श्रीमद्भागवत महापुराण चतुर्थ स्कन्ध भाग 3 — अध्याय 13–23, पृथु चरित्र और सनत्कुमार उपदेश

भक्ति भावना • पुराण साहित्य

श्रीमद्भागवत महापुराण

चतुर्थ स्कन्ध • भाग ३ • अध्याय १३–२३

४५० मूल श्लोक • प्रत्येक श्लोक का सरल हिंदी भावार्थ

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लोककल्याण का राजधर्म और आत्मकल्याण की भक्ति

वेन के दुराचार से पीड़ित प्रजा की रक्षा के लिए पृथु प्रकट होते हैं। वे आजीविका की व्यवस्था, पृथ्वी के संसाधनों के उचित उपयोग और निष्पक्ष राजधर्म का आदर्श रखते हैं। इन्द्र से वैर छोड़ते हैं, भगवान से कथाश्रवण का प्रेम माँगते हैं और सनत्कुमार से आत्मज्ञान पाते हैं।

इस भाग में अध्याय 13–23 के सभी 450 श्लोक और प्रत्येक का स्वतंत्र सरल हिंदी भावार्थ है। इसके बाद रुद्रगीत, पुरञ्जन और प्रचेताओं के प्रसंग आएँगे।

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 13

ध्रुववंश, राजा अङ्ग और वेन का जन्म

श्लोक 13.1

सूत उवाच । निशम्य कौषारविणोपवर्णितं ध्रुवस्य वैकुण्ठपदाधिरोहणम् । प्ररूढभावो भगवत्यधोक्षजे प्रष्टुं पुनस्तं विदुरः प्रचक्रमे ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूत ने कहा—मैत्रेय से ध्रुव के वैकुण्ठपद प्राप्त करने की कथा सुनकर विदुर का भगवान में प्रेम बढ़ा और उन्होंने फिर प्रश्न किया।

श्लोक 13.2

विदुर उवाच । के ते प्रचेतसो नाम कस्यापत्यानि सुव्रत । कस्यान्ववाये प्रख्याताः कुत्र वा सत्रमासत ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर बोले—सुव्रत, ये प्रचेता कौन थे, किसके पुत्र और किस वंश में प्रसिद्ध थे? उनका यज्ञ कहाँ हुआ था?

श्लोक 13.3

मन्ये महाभागवतं नारदं देवदर्शनम् । येन प्रोक्तः क्रियायोगः परिचर्याविधिर्हरेः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: नारद महान भगवद्भक्त और भगवान का दर्शन करने वाले हैं। उन्होंने भगवान की पूजा तथा कर्मयोग की विधि सिखाई है।

श्लोक 13.4

स्वधर्मशीलैः पुरुषैर्भगवान् यज्ञपूरुषः । इज्यमानो भक्तिमता नारदेनेरितः किल ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: भक्त नारद ने बताया है कि अपने धर्म में स्थित मनुष्य कर्तव्यकर्मों द्वारा यज्ञपुरुष भगवान की आराधना करें।

श्लोक 13.5

यास्ता देवर्षिणा तत्र वर्णिता भगवत्कथाः । मह्यं शुश्रूषवे ब्रह्मन् कार्त्स्न्येनाचष्टुमर्हसि ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवर्षि ने वहाँ भगवान की जो कथाएँ कहीं, उन्हें सुनने की इच्छा रखने वाले मुझे विस्तार से बताइए।

श्लोक 13.6

मैत्रेय उवाच । ध्रुवस्य चोत्कलः पुत्रः पितरि प्रस्थिते वनम् । सार्वभौमश्रियं नैच्छदधिराजासनं पितुः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—ध्रुव के वन चले जाने पर उनके पुत्र उत्कल ने पिता का सार्वभौम राज्य और राजासन स्वीकार नहीं करना चाहा।

श्लोक 13.7

स जन्मनोपशान्तात्मा निःसङ्गः समदर्शनः । ददर्श लोके विततमात्मानं लोकमात्मनि ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे जन्म से ही शान्त, अनासक्त और समदर्शी थे। अपने आत्मा को समस्त जगत में और जगत को आत्मा में देखते थे।

श्लोक 13.8

आत्मानं ब्रह्मनिर्वाणं प्रत्यस्तमितविग्रहम् । अवबोधरसैकात्म्यमानन्दमनुसन्ततम् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे आत्मा को शान्त ब्रह्मस्वरूप, भेदरहित, ज्ञानरस से एक और निरन्तर आनन्दमय अनुभव करते थे।

श्लोक 13.9

अव्यवच्छिन्नयोगाग्निदग्धकर्ममलाशयः । स्वरूपमवरुन्धानो नात्मनोऽन्यं तदैक्षत ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: अटूट योगाग्नि से उनके कर्म और अन्तःकरण का मल जल गया था। अपने स्वरूप में स्थित होकर उन्हें आत्मा से अलग कुछ दिखाई नहीं देता था।

श्लोक 13.10

जडान्धबधिरोन्मत्तमूकाकृतिरतन्मतिः । लक्षितः पथि बालानां प्रशान्तार्चिरिवानलः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: भीतर से प्रबुद्ध होते हुए भी वे बाहर से जड़, अन्धे, बहरे, उन्मत्त या मौन जैसे दिखते थे; बच्चों को वे बुझी ज्वाला वाली अग्नि के समान प्रतीत होते थे।

श्लोक 13.11

मत्वा तं जडमुन्मत्तं कुलवृद्धाः समन्त्रिणः । वत्सरं भूपतिं चक्रुर्यवीयांसं भ्रमेः सुतम् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: कुलवृद्धों और मन्त्रियों ने उन्हें जड़ या उन्मत्त समझकर भ्रमि के छोटे पुत्र वत्सर को राजा बना दिया।

श्लोक 13.12

स्वर्वीथिर्वत्सरस्येष्टा भार्यासूत षडात्मजान् । पुष्पार्णं तिग्मकेतुं च इषमूर्जं वसुं जयम् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: वत्सर की प्रिय पत्नी स्वर्वीथि से पुष्पार्ण, तिग्मकेतु, इष, ऊर्ज, वसु और जय नामक छह पुत्र हुए।

श्लोक 13.13

पुष्पार्णस्य प्रभा भार्या दोषा च द्वे बभूवतुः । प्रातर्मध्यन्दिनं सायमिति ह्यासन् प्रभासुताः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुष्पार्ण की दो पत्नियाँ प्रभा और दोषा थीं। प्रभा के पुत्र प्रातः, मध्यन्दिन और सायम् हुए।

श्लोक 13.14

प्रदोषो निशिथो व्युष्ट इति दोषा सुतास्त्रयः । व्युष्टः सुतं पुष्करिण्यां सर्वतेजसमादधे ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: दोषा के पुत्र प्रदोष, निशीथ और व्युष्ट हुए। व्युष्ट और पुष्करिणी से सर्वतेजा उत्पन्न हुए।

श्लोक 13.15

स चक्षुः सुतमाकूत्यां पत्न्यां मनुमवाप ह । मनोरसूत महिषी विरजान् नड्वला सुतान् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: सर्वतेजा और उनकी पत्नी आकूति से चक्षु नामक मनु हुए। मनु की पत्नी नड्वला से निर्मल स्वभाव वाले पुत्र उत्पन्न हुए।

श्लोक 13.16

पुरुं कुत्सं त्रितं द्युम्नं सत्यवन्तमृतं व्रतम् । अग्निष्टोममतीरात्रं प्रद्युम्नं शिबिमुल्मुकम् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके नाम पुरु, कुत्स, त्रित, द्युम्न, सत्यवान, ऋत, व्रत, अग्निष्टोम, अतिरात्र, प्रद्युम्न, शिबि और उल्मुक थे।

श्लोक 13.17

उल्मुकोऽजनयत्पुत्रान् पुष्करिण्यां षडुत्तमान् । अङ्गं सुमनसं ख्यातिं क्रतुमङ्गिरसं गयम् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उल्मुक और पुष्करिणी से अङ्ग, सुमना, ख्याति, क्रतु, अङ्गिरा और गय नामक छह श्रेष्ठ पुत्र हुए।

श्लोक 13.18

सुनीथाङ्गस्य या पत्नी सुषुवे वेनमुल्बणम् । यद्दौःशील्यात्स राजर्षिर्निर्विण्णो निरगात्पुरात् ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: अङ्ग की पत्नी सुनीथा से उग्र स्वभाव वाला वेन हुआ। उसकी दुष्टता से विरक्त होकर राजर्षि अङ्ग नगरी छोड़ गए।

श्लोक 13.19

यमङ्ग शेपुः कुपिता वाग्वज्रा मुनयः किल । गतासोस्तस्य भूयस्ते ममन्थुर्दक्षिणं करम् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: बाद में वज्र के समान प्रभावशाली वाणी वाले ऋषियों ने क्रुद्ध होकर वेन को शाप दिया। उसकी मृत्यु के बाद उन्होंने उसकी दाहिनी भुजा का मन्थन किया।

श्लोक 13.20

अराजके तदा लोके दस्युभिः पीडिताः प्रजाः । जातो नारायणांशेन पृथुराद्यः क्षितीश्वरः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा के अभाव में डाकुओं से प्रजा पीड़ित थी। तब नारायण के अंश से पृथु प्रकट हुए, जिन्हें आदर्श राजव्यवस्था स्थापित करने वाला प्रथम राजा कहा गया।

श्लोक 13.21

विदुर उवाच । तस्य शीलनिधेः साधोर्ब्रह्मण्यस्य महात्मनः । राज्ञः कथमभूद्दुष्टा प्रजा यद्विमना ययौ ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर ने पूछा—शील के भण्डार, सज्जन और ज्ञानियों का आदर करने वाले महात्मा अङ्ग के यहाँ ऐसा दुष्ट पुत्र कैसे हुआ, जिसके कारण वे विरक्त हो गए?

श्लोक 13.22

किं वांहो वेन उद्दिश्य ब्रह्मदण्डमयूयुजन् । दण्डव्रतधरे राज्ञि मुनयो धर्मकोविदाः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: धर्मज्ञ ऋषियों ने दण्ड और शासन का उत्तरदायित्व रखने वाले राजा वेन पर किस अपराध के कारण ब्रह्मदण्ड लगाया?

श्लोक 13.23

नावध्येयः प्रजापालः प्रजाभिरघवानपि । यदसौ लोकपालानां बिभर्त्योजः स्वतेजसा ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रजापालक राजा अपने तेज में लोकपालों की शक्ति धारण करता है; इसलिए पापी होने पर भी प्रजा को उसका तिरस्कार नहीं करना चाहिए—विदुर ने प्रश्न में यह प्राचीन राजधर्म का पक्ष रखा।

श्लोक 13.24

एतदाख्याहि मे ब्रह्मन् सुनीथात्मजचेष्टितम् । श्रद्दधानाय भक्ताय त्वं परावरवित्तमः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप उच्च और निम्न सभी तत्त्वों के ज्ञाता हैं। श्रद्धापूर्वक सुनने वाले मुझे सुनीथा के पुत्र वेन का चरित्र बताइए।

श्लोक 13.25

मैत्रेय उवाच । अङ्गोऽश्वमेधं राजर्षिराजहार महाक्रतुम् । नाजग्मुर्देवतास्तस्मिन्नाहूता ब्रह्मवादिभिः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—राजर्षि अङ्ग ने अश्वमेध नामक महान यज्ञ किया, पर वेदज्ञों के आह्वान करने पर भी देवता उसमें नहीं आए।

श्लोक 13.26

तमूचुर्विस्मितास्तत्र यजमानमथर्त्विजः । हवींषि हूयमानानि न ते गृह्णन्ति देवताः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुरोहितों ने चकित होकर यजमान से कहा—आपकी दी जाती आहुतियाँ देवता स्वीकार नहीं कर रहे हैं।

श्लोक 13.27

राजन् हवींष्यदुष्टानि श्रद्धयाऽऽसादितानि ते । छन्दांस्ययातयामानि योजितानि धृतव्रतैः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, आपकी हविसामग्री दोषरहित और श्रद्धा से प्राप्त है; व्रतधारी ब्राह्मण शुद्ध तथा प्रभावशाली मन्त्रों का प्रयोग कर रहे हैं।

श्लोक 13.28

न विदामेह देवानां हेलनं वयमण्वपि । यन्न गृह्णन्ति भागान् स्वान् ये देवाः कर्मसाक्षिणः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: हमें देवताओं का तनिक भी अनादर हुआ नहीं दिखता; फिर भी कर्मों के साक्षी वे देवता अपने भाग नहीं ले रहे हैं।

श्लोक 13.29

मैत्रेय उवाच । अङ्गो द्विजवचः श्रुत्वा यजमानः सुदुर्मनाः । तत्प्रष्टुं व्यसृजद्वाचं सदस्यांस्तदनुज्ञया ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्राह्मणों की बात सुनकर राजा अङ्ग बहुत उदास हुए। उनकी अनुमति लेकर उन्होंने सभासदों से प्रश्न किया।

श्लोक 13.30

नागच्छन्त्याहुता देवा न गृह्णन्ति ग्रहानिह । सदसस्पतयो ब्रूत किमवद्यं मया कृतम् ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: सभापतियो, बुलाने पर भी देवता नहीं आते और आहुतियाँ नहीं लेते। बताइए, मुझसे कौन सा दोष हुआ है?

श्लोक 13.31

सदसस्पतय ऊचुः । नरदेवेह भवतो नाघं तावन्मनाक्स्थितम् । अस्त्येकं प्राक्तनमघं यदिहेदृक्त्वमप्रजः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: सभापतियों ने कहा—राजन्, इस जीवन में आपका कोई छोटा भी अपराध नहीं है। पूर्वकर्म का कोई अवरोध है जिसके कारण आप अभी सन्तानहीन हैं; यह उनका कर्मफलसम्बन्धी परम्परागत विवेचन था।

श्लोक 13.32

तथा साधय भद्रं ते आत्मानं सुप्रजं नृप । इष्टस्ते पुत्रकामस्य पुत्रं दास्यति यज्ञभुक् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए उत्तम सन्तान की प्राप्ति का उपाय कीजिए। सन्तान की इच्छा से पूजित यज्ञभोक्ता भगवान आपको पुत्र देंगे।

श्लोक 13.33

तथा स्वभागधेयानि ग्रहीष्यन्ति दिवौकसः । यद्यज्ञपुरुषः साक्षादपत्याय हरिर्वृतः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब साक्षात यज्ञपुरुष हरि को सन्तान के लिए वरण किया जाएगा, तब देवता भी अपने भाग स्वीकार करेंगे।

श्लोक 13.34

तांस्तान् कामान् हरिर्दद्याद्यान् यान् कामयते जनः । आराधितो यथैवैष तथा पुंसां फलोदयः ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनुष्य जिन कामनाओं से भगवान की आराधना करता है, भगवान उसी के अनुसार फल देते हैं।

श्लोक 13.35

इति व्यवसिता विप्रास्तस्य राज्ञः प्रजातये । पुरोडाशं निरवपन् शिपिविष्टाय विष्णवे ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसा निश्चय करके ब्राह्मणों ने राजा की सन्तान के लिए शिपिविष्ट नाम वाले विष्णु को पुरोडाश की आहुति दी।

श्लोक 13.36

तस्मात्पुरुष उत्तस्थौ हेममाल्यमलाम्बरः । हिरण्मयेन पात्रेण सिद्धमादाय पायसम् ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस अग्नि से स्वर्णमाला और निर्मल वस्त्र पहने दिव्य पुरुष प्रकट हुए; वे सोने के पात्र में पका हुआ पायस लिए थे।

श्लोक 13.37

स विप्रानुमतो राजा गृहीत्वाञ्जलिनौदनम् । अवघ्राय मुदा युक्तः प्रादात्पत्न्या उदारधीः ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा ने ब्राह्मणों की अनुमति से अञ्जलि में वह खीर ली, आदर से सूँघी और प्रसन्न होकर अपनी पत्नी को दी।

श्लोक 13.38

सा तत्पुंसवनं राज्ञी प्राश्य वै पत्युरादधे । गर्भं काल उपावृत्ते कुमारं सुषुवेऽप्रजा ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: रानी ने उस सन्तानदायी प्रसाद को ग्रहण किया और पति से गर्भ धारण किया। समय आने पर पहले सन्तानहीन रानी ने पुत्र जन्मा।

श्लोक 13.39

स बाल एव पुरुषो मातामहमनुव्रतः । अधर्मांशोद्भवं मृत्युं तेनाभवदधार्मिकः ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: बालक वेन बचपन से ही अपने नाना मृत्यु के स्वभाव का अनुसरण करने लगा; मृत्यु को अधर्म के अंश से उत्पन्न कहा गया है, इसलिए वेन अधार्मिक बना। यह कथा का वंशगत रूपक है।

श्लोक 13.40

स शरासनमुद्यम्य मृगयुर्वनगोचरः । हन्त्यसाधुर्मृगान् दीनान् वेनोऽसावित्यरौज्जनः ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वेन धनुष लेकर वन में जाता और निर्दयता से असहाय पशुओं को मारता। लोग उसे देखकर भय से कहते—वेन आ गया!

श्लोक 13.41

आक्रीडे क्रीडतो बालान् वयस्यानतिदारुणः । प्रसह्य निरनुक्रोशः पशुमारममारयत् ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह इतना क्रूर था कि खेलते हुए अपने साथी बच्चों को भी पकड़कर पशुओं की तरह निर्दयता से मार डालता था।

श्लोक 13.42

तं विचक्ष्य खलं पुत्रं शासनैर्विविधैर्नृपः । यदा न शासितुं कल्पो भृशमासीत्सुदुर्मनाः ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा ने दुष्ट पुत्र को अनेक प्रकार से अनुशासित करना चाहा, पर सुधार न पाने पर अत्यन्त दुखी हुए।

श्लोक 13.43

प्रायेणाभ्यर्चितो देवो येऽप्रजा गृहमेधिनः । कदपत्यभृतं दुःखं ये न विन्दन्ति दुर्भरम् ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अङ्ग सोचने लगे—जिन गृहस्थों की सन्तान नहीं है, उन पर शायद भगवान की कृपा है, क्योंकि वे दुष्ट सन्तान का असह्य दुःख नहीं भोगते। यह उनकी व्यक्तिगत व्यथा की वाणी है।

श्लोक 13.44

यतः पापीयसी कीर्तिरधर्मश्च महान् नृणाम् । यतो विरोधः सर्वेषां यत आधिरनन्तकः ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसी सन्तान से अपकीर्ति, अधर्म, सबके साथ विरोध और अन्तहीन मानसिक पीड़ा पैदा होती है।

श्लोक 13.45

कस्तं प्रजापदेशं वै मोहबन्धनमात्मनः । पण्डितो बहु मन्येत यदर्थाः क्लेशदा गृहाः ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिस सन्तान के लिए गृहस्थजीवन अपनाया जाए और वही मोहबन्धन तथा क्लेश का कारण बने, बुद्धिमान उसे कैसे बहुत मूल्यवान माने?

श्लोक 13.46

कदपत्यं वरं मन्ये सदपत्याच्छुचां पदात् । निर्विद्येत गृहान्मर्त्यो यत्क्लेशनिवहा गृहाः ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर उन्होंने विचार किया—कभी दुष्ट सन्तान भी विरक्ति का कारण बनती है, जबकि प्रिय सन्तान की चिन्ता मन को बाँधे रखती है। इस दुःख से मनुष्य क्लेशपूर्ण आसक्ति छोड़ सकता है।

श्लोक 13.47

एवं स निर्विण्णमना नृपो गृहान् निशीथ उत्थाय महोदयोदयात् । अलब्धनिद्रोऽनुपलक्षितो नृभि- र्हित्वा गतो वेनसुवं प्रसुप्ताम् ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसी विरक्ति से राजा को नींद नहीं आई। आधी रात को उन्होंने सोती हुई वेन की माता और विशाल वैभव वाला घर छोड़ दिया तथा किसी को बताए बिना चले गए।

श्लोक 13.48

विज्ञाय निर्विद्य गतं पतिं प्रजाः पुरोहितामात्यसुहृद्गणादयः । विचिक्युरुर्व्यामतिशोककातरा यथा निगूढं पुरुषं कुयोगिनः ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा के विरक्त होकर चले जाने की बात जानकर प्रजा, पुरोहित, मन्त्री और मित्र अत्यन्त शोक से पृथ्वी पर उन्हें खोजने लगे, जैसे अयोग्य साधक गुप्त परमात्मा को खोजता है।

श्लोक 13.49

अलक्षयन्तः पदवीं प्रजापतेः हतोद्यमाः प्रत्युपसृत्य ते पुरीम् । ऋषीन् समेतानभिवन्द्य साश्रवो न्यवेदयन् पौरव भर्तृविप्लवम् ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब राजा का मार्ग नहीं मिला, वे निराश होकर नगर लौटे। वहाँ एकत्र ऋषियों को प्रणाम करके आँसुओं के साथ स्वामी के लुप्त होने का समाचार बताया।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 13 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 14

वेन का दुराचार और अराजकता का संकट

श्लोक 14.1

मैत्रेय उवाच । भृग्वादयस्ते मुनयो लोकानां क्षेमदर्शिनः । गोप्तर्यसति वै नॄणां पश्यन्तः पशुसाम्यताम् ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—भृगु आदि लोकहितकारी ऋषियों ने देखा कि रक्षक के बिना मनुष्य असुरक्षित होकर पशुओं जैसी स्थिति में पड़ रहे हैं।

श्लोक 14.2

वीरमातरमाहूय सुनीथां ब्रह्मवादिनः । प्रकृत्यसम्मतं वेनमभ्यषिञ्चन् पतिं भुवः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने राजमाता सुनीथा को बुलाया और मन्त्रियों की असहमति होते हुए भी वेन का पृथ्वी के राजा के रूप में अभिषेक किया।

श्लोक 14.3

श्रुत्वा नृपासनगतं वेनमत्युग्रशासनम् । निलिल्युर्दस्यवः सद्यः सर्पत्रस्ता इवाखवः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: वेन के कठोर शासनवाले राजासन पर बैठने का समाचार सुनकर डाकू वैसे छिप गए जैसे साँप से डरे चूहे।

श्लोक 14.4

स आरूढनृपस्थान उन्नद्धोऽष्टविभूतिभिः । अवमेने महाभागान् स्तब्धः सम्भावितः स्वतः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजपद और आठ प्रकार के ऐश्वर्य का अभिमान पाकर वेन अकड़ गया। वह महात्माओं की अवहेलना करता और स्वयं को महान समझता था।

श्लोक 14.5

एवं मदान्ध उत्सिक्तो निरङ्कुश इव द्विपः । पर्यटन् रथमास्थाय कम्पयन्निव रोदसी ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मद से अन्धा और निरङ्कुश हाथी की तरह उन्मत्त वेन रथ पर घूमता, मानो पृथ्वी और आकाश को काँपाता था।

श्लोक 14.6

न यष्टव्यं न दातव्यं न होतव्यं द्विजाः क्वचित् । इति न्यवारयद्धर्मं भेरीघोषेण सर्वशः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसने ढोल बजवाकर घोषणा कराई—कहीं यज्ञ, दान और अग्निहोत्र न किया जाए। इस प्रकार उसने धर्मकर्मों को रोक दिया।

श्लोक 14.7

वेनस्यावेक्ष्य मुनयो दुर्वृत्तस्य विचेष्टितम् । विमृश्य लोकव्यसनं कृपयोचुः स्म सत्रिणः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: दुष्ट वेन का आचरण और जनता का संकट देखकर यज्ञशील मुनियों ने करुणा से आपस में विचार किया।

श्लोक 14.8

अहो उभयतः प्राप्तं लोकस्य व्यसनं महत् । दारुण्युभयतो दीप्ते इव तस्करपालयोः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—प्रजा चोर और रक्षक दोनों ओर से बड़े संकट में फँस गई है, जैसे लकड़ी के दोनों सिरे जल उठें।

श्लोक 14.9

अराजकभयादेष कृतो राजातदर्हणः । ततोऽप्यासीद्भयं त्वद्य कथं स्यात्स्वस्ति देहिनाम् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: अराजकता के भय से अयोग्य वेन को राजा बनाया था, पर अब उसी से भय उत्पन्न हो गया। जीवों का कल्याण कैसे होगा?

