श्रीमद्भागवत महापुराण चतुर्थ स्कन्ध भाग 3 — अध्याय 13–23, पृथु चरित्र और सनत्कुमार उपदेश
श्रीमद्भागवत महापुराण
चतुर्थ स्कन्ध • भाग ३ • अध्याय १३–२३
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लोककल्याण का राजधर्म और आत्मकल्याण की भक्ति
वेन के दुराचार से पीड़ित प्रजा की रक्षा के लिए पृथु प्रकट होते हैं। वे आजीविका की व्यवस्था, पृथ्वी के संसाधनों के उचित उपयोग और निष्पक्ष राजधर्म का आदर्श रखते हैं। इन्द्र से वैर छोड़ते हैं, भगवान से कथाश्रवण का प्रेम माँगते हैं और सनत्कुमार से आत्मज्ञान पाते हैं।
इस भाग में अध्याय 13–23 के सभी 450 श्लोक और प्रत्येक का स्वतंत्र सरल हिंदी भावार्थ है। इसके बाद रुद्रगीत, पुरञ्जन और प्रचेताओं के प्रसंग आएँगे।
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 13
ध्रुववंश, राजा अङ्ग और वेन का जन्म
श्लोक 13.1
सरल हिंदी भावार्थ: सूत ने कहा—मैत्रेय से ध्रुव के वैकुण्ठपद प्राप्त करने की कथा सुनकर विदुर का भगवान में प्रेम बढ़ा और उन्होंने फिर प्रश्न किया।
श्लोक 13.2
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर बोले—सुव्रत, ये प्रचेता कौन थे, किसके पुत्र और किस वंश में प्रसिद्ध थे? उनका यज्ञ कहाँ हुआ था?
श्लोक 13.3
सरल हिंदी भावार्थ: नारद महान भगवद्भक्त और भगवान का दर्शन करने वाले हैं। उन्होंने भगवान की पूजा तथा कर्मयोग की विधि सिखाई है।
श्लोक 13.4
सरल हिंदी भावार्थ: भक्त नारद ने बताया है कि अपने धर्म में स्थित मनुष्य कर्तव्यकर्मों द्वारा यज्ञपुरुष भगवान की आराधना करें।
श्लोक 13.5
सरल हिंदी भावार्थ: देवर्षि ने वहाँ भगवान की जो कथाएँ कहीं, उन्हें सुनने की इच्छा रखने वाले मुझे विस्तार से बताइए।
श्लोक 13.6
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—ध्रुव के वन चले जाने पर उनके पुत्र उत्कल ने पिता का सार्वभौम राज्य और राजासन स्वीकार नहीं करना चाहा।
श्लोक 13.7
सरल हिंदी भावार्थ: वे जन्म से ही शान्त, अनासक्त और समदर्शी थे। अपने आत्मा को समस्त जगत में और जगत को आत्मा में देखते थे।
श्लोक 13.8
सरल हिंदी भावार्थ: वे आत्मा को शान्त ब्रह्मस्वरूप, भेदरहित, ज्ञानरस से एक और निरन्तर आनन्दमय अनुभव करते थे।
श्लोक 13.9
सरल हिंदी भावार्थ: अटूट योगाग्नि से उनके कर्म और अन्तःकरण का मल जल गया था। अपने स्वरूप में स्थित होकर उन्हें आत्मा से अलग कुछ दिखाई नहीं देता था।
श्लोक 13.10
सरल हिंदी भावार्थ: भीतर से प्रबुद्ध होते हुए भी वे बाहर से जड़, अन्धे, बहरे, उन्मत्त या मौन जैसे दिखते थे; बच्चों को वे बुझी ज्वाला वाली अग्नि के समान प्रतीत होते थे।
श्लोक 13.11
सरल हिंदी भावार्थ: कुलवृद्धों और मन्त्रियों ने उन्हें जड़ या उन्मत्त समझकर भ्रमि के छोटे पुत्र वत्सर को राजा बना दिया।
श्लोक 13.12
सरल हिंदी भावार्थ: वत्सर की प्रिय पत्नी स्वर्वीथि से पुष्पार्ण, तिग्मकेतु, इष, ऊर्ज, वसु और जय नामक छह पुत्र हुए।
श्लोक 13.13
सरल हिंदी भावार्थ: पुष्पार्ण की दो पत्नियाँ प्रभा और दोषा थीं। प्रभा के पुत्र प्रातः, मध्यन्दिन और सायम् हुए।
श्लोक 13.14
सरल हिंदी भावार्थ: दोषा के पुत्र प्रदोष, निशीथ और व्युष्ट हुए। व्युष्ट और पुष्करिणी से सर्वतेजा उत्पन्न हुए।
श्लोक 13.15
सरल हिंदी भावार्थ: सर्वतेजा और उनकी पत्नी आकूति से चक्षु नामक मनु हुए। मनु की पत्नी नड्वला से निर्मल स्वभाव वाले पुत्र उत्पन्न हुए।
श्लोक 13.16
सरल हिंदी भावार्थ: उनके नाम पुरु, कुत्स, त्रित, द्युम्न, सत्यवान, ऋत, व्रत, अग्निष्टोम, अतिरात्र, प्रद्युम्न, शिबि और उल्मुक थे।
श्लोक 13.17
सरल हिंदी भावार्थ: उल्मुक और पुष्करिणी से अङ्ग, सुमना, ख्याति, क्रतु, अङ्गिरा और गय नामक छह श्रेष्ठ पुत्र हुए।
श्लोक 13.18
सरल हिंदी भावार्थ: अङ्ग की पत्नी सुनीथा से उग्र स्वभाव वाला वेन हुआ। उसकी दुष्टता से विरक्त होकर राजर्षि अङ्ग नगरी छोड़ गए।
श्लोक 13.19
सरल हिंदी भावार्थ: बाद में वज्र के समान प्रभावशाली वाणी वाले ऋषियों ने क्रुद्ध होकर वेन को शाप दिया। उसकी मृत्यु के बाद उन्होंने उसकी दाहिनी भुजा का मन्थन किया।
श्लोक 13.20
सरल हिंदी भावार्थ: राजा के अभाव में डाकुओं से प्रजा पीड़ित थी। तब नारायण के अंश से पृथु प्रकट हुए, जिन्हें आदर्श राजव्यवस्था स्थापित करने वाला प्रथम राजा कहा गया।
श्लोक 13.21
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर ने पूछा—शील के भण्डार, सज्जन और ज्ञानियों का आदर करने वाले महात्मा अङ्ग के यहाँ ऐसा दुष्ट पुत्र कैसे हुआ, जिसके कारण वे विरक्त हो गए?
श्लोक 13.22
सरल हिंदी भावार्थ: धर्मज्ञ ऋषियों ने दण्ड और शासन का उत्तरदायित्व रखने वाले राजा वेन पर किस अपराध के कारण ब्रह्मदण्ड लगाया?
श्लोक 13.23
सरल हिंदी भावार्थ: प्रजापालक राजा अपने तेज में लोकपालों की शक्ति धारण करता है; इसलिए पापी होने पर भी प्रजा को उसका तिरस्कार नहीं करना चाहिए—विदुर ने प्रश्न में यह प्राचीन राजधर्म का पक्ष रखा।
श्लोक 13.24
सरल हिंदी भावार्थ: आप उच्च और निम्न सभी तत्त्वों के ज्ञाता हैं। श्रद्धापूर्वक सुनने वाले मुझे सुनीथा के पुत्र वेन का चरित्र बताइए।
श्लोक 13.25
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—राजर्षि अङ्ग ने अश्वमेध नामक महान यज्ञ किया, पर वेदज्ञों के आह्वान करने पर भी देवता उसमें नहीं आए।
श्लोक 13.26
सरल हिंदी भावार्थ: पुरोहितों ने चकित होकर यजमान से कहा—आपकी दी जाती आहुतियाँ देवता स्वीकार नहीं कर रहे हैं।
श्लोक 13.27
सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, आपकी हविसामग्री दोषरहित और श्रद्धा से प्राप्त है; व्रतधारी ब्राह्मण शुद्ध तथा प्रभावशाली मन्त्रों का प्रयोग कर रहे हैं।
श्लोक 13.28
सरल हिंदी भावार्थ: हमें देवताओं का तनिक भी अनादर हुआ नहीं दिखता; फिर भी कर्मों के साक्षी वे देवता अपने भाग नहीं ले रहे हैं।
श्लोक 13.29
सरल हिंदी भावार्थ: ब्राह्मणों की बात सुनकर राजा अङ्ग बहुत उदास हुए। उनकी अनुमति लेकर उन्होंने सभासदों से प्रश्न किया।
श्लोक 13.30
सरल हिंदी भावार्थ: सभापतियो, बुलाने पर भी देवता नहीं आते और आहुतियाँ नहीं लेते। बताइए, मुझसे कौन सा दोष हुआ है?
श्लोक 13.31
सरल हिंदी भावार्थ: सभापतियों ने कहा—राजन्, इस जीवन में आपका कोई छोटा भी अपराध नहीं है। पूर्वकर्म का कोई अवरोध है जिसके कारण आप अभी सन्तानहीन हैं; यह उनका कर्मफलसम्बन्धी परम्परागत विवेचन था।
श्लोक 13.32
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए उत्तम सन्तान की प्राप्ति का उपाय कीजिए। सन्तान की इच्छा से पूजित यज्ञभोक्ता भगवान आपको पुत्र देंगे।
श्लोक 13.33
सरल हिंदी भावार्थ: जब साक्षात यज्ञपुरुष हरि को सन्तान के लिए वरण किया जाएगा, तब देवता भी अपने भाग स्वीकार करेंगे।
श्लोक 13.34
सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्य जिन कामनाओं से भगवान की आराधना करता है, भगवान उसी के अनुसार फल देते हैं।
श्लोक 13.35
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसा निश्चय करके ब्राह्मणों ने राजा की सन्तान के लिए शिपिविष्ट नाम वाले विष्णु को पुरोडाश की आहुति दी।
श्लोक 13.36
सरल हिंदी भावार्थ: उस अग्नि से स्वर्णमाला और निर्मल वस्त्र पहने दिव्य पुरुष प्रकट हुए; वे सोने के पात्र में पका हुआ पायस लिए थे।
श्लोक 13.37
सरल हिंदी भावार्थ: राजा ने ब्राह्मणों की अनुमति से अञ्जलि में वह खीर ली, आदर से सूँघी और प्रसन्न होकर अपनी पत्नी को दी।
श्लोक 13.38
सरल हिंदी भावार्थ: रानी ने उस सन्तानदायी प्रसाद को ग्रहण किया और पति से गर्भ धारण किया। समय आने पर पहले सन्तानहीन रानी ने पुत्र जन्मा।
श्लोक 13.39
सरल हिंदी भावार्थ: बालक वेन बचपन से ही अपने नाना मृत्यु के स्वभाव का अनुसरण करने लगा; मृत्यु को अधर्म के अंश से उत्पन्न कहा गया है, इसलिए वेन अधार्मिक बना। यह कथा का वंशगत रूपक है।
श्लोक 13.40
सरल हिंदी भावार्थ: वेन धनुष लेकर वन में जाता और निर्दयता से असहाय पशुओं को मारता। लोग उसे देखकर भय से कहते—वेन आ गया!
श्लोक 13.41
सरल हिंदी भावार्थ: वह इतना क्रूर था कि खेलते हुए अपने साथी बच्चों को भी पकड़कर पशुओं की तरह निर्दयता से मार डालता था।
श्लोक 13.42
सरल हिंदी भावार्थ: राजा ने दुष्ट पुत्र को अनेक प्रकार से अनुशासित करना चाहा, पर सुधार न पाने पर अत्यन्त दुखी हुए।
श्लोक 13.43
सरल हिंदी भावार्थ: अङ्ग सोचने लगे—जिन गृहस्थों की सन्तान नहीं है, उन पर शायद भगवान की कृपा है, क्योंकि वे दुष्ट सन्तान का असह्य दुःख नहीं भोगते। यह उनकी व्यक्तिगत व्यथा की वाणी है।
श्लोक 13.44
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसी सन्तान से अपकीर्ति, अधर्म, सबके साथ विरोध और अन्तहीन मानसिक पीड़ा पैदा होती है।
श्लोक 13.45
सरल हिंदी भावार्थ: जिस सन्तान के लिए गृहस्थजीवन अपनाया जाए और वही मोहबन्धन तथा क्लेश का कारण बने, बुद्धिमान उसे कैसे बहुत मूल्यवान माने?
श्लोक 13.46
सरल हिंदी भावार्थ: फिर उन्होंने विचार किया—कभी दुष्ट सन्तान भी विरक्ति का कारण बनती है, जबकि प्रिय सन्तान की चिन्ता मन को बाँधे रखती है। इस दुःख से मनुष्य क्लेशपूर्ण आसक्ति छोड़ सकता है।
श्लोक 13.47
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसी विरक्ति से राजा को नींद नहीं आई। आधी रात को उन्होंने सोती हुई वेन की माता और विशाल वैभव वाला घर छोड़ दिया तथा किसी को बताए बिना चले गए।
श्लोक 13.48
सरल हिंदी भावार्थ: राजा के विरक्त होकर चले जाने की बात जानकर प्रजा, पुरोहित, मन्त्री और मित्र अत्यन्त शोक से पृथ्वी पर उन्हें खोजने लगे, जैसे अयोग्य साधक गुप्त परमात्मा को खोजता है।
श्लोक 13.49
सरल हिंदी भावार्थ: जब राजा का मार्ग नहीं मिला, वे निराश होकर नगर लौटे। वहाँ एकत्र ऋषियों को प्रणाम करके आँसुओं के साथ स्वामी के लुप्त होने का समाचार बताया।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 13 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 14
वेन का दुराचार और अराजकता का संकट
श्लोक 14.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—भृगु आदि लोकहितकारी ऋषियों ने देखा कि रक्षक के बिना मनुष्य असुरक्षित होकर पशुओं जैसी स्थिति में पड़ रहे हैं।
श्लोक 14.2
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने राजमाता सुनीथा को बुलाया और मन्त्रियों की असहमति होते हुए भी वेन का पृथ्वी के राजा के रूप में अभिषेक किया।
श्लोक 14.3
सरल हिंदी भावार्थ: वेन के कठोर शासनवाले राजासन पर बैठने का समाचार सुनकर डाकू वैसे छिप गए जैसे साँप से डरे चूहे।
श्लोक 14.4
सरल हिंदी भावार्थ: राजपद और आठ प्रकार के ऐश्वर्य का अभिमान पाकर वेन अकड़ गया। वह महात्माओं की अवहेलना करता और स्वयं को महान समझता था।
श्लोक 14.5
सरल हिंदी भावार्थ: मद से अन्धा और निरङ्कुश हाथी की तरह उन्मत्त वेन रथ पर घूमता, मानो पृथ्वी और आकाश को काँपाता था।
श्लोक 14.6
सरल हिंदी भावार्थ: उसने ढोल बजवाकर घोषणा कराई—कहीं यज्ञ, दान और अग्निहोत्र न किया जाए। इस प्रकार उसने धर्मकर्मों को रोक दिया।
श्लोक 14.7
सरल हिंदी भावार्थ: दुष्ट वेन का आचरण और जनता का संकट देखकर यज्ञशील मुनियों ने करुणा से आपस में विचार किया।
श्लोक 14.8
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—प्रजा चोर और रक्षक दोनों ओर से बड़े संकट में फँस गई है, जैसे लकड़ी के दोनों सिरे जल उठें।
श्लोक 14.9
सरल हिंदी भावार्थ: अराजकता के भय से अयोग्य वेन को राजा बनाया था, पर अब उसी से भय उत्पन्न हो गया। जीवों का कल्याण कैसे होगा?
