मयता से देख रहा था मानो आँखों से रूप पी रहा हो, मुख से चूम रहा हो और भुजाओं से आलिङ्गन कर रहा हो।
श्लोक 9.4
सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव स्तुति करना चाहते थे पर विधि नहीं जानते थे। सबके हृदय में स्थित हरि ने यह जानकर कृपा से अपने वेदमय शङ्ख से उनके कपोल को स्पर्श किया।
श्लोक 9.5
सरल हिंदी भावार्थ: उसी क्षण उन्हें दिव्य वाणी और परमात्मतत्त्व का बोध हुआ। भक्ति से भरकर उन्होंने धीर भाव से विश्वविख्यात भगवान की स्तुति की।
श्लोक 9.6
सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव बोले—आप अपनी शक्ति से मेरे भीतर प्रवेश करके सोई हुई वाणी, हाथ, पैर, कान, त्वचा और प्राणों को चेतना देते हैं। उन सर्वशक्तिमान परम पुरुष को प्रणाम है।
श्लोक 9.7
सरल हिंदी भावार्थ: आप अकेले ही अपनी गुणमयी माया से महत्तत्त्व आदि सम्पूर्ण जगत रचते और उसमें प्रवेश करते हैं। अनेक लकड़ियों में एक अग्नि की तरह आप विविध रूपों में प्रकाशित होते हैं।
श्लोक 9.8
सरल हिंदी भावार्थ: आपसे मिला ज्ञान पाकर ब्रह्मा ने जागे हुए व्यक्ति की तरह जगत को देखा। दुःखियों के मित्र, आपका उपकार जानने वाला कौन आपके मुक्तिदायी चरण भूल सकता है?
श्लोक 9.9
सरल हिंदी भावार्थ: जो जन्म–मरण से मुक्त करने वाले कल्पवृक्ष प्रभु को केवल देह के विषयसुख के लिए पूजते हैं, उनकी बुद्धि माया ने हर ली है; वैसे क्षणिक सुख नीच योनियों में भी मिलते हैं।
श्लोक 9.10
सरल हिंदी भावार्थ: आपके चरणों का ध्यान और भक्तों से आपकी कथा सुनकर जो तृप्ति मिलती है, वह केवल निर्विशेष ब्रह्मानुभव में भी वैसी नहीं; फिर नश्वर स्वर्ग के सुख की क्या तुलना!
श्लोक 9.11
सरल हिंदी भावार्थ: अनन्त प्रभु, मुझे निर्मल हृदय और निरन्तर भक्ति करने वाले महात्माओं का सङ्ग मिले। आपकी गुणकथा का अमृत पीकर मैं कठिन दुःखों वाले संसारसागर को सहज पार कर लूँगा।
श्लोक 9.12
सरल हिंदी भावार्थ: आपके चरणों की सुगन्ध से आकृष्ट भक्तों का सङ्ग पाने वाले लोग अत्यन्त प्रिय शरीर और उससे जुड़े पुत्र, मित्र, घर, धन तथा पत्नी की आसक्ति में नहीं डूबे रहते।
श्लोक 9.13
सरल हिंदी भावार्थ: अजन्मा प्रभु, पशु, पर्वत, पक्षी, सरीसृप, देव, दैत्य और मनुष्य आदि तथा महत्तत्त्व से बने स्थूल जगतरूप को मैं जानता हूँ; पर विवाद से परे आपके परम स्वरूप को नहीं जानता।
श्लोक 9.14
सरल हिंदी भावार्थ: कल्पान्त में आप जगत को अपने भीतर लेकर शेषनाग पर शयन करते हैं; आपकी नाभि से निकले स्वर्णिम लोककमल में ब्रह्मा प्रकट होते हैं। उन स्वप्रकाश भगवान को प्रणाम है।
श्लोक 9.15
सरल हिंदी भावार्थ: आप नित्यमुक्त, निर्मल, पूर्ण जाग्रत आत्मा, अविकारी आदिपुरुष और गुणों के अधीश्वर हैं। अखण्ड ज्ञान से बुद्धि की अवस्थाओं के साक्षी रहते हुए भी आप उनसे अलग हैं।
श्लोक 9.16
सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञान आदि परस्पर भिन्न शक्तियाँ अन्ततः जिनमें एक आधार पाती हैं, उस विश्वकारण, अनन्त, आद्य, आनन्दमात्र और निर्विकार ब्रह्म की मैं शरण लेता हूँ।
श्लोक 9.17
सरल हिंदी भावार्थ: आपके चरण ही सच्चा वरदान और समस्त पुरुषार्थों की पूर्ति हैं। फिर भी दीन भक्तों पर कृपा करने को उत्सुक आप हमारी ऐसे रक्षा करते हैं जैसे रँभाती गाय अपने बछड़े की करती है।
श्लोक 9.18
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—शुद्ध संकल्प वाले बुद्धिमान ध्रुव की स्तुति सुनकर भक्तप्रिय भगवान ने प्रसन्नतापूर्वक उनसे कहा।
श्लोक 9.19
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान बोले—सुव्रती राजकुमार, मैं तुम्हारे हृदय का संकल्प जानता हूँ। दूसरों के लिए दुर्लभ वह पद तुम्हें देता हूँ; तुम्हारा कल्याण हो।
श्लोक 9.20
सरल हिंदी भावार्थ: वह तेजस्वी ध्रुवस्थान किसी अन्य ने प्राप्त नहीं किया। उसमें ग्रहों, नक्षत्रों और तारों का ज्योतिश्चक्र स्थित है।
श्लोक 9.21
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे खूँटे के चारों ओर बैलों का चक्र घूमता है, वैसे धर्म, अग्नि, कश्यप, शुक्र और सप्तर्षि आदि तारों सहित उस स्थिर स्थान की परिक्रमा करते हैं। यह पुराण का लोकविन्यास है।
श्लोक 9.22
सरल हिंदी भावार्थ: पिता तुम्हें पृथ्वी का राज्य देकर वन जाएँगे। तुम धर्म में स्थित और इन्द्रियों की शक्ति अक्षुण्ण रखते हुए छत्तीस हजार वर्ष उसका पालन करोगे।
श्लोक 9.23
सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारा भाई उत्तम शिकार के समय मारा जाएगा। उसकी माता उसे खोजती हुई वन में जाएँगी और दावाग्नि में उनका अन्त होगा।
श्लोक 9.24
सरल हिंदी भावार्थ: तुम उदार दक्षिणाओं वाले यज्ञों से मुझ यज्ञात्मा की पूजा करोगे, शुभ भोग प्राप्त करोगे और अन्तकाल में मेरा स्मरण करोगे।
श्लोक 9.25
सरल हिंदी भावार्थ: फिर ऋषियों के लोकों से ऊपर, सबके वन्दनीय मेरे स्थान को प्राप्त करोगे, जहाँ पहुँचकर फिर संसार में लौटना नहीं होता।
श्लोक 9.26
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—इस प्रकार बालक को अपना पद देकर भगवान, उसके देखते–देखते अपने धाम को चले गए।
श्लोक 9.27
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान की चरणसेवा से अपना इच्छित और मनोकामना शान्त करने वाला पद पाकर भी ध्रुव अत्यधिक प्रसन्न नहीं थे; वे नगर लौटने लगे।
श्लोक 9.28
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर ने पूछा—एक ही जन्म में भगवान की आराधना से दुर्लभ परम पद पाकर भी ध्रुव अपने को असफल जैसा क्यों मानने लगे?