श्लोक 14.10

अहेरिव पयः पोषः पोषकस्याप्यनर्थभृत् । वेनः प्रकृत्यैव खलः सुनीथागर्भसम्भवः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: सुनीथा का पुत्र स्वभाव से ही दुष्ट निकला। उसका पोषण साँप को दूध पिलाने जैसा हुआ, जो पालने वाले को भी अनर्थ देता है।

श्लोक 14.11

निरूपितः प्रजापालः स जिघांसति वै प्रजाः । तथापि सान्त्वयेमामुं नास्मांस्तत्पातकं स्पृशेत् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिसे प्रजा की रक्षा के लिए नियुक्त किया, वही उसे नष्ट करना चाहता है। फिर भी पहले समझाएँ, जिससे उसे सुधारने का अपना उत्तरदायित्व पूरा हो।

श्लोक 14.12

तद्विद्वद्भिरसद्वृत्तो वेनोऽस्माभिः कृतो नृपः । सान्त्वितो यदि नो वाचं न ग्रहीष्यत्यधर्मकृत् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: हमने उसका दुराचार जानते हुए भी उसे राजा बनाया था। यदि शान्तिपूर्वक समझाने पर भी यह अधर्मी हमारी बात नहीं मानेगा—

श्लोक 14.13

लोकधिक्कारसन्दग्धं दहिष्यामः स्वतेजसा । एवमध्यवसायैनं मुनयो गूढमन्यवः । उपव्रज्याब्रुवन् वेनं सान्त्वयित्वा च सामभिः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: तो लोकनिन्दा का पात्र बने उसे अपने तेज से दण्ड देंगे। ऐसा निश्चय करके मुनि क्रोध छिपाए वेन के पास गए और पहले मधुर वचनों से समझाने लगे।

श्लोक 14.14

मुनय ऊचुः । नृपवर्य निबोधैतद्यत्ते विज्ञापयाम भोः । आयुःश्रीबलकीर्तीनां तव तात विवर्धनम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुनि बोले—राजन्, हमारी हितकारी बात सुनिए; यह आपकी आयु, ऐश्वर्य, बल और कीर्ति बढ़ाने वाली है।

श्लोक 14.15

धर्म आचरितः पुंसां वाङ्मनःकायबुद्धिभिः । लोकान् विशोकान् वितरत्यथानन्त्यमसङ्गिनाम् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वाणी, मन, शरीर और बुद्धि से किया धर्माचरण मनुष्य को शोकमुक्त लोक देता है; अनासक्त साधक को उससे परम मुक्ति मिलती है।

श्लोक 14.16

स ते मा विनशेद्वीर प्रजानां क्षेमलक्षणः । यस्मिन् विनष्टे नृपतिरैश्वर्यादवरोहति ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रजा के कल्याणरूप उस धर्म को नष्ट मत होने दीजिए। उसके नष्ट होने पर राजा भी अपने ऐश्वर्य से गिर जाता है।

श्लोक 14.17

राजन्नसाध्वमात्येभ्यश्चोरादिभ्यः प्रजा नृपः । रक्षन् यथा बलिं गृह्णन्निह प्रेत्य च मोदते ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो राजा दुष्ट मन्त्रियों और चोरों आदि से प्रजा को बचाकर उचित कर लेता है, वह इस लोक और परलोक दोनों में सुख पाता है।

श्लोक 14.18

यस्य राष्ट्रे पुरे चैव भगवान् यज्ञपूरुषः । इज्यते स्वेन धर्मेण जनैर्वर्णाश्रमान्वितैः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिस राजा के देश और नगर में लोग अपने कर्तव्य तथा वर्णाश्रम की परम्परागत व्यवस्था के अनुसार यज्ञपुरुष भगवान की आराधना करते हैं—

श्लोक 14.19

तस्य राज्ञो महाभाग भगवान् भूतभावनः । परितुष्यति विश्वात्मा तिष्ठतो निजशासने ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने शासनधर्म में स्थित उस राजा से जगत के आत्मा और प्राणियों के पोषक भगवान प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 14.20

तस्मिंस्तुष्टे किमप्राप्यं जगतामीश्वरेश्वरे । लोकाः सपाला ह्येतस्मै हरन्ति बलिमादृताः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: सभी नियन्ताओं के भी ईश्वर प्रसन्न हों तो क्या अप्राप्य है? लोकपालों सहित सब लोक उन्हें आदर से भेंट अर्पित करते हैं।

श्लोक 14.21

तं सर्वलोकामरयज्ञसङ्ग्रहं त्रयीमयं द्रव्यमयं तपोमयम् । यज्ञैर्विचित्रैर्यजतो भवाय ते राजन् स्वदेशाननुरोद्धुमर्हसि ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, समस्त लोकों, देवताओं, यज्ञ, वेद, सामग्री और तप के आधार भगवान का प्रजा विविध यज्ञों से पूजन करे—अपने कल्याण के लिए इसकी अनुमति दीजिए।

श्लोक 14.22

यज्ञेन युष्मद्विषये द्विजातिभि- र्वितायमानेन सुराः कला हरेः । स्विष्टाः सुतुष्टाः प्रदिशन्ति वाञ्छितं तद्धेलनं नार्हसि वीर चेष्टितुम् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपके राज्य में ब्राह्मणों द्वारा किए यज्ञों से भगवान की शक्तिरूप देवता प्रसन्न होकर अभिलषित फल देते हैं। उनका अनादर करना उचित नहीं।

श्लोक 14.23

वेन उवाच । बालिशा बत यूयं वा अधर्मे धर्ममानिनः । ये वृत्तिदं पतिं हित्वा जारं पतिमुपासते ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: वेन बोला—तुम मूर्ख हो और अधर्म को धर्म मानते हो। जीविका देने वाले अपने स्वामी को छोड़कर दूसरे को पूजते हो। उसने इसे परपुरुष से सम्बन्ध रखने के अपमानजनक उपमान से कहा।

श्लोक 14.24

अवजानन्त्यमी मूढा नृपरूपिणमीश्वरम् । नानुविन्दन्ति ते भद्रमिह लोके परत्र च ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसने दावा किया—जो मुझ राजारूप ईश्वर का अपमान करते हैं, उन्हें इस लोक और परलोक में कल्याण नहीं मिलता। यह वेन का अहंकारी कथन है।

श्लोक 14.25

को यज्ञपुरुषो नाम यत्र वो भक्तिरीदृशी । भर्तृस्नेहविदूराणां यथा जारे कुयोषिताम् ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हारा यह यज्ञपुरुष कौन है, जिसमें तुम्हारी इतनी भक्ति है? वेन ने फिर पति का स्नेह छोड़ परपुरुष में आसक्त स्त्रियों का उपमान देकर मुनियों की निन्दा की।

श्लोक 14.26

विष्णुर्विरिञ्चो गिरिश इन्द्रो वायुर्यमो रविः । पर्जन्यो धनदः सोमः क्षितिरग्निरपाम्पतिः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वेन ने विष्णु, ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, पर्जन्य, कुबेर, चन्द्र, पृथ्वी, अग्नि और वरुण का नाम लिया।

श्लोक 14.27

एते चान्ये च विबुधाः प्रभवो वरशापयोः । देहे भवन्ति नृपतेः सर्वदेवमयो नृपः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसने कहा—वर और शाप देने वाले ये तथा अन्य सभी देवता राजा के शरीर में रहते हैं; राजा सर्वदेवमय है। उसने इस राजधर्मसम्बन्धी मान्यता को अपनी निरङ्कुश पूजा की माँग बना लिया।

श्लोक 14.28

तस्मान्मां कर्मभिर्विप्रा यजध्वं गतमत्सराः । बलिं च मह्यं हरत मत्तोऽन्यः कोऽग्रभुक् पुमान् ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए ईर्ष्या छोड़कर अपने सब कर्मों से मेरी ही पूजा करो और मुझे ही भेंट दो। मेरे अतिरिक्त पहला भाग पाने योग्य दूसरा कौन है?

श्लोक 14.29

मैत्रेय उवाच । इत्थं विपर्ययमतिः पापीयानुत्पथं गतः । अनुनीयमानस्तद्याच्ञां न चक्रे भ्रष्टमङ्गलः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—विपरीत बुद्धि वाला पापी वेन गलत मार्ग पर चला गया था। समझाने पर भी उसने ऋषियों की कल्याणकारी प्रार्थना नहीं मानी।

श्लोक 14.30

इति तेऽसत्कृतास्तेन द्विजाः पण्डितमानिना । भग्नायां भव्ययाच्ञायां तस्मै विदुर चुक्रुधुः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वयं को पण्डित मानने वाले वेन ने उनका अपमान किया और हितकारी प्रार्थना ठुकरा दी; इससे वे ऋषि क्रुद्ध हुए।

श्लोक 14.31

हन्यतां हन्यतामेष पापः प्रकृतिदारुणः । जीवन् जगदसावाशु कुरुते भस्मसाद्ध्रुवम् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे बोले—इस स्वभाव से क्रूर पापी को दण्ड दो! जीवित रहने पर यह शीघ्र जगत को नष्ट कर देगा।

श्लोक 14.32

नायमर्हत्यसद्वृत्तो नरदेववरासनम् । योऽधियज्ञपतिं विष्णुं विनिन्दत्यनपत्रपः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो निर्लज्ज होकर यज्ञाधिपति विष्णु की निन्दा करता है, वह दुराचारी मनुष्य श्रेष्ठ राजासन के योग्य नहीं है।

श्लोक 14.33

को वैनं परिचक्षीत वेनमेकमृतेऽशुभम् । प्राप्त ईदृशमैश्वर्यं यदनुग्रहभाजनः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिस भगवान की कृपा से उसे इतना ऐश्वर्य मिला, उन्हीं की निन्दा इस अमंगलकारी वेन के अतिरिक्त कौन करेगा?

श्लोक 14.34

इत्थं व्यवसिता हन्तुं ऋषयो रूढमन्यवः । निजघ्नुर्हुङ्कृतैर्वेनं हतमच्युतनिन्दया ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसा निश्चय करके क्रुद्ध ऋषियों ने अपने हुँकार से वेन का अन्त कर दिया; कथा कहती है कि अच्युत की निन्दा से वह पहले ही पतित हो चुका था।

श्लोक 14.35

ऋषिभिः स्वाश्रमपदं गते पुत्रकलेवरम् । सुनीथा पालयामास विद्यायोगेन शोचती ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऋषियों के आश्रम लौट जाने पर शोकाकुल सुनीथा ने अपनी विद्या के प्रभाव से पुत्र के शरीर को सुरक्षित रखा।

श्लोक 14.36

एकदा मुनयस्ते तु सरस्वत्सलिलाप्लुताः । हुत्वाग्नीन् सत्कथाश्चक्रुरुपविष्टाः सरित्तटे ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक दिन वे मुनि सरस्वती में स्नान करके, अग्निहोत्र पूर्ण करके नदीतट पर बैठे और सत्कथा करने लगे।

श्लोक 14.37

वीक्ष्योत्थितान्तदोत्पातानाहुर्लोकभयङ्करान् । अप्यभद्रमनाथाया दस्युभ्यो न भवेद्भुवः ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: तभी भयावह उत्पात देखकर बोले—क्या रक्षकहीन पृथ्वी पर डाकुओं से कोई अनिष्ट होने वाला है?

श्लोक 14.38

एवं मृशन्त ऋषयो धावतां सर्वतोदिशम् । पांसुः समुत्थितो भूरिश्चोराणामभिलुम्पताम् ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसा सोचते समय उन्हें सब दिशाओं में दौड़ते और लूटपाट करते चोरों से उठी भारी धूल दिखाई दी।

श्लोक 14.39

तदुपद्रवमाज्ञाय लोकस्य वसु लुम्पताम् । भर्तर्युपरते तस्मिन्नन्योन्यं च जिघांसताम् ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा के न रहने पर लोग एक दूसरे का धन लूटने और परस्पर मारने लगे थे; ऋषियों ने उस संकट को पहचाना।

श्लोक 14.40

चोरप्रायं जनपदं हीनसत्त्वमराजकम् । लोकान् नावारयञ्छक्ता अपि तद्दोषदर्शिनः ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: राज्यहीन देश में चोरों का बोलबाला था और सदाचार घट गया था। स्थिति को दोषपूर्ण देखते हुए भी मुनियों ने तत्काल बल से हस्तक्षेप नहीं किया।

श्लोक 14.41

ब्राह्मणः समदृक् शान्तो दीनानां समुपेक्षकः । स्रवते ब्रह्म तस्यापि भिन्नभाण्डात्पयो यथा ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने सोचा—शान्त और समदर्शी ब्राह्मण यदि दीनों की उपेक्षा करे तो उसका ब्रह्मतेज भी वैसे क्षीण होता है जैसे टूटे पात्र से दूध बह जाता है।

श्लोक 14.42

नाङ्गस्य वंशो राजर्षेरेष संस्थातुमर्हति । अमोघवीर्या हि नृपा वंशेऽस्मिन् केशवाश्रयाः ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजर्षि अङ्ग का वंश इस तरह समाप्त नहीं होना चाहिए। इस वंश के प्रभावशाली राजा केशव के आश्रित रहे हैं।

श्लोक 14.43

विनिश्चित्यैवमृषयो विपन्नस्य महीपतेः । ममन्थुरूरुं तरसा तत्रासीद्बाहुको नरः ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसा निश्चय करके ऋषियों ने मृत राजा की जाँघों का मन्थन किया; उससे बाहुक नामक पुरुष प्रकट हुआ, ऐसा पौराणिक वर्णन है।

श्लोक 14.44

काककृष्णोऽतिह्रस्वाङ्गो ह्रस्वबाहुर्महाहनुः । ह्रस्वपान्निम्ननासाग्रो रक्ताक्षस्ताम्रमूर्धजः ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसका वर्ण काला, शरीर और भुजाएँ छोटे, जबड़ा बड़ा, पैर छोटे, नासिका नीची, नेत्र लाल और केश ताम्रवर्ण थे। यह पात्र के रूप का वर्णन है।

श्लोक 14.45

तं तु तेऽवनतं दीनं किं करोमीति वादिनम् । निषीदेत्यब्रुवंस्तात स निषादस्ततोऽभवत् ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसने विनम्र होकर पूछा—मैं क्या करूँ? ऋषियों ने कहा—बैठो, अर्थात निषीद। कथा इसी शब्द से उसका निषाद नाम बताती है।

श्लोक 14.46

तस्य वंश्यास्तु नैषादा गिरिकाननगोचराः । येनाहरज्जायमानो वेनकल्मषमुल्बणम् ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वेन की पापमलिनता अपने साथ ले जाने वाला वह पुरुष कहा गया; उसके वंशज पर्वत–वन में रहने वाले नैषाद बताए गए हैं। यह पौराणिक उत्पत्तिकथा है, आज किसी समुदाय के नैतिक मूल्य का निर्णय नहीं।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 14 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 15

पृथु–अर्चि का प्राकट्य और राज्याभिषेक

श्लोक 15.1

मैत्रेय उवाच । अथ तस्य पुनर्विप्रैरपुत्रस्य महीपतेः । बाहुभ्यां मथ्यमानाभ्यां मिथुनं समपद्यत ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—उस सन्तानहीन मृत राजा की दोनों भुजाओं का ब्राह्मणों ने फिर मन्थन किया तो उनसे एक स्त्री और एक पुरुष प्रकट हुए।

श्लोक 15.2

तद्दृष्ट्वा मिथुनं जातं ऋषयो ब्रह्मवादिनः । ऊचुः परमसन्तुष्टा विदित्वा भगवत्कलाम् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस जोड़े को देखकर वेदज्ञ ऋषियों ने उन्हें भगवान की शक्ति का अंश जाना और अत्यन्त प्रसन्न होकर कहा।

श्लोक 15.3

ऋषय ऊचुः । एष विष्णोर्भगवतः कला भुवनपालिनी । इयं च लक्ष्म्याः सम्भूतिः पुरुषस्यानपायिनी ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऋषि बोले—यह पुरुष जगत का पालन करने वाले विष्णु का अंश है और यह स्त्री उनसे कभी अलग न रहने वाली लक्ष्मी का प्राकट्य है।

श्लोक 15.4

अयं तु प्रथमो राज्ञां पुमान् प्रथयिता यशः । पृथुर्नाम महाराजो भविष्यति पृथुश्रवाः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह राजाओं में अग्रणी होगा और यश फैलाएगा। इसका नाम महाराज पृथु होगा और इसकी कीर्ति दूर तक पहुँचेगी।

श्लोक 15.5

इयं च सुदती देवी गुणभूषणभूषणा । अर्चिर्नाम वरारोहा पृथुमेवावरुन्धती ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह सुन्दर देवी अर्चि कहलाएँगी। इनके सद्गुण ही आभूषणों की शोभा बढ़ाएँगे और ये पृथु को पति के रूप में स्वीकार करेंगी।

श्लोक 15.6

एष साक्षाद्धरेरंशो जातो लोकरिरक्षया । इयं च तत्परा हि श्रीरनुजज्ञेऽनपायिनी ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: लोकों की रक्षा के लिए साक्षात हरि का अंश प्रकट हुआ है और उनकी नित्य अनुगामिनी श्री भी इनके पीछे प्रकट हुई हैं।

श्लोक 15.7

मैत्रेय उवाच । प्रशंसन्ति स्म तं विप्रा गन्धर्वप्रवरा जगुः । मुमुचुः सुमनोधाराः सिद्धा नृत्यन्ति स्वःस्त्रियः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—ब्राह्मण प्रशंसा करने लगे, गन्धर्वों ने गान किया, सिद्धों ने पुष्पवर्षा की और देवाङ्गनाएँ नृत्य करने लगीं।

श्लोक 15.8

शङ्खतूर्यमृदङ्गाद्या नेदुर्दुन्दुभयो दिवि । तत्र सर्व उपाजग्मुर्देवर्षिपितॄणां गणाः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: आकाश में शङ्ख, तूर्य, मृदङ्ग और दुन्दुभि बजे। देवता, ऋषि और पितरों के समूह वहाँ आए।

श्लोक 15.9

ब्रह्मा जगद्गुरुर्देवैः सहासृत्य सुरेश्वरैः । वैन्यस्य दक्षिणे हस्ते दृष्ट्वा चिह्नं गदाभृतः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवताओं के साथ आए जगद्गुरु ब्रह्मा ने वेनपुत्र पृथु के दाहिने हाथ में गदाधारी भगवान का चिह्न देखा।

श्लोक 15.10

पादयोररविन्दं च तं वै मेने हरेः कलाम् । यस्याप्रतिहतं चक्रमंशः स परमेष्ठिनः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके चरणों में कमलचिह्न देखकर ब्रह्मा ने उन्हें हरि का अंश माना। जिनके हाथ में अविच्छिन्न चक्रचिह्न हो, वे परमेश्वर की शक्ति के अंश माने जाते हैं।

श्लोक 15.11

तस्याभिषेक आरब्धो ब्राह्मणैर्ब्रह्मवादिभिः । आभिषेचनिकान्यस्मै आजह्रुः सर्वतो जनाः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: वेदज्ञ ब्राह्मणों ने उनके अभिषेक की तैयारी की; लोग सभी ओर से अभिषेक की सामग्री लाने लगे।

श्लोक 15.12

सरित्समुद्रा गिरयो नागा गावः खगा मृगाः । द्यौः क्षितिः सर्वभूतानि समाजह्रुरुपायनम् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: नदियाँ, समुद्र, पर्वत, नाग, गायें, पक्षी, पशु, आकाश, पृथ्वी और सभी प्राणी अपनी–अपनी भेंटें लाए।

श्लोक 15.13

सोऽभिषिक्तो महाराजः सुवासाः साध्वलङ्कृतः । पत्न्यार्चिषालङ्कृतया विरेजेऽग्निरिवापरः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अभिषिक्त महाराज पृथु सुन्दर वस्त्र–आभूषण धारण करके अलङ्कृत पत्नी अर्चि के साथ ऐसे चमके मानो दूसरी अग्नि हों।

श्लोक 15.14

तस्मै जहार धनदो हैमं वीरवरासनम् । वरुणः सलिलस्रावमातपत्रं शशिप्रभम् ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: कुबेर ने उन्हें सोने का श्रेष्ठ सिंहासन और वरुण ने शीतल जलकण बरसाने वाला चन्द्रप्रभा छत्र दिया।

श्लोक 15.15

वायुश्च वालव्यजने धर्मः कीर्तिमयीं स्रजम् । इन्द्रः किरीटमुत्कृष्टं दण्डं संयमनं यमः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वायु ने दो चँवर, धर्म ने कीर्तिमयी माला, इन्द्र ने उत्तम मुकुट और यम ने शासन का दण्ड प्रदान किया।

श्लोक 15.16

ब्रह्मा ब्रह्ममयं वर्म भारती हारमुत्तमम् । हरिः सुदर्शनं चक्रं तत्पत्न्यव्याहतां श्रियम् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा ने वेदमय कवच, सरस्वती ने श्रेष्ठ हार, हरि ने सुदर्शन चक्र और लक्ष्मी ने अविनाशी सम्पदा दी।

श्लोक 15.17

दशचन्द्रमसिं रुद्रः शतचन्द्रं तथाम्बिका । सोमोऽमृतमयानश्वांस्त्वष्टा रूपाश्रयं रथम् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: रुद्र ने दस चन्द्रचिह्नों वाली तलवार, अम्बिका ने सौ चन्द्रचिह्नों वाली ढाल, सोम ने अमृतमय घोड़े और त्वष्टा ने सुन्दर रथ दिया।

श्लोक 15.18

अग्निराजगवं चापं सूर्यो रश्मिमयानिषून् । भूः पादुके योगमय्यौ द्यौः पुष्पावलिमन्वहम् ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: अग्नि ने आजगव धनुष, सूर्य ने किरणमय बाण, पृथ्वी ने योगशक्तियुक्त पादुकाएँ और आकाश ने नित्य पुष्पवर्षा का उपहार दिया।

श्लोक 15.19

नाट्यं सुगीतं वादित्रमन्तर्धानं च खेचराः । ऋषयश्चाशिषः सत्याः समुद्रः शङ्खमात्मजम् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: खेचरों ने नृत्य, मधुर गान, वादन और अन्तर्धान की कला दी; ऋषियों ने सत्य आशीर्वाद और समुद्र ने अपने से उत्पन्न शङ्ख दिया।

श्लोक 15.20

सिन्धवः पर्वता नद्यो रथवीथीर्महात्मनः । सूतोऽथ मागधो वन्दी तं स्तोतुमुपतस्थिरे ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: समुद्र, पर्वत और नदियों ने उनके रथ के लिए मार्ग दिए। तब सूत, मागध और बन्दी उनकी स्तुति करने उपस्थित हुए।

श्लोक 15.21

स्तावकांस्तानभिप्रेत्य पृथुर्वैन्यः प्रतापवान् । मेघनिर्ह्रादया वाचा प्रहसन्निदमब्रवीत् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्तुति करने वालों का भाव समझकर प्रतापी पृथु मुस्कराए और मेघगर्जना जैसी गम्भीर वाणी से बोले।

श्लोक 15.22

पृथुरुवाच । भोः सूत हे मागध सौम्य वन्दिन् लोकेऽधुनास्पष्टगुणस्य मे स्यात् । किमाश्रयो मे स्तव एष योज्यतां मा मय्यभूवन् वितथा गिरो वः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथु ने कहा—सूत, मागध और सौम्य बन्दी! मेरे गुण अभी लोक में प्रकट नहीं हुए हैं। किस आधार पर मेरी स्तुति करोगे? तुम्हारे वचन मेरे विषय में असत्य न हों।

श्लोक 15.23

तस्मात्परोक्षेऽस्मदुपश्रुतान्यलं करिष्यथ स्तोत्रमपीच्यवाचः । सत्युत्तमश्लोकगुणानुवादे जुगुप्सितं न स्तवयन्ति सभ्याः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब हमारे कर्म और गुण सुनो, तब उनकी प्रशंसा करना। अभी भगवान के उत्तम गुणों का गान उपलब्ध रहते हुए सज्जन किसी साधारण व्यक्ति की अनुचित प्रशंसा नहीं करते।

श्लोक 15.24

महद्गुणानात्मनि कर्तुमीशः कः स्तावकैः स्तावयतेऽसतोऽपि । तेऽस्याभविष्यन्निति विप्रलब्धो जनावहासं कुमतिर्न वेद ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो अपने भीतर बड़े गुण उत्पन्न कर सकता है, वह भी अनुपस्थित गुणों की प्रशंसा क्यों कराए? भविष्य में ये गुण होंगे—इस बहाने फुसलाया मूर्ख नहीं समझता कि लोग उसका उपहास करेंगे।

श्लोक 15.25

प्रभवो ह्यात्मनः स्तोत्रं जुगुप्सन्त्यपि विश्रुताः । ह्रीमन्तः परमोदाराः पौरुषं वा विगर्हितम् ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: महान और प्रसिद्ध सामर्थ्यवान भी अपनी प्रशंसा सुनना संकोच का विषय मानते हैं। लज्जाशील, उदार व्यक्ति अनुचित आत्मप्रशंसा को निन्दनीय समझते हैं।

श्लोक 15.26

वयं त्वविदिता लोके सूताद्यापि वरीमभिः । कर्मभिः कथमात्मानं गापयिष्याम बालवत् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: हमारे महान कर्म तो अभी जगत को ज्ञात भी नहीं हुए। फिर बच्चों की तरह अपना यश गवाना कैसे उचित होगा?