श्लोक 14.10
सरल हिंदी भावार्थ: सुनीथा का पुत्र स्वभाव से ही दुष्ट निकला। उसका पोषण साँप को दूध पिलाने जैसा हुआ, जो पालने वाले को भी अनर्थ देता है।
श्लोक 14.11
सरल हिंदी भावार्थ: जिसे प्रजा की रक्षा के लिए नियुक्त किया, वही उसे नष्ट करना चाहता है। फिर भी पहले समझाएँ, जिससे उसे सुधारने का अपना उत्तरदायित्व पूरा हो।
श्लोक 14.12
सरल हिंदी भावार्थ: हमने उसका दुराचार जानते हुए भी उसे राजा बनाया था। यदि शान्तिपूर्वक समझाने पर भी यह अधर्मी हमारी बात नहीं मानेगा—
श्लोक 14.13
सरल हिंदी भावार्थ: तो लोकनिन्दा का पात्र बने उसे अपने तेज से दण्ड देंगे। ऐसा निश्चय करके मुनि क्रोध छिपाए वेन के पास गए और पहले मधुर वचनों से समझाने लगे।
श्लोक 14.14
सरल हिंदी भावार्थ: मुनि बोले—राजन्, हमारी हितकारी बात सुनिए; यह आपकी आयु, ऐश्वर्य, बल और कीर्ति बढ़ाने वाली है।
श्लोक 14.15
सरल हिंदी भावार्थ: वाणी, मन, शरीर और बुद्धि से किया धर्माचरण मनुष्य को शोकमुक्त लोक देता है; अनासक्त साधक को उससे परम मुक्ति मिलती है।
श्लोक 14.16
सरल हिंदी भावार्थ: प्रजा के कल्याणरूप उस धर्म को नष्ट मत होने दीजिए। उसके नष्ट होने पर राजा भी अपने ऐश्वर्य से गिर जाता है।
श्लोक 14.17
सरल हिंदी भावार्थ: जो राजा दुष्ट मन्त्रियों और चोरों आदि से प्रजा को बचाकर उचित कर लेता है, वह इस लोक और परलोक दोनों में सुख पाता है।
श्लोक 14.18
सरल हिंदी भावार्थ: जिस राजा के देश और नगर में लोग अपने कर्तव्य तथा वर्णाश्रम की परम्परागत व्यवस्था के अनुसार यज्ञपुरुष भगवान की आराधना करते हैं—
श्लोक 14.19
सरल हिंदी भावार्थ: अपने शासनधर्म में स्थित उस राजा से जगत के आत्मा और प्राणियों के पोषक भगवान प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 14.20
सरल हिंदी भावार्थ: सभी नियन्ताओं के भी ईश्वर प्रसन्न हों तो क्या अप्राप्य है? लोकपालों सहित सब लोक उन्हें आदर से भेंट अर्पित करते हैं।
श्लोक 14.21
सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, समस्त लोकों, देवताओं, यज्ञ, वेद, सामग्री और तप के आधार भगवान का प्रजा विविध यज्ञों से पूजन करे—अपने कल्याण के लिए इसकी अनुमति दीजिए।
श्लोक 14.22
सरल हिंदी भावार्थ: आपके राज्य में ब्राह्मणों द्वारा किए यज्ञों से भगवान की शक्तिरूप देवता प्रसन्न होकर अभिलषित फल देते हैं। उनका अनादर करना उचित नहीं।
श्लोक 14.23
सरल हिंदी भावार्थ: वेन बोला—तुम मूर्ख हो और अधर्म को धर्म मानते हो। जीविका देने वाले अपने स्वामी को छोड़कर दूसरे को पूजते हो। उसने इसे परपुरुष से सम्बन्ध रखने के अपमानजनक उपमान से कहा।
श्लोक 14.24
सरल हिंदी भावार्थ: उसने दावा किया—जो मुझ राजारूप ईश्वर का अपमान करते हैं, उन्हें इस लोक और परलोक में कल्याण नहीं मिलता। यह वेन का अहंकारी कथन है।
श्लोक 14.25
सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारा यह यज्ञपुरुष कौन है, जिसमें तुम्हारी इतनी भक्ति है? वेन ने फिर पति का स्नेह छोड़ परपुरुष में आसक्त स्त्रियों का उपमान देकर मुनियों की निन्दा की।
श्लोक 14.26
सरल हिंदी भावार्थ: वेन ने विष्णु, ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, पर्जन्य, कुबेर, चन्द्र, पृथ्वी, अग्नि और वरुण का नाम लिया।
श्लोक 14.27
सरल हिंदी भावार्थ: उसने कहा—वर और शाप देने वाले ये तथा अन्य सभी देवता राजा के शरीर में रहते हैं; राजा सर्वदेवमय है। उसने इस राजधर्मसम्बन्धी मान्यता को अपनी निरङ्कुश पूजा की माँग बना लिया।
श्लोक 14.28
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए ईर्ष्या छोड़कर अपने सब कर्मों से मेरी ही पूजा करो और मुझे ही भेंट दो। मेरे अतिरिक्त पहला भाग पाने योग्य दूसरा कौन है?
श्लोक 14.29
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—विपरीत बुद्धि वाला पापी वेन गलत मार्ग पर चला गया था। समझाने पर भी उसने ऋषियों की कल्याणकारी प्रार्थना नहीं मानी।
श्लोक 14.30
सरल हिंदी भावार्थ: स्वयं को पण्डित मानने वाले वेन ने उनका अपमान किया और हितकारी प्रार्थना ठुकरा दी; इससे वे ऋषि क्रुद्ध हुए।
श्लोक 14.31
सरल हिंदी भावार्थ: वे बोले—इस स्वभाव से क्रूर पापी को दण्ड दो! जीवित रहने पर यह शीघ्र जगत को नष्ट कर देगा।
श्लोक 14.32
सरल हिंदी भावार्थ: जो निर्लज्ज होकर यज्ञाधिपति विष्णु की निन्दा करता है, वह दुराचारी मनुष्य श्रेष्ठ राजासन के योग्य नहीं है।
श्लोक 14.33
सरल हिंदी भावार्थ: जिस भगवान की कृपा से उसे इतना ऐश्वर्य मिला, उन्हीं की निन्दा इस अमंगलकारी वेन के अतिरिक्त कौन करेगा?
श्लोक 14.34
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसा निश्चय करके क्रुद्ध ऋषियों ने अपने हुँकार से वेन का अन्त कर दिया; कथा कहती है कि अच्युत की निन्दा से वह पहले ही पतित हो चुका था।
श्लोक 14.35
सरल हिंदी भावार्थ: ऋषियों के आश्रम लौट जाने पर शोकाकुल सुनीथा ने अपनी विद्या के प्रभाव से पुत्र के शरीर को सुरक्षित रखा।
श्लोक 14.36
सरल हिंदी भावार्थ: एक दिन वे मुनि सरस्वती में स्नान करके, अग्निहोत्र पूर्ण करके नदीतट पर बैठे और सत्कथा करने लगे।
श्लोक 14.37
सरल हिंदी भावार्थ: तभी भयावह उत्पात देखकर बोले—क्या रक्षकहीन पृथ्वी पर डाकुओं से कोई अनिष्ट होने वाला है?
श्लोक 14.38
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसा सोचते समय उन्हें सब दिशाओं में दौड़ते और लूटपाट करते चोरों से उठी भारी धूल दिखाई दी।
श्लोक 14.39
सरल हिंदी भावार्थ: राजा के न रहने पर लोग एक दूसरे का धन लूटने और परस्पर मारने लगे थे; ऋषियों ने उस संकट को पहचाना।
श्लोक 14.40
सरल हिंदी भावार्थ: राज्यहीन देश में चोरों का बोलबाला था और सदाचार घट गया था। स्थिति को दोषपूर्ण देखते हुए भी मुनियों ने तत्काल बल से हस्तक्षेप नहीं किया।
श्लोक 14.41
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने सोचा—शान्त और समदर्शी ब्राह्मण यदि दीनों की उपेक्षा करे तो उसका ब्रह्मतेज भी वैसे क्षीण होता है जैसे टूटे पात्र से दूध बह जाता है।
श्लोक 14.42
सरल हिंदी भावार्थ: राजर्षि अङ्ग का वंश इस तरह समाप्त नहीं होना चाहिए। इस वंश के प्रभावशाली राजा केशव के आश्रित रहे हैं।
श्लोक 14.43
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसा निश्चय करके ऋषियों ने मृत राजा की जाँघों का मन्थन किया; उससे बाहुक नामक पुरुष प्रकट हुआ, ऐसा पौराणिक वर्णन है।
श्लोक 14.44
सरल हिंदी भावार्थ: उसका वर्ण काला, शरीर और भुजाएँ छोटे, जबड़ा बड़ा, पैर छोटे, नासिका नीची, नेत्र लाल और केश ताम्रवर्ण थे। यह पात्र के रूप का वर्णन है।
श्लोक 14.45
सरल हिंदी भावार्थ: उसने विनम्र होकर पूछा—मैं क्या करूँ? ऋषियों ने कहा—बैठो, अर्थात निषीद। कथा इसी शब्द से उसका निषाद नाम बताती है।
श्लोक 14.46
सरल हिंदी भावार्थ: वेन की पापमलिनता अपने साथ ले जाने वाला वह पुरुष कहा गया; उसके वंशज पर्वत–वन में रहने वाले नैषाद बताए गए हैं। यह पौराणिक उत्पत्तिकथा है, आज किसी समुदाय के नैतिक मूल्य का निर्णय नहीं।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 14 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 15
पृथु–अर्चि का प्राकट्य और राज्याभिषेक
श्लोक 15.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—उस सन्तानहीन मृत राजा की दोनों भुजाओं का ब्राह्मणों ने फिर मन्थन किया तो उनसे एक स्त्री और एक पुरुष प्रकट हुए।
श्लोक 15.2
सरल हिंदी भावार्थ: इस जोड़े को देखकर वेदज्ञ ऋषियों ने उन्हें भगवान की शक्ति का अंश जाना और अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा।
श्लोक 15.3
सरल हिंदी भावार्थ: ऋषि बोले—यह पुरुष जगत का पालन करने वाले विष्णु का अंश है और यह स्त्री उनसे कभी अलग न रहने वाली लक्ष्मी का प्राकट्य है।
श्लोक 15.4
सरल हिंदी भावार्थ: यह राजाओं में अग्रणी होगा और यश फैलाएगा। इसका नाम महाराज पृथु होगा और इसकी कीर्ति दूर तक पहुँचेगी।
श्लोक 15.5
सरल हिंदी भावार्थ: यह सुन्दर देवी अर्चि कहलाएँगी। इनके सद्गुण ही आभूषणों की शोभा बढ़ाएँगे और ये पृथु को पति के रूप में स्वीकार करेंगी।
श्लोक 15.6
सरल हिंदी भावार्थ: लोकों की रक्षा के लिए साक्षात हरि का अंश प्रकट हुआ है और उनकी नित्य अनुगामिनी श्री भी इनके पीछे प्रकट हुई हैं।
श्लोक 15.7
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—ब्राह्मण प्रशंसा करने लगे, गन्धर्वों ने गान किया, सिद्धों ने पुष्पवर्षा की और देवाङ्गनाएँ नृत्य करने लगीं।
श्लोक 15.8
सरल हिंदी भावार्थ: आकाश में शङ्ख, तूर्य, मृदङ्ग और दुन्दुभि बजे। देवता, ऋषि और पितरों के समूह वहाँ आए।
श्लोक 15.9
सरल हिंदी भावार्थ: देवताओं के साथ आए जगद्गुरु ब्रह्मा ने वेनपुत्र पृथु के दाहिने हाथ में गदाधारी भगवान का चिह्न देखा।
श्लोक 15.10
सरल हिंदी भावार्थ: उनके चरणों में कमलचिह्न देखकर ब्रह्मा ने उन्हें हरि का अंश माना। जिनके हाथ में अविच्छिन्न चक्रचिह्न हो, वे परमेश्वर की शक्ति के अंश माने जाते हैं।
श्लोक 15.11
सरल हिंदी भावार्थ: वेदज्ञ ब्राह्मणों ने उनके अभिषेक की तैयारी की; लोग सभी ओर से अभिषेक की सामग्री लाने लगे।
श्लोक 15.12
सरल हिंदी भावार्थ: नदियाँ, समुद्र, पर्वत, नाग, गायें, पक्षी, पशु, आकाश, पृथ्वी और सभी प्राणी अपनी–अपनी भेंटें लाए।
श्लोक 15.13
सरल हिंदी भावार्थ: अभिषिक्त महाराज पृथु सुन्दर वस्त्र–आभूषण धारण करके अलङ्कृत पत्नी अर्चि के साथ ऐसे चमके मानो दूसरी अग्नि हों।
श्लोक 15.14
सरल हिंदी भावार्थ: कुबेर ने उन्हें सोने का श्रेष्ठ सिंहासन और वरुण ने शीतल जलकण बरसाने वाला चन्द्रप्रभा छत्र दिया।
श्लोक 15.15
सरल हिंदी भावार्थ: वायु ने दो चँवर, धर्म ने कीर्तिमयी माला, इन्द्र ने उत्तम मुकुट और यम ने शासन का दण्ड प्रदान किया।
श्लोक 15.16
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा ने वेदमय कवच, सरस्वती ने श्रेष्ठ हार, हरि ने सुदर्शन चक्र और लक्ष्मी ने अविनाशी सम्पदा दी।
श्लोक 15.17
सरल हिंदी भावार्थ: रुद्र ने दस चन्द्रचिह्नों वाली तलवार, अम्बिका ने सौ चन्द्रचिह्नों वाली ढाल, सोम ने अमृतमय घोड़े और त्वष्टा ने सुन्दर रथ दिया।
श्लोक 15.18
सरल हिंदी भावार्थ: अग्नि ने आजगव धनुष, सूर्य ने किरणमय बाण, पृथ्वी ने योगशक्तियुक्त पादुकाएँ और आकाश ने नित्य पुष्पवर्षा का उपहार दिया।
श्लोक 15.19
सरल हिंदी भावार्थ: खेचरों ने नृत्य, मधुर गान, वादन और अन्तर्धान की कला दी; ऋषियों ने सत्य आशीर्वाद और समुद्र ने अपने से उत्पन्न शङ्ख दिया।
श्लोक 15.20
सरल हिंदी भावार्थ: समुद्र, पर्वत और नदियों ने उनके रथ के लिए मार्ग दिए। तब सूत, मागध और बन्दी उनकी स्तुति करने उपस्थित हुए।
श्लोक 15.21
सरल हिंदी भावार्थ: स्तुति करने वालों का भाव समझकर प्रतापी पृथु मुस्कराए और मेघगर्जना जैसी गम्भीर वाणी से बोले।
श्लोक 15.22
सरल हिंदी भावार्थ: पृथु ने कहा—सूत, मागध और सौम्य बन्दी! मेरे गुण अभी लोक में प्रकट नहीं हुए हैं। किस आधार पर मेरी स्तुति करोगे? तुम्हारे वचन मेरे विषय में असत्य न हों।
श्लोक 15.23
सरल हिंदी भावार्थ: जब हमारे कर्म और गुण सुनो, तब उनकी प्रशंसा करना। अभी भगवान के उत्तम गुणों का गान उपलब्ध रहते हुए सज्जन किसी साधारण व्यक्ति की अनुचित प्रशंसा नहीं करते।
श्लोक 15.24
सरल हिंदी भावार्थ: जो अपने भीतर बड़े गुण उत्पन्न कर सकता है, वह भी अनुपस्थित गुणों की प्रशंसा क्यों कराए? भविष्य में ये गुण होंगे—इस बहाने फुसलाया मूर्ख नहीं समझता कि लोग उसका उपहास करेंगे।
श्लोक 15.25
सरल हिंदी भावार्थ: महान और प्रसिद्ध सामर्थ्यवान भी अपनी प्रशंसा सुनना संकोच का विषय मानते हैं। लज्जाशील, उदार व्यक्ति अनुचित आत्मप्रशंसा को निन्दनीय समझते हैं।
श्लोक 15.26
सरल हिंदी भावार्थ: हमारे महान कर्म तो अभी जगत को ज्ञात भी नहीं हुए। फिर बच्चों की तरह अपना यश गवाना कैसे उचित होगा?