श्लोक 9.29
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—सौतेली माता के वचनबाणों को याद करते हुए उन्होंने मुक्तिदाता भगवान से मुक्ति नहीं चाही थी। इसी कारण वे पछताए।
श्लोक 9.30
सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव बोले—सनन्दन आदि ब्रह्मचारी अनेक जन्मों की समाधि से जिन चरणों तक पहुँचते हैं, उनकी छाया मुझे छह महीने में मिल गई; फिर भी भेदबुद्धि लेकर लौट आया।
श्लोक 9.31
सरल हिंदी भावार्थ: मेरी दुर्बुद्धि और दुर्भाग्य देखो! जन्म–मरण हरने वाले भगवान के चरणों में जाकर मैंने नश्वर वस्तु माँगी।
श्लोक 9.32
सरल हिंदी भावार्थ: गिरते हुए और दूसरों की उन्नति न सह सकने वाले देवताओं ने मेरी बुद्धि बिगाड़ दी होगी; मैंने नारद के सत्य वचन भी नहीं माने। यह ध्रुव का पश्चात्तापपूर्ण विचार है।
श्लोक 9.33
सरल हिंदी भावार्थ: माया में सोए हुए की तरह मैंने अभिन्न जगत में भेद देखा और भाई को शत्रु मानकर व्यर्थ हृदय जलाया।
श्लोक 9.34
सरल हिंदी भावार्थ: दुर्लभ तप से विश्वात्मा को प्रसन्न करके भी संसारबन्धन हरने वाले प्रभु से मैंने वही बन्धन माँगा। मेरी प्रार्थना मृत व्यक्ति की चिकित्सा जैसी निष्फल थी।
श्लोक 9.35
सरल हिंदी भावार्थ: स्वतन्त्र आत्मराज्य देने वाले ईश्वर से मैंने अज्ञान में मान–प्रतिष्ठा माँगी, जैसे कोई निर्धन सम्राट से अन्न के छिलके माँगे।
श्लोक 9.36
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—विदुर, तुम्हारे जैसे भगवान के चरणरज का आश्रय लेने वाले लोग उनकी सेवा के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहते; स्वतः प्राप्त मन की समृद्धि में वे तृप्त रहते हैं।
श्लोक 9.37
सरल हिंदी भावार्थ: पुत्र के लौटने का समाचार राजा को मानो मरे हुए के लौटने जैसा लगा। वे पहले विश्वास न कर सके और सोचा—मेरे जैसे अपराधी को इतना मंगल कैसे मिले?
श्लोक 9.38
सरल हिंदी भावार्थ: फिर नारद के वचन याद करके विश्वास किया और हर्ष से भरकर समाचार लाने वाले को बहुमूल्य हार दिया।
श्लोक 9.39
सरल हिंदी भावार्थ: वे उत्तम घोड़ों से जुड़े, सोने से सजे रथ पर चढ़े। ब्राह्मण, कुलवृद्ध, मन्त्री और सम्बन्धी उनके साथ चले।
श्लोक 9.40
सरल हिंदी भावार्थ: शङ्ख, दुन्दुभि, वंशी और वेदध्वनि के बीच पुत्र को देखने की उत्कण्ठा से राजा शीघ्र नगर के बाहर निकले।
श्लोक 9.41
सरल हिंदी भावार्थ: स्वर्णाभूषण पहने रानियाँ सुनीति और सुरुचि भी उत्तम के साथ पालकियों पर बैठकर चलीं।
श्लोक 9.42
सरल हिंदी भावार्थ: उपवन के पास ध्रुव को आते देखकर राजा तुरन्त रथ से उतरे और प्रेमविह्वल होकर उनकी ओर दौड़े।
श्लोक 9.43
सरल हिंदी भावार्थ: बहुत दिनों की उत्कण्ठा से भारी साँस लेते हुए उन्होंने पुत्र को गले लगाया। भगवान के चरणस्पर्श से ध्रुव के पापबन्धन दूर हो चुके थे।
श्लोक 9.44
सरल हिंदी भावार्थ: राजा बार–बार पुत्र का मस्तक सूँघते और आनन्द से निकले शीतल आँसुओं से उसे भिगोते रहे।
श्लोक 9.45
सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव ने पिता के चरणों में प्रणाम किया और आशीर्वाद पाया। फिर दोनों माताओं को सिर झुकाकर प्रणाम किया।
श्लोक 9.46
सरल हिंदी भावार्थ: सुरुचि ने चरणों में झुके बालक को उठाकर गले लगाया और आँसुओं से रुकी वाणी में कहा—चिरंजीवी हो।
श्लोक 9.47
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्री आदि सद्गुणों से जिस पर हरि प्रसन्न हों, उसके प्रति सब जीव स्वयं नम्र हो जाते हैं, जैसे जल अपने आप नीचे की ओर बहता है।
श्लोक 9.48
सरल हिंदी भावार्थ: उत्तम और ध्रुव ने भी प्रेम से एक दूसरे को गले लगाया। दोनों के शरीर रोमाञ्चित हुए और आँखों से आँसू बह निकले।
श्लोक 9.49
सरल हिंदी भावार्थ: माता सुनीति ने प्राणों से प्रिय पुत्र को हृदय से लगाया। उसके स्पर्श की तृप्ति से उनकी सारी चिन्ता दूर हो गई।
श्लोक 9.50
सरल हिंदी भावार्थ: वीर पुत्र की माता के स्तनों से वात्सल्य का दूध और आँखों से शुभ आँसू बहने लगे; ध्रुव उनसे बार–बार भीग गए।
श्लोक 9.51
सरल हिंदी भावार्थ: लोग रानी की प्रशंसा करने लगे—सौभाग्य से तुम्हारा खोया हुआ पुत्र मिल गया। वह तुम्हारा दुःख हरने वाला और पृथ्वी का रक्षक होगा।