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 15 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 16

आदर्श राजा पृथु के भावी गुण और कर्म

श्लोक 16.1

मैत्रेय उवाच । इति ब्रुवाणं नृपतिं गायका मुनिचोदिताः । तुष्टुवुस्तुष्टमनसस्तद्वागमृतसेवया ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—पृथु के अमृतमय वचन सुनकर गायक प्रसन्न हुए, फिर ऋषियों की प्रेरणा से उनकी स्तुति करने लगे।

श्लोक 16.2

नालं वयं ते महिमानुवर्णने यो देववर्योऽवततार मायया । वेनाङ्गजातस्य च पौरुषाणि ते वाचस्पतीनामपि बभ्रमुर्धियः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—अपनी माया से वेन के शरीर से अवतरित देवश्रेष्ठ, आपकी महिमा कहने में हम समर्थ नहीं। आपके पराक्रम का विचार करके वाणी के बड़े ज्ञाता भी चकित होते हैं।

श्लोक 16.3

अथाप्युदारश्रवसः पृथोर्हरेः कलावतारस्य कथामृतादृताः । यथोपदेशं मुनिभिः प्रचोदिताः श्लाघ्यानि कर्माणि वयं वितन्महि ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर भी ऋषियों की प्रेरणा और आपके अवतार की कथामृत में आदर से, उनके बताए अनुसार आपके प्रशंसनीय भावी कर्मों का वर्णन करते हैं।

श्लोक 16.4

एष धर्मभृतां श्रेष्ठो लोकं धर्मेऽनुवर्तयन् । गोप्ता च धर्मसेतूनां शास्ता तत्परिपन्थिनाम् ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप धर्मधारियों में श्रेष्ठ होंगे, लोगों को धर्ममार्ग पर चलाएँगे, मर्यादाओं की रक्षा करेंगे और उनका विरोध करने वालों को अनुशासित करेंगे।

श्लोक 16.5

एष वै लोकपालानां बिभर्त्येकस्तनौ तनूः । काले काले यथा भागं लोकयोरुभयोर्हितम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप अकेले अपने भीतर लोकपालों की उपयुक्त शक्तियाँ धारण करके समय–समय पर इस लोक और परलोक दोनों का हित करेंगे।

श्लोक 16.6

वसु काल उपादत्ते काले चायं विमुञ्चति । समः सर्वेषु भूतेषु प्रतपन् सूर्यवद्विभुः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे सूर्य समभाव से प्रकाश देता और समय पर जल ग्रहण करके वर्षा के रूप में लौटाता है, वैसे आप उचित समय पर कर लेंगे और लोकहित में उसका उपयोग करेंगे।

श्लोक 16.7

तितिक्षत्यक्रमं वैन्य उपर्याक्रमतामपि । भूतानां करुणः शश्वदार्तानां क्षितिवृत्तिमान् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी की तरह सहनशील आप प्राणियों के अनुचित व्यवहार को भी धैर्य से सहेंगे और पीड़ितों के प्रति सदा करुणामय रहेंगे।

श्लोक 16.8

देवेऽवर्षत्यसौ देवो नरदेववपुर्हरिः । कृच्छ्रप्राणाः प्रजा ह्येष रक्षिष्यत्यञ्जसेन्द्रवत् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वर्षा न होने पर राजारूप हरि होकर आप इन्द्र की तरह कठिनाई में पड़ी प्रजा की आजीविका और जीवन की रक्षा करेंगे।

श्लोक 16.9

आप्याययत्यसौ लोकं वदनामृतमूर्तिना । सानुरागावलोकेन विशदस्मितचारुणा ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रेमपूर्ण दृष्टि और निर्मल मुस्कान से सुशोभित अमृतमय मुख द्वारा आप लोगों को शान्ति और प्रसन्नता देंगे।

श्लोक 16.10

अव्यक्तवर्त्मैष निगूढकार्यो गम्भीरवेधा उपगुप्तवित्तः । अनन्तमाहात्म्यगुणैकधामा पृथुः प्रचेता इव संवृतात्मा ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वरुण की तरह आपका मार्ग, कार्ययोजना और धनकोश सुरक्षित तथा गुप्त होगा। आपकी गहरी बुद्धि और अनन्त गुण सबके लिए सहज जानने योग्य नहीं होंगे।

श्लोक 16.11

दुरासदो दुर्विषह आसन्नोऽपि विदूरवत् । नैवाभिभवितुं शक्यो वेनारण्युत्थितोऽनलः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: वेनरूपी अरणि से प्रकट अग्नि की तरह आप दुष्टों के लिए दुर्धर्ष और असह्य होंगे; पास होते हुए भी आपकी महिमा की सीमा दूर रहेगी।

श्लोक 16.12

अन्तर्बहिश्च भूतानां पश्यन् कर्माणि चारणैः । उदासीन इवाध्यक्षो वायुरात्मेव देहिनाम् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुप्तचरों के द्वारा लोगों के बाहरी और भीतरी व्यवहार जानेंगे, फिर भी निर्लिप्त निरीक्षक रहेंगे, जैसे शरीरों में प्राणवायु और आत्मा।

श्लोक 16.13

नादण्ड्यं दण्डयत्येष सुतमात्मद्विषामपि । दण्डयत्यात्मजमपि दण्ड्यं धर्मपथे स्थितः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: धर्ममार्ग पर स्थित आप शत्रु के निर्दोष पुत्र को भी दण्ड नहीं देंगे और अपने अपराधी पुत्र को भी उचित दण्ड देंगे।

श्लोक 16.14

अस्याप्रतिहतं चक्रं पृथोरामानसाचलात् । वर्तते भगवानर्को यावत्तपति गोगणैः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ तक सूर्य की किरणें पड़ती हैं, मानस पर्वत तक पृथु का शासनचक्र निर्बाध चलेगा।

श्लोक 16.15

रञ्जयिष्यति यल्लोकमयमात्मविचेष्टितैः । अथामुमाहू राजानं मनोरञ्जनकैः प्रजाः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने लोकहितकारी कर्मों से आप प्रजा को प्रसन्न करेंगे; इसी रञ्जन के कारण लोग आपको राजा कहेंगे।

श्लोक 16.16

दृढव्रतः सत्यसन्धो ब्रह्मण्यो वृद्धसेवकः । शरण्यः सर्वभूतानां मानदो दीनवत्सलः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप दृढ़व्रती, सत्यप्रतिज्ञ, ज्ञानियों के हितैषी, वृद्धों के सेवक, सभी प्राणियों के आश्रय, मान देने वाले और दीनवत्सल होंगे।

श्लोक 16.17

मातृभक्तिः परस्त्रीषु पत्न्यामर्ध इवात्मनः । प्रजासु पितृवत्स्निग्धः किङ्करो ब्रह्मवादिनाम् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: दूसरी स्त्रियों के प्रति माता जैसा सम्मान, पत्नी के प्रति अपने अर्धाङ्ग जैसा भाव, प्रजा के प्रति पिता जैसा स्नेह और ब्रह्मज्ञानी संतों के प्रति सेवाभाव रखेंगे।

श्लोक 16.18

देहिनामात्मवत्प्रेष्ठः सुहृदां नन्दिवर्धनः । मुक्तसङ्गप्रसङ्गोऽयं दण्डपाणिरसाधुषु ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप सबको आत्मा के समान प्रिय होंगे, मित्रों का आनन्द बढ़ाएँगे, अनासक्त संतों का सङ्ग करेंगे और दुष्टों को अनुशासित करेंगे।

श्लोक 16.19

अयं तु साक्षाद्भगवांस्त्र्यधीशः कूटस्थ आत्मा कलयावतीर्णः । यस्मिन्नविद्यारचितं निरर्थकं पश्यन्ति नानात्वमपि प्रतीतम् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप गुणों के अधीश्वर, अविकारी आत्मा भगवान की कलारूप में आए हैं। अज्ञान से बनी अनेकता उन्हीं में दिखाई देती है, यद्यपि उसकी अलग परम सत्ता नहीं।

श्लोक 16.20

अयं भुवो मण्डलमोदयाद्रे- र्गोप्तैकवीरो नरदेवनाथः । आस्थाय जैत्रं रथमात्तचापः पर्यस्यते दक्षिणतो यथार्कः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजाओं के अधिपति और पृथ्वी के अद्वितीय रक्षक होकर आप विजयीरथ और धनुष धारण करेंगे तथा सूर्य की तरह दिशाओं में भ्रमण करेंगे।

श्लोक 16.21

अस्मै नृपालाः किल तत्र तत्र बलिं हरिष्यन्ति सलोकपालाः । मंस्यन्त एषां स्त्रिय आदिराजं चक्रायुधं तद्यश उद्धरन्त्यः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा और लोकपाल आपको भेंट देंगे। उनकी स्त्रियाँ आपके यश का गान करते हुए आपको चक्रधारी भगवान का प्रतिनिधि मानेंगी।

श्लोक 16.22

अयं महीं गां दुदुहेऽधिराजः प्रजापतिर्वृत्तिकरः प्रजानाम् । यो लीलयाद्रीन् स्वशरासकोट्या भिन्दन् समां गामकरोद्यथेन्द्रः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रजा की आजीविका देने वाले अधिराज पृथु पृथ्वीरूपी गाय का दोहन करेंगे और धनुष की नोक से पर्वतों की ऊँच–नीच घटाकर भूमि को रहने योग्य समतल करेंगे।

श्लोक 16.23

विस्फूर्जयन्नाजगवं धनुः स्वयं यदाचरत्क्ष्मामविषह्यमाजौ । तदा निलिल्युर्दिशि दिश्यसन्तो लाङ्गूलमुद्यम्य यथा मृगेन्द्रः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब आप आजगव धनुष की टङ्कार करते पृथ्वी पर चलेंगे, तब दुष्ट वैसे छिप जाएँगे जैसे पूँछ उठाए सिंह को देखकर वन्यजीव छिप जाते हैं।

श्लोक 16.24

एषोऽश्वमेधाञ्शतमाजहार सरस्वती प्रादुरभावि यत्र । अहार्षीद्यस्य हयं पुरन्दरः शतक्रतुश्चरमे वर्तमाने ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ सरस्वती प्रकट होती है, वहाँ आप सौ अश्वमेधों का आयोजन करेंगे; अन्तिम यज्ञ चलते समय सौ यज्ञों वाले इन्द्र आपका घोड़ा चुरा ले जाएँगे।

श्लोक 16.25

एष स्वसद्मोपवने समेत्य सनत्कुमारं भगवन्तमेकम् । आराध्य भक्त्यालभतामलं तत् ज्ञानं यतो ब्रह्म परं विदन्ति ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने महल के उपवन में सनत्कुमार से मिलकर आप भक्ति से उनकी सेवा करेंगे और वह निर्मल ज्ञान पाएँगे जिससे परम ब्रह्म जाना जाता है।

श्लोक 16.26

तत्र तत्र गिरस्तास्ता इति विश्रुतविक्रमः । श्रोष्यत्यात्माश्रिता गाथाः पृथुः पृथुपराक्रमः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने विस्तृत पराक्रम से प्रसिद्ध पृथु स्थान–स्थान पर अपने इन कर्मों की कथाएँ लोगों से सुनेंगे।

श्लोक 16.27

दिशो विजित्याप्रतिरुद्धचक्रः स्वतेजसोत्पाटितलोकशल्यः । सुरासुरेन्द्रैरुपगीयमान- महानुभावो भविता पतिर्भुवः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: दिशाओं को जीतकर और अपने तेज से लोक की बाधाएँ दूर करके आप पृथ्वी के पालक होंगे; देव और असुरों के अधिपति भी आपकी महिमा गाएँगे।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 16 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 17

भूखी प्रजा और पृथ्वी की प्रार्थना

श्लोक 17.1

मैत्रेय उवाच । एवं स भगवान् वैन्यः ख्यापितो गुणकर्मभिः । छन्दयामास तान् कामैः प्रतिपूज्याभिनन्द्य च ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—इस प्रकार गुणों और कर्मों के गान से सम्मानित पृथु ने गायकों का अभिनन्दन किया, उन्हें आदर दिया और इच्छित उपहारों से प्रसन्न किया।

श्लोक 17.2

ब्राह्मणप्रमुखान् वर्णान् भृत्यामात्यपुरोधसः । पौरान् जानपदान् श्रेणीः प्रकृतीः समपूजयत् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने ब्राह्मण आदि सभी सामाजिक वर्गों, सेवकों, मन्त्रियों, पुरोहितों, नगरवासियों, ग्रामीणों और विभिन्न श्रेणियों का उचित सम्मान किया।

श्लोक 17.3

विदुर उवाच । कस्माद्दधार गोरूपं धरित्री बहुरूपिणी । यां दुदोह पृथुस्तत्र को वत्सो दोहनं च किम् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर ने पूछा—अनेक रूप धारण करने वाली पृथ्वी ने गाय का रूप क्यों लिया? पृथु ने उसका दोहन किया तो बछड़ा और दोहनपात्र क्या थे?

श्लोक 17.4

प्रकृत्या विषमा देवी कृता तेन समा कथम् । तस्य मेध्यं हयं देवः कस्य हेतोरपाहरत् ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वभाव से ऊँची–नीची पृथ्वी को उन्होंने समतल कैसे किया? इन्द्र ने उनके पवित्र यज्ञ का घोड़ा क्यों चुराया?

श्लोक 17.5

सनत्कुमाराद्भगवतो ब्रह्मन् ब्रह्मविदुत्तमात् । लब्ध्वा ज्ञानं सविज्ञानं राजर्षिः कां गतिं गतः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ सनत्कुमार से अनुभवयुक्त ज्ञान प्राप्त करके राजर्षि पृथु को अन्ततः कौन सी गति मिली?

श्लोक 17.6

यच्चान्यदपि कृष्णस्य भवान् भगवतः प्रभोः । श्रवः सुश्रवसः पुण्यं पूर्वदेहकथाश्रयम् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान कृष्ण की पूर्वावतार लीलाओं से सम्बन्धित जो अन्य पुण्यकीर्ति आप जानते हैं—

श्लोक 17.7

भक्ताय मेऽनुरक्ताय तव चाधोक्षजस्य च । वक्तुमर्हसि योऽदुह्यद्वैन्यरूपेण गामिमाम् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उसे भी मुझे सुनाइए। मैं आपका और अधोक्षज भगवान का अनुरक्त भक्त हूँ; उन्होंने पृथुरूप में इस पृथ्वी का दोहन किया था।

श्लोक 17.8

सूत उवाच । चोदितो विदुरेणैवं वासुदेवकथां प्रति । प्रशस्य तं प्रीतमना मैत्रेयः प्रत्यभाषत ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूत ने कहा—भगवान वासुदेव की कथा के लिए विदुर की ऐसी प्रेरणा सुनकर मैत्रेय प्रसन्न हुए, उनकी प्रशंसा की और उत्तर दिया।

श्लोक 17.9

मैत्रेय उवाच । यदाभिषिक्तः पृथुरङ्ग विप्रै- रामन्त्रितो जनतायाश्च पालः । प्रजा निरन्ने क्षितिपृष्ठ एत्य क्षुत्क्षामदेहाः पतिमभ्यवोचन् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—ब्राह्मणों द्वारा अभिषिक्त और प्रजा के रक्षक नियुक्त पृथु के पास भूख से दुर्बल लोग आए, क्योंकि पृथ्वी पर अन्न नहीं था।

श्लोक 17.10

वयं राजञ्जाठरेणाभितप्ता यथाग्निना कोटरस्थेन वृक्षाः । त्वामद्य याताः शरणं शरण्यं यः साधितो वृत्तिकरः पतिर्नः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—राजन्, पेट की भूख से हम वैसे जल रहे हैं जैसे भीतर की अग्नि से खोखले वृक्ष। आज हम आपके आश्रय आए हैं; आप हमारी जीविका के लिए राजा बनाए गए हैं।

श्लोक 17.11

तन्नो भवानीहतु रातवेऽन्नं क्षुधार्दितानां नरदेवदेव । यावन्न नङ्क्ष्यामह उज्झितोर्जा वार्तापतिस्त्वं किल लोकपालः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: लोकपाल और आजीविका के स्वामी, हमारे प्राण क्षीण होकर नष्ट होने से पहले भूखों के लिए अन्न का प्रबन्ध कीजिए।

श्लोक 17.12

मैत्रेय उवाच । पृथुः प्रजानां करुणं निशम्य परिदेवितम् । दीर्घं दध्यौ कुरुश्रेष्ठ निमित्तं सोऽन्वपद्यत ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रजा का करुण विलाप सुनकर पृथु ने गहरा विचार किया और संकट का कारण समझ लिया।

श्लोक 17.13

इति व्यवसितो बुद्ध्या प्रगृहीतशरासनः । सन्दधे विशिखं भूमेः क्रुद्धस्त्रिपुरहा यथा ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: कारण का निश्चय करके उन्होंने धनुष उठाया और क्रोधित त्रिपुरविजयी शिव की तरह पृथ्वी को लक्ष्य करके बाण चढ़ाया।

श्लोक 17.14

प्रवेपमाना धरणी निशाम्योदायुधं च तम् । गौः सत्यपाद्रवद्भीता मृगीव मृगयुद्रुता ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: अस्त्र उठाए पृथु को देखकर पृथ्वी काँप गई। वह गाय बनकर ऐसे भागी जैसे शिकारी से डरी हरिणी।

श्लोक 17.15

तामन्वधावत्तद्वैन्यः कुपितोऽत्यरुणेक्षणः । शरं धनुषि सन्धाय यत्र यत्र पलायते ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्रोध से लाल नेत्रों वाले पृथु धनुष पर बाण चढ़ाए उसके पीछे दौड़े; वह जहाँ भागती, वे वहीं पहुँचते।

श्लोक 17.16

सा दिशो विदिशो देवी रोदसी चान्तरं तयोः । धावन्ती तत्र तत्रैनं ददर्शानूद्यतायुधम् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी दिशाओं, उपदिशाओं, पृथ्वी–आकाश और उनके बीच भागी, पर उसे हर जगह पीछे अस्त्र उठाए पृथु दिखाई दिए।

श्लोक 17.17

लोके नाविन्दत त्राणं वैन्यान्मृत्योरिव प्रजाः । त्रस्ता तदा निववृते हृदयेन विदूयता ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे मृत्यु से बचने का स्थान नहीं मिलता, वैसे पृथु से बचने का कोई आश्रय न पाकर वह डरी और व्यथित होकर लौट आई।

श्लोक 17.18

उवाच च महाभागं धर्मज्ञाऽऽपन्नवत्सल । त्राहि मामपि भूतानां पालनेऽवस्थितो भवान् ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वह बोली—धर्मज्ञ और संकटग्रस्तों से स्नेह रखने वाले महात्मा, आप सभी प्राणियों के पालन के लिए नियुक्त हैं; मेरी भी रक्षा कीजिए।

श्लोक 17.19

स त्वं जिघांससे कस्माद्दीनामकृतकिल्बिषाम् । अहनिष्यत्कथं योषां धर्मज्ञ इति यो मतः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं दीन और अपराधरहित हूँ; आप मुझे क्यों मारना चाहते हैं? धर्मज्ञ कहलाने वाले आप स्त्रीरूप धारण किए मुझ पर प्रहार कैसे करेंगे?

श्लोक 17.20

प्रहरन्ति न वै स्त्रीषु कृतागःस्वपि जन्तवः । किमुत त्वद्विधा राजन् करुणा दीनवत्सलाः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: सामान्य लोग भी अपराध करने वाली स्त्रियों पर हाथ उठाने से बचते हैं; फिर आपके जैसे करुणामय और दीनवत्सल राजा से तो रक्षा की आशा है।

श्लोक 17.21

मां विपाट्याजरां नावं यत्र विश्वं प्रतिष्ठितम् । आत्मानं च प्रजाश्चेमाः कथमम्भसि धास्यसि ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं उस स्थायी नाव के समान हूँ जिस पर पूरा जगत टिका है। मुझे तोड़कर आप अपने और प्रजा के जीवन को जलराशि में कैसे सँभालेंगे?

श्लोक 17.22

पृथुरुवाच । वसुधे त्वां वधिष्यामि मच्छासनपराङ्मुखीम् । भागं बर्हिषि या वृङ्क्ते न तनोति च नो वसु ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथु बोले—पृथ्वी, तुम मेरी आज्ञा की अवहेलना करती हो। यज्ञ का भाग स्वीकार करती हो, पर हमें पोषण नहीं देती; इसलिए मैं तुम्हें दण्ड देने आया हूँ।

श्लोक 17.23

यवसं जग्ध्यनुदिनं नैव दोग्ध्यौधसं पयः । तस्यामेवं हि दुष्टायां दण्डो नात्र न शस्यते ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो गाय प्रतिदिन घास खाती है पर दूध नहीं देती, उसके ऐसे दोषपूर्ण आचरण पर दण्ड अनुचित नहीं माना जाता।

श्लोक 17.24

त्वं खल्वोषधिबीजानि प्राक्सृष्टानि स्वयम्भुवा । न मुञ्चस्यात्मरुद्धानि मामवज्ञाय मन्दधीः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा ने पहले जो अन्न–औषधियों के बीज उत्पन्न किए थे, उन्हें तुमने भीतर रोक रखा है और मेरी उपेक्षा करके बाहर नहीं देतीं।

श्लोक 17.25

अमूषां क्षुत्परीतानामार्तानां परिदेवितम् । शमयिष्यामि मद्बाणैर्भिन्नायास्तव मेदसा ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: तुम्हें बाणों से विदीर्ण करके तुम्हारे शरीर की पोषक सम्पदा से इन भूखपीड़ित प्राणियों का विलाप शान्त करूँगा। यह क्रुद्ध राजा का पौराणिक संवाद है।

श्लोक 17.26

पुमान् योषिदुत क्लीब आत्मसम्भावनोऽधमः । भूतेषु निरनुक्रोशो नृपाणां तद्वधोऽवधः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्त्री, पुरुष या नपुंसक—जो केवल अपना हित देखे और प्राणियों के प्रति निर्दयी हो, उसके प्रति राजा का दण्ड अनुचित नहीं—पृथु ने प्राचीन दण्डनीति का यह पक्ष रखा।

श्लोक 17.27

त्वां स्तब्धां दुर्मदां नीत्वा मायागां तिलशः शरैः । आत्मयोगबलेनेमा धारयिष्याम्यहं प्रजाः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: गायरूप धारण कर अभिमान करने वाली तुम्हें बाणों से खण्डित करके भी मैं अपने योगबल से प्रजा को धारण कर लूँगा।

श्लोक 17.28

एवं मन्युमयीं मूर्तिं कृतान्तमिव बिभ्रतम् । प्रणता प्राञ्जलिः प्राह मही सञ्जातवेपथुः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथु को क्रोधमय और काल जैसा प्रचण्ड देखकर पृथ्वी काँपने लगी। उसने प्रणाम और हाथ जोड़कर स्तुति की।

श्लोक 17.29

धरोवाच । नमः परस्मै पुरुषाय मायया विन्यस्तनानातनवे गुणात्मने । नमः स्वरूपानुभवेन निर्धुत- द्रव्यक्रियाकारकविभ्रमोर्मये ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी बोली—माया से अनेक शरीर धारण करने वाले परम पुरुष को प्रणाम है। स्वरूपज्ञान से द्रव्य, क्रिया और कर्तृत्व के भ्रम को शान्त करने वाले प्रभु को नमस्कार है।

श्लोक 17.30

येनाहमात्माऽऽयतनं विनिर्मिता धात्रा यतोऽयं गुणसर्गसङ्ग्रहः । स एव मां हन्तुमुदायुधः स्वरा- डुपस्थितोऽन्यं शरणं कमाश्रये ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपने मुझे प्राणियों के आश्रय के लिए बनाया और आपसे गुणमयी सृष्टि निकली। अब वही स्वतन्त्र स्रष्टा मुझे मारने को अस्त्र उठाए सामने हैं; मैं और किसकी शरण जाऊँ?