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 15 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 16
आदर्श राजा पृथु के भावी गुण और कर्म
श्लोक 16.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—पृथु के अमृतमय वचन सुनकर गायक प्रसन्न हुए, फिर ऋषियों की प्रेरणा से उनकी स्तुति करने लगे।
श्लोक 16.2
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—अपनी माया से वेन के शरीर से अवतरित देवश्रेष्ठ, आपकी महिमा कहने में हम समर्थ नहीं। आपके पराक्रम का विचार करके वाणी के बड़े ज्ञाता भी चकित होते हैं।
श्लोक 16.3
सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी ऋषियों की प्रेरणा और आपके अवतार की कथामृत में आदर से, उनके बताए अनुसार आपके प्रशंसनीय भावी कर्मों का वर्णन करते हैं।
श्लोक 16.4
सरल हिंदी भावार्थ: आप धर्मधारियों में श्रेष्ठ होंगे, लोगों को धर्ममार्ग पर चलाएँगे, मर्यादाओं की रक्षा करेंगे और उनका विरोध करने वालों को अनुशासित करेंगे।
श्लोक 16.5
सरल हिंदी भावार्थ: आप अकेले अपने भीतर लोकपालों की उपयुक्त शक्तियाँ धारण करके समय–समय पर इस लोक और परलोक दोनों का हित करेंगे।
श्लोक 16.6
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे सूर्य समभाव से प्रकाश देता और समय पर जल ग्रहण करके वर्षा के रूप में लौटाता है, वैसे आप उचित समय पर कर लेंगे और लोकहित में उसका उपयोग करेंगे।
श्लोक 16.7
सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी की तरह सहनशील आप प्राणियों के अनुचित व्यवहार को भी धैर्य से सहेंगे और पीड़ितों के प्रति सदा करुणामय रहेंगे।
श्लोक 16.8
सरल हिंदी भावार्थ: वर्षा न होने पर राजारूप हरि होकर आप इन्द्र की तरह कठिनाई में पड़ी प्रजा की आजीविका और जीवन की रक्षा करेंगे।
श्लोक 16.9
सरल हिंदी भावार्थ: प्रेमपूर्ण दृष्टि और निर्मल मुस्कान से सुशोभित अमृतमय मुख द्वारा आप लोगों को शान्ति और प्रसन्नता देंगे।
श्लोक 16.10
सरल हिंदी भावार्थ: वरुण की तरह आपका मार्ग, कार्ययोजना और धनकोश सुरक्षित तथा गुप्त होगा। आपकी गहरी बुद्धि और अनन्त गुण सबके लिए सहज जानने योग्य नहीं होंगे।
श्लोक 16.11
सरल हिंदी भावार्थ: वेनरूपी अरणि से प्रकट अग्नि की तरह आप दुष्टों के लिए दुर्धर्ष और असह्य होंगे; पास होते हुए भी आपकी महिमा की सीमा दूर रहेगी।
श्लोक 16.12
सरल हिंदी भावार्थ: गुप्तचरों के द्वारा लोगों के बाहरी और भीतरी व्यवहार जानेंगे, फिर भी निर्लिप्त निरीक्षक रहेंगे, जैसे शरीरों में प्राणवायु और आत्मा।
श्लोक 16.13
सरल हिंदी भावार्थ: धर्ममार्ग पर स्थित आप शत्रु के निर्दोष पुत्र को भी दण्ड नहीं देंगे और अपने अपराधी पुत्र को भी उचित दण्ड देंगे।
श्लोक 16.14
सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ तक सूर्य की किरणें पड़ती हैं, मानस पर्वत तक पृथु का शासनचक्र निर्बाध चलेगा।
श्लोक 16.15
सरल हिंदी भावार्थ: अपने लोकहितकारी कर्मों से आप प्रजा को प्रसन्न करेंगे; इसी रञ्जन के कारण लोग आपको राजा कहेंगे।
श्लोक 16.16
सरल हिंदी भावार्थ: आप दृढ़व्रती, सत्यप्रतिज्ञ, ज्ञानियों के हितैषी, वृद्धों के सेवक, सभी प्राणियों के आश्रय, मान देने वाले और दीनवत्सल होंगे।
श्लोक 16.17
सरल हिंदी भावार्थ: दूसरी स्त्रियों के प्रति माता जैसा सम्मान, पत्नी के प्रति अपने अर्धाङ्ग जैसा भाव, प्रजा के प्रति पिता जैसा स्नेह और ब्रह्मज्ञानी संतों के प्रति सेवाभाव रखेंगे।
श्लोक 16.18
सरल हिंदी भावार्थ: आप सबको आत्मा के समान प्रिय होंगे, मित्रों का आनन्द बढ़ाएँगे, अनासक्त संतों का सङ्ग करेंगे और दुष्टों को अनुशासित करेंगे।
श्लोक 16.19
सरल हिंदी भावार्थ: आप गुणों के अधीश्वर, अविकारी आत्मा भगवान की कलारूप में आए हैं। अज्ञान से बनी अनेकता उन्हीं में दिखाई देती है, यद्यपि उसकी अलग परम सत्ता नहीं।
श्लोक 16.20
सरल हिंदी भावार्थ: राजाओं के अधिपति और पृथ्वी के अद्वितीय रक्षक होकर आप विजयीरथ और धनुष धारण करेंगे तथा सूर्य की तरह दिशाओं में भ्रमण करेंगे।
श्लोक 16.21
सरल हिंदी भावार्थ: राजा और लोकपाल आपको भेंट देंगे। उनकी स्त्रियाँ आपके यश का गान करते हुए आपको चक्रधारी भगवान का प्रतिनिधि मानेंगी।
श्लोक 16.22
सरल हिंदी भावार्थ: प्रजा की आजीविका देने वाले अधिराज पृथु पृथ्वीरूपी गाय का दोहन करेंगे और धनुष की नोक से पर्वतों की ऊँच–नीच घटाकर भूमि को रहने योग्य समतल करेंगे।
श्लोक 16.23
सरल हिंदी भावार्थ: जब आप आजगव धनुष की टङ्कार करते पृथ्वी पर चलेंगे, तब दुष्ट वैसे छिप जाएँगे जैसे पूँछ उठाए सिंह को देखकर वन्यजीव छिप जाते हैं।
श्लोक 16.24
सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ सरस्वती प्रकट होती है, वहाँ आप सौ अश्वमेधों का आयोजन करेंगे; अन्तिम यज्ञ चलते समय सौ यज्ञों वाले इन्द्र आपका घोड़ा चुरा ले जाएँगे।
श्लोक 16.25
सरल हिंदी भावार्थ: अपने महल के उपवन में सनत्कुमार से मिलकर आप भक्ति से उनकी सेवा करेंगे और वह निर्मल ज्ञान पाएँगे जिससे परम ब्रह्म जाना जाता है।
श्लोक 16.26
सरल हिंदी भावार्थ: अपने विस्तृत पराक्रम से प्रसिद्ध पृथु स्थान–स्थान पर अपने इन कर्मों की कथाएँ लोगों से सुनेंगे।
श्लोक 16.27
सरल हिंदी भावार्थ: दिशाओं को जीतकर और अपने तेज से लोक की बाधाएँ दूर करके आप पृथ्वी के पालक होंगे; देव और असुरों के अधिपति भी आपकी महिमा गाएँगे।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 16 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 17
भूखी प्रजा और पृथ्वी की प्रार्थना
श्लोक 17.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—इस प्रकार गुणों और कर्मों के गान से सम्मानित पृथु ने गायकों का अभिनन्दन किया, उन्हें आदर दिया और इच्छित उपहारों से प्रसन्न किया।
श्लोक 17.2
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने ब्राह्मण आदि सभी सामाजिक वर्गों, सेवकों, मन्त्रियों, पुरोहितों, नगरवासियों, ग्रामीणों और विभिन्न श्रेणियों का उचित सम्मान किया।
श्लोक 17.3
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर ने पूछा—अनेक रूप धारण करने वाली पृथ्वी ने गाय का रूप क्यों लिया? पृथु ने उसका दोहन किया तो बछड़ा और दोहनपात्र क्या थे?
श्लोक 17.4
सरल हिंदी भावार्थ: स्वभाव से ऊँची–नीची पृथ्वी को उन्होंने समतल कैसे किया? इन्द्र ने उनके पवित्र यज्ञ का घोड़ा क्यों चुराया?
श्लोक 17.5
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ सनत्कुमार से अनुभवयुक्त ज्ञान प्राप्त करके राजर्षि पृथु को अन्ततः कौन सी गति मिली?
श्लोक 17.6
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान कृष्ण की पूर्वावतार लीलाओं से सम्बन्धित जो अन्य पुण्यकीर्ति आप जानते हैं—
श्लोक 17.7
सरल हिंदी भावार्थ: उसे भी मुझे सुनाइए। मैं आपका और अधोक्षज भगवान का अनुरक्त भक्त हूँ; उन्होंने पृथुरूप में इस पृथ्वी का दोहन किया था।
श्लोक 17.8
सरल हिंदी भावार्थ: सूत ने कहा—भगवान वासुदेव की कथा के लिए विदुर की ऐसी प्रेरणा सुनकर मैत्रेय प्रसन्न हुए, उनकी प्रशंसा की और उत्तर दिया।
श्लोक 17.9
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—ब्राह्मणों द्वारा अभिषिक्त और प्रजा के रक्षक नियुक्त पृथु के पास भूख से दुर्बल लोग आए, क्योंकि पृथ्वी पर अन्न नहीं था।
श्लोक 17.10
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—राजन्, पेट की भूख से हम वैसे जल रहे हैं जैसे भीतर की अग्नि से खोखले वृक्ष। आज हम आपके आश्रय आए हैं; आप हमारी जीविका के लिए राजा बनाए गए हैं।
श्लोक 17.11
सरल हिंदी भावार्थ: लोकपाल और आजीविका के स्वामी, हमारे प्राण क्षीण होकर नष्ट होने से पहले भूखों के लिए अन्न का प्रबन्ध कीजिए।
श्लोक 17.12
सरल हिंदी भावार्थ: प्रजा का करुण विलाप सुनकर पृथु ने गहरा विचार किया और संकट का कारण समझ लिया।
श्लोक 17.13
सरल हिंदी भावार्थ: कारण का निश्चय करके उन्होंने धनुष उठाया और क्रोधित त्रिपुरविजयी शिव की तरह पृथ्वी को लक्ष्य करके बाण चढ़ाया।
श्लोक 17.14
सरल हिंदी भावार्थ: अस्त्र उठाए पृथु को देखकर पृथ्वी काँप गई। वह गाय बनकर ऐसे भागी जैसे शिकारी से डरी हरिणी।
श्लोक 17.15
सरल हिंदी भावार्थ: क्रोध से लाल नेत्रों वाले पृथु धनुष पर बाण चढ़ाए उसके पीछे दौड़े; वह जहाँ भागती, वे वहीं पहुँचते।
श्लोक 17.16
सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी दिशाओं, उपदिशाओं, पृथ्वी–आकाश और उनके बीच भागी, पर उसे हर जगह पीछे अस्त्र उठाए पृथु दिखाई दिए।
श्लोक 17.17
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे मृत्यु से बचने का स्थान नहीं मिलता, वैसे पृथु से बचने का कोई आश्रय न पाकर वह डरी और व्यथित होकर लौट आई।
श्लोक 17.18
सरल हिंदी भावार्थ: वह बोली—धर्मज्ञ और संकटग्रस्तों से स्नेह रखने वाले महात्मा, आप सभी प्राणियों के पालन के लिए नियुक्त हैं; मेरी भी रक्षा कीजिए।
श्लोक 17.19
सरल हिंदी भावार्थ: मैं दीन और अपराधरहित हूँ; आप मुझे क्यों मारना चाहते हैं? धर्मज्ञ कहलाने वाले आप स्त्रीरूप धारण किए मुझ पर प्रहार कैसे करेंगे?
श्लोक 17.20
सरल हिंदी भावार्थ: सामान्य लोग भी अपराध करने वाली स्त्रियों पर हाथ उठाने से बचते हैं; फिर आपके जैसे करुणामय और दीनवत्सल राजा से तो रक्षा की आशा है।
श्लोक 17.21
सरल हिंदी भावार्थ: मैं उस स्थायी नाव के समान हूँ जिस पर पूरा जगत टिका है। मुझे तोड़कर आप अपने और प्रजा के जीवन को जलराशि में कैसे सँभालेंगे?