श्लोक 9.52
सरल हिंदी भावार्थ: तुमने अवश्य शरणागतों की पीड़ा हरने वाले भगवान की आराधना की है; उनका ध्यान करने वाले धीरजन दुर्जय मृत्यु को भी जीतते हैं।
श्लोक 9.53
सरल हिंदी भावार्थ: लोग ध्रुव का इस प्रकार स्वागत कर रहे थे। राजा ने दोनों भाइयों को हथिनी पर बैठाया और जयगान के बीच प्रसन्न होकर नगर में प्रवेश किया।
श्लोक 9.54
सरल हिंदी भावार्थ: नगर में स्थान–स्थान पर चमकते मकराकार तोरण, गुच्छों वाले केले के स्तम्भ और सुपारी के पौधे सजाए गए थे।
श्लोक 9.55
सरल हिंदी भावार्थ: हर द्वार पर आम के पत्ते, वस्त्र, पुष्पमालाएँ और मोतियों की लड़ियाँ थीं; जलभरे कलश तथा दीपक रखे गए थे।
श्लोक 9.56
सरल हिंदी भावार्थ: प्राकार, प्रवेशद्वार और भवन स्वर्णसज्जा से शोभित थे; ऊँचे महलों के शिखरों की चमक चारों ओर फैल रही थी।
श्लोक 9.57
सरल हिंदी भावार्थ: चौराहे, गलियाँ, बाजार और मार्ग स्वच्छ करके चन्दनजल से सींचे गए थे। लावा, अक्षत, पुष्प, फल और चावल की मंगलभेंटें रखी थीं।
श्लोक 9.58
सरल हिंदी भावार्थ: मार्ग में ध्रुव को देखकर नगर की स्त्रियाँ सरसों, अक्षत, दही, जल, दूर्वा, पुष्प और फल लेकर आगे आती थीं।
श्लोक 9.59
सरल हिंदी भावार्थ: वे स्नेह से आशीर्वाद देती और भेंट अर्पित करती थीं। उनके मधुर गीत सुनते हुए ध्रुव पिता के महल में पहुँचे।
श्लोक 9.60
सरल हिंदी भावार्थ: बहुमूल्य रत्नों से बने उस श्रेष्ठ भवन में पिता का भरपूर स्नेह पाकर वे स्वर्ग के देवता की तरह रहने लगे।
श्लोक 9.61
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ दूध के फेन जैसे सफेद बिछौने, हाथीदाँत और सोने से सजी शय्याएँ, बहुमूल्य आसन तथा स्वर्ण उपकरण थे।
श्लोक 9.62
सरल हिंदी भावार्थ: स्फटिक और विशाल पन्नों की दीवारों पर रत्नदीप चमकते थे; श्रेष्ठ स्त्रियों के आभूषणों की प्रभा भी उनमें मिलती थी।
श्लोक 9.63
सरल हिंदी भावार्थ: रमणीय उद्यानों में विविध दिव्य वृक्ष, जोड़ों में गाते पक्षी और मत्त भ्रमरों की गुंजार थी।
श्लोक 9.64
सरल हिंदी भावार्थ: वैदूर्य की सीढ़ियों वाली बावड़ियाँ कमल, उत्पल और कुमुद से भरी थीं; हंस, कारण्डव, चकवा और सारस उनमें विहार करते थे।
श्लोक 9.65
सरल हिंदी भावार्थ: राजर्षि उत्तानपाद ने पुत्र का अद्भुत प्रभाव सुना और देखा तो वे अत्यन्त विस्मित हुए।
श्लोक 9.66
सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव के युवा होने, मन्त्रियों की स्वीकृति और प्रजा के प्रेम को देखकर राजा ने उन्हें पृथ्वी का राजा बनाया।
श्लोक 9.67
सरल हिंदी भावार्थ: अपनी बढ़ी आयु का विचार करके उत्तानपाद वैराग्यपूर्वक आत्मकल्याण का चिन्तन करते हुए वन चले गए।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 9 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 10
उत्तम की मृत्यु और यक्षों से ध्रुव का युद्ध
श्लोक 10.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—ध्रुव ने प्रजापति शिशुमार की कन्या भ्रमि से विवाह किया; उनके कल्प और वत्सर नामक दो पुत्र हुए।
श्लोक 10.2
सरल हिंदी भावार्थ: वायु की पुत्री इला नामक दूसरी पत्नी से बलवान ध्रुव के उत्कल नामक पुत्र और एक सुन्दर कन्या हुई।
श्लोक 10.3
सरल हिंदी भावार्थ: अविवाहित उत्तम को पर्वत पर शिकार करते समय एक बलवान यक्ष ने मार दिया। उनकी माता भी उन्हें खोजते हुए मृत्यु को प्राप्त हुईं।
श्लोक 10.4
सरल हिंदी भावार्थ: भाई के वध का समाचार सुनकर ध्रुव शोक और रोष से भर गए। वे विजयी रथ पर बैठकर यक्षों के निवास की ओर चले।
श्लोक 10.5
सरल हिंदी भावार्थ: उत्तर दिशा में हिमालय की घाटी में उन्होंने शिव के अनुचरों से सेवित और यक्षों से भरी नगरी देखी।
श्लोक 10.6
सरल हिंदी भावार्थ: बलशाली ध्रुव ने ऐसा शङ्ख बजाया कि आकाश और दिशाएँ गूँज उठीं। उसकी ध्वनि से यक्षस्त्रियाँ बहुत डर गईं।
श्लोक 10.7
सरल हिंदी भावार्थ: उस नाद को सह न सकने वाले बलवान यक्षयोद्धा अस्त्र उठाकर नगरी से बाहर आए और उन पर टूट पड़े।
श्लोक 10.8
सरल हिंदी भावार्थ: धनुषधारी महारथी ध्रुव ने आते हुए हर योद्धा को एक साथ तीन–तीन बाण मारे।
श्लोक 10.9