श्लोक 17.31

य एतदादावसृजच्चराचरं स्वमाययाऽऽत्माश्रययावितर्क्यया । तयैव सोऽयं किल गोप्तुमुद्यतः कथं नु मां धर्मपरो जिघांसति ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपने अपनी अचिन्त्य मायाशक्ति से चराचर जगत बनाया और अब उसी की रक्षा के लिए आए हैं। धर्मपरायण होकर आप मुझे क्यों नष्ट करना चाहते हैं?

श्लोक 17.32

नूनं बतेशस्य समीहितं जनै- स्तन्मायया दुर्जययाकृतात्मभिः । न लक्ष्यते यस्त्वकरोदकारय- द्योऽनेक एकः परतश्च ईश्वरः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: असंयमी लोग आपकी दुस्तर माया से ढके होने के कारण आपके उद्देश्य को नहीं जान पाते। एक होकर भी अनेक रूपों में काम करने और करवाने वाले आप सबसे परे ईश्वर हैं।

श्लोक 17.33

सर्गादि योऽस्यानुरुणद्धि शक्तिभि- र्द्रव्यक्रियाकारकचेतनात्मभिः । तस्मै समुन्नद्धनिरुद्धशक्तये नमः परस्मै पुरुषाय वेधसे ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: द्रव्य, क्रिया, साधन और चेतना की शक्तियों से आप सृष्टि आदि चलाते हैं। सभी शक्तियों के स्वामी, परम पुरुष और विधाता को प्रणाम है।

श्लोक 17.34

स वै भवानात्मविनिर्मितं जग- द्भूतेन्द्रियान्तःकरणात्मकं विभो । संस्थापयिष्यन्नज मां रसातला- दभ्युज्जहाराम्भस आदिसूकरः ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: अजन्मा प्रभु, भूत, इन्द्रिय और अन्तःकरण से बने जगत को स्थिर करने के लिए आपने आदिवराह होकर मुझे रसातल के जल से ऊपर उठाया था।

श्लोक 17.35

अपामुपस्थे मयि नाव्यवस्थिताः प्रजा भवानद्य रिरक्षिषुः किल । स वीरमूर्तिः समभूद्धराधरो यो मां पयस्युग्रशरो जिघांससि ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: तब आपने पृथ्वी को धारण करने वाला वीररूप लेकर मुझे प्रलयजल से बचाया था; आज इसी नाव पर स्थित प्रजा की रक्षा के लिए उग्र बाण से मुझे मारना चाहते हैं।

श्लोक 17.36

नूनं जनैरीहितमीश्वराणा- मस्मद्विधैस्तद्गुणसर्गमायया । न ज्ञायते मोहितचित्तवर्त्मभि- स्तेभ्यो नमो वीरयशस्करेभ्यः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: हम जैसे लोग आपकी गुणमयी माया से मोहित होने के कारण ईश्वर के उद्देश्य नहीं समझ पाते। जिनकी लीला वीरों का यश बढ़ाती है, उन प्रभु को प्रणाम है।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 17 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 18

पृथ्वीरूपी गाय का दोहन और प्रजाव्यवस्था

श्लोक 18.1

मैत्रेय उवाच । इत्थं पृथुमभिष्टूय रुषा प्रस्फुरिताधरम् । पुनराहावनिर्भीता संस्तभ्यात्मानमात्मना ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—क्रोध से काँपते ओठों वाले पृथु की स्तुति करके भयभीत पृथ्वी ने स्वयं को सँभाला और फिर कहा।

श्लोक 18.2

सन्नियच्छाभिभो मन्युं निबोध श्रावितं च मे । सर्वतः सारमादत्ते यथा मधुकरो बुधः ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रभु, क्रोध रोककर मेरी बात सुनिए। बुद्धिमान मधुमक्खी की तरह सभी ओर से उपयोगी सार ग्रहण करता है।

श्लोक 18.3

अस्मिन् लोकेऽथवामुष्मिन् मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः । दृष्टा योगाः प्रयुक्ताश्च पुंसां श्रेयःप्रसिद्धये ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: तत्त्वदर्शी मुनियों ने इस लोक और परलोक में मनुष्यों के कल्याण के लिए अनेक उपाय खोजे और अपनाए हैं।

श्लोक 18.4

तानातिष्ठति यः सम्यगुपायान् पूर्वदर्शितान् । अवरः श्रद्धयोपेत उपेयान् विन्दतेऽञ्जसा ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: बाद में आने वाला जो व्यक्ति श्रद्धा से उन अनुभवी लोगों के बताए उचित उपाय अपनाता है, वह अपना लक्ष्य सहज पा सकता है।

श्लोक 18.5

ताननादृत्य योऽविद्वानर्थानारभते स्वयम् । तस्य व्यभिचरन्त्यर्था आरब्धाश्च पुनः पुनः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो अज्ञानी उनका अनादर करके केवल अपनी मनमानी से कार्य आरम्भ करता है, उसके प्रयत्न बार–बार असफल होते हैं।

श्लोक 18.6

पुरा सृष्टा ह्योषधयो ब्रह्मणा या विशाम्पते । भुज्यमाना मया दृष्टा असद्भिरधृतव्रतैः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, ब्रह्मा ने जो अन्न और औषधियाँ पहले उत्पन्न की थीं, उन्हें मैंने संयमरहित दुष्ट लोगों द्वारा नष्ट और दुरुपयोग होते देखा।

श्लोक 18.7

अपालितानादृता च भवद्भिर्लोकपालकैः । चोरीभूतेऽथ लोकेऽहं यज्ञार्थेऽग्रसमोषधीः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: लोकपालों ने मेरी रक्षा और देखभाल नहीं की। जगत में चोरी बढ़ने पर मैंने यज्ञ तथा भविष्य के पोषण के लिए उन औषधियों के बीज अपने भीतर सुरक्षित कर लिए।

श्लोक 18.8

नूनं ता वीरुधः क्षीणा मयि कालेन भूयसा । तत्र योगेन दृष्टेन भवानादातुमर्हति ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: बहुत समय बीतने से वे वनस्पतियाँ मेरे भीतर क्षीण हो गई हैं; अब अनुभवसिद्ध उचित विधि से उन्हें फिर प्राप्त कीजिए।

श्लोक 18.9

वत्सं कल्पय मे वीर येनाहं वत्सला तव । धोक्ष्ये क्षीरमयान् कामाननुरूपं च दोहनम् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: वीर, मेरे लिए एक बछड़ा और उपयुक्त दोहनपात्र निश्चित कीजिए। उसके प्रति वात्सल्य से मैं दूध के रूप में आपकी अभिलषित वस्तुएँ दूँगी।

श्लोक 18.10

दोग्धारं च महाबाहो भूतानां भूतभावन । अन्नमीप्सितमूर्जस्वद्भगवान् वाञ्छते यदि ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्राणियों का पालन करने वाले महाबाहु, यदि बलदायक अन्न चाहते हैं तो योग्य दोहनकर्ता की व्यवस्था भी कीजिए।

श्लोक 18.11

समां च कुरु मां राजन् देववृष्टं यथा पयः । अपर्तावपि भद्रं ते उपावर्तेत मे विभो ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, मेरी भूमि समतल और व्यवस्थित कीजिए, जिससे वर्षा का जल बना रहे और अन्य ऋतुओं में भी उपयोग मिल सके। आपका कल्याण हो।

श्लोक 18.12

इति प्रियं हितं वाक्यं भुव आदाय भूपतिः । वत्सं कृत्वा मनुं पाणावदुहत्सकलौषधीः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी के प्रिय और हितकारी वचन स्वीकार करके पृथु ने मनु को बछड़ा बनाया और अपने हाथरूपी पात्र में सभी अन्न–औषधियों का दोहन किया।

श्लोक 18.13

तथापरे च सर्वत्र सारमाददते बुधाः । ततोऽन्ये च यथाकामं दुदुहुः पृथुभाविताम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: बुद्धिमान सभी स्थानों से सार ग्रहण करते हैं। इसी तरह अन्य प्राणियों ने भी पृथु द्वारा अनुकूल बनाई पृथ्वी से अपनी आवश्यकता का दोहन किया।

श्लोक 18.14

ऋषयो दुदुहुर्देवीमिन्द्रियेष्वथ सत्तम । वत्सं बृहस्पतिं कृत्वा पयश्छन्दोमयं शुचि ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऋषियों ने बृहस्पति को बछड़ा और इन्द्रियों को पात्र बनाकर वेदमय निर्मल ज्ञानरूपी दूध प्राप्त किया।

श्लोक 18.15

कृत्वा वत्सं सुरगणा इन्द्रं सोममदूदुहन् । हिरण्मयेन पात्रेण वीर्यमोजो बलं पयः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवताओं ने इन्द्र को बछड़ा और स्वर्णपात्र लेकर सोमरस तथा वीर्य, ओज और बलरूपी दूध प्राप्त किया।

श्लोक 18.16

दैतेया दानवा वत्सं प्रह्लादमसुरर्षभम् । विधायादूदुहन् क्षीरमयःपात्रे सुरासवम् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: दैत्य और दानवों ने अपने श्रेष्ठ प्रह्लाद को बछड़ा बनाकर लोहे के पात्र में सुरा और आसवरूपी दूध लिया। यह विविध समूहों की रुचियों का पौराणिक दोहनरूपक है।

श्लोक 18.17

गन्धर्वाप्सरसोऽधुक्षन् पात्रे पद्ममये पयः । वत्सं विश्वावसुं कृत्वा गान्धर्वं मधु सौभगम् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: गन्धर्वों और अप्सराओं ने विश्वावसु को बछड़ा बनाकर कमलपात्र में मधुर गायन, माधुर्य और सौन्दर्यरूपी दूध दुहा।

श्लोक 18.18

वत्सेन पितरोऽर्यम्णा कव्यं क्षीरमधुक्षत । आमपात्रे महाभागाः श्रद्धया श्राद्धदेवताः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्राद्ध के अधिष्ठाता पितरों ने अर्यमा को बछड़ा और कच्चे मिट्टीपात्र को पात्र बनाकर श्रद्धा से कव्य अर्थात पितृअर्पण का सार पाया।

श्लोक 18.19

प्रकल्प्य वत्सं कपिलं सिद्धाः सङ्कल्पनामयीम् । सिद्धिं नभसि विद्यां च ये च विद्याधरादयः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सिद्धों ने कपिल को बछड़ा बनाकर आकाशरूपी पात्र में सङ्कल्पसिद्धि प्राप्त की; विद्याधरों ने भी अपनी विद्याओं का सार पाया।

श्लोक 18.20

अन्ये च मायिनो मायामन्तर्धानाद्भुतात्मनाम् । मयं प्रकल्प्य वत्सं ते दुदुहुर्धारणामयीम् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: अन्य मायावियों ने मय को बछड़ा बनाया और चित्तधारणा के रूप में अन्तर्धान आदि अद्भुत मायाशक्तियों का दोहन किया।

श्लोक 18.21

यक्षरक्षांसि भूतानि पिशाचाः पिशिताशनाः । भूतेशवत्सा दुदुहुः कपाले क्षतजासवम् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: यक्ष, राक्षस, भूत, पिशाच और मांसभक्षी समूहों ने भूतनाथ को बछड़ा बनाकर कपालपात्र में रक्तरूपी आसव दुहा।

श्लोक 18.22

तथाहयो दन्दशूकाः सर्पा नागाश्च तक्षकम् । विधाय वत्सं दुदुहुर्बिलपात्रे विषं पयः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: विषधर, सर्प और नागों ने तक्षक को बछड़ा और बिल को पात्र बनाकर विषरूपी दूध प्राप्त किया।

श्लोक 18.23

पशवो यवसं क्षीरं वत्सं कृत्वा च गोवृषम् । अरण्यपात्रे चाधुक्षन् मृगेन्द्रेण च दंष्ट्रिणः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: पशुओं ने वृषभ को बछड़ा और वन को पात्र बनाकर घासरूपी दूध दुहा; दाँत वाले हिंस्र पशुओं ने सिंह को अपना बछड़ा बनाया।

श्लोक 18.24

क्रव्यादाः प्राणिनः क्रव्यं दुदुहुः स्वे कलेवरे । सुपर्णवत्सा विहगाश्चरं चाचरमेव च ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मांसभक्षी जीवों ने अपने शरीररूपी पात्र में मांस का पोषण लिया। पक्षियों ने गरुड़ को बछड़ा बनाकर चर और अचर दोनों प्रकार के आहार पाए।

श्लोक 18.25

वटवत्सा वनस्पतयः पृथग्रसमयं पयः । गिरयो हिमवद्वत्सा नानाधातून् स्वसानुषु ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वृक्षों ने वट को बछड़ा बनाकर अलग–अलग रस प्राप्त किए। पर्वतों ने हिमालय को बछड़ा और अपने शिखरों को पात्र बनाकर अनेक धातुएँ पाईं।

श्लोक 18.26

सर्वे स्वमुख्यवत्सेन स्वे स्वे पात्रे पृथक्पयः । सर्वकामदुघां पृथ्वीं दुदुहुः पृथुभाविताम् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: सबने अपने–अपने प्रमुख को बछड़ा और अपने अनुकूल पात्र लेकर पृथु से अनुकूल हुई कामधेनुरूप पृथ्वी से अलग–अलग सार प्राप्त किया।

श्लोक 18.27

एवं पृथ्वादयः पृथ्वीमन्नादाः स्वन्नमात्मनः । दोहवत्सादि भेदेन क्षीरभेदं कुरूद्वह ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर, इस प्रकार पृथु और विभिन्न अन्नभोजी प्राणियों ने बछड़े, पात्र और दोहन की विधि के भेद से अपने योग्य पोषण पाया।

श्लोक 18.28

ततो महीपतिः प्रीतः सर्वकामदुघां पृथुः । दुहितृत्वे चकारेमां प्रेम्णा दुहितृवत्सलः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रसन्न होकर पुत्रियों से स्नेह रखने वाले पृथु ने सबकी कामनाएँ पूर्ण करने वाली पृथ्वी को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया।

श्लोक 18.29

चूर्णयन् स्वधनुष्कोट्या गिरिकूटानि राजराट् । भूमण्डलमिदं वैन्यः प्रायश्चक्रे समं विभुः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजराजेश्वर पृथु ने धनुष की नोक से पर्वतों की ऊँची चोटियाँ घटाकर भूमि के बड़े भाग को समतल और उपयोग योग्य किया।

श्लोक 18.30

अथास्मिन् भगवान् वैन्यः प्रजानां वृत्तिदः पिता । निवासान् कल्पयाञ्चक्रे तत्र तत्र यथार्हतः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर पिता की तरह आजीविका देने वाले पृथु ने प्रजा के लिए स्थान–स्थान पर उपयुक्त निवास बसाए।

श्लोक 18.31

ग्रामान् पुरः पत्तनानि दुर्गाणि विविधानि च । घोषान् व्रजान् सशिबिरानाकरान् खेटखर्वटान् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने गाँव, नगर, व्यापारिक पत्तन, विभिन्न दुर्ग, गोपाल बस्तियाँ, पशुशालाएँ, सैनिक शिविर, खदानें तथा छोटे–बड़े आवासक्षेत्र स्थापित किए।

श्लोक 18.32

प्राक्पृथोरिह नैवैषा पुरग्रामादि कल्पना । यथासुखं वसन्ति स्म तत्र तत्राकुतोभयाः ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: कथा के अनुसार पृथु से पहले नगर–ग्राम की ऐसी व्यवस्थित योजना नहीं थी; लोग स्थान–स्थान पर अपनी सुविधा से निश्चिन्त रहते थे।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 18 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 19

इन्द्र का यज्ञविघ्न और ब्रह्मा का समाधान

श्लोक 19.1

मैत्रेय उवाच । अथादीक्षत राजा तु हयमेधशतेन सः । ब्रह्मावर्ते मनोः क्षेत्रे यत्र प्राची सरस्वती ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—राजा पृथु ने मनु के ब्रह्मावर्त क्षेत्र में, जहाँ सरस्वती पूर्व की ओर बहती है, सौ अश्वमेध यज्ञों की दीक्षा ली।

श्लोक 19.2

तदभिप्रेत्य भगवान् कर्मातिशयमात्मनः । शतक्रतुर्न ममृषे पृथोर्यज्ञमहोत्सवम् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: सौ यज्ञों वाले इन्द्र ने सोचा कि पृथु उनके कर्मवैभव से आगे बढ़ जाएँगे; वे इस महान यज्ञोत्सव को सह नहीं सके।

श्लोक 19.3

यत्र यज्ञपतिः साक्षाद्भगवान् हरिरीश्वरः । अन्वभूयत सर्वात्मा सर्वलोकगुरुः प्रभुः ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस यज्ञ में यज्ञपति, सर्वात्मा और सभी लोकों के गुरु भगवान हरि का साक्षात सान्निध्य अनुभव किया जा रहा था।

श्लोक 19.4

अन्वितो ब्रह्मशर्वाभ्यां लोकपालैः सहानुगैः । उपगीयमानो गन्धर्वैर्मुनिभिश्चाप्सरोगणैः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा, शिव, लोकपाल और उनके अनुचर साथ थे; गन्धर्व, मुनि और अप्सराएँ भगवान का यश गा रहे थे।

श्लोक 19.5

सिद्धा विद्याधरा दैत्या दानवा गुह्यकादयः । सुनन्दनन्दप्रमुखाः पार्षदप्रवरा हरेः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: सिद्ध, विद्याधर, दैत्य, दानव, यक्ष और नन्द–सुनन्द आदि भगवान के प्रमुख पार्षद भी उपस्थित थे।

श्लोक 19.6

कपिलो नारदो दत्तो योगेशाः सनकादयः । तमन्वीयुर्भागवता ये च तत्सेवनोत्सुकाः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: कपिल, नारद, दत्त, सनकादि योगेश्वर और उनकी सेवा चाहने वाले अनेक भक्त भगवान के साथ आए थे।

श्लोक 19.7

यत्र धर्मदुघा भूमिः सर्वकामदुघा सती । दोग्धि स्माभीप्सितानर्थान् यजमानस्य भारत ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ धर्मफल देने वाली पृथ्वी यजमान की इच्छित आवश्यकताएँ पूर्ण कर रही थी।

श्लोक 19.8

ऊहुः सर्वरसान् नद्यः क्षीरदध्यन्नगोरसान् । तरवो भूरि वर्ष्माणः प्रासूयन्त मधुच्युतः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: नदियाँ अनेक रस, दूध, दही और पोषक आहार दे रही थीं; बड़े–बड़े वृक्ष मधु बरसाते फल–सम्पदा से भरे थे।

श्लोक 19.9

सिन्धवो रत्ननिकरान् गिरयोऽन्नं चतुर्विधम् । उपायनमुपाजह्रुः सर्वे लोकाः सपालकाः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: समुद्र रत्न, पर्वत चार प्रकार के भोजन और सभी लोक अपने पालकों सहित भेंटें ला रहे थे।

श्लोक 19.10

इति चाधोक्षजेशस्य पृथोस्तु परमोदयम् । असूयन् भगवानिन्द्रः प्रतिघातमचीकरत् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान को अपना स्वामी मानने वाले पृथु का यह उत्कर्ष देखकर इन्द्र ने ईर्ष्या से बाधा डालनी आरम्भ की।

श्लोक 19.11

चरमेणाश्वमेधेन यजमाने यजुष्पतिम् । वैन्ये यज्ञपशुं स्पर्धन्नपोवाह तिरोहितः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब पृथु अन्तिम अश्वमेध से यज्ञेश्वर की आराधना कर रहे थे, तब इन्द्र छिपकर यज्ञ का घोड़ा चुरा ले गए।

श्लोक 19.12

तमत्रिर्भगवानैक्षत्त्वरमाणं विहायसा । आमुक्तमिव पाखण्डं योऽधर्मे धर्मविभ्रमः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: अत्रि ने उन्हें आकाश में भागते देखा। उन्होंने ऐसा भ्रामक धार्मिक वेश धारण किया था जिससे अधर्म में धर्म का भ्रम उत्पन्न हो।

श्लोक 19.13

अत्रिणा चोदितो हन्तुं पृथुपुत्रो महारथः । अन्वधावत सङ्क्रुद्धस्तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अत्रि की प्रेरणा से महारथी पृथुपुत्र क्रुद्ध होकर उनके पीछे दौड़ा और पुकारा—ठहरो, ठहरो!