श्लोक 17.22
सरल हिंदी भावार्थ: पृथु बोले—पृथ्वी, तुम मेरी आज्ञा की अवहेलना करती हो। यज्ञ का भाग स्वीकार करती हो, पर हमें पोषण नहीं देती; इसलिए मैं तुम्हें दण्ड देने आया हूँ।
श्लोक 17.23
सरल हिंदी भावार्थ: जो गाय प्रतिदिन घास खाती है पर दूध नहीं देती, उसके ऐसे दोषपूर्ण आचरण पर दण्ड अनुचित नहीं माना जाता।
श्लोक 17.24
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा ने पहले जो अन्न–औषधियों के बीज उत्पन्न किए थे, उन्हें तुमने भीतर रोक रखा है और मेरी उपेक्षा करके बाहर नहीं देतीं।
श्लोक 17.25
सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हें बाणों से विदीर्ण करके तुम्हारे शरीर की पोषक सम्पदा से इन भूखपीड़ित प्राणियों का विलाप शान्त करूँगा। यह क्रुद्ध राजा का पौराणिक संवाद है।
श्लोक 17.26
सरल हिंदी भावार्थ: स्त्री, पुरुष या नपुंसक—जो केवल अपना हित देखे और प्राणियों के प्रति निर्दयी हो, उसके प्रति राजा का दण्ड अनुचित नहीं—पृथु ने प्राचीन दण्डनीति का यह पक्ष रखा।
श्लोक 17.27
सरल हिंदी भावार्थ: गायरूप धारण कर अभिमान करने वाली तुम्हें बाणों से खण्डित करके भी मैं अपने योगबल से प्रजा को धारण कर लूँगा।
श्लोक 17.28
सरल हिंदी भावार्थ: पृथु को क्रोधमय और काल जैसा प्रचण्ड देखकर पृथ्वी काँपने लगी। उसने प्रणाम और हाथ जोड़कर स्तुति की।
श्लोक 17.29
सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी बोली—माया से अनेक शरीर धारण करने वाले परम पुरुष को प्रणाम है। स्वरूपज्ञान से द्रव्य, क्रिया और कर्तृत्व के भ्रम को शान्त करने वाले प्रभु को नमस्कार है।
श्लोक 17.30
सरल हिंदी भावार्थ: आपने मुझे प्राणियों के आश्रय के लिए बनाया और आपसे गुणमयी सृष्टि निकली। अब वही स्वतन्त्र स्रष्टा मुझे मारने को अस्त्र उठाए सामने हैं; मैं और किसकी शरण जाऊँ?
श्लोक 17.31
सरल हिंदी भावार्थ: आपने अपनी अचिन्त्य मायाशक्ति से चराचर जगत बनाया और अब उसी की रक्षा के लिए आए हैं। धर्मपरायण होकर आप मुझे क्यों नष्ट करना चाहते हैं?
श्लोक 17.32
सरल हिंदी भावार्थ: असंयमी लोग आपकी दुस्तर माया से ढके होने के कारण आपके उद्देश्य को नहीं जान पाते। एक होकर भी अनेक रूपों में काम करने और करवाने वाले आप सबसे परे ईश्वर हैं।
श्लोक 17.33
सरल हिंदी भावार्थ: द्रव्य, क्रिया, साधन और चेतना की शक्तियों से आप सृष्टि आदि चलाते हैं। सभी शक्तियों के स्वामी, परम पुरुष और विधाता को प्रणाम है।
श्लोक 17.34
सरल हिंदी भावार्थ: अजन्मा प्रभु, भूत, इन्द्रिय और अन्तःकरण से बने जगत को स्थिर करने के लिए आपने आदिवराह होकर मुझे रसातल के जल से ऊपर उठाया था।
श्लोक 17.35
सरल हिंदी भावार्थ: तब आपने पृथ्वी को धारण करने वाला वीररूप लेकर मुझे प्रलयजल से बचाया था; आज इसी नाव पर स्थित प्रजा की रक्षा के लिए उग्र बाण से मुझे मारना चाहते हैं।
श्लोक 17.36
सरल हिंदी भावार्थ: हम जैसे लोग आपकी गुणमयी माया से मोहित होने के कारण ईश्वर के उद्देश्य नहीं समझ पाते। जिनकी लीला वीरों का यश बढ़ाती है, उन प्रभु को प्रणाम है।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 17 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 18
पृथ्वीरूपी गाय का दोहन और प्रजाव्यवस्था
श्लोक 18.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—क्रोध से काँपते ओठों वाले पृथु की स्तुति करके भयभीत पृथ्वी ने स्वयं को सँभाला और फिर कहा।
श्लोक 18.2
सरल हिंदी भावार्थ: प्रभु, क्रोध रोककर मेरी बात सुनिए। बुद्धिमान मधुमक्खी की तरह सभी ओर से उपयोगी सार ग्रहण करता है।
श्लोक 18.3
सरल हिंदी भावार्थ: तत्त्वदर्शी मुनियों ने इस लोक और परलोक में मनुष्यों के कल्याण के लिए अनेक उपाय खोजे और अपनाए हैं।
श्लोक 18.4
सरल हिंदी भावार्थ: बाद में आने वाला जो व्यक्ति श्रद्धा से उन अनुभवी लोगों के बताए उचित उपाय अपनाता है, वह अपना लक्ष्य सहज पा सकता है।
श्लोक 18.5
सरल हिंदी भावार्थ: जो अज्ञानी उनका अनादर करके केवल अपनी मनमानी से कार्य आरम्भ करता है, उसके प्रयत्न बार–बार असफल होते हैं।
श्लोक 18.6
सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, ब्रह्मा ने जो अन्न और औषधियाँ पहले उत्पन्न की थीं, उन्हें मैंने संयमरहित दुष्ट लोगों द्वारा नष्ट और दुरुपयोग होते देखा।
श्लोक 18.7
सरल हिंदी भावार्थ: लोकपालों ने मेरी रक्षा और देखभाल नहीं की। जगत में चोरी बढ़ने पर मैंने यज्ञ तथा भविष्य के पोषण के लिए उन औषधियों के बीज अपने भीतर सुरक्षित कर लिए।
श्लोक 18.8
सरल हिंदी भावार्थ: बहुत समय बीतने से वे वनस्पतियाँ मेरे भीतर क्षीण हो गई हैं; अब अनुभवसिद्ध उचित विधि से उन्हें फिर प्राप्त कीजिए।
श्लोक 18.9
सरल हिंदी भावार्थ: वीर, मेरे लिए एक बछड़ा और उपयुक्त दोहनपात्र निश्चित कीजिए। उसके प्रति वात्सल्य से मैं दूध के रूप में आपकी अभिलषित वस्तुएँ दूँगी।
श्लोक 18.10
सरल हिंदी भावार्थ: प्राणियों का पालन करने वाले महाबाहु, यदि बलदायक अन्न चाहते हैं तो योग्य दोहनकर्ता की व्यवस्था भी कीजिए।
श्लोक 18.11
सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, मेरी भूमि समतल और व्यवस्थित कीजिए, जिससे वर्षा का जल बना रहे और अन्य ऋतुओं में भी उपयोग मिल सके। आपका कल्याण हो।
श्लोक 18.12
सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी के प्रिय और हितकारी वचन स्वीकार करके पृथु ने मनु को बछड़ा बनाया और अपने हाथरूपी पात्र में सभी अन्न–औषधियों का दोहन किया।
श्लोक 18.13
सरल हिंदी भावार्थ: बुद्धिमान सभी स्थानों से सार ग्रहण करते हैं। इसी तरह अन्य प्राणियों ने भी पृथु द्वारा अनुकूल बनाई पृथ्वी से अपनी आवश्यकता का दोहन किया।
श्लोक 18.14
सरल हिंदी भावार्थ: ऋषियों ने बृहस्पति को बछड़ा और इन्द्रियों को पात्र बनाकर वेदमय निर्मल ज्ञानरूपी दूध प्राप्त किया।
श्लोक 18.15
सरल हिंदी भावार्थ: देवताओं ने इन्द्र को बछड़ा और स्वर्णपात्र लेकर सोमरस तथा वीर्य, ओज और बलरूपी दूध प्राप्त किया।
श्लोक 18.16
सरल हिंदी भावार्थ: दैत्य और दानवों ने अपने श्रेष्ठ प्रह्लाद को बछड़ा बनाकर लोहे के पात्र में सुरा और आसवरूपी दूध लिया। यह विविध समूहों की रुचियों का पौराणिक दोहनरूपक है।
श्लोक 18.17
सरल हिंदी भावार्थ: गन्धर्वों और अप्सराओं ने विश्वावसु को बछड़ा बनाकर कमलपात्र में मधुर गायन, माधुर्य और सौन्दर्यरूपी दूध दुहा।
श्लोक 18.18
सरल हिंदी भावार्थ: श्राद्ध के अधिष्ठाता पितरों ने अर्यमा को बछड़ा और कच्चे मिट्टीपात्र को पात्र बनाकर श्रद्धा से कव्य अर्थात पितृअर्पण का सार पाया।
श्लोक 18.19
सरल हिंदी भावार्थ: सिद्धों ने कपिल को बछड़ा बनाकर आकाशरूपी पात्र में सङ्कल्पसिद्धि प्राप्त की; विद्याधरों ने भी अपनी विद्याओं का सार पाया।
श्लोक 18.20
सरल हिंदी भावार्थ: अन्य मायावियों ने मय को बछड़ा बनाया और चित्तधारणा के रूप में अन्तर्धान आदि अद्भुत मायाशक्तियों का दोहन किया।
श्लोक 18.21
सरल हिंदी भावार्थ: यक्ष, राक्षस, भूत, पिशाच और मांसभक्षी समूहों ने भूतनाथ को बछड़ा बनाकर कपालपात्र में रक्तरूपी आसव दुहा।
श्लोक 18.22
सरल हिंदी भावार्थ: विषधर, सर्प और नागों ने तक्षक को बछड़ा और बिल को पात्र बनाकर विषरूपी दूध प्राप्त किया।
श्लोक 18.23
सरल हिंदी भावार्थ: पशुओं ने वृषभ को बछड़ा और वन को पात्र बनाकर घासरूपी दूध दुहा; दाँत वाले हिंस्र पशुओं ने सिंह को अपना बछड़ा बनाया।
श्लोक 18.24
सरल हिंदी भावार्थ: मांसभक्षी जीवों ने अपने शरीररूपी पात्र में मांस का पोषण लिया। पक्षियों ने गरुड़ को बछड़ा बनाकर चर और अचर दोनों प्रकार के आहार पाए।
श्लोक 18.25
सरल हिंदी भावार्थ: वृक्षों ने वट को बछड़ा बनाकर अलग–अलग रस प्राप्त किए। पर्वतों ने हिमालय को बछड़ा और अपने शिखरों को पात्र बनाकर अनेक धातुएँ पाईं।
श्लोक 18.26
सरल हिंदी भावार्थ: सबने अपने–अपने प्रमुख को बछड़ा और अपने अनुकूल पात्र लेकर पृथु से अनुकूल हुई कामधेनुरूप पृथ्वी से अलग–अलग सार प्राप्त किया।
श्लोक 18.27
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर, इस प्रकार पृथु और विभिन्न अन्नभोजी प्राणियों ने बछड़े, पात्र और दोहन की विधि के भेद से अपने योग्य पोषण पाया।
श्लोक 18.28
सरल हिंदी भावार्थ: प्रसन्न होकर पुत्रियों से स्नेह रखने वाले पृथु ने सबकी कामनाएँ पूर्ण करने वाली पृथ्वी को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया।
श्लोक 18.29
सरल हिंदी भावार्थ: राजराजेश्वर पृथु ने धनुष की नोक से पर्वतों की ऊँची चोटियाँ घटाकर भूमि के बड़े भाग को समतल और उपयोग योग्य किया।
श्लोक 18.30
सरल हिंदी भावार्थ: फिर पिता की तरह आजीविका देने वाले पृथु ने प्रजा के लिए स्थान–स्थान पर उपयुक्त निवास बसाए।
श्लोक 18.31
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने गाँव, नगर, व्यापारिक पत्तन, विभिन्न दुर्ग, गोपाल बस्तियाँ, पशुशालाएँ, सैनिक शिविर, खदानें तथा छोटे–बड़े आवासक्षेत्र स्थापित किए।
श्लोक 18.32
सरल हिंदी भावार्थ: कथा के अनुसार पृथु से पहले नगर–ग्राम की ऐसी व्यवस्थित योजना नहीं थी; लोग स्थान–स्थान पर अपनी सुविधा से निश्चिन्त रहते थे।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 18 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 19
इन्द्र का यज्ञविघ्न और ब्रह्मा का समाधान
श्लोक 19.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—राजा पृथु ने मनु के ब्रह्मावर्त क्षेत्र में, जहाँ सरस्वती पूर्व की ओर बहती है, सौ अश्वमेध यज्ञों की दीक्षा ली।
श्लोक 19.2
सरल हिंदी भावार्थ: सौ यज्ञों वाले इन्द्र ने सोचा कि पृथु उनके कर्मवैभव से आगे बढ़ जाएँगे; वे इस महान यज्ञोत्सव को सह नहीं सके।
श्लोक 19.3
सरल हिंदी भावार्थ: उस यज्ञ में यज्ञपति, सर्वात्मा और सभी लोकों के गुरु भगवान हरि का साक्षात सान्निध्य अनुभव किया जा रहा था।
श्लोक 19.4
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा, शिव, लोकपाल और उनके अनुचर साथ थे; गन्धर्व, मुनि और अप्सराएँ भगवान का यश गा रहे थे।
श्लोक 19.5
सरल हिंदी भावार्थ: सिद्ध, विद्याधर, दैत्य, दानव, यक्ष और नन्द–सुनन्द आदि भगवान के प्रमुख पार्षद भी उपस्थित थे।
श्लोक 19.6
सरल हिंदी भावार्थ: कपिल, नारद, दत्त, सनकादि योगेश्वर और उनकी सेवा चाहने वाले अनेक भक्त भगवान के साथ आए थे।
श्लोक 19.7
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ धर्मफल देने वाली पृथ्वी यजमान की इच्छित आवश्यकताएँ पूर्ण कर रही थी।
श्लोक 19.8
सरल हिंदी भावार्थ: नदियाँ अनेक रस, दूध, दही और पोषक आहार दे रही थीं; बड़े–बड़े वृक्ष मधु बरसाते फल–सम्पदा से भरे थे।
श्लोक 19.9
सरल हिंदी भावार्थ: समुद्र रत्न, पर्वत चार प्रकार के भोजन और सभी लोक अपने पालकों सहित भेंटें ला रहे थे।
श्लोक 19.10
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान को अपना स्वामी मानने वाले पृथु का यह उत्कर्ष देखकर इन्द्र ने ईर्ष्या से बाधा डालनी आरम्भ की।
श्लोक 19.11
सरल हिंदी भावार्थ: जब पृथु अन्तिम अश्वमेध से यज्ञेश्वर की आराधना कर रहे थे, तब इन्द्र छिपकर यज्ञ का घोड़ा चुरा ले गए।
श्लोक 19.12
सरल हिंदी भावार्थ: अत्रि ने उन्हें आकाश में भागते देखा। उन्होंने ऐसा भ्रामक धार्मिक वेश धारण किया था जिससे अधर्म में धर्म का भ्रम उत्पन्न हो।
श्लोक 19.13
सरल हिंदी भावार्थ: अत्रि की प्रेरणा से महारथी पृथुपुत्र क्रुद्ध होकर उनके पीछे दौड़ा और पुकारा—ठहरो, ठहरो!