सरल हिंदी भावार्थ: मस्तक में लगे बाणों से सबने अपने पराजित होने का अनुमान किया और ध्रुव के रणकौशल की प्रशंसा की।
श्लोक 10.10
सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी अपमान सह न सकने वाले वे योद्धा पैर से छुए सर्पों की तरह क्रुद्ध हुए और बदला लेने के लिए दुगुने बाण चलाने लगे।
श्लोक 10.11
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने परिघ, तलवार, प्रास, शूल, फरसे, शक्ति, ऋष्टि, भुशुण्डी और रंगीन पंखों वाले बाण उठाए।
श्लोक 10.12
सरल हिंदी भावार्थ: एक लाख तीस हजार क्रुद्ध यक्षों ने प्रतिकार की इच्छा से ध्रुव, उनके रथ और सारथि पर अस्त्रों की वर्षा की।
श्लोक 10.13
सरल हिंदी भावार्थ: उस भारी शस्त्रवृष्टि में ध्रुव ढक गए, जैसे मूसलधार वर्षा में पर्वत ओझल हो जाता है।
श्लोक 10.14
सरल हिंदी भावार्थ: आकाश से देखते सिद्ध हाहाकार करने लगे—यक्षसागर में मनुवंश का यह सूर्य डूब गया, मानो मारा गया हो!
श्लोक 10.15
सरल हिंदी भावार्थ: यक्ष विजय की आशा में गर्ज रहे थे कि ध्रुव का रथ कुहरे से निकलते सूर्य की तरह फिर दिखाई दिया।
श्लोक 10.16
सरल हिंदी भावार्थ: दिव्य धनुष की टङ्कार से शत्रुओं को विचलित करते हुए उन्होंने बाणों से अस्त्रसमूह को ऐसे उड़ा दिया जैसे वायु मेघों को उड़ा देती है।
श्लोक 10.17
सरल हिंदी भावार्थ: उनके तीखे बाण कवच चीरकर यक्षों के शरीर में घुस गए, जैसे वज्र पर्वत में प्रवेश करता है।
श्लोक 10.18
सरल हिंदी भावार्थ: युद्ध में उनके तीक्ष्ण बाणों से कटे, सुन्दर कुण्डलों वाले सिर, स्वर्णस्तम्भ जैसी जाँघें और कङ्कणधारी भुजाएँ भूमि पर गिरीं।
श्लोक 10.19
सरल हिंदी भावार्थ: हार, बाजूबन्द, मुकुट और बहुमूल्य पगड़ियाँ भी रणभूमि में बिखर गईं; कथा उस समय के वीररस में इस दृश्य का वर्णन करती है।
श्लोक 10.20
सरल हिंदी भावार्थ: बचे हुए योद्धा ध्रुव के बाणों से घायल और अनेक अङ्ग कटे हुए युद्धभूमि से भागे, जैसे सिंह के आक्रमण से हाथियों का झुण्ड भागता है।
श्लोक 10.21
सरल हिंदी भावार्थ: सामने कोई आक्रमणकारी न देखकर भी ध्रुव शत्रुनगरी में नहीं गए। उन्होंने सोचा—मायावी लोग आगे क्या करना चाहते हैं, यह कोई नहीं जानता।
श्लोक 10.22
सरल हिंदी भावार्थ: सारथि से ऐसा कहते हुए वे सावधान रहे। तभी समुद्र जैसी गर्जना सुनाई दी, वायु चली और दिशाओं में धूल छा गई।
श्लोक 10.23
सरल हिंदी भावार्थ: क्षणभर में आकाश मेघों से ढक गया; बिजली चमकने और भयावह गर्जना होने लगी।
श्लोक 10.24
सरल हिंदी भावार्थ: मायाप्रदर्शन से रक्त, पीब, मल, मूत्र और चर्बी की वर्षा होती तथा आकाश से सिरहीन शरीर गिरते दिखाई दिए।
श्लोक 10.25
सरल हिंदी भावार्थ: फिर आकाश में पर्वत दिखाई दिया और पत्थरों सहित गदा, परिघ, तलवार तथा मूसल सब दिशाओं से गिरने लगे।
श्लोक 10.26
सरल हिंदी भावार्थ: अग्नि उगलते, क्रोधभरे सर्प और मत्त हाथी, सिंह तथा व्याघ्रों के झुण्ड उनकी ओर दौड़ते दिखाई दिए।
श्लोक 10.27
सरल हिंदी भावार्थ: विशाल लहरों और गर्जना वाला समुद्र मानो प्रलयकाल की तरह चारों ओर पृथ्वी डुबोता हुआ सामने आया।
श्लोक 10.28
सरल हिंदी भावार्थ: तीव्र शक्तिवाले असुरभावी यक्षों ने आसुरी माया से ऐसे अनेक भयप्रद दृश्य रचे, जो अस्थिर मनवालों को डरा दें।
श्लोक 10.29
सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव पर प्रयुक्त उस दुस्तर माया को देखकर वहाँ आए मुनियों ने उनके कल्याण की प्रार्थना की।
श्लोक 10.30
सरल हिंदी भावार्थ: मुनि बोले—उत्तानपाद के पुत्र, शरणागतों का दुःख हरने वाले शार्ङ्गधारी भगवान तुम्हारे विरोधियों को दूर करें। जिनका नाम कहने और सुनने से मनुष्य कठिन मृत्यु पार करता है, वे तुम्हारी रक्षा करें।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 10 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 11
मनु का उपदेश और क्रोध से निवृत्ति
श्लोक 11.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—ऋषियों के ये वचन सुनकर ध्रुव ने आचमन किया और नारायण द्वारा प्रदत्त अस्त्र धनुष पर चढ़ाया।
श्लोक 11.2
सरल हिंदी भावार्थ: अस्त्र चढ़ाते ही यक्षों की माया शीघ्र मिट गई, जैसे ज्ञान का उदय होने पर क्लेश मिट जाते हैं।