श्लोक 19.14

तं तादृशाकृतिं वीक्ष्य मेने धर्मं शरीरिणम् । जटिलं भस्मनाच्छन्नं तस्मै बाणं न मुञ्चति ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जटा और भस्म से ढका उनका रूप देखकर राजकुमार ने उन्हें धर्मात्मा साधु समझा और बाण नहीं छोड़ा।

श्लोक 19.15

वधान्निवृत्तं तं भूयो हन्तवेऽत्रिरचोदयत् । जहि यज्ञहनं तात महेन्द्रं विबुधाधमम् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अत्रि ने उसे फिर समझाया—बेटा, यह यज्ञ में बाधा डालने वाला इन्द्र है; वेश देखकर भ्रम में मत पड़ो और इसे रोको।

श्लोक 19.16

एवं वैन्यसुतः प्रोक्तस्त्वरमाणं विहायसा । अन्वद्रवदभिक्रुद्धो रावणं गृध्रराडिव ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: तब पृथुपुत्र क्रोध से आकाश में भागते इन्द्र के पीछे दौड़ा, जैसे जटायु रावण के पीछे गया था।

श्लोक 19.17

सोऽश्वं रूपं च तद्धित्वा तस्मा अन्तर्हितः स्वराट् । वीरः स्वपशुमादाय पितुर्यज्ञमुपेयिवान् ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्र घोड़ा और वह छद्मवेश छोड़कर अदृश्य हो गए। वीर राजकुमार घोड़ा लेकर पिता के यज्ञ में लौट आया।

श्लोक 19.18

तत्तस्य चाद्भुतं कर्म विचक्ष्य परमर्षयः । नामधेयं ददुस्तस्मै विजिताश्व इति प्रभो ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस अद्भुत कर्म को देखकर महर्षियों ने उसका नाम विजिताश्व रखा।

श्लोक 19.19

उपसृज्य तमस्तीव्रं जहाराश्वं पुनर्हरिः । चषाल यूपतश्छन्नो हिरण्यरशनं विभुः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्र ने फिर गहरा अन्धकार उत्पन्न किया और स्वर्णरस्सी से बँधे यज्ञघोड़े को यूप के पास से छिपकर चुरा लिया।

श्लोक 19.20

अत्रिः सन्दर्शयामास त्वरमाणं विहायसा । कपालखट्वाङ्गधरं वीरो नैनमबाधत ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: अत्रि ने फिर आकाश में भागते इन्द्र को दिखाया। इस बार वे कपाल और खट्वाङ्ग लिए थे; राजकुमार ने उस वेश के कारण उन्हें नहीं रोका।

श्लोक 19.21

अत्रिणा चोदितस्तस्मै सन्दधे विशिखं रुषा । सोऽश्वं रूपं च तद्धित्वा तस्थावन्तर्हितः स्वराट् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: अत्रि के पुनः कहने पर राजकुमार ने क्रोध से बाण चढ़ाया। इन्द्र फिर घोड़ा और छद्मवेश छोड़कर अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 19.22

वीरश्चाश्वमुपादाय पितृयज्ञमथाव्रजत् । तदवद्यं हरे रूपं जगृहुर्ज्ञानदुर्बलाः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजकुमार घोड़ा लेकर पिता के यज्ञ में लौट आया। इन्द्र द्वारा छोड़े गए उन अनुचित छद्मरूपों का अल्पविवेकी लोग अनुकरण करने लगे।

श्लोक 19.23

यानि रूपाणि जगृहे इन्द्रो हयजिहीर्षया । तानि पापस्य खण्डानि लिङ्गं खण्डमिहोच्यते ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: घोड़ा चुराने के लिए इन्द्र ने जिन रूपों का सहारा लिया, उन्हें कथा पाप के खण्ड और पाखण्ड के बाहरी चिह्नों की उत्पत्ति कहती है।

श्लोक 19.24

एवमिन्द्रे हरत्यश्वं वैन्ययज्ञजिघांसया । तद्गृहीतविसृष्टेषु पाखण्डेषु मतिर्नृणाम् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथु के यज्ञ में विघ्न डालने के लिए इन्द्र बार–बार घोड़ा चुराते और नए भ्रामक वेश धारण करके छोड़ते रहे; लोगों का मन उनमें फँसने लगा।

श्लोक 19.25

धर्म इत्युपधर्मेषु नग्नरक्तपटादिषु । प्रायेण सज्जते भ्रान्त्या पेशलेषु च वाग्मिषु ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: नग्न या लालवस्त्रधारी बाहरी वेशों और चतुर वाणी से प्रभावित होकर लोग कभी उपधर्म को ही धर्म समझ बैठते हैं। प्रसंग का दोष छद्म और भ्रम है, केवल वस्त्र का रंग नहीं।

श्लोक 19.26

तदभिज्ञाय भगवान् पृथुः पृथुपराक्रमः । इन्द्राय कुपितो बाणमादत्तोद्यतकार्मुकः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह जानकर प्रतापी पृथु क्रुद्ध हुए और इन्द्र को लक्ष्य करके धनुष पर बाण चढ़ाया।

श्लोक 19.27

तमृत्विजः शक्रवधाभिसन्धितं विचक्ष्य दुष्प्रेक्ष्यमसह्यरंहसम् । निवारयामासुरहो महामते न युज्यतेऽत्रान्यवधः प्रचोदितात् ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनका असह्य वेग देखकर पुरोहितों ने रोका—महामते, इस यज्ञ में निर्दिष्ट विधान से बाहर किसी अन्य का वध उचित नहीं।

श्लोक 19.28

वयं मरुत्वन्तमिहार्थनाशनं ह्वयामहे त्वच्छ्रवसा हतत्विषम् । अयातयामोपहवैरनन्तरं प्रसह्य राजन् जुहवाम तेऽहितम् ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—आपके यश से तेजहीन हुए इस विघ्नकर्ता इन्द्र को हम प्रभावशाली मन्त्रों से यहाँ बुलाकर अग्नि में आहुति बना देंगे। यह क्रुद्ध पुरोहितों का प्रस्ताव था।

श्लोक 19.29

इत्यामन्त्र्य क्रतुपतिं विदुरास्यर्त्विजो रुषा । स्रुग्घस्तान् जुह्वतोऽभ्येत्य स्वयम्भूः प्रत्यषेधत ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: यजमान से ऐसा कहकर पुरोहित आहुति देने लगे, पर ब्रह्मा वहाँ आए और उन्हें रोक दिया।

श्लोक 19.30

न वध्यो भवतामिन्द्रो यद्यज्ञो भगवत्तनुः । यं जिघांसथ यज्ञेन यस्येष्टास्तनवः सुराः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मा बोले—इन्द्र का वध मत करो। वे यज्ञरूप भगवान के अङ्ग हैं; जिनकी शक्तियाँ देवता हैं, उन्हीं के यज्ञ से उनके अङ्ग को मारना उचित नहीं।

श्लोक 19.31

तदिदं पश्यत महद्धर्मव्यतिकरं द्विजाः । इन्द्रेणानुष्ठितं राज्ञः कर्मैतद्विजिघांसता ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: देखो, राजा के कर्म में बाधा डालने के लिए इन्द्र ने धर्म में कितना बड़ा भ्रम उत्पन्न कर दिया है।

श्लोक 19.32

पृथुकीर्तेः पृथोर्भूयात्तर्ह्येकोनशतक्रतुः । अलं ते क्रतुभिः स्विष्टैर्यद्भवान् मोक्षधर्मवित् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथु के निन्यानवे यज्ञ ही रहने दो। राजन्, आपने बहुत उत्तम यज्ञ कर लिए; आप मोक्षधर्म जानते हैं, इसलिए संख्या पूरी करने का आग्रह पर्याप्त हुआ।

श्लोक 19.33

नैवात्मने महेन्द्राय रोषमाहर्तुमर्हसि । उभावपि हि भद्रं ते उत्तमश्लोकविग्रहौ ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने ही समान भगवान की शक्ति धारण करने वाले इन्द्र पर क्रोध मत करो। आप दोनों भगवान की विभूति के रूप हैं; आपका कल्याण हो।

श्लोक 19.34

मास्मिन् महाराज कृथाः स्म चिन्तां निशामयास्मद्वच आदृतात्मा । यद्ध्यायतो दैवहतं नु कर्तुं मनोऽतिरुष्टं विशते तमोऽन्धम् ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: महाराज, चिन्ता छोड़कर हमारी बात मानिए। दैव से बाधित कर्म को हर हालत में पूरा करने की हठ से मन अत्यन्त क्रुद्ध होकर अज्ञान में गिर सकता है।

श्लोक 19.35

क्रतुर्विरमतामेष देवेषु दुरवग्रहः । धर्मव्यतिकरो यत्र पाखण्डैरिन्द्रनिर्मितैः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह यज्ञ अब यहीं समाप्त हो। देवताओं को भी वश में करना कठिन है और इन्द्र के बनाए छद्ममार्गों से धर्म में भ्रम फैल रहा है।

श्लोक 19.36

एभिरिन्द्रोपसंसृष्टैः पाखण्डैर्हारिभिर्जनम् । ह्रियमाणं विचक्ष्वैनं यस्ते यज्ञध्रुगश्वमुट् ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: घोड़ा चुराने वाले इन्द्र ने जो आकर्षक छद्ममार्ग फैलाए, उनसे जनता भटक रही है; अब उसके हित पर ध्यान दो।

श्लोक 19.37

भवान् परित्रातुमिहावतीर्णो धर्मं जनानां समयानुरूपम् । वेनापचारादवलुप्तमद्य तद्देहतो विष्णुकलासि वैन्य ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: वेन के दुराचार से लुप्त हुए लोकधर्म की समयानुकूल रक्षा के लिए आप उसके शरीर से विष्णु की कला बनकर प्रकट हुए हैं।

श्लोक 19.38

स त्वं विमृश्यास्य भवं प्रजापते सङ्कल्पनं विश्वसृजां पिपीपृहि । ऐन्द्रीं च मायामुपधर्ममातरं प्रचण्डपाखण्डपथं प्रभो जहि ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसलिए जगत के हित का विचार करके प्रजापतियों का उद्देश्य पूरा कीजिए और अधर्म को जन्म देने वाली इन्द्र की इस छलमाया के प्रभाव को दूर कीजिए।

श्लोक 19.39

मैत्रेय उवाच । इत्थं स लोकगुरुणा समादिष्टो विशाम्पतिः । तथा च कृत्वा वात्सल्यं मघोनापि च सन्दधे ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—लोकगुरु ब्रह्मा की आज्ञा मानकर पृथु ने वैसा ही किया और इन्द्र से भी स्नेहपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किया।

श्लोक 19.40

कृतावभृथस्नानाय पृथवे भूरिकर्मणे । वरान् ददुस्ते वरदा ये तद्बर्हिषि तर्पिताः ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: अवभृथ स्नान कर चुके महान कर्मशील पृथु को यज्ञ से तृप्त वरदाता देवताओं ने वर दिए।

श्लोक 19.41

विप्राः सत्याशिषस्तुष्टाः श्रद्धया लब्धदक्षिणाः । आशिषो युयुजुः क्षत्तरादिराजाय सत्कृताः ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रद्धा से दक्षिणा पाकर और आदर से प्रसन्न हुए सत्य आशीर्वाद देने वाले ब्राह्मणों ने आदिराज पृथु को आशीष दी।

श्लोक 19.42

त्वयाऽऽहूता महाबाहो सर्व एव समागताः । पूजिता दानमानाभ्यां पितृदेवर्षिमानवाः ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने कहा—महाबाहु, आपके आह्वान पर सभी पितर, देवता, ऋषि और मनुष्य आए तथा आपने दान और सम्मान से सबकी पूजा की।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 19 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 20

भगवान विष्णु का उपदेश और पृथु की भक्ति

श्लोक 20.1

मैत्रेय उवाच । भगवानपि वैकुण्ठः साकं मघवता विभुः । यज्ञैर्यज्ञपतिस्तुष्टो यज्ञभुक् तमभाषत ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—यज्ञों से प्रसन्न यज्ञपति भगवान विष्णु इन्द्र के साथ प्रकट हुए और पृथु से बोले।

श्लोक 20.2

श्रीभगवानुवाच । एष तेऽकार्षीद्भङ्गं हयमेधशतस्य ह । क्षमापयत आत्मानममुष्य क्षन्तुमर्हसि ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान ने कहा—इन्द्र ने तुम्हारे सौ अश्वमेधों में बाधा डाली थी। अब वे क्षमा चाहते हैं; तुम्हें उनका अपराध क्षमा कर देना चाहिए।

श्लोक 20.3

सुधियः साधवो लोके नरदेव नरोत्तमाः । नाभिद्रुह्यन्ति भूतेभ्यो यर्हि नात्मा कलेवरम् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, बुद्धिमान और श्रेष्ठ सज्जन जानते हैं कि आत्मा शरीर नहीं है; इसलिए वे किसी जीव से द्वेष नहीं करते।

श्लोक 20.4

पुरुषा यदि मुह्यन्ति त्वादृशा देवमायया । श्रम एव परं जातो दीर्घया वृद्धसेवया ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: यदि तुम्हारे जैसे लोग भी माया में मोहित हो जाएँ तो दीर्घकाल तक महात्माओं की सेवा का उद्देश्य अधूरा रह जाता है।

श्लोक 20.5

अतः कायमिमं विद्वानविद्याकामकर्मभिः । आरब्ध इति नैवास्मिन् प्रतिबुद्धोऽनुषज्जते ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: ज्ञानी समझता है कि यह शरीर अज्ञान, कामना और कर्म से बना है; विवेक जागने पर वह इसमें आसक्त नहीं होता।

श्लोक 20.6

असंसक्तः शरीरेऽस्मिन्नमुनोत्पादिते गृहे । अपत्ये द्रविणे वापि कः कुर्यान्ममतां बुधः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो शरीर से अनासक्त है, वह उसी से जुड़े घर, सन्तान और धन में कैसे अहंता–ममता रखेगा?

श्लोक 20.7

एकः शुद्धः स्वयञ्ज्योतिर्निर्गुणोऽसौ गुणाश्रयः । सर्वगोऽनावृतः साक्षी निरात्माऽऽत्माऽऽत्मनःपरः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: आत्मा एक, निर्मल, स्वप्रकाश, गुणातीत होकर गुणों का आधार, व्यापक, आवरणरहित और साक्षी है। वह देहादि उपाधियों और उनके आश्रित सीमित अभिमान से परे है।

श्लोक 20.8

य एवं सन्तमात्मानमात्मस्थं वेद पूरुषः । नाज्यते प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः स मयि स्थितः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो मनुष्य भीतर स्थित आत्मा को ऐसा जानता है, वह प्रकृति में रहते हुए भी उसके गुणों से लिप्त नहीं होता और मुझमें स्थित रहता है।

श्लोक 20.9

यः स्वधर्मेण मां नित्यं निराशीः श्रद्धयान्वितः । भजते शनकैस्तस्य मनो राजन् प्रसीदति ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, जो निष्काम भाव और श्रद्धा से अपने कर्तव्य द्वारा मेरा नित्य भजन करता है, उसका मन धीरे–धीरे निर्मल और प्रसन्न होता है।

श्लोक 20.10

परित्यक्तगुणः सम्यग्दर्शनो विशदाशयः । शान्तिं मे समवस्थानं ब्रह्मकैवल्यमश्नुते ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुणासक्ति छोड़कर सम्यक दृष्टि और निर्मल अन्तःकरण वाला व्यक्ति मेरी शान्त अवस्था तथा ब्रह्म की अद्वितीय स्थिति प्राप्त करता है।

श्लोक 20.11

उदासीनमिवाध्यक्षं द्रव्यज्ञानक्रियात्मनाम् । कूटस्थमिममात्मानं यो वेदाप्नोति शोभनम् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: शरीर, ज्ञान और क्रिया का साक्षी आत्मा उदासीन निरीक्षक की तरह अविकारी है—यह जानने वाला कल्याण पाता है।

श्लोक 20.12

भिन्नस्य लिङ्गस्य गुणप्रवाहो द्रव्यक्रियाकारकचेतनात्मनः । दृष्टासु सम्पत्सु विपत्सु सूरयो न विक्रियन्ते मयि बद्धसौहृदाः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूक्ष्म उपाधि के कारण द्रव्य, क्रिया, साधन और अनुभूति का गुणप्रवाह चलता है। मुझमें प्रेम बाँधने वाले ज्ञानी उस उपाधि में आई सम्पत्ति या विपत्ति से भीतर नहीं बदलते।

श्लोक 20.13

समः समानोत्तममध्यमाधमः सुखे च दुःखे च जितेन्द्रियाशयः । मयोपकॢप्ताखिललोकसंयुतो विधत्स्व वीराखिललोकरक्षणम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्रिय और मन को जीतकर, सुख–दुःख तथा श्रेष्ठ, समान, मध्यम और अधम सभी के प्रति समभाव रखो। मेरे दिए राज्याधिकार से सभी लोकों की रक्षा करो।

श्लोक 20.14

श्रेयः प्रजापालनमेव राज्ञो यत्साम्पराये सुकृतात्षष्ठमंशम् । हर्तान्यथा हृतपुण्यः प्रजाना- मरक्षिता करहारोऽघमत्ति ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा का सर्वोच्च कल्याण प्रजापालन है। उचित रक्षा करने वाला प्रजा के पुण्य का छठा भाग पाता है; बिना रक्षा किए कर लेने वाला पुण्य खोकर प्रजा के दोषों का भागी बनता है।

श्लोक 20.15

एवं द्विजाग्र्यानुमतानुवृत्त- धर्मप्रधानोऽन्यतमोऽवितास्याः । ह्रस्वेन कालेन गृहोपयातान् द्रष्टासि सिद्धाननुरक्तलोकः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रेष्ठ ज्ञानियों की सम्मति के अनुसार धर्म को प्रधान रखकर पृथ्वी की रक्षा करो। प्रजा के प्रेमपात्र बनकर तुम शीघ्र ही अपने घर आए सिद्ध महात्माओं का दर्शन करोगे।

श्लोक 20.16

वरं च मत्कञ्चन मानवेन्द्र वृणीष्व तेऽहं गुणशीलयन्त्रितः । नाहं मखैर्वै सुलभस्तपोभि- र्योगेन वा यत्समचित्तवर्ती ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, कोई वर भी माँगो। मैं तुम्हारे सद्गुण और शील से वश हूँ; केवल यज्ञ, तप या योग से इतना सहज नहीं मिलता जितना समचित्त साधक को मिलता हूँ।

श्लोक 20.17

मैत्रेय उवाच । स इत्थं लोकगुरुणा विष्वक्सेनेन विश्वजित् । अनुशासित आदेशं शिरसा जगृहे हरेः ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—विश्वगुरु भगवान की शिक्षा को पृथु ने सिर झुकाकर आदर से स्वीकार किया।

श्लोक 20.18

स्पृशन्तं पादयोः प्रेम्णा व्रीडितं स्वेन कर्मणा । शतक्रतुं परिष्वज्य विद्वेषं विससर्ज ह ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने कर्म से लज्जित इन्द्र प्रेम से उनके चरण छू रहे थे। पृथु ने उन्हें गले लगाकर मन का समस्त द्वेष छोड़ दिया।

श्लोक 20.19

भगवानथ विश्वात्मा पृथुनोपहृतार्हणः । समुज्जिहानया भक्त्या गृहीतचरणाम्बुजः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथु ने विश्वात्मा भगवान की पूजा की और बढ़ती हुई भक्ति से उनके चरणकमल पकड़ लिए।

श्लोक 20.20

प्रस्थानाभिमुखोऽप्येनमनुग्रहविलम्बितः । पश्यन् पद्मपलाशाक्षो न प्रतस्थे सुहृत्सताम् ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: कमलनयन प्रभु जाने को उद्यत होकर भी भक्त पर कृपा और प्रेम से रुक गए; वे पृथु को देखते रहे और तुरंत नहीं चले।

श्लोक 20.21

स आदिराजो रचिताञ्जलिर्हरिं विलोकितुं नाशकदश्रुलोचनः । न किञ्चनोवाच स बाष्पविक्लवो हृदोपगुह्यामुमधादवस्थितः ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: आदिराज पृथु हाथ जोड़े खड़े थे। आँसुओं से भरी आँखों के कारण स्पष्ट देख नहीं पा रहे थे और भावविह्वल होकर कुछ कह नहीं सके; उन्होंने भगवान को हृदय में आलिङ्गन किया।

श्लोक 20.22

अथावमृज्याश्रुकला विलोकय- न्नतृप्तदृग्गोचरमाह पूरुषम् । पदा स्पृशन्तं क्षितिमंस उन्नते विन्यस्तहस्ताग्रमुरङ्गविद्विषः ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: फिर आँसू पोंछकर उन्होंने उन अतृप्तिदायक सुन्दर प्रभु को देखा, जिनके चरण भूमि को छू रहे थे और हाथ गरुड़ के ऊँचे कन्धे पर था; तब बोले।

श्लोक 20.23

पृथुरुवाच । वरान्विभो त्वद्वरदेश्वराद्बुधः कथं वृणीते गुणविक्रियात्मनाम् । ये नारकाणामपि सन्ति देहिनां तानीश कैवल्यपते वृणे न च ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथु ने कहा—मुक्ति के स्वामी, ज्ञानी आपसे गुणमयी देहों के विषयभोग क्यों माँगे, जो दुःखमय योनियों में भी मिलते हैं? मैं ऐसे वर नहीं चाहता।

श्लोक 20.24

न कामये नाथ तदप्यहं क्वचि- न्न यत्र युष्मच्चरणाम्बुजासवः । महत्तमान्तर्हृदयान्मुखच्युतो विधत्स्व कर्णायुतमेष मे वरः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जहाँ महात्माओं के हृदय से मुख तक बहता आपके चरणों की कथामृत का आस्वाद न हो, वह मुक्ति भी नहीं चाहता। मुझे उसे सुनने के लिए दस हजार कान दीजिए—यही मेरा वर है।

श्लोक 20.25

स उत्तमश्लोकमहन्मुखच्युतो भवत्पदाम्भोजसुधाकणानिलः । स्मृतिं पुनर्विस्मृततत्त्ववर्त्मनां कुयोगिनां नो वितरत्यलं वरैः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: महात्माओं के मुख से निकली आपकी चरणसुधा की वायु भूले हुए तत्त्वमार्ग की स्मृति जगा देती है। हम जैसे असम्पूर्ण साधकों को उसकी आवश्यकता है; दूसरे वर पर्याप्त नहीं।

श्लोक 20.26

यशः शिवं सुश्रव आर्यसङ्गमे यदृच्छया चोपश‍ृणोति ते सकृत् । कथं गुणज्ञो विरमेद्विना पशुं श्रीर्यत्प्रवव्रे गुणसङ्ग्रहेच्छया ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: सत्सङ्ग में संयोग से भी आपका कल्याणकारी यश एक बार सुन लेने वाला विवेकी उससे कैसे हटेगा? लक्ष्मी ने भी आपके गुणों में प्रेम से आपको वरण किया।

श्लोक 20.27

अथाभजे त्वाखिलपूरुषोत्तमं गुणालयं पद्मकरेव लालसः । अप्यावयोरेकपतिस्पृधोः कलि- र्न स्यात्कृतत्वच्चरणैकतानयोः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं भी लक्ष्मी की तरह गुणों के आश्रय पुरुषोत्तम आपकी सेवा चाहता हूँ। हम दोनों आपके चरणों में एकाग्र हैं; एक ही स्वामी की सेवा की होड़ से हमारे बीच कलह न हो।

श्लोक 20.28

जगज्जनन्यां जगदीश वैशसं स्यादेव यत्कर्मणि नः समीहितम् । करोषि फल्ग्वप्युरु दीनवत्सलः स्व एव धिष्ण्येऽभिरतस्य किं तया ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: यदि सेवा में मुझसे जगन्माता के अधिकार में हस्तक्षेप हो भी जाए तो आप दीनवत्सल होकर मेरी छोटी सेवा को बड़ा मानेंगे। आप आत्मतृप्त हैं; किसी बाहरी सम्पदा के मोहताज नहीं।

श्लोक 20.29

भजन्त्यथ त्वामत एव साधवः व्युदस्तमायागुणविभ्रमोदयम् । भवत्पदानुस्मरणादृते सतां निमित्तमन्यद्भगवन् न विद्महे ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसीलिए संत आपकी भक्ति करते हैं, जो माया के गुणों का भ्रम दूर करते हैं। आपके चरणों का स्मरण करने के अतिरिक्त संतों का दूसरा उद्देश्य हमें नहीं दिखाई देता।

श्लोक 20.30

मन्ये गिरं ते जगतां विमोहिनीं वरं वृणीष्वेति भजन्तमात्थ यत् । वाचा नु तन्त्या यदि ते जनोऽसितः कथं पुनः कर्म करोति मोहितः ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप भक्त से वर माँगने को कहते हैं; मुझे लगता है यह वाणी भी जगत की परीक्षा लेने वाली है। आपकी वाणी की डोर में बँधा जीव फिर कामनाओं से कर्म में कैसे उलझ जाए!