श्लोक 19.14
सरल हिंदी भावार्थ: जटा और भस्म से ढका उनका रूप देखकर राजकुमार ने उन्हें धर्मात्मा साधु समझा और बाण नहीं छोड़ा।
श्लोक 19.15
सरल हिंदी भावार्थ: अत्रि ने उसे फिर समझाया—बेटा, यह यज्ञ में बाधा डालने वाला इन्द्र है; वेश देखकर भ्रम में मत पड़ो और इसे रोको।
श्लोक 19.16
सरल हिंदी भावार्थ: तब पृथुपुत्र क्रोध से आकाश में भागते इन्द्र के पीछे दौड़ा, जैसे जटायु रावण के पीछे गया था।
श्लोक 19.17
सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्र घोड़ा और वह छद्मवेश छोड़कर अदृश्य हो गए। वीर राजकुमार घोड़ा लेकर पिता के यज्ञ में लौट आया।
श्लोक 19.18
सरल हिंदी भावार्थ: उस अद्भुत कर्म को देखकर महर्षियों ने उसका नाम विजिताश्व रखा।
श्लोक 19.19
सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्र ने फिर गहरा अन्धकार उत्पन्न किया और स्वर्णरस्सी से बँधे यज्ञघोड़े को यूप के पास से छिपकर चुरा लिया।
श्लोक 19.20
सरल हिंदी भावार्थ: अत्रि ने फिर आकाश में भागते इन्द्र को दिखाया। इस बार वे कपाल और खट्वाङ्ग लिए थे; राजकुमार ने उस वेश के कारण उन्हें नहीं रोका।
श्लोक 19.21
सरल हिंदी भावार्थ: अत्रि के पुनः कहने पर राजकुमार ने क्रोध से बाण चढ़ाया। इन्द्र फिर घोड़ा और छद्मवेश छोड़कर अन्तर्धान हो गए।
श्लोक 19.22
सरल हिंदी भावार्थ: राजकुमार घोड़ा लेकर पिता के यज्ञ में लौट आया। इन्द्र द्वारा छोड़े गए उन अनुचित छद्मरूपों का अल्पविवेकी लोग अनुकरण करने लगे।
श्लोक 19.23
सरल हिंदी भावार्थ: घोड़ा चुराने के लिए इन्द्र ने जिन रूपों का सहारा लिया, उन्हें कथा पाप के खण्ड और पाखण्ड के बाहरी चिह्नों की उत्पत्ति कहती है।
श्लोक 19.24
सरल हिंदी भावार्थ: पृथु के यज्ञ में विघ्न डालने के लिए इन्द्र बार–बार घोड़ा चुराते और नए भ्रामक वेश धारण करके छोड़ते रहे; लोगों का मन उनमें फँसने लगा।
श्लोक 19.25
सरल हिंदी भावार्थ: नग्न या लालवस्त्रधारी बाहरी वेशों और चतुर वाणी से प्रभावित होकर लोग कभी उपधर्म को ही धर्म समझ बैठते हैं। प्रसंग का दोष छद्म और भ्रम है, केवल वस्त्र का रंग नहीं।
श्लोक 19.26
सरल हिंदी भावार्थ: यह जानकर प्रतापी पृथु क्रुद्ध हुए और इन्द्र को लक्ष्य करके धनुष पर बाण चढ़ाया।
श्लोक 19.27
सरल हिंदी भावार्थ: उनका असह्य वेग देखकर पुरोहितों ने रोका—महामते, इस यज्ञ में निर्दिष्ट विधान से बाहर किसी अन्य का वध उचित नहीं।
श्लोक 19.28
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—आपके यश से तेजहीन हुए इस विघ्नकर्ता इन्द्र को हम प्रभावशाली मन्त्रों से यहाँ बुलाकर अग्नि में आहुति बना देंगे। यह क्रुद्ध पुरोहितों का प्रस्ताव था।
श्लोक 19.29
सरल हिंदी भावार्थ: यजमान से ऐसा कहकर पुरोहित आहुति देने लगे, पर ब्रह्मा वहाँ आए और उन्हें रोक दिया।
श्लोक 19.30
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा बोले—इन्द्र का वध मत करो। वे यज्ञरूप भगवान के अङ्ग हैं; जिनकी शक्तियाँ देवता हैं, उन्हीं के यज्ञ से उनके अङ्ग को मारना उचित नहीं।
श्लोक 19.31
सरल हिंदी भावार्थ: देखो, राजा के कर्म में बाधा डालने के लिए इन्द्र ने धर्म में कितना बड़ा भ्रम उत्पन्न कर दिया है।
श्लोक 19.32
सरल हिंदी भावार्थ: पृथु के निन्यानवे यज्ञ ही रहने दो। राजन्, आपने बहुत उत्तम यज्ञ कर लिए; आप मोक्षधर्म जानते हैं, इसलिए संख्या पूरी करने का आग्रह पर्याप्त हुआ।
श्लोक 19.33
सरल हिंदी भावार्थ: अपने ही समान भगवान की शक्ति धारण करने वाले इन्द्र पर क्रोध मत करो। आप दोनों भगवान की विभूति के रूप हैं; आपका कल्याण हो।
श्लोक 19.34
सरल हिंदी भावार्थ: महाराज, चिन्ता छोड़कर हमारी बात मानिए। दैव से बाधित कर्म को हर हालत में पूरा करने की हठ से मन अत्यन्त क्रुद्ध होकर अज्ञान में गिर सकता है।
श्लोक 19.35
सरल हिंदी भावार्थ: यह यज्ञ अब यहीं समाप्त हो। देवताओं को भी वश में करना कठिन है और इन्द्र के बनाए छद्ममार्गों से धर्म में भ्रम फैल रहा है।
श्लोक 19.36
सरल हिंदी भावार्थ: घोड़ा चुराने वाले इन्द्र ने जो आकर्षक छद्ममार्ग फैलाए, उनसे जनता भटक रही है; अब उसके हित पर ध्यान दो।
श्लोक 19.37
सरल हिंदी भावार्थ: वेन के दुराचार से लुप्त हुए लोकधर्म की समयानुकूल रक्षा के लिए आप उसके शरीर से विष्णु की कला बनकर प्रकट हुए हैं।
श्लोक 19.38
सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए जगत के हित का विचार करके प्रजापतियों का उद्देश्य पूरा कीजिए और अधर्म को जन्म देने वाली इन्द्र की इस छलमाया के प्रभाव को दूर कीजिए।
श्लोक 19.39
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—लोकगुरु ब्रह्मा की आज्ञा मानकर पृथु ने वैसा ही किया और इन्द्र से भी स्नेहपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किया।
श्लोक 19.40
सरल हिंदी भावार्थ: अवभृथ स्नान कर चुके महान कर्मशील पृथु को यज्ञ से तृप्त वरदाता देवताओं ने वर दिए।
श्लोक 19.41
सरल हिंदी भावार्थ: श्रद्धा से दक्षिणा पाकर और आदर से प्रसन्न हुए सत्य आशीर्वाद देने वाले ब्राह्मणों ने आदिराज पृथु को आशीष दी।
श्लोक 19.42
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—महाबाहु, आपके आह्वान पर सभी पितर, देवता, ऋषि और मनुष्य आए तथा आपने दान और सम्मान से सबकी पूजा की।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 19 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 20
भगवान विष्णु का उपदेश और पृथु की भक्ति
श्लोक 20.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—यज्ञों से प्रसन्न यज्ञपति भगवान विष्णु इन्द्र के साथ प्रकट हुए और पृथु से बोले।
श्लोक 20.2
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने कहा—इन्द्र ने तुम्हारे सौ अश्वमेधों में बाधा डाली थी। अब वे क्षमा चाहते हैं; तुम्हें उनका अपराध क्षमा कर देना चाहिए।
श्लोक 20.3
सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, बुद्धिमान और श्रेष्ठ सज्जन जानते हैं कि आत्मा शरीर नहीं है; इसलिए वे किसी जीव से द्वेष नहीं करते।
श्लोक 20.4
सरल हिंदी भावार्थ: यदि तुम्हारे जैसे लोग भी माया में मोहित हो जाएँ तो दीर्घकाल तक महात्माओं की सेवा का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
श्लोक 20.5
सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानी समझता है कि यह शरीर अज्ञान, कामना और कर्म से बना है; विवेक जागने पर वह इसमें आसक्त नहीं होता।
श्लोक 20.6
सरल हिंदी भावार्थ: जो शरीर से अनासक्त है, वह उसी से जुड़े घर, सन्तान और धन में कैसे अहंता–ममता रखेगा?
श्लोक 20.7
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा एक, निर्मल, स्वप्रकाश, गुणातीत होकर गुणों का आधार, व्यापक, आवरणरहित और साक्षी है। वह देहादि उपाधियों और उनके आश्रित सीमित अभिमान से परे है।
श्लोक 20.8
सरल हिंदी भावार्थ: जो मनुष्य भीतर स्थित आत्मा को ऐसा जानता है, वह प्रकृति में रहते हुए भी उसके गुणों से लिप्त नहीं होता और मुझमें स्थित रहता है।
श्लोक 20.9
सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, जो निष्काम भाव और श्रद्धा से अपने कर्तव्य द्वारा मेरा नित्य भजन करता है, उसका मन धीरे–धीरे निर्मल और प्रसन्न होता है।
श्लोक 20.10
सरल हिंदी भावार्थ: गुणासक्ति छोड़कर सम्यक दृष्टि और निर्मल अन्तःकरण वाला व्यक्ति मेरी शान्त अवस्था तथा ब्रह्म की अद्वितीय स्थिति प्राप्त करता है।
श्लोक 20.11
सरल हिंदी भावार्थ: शरीर, ज्ञान और क्रिया का साक्षी आत्मा उदासीन निरीक्षक की तरह अविकारी है—यह जानने वाला कल्याण पाता है।
श्लोक 20.12
सरल हिंदी भावार्थ: सूक्ष्म उपाधि के कारण द्रव्य, क्रिया, साधन और अनुभूति का गुणप्रवाह चलता है। मुझमें प्रेम बाँधने वाले ज्ञानी उस उपाधि में आई सम्पत्ति या विपत्ति से भीतर नहीं बदलते।
श्लोक 20.13
सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्रिय और मन को जीतकर, सुख–दुःख तथा श्रेष्ठ, समान, मध्यम और अधम सभी के प्रति समभाव रखो। मेरे दिए राज्याधिकार से सभी लोकों की रक्षा करो।
श्लोक 20.14
सरल हिंदी भावार्थ: राजा का सर्वोच्च कल्याण प्रजापालन है। उचित रक्षा करने वाला प्रजा के पुण्य का छठा भाग पाता है; बिना रक्षा किए कर लेने वाला पुण्य खोकर प्रजा के दोषों का भागी बनता है।
श्लोक 20.15
सरल हिंदी भावार्थ: श्रेष्ठ ज्ञानियों की सम्मति के अनुसार धर्म को प्रधान रखकर पृथ्वी की रक्षा करो। प्रजा के प्रेमपात्र बनकर तुम शीघ्र ही अपने घर आए सिद्ध महात्माओं का दर्शन करोगे।
श्लोक 20.16
सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, कोई वर भी माँगो। मैं तुम्हारे सद्गुण और शील से वश हूँ; केवल यज्ञ, तप या योग से इतना सहज नहीं मिलता जितना समचित्त साधक को मिलता हूँ।
श्लोक 20.17
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—विश्वगुरु भगवान की शिक्षा को पृथु ने सिर झुकाकर आदर से स्वीकार किया।
श्लोक 20.18
सरल हिंदी भावार्थ: अपने कर्म से लज्जित इन्द्र प्रेम से उनके चरण छू रहे थे। पृथु ने उन्हें गले लगाकर मन का समस्त द्वेष छोड़ दिया।
श्लोक 20.19
सरल हिंदी भावार्थ: पृथु ने विश्वात्मा भगवान की पूजा की और बढ़ती हुई भक्ति से उनके चरणकमल पकड़ लिए।
श्लोक 20.20
सरल हिंदी भावार्थ: कमलनयन प्रभु जाने को उद्यत होकर भी भक्त पर कृपा और प्रेम से रुक गए; वे पृथु को देखते रहे और तुरंत नहीं चले।
श्लोक 20.21
सरल हिंदी भावार्थ: आदिराज पृथु हाथ जोड़े खड़े थे। आँसुओं से भरी आँखों के कारण स्पष्ट देख नहीं पा रहे थे और भावविह्वल होकर कुछ कह नहीं सके; उन्होंने भगवान को हृदय में आलिङ्गन किया।
श्लोक 20.22
सरल हिंदी भावार्थ: फिर आँसू पोंछकर उन्होंने उन अतृप्तिदायक सुन्दर प्रभु को देखा, जिनके चरण भूमि को छू रहे थे और हाथ गरुड़ के ऊँचे कन्धे पर था; तब बोले।
श्लोक 20.23
सरल हिंदी भावार्थ: पृथु ने कहा—मुक्ति के स्वामी, ज्ञानी आपसे गुणमयी देहों के विषयभोग क्यों माँगे, जो दुःखमय योनियों में भी मिलते हैं? मैं ऐसे वर नहीं चाहता।
श्लोक 20.24
सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ महात्माओं के हृदय से मुख तक बहता आपके चरणों की कथामृत का आस्वाद न हो, वह मुक्ति भी नहीं चाहता। मुझे उसे सुनने के लिए दस हजार कान दीजिए—यही मेरा वर है।
श्लोक 20.25
सरल हिंदी भावार्थ: महात्माओं के मुख से निकली आपकी चरणसुधा की वायु भूले हुए तत्त्वमार्ग की स्मृति जगा देती है। हम जैसे असम्पूर्ण साधकों को उसकी आवश्यकता है; दूसरे वर पर्याप्त नहीं।
श्लोक 20.26
सरल हिंदी भावार्थ: सत्सङ्ग में संयोग से भी आपका कल्याणकारी यश एक बार सुन लेने वाला विवेकी उससे कैसे हटेगा? लक्ष्मी ने भी आपके गुणों में प्रेम से आपको वरण किया।
श्लोक 20.27
सरल हिंदी भावार्थ: मैं भी लक्ष्मी की तरह गुणों के आश्रय पुरुषोत्तम आपकी सेवा चाहता हूँ। हम दोनों आपके चरणों में एकाग्र हैं; एक ही स्वामी की सेवा की होड़ से हमारे बीच कलह न हो।
श्लोक 20.28
सरल हिंदी भावार्थ: यदि सेवा में मुझसे जगन्माता के अधिकार में हस्तक्षेप हो भी जाए तो आप दीनवत्सल होकर मेरी छोटी सेवा को बड़ा मानेंगे। आप आत्मतृप्त हैं; किसी बाहरी सम्पदा के मोहताज नहीं।
श्लोक 20.29
सरल हिंदी भावार्थ: इसीलिए संत आपकी भक्ति करते हैं, जो माया के गुणों का भ्रम दूर करते हैं। आपके चरणों का स्मरण करने के अतिरिक्त संतों का दूसरा उद्देश्य हमें नहीं दिखाई देता।
श्लोक 20.30
सरल हिंदी भावार्थ: आप भक्त से वर माँगने को कहते हैं; मुझे लगता है यह वाणी भी जगत की परीक्षा लेने वाली है। आपकी वाणी की डोर में बँधा जीव फिर कामनाओं से कर्म में कैसे उलझ जाए!