श्लोक 11.3
सरल हिंदी भावार्थ: उस दिव्य अस्त्र से स्वर्णपुच्छ और हंसपंख वाले बाण निकले तथा गर्जते मोरों के वन में प्रवेश की तरह शत्रुसेना में जा घुसे।
श्लोक 11.4
सरल हिंदी भावार्थ: तीखे बाणों से पीड़ित यक्ष अस्त्र उठाए क्रुद्ध होकर ध्रुव की ओर दौड़े, जैसे फन उठाए सर्प गरुड़ की ओर बढ़ें।
श्लोक 11.5
सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव ने आक्रमणकारी योद्धाओं के अङ्ग बाणों से काट दिए और उन्हें उस वीरगति के लोक में भेजा, जहाँ ऊर्ध्वरेता योगी सूर्यमण्डल भेदकर पहुँचते हैं, ऐसा कथा में कहा गया है।
श्लोक 11.6
सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव को बहुत से निर्दोष यक्षों को भी मारते देखकर पितामह मनु को दया आई। वे ऋषियों सहित वहाँ आए और उन्हें समझाने लगे।
श्लोक 11.7
सरल हिंदी भावार्थ: मनु बोले—बेटा, अत्यधिक क्रोध छोड़ो; यह अधोगति का पापमय द्वार है। इसी के कारण तुमने इन निर्दोष यक्षों को मार डाला।
श्लोक 11.8
सरल हिंदी भावार्थ: निर्दोष दिव्यजनों का वध हमारे कुल के योग्य नहीं। सज्जन ऐसे कर्म की निन्दा करते हैं।
श्लोक 11.9
सरल हिंदी भावार्थ: तुम अपने भाई से स्नेह रखते हो, पर उसके वध के दुःख में एक के अपराध के कारण इतने लोगों को मार दिया।
श्लोक 11.10
सरल हिंदी भावार्थ: देह को ही अपना स्वरूप मानकर पशुवत प्राणियों का संहार करना भगवान हृषीकेश के भक्त सज्जनों का मार्ग नहीं है।
श्लोक 11.11
सरल हिंदी भावार्थ: तुमने सभी प्राणियों में आत्मभाव से रहने वाले हरि की आराधना करके भगवान विष्णु का दुर्लभ परम पद पाया है।
श्लोक 11.12
सरल हिंदी भावार्थ: हरि स्वयं तुम पर कृपा रखते हैं और उनके भक्त भी तुम्हारा सम्मान करते हैं। संतों के आचरण का अनुसरण करते हुए तुम ऐसा निन्दनीय कर्म कैसे कर बैठे?
श्लोक 11.13
सरल हिंदी भावार्थ: सहनशीलता, करुणा, मैत्री और सभी प्राणियों के प्रति समदृष्टि से सर्वात्मा भगवान प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 11.14
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान प्रसन्न होने पर मनुष्य प्रकृति के गुणों और जीवभाव के बन्धन से मुक्त होकर ब्रह्मशान्ति प्राप्त करता है।
श्लोक 11.15
सरल हिंदी भावार्थ: स्त्री और पुरुष के शरीर पाँच भूतों से बने हैं; उनके सम्बन्ध से फिर स्त्री–पुरुष की सन्तान उत्पन्न होती है।
श्लोक 11.16
सरल हिंदी भावार्थ: प्रकृति के गुणों की परस्पर क्रिया और परमात्मा की माया से जगत की उत्पत्ति, स्थिति और संहार चलता है।
श्लोक 11.17
सरल हिंदी भावार्थ: गुणातीत परम पुरुष इसमें अधिष्ठान और निमित्त हैं; व्यक्त–अव्यक्त जगत उनके प्रभाव में ऐसे चलता है जैसे चुम्बक के पास लोहा।
श्लोक 11.18
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान कालशक्ति और गुणप्रवाह से विविध कार्य करते दिखाई देते हैं, पर स्वरूप से कर्तापन और हिंसा से परे हैं। अनन्त प्रभु की लीला समझना कठिन है।
श्लोक 11.19
सरल हिंदी भावार्थ: वे अनादि, अविनाशी और अनन्त कालरूप हैं; जीवों के माध्यम से जन्म और मृत्यु के माध्यम से अन्त की व्यवस्था चलाते हैं।
श्लोक 11.20
सरल हिंदी भावार्थ: समान रूप से सब प्राणियों में मृत्यु बनकर प्रवेश करने वाले काल का कोई अपना या पराया पक्ष नहीं। असहाय जीव उनके पीछे चलते हैं जैसे वायु के साथ धूलकण।
श्लोक 11.21
सरल हिंदी भावार्थ: स्वयं वृद्धि और क्षय से रहित प्रभु जीवों की आयु का बढ़ना और घटना नियत करते हैं; वे स्थिर रहते हैं और जीव परिवर्तन भोगता है।
श्लोक 11.22
सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, इसी नियामक तत्त्व को कोई कर्म, कोई स्वभाव, कोई काल, कोई दैव और कोई परम पुरुष की इच्छा कहता है।
श्लोक 11.23
सरल हिंदी भावार्थ: वह अव्यक्त, अप्रमेय और अनेक शक्तियों का उद्गम है। उसका पूरा उद्देश्य कौन जान सकता है? जीव स्वयं उसी से उत्पन्न है।
श्लोक 11.24
सरल हिंदी भावार्थ: बेटा, कुबेर के ये सब अनुचर तुम्हारे भाई के हत्यारे नहीं हैं। जन्म और मृत्यु की व्यवस्था में दैव भी कारण है; पूरे समुदाय को दोषी मत मानो।
श्लोक 11.25