श्लोक 20.31

त्वन्माययाद्धा जन ईश खण्डितो यदन्यदाशास्त ऋतात्मनोऽबुधः । यथा चरेद्बालहितं पिता स्वयं तथा त्वमेवार्हसि नः समीहितुम् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपकी माया से भटका अज्ञानी आत्मसत्य को छोड़ दूसरी इच्छाएँ करता है। जैसे पिता बालक के बिना माँगे भी उसका हित करता है, वैसे आप स्वयं हमारा सच्चा कल्याण कीजिए।

श्लोक 20.32

मैत्रेय उवाच । इत्यादिराजेन नुतः स विश्वदृक्- तमाह राजन् मयि भक्तिरस्तु ते । दिष्ट्येदृशी धीर्मयि ते कृता यया मायां मदीयां तरति स्म दुस्त्यजाम् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—सर्वज्ञ भगवान ने स्तुति सुनकर कहा—राजन्, तुममें मेरी भक्ति स्थिर हो। सौभाग्य से तुम्हारी बुद्धि मुझमें ऐसी लगी है जिससे दुस्तर माया पार होती है।

श्लोक 20.33

तत्त्वं कुरु मयाऽऽदिष्टमप्रमत्तः प्रजापते । मदादेशकरो लोकः सर्वत्राप्नोति शोभनम् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रजापालक, सावधान होकर मेरी आज्ञा का पालन करो। मेरे निर्देश का पालन करने वाला सर्वत्र कल्याण पाता है।

श्लोक 20.34

मैत्रेय उवाच । इति वैन्यस्य राजर्षेः प्रतिनन्द्यार्थवद्वचः । पूजितोऽनुगृहीत्वैनं गन्तुं चक्रेऽच्युतो मतिम् ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—राजर्षि पृथु के सार्थक वचनों का अभिनन्दन करके, उनकी पूजा स्वीकार कर और अनुग्रह देकर भगवान जाने को उद्यत हुए।

श्लोक 20.35

देवर्षिपितृगन्धर्वसिद्धचारणपन्नगाः । किन्नराप्सरसो मर्त्याः खगा भूतान्यनेकशः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवता, ऋषि, पितर, गन्धर्व, सिद्ध, चारण, नाग, किन्नर, अप्सराएँ, मनुष्य, पक्षी और अनेक अन्य प्राणी वहाँ थे।

श्लोक 20.36

यज्ञेश्वरधिया राज्ञा वाग्वित्ताञ्जलिभक्तितः । सभाजिता ययुः सर्वे वैकुण्ठानुगतास्ततः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा ने सबमें यज्ञेश्वर का भाव रखकर वाणी, भेंट, प्रणाम और भक्ति से सम्मान किया। सब भगवान के साथ वहाँ से विदा हुए।

श्लोक 20.37

भगवानपि राजर्षेः सोपाध्यायस्य चाच्युतः । हरन्निव मनोऽमुष्य स्वधाम प्रत्यपद्यत ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अच्युत भगवान मानो आचार्यों सहित राजर्षि का मन अपने साथ ले जाते हुए अपने धाम लौट गए।

श्लोक 20.38

अदृष्टाय नमस्कृत्य नृपः सन्दर्शितात्मने । अव्यक्ताय च देवानां देवाय स्वपुरं ययौ ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: दर्शन देकर भी सामान्य इन्द्रियों से परे रहने वाले देवाधिदेव को प्रणाम करके पृथु अपनी नगरी लौटे।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 20 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 21

प्रजा के प्रति पृथु का राजधर्म उपदेश

श्लोक 21.1

मैत्रेय उवाच । मौक्तिकैः कुसुमस्रग्भिर्दुकूलैः स्वर्णतोरणैः । महासुरभिभिर्धूपैर्मण्डितं तत्र तत्र वै ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—नगरी में मोती, फूलमालाएँ, रेशमी वस्त्र, स्वर्णतोरण और अत्यन्त सुगन्धित धूप से स्थान–स्थान सजावट हुई थी।

श्लोक 21.2

चन्दनागुरुतोयार्द्ररथ्याचत्वरमार्गवत् । पुष्पाक्षतफलैस्तोक्मैर्लाजैरर्चिर्भिरर्चितम् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: गलियाँ, चौराहे और मार्ग चन्दन–अगरु के जल से सींचे गए थे; पुष्प, अक्षत, फल, अङ्कुर, लावा और दीपों से मंगलसज्जा थी।

श्लोक 21.3

सवृन्दैः कदलीस्तम्भैः पूगपोतैः परिष्कृतम् । तरुपल्लवमालाभिः सर्वतः समलङ्कृतम् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुच्छों वाले केले के स्तम्भ, सुपारी के पौधे और वृक्षों के पत्तों की मालाएँ चारों ओर लगी थीं।

श्लोक 21.4

प्रजास्तं दीपबलिभिः सम्भृताशेषमङ्गलैः । अभीयुर्मृष्टकन्याश्च मृष्टकुण्डलमण्डिताः ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रजा दीप और मंगलभेंटें लेकर स्वागत को आई; चमकते कुण्डलों से सजी सुन्दर कन्याएँ भी उपस्थित थीं।

श्लोक 21.5

शङ्खदुन्दुभिघोषेण ब्रह्मघोषेण चर्त्विजाम् । विवेश भवनं वीरः स्तूयमानो गतस्मयः ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: शङ्ख, दुन्दुभि और पुरोहितों की वेदध्वनि के बीच वीर पृथु स्तुति सुनते हुए, अभिमानरहित होकर महल में प्रवेश किए।

श्लोक 21.6

पूजितः पूजयामास तत्र तत्र महायशाः । पौराञ्जानपदांस्तांस्तान् प्रीतः प्रियवरप्रदः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: सम्मान पाकर उन्होंने भी प्रसन्नतापूर्वक नगर और ग्राम के लोगों का सम्मान किया तथा प्रिय भेंटें दीं।

श्लोक 21.7

स एवमादीन्यनवद्यचेष्टितः कर्माणि भूयांसि महान् महत्तमः । कुर्वन् शशासावनिमण्डलं यशः स्फीतं निधायारुरुहे परं पदम् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसे अनेक निर्दोष और महान कर्म करते हुए पृथु ने पृथ्वी का पालन किया, विस्तृत यश स्थापित किया और अन्त में परम पद प्राप्त किया।

श्लोक 21.8

सूत उवाच । तदादिराजस्य यशो विजृम्भितं गुणैरशेषैर्गुणवत्सभाजितम् । क्षत्ता महाभागवतः सदस्पते कौषारविं प्राह गृणन्तमर्चयन् ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूत ने कहा—गुणवानों द्वारा सम्मानित आदिराज के यश का वर्णन सुनकर महान भक्त विदुर ने मैत्रेय की प्रशंसा की और फिर पूछा।

श्लोक 21.9

विदुर उवाच । सोऽभिषिक्तः पृथुर्विप्रैर्लब्धाशेषसुरार्हणः । बिभ्रत्स वैष्णवं तेजो बाह्वोर्याभ्यां दुदोह गाम् ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: विदुर बोले—ब्राह्मणों ने पृथु का अभिषेक किया और सभी देवताओं ने उन्हें सम्मान दिया। उनकी भुजाओं में वैष्णव तेज था जिससे उन्होंने पृथ्वी का दोहन किया।

श्लोक 21.10

को न्वस्य कीर्तिं न श‍ृणोत्यभिज्ञो यद्विक्रमोच्छिष्टमशेषभूपाः । लोकाः सपाला उपजीवन्ति काम- मद्यापि तन्मे वद कर्म शुद्धम् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी कीर्ति कौन विवेकी नहीं सुनेगा? आज भी राजा और लोकपाल उनके स्थापित कल्याणकारी मार्गों से लाभ उठाते हैं। मुझे उनके पवित्र कर्म सुनाइए।

श्लोक 21.11

मैत्रेय उवाच । गङ्गायमुनयोर्नद्योरन्तरा क्षेत्रमावसन् । आरब्धानेव बुभुजे भोगान् पुण्यजिहासया ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—पृथु गङ्गा और यमुना के बीच रहते थे। वे संचित पुण्यफल को समाप्त करने के लिए केवल प्रारब्ध से मिले भोग स्वीकार करते थे।

श्लोक 21.12

सर्वत्रास्खलितादेशः सप्तद्वीपैकदण्डधृक् । अन्यत्र ब्राह्मणकुलादन्यत्राच्युतगोत्रतः ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: सात द्वीपों में उनकी आज्ञा निर्बाध चलती थी; फिर भी वे ब्रह्मनिष्ठ ज्ञानियों और भगवान के भक्तों की आध्यात्मिक स्वतन्त्रता का आदर करते थे।

श्लोक 21.13

एकदाऽऽसीन्महासत्रदीक्षा तत्र दिवौकसाम् । समाजो ब्रह्मर्षीणां च राजर्षीणां च सत्तम ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: एक बार उन्होंने महान यज्ञ की दीक्षा ली। वहाँ देवताओं, ब्रह्मर्षियों और राजर्षियों की बड़ी सभा हुई।

श्लोक 21.14

तस्मिन्नर्हत्सु सर्वेषु स्वर्चितेषु यथार्हतः । उत्थितः सदसो मध्ये ताराणामुडुराडिव ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: सब पूजनीय अतिथियों का यथायोग्य सम्मान करने के बाद वे सभा के बीच ऐसे उठे जैसे तारों के बीच चन्द्रमा।

श्लोक 21.15

प्रांशुः पीनायतभुजो गौरः कञ्जारुणेक्षणः । सुनासः सुमुखः सौम्यः पीनांसः सुद्विजस्मितः ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे ऊँचे कद, लम्बी पुष्ट भुजाओं, गौर वर्ण, अरुणकमलनयनों, सुन्दर नासिका, सौम्य मुख, मजबूत कन्धों और उज्ज्वल दाँतों की मुस्कान वाले थे।

श्लोक 21.16

व्यूढवक्षा बृहच्छ्रोणिर्वलिवल्गुदलोदरः । आवर्तनाभिरोजस्वी काञ्चनोरुरुदग्रपात् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनका वक्ष विशाल, कटिभाग विस्तृत, उदर सुन्दर वलियों वाला, नाभि गहरी, जाँघें स्वर्ण जैसी और चरण उन्नत थे।

श्लोक 21.17

सूक्ष्मवक्रासितस्निग्धमूर्धजः कम्बुकन्धरः । महाधने दुकूलाग्र्ये परिधायोपवीय च ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: सूक्ष्म, घुँघराले, काले और चिकने केश तथा शङ्ख जैसी गर्दन थी; उन्होंने बहुमूल्य रेशमी वस्त्र और उत्तरीय धारण किया था।

श्लोक 21.18

व्यञ्जिताशेषगात्रश्रीर्नियमे न्यस्तभूषणः । कृष्णाजिनधरः श्रीमान् कुशपाणिः कृतोचितः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: यज्ञव्रत के कारण आभूषण उतारे हुए थे, जिससे स्वाभाविक सौन्दर्य प्रकट था। वे कृष्णमृगचर्म धारण किए और हाथ में कुश लिए उचित व्रतवेश में थे।

श्लोक 21.19

शिशिरस्निग्धताराक्षः समैक्षत समन्ततः । ऊचिवानिदमुर्वीशः सदः संहर्षयन्निव ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: शीतल और स्नेहपूर्ण नेत्रों से चारों ओर देखकर राजा सभा को प्रसन्न करते हुए बोलने लगे।

श्लोक 21.20

चारुचित्रपदं श्लक्ष्णं मृष्टं गूढमविक्लवम् । सर्वेषामुपकारार्थं तदा अनुवदन्निव ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी वाणी सुन्दर शब्दों वाली, कोमल, स्पष्ट, अर्थगम्भीर और निडर थी; वे सबके उपकार के लिए अपनी समझ प्रकट कर रहे थे।

श्लोक 21.21

राजोवाच । सभ्याः श‍ृणुत भद्रं वः साधवो य इहागताः । सत्सु जिज्ञासुभिर्धर्ममावेद्यं स्वमनीषितम् ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा बोले—यहाँ आए सज्जन सभासदो, आपका मंगल हो। सुनिए; धर्म जानने की इच्छा रखने वाले को संतों के सामने अपना विचार रखना चाहिए।

श्लोक 21.22

अहं दण्डधरो राजा प्रजानामिह योजितः । रक्षिता वृत्तिदः स्वेषु सेतुषु स्थापिता पृथक् ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: मुझे प्रजा की रक्षा, आजीविका और उचित मर्यादाओं में स्थापना के लिए दण्डधारी राजा नियुक्त किया गया है।

श्लोक 21.23

तस्य मे तदनुष्ठानाद्यानाहुर्ब्रह्मवादिनः । लोकाः स्युः कामसन्दोहा यस्य तुष्यति दिष्टदृक् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन कर्तव्यों का पालन करके मैं भगवान को प्रसन्न कर सकूँ और वेदज्ञों द्वारा बताए कल्याणकारी लोक प्राप्त करूँ—यही मेरी इच्छा है।

श्लोक 21.24

य उद्धरेत्करं राजा प्रजा धर्मेष्वशिक्षयन् । प्रजानां शमलं भुङ्क्ते भगं च स्वं जहाति सः ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो राजा प्रजा को धर्म का मार्ग सिखाए बिना केवल कर लेता है, वह उसके दोषों का भागी होता है और अपना पुण्य खो देता है।

श्लोक 21.25

तत्प्रजा भर्तृपिण्डार्थं स्वार्थमेवानसूयवः । कुरुताधोक्षजधियस्तर्हि मेऽनुग्रहः कृतः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रजाजनो, मेरे इस उत्तरदायित्व को सफल बनाने के लिए ईर्ष्या छोड़, भगवान में मन रखकर अपना वास्तविक हित करने वाले कर्तव्य पूरे करो; यही मुझ पर अनुग्रह होगा।

श्लोक 21.26

यूयं तदनुमोदध्वं पितृदेवर्षयोऽमलाः । कर्तुः शास्तुरनुज्ञातुस्तुल्यं यत्प्रेत्य तत्फलम् ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: निर्मल पितरो, देवताओं और ऋषियों, आप भी इसका अनुमोदन करें; क्योंकि करने वाले, सिखाने वाले और अनुमति देने वाले को कर्मफल में भाग मिलता है।

श्लोक 21.27

अस्ति यज्ञपतिर्नाम केषाञ्चिदर्हसत्तमाः । इहामुत्र च लक्ष्यन्ते ज्योत्स्नावत्यः क्वचिद्भुवः ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रेष्ठ पूज्यजनो, यज्ञों के फलदाता परम प्रभु हैं। इस लोक और परलोक में प्राणियों की भिन्न उज्ज्वल स्थितियाँ भी किसी नियामक व्यवस्था का संकेत देती हैं।

श्लोक 21.28

मनोरुत्तानपादस्य ध्रुवस्यापि महीपतेः । प्रियव्रतस्य राजर्षेरङ्गस्यास्मत्पितुः पितुः ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मनु, उत्तानपाद, राजा ध्रुव, राजर्षि प्रियव्रत और हमारे पितामह अङ्ग—

श्लोक 21.29

ईदृशानामथान्येषामजस्य च भवस्य च । प्रह्लादस्य बलेश्चापि कृत्यमस्ति गदाभृता ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: तथा ब्रह्मा, शिव, प्रह्लाद, बलि और अन्य महात्माओं ने गदाधारी भगवान की आराधना को अपना कर्तव्य माना है।

श्लोक 21.30

दौहित्रादीन् ऋते मृत्योः शोच्यान् धर्मविमोहितान् । वर्गस्वर्गापवर्गाणां प्रायेणैकात्म्यहेतुना ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: केवल मृत्यु के वंशज वेन जैसे धर्मबुद्धि से विमुख लोग इस बात से अलग रहे। भगवान ही धर्म, अर्थ, काम, स्वर्ग और मुक्ति के मूल आधार हैं।

श्लोक 21.31

यत्पादसेवाभिरुचिस्तपस्विना- मशेषजन्मोपचितं मलं धियः । सद्यः क्षिणोत्यन्वहमेधती सती यथा पदाङ्गुष्ठविनिःसृता सरित् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके चरणों की सेवा में बढ़ती रुचि अनेक जन्मों का अन्तःकरणमल शीघ्र मिटाती है, जैसे उनके अँगूठे से निकली गङ्गा पवित्र करती है।

श्लोक 21.32

विनिर्धुताशेषमनोमलः पुमा- नसङ्गविज्ञानविशेषवीर्यवान् । यदङ्घ्रिमूले कृतकेतनः पुन- र्न संसृतिं क्लेशवहां प्रपद्यते ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: समस्त मानसिक मल दूर होने पर मनुष्य अनासक्ति और विशेष आत्मज्ञान से समर्थ होता है। उनके चरणों का आश्रय लेकर वह फिर क्लेशमय संसार में नहीं लौटता।

श्लोक 21.33

तमेव यूयं भजतात्मवृत्तिभि- र्मनोवचःकायगुणैः स्वकर्मभिः । अमायिनः कामदुघाङ्घ्रिपङ्कजं यथाधिकारावसितार्थसिद्धयः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: निष्कपट होकर अपनी मानसिक, वाचिक और शारीरिक वृत्तियों तथा कर्तव्यकर्मों से उन्हीं की आराधना करो; उनके चरण प्रत्येक अधिकारी को उचित फल देते हैं।

श्लोक 21.34

असाविहानेकगुणोऽगुणोऽध्वरः पृथग्विधद्रव्यगुणक्रियोक्तिभिः । सम्पद्यतेऽर्थाशयलिङ्गनामभि- र्विशुद्धविज्ञानघनः स्वरूपतः ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वरूप से विशुद्ध ज्ञानमात्र और गुणातीत भगवान ही विविध सामग्री, गुण, क्रिया, मन्त्र, प्रयोजन, भाव, नाम और रूप के द्वारा अनेक प्रकार के यज्ञ बनकर प्रकट होते हैं।

श्लोक 21.35

प्रधानकालाशयधर्मसङ्ग्रहे शरीर एष प्रतिपद्य चेतनाम् । क्रियाफलत्वेन विभुर्विभाव्यते यथानलो दारुषु तद्गुणात्मकः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रकृति, काल, संस्कार और कर्म से बने शरीर में चेतना के रूप में स्थित प्रभु कर्मफल के नियन्ता दिखाई देते हैं, जैसे लकड़ी में अग्नि उसके रूप के अनुसार प्रकट होती है।

श्लोक 21.36

अहो ममामी वितरन्त्यनुग्रहं हरिं गुरुं यज्ञभुजामधीश्वरम् । स्वधर्मयोगेन यजन्ति मामका निरन्तरं क्षोणितले दृढव्रताः ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह मेरा सौभाग्य है कि मेरी प्रजा दृढ़व्रत होकर अपने धर्मकर्मों से यज्ञभोक्ताओं के स्वामी और गुरु हरि की निरन्तर पूजा करती है।

श्लोक 21.37

मा जातु तेजः प्रभवेन्महर्द्धिभि- स्तितिक्षया तपसा विद्यया च । देदीप्यमानेऽजितदेवतानां कुले स्वयं राजकुलाद्द्विजानाम् ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजसत्ता का बल कभी उन ब्राह्मणों पर अत्याचार न करे जो संयम, सहनशीलता, तप और विद्या से प्रकाशित तथा भगवान के उपासक हैं।

श्लोक 21.38

ब्रह्मण्यदेवः पुरुषः पुरातनो नित्यं हरिर्यच्चरणाभिवन्दनात् । अवाप लक्ष्मीमनपायिनीं यशो जगत्पवित्रं च महत्तमाग्रणीः ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुरातन पुरुष हरि भी ज्ञानियों के चरणों का आदर करने का उदाहरण रखते हैं; उनकी नित्य लक्ष्मी और जगत को पवित्र करने वाली कीर्ति विनय की महिमा प्रकट करती है।

श्लोक 21.39

यत्सेवयाशेषगुहाशयः स्वराड् विप्रप्रियस्तुष्यति काममीश्वरः । तदेव तद्धर्मपरैर्विनीतैः सर्वात्मना ब्रह्मकुलं निषेव्यताम् ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिनकी सेवा से सबके हृदय में स्थित स्वतन्त्र भगवान प्रसन्न होते हैं, उन ब्रह्मनिष्ठ ज्ञानियों की धर्मपरायण और विनीत भाव से सेवा करो।

श्लोक 21.40

पुमान् लभेतानतिवेलमात्मनः प्रसीदतोऽत्यन्तशमं स्वतः स्वयम् । यन्नित्यसम्बन्धनिषेवया ततः परं किमत्रास्ति मुखं हविर्भुजाम् ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: ऐसी निरन्तर सेवा से आत्मा प्रसन्न होकर परम शान्ति पाती है। यज्ञभोक्ता भगवान की प्रसन्नता के लिए इससे बढ़कर माध्यम क्या होगा?

श्लोक 21.41

अश्नात्यनन्तः खलु तत्त्वकोविदैः श्रद्धाहुतं यन्मुख इज्यनामभिः । न वै तथा चेतनया बहिष्कृते हुताशने पारमहंस्यपर्यगुः ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: तत्त्ववेत्ताओं के मुख में श्रद्धा से अर्पित अन्न को भगवान प्रेम से स्वीकार करते हैं; चेतना के भाव से रहित केवल अग्नि में दी आहुति से वे वैसे प्रसन्न नहीं होते।

श्लोक 21.42

यद्ब्रह्म नित्यं विरजं सनातनं श्रद्धातपोमङ्गलमौनसंयमैः । समाधिना बिभ्रति हार्थदृष्टये यत्रेदमादर्श इवावभासते ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: ये ज्ञानी श्रद्धा, तप, मंगलाचरण, मौन, संयम और समाधि से नित्य निर्मल वेदज्ञान धारण करते हैं, जिसमें जगत का सत्य दर्पण की तरह प्रतिबिम्बित होता है।

श्लोक 21.43

तेषामहं पादसरोजरेणु- मार्यावहेयाधिकिरीटमायुः । यं नित्यदा बिभ्रत आशु पापं नश्यत्यमुं सर्वगुणा भजन्ति ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैं उनके चरणकमलों की धूल जीवनभर मुकुट पर रखना चाहता हूँ। उसे आदर से धारण करने से पाप मिटते और सद्गुण विकसित होते हैं।

श्लोक 21.44

गुणायनं शीलधनं कृतज्ञं वृद्धाश्रयं संवृणतेऽनुसम्पदः । प्रसीदतां ब्रह्मकुलं गवां च जनार्दनः सानुचरश्च मह्यम् ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुणवान, शीलधन, कृतज्ञ और वृद्धों की सेवा करने वाले के पास सम्पदाएँ आती हैं। ब्रह्मनिष्ठ समुदाय, गौओं के हितकारी जनार्दन और उनके सेवक मुझ पर प्रसन्न हों।

श्लोक 21.45

मैत्रेय उवाच । इति ब्रुवाणं नृपतिं पितृदेवद्विजातयः । तुष्टुवुर्हृष्टमनसः साधुवादेन साधवः ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—राजा के ये वचन सुनकर पितर, देवता, ब्राह्मण और संत प्रसन्न हुए तथा साधु–साधु कहकर उनका अभिनन्दन किया।

श्लोक 21.46

पुत्रेण जयते लोकानिति सत्यवती श्रुतिः । ब्रह्मदण्डहतः पापो यद्वेनोऽत्यतरत्तमः ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे बोले—पुत्र से श्रेष्ठ लोक मिलते हैं, यह श्रुति की बात सत्य हुई; ब्रह्मदण्ड से मरा पापी वेन भी पुत्र पृथु के प्रभाव से अन्धकार से पार हुआ।

श्लोक 21.47

हिरण्यकशिपुश्चापि भगवन्निन्दया तमः । विविक्षुरत्यगात्सूनोः प्रह्लादस्यानुभावतः ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: हिरण्यकशिपु भी भगवान की निन्दा से अधोगति को जाने वाला था, पर पुत्र प्रह्लाद के प्रभाव से उसके कुल का कल्याण हुआ।

श्लोक 21.48

वीरवर्य पितः पृथ्व्याः समाः सञ्जीव शाश्वतीः । यस्येदृश्यच्युते भक्तिः सर्वलोकैकभर्तरि ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वी के पितृतुल्य वीरश्रेष्ठ, आप दीर्घकाल जीवित रहें! समस्त लोकों के एकमात्र पालक अच्युत में आपकी ऐसी भक्ति है।

श्लोक 21.49

अहो वयं ह्यद्य पवित्रकीर्ते त्वयैव नाथेन मुकुन्दनाथाः । य उत्तमश्लोकतमस्य विष्णो- र्ब्रह्मण्यदेवस्य कथां व्यनक्ति ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: पवित्रकीर्ति नाथ, आपके जैसा स्वामी पाकर हम भी मुकुन्द के आश्रित हो गए; आप भगवान विष्णु की महिमा स्पष्ट करते हैं।

श्लोक 21.50

नात्यद्भुतमिदं नाथ तवाजीव्यानुशासनम् । प्रजानुरागो महतां प्रकृतिः करुणात्मनाम् ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने आश्रितों को ऐसी शिक्षा देना आपके लिए आश्चर्य नहीं। करुणामय महात्माओं का स्वभाव ही प्रजा से प्रेम करना है।

श्लोक 21.51

अद्य नस्तमसः पारस्त्वयोपासादितः प्रभो । भ्राम्यतां नष्टदृष्टीनां कर्मभिर्दैवसंज्ञितैः ॥ ५१॥

सरल हिंदी भावार्थ: कर्म और दैव के अधीन भटकते तथा विवेक खोए हमें आपने आज अज्ञान के पार पहुँचने का मार्ग दिखाया है।

श्लोक 21.52

नमो विवृद्धसत्त्वाय पुरुषाय महीयसे । यो ब्रह्म क्षत्रमाविश्य बिभर्तीदं स्वतेजसा ॥ ५२॥

सरल हिंदी भावार्थ: विकसित शुद्ध सत्त्व वाले महान पुरुष को प्रणाम, जो ज्ञान और शासन की शक्तियों में प्रवेश करके अपने तेज से जगत को धारण करते हैं।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 21 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 22

सनत्कुमार का आत्मज्ञान और अनासक्त कर्म

श्लोक 22.1

मैत्रेय उवाच । जनेषु प्रगृणत्स्वेवं पृथुं पृथुलविक्रमम् । तत्रोपजग्मुर्मुनयश्चत्वारः सूर्यवर्चसः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—लोग प्रतापी पृथु की प्रशंसा कर रहे थे कि वहाँ सूर्य जैसे तेजस्वी चार कुमार मुनि आए।

श्लोक 22.2

तांस्तु सिद्धेश्वरान् राजा व्योम्नोऽवतरतोऽर्चिषा । लोकानपापान् कुर्वत्या सानुगोऽचष्ट लक्षितान् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजा ने अनुचरों सहित उन सिद्धेश्वरों को आकाश से उतरते देखा; उनकी ज्योति लोकों को पवित्र कर रही थी।

श्लोक 22.3

तद्दर्शनोद्गतान् प्राणान् प्रत्यादित्सुरिवोत्थितः । ससदस्यानुगो वैन्य इन्द्रियेशो गुणानिव ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके दर्शन से उमड़े आदर में पृथु सभासदों और अनुचरों सहित उठ खड़े हुए, मानो हर्ष से बाहर गए प्राणों को वापस समेट रहे हों।

श्लोक 22.4

गौरवाद्यन्त्रितः सभ्यः प्रश्रयानतकन्धरः । विधिवत्पूजयाञ्चक्रे गृहीताध्यर्हणासनान् ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: विनय से गर्दन झुकाकर उन्होंने मुनियों को उचित आसन दिए और विधिपूर्वक आदर से पूजा की।

श्लोक 22.5

तत्पादशौचसलिलैर्मार्जितालकबन्धनः । तत्र शीलवतां वृत्तमाचरन् मानयन्निव ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने मुनियों के चरणधोवन का जल मस्तक पर धारण किया और शीलवानों के आदर्श स्वागत का आचरण किया।

श्लोक 22.6

हाटकासन आसीनान् स्वधिष्ण्येष्विव पावकान् । श्रद्धासंयमसंयुक्तः प्रीतः प्राह भवाग्रजान् ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्वर्णासनों पर अग्नि की तरह तेजस्वी बैठे, शिव से भी पहले उत्पन्न उन कुमारों से श्रद्धा और संयमयुक्त राजा ने प्रसन्न होकर कहा।

श्लोक 22.7

पृथुरुवाच । अहो आचरितं किं मे मङ्गलं मङ्गलायनाः । यस्य वो दर्शनं ह्यासीद्दुर्दर्शानां च योगिभिः ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथु बोले—मंगल के आश्रय महात्माओ, मैंने कौन सा शुभ कर्म किया कि आप जैसे योगियों के लिए भी दुर्लभ संतों का दर्शन मिला?