श्लोक 20.31
सरल हिंदी भावार्थ: आपकी माया से भटका अज्ञानी आत्मसत्य को छोड़ दूसरी इच्छाएँ करता है। जैसे पिता बालक के बिना माँगे भी उसका हित करता है, वैसे आप स्वयं हमारा सच्चा कल्याण कीजिए।
श्लोक 20.32
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—सर्वज्ञ भगवान ने स्तुति सुनकर कहा—राजन्, तुममें मेरी भक्ति स्थिर हो। सौभाग्य से तुम्हारी बुद्धि मुझमें ऐसी लगी है जिससे दुस्तर माया पार होती है।
श्लोक 20.33
सरल हिंदी भावार्थ: प्रजापालक, सावधान होकर मेरी आज्ञा का पालन करो। मेरे निर्देश का पालन करने वाला सर्वत्र कल्याण पाता है।
श्लोक 20.34
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—राजर्षि पृथु के सार्थक वचनों का अभिनन्दन करके, उनकी पूजा स्वीकार कर और अनुग्रह देकर भगवान जाने को उद्यत हुए।
श्लोक 20.35
सरल हिंदी भावार्थ: देवता, ऋषि, पितर, गन्धर्व, सिद्ध, चारण, नाग, किन्नर, अप्सराएँ, मनुष्य, पक्षी और अनेक अन्य प्राणी वहाँ थे।
श्लोक 20.36
सरल हिंदी भावार्थ: राजा ने सबमें यज्ञेश्वर का भाव रखकर वाणी, भेंट, प्रणाम और भक्ति से सम्मान किया। सब भगवान के साथ वहाँ से विदा हुए।
श्लोक 20.37
सरल हिंदी भावार्थ: अच्युत भगवान मानो आचार्यों सहित राजर्षि का मन अपने साथ ले जाते हुए अपने धाम लौट गए।
श्लोक 20.38
सरल हिंदी भावार्थ: दर्शन देकर भी सामान्य इन्द्रियों से परे रहने वाले देवाधिदेव को प्रणाम करके पृथु अपनी नगरी लौटे।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 20 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 21
प्रजा के प्रति पृथु का राजधर्म उपदेश
श्लोक 21.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—नगरी में मोती, फूलमालाएँ, रेशमी वस्त्र, स्वर्णतोरण और अत्यन्त सुगन्धित धूप से स्थान–स्थान सजावट हुई थी।
श्लोक 21.2
सरल हिंदी भावार्थ: गलियाँ, चौराहे और मार्ग चन्दन–अगरु के जल से सींचे गए थे; पुष्प, अक्षत, फल, अङ्कुर, लावा और दीपों से मंगलसज्जा थी।
श्लोक 21.3
सरल हिंदी भावार्थ: गुच्छों वाले केले के स्तम्भ, सुपारी के पौधे और वृक्षों के पत्तों की मालाएँ चारों ओर लगी थीं।
श्लोक 21.4
सरल हिंदी भावार्थ: प्रजा दीप और मंगलभेंटें लेकर स्वागत को आई; चमकते कुण्डलों से सजी सुन्दर कन्याएँ भी उपस्थित थीं।
श्लोक 21.5
सरल हिंदी भावार्थ: शङ्ख, दुन्दुभि और पुरोहितों की वेदध्वनि के बीच वीर पृथु स्तुति सुनते हुए, अभिमानरहित होकर महल में प्रवेश किए।
श्लोक 21.6
सरल हिंदी भावार्थ: सम्मान पाकर उन्होंने भी प्रसन्नतापूर्वक नगर और ग्राम के लोगों का सम्मान किया तथा प्रिय भेंटें दीं।
श्लोक 21.7
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसे अनेक निर्दोष और महान कर्म करते हुए पृथु ने पृथ्वी का पालन किया, विस्तृत यश स्थापित किया और अन्त में परम पद प्राप्त किया।
श्लोक 21.8
सरल हिंदी भावार्थ: सूत ने कहा—गुणवानों द्वारा सम्मानित आदिराज के यश का वर्णन सुनकर महान भक्त विदुर ने मैत्रेय की प्रशंसा की और फिर पूछा।
श्लोक 21.9
सरल हिंदी भावार्थ: विदुर बोले—ब्राह्मणों ने पृथु का अभिषेक किया और सभी देवताओं ने उन्हें सम्मान दिया। उनकी भुजाओं में वैष्णव तेज था जिससे उन्होंने पृथ्वी का दोहन किया।
श्लोक 21.10
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी कीर्ति कौन विवेकी नहीं सुनेगा? आज भी राजा और लोकपाल उनके स्थापित कल्याणकारी मार्गों से लाभ उठाते हैं। मुझे उनके पवित्र कर्म सुनाइए।
श्लोक 21.11
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—पृथु गङ्गा और यमुना के बीच रहते थे। वे संचित पुण्यफल को समाप्त करने के लिए केवल प्रारब्ध से मिले भोग स्वीकार करते थे।
श्लोक 21.12
सरल हिंदी भावार्थ: सात द्वीपों में उनकी आज्ञा निर्बाध चलती थी; फिर भी वे ब्रह्मनिष्ठ ज्ञानियों और भगवान के भक्तों की आध्यात्मिक स्वतन्त्रता का आदर करते थे।
श्लोक 21.13
सरल हिंदी भावार्थ: एक बार उन्होंने महान यज्ञ की दीक्षा ली। वहाँ देवताओं, ब्रह्मर्षियों और राजर्षियों की बड़ी सभा हुई।
श्लोक 21.14
सरल हिंदी भावार्थ: सब पूजनीय अतिथियों का यथायोग्य सम्मान करने के बाद वे सभा के बीच ऐसे उठे जैसे तारों के बीच चन्द्रमा।
श्लोक 21.15
सरल हिंदी भावार्थ: वे ऊँचे कद, लम्बी पुष्ट भुजाओं, गौर वर्ण, अरुणकमलनयनों, सुन्दर नासिका, सौम्य मुख, मजबूत कन्धों और उज्ज्वल दाँतों की मुस्कान वाले थे।
श्लोक 21.16
सरल हिंदी भावार्थ: उनका वक्ष विशाल, कटिभाग विस्तृत, उदर सुन्दर वलियों वाला, नाभि गहरी, जाँघें स्वर्ण जैसी और चरण उन्नत थे।
श्लोक 21.17
सरल हिंदी भावार्थ: सूक्ष्म, घुँघराले, काले और चिकने केश तथा शङ्ख जैसी गर्दन थी; उन्होंने बहुमूल्य रेशमी वस्त्र और उत्तरीय धारण किया था।
श्लोक 21.18
सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञव्रत के कारण आभूषण उतारे हुए थे, जिससे स्वाभाविक सौन्दर्य प्रकट था। वे कृष्णमृगचर्म धारण किए और हाथ में कुश लिए उचित व्रतवेश में थे।
श्लोक 21.19
सरल हिंदी भावार्थ: शीतल और स्नेहपूर्ण नेत्रों से चारों ओर देखकर राजा सभा को प्रसन्न करते हुए बोलने लगे।
श्लोक 21.20
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी वाणी सुन्दर शब्दों वाली, कोमल, स्पष्ट, अर्थगम्भीर और निडर थी; वे सबके उपकार के लिए अपनी समझ प्रकट कर रहे थे।
श्लोक 21.21
सरल हिंदी भावार्थ: राजा बोले—यहाँ आए सज्जन सभासदो, आपका मंगल हो। सुनिए; धर्म जानने की इच्छा रखने वाले को संतों के सामने अपना विचार रखना चाहिए।
श्लोक 21.22
सरल हिंदी भावार्थ: मुझे प्रजा की रक्षा, आजीविका और उचित मर्यादाओं में स्थापना के लिए दण्डधारी राजा नियुक्त किया गया है।
श्लोक 21.23
सरल हिंदी भावार्थ: इन कर्तव्यों का पालन करके मैं भगवान को प्रसन्न कर सकूँ और वेदज्ञों द्वारा बताए कल्याणकारी लोक प्राप्त करूँ—यही मेरी इच्छा है।
श्लोक 21.24
सरल हिंदी भावार्थ: जो राजा प्रजा को धर्म का मार्ग सिखाए बिना केवल कर लेता है, वह उसके दोषों का भागी होता है और अपना पुण्य खो देता है।
श्लोक 21.25
सरल हिंदी भावार्थ: प्रजाजनो, मेरे इस उत्तरदायित्व को सफल बनाने के लिए ईर्ष्या छोड़, भगवान में मन रखकर अपना वास्तविक हित करने वाले कर्तव्य पूरे करो; यही मुझ पर अनुग्रह होगा।
श्लोक 21.26
सरल हिंदी भावार्थ: निर्मल पितरो, देवताओं और ऋषियों, आप भी इसका अनुमोदन करें; क्योंकि करने वाले, सिखाने वाले और अनुमति देने वाले को कर्मफल में भाग मिलता है।
श्लोक 21.27
सरल हिंदी भावार्थ: श्रेष्ठ पूज्यजनो, यज्ञों के फलदाता परम प्रभु हैं। इस लोक और परलोक में प्राणियों की भिन्न उज्ज्वल स्थितियाँ भी किसी नियामक व्यवस्था का संकेत देती हैं।
श्लोक 21.28
सरल हिंदी भावार्थ: मनु, उत्तानपाद, राजा ध्रुव, राजर्षि प्रियव्रत और हमारे पितामह अङ्ग—
श्लोक 21.29
सरल हिंदी भावार्थ: तथा ब्रह्मा, शिव, प्रह्लाद, बलि और अन्य महात्माओं ने गदाधारी भगवान की आराधना को अपना कर्तव्य माना है।
श्लोक 21.30
सरल हिंदी भावार्थ: केवल मृत्यु के वंशज वेन जैसे धर्मबुद्धि से विमुख लोग इस बात से अलग रहे। भगवान ही धर्म, अर्थ, काम, स्वर्ग और मुक्ति के मूल आधार हैं।
श्लोक 21.31
सरल हिंदी भावार्थ: उनके चरणों की सेवा में बढ़ती रुचि अनेक जन्मों का अन्तःकरणमल शीघ्र मिटाती है, जैसे उनके अँगूठे से निकली गङ्गा पवित्र करती है।
श्लोक 21.32
सरल हिंदी भावार्थ: समस्त मानसिक मल दूर होने पर मनुष्य अनासक्ति और विशेष आत्मज्ञान से समर्थ होता है। उनके चरणों का आश्रय लेकर वह फिर क्लेशमय संसार में नहीं लौटता।
श्लोक 21.33
सरल हिंदी भावार्थ: निष्कपट होकर अपनी मानसिक, वाचिक और शारीरिक वृत्तियों तथा कर्तव्यकर्मों से उन्हीं की आराधना करो; उनके चरण प्रत्येक अधिकारी को उचित फल देते हैं।
श्लोक 21.34
सरल हिंदी भावार्थ: स्वरूप से विशुद्ध ज्ञानमात्र और गुणातीत भगवान ही विविध सामग्री, गुण, क्रिया, मन्त्र, प्रयोजन, भाव, नाम और रूप के द्वारा अनेक प्रकार के यज्ञ बनकर प्रकट होते हैं।
श्लोक 21.35
सरल हिंदी भावार्थ: प्रकृति, काल, संस्कार और कर्म से बने शरीर में चेतना के रूप में स्थित प्रभु कर्मफल के नियन्ता दिखाई देते हैं, जैसे लकड़ी में अग्नि उसके रूप के अनुसार प्रकट होती है।
श्लोक 21.36
सरल हिंदी भावार्थ: यह मेरा सौभाग्य है कि मेरी प्रजा दृढ़व्रत होकर अपने धर्मकर्मों से यज्ञभोक्ताओं के स्वामी और गुरु हरि की निरन्तर पूजा करती है।
श्लोक 21.37
सरल हिंदी भावार्थ: राजसत्ता का बल कभी उन ब्राह्मणों पर अत्याचार न करे जो संयम, सहनशीलता, तप और विद्या से प्रकाशित तथा भगवान के उपासक हैं।
श्लोक 21.38
सरल हिंदी भावार्थ: पुरातन पुरुष हरि भी ज्ञानियों के चरणों का आदर करने का उदाहरण रखते हैं; उनकी नित्य लक्ष्मी और जगत को पवित्र करने वाली कीर्ति विनय की महिमा प्रकट करती है।
श्लोक 21.39
सरल हिंदी भावार्थ: जिनकी सेवा से सबके हृदय में स्थित स्वतन्त्र भगवान प्रसन्न होते हैं, उन ब्रह्मनिष्ठ ज्ञानियों की धर्मपरायण और विनीत भाव से सेवा करो।
श्लोक 21.40
सरल हिंदी भावार्थ: ऐसी निरन्तर सेवा से आत्मा प्रसन्न होकर परम शान्ति पाती है। यज्ञभोक्ता भगवान की प्रसन्नता के लिए इससे बढ़कर माध्यम क्या होगा?