सरल हिंदी भावार्थ: वही परमात्मा जगत को रचता, पालता और समेटता है, फिर भी अहंकार न होने से गुणों और कर्मों में लिप्त नहीं होता।
श्लोक 11.26
सरल हिंदी भावार्थ: सब प्राणियों के आत्मा, स्वामी और पोषक प्रभु अपनी मायाशक्ति के द्वारा सृष्टि, पालन और संहार करते हैं।
श्लोक 11.27
सरल हिंदी भावार्थ: मृत्यु और अमरत्व दोनों के नियन्ता तथा जगत के परम आश्रय उन्हीं भगवान की सर्वभाव से शरण लो। प्रजापति भी उनके अधीन अपना कर्तव्य करते हैं, जैसे नाक की रस्सी से नियंत्रित बैल।
श्लोक 11.28
सरल हिंदी भावार्थ: तुमने पाँच वर्ष की आयु में सौतेली माता के अपमान से व्यथित होकर माँ को छोड़ा, वन में तप किया और इन्द्रियों से परे प्रभु की आराधना से तीनों लोकों से ऊँचा पद पाया था।
श्लोक 11.29
सरल हिंदी भावार्थ: अब उन्हीं अद्वितीय, अविनाशी और गुणातीत आत्मा को अपने मुक्त अन्तःकरण में खोजो, जिनमें दिखाई देने वाला भेद वास्तविक स्वतन्त्र सत्ता नहीं रखता।
श्लोक 11.30
सरल हिंदी भावार्थ: भीतर स्थित अनन्त, आनन्दमय और सर्वशक्तिमान भगवान में परम भक्ति करो; तब धीरे–धीरे अहंता–ममता की गहरी अज्ञानग्रन्थि कटेगी।
श्लोक 11.31
सरल हिंदी भावार्थ: कल्याण के महान बाधक क्रोध को व्यापक शास्त्रज्ञान से सँभालो, जैसे औषधि से रोग को रोकते हैं। तुम्हारा मंगल हो।
श्लोक 11.32
सरल हिंदी भावार्थ: क्रोधग्रस्त व्यक्ति से संसार बहुत डरता है। अपना अभय चाहने वाला बुद्धिमान उसके वश में नहीं जाता।
श्लोक 11.33
सरल हिंदी भावार्थ: भाई के हत्यारे समझकर इतने यक्षों को मारने से तुमने शिव के मित्र और भ्रातृतुल्य धनाध्यक्ष कुबेर का अनादर किया है।
श्लोक 11.34
सरल हिंदी भावार्थ: शीघ्र विनय और नम्र वचनों से उन्हें प्रसन्न करो, जिससे महात्माओं का तेज हमारे कुल को हानि न पहुँचाए।
श्लोक 11.35
सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार पौत्र को उपदेश देकर मनु ने ध्रुव का प्रणाम स्वीकार किया और ऋषियों के साथ अपने स्थान को लौट गए।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 11 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 12
कुबेर का वर, ध्रुवपद और कथा की फलश्रुति
श्लोक 12.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—ध्रुव को हिंसा से निवृत्त और क्रोधरहित जानकर कुबेर वहाँ आए। चारण, यक्ष और किन्नर उनकी स्तुति कर रहे थे; हाथ जोड़े ध्रुव से उन्होंने कहा।
श्लोक 12.2
सरल हिंदी भावार्थ: कुबेर बोले—क्षत्रियकुमार, पितामह के कहने से तुमने कठिनाई से छूटने वाला वैर त्याग दिया; इससे मैं बहुत प्रसन्न हूँ।
श्लोक 12.3
सरल हिंदी भावार्थ: परम दृष्टि से न तुम यक्षों के स्वतन्त्र मृत्युकारण हो, न यक्ष तुम्हारे भाई के; प्राणियों के जन्म और विनाश पर काल का शासन है।
श्लोक 12.4
सरल हिंदी भावार्थ: अज्ञान से उत्पन्न मैं–तुम की भेदबुद्धि स्वप्न की तरह प्रतीत होती है। उसी मिथ्या चिन्तन से बन्धन और उलटा ज्ञान पैदा होता है।
श्लोक 12.5
सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव, तुम्हारा कल्याण हो। अब सब प्राणियों में आत्मीयभाव रखते हुए उन अधोक्षज भगवान की ओर मन लगाओ, जो सबके आत्मा हैं।
श्लोक 12.6
सरल हिंदी भावार्थ: जन्मबन्धन मिटाने वाले उनके पूजनीय चरणों को भजो। वे अपनी गुणमयी मायाशक्ति से सम्बन्धित होकर भी स्वरूप से उससे सर्वथा अलग हैं।
श्लोक 12.7
सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, अपने मन का कोई वर मुझसे निःसंकोच माँगो। तुम वर पाने योग्य हो; हमने सुना है कि तुम भगवान के चरणों के अत्यन्त निकट हो।
श्लोक 12.8
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—कुबेर के वर माँगने को कहने पर महामति भक्त ध्रुव ने हरि की अचल स्मृति माँगी, जिससे कठिन अज्ञानसागर सहज पार होता है।
श्लोक 12.9
सरल हिंदी भावार्थ: इडविडा के पुत्र कुबेर ने प्रसन्न होकर वह वर दिया और अन्तर्धान हो गए। ध्रुव भी अपनी नगरी लौट आए।
श्लोक 12.10
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने उदार दक्षिणाओं वाले यज्ञों से यज्ञेश्वर की आराधना की, जो सामग्री, क्रिया और देवताओं के मूल आधार तथा कर्मफलदाता हैं।
श्लोक 12.11