श्लोक 22.8

किं तस्य दुर्लभतरमिह लोके परत्र च । यस्य विप्राः प्रसीदन्ति शिवो विष्णुश्च सानुगः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिस पर ज्ञानियों, शिव, विष्णु और उनके सेवकों की कृपा हो, उसके लिए इस लोक या परलोक में क्या दुर्लभ रह सकता है?

श्लोक 22.9

नैव लक्षयते लोको लोकान् पर्यटतोऽपि यान् । यथा सर्वदृशं सर्व आत्मानं येऽस्य हेतवः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप लोकों में घूमते हैं, फिर भी सामान्य लोग आपको नहीं पहचान पाते, जैसे सबके भीतर स्थित सर्वद्रष्टा आत्मा को नहीं जानते।

श्लोक 22.10

अधना अपि ते धन्याः साधवो गृहमेधिनः । यद्गृहा ह्यर्हवर्याम्बुतृणभूमीश्वरावराः ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे साधु गृहस्थ निर्धन होकर भी धन्य हैं जिनके घर में पूजनीय अतिथि के लिए जल, तृणासन, बैठने की भूमि और निष्कपट स्वागत मौजूद हो।

श्लोक 22.11

व्यालालयद्रुमा वै तेऽप्यरिक्ताखिलसम्पदः । यद्गृहास्तीर्थपादीयपादतीर्थविवर्जिताः ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: इसके विपरीत सब सम्पदा वाले घर भी संतों के चरणजल से वञ्चित हों तो साँपों के आश्रय वाले वृक्षों जैसे हैं।

श्लोक 22.12

स्वागतं वो द्विजश्रेष्ठा यद्व्रतानि मुमुक्षवः । चरन्ति श्रद्धया धीरा बाला एव बृहन्ति च ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रेष्ठ ज्ञानियो, आपका स्वागत है। मुक्तिकामी धीरजन श्रद्धा से आपके आचरण का अनुसरण करते हैं; आप बालरूप होकर भी महान व्रतधारी हैं।

श्लोक 22.13

कच्चिन्नः कुशलं नाथा इन्द्रियार्थार्थवेदिनाम् । व्यसनावाप एतस्मिन् पतितानां स्वकर्मभिः ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: नाथो, इन्द्रियविषयों को ही पुरुषार्थ समझकर अपने कर्मों से इस विपत्तिपूर्ण संसार में पड़े हम लोगों का क्या कल्याण हो सकता है?

श्लोक 22.14

भवत्सु कुशलप्रश्न आत्मारामेषु नेष्यते । कुशलाकुशला यत्र न सन्ति मतिवृत्तयः ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: आप आत्मारामों से कुशल पूछना आवश्यक नहीं, क्योंकि आपके भीतर शुभ–अशुभ परिस्थितियों की आश्रित मनोवृत्तियाँ नहीं उठतीं।

श्लोक 22.15

तदहं कृतविश्रम्भः सुहृदो वस्तपस्विनाम् । सम्पृच्छे भव एतस्मिन् क्षेमः केनाञ्जसा भवेत् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपको अपना हितैषी जानकर मैं विश्वास से पूछता हूँ—इस संसार में शीघ्र और वास्तविक कल्याण किस साधन से होगा?

श्लोक 22.16

व्यक्तमात्मवतामात्मा भगवानात्मभावनः । स्वानामनुग्रहायेमां सिद्धरूपी चरत्यजः ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: स्पष्ट है कि आत्मज्ञानियों के आत्मा और सबका हित करने वाले अजन्मा भगवान अपने भक्तों पर कृपा के लिए सिद्धरूप से भ्रमण करते हैं।

श्लोक 22.17

मैत्रेय उवाच । पृथोस्तत्सूक्तमाकर्ण्य सारं सुष्ठु मितं मधु । स्मयमान इव प्रीत्या कुमारः प्रत्युवाच ह ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—पृथु की सारयुक्त, सुन्दर, संक्षिप्त और मधुर बात सुनकर सनत्कुमार प्रेम से मुस्कराए और उत्तर दिया।

श्लोक 22.18

सनत्कुमार उवाच । साधु पृष्टं महाराज सर्वभूतहितात्मना । भवता विदुषा चापि साधूनां मतिरीदृशी ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: सनत्कुमार बोले—महाराज, सभी प्राणियों का हित चाहने वाले आपने उत्तम प्रश्न किया है। ज्ञानी संतों की बुद्धि ऐसी ही होती है।

श्लोक 22.19

सङ्गमः खलु साधूनामुभयेषां च सम्मतः । यत्सम्भाषणसम्प्रश्नः सर्वेषां वितनोति शम् ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: संतों का मिलन दोनों पक्षों को प्रिय होता है; उनके संवाद और प्रश्न सभी का कल्याण फैलाते हैं।

श्लोक 22.20

अस्त्येव राजन् भवतो मधुद्विषः पादारविन्दस्य गुणानुवादने । रतिर्दुरापा विधुनोति नैष्ठिकी कामं कषायं मलमन्तरात्मनः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: आपमें हरि के चरणों और गुणगान के प्रति दुर्लभ दृढ़ प्रेम है। यह प्रेम अन्तःकरण की कामना और मलिन संस्कार दूर करता है।

श्लोक 22.21

शास्त्रेष्वियानेव सुनिश्चितो नृणां क्षेमस्य सध्र्यग् विमृशेषु हेतुः । असङ्ग आत्मव्यतिरिक्त आत्मनि दृढा रतिर्ब्रह्मणि निर्गुणे च या ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: शास्त्रों में विचार करके मनुष्य के कल्याण का यही निश्चित साधन बताया गया है—आत्मा से भिन्न वस्तुओं में अनासक्ति और गुणातीत ब्रह्म में दृढ़ प्रेम।

श्लोक 22.22

सा श्रद्धया भगवद्धर्मचर्यया जिज्ञासयाऽऽध्यात्मिकयोगनिष्ठया । योगेश्वरोपासनया च नित्यं पुण्यश्रवः कथया पुण्यया च ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: यह प्रेम श्रद्धा, भगवद्धर्म का आचरण, तत्त्वजिज्ञासा, अध्यात्मयोग में निष्ठा, योगेश्वर की उपासना और भगवान की पवित्र कथा से बढ़ता है।

श्लोक 22.23

अर्थेन्द्रियारामसगोष्ठ्यतृष्णया तत्सम्मतानामपरिग्रहेण च । विविक्तरुच्या परितोष आत्मन् विना हरेर्गुणपीयूषपानात् ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: धन और इन्द्रियसुख में डूबे लोगों की गोष्ठियों की लालसा छोड़ने, उनकी आसक्ति बढ़ाने वाली वस्तुएँ न लेने, एकान्तप्रियता और हरि के गुणामृत में आत्मसन्तोष से वह प्रेम पुष्ट होता है।

श्लोक 22.24

अहिंसया पारमहंस्यचर्यया स्मृत्या मुकुन्दाचरिताग्र्यसीधुना । यमैरकामैर्नियमैश्चाप्यनिन्दया निरीहया द्वन्द्वतितिक्षया च ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: अहिंसा, परमहंसों का आचरण, मुकुन्द की श्रेष्ठ लीलाओं का स्मरण, निष्काम यम–नियम, निन्दा का त्याग, अनावश्यक इच्छाओं से निवृत्ति और द्वन्द्वसहन भी उसके साधन हैं।

श्लोक 22.25

हरेर्मुहुस्तत्परकर्णपूर- गुणाभिधानेन विजृम्भमाणया । भक्त्या ह्यसङ्गः सदसत्यनात्मनि स्यान्निर्गुणे ब्रह्मणि चाञ्जसा रतिः ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के गुणों का बार–बार गान करते हुए बढ़ती भक्ति से स्थूल–सूक्ष्म अनात्म वस्तुओं में आसक्ति छूटती और गुणातीत ब्रह्म में सहज अनुराग होता है।

श्लोक 22.26

यदा रतिर्ब्रह्मणि नैष्ठिकी पुमा- नाचार्यवान् ज्ञानविरागरंहसा । दहत्यवीर्यं हृदयं जीवकोशं पञ्चात्मकं योनिमिवोत्थितोऽग्निः ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुरु का आश्रय पाकर ब्रह्म में दृढ़ प्रेम होने पर ज्ञान और वैराग्य की शक्ति सूक्ष्म कर्मबीजों को जला देती है, जैसे लकड़ी से निकली अग्नि उसी लकड़ी को जला देती है।

श्लोक 22.27

दग्धाशयो मुक्तसमस्ततद्गुणो नैवात्मनो बहिरन्तर्विचष्टे । परात्मनोर्यद्व्यवधानं पुरस्तात् स्वप्ने यथा पुरुषस्तद्विनाशे ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अन्तःकरण का अज्ञान जलने और उसके गुणों से मुक्त होने पर भीतर–बाहर का वह विभाजन नहीं रहता जो पहले आत्मा और परमात्मा के बीच था; जैसे जागने पर स्वप्न का भेद मिट जाता है।

श्लोक 22.28

आत्मानमिन्द्रियार्थं च परं यदुभयोरपि । सत्याशय उपाधौ वै पुमान् पश्यति नान्यदा ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जब तक उपाधि का आधार रहता है तभी मनुष्य आत्मा, विषय और उनके परे नियन्ता को अलग–अलग सीमित रूपों में देखता है; उपाधि मिटने पर वह भ्रान्ति नहीं रहती।

श्लोक 22.29

निमित्ते सति सर्वत्र जलादावपि पूरुषः । आत्मनश्च परस्यापि भिदां पश्यति नान्यदा ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: जैसे जल आदि प्रतिबिम्ब के माध्यम होने पर अपने और दूसरे रूप का भेद दिखाई देता है, वैसे ही उपाधि के कारण भेदबुद्धि होती है।

श्लोक 22.30

इन्द्रियैर्विषयाकृष्टैराक्षिप्तं ध्यायतां मनः । चेतनां हरते बुद्धेः स्तम्बस्तोयमिव ह्रदात् ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: इन्द्रियाँ विषयों की ओर खिंचें तो विषयध्यान में पड़ा मन बुद्धि का विवेक खींच लेता है, जैसे तट की वनस्पति सरोवर का जल सोख लेती है।

श्लोक 22.31

भ्रश्यत्यनुस्मृतिश्चित्तं ज्ञानभ्रंशः स्मृतिक्षये । तद्रोधं कवयः प्राहुरात्मापह्नवमात्मनः ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: तब आत्मस्मृति घटती है और स्मृति के नष्ट होने से ज्ञान लुप्त होता है। ज्ञानी इस आत्मज्ञान के अवरोध को अपने ही स्वरूप का विस्मरण कहते हैं।

श्लोक 22.32

नातः परतरो लोके पुंसः स्वार्थव्यतिक्रमः । यदध्यन्यस्य प्रेयस्त्वमात्मनः स्वव्यतिक्रमात् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: अपने सत्य स्वरूप को भुलाकर दूसरी वस्तु को अधिक प्रिय मान लेना मनुष्य के हित की सबसे बड़ी हानि है।

श्लोक 22.33

अर्थेन्द्रियार्थाभिध्यानं सर्वार्थापह्नवो नृणाम् । भ्रंशितो ज्ञानविज्ञानाद्येनाविशति मुख्यताम् ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: धन और विषयों का अत्यधिक चिन्तन मनुष्य के सभी श्रेष्ठ उद्देश्यों को नष्ट करता है। उससे ज्ञान और अनुभव छूटकर चेतना जड़ता की ओर गिरती है।

श्लोक 22.34

न कुर्यात्कर्हिचित्सङ्गं तमस्तीव्रं तितीरिषुः । धर्मार्थकाममोक्षाणां यदत्यन्तविघातकम् ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: गहरे अज्ञान के पार जाना चाहने वाले को उस आसक्ति से बचना चाहिए जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों में बड़ी बाधा बनती है।

श्लोक 22.35

तत्रापि मोक्ष एवार्थ आत्यन्तिकतयेष्यते । त्रैवर्ग्योऽर्थो यतो नित्यं कृतान्तभयसंयुतः ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: इनमें मोक्ष ही अन्तिम और स्थायी पुरुषार्थ है, क्योंकि धर्म, अर्थ और काम के सांसारिक फल सदा काल के भय से जुड़े हैं।

श्लोक 22.36

परेऽवरे च ये भावा गुणव्यतिकरादनु । न तेषां विद्यते क्षेममीश विध्वंसिताशिषाम् ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुणों की क्रिया से उत्पन्न ऊँचे या नीचे सभी भोगरूपों में स्थायी सुरक्षा नहीं है; काल उनकी आशाओं का अन्त कर देता है।

श्लोक 22.37

तत्त्वं नरेन्द्र जगतामथ तस्थुषां च देहेन्द्रियासुधिषणात्मभिरावृतानाम् । यः क्षेत्रवित्तपतया हृदि विश्वगाविः प्रत्यक् चकास्ति भगवांस्तमवेहि सोऽस्मि ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: राजन्, स्थावर–जङ्गम प्राणी शरीर, इन्द्रिय, प्राण, बुद्धि और अहंकार से ढके हैं। उनके हृदय में साक्षी बनकर प्रकाशित विश्वव्यापक भगवान को अपना सच्चा आत्मस्वरूप जानो।

श्लोक 22.38

यस्मिन्निदं सदसदात्मतया विभाति मायाविवेकविधुति स्रजि वाहिबुद्धिः । तं नित्यमुक्तपरिशुद्धविशुद्धतत्त्वं प्रत्यूढकर्मकलिलप्रकृतिं प्रपद्ये ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिनमें माया से यह कारण–कार्य जगत प्रकट होता है, जैसे भ्रम से माला में साँप दिखाई दे, उन नित्यमुक्त, पूर्ण निर्मल और कर्ममल से परे परम तत्त्व की मैं शरण लेता हूँ।

श्लोक 22.39

यत्पादपङ्कजपलाशविलासभक्त्या कर्माशयं ग्रथितमुद्ग्रथयन्ति सन्तः । तद्वन्न रिक्तमतयो यतयोऽपि रुद्ध- स्रोतोगणास्तमरणं भज वासुदेवम् ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: संत भगवान के चरणकमलों की भक्ति से कर्मबन्धन की गाँठ खोलते हैं; केवल इन्द्रियनिरोध करने वाले भक्ति से रिक्त साधक वैसे सफल नहीं होते। उन शरणयोग्य वासुदेव का भजन करो।

श्लोक 22.40

कृच्छ्रो महानिह भवार्णवमप्लवेशां षड्वर्गनक्रमसुखेन तितीर्षन्ति । तत्त्वं हरेर्भगवतो भजनीयमङ्घ्रिं कृत्वोडुपं व्यसनमुत्तर दुस्तरार्णम् ॥ ४०॥

सरल हिंदी भावार्थ: मन और पाँच इन्द्रियों के मगरों से भरे संसारसागर को बिना नौका केवल प्रयास से पार करना बड़ा कठिन है। भगवान के पूजनीय चरणों को नौका बनाकर इस दुस्तर संकट से पार जाओ।

श्लोक 22.41

मैत्रेय उवाच । स एवं ब्रह्मपुत्रेण कुमारेणात्ममेधसा । दर्शितात्मगतिः सम्यक् प्रशस्योवाच तं नृपः ॥ ४१॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—आत्मज्ञानी ब्रह्मापुत्र सनत्कुमार ने पृथु को आत्मकल्याण का मार्ग दिखाया। राजा ने उनकी प्रशंसा करके कहा।

श्लोक 22.42

राजोवाच । कृतो मेऽनुग्रहः पूर्वं हरिणाऽऽर्तानुकम्पिना । तमापादयितुं ब्रह्मन् भगवन् यूयमागताः ॥ ४२॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथु बोले—दुःखियों पर कृपा करने वाले हरि ने पहले मुझ पर अनुग्रह किया था। आप उसी अनुग्रह को पूरा करने के लिए आए हैं।

श्लोक 22.43

निष्पादितश्च कार्त्स्न्येन भगवद्भिर्घृणालुभिः । साधूच्छिष्टं हि मे सर्वमात्मना सह किं ददे ॥ ४३॥

सरल हिंदी भावार्थ: करुणामय महात्माओ, आपने वह कार्य पूर्ण कर दिया। मेरे शरीर सहित सब कुछ संतों की कृपा से मिला है; बदले में मैं आपको क्या दे सकता हूँ?

श्लोक 22.44

प्राणा दाराः सुता ब्रह्मन् गृहाश्च सपरिच्छदाः । राज्यं बलं मही कोश इति सर्वं निवेदितम् ॥ ४४॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्राण, पत्नी, पुत्र, उपकरणों सहित घर, राज्य, सेना, पृथ्वी और धनकोश—सब आपके चरणों में समर्पित हैं।

श्लोक 22.45

सैनापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च । सर्वलोकाधिपत्यं च वेदशास्त्रविदर्हति ॥ ४५॥

सरल हिंदी भावार्थ: सेनापतित्व, राज्य, दण्डनीति और लोकों पर अधिकार का वास्तविक अधिकारी वही है जो वेद–शास्त्र के मर्म को जानकर न्याय करे।

श्लोक 22.46

स्वमेव ब्राह्मणो भुङ्क्ते स्वं वस्ते स्वं ददाति च । तस्यैवानुग्रहेणान्नं भुञ्जते क्षत्रियादयः ॥ ४६॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथु ने कहा—ब्रह्मज्ञानी जो भोगता, पहनता और दान देता है, वह उसके ज्ञानाधिकार का ही फल है; उसकी कृपा से शासक आदि भी अन्न पाते हैं। यह तत्कालीन ब्राह्मण–राजधर्म के सम्मान का कथन है।

श्लोक 22.47

यैरीदृशी भगवतो गतिरात्मवादे एकान्ततो निगमिभिः प्रतिपादिता नः । तुष्यन्त्वदभ्रकरुणाः स्वकृतेन नित्यं को नाम तत्प्रतिकरोति विनोदपात्रम् ॥ ४७॥

सरल हिंदी भावार्थ: जिन वेदज्ञों ने हमें आत्मज्ञान में भगवान की ऐसी गति स्पष्ट की, उनके उपकार का बदला कोई अपनी तुच्छ भेंट से कैसे दे? वे अपनी असीम करुणा और सत्कर्म से ही प्रसन्न हों।

श्लोक 22.48

मैत्रेय उवाच । त आत्मयोगपतय आदिराजेन पूजिताः । शीलं तदीयं शंसन्तः खेऽभूवन् मिषतां नृणाम् ॥ ४८॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—आत्मयोग के स्वामी कुमारों ने आदिराज की पूजा स्वीकार की, उनके शील की प्रशंसा की और सबके देखते आकाशमार्ग से चले गए।

श्लोक 22.49

वैन्यस्तु धुर्यो महतां संस्थित्याध्यात्मशिक्षया । आप्तकाममिवात्मानं मेन आत्मन्यवस्थितः ॥ ४९॥

सरल हिंदी भावार्थ: महात्माओं में अग्रणी पृथु अध्यात्मशिक्षा में स्थित होकर आत्मा में स्थिर और पूर्णकाम जैसे हो गए।

श्लोक 22.50

कर्माणि च यथाकालं यथादेशं यथाबलम् । यथोचितं यथावित्तमकरोद्ब्रह्मसात्कृतम् ॥ ५०॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने समय, स्थान, शक्ति, उपयुक्तता और साधनों के अनुसार सभी कर्म ब्रह्मार्पण भाव से किए।

श्लोक 22.51

फलं ब्रह्मणि विन्न्यस्य निर्विषङ्गः समाहितः । कर्माध्यक्षं च मन्वान आत्मानं प्रकृतेः परम् ॥ ५१॥

सरल हिंदी भावार्थ: फल भगवान को अर्पित करके वे अनासक्त और एकाग्र रहे; स्वयं को प्रकृति से परे तथा परमात्मा को कर्मों का साक्षी–नियन्ता जानते थे।

श्लोक 22.52

गृहेषु वर्तमानोऽपि स साम्राज्यश्रियान्वितः । नासज्जतेन्द्रियार्थेषु निरहम्मतिरर्कवत् ॥ ५२॥

सरल हिंदी भावार्थ: गृहस्थ और साम्राज्यवैभव से सम्पन्न रहते हुए भी वे सूर्य की तरह अनासक्त थे; अहंकार न होने से इन्द्रियविषयों में नहीं फँसे।

श्लोक 22.53

एवमध्यात्मयोगेन कर्माण्यनुसमाचरन् । पुत्रानुत्पादयामास पञ्चार्चिष्यात्मसम्मतान् ॥ ५३॥

सरल हिंदी भावार्थ: अध्यात्मयोग के साथ कर्तव्य निभाते हुए उन्होंने अर्चि से अपने अनुरूप पाँच पुत्र उत्पन्न किए।

श्लोक 22.54

विजिताश्वं धूम्रकेशं हर्यक्षं द्रविणं वृकम् । सर्वेषां लोकपालानां दधारैकः पृथुर्गुणान् ॥ ५४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनके नाम विजिताश्व, धूम्रकेश, हर्यक्ष, द्रविण और वृक थे। पृथु अकेले ही सभी लोकपालों के गुण धारण करते थे।

श्लोक 22.55

गोपीथाय जगत्सृष्टेः काले स्वे स्वेऽच्युतात्मकः । मनोवाग्वृत्तिभिः सौम्यैर्गुणैः संरञ्जयन् प्रजाः ॥ ५५॥

सरल हिंदी भावार्थ: भगवान के भाव में स्थित होकर वे उचित समय पर जगत की रक्षा करते और सौम्य मन, वाणी तथा सद्गुणों से प्रजा को प्रसन्न रखते थे।