श्लोक 21.41
सरल हिंदी भावार्थ: तत्त्ववेत्ताओं के मुख में श्रद्धा से अर्पित अन्न को भगवान प्रेम से स्वीकार करते हैं; चेतना के भाव से रहित केवल अग्नि में दी आहुति से वे वैसे प्रसन्न नहीं होते।
श्लोक 21.42
सरल हिंदी भावार्थ: ये ज्ञानी श्रद्धा, तप, मंगलाचरण, मौन, संयम और समाधि से नित्य निर्मल वेदज्ञान धारण करते हैं, जिसमें जगत का सत्य दर्पण की तरह प्रतिबिम्बित होता है।
श्लोक 21.43
सरल हिंदी भावार्थ: मैं उनके चरणकमलों की धूल जीवनभर मुकुट पर रखना चाहता हूँ। उसे आदर से धारण करने से पाप मिटते और सद्गुण विकसित होते हैं।
श्लोक 21.44
सरल हिंदी भावार्थ: गुणवान, शीलधन, कृतज्ञ और वृद्धों की सेवा करने वाले के पास सम्पदाएँ आती हैं। ब्रह्मनिष्ठ समुदाय, गौओं के हितकारी जनार्दन और उनके सेवक मुझ पर प्रसन्न हों।
श्लोक 21.45
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—राजा के ये वचन सुनकर पितर, देवता, ब्राह्मण और संत प्रसन्न हुए तथा साधु–साधु कहकर उनका अभिनन्दन किया।
श्लोक 21.46
सरल हिंदी भावार्थ: वे बोले—पुत्र से श्रेष्ठ लोक मिलते हैं, यह श्रुति की बात सत्य हुई; ब्रह्मदण्ड से मरा पापी वेन भी पुत्र पृथु के प्रभाव से अन्धकार से पार हुआ।
श्लोक 21.47
सरल हिंदी भावार्थ: हिरण्यकशिपु भी भगवान की निन्दा से अधोगति को जाने वाला था, पर पुत्र प्रह्लाद के प्रभाव से उसके कुल का कल्याण हुआ।
श्लोक 21.48
सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी के पितृतुल्य वीरश्रेष्ठ, आप दीर्घकाल जीवित रहें! समस्त लोकों के एकमात्र पालक अच्युत में आपकी ऐसी भक्ति है।
श्लोक 21.49
सरल हिंदी भावार्थ: पवित्रकीर्ति नाथ, आपके जैसा स्वामी पाकर हम भी मुकुन्द के आश्रित हो गए; आप भगवान विष्णु की महिमा स्पष्ट करते हैं।
श्लोक 21.50
सरल हिंदी भावार्थ: अपने आश्रितों को ऐसी शिक्षा देना आपके लिए आश्चर्य नहीं। करुणामय महात्माओं का स्वभाव ही प्रजा से प्रेम करना है।
श्लोक 21.51
सरल हिंदी भावार्थ: कर्म और दैव के अधीन भटकते तथा विवेक खोए हमें आपने आज अज्ञान के पार पहुँचने का मार्ग दिखाया है।
श्लोक 21.52
सरल हिंदी भावार्थ: विकसित शुद्ध सत्त्व वाले महान पुरुष को प्रणाम, जो ज्ञान और शासन की शक्तियों में प्रवेश करके अपने तेज से जगत को धारण करते हैं।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 21 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 22
सनत्कुमार का आत्मज्ञान और अनासक्त कर्म
श्लोक 22.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—लोग प्रतापी पृथु की प्रशंसा कर रहे थे कि वहाँ सूर्य जैसे तेजस्वी चार कुमार मुनि आए।
श्लोक 22.2
सरल हिंदी भावार्थ: राजा ने अनुचरों सहित उन सिद्धेश्वरों को आकाश से उतरते देखा; उनकी ज्योति लोकों को पवित्र कर रही थी।
श्लोक 22.3
सरल हिंदी भावार्थ: उनके दर्शन से उमड़े आदर में पृथु सभासदों और अनुचरों सहित उठ खड़े हुए, मानो हर्ष से बाहर गए प्राणों को वापस समेट रहे हों।
श्लोक 22.4
सरल हिंदी भावार्थ: विनय से गर्दन झुकाकर उन्होंने मुनियों को उचित आसन दिए और विधिपूर्वक आदर से पूजा की।
श्लोक 22.5
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने मुनियों के चरणधोवन का जल मस्तक पर धारण किया और शीलवानों के आदर्श स्वागत का आचरण किया।
श्लोक 22.6
सरल हिंदी भावार्थ: स्वर्णासनों पर अग्नि की तरह तेजस्वी बैठे, शिव से भी पहले उत्पन्न उन कुमारों से श्रद्धा और संयमयुक्त राजा ने प्रसन्न होकर कहा।
श्लोक 22.7
सरल हिंदी भावार्थ: पृथु बोले—मंगल के आश्रय महात्माओ, मैंने कौन सा शुभ कर्म किया कि आप जैसे योगियों के लिए भी दुर्लभ संतों का दर्शन मिला?
श्लोक 22.8
सरल हिंदी भावार्थ: जिस पर ज्ञानियों, शिव, विष्णु और उनके सेवकों की कृपा हो, उसके लिए इस लोक या परलोक में क्या दुर्लभ रह सकता है?
श्लोक 22.9
सरल हिंदी भावार्थ: आप लोकों में घूमते हैं, फिर भी सामान्य लोग आपको नहीं पहचान पाते, जैसे सबके भीतर स्थित सर्वद्रष्टा आत्मा को नहीं जानते।
श्लोक 22.10
सरल हिंदी भावार्थ: वे साधु गृहस्थ निर्धन होकर भी धन्य हैं जिनके घर में पूजनीय अतिथि के लिए जल, तृणासन, बैठने की भूमि और निष्कपट स्वागत मौजूद हो।
श्लोक 22.11
सरल हिंदी भावार्थ: इसके विपरीत सब सम्पदा वाले घर भी संतों के चरणजल से वञ्चित हों तो साँपों के आश्रय वाले वृक्षों जैसे हैं।
श्लोक 22.12
सरल हिंदी भावार्थ: श्रेष्ठ ज्ञानियो, आपका स्वागत है। मुक्तिकामी धीरजन श्रद्धा से आपके आचरण का अनुसरण करते हैं; आप बालरूप होकर भी महान व्रतधारी हैं।
श्लोक 22.13
सरल हिंदी भावार्थ: नाथो, इन्द्रियविषयों को ही पुरुषार्थ समझकर अपने कर्मों से इस विपत्तिपूर्ण संसार में पड़े हम लोगों का क्या कल्याण हो सकता है?
श्लोक 22.14
सरल हिंदी भावार्थ: आप आत्मारामों से कुशल पूछना आवश्यक नहीं, क्योंकि आपके भीतर शुभ–अशुभ परिस्थितियों की आश्रित मनोवृत्तियाँ नहीं उठतीं।
श्लोक 22.15
सरल हिंदी भावार्थ: आपको अपना हितैषी जानकर मैं विश्वास से पूछता हूँ—इस संसार में शीघ्र और वास्तविक कल्याण किस साधन से होगा?
श्लोक 22.16
सरल हिंदी भावार्थ: स्पष्ट है कि आत्मज्ञानियों के आत्मा और सबका हित करने वाले अजन्मा भगवान अपने भक्तों पर कृपा के लिए सिद्धरूप से भ्रमण करते हैं।
श्लोक 22.17
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—पृथु की सारयुक्त, सुन्दर, संक्षिप्त और मधुर बात सुनकर सनत्कुमार प्रेम से मुस्कराए और उत्तर दिया।
श्लोक 22.18
सरल हिंदी भावार्थ: सनत्कुमार बोले—महाराज, सभी प्राणियों का हित चाहने वाले आपने उत्तम प्रश्न किया है। ज्ञानी संतों की बुद्धि ऐसी ही होती है।
श्लोक 22.19
सरल हिंदी भावार्थ: संतों का मिलन दोनों पक्षों को प्रिय होता है; उनके संवाद और प्रश्न सभी का कल्याण फैलाते हैं।
श्लोक 22.20
सरल हिंदी भावार्थ: आपमें हरि के चरणों और गुणगान के प्रति दुर्लभ दृढ़ प्रेम है। यह प्रेम अन्तःकरण की कामना और मलिन संस्कार दूर करता है।
श्लोक 22.21
सरल हिंदी भावार्थ: शास्त्रों में विचार करके मनुष्य के कल्याण का यही निश्चित साधन बताया गया है—आत्मा से भिन्न वस्तुओं में अनासक्ति और गुणातीत ब्रह्म में दृढ़ प्रेम।
श्लोक 22.22
सरल हिंदी भावार्थ: यह प्रेम श्रद्धा, भगवद्धर्म का आचरण, तत्त्वजिज्ञासा, अध्यात्मयोग में निष्ठा, योगेश्वर की उपासना और भगवान की पवित्र कथा से बढ़ता है।
श्लोक 22.23
सरल हिंदी भावार्थ: धन और इन्द्रियसुख में डूबे लोगों की गोष्ठियों की लालसा छोड़ने, उनकी आसक्ति बढ़ाने वाली वस्तुएँ न लेने, एकान्तप्रियता और हरि के गुणामृत में आत्मसन्तोष से वह प्रेम पुष्ट होता है।
श्लोक 22.24
सरल हिंदी भावार्थ: अहिंसा, परमहंसों का आचरण, मुकुन्द की श्रेष्ठ लीलाओं का स्मरण, निष्काम यम–नियम, निन्दा का त्याग, अनावश्यक इच्छाओं से निवृत्ति और द्वन्द्वसहन भी उसके साधन हैं।
श्लोक 22.25
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के गुणों का बार–बार गान करते हुए बढ़ती भक्ति से स्थूल–सूक्ष्म अनात्म वस्तुओं में आसक्ति छूटती और गुणातीत ब्रह्म में सहज अनुराग होता है।
श्लोक 22.26
सरल हिंदी भावार्थ: गुरु का आश्रय पाकर ब्रह्म में दृढ़ प्रेम होने पर ज्ञान और वैराग्य की शक्ति सूक्ष्म कर्मबीजों को जला देती है, जैसे लकड़ी से निकली अग्नि उसी लकड़ी को जला देती है।
श्लोक 22.27
सरल हिंदी भावार्थ: अन्तःकरण का अज्ञान जलने और उसके गुणों से मुक्त होने पर भीतर–बाहर का वह विभाजन नहीं रहता जो पहले आत्मा और परमात्मा के बीच था; जैसे जागने पर स्वप्न का भेद मिट जाता है।
श्लोक 22.28
सरल हिंदी भावार्थ: जब तक उपाधि का आधार रहता है तभी मनुष्य आत्मा, विषय और उनके परे नियन्ता को अलग–अलग सीमित रूपों में देखता है; उपाधि मिटने पर वह भ्रान्ति नहीं रहती।
श्लोक 22.29
सरल हिंदी भावार्थ: जैसे जल आदि प्रतिबिम्ब के माध्यम होने पर अपने और दूसरे रूप का भेद दिखाई देता है, वैसे ही उपाधि के कारण भेदबुद्धि होती है।
श्लोक 22.30
सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्रियाँ विषयों की ओर खिंचें तो विषयध्यान में पड़ा मन बुद्धि का विवेक खींच लेता है, जैसे तट की वनस्पति सरोवर का जल सोख लेती है।
श्लोक 22.31
सरल हिंदी भावार्थ: तब आत्मस्मृति घटती है और स्मृति के नष्ट होने से ज्ञान लुप्त होता है। ज्ञानी इस आत्मज्ञान के अवरोध को अपने ही स्वरूप का विस्मरण कहते हैं।
श्लोक 22.32
सरल हिंदी भावार्थ: अपने सत्य स्वरूप को भुलाकर दूसरी वस्तु को अधिक प्रिय मान लेना मनुष्य के हित की सबसे बड़ी हानि है।
श्लोक 22.33
सरल हिंदी भावार्थ: धन और विषयों का अत्यधिक चिन्तन मनुष्य के सभी श्रेष्ठ उद्देश्यों को नष्ट करता है। उससे ज्ञान और अनुभव छूटकर चेतना जड़ता की ओर गिरती है।
श्लोक 22.34
सरल हिंदी भावार्थ: गहरे अज्ञान के पार जाना चाहने वाले को उस आसक्ति से बचना चाहिए जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों में बड़ी बाधा बनती है।
श्लोक 22.35
सरल हिंदी भावार्थ: इनमें मोक्ष ही अन्तिम और स्थायी पुरुषार्थ है, क्योंकि धर्म, अर्थ और काम के सांसारिक फल सदा काल के भय से जुड़े हैं।
श्लोक 22.36
सरल हिंदी भावार्थ: गुणों की क्रिया से उत्पन्न ऊँचे या नीचे सभी भोगरूपों में स्थायी सुरक्षा नहीं है; काल उनकी आशाओं का अन्त कर देता है।
श्लोक 22.37
सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, स्थावर–जङ्गम प्राणी शरीर, इन्द्रिय, प्राण, बुद्धि और अहंकार से ढके हैं। उनके हृदय में साक्षी बनकर प्रकाशित विश्वव्यापक भगवान को अपना सच्चा आत्मस्वरूप जानो।
श्लोक 22.38
सरल हिंदी भावार्थ: जिनमें माया से यह कारण–कार्य जगत प्रकट होता है, जैसे भ्रम से माला में साँप दिखाई दे, उन नित्यमुक्त, पूर्ण निर्मल और कर्ममल से परे परम तत्त्व की मैं शरण लेता हूँ।
श्लोक 22.39
सरल हिंदी भावार्थ: संत भगवान के चरणकमलों की भक्ति से कर्मबन्धन की गाँठ खोलते हैं; केवल इन्द्रियनिरोध करने वाले भक्ति से रिक्त साधक वैसे सफल नहीं होते। उन शरणयोग्य वासुदेव का भजन करो।
श्लोक 22.40
सरल हिंदी भावार्थ: मन और पाँच इन्द्रियों के मगरों से भरे संसारसागर को बिना नौका केवल प्रयास से पार करना बड़ा कठिन है। भगवान के पूजनीय चरणों को नौका बनाकर इस दुस्तर संकट से पार जाओ।
श्लोक 22.41
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—आत्मज्ञानी ब्रह्मापुत्र सनत्कुमार ने पृथु को आत्मकल्याण का मार्ग दिखाया। राजा ने उनकी प्रशंसा करके कहा।
श्लोक 22.42
सरल हिंदी भावार्थ: पृथु बोले—दुःखियों पर कृपा करने वाले हरि ने पहले मुझ पर अनुग्रह किया था। आप उसी अनुग्रह को पूरा करने के लिए आए हैं।
श्लोक 22.43
सरल हिंदी भावार्थ: करुणामय महात्माओ, आपने वह कार्य पूर्ण कर दिया। मेरे शरीर सहित सब कुछ संतों की कृपा से मिला है; बदले में मैं आपको क्या दे सकता हूँ?