सरल हिंदी भावार्थ: सर्वात्मा होकर भी सब उपाधियों से परे अच्युत में उनकी भक्ति तीव्र प्रवाह से बढ़ी। उन्होंने अपने भीतर और सभी प्राणियों में उन्हीं प्रभु को देखा।
श्लोक 12.12
सरल हिंदी भावार्थ: वे शीलवान, ज्ञानियों का सम्मान करने वाले, दीनों पर स्नेह रखने वाले और धर्ममर्यादा के रक्षक थे; प्रजा उन्हें पिता मानती थी।
श्लोक 12.13
सरल हिंदी भावार्थ: कथा के अनुसार उन्होंने छत्तीस हजार वर्ष राज्य किया। पुण्यफल को भोग से और अशुभ कर्मफल को संयम तथा त्याग से क्षीण किया।
श्लोक 12.14
सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार अनेक यज्ञ करते हुए, इन्द्रियों की शक्ति अक्षुण्ण रखते हुए धर्म, अर्थ और काम के अनुकूल जीवन बिताकर उन्होंने पुत्र को राजासन दे दिया।
श्लोक 12.15
सरल हिंदी भावार्थ: वे समझ गए कि आत्मा में माया से बना यह विश्व अज्ञानजनित स्वप्न और आकाश में दिखने वाले काल्पनिक नगर जैसा है।
श्लोक 12.16
सरल हिंदी भावार्थ: शरीर, पत्नी, सन्तान, मित्र, सेना, भरा कोश, महल, उद्यान और समुद्रपर्यन्त राज्य सब काल के अधीन हैं—ऐसा विचार करके वे बदरिकाश्रम चले गए।
श्लोक 12.17
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ पवित्र जल में स्नान करके, आसन और प्राण संयमित करके तथा इन्द्रियाँ समेटकर उन्होंने भगवान के विराट रूप में चित्त लगाया; फिर गहन समाधि में स्थूल ध्यान से भी ऊपर उठे।
श्लोक 12.18
सरल हिंदी भावार्थ: हरि में निरन्तर भक्ति बहने लगी। आनन्दाश्रु, पिघलते हृदय और रोमाञ्च के बीच वे देहाभिमान भूल गए और सूक्ष्म बन्धन से मुक्त हुए।
श्लोक 12.19
सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव ने आकाश से उतरता श्रेष्ठ विमान देखा, जो उदित पूर्णचन्द्र की तरह दसों दिशाओं को प्रकाशित कर रहा था।
श्लोक 12.20
सरल हिंदी भावार्थ: उसमें चार भुजाओं वाले दो दिव्य किशोर खड़े थे। वे श्यामवर्ण, अरुणकमलनयन, गदाधारी और किरीट, हार, बाजूबन्द तथा कुण्डलों से सुसज्जित थे।
श्लोक 12.21
सरल हिंदी भावार्थ: उन्हें भगवान के सेवक जानकर ध्रुव उठे। विस्मय से स्वागत की विधि भूल गए और हरि के नाम लेते हुए हाथ जोड़कर प्रमुख पार्षदों को प्रणाम किया।
श्लोक 12.22
सरल हिंदी भावार्थ: कृष्ण के चरणों में मन लगाए, हाथ जोड़े और विनय से सिर झुकाए ध्रुव के पास भगवान के प्रिय नन्द और सुनन्द आए तथा मुस्कराकर बोले।
श्लोक 12.23
सरल हिंदी भावार्थ: नन्द–सुनन्द ने कहा—राजन्, तुम्हारा मंगल हो। हमारी बात ध्यान से सुनो; तुमने पाँच वर्ष की आयु में ही तप से भगवान को प्रसन्न कर लिया था।
श्लोक 12.24
सरल हिंदी भावार्थ: हम समस्त जगत को धारण करने वाले शार्ङ्गधारी भगवान के पार्षद हैं और तुम्हें उनके परम पद तक ले जाने आए हैं।
श्लोक 12.25
सरल हिंदी भावार्थ: तुमने वह दुर्लभ विष्णुपद पाया है जिसे ज्ञानी भी सर्वोच्च कहते हैं। वहाँ चलो, जिसकी चन्द्र, सूर्य, ग्रह, नक्षत्र और तारे परिक्रमा करते हैं।
श्लोक 12.26
सरल हिंदी भावार्थ: जगत के वन्दनीय उस परम विष्णुपद को प्राप्त करो, जहाँ तुम्हारे पूर्वज या दूसरे लोग पहले कभी नहीं पहुँचे।
श्लोक 12.27
सरल हिंदी भावार्थ: दीर्घायु भक्त, भगवान ने तुम्हारे लिए यह श्रेष्ठ विमान भेजा है। अब इसमें आरोहण करो।
श्लोक 12.28
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—वैकुण्ठ के प्रमुख सेवकों की अमृतमय वाणी सुनकर ध्रुव ने स्नान और नित्य मंगलकर्म किए, मुनियों को प्रणाम किया और आशीर्वाद लिया।
श्लोक 12.29
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने विमान की परिक्रमा और पूजा की, पार्षदों को प्रणाम किया और स्वर्णप्रभा वाले दिव्य रूप से उसमें चढ़ने को उद्यत हुए।
श्लोक 12.30
सरल हिंदी भावार्थ: तभी उन्हें मृत्यु सामने दिखाई दी। कथा कहती है कि ध्रुव मृत्यु के मस्तक पर चरण रखकर उस अद्भुत विमान में चढ़ गए—यह उनकी मृत्युविजय का चित्रण है।
श्लोक 12.31
सरल हिंदी भावार्थ: दुन्दुभि, मृदङ्ग और पणव बजे; गन्धर्वों ने गीत गाए और पुष्पवर्षा हुई।
श्लोक 12.32
सरल हिंदी भावार्थ: दिव्यलोक जाते समय ध्रुव को माता सुनीति याद आईं। उन्होंने सोचा—मैं अपनी असहाय माता को छोड़कर कैसे चला जाऊँ?