श्लोक 22.56

राजेत्यधान्नामधेयं सोमराज इवापरः । सूर्यवद्विसृजन् गृह्णन् प्रतपंश्च भुवो वसु ॥ ५६॥

सरल हिंदी भावार्थ: चन्द्रमा की तरह सुख देने से उनका राजा नाम सार्थक था; सूर्य की तरह वे पृथ्वी की सम्पदा उचित समय पर लेते, लौटाते और उपयोग करते थे।

श्लोक 22.57

दुर्धर्षस्तेजसेवाग्निर्महेन्द्र इव दुर्जयः । तितिक्षया धरित्रीव द्यौरिवाभीष्टदो नृणाम् ॥ ५७॥

सरल हिंदी भावार्थ: तेज में अग्नि, दुर्जयता में इन्द्र, सहनशीलता में पृथ्वी और अभिलषित कल्याण देने में आकाश के समान थे।

श्लोक 22.58

वर्षति स्म यथाकामं पर्जन्य इव तर्पयन् । समुद्र इव दुर्बोधः सत्त्वेनाचलराडिव ॥ ५८॥

सरल हिंदी भावार्थ: वर्षामेघ की तरह आवश्यक समृद्धि देकर प्रजा को तृप्त करते; गम्भीरता में समुद्र और धैर्य में पर्वतराज जैसे थे।

श्लोक 22.59

धर्मराडिव शिक्षायामाश्चर्ये हिमवानिव । कुबेर इव कोशाढ्यो गुप्तार्थो वरुणो यथा ॥ ५९॥

सरल हिंदी भावार्थ: अनुशासन में धर्मराज, अद्भुत सम्पदा में हिमालय, कोशसमृद्धि में कुबेर और गोपनीय व्यवस्था में वरुण के समान थे।

श्लोक 22.60

मातरिश्वेव सर्वात्मा बलेन महसौजसा । अविषह्यतया देवो भगवान् भूतराडिव ॥ ६०॥

सरल हिंदी भावार्थ: वायु की तरह सर्वव्यापी सम्पर्क रखने वाले तथा बल, तेज और ओज में प्रचण्ड शिव के समान दुर्धर्ष थे।

श्लोक 22.61

कन्दर्प इव सौन्दर्ये मनस्वी मृगराडिव । वात्सल्ये मनुवन्नॄणां प्रभुत्वे भगवानजः ॥ ६१॥

सरल हिंदी भावार्थ: सौन्दर्य में कामदेव, आत्मबल में सिंह, प्रजा के प्रति वात्सल्य में मनु और प्रभुत्व में ब्रह्मा के समान थे।

श्लोक 22.62

बृहस्पतिर्ब्रह्मवादे आत्मवत्त्वे स्वयं हरिः । भक्त्या गोगुरुविप्रेषु विष्वक्सेनानुवर्तिषु । ह्रिया प्रश्रयशीलाभ्यामात्मतुल्यः परोद्यमे ॥ ६२॥

सरल हिंदी भावार्थ: ब्रह्मचर्चा में बृहस्पति और आत्मसंयम में हरि जैसे थे। गौ, गुरु, ज्ञानियों और भगवान के भक्तों के प्रति भक्ति तथा लज्जा, विनय और परोपकार में उनका आदर्श स्वयं उनका चरित्र था।

श्लोक 22.63

कीर्त्योर्ध्वगीतया पुम्भिस्त्रैलोक्ये तत्र तत्र ह । प्रविष्टः कर्णरन्ध्रेषु स्त्रीणां रामः सतामिव ॥ ६३॥

सरल हिंदी भावार्थ: पुरुष तीनों लोकों में उनकी ऊँची कीर्ति गाते थे; उनका यश स्त्रियों के कानों तक भी ऐसे पहुँचा जैसे संतों के हृदय में श्रीराम का प्रिय चरित्र।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 22 समाप्त ॥

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चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 23

पृथु का वानप्रस्थ, परमगति और फलश्रुति

श्लोक 23.1

मैत्रेय उवाच । दृष्ट्वाऽऽत्मानं प्रवयसमेकदा वैन्य आत्मवान् । आत्मना वर्धिताशेषस्वानुसर्गः प्रजापतिः ॥ १॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—सब आश्रितों का पोषण कर चुके आत्मसंयमी प्रजापालक पृथु ने एक दिन देखा कि उनकी आयु ढल गई है।

श्लोक 23.2

जगतस्तस्थुषश्चापि वृत्तिदो धर्मभृत्सताम् । निष्पादितेश्वरादेशो यदर्थमिह जज्ञिवान् ॥ २॥

सरल हिंदी भावार्थ: वे स्थावर और जङ्गम सबकी आजीविका देने वाले, संतों के धर्मरक्षक और जिस उद्देश्य से जन्मे थे उस ईश्वरीय आज्ञा को पूरा करने वाले थे।

श्लोक 23.3

आत्मजेष्वात्मजां न्यस्य विरहाद्रुदतीमिव । प्रजासु विमनःस्वेकः सदारोऽगात्तपोवनम् ॥ ३॥

सरल हिंदी भावार्थ: उन्होंने अपनी पुत्री मानी पृथ्वी का भार पुत्रों को सौंपा। प्रजा उनके वियोग से दुखी थी; वे पत्नी के साथ तपोवन चले गए।

श्लोक 23.4

तत्राप्यदाभ्यनियमो वैखानससुसम्मते । आरब्ध उग्रतपसि यथा स्वविजये पुरा ॥ ४॥

सरल हिंदी भावार्थ: वहाँ वानप्रस्थों के मान्य मार्ग में अटल नियम लेकर उन्होंने कठोर तप आरम्भ किया, जैसे पहले पृथ्वी को व्यवस्थित करने में दृढ़ प्रयत्न किया था।

श्लोक 23.5

कन्दमूलफलाहारः शुष्कपर्णाशनः क्वचित् । अब्भक्षः कतिचित्पक्षान् वायुभक्षस्ततः परम् ॥ ५॥

सरल हिंदी भावार्थ: कथा में उनके कन्द–मूल–फल, कभी सूखे पत्तों, कुछ समय जल और फिर वायु पर निर्वाह का तपवर्णन है।

श्लोक 23.6

ग्रीष्मे पञ्चतपा वीरो वर्षास्वासारषाण्मुनिः । आकण्ठमग्नः शिशिरे उदके स्थण्डिलेशयः ॥ ६॥

सरल हिंदी भावार्थ: ग्रीष्म में पञ्चाग्नि, वर्षा में खुली वर्षाधारा, शीत में गले तक जल और भूमि पर शयन जैसे तप किए, ऐसा पौराणिक वर्णन है।

श्लोक 23.7

तितिक्षुर्यतवाग्दान्त ऊर्ध्वरेता जितानिलः । आरिराधयिषुः कृष्णमचरत्तप उत्तमम् ॥ ७॥

सरल हिंदी भावार्थ: सहनशील, संयतवाणी, इन्द्रियजयी, ब्रह्मचारी और प्राणसंयमी होकर वे कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए तप करते रहे।

श्लोक 23.8

तेन क्रमानुसिद्धेन ध्वस्तकर्ममलाशयः । प्राणायामैः सन्निरुद्धषड्वर्गश्छिन्नबन्धनः ॥ ८॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्रमशः साधना से कर्ममल नष्ट हुआ; प्राणसंयम से मन और पाँच इन्द्रियाँ वश में आईं और बन्धन कट गए।

श्लोक 23.9

सनत्कुमारो भगवान् यदाहाध्यात्मिकं परम् । योगं तेनैव पुरुषमभजत्पुरुषर्षभः ॥ ९॥

सरल हिंदी भावार्थ: सनत्कुमार ने जो परम अध्यात्मयोग बताया था, उसी से पुरुषश्रेष्ठ पृथु परम पुरुष की आराधना करते रहे।

श्लोक 23.10

भगवद्धर्मिणः साधोः श्रद्धया यततः सदा । भक्तिर्भगवति ब्रह्मण्यनन्यविषयाभवत् ॥ १०॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रद्धा से निरन्तर भगवद्धर्म का पालन करने वाले सज्जन पृथु की भगवान में अनन्य भक्ति हो गई।

श्लोक 23.11

तस्यानया भगवतः परिकर्मशुद्ध- सत्त्वात्मनस्तदनुसंस्मरणानुपूर्त्या । ज्ञानं विरक्तिमदभून्निशितेन येन चिच्छेद संशयपदं निजजीवकोशम् ॥ ११॥

सरल हिंदी भावार्थ: सेवा से शुद्ध अन्तःकरण और निरन्तर स्मरण के कारण वैराग्ययुक्त ज्ञान उत्पन्न हुआ; उसकी तीक्ष्ण शक्ति से संशय और सूक्ष्म जीवबन्धन की गाँठ कट गई।

श्लोक 23.12

छिन्नान्यधीरधिगतात्मगतिर्निरीह- स्तत्तत्यजेऽच्छिनदिदं वयुनेन येन । तावन्न योगगतिभिर्यतिरप्रमत्तो यावद्गदाग्रजकथासु रतिं न कुर्यात् ॥ १२॥

सरल हिंदी भावार्थ: आत्मगति पाकर और अन्य इच्छाएँ मिट जाने पर उन्होंने भेद काटने वाले साधनज्ञान का आग्रह भी छोड़ा। जब तक भगवान की कथा में प्रेम न हो, साधक को योगसाधना में असावधान नहीं होना चाहिए।

श्लोक 23.13

एवं स वीरप्रवरः संयोज्यात्मानमात्मनि । ब्रह्मभूतो दृढं काले तत्याज स्वं कलेवरम् ॥ १३॥

सरल हिंदी भावार्थ: इस प्रकार वीरश्रेष्ठ पृथु ने चित्त को आत्मा में दृढ़ स्थापित किया और समय आने पर ब्रह्मभाव में स्थित होकर शरीर त्याग दिया।

श्लोक 23.14

सम्पीड्य पायुं पार्ष्णिभ्यां वायुमुत्सारयञ्छनैः । नाभ्यां कोष्ठेष्ववस्थाप्य हृदुरःकण्ठशीर्षणि ॥ १४॥

सरल हिंदी भावार्थ: कथा के योगवर्णन में कहा गया है कि उन्होंने एड़ियों से अधोभाग सँभाला और प्राण को क्रमशः नाभि, उदर, हृदय, छाती, कण्ठ तथा मस्तक की ओर उठाया।

श्लोक 23.15

उत्सर्पयंस्तु तं मूर्ध्नि क्रमेणावेश्य निःस्पृहः । वायुं वायौ क्षितौ कायं तेजस्तेजस्ययूयुजत् ॥ १५॥

सरल हिंदी भावार्थ: अनासक्त होकर प्राण को मस्तक तक ले गए और देह के वायु, पृथ्वी तथा तेजतत्त्व को उनके व्यापक तत्त्वों में लीन किया।

श्लोक 23.16

खान्याकाशे द्रवं तोये यथास्थानं विभागशः । क्षितिमम्भसि तत्तेजस्यदो वायौ नभस्यमुम् ॥ १६॥

सरल हिंदी भावार्थ: आकाशांश को आकाश और जलांश को जल में मिलाया; फिर पृथ्वी को जल, जल को तेज, तेज को वायु और वायु को आकाश में क्रम से लीन किया।

श्लोक 23.17

इन्द्रियेषु मनस्तानि तन्मात्रेषु यथोद्भवम् । भूतादिनामून्युत्कृष्य महत्यात्मनि सन्दधे ॥ १७॥

सरल हिंदी भावार्थ: मन और इन्द्रियों को उनके सूक्ष्म विषयों में, उन्हें अहंकार में और अहंकार को महत्तत्त्व में समेटा, ऐसा तत्त्वलय का वर्णन है।

श्लोक 23.18

तं सर्वगुणविन्यासं जीवे मायामये न्यधात् । तं चानुशयमात्मस्थमसावनुशयी पुमान् । ज्ञानवैराग्यवीर्येण स्वरूपस्थोऽजहात्प्रभुः ॥ १८॥

सरल हिंदी भावार्थ: गुणों के समस्त विन्यास को मायिक जीवोपाधि में समेटकर ज्ञान और वैराग्य की शक्ति से उस सूक्ष्म संस्कार को भी छोड़ा तथा अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो गए।

श्लोक 23.19

अर्चिर्नाम महाराज्ञी तत्पत्न्यनुगता वनम् । सुकुमार्यतदर्हा च यत्पद्भ्यां स्पर्शनं भुवः ॥ १९॥

सरल हिंदी भावार्थ: उनकी महारानी अर्चि भी वन गई थीं। वे इतनी सुकुमारी थीं कि पहले उनके चरण पृथ्वी के कठोर स्पर्श के भी अभ्यस्त नहीं थे।

श्लोक 23.20

अतीव भर्तुर्व्रतधर्मनिष्ठया शुश्रूषया चार्षदेहयात्रया । नाविन्दतार्तिं परिकर्शितापि सा प्रेयस्करस्पर्शनमाननिर्वृतिः ॥ २०॥

सरल हिंदी भावार्थ: पति के व्रतधर्म में निष्ठा, सेवा और ऋषियों जैसी सादगी से उनका शरीर दुर्बल हुआ, फिर भी पति के स्नेह और आदर से तृप्त होकर वे कष्ट को प्रधान नहीं मानती थीं।

श्लोक 23.21

देहं विपन्नाखिलचेतनादिकं पत्युः पृथिव्या दयितस्य चात्मनः । आलक्ष्य किञ्चिच्च विलप्य सा सती चितामथारोपयदद्रिसानुनि ॥ २१॥

सरल हिंदी भावार्थ: पृथ्वीपति और अपने प्रिय पति का शरीर चेतनारहित देखकर अर्चि ने कुछ विलाप किया और पर्वत की ढलान पर चिता बनवाई।

श्लोक 23.22

विधाय कृत्यं ह्रदिनीजलाप्लुता दत्त्वोदकं भर्तुरुदारकर्मणः । नत्वा दिविस्थांस्त्रिदशांस्त्रिः परीत्य विवेश वह्निं ध्यायती भर्तृपादौ ॥ २२॥

सरल हिंदी भावार्थ: कथा कहती है कि अन्त्यकर्म और जलाञ्जलि देकर, नदी में स्नान करके तथा देवताओं को प्रणाम और चिता की परिक्रमा करके अर्चि पति का ध्यान करती अग्नि में प्रविष्ट हुईं। यह प्राचीन आख्यान का वर्णन है, आज विधवा के लिए अनुकरणीय धर्म या निर्देश नहीं।

श्लोक 23.23

विलोक्यानुगतां साध्वीं पृथुं वीरवरं पतिम् । तुष्टुवुर्वरदा देवैर्देवपत्न्यः सहस्रशः ॥ २३॥

सरल हिंदी भावार्थ: पति पृथु के पीछे गई साध्वी अर्चि को देखकर हजारों देवपत्नियों ने अपने पतियों सहित उनकी निष्ठा की प्रशंसा की।

श्लोक 23.24

कुर्वत्यः कुसुमासारं तस्मिन् मन्दरसानुनि । नदत्स्वमरतूर्येषु गृणन्ति स्म परस्परम् ॥ २४॥

सरल हिंदी भावार्थ: उस पर्वतशिखर पर पुष्पवर्षा करते हुए और दिव्य वाद्यों की ध्वनि के बीच वे परस्पर कहने लगीं।

श्लोक 23.25

देव्य ऊचुः । अहो इयं वधूर्धन्या या चैवं भूभुजां पतिम् । सर्वात्मना पतिं भेजे यज्ञेशं श्रीर्वधूरिव ॥ २५॥

सरल हिंदी भावार्थ: देवपत्नियाँ बोलीं—यह रानी धन्य है; इन्होंने अपने पति की सर्वभाव से वैसे सेवा की जैसे लक्ष्मी यज्ञेश्वर की करती हैं।

श्लोक 23.26

सैषा नूनं व्रजत्यूर्ध्वमनु वैन्यं पतिं सती । पश्यतास्मानतीत्यार्चिर्दुर्विभाव्येन कर्मणा ॥ २६॥

सरल हिंदी भावार्थ: देखो, अर्चि अपने अद्भुत कर्म के प्रभाव से हमारे लोकों को पार करके पति पृथु के पीछे उच्च गति को जा रही हैं।

श्लोक 23.27

तेषां दुरापं किं त्वन्यन्मर्त्यानां भगवत्पदम् । भुवि लोलायुषो ये वै नैष्कर्म्यं साधयन्त्युत ॥ २७॥

सरल हिंदी भावार्थ: क्षणभङ्गुर मनुष्यजीवन में जो निष्काम स्थिति प्राप्त कर लेते हैं, उनके लिए भगवान का पद छोड़ और क्या दुर्लभ होगा?

श्लोक 23.28

स वञ्चितो बतात्मध्रुक् कृच्छ्रेण महता भुवि । लब्ध्वापवर्ग्यं मानुष्यं विषयेषु विषज्जते ॥ २८॥

सरल हिंदी भावार्थ: बहुत कठिनाई से मुक्ति का अवसर देने वाला मनुष्यजन्म पाकर भी जो केवल विषयों में फँसता है, वह अपने ही हित को खो देता है।

श्लोक 23.29

मैत्रेय उवाच । स्तुवतीष्वमरस्त्रीषु पतिलोकं गता वधूः । यं वा आत्मविदां धुर्यो वैन्यः प्रापाच्युताश्रयः ॥ २९॥

सरल हिंदी भावार्थ: मैत्रेय ने कहा—देवाङ्गनाओं की स्तुति के बीच अर्चि उसी दिव्य गति को पहुँचीं जिसे आत्मज्ञानियों में अग्रणी और अच्युताश्रित पृथु ने पाया था।

श्लोक 23.30

इत्थम्भूतानुभावोऽसौ पृथुः स भगवत्तमः । कीर्तितं तस्य चरितमुद्दामचरितस्य ते ॥ ३०॥

सरल हिंदी भावार्थ: महान भक्त पृथु का ऐसा प्रभाव था। उनके उदार कर्मों का चरित्र मैंने तुम्हें सुनाया।

श्लोक 23.31

य इदं सुमहत्पुण्यं श्रद्धयावहितः पठेत् । श्रावयेच्छृणुयाद्वापि स पृथोः पदवीमियात् ॥ ३१॥

सरल हिंदी भावार्थ: जो श्रद्धा और ध्यान से इस महान पुण्यकथा को पढ़े, सुनाए या सुने, उसके लिए पृथु की कल्याणकारी गति का फल कहा गया है।

श्लोक 23.32

ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चस्वी राजन्यो जगतीपतिः । वैश्यः पठन् विट्पतिः स्याच्छूद्रः सत्तमतामियात् ॥ ३२॥

सरल हिंदी भावार्थ: फलश्रुति में ब्राह्मण को ब्रह्मतेज, क्षत्रिय को योग्य शासन, वैश्य को व्यापारिक प्रतिष्ठा और शूद्र को श्रेष्ठ सद्गुण प्राप्त होने की बात है; अपने क्षेत्र में उन्नति इसका भाव है।

श्लोक 23.33

त्रिकृत्व इदमाकर्ण्य नरो नार्यथवाऽऽदृता । अप्रजः सुप्रजतमो निर्धनो धनवत्तमः ॥ ३३॥

सरल हिंदी भावार्थ: श्रद्धा से इसे तीन बार सुनने वाले स्त्री या पुरुष के लिए सन्तानहीनता और निर्धनता के दुःख दूर होकर उत्तम सन्तान तथा समृद्धि मिलने का पारम्परिक फल कहा गया है।

श्लोक 23.34

अस्पष्टकीर्तिः सुयशा मूर्खो भवति पण्डितः । इदं स्वस्त्ययनं पुंसाममङ्गल्यनिवारणम् ॥ ३४॥

सरल हिंदी भावार्थ: अल्पकीर्ति वाले को यश और अज्ञानी को ज्ञान मिले—ऐसी फलश्रुति है। यह कथा मंगलकारी और अमंगल दूर करने वाली मानी गई है।

श्लोक 23.35

धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं कलिमलापहम् । धर्मार्थकाममोक्षाणां सम्यक् सिद्धिमभीप्सुभिः । श्रद्धयैतदनुश्राव्यं चतुर्णां कारणं परम् ॥ ३५॥

सरल हिंदी भावार्थ: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि चाहने वालों को इसे श्रद्धा से सुनना चाहिए; इसे पुण्य, यश, शुभ आयु, कल्याण और कलिमलनाश का साधन कहा गया है।

श्लोक 23.36

विजयाभिमुखो राजा श्रुत्वैतदभियाति यान् । बलिं तस्मै हरन्त्यग्रे राजानः पृथवे यथा ॥ ३६॥

सरल हिंदी भावार्थ: विजय के लिए प्रस्थान करने वाला राजा यह कथा सुने तो दूसरे राजा उसे पृथु की तरह आदर और भेंट दें—यह भी फलश्रुति का कथन है।

श्लोक 23.37

मुक्तान्यसङ्गो भगवत्यमलां भक्तिमुद्वहन् । वैन्यस्य चरितं पुण्यं श‍ृणुयाच्छ्रावयेत्पठेत् ॥ ३७॥

सरल हिंदी भावार्थ: अन्य आसक्तियाँ छोड़कर भगवान में निर्मल भक्ति बढ़ाते हुए पृथु का यह पवित्र चरित्र सुनो, सुनाओ और पढ़ो।

श्लोक 23.38

वैचित्रवीर्याभिहितं महन्माहात्म्यसूचकम् । अस्मिन् कृतमतिर्मर्त्यः पार्थवीं गतिमाप्नुयात् ॥ ३८॥

सरल हिंदी भावार्थ: विचित्रवीर्य के पुत्र विदुर, यह चरित्र महात्मा की महिमा प्रकट करता है। इसमें मन लगाकर मनुष्य पृथु की श्रेष्ठ गति प्राप्त कर सकता है।

श्लोक 23.39

अनुदिनमिदमादरेण श‍ृण्वन् पृथुचरितं प्रथयन् विमुक्तसङ्गः । भगवति भवसिन्धुपोतपादे स च निपुणां लभते रतिं मनुष्यः ॥ ३९॥

सरल हिंदी भावार्थ: प्रतिदिन आदर से पृथुचरित्र सुनने–सुनाने और आसक्ति छोड़ने से मनुष्य उन भगवान में गहरा प्रेम पाता है जिनके चरण संसारसागर पार करने की नौका हैं।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • अध्याय 23 समाप्त ॥

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इस भाग का भक्ति-सन्देश

सत्ता का उद्देश्य प्रजा की रक्षा, न्याय और आजीविका है। पृथु का चरित्र बाहरी सफलता से भीतर की अनासक्ति तक जाता है। संतों की सेवा, निष्काम कर्म, सभी प्राणियों का हित और भगवान की कथामृत में प्रेम उसके केन्द्र हैं।

पाठाधार और संपादकीय जानकारी

प्राचीन मूल संस्कृत पाठ का आधार Sanskrit Documents का “श्रीमद्भागवतं—चतुर्थस्कन्धः” है। अध्याय 13–23 में क्रमशः 49, 46, 26, 27, 36, 32, 42, 38, 52, 63 और 39 श्लोक हैं; कुल 450। आधार-पाठ में अध्याय 21 का क्रम 44 के बाद 46–53 अंकित है। श्लोक “इति ब्रुवाणं नृपतिम्” और अंतिम श्लोक का दूसरे संस्कृत संस्करण से मिलान करके यहाँ वह क्रम 45–52 रखा गया है; कोई श्लोक हटाया नहीं गया। हिंदी भावार्थ स्वतंत्र संपादकीय प्रस्तुति है। वंशोत्पत्ति, दिव्य घटनाएँ और फलश्रुतियाँ पौराणिक परम्परा के अनुसार हैं। सामाजिक उत्पत्तिकथाएँ किसी वर्तमान समुदाय के मूल्य का निर्णय नहीं हैं। अध्याय 23 में अर्चि का अग्निप्रवेश प्राचीन आख्यान की घटना है, आज किसी विधवा के लिए धर्मादेश या अनुकरण का निर्देश नहीं। तपस्या और योगलय के विवरण भी कथा के प्रसंग हैं।

॥ चतुर्थ स्कन्ध • भाग ३ समाप्त ॥

॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

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