श्लोक 22.44
सरल हिंदी भावार्थ: प्राण, पत्नी, पुत्र, उपकरणों सहित घर, राज्य, सेना, पृथ्वी और धनकोश—सब आपके चरणों में समर्पित हैं।
श्लोक 22.45
सरल हिंदी भावार्थ: सेनापतित्व, राज्य, दण्डनीति और लोकों पर अधिकार का वास्तविक अधिकारी वही है जो वेद–शास्त्र के मर्म को जानकर न्याय करे।
श्लोक 22.46
सरल हिंदी भावार्थ: पृथु ने कहा—ब्रह्मज्ञानी जो भोगता, पहनता और दान देता है, वह उसके ज्ञानाधिकार का ही फल है; उसकी कृपा से शासक आदि भी अन्न पाते हैं। यह तत्कालीन ब्राह्मण–राजधर्म के सम्मान का कथन है।
श्लोक 22.47
सरल हिंदी भावार्थ: जिन वेदज्ञों ने हमें आत्मज्ञान में भगवान की ऐसी गति स्पष्ट की, उनके उपकार का बदला कोई अपनी तुच्छ भेंट से कैसे दे? वे अपनी असीम करुणा और सत्कर्म से ही प्रसन्न हों।
श्लोक 22.48
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—आत्मयोग के स्वामी कुमारों ने आदिराज की पूजा स्वीकार की, उनके शील की प्रशंसा की और सबके देखते आकाशमार्ग से चले गए।
श्लोक 22.49
सरल हिंदी भावार्थ: महात्माओं में अग्रणी पृथु अध्यात्मशिक्षा में स्थित होकर आत्मा में स्थिर और पूर्णकाम जैसे हो गए।
श्लोक 22.50
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने समय, स्थान, शक्ति, उपयुक्तता और साधनों के अनुसार सभी कर्म ब्रह्मार्पण भाव से किए।
श्लोक 22.51
सरल हिंदी भावार्थ: फल भगवान को अर्पित करके वे अनासक्त और एकाग्र रहे; स्वयं को प्रकृति से परे तथा परमात्मा को कर्मों का साक्षी–नियन्ता जानते थे।
श्लोक 22.52
सरल हिंदी भावार्थ: गृहस्थ और साम्राज्यवैभव से सम्पन्न रहते हुए भी वे सूर्य की तरह अनासक्त थे; अहंकार न होने से इन्द्रियविषयों में नहीं फँसे।
श्लोक 22.53
सरल हिंदी भावार्थ: अध्यात्मयोग के साथ कर्तव्य निभाते हुए उन्होंने अर्चि से अपने अनुरूप पाँच पुत्र उत्पन्न किए।
श्लोक 22.54
सरल हिंदी भावार्थ: उनके नाम विजिताश्व, धूम्रकेश, हर्यक्ष, द्रविण और वृक थे। पृथु अकेले ही सभी लोकपालों के गुण धारण करते थे।
श्लोक 22.55
सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के भाव में स्थित होकर वे उचित समय पर जगत की रक्षा करते और सौम्य मन, वाणी तथा सद्गुणों से प्रजा को प्रसन्न रखते थे।
श्लोक 22.56
सरल हिंदी भावार्थ: चन्द्रमा की तरह सुख देने से उनका राजा नाम सार्थक था; सूर्य की तरह वे पृथ्वी की सम्पदा उचित समय पर लेते, लौटाते और उपयोग करते थे।
श्लोक 22.57
सरल हिंदी भावार्थ: तेज में अग्नि, दुर्जयता में इन्द्र, सहनशीलता में पृथ्वी और अभिलषित कल्याण देने में आकाश के समान थे।
श्लोक 22.58
सरल हिंदी भावार्थ: वर्षामेघ की तरह आवश्यक समृद्धि देकर प्रजा को तृप्त करते; गम्भीरता में समुद्र और धैर्य में पर्वतराज जैसे थे।
श्लोक 22.59
सरल हिंदी भावार्थ: अनुशासन में धर्मराज, अद्भुत सम्पदा में हिमालय, कोशसमृद्धि में कुबेर और गोपनीय व्यवस्था में वरुण के समान थे।
श्लोक 22.60
सरल हिंदी भावार्थ: वायु की तरह सर्वव्यापी सम्पर्क रखने वाले तथा बल, तेज और ओज में प्रचण्ड शिव के समान दुर्धर्ष थे।
श्लोक 22.61
सरल हिंदी भावार्थ: सौन्दर्य में कामदेव, आत्मबल में सिंह, प्रजा के प्रति वात्सल्य में मनु और प्रभुत्व में ब्रह्मा के समान थे।
श्लोक 22.62
सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मचर्चा में बृहस्पति और आत्मसंयम में हरि जैसे थे। गौ, गुरु, ज्ञानियों और भगवान के भक्तों के प्रति भक्ति तथा लज्जा, विनय और परोपकार में उनका आदर्श स्वयं उनका चरित्र था।
श्लोक 22.63
सरल हिंदी भावार्थ: पुरुष तीनों लोकों में उनकी ऊँची कीर्ति गाते थे; उनका यश स्त्रियों के कानों तक भी ऐसे पहुँचा जैसे संतों के हृदय में श्रीराम का प्रिय चरित्र।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 22 समाप्त ॥
चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 23
पृथु का वानप्रस्थ, परमगति और फलश्रुति
श्लोक 23.1
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—सब आश्रितों का पोषण कर चुके आत्मसंयमी प्रजापालक पृथु ने एक दिन देखा कि उनकी आयु ढल गई है।
श्लोक 23.2
सरल हिंदी भावार्थ: वे स्थावर और जङ्गम सबकी आजीविका देने वाले, संतों के धर्मरक्षक और जिस उद्देश्य से जन्मे थे उस ईश्वरीय आज्ञा को पूरा करने वाले थे।
श्लोक 23.3
सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने अपनी पुत्री मानी पृथ्वी का भार पुत्रों को सौंपा। प्रजा उनके वियोग से दुखी थी; वे पत्नी के साथ तपोवन चले गए।
श्लोक 23.4
सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ वानप्रस्थों के मान्य मार्ग में अटल नियम लेकर उन्होंने कठोर तप आरम्भ किया, जैसे पहले पृथ्वी को व्यवस्थित करने में दृढ़ प्रयत्न किया था।
श्लोक 23.5
सरल हिंदी भावार्थ: कथा में उनके कन्द–मूल–फल, कभी सूखे पत्तों, कुछ समय जल और फिर वायु पर निर्वाह का तपवर्णन है।
श्लोक 23.6
सरल हिंदी भावार्थ: ग्रीष्म में पञ्चाग्नि, वर्षा में खुली वर्षाधारा, शीत में गले तक जल और भूमि पर शयन जैसे तप किए, ऐसा पौराणिक वर्णन है।
श्लोक 23.7
सरल हिंदी भावार्थ: सहनशील, संयतवाणी, इन्द्रियजयी, ब्रह्मचारी और प्राणसंयमी होकर वे कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए तप करते रहे।
श्लोक 23.8
सरल हिंदी भावार्थ: क्रमशः साधना से कर्ममल नष्ट हुआ; प्राणसंयम से मन और पाँच इन्द्रियाँ वश में आईं और बन्धन कट गए।
श्लोक 23.9
सरल हिंदी भावार्थ: सनत्कुमार ने जो परम अध्यात्मयोग बताया था, उसी से पुरुषश्रेष्ठ पृथु परम पुरुष की आराधना करते रहे।
श्लोक 23.10
सरल हिंदी भावार्थ: श्रद्धा से निरन्तर भगवद्धर्म का पालन करने वाले सज्जन पृथु की भगवान में अनन्य भक्ति हो गई।
श्लोक 23.11
सरल हिंदी भावार्थ: सेवा से शुद्ध अन्तःकरण और निरन्तर स्मरण के कारण वैराग्ययुक्त ज्ञान उत्पन्न हुआ; उसकी तीक्ष्ण शक्ति से संशय और सूक्ष्म जीवबन्धन की गाँठ कट गई।
श्लोक 23.12
सरल हिंदी भावार्थ: आत्मगति पाकर और अन्य इच्छाएँ मिट जाने पर उन्होंने भेद काटने वाले साधनज्ञान का आग्रह भी छोड़ा। जब तक भगवान की कथा में प्रेम न हो, साधक को योगसाधना में असावधान नहीं होना चाहिए।
श्लोक 23.13
सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार वीरश्रेष्ठ पृथु ने चित्त को आत्मा में दृढ़ स्थापित किया और समय आने पर ब्रह्मभाव में स्थित होकर शरीर त्याग दिया।
श्लोक 23.14
सरल हिंदी भावार्थ: कथा के योगवर्णन में कहा गया है कि उन्होंने एड़ियों से अधोभाग सँभाला और प्राण को क्रमशः नाभि, उदर, हृदय, छाती, कण्ठ तथा मस्तक की ओर उठाया।
श्लोक 23.15
सरल हिंदी भावार्थ: अनासक्त होकर प्राण को मस्तक तक ले गए और देह के वायु, पृथ्वी तथा तेजतत्त्व को उनके व्यापक तत्त्वों में लीन किया।
श्लोक 23.16
सरल हिंदी भावार्थ: आकाशांश को आकाश और जलांश को जल में मिलाया; फिर पृथ्वी को जल, जल को तेज, तेज को वायु और वायु को आकाश में क्रम से लीन किया।
श्लोक 23.17
सरल हिंदी भावार्थ: मन और इन्द्रियों को उनके सूक्ष्म विषयों में, उन्हें अहंकार में और अहंकार को महत्तत्त्व में समेटा, ऐसा तत्त्वलय का वर्णन है।
श्लोक 23.18
सरल हिंदी भावार्थ: गुणों के समस्त विन्यास को मायिक जीवोपाधि में समेटकर ज्ञान और वैराग्य की शक्ति से उस सूक्ष्म संस्कार को भी छोड़ा तथा अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो गए।
श्लोक 23.19
सरल हिंदी भावार्थ: उनकी महारानी अर्चि भी वन गई थीं। वे इतनी सुकुमारी थीं कि पहले उनके चरण पृथ्वी के कठोर स्पर्श के भी अभ्यस्त नहीं थे।
श्लोक 23.20
सरल हिंदी भावार्थ: पति के व्रतधर्म में निष्ठा, सेवा और ऋषियों जैसी सादगी से उनका शरीर दुर्बल हुआ, फिर भी पति के स्नेह और आदर से तृप्त होकर वे कष्ट को प्रधान नहीं मानती थीं।
श्लोक 23.21
सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वीपति और अपने प्रिय पति का शरीर चेतनारहित देखकर अर्चि ने कुछ विलाप किया और पर्वत की ढलान पर चिता बनवाई।
श्लोक 23.22
सरल हिंदी भावार्थ: कथा कहती है कि अन्त्यकर्म और जलाञ्जलि देकर, नदी में स्नान करके तथा देवताओं को प्रणाम और चिता की परिक्रमा करके अर्चि पति का ध्यान करती अग्नि में प्रविष्ट हुईं। यह प्राचीन आख्यान का वर्णन है, आज विधवा के लिए अनुकरणीय धर्म या निर्देश नहीं।
श्लोक 23.23
सरल हिंदी भावार्थ: पति पृथु के पीछे गई साध्वी अर्चि को देखकर हजारों देवपत्नियों ने अपने पतियों सहित उनकी निष्ठा की प्रशंसा की।
श्लोक 23.24
सरल हिंदी भावार्थ: उस पर्वतशिखर पर पुष्पवर्षा करते हुए और दिव्य वाद्यों की ध्वनि के बीच वे परस्पर कहने लगीं।
श्लोक 23.25
सरल हिंदी भावार्थ: देवपत्नियाँ बोलीं—यह रानी धन्य है; इन्होंने अपने पति की सर्वभाव से वैसे सेवा की जैसे लक्ष्मी यज्ञेश्वर की करती हैं।
श्लोक 23.26
सरल हिंदी भावार्थ: देखो, अर्चि अपने अद्भुत कर्म के प्रभाव से हमारे लोकों को पार करके पति पृथु के पीछे उच्च गति को जा रही हैं।
श्लोक 23.27
सरल हिंदी भावार्थ: क्षणभङ्गुर मनुष्यजीवन में जो निष्काम स्थिति प्राप्त कर लेते हैं, उनके लिए भगवान का पद छोड़ और क्या दुर्लभ होगा?
श्लोक 23.28
सरल हिंदी भावार्थ: बहुत कठिनाई से मुक्ति का अवसर देने वाला मनुष्यजन्म पाकर भी जो केवल विषयों में फँसता है, वह अपने ही हित को खो देता है।
श्लोक 23.29
सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—देवाङ्गनाओं की स्तुति के बीच अर्चि उसी दिव्य गति को पहुँचीं जिसे आत्मज्ञानियों में अग्रणी और अच्युताश्रित पृथु ने पाया था।
श्लोक 23.30
सरल हिंदी भावार्थ: महान भक्त पृथु का ऐसा प्रभाव था। उनके उदार कर्मों का चरित्र मैंने तुम्हें सुनाया।
श्लोक 23.31
सरल हिंदी भावार्थ: जो श्रद्धा और ध्यान से इस महान पुण्यकथा को पढ़े, सुनाए या सुने, उसके लिए पृथु की कल्याणकारी गति का फल कहा गया है।
श्लोक 23.32
सरल हिंदी भावार्थ: फलश्रुति में ब्राह्मण को ब्रह्मतेज, क्षत्रिय को योग्य शासन, वैश्य को व्यापारिक प्रतिष्ठा और शूद्र को श्रेष्ठ सद्गुण प्राप्त होने की बात है; अपने क्षेत्र में उन्नति इसका भाव है।
श्लोक 23.33
सरल हिंदी भावार्थ: श्रद्धा से इसे तीन बार सुनने वाले स्त्री या पुरुष के लिए सन्तानहीनता और निर्धनता के दुःख दूर होकर उत्तम सन्तान तथा समृद्धि मिलने का पारम्परिक फल कहा गया है।
श्लोक 23.34
सरल हिंदी भावार्थ: अल्पकीर्ति वाले को यश और अज्ञानी को ज्ञान मिले—ऐसी फलश्रुति है। यह कथा मंगलकारी और अमंगल दूर करने वाली मानी गई है।
श्लोक 23.35
सरल हिंदी भावार्थ: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि चाहने वालों को इसे श्रद्धा से सुनना चाहिए; इसे पुण्य, यश, शुभ आयु, कल्याण और कलिमलनाश का साधन कहा गया है।
श्लोक 23.36
सरल हिंदी भावार्थ: विजय के लिए प्रस्थान करने वाला राजा यह कथा सुने तो दूसरे राजा उसे पृथु की तरह आदर और भेंट दें—यह भी फलश्रुति का कथन है।
श्लोक 23.37
सरल हिंदी भावार्थ: अन्य आसक्तियाँ छोड़कर भगवान में निर्मल भक्ति बढ़ाते हुए पृथु का यह पवित्र चरित्र सुनो, सुनाओ और पढ़ो।
श्लोक 23.38
सरल हिंदी भावार्थ: विचित्रवीर्य के पुत्र विदुर, यह चरित्र महात्मा की महिमा प्रकट करता है। इसमें मन लगाकर मनुष्य पृथु की श्रेष्ठ गति प्राप्त कर सकता है।
श्लोक 23.39
सरल हिंदी भावार्थ: प्रतिदिन आदर से पृथुचरित्र सुनने–सुनाने और आसक्ति छोड़ने से मनुष्य उन भगवान में गहरा प्रेम पाता है जिनके चरण संसारसागर पार करने की नौका हैं।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 23 समाप्त ॥
इस भाग का भक्ति-सन्देश
सत्ता का उद्देश्य प्रजा की रक्षा, न्याय और आजीविका है। पृथु का चरित्र बाहरी सफलता से भीतर की अनासक्ति तक जाता है। संतों की सेवा, निष्काम कर्म, सभी प्राणियों का हित और भगवान की कथामृत में प्रेम उसके केन्द्र हैं।
पाठाधार और संपादकीय जानकारी
प्राचीन मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents का “श्रीमद्भागवतं—चतुर्थस्कन्धः” है। अध्याय 13–23 में क्रमशः 49, 46, 26, 27, 36, 32, 42, 38, 52, 63 और 39 श्लोक हैं; कुल 450। आधार-पाठ में अध्याय 21 का क्रम 44 के बाद 46–53 अंकित है। श्लोक “इति ब्रुवाणं नृपतिम्” और अंतिम श्लोक का दूसरे संस्कृत संस्करण से मिलान करके यहाँ वह क्रम 45–52 रखा गया है; कोई श्लोक हटाया नहीं गया। हिंदी भावार्थ स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है। वंशोत्पत्ति, दिव्य घटनाएँ और फलश्रुतियाँ पौराणिक परम्परा के अनुसार हैं। सामाजिक उत्पत्तिकथाएँ किसी वर्तमान समुदाय के मूल्य का निर्णय नहीं हैं। अध्याय 23 में अर्चि का अग्निप्रवेश प्राचीन आख्यान की घटना है, आज किसी विधवा के लिए धर्मादेश या अनुकरण का निर्देश नहीं। तपस्या और योगलय के विवरण भी कथा के प्रसंग हैं।
॥ चतुर्थ स्कन्ध • भाग ३ समाप्त ॥
॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥
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