श्लोक 12.33
सरल हिंदी भावार्थ: उनका भाव जानकर दोनों पार्षदों ने दिखाया कि सुनीति भी आगे दूसरे विमान से जा रही हैं।
श्लोक 12.34
सरल हिंदी भावार्थ: मार्ग में विमानों पर स्थित देवता उनकी प्रशंसा और पुष्पवर्षा करते रहे। वे क्रमशः विभिन्न ग्रहलोकों को देखते हुए आगे बढ़े।
श्लोक 12.35
सरल हिंदी भावार्थ: देवयान मार्ग से तीनों लोक और ऋषियों के लोक पार करके वे उस विष्णुपद को पहुँचे, जो ध्रुव की अचल गति है।
श्लोक 12.36
सरल हिंदी भावार्थ: वह अपनी ही ज्योति से प्रकाशित है और उससे तीनों लोक प्रकाशित होते हैं। निर्दयी लोग वहाँ नहीं पहुँचते; नित्य शुभ आचरण करने वाले वहाँ जाते हैं।
श्लोक 12.37
सरल हिंदी भावार्थ: शान्त, समदर्शी, निर्मल और सब प्राणियों को सुख देने वाले, भगवान को ही प्रिय बन्धु मानने वाले भक्त सहज अच्युतपद प्राप्त करते हैं।
श्लोक 12.38
सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार कृष्णपरायण ध्रुव तीनों लोकों के निर्मल चूड़ामणि के समान हुए।
श्लोक 12.39
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर, पुराण के वर्णन में गम्भीर वेग वाला ज्योतिश्चक्र उनके चारों ओर निरन्तर घूमता है, जैसे खूँटे के चारों ओर बैल घूमते हैं।
श्लोक 12.40
सरल हिंदी भावार्थ: ध्रुव की यह महिमा देखकर नारद ने प्रचेताओं के यज्ञ में वीणा बजाते हुए उनके यश का गान किया।
श्लोक 12.41
सरल हिंदी भावार्थ: नारद बोले—पतिव्रता सुनीति के तपस्वी पुत्र की गति देखकर बड़े वेदज्ञ भी उसे पाने के उपाय पूरी तरह नहीं जान सकते; साधारण राजाओं की तो बात ही क्या!
श्लोक 12.42
सरल हिंदी भावार्थ: सौतेली माता के वचनबाणों से घायल पाँच वर्ष का वह बालक वन गया, मेरे उपदेश का पालन किया और भक्तगुणों से वश होने वाले अजेय भगवान को प्रसन्न कर लिया।
श्लोक 12.43
सरल हिंदी भावार्थ: जिस पद को उसने पाँच–छह वर्ष की आयु में थोड़े दिनों में वैकुण्ठनाथ को प्रसन्न करके पाया, वहाँ दूसरे राजा वर्षों प्रयत्न करके भी कैसे पहुँच सकते हैं!
श्लोक 12.44
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—विदुर, तुम्हारे पूछने पर मैंने संतों द्वारा प्रशंसित महान यशस्वी ध्रुव का पूरा चरित्र सुनाया।
श्लोक 12.45
सरल हिंदी भावार्थ: यह कथा धन्यता, यश, शुभ आयु, पुण्य, मंगल, स्वर्गीय कल्याण, स्थिरता, प्रसन्नता और पापशुद्धि देने वाली कही गई है।
श्लोक 12.46
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के प्रिय भक्त के इस चरित्र को बार–बार श्रद्धा से सुनने पर भगवान में भक्ति बढ़ती है, जिससे क्लेश घटते हैं।
श्लोक 12.47
सरल हिंदी भावार्थ: उत्कर्ष चाहने वाले श्रोता के लिए यह कथा तीर्थ समान है; उससे शील आदि गुण, तेज और उदारचित्त लोगों का सम्मान प्राप्त होता है।
श्लोक 12.48
सरल हिंदी भावार्थ: पवित्र होकर ज्ञानियों की सभा में प्रातः और सायं पुण्यश्लोक ध्रुव की महान कथा का कीर्तन करना चाहिए।
श्लोक 12.49
सरल हिंदी भावार्थ: पूर्णिमा, अमावस्या, द्वादशी, श्रवण नक्षत्र, तिथि के अन्त, व्यतीपात, संक्रान्ति और रविवार जैसे अवसरों का कथा में विशेष उल्लेख है।
श्लोक 12.50
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के चरणों का आश्रय लेकर श्रद्धालुओं को यह कथा निष्काम भाव से सुनाए। आत्मतृप्त कथावाचक ऐसी सेवा से सिद्धि पाता है।
श्लोक 12.51
सरल हिंदी भावार्थ: जो करुणामय व्यक्ति तत्त्व न जानने वाले को सत्पथ पर ले जाने वाला अमृततुल्य ज्ञान देता है, उस दीनहितैषी पर देवता भी कृपा करते हैं।
श्लोक 12.52
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर, यही ध्रुव के विख्यात और शुद्ध कर्मों की कथा मैंने सुनाई—वह बालक जिसने खिलौने और माता का घर छोड़कर भगवान विष्णु की शरण ली थी।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 12 समाप्त ॥
इस भाग का भक्ति-सन्देश
ध्रुव का चरित्र दृढ़ भक्ति के साथ अन्तःकरण के परिवर्तन की कथा है। मान–प्रतिष्ठा की इच्छा भगवान के दर्शन से प्रेम में बदलती है। मनु सहनशीलता, करुणा, मैत्री और समता को भगवान की प्रसन्नता का मार्ग बताते हैं; अन्त में ध्रुव अचल हरिस्मरण माँगते हैं।
पाठाधार और संपादकीय जानकारी
प्राचीन मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents का “श्रीमद्भागवतं—चतुर्थस्कन्धः” है। अध्याय 8–12 में क्रमशः 82, 67, 30, 35 और 52 श्लोक हैं; कुल 266। हिंदी भावार्थ स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है, किसी आधुनिक टीका की प्रतिलिपि नहीं। ध्रुव की बाल्यावस्था की तपस्या, अत्यल्प आहार और प्राणनिरोध पौराणिक वृत्तान्त हैं, व्यवहार में अपनाने की साधना या स्वास्थ्यविधि नहीं। ध्रुवलोक, दिव्य आयु और ज्योतिश्चक्र का वर्णन पुराण के लोकविन्यास के अनुसार है। युद्ध के बाद मनु का उपदेश निर्दोषों के वध और सामूहिक प्रतिशोध को स्पष्टतः अनुचित बताता है।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • भाग २ समाप्त ॥
॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
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